Monday, December 14, 2015

‎SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (18.8) श्रीमद् भगवद्गीता अथाष्टमोS

SHRIMAD BHAGWAD GEETA (8) श्रीमद् "अथ भगवद्गीता अथाष्टमोSध्याय"
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ 
अर्जुन उवाच :- 
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥8.1॥ 
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन। प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥8.2॥
अर्जुन बोले :- हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है ? अध्यात्म क्या है ? कर्म क्या है ? अधिभूत किसको कहा गया है ? और अधिदैव (Adhidaev :- The principle of subjective existence, governing all the demigods) किसको कहते हैं ? यहाँ अधियज्ञ (Adhi Yagy :- relating to a sacrifice, influence or agency affecting a sacrifice) कौन है और वह इस देह में कैसे है ? हे मधुसूदन ! वशीभूत (mesmerised, controlled)
अन्तःकरण वाले मनुष्य के द्वारा अन्तकाल में आप कैसे जानने में आते हैं ? 
Arjun questioned: Hey Purushottam! The Ultimate amongest the humans! Who is Brahm-the Eternal Being or the Spirit? What is spirituality-the nature of the Eternal Being? What is Karm (deeds, endeavour, work) ? Who represents whole inanimate creation, (all perishable things, spiritual or fine substratum of material or gross objects, the mortal beings, Supreme Spirit, Supreme Spirit itself, all penetrating influence of the Supreme Spirit, nature)? Who governs all the demigods? Who is the Supreme Being and how does HE dwell in the body-human incarnation? How can YOU the Supreme Being, be remembered at the time of death by those who are mesmerised by the nature and are under the control over their minds?
श्रीभगवानुवाच :- 
अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥8.3॥ 
भगवान् श्री कृष्ण ने कहा :- परम अक्षर ब्रह्म और परा प्रकृति को अध्यात्म कहते हैं। परब्रह्म परमेश्वर परमात्मा के द्वारा प्राणियों की सत्ता को प्रकट करना  कर्म है। 
Bhagwan Shri  Krishna said: Param Akshar is a manifestation of Brahm-the Almighty (Om, Pranav, Ved, Nature, the eternal and immutable Spirit of the Supreme Being). The creative power of Almighty that causes manifestation of the living entity is called Karm.
परम अक्षर का नाम ब्रह्म है। ब्रह्म को प्रणव, वेद, प्रकृति के लिए भी प्रयोग किया गया है। परम अक्षर सर्वोपरि सच्चिदानन्दघन, अविनाशी, निर्गुण-निराकार परमात्मा का वाचक है। आत्मा का वर्णन-बखान भी अध्यात्म है। स्वभाव के अध्यात्म के साथ आने से यह जीव के होने अर्थात उसके स्वरूप का वाचक बन गया है। समस्त सृष्टि के परमेश्वर में विलय के तदोपरांत पुनः महासर्ग की शुरुआत होती है, जिसे कर्म कहा गया है। महाप्रलय के वक़्त अहङ्कार और सञ्चित कर्मों सहित प्राणियों का प्रकृति में लीन होना, परमात्मा को प्रकृति को क्रियाशीलता प्रदान करने के लिए संकल्प उत्त्पन्न करता है। यही सृष्टि की रचना, फल रहित क्रिया और फल जनक शुभ-अशुभ कर्म के कारक बन जाते हैं। फिर भी सृष्टि रचना का कर्ता होने के बावजूद परमात्मा अकर्ता ही हैं। 
The Almighty is represented by the Ultimate letter vowel "ॐ"-OM, called Brahm. This is used to illustrate the primary sound created at the occasion of the evolution-creation of nature, Veds, the indestructible God-who is without characteristics and form. This is spirituality-mythology and explanation of the characteristics of soul too is spirituality-mythology. Combination of organism-nature with mythology-spirituality becomes his form. At the time of destruction-dissolution, the entire nature and the organisms merge into the Almighty with their characters, tendencies, ego and appear again when evolution takes place. This process is described as Karm (action, activity, deed) performed by the God, which is without ego, indulgence-free from any reward, virtuousness or evilness. Though the Almighty is creating the nature-universe, yet-still he is not the doer-performer, since his indulgence is not there. The organism who had eloped-merged into the Ultimate are reappearing according to the balance of their deeds in previous incarnations.
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥8.4॥ 
हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! क्षर भाव-परिवर्तन रूप क्रिया से जो परिणाम उत्त्पन्न होते हैं, वे सब नाशवान् पदार्थ, अधिभूत हैं, प्रकृतिस्थ जीव-पुरुष, हिरण्यगर्भ ब्रह्मा अधिदैव हैं और इस देह में कर्म और यज्ञ का प्रभु अन्तर्यामी रूप से मैं ही अधियज्ञ हूँ। 
Hey Arjun! You are superb-best amongest the creatures-Humans who have obtained a physical form. The distortions  generated  by various processes constitute the Adhi Bhoot (Nature, perishable, destructible materials-goods), Brahma Ji is the creator of material & divine organisms-The Adhi Daev and I am the Ultimate (Almighty, Adhi Yagy), in the form of a human being, to accept all the deeds and sacrifices by the humans.
चाहे कोई भी नाशवान्-परिवर्तन शील वस्तु-पदार्थ हो, वह अधिभूत-प्रकृति का अंग है। पृथ्वी, जल, वायु, आकाश और तेज़ उसके अंग हैं। यह क्षर भाव अर्थात अपरा प्रकृति है। समस्त कर्म अधिभूत के वाचक हैं। ब्रह्मा जी से समस्त प्रकृति-श्रष्टि उत्पन्न हुई है, अतः वे अादिदैव हैं। ज्ञान से ब्रह्म में एकता होती है। अतः वे अध्यात्म के पर्याय अधिदैव हैं।अधियज्ञ पूर्ण ब्रह्म-पर ब्रह्म परमेश्वर के पर्याय हैं। प्रेम-भक्ति समर्पण से उनमें अभिन्नता होती है। 
All perishable goods, services, Karm constitute the Adhi Bhut. Nature, earth, sky, air, water and the energy-Tej are destructible-decaying in nature. Deterioration is a character of the perishable goods-nature. Entire nature-evolution took place from Brahma Ji, who him self is a form of the Almighty. Unification is obtained with the Brahm through enlightenment-learning. He is Adhi Daev-the Creator. The Almighty who him self appeared over the earth to remove the burden of the earth is Adhi Yagy. All prayers, worship, sacrifices are meant for HIM. One can achieve HIM through love-affection, devotion & surrender (asylum, shelter, patronage, protection)  under HIM.
जनेउ JANEU :- The sacred loin thread-Hindu Brahmns wear it.
अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥8.5॥ 
जो मनुष्य अन्तकाल में भी मेरा स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, वह मेरे स्वरूप को ही प्राप्त करता है, इसमें सन्देह नहीं है। 
One who remembers the Almighty at the time of death, attains HIS figure-assimilates in HIM, which is beyond doubt suspicion (One reaches Vaikunth Lok, abode of Bhagwan Vishnu or Gau Lok, abode of Bhagwan Shri Krashn, with four arms, like the Almighty). 
जो मनुष्य पूरे जीवन भर अनेकानेक अवसर प्राप्त होने पर भी भजन, कीर्तन, मनन, चिन्तन, तपस्या, योग नहीं कर पाया, अगर वो मृत्यु के मौंके पर केवल  भगवान् का स्मरण मात्र भी कर ले तो, उसे भगवान् की प्राप्ति हो जाती है। एक ऐसा इन्सान जिसने संसार की प्रत्येक वस्तु, गतिविधि को परमात्मा का स्वरूप मान लिया है और वह यदि मृत्यु के वक़्त इन्हें स्मरण करता है तो, वह भी प्रभु का स्मरण ही करता है। उसने जिस भीे भाव  से परमात्मा को माना-जाना है, यथा द्विभुज, चतुर्भुज, साकार, निराकार, सगुण, निर्गुण, नाम, लीला, धाम, रूप आदि और उपासना की है तो वह उसी-उसी रूप-भाव को प्राप्त करेगा। ऐसा न होने पर भी यदि प्राणी अंत समय में भगवान् को स्मरण करता है तो, उसे भगवत प्राप्ति में कोई संदेह नहीं है।
One who do not devote time for prayers, recitation of Almighty's names, characteristics, asceticism, Yog, pilgrimage,  worship, meditation etc. still has the chance to attain Moksh-Salvation if he remembers HIM at the time of death. One who identified God in each and activity, entity, object too attain Liberation if he recollects them as a form of the Almighty, while departing the earth. He who recognized the God as having 2 hands or 4 hands, with form or formless, with qualities-characters or without characteristics, names, abodes, acts, incarnations, divinity will attain that form after the death. Even if nothing of the sort had happened and he just remembers HIM, the doors of the abodes of the Almighty opens up for him, i.e., his Liberation is certain without any doubt-suspicion.
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥8.6॥ 
हे कौन्तेय अर्जुन! मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भी भाव-योनि का स्मरण करते हुए शरीर छोड़ता है, उसी भाव में तन्मय चित्त होने के कारण वह, अंतकाल के उस भाव से भावित होकर उस-उस योनि को ही प्राप्त करता है। 
One moves to that species (takes birth, reincarnation) which he was thinking of, at the time of his death.
वर्तमान जीवन में मनुष्य का जिन-जिन लोगों लगाव, द्रोह, शत्रुता आदि थी, अगर वह मृत्यु के समय उन्हें याद करता है, उनका चिंतन करता है तो, वो उन्हीं के बीच फिर से जन्म लेगा। अगर वह किसी पशु-पक्षी से लगाव के कारण उसे स्मरण कर रहा होगा तो, उस योनि में चला जायेगा। 
One developed relations with innumerable people throughout his life. He could not detach him self from these bonds, enmity, affections etc. and kept remembering them at the last moment. His memory-remembrance of such events, people, sensuality, passions will direct him to these people, families, country after the death for rebirth. If he had developed love and affection for his pets, birds, animals, reptiles he will certainly go to these species in new incarnation. It shows the importance of the last moments in the life of a person. Relinquished King Bharat, an incarnation of the Almighty; too got birth as a deer due to his attachment for the deer nursed by him.
स्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥8.7॥ 
इसलिये तू हर वक्त मेरा स्मरण कर और युद्ध (स्वकार्य) भी कर। मुझ में मन और बुद्धि अर्पित करने वाल तू निःसंदेह मुझे ही प्राप्त होगा। 
The Almighty assured Arjun that he would assimilate in HIM, if he always remembered HIM, performed his duties (war against Kauravs) and directed-focused his brain-thoughts and intelligence in HIM, always-at every point of time.
मनुष्य के लिए यह आवश्यक है कि वो परमात्मा को सुख-दुःख, सोते-जागते, कार्य-आराम करते हुए भी स्मरण करे। यहाँ युद्ध कार्य-कलाप के लिए आया है, क्योंकि हर समय युद्ध हो ही नहीं सकता। यह भी निश्चित है कि अगर प्राणी-मनुष्य परमात्मा का स्मरण करता है, तो परमात्मा भी उसे अवश्य स्मरण करते हैं। मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ शरीर तभी शुद्ध हो सकते हैं, जब मनुष्य स्वयं को प्रभु की शरण में प्रस्तुत करे। प्रभु का स्मरण मनुष्य बोध, संबंध और क्रिया के माध्यम से कर सकता है।
The mortals must not forget that they are being watched continuously by the Almighty. All his deeds fair or foul are recorded and he is made to suffer for his misdeeds, evils, wretchedness and rewarded for the virtues.Therefore, the humans should always remember HIM and act precisely. Its one's effort to remember the Almighty at all times, whether working or sitting idle, enjoying or suffering, pain or pleasure. One can not continue to fight all the time. It just indicate work, endeavours, deeds. One remembers the God and HE too reciprocate. One has to surrender before the God in To-To i.e., with his mind, intelligence and thoughts-ideas. Its possible to remember the God through realisation, relation and actions.
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥8.8॥ 
हे पृथानन्दन! अभ्यास योग से युक्त  और अन्य का चिन्तन न करने वाले (इधर-उधर विचलित न होने वाला) चित्त से परम दिव्य पुरुष-परमात्मा का चिन्तन हुआ; शरीर छोड़ने वाला मनुष्य, उसी को प्राप्त होता है।
One who has been practicing Yog, without running after multiple demigods (for fulfilment of desires, wants, allurements, ambitions), without unwavering mind that is disciplined by the practice of meditation-Yog, contemplating on the Almighty achieves HIM-attains Salvation, hey Arjun!
मनुष्य सगुण-निर्गुण परमात्मा में ध्यान, मन-चित्त लगाये और निरंतर योगाभ्यास करे। इसके द्वारा प्रसन्नता और खिन्नता दोनों ही नहीं रहेंगी अर्थात उनमें भी समता की प्राप्ति हो जायेगी। मनुष्य को अपना समग्र चिन्तन परमात्मा में केंद्रित करना होगा और किसी भी अन्य देवी-देवता से हटाना होगा जो कि मनुष्य कामनाओं की प्राप्ति हेतु करता है। इसके लिए उसे दृढ़ प्रतिज्ञ भी होना होगा। 
One has to focus his attention entirely to the Almighty and practice Yog continuously. This will eliminate pleasure and pain leading to equanimity ( a state of neutrality) in them as well. He had been praying several deities-demigods for the fulfilment of his desires which he has to abandon. In addition to this he needs firm determination to assimilate in the God.
कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। 
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥8.9॥
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। 
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्॥8.10॥
जो सर्वज्ञ, अनादि, सब पर शासन करनेवाला, सूक्ष्म से अत्यन्त सूक्ष्म, सबका धारण-पोषण करनेवाला, अज्ञान से अत्यन्त परे, सूर्य की तरह प्रकाश-स्वरूप अर्थात ज्ञान स्वरूप-ऐसे अचिन्त्य स्वरूप का चिन्तन करता है। वह भक्ति युक्त मनुष्य अन्त समय में अचल मन से और योग बल के द्वारा भृकुटि के मध्य में प्राणों को अच्छी तरह से प्रविष्ट करके (शरीर छोड़ने पर) उस परम दिव्य पुरुष को ही प्राप्त होता है। 
One who meditates of the Almighty as the omniscient, the ancient, the administer-controller, minute than the minutest, nurturer-sustainer of everyone, the inconceivable, luminous-bright like the Sun and transcendental-beyond the material reality; at the time of death with steadfast mind and devotion by making the flow of bio-impulses rise up to the middle of the eye brows by the power of Yogic practices; attains HIM-the Ultimate.
सम्पूर्ण प्राणियों को और उनके सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्मों को जानने वाले परमात्मा को कवि अर्थात सर्वज्ञ कहते हैं। सबका आदि होने के कारण उन्हें पुराण कहा गया है। नेत्रों के ऊपर मन, मन के ऊपर बुद्धि, बुद्धि के ऊपर अहम् और जो अहम् के भी ऊपर शासन करते है, उन्हें अनुशासित करते है, वह परमात्मा हैं। परमात्मा सूक्ष्म से भी सूक्ष्म मन-बुद्धि की सीमा से परे-ऊपर है। वह समस्त-अनंतकोटि ब्रह्माण्डों को धारण करने वाला है। वह अज्ञान से दूर अर्थात उसका नाश करने वाला है। वह सूर्य के समान प्रकाश करने वाला अर्थात मन-बुद्धि को प्रकाशित-अनुशासित करने वाला है। वह सगुण-निर्गुण परमात्मा सब कुछ याद रखने वाला है। उस परमात्मा को मनुष्य निरंतर-याद करे उसका चिंतन करे। 
मनुष्य भक्ति-प्राणायाम अर्थात योगबल द्वारा मन को उस परमात्मा में लगाये-अचल करे और दोनों भ्रुवों के मध्यभाग में स्थित जो द्विदल चक्र है, उसमें स्थित सुषुम्ना नाड़ी में प्राणों का अच्छी तरह प्रवेश करके, वह शरीर छोड़कर दसवें द्वार से दिव्य परम पुरुष को प्राप्त करे। 
The Almighty is aware of each and every activity of the organism. HE is ancient beyond the limits of time, since ever-forever. The mind lies over the eye brows, (mind controls-perceives what is seen by the eyes), intelligence rules the head, mind, brain, intelligence is ruled by the ego and the Almighty regulates even this ego. HE disciplines every one-everything. HE is minutest-much smaller than the atom and holds the infinite number of universes. HE abolishes ignorance and provides enlightenment-prudence. HE is shinning-bright like the Sun and destroys darkness-lack of knowledge-ignorance. The formless-characteristics less Almighty remembers everything, event, person, soul. The human should always think of HIM-continuously. One should make use of the Yogic power and strength of devotion to concentrate his mind in the Almighty and focus between the two eye brows. This constitutes the 10th opening of the human body. The Shushmna Nadi (the Central Nadi-nerve in the spine which conducts the Kundlini or spiritual force from Mooladhar Chakr to Sahasrar Chakr) has to be invoked to release the soul through this opening to assimilate in the Ultimate.
यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। 
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥8.11॥ 
वेदवेत्ता लोग जिसको अक्षर कहते हैं, वीतराग यति जिसको प्राप्त करते हैं और साधक जिसकी प्राप्ति की इच्छा करते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वह पद मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा। 
Now, I shall explain the process in brief to attain the Ultimate Abode, title, level that the people who have learnt Ved; called immutable, which is aimed by the detached, relinquished, ascetics, along with those who lead a life of celibacy. 
जो निर्गुण, निराकार, एकरूप, एकरस, परमब्रह्म है, वह अक्षर है अर्थात उसका कभी नाश नहीं होता। जो लोग राग-द्वेष से मुक्त हो चुके हैं, जिनका ह्रदय निर्मल है, वे यति (ascetics) महापुरुष सदैव उसको प्राप्त करने का प्रयास करते रहते हैं। जो लोग भोग की इच्छाओं का त्याग करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उनका उद्देश्य भी केवल परमात्म प्राप्ति ही है। भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा कि वे उस साधन का संक्षेप में वर्णन करेंगे जो समस्त साधनों का अन्तिम सर्वोत्तम फल है।  
The Almighty is free from characteristics. HE is formless, uniform-identical, unilateral, monotonous-unchanging and imperishable. Those ascetics who are free from enmity, attachments, with pure hearts, always endeavour for achieving HIM. Those who are relinquished-detached and have rejected all allurements, practice celibacy to reach the Ultimate. Bhagwan Shri Krashn assured Arjun that HE would explain in short, the procedure to assimilate in the Ultimate.
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥8.12॥ 
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥8.13॥
इन्द्रियों के समस्त द्वारों को रोककर मन का ह्रदय में निरोध करके और अपने प्राणों को मस्तक में स्थापित करके योग धारणा में स्थित हुआ जो साधक "ॐ" इस एक अक्षर का ब्रह्म का मानसिक उच्चारण और मेरा स्मरण करता हुआ शरीर को छोड़कर जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। 
One attains the Ultimate-the Supreme Abode, when he closes all doors of the body (mouth, nostrils, eyes, ears, pennies & anus) checks the thoughts by subliming them in the heart, pulls the soul-Pran Vayu (bio impulses), in the skull, brain, cerebrum, practicing Yog, reciting-uttering the Ultimate syllable "ॐ"OM-the sacred monosyllable sound power of Spirit, mentally-silently and remembering the Almighty, while deserting the human incarnation-body.
मनुष्य-साधक शरीर त्याग करते वक्त अपना ध्यान कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियों से हटा ले, ताकि वे अपने स्थान पर स्थिर रहें। मन का निरोध करके उसे ह्रदय में स्थानान्तरित कर दे  अर्थात ध्यान को विषयों से मुक्त करके, अपने ह्रदय में परमात्मा की मूर्ति-आकृति का अनुभव करे। प्राणों को दसवें द्वार-ब्रह्मरंध्र में रोक ले; अर्थात उन पर काबू कर ले। इस प्रकार वो योग धारणा में स्थित हो जाये। इन्द्रियों और मन से कुछ भी चेष्टा न करे। इस स्थित को प्राप्त करके वो "ॐ अर्थात प्रणव" का मानसिक उच्चारण करे अर्थात वो निर्गुण-निराकार परम अक्षर ब्रह्म का स्मरण करे। यही वह अवस्था है, जिसमें प्रभु को स्मरण करते हुए दसवें द्वार :- ब्रह्म रंध्र से प्राणों का विसर्जन करते हुए परमगति अर्थात निर्गुण-निराकर परमात्मा को प्राप्त करे। 
The practitioner of Yog has to divert his attention from the body and the brain, thought, ideas, organs of work and experience, so that they are comfortably placed in their position-becomes motionless. The mind has to be controlled completely and forget every thing else, except the God and form a mental image of the Almighty in the heart. The bio impulses have to be concentrated in the tenth opening: the place between the eye brows called Brahm Randhr-the Ultimate opening through he scull. Having attained this state, he should start uttering-reciting "ॐ" silently-mentally. Now, he is ready-prepared to immerse in the Almighty, who is free from characteristics and form. The time is mature for him to depart the human incarnation for which he was awarded this, to assimilate in the God.
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः। तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः॥8.14॥ 
हे प्रथानन्दन अर्जुन ! अनन्य चित्तवाला जो मनुष्य मेरा नित्य निरन्तर स्मरण करता है, उस नित्य-निरन्तर मुझमे लगे हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात उसको आसानी से प्राप्त हो जाता हूँ।
Bhagwan Shri Krashn told Arjun that he was always easily available-attainable to the steadfast devotee-Yogi, who always remembered HIM regularly. सगुण उपासना में मनुष्य भगवान् के स्वरूप का जाग्रत अवस्था में, मृत्यु पर्यन्त निरन्तर सतत दृढ़ता पूर्वक चिंतन-स्मरण करता है। भगवान् के जितने भी स्वरूप हैं, उनमें भेद नहीं करता। वह अपना मन किसी अन्य चीज में नहीं लगाता । वह ऐसा चिंतन करता है कि मैं केवल भगवान् का हूँ और वे मेरे हैं। मनुष्य के द्वारा प्रभु के श्री चरणों का चिन्तन निष्काम, श्रद्धा, प्रेम युक्त हो। योग मार्ग से प्राणों के विसर्जन में मनुष्य को समस्त इन्द्रियों की क्रियाओं को रोककर दसवें मार्ग से प्राणांत करना है। मगर स्मरण में ऐसा बन्धन नहीं है। यह स्वतः अपने आप होना है। 
The devotee considers the image-form of the Almighty in his heart and remember-recite HIS name regularly-vigorously, with firmness, love-affection, without desire. He makes it sure that he belongs to HIM only and that the God too reciprocate his gestures.The Path of Yog is a bit intricate for a common man. Very rare-few people adopts this life. One who is residing in a city, perform his duties-routine may find it extremely difficult to practice Yog, in its true form. However exceptions are always there. Yog helps one to awake his Kundlini power, bring the Pran to the tenth opening and depart for heavenly abode. But as for as remembrance is concerned, the devotee is not supposed to make extra efforts. Everything happens automatically, by it self, under the patronage of the God.
मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्। नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः॥8.15॥
महात्मा लोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय अर्थात दुखों के घर और अशाश्र्वत अर्थात निरन्तर बदलने वाले पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होते, क्योंकि वे परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं अर्थात उनको परम प्रेम की प्राप्ति हो गई है।
The pious, virtuous, righteous great souls are not subjected to pains-sorrow after attaining the Almighty. They do not take repeated incarnations-rebirth in this miserable transitory world, since they have attained the Ultimate accomplishment. They have achieved the love of the God.
मनुष्य को पुनर्जन्म अपने कर्मों के आधीन प्राप्त होता है। यह अशाश्र्वत है, क्योंकि कोई भी योनि स्थाई नहीं है। प्राणी को लगातार 84,00,000 योनियों से गुजरना पड़ता है, तब जाके उसे मनुष्य-मानव योनि प्राप्त होती है, जिसके माध्यम से जीव पुनर्जन्म से मुक्त हो सकता है। परमात्मा से प्रेम होना, उनके दर्शन कर लेना, मोक्ष प्राप्त कर लेना बड़े सौभाग्य की बात है। अगर भगवान् अवतार लेते हैं तो मुक्त जीव भी उनके साथ उनके पार्षदों के रूप में ही अवतार ग्रहण करते हैं, जो कि दुखों-कष्टों से दूर है। परमात्मा की इच्छा के अनुरूप भगवान् को प्राप्त हुए लोग उनके भक्तों, साधुजनों, मनुष्यों का उद्धार करने हेतु, धर्म की स्थापना हेतु ही शरीर धारण करते हैं। भक्ति मार्ग पर चलने वालों को परमात्मा ने स्वयं महात्मा कहा है। केवल भक्ति योग में ही महात्मा शब्द का प्रयोग किया गया है कर्मयोग, ज्ञान योग अथवा किसी अन्य योग में नहीं। परमात्मा का प्रेम प्राप्त होने पर यह भावना निरन्तर बढ़ती जाती है। [यह सद्यो गति मुक्ति है]
Incarnations as organism is the result-output of the deeds. Before achieving rebirth as a human being the soul has to pass through 84,00,000 species. Human is the only species which is capable of immersing into the Almighty not to be sent back for rebirth. Love with the God, HIS sight-company and Salvation are the result (yield) of greatest of great fortune. In case the Almighty takes Avtar, HE brings his favourites along with HIM like Gwal-Bal (boys grazing cows, herdsmen) when he appeared on earth to eliminate the sinners to relieve the earth, as Shri Krashn. These great souls are free from pains-sorrow. At occasions great soul are made to take Avtars to help the devotees-saints, establishment of faith, reliving the humans from this species as well. The God HIMSELF called the great souls, who follow the path of devotion as Mahatma. Karm Yog, Gyan Yog-Sankhy Yog or Yog of any other nature do not use this term Mahatma. Once one start loving the God, its intensity keep on increasing till he achieves Salvation.
The sinners are sure to be eliminated if they do not mend their behaviour by the God. Greater is the sin, greater is the penalty-punishment.
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते॥8.16॥ 
हे अर्जुन! ब्रह्मलोक तक सभी लोक पुनरावर्ती वाले हैं अर्थात वहाँ जाकर पुनः वापस लौटकर संसार में आना पड़ता है; परन्तु हे कौन्तेय! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता। 
The Almighty Bhagwan Shri Krashn told Arjun that all abodes till Brahm Lok attained by the Yogi, ascetic, devotee are subject to return to the earth after enjoying the fruits of their effort-endeavour. The organism does not obtain Salvation. But if he achieves the Ultimate Gau Lok or Vaikunth Lok, he does not return to earth i.e., he is freed from the vicious cycles of birth and death.
नर्कों से लेकर ब्रह्म लोक पर्यन्त समस्त लोक मनुष्य को कर्म फल भोगों के उपरान्त पुनः पृथ्वी लोक पर भेज देते हैं। समस्त भोग स्थलों में ब्रह्म लोक सर्वोच्च है। मृत्युलोक में राजा होना, स्त्री-पुरुष, परिवार आदि सभी उसके अनुकूल हों, युवावस्था हो शरीर निरोग हो, यह यहाँ का सुख है।  इससे अधिक सुख मर्त्य देवताओं को मिलता है जो मृत्यु के बाद पुण्यकर्मों के आधार पर देवलोक प्राप्त करते हैं। इनसे अधिक सुख आजान देवता पाते हैं जो कल्प के अंत तक देवता बने रहते हैं। इनसे अधिक सुख इन्द्र के लोक स्वर्ग में है और सबसे अधिक सुख ब्रह्म लोक में है। परन्तु अनन्त सुख तो केवल भगवत्प्राप्ति में ही मिलता है। देव-ब्रह्मा जी के दर्शन मात्र से मुक्ति नहीं मिलती यह मिलती है, परम पिता परमेश्वर में लीन और एकाकार होने और मोक्ष से ही प्राप्त होती है। अनन्त  ब्रह्मांडों का सुख भी मनुष्य को पूर्णरूपेण सुखी नहीं कर सकता। 
The organism-humans are sent back to earth after experiencing the impact of their Karm-deeds from the hells and the heavens, including the highest the Brahm Lok. Brahm Lok provides the best possible comforts, one can think of. Still one can not stay there for ever. The human as a king with family, relatives, wife, children, good health and youth is most comfortable. Next stage is that of the Marty demigods-deities. Higher than them are the Azan demigods, deities, who retain this form till one day-Kalp of Brahma Ji is there. The heaven of the Indr provides more pleasure, sensuality, sexuality, comforts, luxuries to the devotee, ascetic-Yogi. Above them all these, is the Brahm Lok. Since, the Brahm Lok too is perishable, its residents too are sure to be eliminated-expelled after the designated period. If one thinks that he will continue to have comforts-pleasure just by seeing the deities, demigods or the God, he is mistaken, since its not the gesture-meeting with the God, but the faith-feelings which relieves one from the unending cycles of birth and death.  One who achieve the Gau Lok or Vaikunth Lok is sure to stay there, since they are out of reach for the time.
सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः। रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः॥8.17॥ 
जो मनुष्य ब्रह्मा जी के एक हजार चतुर्युग वाले एक दिन को और एक हजार चतुर्युग वाली एक रात्रि को जानते है; वे मनुष्य ब्रह्मा के दिन और रात को जानने वाले हैं। 
One who is aware of the division of time in Brahm Lok of Brahma Ji as a single day or night, is aware of the fact that its equivalent to earth's 1,000 Chaturyugi. The constitutes of 4.32 billion solar years and that the night too is composed of 4.32 billion solar years, on earth.  सत्य, त्रेता, द्वापर और कलि इन चारों को मिलकर मृत्युलोक में एक चतुर्युगी बनती है। ऐसी एक हजार चतुर्युगी के बराबर ब्रह्मा जी का एक दिन और इसी परिमाण में उनकी एक रात होती है। 100 वर्ष की आयु के उपरान्त ब्रह्मा जी परमात्मा में लीन हो जाते हैं। उनके ब्रह्म लोक का विलय प्रकृति के साथ हो जाता है। आयु कितनी ही बड़ी क्यों न हो एक ना एक दिन पूरी हो ही जाती है। केवल परमात्मा ही कालातीत हैं। जिस मनुष्य को इस बात का अहसास-ज्ञान है वो ब्रह्म लोक के सुखों तक को महत्व नहीं देता और केवल परमात्मा को प्राप्त करने का उद्यम करता रहता है।
Please refer to :: HINDU-VEDIC CALENDAR (1) काल विभाजन santoshkipathshala.blogspot.com 
The time over the earth is measured in solar years. One single day of Brahma Ji-the creator constitutes of 4.32 billion solar years, divided into Saty, Treta, Dwapar and Kali Yug. This period is equivalent to Brahma Ji's one day or one night called Kalp on earth. Bhagwan Brahma is scheduled to survive for 100 divine years, after which he is sure to assimilate in the Almighty, since he too is busy in ascetic-meditative practices in Brahm Lok, simultaneously; along with performing the duties assigned to him by the Almighty. His Brahm Lok is the highest amongest the heavens too will assimilate in mother nature. Howsoever long the age might be, one day or the other it will vanish. One who has realised this does not crave for heavens and concentrate over Bhakti & Salvation. A comprehensive study of time is compiled over this blog :- santoshkipathshala.blogspot.com under the title: HINDU-VEDIC CALENDAR (1) काल विभाजन
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे। रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके॥8.18॥ 
ब्रह्मा जी के दिन के आरम्भ में  अव्यक्त (ब्रह्मा जी के सूक्ष्म शरीर) से सम्पूर्ण शरीर पैदा होते हैं और ब्रह्मा जी की रात के आरम्भ काल में उस अव्यक्त नाम वाले  (ब्रह्मा जी के सूक्ष्म शरीर) में ही सम्पूर्ण शरीर लीन हो जाते हैं।
All manifestations-organism, weather material or divine, evolve from the creator-Brahma Ji during the creative cycle-beginning of his day (Kalp, Sarg) and then they merge-assimilate back into him during night (Praly, devastation)  of Brahma Ji during the destructive cycle. व्यक्त-मूर्त शब्दों का प्रयोग भौतिक और दैवीय सृष्टि के लिए किया गया है। ब्रह्मा जी के सूक्ष्म शरीर से दिन (कल्प, सर्ग) की शुरुआत में समस्त प्राणियों का उद्भव-विकास होता है और रात्रि-प्रलय में समस्त जीवधारी उन्हीं में लीन हो जाते हैं। महाप्रलय उस वक्त होता है, जब ब्रह्मा जी अपनी आयु पूरी कर लेते हैं और महासर्ग तब होता है, जब ब्रह्मा जी परमात्मा से पुनः प्रकट होते हैं। ब्रह्मा जी पर्यन्त सभी प्राणी-लोक काल के अंतर्गत हैं। परमात्मा कालातीत हैं। ब्रह्मा जी के दिन और रात की गड़ना सूर्य से नहीं अपितु प्रकृति से होती है। ब्रह्मा जी में लय होते वक्त प्राणी के गुण-दोष आत्मा में बने रहते हैं और नये सर्ग में उत्पत्ति होने पर पुनः प्रकट हो जाते हैं। 
The physical-material & divine manifestations are used to illustrate the defined body form-shape & size. All organism take birth from the micro-minute body form of Brahma Ji to convert into visible (macro, vast forms), species of the universal creations. This process begins at the dawn of Brahma Ji's day. As soon as one day Brahma Ji is over the night falls and devastation takes place concluding the entire living world-abodes. They all assimilate in him. All abodes till Brahm Lok are perishable in due course of time except the Gau Lok and Vaikunth Lok. Only the Almighty is free from the clutches of time-death. Longevity of the Brahma Ji's day & night is not measured by the solar scale. Its measured through nature's other parameters. The traits, virtues, defects, qualities, characterises remain in the soul and reveal as soon the next phase begins and the soul acquires new body, according to remaining deeds.
भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे॥8.19॥ 
हे पार्थ! उन्हीं प्राणियों का यह समुदाय उत्पन्न हो-होकर प्रकृति के परवश हुआ ब्रह्मा जी के दिन के समय उत्पन्न पुनः होता है और ब्रह्मा जी की रात्रि में लीन हो जाता है। 
The same multitude-quantum of beings comes into existence again and again at the beginning of evolution-creative cycle and is annihilated, inevitably, at the time of devastation (doom's day, the destructive cycle).  प्राणियों का यह समुदाय वही है, जो परमात्मा का स्वरूप है और आदि काल से जन्म-मृत्यु के बंधनों में जकड़ा हुआ है। पदार्थ-शरीर तो बदलता रहता है, क्योंकि वो निर्जीव सम्बन्ध नहीं रखता, मगर प्राणी संबंधों से स्वयं को मुक्त नहीं कर पाता। प्राणी का जन्म-जन्म का बंधन उसका स्वयं संचित किया हुआ है, क्योंकि वो उसे अपना मानता है। जब वह इसको अपना मानता है तो इसके-प्रकृति के, परवश-परतंत्र हो जाता है। सुख की इच्छा उसे मुक्त-स्वतंत्र नहीं होने देती। यही इच्छा उसे अवश (बेबस-लाचार) बना देती है। इस प्रकार वह जन्म-मृत्यु का ग्रास बनकर ब्रह्मा जी के दिन में बार-बार जन्म लेता हुआ, अन्ततोगत्वा पुनः ब्रह्मा जी की रात्रि में-प्रकृति में लीन हो जाता है। 
Entire group of creatures-organism is the same which is a replica of the Almighty, but remains away from-aloof from HIM due to his desire for comforts. It passes through numerous species-incarnation due to the feeling of oneness with the physical-material body. He considers this body to be his own. He performs to seek success-pleasure and makes him rigidly tied to the body. The body falls after death but the relations persists, even after the death. The chain continues for 4.32 billion solar years during Brahma's day (Kalp, Sarg) and assimilation in nature remains thereafter for the next evolution and then he again roam in various species till he understand-realise the gravity, magnitude-importance of Salvation-devotion to the Almighty-God and start makes endeavours to achieve it. Its a game of snake and ladder.
परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः। यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति॥8.20॥ 
परन्तु उस अव्यक्त (ब्रह्मा जी के सूक्ष्म शरीर) से अन्य-अलग (विलक्षण) अनादि अत्यन्त श्रेष्ठ भाव रूप जो अव्यक्त (ईश्वर) है, वह सम्पूर्ण प्राणियों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होता। 
Other than Brahma Ji, there exists the eternal transcendental (Supreme, the Ultimate, the Almighty, the Eternal), who remains even after the loss of all life forms, weather physical-material or divine. ब्रह्मा जी के सूक्ष्म शरीर जिसके दो तत्व हैं :- प्रकृति जिसमें समष्टि, मन, बुद्धि और अहंकार व्याप्त हैं और उससे भी और दूसरा अंग परमात्मा, जो अत्यन्त विलक्षण-भावरूप से अव्यक्त सनातन परमात्मा-परमेश्वर विराजमान है। वो सभी काल में बना रहता है। वह अनादि, अनन्त, सर्वश्रेष्ठ स्थायी है। 
The body of Brahma Ji constitutes of two components :- the nature and the God. Entire universe-macro form are embedded (implant, plant, set, fix, lodge, root, insert, placed) in it. The Almighty-Eternal is above Brahma Ji. HE is beyond the limits of time & death. HE is imperishable, since ever, for ever, Ultimate.
अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम्। यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥8.21॥
उसी को अव्यक्त और अक्षर कहा गया है तथा उसी को परम गति कहा गया है और जिसको प्राप्त होने पर जीव फिर लौटकर संसार में कभी नहीं आता, वह मेरा परम धाम है। 
HE is called unrevealed, imperishable, Ultimate abode, from which the soul never return to earth, having achieved it. परमात्मा अव्यक्त-व्यक्त, अक्षर-क्षर, गति-स्थिति से रहित निरपेक्ष तत्व है। उसे सगुण-साकार, निर्गुण-निराकार, सगुण-निराकर अथवा निर्गुण-साकार कैसे भी मानकर साधक प्रयत्न करे; वह अन्ततोगत्वा, उसी निरक्षर ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है जिसको पाकर पुनरावर्ती नहीं होती अर्थात मनुष्य को मृत्यु लोक में नहीं आना पड़ता। परमात्मा यदि अवतार ग्रहण करते हैं तो उनके संगी-साथियों के रूप में ऐसे महात्मा लोग भी साथ चले आते हैं। कभी-कभार भगवान् की इच्छा से ऐसे व्यक्ति लोगों का उद्धार करने के लिए भी कारक पुरुषों के रूप में इस भूमंडल पर पधार सकते हैं।
The Almighty has various modules like :- with characteristics & form, without characteristics & without form, without characteristics and with form &  with characteristics  and without form. HE is absolute and neutral; free from the clutches of time. The practitioner, Yogi, ascetics, devotee will assimilate in HIM, irrespective of the route adopted by him. One does not return to earth, becomes free from the repeated cycles of birth & death, having reached that Ultimate abode of the God. At occasions the Almighty takes incarnations-Avtars to help the residents of earth. In such conditions the pure souls do accompany HIM. There are instances, when such souls do come to earth to bring out the people out of trouble.
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया। यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्॥8.22॥ 
हे प्रथानन्दन अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्य भक्ति से प्राप्त किया जा सकता है।
Bhagwan Shri Krashn asked Arjun-the son of Pratha-Kunti, that the Almighty is pervaded throughout the universe-eternity, all living beings are controlled by HIM and HE can be attained through unique-unalienable devotion. सम्पूर्ण सृष्टि परमात्मा के अन्तर्गत-अधीन है और वह स्वयं सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। उसके सिवाय किसी अन्य की स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वह अव्यक्त, अक्षर, परमगति केवल अनन्य भक्ति से ही प्राप्त किया जा सकता है। कोई भी अन्य साधन बगैर भक्ति के अपूर्ण है। 
Whole world-life is controlled by the Almighty and HE HIMSELF pervades through it. None-nothing is independent, except HIM. HE the undisclosed, undescribed, Ultimate WHO can be achieved through unique, undivided, unshared devotion. What ever path one adopts for Salvation should have devotion associated with it. How can one attain HIM without dedication-devotion?!
यत्र काले त्वनावृत्तिमावृत्तिं चैव योगिनः। प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ॥8.23॥ 
परन्तु हे भरत वंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! जिस काल में अर्थात मार्ग में शरीर को छोड़कर गए योगी अनावृत्ति को प्राप्त होते हैं अर्थात पीछे लौटकर नहीं आते और जिस मार्ग से  गए हुए आवृत्ति को प्राप्त होते है अर्थात लौटकर आते हैं उस काल को अर्थात दोनों मार्गों को मैं कहूँगा। 
But the greatest amongest the descendants of Bharat, Hey Arjun, listen to me, carefully with attention! I shall explain-describe both the routes-paths adopted by those Yogis who do not return to earth or get reincarnations and those who return back to earth or obtain reincarnations.
जीवित अवस्था में बन्धनमुक्त को सद्योमुक्ति कहते हैं (श्लोक 8-15) अर्थात जिसने यहाँ ही भगवत्प्राप्ति, अनन्य भक्ति-प्रेम प्राप्त कर लिया हो वे यहीं परम संसिद्धि को प्राप्त कर लेते हैं। क्रम मुक्ति उन्हें प्राप्त होती है जो सूक्ष्म वासनाओं के कारण ब्रह्मा जी के साथ मुक्त होते हैं। जो व्यक्ति केवल सुख भोग के लिए ब्रह्मादि उच्च लोकों में जाते हैं और जिनका आवागमन चलता रहता हैं और उनकी गति को पुनरावृति कहते हैं। काल शब्द का प्रयोग गति और सृति के रूप में भी किया गया है। अनावृत ज्ञान वाले पुरुष ही अनावृति में और आवृत ज्ञानवाले आवृत्ति में जाते हैं। अनावृत वे हैं जो जो भोगों से मुक्त हो गए हैं और जिनका विवेक जाग्रत है। निष्काम भाव से उनकी पुनरावृति नहीं होती। जो परमात्मा से विमुख, सांसारिक पदार्थों और भोगों में आसक्ति, कामना और ममता वाले आवृत ज्ञान वाले अर्थात जिनका ज्ञान ढँका हुआ है, वे फिर से जन्म-मरण के चक्र में पड़ते हैं। सकाम भाव के कारण उनके मार्ग में अँधेरा-अविवेक है। परमात्म प्राप्ति के उद्देश्य वाले लोग जिनमें आंशिक वासना रह जाती है वो उच्च लोकों में जाकर भी पुनः लौट आते हैं। उन्हें योग भ्रष्ट भी कहा जाता है। जो परिवर्तन शील प्रकृति के साथ सम्बन्ध रखता है, उसे लौटकर आना ही पड़ता है। 
Those who attain Liberation while alive due to extreme-unique devotion, love & affection for the Almighty, achieve the Ultimate renunciation-assimilation in God. Yet another category constitutes of those who elevate to the Brahm Lok and still have some sort of inclination for the comforts, gets Liberation along with the creator-Brahma Ji. The third category constitutes of those who's prudence is choked (covered, masked, lost) with desires, sensuality, sexuality, affections, allurements. Those belonging to this category are not freed from the clutches of repeated birth & death cycles. Those Yogis who attain higher abodes may return due to the presence of lust-desires in them. Those who disconnect themselves from nature never return but those who are unable to break the cord of attachments with the nature, keep on returning again and again. Anything done with the desire of fruit, result, outcome, rewards keep one tied with nature and he keep on rotating from one species to another as per his deeds.
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥8.24॥ 
जिस मार्ग में ज्योतिर्मय-प्रकाशस्वरूप अग्नि का अधिपति देवता, दिन का अधिपति देवता, शुक्ल पक्ष का अधिपति देवता और उत्तरायण के छः महीनों का अधिपति देवता है, उस मार्ग में शरीर छोड़कर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर (पहले ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर) पीछे ब्रह्मा जी के साथ ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।
The Yogi who still has some fractional, remaining desires, motives, is taken sequentially, through the paths followed by the deity, demigod of fire, Agni, the deity of the day, the deity of bright lunar fortnight and thereafter by the deity of the Uttrayan-the six months period, during which the Sun moves from South to North; to the creator Brahma Ji & they too assimilate in the Almighty with Brahma Ji.
इस पृथ्वी पर शुक्लमार्ग में सबसे पहले अग्नि देवता का अधिकार रहता है। अग्नि रात्रि में प्रकाश करती है दिन में नहीं क्योंकि अग्नि का प्रकाश दिन के प्रकाश की अपेक्षा सीमित है, कम दूर तक जाता है। शुक्लपक्ष 15 दिनों का होता है जो कि पितरों की एक रात है। यह प्रकाश आकाश में अधिक दूर तक जाता है। जब सूर्य भगवान् उत्तर की तरफ चलते हैं, तब यह उत्तरायण कहलाता है और यह 6 महीनों का समय देवताओं का एक दिन है। इसका प्रकाश और अधिक दूर तक फैला हुआ है। जो शुक्लमार्ग की बहुलता वाले मार्ग में जाने वाले हैं, वे सबसे पहले अग्नि देवता के अधिकार में, फिर दिन के देवता के अधिकार में और शुक्लपक्ष के देवता को प्राप्त होते हैं। शुक्लपक्ष के देवता उसे उत्तरायण के अधिपति के सुपुर्द कर देते हैं औए वे उसे आगे ब्रह्मलोक के अधिकारी देवता के समर्पित कर देते हैं। इस प्रकार जीव क्रमश: ब्रह्मलोक में पहुँच जाता है और ब्रह्मा जी की आयु पर्यन्त वहाँ रहकर महाप्रलय में ब्रह्मा जी के साथ ही मुक्त हो जाता है तथा सच्चिदानंदघन परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
ब्रह्मविद: परमात्मा परोक्षरूप से जानने वालों के लिए है अपरोक्षरुप रूप से जाननेवालों के लिए नहीं, जिन्हें यहीं पर सद्योमुक्ति या जीवन्मुक्ति बगैर ब्रह्मलोक जाये ही प्राप्त हो जाती है। 
The period of bright moon light is under the control of the deity of fire Agni Dev. Fire does not produce as much light as is produced by the Sun. Sun light extends farther than the light produced by fire. Bright lunar fortnight constitutes of 15 days, which is the period dominated by the Pitr Gun (the Manes, ancestors). The light extends farther. It is followed by the period of 6 months when the Sun turns north called Uttrayan in northern hemisphere. The sequence is such that the soul of the relinquished is passed on to the next in the hierarchy to be handed over to the creator Brahma Ji, where it stays and enjoys till the Ultimate devastation takes place and it merges with the Almighty-the Ultimate being, not to return back.
There is yet another version which explains this verse in the form of the phases of Moon. As the organism grows in virtues his status is enhanced from 1 to 16, which is the phase of the Ultimate being the Lord of Lords the Almighty. Those with less virtues to their credit and still possess left over rewards of the virtuous, righteous, pious deeds, are promoted to the Brahm Lok in stead of being relinquished straight way to the Almighty by granting him Salvation.
अपरोक्षक्रम में :: (1). अग्नि: :- बुद्धि सतोगुणी हो जाती है दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव विकसित होने लगता है, (2). ज्योति: :- ज्योति के सामान आत्म साक्षात्कार की प्रबल इच्छा बनी रहती है। दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव ज्योति के समान गहरा होता जाता है और (3). अहः :- दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव दिन के प्रकाश की तरह स्थित हो जाता है। इस प्रकृम में 16 कलाएँ :– 15 कला शुक्ल पक्ष + 01 एवं उत्तरायण कला = 16 हैं। (1). बुद्धि का निश्चयात्मक हो जाना, (2). अनेक जन्मों की सुधि आने लगती है, (3). चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है, (4). अहंकार नष्ट हो जाता है, (5). संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं। स्वयं के स्वरुप का बोध होने लगता है, (6). आकाश तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। कहा हुआ प्रत्येक शब्द सत्य होता है, (7). वायु तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। स्पर्श मात्र से रोग मुक्त कर देता है, (8). अग्नि तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। दृष्टि मात्र से कल्याण करने की शक्ति आ जाती है, (9). जल तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। जल स्थान दे देता है। नदी, समुद्र आदि कोई बाधा नहीं रहती, (10). पृथ्वी तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। हर समय देह से सुगंध आने लगती है, नींद, भूख प्यास नहीं लगती, (11). जन्म, मृत्यु, स्थिति अपने अधीन हो जाती है, (12). समस्त भूतों से एक रूपता हो जाती है और सब पर नियंत्रण हो जाता है। जड़ चेतन इच्छानुसार कार्य करते हैं, (13). समय पर नियंत्रण हो जाता है। देह वृद्धि रुक जाती है अथवा अपनी इच्छा से होती है, (14). सर्व व्यापी हो जाता है। एक साथ अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है। पूर्णता अनुभव होती है। योगी-विमुक्त लोक कल्याण के लिए संकल्प धारण कर सकता है, (15). कारण का भी कारण हो जाता है। यह अव्यक्त अवस्था है, (16). उत्तरायण कला :- अपनी इच्छा अनुसार समस्त दिव्यता के साथ अवतार रूप में जन्म लेता है जैसे राम, कृष्ण। यहाँ उत्तरायण के प्रकाश की तरह उसकी दिव्यता फैलती है। सोलहवीं कला पहले और पन्द्रहवीं को बाद में स्थान दिया है। इससे निर्गुण सगुण स्थिति भी सुस्पष्ट हो जाती है। सोलह कला युक्त पुरुष में व्यक्त अव्यक्त की सभी कलाएँ होती हैं। यही दिव्यता है।[वेदों के समान ही विभिन्न विद्वानों ने गीता की व्याख्या भी अलग-अलग की है। परन्तु मूल तत्व सब जगह एक ही रहता है]
धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम्। तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते॥8.25॥ 
धूम का अधिपति देवता, रात्रि का अधिपति देवता, कृष्ण पक्ष का अधिपति देवता और 6 महीनों वाले दक्षिणायन का अधिपति देवता है, शरीर छोड़कर गया हुआ उस मार्ग से गया हुआ सकाम व्यक्ति-योगी चन्द्रमा की ज्योति को प्राप्त होकर लौट आता है अर्थात जन्म-मरण को प्राप्त होता है। 
The passage of righteous, virtuous, pious one, who is praying to the Almighty with motive is quite different, since it follows the path of darkness, night, dark phase of Moon-fortnight, turning of Sun into Southern solstice-hemisphere, when he ultimately achieves the Chandr Lok to be fed with elixir, Amrat, nectar for the period of his stay there and thereafter turning back to earth to be born in the families of the righteous well to do people.
Sun & Moon both have some kind of habitation. Habitation over the Sun is masked by the outer sphere which is luminous-illuminated and visible through out the universe. Habitation over Luna may be both inside or surface of Moon. Time and again evidence surfaces favouring the presence of life over Luna. Life is possible over Venus as well Mars. These are known as abodes-Lok of deities. धूम अर्थात अन्धकार के देवता कृष्ण मार्ग से जाने वाले जीवों को रात्रि के अधिपति देवता को सौंप देते हैं, जो कि उन्हें कृष्ण पक्ष के देवता के सुपुर्द कर देते हैं। यहाँ से जीव को दक्षिणायन के अधिपति ग्रहण करते हैं और अब जीव को चन्द्र लोक के अधिपति प्राप्त करते हैं। यहाँ वह अमृत का पान करता है। चन्द्रमा पृथ्वी के सन्निकट है जबकि चन्द्र लोक तो सूर्य लोक से भी कहीं आगे है। चन्द्र लोक से अमृत चन्द्र मण्डल में आता है, जिससे शुक्ल पक्ष में औषधियों की पुष्टि होती है। कृष्ण मार्ग भी उर्ध्व गति का द्योतक है। ऐसे लोग पुनर्जन्म लेते वक्त श्री मानों के घर में स्थान पाते हैं। ये व्यक्ति-साधक वो हैं, जो कि ऊँचे लोकों के प्राप्ति हेतु यज्ञ, हवन, अग्निहोत्र आदि का आयोजन करते हैं। अतः ब्रह्म लोक तक पहुँच कर ब्रह्मा जी के साथ लय होने वाले और इन साधकों की गति में अन्तर है। जिस साधक का उद्देश्य ही भगवत्प्राप्ति है वो कभी भी शरीर छोड़ें :- दिन-रात, उत्तरायण-दक्षिणायन, शुक्ल पक्ष-कृष्ण पक्ष, उन्हें लेने लिए स्वयं भगवान् के पार्षद आते हैं। 
निष्काम भाव प्रकाशमय और सकाम भाव अंधकारमय है। कृष्ण मार्ग को पितृ यान, धूम मार्ग और दक्षिण मार्ग भी कहा गया है। 
The deity of darkness handover the expired-dead one to the deity of Krashn Marg (dark way, path-road), who in turn give him to the deity of night to be handed over to the deity of dark phase of Lunar fortnight. From here, he is surrendered to the deity of the southern path of Sun, leading him to the Chandr Lok which is much higher than the Sun's abode. The Lunar abode is different than the Luna which is comparatively closer to the earth. The organism in his minor form-body (सूक्ष्म शरीर) is fed with nectar, elixir, the Amrat to support him, till his rewarding-enjoying phase is over. Now, the organism returns to the earth to be born in the families of the devotees of the God, who are well to do, prosperous. 
There is a lot of difference between the darkness associated with the hells and this dark route to Chandr Lok. Hells are full of tortures, pains, sorrow, worries unending tensions, anxieties etc. The route to Chandr Lok is meant for those who desire to attain Ultimate comforts and performs Yagy, Hawan, prayers, Agnihotr to attain them. Yet there are the humans-Yogis who's one point program is attainment of the God through devotion. For them the restriction of day-night, dark or bright phase of Moon, movement of Sun in northern hemisphere or southern hemisphere are meaning less, since the nominees of the God themselves come to earth to receive and welcome them to the Almighty's abode.
Selflessness-devotion without motives desires is synonym to brightness-light, while devotion with desires-longing is darkness.
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते। एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः॥8.26॥ 
क्योंकि शुक्ल और कृष्ण, ये दोनों ही गतियाँ अनादिकाल से ही जगत्-प्राणी मात्र के साथ सम्बन्ध रखने वाली मानी गई हैं। इनमें से एक गति से जाने वालों को लौटना नहीं पड़ता, जबकि दूसरी गति से जाने वालों को पुनः लौटना पड़ता है। 
Movement of the soul through bright or the dark passage is continuing from the beginning-on set of life. First of these passage is safe, since one is not supposed to return back to earth while the return-reincarnation is certain from the second-dark path. The former grants Salvation and the latter leads to rebirth as human beings. शुक्ल मार्ग पर गए प्राणी का लय ब्रह्मा जी के हो जाता है, उसे वापस आना नहीं पड़ता; जबकि कृष्ण मार्ग पर गए हुए को वापस लौटना ही पड़ता है। यही जगत का शास्वत नियम है, जो कि अनादिकाल से चला आ रहा है। भगवत्कृपा प्राणी को कभी भी किसी भी योनि में प्राप्त हो सकती है, क्योंकि उसे अपने बचे हुए पुण्य और पापों का क्षय होने तक ऊर्ध्वगति, मध्यगति या अधोगति के भोग के इन मार्गों का अनुसरण करना ही होता है। मनुष्य जन्म बहुत विशेष है, क्योंकि यहीं पर रहकर प्राणी कर्म, योग, मुक्ति-मोक्ष, भक्ति का उद्यम कर सकता है। 
The bright-illuminated passage leads to assimilation in the creator, ensuring assimilation in the Almighty at the occurrence of Ultimate devastation. The dark path is called so, since the organism has left over desires, affections, allurements, alienation (अलगाव, दुराव, अन्य संक्रामण, हस्तांतरण, विराग, dispassion, disfavour), which are sure to bring him back to the earth to restart yet again. This is the law of nature-eternity; followed by the divinity. However, one may be able to attain Salvation-freedom in inferior species as well, since he had been able to undergo the remaining punishments in that form. One should not be proud of being a Brahmn, enlightened, scholar, rich or a noble, since that phase might be going to be over as soon as the reward of the left over pious deeds has been en-cashed. Movement to higher, middle order or the lower abodes depends upon the deeds of the organism as a human being and some times in inferior species like primates, as well. One must keep it in mind that he has been able to get the opportunity of being a human being due to some left over pious deeds which he should not miss to attain the Ultimate abode-the abode of the Almighty.
नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन॥8.27॥ 
हे प्रथानन्दन अर्जुन! इन दोनों मार्गों को जानने वाला कोई भी योगी मोहित नहीं होता। अतः हे अर्जुन! तू हर समय योग युक्त समता को प्राप्त कर। 
The Almighty stressed that the Yogi-one, who is aware of the two routes-paths after the death; first leading to Salvation and the other leading to reincarnation, is not enchanted-illusioned. He asked Arjun to attain equanimity aided with Yog and establish him in it. 
योगी-साधकों-तपस्वियों की दो गतियों :- कृष्ण मार्गी साधक सुख-भोग, उच्च लोकों में जाने की इच्छा रखते हैं, किन्तु शुक्ल मार्गी जो परमात्मा-ब्रह्म में लीन होना चाहते हैं; इन दोनों को जानकर जो व्यक्ति कृष्ण मार्ग का त्यागकर देता है और निष्काम हो कर समता हासिल कर लेता है और दृढ़प्रतिज्ञ हो जाता है कि उसे तो केवल परमात्म तत्व की उपलब्धि ही करनी है, वो मोहित-पथभ्रष्ट नहीं होता और अन्ततोगत्वा परमात्मा को प्राप्त कर ही लेता है।  
There are two paths after the death one may follow. The second one is that of comforts, sensuality, enjoyment, pleasure and the first one to liberate from the repeated cycles of birth and death. The enlightened aware of these two has to attain equanimity and practice for Liberation with firm determination. He is not illusioned or enchanted. He rejects all allurements, desires and devote him self whole heartedly to the Almighty.
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्॥8.28॥ 
योगी-भक्त इस ज्ञान (इस अध्याय में वर्णित और गीता ज्ञान) को प्राप्त करके वेदों में, यज्ञों में, तपों में तथा दान आदि में जो-जो भी पुण्य फल कहे गए हैं, उन सभी फलों  अतिक्रमण कर जाता है और आदि स्थान परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।
यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, योग, व्रत आदि जितने भी उत्तम से उत्तम कार्य-कलाप, पवित्र धर्म-कर्म हैं, विनाशी-नष्ट होने वाला फल ही देते हैं। भोग-भूमियों की आखिरी सीमा-हद ब्रह्म लोक ही है। प्रकृति से संयुक्त जो कोई भी कर्म है, वह नाश वान है और परमात्म तत्व से विमुख होकर ही मनुष्य उसे उपलब्ध कर पाता है। यही उसकी भूल-गलती है; जिसे वह स्वयं ही दूर कर सकता है। इस अध्याय (गीता का ज्ञान) को पढ़ने, जानने, समझने (जानना, मानना ही पर्याप्त नहीं है, अपितु उस पर अमल करना-चलना भी अनिवार्य है और वह दृढ निश्चय से ही प्राप्त होता है) के पश्चात दृढ़ निश्चय से यदि साधक लगातार, अनवरत, अनथक प्रयास करता है, तो सहज ही परमात्म तत्व को प्राप्त करके परमधाम पहुँच जाता है। 
The devotee, Yogi-one attains the Ultimate abode-Salvation, by grasping, understanding and following in practice with firm determination, crossing-rejecting the barriers-rewards of virtues-austerities, earned through enlightenment-learning of Veds, holy sacrifices in fire: Yagy, Hawan, Agnihotr and charity-donations (including service-welfare of the mankind-humanity). Yagy-sacrifices, donations, asceticism, fasting, Yog, visiting holy places-pilgrimages and the utmost pious deeds, religious acts results in perishable attainment-rewards. One can not reach beyond Brahm Lok which rewards the best comforts. Any deed connected with the earth results in perishable outcome and separation from the Almighty. This is the mistake which binds him with repeated birth & death cycles, incarnations. However, one who has grasped this lesson thoroughly, practices it with firmness-determination, surely reaches the Ultimate abode the seat of the Almighty from where he will never return to suffer. 
 ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे अक्षरब्रह्मयोगो नामाष्टमोऽध्यायः॥8॥
इस प्रकार, ॐ, तत्, सत्-इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद गीतोपनिषद्रूप  श्रीकृष्णार्जुन संवाद में अक्षरब्रह्म योग नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ। 
In this manner the eighth chapter of Shri Mad Bhagwad Geeta containing the pious om-ॐ, tat, sat; the dialogue between Bhagwan Shri Krashn  & Arjun, discussing Brahm Vidya-Knowledge of the Ultimate & Yog Shastr has been completed.
Blessing of the virtuous readers & grace of Almighty resulted in revision of this chapter on 14.01.2018 at Noida.

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