Friday, May 29, 2015

रति (ऋग्वेद 1)

‎रति
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:। 
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (179) ::  ऋषि :- लोपामुद्रा, अगस्त्य, देवता :- रति,  छन्द :- त्रिष्टुप्, बृहती।
पूर्वीरहं शरदः शश्रमाणा दोषा वस्तोरुषसो जरयन्तीः। 
मिनाति श्रियं जरिमा तनूनामप्यू नु पत्नीर्वृषणो जगम्युः॥
लोपामुद्रा कहती हैं :- हे अगस्त्य! अनेक वर्षों से मैं दिन-रात बुढ़ापा लाने वाली उषाओं में आपकी सेवा करके श्रान्त हुई हूँ। बुढ़ापा शरीर के सौन्दर्य व क्षमताओं का नाश कर देता है; इसलिए उत्तम संतान की प्राप्ति के लिए सामर्थवान् पुरुष ही पत्नियों के पास जायें।[ऋग्वेद 1.179.1]
श्रान्त :: श्रम के कारण शिथिल होना; exhausted,  a weary, fatigued, tired, description.
लोपामुद्रा महर्षि अगस्त्य की पत्नी थीं। इनको वरप्रदा और कौशीतकी भी कहते हैं। इनका पालन-पोषण विदर्भराज निमि या क्रथपुत्र भीम ने किया, इसलिए इन्हें वैदर्भी भी कहते थे। महर्षि अगस्त्य से विवाह हो जाने पर राजवस्त्र और आभूषण का परित्याग कर, इन्होंने पति के अनुरूप वल्कल एवं मृगचर्म धारण किया। महर्षि अगस्त्य द्वारा प्रहलाद के वंशज इत्वल से पर्याप्त धन ऐश्वर्य प्राप्त होने पर दोनों में समागम हुआ, जिससे दृढस्यु' नामक पराक्रमी पुत्र की उत्पत्ति हुई। भगवान् श्री राम अपने वनवास में लोपामुद्रा तथा अगस्त्य से मिलने उनके आश्रम गए थे। वहाँ ऋषि ने उन्हें उपहार स्वरूप धनुष, अक्षय तूणीर तथा खड्ग दिए थे। लोपामुद्रा ने माता सीता को साड़ी भेंट की जो कभी मैली नहीं होती थी। 
लोपामुद्रा :- मैं वर्षों से दिन-रात जरा की सन्देश वाहिका उषाओं में तुम्हारी सेवा करती हूँ। वृद्धावस्था शरीर सौन्दर्य को समाप्त करती है। इसलिए यौवन काल में ही पति-पत्नी गृहस्थ धर्म का पालन करके उसके उद्देश्य को पूर्ण करें।
Lopa Mudra, wife of August Rishi told him that she was fatigued by serving him day & night. Old age looses the beauty-charm of the body. Hence, a woman should make endeavours to carry out the duties of Grahasthashram-house hold, family life i.e., reproduction. She said that the male should mate with his wife only when he is sexually fit & fine i.e., potent.
ये चिद्धि पूर्व ऋतसाप आसन्त्साकं देवेभिरवदन्नृतानि ते।  
चिदवासुर्नह्यन्तमापु: समू नु पत्नीर्वृषभिर्जगम्युः॥
हे अगस्त्य! जो प्राचीन और सत्य रक्षक लोग देवताओं के साथ रहते थे, उन्होंने भी संतान उत्पत्ति के कार्य का निर्वाहन किया और अन्त तक ब्रह्मचर्य व्रत का पालन नहीं किया। काम में समर्थ ऐसे पुरुषों को उन्हीं के अनुकूल पत्नियाँ प्राप्त हुई।[ऋग्वेद 1.179.2]
धर्म पालन पुरातन ऋषि-देवताओं से सच बोला करते थे। वे क्षीण हो गये तथा जीवन के परम फल को प्राप्त नहीं हुए, इसलिए पति-पत्नी को संयमशील विद्या के अध्ययन में रत विद्वान को भी उपयुक्त दशा में काम भाव प्राप्त होता है और वह अनुकूल पत्नी को प्राप्त कर संतान उत्पादन का कार्य करता है।
Hey August! The ancient truthful people who accompanied the demigods, too followed the procedure & dictates, pertaining to reproduction and avoided chastity till end. Such people who were potent got the wives who too were like them.
न मृषा श्रान्तं यदवन्ति देवा विश्वा इत्स्पृधो अभ्यश्नवाव। 
जयावेदत्र शतनीथमाजिं यत्सम्यचा मिथुनावभ्यजाव॥
अगस्त्य ऋषि कहते हैं :- हमारी साधना व्यर्थ नहीं गई, क्योंकि देवता लोग रक्षा करते है। हम सारे भोगों का उपभोग कर सकते हैं। यदि हम दोनों चाहें तो इस संसार में हम सैकड़ों भोगों के साधन प्राप्त कर सकते हैं।[ऋग्वेद 1.179.3]
अगस्त्य :- हमने व्यर्थ में परिश्रम नहीं किया। देवगण हमारे रक्षक हैं। हम स्पर्द्धा करने वालों को वश में करते और सैकड़ों साधनों का उपभोग करते हैं। 
August said that their labour was noted since the demigods protected them. They were capable of enjoying all sorts of comforts & luxuries.
नदस्य मा रुधतः काम आगन्त्रित आजातो अमुतः कुतश्चित्।
लोपामुद्रा वृषणं नी रिणाति धीरमधीरा धयति श्वसन्तम्॥
यद्यपि मैं जय और संयम में नियुक्त हूँ तथापि इसी कारण या किसी भी कारण, मुझ में काम का समावेश हो गया है। सेचन करने वाली लोपामुद्रा पति के साथ संगत है। घास पर संयम रखने वाले धीर पुरुष ही काम वेग पर नियन्त्रण कर पाते है।[ऋग्वेद 1.179.4]
नर-नारी संयुक्त रूप से गृहस्थ सेवन के लिए मुझे ग्रहण हों, धैर्यवान व्यक्ति को मैं धारण करूँ।
Though I am engaged in controlling self, yet due to this or some other reason the sensuality-sexuality is troubling me. Lopa Mudra who is determined and controls her self, is with her husband. 
इमं नु सोममन्तितो हृत्सु पीतमुप ब्रुवे। 
यत्सीमागश्चकृमा तत्सु मृळतु पुलुकामो हि मर्त्यः॥
सोमरस के समीप जाकर उसका पान करता हुआ शिष्य कहता है कि मनुष्य तो अनेक इच्छाओं का दास है। अगर इस इच्छा के कारण मेरे मन में कोई विकार उत्पन्न हुआ हो तो यह सोमरस अपने प्रभाव से उसे शुद्ध कर दे।[ऋग्वेद 1.179.5]
शिष्य :- मैं मन से पान किये हुए इस सोम की प्रार्थना करता हूँ। यदि हमसे कोई भूल हुई हो तो उसे वे माफ करें क्योंकि प्राणी अनेक इच्छाओं से युक्त होता है।
The disciple-student (follower) sips Somras and says that a humans being is slave of desires-wishes, wants. If some sort of defect has creped into his mind, it should be removed by the Somras due to its impact-effect. 
अगस्त्यः खनमानः खनित्रैः प्रजामपत्यं बलमिच्छमानः। 
उभौ वर्णावृषिरुग्रः पुपोष सत्या देवेष्वाशिषो जगाम॥
उग्र ऋषि अगस्त्य ने अनेक उपायों का उद्भावन करके, बहुत पुत्रों और बल की इच्छा करके काम और तप दोनों वरणीय वस्तुओं का पालन किया और देवताओं से यथार्थ आशीर्वाद को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 1.179.6]
विभिन्न साधनाओं से अगस्त्य ऋषि ने अनेक संतान और बल की कामना से दोनों वरणीय वस्तुओं को पुष्ट किया और देवताओं से सच्चे आशीर्वाद को प्राप्त किया।
August Rishi used various ways & means, desired many sons and strength, accomplished-attained both sex and ascetics, having blessings of the demigods.
 
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
skbhardwaj1951@gmail.com

Tuesday, May 19, 2015

HEAVEN-EARTH द्यावा-पृथ्वी (RIG VED ऋग्वेद 1-6)

HEAVEN-EARTH द्यावा-पृथ्वी
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। 
पिपृतां नो भरीमभिः॥
अति विस्तारयुक्त पृथ्वी और द्युलोक हमारे इस यज्ञ कर्म को अपने-अपने अंशों द्वारा परिपूर्ण करें। वे भरण-पोषण करनेवाली सामग्रियों (सुख-साधनों) से हम सभी को तृप्त करें।[ऋग्वेद 1.22.13]
श्रेष्ठ आकाश और पृथ्वी ऐसे यज्ञ को सींचने की अभिलाषा करते हुए हमको पोषण शक्ति प्रदान करें।
Let the earth and the heavens add up to-contribute to our Yagy through their share and satisfy us by providing us with nourishment and amenities.
तयोरिद्‍घृतवत्पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः। गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे॥
गन्धर्व लोक के ध्रुवस्थान में आकाश और पृथ्वी के मध्य में अवस्थित घृत के समान (सार रूप) जलों (पोषक प्रवाहों) को ज्ञानी जन अपने विवेक युक्त कर्मों (प्रयासों) द्वारा प्राप्त करते हैं।[ऋग्वेद 1.22.14]
पृथ्वी और आकाश के मध्य गन्धर्वों के स्थान में ज्ञानी जन ध्यान पूर्वक घृत के समान जल पीते हैं।
The enlightened receives the extracts like the Ghee between the earth & sky at a fixed place (Dhruv Sthan) by means of their deeds aided with prudence.
स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथः॥
हे पृथ्वी देवी! आप सुख देने वाली, बाधा हरने वाली और उत्तमवास देने वाली हैं। आप हमें विपुल परिमाण में सुख प्रदान करें।[ऋग्वेद 1.22.15]
हे पृथ्वी! तुम सुखदायिनी, विघ्न रहित और श्रेष्ठ वास देने वाली हो तथा हमको सहारा प्रदान करो।
Hey mother earth! You give us comforts-pleasure, remove our troubles and provide excellent place to live. Please grant us comforts in sufficient quantity.
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (159) ::  ऋषि :- दीर्घतमा, देवता :- द्यावा-पृथ्वी, छन्द :- जगती।
प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी ऋतावृधा मही स्तुषे विदथेषु प्रचेतसा। 
देवेभिर्ये देवपुत्रे सुदंससेत्था धिया वार्याणि प्रभूषतः॥
यज्ञ वर्द्धक, महान् और यज्ञ कार्य में चैतन्यकारी द्यावा-पृथिवी की मैं विशेष रूप से स्तुति करता हूँ। यजमान उनके पुत्र स्वरूप हैं। उनके कर्म को मनोवांछित धन प्रदान करते हैं। उनके कर्म सुन्दर हैं। अनुग्रह करते हुए वे यजमानों को मनोवांछित धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 1.159.1]
अनुष्ठानों को पुष्ट करने वाली, ज्ञान वर्द्धिनी क्षितिज धरा की मैं प्रार्थना करता हूँ। यजमान उनके पुत्र हैं। वे देवगण के साथ वरणीय धनों से धन देती हैं।
I specially pray to the great earth and the sky, who enhance-boost Yagy and make us conscious. The Ritviz-hosts are like their sons. They provide sufficient money to promote their endeavours. Their endeavours like granting money to the Ritviz are appreciable-beautiful.
उत मन्ये पितुरद्रुहो मनो माआर्पहि स्वतवस्तद्धवीमभिः। 
सुरेतसा पितरा भूम चक्रतुरुरु प्रजाया अमृतं वरीमभिः॥
मैंने आह्वान मंत्र द्वारा निर्द्रोह और पितृ स्थानीय द्युलोक के उदार और उत्तम मन को जाना है। मातृ स्थानीय पृथ्वी के मन को भी जाना है। पिता-माता (द्यावा-पृथ्वी) अपनी शक्ति से पुत्रों का भली-भाँति रक्षण करते हुए उन्हें प्रगतिशील बनाया।[ऋग्वेद 1.159.2]
मैं क्षितिज रूप पिता और धरा रूप माता के महत्व का चिन्तन करता हूँ। उन अत्यन्त पुरुषार्थियों ने जीवों को प्रकट किया और अन्नों को निर्मित किया।
I have recognised the earth & the sky (horizon) due to meditation. I have understood that the earth is mother. Its the parents (mother & father) who make their progeny progressive-efficient.
Food grains are produced over the earth to feed-nurture the living beings. For the Hindu, earth is the mother.
ते सूनवः स्वपसः सुदंससो मही जजुर्मातरा पूर्वचित्तये। 
स्थातुश्च सत्यं जगतश्च धर्मणि पुत्रस्य पाथः पदमद्वयाविनः॥
आपकी सन्तान, सुकर्मा और सुदर्शन प्रजायें आपके पहले के अनुग्रह को स्मरण करके आपको महान् और माता कहकर जानते हैं। पुत्र स्वरूप स्थावर और जंगम पदार्थ द्यावा-पृथ्वी के अतिरिक्त और किसी को नहीं जानते। आप उनकी रक्षा के लिए अबाध स्थान प्रदान करें।[ऋग्वेद 1.159.3]
सुदर्शन :: प्रिय, दिलकश, आकर्षक; comely, nice-looking.
अनुग्रह :: दया, सुघड़ता, इनायत, सुंदर ढंग, श्री, पक्षपात, अनुमति, अति कृपा, पत्र, इनायत; grace, favour, graciousness.
हे आसमान पृथ्वी! श्रेष्ठ कर्म वाले कुशल पुत्र रूपी प्रजागण तुम्हें जननी मानते हैं। तुम स्थावर, जंगम में सत्य स्थापित करने के लिए सूर्य के स्थान की रक्षा करते हो।
Your progeny and the pious, comely, nice looking populace remember your grace earlier and consider you as a great mother. The immovable-stationary and movable living beings do not know any one except the horizon and the earth. Please make sufficient arrangements-space for their protection.
ते मायिनो ममिरे सुप्रचेतसो जामी सयोनी मिथुना समोकसा। 
नव्यंनव्यं तन्आपा तन्वते दिवि समुद्रे अन्तः करेंयः सुदीतयः॥
द्यावा-पृथ्वी सहोदरा भगिनी और एक स्थान पर रहने वाले जोड़े हैं। वे प्रज्ञायुक्त और चैतन्यकारी हैं। किरणें उनका विभाग करती हैं। अपने कार्य में निरत और सुप्रकाशित रश्मियाँ द्योतमान अन्तरिक्ष के बीच नये-नये सूत्रों को विस्तारित करती हैं।[ऋग्वेद 1.159.4]
प्रज्ञायुक्त :: prudent, wise or judicious in practical affairs, sagacious, discreet or circumspect, sober. 
आकाश और धरती एक स्थान से उत्पन्न हुए सहोदरा हैं। वे प्रजा से युक्त हैं। रश्मियाँ उनका विभाजन करती हैं और नए सूत्रों को प्रकट करती हैं।
The sky-horizon and the earth are twins and live in a pair. They are conscious and discreet. Rays of light divide-differentiate between them. They perform their assigned duties and give rise to new equations-compositions.
तद्राधो अद्य सवितुर्वरेण्यं वयं देवस्य प्रसवे मनामहे। 
अस्मभ्यं द्यावापृथिवी सुचेतुना रयिं धत्तं वसुमन्तं शतग्विनम्॥
आज सविता देवता की आज्ञा के अनुसार उस वरणीय धन को चाहते हैं। हमारे ऊपर द्यावा-पृथ्वी अनुग्रह करके गृह आदि और शत-शत गौओं से युक्त धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 1.159.5]
वे द्यावा-धरा! सविता की शिक्षा में स्थिर तुमसे हम उस अत्यन्त श्रेष्ठ धन की विनती करते हैं तुम हमको श्रेष्ठ निवास तथा गवादि परिपूर्ण समृद्धि को प्रदान करो। 
We wish to acquire the wealth as per the directives of Savita. Let Both sky and the earth favour us and grant house, hundreds of cows and riches.  
द्यावा पृथ्वी :: आकाश और पृथ्वी को भी देव वर्ग में रखा गया है। इनका आह्वान एक साथ जोड़कर ही किया गया है। पृथ्वी का ऋग्वेद की तीन ऋचाओं में स्वतंत्र वर्णन है, पर धौः का अलग से वर्णन नहीं मिलता। ये दोनों पितरा-मातरा (पिता-माता) के रूप में भी संबोधित किए गए हैं। द्यावा-पृथ्वी को सृष्टि के जीवों के सृजन और पालन-पोषण कर्ता के रूप में माना गया है। ऋचाओं में कहा गया है कि ये द्यावा पृथ्वी पूरी सृष्टि को समृद्धि देते हैं। वे पवित्र हैं।
शक्ति उपासना का मूल आधार आद्य ग्रन्थ ऋग्वेद की द्यावा-पृथ्वी हैं, जिसमें पृथ्वी स्त्री मानी गई है और आकाश पुरुष।
ऋग्वेद ने वरूण देव जिन्होंने विस्तृत द्यावा-पृथ्वी की स्थापना की, इन्होंने ही आकाश और नक्षत्रों को प्रेरित कर पृथ्वी को प्रशस्त किया, को पहिया युक्त कहा है। 
द्युलोक से ऊपर जो कुछ भी है और पृथ्वी से नीचे जो कुछ भी है जिसे हम द्यावा-पृथ्वी कहते हैं।
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (160) ::  ऋषि :- दीर्घतमा, देवता :- द्यावा-पृथ्वी, छन्द :- जगती।
ते हि द्यावापृथिवी विश्वशंभुव ऋतावरी रजसो धारयत्करी।  
सुजमन्मनी घिषणे अन्तरीयते देवो देवी धर्मणा सूर्यः शुचिः॥
द्यावा-पृथ्वी संसार के लिए सुख दायिनी, यज्ञवती, जल उत्पन्न करने के लिए चेष्टा युक्त, सुजाता और अपने कार्य में निपुण हैं। द्योतमान्-अग्नि और शुचि सूर्य द्यावा-पृथ्वी के मध्य में अपने-अपने कार्यों द्वारा सदैव गमन करते हैं।[ऋग्वेद 1.160.1]
सुजाता :: सुजाता ने भगवान बुद्ध को भोजन कराया था, सुजाता अष्टावक्र ऋषि की माता थीं, उत्तम कुलोत्प्न्न; name of the woman who offered meals to Bhagwan Budh, name of Rishi Ashtawakr's mother, well born.
अंतरिक्ष को अग्नि में धारण करने वाली क्षितिज धरा सभी को सुख प्रदान करने वाली है। उनके मध्य सूर्य प्रतिदिन नियम पूर्वक विचरणशील हैं।
The combination of earth and the horizon-sky are meant to provide comforts, create showers-rains, inspire for Yagy, active, well born and skilled in their job. The fire-Agni and the Sun keep on cycling between them.
उरुव्यचसा महिनी असश्चता पिता माता च भुवनानि रक्षतः। 
सुधृष्टमे वपुष्येन रोदसी पिता यत्सीमभि रूपैरवासयत्॥
विशाल, विस्तीर्ण और परस्पर वियुक्त माता-पिता (द्यावा-पृथ्वी) प्राणियों की रक्षा करते है। मनुष्यों के मंगल के लिए ही द्यावा-पृथ्वी मानो सचेष्ट हैं, क्योंकि पिता समस्त पदार्थों को रूप प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 1.160.2]
अत्यन्त व्यापक और विशाल क्षितिज और धरा पिता और जननी रूप से सभी लोकों का पोषण करते हैं, जैसे पिता अपने बालक को महान वस्त्रों से आच्छादित करता है।
The wide-vast corelated horizon & the earth support the living beings. They act for the well being of the organism like the father who provide all materials-commodities to the progeny. 
स वह्निः पुत्रः पित्रोः पवित्रवान्पुनाति धीरो भुवनानि मायया। 
धेनुं च पृश्निं वृषभं सुरेतसं विश्वाहा शुक्रं पयो अस्य दुक्षत॥
पिता-माता (द्यावा-पृथ्वी) के पुत्र सूर्य हैं। वे धीर और फलदाता हैं। अपनी बुद्धि से वे समस्त भूलोक को प्रकाशित करते हैं। वे शुक्ल वर्ण धेनु (पृथ्वी) और सेचन कार्य में समर्थ वृष (द्युलोक) को भी प्रकाशित करते हैं। वे द्युलोक से निर्मल दूध दुहते हैं।[ऋग्वेद 1.160.3]
धीर :: शांत स्वभाव वाला, नम्र, विनीत; passionless, halcyon.
वह माता-पिता को भार वहन करने वाला सूर्य अपने पराक्रम से संसार को पवित्र करता है। वह अनेक रंगों वाली धरती रूपी गौ और पौरुष युक्त आसमान रूपी वृषभ करता हुआ धरती से रस रूपी दुग्ध का दोहन करता है।
Sun is the son of the earth and the sky. He is passionless-halcyon and grant rewards lighten the earth. He nourish and lighten the earth and the heavens. He milch the heavens.
Its the Sun, who is essential for life over the earth.
अयं देवानामपसामपस्तमो यो जजान रोदसी विश्वशंभुवा। 
वि यो ममे रजसी सुक्रतूययाजरेभिः स्कम्भनेमिः समानृचे॥
वे देवों में देवोत्तम और कर्मियों में कर्म श्रेष्ठ हैं। उन्होंने सर्व सुखदाता द्यावा-पृथ्वी को प्रकट किया और प्राणियों के सुख के लिए द्यावा-पृथ्वी को विभक्त करके सुदृढ़ खूँटे में इन्हें स्थिर कर रखा है।[ऋग्वेद 1.160.4]
देवताओं में महान परमात्मा महान कर्मा है। उसने क्षितिज धरा को रचित किया। उसी ने अपनी प्रजा से दोनों जगत को नापा और जीर्ण न होने वाले स्तम्भों पर टिका दिया। 
The Almighty in the form of Sun (Sury Narayan) is best amongest the performers. Its he who made the horizon & the earth visible. Its he who provide all sorts-kinds of comforts-amenities and divided the sky & the earth and makes them stable.
The Sun is at the core of the planetary system. Its gravitational force keep the solar system well knit-tied and functional. Newton's laws and Kepler's laws just describe this phenomenon. Veds describe the various forces at length.
ते नो गृणाने महिनी महि श्रवः क्षत्रं द्यावापृथिवी धासथो बृहत्ये। 
येनाभि कृष्टीस्ततनाम विश्वहा पनाय्यमोजो अस्मे समिन्वतम्॥
हे द्यावा-पृथ्वी! हम आपकी स्तुति करते हैं। आप महान् है, हमें प्रभूत अन्न और बल प्रदान करें, जिससे हम सदैव पुत्रादि प्रजा का विस्तार करें। हमारे शरीर में प्रशंसनीय बल की वृद्धि करें।[ऋग्वेद 1.160.5] 
हे क्षितिज धरा! तुम हमारे लिए श्रेष्ठ समृद्धि और शक्ति को धारण करो जिससे धन प्रजाओं का विस्तार हो।
Hey horizon and the earth! We pray-worship you. You are great. Grant us nourishing food grains and strength-power, so that we are able to extend our family lineage-lining. Add appreciable might to our bodies.
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (185) ::  ऋषि :- अगस्त्य, देवता :- द्यावा-पृथिवी,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
कतरा पूर्वा कतरापरायोः कथा जाते करेंयः को वि वेद। 
विश्वं त्मना बिभृतो यद्ध नाम वि वर्तते अहनी चक्रियेव॥
हे कवि गण  धुलोक और पृथ्वी लोक में पहले कौन उत्पन्न हुआ है, पीछे कौन उत्पन्न हुआ है, यह किसलिए उत्पन्न हुए हैं, यह बात कौन जानता है? दिन और रात्रि का निर्माण करने वाले दोनों समस्त संसार को धारण कर चक्र के समान घूमते अर्थात् भ्रमण करते रहते हैं।[ऋग्वेद 1.185.1]
हे ऋषियों! आकाश और पृथ्वी में कौन पहले और कौन बाद में रचित हुआ? इस बात को जानने वाला कौन है? ये दोनों अपने आप समस्त पदार्थों को धारण करती और दिन-रात के तुल्य विचरण करती है, वह न चलने वाली, बिना पैरों के आकाश पृथ्वी पैरों वाले शरीर धारियों को माता-पिता के समान गोद में धारण करती है। 
Hey Rishi Gan-sages! Who was born first, the earth or the sky? What is purpose behind their origin? Both of them keep on revolving bearing-supporting the entire-whole universe. 
भूरिं  द्वे अचरन्ती चरन्तं पद्वन्तं गभमपदी दधाते। 
नित्यं न सूनुं पित्रोरुपस्थे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्॥
पाद रहित और अविचल द्यावा पृथ्वी पादयुक्त तथा सचल गर्भस्थित प्राणियों को माता-पिता की गोद में पुत्र की तरह धारण करते हुए हमें पापों से बचायें।[ऋग्वेद 1.185.2]
हे आकाश पृथ्वी! हमारी डर से सुरक्षा करो। अक्षय, शुद्ध प्रकाशित, अमर, पूजनीय, धन की प्रार्थना करता हूँ। स्तोता के लिए उसे उत्पन्न करो और भयों से हमारी सुरक्षा करो।
Free from legs-rigid (immovable looking) sky & the earth bear all stationary & movable living beings-organism like mother & father protecting us from all fears-sins.  
अनेहो दात्रमदितेरनर्वं हुवे स्वर्वदवधं नमस्वत्। 
तद्रोदसी जनयतं जरित्रे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्॥
हम माता अदिति से पाप रहित, अक्षीण, हिंसा रहित, अन्न युक्त और स्वर्ग तुल्य धन के लिए प्रार्थना करते हैं। द्यावा पृथ्वी स्तोता यजमान के लिए वही धन उत्पन्न करते हुए उन्हें महापापों से बचावें।[ऋग्वेद 1.185.3]
दिन-रात्रि परिपूर्ण, देवों में पीड़ा रहित, अन्न से युवा, सुरक्षा वाली, अद्भुत गुणों से परिपूर्ण आकाश पृथ्वी मेरे अनुकूल रहें।
We request-pray to Dev Mata (mother of demigods-deities) Aditi for sinless, violence free, possessing food grains heaven like riches. Earth & sky create such wealth for the Stota hosts, Ritviz. 
अतप्यमाने अवसावन्ती अनु ष्याम रोदसी देवपुत्रे। 
उभे देवानामुभयेभिरह्नां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्॥
हम प्रकाशमान दिन और रात्रि के उभयविध धन के लिए दुःख-रहित और अन्न द्वारा तृप्तिकारी धावा पृथ्वी का अनुगमन कर सकें। हे द्यावा पृथ्वी! आप हमें महापापों से बचायें।[ऋग्वेद 1.185.4]
हे आकाश पृथ्वी! भयानक डरों से हमारी सुरक्षा करो। संग चलने वाली, सदैव तरुण, तुल्य सोम परिपूर्ण, भगिनी भूत, क्षितिज-धरा, माता-पिता की गोद रूप है।
Let us earn-create wealth-assets through day & night, which is free from pains-sorrow following the sky & the earth. Hey Sky & Earth! Protect us from sins-fears.
संगच्छमाने युवती समन्ते स्वसारा जामी पित्रोरुपस्थे। 
अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्॥
परस्पर संसक्त, सदा युवा, समान सीमा से संयुक्त, भगिनी भूत और मित्र सदृश द्यावा पृथ्वी माता-पिता के क्रोड स्थित और प्राणियों के नाभि-स्वरूप, जल का घ्राण करते हुए हमें महापाप से बचायें।[ऋग्वेद 1.185.5]
क्रोड़ :: गोद; lap.
हे अम्बर-धरा! भयावह डर से हमारी सुरक्षा करो। विस्तीर्ण बाल स्थान, महान रक्षाओं से युक्त आकाश और धरती का देवगणों की प्रसन्नता के लिए आह्वान करता हूँ। यह आश्चर्य रूप वाले जल को धारण करने में सक्षम हैं। यह हमारी महान पाप में रक्षा करें।
Joined-connected together, always young, having common boundaries, like sister and friend; the sky & the earth protect us, from great dangers, sins-fears, holding us in their lap.
उर्वी सद्मनी बृहती ॠतेन हुवे देवानामवसा जनित्री। 
दधाते ये अमृतं सुप्रतीके द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्॥
देवों की प्रसन्नता के लिए मैं विस्तीर्ण निवास भूत, महानुभाव और शस्यादि-समुत्पादक छावा पृथ्वी को यज्ञ के लिए बुलाता हूँ। इनका रूप आश्चर्यजनक है और ये जल धारण करते है। हे द्यावा पृथ्वी! हमें महापाप से बचावें।[ऋग्वेद 1.185.6]
प्रतीत्य समुत्पाद :: अविद्या, संस्कार विज्ञान, नामरूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भय, जाति और दुःख से बारहों पदार्थ जो उत्तरोत्तर संबद्ध हैं और क्रमात् एक दूसरे से उत्पन्न होते हैं।
समुत्पाद :: having same origin.
मैं इस यज्ञ में विस्तीर्ण, अनेक रूपवाली, असीमित आकाश और पृथ्वी की पूजा करता हूँ। यह सौभाग्यवती सभी पदार्थ और मनुष्यों को धारण करती है। हे आकाश-पृथ्वी! हमारी महापाप से सुरक्षा करो।
I invite the sky & earth for Yagy, for the sake of the demigods-deities, over this vast living abode bearing greenery, having the same-common origin. They have amazing figures (shapes & sizes) and they bear water. Hey earth & the sky! protect us from sins-fears, worries.
उर्वी पृथ्वी बहुले दूरेअन्ते उप ब्रुवे नमसा यज्ञे अस्मिन्द। 
दधाते ये सुभगे सुप्रतूर्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्॥
महान् पृथु, अनेक आकारों से विशिष्ट और अनन्त द्यावा पृथ्वी की यज्ञस्थल में मैं नमस्कार मंत्र द्वारा स्तुति करता हूँ। हे सौभाग्यवती और उद्धार कुशला द्यावा पृथ्वी! आप संसार को धारण करके हमें महा पाप से बचावें।[ऋग्वेद 1.185.7]
हे आकाश-पृथ्वी! देवगण, बन्धुगण, जमाता आदि के प्रति हमने जो पाप किये हों वे इस श्लोक से अनुष्ठान द्वारा दूर हो जायें। तुम हमको महापाप से बचाओ।
Hey vivid forms acquiring Sky & Earth! I salute you with the help of prayer Mantr-hymns, in the Yagy conducted by king Prathu. You protects us from the sins of high magnitude.
देवान्वा यच्चकृमा कच्चिदागः सखायं वा सदमिज्जास्पतिं वा। 
इयं धीर्भूया अवयानमेषां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्॥
हम देवों के पास जो सदा अपराध करते हैं, मित्र और जामाता के प्रति जो सब अपराध करते हैं, हमारा वह यज्ञ उन सब पापों को दूर करे।[ऋग्वेद 1.185.8]
मनुष्यों की भलाई करने वाली अम्बर धरा मुझे शरण प्रदान करें और  पोषण करती हुई मेरे संग रहें।
Let our Yagy vanish our sins pertaining to the demigods-deities, friends other people. 
उभा शंसा नर्या मामविष्टामुभे मामूती अवसा सचेताम्। 
भूरि चिदर्य: सुदास्तरायेषा मदन्त इषयेम देवाः॥
स्तुति योग्य और मनुष्यों के हितकर द्यावा पृथ्वी मुझे आश्रय प्रदान करे। आश्रयदाता द्यावा पृथ्वी आश्रय देने के लिए मेरे साथ मिलें। हे देवो! हम आपके स्तोता हैं, अन्न द्वारा आपको तृप्त करते हुए प्रचुर दान के लिए प्रचुर अन्न की कामना करते हैं।[ऋग्वेद 1.185.9]
मनुष्यों की भलाई करने वाली अम्बर धरा मुझे शरण प्रदान करें और  पोषण करती हुई मेरे संग रहें। हे देवगण! हम तुम्हारे स्तोता हवि रूप अन्न देकर तुम्हें प्रसन्न करते हैं और दान के लिए धन मांगा करते हैं।
Let the sky & earth shelter us who are beneficial to the revered-honourable people. Let both earth &sky join together to protect me. Hey demigods-deities (Sky & earth), we are your worshipers praying you for enough food grains for self and donation. 
ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः। 
पातामवद्याद्दुरितादभीके पिता माता च रक्षतामवोभिः॥
पिता रूप आकाश और माता रूप पृथ्वी अपने रक्षा-साधनों द्वारा हमें संरक्षित करें। अत्यन्त समीप रहने वाले ये दोनों हर प्रकार के अनिष्टों से (सदैव) हमारी रक्षा करते हुए तृप्तिकर वस्तु द्वारा हमें पालित करें।[ऋग्वेद 1.185.10] 
मैंने आसमान और पृथ्वी के लिए सत्य का कथन किया है। आसमान पृथ्वी निन्दा और अनिष्ट से हमारे रक्षक हों और माता-पिता के समान हमारा पालन करें।
Father & mother figure  sky & the earth should protect us through their all means. Let them provide us with resources granting us satisfaction.
इदं द्यावापृथिवी सत्यमस्तु पितर्मातर्यदिहोपब्रुवे वाम्। 
भूतं देवानामवमे अवोभिर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्॥
हे माता और हे पिता! आपके लिए इस यज्ञ में मैंने जो स्तोत्र पढ़े हैं, उन्हें सार्थक करें। हे द्यावा पृथ्वी! आश्रयदान द्वारा आप स्तोताओं के निकटवर्ती बनें, ताकि हम अन्न, बल और दीर्घायु प्राप्त कर सकें।[ऋग्वेद 1.185.11] 
हे पिता-माता रूप आकाश पृथ्वी! मैंने जो कुछ तुम्हारी भलाई के लिए कहा है, वह सत्य हो। तुम देवों से सत्य सुरक्षा करने वाली बनो। हम अन्न शक्ति और दानमयी स्वभाव को ग्रहण करें।
Hey parents figures sky & the earth! Make the Strotr useful I have read in this Yagy in your honour. You should be close to those who worship you (sing Strotr for seeking your favours) so that we get food grains, strength and longevity.
ऋषि :- 
अस्य मे द्यवापृथिवी ऋतायतो भूतमवित्री वचसः सिषासतः। 
ययोरायुः प्रतरं ते इदं पुर उपस्तुते वसूयुर्वां महो दधे॥
हे द्यावा पृथिवी! जो स्तोता यज्ञ और आपको प्रसन्न करने की इच्छा करता है, उसके आप आश्रयदाता बनें। आपका अन्न सर्वापेक्षा उत्कृष्ट है। सभी द्यावा पृथिवी की स्तुति करते हैं। अन्न कामी होकर मैं महास्तोत्र द्वारा आपकी प्रार्थना करूँगा।[ऋग्वेद 2.32.1]
हे धावा-धरा! जो वंदना करने वाला, अनुष्ठान कर्म तुमको हर्षित करने की अभिलाषा करें, उसको शरण प्रदान करो। तुम्हारा अन्न महान हैं। सभी तुम्हारी प्रार्थना करते हैं। मैं भी महान श्लोक से तुम्हारी वंदना करूँगा। 
Hey space & earth! You grant shelter to the host, Ritviz who wish to appease you by conducting Yagy. Your food grains are superior to anyone else. Everyone worship you. I will request you for the sake of food grains with the help-recitation of an ultimate-excellent verse-Shlok, hymn.
मा नो गुह्या रिप आयोरहन्दभन्मा न आभ्यो रीरधो दुच्छुनाभ्यः। 
मा नो वि यौः सख्या विद्धि तस्य नः सुम्नायता मनसा तत्त्वेमहे॥
हे इन्द्र देव! शत्रु की गुप्त माया हमें दिन या रात में मारने न पावें। हमें कष्ट दात्री शत्रु सेना के वश में न करना। हमारी मैत्री न छोड़ना। हृदय में हमारे सुख की आकांक्षा करके हमारी मित्रता की स्मृति करना। आपसे हम यही कामना करते हैं।[ऋग्वेद 2.32.2]
हे इन्द्र देव! दिन या रात्रि में कभी भी शत्रु हम पर हावी न हो सके। त्रास देने वाले शत्रु सेना के वश में हमकों न करना। हमारी मित्रता को कभी समाप्त न करना। हमारी मित्रता को याद करते हुए हमें सुख प्रदान करना। हमारी इतनी सी ही मनोकामना है।
Hey Indr Dev! Do not let the enemy over power us. His illusionary powers should not kill us either during the day or night. Do not desert us. Recognise us as a friend with the desire of our welfare. This is our desire. 
अहेळता मनसा श्रुष्टिमा वह दुहानां धेनुं पिप्युषीमसश्चतम्।
पद्याभिराशुं वचसा च वाजिनं त्वां हिनोमि पुरुहूत विश्वहा॥
हे इन्द्र देव! प्रसन्न चित्त से सुखकारी, दुग्धवती, मोटी और मजबूत गाय को ले आना। आपको सब बुलाते हैं। आप बहुत तीव्र चलते हैं। आप द्रुतभाषी है। मैं दिन-रात आपकी स्तुति करता हूँ।[ऋग्वेद 2.32.3]
हे इन्द्रदेव! मन में प्रसन्न हुए तुम दूध देने वाली हष्ट-पुष्ट धेनु को लेकर पधारना। तुम्हारा हम सभी आह्वान करते हैं, तुम द्रुतमान एवं द्रुतभाषी हो। मैं दिन रात्रि पूजन करता हूँ।
Hey Indr Dev! Come happily associated with fat milch cows. Everyone invite you. You move very fast. I recite prayers devoted to you, through out day & night.
राकामहं सुहवां सुष्टुती हुवे शृणोतु नः सुभगा बोधतु त्मना। 
सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्॥
मैं उत्कृष्ट स्तोत्र द्वारा आह्वान योग्य राका एवं पूर्णिमा देवी को बुलाता हूँ। वे सुभग हैं, हमारा आह्वान श्रवण करे। वे स्वयं हमारा अभिप्राय जानकर अच्छेद्य सूची के द्वारा हमारे कर्म को पूर्ण करें। वे हमें अक्रान्त, बहुधनवान् और वीर्यवान् पुत्र प्रदान करें।[ऋग्वेद 2.32.4]
सुभग :: भाग्यवान्, समृद्ध और सुखी; beautiful, lovely.
आह्वान के योग्य पूर्ण रात्रि का मैं आह्वान करता हूँ। वे शोभनीय हमारे आह्वान को सुनें। वे हमारी इच्छा को समझकर हमारे कर्मों को सुगठित करें और हमें असंख्य धन से परिपूर्ण पुत्र प्रदान करें।
I invoke the Raka, with the help of excellent Strotr-hymn. She is lucky-auspicious to us. Let her listen-respond to our requests. She should understand our purpose and accomplish our desires. She should grant us several sons along with wealth i.e., excellent and opulent descendants.  
  यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि। 
ताभिनें अद्य सुमना उपागहि सहस्रपोषं सुभगे रराणा॥
हे ऐश्वर्य शालिनि राका देवी! आप जिस सुन्दर अनुग्रह में हव्य दाता को धन देती है, आज प्रसन्न चित्त से उसी अनुग्रह के साथ पधारें।  हे शोभन भाग्यवती! हजारों प्रकार से आप हमारी पुष्टि करें।[ऋग्वेद 2.32.5]
हे रात्रि देवी! तुम अपनी कृपा से ही हविदाता को श्रेष्ठ धन प्रदान करती हो। प्रसन्न मन से कृपा पूर्वक हमारे यहाँ पधारी हे सुन्दर भाग्यवान! तुम अनेक प्रकार से हमारी रक्षा करने वाली बनो।
Hey grandeur possessing Raka Devi (Goddess-deity of night)! Please come with the well wishes, grant wealth to the host-Ritviz making offerings to you. Hey glorious deity! Nourish us through thousands of means.  
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा। 
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्डि नः॥
स्थूल जाता सिनीवाली! (अमावस्या), आप देवों की बहन है। प्रदत्त हव्य की सेवा करें। हमें अपत्य प्रदान करें।[ऋग्वेद 2.32.6]
हे स्थूल अन्धकार परिपूर्ण रात्रि! तुम देवताओं की बहिन हो। हमारे को प्राप्त करो और हमको संतान प्रदान करो।
Hey dark night Amavasya! You are a sister of the demigods-deities. Accept our offerings and grant us progeny. 
या सुबाहुः स्वङ्गुरिः सुषूमा बहुसूवरी। 
तस्यै विश्पल्यै हविः सिनीवाल्यै जुहोतन॥
हे याजकों! जो सिनीवाली देवी उत्तम भुजाओं और सुन्दर अंगुलियों वालों, श्रेष्ठ पदार्थों व उत्तम प्रजाओं की जनक हैं, उन प्रजापालक सिनीवाली देवी के लिए हविष्यान्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 2.32.7]
घोर अंधकार परिपूर्ण रात्रि शोभनीय बाहु और उंगलियों वाली महान प्रकाट्य और बहु प्रजनन से परिपूर्ण हैं। संसार की सुरक्षा करने वाली उस देवी के लिए हवि प्रदान करो।
Hey worshipers! Let us make offerings to the Sini Vali Devi (Night), who grow excellent materials and protect the excellent beings; possessing beautiful fingers and nurturing the living beings. 
या गुङ्गुर्या सिनीवाली या राका या सरस्वती। 
इन्द्राणीमह्व ऊतये वरुणानीं स्वस्तये॥
जो गुङ्गु जो सिनीवाली, जो राका, जो सरस्वती आदि देवियों है, हम अपने संरक्षण के कामना से उनका आवाहन करते हैं। इन्द्राणि और वरुणानि देवियों को भी स्वतः कल्याण की कामना के लिए आवाहित करते हैं।[ऋग्वेद 2.32.8]
गुंगू, कुहू देव पत्नी अंधकार वाली रात और सरस्वती देवी का मैं आह्वान करता हूँ तथा सुख कामना से वरुणाग्नि का आह्वान करता हूँ।
We invoke the deities Gungu, Sini Vali, Raka, Saraswati for our protection. We invoke Indrani & Varunai too, for our welfare.
प्रेतां यज्ञस्य शंभुवा युवामिदा वृणीमहे। अग्निं च हव्यवाहनम्॥
हे यज्ञ के सुख-सम्पादक द्यावा-पृथ्वी! आप आवें। हम आपकी प्रार्थना करते हैं। हम हव्य वाहन अग्निदेव की भी प्रार्थना करते है।[ऋग्वेद 2.41.19]
हे धरा अम्बर! तुम अनुष्ठान की सुसम्पादिका हो। इस अनुष्ठान में पधारो। हम तुम्हारी वंदना करते हैं तथा हविवाहक अग्निदेव का भी पूजन करते हैं। 
Hey comfort accomplishing horizon and earth! Come to us. We are praying to you. We pray to Agni Dev too, who is the carrier of the offerings in the Yagy. 
द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम्। यज्ञं देवेषु यच्छताम्॥
द्यावा-पृथ्वी स्वर्ग आदि के साधक सौर देवों की ओर जाने वाली हैं। हमारे इस यज्ञ को देवों के पास ले जावें।[ऋग्वेद 2.41.20]
हे आसमान धरती! तुम बैकुण्ठ आदि की साधना सफल करने वाली हो और देवताओं की ओर जाया करती हो। हमारे इस यज्ञ को देवगणों के समीप पहुँचाओ।
Hey sky & the earth you accomplishes the desires-efforts for heavens & Vaekunth Lok. Carry our Yagy to the demigods-deities.
आ वामुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु यज्ञियाः। इहाद्य सोमपीतये॥
हे द्यावा-पृथ्वी! आपस में सम्बन्ध रहने वाले आप द्वेष और शत्रुता से मुक्त हों, आज इस यज्ञ में आने वाले देवता सोमरस का पान करने के लिए आपके पास विराजित हों।[ऋग्वेद 2.41.21]
हे अम्बर धरा! तुम द्वेष और शत्रुता से पृथक रहो। इस अनुष्ठान में अग्नि वाले देवगण आज सोम पान करने हेतु तुम्हारे निकट पधारें।
Hey sky & the earth! Keeping mutual relations be free from enmity. The demigods-deities participating in this Yagy be by your side.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (38) :: ऋषि :- वामदेव,  गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, दधिक्रा,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
उतो हि वां दात्रा सन्ति पूर्वा या पूरुभ्यस्त्रसदस्युर्नितोशे।
क्षेत्रासां ददथुरुर्वरासां घनं दस्युभ्यो अभिभूतिमुग्रम्॥
हे द्यावा-पृथ्वी! दाता त्रसदस्तु राजा ने आपके समीप से बहुत धन प्राप्त करके याचक मनुष्यों को दिया, आपने उन्हें अश्व और पुत्र दिये एवं दस्युओं को मारने के लिए अभिभव समर्थ तीक्ष्ण अस्त्र प्रदान किया।[ऋग्वेद 4.38.1]
हे आकाश-पृथ्वी! त्रसदस्यु नामक दानी राजा ने तुमसे अनेक धन प्राप्त करके माँगने वालों को दिया। तुमने उसको अश्व और पुत्र प्रदान किया था तथा राक्षसों का पतन करने के लिए विरोधियों को पराजित करने वाला तीक्ष्ण शस्त्र दिया था।
Hey Heaven-sky & Earth! Donor king Trasdastu got lots of money-riches from you and gave to the needy. You gave them horses, sons and sharp weapons to kill the demons-dacoits.
उत वाजिनं पुरुनिष्षिध्वानं दधिक्रामु ददथुर्विश्वकृष्टिम्।
ऋजिप्यं श्येनं प्रुषितप्सुमाशुं चर्कृत्यमर्यो नृपतिं न शूरम्॥
गमनशील, अनेक शत्रुओं के निषेधक, समस्त मनुष्यों के रक्षक, सुन्दरगामी, दीप्ति विशिष्ट, शीघ्र गामी एवं बलवान राजा के तुल्य शत्रु विनाशक दधिक्रा (अश्व रूपी अग्नि) देव को आप दोनों (द्यावा-पृथ्वी) को धारित करते है।[ऋग्वेद 4.38.2]
दधिक्रा :: एक देवता जो घोड़े के आकार के माने जाते हैं, घोड़ा, अश्व; a demigod with the shape-figure of horses, horse.
अनेक शत्रुओं को रोकने वाले सभी प्राणियों के रक्षक विशेष प्रकाश वाले, द्रुतगामी, शक्तिशाली, भूमिपति के समान शत्रुओं को नष्ट करने वाले दधिक्रा को तुम दोनों ग्रहण करने वाली हो।
Both of you, the heaven & earth support the horse (fire in the form of horse) capable of vanishing-killing the enemies, fast moving, possessing beautiful movements, radiant, equivalent to a mighty king, protector of all humans.
यं सीमनु प्रवतेव द्रवन्तं विश्वः पूरुर्मदति हर्षमाणः।
प िड्भर्गृध्यन्तं मेधयुं न शूरं रथतुरं वातमिव ध्रजन्तम्॥
सब मनुष्य बलिष्ठ होकर जिस दधिक्रा देव की प्रार्थना करते हैं, वे निम्नगामी जल के तुल्य गमन शील संग्रामाभिलाषी शूर के तुल्य पद द्वारा दिशाओं के लङ्घनाभिलाषी, रथ गामी और वायु के तुल्य द्रुत गामी है।[ऋग्वेद 4.38.3]
समस्त पुरुष हर्षित होकर नीचे जाने वाले के समान, विचरण करने वाले पराक्रमी के समान पैरों से दिशाओं को पार करने वाले, रथ में चलने वाले एवं वायु के समान शीघ्र चाल वाले हैं।
All humans having acquired might pray-worship Dadhikra Dev who is like slow moving water inside the earth, braves-warriors who wish to fight, capable to moving in all directions, riding the charoite fast moving like the air.
यः स्मारुन्धानो गध्या समत्सु सनुतरश्चरति गोषु गच्छन्।
आविर्ऋजीको विदथा निचिक्यित्तिरो अरतिं पर्याप आयोः॥
जो संग्राम में एकत्री भूत पदार्थों को निरुद्ध करते हुए अत्यन्त भोग वासना से समस्त दिशाओं में गमन करते और वेग से विचरण करते हैं, जिनकी शक्ति आविर्भूत रहती हैं, वे ज्ञातव्य कर्मों को जानते हुए स्तुति कारी याजक गणों के शत्रुओं को तिरस्कृत करते हैं।[ऋग्वेद 4.38.4]
तिरस्कृत :: तुच्छ समझनेवाला; insult, despise, contempt, scorn.
घृणा करने वाला, तिरस्कारी, निंदात्मक, घृणात्मक, तिरस्कृतजो युद्ध में एकत्र हुए पदार्थों को रोकते हुए सभी दिशाओं में जाते हुए वेग से चलते हैं। जिनका बल स्वयं प्रकट होता है, वे किये जाने योग्य कर्मों के ज्ञाता स्तोता यजमानों के शत्रुओं को यशस्वी नहीं होने देते।
Those who, oppose the mingled multitude in battles, rushes eagerly, passing through the regions, whose vigour is manifestly, who, understanding what is to be known, puts to shame the adversary of the worshipers-Ritviz.
Those who block the collected goods in the war, move in all directions with high speed, their might emerges, they are aware of the endeavours of the Ritviz-worshipers and scorn-insult the enemy.
उत स्मैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु।
नीचायमानं जसुरिं न श्येनं श्रवश्चाच्छा पशुमच्च यूथम्॥
मनुष्य जिस प्रकार से वस्त्रापहारक तस्कर को देखकर चीत्कार करता है, उसी प्रकार संग्राम में शत्रु गण दधिक्रा देव को देखकर चीत्कार करते हैं। पक्षिगण जिस प्रकार नीचे की ओर आने वाले क्षुधार्त्त श्येन पक्षी को देखकर पलायन करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य अन्न और पशु यूथ के उद्देश्य से गमन करने वाले दधिक्रा देव को देखकर चीत्कार करते हैं।[ऋग्वेद 4.38.5]
जैसे लोग वस्त्र चुराने वाले चोर को देखकर चिल्लाते हैं, वैसे ही संग्राम भूमि से दधिक्रा देव को देखकर शत्रुगण चीखते हैं। जैसे नीचे की ओर आते हुए भूखे बाज को देखकर पक्षी नहीं ठहरते, वैसे ही पुरुष अन्न और पशुओं के लिए जाते हुए दधिक्रा को देखकर चीखते हैं।
The enemy start crying like those who see the cloth thief on seeing Dadhikra Dev in the war & the birds move away when they see the hungry falcon attacking them. The humans and the cattle cry on seeing Dadhikra Dev while moving for the sake of food stuff.
उत स्मासु प्रथमः सरिष्यन्नि वेवेति श्रेणिभी रथानाम्।
स्त्रजं कृण्वानो जन्यो न शुभ्वा रेणुं रेरिहत्किरणं ददश्वान्॥
वे असुर सेनाओं में जाने की अभिलाषा करके रथ पंक्तियों से युक्त होकर गमन करते हैं। वे अलंकृत है। वे मनुष्यों के हितकर अश्व के तुल्य शोभायमान हैं। वे मुखस्थित लौह दण्ड या लगाम को दाँतों से खिंचते हुए धूल-धूसरित हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.6]
वे असुर सेनाओं में जाने की इच्छा से रथों की पंक्ति के समान गमन करते हैं। वे शोभित हैं और प्राणियों का हित करने वाले अश्वों की तरह सुन्दर लगते हैं। वे मुँह में पड़ी लगाम को चबाते और पाँव से उड़ती हुई धूल को चाटते हैं।
They desire to move to the enemy army in rows of chariots. They are decorated. They are comparable to horses busy in the welfare of humans. They pull the reins placed in their mouth and covered with dust.
उत स्य वाजी सहुरिर्ऋतावा शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्ये।
तुरं यतीषु तुरयन्नृजिप्योऽधि भ्रुवोः किरते रेणुमृञ्जन्॥
इस प्रकार का वह अश्व सहनशील, अन्नवान, स्वशरीर द्वारा संग्राम में कार्य साधन करता हैं। वह ऋजुगामी और वेग गामी है। शत्रु सेनाओं के बीच में वह वेग से गमन करता है। वह धूलि को उठाकर के भ्रूदेश के ऊपर विक्षिप्त करता है।[ऋग्वेद 4.38.7]
इस तरह यह अश्व अन्नवान, सहनशील और अपने शरीर के द्वारा संग्राम कार्य को सिद्ध करता है। वह गति से चलने वाला शत्रुओं की सेनाओं में गति से दौड़ता है। वह धूल को पैरों से उड़ाकर अपनी भौहों में धारण करता है।
In this manner that tolerant horse, having food grains-stuff, utilises his body in the war. He moves straight with high speed in enemy armies. He raise the dust with his hoofs above his head-eye brows and disturb the enemy.
उत स्मास्य तन्यतोरिव द्योर्ऋघायतो अभियुजो भयन्ते।
यदा सहस्रमभि षीमयोधीदुर्वर्तुः स्मा भवति भीम ऋञ्जन्॥
युद्धाभिलाषी लोग दीप्तिमान शब्दकारी वज्र के तुल्य हिंसाकारी दधिक्रा देव से भयभीत होते हैं। जब वे चारों ओर हजारों के ऊपर प्रहार करते हैं, तब वे उत्तेजित होकर भयंकर और अजेय हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.8]
अजेय :: असामान्य, अदम्य, अनभ्यस्त, ग़ैरमामूली, अपराजेय, न जीते जाते योग्य, दुर्गम, दुस्तर, अलंघ्य; invincible, insurmountable, unbeaten.
युद्ध की इच्छा करने वाले प्राणी निनाद करने वाले उज्जवल वज्र के समान घातक दधिक्रा से भयभीत होते हैं। जब वे सभी ओर से वार करते हैं तब वे महाबलशाली हो जाते हैं। उस समय उन्हें कोई रोक नहीं सकता।
People engaged in war are afraid of Dadhikra Dev due to the sound like Vajr created by him. He become furious and invincible when he strikes thousands of  enemies from  four directions.
उत स्मास्य पनयन्ति जना जूतिं कृष्टिप्रो अभिभूतिमाशोः।
उतैनमाहुः समिथे वियन्तः परा दधिक्रा असरत्सहस्रैः॥
मनुष्यों की अभिलाषा को पूर्ण करने वाले एवं वेगवान दधिक्रा देव के अभिभव कारक वेग की प्रार्थना मनुष्य गण करते हुए कहते हैं कि ये दधिक्रा देव हजारों शत्रुओं को भी पराभूत करके आगे बढ़ जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.9]
मनुष्यों की कामना पूर्ण करने वाले, अत्यन्त गति से परिपूर्ण दधिक्रा देव के विजयोल्लास से परिपूर्ण वेद की वंदनाकारी प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि रिपु पराजित होगा। दधिक्रा देव सहस्र संख्यक शक्ति के साथ संग्राम में जाते हैं। 
The humans worship the defeater of thousands of  enemies pray to fast moving Dadhikra Dev who accomplish the desires of the humans. 
आ दधिक्राः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्यइव ज्योतिषापस्ततान।
सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि॥
सूर्य देव जिस प्रकार से तेज द्वारा जल प्रदान करते है, उसी प्रकार से दधिक्रा देव बल द्वारा पञ्चकृष्टि (देव, मनुष्य, असुर, राक्षस और पितृगण अथवा चारों वर्ण और निषाद) को व्याप्त कर देते है। शत-सहस्र दाता, वेगवान (दधिका देव) हमारे स्तुति वाक्य को मधुर फल द्वारा संयोजित करें।[ऋग्वेद 4.38.10]
सूर्य देव अपने तेज से जैसे जल वृद्धि करते हैं वैसे ही दधिक्रा देव जल द्वारा पश्चवृष्टि की वृद्धि करते हैं। सैकड़ों क्या हजारों फलों को प्रदान करने वाले दधिक्रा देव हमारी स्तुति रूप वचनों का अभीष्ट फल प्रदान करते हुए सम्पादन करें।
The way the Sun grant water due to his shine-aura, Dadhikra Dev too grant too grant water to the demigods-deities, humans, demons-giants, manes, the fours Varn and the Nishads. Let fast moving Dadhikra Dev who grants-accomplish hundreds & thousands wishes accept our prayers.(11.04.2023)
अनु कृष्णे वसुधिती येमाते विश्वपेशसा।
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये॥
हे वायु देव! कृष्ण वर्ण, वसुओं की धात्री, विश्व रूपा द्यावा-पृथ्वी आपका अनुगमन करती है। हे वायु देव! आप सोमपान के लिए तेजस्वी रथ द्वारा पधारें।[ऋग्वेद 4.48.3]
हे वायु! काले रंग वाली, वसुओं को धारण करने वाली विश्वरूप अम्बर-धरा तुम्हारे पदचिह्नों पर चलती है। तुम अपने हर्षिता परिपूर्ण रथ के द्वारा सोम को पीने के लिए यहाँ विराजमान होओ।
Hey Vayu! Blackish heaven & earth constituting the universe, who supports the Vasus, follows you. Come to drink Somras in your radiant charoite.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (56) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, छन्द :- त्रिष्टुप्, गायत्री।
मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भिरकैः।
यत्सीं वरिष्ठे बृहती विमिन्वन्रुवद्धोक्षा पप्रथानेभिरेवैः॥
महती और श्रेष्ठा द्यावा-पृथ्वी इस यज्ञ में दीप्तिकर मन्त्र और सोमादि से युक्त होकर दीप्ति विशिष्ट हों। जिस लिए कि सेचनकारी पर्जन्य विस्तीर्ण और महती द्यावा-पृथ्वी को स्थापित करते हुए प्रथमान और गमन शील मरुतों के साथ सभी जगह शब्द करते हैं।[ऋग्वेद 4.56.1]
पर्जन्य :: गरजता तथा बरसता हुआ बादल-मेघ, इंद्र, विष्णु, कश्यप ऋषि के एक पुत्र जिसकी गिनती गंधर्वों में होती है।
Let the excellent & significant-important heaven & earth become aurous-shinning by the recitation of sacred hymns, chants-Mantr, associated by Somras. The vast-broad showering clouds make thundering sound along with the Marud Gan.
Vast and excellent Heaven and Earth, be present with splendour at this Yagy-sacrifice, attracted by sanctifying Mantr-chants, hymns; since that the showerer sounds everywhere with his heralds, the rapid winds, passing through the two spacious and mighty regions.
HERALD :: इस बात का संकेत होना कि कुछ घटित होने वाला है; indications that something is going to happen soon.
देवी देवेभिर्यजते यजत्रैमिनती तस्थतुरुक्षमाणे।
ऋतावरी अद्रुहा देवपुत्रे यज्ञस्य नेत्री शुचयद्धिरकैः॥
यजन योग्य, अहिंसक, अभीष्ट वर्षी, सत्य शील, द्रोह रहित, देवों के उत्पादक और यज्ञों के निर्वाहक द्यावा-पृथ्वी रूप देवी द्वय यष्टव्य देवों के साथ दीप्तिकर मन्त्रों या हवि लक्षण अन्नों से युक्त होवें।[ऋग्वेद 4.56.2]
द्रोह :: दुष्टता, हानिकरता, नुक़सानदेहता, कपट, नमकहरामी, बेवफ़ाई, राज-द्रोहिता, द्वेष, डाह, दुष्ट भाव, बदख़्वाहता; treachery, malignancy, disloyalty, malevolence.
Let worship deserving, non violent, accomplishment granting, truthful, free from treachery heaven & earth in the form of goddess duo, accompanied by the demigods-deities be associated with aurous, energetic, inspiring Mantr-chants offerings in the form of food grains. 
स इत्स्वपा भुवनेष्वास य इमे द्यावापृथिवी जजान।
उर्वी गभीरे रजसी सुमेके अवंशे धीरः शच्या समैरत्॥
जिन्होंने इस द्याव-पृथ्वी को उत्पन्न किया; जिन बुद्धिमान ने विस्तीर्ण, अविचला सुरूपा और आधार रहिता द्यावा-पृथ्वी को सम्यक रूप से कुशल कर्म द्वारा परिचालित किया, वे ही भुवनों के बीच में शोभन कर्मा हैं।[ऋग्वेद 4.56.3]
The intelligent, who created the earth-heavens, extended the unbalanced earth & heavens, operated them skilfully is present between the abodes, performing the great-beautiful deeds.
नू रोदसी बृहद्धिर्नो वरूथैः पत्नीवद्भिरिषयन्ती सजोषाः।
उरूची विश्वे यजते नि पातं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे द्यावा-पृथ्वी! आप दोनों हम लोगों के लिए अन्न दान की अभिलाषिणी और परस्पर सङ्गता है। विस्तीर्णा प्रदान करें, व्याप्ता एवं याग योग्या होकर आप दोनों हमें पत्नी युक्त महान गृह प्रदान करें तथा हम लोगों की सुरक्षा करें। हम लोग अपने अच्छे कर्म के द्वारा रथ और दास से युक्त होवें।[ऋग्वेद 4.56.4]
Hey earth & heavens, complementary of each other! You wish to donate food grains. Grant us protection, progress and houses along with wife. Let us become the possessors of charoite and servants by virtue of our pious-righteous deeds.
प्र वां महि द्यवी अभ्युपस्तुतिं भरामहे। शुची उप प्रशस्तये॥
हे द्युतिमती द्यावा-पृथ्वी! हम लोग आप दोनों के उद्देश्य से महान स्तुतियों को सम्पादित करेंगे। आप दोनों विशुद्ध हैं। हम लोग प्रशंसा करने के लिए आपके निकट गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.56.5]
Hey aurous-shinning, pure earth & heavens! We will perform-conduct great prayers for you. We come closure to you to appreciated you.
पुनाने तन्वा मिथः स्वेन दक्षेण राजथः। ऊह्याथे सनादृतम्॥
हे देवियों! आप दोनों अपनी मूर्तियों और बल द्वारा परस्पर प्रत्येक को शोधित करके शोभमाना होवें और सदैव यज्ञ का निर्वाह करें।[ऋग्वेद 4.56.6]
Hey goddesses! You should be established by virtue of your might, purify each & every one, always conducting Yagy.
मही मित्रस्य साधयस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्। परि यज्ञं नि वेदथुः॥
हे महती द्यावा-पृथ्वी! आप दोनों मित्र भूत स्तोता को अभीष्ट फल प्रदान करती हैं। यज्ञ की पूर्णता के लिए संरक्षण देती हुई यज्ञ को अवलम्बन प्रदान करती हैं।[ऋग्वेद 4.56.7]
Hey earth & heavens! You grant rewards of our deeds like friends, support the Yagy to accomplish it.(07.05.2023)
प्र सुष्टुतिः स्तनयन्तं रुवन्तमिळस्पतिं जरितर्नूनमश्याः।
यो अब्दिमाँ उदनिमाँ इयर्ति ए विद्याता रोदसी उक्षमाणः॥
हे स्तोताओं! आपकी शोभन प्रार्थना गर्जनशील और शब्दकारी उदक स्वामी पर्जन्य के पास पहुँचती है। वे मेघों को धारण कर जल वर्षण करके द्यावा-पृथ्वी को वैद्युतालोक से आलोकित करके गमन करते हैं।[ऋग्वेद 5.42.14]
Hey Stota! Your beautiful prayers reach Parjany lord of thunder clouds and noisy lord of water. He take the form of clouds, rain over the earth & heavens lightening by causing electric sparks in the sky.
प्रैष स्तोमः पृथिवीमन्तरिक्षं वनस्पतींरोषधी राये अश्याः।
देवोदेवः सुहवो भूतु मह्यं मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्॥
धन के लिए हमारे द्वारा विहित यह स्तोत्र पृथ्वी, स्वर्ग, वृक्ष और औषधियों के निकट आगमन करे। हमारे लिए सब देवों का दिव्य आह्वान हो। माता पृथ्वी हम लोगों को दुर्मति में स्थापित न करें।[ऋग्वेद 5.42.16]
विहित :: उचित, मुनासिब, विधि के अनुरूप होनेवाला; canonical, ordained.
दुर्मति :: दुर्बुद्धि, आठ संवत्सरों में से एक जिसमें दुर्भिक्ष-अकाल होता है; bad-negative thoughts-ideas. 
अकाल :: अशुभ समय, भुखमरी (दुर्भिक्ष), असमय, अविनाशी; famine, dearth.
Let our Strotr ordained for wealth move closer to the earth, heavens, trees and vegetation-herbs. Let all demigods-deities be invoked for us. Mother earth should not put us in that Samvatsar-era which is dominated by hunger-famine & dearth.
आ सुष्टुती नमसा वर्तयध्यै द्यावा वाजाय पृथिवी अमृध्रे।
पिता माता मधुवचाः सुहस्ता भरे भरे नो यशसावविष्टाम्॥
हम अन्न-लाभ के लिए शोभन स्तव और हव्य द्वारा हिंसा रहित द्यावा-पृथ्वी को प्रसन्न करने की इच्छा करते हैं। प्रिय वचन, शोभन हस्त और यशोयुक्त मातृ-पितृ स्वरूपा द्यावा-पृथ्वी सम्पूर्ण यज्ञ में हम लोगों की रक्षा करें।[ऋग्वेद 5.43.2]
We wish to please harmless earth & heavens with beautiful verses-hymns and offerings for the sake of food grains. Let the revered-honoured, glorious earth & heavens, with beautiful hands and pleasing words protect us through the Yagy.
बृहद्वयो बृहते तुभ्यमग्ने धियाजुरो मिथुनासः सचन्त।
देवोदेवः सुहवो भूतु मह्यं मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्॥
हे अग्नि देव! आप बृहत्स्वरूप है। धर्मकार्य द्वारा जीर्ण होकर स्त्री-पुरुष एक साथ ही आपको प्रभूत अन्न प्रदान करते हैं। देवगण हमारे द्वारा भली-भाँति से आहूत होवें। जननी स्वरूप पृथ्वी हमारे प्रति विरुद्ध बुद्धि धारण न करें।[ऋग्वेद 5.43.15]
जीर्ण :: बासी, पुराना, नीरस, बेस्वाद, फीका, चिरकालिक, स्थायी, बहुकालीन, नष्ट, बरबाद किया हुआ, छिन्न-भिन्न; chronic, dilapidated, stale. 
Hey Agni Dev! You are giant bodied-sized. On being dilapidated, old-tired woman & man together offer a lot of food grains. Let the demigods-deities be worshiped-prayed by us properly. Goddess earth like a mother should not posses thoughts against us.
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (84) :: ऋषि :- भौम अत्रि; देवता :- पृथ्वी; छन्द :- अनुष्टुप्।
बळित्था पर्वतानां खिद्रं बिभर्षि पृथिवि।
प्र या भूमिं प्रवत्वति मह्ना जिनोषि महिनि॥
हे पृथिवी देवी; हे मध्य-स्थान की देवी! आप यहाँ अन्तरिक्ष में पर्वतों या मेघों के भेदन को धारित करती हैं। आप बलशालिनी और श्रेष्ठ हैं; क्योंकि आप माहात्म्य द्वारा पृथ्वी प्रसन्न करती है।[ऋग्वेद 5.84.1]
हे अत्यन्त नीचे स्थान से युक्त आदर करने योग्य भूमि के सदृश वर्त्तमान! जो तुम मेघों के महत्त्व से भूमि को धारण करती इस प्रकार से सत्य को जिस कारण धारण करती हो तथा दीनता को विशेष करके नष्ट करती हो, इससे सत्कार करने योग्य हो। 
Hey Prathvi-Earth Devi! You bear the mountains and clouds in the space-sky. You are mighty-powerful and the best. Hence you deserve worship.
स्तोमासस्त्वा विचारिणि प्रति ष्टोभन्त्यक्तुभिः।
प्र या वाजं न हेषन्तं पेरुमस्य स्यर्जुनि॥
हे विविध प्रकार से गमन करने वाली पृथ्वी देवी! स्तोता लोग गमन शील स्तोत्रों द्वारा आपका स्तवन करते हैं। हे अर्जुनी! आप शब्द करने वाले अश्व के सदृश जलपूर्ण मेघ को प्रक्षिप्त करती हैं।[ऋग्वेद 5.84.2]
प्रक्षिप्त :: फेंका हुआ, मिलाया हुआ, डाला हुआ, पीछे से जोड़ा हुआ, आगे की ओर निकला हुआ; projected.
Hey Prathvi Devi, revolving with various speeds! The Stotas worship you with dynamic-excellent Strotr. Hey Arjuni! You regulate the clouds having water like a neighing horse.
Earth revolves as a planet of the solar system. It spins around its own axis. Its speed at the poles is low and high at the equator.
दृळ्हा चिद्या वनस्पतीन्क्ष्मया दर्धर्ण्योजसा।
यत्ते अभ्रस्य विद्युतो दिवो वर्षन्ति वृष्टयः॥
हे पृथ्वी देवी! जब विद्योतमान अन्तरिक्ष से आपके सम्बन्धी मेघ जलवर्षा करते हैं, तब आप दृढ़ भूमि के साथ वनस्पतियों को धारित करती हैं अथवा वनस्पतियों को दृढ़ करके धारण करती हैं।[ऋग्वेद 5.84.3]
Hey Prathvi Devi! When clouds rain from the sky associated with lightening, you bear the vegetation in the tight soil.(17.08.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (70) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- द्यावा-पृथिवी; छन्द :- जगती।
घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा।
द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा॥
हे द्यावा-पृथ्वी! आप जलवती, भूतों के आश्रय स्थल, विस्तीर्णा, प्रसिद्धा, जल दोहन कर्त्री, सुरूपा, वरुण के धारित द्वारा पृथक्रूप से धारिता, नित्या और बहुकर्मा हैं।[ऋग्वेद 6.70.1]
Hey radiant earth & heavens! You are the asylum of living beings & possess various forms. You are forever & perform several endeavours, draws water from the wells supported by affectionate Varun Dev.
असश्चन्ती भूरिधारे पयस्वती घृतं दुहाते सुकृते शुचिव्रते।
राजन्ती अस्य भुवनस्य रोदसी अस्मे रेतः सिञ्चतं यन्मनुर्हितम्॥
असंगता, बहुधारावती, जलवती और शुचिकर्मा द्यावा-पृथ्वी, सुकृती व्यक्ति को आप जल प्रदान करती हैं। हे द्यावा-पृथ्वी! आप भुवनों की अधिष्ठता हैं। आप हर्षित होकर हमें हितकारी फल प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.70.2]
असंगता :: विसंगतता, असंबद्धता, बेमेल; inconsistency, inconsequence, irrelevance. 
Inconsistent, possessing several currents of water, performing pious deeds earth & the heavens; grant water to the person performing virtuous jobs. Hey earth & heavens! You are the lord of abodes. On being happy reward us beneficially.
यो वामृजवे क्रमणाय रोदसी मर्तो ददाश धिषणे स साधति।
प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि युवोः सिक्ता विषुरूपाणि सव्रता॥
हे सर्व निवासभूता द्यावा-पृथ्वी! जो मनुष्य आपको सरल गमन के लिए यह देता है, उसका मनोरथ सिद्ध होता है और अपत्यों के साथ बढ़ता है। कर्मों के ऊपर आपके द्वारा सिक्तरेत नानारूप है और वह समानकर्मा उत्पन्न होता है।[ऋग्वेद 6.70.3]
Hey abode of all earth & heavens! One who make offerings to you for your following straight path-route, his desires are accomplished and progress alongwith his progeny and encouraged with your conduct-movement. Several beings performing identical deeds are born here.
घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावृधा।
उर्वी पृथ्वी होतृवूर्ये पुरोहिते ते इद्विप्रा ईळते सुम्नमिष्टये॥
द्यावा-पृथ्वी जल द्वारा ढकी हुई और जल का आश्रय करती हैं। वे जल से ओत-प्रोत हैं, जलवर्षा विधायिनी और विस्तृता है, सिद्धा और यज्ञ में पुरस्कृता है। यज्ञ के लिए विद्वान उनसे सुख की याचना करता है।[ऋग्वेद 6.70.4]
सिद्ध :: पूरा, निपुण, प्रमाणित, पूर्ण, निर्मित, पूरा, दोषहीन, निर्दोष, निपुण, प्रमाणित; proven, perfect, proved, finished.
Earth & heavens are covered with water and asylum the water. They are saturated with water, causes rains, perfect, vast-comprehensive, accomplished and rewarded in the Yagy. The enlightened worship-pray them for comforts-pleasure.
मधु नो द्यावापृथिवी मिमिक्षतां मधुश्चता मधुदुधे मधुव्रते।
दधाने यज्ञं द्रविणं च देवता महि श्रवो वाजमस्मे सुवीर्यम्॥
जल का क्षरण करने वाली, जल दूहने वाली, उदक कर्मा देवी तथा यज्ञ, धन, महान यश, अन्न और वीर्य देने वाली द्यावा-पृथिवी हमें मधु से सिंचित करे [ऋग्वेद 6.70.5]
क्षरण :: क्षीण होना, रिसना; corrosion, abrosia.
Let the water loosing, extracting, utilizing, Yagy conducting, possessor of great wealth, name fame and strengthening earth & the heavens nourish us with honey. 
ऊर्जनो द्यौश्च पृथिवी च पिन्वतां पिता माता विश्वविदा सुदंससा।
संरराणे रोदसी विश्वशंभुवा सनिं वाजं रयिमस्मे समिन्वताम्॥
हे पिता द्युलोक और माता पृथ्वी देवी! हमें अन्न प्रदान करें। संसार को जानने वाली, सुकर्मा परस्पर रममाण और सबको सुख प्रदान करने वाली द्यावा- पृथ्वी आप हमें पुत्र-पौत्रयुक्त, अन्न, बल, यश और धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.70.6]
Hey fatherly heavens and motherly earth! Grant us food grains. Aware of the universe, virtuous, performing pious deeds-endeavours, granting pleasure-comforts to all, grant us sons & grandsons, food grains, strength, name & fame and wealth.(09.11.2023)
 
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संतोष महादेव-सिद्ध व्यास पीठ, बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा

Saturday, May 2, 2015

वनस्पतिदेव

वनस्पतिदेव
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नमः। 
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्। 
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
अव सृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः। प्र दातुरस्तु चेतनम्॥
हे वनस्पतिदेव! आप देवों के लिये नित्य हविष्यान्न प्रदान करने वाले दाता को प्राणरूप उत्साह प्रदान करें।[ऋग्वेद 1.13.11]
हे वनस्पति देव! यजमान को ज्ञान देने के लिए देवताओं के लिए हवि समर्पण करो।
Hey Vanaspati Dev (deity of vegetation)! Please give grains for offerings to the holder of the Yagy, to be used as offerings for the demigods-deities.

 
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Thursday, April 30, 2015

पूषा देव PUSHA DEV [ऋग्वेद 1-8]

पूषा देव PUSHA DEV
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं नीराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
आ पूषञ्चित्रबर्हिषमाघृणे धरुणं दिवः।
आजा नष्टं यथा पशुम्॥
हे दिप्तीमान पूषादेव! आप अद्भूत तेजों से युक्त एवं धारण शक्ति से सम्पन्न हैं। अत: सोम को द्युलोक से वैसे ही लायें जैसे खोये हुये पशु को ढूँढ़कर लाते है।[ऋग्वेद 1.23.13]
हे प्रकाश से परिपूर्ण पूषा! जैसे खोये हुए पशु को ढूँढकर लाते हैं, वैसे ही तुम कुशा से परिपूर्ण, अनुष्ठान धारक सोम को ले आओ।
Hey shinning-stunning Pusha Dev! You are blessed with amazing (wonderful, marvellous) powers. Hence, trace-search the Som-Moon in the heavens just as a lost cattle is found.
पूषा राजानमाघृणिरपगूळ्हं गुहा हितम्। अविन्दच्चित्रबर्हिषम्॥
दीप्तिमान पूषादेव ने अंतरिक्ष गुहा में छिपे हुये शुभ्र तेजों से युक्त सोम राजा को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 1.23.14]
समस्त ओर से प्रकाशमान पूषा ने गुफा में छिपे हुए कुश सहित सम्राट सोम को ग्रहण किया।
Glittering-bright Pusha Dev traced-found the king Som-Moon, having aura & brightness, in the space-sky tunnel.
उतो स मह्यमिन्दुभिः षड्युक्ताँ अनुसेषिधत्। गोभिर्यवं न चर्कृषत्॥
वे पूषादेव हमारे लिये याग के हेतुभूत सोम के साथ वसंतादि षट्‍ऋतुओं को क्रमशः वैसे ही प्राप्त कराते हैं, जैसे यवों (जौ) के लिये कृषक बार-बार खेत जोतता है।[ऋग्वेद 1.23.15]
वह युवा सुघटित और ऋतुओं को सोमों द्वारा ग्रहण करता रहे, जैसे कृषक जौ को बार-बार ग्रहण करता है। 
The Pusha Dev arrange-manage Som-Moon along with the six seasons in an order just like the farmer, who plough the field for producing barley.
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मंडल (सूक्त 42) :: ऋषि :- कण्व धौर, देवता :- पूषा, छन्द :- गायत्री।
सं पूषन्नध्वनस्तिर व्यंहो विमुचो नपात्। सक्ष्वा देव प्र णस्पुरः॥
हे पूषा देव! हम पर सुखों को न्योछावर करें। पाप मार्गों से हमें पार लगायें। हे देव! हमें आगे बढा़यें।[ऋग्वेद 1.42.1]
हे पूजन! हमको कष्टों से पार लगाओ और हमारे पापों को समाप्त करो। हमारे गामी बनो।
Hey Pusha Dev! Shower bliss over us. Make us swim us over the path of sin, vices, wickedness. Hey Dev! Promote us-enhance our progress.
यो नः पूषन्नघो वृको दुःशेव आदिदेशति। अप स्म तं पथो जहि॥
हे पूषा देव! जो हिंसक, चोर जुआ खेलने वाले हम पर शासन करना चाहते हैं, उन्हें हम से दूर करें।[ऋग्वेद 1.42.2]
हे पूषादेव! हिंसक चोर, जुआ खेलने वाले जो हम पर राज करना चाहते उन्हें हम से दूर कर दो।
Hey Pusha Dev! The violent gamblers, who wish to rule-over power us should be repelled away from us.
अप त्यं परिपन्थिनं मुषीवाणं हुरश्चितम्। दूरमधि स्रुतेरज॥
हे पूषा देव! मार्ग में घात लगाने वाले तथा लूटने वाले कुटिल चोर को हमारे मार्ग से दूर करके विनष्ट करें।[ऋग्वेद 1.42.3]   
मार्ग में रोकने वाले, चोरी, लूटपाट करने वाले, कुटिल दस्यू हमारे रास्ते से हटाओ।
धात लगाना :: ambush.
Hey Pusha Dev! Remove, repel, destroy the crooked thief who wish to ambush, loot, torture us on the way.
त्वं तस्य द्वयाविनोऽघशंसस्य कस्य चित्। पदाभि तिष्ठ तपुषिम्॥
आप हर किसी दुहरी चाल चलने वाले कुटिल हिंसकों के शरीर को पैरों से कुचल कर खड़े हों अर्थात इन्हें दबाकर रखें, उन्हें बढ़ने न दे।[ऋग्वेद 1.42.4]
हे पुषन्! तुम पाप को बढ़ावा देने वाले तथा क्रोधी को अपने से कुचल डालो।
You should over power-control the wicked, violent, crooked with your legs and don't let them move further.
आ तत्ते दस्र मन्तुमः पूषन्नवो वृणीमहे। येन पितॄनचोदयः॥
हे दुष्ट नाशक, मनीषी पूषादेव! हम अपनी रक्षा के निमित्त आपकी स्तुति करते हैं। आपके संरक्षण ने ही हमारे पितरों को प्रवृद्ध किया था।[ऋग्वेद 1.42.5]
हे विकराल कर्म वाले ज्ञानी पूषादेव! तुम्हारी रक्षा के लिए हम प्रार्थना करते हैं। इस रक्षा ने हमारे पूर्व पुरुषों को भी बढ़ाया था। 
Hey the destroyer of the wicked, viceful, enlightened Pusha Dev! We pray to you for our protection. You protected our Manes-ancestors and made them progress.
अधा नो विश्वसौभग हिरण्यवाशीमत्तम। धनानि सुषणा कृधि॥
हे सम्पूर्ण सौभाग्ययुक्त और स्वर्ण आभूषणों से युक्त पूषादेव! हमारे लिए सभी उत्तम धन एवं सामर्थ्यो को प्रदान करें।[ऋग्वेद 1.42.6]
हे परम सौभाग्यशाली, रथ वाले पूषादेव! हमारे लिए सुसाध्य धनों को प्राप्त करने की सामर्थ्य दो।
Hey lucky, ornamented with gold, Pusha Dev! Grant us excellent riches, strength-power. 
अति नः सश्चतो नय सुगा नः सुपथा कृणु। पूषन्निह क्रतुं विदः॥
हे पूषा देव! कुटिल दुष्टों से हमें दूर ले चलें। हमें सुगम-सुपथ का अवलम्बन प्रदान करें एवं अपने कर्तव्यों का बोध करायें।[ऋग्वेद 1.42.7]
झगड़ों में फंसे हुए हमको शत्रुओं से दूर ले जाओ। हमको आसान मार्ग अवलम्बी बनाओ।
Hey Pusha Dev! Take us away from the wicked, guide us to the simple way and tell us our duties.
अभि सूयवसं नय न नवज्वारो अध्वने। पूषन्निह क्रतुं विदः॥
हे पूषा देव! हमें उत्तम जौ (अन्न) वाले देश की ओर ले चलें। मार्ग में नवीन संकट न आने पायें। हमें अपने कर्तव्यों का ज्ञान करायें।(हम इन कर्तव्यों को जाने)।[ऋग्वेद 1.42.8]
हे पूजन! हमारी सुरक्षा के लिए शक्ति प्रदान करो। जहाँ कृषि के उपयुक्त धरा हो। हमको वहाँ ले चलो। रास्ते में कोई नया कष्ट न आवे। हमारी सुरक्षा लिये बलशाली होओ।
Hey Pusha Dev! Take us to the country-place enriched with best food grains. Ensure that new tensions-tortures don't come in our way. Make us strong and tell us our duties (do's and don't).
शग्धि पूर्धि प्र यंसि च शिशीहि प्रास्युदरम्। पूषन्निह क्रतुं विदः॥
हे पूषा देव! हमें सामर्थ्य दें। हमें धनों से युक्त करें। हमें साधनों से सम्पन्न करें। हमें तेजस्वी बनायें। हमारी उदरपूर्ति करें। हम अपने इन कर्तव्यों को जाने।[ऋग्वेद 1.42.9]
हे सामर्थवान पूषन! हमको अभिलाषी धन प्रदान करो। हमें तेजस्वी बनाओ। हमारी उदर पूर्ति करो। हमारे लिए शक्ति ग्रहण करो।
Hey Pusha Dev! Make us capable & strong. Enrich us with means of production-working to earn our livelihood and our working-duties.
न पूषणं मेथामसि सूक्तैरभि गृणीमसि। वसूनि दस्ममीमहे॥
हम पूषा देव को नहीं भूलते! सूक्तों में उनकी स्तुति करते हैं। प्रकाशमान सम्पदा हम उनसे माँगते हैं।[ऋग्वेद 1.42.10]
हम देव की निंदा नहीं वन्दना करते हैं। उस दिव्य देव से धन माँगते हैं।
We do not forget Pusha Dev! We pray him with the help of Sukt-divine phrases, hymns. We request for enlightenment (education, learning), the knowledge which can guide us, pave our way.
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (138) ::  ऋषि :- परुच्छेपो, देवता :- पूषा, छन्द :- अत्यष्टि।
प्रप्र पूष्णस्तुविजातस्य शस्यते महित्वमस्य तवसो न तन्दते स्तोत्रमस्य न तन्दते। अर्चामि सुम्नयन्नहमन्त्यूतिं मयोभुवम्। विश्वस्य यो मन आयुयुवे मखो देव आयुयुवे मखः॥
अनेक मनुष्यों द्वारा पूजित पूषा (सूर्य) देव की शक्ति की महिमा सर्वत्र प्रशंसा प्राप्त करती है। कोई उसे मारना नहीं चाहता। पूषा के स्तोत्र की विश्रान्ति नहीं है। मैं सुख पाने की इच्छा से पूषा की पूजा करता हूँ। वे तत्काल सहायता करते हुए हर्ष प्रदान करते हैं। वे पूषा यज्ञ वाले है। वे समस्त मनुष्यों के मन के साथ मिल जाते है।[ऋग्वेद 1.138.1]
पूषा (सूर्य) का बहुत अधिक महत्व है। उसकी शक्ति कम नहीं होती। उसका श्लोक हमेशा वृद्धि करने वाला है। मैं कल्याण की कामना से उसे नमस्कार करता हूँ। उसने समस्त हृदयों को आकृष्ट कर लिया है।
The glory of Pusha (Sun) is recognised & appreciated everywhere by several humans. None wants to kill it. There is no end to the Strotr pertaining to Pusha. I pray-worship Pusha with the desire-will of getting comforts-pleasure. He quickly deliver help and grant pleasure. Pusha stands for Yagy. He occupies a place in the innerself (mind, heart & soul) of the humans.
प्र हि त्वा पूषन्नजिरं न यामनि स्तोमेभिः कृण्व ऋणवो यथा मृध उष्ट्रो न पीपरो मृधः। हुवे यत्त्वा मयोभुवं देवं सख्याय मर्त्यः। अस्माकमाङ्गूषाधुम्निनस्कृधि वाजेषु द्युमिनस्कृधि॥
जिस प्रकार से शीघ्र चलने वाले घोड़े की प्रशंसा होती है, वैसे ही, हे पूषन्। मंत्रों द्वारा मैं आपकी प्रशंसा करता हूँ। ऊँट की तरह आप हमें हिंसक शत्रुओं से सुरक्षित रखते हैं। आप से सुख प्रदत्त करने वाले देवता हैं और मैं मनुष्य हूँ, मित्रता पाने के लिए मैं आपका आवाहन करता हूँ। मेरी आवाहन की शक्ति को बढ़ावें और मुझे संग्राम में विजयी बनावें।[ऋग्वेद 1.138.2]
हे पृषा! शीघ्रगामी प्राणी को राह में श्रेष्ठ दिशा बताने के समान तुम्हें श्लोक से प्रेरणा करता हूँ जिससे तुम हमारे शत्रुओं को दूर करो। मैं तुम्हारा आह्वान करता हूँ। मुझे युद्धों में शक्तिशाली बनाओ।
Hey Pusha! The way a fast moving horse is appreciated, similarly, I appreciate you with the help of Mantr (hymns). You protect us from violent enemies like a camel. Demigods-deities attain pleasure-comforts from you. I am a human requesting you for friendship. Please boost my power of request-invitation (inciting, invoking) and make be win in the war-struggle.
यस्य ते पूषन्त्सख्ये विपन्यवः क्रत्वा चित्सन्तोऽवसा बुभुज्रिर इति कृत्वा बुभुज्रिरे। तामनु त्वा नवीयसी नियुतं राय ईमहे। अहेळमान उरुशंस सरी भव वाजेवाजे सरी भव॥
हे पूषन्! आपकी मित्रता प्राप्त करके विशेष यज्ञ द्वारा आपको प्रसन्न करते हुए, स्तोत्र परायण यजमान आपके द्वारा रक्षित होकर नाना प्रकार के भोग भोगते हैं। आपका संरक्षण प्राप्त कर आपके पास से असँख्य धन चाहते हैं। हे बहुतों के द्वारा स्तवनीय पूषादेव! हमारा अनादर न करके हमारे सामने आवें और युद्धकाल में हमारे अग्रगामी बनायें।[ऋग्वेद 1.138.3]
हे पूषन! तुम्हारी वंदना में लगे हुए मनुष्य ही तुम्हारी रक्षाओं को ग्रहण कर सकें। हम ज्ञान से सम्पन्न हुए नये श्लोक द्वारा तुम से असंख्य धन की विनती करते हैं। तुम हम पर क्रोध मत करो। प्रत्येक संग्राम में हमारे सहायक बनो।
Hey Pusha! We enjoy in several ways after attaining your friendship,
by virtue of special-significant Yagy. We wish to acquire unlimited riches-wealth under your protection, asylum, shelter. Hey, revered by many, Pusha! Don't ignore us, come to us and make us able to occupy front row in a war-fight.
अस्या ऊ षु ण उप सातये भुवोऽहेळमानो ररिवाँ अजाश्व श्रवस्यतामजाश्व। ओ षु त्वा ववृतीमहि स्तोमेभिर्दस्म साधुभिः। नहि त्वा पूषन्नतिमन्य आघृणे न ते सख्यमपहह्नु वे॥
हे अज वाहन वाले पूषन्! हमारे लाभ के लिए अनादर न कर और दानशील होकर हमारे पास पधारें। हे अजाश्च पूषन्। हम अन्न चाहते हैं। हमारे पास आवें। हे शत्रुहन्ता पूषन्! हम उत्तम स्तोत्रों से आपकी स्तुति करते हैं। हे जलवर्षक पूषादेव! हम आपके द्वारा अनादर से परे रहें और आपकी मैत्री से कभी वंचित न हो अर्थात् आपकी मित्रता हमें सदैव प्राप्त होती रहे।[ऋग्वेद 1.138.4]
हे अजाश्व पूषन! तुम दान के लिए क्रोध से रहित हुए यहाँ आओ। हम यश की अभिलाषा करते हैं। हम तुम्हारा तिरस्कार नहीं कर सकते। आपके मित्र-भाव की आलोचना नहीं करते। तुम अद्भुत कर्मवाले श्लोक पर ध्यान दो।
Hey goat rider Pusha! Please do not neglect us, become a donor and come to us. We want food stuff. Hey slayer of the enemy! We pray to you with the help of decent hymns-Shloks. Hey rain causing Pusha! We should be blessed with your friendship.
ऋग्वेद संहिता, द्वितीय मण्डल सूक्त (40) :: ऋषि :- गृत्समद, भार्गव, शौनक, देवता :- सोम, पूषा, अदिति, छन्द :- त्रिष्टुप।
सोमापूषणा जनना रयीणां जनना दिवो जनना पृथिव्याः।
जातौ विश्वस्य भुवनस्य गोपौ देवा अकृण्वन्नमृतस्य नाभिम्॥
आप धन, द्युलोक और पृथ्वी के पिता है। जन्म के अनन्तर ही आप सारे संसार के रक्षक हुए हैं। देवों ने आपको अमृत का केन्द्र बनाया है।[ऋग्वेद 2.40.1]
तुम धन, अम्बर, और धरा के पिता हो। जन्म लेने के बाद ही तुम संसार के रक्षक बन गये। देवताओं ने तुम्हें अमरत्व प्रदान करने वाला बनाया।
You are the father of the heavens, wealth and the earth. You turned into the protector of the universe soon after your birth. The demigods-deities have made you the centre of nectar, elixir, ambrosia, Amrat.
इमौ देवौ जायमानौ जुषन्तेमौ तमांसि गूहतामजुष्टा। 
आभ्यामिन्द्रः पक्वमामास्वन्तः सोमापूषभ्यां जनदुत्रियासु॥
जन्मते ही द्युतिमान् सोम और पूषा की देवों ने सेवा की। ये दोनों अप्रिय अन्धकार का विनाश करते हैं। इनके साथ इन्द्र देव तरुणी, धेनुओं के अधः प्रदेश में पक्व दुग्ध उत्पन्न करते हैं।[ऋग्वेद 2.40.2]
तेजस्वी सोम और पूषा के जन्म लेते ही देवों ने उनकी सेवा की। इन दोनों ने अहितकर अंधकार को मिटाया। इनकी सहायता से इन्द्र युवती धेनुओं के निम्नवत हिस्से वाले भाग में दुग्ध को रचित करते हैं।
The demigods-deities served bright Som-Moon and Pusha as soon as they took birth. Indr Dev evolved milk in the udder of the cows.
सोमापूषणा रजसो विमानं सप्तचक्रं रथमविश्वमिन्वम्। 
विषूवृतं मनसा युज्यमानं तं जिन्वथो वृषणा पञ्चरश्मिम्॥
हे अभीष्ट वर्षी सोम और पूषा! आप संसार के विभाजक, सप्त चक्र (सात ऋतु, मलमास लेकर) वाले संसार के लिए अविभाज्य, सर्वत्र वर्तमान और पंच रश्मि (पाँच ऋतू, हेमन्त और शीत को एक में करके) वाले हैं। इच्छा उत्पन्न होते ही योजित रथ हमारे सामने प्रेरित करते हैं।[ऋग्वेद 2.40.3]
इच्छित वर्षों में सोम और पूषा! तुमने संसार का विभाजन किया, तुम मल मास रहित सातों ऋतुओं से युक्त संसार के लिए पांच किरणों से युक्त हो। कामना करते ही अपना जाता हुआ रथ हमारे सम्मुख लाते हो।
Accomplishment fulfilling Som & Pusha! You divide the universe-year in seven cycles i.e., seasons and join the five seasons with Hemant and winter. Your charoite come to us as soon we desire.
In general we observe 4 seasons but in reality they are 6 in number. Though there are 12 months in a year according to ancient Hindu calendars and yet the 13th month is added for correction, since lunar mass varies considerably in number of days from 27 to 31. 
Please refer to ::  ANCIENT HINDU CALENDAR  काल गणना santoshkipathshala.blogspot.com
दिव्य १ न्यः सदनं चक्र उच्चा पृथिव्यामन्यो अध्यन्तरिक्षे। 
तावस्मभ्यं पुरुवारं पुरुक्षं रायस्पोषं वि ष्यतां नाभिमस्मे॥
आप में से एक जन (पूषा) उन्नत द्युलोक में रहते हैं। दूसरे (सोम) औषधि रूप से पृथ्वी  और चन्द्र रूप से अन्तरिक्ष में रहते हैं। आप दोनों अनेक लोगों में वरणीय, बहुकीर्तिशाली हमारे भाग का कारण और पशु-रूप धन हमें प्रदान करें।[ऋग्वेद 2.40.4]
सोम पूषा औषधि रूप से पृथ्वी पर तथा चन्द्रमा रूप से उन्नतशील अम्बर में निवास करते हैं। तुम दोनों प्रशंसा योग्य, वरण करने के योग्य, सुन्दर पशु धन प्रदान करो।
One of you, Pusha resides-lives in the heaven and the second i.e., Som lives over the earth in the form of medicines (Ayur Vedic Medicines herbs). Som lives in space as a material object-satellite of earth. Both of you are appreciable & acceptable to most of the people. Grant our share of riches in the form of cattle. 
विश्वान्यन्यो भुवना जजान विश्वमन्यो अभिचक्षाण एति। 
सोमापूषणाववतं धियं मे युवाभ्यां विश्वाः पृतना जयेम॥
हे सोम और पूषा! आपमें से एक (सोम) ने सारे भूतों को उत्पन्न किया। दूसरे (पूषा) सारे संसार का पर्यवेक्षण करते हैं। हे सोम और पूषा! आप हमारे कर्म की रक्षा करें। आपकी सहायता से हम शत्रु सेना पर विजय प्राप्त करें।[ऋग्वेद 2.40.5]
हे सोम और पूजन! तुमने समस्त भूतों को प्रकट किया। पूषा समस्त संसार को देखते हैं। तुम दोनों हमारे कार्यों के रक्षक हो। तुम्हारी शक्ति से हम शत्रु सेना को विजय कर लें। 
Hey Som & Pusha! Som is the creator of all that which has been perished-past. Pusha observes the universe. Hey Som & Pusha! Let both of you become the protector of our endeavours-duty. We should win the enemy with your help. 
धियं पूषा जिन्वतु विश्वमिन्वो रयिं सोमो रयिपतिर्दधातु। 
अवतु देव्यदितिरनर्वा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः॥
संसार को प्रसन्नता देने वाले पूषा हमारे कर्म से तृप्ति प्राप्त करें। धनपति सोम हमें धन प्रदान करें। द्युतिमती और शत्रु रहिता अदिति हमारी रक्षा करें। हम सुसंतति युक्त होकर यज्ञ में आपका यशोगान करें।[ऋग्वेद 2.40.6]
संसार को सुख प्रदान करने वाले पूषा हमारे कर्म से संतुष्ट हों। धन से सम्पन्न सोम हमको धन दें। तेजस्विनी, अदिति शत्रुओं से हमारी रक्षा करें। हम पुत्र और पौत्रों से युक्त, यज्ञ में अधिक श्लोक पाठ करेंगे।
Let Pusha who grant happiness-pleasure to the whole world be satisfied with our endeavours-deeds. Let-wealthy Som grant us riches. Let glorious-bright Aditi having no enemy, protect us. We should sing your glory blessed with sons and grandsons. 
इयं ते पूषन्नाघृणे सुष्टुतिर्देव नव्यसी। अस्माभिस्तुभ्यं शस्यते॥
हे दीप्तिमान् पूषा! ये नीवनतम और शोभन स्तुति रूप वचन आपके लिए का उच्चारण हम लोग आपके लिए ही करते हैं।[ऋग्वेद 3.62.7]
हे पूषन! तुम सभी तरह से प्रकाशमान तथा प्रत्येक सुख की वर्षा करने में समर्थ हो। तुम्हारा वह अत्यन्त नया श्लोक सदैव वंदना करने के योग्य हो। इस उत्तम वंदना को हम तुम्हारे प्रति हमेशा उच्चारण करते रहें।
Hey radiant showerer of comforts Pusha Dev! We recite these excellent verses-hymns, compositions-Strotr in your honour.
तां जुषस्व मिरं मम वाजयन्तीमवा धियम्। वधूयुरिव योषणाम्॥
हे पूषा! मेरी उस प्रार्थना को स्वीकार करें। स्वीकार स्त्री के अभिमुख आगमन करता है, उसी प्रकार आप इस हर्षकारिणी प्रार्थना के अभिमुख आगमन करें।[ऋग्वेद 3.62.8]
पत्नी की इच्छा करने वाला मनुष्य जैसे चाहत करने वाली रमणी को स्नेह पूर्वक स्वीकार करता है। वैसे ही हे पूजन! मेरी उस ज्ञानमय तथा सत्यासत्य को जानने वाली और उत्तम धनावती मंत्र युक्त बुद्धि को स्नेह भावना पूर्वक स्वीकृत करो।
Hey Pusha Dev! Respond-accept our prayers, with the enlightened, truthful words, the way a person desirous of companion-wife does it.  
यो विश्वाभि विपश्यति भुवना सं च पश्यति। स नः पूषाविता भुवत्॥
जो पूषा निखिल लोक को विशेष रूप से देखते हैं और उसे देखते हैं, वे ही पूषा हम लोगों का रक्षण करें।[ऋग्वेद 3.62.9]
जो पूषा सभी लोकों को समान रूप से देखते हैं तथा समस्त संसार को विविध दृष्टिकोण से देखते हैं, वह हमारे पोषक तथा सभी तरह से हमारे रक्षक हैं।
Let Pusha Dev who looks at the entire universe uniformly, nourish & protect us. 
प्र तव्यसो नमउक्तिं तुरस्याहं पूष्ण उत वायोरदिक्षि।
या राधसा चोदितारा मतीनां या वाजस्य द्रविणोदा उत त्मन्॥
हम बलवान् और वेग पूर्वक गमन करने वाले पूषा तथा वायु देव की प्रार्थना करते हैं। ये दोनों देव धन और अन्न के लिए लोगों की बुद्धि को प्रेरित करें अथवा जो देव संग्राम के प्रेरक हैं, वे धनप्रदान करें।[ऋग्वेद 5.43.9]
We worship dynamic-accelerated mighty Pusha and Vayu Dev. Let both of them inspire the minds of public-populace for food grains and wealth or else, those who are the inspirer of war grant wealth.
आ मा पूषन्नुप द्रव शंसिषं नु ते अपिकर्ण आघृणे। अघा अर्यो अरातयः॥
हे पूषा देव! आप शीघ्र मेरे पास आवें। दीप्तिमान देव भीषण आक्रमण करने वाले शत्रुओं को पीड़ा पहुँचावें। मैं भी आपके कर्ण (कान) के पास आकर गुणगान करता हूँ।[ऋग्वेद 6.48.16]
Hey Pusha Dev! Come to me quickly. Hey radiant deity torture the invading enemies. I sing songs of your glory near-close to your ears.
मा काकम्बीरमुद्वृहो वनस्पतिमशस्तीर्वि हि नीनशः।
मोत सूरो अह एवा चन ग्रीवा आदधते वेः॥
हे पूषा देव! आप कौओं के आश्रयभूत वनस्पति को नष्ट मत करना। मेरे निन्दकों को पूर्णतः नष्ट कर दें। जिस प्रकार से व्याध चिड़ियों को फँसाने के लिए जाल फैलाता है, उसी प्रकार शत्रु लोग मुझे किसी भी प्रकार से बाँध न सकें।[ऋग्वेद 6.48.17]
Hey Pusha Dev! Do not destroy the vegetation sheltering the crows. Destroys my cynics. The enemy should not be able to bind-tie me like the hunter who spread net to catch the birds. 
दृतेरिव तेऽवृकमस्तु सख्यम्। अच्छिद्रस्य दधन्वतः सुपूर्णस्य दधन्वतः॥
हे पूषा देव! आपसे हमारी मैत्री छिद्र रहित दधि पात्र के सदृश निर्बाध एवं अविच्छिन्न बनी रहे।[ऋग्वेद 6.48.18]
Hey Pusha Dev! Let our friendship with you, remain free from holes like the pot containing curd; continuously and unbroken.
परो हि मर्त्यैरसि समो देवैरुत श्रिया।
अभि ख्यः पूषन् पृतनासु नस्त्वमवा यथा पुरा॥
हे पूषा देव! आप मनुष्यों का अतिक्रम करके अवस्थित हैं। धन में देवों के तुल्य हैं। इसलिए संग्राम में हमारी ओर अनुकूल दृष्टि रखें। प्राचीन समय में आपने मनुष्यों की जिस प्रकार से रक्षा की, उसी प्रकार इस समय हमारी रक्षा करें।[ऋग्वेद 6.48.19]
अतिक्रम :: मर्यादा का उल्लंघन, दुरुपयोग; deviation.
Hey Pusha Dev! You are stabilized by deviating from the norms set for the humans. You are like the demigods-deities in granting-possessing wealth. You should be favourable to us in war. The way you safe guarded the humans protect us as well now.
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (53) :: ऋषि :- ऋजिश्वा भरद्वाज; देवता :- पूषा,  छन्द :- गायत्री, अनुष्टुप्।
वयमु त्वा पथस्पते रथं न वाजसातये। धिये पूषन्नयुज्महि॥
हे मार्ग पति पूषन! कर्मानुष्ठान और अन्न लाभ के लिए युद्ध स्थल में रथ के सदृश हम आपको अपने अभिमुख करते हैं।[ऋग्वेद 6.53.1]
कर्मानुष्ठान :: किसी व्यक्ति द्वारा की गई कोई भी क्रिया, शास्त्र विहित कर्म, संध्या, अग्निहोत्र; rituals.
Hey lord of roads! We present our selves before you for rituals and food grains like the charoite in the war.
अभि नो नर्यं वसु वीरं प्रयतदक्षिणम्। वामं गृहपतिं नय॥
हे पूषन! हमारे यहाँ मानव हितैषी, धन-दान में मुक्त हस्त और विशुद्ध दान वाला एक गृहस्थ भेजें।[ऋग्वेद 6.53.2]
Hey Pusha! Send the house hold here who is devoted to human welfare-benefits & donate freely with pious money. 
अदित्सन्तं चिदाघृणे पूषन्दानाय चोदय। पणेश्चिद्वि प्रदा मनः॥
हे दीप्ति सम्पन्न पूषन! कृपण को दान देने के लिए प्रेरित करें और उसके हृदय को कोमल बनावें।[ऋग्वेद 6.53.3]
Hey radiant Pusha! Inspire the miser to donate and soften his heart.
वि पथो वाजसातये चिनुहि वि मृधो जहि। साधन्तामुग्र नो धियः॥
हे प्रचण्ड बलशाली पूषन! अन्न लाभ के लिए समस्त पथ परिष्कृत करें। विघ्नकारी चोर आदि का संहार करें और हमारे अनुष्ठानों को सफल करें।[ऋग्वेद 6.53.4]
प्रचंड :: अत्यधिक उग्र, तीव्र या तेज़ी होना, बहुत तीखा, उग्र, प्रखर, प्रबल, बहुत अधिक वेगवान, भंयकर, भीषण, अति तेजस्वी, प्रतापी, दुस्सह, असह्य, पुष्ट, बलवान, कठिन, विश्वासंबंधी, विश्विक, अवाढव्य, विराट, कठोर, बड़ा, भारी, अत्यंत क्रोधी, कठोर, उग्र, कड़ा; terrific, severe, huge, colossal,  cosmic, convulsion.
परिष्कृत :: साफ़ किया हुआ, सुधारा हुआ; sophisticated, refined.
Hey terrific Pusha Dev! Refine the road fro gain of food grains. destroy the troubling thieves etc. and make our rituals-endeavours successful.
परि तृन्धि पणीनामारया हृदया कवे। अथेमस्मभ्यं रन्धय॥ 
हे ज्ञानी पूषन! सूक्ष्म लोहा प्रदण्ड (आरा) से पणियों या लुब्धकों का हृदय परिवर्तित कर हमारे वश में करें।[ऋग्वेद 6.53.5]
Hey enlightened Pusha Dev! Change the hearts of either the Panis or Lubdhak with small severe iron rod-weapon and put them under our control.
वि पूषन्नारया तुद पणेरिच्छ हृदि प्रियम्। अथेमस्मभ्यं रन्धय॥
हे पूषन! सूक्ष्म लोहाग्र दण्ड (प्रतोद या आरा) से पणि या चोर का हृदय परिवर्तित करें। उसके हृदय में सद्भावना भरें और उसे मेरे वशीभूत करें।[ऋग्वेद 6.53.6]
सद्भावना :: अच्छी नीयत, सद्भाव, सद्‍भाव से, नेकनीयती, सदाशयता, goodwill, good faith, bonafied.
Hey Pusha Dev! Change the heart of Pani or thief with the sharp-small pointed rod, with sharp head. Fill his heart with good will.
आ रिख किकिरा कृणु पणीनां हृदया करें। अथेमस्मभ्यं रन्धय॥
हे ज्ञानी पूषन्देव! चोरों के हृदयों को रेखाङ्कित करें। उनके हृदयों की कठोरता को भली-भाँति कम करें और उन्हें हमारे वश में करें।[ऋग्वेद 6.53.7]
Hey enlightened Pusha Dev! Touch the hearts of thieves. Soften their hearts and put them under our control.
यां पूषन्ब्रह्मचोदनीमारां बिभर्ष्याघृणे।
तया समस्य हृदयमा रिख किकिरा कृणु॥
हे दीप्ति सम्पन्न पूषन! आप अन्न प्रेरक प्रतोद धारण कर उसके द्वारा समस्त लोभी व्यक्तियों का हृदय रेखाङ्कित करें एवं उसकी कठोरता शिथिल करें।[ऋग्वेद 6.53.8]
प्रतोद :: पशु हाँकने की छड़ी, औगी, पैना, कोड़ा, चाबुक, एक प्रकार का साम गान; whiplash.
Hey aurous Pusha Dev! Bear the whiplash for directing the greedy for releasing food grains, punish the greedy and soften their hearts.
या ते अष्ट्रा गोओपशाघृणे पशुसाधनी। तस्यास्ते सुम्नमीमहे॥
हे दीप्तिशाली पूषन देव! आप जिस अस्त्र से धेनुओं और पशुओं को परिचालित करते हैं, हम आपके उसी अस्त्र से उपकार की प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 6.53.9]
Hey radiant Pusha Dev! We worship-pray your weapon for favours with which you controlled the cows and animals. 
उत नो गोषणिं धियमश्वसां वाजसामुत। नृवत्कृणुहि वीतये॥
हे पूषन देव! हमारे यज्ञादि कार्य की सफलता हेतु आप गौ, अश्व, अन्न और सेवक प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.53.10]
Hey Pusha Dev! Grant us cows, horses and servants for the success of our Yagy.(18.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (54) :: ऋषि :- ऋजिश्वा भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- पूषा,  छन्द :- गायत्री।
सं पूषन्विदुषा नय यो अञ्जसानुशासति। य एवेदमिति ब्रवत्॥
हे पूषा देव! आप हमें एक ऐसे विलक्षण व्यक्ति से मिलावें, जो हमें वस्तुतः रास्ता बतावें और जो हमारे अपहृत द्रव्य को प्राप्त करने का मार्ग बतावें।[ऋग्वेद 6.54.1]
Hey Pusha Dev! Arrange our meeting some amazing person who can show us the right path and guide us the way to recover our snatched-looted wealth.
समु पूष्णा गमेमहि यो गृहाँ अभिशासति। इम एवेति च ब्रवत्॥ 
हम पूषा की कृपा से ऐसे व्यक्ति से मिलें, जो समस्त गृह में दिखावेगा और कहेगा कि ये ही आपके खोये हुए पशु हैं।[ऋग्वेद 6.54.2]
We should meet some one by the grace of Pusha Dev who will direct-guide us to place-house where our animals are hidden.
पूष्णश्चक्रं न रिष्यति न कोशोऽव पद्यते। नो अस्य व्यथते पविः॥
पूषा का आयुध चक्र विनष्ट नहीं होता। इस चक्र का कोश हीन नहीं होता और इसकी धार कुण्ठित नहीं होती।[ऋग्वेद 6.54.3]
The weapon disc of Pusha Dev which is never destroyed nor its tooth-edge become blunt. Its revolutions-cycles are maintained.
यो अस्मै हविषाविधन्न तं पूषापि मृष्यते। प्रथमो विन्दते वसु॥
जो व्यक्ति हव्य द्वारा पूषा की सेवा करता है, उसका पूषा लेशमात्र भी अपकार नहीं करते और प्रधानतः वही व्यक्ति धन भी प्राप्त करता है।[ऋग्वेद 6.54.4]
One who make offerings and serve Pusha Dev is not harmed by him and granted wealth.
पूषा गा अन्वेतु नः पूषा रक्षत्वर्वतः। पूषा वाजं सनोतु नः॥
रक्षा के लिए हमारी गायों का पूषा अनुसरण करें। वे हमारे अश्वों की रक्षा करें और हमें अन्न एवं धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.54.5]
Let Pusha Dev follow our cows for their protection; protect our horses and grant us food grains and wealth as well.
पूषन्ननु प्र गा इहि याजकगणस्य सुन्वतः। अस्माकं स्तुवतामुत॥
हे पूषा देव! रक्षा के लिए सोम का अभिषव करने वाले याजकगण की गौओं का अनुसरण जानी-मानी गौवें भी करें।[ऋग्वेद 6.54.6]
Hey Pusha Dev! Let the well knows cows follow the cows of the Ritviz for protection, who extract Somras.
माकिर्नेशन्माकी रोरिषन्माकीं सं शारि केवटे। अथारिष्टाभिरा गहि॥
हे पूषा देव! हमारा गोधन नष्ट न होने पावे। यह व्याघ्रादि द्वारा मोहित न होने पावे। यह कुएँ में न गिरे। इसलिए आप अहिंसित गौवों के साथ सायंकाल हमारे पास लौट आवें।[ऋग्वेद 6.54.7]
Hey Pusha Dev! Make sure that our wealth in the form of cows is not lost. It should not be enchanted-mesmerised by the tiger etc. It should not fall into the well. Hence, you should return in the evening with the unharmed cows.
शृण्वन्तं पूषणं वयमिर्यमनष्टवेदसम्। ईशानं राय ईमहे॥
हमारे स्तोत्रों को सुनने वाले, दारिद्र नाशक, अविनष्ट धन और समस्त संसार के अधिपति पूषादेव के पास हम धन के लिए प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 6.54.8]
We worship-pray in front of Pusha Dev who is the lord of the world, for wealth. He listen our Strotr, remove poverty and protect the wealth.
पूषन्तव व्रते वयं न रिष्येम कदा चन। स्तोतारस्त इह स्मसि॥
हे पूषा देव! जब तक हम आपकी उपासना में लगे रहते हैं, तब तक हम कभी मारे न जावें। प्रत्युत पहले की तरह ही सुरक्षित रहें।[ऋग्वेद 6.54.9]
Hey Pusha Dev! We should be alive till we are busy with your worship-prayers and remain protected as before.
परि पूषा परस्ताद्धस्तं दधातु दक्षिणम्। पुनर्नो नष्टमाजतु॥ 
हे पूषा देव! अपने दाहिने हाथ से हमारे गोधन को कुमार्ग गामी होने से बचावें। वे हमारे नष्ट गोधन को पुनः प्राप्त करावें।[ऋग्वेद 6.54.10]
Hey Push Dev! Protect our cows from following wrong direction with your right hand. He should restore our lost wealth in the form of cows.(19.10.2023)
ऋषि :-
एहि वां विमुचो नपादाघृणे सं सचावहै। रथीर्ऋतस्य नो भव॥
हे दीप्ति सम्पन्न प्रजापति पुत्र पूषा देव! आपका स्तोता मेरे पास आवे। हम दोनों मिलें और आप हमारे यज्ञकर्म का नेतृत्व करें।[ऋग्वेद 6.55.1]
Hey radiant Pusha Dev, son of Praja Pati! Let your Strotr come to me. We should join together and lead the Yagy activities.
रथीतमं कपर्दिनमीशानं राधसो महः। रायः सखायमीमहे॥
हम अपने रथि श्रेष्ठ, चूड़ावान (कपर्दी), अतुल ऐश्वर्य के अधिपति और अपने मित्र पूषा के पास धन की याचना करते हैं।[ऋग्वेद 6.55.2]
हम अपने मित्र पूषा, सारथियों के मुखिया, चोटी-बालों की पहनने वाले, अनंत धन के स्वामी से धन की याचना करते हैं।
We solicit riches of our friend, Pusha, the head of charioteers, the wearer of a braid of hair, the lord of infinite wealth.
We request our friend Pusha, who is an excellent charioteer, has band of hair our the head, possessor of infinite wealth; for wealth.
रायो धारास्याघृणे वसो राशिरजाश्व। धीवतोधीवतः सखा॥
हे दीप्तिशाली पूषा! आप धन के प्रवाह हैं, धन की राशि हैं, आप ही स्तुति करने वाले स्तोत्राओं के मित्र हैं।[ऋग्वेद 6.55.3]
Hey radiant Pusha! You are the flow & lord of wealth and friend of Stotas who pray-worship you. 
पूषणं न्व १ जाश्वमुप स्तोषाम वाजिनम्। स्वसुर्यो जार उच्यते॥
आज हम उन्हीं छाग (बकरी) वाहन और अन्न युक्त सूर्य या पूषा की प्रार्थना करते हैं, जिन्हें लोग भगिनी या उषा का प्रणयी अथवा जार कहते हैं।[ऋग्वेद 6.55.4]
GALLANT :: श्रेष्ठ, बहादुर, वीर; heroic, brave, plucky, mettlesome, hardy, valiant, daring, valorous, excellent, best, surpassing, nailing, spanking.
We worship possessor of food grains Sury Dev-Sun or Pusha Dev who ride the goat and possess food grains, whom people call gallant sister or paramour of Usha.  
मातुर्दिधिषुमब्रवं स्वसुर्जारः शृणोतु नः। भ्रातेन्द्रस्य सखा मम॥
रात्रि रूपिणी माता के पति पूषा की हम प्रार्थना करते हैं। अपनी भगिनी (उषा) के जार पूषा (सूर्य) हमारा स्तोत्र श्रवण करें। इन्द्र देव के भ्राता पूषा हमारे मित्र होवें।[ऋग्वेद 6.55.5]
We pray-worship Pusha Dev who is the husband of the Night like a mother. Let sister Usha and Zar-Pusha, the Sun, listen-respond to our Strotr. Let Pusha Dev brother of Indr Dev become our friend. 
आजासः पूषणं रथे निशृम्भास्ते जनश्रियम्। देवं वहन्तु बिभ्रतः॥
रथ में नियुक्त छागगण स्तोताओं के आश्रय पूषा का रथ वहन करते हुए उन्हें यहाँ ले आवें।[ऋग्वेद 6.55.6]
Let the goats deployed in the charoite bring Pusha Dev, who is the asylum of Stotas, here.(20.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (56) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- पूषा,  छन्द :- गायत्री, अनुष्टुप्।
य एनमादिदेशति करम्भादिति पूषणम्। न तेन देव आदिशे॥
जो पूषा को घी मिले जौ के सत्तू का भोगी कहकर उनकी प्रार्थना करता है, उसे अन्य देवों की प्रार्थना नहीं करनी पड़ती।[ऋग्वेद 6.56.1]
One who worship Pusha Dev by saying that he is the eater of roasted & grinded barley mixed with Ghee; need no other demigods-deities.
उत घा स रथीतमः सख्या सत्पतिर्युजा। इन्द्रो वृत्राणि जिघ्नते॥
रथि श्रेष्ठ, साधुओं के रक्षक और सुप्रसिद्ध इन्द्र देव अपने मित्र पूषा की सहायता से शत्रुओं का संहार करते हैं।[ऋग्वेद 6.56.2]
Best amongest the charioteers, protector of the sages famous-honoured Indr Dev destroy the enemies with the help of his friend Pusha Dev. 
उतादः परुषे गवि सूरश्चक्रं हिरण्ययम्। न्यैरयद्रथीतमः॥
चालक और रवि श्रेष्ठ पूषा सूर्य के हिरणमय रथ का चक्र नियत परिचालित करते हैं।[ऋग्वेद 6.56.3]
Driver and best Ravi, Pusha cycle-drive the golden charoite of Sun in a fixed manner-regularly.
यदद्य त्वा पुरुष्टुत ब्रवाम दस्त्र मन्तुमः। तत्सु नो मन्म साधय॥
हे बहुलोक वन्दनीय, मनोहर मूर्ति और ज्ञानी पूषा! प्रतिदिन हम जिस धन को लक्ष्य करके आपकी प्रार्थना करते हैं, उसी वांच्छित धन को हमें प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.56.4]
Hey beautiful and enlightened Pusha Dev, revered-honoured in many abodes! Grant us the wealth for which we pray-worship you.
इमं च नो गवेषणं सातये सीषधो गणम्। आरात्पूषन्नसि श्रुतः॥
हे पूषा! गौ की कामना करने वाले इन समस्त मनुष्यों को गौ प्राप्त करावें। आप समीप और दूर से भी प्रसिद्ध हैं अर्थात् आप सर्वव्यापक हैं।[ऋग्वेद 6.56.5]
Hey Pusha Dev! Grant cows to the humans who desire them. You are famous far & wide i.e., you pervade all places.
आ ते स्वस्तिमीमह आरे अघामुपावसुम्।
अद्या च सर्वतातये श्वश्च सर्वतातये॥
हे पूषा देव! हम आज और कल के यज्ञों के सम्पादन के लिए आपकी उसी रक्षा को चाहते हैं। आप हमें धन प्रदान करें और पाप कर्म से बचावें।[ऋग्वेद 6.56.6]
Hey Pusha Dev! We seek asylum under you for conducting Yagy today and tomorrow. Grant us wealth and protect-save us from committing-doing sins.(21.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (57) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- पूषा,  छन्द :- त्रिष्टुप्, जगती।
इन्द्रा नु पूषणा वयं सख्याय स्वस्तये। हुवेम वाजसातये॥ 
हे इन्द्र देव और पूषा देव! अपने मंगल के लिए आज हम आपकी मित्रता और अन्न की प्राप्ति के लिए आपका आवाहन करते हैं।[ऋग्वेद 6.57.1]
Hey Indr Dev & Pusha Dev! We invoke you for your friendship for our welfare and food grains.
सोममन्य उपासदत्पातवे चम्वोः सुतम्। करम्भमन्य इच्छति॥
आप में से एक (इन्द्र देव) पात्र स्थित अभिषुत सोमरस का पान करने के लिए जाते हैं और दूसरे (पूषा) जौ का सत्तू खाने की इच्छा करते हैं।[ऋग्वेद 6.57.2]
Indr Dev is desirous of drinking Somras and Pusha Dev wish to eat roasted & grounded barley.
अजा अन्यस्य वह्नयो हरी अन्यस्य संभृता। ताभ्यां वृत्राणि जिघ्नते॥
एक के वाहन-सवारी छाग हैं और दूसरे के वाहन स्थूल काय दो अश्व हैं। दूसरे (इन्द्र देव) इन्हीं दोनों अश्वों के साथ वृत्रासुर का संहार करते हैं।[ऋग्वेद 6.57.3]
The vehicle-conveyance of Indr Dev are two Stallion named Hari, while Pusha Dev rides the goats.
यदिन्द्रो अनयद्रितो महीरपो वृषन्तमः। तत्र पूषाभवत्सचा॥
जिस समय अतिशय वर्षक इन्द्र देव महावृष्टि करते हैं, उस समय इनके सहायक पूषा ही होते हैं।[ऋग्वेद 6.57.4]
When Indr Dev resort to downpour, Pusha Dev assist him.
तां पूष्णः सुमतिं वयं वृक्षस्य प्र वयामिव। इन्द्रस्य चा रभामहे॥
हम वृक्ष की सुदृढ़ शाखा के सदृश पूषा और इन्द्र देव की कृपा दृष्टि के ऊपर ही निर्भर रहते है।[ऋग्वेद 6.57.5]
कृपा दृष्टि :: regard, grace, favour, obligation, condescension, pleasure, favour, mercy, blessing, benevolence. 
We depend-survive over the blessings-favours of Pusha & Indr Dev like the strong branch of a tree.
उत्पूषणं युवामहे ऽ भीशँरिव सारथिः। मह्या इन्द्रं स्वस्तये॥
जिस प्रकार सारथि लगाम खींचता है, उसी प्रकार हम भी अपने प्रहर्षित कल्याण के लिए पूषा और इन्द्र देव को अपने पास खींचते हैं।[ऋग्वेद 6.57.6]
प्रहर्षित :: प्रसन्न, हर्षित, आनंदित, कठोर या कड़ा, अकड़ा हुआ, संभोग के लिये उत्तेजित किया हुआ; excited.
The way the charoite drive pulls the reins we too are pulled-dragged towards Indr Dev & Pusha Dev for our welfare.(22.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (58) :: ऋषि :-  भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- पूषा,  छन्द :- त्रिष्टुप् जगती। 
शुक्रं ते अन्यद्यजतं ते अन्यद्विषुरूपे अहनी द्यौरिवासि।
विश्वा हि माया अवसि स्वधावो भद्रा ते पूषन्निह रातिरस्तु॥
हे पूषा! आपका यह रूप (दिन) शुक्लवर्ण है और अन्य रूप (रात्रि) केवल यजनीय हैं। इस प्रकार दिन और रात्रि के रूप विभिन्न प्रकार के हैं। आप सूर्य देव के सदृश प्रकाशमान हैं; क्योंकि आप सभी के दाता हैं और सब प्रकार के ज्ञान धारित करते है। इस समय आपका कल्याणकारी दान हमें प्राप्त होवे।[ऋग्वेद 6.58.1]
Hey Pusha! Your bright phase-day and the other one dark phase-night deserve worship. You are radiant like the Sun. You benefit all and is enlightened. Let us receive your donation meant for welfare.
अजाश्वः पशुपा वाजपस्त्यो धियं जिन्वो भुवने विश्वे अर्पितः।
अष्ट्रां पूषा शिथिरामुद्वरीवृजत् संचक्षाणो भुवना देव ईयते॥
जो छाग वाहन और पशु पालक हैं, जिनका घर अन्न से परिपूर्ण है, जो स्तोताओं के प्रीतिदाता हैं, जो अखिल भुवनों के ऊपर स्थापित हैं, वही देव (पूषा) सूर्य रूप से समस्त प्राणियों को प्रकाशित करके और अपने हाथ से आरा उठाकर नभो मण्डल में जाते हैं।[ऋग्वेद 6.58.2]
He who nurture the goats and animals, his house is full of food grains, loves-affectionate to the Stotas, placed at the highest point of all abodes, that Pusha Dev raise the saw in his hands and goes to the sky-space.
यास्ते पूषन्नावो अन्तः समुद्रे हिरण्ययीरन्तरिक्षे चरन्ति।
ताभिर्यासि दूत्यां सूर्यस्य कामेन कृत श्रव इच्छमानः॥
हे पूषा देव! आपकी जो सारी हिरण्यमयी नौकाएँ समुद्र मध्यस्थित अन्तरिक्ष में चलती हैं, उनके द्वारा आप सूर्य देव का दूत कार्य करते हैं। आप हव्यरूप अन्न चाहते हैं। स्तोता लोग आपको स्वेच्छा से दिए पशु आदि के द्वारा वशीभूत करते हैं।[ऋग्वेद 6.58.3]
Hey Pusha Dev! Your golden vessels, ships, boats stationed in the ocean navigate functioning as the messenger of Sury Dev. You are desirous of offerings in the form of food grains. The Stotas wilfully offer you animals to seek your blessings.
पूषा सुबन्धुर्दिव आ पृथिव्या इळस्पतिर्मघवा दस्मवर्चाः।
यं देवासो अददुः सूर्यायै कामेन कृतं तवसं स्वञ्चम्॥
पूषा स्वर्ग और पृथ्वी के शोभन मित्र हैं, अन्न के अधिपति हैं, ऐश्वर्यशाली हैं, मनोहरमूर्ति हैं। वे बलशाली, स्वेच्छा से दिये पशु आदि के द्वारा प्रसन्नता के योग्य और शोभन गमनकर्ता हैं। उन्हें देवों ने सूर्यदेव की पत्नी के पास भेजा था।[ऋग्वेद 6.58.4]
Pusha Dev is a great friend of the earth and heavens, lord of food grains and possess grandeur and is attractive. He is mighty, feels happy by offering animals willingly and moves gracefully. The demigods-deities sent him to the wife of Sury Dev.(23.10.2023)
प्र पूषणं वृणीमहे युज्याय पुरूवसुम्।
स शक्र शिक्ष पुरुहूत नो धिया तुजे राये विमोचन॥
मित्रता की प्राप्ति के लिए हम बहु धन वाले पूषा देव का वरण करते हैं। हे अनेकों द्वारा आहूत और पाप विमोचक पूषन् देव! अपनी बुद्धि के द्वारा धन की प्राप्ति और शत्रु विनाश के लिए हमें सामर्थ्यवान् बनावें।[ऋग्वेद 8.4.15]
We accept Pusha Dev, possessor of various kind of wealth for friendship. Hey Pusha Dev, worshiped by several people and reliever of sins! Make us capable of earning money with the help of our intelligence and destruction of enemies.
सं नः शिशीहि भुरिजोरिव क्षुरं रास्व रायो विमोचन।
त्वे तन्नः सुवेदमुस्रियं वसु यं त्वं हिनोषि मर्त्यम्॥
(नाई की) बाँह में रहने वाले छुरे की तरह हमें तीक्ष्ण बुद्धि प्रदान करें। हे पाप विमोचक! हमें धन प्रदान करें। आपका गोधन हमारे लिए सुलभ हों। आप मनुष्यों के लिए यह धन भेजा करते हैं।[ऋग्वेद 8.4.16]
Grant us sharp intelligence like the knife of the barber. Hey reliever of sins! Grant us money. Let your cows be available to us. You keep on sending money for the humans.
वेमि त्वा पूषन्नृञ्जसे वेमि स्तोतव आघृणे।
न तस्य वेम्यरणं हि तद्वसो स्तुषे पज्राय साग्ने॥
हे पूषन्देव! मैं आपको प्रसाधित करने की इच्छा करता हूँ। हे दीप्तिमान् पूषन्! आपकी स्तुति करने की इच्छा करता हूँ। अन्य देवताओं की स्तुति करने की मैं इच्छा नहीं करता; क्योंकि वे हितकर नहीं हैं। निवास प्रद, स्तोता और साम मन्त्र युक्त पत्र (कक्षीवान्) को अभिलषित धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 8.4.17]
Hey Pusha Dev! I wish to decorate you. Hey radiant Pusha Dev! I wish to worship you. I do not wish to pray to other demigods-deities since they are not of no use to me. Grant Stota-Kakshiwan desired wealth alongwith residence and Sam Mantr.
परा गावो यवसं कच्चिदाघृणे नित्यं रेक्णो अमर्त्य।
अस्माकं पूषन्नविता शिवो भव मंहिष्ठो वाजसातये॥
हे दीप्ति वाले और अमर पूषन्देव! किसी समय हमारी गौवें चरने के बाद लौटती हैं। हमारा गौरूप धन नित्य हों। आप हमारे रक्षक और मङ्गलकारी हों। अन्नदान के लिए महान् होवें।[ऋग्वेद 8.4.18]
Hey aurous and immortal Pusha Dev! Our cows are like wealth for us, they graze and return home. You should be our protector and beneficial to us. You should be a great donor of food grains.
स्थूरं राधः शताश्वं कुरुङ्गस्य दिविष्टिषु।
राज्ञस्त्वेषस्य सुभगस्य रातिषु तुर्वशेष्वमन्महि॥
कुरुङ्ग नाम के दीप्त और सौभाग्यवान् राजा की स्वर्ग प्राप्ति के लिए यज्ञ और दान में मनुष्यों के बीच हमने प्रचुर और सौ अश्वों से युक्त धन को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 8.4.19]
We obtained lot of wealth and hundred horses in the Yagy conducted for the aurous & lucky king Kurang, who wished to attain heavens.
धीभिः सातानि काण्वस्य वाजिनः प्रियमेधैरभिद्युभिः।
षष्टिं सहस्त्रानु निर्मजामजे निर्यूथानि गवामृषिः॥
कण्व पुत्र और हवि वाले मेधातिथि और उनके स्तोताओं द्वारा भजन के योग्य तथा दीप्ति पाये हुए प्रियमेध नाम के ऋषियों द्वारा सेवित एवं अती पवित्र साठ हजार गौवों को कण्वपुत्र मेधातिथि ने सबके अन्त में प्राप्त किया।[ऋग्वेद 8.4.20]
Son of Kavy Medhatithi and other Stotas, worthy of recitation of sacred hymns, attained extremely pure sixty thousand cows after others; used-served by Priymedh Rishis.
वृक्षाश्चिन्मे अभिपित्वे अरारणुः। गां भजन्त मेहनाश्वं भजन्त मेहना॥ 
मेरे धन पाने पर वृक्षों ने भी हर्षध्वनि की, इन्होंने प्रशंसनीय गोधन और अश्वधन प्राप्त किया।[ऋग्वेद 8.4.21]
Even the trees made sound reflecting happiness when I got money, cows and horses.{20.03.2023)
 
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
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