Wednesday, December 30, 2015

सृष्टि-उत्पत्ति सूक्त

सृष्टि-उत्पत्ति सूक्त 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj  

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नासदीय सूक्त :- ऋग्वेद,   ऋषि :- प्रजापति,  परमेष्ठी देवता: भाववृत्त
नासदासीन्नो सदासात्तदानीं नासीद्रजो नोव्योमा परोयत्।किमावरीवः कुहकस्य शर्मन्नंभः किमासीद् गहनंगभीरम् ॥1॥
पदच्छेद अन्वय : - तदानीम् असत् न आसीत् सत् नो आसीत्; रजः न आसीत्; व्योम नोयत् परः अवरीवः, कुह कस्य शर्मन् गहनं गभीरम्।
उस समय अर्थात् सृष्टि की उत्पत्ति से पहले प्रलय दशा में असत् अर्थात् अभावात्मक तत्त्व नहीं था। सत्=भाव तत्त्व भी नहीं था, रजः=स्वर्गलोक मृत्युलोक और पाताल लोक भी नहीं थे, अन्तरिक्ष नहीं था और उससे परे जो कुछ है वह भी नहीं था, वह आवरण करने वाला तत्त्व कहाँ था और किसके संरक्षण में था? उस समय गहन=कठिनाई से प्रवेश करने योग्य गहरा क्या था, अर्थात् वे सब नहीं थे।
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः।अनीद वातं स्वधया तदेकं तस्मादधान्यन्न पर किं च नास ॥2॥
पदच्छेद अन्वय :तर्हि मृत्युः नासीत् न अमृतम्, रात्र्याः अह्नः प्रकेतः नासीत् तत् अनीत अवातम, स्वधया एकम् ह तस्मात् अन्यत् किञ्चन न आस न परः।
उस प्रलय कालिक समय में मृत्यु नहीं थी और अमृत=मृत्यु का अभाव भी नहीं था। रात्री और दिन का ज्ञान भी नहीं था। उस समय वह ब्रह्म तत्व ही केवल प्राण युक्त, क्रिया से शून्य और माया के साथ जुड़ा हुआ एक रूप में विद्यमान था, उस माया सहित ब्रह्म से कुछ भी नहीं था और उस से परे भी कुछ नहीं था।
तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥3॥
पदच्छेद अन्वय :अग्रे तमसा गूढम् तमः आसीत्, अप्रकेतम् इदम् सर्वम् सलिलम्, आःयत्आभु तुच्छेन अपिहितम आसीत् तत् एकम् तपस महिना अजायत।
सृष्टिके उत्पन्न होने से पहले अर्थात् प्रलय अवस्था में यह जगत् अन्धकार से आच्छादित था और यह जगत् तमस रूप मूल कारण में विद्यमान था, आज्ञायमान यह सम्पूर्ण जगत् सलिल=जल रूप में था।अर्थात् उस समय कार्य और कारण दोंनों मिले हुए थे। यह जगत् और वह व्यापक एवं निम्न स्तरीय अभाव रूप अज्ञान से आच्छादित था। इसीलिए कारण के साथ कार्य एकरूप होकर यह जगत् ईश्वर के संकल्प और तप की महिमा से उत्पन्न हुआ।
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्।सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥4
पदच्छेद अन्वय :अग्रे तत् कामः समवर्तत; यत्मनसः अधिप्रथमं रेतः आसीत्, सतः बन्धुं कवयःमनीषाहृदि प्रतीष्या असति निरविन्दन। 
सृष्टि की उत्पत्ति होने के समय सब से पहले काम=अर्थात् सृष्टि रचना करने की इच्छा शक्ति उत्पन्न हुयी, जो परमेश्वर के मन मे सबसे पहला बीज रूप कारण हुआ; भौतिक रूप से विद्यमान जगत् के बन्धन-कामरूप कारण को क्रान्तदर्शी ऋषियो ने अपने ज्ञान द्वारा भाव से विलक्षण अभाव मे खोज डाला।
तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासी३दुपरि स्विदासी३त्।रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥5॥
पदच्छेद अन्वय :एषाम् रश्मिःविततः तिरश्चीन अधःस्वित् आसीत्, उपरिस्वित् आसीत्रेतोधाः आसन् महिमानःआसन् स्वधाअवस्तात प्रयति पुरस्तात्।
पूर्वोक्त मन्त्रों में नासदासीत् कामस्तदग्रे मनसारेतः में अविद्या, काम-सङ्कल्प और सृष्टि बीज-कारण को सूर्य-किरणों के समान बहुत व्यापकता उनमें विद्यमान थी। यह सबसे पहले तिरछा था या मध्य में या अन्त में? क्या वह तत्त्व नीचे विद्यमान था या ऊपर विद्यमान था?
वह सर्वत्र समान भाव से भाव उत्पन्न था। इस प्रकार इस उत्पन्न जगत् में कुछ पदार्थ बीज रूप कर्म को धारण करने वाले जीव रूप में थे और कुछ तत्त्व आकाशादि महान रूप में प्रकृति रूप थे; स्वधा=भोग्य पदार्थ निम्नस्तर के होते हैं और भोक्ता पदार्थ उत्कृष्टता से परिपूर्ण होते हैं।
को आद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः।अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥6॥
पदच्छेद अन्वय :कः अद्धा वेद कः इह प्रवोचत् इयं विसृष्टिः कुतः कुतः आजाता, देवा अस्य विसर्जन अर्वाक् अथ कः वेद यतः आ बभूव।
कौन इस बात को वास्तविक रूप से जानता है और कौन इस लोक में सृष्टि के उत्पन्न होने के विवरण को बता सकता है कि यह विविध प्रकार की सृष्टि किस उपादान कारण से और किस निमित्त कारण से सब ओर से उत्पन्न हुई।देवता भी इस विविध प्रकार की सृष्टि उत्पन्न होने से बाद के हैं। अतः ये देवगण भी अपने से पहले की बात के विषय में नहीं बता सकते। इसलिए कौन मनुष्य जानता है, जिस कारण यह सारा संसार उत्पन्न हुआ ?
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न।यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥7॥
पदच्छेद अन्वय :इयं विसृष्टिः यतः आबभूव यदि वा दधे यदि वा न। अस्य यः अध्यक्ष परमे व्यामन् अंग सा वेद यदि न वेद।
यह विविध प्रकार की सृष्टि जिस प्रकार के उपादान और निमित्त कारण से उत्पन्न हुयी इस का मुख्य कारण है ईश्वर के द्वारा इसे धारण करना। इसके अतिरिक्त अन्य कोई धारण नहीं कर सकता।इस सृष्टि का जो स्वामी ईश्वर है, अपने प्रकाश या आनंद स्वरुप में प्रतिष्ठित है। हे प्रिय श्रोताओं ! वह आनंद स्वरुप परमात्मा ही इस विषय को जानता है उस के अतिरिक्त (इस सृष्टि उत्पत्ति तत्व को) कोई नहीं जानता है।ब्रम्हांड एक खुला स्थान है, जिसकी कोई सीमायें नहीं हैं, कोई अंत नहीं है। इसकी लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई और गहराई अनंत हैं। पर इसकी रचना कैसे और क्यों हुई?
सृष्टि की रचना-नासदीय सूक्त : यह ऋग्वेद के 10 वें मंडल का 129 वां सूक्त है। इसका संबंध ब्रह्माण्ड विज्ञान और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है। 
नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्। किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद्गहनं गभीरम् ॥1॥
इस जगत् की उत्पत्ति से पहले ना ही किसी का आस्तित्व था और ना ही अनस्तित्व, अर्थात इस जगतमें केवल परमात्मा ही थातब न हवा थी, ना आसमान था और ना उसके परे कुछ था,चारों ओर समुन्द्र की भांति गंभीर और गहन बस अंधकार के आलावा कुछ नहीं था।
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत्प्रकेतः। आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ॥2॥
उस समय न ही मृत्यु थी और न ही अमरता, मतलब न ही पृथ्वी पर कोई जीवन था और न ही स्वर्ग में रहने वाले अमर लोग थे,उस समय दिन और रात भी नहीं थे।उस समय बस एक अनादि पदार्थ था (जिसे प्रकृति कहा गया है), मतलब जिसका आदि या आरंभ न हो और जो सदा से बना चला आ रहा हो।
तम आसीत्तमसा गूहळमग्रे प्रकेतं सलिलं सर्वाऽइदम्। तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम् ॥3॥
शुरू में सिर्फ अंधकार में लिपटा अंधकार और वो जल की भांति अनादि पदार्थ था जिसका कोई रूप नहीं था, अर्थात जो अपना आयतन न बदलते हुए अपना रूप बदल सकता है। फिर उस अनादि पदार्थ में एक महान निरंतर तप् से वो रचयिता (परमात्मा-भगवान) प्रकट हुआ।
कामस्तदग्रे समवर्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत्। सतो बन्धुमसति निरविन्दन्हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥4॥
सबसे पहले रचयिता को इच्छा-कामना-विचार-भाव-इरादा आया सृष्टि की रचना का, जो कि सृष्टि उत्पत्ति का पहला बीज था, इस तरह रचयिता ने विचार कर आस्तित्व और अनस्तित्व की खाई पाटने का काम किया।
 तिरश्चीनो विततो रश्मिरेषामधः स्विदासीदुपरि स्विदासीत्। रेतोधा आसन्महिमान आसन्त्स्वधा अवस्तात्प्रयतिः परस्तात् ॥5॥
फिर उस कामना रुपी बीज से चारों ओर सूर्य किरणों के समान ऊर्जा की तरंगें निकलीं, जिन्होंने उस अनादि पदार्थ (प्रकृति) से मिलकर सृष्टि रचना का आरंभ किया।
को अद्धा वेद क इह प्र वोचत्कुत आजाता कुत इयं विसृष्टिः। अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आबभूव ॥6॥
अभी वर्तमान में कौन पूरी तरह से ठीक-ठीक बता सकता है कि कब और कैसे इस विविध प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति और रचना हुई, क्योंकि विद्वान लोग तो खुद सृष्टि रचना के बाद आये। अतः वर्तमान समय में कोई ये दावा करके ठीक-ठीक वर्णण नहीं कर सकता कि सृष्टि बनने से पूर्व क्या था और इसके बनने का कारण क्या था।
इयं विसृष्टिर्यत आबभूव यदि वा दधे यदि वा न। यो अस्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न वेद ॥7॥
सृष्टि रचना का स्रोत क्या है? कौन है इसका कर्ता-धर्ता ? सृष्टि का संचालक, अवलोकन करता, ऊपर कहीं स्वर्ग में है बैठा। 
ऋग्वेद के नासदीय सूक्त [ऋग्वेद 10-129] :- जब सत् भी नहीं था, असत् भी नहीं था, तम के द्वारा तम ढँका हुआ था,  तब वह निस्पन्द अवस्था में था। इस प्राण की सत्ता तब भी थी, किन्तु उसमें कोई गति न थी; आनीदवातम्’ का अर्थ है, ‘अर्थात जब हवा भी नहीं था, वह ब्रह्म अकेला अपने ही दम पर सांसे ले रहा था, वह अस्तित्ववान था ! स्पन्दन का विराम हो जाने पर भी ‘वह’ था ! तब एक बहुत लम्बे विराम के उपरान्त जब कल्प का आरम्भ होता है, तब आनीदवातम् निस्पन्द परमाणु)स्पन्दन आरम्भ कर देता है। और प्राण आकाश को आघात पर आघात प्रदान करता है। परमाणु घनीभूत होते हैं, और उनके संगठन की इस प्रक्रिया में विभिन्न तत्व बन जाते हैं।

नासदासीन्नो सदासीत्तदानीं नासीद्रजो नो व्योमा परो यत्। किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद् गहनं गभीरम् ॥1॥ 
तदानीम् ) तब प्रलयावस्थामें ( असत् + न + आसीत् ) ‘अभाव’ (किसी वस्तु का न होना, उस वस्तु का “अभाव” कहा जाता है, जैसे वंध्या का पुत्र तथा “अन्योन्य अभाव” परस्पर अभाव, जैसे घट में पट का न होना तथा पट में घट का न होना।) नहीं था, ( नो + सत् + आसीत् ) ‘भाव’ भी नहीं था, अर्थात उस अवस्था में व्यक्ताव्यक्त कुछ भी प्रतीत नहीं होता था ( रजः + न + आसीत् ) लोक-लोकान्तर भी न थे। ” [(निरुक्त 4-19) के अनुसार ” लोका रजान्स्युच्यन्ते ” में लोकों का नाम रज है] ( व्योम + नो ) आकाश भी नहीं था (परः + यत् ) आकाश से भी पर यदि ‘कुछ’ हो सकता है तो वह भी नहीं था ( कुह ) किस देश में ( कस्य + शर्मन् ) किस के कल्याण के लिये ( किम + आवरीवः ) कौन किस को आवरण करे। इस लिये आवरण भी नहीं था (किम् ) क्या ( गहनम् ) ( गभीरम् ) गभीर ( अम्भः ) जल ( आसीत् ) था ? नहीं ।
ऋषि इस प्रथम ऋचा में व्यक्त संसार के अस्तित्व का निषेध करते हैं। प्रलयावस्था में असत् या सत् कुछ प्रतीत नहीं होता था। कोई लोक वा यह दृश्यमान आकाश भी प्रतीत नहीं होते थे। अत्यन्त गभीर जलादिक भी नहीं था। जब कुछ नहीं था तो उसका आवरण भी नहीं था। यह स्पष्ट है कि बीज की रक्षा के लिये आवरण हुआ करता है। इसी प्रकार गेहूँ, यव, चने आदि पदार्थों में आवरण होते हैं। जब आच्छाद्य नहीं था, तब आच्छादक का भी अभाव था( आ + अवरीवः ) यह ‘वृ’धातु से यड्लुगन्त में लड् लकार का रूप है।
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्या अह्न आसीत् प्रकेतः ।आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्न परः किञ्चनास ॥ 2॥ 
न + मृत्युः + आसीत् ) न मृत्यु थी ( न + तर्हि + अमृतम् ) न उस समय अमृत था (न + रात्र्याः + अह्नः ) न रात्रि और दिन का ( प्रकेतः + आसीत् ) कोई चिह्न था । तब उस समय कुछ था, या नहीं ? ब्रह्म भी था , या नहीं ? इस पर कहते हैं कि ( अवातम् ) वायुरहित ( तत् + एकम् ) वह एक ब्रह्म (स्वधया) प्रकृति के साथ ( आनीत् ) चेतनस्वरूप विद्यमान था। ( तस्मात् + ह् + अन्यत् ) पूर्वोक्त प्रकृति सहित ब्रह्म के अतिरिक्त ( किञ्चन + न ) कुछ भी नहीं था। अतः ( परः ) सृष्टि के पूर्व कुछ भी नहीं था। यह सिद्ध होता है।
आनीत् — प्राणनार्थक ‘अन’ धातु का ‘आनीत्’ यह रूप है, ( अवातम् ) वायुरहित । बिना वायु का वह एक ब्रह्म विद्यमान था। ‘ जब वायु भी नहीं थी, वह ब्रह्म अकेला अपने ही दम पर सांसे ले रहा था, वह अस्तित्ववान था ! केवल वह ‘एक’ ही नहीं था , किन्तु ‘स्वधा’ भी उसके साथ थी
स्वधया’ यह तृतीय का एकवचन है।सायण ‘स्वधा’ शब्द का अर्थ ‘माया’ करते हैं। वास्तव में वेदान्ताभिमत अनिर्वाच्य ‘मायावाची स्वधा’ शब्द यहाँ नहीं है , किन्तु यह स्वधा ‘प्रकृतिवाची शब्द’ है। यदि जगत् के मूल कारण का नाम माया अभिप्रेत हो , तो नाममात्र के लिए विवाद करना व्यर्थ है। तब उस मूल कारण का नाम ‘माया’ यद्वा ‘प्रकृति’ यद्वा ‘प्रधान’, ‘अव्यक्त’, ‘अज्ञान’ , ‘परमाणु’ इत्यादि कुछ भी नाम रख लें।
किन्तु ‘माया’ और ‘प्रकृति’ या ‘अव्यक्त’ इत्यादि शब्द की अपेक्षा ‘स्वधा’ शब्द बहुत उपयुक्त है। क्योंकि स्व = निज सत्ता । जो निज सत्ता को धा = धारण किये हुये विद्यमान हो , उसे स्वधा कहते हैं । “स्वं दधातीति स्वधा” ~ जो अपने को धारण करती है , उसे स्वधा कहते हैं । जैसे परमात्मा की सत्ता बनी रहती है , तद्वत् जड़ जगत् के मूल कारण की भी सत्ता सदा बनी रहती है ।
इसलिए उसको स्वधा कहते हैं । ‘सह युक्तेsप्रधाने [अ. 2-3-19] इस सूत्रानुसार सह [ सहार्थ के योग में स्वधा ] शब्द का तृतीया के एकवचन में स्वधया रूप है।
तम आसीतीत्तमसा गूढमग्रेsप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदम् | तुच्छ्येनाम्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिनाजायतैकम् ॥3॥ 
अग्रे + तमः + आसीत्) सृष्टि के पूर्व तमोवाच्य जगन्मूल कारण प्रधान था और ( तमसा ) उसी तमोवाच्य प्रधान से ( इदम् + सर्वम् ) यह वर्तमानकालिक दृश्यमान सब कुछ (गूढ़म् ) आच्छादित था, अत एव ( अप्रकेतम् ) वह अप्रज्ञात था । पुनः ( सलिलम् + आः ) दुग्धमिश्रित जल के समान कार्य-कारण में भेदशून्य यह सब था। पुनः ( आभु ) सर्वत्र व्यापक ( यत् ) जो जगन्मूल कारण प्रधान था, वह भी ( तुच्छ्येन ) तुच्छता के साथ अर्थात अव्यक्तावस्था के साथ (अपिहितम् + आसीत् ) आच्छादित था ( तत् ) वही ‘प्रधान ‘ या स्वधा ( एकम् ) एक होकर (तपसः + महिना ) परमात्मा के तप के महिमा से ( अजायत ) व्यक्तावस्था में प्राप्त हुआ।
प्रथम ऋचा में सत् और असत् इन दोनों का विवरण इसलिए किया कि यह दोनों नहीं ज्ञात होते थे। पुनः द्वितीय ऋचा में अमृत इत्यादिकों का अभाव कथन कर उस अवस्था में भी एक परमात्मा की स्वधा के साथ विद्यमानता बतलायी गई अर्थात जगन्मूल कारण जड़ प्रकृति अव्यक्तावस्था में होने से नहीं के बराबर थी , किन्तु उसके साथ सब में चैतन्य देने वाला एक परमात्मा विद्यमान था इत्यादि वर्णन पूर्वोक्त दोनों ऋचाओं में किया गया ।
अब लोगों को यह सन्देह हो कि जड़ जगत का मूल कारण क्या ” सर्वथैव शशविषाणदिवत् अविद्यमान” था जो सर्वथा नहीं होते, जैसे शशविषाण, वन्ध्यापुत्र आदि असत् होते हैं, (वैसे ही क्या माँ काली या स्वधा असत् है ?)। परमात्मा ने स्वयं इस जगत को अपने सामर्थ्य से बना लिया ?
इत्यादि आशंकाओं को दूर करने के लिए आगे कहा है कि ‘तम आसीत्’ इत्यादि जगन्मूल कारण अवश्य था और उसी मूल कारण से वर्तमानकालिक यह सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् आच्छादित था अर्थात केवल कारण विद्यमान था, कार्य नहीं। वह कारण भी ‘तुच्छयेन’ अव्यक्तावस्था से ढका हुआ था , तब परमात्मा की कृपा से एक होकर इस वर्तमानकालिक रूप में परिणत हुआ।
सत्त्व, रज, तम इनकी साम्यावस्था का नाम प्रकृति है। उस प्रकृति के प्रधान , अव्यक्त , और अदृश्य आदिक अनेक नाम हैं। यहाँ वेद में उसी को ‘तमः’ शब्द से कहा है । वेदान्त में इसी का नाम ‘अज्ञान’ (अविवेक) है क्योंकि वह ज्ञानस्वरूप परमात्मा को भी ढक लेता है।

आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमनिर्देश्यम् प्रसुप्तमिव सर्वतः॥ [मनु 1-5] 
यह वर्तमानकालीन जगत् प्रलयावस्था में तमोमय , अप्रज्ञात , अलक्षण , अप्रतर्क्य , अनिर्देश्य और मानो सर्वत्र प्रसुप्त था | उस समय यह जगत न किसी को जानने योग्य (अप्रज्ञात) था, न तर्क में लाने योग्य (अप्रतर्क्य) थाऔर न प्रसिद्ध चिन्हों (लक्षण) युक्त था, और न इन्द्रियों से ही जानने योग्य (अनिर्देश्य) था , और मानो सर्वत्र प्रसुप्त था।
किन्तु जब जीवों के कर्म फलोन्मुख होते हैं, तब परमेश्वर की सृष्टि करने की इच्छा होती है | यहईश्वरीय सिसृक्षा ( सृष्टि करने की इच्छा) ही तप कहलाती है और उसी तप की महिमा से वह कारण रूप जड़ प्रधान मानो एक रूप होकर परिणत होने लगता है , तब उससे क्रमपूर्वक महदादि सृष्टि होती है
कामस्तदग्रे समवर्त्तताधि मनसो रेतः प्रथमं यदासीत् |सतो बन्धुमसति निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा ॥4॥ 
तदग्रे ) उस सृष्टि के पूर्व ( कामः + समवर्त्तत ) ईश्वरीय कामना थी ( यत् ) जो ( मनसः + अधि ) अन्तःकरण का ( प्रथमम् + रेतः ) प्रथम बीजस्वरूप ‘काम’ ही ( आसीत् ) था। ( कवयः ) बुद्धिमान ऋषि प्रभृति ( मनीषा ) अपनी सात्विक बुद्धि से ( असति ) विनश्वर ( हृदि + प्रतीष्य ) हृदय में विचार (सतः + बन्धुम् ) अविनश्वर सद्वाच्य प्रकृति के बाँधने वाले परमात्मा को ( निरविन्दन् ) पाते हैं।
जो लोग ईश्वर को कामनारहित कहते हैं , वे वास्तव में तात्पर्य को नहीं समझते क्योंकि ‘सोsकामयत’
(तै . उप . २-६ ) = उसने कामना की , ‘तदैक्षत’ ( छा . उप . ६-२-१ ) = उसने ईक्षण किया इत्यादि श्रुतिवाक्यों से ब्रह्म में काम का सद्भाव प्रसिद्ध है । यदि काम न होता तो यह सृष्टि भी नहीं होती ।
इस हेतु जीवों के स्व-स्व कर्मानुसार फल भोगने के लिए सृष्टि करने की ईश्वर की कामना अवश्य थी । और यही कामना मानो , जगद्रचना का बीजभूत थी। उस कर्त्ता-धर्त्ता परमात्मा को कविगण अपनी बुद्धि से इसी विनश्वर हृदय में प्राप्त करते हैं | उसके अन्वेषण के लिए बाह्य जगत् में इतस्ततः दौड़ना नहीं पड़ता।
सतो बन्धुम् = जड़ जगत् के ‘कारण प्रकृति’ का नाम है – ‘सत्’! उस कारण (ह्रीं) को परमेश्वर अपने वश में रखता है । इस हेतु वह ‘सतो बन्धु’ कहलाते है । जो अपने साथ बाँध ले, बन्धु नाम बाँधने वाला।

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