Friday, November 27, 2015

SCRIPTURE'S TEACHINGS पौराणिक शिक्षा

SCRIPTURE'S TEACHINGS 
पौराणिक शिक्षा  
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
PtSantoshBhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
रावण अंगद संवाद :: 
बुरी आदतें Bad habits :-
वानर राज बाली के पुत्र तो दूत बनाकर रावण के दरवार में भेजा गया ताकि वो नीतिगत व्यवहार करते हुए माँ सीता को स्वतः मुक्त दे। महाविद्वान रावण की बुद्धि का नाश हो चुका था और उसका अंत समय निकट था। ऐसा जानकर अंगद ने उसे समझने का विफल प्रयास किया।
सूर्य और चन्द्र अपने समय पर निकलते हैं। धरती और अन्य ग्रह-नक्षत्र अपनी निश्चित गति से भ्रमण करते हैं। प्रकृति में प्रत्येक वस्तु नियम का पालन करती है। जो मनुष्य अपने जीवन में सात्विक विचारों से जीवन निर्वाह करता है वह मोक्ष का हकदार हो जाता है। अतः अच्छे और सुखी जीवन के लिए जरूरी है कि कुछ शास्त्रोक्त नियमों का पालन किया जाए।
मृत्यु एक अटल सत्य है। देह एक दिन खत्म हो जानी है, यह पूर्व निश्चित है। आमतौर पर यही माना जाता है कि जब देह निष्क्रिय होती है, तब ही इंसान की मृत्यु होती है, लेकिन कोई भी इंसान देह के निष्क्रिय हो जाने मात्र से नहीं मरता। कई बार जीवित रहते हुए भी व्यक्ति मृतक के समान हो जाता है। 
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित श्री रामचरित मानस के लंकाकांड में एक प्रसंग आता है, जब लंका दरबार में रावण और अंगद के बीच संवाद होता है। इस संवाद में अंगद ने रावण को बताया है कि कौन-कौन से 14 दुर्गण या बातें आने पर व्यक्ति जीते जी मृतक समान हो जाते हैं।
In the Lanka Kand of the Ram Charit Manas, Angad, the son of Bali, went to Ravan’s royal court as a messenger of Bhawan Shri  Ram. He advised Ravan to return Mata Sita peacefully and follow the path of righteousness.
Ravan’s wisdom had been destroyed by arrogance and his end was near. Angad tried to counsel him, but Ravan refused to listen.
Sun and Moon rise at the fixed time. Earth, planets, constellations revolve in their fixed orbits, in fixed period of time. Every thing in nature is governed by rules. One who follows virtuous life deserve Salvation-Moksh. For happy and comfortable life one must follow the rules-regulations framed in scriptures.
Death is must, Ultimate truth. Body has to fall one day or the other. Its predestined. Its believed that a person is dead when the body become inactive-actionless. But just by becoming motionless its not essential to be dead. Some times a person though alive but is just dead.
Angad explained that a person does not die only when the body becomes lifeless. Sometimes, even while physically alive, a person becomes like the dead due to evil qualities.
One who abandons dharma (righteousness).
A greedy person who is never satisfied.
One who is constantly angry.
A person drowned in lust and sensuality.
One blinded by pride and arrogance.
A slanderer of noble people.
One who disrespects teachers, parents and elders.
An ungrateful person.
One who rejects or insults sacred scriptures.
A betrayer who breaks trust.
A deceitful and crooked-minded individual.
A ruler or leader who governs unjustly and selfishly.
One who avoids good company (Satsang-virtuous-righteous company).
A person who turns away from God and spiritual remembrance.
Just as the sun and moon rise at their appointed times and the planets move in fixed order, nature follows discipline and law. Likewise, a human being should live with purity, balance, and righteous conduct.
Death of the body is certain, but a life filled with virtue leads to honour and spiritual elevation.
Arrogance, greed, and unrighteousness make a person fall, just as they led to Ravan’s destruction.
(1). कामी-लम्पट-दुराचारी :-  इन्द्रिय लोलुप, अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होती और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है।
Extremely Sexy-lascivious :- One who after the satisfaction o sensual organs, passionate is like a dead log.
(2). वाम मार्गी :- जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले। जो भगवान् को न मानता हो या स्वयं को भगवान् कहता हो, संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो; नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।
Vam Margi-Anti Social :- Who move against the society, social norms, culture- behaviour, Who is atheist. Considers-declares himself to be God. Find negativity behind every thing. Do not follow rules-regulations. Who abandon the established practices in society act against the Dharm is Vam Margi and like dead.
(3). कृपण-कंजूस :- अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म के कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याण कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो। दान करने से बचता हो। ऐसा आदमी भी मृत समान ही है। मरने के बाद सभी कुछ यहीँ रह जाता है केवल बुराई या भलाई ही साथ जाती है।
Extreme miserliness :- Such person is like dead. One who hesitate in participating in religious, social, welfare of the others (poor, needy),  is like dead. One who do not donate is like dead. After death every thing is left behind only virtuous and sins are carried over to next births.
(4). अति दरिद्र :- पूर्वजन्मों के कर्मफल के रूप  दारिद्रय प्राप्त होता है। गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वो भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ हैं। दरिद्र व्यक्ति को नहीं चाहिए, क्योकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। बल्कि गरीब लोगों की मदद नहीं चाहिए।
Extreme Poverty ;- Its the outcome of previous birth's deeds. Its the biggest curse. A person without wealth, self confidence, honour-respect and courage is like a dead log. Do not rebuke-insult the poor, since he is already dead. Instead help the poor, poverty stricken, needy. It will definitely reshape your future, brighten with good luck.
(5). विमूढ़ :- ज्ञान शून्य, निर्बुद्धि, विवेकहीन यानि अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसके पास विवेक, बुद्धि नहीं हो। जो खुद निर्णय ना ले सके। हर काम को समझने या निर्णय को लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृत के समान ही है।
विमूढ़ :: परेशान, व्याकुल, भ्रांत, विमूढ़, घबड़ाया हुआ, अस्तव्यस्त, अत्यंत मोहित, भ्रम में पड़ा हुआ; idiot, confused. 
An idiot, ignorant, who lack knowledge is like dead. He has no intelligence, prudence. He depends over others for his actions-efforts, endeavours, depends over others.
(6). अजसि-बदनाम :- जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर, परिवार, कुटुंब, समाज, नगर या राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता है, वह व्यक्ति मृत समान ही होता है। नाम अच्छा बदनाम बुरा। नामी कमा खावे बदनाम  मारा जाये।
Defamation :- A defamed person is like dead. One who is not respected-honoured by the family, clan, society, cities or the nation is like dead. One should have virtues instead to defamation.
(7). रोगी :- जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता विचार हावी हो जाती है। व्यक्ति मुक्ति की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति स्वस्थ्य जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।अच्छा स्वास्थ्य हज़ार नियामतें।
Patient-ill, prolonged illness :- A person suffering from diseases (physical or mental) continuously is like dead. He remain disturbed due to the absence of good health. Negativity over power him. He starts praying for release from the body i.e., death. 
(8). अत्यधिक वृद्ध व्यक्ति :- अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों असक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार स्वयं वह और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।
Too old-aged :- He too is like dead, since he has to depend over others. His mind and body become incapable. In such cases some times his own people start praying for his release-death so that he is freed from the pain-trauma.
(9). संतत क्रोधी :- हर वक्त क्रोध में रहने वाला भी मृत समान ही है। हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करना ऐसे लोगों का काम होता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि, दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता है।
Short tempered :- An eternally angry person too is like dead. He gets angry over tit bits. As a result of his innerself & mind goes out of control. He looses prudence. 
(10). अघ खानी :- जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है।पाप की कमाई से किया गया पुण्य भी पाप फल प्रदानकरता है।
Agh Khani :- A person who run-support his family with the money earned through sinful-deceitful means is like dead. His family members, companions too become alike.  
(11). तनु पोषक :- ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना ना हो तो ऐसा व्यक्ति भी मृत समान है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकि किसी अन्य को मिले ना मिले, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं।
Self centerd :- A person who survive for the self satisfaction and his own selfich motives, is like dead. He has no sentiment-feeling for others. He think that I should every thing first of all. Such people are useless for the society or the nation.
(12). निंदक :- निंदक से सम्बन्ध कभी भी परेशानी का सबब बन सकता है। अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियां ही नजर आती हैं। जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता। ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे तो सिर्फ किसी ना किसी की बुराई ही करे, वह इंसान मृत समान होता है।
Cynic :- Relations with a cynic may turn into a cause of trouble-frustration, difficulty. He finds faults with everyone but never look at what he is doing. He is like a dead person.
(13). विष्णु विमुख :- जो व्यक्ति परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति ये सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं। हम जो करते हैं, वही होता है। संसार हम ही चला रहे हैं। जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता है, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।
Anti Vishnu (Almighty) :- A person o oppose god is like dead. For existence of God is not there. He is bound to face infinite trouble, and continue oscillating infinite painful-dreaded species, like a pendulum.
(14). संत और वेद विरोधी :- जो व्यक्ति साधु-गुरुजन-माँ-बाप, संत, ग्रंथ, पुराण और वेदों का विरोधी है, वह भी मृत समान होता है।
Anti sages-Tapasvi & Veds :- One who oppose the sages, parents, Guru, scriptures and veds too is like a dead person.
मेहमान नवाज़ी-अतिथि सत्कार :: समय और काल के अनुरूप मान्यताएँ, मर्यादाएँ बदल जाती हैं। वर्तमान काल में मेहमान नवाज़ी से पहले यह देखना आवश्यक है कि व्यक्ति किस इरादे से आया है। उसे घर में घुसाने से पहले विचार कर लें। अनजान व्यक्ति को घर में प्रवेश न करने दें। अगर महिला घर में अकेली है तो उसे चाहिए कि आगन्तुक को प्रवेश न करने दे। मिलने-जुलने वालों को दिन में बुलाएँ।  व्यवसाय सम्बन्धी बातचीत के लिए किसी को भी घर में घुसाना, दीर्घकाल में बेहद हानिकारक सिद्ध होता है। घर और व्यवसायिक गतिविधियाँ अलग-अलग स्थानों-परिसर में चलायें। 
घर आए मेहमान को यदि भोजन करवाते हैं तो निम्न कुछ बातें विशेषतया ध्यान में रखें। सामान्यतया ये नियम धर्म-कर्म, पूजा-पाठ, श्राद्ध, ब्राह्मण-गुरु, गुरुजनों, रिश्तेदारों, सगे-सम्बन्धियों के आगमन पर लागु होते हैं। विधर्मी, अपराधी, विरोधी, असामाजिक तत्वों को घर से दूर ही रखें। 
(1). मन साफ हो :- यदि मनुष्य का मन शुद्ध नहीं है तो, उसे अपने शुभ कर्मों का फल नहीं मिलता है। घर आए अतिथि का सत्कार करते समय या उन्हें भोजन करवाते समय कोई भी गलत भावों को मन में नहीं आने देना चाहिए। अतिथि सत्कार के समय जिस मनुष्य के मन में जलन, क्रोध, हिंसा जैसे बातें चलती रहती हैं, उसे कभी अपने कर्मों का उचित फल नहीं मिलता है। 
(2). मधुर प्रेममयी वाणी :- घर आए-बुलाये अतिथि का अपमान नहीं करना चाहिए। कई बार मनुष्य क्रोध में आकर या किसी भी अन्य कारणों से घर आए मेहमान का अपमान कर देता है तो वह पाप का भागी बन जाता है। हर मनुष्य को अपने घर आए मेहमान का अच्छे भोजन से साथ-साथ पवित्र और मीठी वाणी के साथ स्वागत-सत्कार करना चाहिए।
(3). शुद्ध शरीर व वस्त्र :- मेहमान को भगवान के समान माना जाता है। अपवित्र शरीर से न भगवान की सेवा की जाती है और न ही मेहमान की। किसी को भी भोजन करवाने से पहले मनुष्य को शुद्ध जल से स्नान करके, साफ कपड़े धारण करना चाहिए। अपवित्र या बासी शरीर से की गई सेवा का फल कभी नहीं मिलता है।
(4). उपहार-दक्षिणा :- घर पर अनुग्रह करने के लिए पधारे ब्राह्मण, पुरोहित, गुरु, आचार्य, ऋत्विज, कंजकों में आए कन्या-लाँगुरा को दक्षिणा-उपहार अवश्य दें। अच्छी भावनाओं से दिया गया उपहार हमेशा ही शुभ फल देने वाला होता है।(शिवपुराण)
नीतिसार :: न्याय संगत कठोर व्यवहार
(1). अशुद्ध-बगैर धुले वस्त्र सौभाग्य नष्ट हैं :- अशुद्ध तन, मन और वस्त्र माँ लक्ष्मी की कृपा के पात्र नहीं हो सकते। माता उनका त्याग कर देती है। वे समाज में भी सम्मान प्राप्त नहीं कर पाते। साफ एवं सुगंधित वस्त्र धारण करने पर लक्ष्मी की विशेष कृपा बनी रहती है।
Wear washed clean cloths.
(2). अभ्यास के बिना विद्या नष्ट हो जाती है :- मनुष्य को ज्ञान-विद्या का निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिये।
Learning need practice. 
(3). संतुलित और सुपाच्य भोजन-आहार ग्रहण करें :- अधिकांश बीमारियां असंतुलित खान-पान की वजह से ही होती हैं। मनुष्य को हमेशां सदैव सुपाच्य भोजन ही ग्रहण करना चाहिए। तली हुई गरिष्ठ भोजन से सदैव बचें। ऐसे भोजन से पाचन तंत्र ठीक से काम करता है और भोजन से पूर्ण ऊर्जा शरीर को प्राप्त होती है। यदि पाचन तंत्र स्वस्थ रहेगा तो व्याधि-बीमारी-रोग भी दूर रहेंगे। रहता है और इस वजह से हम रोगों से बचे रहते हैं।
Eat easily digestive food. 
(4). विवेक-चतुराई पूर्ण संतुलित व्यवहार :- मनुष्य को शत्रु को कभी अपने से कमजोर नहीं समझना चाहिए। उसकी हर गतिविधियों पर पैनी नज़र रखनी चाहिए। उसके सम्बंधित नीति का कभी खुलासा नहीं करना चाहिए। उसकी हर चाल को समझकर नीति-निर्धारण करना जरूरी है। वक्त से पहले अपनी चाल-नीति उजागर करने वाले को अक्सर हार का सामना करना पड़ता है।(गरुड़ पुराण)
Behaviour should be balanced, full of prudence & intelligence.
तुलसीदास जी ने राम चरित मानस में कहा है कि ढ़ोल, गँवार शूद्र, पशु और नारी ये सब ताड़न के अधिकारी। ये कथन विशेष परिस्थितियों में लागु होता है, हर वक्त नहीं। अर्थात जब वह अपनी सीमा-मर्यादा से बाहर निकल जाये। मनुष्यों की कुछ अन्य श्रेणियाँ और भी हैं जिनके साथ सदैव कठोर-न्यायोचित  व्यवहार ही करना चाहिए। यदि इनके साथ नरमी से बात करेंगे तो वे कभी भी उचित व्यवहार नहीं करेंगे। मालिक को चाहिए कि वह सख्ती तो करे, मगर अभद्र व्यवहार, मार-पीट न करे। वैसे सीमा से अधिक कठोरता उचित नहीं है। ताड़ना का अर्थ मारपीट कदापि नहीं है अपितु समुचित न्यायोचित, सम सामयिक व्यवहार है। 
Garuda Purana- aesi patni, dost, naukar aur ghar se rehna chahiye bach ke(1). दुष्ट-दुर्जन व्यक्ति :- असामाजिक तत्व, कुटिल, खल, कामी, आतंकवादी, चोर-लुटेरे, डाकु, बलात्कारी आदि के साथ नम्रता पूर्वक व्यवहार व्यर्थ है। वह विनम्रता, सदाचार की बोली नहीं समझता। उसका बहिष्कार, कैद में रहना ही उचित है। कभी-कभी ऐसे लोग सुधर भी जाते हैं। 
Be strict with the wicked, let him understand law, legislature, rules regulation and social norms-virtues.
(2). शिल्पकार यानी कारीगर या मजदूर :- यह नियम केवल उन्हीं कामचोरों पर लागु होता है जो पारिश्रमिक लेकर भी काम करके राज़ी नहीं हैं। वर्तमान समाज और परिस्थितियों में सार्वजनिक-सरकारी क्षेत्र के कर्मचारी-मंत्री-संत्री इसी श्रेणी में आते हैं। न खुद कुछ करते हैं और न दूसरों को कुछ करने देते हैं। वैसे निजी, गैर-सरकारी, व्यक्तिगत क्षेत्र का हालत भी अच्छे नहीं हैं। सब ओर आपा धापी, मारा-मारी है। अतः पैसा देकर काम करना है तो सख्ती से पेश आइये।
Its applicable to only those who shirk work, are lazy.
(3). दास, गुलाम, भृत्य, नौकर :- यदि वह उल्टा बोलता है, आज्ञा का पालन नहीं करता, दिया हुआ काम समय से नहीं निपटाता, आलसी है, नाश करता है, बातूनी है, उससे मिलने-जुलने वाले समय-वेसमय आते हैंतो सावधान हो जाइये। वो आपको कभी भी धोखा दे सकता है चोट-नुकसान पहुँचा सकता है। दुराचरण करने वाले, संदिग्ध चरित्र के व्यक्ति को कभी काम पर न रखें। इनका अनुशासित होना अनिवार्य है। समय-असमय इनाम-इकराम देकर उनकी आदत खराब न करें।
The servant should be dealt firmly if he is disobedient. He may be removed from the service if he repeats the offence.
Shastra gyan- How To Get Blessings Of God(4). ढोलक व अन्य वाद्य यंत्र :- ढोलक ऐसा वाद्य यंत्र है जिसे यदि आप धीरे-धीरे प्रेम पूर्वक बजाने का प्रयास करेंगे तो उसकी आवाज वैसी नहीं आएगी, जैसी आप चाहते हैं यानी वह ठीक से काम नहीं करेगा। यदि आप चाहते हैं कि ढोलक की मधुर आवाज़ आये तो उसे सुर-ताल में बजायें। वाद्य यंत्रों का उचित मात्र में समंजय-कसा होना आवश्यक है। महात्मा बुद्ध ने कहा था कि वीणा के मदर स्वर उसके उचित संवयन से ही उत्त्पन्न होते हैं।
Musical instruments should be tuned so that they produce melodious sound.
(5). दुष्ट स्त्री :- हिंदू धर्म में स्त्रियों को बहुत ही सम्माननीय माना गया है। उनके साथ दुर्व्यवहार करने के बारे में सोचना भी गलत है, लेकिन यदि किसी स्त्री का स्वभाव दुष्ट है तो उसके साथ नम्रता पूर्ण व्यवहार करना मूर्खता होगी क्योंकि वह अपने स्वभाव के अनुसार आपको दुख ही पहुंचाएगी। इसलिए कहा गया है कि दुष्ट स्त्री के साथ सदैव कठोर अनुशासन व व्यवहार करना चाहिए।
Wicked woman has to be disciplined. No leniency.
Please refer to :: FIDELITY OF WOMAN पतिव्रता स्त्री-सतीत्व santoshsuvichar.blogspot.com
गरुड़ पुराण :: जीवनपयोगी वचन (1)
गरुड़ जी भगवान् श्री हरि विष्णु के वाहन और परम तेजस्वी हैं। भगवान् श्री राम को नागपास्त्र से मुक्त करने के लिये हनुमान जी उन्हें स्वयं लेकर आये। भगवान् श्री कृष्ण और सत्यभामा ने स्वर्ग में देवराज इन्द्र के साथ युद्ध में उन्हें स्मरण किया तो वे तुरन्त पधारे। गरुड़ पुराण का पाठ परिवार में स्वजन की मृत्यु के पश्चात उसकी आत्मा की शांति के लिए किया।  इसमें मानव जीवन के लिए हितकर बातें विस्तार से समझाई गई हैं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं। मनमानी करने वाली पत्नी, दुष्ट मित्र, वाद-विवाद करने वाला नौकर तथा जिस घर में सांप रहता है, वहाँ निवास करना साक्षात मृत्यु का आह्वाहन करना है। 
स्वेच्छा चारिणीं पत्नी :- नारी माँ भी है और नरक का द्वार भी। अगर वह स्वेच्छा चरिणीं है तो उसकी औलाद, सास-सुसर, पति कभी भी परेशानी में पड़ सकते हैं।
स्वेच्छा चारी :: नैतिक नियमों की अनिवार्यता स्वीकार न करने वाला, सनकी; arbitrary, wayward, antinomian, vagrant.
A woman who do not follow her husband, is arbitrary, vagrant.
दुष्ट मित्र :- आजकल के हालत में रिश्तेदार, मित्र, पत्नी के रूप में सच्चा हमदर्द मिलना नामुमकिन है। 
Wicked-vicious friend.
वाद-विवाद करने वाला नौकर :- घरों में भृत्य (दास, नौकर) रखने का प्रचलन काफी पुराना है। वर्तमान में भी संभ्रांत परिवारों में ज़रुरत के मुताबिक नौकर रखे जाते हैं। नौकर न सिर्फ अपने मालिक की जरुरतों का पूरा ध्यान रखते हैं बल्कि वह घर के गुप्त भेद भी जानते हैं, लेकिन यदि नौकर वाद-विवाद करने वाला हो तो उसे तुरंत निकाल देना भी बेहतर रहता है।वाद-विवाद करने वाला नौकर किसी भी समय आपके लिए कोई बड़ी मुसीबत बन सकता है। यदि ऐसा नौकर आपका कोई गुप्त भेद जानता है तो वाद-विवाद होने पर वह कभी भी आपका भेद खोल सकता है। वाद-विवाद बढ़ जाने पर वह आपको शारीरिक चोट भी पहुंचा सकता है। अत: वाद-विवाद करने वाले नौकर को साथ में रखना साक्षात मृत्यु के समान है।
A servant who argue with the master.
घर में रहने वाला सांप :- आज जिस घर में रहते हैं, यदि वहां सांप का भी निवास है तो भी आपकी जान हमेशा खतरे में रहती है। वैसे तो सांप बिना वजह किसी पर हमला नहीं करता, लेकिन गलती से भी यदि आप आपका पैर उस पर पड़ जाए तो सांप आपको काटे बिना नहीं छोड़ेगा। इसलिए साँप को सपेरे के हवाले करने या मारने में कतई देर मत लगाओ।
Snake in the house. 
निषिद्ध कर्म :- शास्त्रों के अनुरूप निम्न कर्म न करके निषिद्ध-बुरे कर्म करने से घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान नहीं मिलता और अपयश यानी अपमान का सामना करना पड़ता है।
Forbidden deeds.
गरुड़ पुराण :: जीवनपयोगी वचन (2)
(1). संतान की अनदेखी :- यदि कोई व्यक्ति-परिवार संतान के पालन-पोषण में लापरवाही-कोताही बरतता है, तो उसकी संतान के अनुचित मार्ग पर जाने की संभावना बढ़ जाती है। संतान को संस्कारी बनाना चाहिए और सही-उचित मार्ग दिख्नाना चाहिए। संतान के अच्छे भविष्य के लिए उचित देखभाल, पालन-पोषण और समुचित देखभाल बेहद ज़रूरी है अन्यथा संतान कुमार्गी हो सकती है; जिससे हानि, अपमान, दुःख, क्लेश आदि की सम्भावना बढ़ जाती है।
Absence of child care. 
(2). लालच :- धनी व्यक्ति यदि परिवार के पालन-पोषण पर उचित व्यय नहीं करता और लालच के वश कंजूसी करता है, तो उसे धन के लोभ में फंसकर अनेकानेक परेशानियों का सामना करता पड़ता है और उसके लोक और परलोक दोनों ही बिगड़ जाते हैं।
Greed. 
(3). धन अभाव होने पर भी सीमा से अधिक दान करना :- जो लोग अपनी आय से अधिक खर्च करते हैं, अत्यधिक दान करते हैं, वे व्यर्थ ही अनेकानेक परेशानियों-मुसीबतें बैठे-बिठाये मोल ले लेते हैं। मनुष्य को अपनी सीमा में रहकर घर-परिवार की जरूरतें पूरी करने के बाद ही समुचित मात्रा में योग्य पात्र को दान करना चाहिए।
Donating more than capability to the righteous person, only.
(4). दुष्टों की संगति :- अच्छी या बुरी संगति का असर मानव जीवन पर बहुत प्रभाव डालती है। संत को दुर्जन और दुर्जन को संत बना सकती है। कुसंगति नर्क का मार्ग खोल देती है। रत्नाकर बाल्मीकि इसी प्रकार बने। 
Wicked company.
Shastra gyan- How To Get Blessings Of God(5). दूसरों का अहित :- अपनी  स्वार्थ सिद्धि के लिए अन्य व्यक्ति को नुकसान पहुँचाना, दुःख देना, परेशान करना, प्रताड़ित करना इस लोक के साथ परलोक में भी दुखदायी है। अन्ततोगत्वा दुरात्मा को नर्क गामी होकर भयंकर यंत्रणाएं झेलनी ही पड़ती हैं।
Harming others.
(6). भाग्य अभिवृद्धि :- सुखी और श्रेष्ठ जीवन के लिए शास्त्रों में प्रतिपादित नियमों-परम्पराओं का न्यायोचित ढंग से निर्वाह करने से विपदा-समस्याएँ उत्तपन्न ही नहीं होतीं। मनुष्य चाहे तो स्वयं का भाग्य भी बदल सकता है, यदि वो शास्त्रोचित क्रिया-कलापों का निर्वाह नियम पूर्वक करे।
Good Luck.
विष्णुरेकादशी गीता तुलसी विप्रधेनव:। असारे दुर्गसंसारे षट्पदी मुक्तिदायिनी॥
Shastra gyan- How To Get Blessings Of God(1). विष्णु पूजन :- भगवान् श्री हरी विष्णु जगत के पालन हार हैं। श्रीहरि माँ लक्ष्मी के पति और ऐश्वर्य, सुख-समृद्धि तथा शांति के स्वामी भी हैं। विष्णु अवतारों की पूजा करने पर मनुष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष, सब कुछ प्राप्त हो सकता है।
Worship of Bhagwan Shri Hari Vishnu.
(2). एकादशी व्रत :- यह व्रत भगवान विष्णु को ही समर्पित है। हिन्दी पंचांग के अनुसार हर माह में 2 एकादशियां आती है। एक कृष्ण पक्ष में और एक शुक्ल पक्ष में। दोनों ही पक्षों की एकादशी पर व्रत करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। आज भी जो लोग सही विधि और नियमों का पालन करते हुए एकादशी व्रत करते हैं, उनके घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
Observing fast on Akadashi.
Shastra gyan- How To Get Blessings Of God  (3). श्रीमद् भागवत गीता का पाठ :- श्रीमद् भागवत गीता भगवान् श्री कृष्ण का ही साक्षात् ज्ञानस्वरूप है। जो लोग नियमित रूप से गीता का या गीता के श्लोकों का पाठ करते हैं, वे भगवान् की कृपा प्राप्त करते हैं। गीता पाठ के साथ ही इस ग्रंथ में दी गई शिक्षाओं का पालन भी दैनिक जीवन में करना चाहिए। जो भी शुभ काम करें, भगवान् का ध्यान करते हुए करें, सफलता मिलने की संभावनाएं बढ़ जाएंगी।
Reading-recitation of Shrimad Bhagwat Geeta.
(4). तुलसी की देखभाल करना :- घर में तुलसी होना शुभ और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद है। तुलसी की महक से वातावरण के सूक्ष्म हानिकारक कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। घर के आसपास की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। साथ ही, तुलसी की देखभाल करने और पूजन करने से देवी लक्ष्मी सहित सभी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है।
Caring Tulsi Plant.
Shastra gyan- How To Get Blessings Of God(5). ब्राह्मण का सम्मान करना :- विद्वान ब्राह्मण सदैव आदरणीय हैं। जो लोग इनका अपमान करते हैं, वे जीवन में दुख प्राप्त करते हैं। ब्राह्मण ही भगवान् और भक्त के बीच की अहम कड़ी है। ब्राह्मण ही सही विधि से पूजन आदि कर्म करवाते हैं। शास्त्रों का ज्ञान प्रसारित करते हैं। दुखों को दूर करने और सुखी जीवन प्राप्त करने के उपाय बताते हैं। अत: ब्राह्मणों का सदैव सम्मान करना चाहिए।
Honouring enlightened, virtuous, Savik Brahman.
(6). गौ सेवा :- जिन घरों में गाय होती है, वहां सभी देवी-देवता वास करते हैं। गाय से प्राप्त होने वाले दूध, मूत्र और गोबर पवित्र और स्वास्थ्यवर्धक हैं। गौमूत्र के नियमित सेवन से केंसर जैसी गंभीर बीमारी में भी राहत मिल सकती है। यदि गाय का पालन नहीं कर सकते हैं तो किसी गौशाला में अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार धन का दान किया जा सकता है।
Cows care-service.
 
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
skbhardwaj1951@gmail.com








Thursday, November 26, 2015

अन्न FOOD STUFF (ऋग्वेद 1)

 OCEAN CHURNING समुद्र मंथन
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (187) ::  ऋषि :- अगस्त्य, देवता :- अन्न,  छन्द :- अनुष्टुप, बृहती, गायत्री।
पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्। 
यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्
मैं क्षिप्रकारी होकर विशाल, सबके धारक और बलात्मक पितु (अन्न) की स्तुति करता हूँ। उनकी ही शक्ति से इन्द्रदेव ने वृत्रासुर के अंगों को काटकर उसका वध किया।[ऋग्वेद 1.187.1]
अब मैं शक्तिशाली अन्न का पूजन करता हूँ, जिसकी शक्ति से "त्रित" ने वृत्र के जोड़ को तोड़कर समाप्त कर डाला।
I quickly pray to food grain-food stuff, which supports all, give strength. With the strength of which Dev Raj Indr chopped the organs of Vrata Sur. 
स्वादो पितो मधो पितो वयं त्वा ववृमहे। अस्माकमविता भव
हे स्वादु पितु, हे मधुर पितु! हम आपकी सेवा करते हैं। आप हमारी रक्षा करें।[ऋग्वेद 1.187.2]
हे सुस्वादु अन्न! तू मधुर है, हमने तेरा वरण किया है, तू हमारा रक्षक हो।
Hey tasty, sweet food! We serve-worship you. Protect us.  
उप नः पितवा चर शिवः शिवाभिरूतिभिः। 
मयोभुरद्विषेण्यः सखा सुशेवो अद्वयाः
हे पितु आप मंगलमय है। कल्याणवाही आश्रयदान द्वारा हमारे पास आकर हमें सुख प्रदान करें। हमारे लिए आपका रस अप्रिय न हो। आप हमारे लिए मित्र और अद्वितीय सुखकर बने।[ऋग्वेद 1.187.3]
हे अन्न! तू कल्याण स्वरूप है। अपनी सुरक्षाओं से युक्त हमारी तरफ आ। तू स्वास्थ्य दाता हमको हानिकारक न हो और अद्वितीय सखा के समान सुखकर रहो।
Hey food, you are auspicious! Being our benefactor, come and provide us pleasure. Hey protector of our health! You should be like a friend to us & we should not be harmed. 
BENEFACTOR :: दान देने-करनेवाला; grantor, presenter, conducive, helpful, accommodating, promoter, instrumental.
तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः। दिवि वाताइव श्रिताः
हे पितु! जिस प्रकार से वायु देवता अन्तरिक्ष का आश्रय प्राप्त किये हुए हैं, उसी प्रकार ही आपका रस समस्त संसार के अनुकूल व्याप्त है।[ऋग्वेद 1.187.4] 
हे अन्न! पवन के अंतरिक्ष में आश्रय लेने के समान तेरा इस संसार में फैला है।
Hey food! The way in which the air is dependent over the sky, your sap is favourable to the whole universe.
तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ठ ते पितो। 
प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवाइवेरते
हे स्वादुतम पितु! जो लोग आपकी प्रार्थना करते हैं, वे भोक्ता हैं। आपकी कृपा से वे आपको दान देते हैं। आपके रस का आस्वादन करने वालों की गर्दन ऊँची होती है।[ऋग्वेद 1.187.5] 
हे पालक और सुस्वादु अन्न! तुम्हारा दान करने वाले तुम्हारी दया चाहते हैं। तुम्हारे सेवन कर्त्ता तुम्हारी अर्चना करते हैं। तुम्हारी प्रार्थना रस आस्वाद न करने वालों की ग्रीवा को उन्नत और अटल करता है।
Hey tastiest food grain! Those who donate you, desire your blessings. Its your mercy that they donate you. Those who taste your sap, keep their neck high and determined-firm.
त्वे पितो महानां देवानां मनो हितम्। 
अकारि चारु केतुना तवाहिमवसावधीत्
हे पितु! महान् देवों ने आप में ही अपने मन को निहित किया है। आपको तीव्र बुद्धि और आश्रय द्वारा ही अहि का वध किया गया।[ऋग्वेद 1.187.6]
हे अन्न! श्रेष्ठ देवों का हृदय तुझमें ही रखा है। तुम्हारी शरण में सुन्दर कार्य किये जाते हैं। तुम्हारी सुरक्षा से ही इन्द्रदेव ने वृत्र को समाप्त किया था।
Hey food grain! Great demigods-deities concentrated their innerself in you. Its your sharp intellect and protection that Ahi was killed. 
यददो पितो अजगन्विवस्व पर्वतानाम्। 
अत्रा चिन्नो मधो पितोऽरं भक्षाय गम्याः
जिस समय मेघ प्रसिद्ध जल को लाते हैं, उस समय हे मधुर पितु हमारे सम्पूर्ण भोजन के लिए हमारे पास पधारें।[ऋग्वेद 1.187.7]
हे अन्न! बादलों में जो विख्यात जल रूप धन है, उसके द्वारा मधुर हुए हमारे सेवन के लिए ग्रहण हो।
Hey sweet food grain! Let all sorts of food grains come to us for food (lunch & dinner), when the clouds bring water.
यदपामोषधीनां परिंशमारिशामहे। वातापे पीव इद्भव
हम यथेष्ट जल और जौ आदि औषधियों को खाते हैं, इसलिए हे शरीर! आप स्थूल बनें।[ऋग्वेद 1.187.8]
हे अन्न! हम जलों और दवाइयों का कम अंश सेवन करते हैं। तू वृद्धि को प्राप्त हो।
Hey body! We consume sufficient barley and water to keep fit, healthy, handsome. 
यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे। वातापे पीव इद्भव
हे सोम देव! आपके जौ आदि और दुग्ध आदि से मिश्रित अंश का हम भक्षण करते हैं। इसलिए हे शरीर! आप स्थूल बनें।[ऋग्वेद 1.187.9] 
हे सोम! हम तुम्हारे दूध से मिश्रित खिचड़ी रूपी अन्न का सेवन करते हैं। अतः तू वृद्धि को प्राप्त हो।
Hey Som Dev-Moon! We consume barley and milk to keep our fit & fine. 
करम्भ ओषधे भव पीवो वृक उदारथिः। वातापे पीव इद्भव
हे करम्भ औषधि! आप स्थूलता सम्पादक, रोगनिवारक और इन्द्रियोद्दीपक बनें। हे शरीर! आप स्थूल बनें।[ऋग्वेद 1.187.10] 
करम्भ ::  दही चावल या जौ को मिलाकर बनाया गया भोज्य पदार्थ, रम्भा का भाई, महिसासुर का पिता, कलिंग की राजकुमारी-देवातिथि की माता जिसका विवाह पुरुवंश में हुआ, शकुनि का पुत्र-देवरथ का पिता, एक औषधि का नाम; a preparation of curd mixed with rice or barley-meal. 
हे औषधि रूप अन्न! तू शरीर उत्पत्ति के अनुकूल, पुष्टिप्रद, व्याधि नाशक और उद्दीपन करने वाला है। तू वृद्धि को प्राप्त हो।
Hey Karambh-a medicine! You grant us a strong body, remove diseases and energise the sense organs. Hey body! You should become strong-healthy.
तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम। 
देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम्
हे पितु! गौवों के पास जिस प्रकार हव्य गृहीत होता है, उसी प्रकार से ही आपके पास स्तुति द्वारा हम रस ग्रहण करते हैं। यह रस देवों को ही नहीं, हमें भी बलवान् बनाता है।[ऋग्वेद 1.187.11] 
हे अन्न! धेनु जैसे सेवनीय दुग्ध को बहाती है वैसे ही तुमसे वंदना द्वारा हम रस प्राप्त करते हैं। तू देवों को हर्षित करने वाला हमको भी संतुष्ट करता है।
Hey grains! The way the cow give us milk, you give us sap-extract which we obtain by worshiping you. This extract should make strong like the demigods-deities. 
A Hindu farmer worship the crops. The first lot is worshipped as soon it arrives home. Sugar cane too, is worshipped. 
    
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Monday, November 16, 2015

RISHIS-SAGES ऋषि

RISHIS ऋषि
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com santoshkathasagar.blogspot.com bhartiyshiksha.blogspot.com santoshhindukosh.blogspot.com
 ॐ गं गणपतये नमः।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
सप्त ऋषि :: ऋषि संस्कृत भाषा का शब्द है। ऋषि का स्थान तपस्वी और योगी की तुलना में उच्चतम होता है। ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि ऋषियों की 7 श्रेणियाँ हैं। साधु-संत, संन्यासी, परिव्राजक, तपस्वी, मुनि, ब्रह्मचारी, यती समाज से अलग हुए अन्य व्यक्ति हैं।
Rishi is an ancient term used for enlightened sages-saints, who preferred to live in either in isolation or with the family. Some of them used to teach the students in their Ashram, while some lived with their families in groups-colony. They were prudent, visionary, far sighted with the capability to peep into future. Some of them lived alone while most of them had families and students as well. Their only common goals was welfare of society, renunciation-emancipation i.e., Moksh-Salvation.
They often resorted to Tapasya-asceticism. 
(1). केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ठ तथा भृगु, (2). अत्रि, भृगु, कौत्सा, वशिष्ठ, गौतम, कश्यप और अंगिरस, (3). कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नी, भारद्वाज सप्त ऋषि हैं। विभिन्न कालों, मन्वन्तरों, चतुर्युगियों में सप्तऋषि अलग-अलग होंगें। 
सामान्यतया मौन रखने वाले व्यक्ति मुनि कहे जाते हैं। देवऋषि नारद को अक्सर मुनि की संज्ञा दी जाती है। भगवान् वेद व्यास को भी अक्सर मुनि कह दिया जाता है। वो महर्षि थे जिन्होंने वेद को चार भागों में विभाजित किया। वे महाभारत और अठारह पुराणों के रचनाकार भी हैं। बाल्मीकि को महर्षि कहा गया है। 
जीवन का चौथा चरण सन्यास कहा गया है। संसार का त्याग करके एक समय भिक्षा से या कन्द-मूल खाकर आबादी से दूर रहकर भगवत भजन, तपस्या करने वाले व्यक्ति सन्यासी कहे जाते हैं। 
परिव्राजक, परमहंस, यती संसार सागर घर-गृहस्थी को त्याग चुके व्यक्ति हैं।
तपस्वी वह व्यक्ति है जो कि शारीरिक और मानसिक प्रलोभनों से मुक्त, अनुशासन और कष्ट सहिष्णुता, धैर्य और संयम से युक्त है। 
भगीरथ, हिरण्यकश्यप, रावण, विश्वामित्र भी तपस्वी की श्रेणी में आते हैं। इन लोगों ने ध्येय-आकांक्षाओं की पूर्ति के लिये तपस्या की।  
योगी अपनी शारीरिक, आध्यत्मिक शक्तियों को ईश्वर में केन्द्रित करता है। 
आकाश में 7 तारों का एक समूह नजर आता है, जिसे सप्त ऋषि मण्डल कहा गया है। ये 7 तारे ध्रुव तारे  की परिक्रमा करते हैं।
7 प्रकार के ऋषि :: 
सप्त ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षय:, 
कण्डर्षिश्च, श्रुतर्षिश्च, राजर्षिश्च क्रमावश।
(1). ब्रह्मर्षि, (2). देवर्षि, (3). महर्षि, (4). परमर्षि, (5). काण्डर्षि, (6). श्रुतर्षि और (7). राजर्षि। 
प्रत्येक मन्वंतर में प्रमुख रूप से 7 प्रमुख ऋषि हुए हैं। 
विष्णु पुराण के अनुसार नामावली ::
(1). प्रथम स्वायंभुव मन्वंतर :- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ।
(2). द्वितीय स्वारोचिष मन्वंतर :- ऊर्ज्ज, स्तम्भ, वात, प्राण, पृषभ, निरय और परीवान।
(3). तृतीय उत्तम मन्वंतर :- महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र।
(4). चतुर्थ तामस मन्वंतर :- ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर।
(5). पंचम रैवत मन्वंतर :- हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि।
(6). षष्ठ चाक्षुष मन्वंतर :- सुमेधा, विरजा, हविष्मान, उतम, मधु, अतिनामा और सहिष्णु।
(7). वर्तमान सप्तम वैवस्वत मन्वंतर :- कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज।
भविष्य में ::
(1). अष्टम सावर्णिक मन्वंतर :- गालव, दीप्तिमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृप, ऋष्यश्रृंग और व्यास।
(2). नवम दक्षसावर्णि मन्वंतर :- मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान, द्युतिमान, सबन और भव्य।
(3). दशम ब्रह्मसावर्णि मन्वंतर :- तपोमूर्ति, हविष्मान, सुकृत, सत्य, नाभाग, अप्रतिमौजा और सत्यकेतु।
(4).  एकादश धर्मसावर्णि मन्वंतर :- वपुष्मान्, घृणि, आरुणि, नि:स्वर, हविष्मान्, अनघ और अग्नितेजा।
(5). द्वादश रुद्रसावर्णि मन्वंतर :- तपोद्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोनिधि, तपोरति और तपोधृति।
(6).  त्रयोदश देवसावर्णि मन्वंतर :- धृतिमान, अव्यय, तत्वदर्शी, निरुत्सुक, निर्मोह, सुतपा और निष्प्रकम्प।
(7). चतुर्दश इन्द्रसावर्णि मन्वंतर :- अग्नीध्र, अग्नि, बाहु, शुचि, युक्त, मागध, शुक्र और अजित।
इन ऋषियों में से कुछ कल्पान्त-चिरंजीवी, मुक्तात्मा और दिव्य देह धारी हैं।
(1). गौतम, (2). भरद्वाज, (3). विश्वामित्र, (4). जमदग्नि, (5). वसिष्ठ, (6). कश्यप और (7). अत्रि।[शतपथ ब्राह्मण]
(1). मरीचि, (2).  अत्रि, (3). अंगिरा, (4). पुलह, (5). क्रतु, (6). पुलस्त्य और (7). वसिष्ठ सप्तर्षि माने गए हैं।[महाभारत] 
महाभारत में राजधर्म और धर्म के प्राचीन आचार्यों के नाम इस प्रकार हैं :– बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज और गौरशिरस मुनि।
मनु, बृहस्पति, उशनस (शुक्र), भरद्वाज, विशालाक्ष (शिव), पराशर, पिशुन, कौणपदंत, वातव्याधि और बहुदंती पुत्र।[कौटिल्य अर्थशास्त्र]
वैवस्वत मन्वंतर में वशिष्ठ ऋषि हुए। उस मन्वंतर में उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि मिली। वशिष्ठजी ने गृहस्थाश्रम की पालना करते हुए ब्रह्माजी के मार्ग दर्शन में उन्होंने सृष्टि वर्धन, रक्षा, यज्ञ आदि से संसार को दिशा बोध दिया।
कश्यप :: मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की 13 कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।
जमदग्नि ::  भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के 16 मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।
सप्तऋषि मण्डल :: आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।
वेदों के  ज्ञाता :: ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं। 
सात ऋषि कुल ::  (1). वशिष्ठ, (2). विश्वामित्र, (3). कण्व, (4). भरद्वाज, (5). अत्रि, (6). वामदेव और (7). शौनक। 
विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :- 
वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्
सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं :- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज।
इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।
महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भरद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।
कण्व :: माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।
वामदेव :: वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं।
शौनक :: शौनक ने 84 हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे।
ऋषि RISHI :: ऋग्वेद के मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की सँख्या 403 है।
ऋषियों की श्रेणियाँ :: 
(1). एकाकी :: वेद मन्त्रों को प्रकट करने में जिन ऋषियों के परिवारके किसी सदस्य ने कोई सहयोग नहीं किया वे एकाकी कहे गए हैं। इनकी सँख्या 88 है। 
(2). पारिवारिक :: ये ऋषि वे हैं, जिन्हें इस कार्य में उनके परिवार के सदस्यों का सहयो मिला। इनकी अगली पीढ़ियों में भी वेदाविर्भाव-कार्य की क्रम बद्ध परम्परा चलती रही। इनकी गणना है।
सप्तर्षी ऋग्वेद के नवम मण्डल के 107वें तथा दशम मण्डल के 137वें सूक्तों के द्रष्टा हैं। ये हैं :- (1). गोतम, (2) भरद्वाज, (3) विश्वामित्र, (4) जमदग्नि, (5) कश्यप, (6) वसिष्ठ तथा (7) अत्रि। इनमें गोतम परिवार के 4, भरद्वाज के 11, विश्वामित्र के 11, जमदग्नि के 2, कश्यप के 10, वसिष्ठ के 13 तथा अत्रि परिवार के 38 ऋषि हैं। अन्य परिवार प्रकारान्तर में उन्हीं के कुटुम्बी या सम्बन्धी हैं।
इन सात परिवारों का समावेश मुख्य तया चार ही परिवारों में है :- आङ्गिरस, भार्गव, काश्यप और आत्रेय। 
इनमें भी अधिक परिवार वाले आङ्गिरस ही हैं। इनकी सँख्या 56 है। गौतम तथा भारद्वाजों का अन्तर्भाव इन्हीं में है। वैश्वामित्र और जामदग्न्य परिवार का समावेश भार्गवों में है। वसिष्ठ परिवार काश्यप के अन्तर्भूत है। आत्रेय परिवार बिलकुल स्वतंत्र है। 
प्रजापति ने यज्ञ द्वारा तीन पुत्र उत्पत्र किये :- भृगु, अङ्गिरा तथा अत्रि। भृगु के पुत्र हुए कषि, च्यवन आदि। भृगु के ही एक पुत्र थे ऋचीक, जिनके बनाये हुए चरओं के भक्षण से गाधिपुत्र विश्वामित्र तथा स्वयं ऋचीक जमदग्नि का जन्म हुआ। जमदग्नि के पुत्र परशुराम गया विश्वामित्र के पुत्र मधुच्छन्दा थे। अपने सौ भाइयों मधुच्छन्दा का प्रमुख स्थान था। मनुछन्दा के दो पुत्र थे :- जेता और अघमर्षण। अतः वैश्वामित्र परिवार भार्गव परिवार से अलग नहीं है। 
भरद्वाज :: Rishi Bhardwaj was the grand son of sage Vrahaspati. His father's name was Shanyu (शंयु), who was the son of Dev Guru Vrahspati. Dev Guru Vrahaspati was the son of Rishi Angira. Angira, Vrahaspati and Bhardwaj are recognised as Trey Rishi. Mahrishi Angira, was the elder son of the creator Bhagwan Brahma. 
अङ्गिरा के दो पुत्र थे उतथ्य (उचथ्य) तथा बृहस्पति। बृहस्पति के चार पुत्र हुए :- भरद्वाज, अग्नि, तपुया और शंयु। भरद्वाज के ही पुत्र थे पायु जिनकी कृपा से राजा अभ्यावर्ती तथा प्रस्तोक युद्ध में विजयी हुए थे। बृहस्पति के ज्येष्ठ भ्राता उतथ्य के पुत्र दीर्घतमा थे और दीर्घतमा के कक्षीवान्। 
कक्षीवान के घोषा कक्षीवती नाम की कन्या तथा शबर और सुकीर्ति नामक दो पुत्र थे। घौषेय, सुहस्त्य कक्षीवान के दौहित थे। इस प्रकार भरद्वाज परिवार आङ्गिरस परिवार की शाखा ही है। 33 सदस्यों वाले जिस काण्व परिवार का ऋग्वेद के अष्टम मण्डल में विशेष प्रभाव है, वह आङ्गिरसों का ही अङ्ग है, क्योंकि उस परिवार के मूल पुरुष कण्वके पिता घोर आङ्गिरस ही थे।
बृहस्पति के पुत्र भरद्वाज ने यंत्र सर्वस्व नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।
वैदिक ऋषियों में भरद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भरद्वाज के पिता शंयु देव गुरु बृहस्पति के पुत्र थे। भरद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे, लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्री राम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।
ऋषि भरद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम रात्रि था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं। ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भरद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भरद्वाज के 765 मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भरद्वाज के 23 मन्त्र मिलते हैं। 'भरद्वाज-स्मृति' एवं 'भरद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भरद्वाज ही थे। ऋषि भरद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।
गौतम परिवार भी आङ्गिरस परिवार से ही सम्बद्ध है। यह श्रृंखला इस प्रकार है :- अङ्गिरा, रहूगण, गौतम, वामदेव, वामदेव के भाई नोधा तथा नोधा के पुत्र एकद्यु।
वसिष्ठ परिवार का समावेश कश्यप परिवार में है। इस सम्बन्ध की द्योतक वंश परम्परा इस प्रकार है :- मरीचि, कश्यप, मैत्रावरुण, वसिष्ठ, शक्ति तथा पराशर।
अत्रि-परिवार स्वतन्त्र है। इनकी वंश बेल यह है :- अधि, भौम, अर्चनाना, श्यावाश्च तथा अन्धीगुश्पावाश्वि।
ये सभी प्रमुख पारिवारिक ऋषि 42 परिवारों  विभक्त हुए। 
I am trying to establish the link, since some vital links are missing. Some contradictions too are appearing but I am sure, I will be able to rectify all errors. Some errors are due to the Kalp & Manvantar in which a specific Rishi appeared and so there may be variations in the clan as well.
अंगिरा ऋषि :: ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।
विश्वामित्र ऋषि :: गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।
ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।
माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है। 
ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए। इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।
वशिष्ठ ऋषि :: ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्त ऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।
राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता!? ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।
कश्यप ऋषि :: मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की 13  कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।
जमदग्नि ऋषि :: भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के 16  मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।
अत्रि ऋषि :: सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।
ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।
अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया। अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था। मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।
अपाला ऋषि :: अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।
नर और नारायण ऋषि :: ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।
ऋषि महर्षि पराशर MAHARISHI PARASHAR :: Maharishi  Parashar was an authority over Rig Ved. He authored of many ancient Indian texts on spirituality & Astrology. His treatise Jyotish Shastr Brahat Parashari Hora Shastr is admired by the enlightened astrologers.
He was the grandson of Vashishth-Mans Putr of Brahma Ji. 
There was always a clash of ego between Vashishth Ji and Vishwamitr. Vishwamitr acquired ascetic powers through ascetic practices but no match to Vashishth Ji as was declared by Bhagwan Shesh Nag when they both went to him to settle the issue of ascetic practices and decent company (auspicious, righteous, virtuous company).
Vishwamitr had killed 10 sons of Vashishth Ji but Vashishth Ji did not try to to take revenge from him.
Parashar was the son of Shakti-Vashishth's son.
Vashishth Ji granted him Brahm Gyan, gist of Ultimate knowledge-enlightenment. 
He fathered by Bhagwan Ved Vyas when Saty Wati-born from a fish, was carrying him in a boat across the Maa Ganga.
It all happened due to the destiny. Bhagwan Ved Vyas is an incarnation of Bhagwa Shri Hari Vishnu. 
Parashar gave her the boon of continued virginity, continued protection and affection of her father and created a thick fog that reduced the visibility to zero. It so happened that they were near a riverine island and through their union, Ved Vyas was born instantly (not after 9 months as usual), grew up to be an adult immediately and took leave of his parents and left for Tapasya with an assurance to his mother that whenever she needs his help, she should just remember him and he would manifest himself before her.
Because he was born on an island, he came to be known as Krashn Dwaepayan (Dweep-island), Krashn because he was dark complexioned (being an incarnation of Bhagwan Shri Hari Vishnu, who is also Megh Shyam), Parashar (son of Parashar) and Ved Vyas because he took birth to divide the Ved and make them accessible to the humans in the coming ages. ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।
आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। 
उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। 
प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं।
वेदों के अनुवादक ऋषि :: ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। 
पर इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं। 
वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है:- (1). वशिष्ठ, (2). विश्वामित्र, (3). कण्व, (4). भरद्वाज, (5). अत्रि, (6). वामदेव और (7). शौनक। 
पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है :- 
वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्
सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भरद्वाज।
इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है :- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।
महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं तो दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं। 
कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है।
वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक, ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।
इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है। 
अवशिष्ट-एकाकी ऋषि नामावली :: अकृष्टा माषा:, अक्षो मौजवान्, आग्नेयो धिष्ण्या ऐश्वरा, अग्नि, अग्नि पावक:, अग्नि सौचीक:, अग्निहपतिः सहसः सुतः, अग्निर्यविष्टः सहस: सूत:, अग्निर्वैश्वानर:,  अग्निश्चाक्षुष:, अङ्ग औरव:, अत्रि साँख्य:, अदितिर्दाक्षायणी, अरुणो वैतहव्य:, आत्मा, आसङ्ग:, प्लायोगि:, उपस्तुतो, वार्ष्टिहव्य:, उरुक्षय, आमहीयव:, उर्वशी, ऋणंचयः, ऋषभो वैराजः शाक्वरो वा, ऋषयो दृष्टलिङ्गा:, कपोतो, नैर्ऋतः, कवष कवम ऐलूष:, कुल्मल बर्हिष शैलूषिः, गयः प्लातः, गोधा ऋषिका, जुहूर्ब्रह्मजाया, तान्व, पार्थ्य, त्रसदस्युः पौरुकुत्स्य:, त्रिशिरास्त्वाष्ट्र:, त्र्यरुणस्त्रैवृष्ण:, त्वष्टा गर्भकर्ता, दुवस्युर्वान्दनः, देवमुनिरिरैरंमद:, देवा: देवापिरार्ष्टिषेणः, द्युतानो मारुतिः, नद्यः, नारायण:, पणयोऽसुरा:, पृथुर्वैन्यः, पृश्नयोऽजाः, प्रजापतिः, प्रजापति: परमेष्टी:,  प्रजापतिर्वाच्यः, बृहस्पतिलौक्यः, भावयव्यः, भृगुर्वारुणिः, मत्स्य: सांमदः, मत्स्याः, मनुः सांवरणः, मनुराप्सवः, मरुत:, मान्धाता यौवनाश्चः, मुद्गलो भार्म्यश्वः, रोमशा:, लुशो धानाकः, वत्सप्रिर्भालन्दनः, वभ्रो वैखानसः, वरुण:, वशोऽश्व्यः, वसुमना रौहिदश्वः, वागाम्भृणी, विवस्वानादित्य:, विश्वमना वैयश्चः, विश्वावसुर्देवगन्धर्वः, वृशो जानः, वैखानसाः शतम्, शिबिरौशीनरः, श्रद्धा कामायनी, सप्त ऋषयः, सप्तिर्वाजम्भर:, सरमा देवशुनी, सिकता निवावरी, सुदा: पैजवनः, सुमित्रा वाध्य्रश्वः, सुवेदाः शैरीषिः, सूनुरार्भव:, सूर्या सावित्री तथा हविर्धान आङ्गिः।
ऋषि परिवारों की सदस्य सँख्या :: (1). आग्नेयः (4) :- कुमारः, केतु:, वत्स: तथा श्येन:। 
(2). आङ्गिरसः (56) :- अभिवर्त:, अहमीयू:, अयास्यः, उचथ्यः, उरुः, उर्धसद्मा, कुत्सः, कृतयशा:, कृष्ण:, घोर:, तिरश्चि:, दिव्यः, धरुणः, ध्रुव:,  भूषः, नृमेध:, पवित्रः, पुरुमीळहः, पुरुमेधः, पुरुहन्मा, पुरुदक्ष:, प्रभूवसुः, प्रियमेधः, बरुः, बिन्दुः, बृहस्पति:, भिक्षु:, मूर्धन्यान्, रहूगणः, वसुरोचिषः, विरूपः, विहव्यः, वीतहव्य:, व्यश्व:, शिशु:, श्रुतकक्षः, संवननः, संवर्तः, सप्तगु:, सव्य:,  सुकक्षः, सुदीतिः, हरिमन्तः, हिरण्यस्तूपः, अर्चन हैरण्यस्तूपः, शश्र्वत्याङ्गिरसः, विश्वाकः,  कार्ण्णि:, शकपूतो:, नार्मेधः, सिन्धुक्षित् प्रैयमेधः, दीर्घतमा ओचथ्यः, कक्षीवान् दैर्घतमसः, काक्षीवती घोषा, सुहस्तो घौषेषः शबर: काक्षीवतः तथा सुकीर्तिः काक्षीवतः।
(3). अत्रेयः (38) :- अत्रिभौमः, अर्चनानाः, अवस्यु:, ईष:, उरुचक्रि:, एव्यामरुत्, कुमारः, गयः, गविष्ठिर:, गातुः, गोपवन:, घुम्नः, द्वितः, पूरु:, पौरः, प्रतिक्षत्र, प्रतिक्षत्र:, प्रतिप्रभ:, प्रतिभानुः, बभ्रुः, बाहुवृक्त:, बुधः, यजत:, रातहव्यः, व्व्रि:, विश्वसामा, श्यावाश्वः, श्रुतवित्, सत्यश्रवाः, सदापृण:, सप्तध्रि:, ससः, सुतम्भरः, स्वस्ति:, वसूयव आग्रेयाः, अन्धीगुः श्यावाश्र्वि:, अपाला तथा विश्ववारा।
(4). आथर्वणः (2) :- बृहद्दिवः तथा भिषग्। 
(5). आपत्य: (3) :- त्रितः, द्वितः तथा भुवनः। 
(6). ऐन्द्रः (14) :- अप्रतिरथः, जयः, लव:, वसुक्रः, विमदः, वृषाकपिः, सर्वहरिः, इन्द्रः, इन्द्रो मुष्कवान्, इन्द्रो वैकुण्ठः, इन्द्राणी, इन्द्रस्य स्नुषा (वसुक्रपत्नी), इन्द्रमातरो देवजामयः तथा शची पौलोमी।
(7). काण्वः (33) :- आयुः, इरिम्बिठिः, कुरुसुतिः, कुसीदी, कृशः, त्रिशाोकः, देवातिथिः, नाभाकः, नारदः, गीपातथिः, पर्वत:, पुनर्वत्सः, पुष्टिगुः, पृषध्रः, प्रगाथ:, प्रस्कण्वः, ब्रह्मातिथिः, मातरिश्वाः, मेधातिथि:, मेध्यः, मेध्यातिथिः, वत्सः, शशकर्णः, श्रुष्टिगुः, सध्वंस, सुपर्णः, सोभरिः, कुशिकः सौभरः, अश्वसूकती काण्वायनः, गोषूक्ती  काण्वायन:, कलिः प्रागाथः, धर्मः प्रागाथः तथा हर्यतः प्रागाथः।
(8). काश्यपः (10) :- अधत्सारः, असितः, कश्यपो गरीचः, देवलः, निध्रुविः, भूतांशः, रेभः, रेभसून,  मेला तथा शिखण्डिन्याप्सरसी काश्यप्यौ।
(9). कौत्सः (2) :- दुर्मित्रः तथा सुमित्रः। 
(10). गौतम: (4) :- गोतमः, नोधाः, वामदेवः तथा एक द्युर्नोधस:।  
(11). गौपायनः (4) :- बन्धुः, विप्रबन्धुः, श्रुतबन्धु:, तथा सुबन्धु:।
(12). तापसः (3) :- अग्निः, धर्मः तथा मन्युः।
(13). दैवोदासि: (1) :- परुच्छेप:, प्रतर्दन: तथा अनानत: पारुच्छेपि:।   
(14). प्राजापत्य: (9) :- पतङ्ग:, प्रजावान्, यक्ष्मनाशनः, यज्ञ:, विमद:, विष्णुः, संवरण:, हिरण्यगर्भ: तथा दक्षिणा।   
(15). बार्हस्पत्य (4) :- अग्नि:, तपुर्मूर्धा, भरद्वाज: तथा शंयु:। 
(16). ब्राह्म: (2) :- ऊर्ध्वनाभा तथा रक्षोहा। 
(17). भारत: (1) :- अश्वमेधः, देववात: तथा देवश्रवा:। 
(18). भारद्वाजः (11) :- ऋजिश्वा, गर्ग:, नर:, पायु:, वसुः, शास:, शिरिम्बिठ:, शुनहोत्र:, सप्रथ:, सुहोत्र: तथा रात्रि:।
(19). भार्गव (14) :- इट:, कपि:, कृन्तु:, गृत्समदः, च्यवनः, जमदग्नि:, नेम:, प्रयोग:, वेन:,  सोमाहुति:,  स्यूमरश्मि:, उशना काव्य:,  कुर्मो गार्त्स्मद:  तथा रामो जामदग्न्य:।
(20). भौवन: (2) :- विश्वकर्मा तथा साधनः।
(21). माधुच्छन्दस: (2) :- अधमर्षण:, तथा जेता। 
(22). मानवः (4) :- चक्षुः, नहुष:,  नमः, गाभारदिशः 
(23). मैत्रावरुणिः (2) :- वशिष्ठ: तथा अगस्त्य: (मान्य)। 
(24). आगस्त्यः (5) :- अगस्त्यशिष्या, अगस्त्यपत्नी (लोपामुदा), अगस्त्यस्वसा (लोपायनमाता), दृळ्हच्युत:, इध्मवाहो दार्ढ़च्युत:। 
(25). यामायनः (7) :- ऊर्ध्वकृशन:,  कुमारः, दमनः, देवश्रवा:, मथितः, शङ्ख:, तथा  संकुसुत:।  
(26). वातरशन: (7) :-  ऋष्यशृङ्ग:, एतशः, करिक्रतः, जूति:, वातजूति:, विप्र जूतिः, तथा वृषाणकः। 
(27). वातायन: (2) :- अनिल तथा  उलः।
(28). वामदेव्यः (3) :- अंहोमुक्, बृहदुक्थ:  तथा मूर्धन्वान्।
(29). वारुणिः (2) :- भृगु: तथा सत्यघृति:।
(30). वर्षागिरः (6) :- अम्बरीषः, ऋजाश्व:, भयमानः, सहदेवः, सुराधा तथा सिन्धुद्वीप: (आम्बरीष:)।
(31). वासिष्ठः (13) :- इन्द्रप्रमतिः, उपमन्यु, कर्णश्रुत्, चित्रमहा, द्युम्नीकः, प्रथ:, मन्युः, मृळीकः, वसुक्र:, वृषगणः, व्याघ्रपात्, शक्ति: समा वसिष्ठपुत्रा:।
(32). वासुकः (2) :- वसुकर्णः तथा वसुकृत्।
(33). वैरूपः (4) :- अष्ट्रादंष्ट्र, नभ:प्रभेदनः, शतप्रभेदन: तथा सध्रिः
(34). वैवस्वत: (3) :- मनु:, यमः तथा यमी।
(35). वैश्वामित्रः (12) :- कुशिक ऐषीरथिः (विश्वामित्र पूर्वज:), विश्वामित्रो गाधिन:, अष्टकः, ऋषभः, कतः, देवरातः, पूरणः, प्रजापतिः, मधुच्छन्दाः, रेणुः, गाथी कौशिक: तथा उत्कीलः कात्यः।
(36). शाक्त्यः (2) :- गौरवीतिः तथा पाराशर:। 
(37). शार्ङ्गः (4) :- जरिता, द्रोण:, सारिसृक्वः तथा स्तम्बमित्रः।
(38). सर्पः (4) :- अर्बुद: काद्रवेय:, जरत्कर्ण ऐरावत:, ऊर्ध्वग्रावा आर्बुदि: तथा सार्पराज्ञी।
(39). सौर्य: (4) :- अभितपाः, धर्मः, चक्षुः तथा विभ्राट्। 
(40). सौहोत्रः (2) :- अजमीळह: तथा पुरुमीळहः।
(41). स्थौरः (2) :- अग्रियूतः तथा अग्नियूपः। 
(42).सोमपरिवार: (4) :- सोमः, बुधः, सौम्यः तथा पुरूरवा ऐकः (आयुः, नहुषः) ययातिर्नाहुषः। 
(43). ताक्ष्र्य: (2) :- अरिष्टनेमिः तथा सुपर्णस्ताक्ष्र्यपुत्र:।
अकृष्ट फलमूलानि वनवासरतः सदा।
कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते
बिना जोते हुए स्थान के फल, मूल खाने वाला (अर्थात ईश्वर की कृपा से प्राप्त हर भोजन से संतुष्ट होने वाला), निरन्तर वन से प्रेम रखने वाला और प्रतिदिन श्राद्ध करने वाला ब्राह्मण ऋषि कहलाता है।[चाणक्य नीति 11.14] 
The Brahman who solely depend over the fruits and roots of uncultivated lands having love-affection for the forests performing Shraddh (prayers, rites) pertaining to the Manes-Pitre is termed a Rishi-sage.
The sage, hermit, wanderer survives over the food he receives by the grace of God through alms, begging only once a day or the fruits, rhizomes & bulbs recovered-digged from the ground.

 
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