पौराणिक शिक्षा
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
PtSantoshBhardwaj
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वानर राज बाली के पुत्र तो दूत बनाकर रावण के दरवार में भेजा गया ताकि वो नीतिगत व्यवहार करते हुए माँ सीता को स्वतः मुक्त दे। महाविद्वान रावण की बुद्धि का नाश हो चुका था और उसका अंत समय निकट था। ऐसा जानकर अंगद ने उसे समझने का विफल प्रयास किया।
सूर्य और चन्द्र अपने समय पर निकलते हैं। धरती और अन्य ग्रह-नक्षत्र अपनी निश्चित गति से भ्रमण करते हैं। प्रकृति में प्रत्येक वस्तु नियम का पालन करती है। जो मनुष्य अपने जीवन में सात्विक विचारों से जीवन निर्वाह करता है वह मोक्ष का हकदार हो जाता है। अतः अच्छे और सुखी जीवन के लिए जरूरी है कि कुछ शास्त्रोक्त नियमों का पालन किया जाए।
मृत्यु एक अटल सत्य है। देह एक दिन खत्म हो जानी है, यह पूर्व निश्चित है। आमतौर पर यही माना जाता है कि जब देह निष्क्रिय होती है, तब ही इंसान की मृत्यु होती है, लेकिन कोई भी इंसान देह के निष्क्रिय हो जाने मात्र से नहीं मरता। कई बार जीवित रहते हुए भी व्यक्ति मृतक के समान हो जाता है।
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्री रामचरित मानस के लंकाकांड में एक प्रसंग आता है, जब लंका दरबार में रावण और अंगद के बीच संवाद होता है। इस संवाद में अंगद ने रावण को बताया है कि कौन-कौन से 14 दुर्गण या बातें आने पर व्यक्ति जीते जी मृतक समान हो जाते हैं।
In the Lanka Kand of the Ram Charit Manas, Angad, the son of Bali, went to Ravan’s royal court as a messenger of Bhawan Shri Ram. He advised Ravan to return Mata Sita peacefully and follow the path of righteousness.
Ravan’s wisdom had been destroyed by arrogance and his end was near. Angad tried to counsel him, but Ravan refused to listen.
Sun and Moon rise at the fixed time. Earth, planets, constellations revolve in their fixed orbits, in fixed period of time. Every thing in nature is governed by rules. One who follows virtuous life deserve Salvation-Moksh. For happy and comfortable life one must follow the rules-regulations framed in scriptures.
Death is must, Ultimate truth. Body has to fall one day or the other. Its predestined. Its believed that a person is dead when the body become inactive-actionless. But just by becoming motionless its not essential to be dead. Some times a person though alive but is just dead.
Angad explained that a person does not die only when the body becomes lifeless. Sometimes, even while physically alive, a person becomes like the dead due to evil qualities.
One who abandons dharma (righteousness).
A greedy person who is never satisfied.
One who is constantly angry.
A person drowned in lust and sensuality.
One blinded by pride and arrogance.
A slanderer of noble people.
One who disrespects teachers, parents and elders.
An ungrateful person.
One who rejects or insults sacred scriptures.
A betrayer who breaks trust.
A deceitful and crooked-minded individual.
A ruler or leader who governs unjustly and selfishly.
One who avoids good company (Satsang-virtuous-righteous company).
A person who turns away from God and spiritual remembrance.
Just as the sun and moon rise at their appointed times and the planets move in fixed order, nature follows discipline and law. Likewise, a human being should live with purity, balance, and righteous conduct.
Death of the body is certain, but a life filled with virtue leads to honour and spiritual elevation.
Arrogance, greed, and unrighteousness make a person fall, just as they led to Ravan’s destruction.
Continue reading रावण अंगद संवाद :: 14 Bad habits बुरी आदतें :-
(1). कामी-लम्पट-दुराचारी :- इन्द्रिय लोलुप, अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है।
Extremely Sexy-lascivious :- One who after the satisfaction o sensual organs, passionate is like a dead log.
(2). वाम मार्गी :- जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले। जो भगवान् को न मानता हो या स्वयं को भगवान् कहता हो, संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो; नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।
Vam Margi-Anti Social :- Who move against the society, social norms, culture- behaviour, Who is atheist. Considers-declares himself to be God. Find negativity behind every thing. Do not follow rules-regulations. Who abandon the established practices in society act against the Dharm is Vam Margi and like dead.
(3). कृपण-कंजूस :- अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म के कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याण कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो। दान करने से बचता हो। ऐसा आदमी भी मृत समान ही है। मरने के बाद सभी कुछ यहीँ रह जाता है केवल बुराई या भलाई ही साथ जाती है।
Extreme miserliness :- Such person is like dead. One who hesitate in participating in religious, social, welfare of the others (poor, needy), is like dead. One who do not donate is like dead. After death every thing is left behind only virtuous and sins are carried over to next births.
(4). अति दरिद्र :- पूर्वजन्मों के कर्मफल के रूप दारिद्रय प्राप्त होता है। गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वो भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ हैं। दरिद्र व्यक्ति को नहीं चाहिए, क्योकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। बल्कि गरीब लोगों की मदद नहीं चाहिए।
Extreme Poverty ;- Its the outcome of previous birth's deeds. Its the biggest curse. A person without wealth, self confidence, honour-respect and courage is like a dead log. Do not rebuke-insult the poor, since he is already dead. Instead help the poor, poverty stricken, needy. It will definitely reshape your future, brighten with good luck.
(5). विमूढ़ :- ज्ञान शून्य, निर्बुद्धि, विवेकहीन यानि अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसके पास विवेक, बुद्धि नहीं हो। जो खुद निर्णय ना ले सके। हर काम को समझने या निर्णय को लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृत के समान ही है।
विमूढ़ :: परेशान, व्याकुल, भ्रांत, विमूढ़, घबड़ाया हुआ, अस्तव्यस्त, अत्यंत मोहित, भ्रम में पड़ा हुआ; idiot, confused.
An idiot, ignorant, who lack knowledge is like dead. He has no intelligence, prudence. He depends over others for his actions-efforts, endeavours, depends over others.
(6). अजसि-बदनाम :- जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर, परिवार, कुटुंब, समाज, नगर या राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता है, वह व्यक्ति मृत समान ही होता है। नाम अच्छा बदनाम बुरा। नामी कमा खावे बदनाम मारा जाये।
Defamation :- A defamed person is like dead. One who is not respected-honoured by the family, clan, society, cities or the nation is like dead. One should have virtues instead to defamation.
(7). रोगी :- जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता विचार हावी हो जाती है। व्यक्ति मुक्ति की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति स्वस्थ्य जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।अच्छा स्वास्थ्य हज़ार नियामतें।
Patient-ill, prolonged illness :- A person suffering from diseases (physical or mental) continuously is like dead. He remain disturbed due to the absence of good health. Negativity over power him. He starts praying for release from the body i.e., death.
(8). अत्यधिक वृद्ध व्यक्ति :- अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों असक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार स्वयं वह और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।
Too old-aged :- He too is like dead, since he has to depend over others. His mind and body become incapable. In such cases some times his own people start praying for his release-death so that he is freed from the pain-trauma.
(9). संतत क्रोधी :- हर वक्त क्रोध में रहने वाला भी मृत समान ही है। हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करना ऐसे लोगों का काम होता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि, दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता है।
Short tempered :- An eternally angry person too is like dead. He gets angry over tit bits. As a result of his innerself & mind goes out of control. He looses prudence.
(10). अघ खानी :- जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है।पाप की कमाई से किया गया पुण्य भी पाप फल प्रदानकरता है।
Agh Khani :- A person who run-support his family with the money earned through sinful-deceitful means is like dead. His family members, companions too become alike.
Continue reading रावण अंगद संवाद :: 14 Bad habits बुरी आदतें
SCRIPTURE'S TEACHINGS पौराणिक शिक्षा
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(11). तनु पोषक :- ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना ना हो तो ऐसा व्यक्ति भी मृत समान है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकि किसी अन्य को मिले ना मिले, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं।
(12). निंदक :- निंदक से सम्बन्ध कभी भी परेशानी का सबब बन सकता है। अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियां ही नजर आती हैं। जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता। ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे तो सिर्फ किसी ना किसी की बुराई ही करे, वह इंसान मृत समान होता है।
(13). विष्णु विमुख :- जो व्यक्ति परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति ये सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं। हम जो करते हैं, वही होता है। संसार हम ही चला रहे हैं। जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता है, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।
(14). संत और वेद विरोधी :- जो व्यक्ति साधु-गुरुजन-माँ-बाप, संत, ग्रंथ, पुराण और वेदों का विरोधी है, वह भी मृत समान होता है।
शिवपुराण :: मेहमान नवाज़ी-अतिथि सत्कार
समय और काल के अनुरूप मान्यताएँ, मर्यादाएँ बदल जाती हैं। वर्तमान काल में मेहमान नवाज़ी से पहले यह देखना आवश्यक है कि व्यक्ति किस इरादे से आया है। उसे घर में घुसाने से पहले विचार कर लें। अनजान व्यक्ति को घर में प्रवेश न करने दें। अगर महिला घर में अकेली है तो उसे चाहिए कि आगन्तुक को प्रवेश ने करने दे। मिलने-जुलने वालों को दिन में बुलाएँ। व्यवसाय सम्बन्धी बातचीत के लिए किसी को भी घर में घुसाना दीर्घकाल में बेहद हानिकारक सिद्ध होता है। घर और व्यवसायिक गतिविधियाँ अलग-अलग स्थानों-परिसर में चलायें।
घर आए मेहमान को यदि भोजन करवाते हैं तो निम्न कुछ बातें विशेषतया ध्यान में रखें। सामान्यतया ये नियम धर्म-कर्म, पूजा-पाठ, श्राद्ध, ब्राह्मण-गुरु, गुरुजनों, रिश्तेदारों, सगे-सम्बन्धियों के आगमन पर लागु होते हैं। विधर्मी, अपराधी, विरोधी, असामाजिक तत्वों को घर से दूर ही रखें।
(1). मन साफ हो :- यदि मनुष्य का मन शुद्ध नहीं है तो, उसे अपने शुभ कर्मों का फल नहीं मिलता है। घर आए अतिथि का सत्कार करते समय या उन्हें भोजन करवाते समय कोई भी गलत भावों को मन में नहीं आने देना चाहिए। अतिथि सत्कार के समय जिस मनुष्य के मन में जलन, क्रोध, हिंसा जैसे बातें चलती रहती हैं, उसे कभी अपने कर्मों का उचित फल नहीं मिलता है।
(2). मधुर प्रेममयी वाणी :- घर आए-बुलाये अतिथि का अपमान नहीं करना चाहिए। कई बार मनुष्य क्रोध में आकर या किसी भी अन्य कारणों से घर आए मेहमान का अपमान कर देता है तो वह पाप का भागी बन जाता है। हर मनुष्य को अपने घर आए मेहमान का अच्छे भोजन से साथ-साथ पवित्र और मीठी वाणी के साथ स्वागत-सत्कार करना चाहिए।
(3). शुद्ध शरीर व वस्त्र :- मेहमान को भगवान के समान माना जाता है। अपवित्र शरीर से न भगवान की सेवा की जाती है और न ही मेहमान की। किसी को भी भोजन करवाने से पहले मनुष्य को शुद्ध जल से स्नान करके, साफ कपड़े धारण करना चाहिए। अपवित्र या बासी शरीर से की गई सेवा का फल कभी नहीं मिलता है।
(4). उपहार-दक्षिणा :- घर पर अनुग्रह करने के लिए पधारे ब्राह्मण-पुरोहित-गुरु-आचार्य, ऋत्विज, कंजकों में आए कन्या-लाँगुरा को दक्षिणा-उपहार अवश्य दें। अच्छी भावनाओं से दिया गया उपहार हमेशा ही शुभ फल देने वाला होता है।
(1). अशुद्ध-बगैर धुले वस्त्र सौभाग्य नष्ट हैं :- अशुद्ध तन, मन और वस्त्र माँ लक्ष्मी की कृपा के पात्र नहीं हो सकते। माता उनका त्याग कर देती है। वे समाज में भी सम्मान प्राप्त नहीं कर पाते। साफ एवं सुगंधित वस्त्र धारण करने पर लक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रहती है।
(2). अभ्यास के बिना विद्या नष्ट हो जाती है :- मनुष्य को ज्ञान-विद्या का निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिये।
(3). संतुलित और सुपाच्य भोजन-आहार ग्रहण करें :- अधिकांश बीमारियां असंतुलित खान-पान की वजह से ही होती हैं। मनुष्य को हमेशां सदैव सुपाच्य भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। तली हुई गरिष्ठ भोजन से सदैव बचें। ऐसे भोजन से पाचन तंत्र ठीक से काम करता है और भोजन से पूर्ण ऊर्जा शरीर को प्राप्त होती है। यदि पाचन तंत्र स्वस्थ रहेगा तो व्याधि-बीमारी-रोग भी दूर रहेंगे। रहता है और इस वजह से हम रोगों से बचे रहते हैं।
(4). विवेक-चतुराई पूर्ण संतुलित व्यवहार :- मनुष्य को शत्रु को कभी अपने से कमजोर नहीं समझना चाहिए। उसकी हर गतिविधियों पर पैनी नज़र रखनी चाहिए। उसके सम्बंधित नीति का कभी खुलासा नहीं करना चाहिए। उसकी हर चाल को समझकर नीति-निर्धारण करना जरूरी है। वक्त से पहले अपनी चाल-नीति उजागर करने वाले को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है।
गरुड़ पुराण :: न्याय संगत कठोर व्यवहार
तुलसीदास जी ने राम चरित मानस में कहा है कि ढ़ोल, गँवार शूद्र, पशु और नारी ये सब ताड़न के अधिकारी। ये कथन विशेष परिस्थितियों में लागु होता है हर वक्त नहीं। अर्थात जब वह अपनी सीमा-मर्यादा से बाहर निकल जाये। मनुष्यों की कुछ अन्य श्रेणियाँ और भी हैं जिनके साथ सदैव कठोर-न्यायोचित व्यवहार ही करना चाहिए। यदि इनके साथ नरमी से बात करेंगे तो वे कभी भी उचित व्यवहार नहीं करेंगे। मालिक को चाहिए कि वह सख्ती तो करे मगर अभद्र व्यवहार, मार-पीट न करे। वैसे सीमा से अधिक कठोरता उचित नहीं है। ताड़ना का अर्थ मारपीट कदापि नहीं है अपितु समुचित न्यायोचित, सम सामयिक व्यवहार है।
(1). दुष्ट-दुर्जन व्यक्ति :- असामाजिक तत्व, कुटिल, खल, कामी, आतंकवादी, चोर-लुटेरे, डाकु, बलात्कारी आदि के साथ नम्रता पूर्वक व्यवहार व्यर्थ है। वह विनम्रता, सदाचार की बोली नहीं समझता। उसका बहिष्कार, कैद में रहना ही उचित है। कभी-कभी ऐसे लोग सुधर भी जाते हैं।
(2). शिल्पकार यानी कारीगर या मजदूर :- यह नियम केवल उन्हीं कामचोरों पर लागु होता है जो पारिश्रमिक लेकर भी काम करके राज़ी नहीं हैं। वर्तमान समाज और परिस्थितियों में सार्वजनिक-सरकारी क्षेत्र के कर्मचारी-मंत्री-संत्री इसी श्रेणी में आते हैं। न खुद कुछ करते हैं और न दूसरों को कुछ करने देते हैं। वैसे निजी, गैर-सरकारी, व्यक्तिगत क्षेत्र का हालत भी अच्छे नहीं हैं। सब ओर आपा धापी, मारा-मारी है। अतः पैसा देकर काम करना है तो सख्ती से पेश आइये।(3). दास, गुलाम, भृत्य, नौकर :- यदि वह उल्टा बोलता है, आज्ञा का पालन नहीं करता, दिया हुआ काम समय से नहीं निपटाता, आलसी है, नाश करता है, बातूनी है, उससे मिलने-जुलने वाले समय-वेसमय आते हैंतो सावधान हो जाइये। वो आपको कभी भी धोखा दे सकता है चोट-नुकसान पहुँचा सकता है। दुराचरण करने वाले, संदिग्ध चरित्र के व्यक्ति को कभी काम पर न रखें। इनका अनुशासित होना अनिवार्य है। समय-असमय इनाम-इकराम देकर उनकी आदत खराब न करें।
(4). ढोलक व अन्य वाद्य यंत्र :- ढोलक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसे यदि आप धीरे-धीरे प्रेम पूर्वक बजाने का प्रयास करेंगे तो उसकी आवाज वैसी नहीं आएगी, जैसी आप चाहते हैं यानी वह ठीक से काम नहीं करेगा। यदि आप चाहते हैं कि ढोलक की मधुर आवाज़ आये तो उसे सुर-ताल में बजायें। वाद्य यंत्रों का उचित मात्र में समंजय-कसा होना आवश्यक है। महात्मा बुद्ध ने कहा था कि वीणा के मदर स्वर उसके उचित संवयन से ही उत्त्पन्न होते हैं।
(5). दुष्ट स्त्री :- हिंदू धर्म में स्त्रियों को बहुत ही सम्माननीय माना गया है। उनके साथ दुर्व्यवहार करने के बारे में सोचना भी गलत है, लेकिन यदि किसी स्त्री का स्वभाव दुष्ट है तो उसके साथ नम्रता पूर्ण व्यवहार करना मूर्खता होगी क्योंकि वह अपने स्वभाव के अनुसार आपको दुख ही पहुंचाएगी। इसलिए कहा गया है कि दुष्ट स्त्री के साथ सदैव कठोर अनुशासन व व्यवहार करना चाहिए। Please refer to :: FIDELITY OF WOMAN पतिव्रता स्त्री-सतीत्व santoshsuvichar.blogspot.comगरुड़ पुराण :: जीवनपयोगी वचन
गरुड़ जी भगवान् श्री हरि विष्णु के वाहन और परम तेजस्वी हैं। भगवान् श्री राम को नागपास्त्र से मुक्त करने के लिये हनुमान जी उन्हें स्वयं लेकर आये। भगवान् श्री कृष्ण और सत्यभामा ने स्वर्ग में देवराज इन्द्र के साथ युद्ध में उन्हें स्मरण किया तो वे तुरन्त पधारे। गरुड़ पुराण का पाठ परिवार में स्वजन की मृत्यु के पश्चात उसकी आत्मा की शांति के लिए किया। इसमें मानव जीवन के लिए हितकर बातें विस्तार से समझाई गई हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। मनमानी करने वाली पत्नी, दुष्ट मित्र, वाद-विवाद करने वाला नौकर तथा जिस घर में सांप रहता है, वहाँ निवास करना साक्षात मृत्यु का आह्वाहन करना है।
स्वेच्छा चारिणीं पत्नी :-नारी माँ भी है और नरक का द्वार भी। अगर वह स्वेच्छा चरिणीं है तो उसकी औलाद, सास-सुसर, पति कभी भी परेशानी में पड़ सकते हैं।
दुष्ट मित्र :- आजकल के हालत में रिश्तेदार, मित्र , पत्नी के रूप में सच्चा हमदर्द मिलना नामुमकिन है।
वाद-विवाद करने वाला नौकर :- घरों में भृत्य (दास, नौकर) रखने का प्रचलन काफी पुराना है। वर्तमान में भी संभ्रांत परिवारों में ज़रुरत के मुताबिक नौकर रखे जाते हैं। नौकर न सिर्फ अपने मालिक की जरुरतों का पूरा ध्यान रखते हैं बल्कि वह घर के गुप्त भेद भी जानते हैं, लेकिन यदि नौकर वाद-विवाद करने वाला हो तो उसे तुरंत निकाल देना भी बेहतर रहता है।वाद-विवाद करने वाला नौकर किसी भी समय आपके लिए कोई बड़ी मुसीबत बन सकता है। यदि ऐसा नौकर आपका कोई गुप्त भेद जानता है तो वाद-विवाद होने पर वह कभी भी आपका भेद खोल सकता है। वाद-विवाद बढ़ जाने पर वह आपको शारीरिक चोट भी पहुंचा सकता है। अत: वाद-विवाद करने वाले नौकर को साथ में रखना साक्षात मृत्यु के समान है।
घर में रहने वाला सांप :- आज जिस घर में रहते हैं, यदि वहां सांप का भी निवास है तो भी आपकी जान हमेशा खतरे में रहती है। वैसे तो सांप बिना वजह किसी पर हमला नहीं करता, लेकिन गलती से भी यदि आप आपका पैर उस पर पड़ जाए तो सांप आपको काटे बिना नहीं छोड़ेगा। इसलिए साँप को सपेरे के हवाले करने या मारने में कतई देर मत लगाओ।
निषिद्ध कर्म :- शास्त्रों के अनुरूप निम्न कर्म न करके निषिद्ध-बुरे कर्म करने से घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान नहीं मिलता और अपयश यानी अपमान का सामना करना पड़ता है।
(1). संतान की अनदेखी :- यदि कोई व्यक्ति-परिवार संतान के पालन-पोषण में लापरवाही-कोताही बरतता है, तो उसकी संतान के अनुचित मार्ग पर जाने की संभावना बढ़ जाती है। संतान को संस्कारी बनाना चाहिए और सही-उचित मार्ग दिख्नाना चाहिए। संतान के अच्छे भविष्य के लिए उचित देखभाल, पालन-पोषण और समुचित देखभाल बेहद ज़रूरी है अन्यथा संतान कुमार्गी हो सकती है; जिससे हानि, अपमान, दुःख, क्लेश आदि की सम्भावना बढ़ जाती है।
(2). लालच :- धनी व्यक्ति यदि परिवार के पालन-पोषण पर उचित व्यय नहीं करता और लालच के वश कंजूसी करता है, तो उसे धन के लोभ में फंसकर अनेकानेक परेशानियों का सामना करता पड़ता है और उसके लोक और परलोक दोनों ही बिगड़ जाते हैं।
(3). धन अभाव होने पर भी सीमा से अधिक दान करना :- जो लोग अपनी आय से अधिक खर्च करते हैं, अत्यधिक दान करते हैं, वे व्यर्थ ही अनेकानेक परेशानियों-मुसीबतें बैठे-बिठाये मोल ले लेते हैं। मनुष्य को अपनी सीमा में रहकर घर-परिवार की जरूरतें पूरी करने के बाद ही समुचित मात्रा में योग्य पात्र को दान करना चाहिए।
(4). दुष्टों की संगति :- अच्छी या बुरी संगति का असर मानव जीवन पर बहुत प्रभाव डालती है। संत को दुर्जन और दुर्जन को संत बना सकती है। कुसंगति नर्क का मार्ग खोल देती है। रत्नाकर बाल्मीकि इसी प्रकार बने।
(5). दूसरों का अहित :- अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुँचाना, दुःख देना, परेशान करना, प्रताड़ित करना इस लोक के साथ परलोक में भी दुखदायी है। अन्ततोगत्वा दुरात्मा को नर्क गामी होकर भयंकर यंत्रणाएं झेलनी ही पड़ती हैं।
भाग्य अभिवृद्धि :- सुखी और श्रेष्ठ जीवन के लिए शास्त्रों में प्रतिपादित नियमों-परम्पराओं का न्यायोचित ढंग से निर्वाह करने से विपदा-समस्याएँ उत्तपन्न ही नहीं होतीं। मनुष्य चाहे तो स्वयं का भाग्य भी बदल सकता है, यदि वो शास्त्रोचित क्रिया-कलापों का निर्वाह नियम पूर्वक करे।
विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनव:।असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी॥
(1). विष्णु पूजन :- भगवान् श्री हरी विष्णु जगत के पालन हार हैं। श्रीहरि माँ लक्ष्मी के पति और ऐश्वर्य, सुख-समृद्धि तथा शांति के स्वामी भी हैं। विष्णु अवतारों की पूजा करने पर मनुष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष, सब कुछ प्राप्त हो सकता है।
(2). एकादशी व्रत :- यह व्रत भगवान विष्णु को ही समर्पित है। हिन्दी पंचांग के अनुसार हर माह में 2 एकादशियां आती है। एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। दोनों ही पक्षों की एकादशी पर व्रत करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। आज भी जो लोग सही विधि और नियमों का पालन करते हुए एकादशी व्रत करते हैं, उनके घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
(3). श्रीमद् भागवत गीता का पाठ :- श्रीमद् भागवत गीता भगवान् श्री कृष्ण का ही साक्षात् ज्ञानस्वरूप है। जो लोग नियमित रूप से गीता का या गीता के श्लोकों का पाठ करते हैं, वे भगवान् की कृपा प्राप्त करते हैं। गीता पाठ के साथ ही इस ग्रंथ में दी गई शिक्षाओं का पालन भी दैनिक जीवन में करना चाहिए। जो भी शुभ काम करें, भगवान् का ध्यान करते हुए करें, सफलता मिलने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
(4). तुलसी की देखभाल करना :- घर में तुलसी होना शुभ और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है। तुलसी की महक से वातावरण के सूक्ष्म हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। घर के आसपास की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। साथ ही, तुलसी की देखभाल करने और पूजन करने से देवी लक्ष्मी सहित सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
(5). ब्राह्मण का सम्मान करना :- विद्वान ब्राह्मण सदैव आदरणीय हैं। जो लोग इनका अपमान करते हैं, वे जीवन में दुख प्राप्त करते हैं। ब्राह्मण ही भगवान् और भक्त के बीच की अहम कड़ी है। ब्राह्मण ही सही विधि से पूजन आदि कर्म करवाते हैं। शास्त्रों का ज्ञान प्रसारित करते हैं। दुखों को दूर करने और सुखी जीवन प्राप्त करने के उपाय बताते हैं। अत: ब्राह्मणों का सदैव सम्मान करना चाहिए।
(6). गौ सेवा :- जिन घरों में गाय होती है, वहां सभी देवी-देवता वास करते हैं। गाय से प्राप्त होने वाले दूध, मूत्र और गोबर पवित्र और स्वास्थ्यवर्धक हैं। गौमूत्र के नियमित सेवन से केंसर जैसी गंभीर बीमारी में भी राहत मिल सकती है। यदि गाय का पालन नहीं कर सकते हैं तो किसी गौशाला में अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार धन का दान किया जा सकता है।





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