Thursday, November 26, 2015

MYTHOLOGICAL CHURNING OF OCEAN समुद्र मंथन

MYTHOLOGICAL CHURNING OF OCEAN समुद्र मंथन 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj  
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रैवत मन्वन्तर में पाँचवें मनु थे रैवत। वे चौथे मनु तामस के सगे भाई थे। छटे मनु चक्षु के पुत्र चाक्षुक थे। इन्द्र थे मन्त्रद्रुम जगतपति भगवान् ने उस समय वैराज की पत्नी सम्भूति के गर्भ से अजित नाम के अंशावतार ग्रहण किया था। उन्होंने ही समुद्र मन्थन करके देवताओं को अमृत पिलाया था। वे ही कच्छप रूप धारण करके मन्दराचल को मथानी बनाकर उसके आधार बने थे।
किसी समय भगवान्  शंकर के अंशभूत महर्षि दुर्वासा पृथ्वी पर विचर रहे थे। घूमते-घूमते वे एक मनोहर वन में गए। वहाँ एक विद्याधर सुंदरी हाथ में पारिजात पुष्पों की माला लिए खड़ी थी, वह माला दिव्य पुष्पों की बनी थी। उसकी दिव्य गंध से समस्त वन-प्रांत सुवासित हो रहा था। दुर्वासा ने विद्याधरी से वह मनोहर माला माँगी। विद्याधरी ने उन्हें आदरपूर्वक प्रणाम करके वह माला दे दी। माला लेकर उन्मत्त वेषधारी मुनि ने अपने मस्तक पर डाल ली और पुनः पृथ्वी पर भ्रमण करने लगे।

Indian Epics Resources: Image: Vasuki and the churning of the Ocean. You can see a list of the things produced at the churning of the Ocean at Wikipedia: http://en.wikipedia.org/wiki/Samudra_manthan:

इसी समय मुनि को देवराज इंद्र दिखाई दिए, जो मतवाले ऐरावत पर चढ़कर आ रहे थे। उनके साथ बहुत-से देवता भी थे। मुनि ने अपने मस्तक पर पड़ी माला उतार कर हाथ में ले ली। उसके ऊपर भौरे गुंजार कर रहे थे। जब देवराज समीप आए तो महर्षि दुर्वासा ने वह माला उनके ऊपर फेंक दी। देवराज ने उसे ऐरावत के मस्तक पर डाल दिया। ऐरावत ने उसकी तीव्र गंध से आकर्षित हो सूँड से माला उतार ली और सूँघकर पृथ्वी पर फेंक दी। यह देख दुर्वासा क्रोध से जल उठे और देवराज इंद्र से गुस्से में आकर बोले कि हे इंद्र! ऐश्वर्य के घमंड से तुम्हारा ह्रदय दूषित हो गया है। तुम पर जड़ता छा रही है, तभी तो मेरी दी हुई माला का तुमने आदर नहीं किया है। वह माला नहीं, श्री लक्ष्मी जी का धाम थी। माला लेकर तूमने प्रणाम तक नहीं किया। इसलिए तुम्हारे अधिकार में स्थित तीनों लोकों की लक्ष्मी शीघ्र ही अदृश्य हो जाएगी।' यह शाप सुनकर देवराज इंद्र घबरा गए और तुरंत ही ऐरावत से उतर कर मुनि के चरणों में पड़ गए। उन्होंने दुर्वासा को प्रसन्न करने की लाख चेष्टाएँ कीं, किंतु महर्षि टस-से-मस न हुए। उल्टे इंद्र को फटकार कर वहाँ से चल दिए। इंद्र भी ऐरावत पर सवार हो अमरावती को लौट गए। तबसे तीनों लोकों की लक्ष्मी नष्ट हो गई। इस प्रकार त्रिलोकी के श्री हीन एवं सत्वरहित हो जाने पर दानवों ने देवताओं पर चढ़ाई कर दी। देवताओं में अब उत्साह नहीं रह गया था। सबने हार मान ली। फिर सभी देवता ब्रह्माजी की शरण में गए। ब्रह्माजी ने उन्हें भगवान्  विष्णु की शरण में जाने की सलाह दी तथा सबके साथ वे स्वयं भी क्षीर सागर के उत्तर तट पर गए। वहाँ पहुँच कर ब्रह्मा आदि देवताओं ने बड़ी भक्ति से भगवान्  विष्णु का स्तवन किया। भगवान् प्रसन्न होकर देवताओं के सम्मुख प्रकट हुए। भगवान् विष्णु ने देवताओं से कहा कि यदि कोई बड़ा काम करना हो तो शत्रुओं से भी मेल मिलाप कर लेना चाहिए। यह आवश्यक है कि काम बन जाने के बाद उनके साथ साँप और चूहे वाला बर्ताव के सकते हैं। [श्री मद्भागवत 6-8-20]
उनका अनुपम तेजस्वी मंगलमय विग्रह देखकर देवताओं ने पुनः स्तवन किया, तत्पश्चात भगवान्  ने उन्हें क्षीरसागर को मथने की सलाह दी और कहा, ''इससे अमृत प्रकट होगा। उसके पान करने से तुम सब लोग अजर-अमर हो जाओगे, किंतु यह कार्य है बहुत दुष्कर अतः तुम्हें दैत्यों को भी अपना साथी बना लेना चाहिए। मैं तो तुम्हारी सहायता करूँगा ही...।
यह बात जब देवताओं ने असुरों के राजा बलि को बताई तो वे भी समुद्र मंथन के लिए तैयार हो गए। देवगणों ने दैत्यों से संधि करली और अमृत-प्राप्ति के लिए प्रयास करने लगे। वे भाँति-भाँति की औषधियाँ लाएँ और उन्हें क्षीरसागर में छोड़ दिया, फिर सोने के मंदराचल पर्वत को मथानी और वासुकि नागराज को नेती (-रस्सी) बनाकर बड़े वेग से समुद्र मंथन का कार्य आरंभ किया।देवतागण वासुकि के मुँह की ओर चले तो अहंकारी राक्षसों को यह पसंद नहीं आया और उन्होंने स्वयं को नागराज वासुकि के मुँख की ओर लगाया। देवताओं  ने नागराज वासुकि की पूँछ की ओर लगना स्वीकार कर लिया।मंथन करते समय वासुकि की निःश्वासाग्नि से झुलसकर सभी दैत्य निस्तेज हो गए और उसी निःश्वास वायु से विक्षिप्त होकर बादल वासुकि की पूँछ की ओर बरसते थे, जिससे देवताओं की शक्ति बढ़ती गई। भक्त वत्सल भगवान्  विष्णु स्वयं कच्छप रूप धारण कर क्षीरसागर में घूमते हुए मंदराचल के आधार बने हुए थे। वे ही एक रूप से देवताओं में और एक रूप से दैत्यों में मिलकर नागराज को खींचने में भी सहायता देते थे तथा एक अन्य विशाल रूप से, जो देवताओं और दैत्यों को दिखाई नहीं देता था, उन्होंने मंदराचल को ऊपर से दबा रखा था। इसके साथ ही वे नागराज वासुकि में भी बल का संचार करते थे और देवताओं की भी शक्ति बढ़ा रहे थे। 
समुद्र मंथन से उच्चैश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, लक्ष्मी, भगवान् धन्वन्तरि सहित 14 रत्न निकले जिनमें 14 वाँ अमृत था। 
इस प्रकार मंथन करने पर क्षीरसागर से क्रमशः कामधेनु, वारुणी देवी, कल्पवृक्ष और अप्सराएँ प्रकट हुईं। इसके बाद चंद्रमा निकले, जिन्हें महादेव जी ने मस्तक पर धारण किया। फिर कालकूट विष प्रकट हुआ जिसे भगवान् शिव ने सहर्ष अपने कंठ में धारण कर लिया उअर नील कंठ कहलाये. इस दौरान कुछ बूँदैं बिखर गईं जिन्हें साँपों और बिच्छुओं ने चाट लिया।  कुछ बिखरा हुआ कालकूट जड़ी बूटियों ने ग्रहण कर लिया जिसके कारण हिमालय की ओर से आने वाली हवा विषैली हो गई।तदनंतर अमृत का कलश हाथ में लिए भगवान् धन्वंतरि का प्रादुर्भाव हुआ। इससे देवताओं और दानवों को भी बड़ी प्रसन्नता हुई। भगवती माँ लक्ष्मी देवी प्रकट हुईं। वे खिले हुए कमल के आसन पर विराजमान थीं। उनके अंगों की दिव्य कांति सब ओर प्रकाशित हो रही थी। उनके हाथ में कमल शोभा पा रहा था। उनका दर्शन कर देवता और महर्षिगण प्रसन्न हो गए। उन्होंने वैदिक श्री सूक्त का पाठ करके लक्ष्मी देवी का स्तवन करके दिव्य वस्त्राभूषण अर्पित किए। वे उन दिव्य वस्त्राभूषणों से विभूषित होकर सबके देखते-देखते अपने सनातन स्वामी श्री विष्णु भगवान के वक्षस्थल में चली गई। भगवान् को लक्ष्मी जी के साथ देखकर देवता प्रसन्न हो गए। दैत्यों को बड़ी निराशा हुई। उन्होंने धन्वंतरि के हाथ से अमृत का कलश छीन लिया, किंतु भगवान् ने मोहिनी स्त्री के रूप से उन्हें अपनी माया द्वारा मोहित करके सारा अमृत देवताओं को ही पिला दिया। तदनंतर इंद्र ने बड़ी विनय और भक्ति के साथ श्री लक्ष्मी जी ने देवताओं को मनोवांछित वरदान दिया।
(1). कालकूट विष :- समुद्र मंथन में से सबसे पहले कालकूट विष निकला, जिसे भगवान् शिव  ने ग्रहण कर लिया। इससे तात्पर्य है कि अमृत (परमात्मा) हर इंसान के मन में स्थित है। अगर हमें अमृत की इच्छा है तो सबसे पहले हमें अपने मन को मथना पड़ेगा। जब हम अपने मन को मथेंगे तो सबसे पहले बुरे विचार (bad thoughts) ही बाहर निकलेंगे। यही बुरे विचार विष है। हमें इन बुरे विचारों को परमात्मा को समर्पित कर देना चाहिए और इनसे मुक्त हो जाना चाहिए।
(2). कामधेनु :- माँ कामधेनु अग्निहोत्र (यज्ञ) की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने उसे ग्रहण कर लिया। कामधेनु प्रतीक है मन की निर्मलता की। क्योंकि विष निकल जाने के बाद मन निर्मल हो जाता है। ऐसी स्थिति में ईश्वर तक पहुंचना और भी आसान (easy) हो जाता है। Please refer to KAM DHENU कामधेनु santoshsuvichar.blogspot.com   
(3). उच्चैश्रवा घोड़ा :- यह सफेद (-white colored divine horse) रंग का घोड़ा था। इसे असुरों के राजा बलि ने अपने पास रख लिया। उच्चैश्रवा घोड़ा मन की गति का प्रतीक है। मन की गति ही सबसे अधिक मानी गई है। यदि आपको अमृत (परमात्मा) चाहिए तो अपने मन की गति पर विराम (-control) लगाना होगा। तभी परमात्मा से मिलन संभव है।
(4). ऐरावत हाथी :-  ऐरावत हाथी के चार बड़े-बड़े दांत (-four big tusks-teeth) थे। उनकी चमक कैलाश पर्वत से भी अधिक थी। ऐरावत हाथी को देवराज इंद्र ने रख लिया। ऐरावत हाथी प्रतीक है बुद्धि का और उसके चार दांत लोभ, मोह, वासना और क्रोध का। शुद्ध सात्विक व निर्मल बुद्धि से ही मनुष्य विकारों पर काबू रख सकता है। 
(5). कौस्तुभ मणि :- से भगवान विष्णु ने अपने ह्रदय (-heart) पर धारण कर लिया। कौस्तुभ मणि प्रतीक है भक्ति का। जब मनुष्य के मन से सारे विकार निकल जाएंगे, तब भक्ति ही शेष रह जाएगी। यही भक्ति ही भगवान ग्रहण करेंगे।
(6). कल्पवृक्ष :- यह इच्छाएं पूरी करने वाला है इसलिए, इसे देवताओं ने स्वर्ग (-heaven) में स्थापित कर दिया। कल्पवृक्ष प्रतीक है मनुष्य की इच्छाओं का। अगर मनुष्य अमृत (परमात्मा) प्राप्ति के लिए प्रयास कर रहा है तो वह सभी इच्छाओं का त्याग कर दें। मन में इच्छाएं होंगी तो परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं है। Please refer to:: AYURVED: CHAPTER (III) AUSPICIOUS-USEFUL  TREES-PLANTS आयुर्वेद: अध्याय (III) पवित्र-उपयोगी वृक्ष  santoshkipathshala.blogspot.com   
(7). RAMBHA THE DIVINE COMFORT WOMAN रंभा अप्सरा :-  वह सुंदर वस्त्र व आभूषणपहने हुई थीं। उसकी चाल मन को लुभाने वाली थी। ये भी देवताओं के पास चलीं गई। अप्सरा प्रतीक है मन में छिपी वासना का। जब आप किसी विशेष उद्देश्य में लगे होते हैं तब वासना आपका मन विचलित करने का प्रयास करती हैं। उस स्थिति में मन पर नियंत्रण होना बहुत जरूरी है।
Image result for images chandra dev(8). MAA LAXMI THE DEITY OF WEALTH & COMFORTS माँ लक्ष्मी :- असुर, देवता, ऋषि आदि सभी चाहते थे कि लक्ष्मी उन्हें मिल जाएं, लेकिन माँ लक्ष्मी ने भगवान विष्णु का वरण कर लिया। माँ लक्ष्मी धन, वैभव, ऐश्वर्य व अन्य सांसारिक सुखों की प्रतीक है । जब हम अमृत (परमात्मा) प्राप्त करना चाहते हैं तो सांसारिक सुख भी हमें अपनी ओर खींचते हैं, लेकिन हमें उस ओर ध्यान न देकर केवल ईश्वर भक्ति में ही ध्यान लगाना चाहिए।
(9). वारुणी WINE :- भगवान की अनुमति से इसे दैत्यों ने ले लिया। वारुणी का अर्थ है शराब-मदिरा यानी नशा। यह भी एक बुराई है। नशा कैसा भी हो शरीर और समाज के लिए बुरा ही होता है। परमात्मा को पाना है तो सबसे पहले नशा छोड़ना होगा तभी परमात्मा से साक्षात्कार संभव है।
(10). MOON चंद्रमा :- चंद्रमा को भगवान शिव ने अपने मस्तक पर धारण कर लिया। चंद्रमा प्रतीक है शीतलता का। जब मनुष्य का मन बुरे विचार, लालच, वासना, नशा आदि से मुक्त हो जाएगा, उस समय वह चंद्रमा की तरह शीतल हो जाएगा। परमात्मा को पाने के लिए ऐसा ही मन चाहिए। ऐसे मन वाले भक्त को ही अमृत (परमात्मा) प्राप्त होता है। चन्द्र औषधियों के स्वामी हैं। 
(11). PARIJAT THE DIVINE TREE पारिजात वृक्ष-हरश्रृंगार :- इसके बाद समुद्र मंथन से पारिजात वृक्ष निकला। इस वृक्ष की विशेषता थी कि इसे छूने से थकान मिट जाती थी। यह भी देवताओं के हिस्से में गया। यह सुख और शांति प्रदायक है। अनेक रोगों के उपचार में सहयोगी है। शांति है।Please refer to:: AYURVED: CHAPTER (III) AUSPICIOUS-USEFUL  TREES-PLANTS आयुर्वेद: अध्याय (III) पवित्र-उपयोगी वृक्ष  santoshkipathshala.blogspot.com   
(12). PANCHJANY CONCH पांचजन्य शंख :- इसे भगवान विष्णु ने ग्रहण कर लिया। शंख को विजय का प्रतीक (-sign of victory) माना गया है साथ ही इसकी ध्वनि भी बहुत ही शुभ मानी गई है। जब मनुष्य अमृत (परमात्मा) से एक कदम दूर होते हैं तो मन का खालीपन ईश्वरीय नाद यानी स्वर से भर जाता है। इसी स्थिति में ईश्वर का साक्षात्कार होता है।
(13) व (14).  भगवान् धन्वंतरि व अमृत कलश :- कार्तिक महीने की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के दिन धनवंतरि त्रयोदशी मनाई जाती है।इसी दिन समुद्र मंथन से भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन भगवान् धन्वंतरि की विशेष पूजा की जाती है। समुद्र मंथन से सबसे अंत में भगवान्  धन्वंतरि (-Bhagwan Dhanvantari) अपने हाथों में अमृत कलश लेकर निकले। भगवान धन्वंतरि प्रतीक हैं निरोगी तन व निर्मल मन के। जब आपका तन निरोगी और मन निर्मल होगा तभी इसके भीतर आपको परमात्मा की प्राप्ति होगी।

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