Wednesday, December 22, 2021

अश्व-DADHIKRA DEV (ऋग्वेद 4)

अश्व-ऋग्वेद संहिता
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (162) :: ऋषि :- दीर्घतमा, देवता :- अश्व, छन्द :- त्रिष्टुप्।
मा नो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऋभुक्षा मरुतः परि ख्यन्। यद्वाजिनो देवजातस्य सप्तेः प्रवक्ष्यामो विदथे वीर्याणि॥
चूँकि हम यज्ञ में देवजात और द्रुत गति अश्व के वीर कर्म का भजन करते हैं, इसलिए मित्र, वरुण, अर्यमा, आयु, इन्द्र, ऋभुक्षा और वायु आदि सभी देवता सदैव हमारे अनुकूल रहें और हमसे अलग न हो।[ऋग्वेद 1.162.1]
सखा, वरुण, अर्यमा, वायु, इन्द्र और मरुद्गण हमसे नियुक्त न हों। हम देवों के अत्यन्त वेगवान, अश्व के वीरता पूर्ण कर्मों का अनुष्ठान में वर्णन करते हैं।
Since, we recite prayers devoted to Dev Jat and the fast moving horses, Mitr, Varun, Aryma, Ayu, Indr, Ribhuksha and Vayu etc. demigods-deities should remain in favour our favour and never move away-depart from us.
यन्निर्णिजा रेक्णसा प्रावृतस्य रातिं गृभीतां मुखतो नयन्ति। 
सुप्राङजो मेम्यद्विश्वरूप इन्द्रापूष्णोः प्रियमप्येति पाथः
सुन्दर स्वर्णाभरण से विभूषित अश्व के सामने ऋत्विक् लोग उत्सर्ग के लिए अज अर्थात् बकरे को पकड़कर ले जाते हैं। विविध वर्ण के अज शब्द करते हुए सामने जाते हैं और वह इन्द्र और पूषा के प्रिय हव्य को प्राप्त करते हैं।[ऋग्वेद 1.162.2]
उत्सर्ग :: त्यागना, बलिदान; ejecta, egestion, dedication, devotion, effusion, emission, excreta, excretion, sacrifice.
हम दमकते हुए वस्त्रों और स्वर्ण सहित आभूषणों से अश्व सुसज्जित आगे विभिन्न रंग वाली सामग्री ले जाते हैं। वह इन्द्र और पूषा के लिए प्रिय हो। 
The Ritviz take the goat for sacrifice in front of the horse decorated with golden ornaments. Several species of the goats come forward making sound and become favourite offerings for Indr & Pusha.
एष छागः पुरो अश्वेन वाजिना पूष्णो भागो नीयते विश्वदेव्यः। 
अभिप्रियं यत्पुरोळाशमर्वता त्वष्टेदेनं सौश्रवसाय जिन्वति
बलवान् अश्वों के आगे जब यह अज (बकरा) लाया जाता है, तब यजमान इस अश्व के साथ अज को प्रिय लगने वाले पुरोडाष आदि का भाग प्रदान कर यशस्वी होते हैं।[ऋग्वेद 1.162.3]
सब देवगण योग्य पूषा का भाग ले जाते हैं, जिसे त्वष्टा अत्यन्त पुष्टिप्रद बनाने के लिए प्रेरित करते हैं।
When this goat is brought in front of the powerful-strong horses, the Ritviz make offerings liked by the horses & the goat. 
यद्धविष्यमृतुशो देवयानं त्रिर्मानुषाः पर्यश्वं नयन्ति। 
अत्रा पूष्णः प्रथमो भाग एति यज्ञं देवेभ्यः प्रतिवेदयन्नजः
जब ऋत्विक् लोग देवों के लिए प्राप्त करने योग्य अश्व को समय-समय पर तीन बार अग्नि के पास ले जाते हैं, तब पूषा के प्रथम भाग का अज देवों के यज्ञ की बात का प्रचार करके आगे आते हैं।[ऋग्वेद 1.162.4]
जहाँ प्राणी नियत काल में देवताओं के प्राप्त कराने योग्य घोड़े को घुमाते हैं, वहाँ पूषा का भाग देवगणों के यज्ञ को विख्यात करता हुआ चलता है।
When the Ritviz-Brahmans (Priests) bring the horse meant for the demigods-deities, thrice near the fire, they declare the offerings meant for Pusha (his share of offerings in the form of goat) to appreciate-honour the Yagy.
It does not mention animal sacrifices. 
होताध्वर्युरावया अग्निमिन्धो ग्रावग्राभ उत शंस्ता सुविप्रः। 
तेन यज्ञेन स्वरंकृतेन स्विष्टेन वक्षणा आ पृणध्वम्
होता (देवों को बुलाने वाले), अध्वर्यु (यज्ञ नेता), आवया (हव्य दाता), अग्नि सिद्ध (अग्नि प्रज्वलन कर्त्ता), ग्राव प्राभ (प्रस्तर-द्वारा सोमरस निकालने वाले), शंस्ता (नियमानुसार कर्म का अनुष्ठान करने वाले) और ब्रह्मा (सब यज्ञ कार्यों के प्रधान सम्पादक) प्रसिद्ध, अलंकृत और सुन्दर यज्ञ द्वारा नदियों को (जल से) पूर्ण करें।[ऋग्वेद 1.162.5]
अनुष्ठान :: संस्कार, धार्मिक क्रिया, उत्सव-संस्कार, पद्धति, शास्र विधि, आचार, आतिथ्य सत्कार; rituals, rites, ceremonies.
समारोह, संस्कार, अनुष्ठान, विधि, रसम, धर्म क्रिया होता, अध्वर्यु, प्रस्थाता, अग्नीत, ग्राव, स्तुत, प्रशस्ता वे सभी अत्यन्त शोभित हुए हमारी हवियों वाले सस्वर यज्ञ को परिपूर्ण करें। यूप काटने वाले, यूप ढोने वाले, यूप के लिए चषाल को गाढने वाले और अनुष्ठान के लिए अनिवार्य पात्र तैयार करने वाले, सभी का प्रयास हमको उत्साहजनक हो। 
Let the hosts, chief priest, those making offerings, igniting fire, extracting Somras, systematic conducting of rituals, rites, ceremonies; chief organisers fill the rivers with water in a beautifully organised and decorated Yagy. 
यूपव्रस्का उत ये यूपवाहाश्चषालं ये अश्वयूपाय तक्षति। 
ये चार्वते पचनं संभरन्त्युतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु
जो यूप के योग्य वृक्ष काटते हैं, जो यूप वृक्ष ढोते हैं, जो अश्व को बाँधने के यूप के लिए काष्ठ मण्डप आदि तैयार करते हैं, जो अश्व के लिए पाक पात्र का संग्रह करते हैं, इन सबके द्वारा हमारे लिए हितकारी कार्य हों।[ऋग्वेद 1.162.6]
यूप :: यज्ञ में वह खंभा जिसमें बलि का पशु बाँधा जाता है; toggle.  
यूप काटने वाले, यूप ढोने वाले, यूप के लिए चषाल को गढ़ने वाले और अनुष्ठान के लिए अनिवार्य पात्र तैयार करने वाले, सभी का प्रयास हमको उत्साह जनक हो।
Let the efforts of those who cut the tree and make the Yup-pole (toggle) to tie animals in a Yagy, carriers of Yup, boundary to hold the horse etc. be beneficial to us.
उप प्रागात्सुमन्मेऽधायि मन्म देवानामाशा उप वीतपृष्ठः। 
अन्वेनं विप्रा ऋषयो मदन्ति देवानां पुष्टे चकृमा सुबन्धुम् 
हे मनोहर पृष्ठ विशिष्ट अश्व! देवों की आशा पूर्ति के लिए पधारें। देवों की पुष्टि के लिए हम उसे अच्छी तरह बाँधेंगे। मेधावी ऋत्विक् लोग आनन्दित हों। हमारा मनोरथ स्वयं सिद्ध हों।[ऋग्वेद 1.162.7]
उज्जवल पीठ वाला घोड़ा देवगण की तरफ मुख करके खड़ा है। मेरा श्लोक रुचिकर है। मेधावी ऋषि इसका समर्थन करते हैं। देवगण को संतुष्ट करने के लिए हमने यह उत्तम श्लोक तैयार किया है।
Hey horse with strong back! Come to fulfil the desires of the demigods-deities. We will tie him properly for the satisfaction of the demigods-deities. Let the brilliant Ritviz be happy. Let our purpose be accomplished automatically. 
य द्वाजिनो दाम संदानमर्वतो या शीर्षण्या रशना रज्जुरस्य। 
यद्वा घास्य प्रभृतमास्येतृणं सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु
जिस रस्सी से घोड़े की गर्दन बाँधी जाती है, जिससे उसके पैर बाँधे जाते हैं, जिस रस्सी से उसका सिर बाँधा जाता है, वे सब रस्सियाँ और अश्व के मुख में डाली जाने वाली घासें देवों के पास आयें।[ऋग्वेद 1.162.8]
गतिवान घोड़े की रास और मुँह में डाली हुई घास आदि या घोड़े की जो वस्तुएँ हों, वे सभी देवगणों की हों।
Let the cord with which the neck, legs and the head of the horse are tied and grass to be offered to the horse (put in its mouth) come to the demigods-deities.
यदश्वस्य क्रविषो मक्षिकाश यद्वा स्वरौ स्वधितौ रिप्तमस्ति। 
यद्धस्तयोः शमितुर्यन्नखेषु सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु
अश्व का जो कच्चा माँस ही मक्खी खाती हैं, काटने या साफ करने के समय हथियार में जो लग जाता है और छेदक के हाथों और नाखूनों में जो लग जाता है, वह सब देवों के पास जावें।[ऋग्वेद 1.162.9]
जो कच्चा भाग मक्खियाँ खाती हैं, जो भाग तापदायक कर्मों में लग जाता है तथा जो कार्यरत नरों के हाथ में लग जाता है, वे सभी देवताओं यज्ञ को परिपूर्ण करें।
Let raw meat eaten by the flies, remains over the cutters & cleaners and that which remains in the hands & the nails of the cutter, reach the demigods-deities. 
यदूवध्यमुदरस्यापवाति य आमस्य क्रविषो गन्धो अस्ति। 
सुकृता तच्छमितारः कृण्वन्तूत मेधं शृतपाकं पचन्तु
उदर अर्थात् पेट का जो अजीर्ण अंश बाहर हो जाता है और अपक्व माँस का जो लेशमात्र बचा रहता है, उसे छेदक निर्दोष अर्थात् पवित्र करके उस माँस को देवों के लिए पकावें।[ऋग्वेद 1.162.10]
थोड़े पके अन्न और गंध परिपूर्ण भक्षण सामग्री को सिद्ध करने वाले श्रेष्ठ प्रकार से शुद्ध करके प्रस्तुत करें।
The undigestible segment of the stomach and the uncooked meat should be purified and prepared for the demigods-deities.
यत्ते गात्रादग्निना पच्यमानादभि शूलं निहतस्यावधावति। 
मा तद्भूम्यामा श्रिषन्मा तृणेषु देवेभ्यस्तदुशद्भ्यो रातमस्तु
हे अश्व! आग में पकाते समय आपके शरीर से जो रस निकलता और जो अंग शूल से आबद्ध रहता है, वह मिट्टी में गिरकर तिनकों में न मिल जाय। यज्ञ भाग चाहने वाले देवों का वह आहार बनें।[ऋग्वेद 1.162.11]
हे अश्व! क्रोधाग्नि द्वारा जलते हुए तेरे शरीर से जो अत्यन्त स्वेद-रूप रस टपके वह भूमि सात न हो जाये, बल्कि उससे देव गण का उत्साह वर्द्धन हो।
Hey horse! While cooking the juice-liquid that comes off of your body; should not be mixed with the straw, when it falls over the ground. It should become the food of those demigods-deities who desire the offerings of the Yagy. 
ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्कं य ईमाहुः सुरभिर्निर्हरति। 
ये चार्वतो मांसभिक्षामुपासत उतो तेषामभिगूर्तिर्न इन्वतु
जो लोग चारों ओर से अश्व का पकना देखते हैं, जो कहते हैं कि गन्ध मनोहर है, देवों को दें और जो माँस-भिक्षा की आशा करते हैं, उनका संकल्प हमारा ही है।[ऋग्वेद 1.162.12]
घोड़े को अत्यन्त आक्रोशित देखते हैं। वे उनके सम्मुख से हट जाने को कहते हैं। तब उसके महान दिखाई देने के कारण समस्त पराक्रमी उसे ग्रहण की विनती करते हैं, इससे भी अश्वों, स्वामी और पराक्रमी का उत्साह वर्द्धन होता है।
Those who see the horse being cooked from all sides say that the smell is good. Give it to the demigods-deities. They expect some meat as begging. Their determination-idea (desire) matches us.
Meat eating is taboo in Hinduism. If the demigods-deities desire meat, they must have been meat eaters in their earlier births. Bhavishy Puran says that at least two viceroys (Christians) of British empire and Akbar (a Muslim) had attained heaven. Heaven is a place to satisfy sensualities, sexuality, passions, lasciviousness. There one can not make efforts for Moksh-emancipation. Ultimately such souls return to earth.
There are references in scriptures that the sacrificial horse was converted into camphor by using Mantr Shakti.
यन्नीक्षणं मांस्पचन्या उखाया या पात्राणि यूष्ण आसेचनानि।  ऊष्मण्यापिधाना चरूणामङ्काः सूनाः परि भूषन्त्यश्वम्
माँस पाचन की परीक्षा के लिए जो काष्ठाभानु लगाया जाता है, जिन पात्रों में रस रक्षित होता है, जिन आच्छादनों से गर्मी रहती है, जिस वेतस शाखा से अश्व का अवयव पहले चिह्नित किया जाता है और जिस क्षुरिका से चिह्नानुसार अवयव काटे जाते हैं, वो सब अश्व का माँस प्रस्तुत करते हैं।[ऋग्वेद 1.162.13]
मन को अच्छे लगने वाले, परिपाक करने वाले, सिंचन योग्य जो पात्र हैं, इनसे अश्व को सुभूषित करते हैं।
The wooden staff used for examining meat, the pots in which meat is saved are kept warm. The branch of the Vetas tree (Cane) is used to identify the organ of the horse which has to be cut to extract meat.
निक्रमणं निषदनं विवर्तनं यच्च पड्वीशमर्वतः। 
यच्च पयौ यच्च घासिं जघास सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु
जहाँ अश्व गये थे, जहाँ बैठा था, जहाँ लेटा था, जिससे उसके पैर बाँधे गये थे, जो उसने पिया था तथा जो घास उसने खाई थी, वो सब देवों के पास जावें।[ऋग्वेद 1.162.14]
अश्व का भागना बैठना, लेटना, जल पीना, खाना जो कुछ कर्म हैं, वे सभी देवगणों के आधीन हैं। 
Let every thing like the places visited by the horse, where it laid to rest, where its feet were tied, the water drunk by it and the grass consumed by it should go to the demigods-deities.
मा त्वाग्निर्ध्वनयीद्भूमगन्धिर्मोखा भ्राजन्त्यभि विक्त जघ्रिः। 
इष्टं वीतमभिगूर्तं वषट्कृतं तं देवासः प्रति गृभ्णन्त्यश्वम्
हे अश्वगण! आपका निकलना, आनन्दित होना, पलटना, पीना-खाना आदि समस्त क्रियाएँ देवताओं के संरक्षण में हो।[ऋग्वेद 1.162.15]
हे अश्व! तुझे अग्नि का आँखों में घुस जाने वाला धुँआ कभी पीड़ित न करे। तुम सुन्दर अश्व को देवता स्वीकार करो।
Hey (sacrificial) horse! All of your activities-actions like movement, happiness, turning, eating & drinking etc. must be under the supervision of the deities-demigods  
यदश्वाय वास उपस्तृणन्त्यधीवासं या हिरण्यान्यस्मै। 
संदानमर्वन्तं पड्वीशं प्रिया देवेष्वा यामयन्ति
जिस आच्छादन योग्य वस्त्र से अश्व को आच्छादित किया जाता है, उसको जो सोने के गहने दिये जाते हैं, जिससे उसका सिर और पैर बाँधे जाते हैं, वो समस्त देवों के लिए प्रिय है। ऋत्विक लोग देवताओं को यह सब प्रदान करते है।[ऋग्वेद 1.162.16]
जो अश्वों को वस्त्राभूषणों से सुसज्जित करते हैं, वे देवगण को हर्षित करते हैं।
The cloth used for covering the horse, fixing the ornaments used to decorate it, for covering its head and tying its legs; are liked by the demigods-deities. The Ritviz make all these offerings to the demigods-deities.
यत्ते सादे महसा शूकृतस्य पाष्ण्र्या वा कशया वा तुतोद। 
स्रुचेव ता हविषो अध्वरेषु सर्वा ता ते ब्रह्मणा सूदयामि
हे अश्व! जोर से नाक से ध्वनि करते हुए गमन करने पर चाबुक के आघात से जो कष्ट उत्पन्न हुआ है, वो सब कष्ट मैं उसी प्रकार मंत्र द्वारा आहुति में देता हूँ, जिस प्रकार से स्रुक द्वारा हव्य दिया जाता है।[ऋग्वेद 1.162.17]
हे अश्व! तेरे हाँफने से या थम जाने पर तुझे जो दुःख हुआ है, उसे मैं मंत्र द्वारा निवृत करता हूँ। 
Hey horse! I relieve you of the pain which was caused to you by striking you with the whip, with the help of Mantr.
चतुस्त्रिंशद्वाजिनो देवबन्धोवङ्क्रीरश्वस्य स्वधितिः समेति। 
अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणोत परुष्परुरनुघुष्या वि शस्त
हे ऋषियों! देवों के मित्र इस अश्व के चौतीस अंगों को अच्छी प्रकार प्राप्त करने वाले आप, इनके प्रत्येक अंग को स्वस्थ बनाकर समस्त त्रुटियों को दूर कर दें।[ऋग्वेद 1.162.18]
हे पराक्रमियों! वेगवान घोड़े की पीठ की पसलियों पर अस्त्र पहुँच सकता है। इसलिए उसके शरीर का निवारण न करो। उसे अभ्यास द्वारा पूर्ण शिक्षित बनाओ।
Hey sages! Make the 34 organs of this horse healthy-perfect to make it acceptable to the demigods-deities.
एकस्त्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथ ऋतुः। 
या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ताता पिण्डानां प्र जुहोम्यग्नौ
सूर्य रूपी अश्व को सम्वत्सर विभाजित करता है। इसके दो विभाग उसके नियन्ता होते हैं अर्थात् उत्तरायण और दक्षिणायन। वह दो मासों की ऋतुओं में विभाजित होता है। यज्ञ में शरीर के अलग-अलग अंगों की पुष्टि के उद्देश्य से ऋतु सम्बन्धी अनुकूल पदार्थों की आहुतियाँ प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 1.162.19]
संवत्सर :: Samvatsar  is a Sanskrat term for a solar year. In the medieval era literature, a Samvatsar refers to the Jovian year, that is a year based on the relative position of the planet Jupiter, while the solar year is called Varsh. A Jovian year is not equal to a solar year based on the relative position of Earth and Sun. A Jovian year is defined in Indian calendars as the time Brahaspati (Jupiter) takes to transit from one constellation to the next relative to its mean motion.
हे अश्व! चालाक नर तुम पर निमंत्रण रखते हैं। तेरे अंगों को मैं कुशल नियन्ता के अधिकार में करूँ।
Horse in the form of path of the Sun is divided by the solar year into two parts the Northern Hemisphere and the Southern Hemisphere. These two are further sub divided into seasons. While conducting the Yagy offerings are made as per the season to make the body organs strong.
मा त्वा तपत्प्रिय आत्मापियन्तं मा स्वधितिस्तन्वआ तिष्ठिपत्ते। 
मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राण्यसिना मिथू कः
हे अश्व! आप जिस समय देवों के पास जाते हो, उस समय आपको प्रिय देह आपको कष्ट प्रदान न करें। आपके शरीर को खड्ग अधिक क्षति ग्रस्त न करे। माँस-लोलुप और अकुशल व्यक्ति भी आपके पापों के अतिरिक्त आपके (अन्य) अंगों पर खड्ग का प्रहार न सके।[ऋग्वेद 1.162.20]
हे घोड़े! चलते समय तुम्हें कोई दुःख न दे। तेरे हृदय में शस्त्र प्रवेश न करें। कोई मूर्ख प्राणी लोभ वश तेरे तन पर आघात न करे।
Hey horse! None should harm you, when you visit the demigods-deities. Your body should remain unaffected by the attack of sword etc. weapons. Those desirous of your meat and the unskilled people should not be able to strike your organs. 
न वा उ एतन्प्रियसे न रिष्यसि देवाँ इदेषि पथिभिः सुगेभिः। 
हरी ते युञ्जा पृषती अभूतामुपास्थाद्वाजी धुरि रासभस्य
हे अश्व! आप न तो मरते हो और न संसार आपकी हिंसा करता है। आप उत्तम मार्ग से देवों के पास जाते हैं। इन्द्रदेव के हरि नाम के दोनों घोड़े और मरुतों के पृषती नाम के दोनों वाहन आपके रथ में नियोजित किये गये हैं। अश्वनी कुमारों के वाहन रासभ के स्थान पर आपके रथ में कोई शीघ्रगामी रथ नियोजित किया जायगा।[ऋग्वेद 1.162.21]
हे अश्व! तेरे सखा रहेंगे। अग्नि देवों के रथ में रास की जगह पर भी कोई अश्व जोता जायेगा।
Hey horse! Neither you die nor the world harm-kill you. You move to the demigods-deities through excellent means-path (ways). The horses named Hari and the chariots named Prashti of Marud Gan have been deployed in your chariot. Some other vehicle will be deployed in your chariot instead of the vehicle named Rasabh of the Ashwani Kumars.  
सुगव्यं नो वाजी स्वश्र्व्यं पुंसः पुत्राँ उत विश्वापुषं रयिम्। 
अनागास्त्वं नो अदितिः कृणोतु क्षत्रं नो अश्वो वनतां हविष्मान्
यह अश्व हमें गौ और अश्व से युक्त तथा संसार रक्षक, धन प्रदान करते हुए हमें पुत्र प्रदान करे। तेजस्वी अश्व हमें पाप कर्मों से बचावें। हविर्भूत अश्व हमें शारीरिक बल प्रदत्त करें।[ऋग्वेद 1.162.22]
तेजस्वी :: शानदार, शोभायमान, अजीब, हक्का-बक्का करने वाला, नादकार, तेज़, शीघ्र, कोलाहलमय, उग्र, प्रज्वलित, तीक्ष्ण, उत्सुक, कलह प्रिय; majestic, full of aura-brightness, stunning, rattling, fiery.
वह अश्व सुन्दर गवादि परिपूर्ण धनो से एवं पुत्रादि से परिपूर्ण करने वाला हो। अदिति हमारे पापों को दूर करें। यह अन्न परिपूर्ण धन हमको शक्ति प्रदान करे।
Let this horse grant us cows & horses, protect the world, give us money and son. The majestic (stunning, rattling, fiery) should protect us from sins and grant us might, strength & power.
In Strotr, its felt that the translation to Hindi is improper-incorrect.
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (163) ::  ऋषि :- दीर्घतमा, देवता :- अश्व, छन्द :- त्रिष्टुप्।
This Strotr is devoted to Ashw (Horse) a demigod-deity.
यदक्रन्दः प्रथमं जायमान उद्यन्त्समुद्रादुत वा पुरीषात्।
श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहू उपस्तुत्यं महि जातं ते अर्वन्॥
हे अश्व! आपका महान् जन्म सबकी स्तुति योग्य है। अन्तरिक्ष या जल से पहले उत्पन्न होकर यजमान के अनुग्रह के लिए महान शब्द करते हो। श्येन पक्षी के पंखों की तरह आपके पंख है और हिरण के पैरों की तरह आपके भी पैर हैं।[ऋग्वेद 1.163.1]
हे अश्व! तुम्हारा जन्म भी कथन योग्य है। तुम अंतरिक्ष या जल से निकलकर अत्यन्त ध्वनि करते हो। तुम्हारे बाज के तुल्य पंख और हिरण के तुल्य पाँव हैं।

Hey Ashw! Your birth-appearance, deserve prayer. You make loud sound for the sake of the host-Ritviz prior to the appearance of the space and the water. Your feather is like Shyen-a bird and your feet are like that of the deer. 
यमेन दत्तं त्रित एनमायुनगिन्द्र एणं प्रथमो अध्यतिष्ठत्। 
गन्धर्वो अस्य रशनामगृभ्णात्सूरादश्वं वसवो निरष्ट॥
यम या अग्नि ने अश्व दिये, त्रित या वायु ने उसे रथ में नियोजित किया। रथ पर पहले इन्द्र चढ़े और गन्धर्वों या सोमों ने उसकी लगाम को धारण किया। वसुओं द्वारा सूर्यमण्डल से निकाले जाने वाले इस अश्व की हम स्तुति करते हैं।[ऋग्वेद 1.163.2]
यम द्वारा दिये गये इस घोड़े को त्रित ने जोड़ा। इन्द्रदेव ने इस पर प्रथम बार सवारी की। गन्धर्व ने उसकी लगाम पकड़ी।
The horses were granted by Yam & Agni Dev, Trit or Vayu deployed them in the chariote. Indr rode the chariote first and the Gandharvs & Soms held the reins. We pray to this chariote drawn by the Vasus through the Sury Mandal (Solar System).
असि यमो अस्यादित्यो अर्वन्नसि त्रितो गुह्येन व्रतेन।
असि सोमेन समया विपृक्त आहुस्ते त्रीणि दिवि बन्धनानि॥
हे अश्व! आप यम, आदित्य और गोपनीय व्रतधारी त्रित है। आप सोम के साथ संयुक्त हैं। पुरोहित लोग कहते हैं कि द्युलोक में आपके तीन बन्धन स्थान हैं।[ऋग्वेद 1.163.3]
Hey Ashw! You are Yam, Adity and the Trit-trio, holding-conducting the Vrat secretly. You are associated with Som. The Purohit-priests says that you are available at three places in the heavens.
त्रित :: एक ऋषि का नाम जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र माने जाते हैं, गौतम मुनि के तीन पुत्रों में से एक जो अपने दोनों भइयों से अधिक तेजस्वी और विद्वान् थे। एक देवता, जिन्होंने सोम बनाया था।
त्रित मुनि का यज्ञ :: भरतश्रेष्ठ! जैसे पापी मनुष्य अपने-आपको नरक में डूबा हुआ देखता है, उसी प्रकार तृण, वीरुध और लताओं से व्याप्त हुए उस कुँए में अपने आपको गिरा देख मृत्यु से डरे और सोमपान से वंचित हुए विद्वान त्रित अपनी बुद्धि से सोचने लगे कि मैं इस कुँए में रहकर कैसे सोमरस का पान कर सकता हूँ। इस प्रकार विचार करते-करते महातपस्वी त्रित ने उस कुँए में एक लता देखी, जो दैव योग से वहाँ फैली हुई थी। मुनि ने उस बालू भरे कूप में जल की भावना करके उसी में संकल्प द्वारा अग्नि की स्थापना की और होता आदि के स्थान पर अपने आपको ही प्रतिष्ठित किया। तत्पश्चात् उन महातपस्वी त्रित ने उस फैली हुई लता में सोम की भावना करके मन ही मन ऋग, यजु और साम का चिन्तन किया। नरेश्वर! इसके बाद कंकड़ या बालू-कणों में सिल और लोढ़े की भावना करके उस पर पीस कर लता से सोमरस निकाला। फिर जल में घी का संकल्प करके उन्होंने देवताओं के भाग नियत किये और सोमरस तैयार करके उसकी आहुति देते हुए वेद-मन्त्रों की गम्भीर ध्वनि की। राजन! ब्रह्म वादियों ने जैसा बताया है, उसके अनुसार ही उस यज्ञ का सम्पादन करके की हुई त्रित की वह वेदध्वनि स्वर्ग लोक तक गूँज उठी। महात्मा त्रित का वह महान यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय सारा स्वर्ग लोक उद्विग्न हो उठा, परन्तु किसी को उसका कोई कारण नहीं जान पड़ा। तब देव गुरु बृहस्पति ने वेद मन्त्रों के उस तुमुलनाद को सुनकर देवताओं से कहा, "देवगण! त्रित मुनि का यज्ञ हो रहा है, वहाँ हम लोगों को चलना चाहिये"।
वे महान तपस्वी हैं। यदि हम नहीं चलेंगे तो वे कुपित होकर दूसरे देवताओं की सृष्टि कर लेंगे। बृहस्पति जी का यह वचन सुनकर सब देवता एक साथ हो उस स्थान पर गये, जहाँ त्रित मुनि का यज्ञ हो रहा था। वहाँ पहुँच कर देवताओं ने उस कूप को देखा, जिसमें त्रित मौजूद थे। साथ ही उन्होंने यज्ञ में दीक्षित हुए महात्मा त्रित मुनि का भी दर्शन किया। वे बड़े तेजस्वी दिखायी दे रहे थे। उन महाभाग मुनि का दर्शन करके देवताओं ने उनसे कहा, "हम लोग यज्ञ में अपना भाग लेने के लिये आये हैं"। उस समय महर्षि ने उनसे कहा, "देवताओं! देखो, में किस दशा में पड़ा हूँ। इस भयानक कूप में गिरकर अपनी सुधबुध खो बैठा हूँ"। महाराज! तदनन्तर त्रित ने देवताओं को विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारण करते हुए उनके भाग समर्पित किये। इससे वे उस समय बड़े प्रसन्न हुए। विधि पूर्वक प्राप्त हुए उन भागों को ग्रहण करके प्रसन्न चित्त हुए देवताओं ने उन्हें मनोवान्छित वर प्रदान किया। मुनि ने देवताओं से वर माँगते हुए कहा, "मुझे इस कूप से आप लोग बचावें तथा जो मनुष्य इसमें आचमन करे, उसे यज्ञ में सोमपान करने वालों की गति प्राप्त हो"। राजन! मुनि के इतना कहते ही कुँए में तरंगमालाओं से सुशोभित सरस्वती लहरा उठी। उसने अपने जल के वेग से मुनि को ऊपर उठा दिया और वे बाहर निकल आये। फिर उन्होंने देवताओं का पूजन किया।[महाभारत शल्य पर्व 36.20-55]
हे देवों! तुमने इसे सूर्य से ग्रहण किया। हे अश्व! तू यम रूप है, सूर्य रूप है और गोपनीय नियम वाला त्रित है। तू सोम से युक्त है आसमान में तेरे बंधन को तीन स्थान बताए गए हैं। 
त्रीणि त आहुर्दिवि बन्धनानि त्रीण्यप्सु त्रीण्यन्तः समुद्रे। 
उतवे मे वरुण्श्छन्त्स्यर्वन्यत्रा त आहुः परमं जनित्रम्॥
हे अश्व! द्युलोक में आपके तीन बन्धन (वसुगण, सूर्य और द्युस्थान) है। जल या पृथ्वी में आपके तीन बन्धन (अन्न, स्थान और बीज) हैं। अन्तरिक्ष में आपके तीन बन्धन (मेघ, विद्युत् और स्तनित) है। आप ही वरुण हैं। पुरातत्वविदों ने जिन सब स्थानों में आपके परम जन्म का निर्देश किया है, वह आप हमें बताते हैं।[ऋग्वेद 1.163.4]
स्तनित :: बादल की गरज, मेघ गर्जन, बिजली की कड़क, ताली बजाने का शब्द, करतल ध्वनि, गरजता हुआ, गर्जित, आवाज़ या ध्वनि करता हुआ,  ध्वनित, शब्दायमान; rattling sound of the clouds.
हे अश्व! नभ जल और अंतरिक्ष में तेरे तीन तीन बंधन स्थान बताए गए हैं। तू ही वरुण और जहाँ पर तेरा जन्म स्थान है, उसे बताते हैं।
Hey Ashw! You are tied to Vasu Gan, Sury-Sun and the horizon in space. Over the earth & the water you are present in food grains, place-site & the seeds. In the space you are tied to clouds, electricity and the rattling sound of he clouds. You are a form of Varun Dev. The historians-scriptures tells us the places of your origin.
इमा ते वाजिन्नवमार्जनानीमा शफानां सनितुर्निधाना। 
अत्रा ते भद्रा रशना अपश्यमृतस्य या अभिरक्षन्ति गोपाः॥
हे अश्व! मैंने देखा है, ये सब स्थान आपके अंगशोधक हैं। जिस समय आप यज्ञांश का भोजन करते हैं, उस समय आपके पैरों के चिह्न यहाँ पड़ते है। आपकी जो फलप्रद लगाम सत्यभूत यज्ञ की रक्षा करती है, उसे भी यहाँ देखा है।[ऋग्वेद 1.163.5]
हे अश्व! ये तुमको शुद्ध करने वाली जगह है। ये तुम्हारे पद-चिह्नों वाले स्थान हैं। यहाँ तुम्हारी कल्याणकारी रस्सियाँ रखी हैं। यज्ञ पोषक इनकी सुरक्षा करते देखे जाते हैं।
Hey Ashw (horse)! All these places (items, things) cleanse your body. I have seen the spots-places (points) where hoofs fall, when you eat the offerings in the Yagy and your reins protecting the truthful Yagy.
आत्मानं ते मनसारादजानामवो दिवा पतयन्तं पतङ्गम्। 
शिरो अपश्यं पथिभिः सुगेभिररेणुभिर्जेहमानं पतत्रि॥
हे अश्व! दूर से ही मन द्वारा मैंने आपके शरीर को पहचाना। आप नीचे से अन्तरिक्ष मार्ग में सूर्य मण्डल में जाते हैं। मैंने देखा आपका सिर धूलि शून्य, सुखकर मार्ग से शीघ्र गति से क्रमश: ऊपर उठता है।[ऋग्वेद 1.163.6]
हे अश्व! मैंने तुम्हारे शरीर को अपने मन से ही पहचान लिया है। तुमको आसमान में उड़ते हुए देखा है। तुम धूल से रहित राह से जाने का प्रयत्न करते हो। तुम द्रुत वेग से चलते हुए सिर को ऊंचा उठाते हो।
Hey Ashw! I have recognised your body though a distance with the help of my mind (insight, innerself, consciousness).You move to the Sury Mandal (core-inside of the Sun, where life forms are present) from the lower space. I saw-found your clean head without dust, rising-moving upwards comfortably with fast-high speed.
अत्रा ते रूपमुत्तममपश्यं जिगीषमाणमिष आ पदे गोः। 
यदा ते मर्तो अनु भोगमानळाद्विसिष्ठ ओषधीरजीगः॥
मैं देखता हूँ, आपका उत्कृष्ट रूप पृथ्वी पर चारों ओर अन्न के लिए आगमन करता है। हे अश्व! जिस समय मनुष्य भोग लेकर आपके पास जाता है, उस समय आप ग्रास योग्य तृण आदि का भक्षण करते हैं।[ऋग्वेद 1.163.7]
हे अश्व! तुम्हारा महान शरीर धरा पर अन्नो को जीतने के लिए विचरण करता है। जब मनुष्य तुम्हारे भक्षणार्थ तृणादि लाता है, तब तुम उसे खुशी-खुशी भक्षण करते हो।
Hey Ashw! I see your excellent body coming over to the earth for food grains-stuff. Hey Ashw! When humans comes to you with offerings, you eat suitable mouthful straw (single bite).  
अनु त्वा रथो अनु मर्यो अर्वन्ननु गावोऽनु भगः कनीनाम्। 
अनु व्रातासस्तव सख्यमीयुरनु देवा ममिरे वीर्यं ते॥
हे अश्व! आपके पीछे-पीछे अश्व जाता है, मनुष्य आपके पीछे जाते हैं, स्त्रियों का सौभाग्य आपके पीछे जाता है। दूसरे अश्वों ने आपको अनुगमन करके मित्रता प्राप्त की है। देवगण आपके वीरकर्म की प्रशंसा करते हैं।[ऋग्वेद 1.163.8]
अश्व! तुम्हारे पीछे रथ चलते हैं। मनुष्य, गौ आदि भी तुम्हारे पीछे ही चलते हैं। स्त्रियों का सौभाग्य तुम्हारे पीछे चलता है। अन्य घोड़े तुम्हारे संग चलते हुए सखा भाव रखते हैं।
Hey Ashw! Other Ashw-horse, humans, fortune-good luck of women follows you. Other horses followed you and became friendly with you. The demigods-deities praise your valour.
VALOUR :: निर्भयता, साहस, शूर-वीरता, हिम्मत; दिलेरी, निर्भयता, पराक्रम,  बहादुरी,  वीरता,  शूरता,  साहस, वीरत्व; bravery, hardihood, heroine, pluck, stoutness, valiance, chivalry, gallantry, metal, grit, stout-heart, courageousness, daring, effrontery, intrepidity, courage, fearlessness, courageousness, braveness, intrepidity, pluck, pluckiness, nerve, backbone, spine, heroism, stout-heartedness, manliness, audacity, boldness, spirit, fortitude, mettle, dauntlessness.
हिरण्यशृङ्गोऽयो अस्य पादा मनोजवा अवर इन्द्र आसीत्। 
देवा इदस्य हविरद्यमायन्यो अर्वन्तं प्रथमो अध्यतिष्ठत्॥
अश्व का सिर सोने का है और उसके पैर लोहे के तथा वेगशाली हैं। वेग के सम्बन्ध में तो इन्द्रदेव भी लघु है। देवगण अश्व के हव्य भक्षण के लिए यहाँ पधारते हैं, किन्तु इन्द्रदेव पहले से ही यहाँ उपस्थित रहते हैं।[ऋग्वेद 1.163.9]
देवगण तुम्हारे पीछे वीर्य, कार्य के प्रशंसक हैं। इस घोड़े का सिर स्वर्ण से सजा हुआ है। इसके पैरों में लोहे का आवरण चढ़ा है। देवता भी इससे आकर्षित होते हैं। इन्द्र इस अश्व पर सबसे पहले सवार हुए थे। 
The head of the fast running horse-Ashw is golden and its feet are made of iron. Its faster than Dev Raj is respect of speed. The demigods-deities present themselves here to ensure that the horse eats-accepts the offerings, while Dev Raj Indr is already present.
ईर्मान्तासः सिलिकमध्यमासः सं शूरणासो दिव्यासो अत्याः। 
हंसाइव श्रेणिशो यतन्ते यदाक्षिषुर्दिव्यमज्ममश्वाः॥
सूर्य देव के रथ को खींचने वाले और सदैव चलने वाले पुष्ट जंघाओं और वक्ष वाले अश्व पंक्ति बद्ध होकर हंसों के तुल्य चलते हैं, तब वे स्वर्ग मार्ग में दिव्यता को प्राप्त होते हैं।[ऋग्वेद 1.163.10]
जब यह अश्व भव्य मार्ग में चलता है तब उसके साथी घोड़ों के साथ चलती हुई पंक्ति हंसों को पंक्ति जैसी लगती है।
When the horses pulling the chariote of Bhagwan Sury Narayan having strong thighs and strong chest, moving in a que like swans attain divinity through the heavens. 
तव शरीरं पतयिष्णवर्वन्तव चित्तं वातइव ध्रजीमान्। 
तव शृङ्गाणि विष्ठिता पुरुत्रारण्येषु जर्भुराणा चरन्ति॥
हे अश्व! आपका शरीर शीघ्रगामी है, आपका चित्त भी वायु भी की तरह शीघ्रगन्ता है। आपकी विशेष प्रकार से स्थित दीप्तियाँ जंगलों में दावानल के रूप में विद्यमान है।[ऋग्वेद 1.163.11]
हे अश्व! तू उड़ने में समर्थवान है। तू पवन वेग से चलता है। तू विविध स्थानों में भ्रमणशील है।
Hey fast moving, horse-Ashw! Your are fast moving like wind and capable of flying. You travel through various places like forests-jungles. You are present in the forests like the fire which engulfs the jungles.
उप प्रागाच्छसनं वाज्यर्वा देवद्रीचा मनसा दीध्यान:।  
अजः पुरो नीयते नाभिरस्यानु पश्चात्करेंयो यन्ति रेभाः॥
वह द्रुतगामी अश्व आसक्त चित्त से देवों का ध्यान करते हुए वध स्थान में जाता है। उसके मित्र अज उसके आगे-आगे ले जाया जाता है। स्तोता पीछे-पीछे पाठ करते हुए चलते हैं।[ऋग्वेद 1.163.12]
कुशल घोड़ा युद्ध क्षेत्र की तरफ जाता हुआ वंदना के योग्य होता है। अन्य अश्व जो उसके संग जन्म लेते हुए भी इसका बंधु रूप है, संग चलता है। मेधावी जन उसके संग आगे चलते हैं।
That fast moving horse moves to the site of sacrifice-slaughter remembering the demigods-deities. Its friend goat moves ahead of him. The devotees follows him chanting Shloks. 
उप प्रागात्परमं यत्सवस्थमवां अच्छा पितरं मातरं च 
अद्या देवातमी हि गम्या अथा शास्ते दाशुषे वार्याणि॥
द्रुतगामी अश्व पिता और माता को प्राप्त करने के लिए उत्कृष्ट और एक निवास योग्य स्थान पर गमन करता है। हे याजक! आप भी अच्छे गुणों से युक्त होकर देवत्व को प्राप्त करते हुए देवताओं से अपार वैभव प्राप्त करें।[ऋग्वेद 1.163.13]
ऐसा परम श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त हुआ वीर देवगणों के समीप पहुँचता है। उसे प्रदान करने वाला घोड़ा का मालिक यजमान वरणीय धन प्राप्त करता है।
The fast moving horse-Ashw moves to the excellent place for living, with his parents. Hey Yagy performers, you too should have righteous-virtuous qualities to attain demigodhood and all sorts of amenities like the demigods-deities.
अश्व मेध यज्ञ का घोड़ा :: सार्वभौम राजा अर्थात् चक्रवर्ती नरेश ही अश्वमेध यज्ञ करने का अधिकारी माना जाता था। 
इसको सम्पन्न करने के लिए महत्वशाली राजा-शासक भी तत्पर रहते थे।[ऐतरेय ब्राह्मण, 8 पंचिका]  
जो सब पदार्थो को प्राप्त करना चाहता है, सब विजयों का इच्छुक होता है और समस्त समृद्धि पाने की कामना करता है, वह इस यज्ञ का अधिकारी है।[आश्वलायन श्रौत सूत्र (10.6.1]  
सार्वभौम के अतिरिक्त भी मूर्धाभिषिक्त राजा अश्वमेध कर सकता था।[आपस्तम्ब श्रौतसूत्र 20.1.1; लाट्यायन 9.10.17]
ऋग्वेद के उपरोक्त दो सूक्तों (1.162 तथा 1.163) में अश्वमेध यज्ञ में प्रयुक्त अश्व तथा उसमें किए जाने वाले हवन का विशेष विवरण दिया गया है। 
शतपथ (13.1-5) तथा तैतिरीय ब्राह्मणों (3.8-9) में इसका बड़ा ही विशद वर्णन उपलब्ध है, जिसका अनुसरण श्रौत सूत्रों, वाल्मीकीय रामायण (1.13), महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में तथा जैमिनीय अश्वमेध में किया गया है।
अश्वमेध का आरम्भ फाल्गुन शुक्ल अष्टमी या नवमी से अथवा ज्येष्ठ (या आषाढ़) मास की शुक्लाष्टमी से किया जाता था। आपस्तम्ब ने चैत्र पूर्णिमा इसके लिए उचित तिथि मानी है। मूर्धाभिषिक्त राजा यजमान के रूप में मण्डप  में प्रवेश करता था और उसके पीछे उसकी पत्नियाँ सुसज्जित वेश में गले में सुनहला निष्क पहन कर अनेक दासियों तथा राजपुत्रियों के साथ आती थीं। इनके पदनाम थे :-
महिषी (राजा के साथ अभिषिक्त पटरानी), वावाता (राजा की प्रियतमा), परिवृक्त्री (परित्यक्ता भार्या) तथा पालागली (हीन जाति की रानी)।
अश्वमेध के लिए बड़ा ही सुडौल, सुन्दर तथा दर्शनीय घोड़ा चुना जाता था। उसके शरीर पर श्याम रंग की आभा होती थी। तालाब जल में उसे विधिवत् स्नान कराकर इस पावन कर्म के लिए अभिषिक्त किया जाता था। तब वह राजकुमारों के संरक्षण में वर्ष भर स्वच्छन्द घूमने के लिए छोड़ दिया जाता था। अश्व की अनुपस्थिति में तीन इष्टियाँ प्रतिदिन सवितृदेव के निमित दी जाती थीं और ब्राह्मण तथा क्षत्रिय जाति के वीणावादक स्वरचित पद्य प्रतिदिन राजा की स्तुति में वीणा बजा कर गाते थे। प्रतिदिन पारिप्लव (विशिष्ट आख्यान) का पारायण किया जाता था। एक साल तक निर्विघ्न घूमने के बाद जब घोड़ा सकुशल लौट आता था, तब राजा दीक्षा ग्रहण करता था। अवश्मेध तीन सुत्या दिवसों का अहीन याग था। सुत्या से अभिप्राय सोमलता को कूटकर सोमरस चुलाने से था (सवन, अभिषव)। इसमें बारह दीक्षाएँ, बारह उपसद और तीन सुत्याएँ होती थीं। 21 अरत्नि ऊँचे 21 यूप प्रस्तुत किए जाते थे।
दूसरा सुत्यादिवस प्रधान और विशेष महत्वशाली होता था। उस दिन अश्वमेधीय अश्व को अन्य तीन अश्वों के साथ रथ में जोत कर तालाब में स्नान कराया जाता था। ब्रह्मोद्य से तात्पर्य गूढ़ पहेलियों का पूछना और बूझना होता है। तब राजा व्याघ्रचर्म या सिंहचर्म पर बैठता था। तीसरे दिन उपांग याग होते थे और ऋत्विजों को भूरि दक्षिणा दी जाती थी। होता, ब्रह्मा, अध्वर्यु तथा उद्गाता को पूरब, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर दिशाओं में विजित देशों की सम्पति क्रमशः दक्षिणा में दी जाती थी और अश्वमेध इस विधि से सम्पन्न माना जाता था।
भगवान् श्री राम और भगवान्  कृष्ण भी अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। इनका मूल प्रयोजन उन राजाओं को शासन विहीन और दण्डित करना था; जो अत्याचारी, निरंकुश, दुराचारी, प्रजाहंता थे। भगवान् श्री कृष्ण ने उनके वंशजों को राज्य प्रदान कर दिया।  
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम्। 
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्॥
घोड़ों में अमृत के साथ समुद्र से प्रकट होने वाले उच्चै:श्रवा नामक घोड़े को, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा को मेरी विभूति मानो।[श्रीमद्भागवत गीता 10.27]  
During the churning of the ocean 14 jewels-Ultimate goods & personalities appeared. Amongest them the horse, which became the king of horses and named Uchcheshrawa along with Aerawat-the elephant, which appeared and became the king of elephants and both of them became the vehicles of Indr-the king of heaven, are the Ultimate forms of the God as per HIS own admission. The Almighty says that HE is present over the earth in the form of the kings.
समुद्र मन्थन के परिणाम स्वरूप प्राप्त हुए 14 रत्नों में उच्चैः श्रवा नामक अश्व और ऐरावत नामक हाथी भी थे, जो कि देवराज इन्द्र के वाहन बने। उन्हें परमात्मा ने अपनी विभूति माना है, क्योंकि वे क्रमश: घोड़ों और हाथियों में श्रेष्ठतम और उनके राजा हैं। प्रजा का पालन, रक्षा-संरक्षण राजा का धर्म है। वह प्रजा पालक अर्थात प्रजा की सेवा, लालन-पालन, देखभाल के लिए है, न कि अधिकार जताने-प्रताड़ित करने के लिए। राजा को सामर्थ्य-शक्तियाँ परमात्मा से सदुपयोग के लिए प्राप्त हैं, न कि दुरूपयोग की लिए। अतः राजा  परमात्मा की विभूति है। 
Mythological churning of the ocean resulted into the appearance of the 14 jewels-Ultimate goods & divine personalities. Amongest them Uchcheshrawa was the divine horse accompanied by the divine elephant Aerawat. They both became the kings of the horses & the elephants, respectively. They are Ultimate in their category and hence are the forms of the God. 
Please refer to :: MYTHOLOGICAL CHURNING OF OCEAN समुद्र मंथनsantoshsuvichar.blogspot.com
The king-ruler, emperor has been declared to be his own form-representative, by the God till he is protecting, nurturing, serving the citizens-masses. As a matter of fact there had been kings who proclaimed to be God and reached hell. Its one way traffic. A king may have  a microscopic fraction of the characteristics, qualities, traits of the Almighty, but the reciprocal-inverse or the opposite is never true.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (38) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, दधिक्रा,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
उतो हि वां दात्रा सन्ति पूर्वा या पूरुभ्यस्त्रसदस्युर्नितोशे।
क्षेत्रासां ददथुरुर्वरासां घनं दस्युभ्यो अभिभूतिमुग्रम्
हे द्यावा-पृथ्वी! दाता त्रसदस्तु राजा ने आपके समीप से बहुत धन प्राप्त करके याचक मनुष्यों को दिया, आपने उन्हें अश्व और पुत्र दिये एवं दस्युओं को मारने के लिए अभिभव समर्थ तीक्ष्ण अस्त्र प्रदान किया।[ऋग्वेद 4.38.1]
हे आकाश-पृथ्वी! त्रसदस्यु नामक दानी राजा ने तुमसे अनेक धन प्राप्त करके माँगने वालों को दिया। तुमने उसको अश्व और पुत्र प्रदान किया था तथा राक्षसों का पतन करने के लिए विरोधियों को पराजित करने वाला तीक्ष्ण शस्त्र दिया था।
Hey Heaven-sky & Earth! Donor king Trasdastu got lots of money-riches from you and gave to the needy. You gave them horses, sons and sharp weapons to kill the demons-dacoits.
उत वाजिनं पुरुनिष्षिध्वानं दधिक्रामु ददथुर्विश्वकृष्टिम्।
ऋजिप्यं श्येनं प्रुषितप्सुमाशुं चर्कृत्यमर्यो नृपतिं न शूरम्
गमनशील, अनेक शत्रुओं के निषेधक, समस्त मनुष्यों के रक्षक, सुन्दरगामी, दीप्ति विशिष्ट, शीघ्र गामी एवं बलवान राजा के तुल्य शत्रु विनाशक दधिक्रा (अश्व रूपी अग्नि) देव को आप दोनों (द्यावा-पृथ्वी) को धारित करते है।[ऋग्वेद 4.38.2]
दधिक्रा :: एक देवता जो घोड़े के आकार के माने जाते हैं, घोड़ा, अश्व; a demigod with the shape-figure of horses, horse.
अनेक शत्रुओं को रोकने वाले सभी प्राणियों के रक्षक विशेष प्रकाश वाले, द्रुतगामी, शक्तिशाली, भूमिपति के समान शत्रुओं को नष्ट करने वाले दधिक्रा को तुम दोनों ग्रहण करने वाली हो।
Both of you, the heaven & earth support the horse (fire in the form of horse) capable of vanishing-killing the enemies, fast moving, possessing beautiful movements, radiant, equivalent to a mighty king, protector of all humans.
यं सीमनु प्रवतेव द्रवन्तं विश्वः पूरुर्मदति हर्षमाणः।
 िड्भर्गृध्यन्तं मेधयुं न शूरं रथतुरं वातमिव ध्रजन्तम्
सब मनुष्य बलिष्ठ होकर जिस दधिक्रा देव की प्रार्थना करते हैं, वे निम्नगामी जल के तुल्य गमन शील संग्रामाभिलाषी शूर के तुल्य पद द्वारा दिशाओं के लङ्घनाभिलाषी, रथ गामी और वायु के तुल्य द्रुत गामी है।[ऋग्वेद 4.38.3]
समस्त पुरुष हर्षित होकर नीचे जाने वाले के समान, विचरण करने वाले पराक्रमी के समान पैरों से दिशाओं को पार करने वाले, रथ में चलने वाले एवं वायु के समान शीघ्र चाल वाले हैं।
All humans having acquired might pray-worship Dadhikra Dev who is like slow moving water inside the earth, braves-warriors who wish to fight, capable to moving in all directions, riding the charoite fast moving like the air.
यः स्मारुन्धानो गध्या समत्सु सनुतरश्चरति गोषु गच्छन्।
आविर्ऋजीको विदथा निचिक्यित्तिरो अरतिं पर्याप आयोः
जो संग्राम में एकत्री भूत पदार्थों को निरुद्ध करते हुए अत्यन्त भोग वासना से समस्त दिशाओं में गमन करते और वेग से विचरण करते हैं, जिनकी शक्ति आविर्भूत रहती हैं, वे ज्ञातव्य कर्मों को जानते हुए स्तुति कारी याजक गणों के शत्रुओं को तिरस्कृत करते हैं।[ऋग्वेद 4.38.4]
तिरस्कृत :: तुच्छ समझनेवाला; insult, despise, contempt, scorn.
घृणा करने वाला, तिरस्कारी, निंदात्मक, घृणात्मक, तिरस्कृतजो युद्ध में एकत्र हुए पदार्थों को रोकते हुए सभी दिशाओं में जाते हुए वेग से चलते हैं। जिनका बल स्वयं प्रकट होता है, वे किये जाने योग्य कर्मों के ज्ञाता स्तोता यजमानों के शत्रुओं को यशस्वी नहीं होने देते।
Those who, oppose the mingled multitude in battles, rushes eagerly, passing through the regions, whose vigour is manifestly, who, understanding what is to be known, puts to shame the adversary of the worshipers-Ritviz.
Those who block the collected goods in the war, move in all directions with high speed, their might emerges, they are aware of the endeavours of the Ritviz-worshipers and scorn-insult the enemy.
उत स्मैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु।
नीचायमानं जसुरिं न श्येनं श्रवश्चाच्छा पशुमच्च यूथम्
मनुष्य जिस प्रकार से वस्त्रापहारक तस्कर को देखकर चीत्कार करता है, उसी प्रकार संग्राम में शत्रु गण दधिक्रा देव को देखकर चीत्कार करते हैं। पक्षिगण जिस प्रकार नीचे की ओर आने वाले क्षुधार्त्त श्येन पक्षी को देखकर पलायन करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य अन्न और पशु यूथ के उद्देश्य से गमन करने वाले दधिक्रा देव को देखकर चीत्कार करते हैं।[ऋग्वेद 4.38.5]
जैसे लोग वस्त्र चुराने वाले चोर को देखकर चिल्लाते हैं, वैसे ही संग्राम भूमि से दधिक्रा देव को देखकर शत्रुगण चीखते हैं। जैसे नीचे की ओर आते हुए भूखे बाज को देखकर पक्षी नहीं ठहरते, वैसे ही पुरुष अन्न और पशुओं के लिए जाते हुए दधिक्रा को देखकर चीखते हैं।
The enemy start crying like those who see the cloth thief on seeing Dadhikra Dev in the war & the birds move away when they see the hungry falcon attacking them. The humans and the cattle cry on seeing Dadhikra Dev while moving for the sake of food stuff.
उत स्मासु प्रथमः सरिष्यन्नि वेवेति श्रेणिभी रथानाम्।
स्त्रजं कृण्वानो जन्यो न शुभ्वा रेणुं रेरिहत्किरणं ददश्वान्
वे असुर सेनाओं में जाने की अभिलाषा करके रथ पंक्तियों से युक्त होकर गमन करते हैं। वे अलंकृत है। वे मनुष्यों के हितकर अश्व के तुल्य शोभायमान हैं। वे मुखस्थित लौह दण्ड या लगाम को दाँतों से खिंचते हुए धूल-धूसरित हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.6]
वे असुर सेनाओं में जाने की इच्छा से रथों की पंक्ति के समान गमन करते हैं। वे शोभित हैं और प्राणियों का हित करने वाले अश्वों की तरह सुन्दर लगते हैं। वे मुँह में पड़ी लगाम को चबाते और पाँव से उड़ती हुई धूल को चाटते हैं।
They desire to move to the enemy army in rows of chariots. They are decorated. They are comparable to horses busy in the welfare of humans. They pull the reins placed in their mouth and covered with dust.
उत स्य वाजी सहुरिर्ऋतावा शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्ये।
तुरं यतीषु तुरयन्नृजिप्योऽधि भ्रुवोः किरते रेणुमृञ्जन्
इस प्रकार का वह अश्व सहनशील, अन्नवान, स्वशरीर द्वारा संग्राम में कार्य साधन करता हैं। वह ऋजुगामी और वेग गामी है। शत्रु सेनाओं के बीच में वह वेग से गमन करता है। वह धूलि को उठाकर के भ्रूदेश के ऊपर विक्षिप्त करता है।[ऋग्वेद 4.38.7]
इस तरह यह अश्व अन्नवान, सहनशील और अपने शरीर के द्वारा संग्राम कार्य को सिद्ध करता है। वह गति से चलने वाला शत्रुओं की सेनाओं में गति से दौड़ता है। वह धूल को पैरों से उड़ाकर अपनी भौहों में धारण करता है।
In this manner that tolerant horse, having food grains-stuff, utilises his body in the war. He moves straight with high speed in enemy armies. He raise the dust with his hoofs above his head-eye brows and disturb the enemy.
उत स्मास्य तन्यतोरिव द्योर्ऋघायतो अभियुजो भयन्ते।
यदा सहस्रमभि षीमयोधीदुर्वर्तुः स्मा भवति भीम ऋञ्जन्
युद्धाभिलाषी लोग दीप्तिमान शब्दकारी वज्र के तुल्य हिंसाकारी दधिक्रा देव से भयभीत होते हैं। जब वे चारों ओर हजारों के ऊपर प्रहार करते हैं, तब वे उत्तेजित होकर भयंकर और अजेय हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.8]
अजेय :: असामान्य, अदम्य, अनभ्यस्त, ग़ैरमामूली, अपराजेय, न जीते जाते योग्य, दुर्गम, दुस्तर, अलंघ्य; invincible, insurmountable, unbeaten.
युद्ध की इच्छा करने वाले प्राणी निनाद करने वाले उज्जवल वज्र के समान घातक दधिक्रा से भयभीत होते हैं। जब वे सभी ओर से वार करते हैं तब वे महाबलशाली हो जाते हैं। उस समय उन्हें कोई रोक नहीं सकता।
People engaged in war are afraid of Dadhikra Dev due to the sound like Vajr created by him. He become furious and invincible when he strikes thousands of  enemies from  four directions.
उत स्मास्य पनयन्ति जना जूतिं कृष्टिप्रो अभिभूतिमाशोः।
उतैनमाहुः समिथे वियन्तः परा दधिक्रा असरत्सहस्रैः
मनुष्यों की अभिलाषा को पूर्ण करने वाले एवं वेगवान दधिक्रा देव के अभिभव कारक वेग की प्रार्थना मनुष्य गण करते हुए कहते हैं कि ये दधिक्रा देव हजारों शत्रुओं को भी पराभूत करके आगे बढ़ जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.9]
मनुष्यों की कामना पूर्ण करने वाले, अत्यन्त गति से परिपूर्ण दधिक्रा देव के विजयोल्लास से परिपूर्ण वेद की वंदनाकारी प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि रिपु पराजित होगा। दधिक्रा देव सहस्र संख्यक शक्ति के साथ संग्राम में जाते हैं। 
The humans worship the defeater of thousands of  enemies pray to fast moving Dadhikra Dev who accomplish the desires of the humans. 
आ दधिक्राः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्यइव ज्योतिषापस्ततान।
सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि
सूर्य देव जिस प्रकार से तेज द्वारा जल प्रदान करते है, उसी प्रकार से दधिक्रा देव बल द्वारा पञ्चकृष्टि (देव, मनुष्य, असुर, राक्षस और पितृगण अथवा चारों वर्ण और निषाद) को व्याप्त कर देते है। शत-सहस्र दाता, वेगवान (दधिका देव) हमारे स्तुति वाक्य को मधुर फल द्वारा संयोजित करें।[ऋग्वेद 4.38.10]
सूर्य देव अपने तेज से जैसे जल वृद्धि करते हैं वैसे ही दधिक्रा देव जल द्वारा पश्चवृष्टि की वृद्धि करते हैं। सैकड़ों क्या हजारों फलों को प्रदान करने वाले दधिक्रा देव हमारी स्तुति रूप वचनों का अभीष्ट फल प्रदान करते हुए सम्पादन करें।
The way the Sun grant water due to his shine-aura, Dadhikra Dev too grant too grant water to the demigods-deities, humans, demons-giants, manes, the fours Varn and the Nishads. Let fast moving Dadhikra Dev who grants-accomplish hundreds & thousands wishes accept our prayers.(11.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (39) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, दधिक्रा,  छन्द :- त्रिष्टुप, अनुष्टुप।
आशुं दधिक्रां तमु नु ष्टवाम दिवस्पृथिव्या उत चर्किराम।
उच्छन्तीर्मामुषसः सूदयन्त्वति विश्वानि दुरितानि पर्षन्
हम लोग शीघ्रगामी उसी दधिक्रा देव की शीघ्र प्रार्थना करेंगे। द्यावा-पृथ्वी के समीप से उनके सम्मुख विक्षेप करेंगे। तमोनिवारिणी उषा देवी हमारी रक्षा करें एवं समस्त विपत्तियों से हमें पार करें।[ऋग्वेद 4.39.1]
उन शीघ्रगामी दधिक्रा देव की हम पुरुष शीघ्र ही उपासना करेंगे। अम्बर-धरा के पास से उनके सम्मुख घास डालेंगे। अंधकार को दूर करने वाली उषा हमारी रक्षिक बनकर सभी कष्टों को हमसे दूर करें।
Verily we praise that swift Dadhikra Dev and scatter (proved before him) from heaven and earth; may the gloom-dispelling dawns preserve for me (all good things) and bear me beyond all evils.
We will worship-pray fast-quick moving Dadhikra Dev and scatter before him in the presence of sky-heaven and earth. let Usha Devi protect us and swim us across all trouble. 
महश्चर्कर्म्यर्वतः क्रतुप्रा दधिक्राव्णः पुरुवारस्य वृष्णः।
ये पूरुभ्यो दीदिवासं नाग्निं ददथुर्मित्रावरुणा ततुरिम्
हम यज्ञ सम्पन्न करने वाले हैं। हम बहुतों द्वारा वरणीय, महान और अभीष्ट वर्षी दधिक्रा देव की प्रार्थना करते हैं। हे मित्रा-वरुण! आप दोनों दीप्तिमान अग्नि देव के तुल्य स्थित तथा त्राणकर्ता दधिक्रा देव को मनुष्यों के उपकार के लिए धारित करते है।[ऋग्वेद 4.39.2]
हम अनुष्ठान कर्म के संपादन कर्त्ता हैं। अनेकों द्वारा वरण किये जाने वाले अभिलाषा की वर्षा करने वाले दधिक्रा देव की हम वंदना करते हैं। हे मित्रा-वरुण! तुम दैदीप्यमान अग्नि के समान दुःखों से पार लगाने वाले दधिक्रा देव को प्राणियों के हितार्थ धारण करने वाले हो।
We intend to organise a Yagy. We worship great Dadhikra Dev adorned by many people, who  accomplish our desires-needs. Hey Mitra-Varun! You support Dadhikra Dev who relieve us from trouble, like the aurous Agni Dev for the welfare of humans.
यो अश्वस्य दधिक्राव्णो अकारीत्समिद्धे अग्ना उषसो व्युष्टौ।
अनागसं तमदितिः कृणोतु स मित्रेण वरुणेना सजोषाः
जो याजकगण उषा के प्रकाशित होने पर अर्थात प्रभात होने पर और अग्नि देव के समिद्ध होने पर अश्व रूप दधिक्रा की प्रार्थना करते हैं, मित्र, वरुण और अदिति के साथ दधिक्रादेव उस याजकरण को निष्पाप करें।[ऋग्वेद 4.39.3]
जो यजमान उषाकाल में अग्नि प्रज्जवलित होने पर घोड़े रूप दधिक्रा का पूजन करते हैं, उनकी सखा, वरुण, अदिति और दधिक्रा पापों से बचावें।
Those Ritviz-hosts, who worship Dadhikra Dev; when Agni Dev is being ignited with the day break, he makes them sinless in association with Mitr, Varun & Aditi.
दधिक्राव्ण इष ऊर्जो महो यदमन्महि मरुतां नाम भद्रम्।
स्वस्तये वरुणं मित्रमग्नि हवामह इन्द्रं वज्रबाहुम्
हम अन्न साधक, बल साधक, महान और स्तोताओं के कल्याण कारक दधिक्रा देव के नाम की प्रार्थना करते हैं। कल्याण के लिए हम वरुण, मित्र, अग्नि और वज्रबाहु इन्द्र देव का आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.39.4]
अन्न का साधन करने वाले, प्रार्थना। करने वालों का मंगल करने वाले श्रेष्ठ दधिक्रा देव का नाम संकीर्तन करते हैं। सुख की प्राप्ति के लिए हम मित्र वरुण, अग्नि में व्रज धारण करने वाले इन्द्रदेव को आमंत्रित करते हैं।
We worship Dadhikra Dev who is the provider of food grains, great and beneficial to hosts-devotees. We invoke Mitr Dev, Varun Dev, Agni Dev and Indr Dev wielding Vajr.
WIELD :: रखना, चलाना, बरतना, हिलाना, सँभालना, फिराना, प्रबंध करना, काम में लगाना, हाथ लगाना, उपयोग करना; hold, to have and use power, authority, to hold and be ready to use a weapon.
इन्द्रमिवेदुभये विह्वयन्त उदीराणा यज्ञमुपप्रयन्तः।
दधिक्रामु सूदनं मर्त्याय ददथुर्मित्रावरुणा नो अश्वम्
जो युद्ध करने के लिए पराक्रम करते हैं और जो यज्ञ आरम्भ करते हैं, वे दोनों ही इन्द्र देव के तुल्य दधिक्रा देव का आह्वान करते हैं। हे मित्रा-वरुण! आप मनुष्यों के प्रेरक अश्व स्वरूप दधिक्रा देव को हमारे लिए धारित करें।[ऋग्वेद 4.39.5]
जो युद्ध को तैयार करते हैं और जो यज्ञ कर्म करते हैं, वह दोनों ही इन्द्र के समान दधिक्रा देव को आमंत्रित करते हैं। हे मित्रा-वरुण! तुम मनुष्यों को शिक्षा प्रदान करने वाले अश्व के रूप वाले दधिक्रा देव को हमारे लिए धारण करो।
Those who make efforts for the war & those who begin Yagy, both invoke Dadhikra Dev just like Indr Dev. Hey Mitra-Varun! You support Dadhikra Dev-in the form of horse, who inspire humans. 
दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः।
सुरभि नो मुखा करत्प्र ण आयूंषि तारिषत्
हम जयशील, व्यापक और वेगवान दधिक्रा देव की प्रार्थना करते हैं। वे हमारे नेत्र आदि इन्द्रियों को सुगन्ध विशिष्ट कर हमारी आयु को बढ़ावें।[ऋग्वेद 4.39.6] 
विजय से परिपूर्ण, व्यापक और गति वाले दधिक्रा का हम पूजन करते हैं। हे हमारे नेत्र, मुख आदि इन्द्रियों को सुरभित करें और हमारी आयु की वृद्धि करें।
We worship-pray the winner, dynamic Dadhikra Dev. Let him make our eyes & other sense organs strong-energetic and boast our longevity.(14.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (40) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, दधिक्रा, सूर्य, छन्द :- जगती, त्रिष्टुप।
दधिक्राव्ण इदु नु चर्किराम विश्वा इन्मामुषसः सूदयन्तु।
अपामग्नेरुषसः सूर्यस्य बृहस्पतेराङ्गिरसस्य जिष्णोः
हम बारम्बार दधिक्रा देव की प्रार्थना करेंगे। सम्पूर्ण उषा हमें कर्म में प्रेरित करें। हम जल, अग्निदेव, उषा, सूर्य, बृहस्पति और अङ्गिरा गोत्रोत्पन्न जिष्णु की प्रार्थना करेंगे।[ऋग्वेद 4.40.1]
जिष्णु :: विजयी; triumphant, victorious, winner.
उन दधिक्रादेव की हम बारम्बार उपासना करेंगे। समस्त उषायें हमको कार्यों में संलग्न करें। जल, अग्नि, उषा, सूर्य, बृहस्पति और अंगिरा वंशज विष्णु का हम समर्थन करेंगे।
We will worship-pray Dadhikra Dev repeatedly. Let Usha inspire us endeavours, every morning. We will pray to the winners in the dynasty Agni Dev, Sun, Brahaspati and Angira.
सत्वा भरिषो गविषो दुवन्यसच्छ्रवस्यादिष उषसस्तुरण्यसत्।
सत्यो द्रवो द्रवरः पतङ्गरो दधिक्रावेषमूर्जं स्वर्जनत्
गमनशील, पालन-पोषण में कुशल, गौओं के प्रेरक और परिचारकों के साथ निवास करने वाले दधिक्रा देव अभिलषणीय उषा काल में अन्न की कामना करें। शीघ्र गामी, सत्य गमन शील, वेग वान और उत्प्लवन द्वारा गमन शील दधिक्रा देव अन्न, बल और हर्ष उत्पन्न करें।[ऋग्वेद 4.40.2]
भरण-पोषण कर्म चालक, विचरणशील, धेनुओं को प्रेरणा प्रदान करने वाले, परिचारिकों के साथ रहने वाले दधिक्रा कामना गोग्य उषा बेला में अन्न की इच्छा करें। ये वेगवान, शीघ्र चलने वाले दधिक्रा देव अन्न, बल और अलौकिक गुणों को प्रकट करने वाले हों।
Let dynamic, expert in nourishment-nurturing and inspirer of cows along with his care takers, desire for food grains at dawn. Let fast moving, truthful, accelerated, possessing thrust Dadhikra Dev show the divine characters of food grains, force-might.
उत स्मास्य द्रवतस्तुरण्यतः पर्णं न वेरनु वाति प्रगर्धिनः।
श्येनस्येव ध्रजतो अङ्कसं परि दधिक्राव्णः सहोर्जा तरित्रतः 
पक्षिगण जिस प्रकार से पक्षियों की गति का अनुसरण करते हैं, उसी प्रकार सब वेगवान लोग त्वरायुक्त और आकांक्षावान दधिक्रा देव की गति का अनुसरण करते हैं। श्येन पक्षी के तुल्य द्रुतगामी और त्राणकारी दधिक्रा देव के उस प्रदेश के चारों ओर एकत्र होकर अन्न के लिए सब गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.40.3]
जैसे पक्षी पक्षियों की परम्परागत रास्ते पर चलते हैं, वैसे ही सभी वेगवान जीव शीघ्रता से युक्त एवं अभिलाषा वाले दधिक्रा की चाल पर चलते हैं। श्येन के समान शीघ्रगामी एवं सुरक्षा करने वाले दधिक्रा के समस्त तरफ संगठित होकर समस्त अन्न के लिए जाते हैं।
The manner in which the birds follow the route of migration of their ancestors, all dynamic, accelerated and desirous people follow Dadhikra Dev. Moving fast like the falcon, protector Dadhikra Dev move in all directions for food stuff.
उत स्य वाजी क्षिपणिं तुरण्यति ग्रीवायां बद्धो अपिकक्ष आसनि।
क्रतुं दधिक्रा अनु संतवीत्वत्प थामङ्कांस्यन्वापनीफणत्
वह अश्वरूप देव कण्ठ प्रदेश में कक्ष प्रदेश और मुख प्रदेश में बद्ध होते हैं एवं बद्ध होकर पैदल शीघ्र गमन करते हैं। दधिक्रा देव अधिक बलवान होकर यज्ञाभिमुख कुटिल मार्गों का अनुसरण करके सभी जगह गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.40.4]
यह देव अश्वरूपी वाले हैं। यह काष्ठ कक्ष और मुख में बंधे हुए होते हैं और पैदल ही तेजी से चलते हैं। वे दधिक्रा अत्यन्त पराक्रमी होकर टेढ़े रास्तों को भी लांघते हुए अनुष्ठान के सम्मुख मुख करके समस्त ओर जाते हैं।
Dadhikra Dev remain in the form of horse. He moves fast on foot tied in the neck, mouth & the body. He become mighty, moving towards the Yagy site, following the uneven routes, all around-every where. 
हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत्। नृषद्वरसदृतसव्द्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतम्
हंस (आदित्य) दीप्त आकाश में अवस्थित रहते हैं। वसु (वायु) अन्तरिक्ष में अवस्थिति करते है। होता (वैदिकाग्नि) वेदीस्थल पर गार्हपत्यादि रूप से अवस्थिति करते हैं एवं अतिथिवत पूज्य होकर धर में (पाकादिसाधन रूप से) अवस्थिति करते हैं। ऋत (सत्य, ब्रह्म, यक्ष ) मनुष्यों के बीच में अवस्थान करते हैं, वरणीय स्थान में अवस्थान करते हैं, यज्ञस्थल में अवस्थान करते हैं एवं अन्तरिक्ष स्थल में अवस्थान करते हैं। वे जल में, रश्मियों में, सत्य में और पर्वतों में उत्पन्न हुए हैं।[ऋग्वेद 4.40.5]
अवस्थित नभ में वायु अंतरिक्ष में और होता इत्यादि वेदी पर आते हैं। अदिति के समान पूजनीय होकर गृह में निवास करते हैं। ऋभु मनुष्यों में वरणीय स्थान तथा यज्ञ-स्थल में रहते हैं। वे नत, रश्मि, सत्य और शैलों में उत्पन्न हुए हैं।
Swans (Hans-Adity) stay-establish in the sky. Vasu Vayu stay in the space. The hosts-Ritviz stay at the Yagy site like the fire and honoured like Aditi. Rat dev (Truth, Brahm & Yaksh) establish between-amongest the humans & the space-sky. They are born in the waters, rays of light and the mountains.(16.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (44) :: ऋषि :- वसिष्ठ मैत्रा-वरुण; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप।
दधिक्रां वः प्रथममश्विनोषसमग्निं समिद्धं भगमूतये हुवे।
इन्द्रं विष्णुं पूषणं ब्रह्मणस्पतिमादित्यान्द्यावापृथिवी अपः स्वः
आपकी रक्षा के लिए पहले मैं दधिका देवता को आवाहित करता हूँ। इसके पश्चात अश्विनी कुमारों, उषा, समिद्ध अग्नि देव और भग देव का आह्वान करता हूँ। इन्द्र देव, श्रीविष्णु, पूषा, ब्रह्मणस्पति, आदित्यगण, द्यावा-पृथ्वी, जल देवता और सूर्य देव को आवाहित करता हूँ।[ऋग्वेद 7.44.1]
I invoke Dadhikra Dev for your protection. Thereafter, I will invoke Ashwani Kumars, Pusha, Samiddh, Agni Dev & Bhag Dev. I am invoking Indr Dev, Shri Hari Vishnu, Pusha, Brahmanspati, Adity Gan, earth & the heavens, deity of water Varun Dev, Sury Dev.
दधिक्रामु नमसा बोधयन्त उदीराणा यज्ञमुपप्रयन्तः।
इळां बर्हिषि सादयन्तोऽश्विना विप्रा सुहवा हुवेम
यज्ञ के प्रारम्भ में हम स्तोत्राओं द्वारा दधिकादेव को प्रबोधित और प्रवर्तित करते हुए और इलादेवी (हवी रूपा देवी) को स्थापित करते हुए शोभन आह्वान से सम्पन्न मेधावी अश्विनी कुमारों को बुलाते हैं।[ऋग्वेद 7.44.2]
In the beginning of Yagy, we Stotas promulgated & enlightened Dadhikra Dev, established Ila Devi and gracefully invoked intelligent Ashwani Kumars.
दधिक्रावाणां बुबुधानो अग्निमुप ब्रुव उषसं सूर्य गाम्।
ब्रध्नं मँश्चतोर्वरुणस्य ब्रभुं ते विश्वास्मद्दुरिता यावयन्तु
दधिका को प्रबोधित करके मैं अग्निदेव, उषादेवी, सूर्यदेव और वाग्देवता की स्तुति करता हूँ। मैं अभिमानियों के विनाशकारी वरुणदेव के महान पिङ्गलवर्ण अश्व की स्तुति करता हूँ। वे सभी देवगण समस्त पापों को मुझसे पृथक करें।[ऋग्वेद 7.44.3]
Having promulgated Dadhikra Dev I worship Agni Dev, Usha Devi, Sury Dev and Vag Devta. I pray to the copper coloured horse of Varun Dev who destroy the egoistic. Let all these demigods-deities separate the sins from me.
दधिक्रावा प्रथमो वाज्यर्वाग्रे रथानां भवति प्रजानन्।
संविदान उषसा सूर्येणादित्येभिर्वसुभिरङ्गिरोभिः
अश्वों में प्रमुख, शीघ्रगामी और गतिशील दधिका ज्ञातव्य को भली-भाँति जानकर उषा, सूर्य, आदित्य, वसुगण और अंगिरा लोगों के साथ सहमत होकर स्वयं रथ के अग्रभाग में नियोजित हो जाते हैं।[ऋग्वेद 7.44.4]
Leader-chief of the horses, fast moving and accelerated Dadhikra understood the desired, agreed with Usha, Adity, Vasu Gan and Angiras and deployed himself in the front of the charoite.
आ नो दधिक्राः पथ्यामनक्त्वृतस्य पन्थामन्वेतवा उ।
शृणोतु नो दैव्यं शर्धो अग्निः शृण्वन्तु विश्वे महिषा अमूराः
यजन मार्ग से जाने के लिए दधिक्रा देव हमारे मार्ग को जल से सिंचित करें। दिव्य रूप वाले वे अग्नि देव और समस्त बलशाली विद्वान हमारी प्रार्थना श्रवण करें।[ऋग्वेद 7.44.5]
Let Dadhikra Dev shower-irrigate our path-route of the Yagy with water. Let all mighty enlightened and divine form Agni Dev listen-respond to our prayers.(12.01.2024)


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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

Wednesday, April 28, 2021

LAL KITAB REMEDIES लाल किताब के उपाय

LAL KITAB REMEDIES
 लाल किताब के उपाय
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com santoshhastrekhashastr.wordpress.com  bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com 
 "ॐ गं गणपतये नमः" 
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्। 
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
हर समस्या का समाधान :: मनुष्य अपनी मेहनत-ईमानदारी और स्वयं की समझदारी समस्याओं को दूर करने का प्रयास करे, धार्मिक-पुण्यात्मक कार्य करे। सुख-दुख मनुष्य के पूर्ववर्ती और वर्तमान कर्मों का प्रतिफल ही है। पुण्य कर्म किए जाए तो दु:ख का समय जल्दी निकल जाता है।
गाय, पक्षी, कुत्ता, चींटियाो और मछलियों को भोजन-चारा प्रदान करने से सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। नियमित रूप से गाय को रोटी खिलाएं तो उसके ज्योतिषीय ग्रह दोष नष्ट हो जाते हैं। गाय को पूज्य और पवित्र माना जाता है, इसी वजह से इसकी सेवा करने वाले व्यक्ति को सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार पक्षियों को दाना डालने पर आर्थिक मामलों में लाभ प्राप्त होता है। व्यवसाय करने वाले लोगों को विशेष रूप से प्रतिदिन पक्षियों को दाना अवश्य डालना चाहिए।
यदि कोई व्यक्ति दुश्मनों से परेशान हैं और उनका भय हमेशा ही सताता रहता है तो कुत्ते को रोटी खिलाना चाहिए। नियमित रूप से जो कुत्ते को रोटी खिलाते हैं, उन्हें दुश्मनों का भय नहीं सताता है। कर्ज से परेशान से लोग चींटियों को शक्कर और आटा डालें। ऐसा करने पर कर्ज की समाप्ति जल्दी हो जाती है।
जिन लोगों की पुरानी सम्पत्ति उनके हाथ से निकल गई है या कई मूल्यवान वस्तु खो गई है तो ऐसे लोग यदि प्रतिदिन मछली को आटे की गोलियाँ खिलाते हैं तो उन्हें लाभ प्राप्त होता है। मछलियों को आटे की गोलियाँ खिलाने से पुरानी सम्पत्ति पुन: प्राप्त होने के योग बनते हैं।
बचत :: चावल के 21 दाने घर में पैसे रखने के स्थान पर लाल पोटली में रखें। इससे धन  की बचत होगी, फिजूल खर्ची नहीं होगी। किसी भी शुभ मुहूर्त या अक्षय तृतीया, पूर्णिमा, दीपावली या किसी अन्य शुभ मुहूर्त में सुबह जल्दी उठें। सभी आवश्यक कार्यों से निवृत्त होकर लाल रेशमी कपड़ा लें। अब उस लाल कपड़े में चावल के 21 दानें रखें। ध्यान रहें चावल के सभी 21 दानें पूरी तरह से अखंडित हों। उन दानों को कपड़े में बाँध लें। माता लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजन करें। पूजा में यह लाल कपड़े में बंधे चावल भी रखें। पूजन के बाद यह लाल कपड़े में बंधे चावल घर  में धन-पैसे रखने के स्थान पर गुप्त रूप से रखें।  
दारिद्र मुक्ति :: 
दरिद नाशन दान, शील दुर्गतिहिं नाशियत।
बुद्धि नाश अज्ञान, भय नाशत है भावना[चाणक्य]
दान से दरिद्रता या गरीबी का नाश होता है। शील या व्यवहार दुखों को दूर करता है। बुद्धि अज्ञानता को नष्ट कर देती है। शुभ विचार सभी प्रकार के भय से मुक्ति दिलाते हैं।
Donations leads to removal of poverty, good behaviour relieves of pains-sorrow, troubles, intelligence destroys ignorance and good-virtuous thoughts relieves one from fear. 
भाग्य या किस्मत का निर्धारण प्रारब्ध-पूर्व कर्मों है। मगर शुभ कर्मों द्वारा अशुभ कर्मों के फल को रोका जा सकता है।  
दारिद्रयनाशनं दानं शीलं दुर्गतिनाशनम्।
अज्ञाननाशिनी प्रज्ञा भावना भयनाशिनी[चाणक्य]
केवल दान और पुण्य कर्मों से ही दरिद्रता का नाश हो सकता है। दुर्गति या दुरावस्था का नाश शील या गुणों से  किया जा सकता है। बुद्धि अज्ञानता को नष्ट कर देती है। किसी भी प्रकार के डर को विचार नष्ट कर देते हैं।
यदि किसी व्यक्ति को धन के अभाव का सामना करना पड़ रहा है तो उसे दान-पुण्य के प्रभाव से राहत मिल सकती है। दान से दरिद्रता दूर होती है। दान करने वाले व्यक्ति से सभी देवी-देवता प्रसन्न रहते हैं और ग्रह दोष भी समाप्त हो जाते हैं। 
इसका एक अर्थ यह भी है कि दान ग्रहण करके उसका सदुपयोग करें स्वयं दान देने लायक बनें। जातक कभी भी अपनी सामर्थ्य से अधिक दान नहीं करना चाहिये। सामान्य स्थिति  में आय का छटा भाग या अधिक  से अधिक आय का पाँचवाँ भाग दान किया सकता है।  
बुद्धि प्राप्ति हेतु भगवान् शिव का दूध से अभिषेक करें। माता सरस्वती का बीज मन्त्र "ॐ ऐं नमः" का जाप प्रतिदिन 108 बार करें। 
विद्या सम्बन्धी समस्याएँ :: पढ़ाई से संबंधित परेशानियों को दूर करने के लिए माता सरस्वती का ध्यान करें एवं बल, बुद्धि, विद्या के दाता हनुमान जी महाराज और गणेश जी महाराज का पूजन करें।
बुद्धि की वृद्धि :: तीव्र बुद्धि और विद्या निम्न मंत्रो का एक-एक लाख जाप करें। 
(1). सच्चिदा एकी ब्रह्म ह्रीं सच्चिदा क्रीं ब्रह्म।
(2). ॐ क्रीं क्रीं क्रीं।
गृह कलह की शान्ति लिये भगवान् शिव का दूध से अभिषेक करें।
कामना पूर्ति हेतु भगवान् शिव का जलाभिषेक करें। 
वंश का विस्तार, रोगों का नाश तथा नपुंसकता दूर करने हेतु घी की धारा से भगवान् शिव का अभिषेक करें।
भोग की वृद्धि हेतु इत्र की धारा से भगवान् शिव का अभिषेक करें।
क्षय रोग का नाश करने के लिये शहद से भगवान् शिव का अभिषेक करें, परन्तु उचित दवाई का प्रयोग साथ-साथ करें। 
आनंद की प्राप्ति हेतु ईख से भगवान् शिव का अभिषेक करें। 
भोग एवं मोक्ष की प्राप्ति हेतु गँगा जल से भगवान् शिव का अभिषेक करें। 
शादी या विवाहित जीवन से जुड़ी समस्याओं का निराकरण करने के लिए भगवान् शिव और माँ पार्वती, लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, राधा-कृष्ण और गणपति महाराज की पूजा करनी चाहिए।
पुत्र या पुत्री का विवाह :: सफेद खरगोश पालें। अविवाहित पुत्र या पुत्री से उसे खाना दिलवायें  देखभाल करायें। इससे धीरे-धीरे, विवाह का योग बनने लगता है।
पुरुषों के विवाह में यदि रुकावटें और विलंब हो, तो दोमुखी रुद्राक्ष के पाँच दाने लें। एक कटोरी जल में उन्हें पूजा में रखें। धूप, दीप जलाएं। प्रतिदिन तीन माला "ऊँ पार्वती वल्लवभायु स्वाहा" का जाप करें। यह प्रयोग करीब तीन महीने तक करें। जल पौधें पर चढ़ा दें। तीन महीने की पूजा के पश्चात एक रुद्राक्ष गणेश पर, एक रुद्राक्ष पार्वती पर, एक रुद्राक्ष कार्तिकेय पर, एक रुद्राक्ष नदी को और एक रुद्राक्ष भगवान् शिव पर चढ़ा दें। शिवलिंग पर जल चढ़ाए और आराधना करते हुए भोलेनाथ से प्रार्थना करें। शीघ्र ही विवाह  का योग बनेगा। यह उपाय शुक्ल पक्ष के प्रथम सोमवार से आरंभ करें। रुद्राक्ष की पवित्र माला से जाप करें।
ससुराल में प्यार :: विवाह पश्चात ससुराल में प्यार पाने के लिए और सभी से अच्छे संबंध हों, इसके लिए लड़की को सर्वप्रथम सबका सम्मान करना चाहिए।
एक कटोरी में जल लें। उसे पूजा स्थल में रखें। धूप दीप जला लें। भोग-प्रसाद रखें। "ऊँ क्लीं कृष्णाय नमः" मंत्र की एक माला प्रतिदिन जाप करें। पूजा के पश्चात जल पी लें। सुबह-शाम इलायची खायें। परिवार में सुख-शान्ति रहेगी। ससुराल में सबसे मधुर संबंध बना रहेगा। 
धन संबंधी समस्याओं का निवारण करने के लिये महालक्ष्मी, कुबेर, भगवान् श्री हरी विष्णु से प्रार्थना करनी चाहिए।
कार्य में सफलता हेतु किसी भी कार्य की शुरूआत गणपति महाराज के पूजन के साथ ही करें।
कष्टों  निवारण :: निम्न मंत्र के 108 बार पाठ मानसिक से विपदा दूर चली जाती हैं।
रां रां रां रां रां रां रां रां कष्टं स्वाहा।
उन्नति :: किसी भी क्षेत्र में उन्नति पाने के लिए निम्न मंत्र का 108 बार नित्य जप करें।
ह्रीं श्रीं श्रीं श्रीं श्रीं श्रीं श्रीं श्रीं लक्ष्मी मम् गृहे धन पूरे। चिंता दूरे-दूरे स्वाहा।
विध्न निवारण :: निम्न मंत्र का 1,000 बार जाप करके सिद्ध करें। फिर नित्य 21 बार मंत्र का उच्चारण कर के मुख का मार्जन करें, तो परिवार के सभी सदस्यों के लिए हर प्रकार के विघ्न दूर हो जाएंगे। सायं काल पीपल की जड़ में शर्बत छोड़ें और श्रद्धापूर्वक धूप-दीप जलाएं।
नमः शांते प्रशांते ॐ ह्रीं ह्रौं सर्व क्रोध प्रशमनी स्वाहा।
भूत-प्रेत बाधा :: निम्न मंत्र को 1,000 बार जप करना चाहिए। इसके बाद जिसे भूत लगा हो, उसे 7 बार, मंत्र पड़ते हुए झाड़ें, तो लाभ होगा।
नमो मसाणं बरसिने प्रेतानां कुरू कुरू स्वाहा।
भय या भूत-प्रेत आदि का डर सताता हो तो हनुमान जी महाराज का ध्यान करें और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
वैवाहिक जीवन का सुख :: पति-पत्नी बिछड़ गए हैं और काफी प्रयत्नों के बाद भी वापस मिलने का योग नहीं बन पा रहा हो तो हनुमान जी महाराज का ध्यान-प्रार्थना करें। 
 वैवाहिक जीवन में सुख-शान्ति :: कन्या का विवाह हो चुका हो और वह विदा हो रही हो तब एक लोटे में गँगा जल लेकर उसमें थोड़ी हल्दी डालकर व एक सिक्का डालकर लड़की के ऊपर से उबारकर उसके आगे फेंक दें। लड़की का वैवाहिक जीवन सफल होगा और वह ससुराल में भी खुश रहेगी।
परेशानी का निराकरण :: शनिदेव, राहु और केतु से सम्बन्धित वस्तुओं का दान और उनकी पूजा करें।
भूमि सम्बन्धी परेशानियाँ ::  मंगल का पूजन करें। हनुमान जी महाराज की प्रार्थना-सेवा करें। 
विवाह में विलंब :: विवाह के कारक बृहस्पति  की पूजा करें।  
कर्ज निवारण (1). :: कर्ज और मर्ज बढ़ते ही जाते हैं, यदि समय पर उनका उपाय न किया जाये। भारत में हर साल हजारों किसान कर्ज में डूबकर आत्महत्या तक कर लेते हैं। आजकल बैंक और लेनदेन करने वाली आर्थिक-मौद्रिक सँस्थाएँ ग्राहकों को कर्ज लेने के लिये प्रोत्साहित करती हैं और उनसे 47 % तक ब्याज वसूल करती हैं। डेबिट कार्ड का चलन बढ़ता ही जा रहा है। समझदार व्यक्ति अपनी चादर देखकर ही पैर पसारता है। 
ज्योतिष में षष्ठ, अष्टम, द्वादश स्थान एवं मंगल ग्रह को कर्ज का कारक ग्रह माना जाता है। मंगल के कमजोर होने, पापग्रह से युक्त होने, अष्टम, द्वादश, षष्ठ स्थान पर नीच या अस्त स्थिति में होने पर जातक सदैव ऋणी बना रहता है। ऐसे में यदि उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि पड़े तो कर्ज तो होता है, तो बड़ी मुश्किल से चुकता होता है। शास्त्रों में मंगलवार और बुधवार को कर्ज के लेन-देन के लिए निषेध किया है। मंगलवार को कर्ज लेने वाला जीवन पर्यंत ऋण नहीं चुका पाता तथा उसकी संतानें भी कर्जों में डूबी रहती हैं।

अपनी आमदनी के अनुसार ही ऋण लें और समय पर चुकता करें। अपनी आय का छटा हिस्सा वक्त जरूरत के लिये बचकर रखें। 
शनिवार को ऋणमुक्तेश्वर महादेव का पूजन करें।
मंगल की भातपूजा, दान, होम और जप करें।
मंगल एवं बुधवार को कर्ज का लेन-देन कतई न करें।
लाल, सफेद वस्त्रों का अधिकतम प्रयोग करें।
गणेश जी महाराज को प्रतिदिन दूर्वा और मोदक का भोग लगायें।
गणेश जी महाराज का अथर्व शीर्ष का पाठ प्रति बुधवार करें।
माँ बाप का आदर करें।
शिवलिंग पर प्रतिदिन कच्चा दूध चढ़ाते हुए, भगवान् शिव से प्रार्थना करें :- 
"ॐ ऋणमुक्तेश्वराय नमः शिवाय"
कर्ज निवारण (2). :: शनिवार को ऋणमुक्तेश्वर महादेव का पूजन करें। मंगल को भात पूजा, दान, होम और जप करें। मंगल एवं बुधवार को कर्ज का लेन-देन न करें। लाल, सफेद वस्त्रों का अधिकतम प्रयोग करें। गणेश जी महाराज को प्रतिदिन दूर्वा और मोदक का भोग लगायें। गणेश जी महाराज का अथर्व शीर्ष का पाठ प्रति बुधवार करें। शिवलिंग पर प्रतिदिन कच्चा दूध चढ़ायें।
धन सम्बन्धी समस्यायें :: (1). हकीक नामक का प्रयोग विभिन्न पूजा-पाठ, साधनाओं और उपासनाओं में किया जाता है। जिसके घर में हकीक होता है, वह कभी गरीब नहीं हो सकता। शुक्रवार के दिन रात्रि में पूजा उपासना करने के पश्चात एक हकीक माला लें और एक सौ आठ बार "ऊं ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं लक्ष्मी वासुदेवाय नम:" मंत्र का जप करें। इसके बाद माला को माता लक्ष्मी के मन्दिर में अर्पित कर दें। धन से जुड़ी हर समस्या हल हो जाएगी।
(2). ग्यारह हकीक पत्थर लेकर किसी मन्दिर में चढ़ा कर ईश्वर  प्रार्थना करें कि अमुक कार्य में सफलता प्रदान करें। ऐसा करने से सफलता हासिल होगी।
(3). धन की इच्छा रखने वाला जातक रात्रि में सत्ताइस हकीक पत्थर लेकर उनके ऊपर माता लक्ष्मी का चित्र स्थापित करे, तो निश्चय ही उसके घर में तरक्की होगी। 
धन धान्य प्राप्ति :: जातक घर में कुबेर की प्रतिमा-चित्र उत्तर दिशा में शुद्ध-पवित्र स्थान पर लगाकर उन्हें पूजा-आराधना द्वारा प्रसन्न करे। घर साफ़-सुथरा रखें। कबाड़ा शीघ्रातिशीघ्र निकल दें। मेहनत करें, बुद्धि का प्रयोग करें। छल-छंद न करें।
शनि साढ़े साती और ढ़ैया :: यदि कुण्डली में शनि विपरित फल देने वाला है और  रूकावट-अवरोध उत्पन्न हो रहा हो तो, शनिवार  लोहे  बर्तनों में खाना पकायें और खायें। वैसे आजकल स्टील-लोहे का प्रयोग तो हो ही रहा है। शनि कृपा प्राप्त करने लिये शनिवार को शनि और पीपल की पूजा करनी चाहिये और नीले वस्त्र धारण करने चाहिए।  
शनि मंत्र :: शनिवार के दिन नवग्रह या शनि मन्दिर में बदन पर लाल लुंगी पहन कर, भीग कर ही शनिदेव पर तेल चढ़ाते हुए, इस शनि मंगल स्त्रोत का पाठ करने से परेशानी व पीड़ा से छुटकारे व रक्षा की कामना करें :-
मन्द: कृष्णनिभस्तु पश्चिममुख: सौराष्ट्रक: काश्यप: 
स्वामी नक्रभकुम्भयोर्बुधसितौ मित्रे समश्चाङ्गिरा:
स्थानं पश्चिमदिक् प्रजापति-यमौ देवौ धनुष्यासन:
षट्त्रिस्थ: शुभकृच्छनी रविसुत: कुर्यात् सदा मङ्गलम्
शनि की दशा जैसे ढैय्या, साढ़े साती या महादशा में शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव व्यावहारिक जीवन के अनेक कामों में बाधायें पैदा कर सकती है। शनिवार का दिन शनिदेव की उपासना से शनि ग्रह दोष शान्ति के लिए बहुत ही उपयुक्त है।
नवग्रह शान्ति (1) :: नवग्रह अपना प्रभाव ईश्वर आदि दैविक शक्तियों पर भी दिखाते हैं। माता सती द्वारा आत्मदाह उनके विवाह में नवग्रह शान्ति न होने से ही हुआ। अवतार रूप में भगवान्  ब्रह्मा, विष्णु और महेश (त्रिदेव) भी इनके दुष्प्रभाव से अछूते नहीं रहते। ब्रह्मदेव सृष्टि, भगवान् विष्णु पालन और महेश-शिव संहारक शक्तियों के स्वामी हैं। इस तरह संपूर्ण सृष्टि और कालचक्र पर त्रिदेव का नियंत्रण है। त्रिदेवों के अधीन होने से ही नवग्रह भी रचना, पालन व संहार की इस प्रक्रिया में अलग-अलग शक्तियों द्वारा भूमिका निभाकर दैहिक, दैविक और भौतिक सुख-दु:ख नियत करते हैं। जन्म लेने वाले हर मनुष्य पर नवग्रहों का प्रभाव आजीवन बना रहता है अतः इनकी शान्ति-उपासना जरुरी है। 
सुबह स्नान के बाद त्रिदेव व नवग्रह की प्रतिमा या तस्वीर की गंध, अक्षत, नैवेद्य, धूप व दीप लगाकर पूजा करें व मंगल कामना हेतु निम्न मंत्र का उच्चारण श्रद्धा पूर्वक करें :-
ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानु: शशी भूमिसुतो बुधश्च।
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव: कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम्
ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु सभी देवता मेरे प्रात:काल को मंगलमय करें। स्मरण के बाद आरती कर, प्रसाद ग्रहण करें।
नवग्रह शान्ति (2) ::
सूर्य :-
(1). सूर्य के दोष के निवारण हेतु प्रतिदिन चीटियों को खीर खिलायें। इसी प्रकार केले को छील कर चींटियों के बिल के पास रखें।
(2). इसी  प्रकार गाय को खीर और केला खिलायें।
(3). जल और गाय का दूध मिलाकर सूर्य नारायण को चढ़ायें। जब जल चढ़ायें, तो इस तरह से कि सूर्य की किरणें उस गिरते हुए जल में से निकल कर माथे-सर पर पड़ें। 
(4). जल से अर्घ्य देने के बाद जहाँ पर जल चढ़ाया है, वहाँ पर सवा मुट्ठी साबुत चावल चढ़ा दें।
चन्द्र :-
(1). पूर्णिमा के दिन गोला, बूरा तथा घी मिलाकर गाय को खिलायें। 5  पूर्ण मासी तक गाय को खिलायें।
(2). 5 पूर्णमासी तक केवल शुक्ल पक्ष में प्रत्येक 15 दिन गँगाजल तथा गाय का दूध चन्द्रमा उदय होने के बाद चन्द्रमा को अर्घ्य दें।
(3). जब चाँदनी रात हो, तब जल के किनारे जल में चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब ओर हाथ जोड़कर दस मिनट तक खड़े रहें और फिर पानी में मीठा प्रसाद चढ़ा देवें, घी का दीपक प्रज्जवलित करें। उक्त प्रयोग घर में भी कर सकते हैं, पीतल के बर्तन में पानी भरकर छत पर रखकर या जहाँ भी चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब पानी में दिख सके वहीं पर यह कार्य कर सकते हैं।
मंगल :-
(1). चावलों को उबालने के बाद बचे हुए माँड-पानी में उतना ही पानी तथा 100 ग्राम गुड़ मिलाकर गाय को खिलायें।
(2). सवा महीने में जितने दिन होते हैं, उतने साबुत चावल पीले कपड़े में बाँध कर यह पोटली अपने साथ रखें। यह प्रयोग सवा महीने तक जारी रखें।
(3). मंगलवार के दिन हनुमान जी महाराज का व्रत पाँच मंगलवार तक रखें। 
(4). किसी जंगल जहाँ बन्दर रहते हो, में सवा मीटर लाल कपड़ा बाँध कर आयें, फिर रोजाना अथवा मंगलवार के दिन उस जंगल में बन्दरों को चने और गुड़ खिलायें।
बुध :-
(1). सवा मीटर सफेद कपड़े में हल्दी से  स्थान पर “ॐ” लिखें तथा उसे पीपल पर लटका दें।
(2). बुधवार के दिन थोड़े गेहूँ तथा चने दूध में डालकर पीपल पर चढ़ायें।
(3). सोमवार से बुधवार तक हर सप्ताह कन्नेर की झाड़ी पर दूध चढ़ायें। जिस दिन से शुरुआत करें उस दिन कन्नेर की जड़ों में कलावा बाँधें। यह प्रयोग कम से कम पाँच सप्ताह करें।
बृहस्पति :-
(1). साँड को रोजाना सवा किलो 7 अनाज, सवा सौ ग्राम गुड़ सवा महीने तक खिलायें।
(2). हल्दी पाँच गाँठ पीले कपड़े में बाँधकर पीपल के पेड़ पर बाँध दें तथा 3 गाँठ पीले कपड़े में बाँधकर अपने साथ रखें।
(3). बृहस्पतिवार के दिन भुने हुए चने बिना नमक के ग्यारह मन्दिरों के सामने बाँटें। सुबह उठने के बाद घर से निकलते ही जो भी जीव सामने आये उसे ही खिलायें चाहे कोई पशु हो या मनुष्य।
शुक्र :-
(1). उड़द का पौधा घर में लगाकर उस पर सुबह के समय दूध चढ़ायें। प्रथम दिन संकल्प कर पौधे की जड़ में कलावा बाँधें। यह प्रयोग सवा दो महीने तक करें।
(2). सवा दो महीने में जितने दिन होते है, उतने उड़द के दाने सफेद कपड़े में बाँधकर अपने पास रखें।
(3). शुक्रवार के दिन पाँच गेंदे के फूल तथा सवा सौ उड़द पीपल की खोखर में रखें, यह प्रयोग कम से कम पाँच शुक्रवार तक जारी रखें।
शनि :- सवा महिने तक प्रतिदिन तेली के घर बैल को गुड़ तथा तेल लगी रोटी खिलायें।
राहू :-
(1). चन्दन की लकड़ी साथ में रखें। रोजाना सुबह उस चन्दन की लकड़ी को पत्थर पर घिसकर पानी में मिलाकर उस पानी को पियें।
(2). साबुत मूँग का खाने में अधिक सेवन करें।
(3). साबुत गेहूँ उबालकर मीठा डालकर कोढ़ियों को खिलावें तथा सत्कार करके घर वापस आयें।
केतु :- मिट्टी के घड़े के बराबर टुकड़े करें। नीचे का हिस्सा काम में लेना है, वह समतल हो अर्थात् किनारे उपर-नीचे न हो। इसमें अब एक छोटा सा छेद करें तथा इस हिस्से को ऐसे स्थान पर जहाँ मनुष्य-पशु आदि का आवागमन न हो अर्थात् एकान्त में, जमीन में गड्ढा कर के गाड़ दें। ऊपर का हिस्सा खुला रखें। अब रोजाना सुबह अपने ऊपर से उबार कर सवा सौ ग्राम दूध उस घड़े के हिस्से में चढ़ावें। दूध चढ़ाने के बाद उससे अलग हो जावें तथा जाते समय पीछे मुड़कर नहीं देखें।
माँ लक्ष्मी की कृपा :: 
जहाँ दान, धर्म, शील, वहाँ लक्ष्मी का वास होता है। 
बुद्धिमान, भक्त, सत्यवादियों के यहाँ उनका निवास होता है।
जहाँ अधर्म बढ़ने लगता है, उस स्थान को माँ लक्ष्मी त्याग देती हैं। 
जहाँ लोग पितरों का तर्पण, दान-पुण्य नहीं करते,  वहाँ देवी लक्ष्मी का निवास नहीं होता। 
जहाँ पाप कर्मों में लोग लिप्त होते हैं, वहाँ माँ लक्ष्मी का निवास नहीं होता। 
जहाँ मूर्खों का आदर होता है, वहाँ उनका निवास नहीं होता। 
जिन घरों में स्त्रियाँ दुराचारिणी, बुरे चरित्र वाली होती हैं, जहाँ स्त्रियां उचित ढंग से उठने-बैठने के नियम नहीं अपनाती हैं, जहाँ स्त्रियां साफ-सफाई नहीं रखती हैं, वहाँ लक्ष्मी का निवास नहीं होता है।
देवी लक्ष्मी स्वयं धनलक्ष्मी, भूति, श्री, श्रद्धा, मेधा, संनति, विजिति, स्थिति, धृति, सिद्धि, समृद्धि, स्वाहा, स्वधा, नियति तथा स्मृति हैं। वे धर्मशील पुरुषों के देश में, नगर में, घर में हमेशा निवास करती हैं।
माता लक्ष्मी उन्हीं लोगों पर कृपा बरसाती हैं, जो युद्ध में पीठ दिखाकर नहीं भागते हैं। शत्रुओं को बाहुबल से पराजित कर देते हैं। शूरवीर लोगों से माँ लक्ष्मी सदैव प्रसन्न रहती हैं।
जिन घरों में खाना बनाते समय पवित्रता का ध्यान नहीं रखा जाता है, जहाँ जूठे हाथों से ही खाना बनाने के बर्तनों, घी को छू लिया जाता है, जहाँ लोग जूठा खाते-खिलाते हैं, वहाँ लक्ष्मी का निवास नहीं होता।  
जिन घरों में बहु अपने सास-ससुर पर नौकरों के समान हुकुम चलाती है, उन्हें कष्ट देती हैं, अनादर करती है,  लक्ष्मी उन घरों का त्याग कर देती हैं। 
जिस घर में पत्नी अपने पति को प्रताडि़त करती है, पति की आज्ञा का पालन नहीं करती है, उसे नाम लेकर पुकारती है, पति के अतिरिक्त अन्य पुरुषों से अनैतिक संबंध रखती है, माँ लक्ष्मी उन घरों का त्याग कर देती हैं। पति को नाम  लेकर  पुकारने-बुलाने से उसकी आयु क्षीण होती है। 
जो लोग अपने शुभ चिंतकों के नुकसान पर हँसते हैं, उनसे मन ही मन द्वेष भाव रखते हैं, किसी को मित्र बनाकर उसका अहित करते हैं तो  माँ लक्ष्मी की कृपा उनके ऊपर से उठ जाती है और वे लोग सदैव दरिद्र रहते हुए कष्ट भोगते हैं।
आर्थिक तंगी-अभाव-गरीबी दूर करना :: निम्न मंत्र का जप शुभ दिन और मुहूर्त में प्रारम्भ करें। प्रतिदिन नियमानुसार जप करें। माँ लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र के सम्मुख उत्तर, उत्तर-पूर्व दिशा में शुद्ध देशी घी या तिल  के तेल का दिया जलायें। मंत्र का जप हमेशा कमलगट्टे की माला से ही करें। 12 लाख जप होने पर यह मंत्र सिद्ध हो जाता है। 
"ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं दारिद्रय विनाशके जगत्प्रसूत्यै नम:"
धन वापसी :: प्रातः काल में नित्यकर्म के पश्चात भगवान् सूर्य को जल अर्पण करें। उस जल में 11 बीज लाल मिर्च के डाल दें तथा भगवान् सूर्य से पैसे वापिसी की प्रार्थना करें। "ओम आदित्याय नमः" का जाप करें। सच्चाई व शुद्ध भोजन पर विशेष ध्यान दें। माँस, मदिरा, झूठे वचन, परस्त्री गमन न करें। परमात्मा में श्रद्धा, भक्ति और विश्वास बनाये रखें।
सम्पत्ति की बिक्री :: 86 (छियासी) साबुत बादाम छिलके सहित लें। नित्यकर्म के उपरान्त बगैर मुँह झूठा किये, दो बादाम लेकर मन्दिर में शिव लिंग या भगवान् शिव की मूर्ति के आगे रखें। हाथ जोड कर भगवान् से सम्पत्ति की उचित दाम पर बिकी की प्रार्थना करें। उन दो बादामों में से एक बादाम वापिस ले आयें। उस बादाम को लाकर घर में कहीं अलग से रख दें। ऐसा 43 दिन तक लगातार करें। 43 दिन के बाद जो बादाम आपने घर में इकट्ठा किए हैं, उन्हें जल में प्रवाहित कर दें।
धन, पद व यश कामना सिद्धि :: धन संपन्न व्यक्ति के लिए विद्यावान, गुणवान और कुलीन या प्रतिष्ठित बनना संभव हो जाता है, इसलिए धन कर्म, कला, शक्ति व ज्ञान प्राप्ति का साधन है। शक्ति, ज्ञान व वैभव का स्वरूप माता महाकाली, माँ महालक्ष्मी व माँ महासरस्वती के रूप में पूजनीय है। माँ महाकाली मलिनता, रोग, दोष व कलह का नाश कर शक्ति संपन्न, महालक्ष्मी धन संपन्न और महासरस्वती विद्या व ज्ञान का स्वामी बनाने वाली हैं। कामनासिद्धि के लिए शुक्रवार को देवी उपासना लाल सामग्रियों से यथा लाल चंदन, अक्षत, लाल फूल, लाल मौली या वस्त्र, नारियल अर्पित कर धूप व घी का दीप प्रज्जवलित करें व लाल आसन पर बैठ धन, पद व यश की कामना के साथ देवी मंदिर या घर पर ही माता महालक्ष्मी, माँ महाकाली व माँ महासरस्वती प्रतिमा या माँ वैष्णो देवी के चित्र के समक्ष बैठकर निम्न मंत्रो का साथ प्रार्थना करें। 
कामेश्वरी महालक्ष्मीं ब्रह्माण्ड वश कारिणीम्। 
सिद्धेश्वरी सिद्धिदात्रीं शत्रूणां भय दानिनीम्॥  
ऋद्धि देवीं पात-वसं उद्यत-भानु सम-प्रभाम्। 
कुलदेवीं नमामि स्वां सर्व-काम-प्रदां शिवाम्॥ 
सिद्धि-रूपेण देवी त्वां विष्णु प्राण-वल्लभाम्। 
काली-रूप धृतां उग्रां रक्तबीज-निपातिनीम्॥ 
विद्या रूप धरां पुण्यां शुभ लाभ प्रद स्थिताम्। 
दुर्गा-रूप-धरां देवीं दैत्य-दर्प-विनाशिनीम्॥ 
मूषक वाहना रूढां सिंह-वाहन-संयुताम्। 
ऋद्धि-सिद्धि, महादेवि पूर्ण सौभाग्यं देहि मे॥ 
मंत्र स्तुति के बाद तीनों देवियों की धूप, दीप व कर्पूर आरती करें। दीपज्योति ग्रहण कर क्षमा प्रार्थना के साथ प्रसाद ग्रहण करें। नारियल लाल वस्त्र में बांध तिजोरी में रखना भी मंगलकारी व समृद्धि दायक है।
अंतहीन भौतिक सुख-शिव पूजा :: सोमवार के दिन शिव पूजा में विशेष पूजा सामग्रियों के साथ-साथ तरह-तरह के अनाज चढ़ाने से भी कामना सिद्धि होती है। महादेव या शिवलिंग के ऊपर चावल, जो टूटे न हो चढ़ाने से माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।  गेंहू चढ़ाकर की गई पूजा से संतान सुख मिलता है। तिल से पूजा करने पर मन, शरीर और विचारों के दोष का अंत हो जाता है। जौ चढ़ाकर शिव की पूजा अंतहीन सुख देती है। मूँग चढ़ाने से विशेष मनोरथ पूरे होते हैं। अरहर के पत्तों से शिव पूजा अनेक तरह के दु:ख दूर करती है।
शिव उपासना की विशेष घडिय़ों में सोमवार का दिन बहुत शुभ है।
सोमवार को स्नान के बाद स्वच्छ व सफेद वस्त्र पहन शान्त मन से शिवालय या घर पर स्फटिक या धातु से बनी शिवलिंग को खासतौर पर शांति की कामना से दूध व शुद्ध जल से स्नान कराएं। सफेद चंदन, वस्त्र, अक्षत, बिल्वपत्र, सफेद आंकड़े के फूल व श्रीफल यानी नारियल पंचाक्षरी मंत्र "ऊँ नम: शिवाय" बोलते हुए चढाएं व पूजा के बाद नीचे लिखे शिव का श्रद्धा से स्मरण या जप करें :-
 शिवो गुरु: शिवो देव: शिवो बन्धु: शरीरिणाम्। 
शिव आत्मा शिवो जीव: शिवादन्यन्न किञ्चन
शिव से अलग कुछ भी नहीं है, शिव ही गुरु है, शिव देव हैं, शिव सभी प्राणियों के बन्धु हैं, शिव ही आत्मा है और शिव ही जीव हैं।
मंत्र स्मरण व पूजा के बाद दूध की मिठाई का भोग लगा भगवान् शिव की आरती धूप, दीप व कर्पूर से करें। प्रसाद ग्रहण कर सुकून भरे जीवन की कामना से सिर पर भगवान् शिव को अर्पित सफेद चंदन लगाएं।
भौतिक सुख, आत्मशांति, प्रकोप की शांति हेतु मंत्रोपचार :: 
भगवान् श्री हरी  विष्णु :: (1). ओम नमो भगवते वासुदेवाय, (2). ओम श्री विष्णुवे नमः, (3). ओम नमो नारायणाय। 
शिव उपासना :: (1). ओम नमः शिवाय, (2). ओम तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रूद्र प्रचोदयात, (3). ओम त्रयम्बकं यजामहे सुघंधिम पुष्टिवर्धनम उर्वारुक्मेव बंधनान मृत्योंम्रुक्षीय मामृतात, (4). ओम नमो भगवते महारुद्राय, (5). ओम काल रुद्राय नमः। 
धन प्राप्ति के लिए माँ लक्ष्मी उपासना :: (1). ओम श्रिम रिम श्रिम कमले कमलालये प्रसिद प्रसिद श्रिम रिम श्रिम महालक्ष्मेय नमः,  (2). ओम श्रिम नमः, (3). ओम श्रिम श्रिये नमः। 
सफलता व प्रसिद्धि-सूर्य उपासना :: रविवार को स्नान के बाद घर या देवालय के पवित्र स्थान पर सूर्य पूजा करें। जिसमें सूर्य प्रतिमा को लाल चन्दन, चावल, तिल, करवीर या कनेर के फूल के साथ नैवेद्य अर्पित कर स्वच्छ आसन पर पूर्व दिशा की ओर मुख कर बैठ नीचे लिखे मात्र तीन अक्षरी सूर्य मंत्र "ह्रां ह्रीं स:" का कम से कम 108 बार जप करें। मंत्र जप व पूजा के बाद सूर्य की धूप, दीप व कर्पूर आरती करें।
व्यवसाय-व्यापार में सफलता :: दुकान-दफ़्तर की तिजोरी के पास माता महा लक्ष्मी और गणपति जी महाराज की तस्वीर लगायें। दुकान खुलते ही माता लक्ष्मी की पूजा करके आसन ग्रहण करें। 
पूर्व दिशा में दोष के कारण दुख एवं कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है अतः  पूर्व दिशा में सूर्य यंत्र की स्थापना करें तथा प्रात:काल सूर्य को अर्ध्य देकर सूर्य की उपासना करें। पूर्व दिशा में घर की सम्पत्ति और तिजोरी रखना बहुत शुभ होता है। इससे धन में लगातार बढ़ोतरी होती रहती है।
व्यापार वृद्धि :: ओम  श्रिम श्रिम श्रिम परमा सिद्धि श्रिम ओम। 
आरोग्य  प्राप्ति  ::  (1). माँ भयात  सर्वतो रक्ष श्रियम वर्धय सर्वदा शारीरारोग्य में देहि देवी देवी नमोस्तुते, 
 (2). ओम अच्युताय नमः, ओम अनंताय नमः, ओम गोविन्दाय नमः, ओम  रुद्राय नमः। 
 
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