Tuesday, May 19, 2015

HEAVEN-EARTH द्यावा-पृथ्वी (RIG VED ऋग्वेद 1-6)

HEAVEN-EARTH द्यावा-पृथ्वी
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
मही द्यौः पृथिवी च न इमं यज्ञं मिमिक्षताम्। 
पिपृतां नो भरीमभिः॥
अति विस्तारयुक्त पृथ्वी और द्युलोक हमारे इस यज्ञ कर्म को अपने-अपने अंशों द्वारा परिपूर्ण करें। वे भरण-पोषण करनेवाली सामग्रियों (सुख-साधनों) से हम सभी को तृप्त करें।[ऋग्वेद 1.22.13]
श्रेष्ठ आकाश और पृथ्वी ऐसे यज्ञ को सींचने की अभिलाषा करते हुए हमको पोषण शक्ति प्रदान करें।
Let the earth and the heavens add up to-contribute to our Yagy through their share and satisfy us by providing us with nourishment and amenities.
तयोरिद्‍घृतवत्पयो विप्रा रिहन्ति धीतिभिः। गन्धर्वस्य ध्रुवे पदे॥
गन्धर्व लोक के ध्रुवस्थान में आकाश और पृथ्वी के मध्य में अवस्थित घृत के समान (सार रूप) जलों (पोषक प्रवाहों) को ज्ञानी जन अपने विवेक युक्त कर्मों (प्रयासों) द्वारा प्राप्त करते हैं।[ऋग्वेद 1.22.14]
पृथ्वी और आकाश के मध्य गन्धर्वों के स्थान में ज्ञानी जन ध्यान पूर्वक घृत के समान जल पीते हैं।
The enlightened receives the extracts like the Ghee between the earth & sky at a fixed place (Dhruv Sthan) by means of their deeds aided with prudence.
स्योना पृथिवि भवानृक्षरा निवेशनी। यच्छा नः शर्म सप्रथः॥
हे पृथ्वी देवी! आप सुख देने वाली, बाधा हरने वाली और उत्तमवास देने वाली हैं। आप हमें विपुल परिमाण में सुख प्रदान करें।[ऋग्वेद 1.22.15]
हे पृथ्वी! तुम सुखदायिनी, विघ्न रहित और श्रेष्ठ वास देने वाली हो तथा हमको सहारा प्रदान करो।
Hey mother earth! You give us comforts-pleasure, remove our troubles and provide excellent place to live. Please grant us comforts in sufficient quantity.
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (159) ::  ऋषि :- दीर्घतमा, देवता :- द्यावा-पृथ्वी, छन्द :- जगती।
प्र द्यावा यज्ञैः पृथिवी ऋतावृधा मही स्तुषे विदथेषु प्रचेतसा। 
देवेभिर्ये देवपुत्रे सुदंससेत्था धिया वार्याणि प्रभूषतः
यज्ञ वर्द्धक, महान् और यज्ञ कार्य में चैतन्यकारी द्यावा-पृथिवी की मैं विशेष रूप से स्तुति करता हूँ। यजमान उनके पुत्र स्वरूप हैं। उनके कर्म को मनोवांछित धन प्रदान करते हैं। उनके कर्म सुन्दर हैं। अनुग्रह करते हुए वे यजमानों को मनोवांछित धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 1.159.1]
अनुष्ठानों को पुष्ट करने वाली, ज्ञान वर्द्धिनी क्षितिज धरा की मैं प्रार्थना करता हूँ। यजमान उनके पुत्र हैं। वे देवगण के साथ वरणीय धनों से धन देती हैं।
I specially pray to the great earth and the sky, who enhance-boost Yagy and make us conscious. The Ritviz-hosts are like their sons. They provide sufficient money to promote their endeavours. Their endeavours like granting money to the Ritviz are appreciable-beautiful.
उत मन्ये पितुरद्रुहो मनो माआर्पहि स्वतवस्तद्धवीमभिः। 
सुरेतसा पितरा भूम चक्रतुरुरु प्रजाया अमृतं वरीमभिः
मैंने आह्वान मंत्र द्वारा निर्द्रोह और पितृ स्थानीय द्युलोक के उदार और उत्तम मन को जाना है। मातृ स्थानीय पृथ्वी के मन को भी जाना है। पिता-माता (द्यावा-पृथ्वी) अपनी शक्ति से पुत्रों का भली-भाँति रक्षण करते हुए उन्हें प्रगतिशील बनाया।[ऋग्वेद 1.159.2]
मैं क्षितिज रूप पिता और धरा रूप माता के महत्व का चिन्तन करता हूँ। उन अत्यन्त पुरुषार्थियों ने जीवों को प्रकट किया और अन्नों को निर्मित किया।
I have recognised the earth & the sky (horizon) due to meditation. I have understood that the earth is mother. Its the parents (mother & father) who make their progeny progressive-efficient.
Food grains are produced over the earth to feed-nurture the living beings. For the Hindu, earth is the mother.
ते सूनवः स्वपसः सुदंससो मही जजुर्मातरा पूर्वचित्तये। 
स्थातुश्च सत्यं जगतश्च धर्मणि पुत्रस्य पाथः पदमद्वयाविनः
आपकी सन्तान, सुकर्मा और सुदर्शन प्रजायें आपके पहले के अनुग्रह को स्मरण करके आपको महान् और माता कहकर जानते हैं। पुत्र स्वरूप स्थावर और जंगम पदार्थ द्यावा-पृथ्वी के अतिरिक्त और किसी को नहीं जानते। आप उनकी रक्षा के लिए अबाध स्थान प्रदान करें।[ऋग्वेद 1.159.3]
सुदर्शन :: प्रिय, दिलकश, आकर्षक; comely, nice-looking.
अनुग्रह :: दया, सुघड़ता, इनायत, सुंदर ढंग, श्री, पक्षपात, अनुमति, अति कृपा, पत्र, इनायत; grace, favour, graciousness.
हे आसमान पृथ्वी! श्रेष्ठ कर्म वाले कुशल पुत्र रूपी प्रजागण तुम्हें जननी मानते हैं। तुम स्थावर, जंगम में सत्य स्थापित करने के लिए सूर्य के स्थान की रक्षा करते हो।
Your progeny and the pious, comely, nice looking populace remember your grace earlier and consider you as a great mother. The immovable-stationary and movable living beings do not know any one except the horizon and the earth. Please make sufficient arrangements-space for their protection.
ते मायिनो ममिरे सुप्रचेतसो जामी सयोनी मिथुना समोकसा। 
नव्यंनव्यं तन्आपा तन्वते दिवि समुद्रे अन्तः करेंयः सुदीतयः
द्यावा-पृथ्वी सहोदरा भगिनी और एक स्थान पर रहने वाले जोड़े हैं। वे प्रज्ञायुक्त और चैतन्यकारी हैं। किरणें उनका विभाग करती हैं। अपने कार्य में निरत और सुप्रकाशित रश्मियाँ द्योतमान अन्तरिक्ष के बीच नये-नये सूत्रों को विस्तारित करती हैं।[ऋग्वेद 1.159.4]
प्रज्ञायुक्त :: prudent, wise or judicious in practical affairs, sagacious, discreet or circumspect, sober. 
आकाश और धरती एक स्थान से उत्पन्न हुए सहोदरा हैं। वे प्रजा से युक्त हैं। रश्मियाँ उनका विभाजन करती हैं और नए सूत्रों को प्रकट करती हैं।
The sky-horizon and the earth are twins and live in a pair. They are conscious and discreet. Rays of light divide-differentiate between them. They perform their assigned duties and give rise to new equations-compositions.
तद्राधो अद्य सवितुर्वरेण्यं वयं देवस्य प्रसवे मनामहे। 
अस्मभ्यं द्यावापृथिवी सुचेतुना रयिं धत्तं वसुमन्तं शतग्विनम्
आज सविता देवता की आज्ञा के अनुसार उस वरणीय धन को चाहते हैं। हमारे ऊपर द्यावा-पृथ्वी अनुग्रह करके गृह आदि और शत-शत गौओं से युक्त धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 1.159.5]
वे द्यावा-धरा! सविता की शिक्षा में स्थिर तुमसे हम उस अत्यन्त श्रेष्ठ धन की विनती करते हैं तुम हमको श्रेष्ठ निवास तथा गवादि परिपूर्ण समृद्धि को प्रदान करो। 
We wish to acquire the wealth as per the directives of Savita. Let Both sky and the earth favour us and grant house, hundreds of cows and riches.  
द्यावा पृथ्वी :: आकाश और पृथ्वी को भी देव वर्ग में रखा गया है। इनका आह्वान एक साथ जोड़कर ही किया गया है। पृथ्वी का ऋग्वेद की तीन ऋचाओं में स्वतंत्र वर्णन है, पर धौः का अलग से वर्णन नहीं मिलता। ये दोनों पितरा-मातरा (पिता-माता) के रूप में भी संबोधित किए गए हैं। द्यावा-पृथ्वी को सृष्टि के जीवों के सृजन और पालन-पोषण कर्ता के रूप में माना गया है। ऋचाओं में कहा गया है कि ये द्यावा पृथ्वी पूरी सृष्टि को समृद्धि देते हैं। वे पवित्र हैं।
शक्ति उपासना का मूल आधार आद्य ग्रन्थ ऋग्वेद की द्यावा-पृथ्वी हैं, जिसमें पृथ्वी स्त्री मानी गई है और आकाश पुरुष।
ऋग्वेद ने वरूण देव जिन्होंने विस्तृत द्यावा-पृथ्वी की स्थापना की, इन्होंने ही आकाश और नक्षत्रों को प्रेरित कर पृथ्वी को प्रशस्त किया, को पहिया युक्त कहा है। 
द्युलोक से ऊपर जो कुछ भी है और पृथ्वी से नीचे जो कुछ भी है जिसे हम द्यावा-पृथ्वी कहते हैं।
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (160) ::  ऋषि :- दीर्घतमा, देवता :- द्यावा-पृथ्वी, छन्द :- जगती।
ते हि द्यावापृथिवी विश्वशंभुव ऋतावरी रजसो धारयत्करी।  
सुजमन्मनी घिषणे अन्तरीयते देवो देवी धर्मणा सूर्यः शुचिः
द्यावा-पृथ्वी संसार के लिए सुख दायिनी, यज्ञवती, जल उत्पन्न करने के लिए चेष्टा युक्त, सुजाता और अपने कार्य में निपुण हैं। द्योतमान्-अग्नि और शुचि सूर्य द्यावा-पृथ्वी के मध्य में अपने-अपने कार्यों द्वारा सदैव गमन करते हैं।[ऋग्वेद 1.160.1]
सुजाता :: सुजाता ने भगवान बुद्ध को भोजन कराया था, सुजाता अष्टावक्र ऋषि की माता थीं, उत्तम कुलोत्प्न्न; name of the woman who offered meals to Bhagwan Budh, name of Rishi Ashtawakr's mother, well born.
अंतरिक्ष को अग्नि में धारण करने वाली क्षितिज धरा सभी को सुख प्रदान करने वाली है। उनके मध्य सूर्य प्रतिदिन नियम पूर्वक विचरणशील हैं।
The combination of earth and the horizon-sky are meant to provide comforts, create showers-rains, inspire for Yagy, active, well born and skilled in their job. The fire-Agni and the Sun keep on cycling between them.
उरुव्यचसा महिनी असश्चता पिता माता च भुवनानि रक्षतः। 
सुधृष्टमे वपुष्येन रोदसी पिता यत्सीमभि रूपैरवासयत्
विशाल, विस्तीर्ण और परस्पर वियुक्त माता-पिता (द्यावा-पृथ्वी) प्राणियों की रक्षा करते है। मनुष्यों के मंगल के लिए ही द्यावा-पृथ्वी मानो सचेष्ट हैं, क्योंकि पिता समस्त पदार्थों को रूप प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 1.160.2]
अत्यन्त व्यापक और विशाल क्षितिज और धरा पिता और जननी रूप से सभी लोकों का पोषण करते हैं, जैसे पिता अपने बालक को महान वस्त्रों से आच्छादित करता है।
The wide-vast corelated horizon & the earth support the living beings. They act for the well being of the organism like the father who provide all materials-commodities to the progeny. 
स वह्निः पुत्रः पित्रोः पवित्रवान्पुनाति धीरो भुवनानि मायया। 
धेनुं च पृश्निं वृषभं सुरेतसं विश्वाहा शुक्रं पयो अस्य दुक्षत
पिता-माता (द्यावा-पृथ्वी) के पुत्र सूर्य हैं। वे धीर और फलदाता हैं। अपनी बुद्धि से वे समस्त भूलोक को प्रकाशित करते हैं। वे शुक्ल वर्ण धेनु (पृथ्वी) और सेचन कार्य में समर्थ वृष (द्युलोक) को भी प्रकाशित करते हैं। वे द्युलोक से निर्मल दूध दुहते हैं।[ऋग्वेद 1.160.3]
धीर :: शांत स्वभाव वाला, नम्र, विनीत; passionless, halcyon.
वह माता-पिता को भार वहन करने वाला सूर्य अपने पराक्रम से संसार को पवित्र करता है। वह अनेक रंगों वाली धरती रूपी गौ और पौरुष युक्त आसमान रूपी वृषभ करता हुआ धरती से रस रूपी दुग्ध का दोहन करता है।
Sun is the son of the earth and the sky. He is passionless-halcyon and grant rewards lighten the earth. He nourish and lighten the earth and the heavens. He milch the heavens.
Its the Sun, who is essential for life over the earth.
अयं देवानामपसामपस्तमो यो जजान रोदसी विश्वशंभुवा। 
वि यो ममे रजसी सुक्रतूययाजरेभिः स्कम्भनेमिः समानृचे
वे देवों में देवोत्तम और कर्मियों में कर्म श्रेष्ठ हैं। उन्होंने सर्व सुखदाता द्यावा-पृथ्वी को प्रकट किया और प्राणियों के सुख के लिए द्यावा-पृथ्वी को विभक्त करके सुदृढ़ खूँटे में इन्हें स्थिर कर रखा है।[ऋग्वेद 1.160.4]
देवताओं में महान परमात्मा महान कर्मा है। उसने क्षितिज धरा को रचित किया। उसी ने अपनी प्रजा से दोनों जगत को नापा और जीर्ण न होने वाले स्तम्भों पर टिका दिया। 
The Almighty in the form of Sun (Sury Narayan) is best amongest the performers. Its he who made the horizon & the earth visible. Its he who provide all sorts-kinds of comforts-amenities and divided the sky & the earth and makes them stable.
The Sun is at the core of the planetary system. Its gravitational force keep the solar system well knit-tied and functional. Newton's laws and Kepler's laws just describe this phenomenon. Veds describe the various forces at length.
ते नो गृणाने महिनी महि श्रवः क्षत्रं द्यावापृथिवी धासथो बृहत्ये। 
येनाभि कृष्टीस्ततनाम विश्वहा पनाय्यमोजो अस्मे समिन्वतम्
हे द्यावा-पृथ्वी! हम आपकी स्तुति करते हैं। आप महान् है, हमें प्रभूत अन्न और बल प्रदान करें, जिससे हम सदैव पुत्रादि प्रजा का विस्तार करें। हमारे शरीर में प्रशंसनीय बल की वृद्धि करें।[ऋग्वेद 1.160.5] 
हे क्षितिज धरा! तुम हमारे लिए श्रेष्ठ समृद्धि और शक्ति को धारण करो जिससे धन प्रजाओं का विस्तार हो।
Hey horizon and the earth! We pray-worship you. You are great. Grant us nourishing food grains and strength-power, so that we are able to extend our family lineage-lining. Add appreciable might to our bodies.
ऋग्वेद संहिता, प्रथम मण्डल सूक्त (185) ::  ऋषि :- अगस्त्य, देवता :- द्यावा-पृथिवी,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
कतरा पूर्वा कतरापरायोः कथा जाते करेंयः को वि वेद। 
विश्वं त्मना बिभृतो यद्ध नाम वि वर्तते अहनी चक्रियेव
हे कवि गण  धुलोक और पृथ्वी लोक में पहले कौन उत्पन्न हुआ है, पीछे कौन उत्पन्न हुआ है, यह किसलिए उत्पन्न हुए हैं, यह बात कौन जानता है? दिन और रात्रि का निर्माण करने वाले दोनों समस्त संसार को धारण कर चक्र के समान घूमते अर्थात् भ्रमण करते रहते हैं।[ऋग्वेद 1.185.1]
हे ऋषियों! आकाश और पृथ्वी में कौन पहले और कौन बाद में रचित हुआ? इस बात को जानने वाला कौन है? ये दोनों अपने आप समस्त पदार्थों को धारण करती और दिन-रात के तुल्य विचरण करती है, वह न चलने वाली, बिना पैरों के आकाश पृथ्वी पैरों वाले शरीर धारियों को माता-पिता के समान गोद में धारण करती है। 
Hey Rishi Gan-sages! Who was born first, the earth or the sky? What is purpose behind their origin? Both of them keep on revolving bearing-supporting the entire-whole universe. 
भूरिं  द्वे अचरन्ती चरन्तं पद्वन्तं गभमपदी दधाते। 
नित्यं न सूनुं पित्रोरुपस्थे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्
पाद रहित और अविचल द्यावा पृथ्वी पादयुक्त तथा सचल गर्भस्थित प्राणियों को माता-पिता की गोद में पुत्र की तरह धारण करते हुए हमें पापों से बचायें।[ऋग्वेद 1.185.2]
हे आकाश पृथ्वी! हमारी डर से सुरक्षा करो। अक्षय, शुद्ध प्रकाशित, अमर, पूजनीय, धन की प्रार्थना करता हूँ। स्तोता के लिए उसे उत्पन्न करो और भयों से हमारी सुरक्षा करो।
Free from legs-rigid (immovable looking) sky & the earth bear all stationary & movable living beings-organism like mother & father protecting us from all fears-sins.  
अनेहो दात्रमदितेरनर्वं हुवे स्वर्वदवधं नमस्वत्। 
तद्रोदसी जनयतं जरित्रे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्
हम माता अदिति से पाप रहित, अक्षीण, हिंसा रहित, अन्न युक्त और स्वर्ग तुल्य धन के लिए प्रार्थना करते हैं। द्यावा पृथ्वी स्तोता यजमान के लिए वही धन उत्पन्न करते हुए उन्हें महापापों से बचावें।[ऋग्वेद 1.185.3]
दिन-रात्रि परिपूर्ण, देवों में पीड़ा रहित, अन्न से युवा, सुरक्षा वाली, अद्भुत गुणों से परिपूर्ण आकाश पृथ्वी मेरे अनुकूल रहें।
We request-pray to Dev Mata (mother of demigods-deities) Aditi for sinless, violence free, possessing food grains heaven like riches. Earth & sky create such wealth for the Stota hosts, Ritviz. 
अतप्यमाने अवसावन्ती अनु ष्याम रोदसी देवपुत्रे। 
उभे देवानामुभयेभिरह्नां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्
हम प्रकाशमान दिन और रात्रि के उभयविध धन के लिए दुःख-रहित और अन्न द्वारा तृप्तिकारी धावा पृथ्वी का अनुगमन कर सकें। हे द्यावा पृथ्वी! आप हमें महापापों से बचायें।[ऋग्वेद 1.185.4]
हे आकाश पृथ्वी! भयानक डरों से हमारी सुरक्षा करो। संग चलने वाली, सदैव तरुण, तुल्य सोम परिपूर्ण, भगिनी भूत, क्षितिज-धरा, माता-पिता की गोद रूप है।
Let us earn-create wealth-assets through day & night, which is free from pains-sorrow following the sky & the earth. Hey Sky & Earth! Protect us from sins-fears.
संगच्छमाने युवती समन्ते स्वसारा जामी पित्रोरुपस्थे। 
अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्
परस्पर संसक्त, सदा युवा, समान सीमा से संयुक्त, भगिनी भूत और मित्र सदृश द्यावा पृथ्वी माता-पिता के क्रोड स्थित और प्राणियों के नाभि-स्वरूप, जल का घ्राण करते हुए हमें महापाप से बचायें।[ऋग्वेद 1.185.5]
क्रोड़ :: गोद; lap.
हे अम्बर-धरा! भयावह डर से हमारी सुरक्षा करो। विस्तीर्ण बाल स्थान, महान रक्षाओं से युक्त आकाश और धरती का देवगणों की प्रसन्नता के लिए आह्वान करता हूँ। यह आश्चर्य रूप वाले जल को धारण करने में सक्षम हैं। यह हमारी महान पाप में रक्षा करें।
Joined-connected together, always young, having common boundaries, like sister and friend; the sky & the earth protect us, from great dangers, sins-fears, holding us in their lap.
उर्वी सद्मनी बृहती ॠतेन हुवे देवानामवसा जनित्री। 
दधाते ये अमृतं सुप्रतीके द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्
देवों की प्रसन्नता के लिए मैं विस्तीर्ण निवास भूत, महानुभाव और शस्यादि-समुत्पादक छावा पृथ्वी को यज्ञ के लिए बुलाता हूँ। इनका रूप आश्चर्यजनक है और ये जल धारण करते है। हे द्यावा पृथ्वी! हमें महापाप से बचावें।[ऋग्वेद 1.185.6]
प्रतीत्य समुत्पाद :: अविद्या, संस्कार विज्ञान, नामरूप, षडायतन, स्पर्श, वेदना, तृष्णा, उपादान, भय, जाति और दुःख से बारहों पदार्थ जो उत्तरोत्तर संबद्ध हैं और क्रमात् एक दूसरे से उत्पन्न होते हैं।
समुत्पाद :: having same origin.
मैं इस यज्ञ में विस्तीर्ण, अनेक रूपवाली, असीमित आकाश और पृथ्वी की पूजा करता हूँ। यह सौभाग्यवती सभी पदार्थ और मनुष्यों को धारण करती है। हे आकाश-पृथ्वी! हमारी महापाप से सुरक्षा करो।
I invite the sky & earth for Yagy, for the sake of the demigods-deities, over this vast living abode bearing greenery, having the same-common origin. They have amazing figures (shapes & sizes) and they bear water. Hey earth & the sky! protect us from sins-fears, worries.
उर्वी पृथ्वी बहुले दूरेअन्ते उप ब्रुवे नमसा यज्ञे अस्मिन्द। 
दधाते ये सुभगे सुप्रतूर्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्
महान् पृथु, अनेक आकारों से विशिष्ट और अनन्त द्यावा पृथ्वी की यज्ञस्थल में मैं नमस्कार मंत्र द्वारा स्तुति करता हूँ। हे सौभाग्यवती और उद्धार कुशला द्यावा पृथ्वी! आप संसार को धारण करके हमें महा पाप से बचावें।[ऋग्वेद 1.185.7]
हे आकाश-पृथ्वी! देवगण, बन्धुगण, जमाता आदि के प्रति हमने जो पाप किये हों वे इस श्लोक से अनुष्ठान द्वारा दूर हो जायें। तुम हमको महापाप से बचाओ।
Hey vivid forms acquiring Sky & Earth! I salute you with the help of prayer Mantr-hymns, in the Yagy conducted by king Prathu. You protects us from the sins of high magnitude.
देवान्वा यच्चकृमा कच्चिदागः सखायं वा सदमिज्जास्पतिं वा। 
इयं धीर्भूया अवयानमेषां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात्
हम देवों के पास जो सदा अपराध करते हैं, मित्र और जामाता के प्रति जो सब अपराध करते हैं, हमारा वह यज्ञ उन सब पापों को दूर करे।[ऋग्वेद 1.185.8]
मनुष्यों की भलाई करने वाली अम्बर धरा मुझे शरण प्रदान करें और  पोषण करती हुई मेरे संग रहें।
Let our Yagy vanish our sins pertaining to the demigods-deities, friends other people. 
उभा शंसा नर्या मामविष्टामुभे मामूती अवसा सचेताम्। 
भूरि चिदर्य: सुदास्तरायेषा मदन्त इषयेम देवाः
स्तुति योग्य और मनुष्यों के हितकर द्यावा पृथ्वी मुझे आश्रय प्रदान करे। आश्रयदाता द्यावा पृथ्वी आश्रय देने के लिए मेरे साथ मिलें। हे देवो! हम आपके स्तोता हैं, अन्न द्वारा आपको तृप्त करते हुए प्रचुर दान के लिए प्रचुर अन्न की कामना करते हैं।[ऋग्वेद 1.185.9]
मनुष्यों की भलाई करने वाली अम्बर धरा मुझे शरण प्रदान करें और  पोषण करती हुई मेरे संग रहें। हे देवगण! हम तुम्हारे स्तोता हवि रूप अन्न देकर तुम्हें प्रसन्न करते हैं और दान के लिए धन मांगा करते हैं।
Let the sky & earth shelter us who are beneficial to the revered-honourable people. Let both earth &sky join together to protect me. Hey demigods-deities (Sky & earth), we are your worshipers praying you for enough food grains for self and donation. 
ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः। 
पातामवद्याद्दुरितादभीके पिता माता च रक्षतामवोभिः
पिता रूप आकाश और माता रूप पृथ्वी अपने रक्षा-साधनों द्वारा हमें संरक्षित करें। अत्यन्त समीप रहने वाले ये दोनों हर प्रकार के अनिष्टों से (सदैव) हमारी रक्षा करते हुए तृप्तिकर वस्तु द्वारा हमें पालित करें।[ऋग्वेद 1.185.10] 
मैंने आसमान और पृथ्वी के लिए सत्य का कथन किया है। आसमान पृथ्वी निन्दा और अनिष्ट से हमारे रक्षक हों और माता-पिता के समान हमारा पालन करें।
Father & mother figure  sky & the earth should protect us through their all means. Let them provide us with resources granting us satisfaction.
इदं द्यावापृथिवी सत्यमस्तु पितर्मातर्यदिहोपब्रुवे वाम्। 
भूतं देवानामवमे अवोभिर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम्
हे माता और हे पिता! आपके लिए इस यज्ञ में मैंने जो स्तोत्र पढ़े हैं, उन्हें सार्थक करें। हे द्यावा पृथ्वी! आश्रयदान द्वारा आप स्तोताओं के निकटवर्ती बनें, ताकि हम अन्न, बल और दीर्घायु प्राप्त कर सकें।[ऋग्वेद 1.185.11] 
हे पिता-माता रूप आकाश पृथ्वी! मैंने जो कुछ तुम्हारी भलाई के लिए कहा है, वह सत्य हो। तुम देवों से सत्य सुरक्षा करने वाली बनो। हम अन्न शक्ति और दानमयी स्वभाव को ग्रहण करें।
Hey parents figures sky & the earth! Make the Strotr useful I have read in this Yagy in your honour. You should be close to those who worship you (sing Strotr for seeking your favours) so that we get food grains, strength and longevity.
ऋषि :- 
अस्य मे द्यवापृथिवी ऋतायतो भूतमवित्री वचसः सिषासतः। 
ययोरायुः प्रतरं ते इदं पुर उपस्तुते वसूयुर्वां महो दधे
हे द्यावा पृथिवी! जो स्तोता यज्ञ और आपको प्रसन्न करने की इच्छा करता है, उसके आप आश्रयदाता बनें। आपका अन्न सर्वापेक्षा उत्कृष्ट है। सभी द्यावा पृथिवी की स्तुति करते हैं। अन्न कामी होकर मैं महास्तोत्र द्वारा आपकी प्रार्थना करूँगा।[ऋग्वेद 2.32.1]
हे धावा-धरा! जो वंदना करने वाला, अनुष्ठान कर्म तुमको हर्षित करने की अभिलाषा करें, उसको शरण प्रदान करो। तुम्हारा अन्न महान हैं। सभी तुम्हारी प्रार्थना करते हैं। मैं भी महान श्लोक से तुम्हारी वंदना करूँगा। 
Hey space & earth! You grant shelter to the host, Ritviz who wish to appease you by conducting Yagy. Your food grains are superior to anyone else. Everyone worship you. I will request you for the sake of food grains with the help-recitation of an ultimate-excellent verse-Shlok, hymn.
मा नो गुह्या रिप आयोरहन्दभन्मा न आभ्यो रीरधो दुच्छुनाभ्यः। 
मा नो वि यौः सख्या विद्धि तस्य नः सुम्नायता मनसा तत्त्वेमहे
हे इन्द्र देव! शत्रु की गुप्त माया हमें दिन या रात में मारने न पावें। हमें कष्ट दात्री शत्रु सेना के वश में न करना। हमारी मैत्री न छोड़ना। हृदय में हमारे सुख की आकांक्षा करके हमारी मित्रता की स्मृति करना। आपसे हम यही कामना करते हैं।[ऋग्वेद 2.32.2]
हे इन्द्र देव! दिन या रात्रि में कभी भी शत्रु हम पर हावी न हो सके। त्रास देने वाले शत्रु सेना के वश में हमकों न करना। हमारी मित्रता को कभी समाप्त न करना। हमारी मित्रता को याद करते हुए हमें सुख प्रदान करना। हमारी इतनी सी ही मनोकामना है।
Hey Indr Dev! Do not let the enemy over power us. His illusionary powers should not kill us either during the day or night. Do not desert us. Recognise us as a friend with the desire of our welfare. This is our desire. 
अहेळता मनसा श्रुष्टिमा वह दुहानां धेनुं पिप्युषीमसश्चतम्।
पद्याभिराशुं वचसा च वाजिनं त्वां हिनोमि पुरुहूत विश्वहा
हे इन्द्र देव! प्रसन्न चित्त से सुखकारी, दुग्धवती, मोटी और मजबूत गाय को ले आना। आपको सब बुलाते हैं। आप बहुत तीव्र चलते हैं। आप द्रुतभाषी है। मैं दिन-रात आपकी स्तुति करता हूँ।[ऋग्वेद 2.32.3]
हे इन्द्रदेव! मन में प्रसन्न हुए तुम दूध देने वाली हष्ट-पुष्ट धेनु को लेकर पधारना। तुम्हारा हम सभी आह्वान करते हैं, तुम द्रुतमान एवं द्रुतभाषी हो। मैं दिन रात्रि पूजन करता हूँ।
Hey Indr Dev! Come happily associated with fat milch cows. Everyone invite you. You move very fast. I recite prayers devoted to you, through out day & night.
राकामहं सुहवां सुष्टुती हुवे शृणोतु नः सुभगा बोधतु त्मना। 
सीव्यत्वपः सूच्याच्छिद्यमानया ददातु वीरं शतदायमुक्थ्यम्
मैं उत्कृष्ट स्तोत्र द्वारा आह्वान योग्य राका एवं पूर्णिमा देवी को बुलाता हूँ। वे सुभग हैं, हमारा आह्वान श्रवण करे। वे स्वयं हमारा अभिप्राय जानकर अच्छेद्य सूची के द्वारा हमारे कर्म को पूर्ण करें। वे हमें अक्रान्त, बहुधनवान् और वीर्यवान् पुत्र प्रदान करें।[ऋग्वेद 2.32.4]
सुभग :: भाग्यवान्, समृद्ध और सुखी; beautiful, lovely.
आह्वान के योग्य पूर्ण रात्रि का मैं आह्वान करता हूँ। वे शोभनीय हमारे आह्वान को सुनें। वे हमारी इच्छा को समझकर हमारे कर्मों को सुगठित करें और हमें असंख्य धन से परिपूर्ण पुत्र प्रदान करें।
I invoke the Raka, with the help of excellent Strotr-hymn. She is lucky-auspicious to us. Let her listen-respond to our requests. She should understand our purpose and accomplish our desires. She should grant us several sons along with wealth i.e., excellent and opulent descendants.  
  यास्ते राके सुमतयः सुपेशसो याभिर्ददासि दाशुषे वसूनि। 
ताभिनें अद्य सुमना उपागहि सहस्रपोषं सुभगे रराणा
हे ऐश्वर्य शालिनि राका देवी! आप जिस सुन्दर अनुग्रह में हव्य दाता को धन देती है, आज प्रसन्न चित्त से उसी अनुग्रह के साथ पधारें।  हे शोभन भाग्यवती! हजारों प्रकार से आप हमारी पुष्टि करें।[ऋग्वेद 2.32.5]
हे रात्रि देवी! तुम अपनी कृपा से ही हविदाता को श्रेष्ठ धन प्रदान करती हो। प्रसन्न मन से कृपा पूर्वक हमारे यहाँ पधारी हे सुन्दर भाग्यवान! तुम अनेक प्रकार से हमारी रक्षा करने वाली बनो।
Hey grandeur possessing Raka Devi (Goddess-deity of night)! Please come with the well wishes, grant wealth to the host-Ritviz making offerings to you. Hey glorious deity! Nourish us through thousands of means.  
सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामसि स्वसा। 
जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिड्डि नः
स्थूल जाता सिनीवाली! (अमावस्या), आप देवों की बहन है। प्रदत्त हव्य की सेवा करें। हमें अपत्य प्रदान करें।[ऋग्वेद 2.32.6]
हे स्थूल अन्धकार परिपूर्ण रात्रि! तुम देवताओं की बहिन हो। हमारे को प्राप्त करो और हमको संतान प्रदान करो।
Hey dark night Amavasya! You are a sister of the demigods-deities. Accept our offerings and grant us progeny. 
या सुबाहुः स्वङ्गुरिः सुषूमा बहुसूवरी। 
तस्यै विश्पल्यै हविः सिनीवाल्यै जुहोतन
हे याजकों! जो सिनीवाली देवी उत्तम भुजाओं और सुन्दर अंगुलियों वालों, श्रेष्ठ पदार्थों व उत्तम प्रजाओं की जनक हैं, उन प्रजापालक सिनीवाली देवी के लिए हविष्यान्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 2.32.7]
घोर अंधकार परिपूर्ण रात्रि शोभनीय बाहु और उंगलियों वाली महान प्रकाट्य और बहु प्रजनन से परिपूर्ण हैं। संसार की सुरक्षा करने वाली उस देवी के लिए हवि प्रदान करो।
Hey worshipers! Let us make offerings to the Sini Vali Devi (Night), who grow excellent materials and protect the excellent beings; possessing beautiful fingers and nurturing the living beings. 
या गुङ्गुर्या सिनीवाली या राका या सरस्वती। 
इन्द्राणीमह्व ऊतये वरुणानीं स्वस्तये
जो गुङ्गु जो सिनीवाली, जो राका, जो सरस्वती आदि देवियों है, हम अपने संरक्षण के कामना से उनका आवाहन करते हैं। इन्द्राणि और वरुणानि देवियों को भी स्वतः कल्याण की कामना के लिए आवाहित करते हैं।[ऋग्वेद 2.32.8]
गुंगू, कुहू देव पत्नी अंधकार वाली रात और सरस्वती देवी का मैं आह्वान करता हूँ तथा सुख कामना से वरुणाग्नि का आह्वान करता हूँ।
We invoke the deities Gungu, Sini Vali, Raka, Saraswati for our protection. We invoke Indrani & Varunai too, for our welfare.
प्रेतां यज्ञस्य शंभुवा युवामिदा वृणीमहे। अग्निं च हव्यवाहनम्
हे यज्ञ के सुख-सम्पादक द्यावा-पृथ्वी! आप आवें। हम आपकी प्रार्थना करते हैं। हम हव्य वाहन अग्निदेव की भी प्रार्थना करते है।[ऋग्वेद 2.41.19]
हे धरा अम्बर! तुम अनुष्ठान की सुसम्पादिका हो। इस अनुष्ठान में पधारो। हम तुम्हारी वंदना करते हैं तथा हविवाहक अग्निदेव का भी पूजन करते हैं। 
Hey comfort accomplishing horizon and earth! Come to us. We are praying to you. We pray to Agni Dev too, who is the carrier of the offerings in the Yagy. 
द्यावा नः पृथिवी इमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम्। यज्ञं देवेषु यच्छताम्
द्यावा-पृथ्वी स्वर्ग आदि के साधक सौर देवों की ओर जाने वाली हैं। हमारे इस यज्ञ को देवों के पास ले जावें।[ऋग्वेद 2.41.20]
हे आसमान धरती! तुम बैकुण्ठ आदि की साधना सफल करने वाली हो और देवताओं की ओर जाया करती हो। हमारे इस यज्ञ को देवगणों के समीप पहुँचाओ।
Hey sky & the earth you accomplishes the desires-efforts for heavens & Vaekunth Lok. Carry our Yagy to the demigods-deities.
आ वामुपस्थमद्रुहा देवाः सीदन्तु यज्ञियाः। इहाद्य सोमपीतये
हे द्यावा-पृथ्वी! आपस में सम्बन्ध रहने वाले आप द्वेष और शत्रुता से मुक्त हों, आज इस यज्ञ में आने वाले देवता सोमरस का पान करने के लिए आपके पास विराजित हों।[ऋग्वेद 2.41.21]
हे अम्बर धरा! तुम द्वेष और शत्रुता से पृथक रहो। इस अनुष्ठान में अग्नि वाले देवगण आज सोम पान करने हेतु तुम्हारे निकट पधारें।
Hey sky & the earth! Keeping mutual relations be free from enmity. The demigods-deities participating in this Yagy be by your side.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (38) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, दधिक्रा,  छन्द :- त्रिष्टुप्।
उतो हि वां दात्रा सन्ति पूर्वा या पूरुभ्यस्त्रसदस्युर्नितोशे।
क्षेत्रासां ददथुरुर्वरासां घनं दस्युभ्यो अभिभूतिमुग्रम्
हे द्यावा-पृथ्वी! दाता त्रसदस्तु राजा ने आपके समीप से बहुत धन प्राप्त करके याचक मनुष्यों को दिया, आपने उन्हें अश्व और पुत्र दिये एवं दस्युओं को मारने के लिए अभिभव समर्थ तीक्ष्ण अस्त्र प्रदान किया।[ऋग्वेद 4.38.1]
हे आकाश-पृथ्वी! त्रसदस्यु नामक दानी राजा ने तुमसे अनेक धन प्राप्त करके माँगने वालों को दिया। तुमने उसको अश्व और पुत्र प्रदान किया था तथा राक्षसों का पतन करने के लिए विरोधियों को पराजित करने वाला तीक्ष्ण शस्त्र दिया था।
Hey Heaven-sky & Earth! Donor king Trasdastu got lots of money-riches from you and gave to the needy. You gave them horses, sons and sharp weapons to kill the demons-dacoits.
उत वाजिनं पुरुनिष्षिध्वानं दधिक्रामु ददथुर्विश्वकृष्टिम्।
ऋजिप्यं श्येनं प्रुषितप्सुमाशुं चर्कृत्यमर्यो नृपतिं न शूरम्
गमनशील, अनेक शत्रुओं के निषेधक, समस्त मनुष्यों के रक्षक, सुन्दरगामी, दीप्ति विशिष्ट, शीघ्र गामी एवं बलवान राजा के तुल्य शत्रु विनाशक दधिक्रा (अश्व रूपी अग्नि) देव को आप दोनों (द्यावा-पृथ्वी) को धारित करते है।[ऋग्वेद 4.38.2]
दधिक्रा :: एक देवता जो घोड़े के आकार के माने जाते हैं, घोड़ा, अश्व; a demigod with the shape-figure of horses, horse.
अनेक शत्रुओं को रोकने वाले सभी प्राणियों के रक्षक विशेष प्रकाश वाले, द्रुतगामी, शक्तिशाली, भूमिपति के समान शत्रुओं को नष्ट करने वाले दधिक्रा को तुम दोनों ग्रहण करने वाली हो।
Both of you, the heaven & earth support the horse (fire in the form of horse) capable of vanishing-killing the enemies, fast moving, possessing beautiful movements, radiant, equivalent to a mighty king, protector of all humans.
यं सीमनु प्रवतेव द्रवन्तं विश्वः पूरुर्मदति हर्षमाणः।
 िड्भर्गृध्यन्तं मेधयुं न शूरं रथतुरं वातमिव ध्रजन्तम्
सब मनुष्य बलिष्ठ होकर जिस दधिक्रा देव की प्रार्थना करते हैं, वे निम्नगामी जल के तुल्य गमन शील संग्रामाभिलाषी शूर के तुल्य पद द्वारा दिशाओं के लङ्घनाभिलाषी, रथ गामी और वायु के तुल्य द्रुत गामी है।[ऋग्वेद 4.38.3]
समस्त पुरुष हर्षित होकर नीचे जाने वाले के समान, विचरण करने वाले पराक्रमी के समान पैरों से दिशाओं को पार करने वाले, रथ में चलने वाले एवं वायु के समान शीघ्र चाल वाले हैं।
All humans having acquired might pray-worship Dadhikra Dev who is like slow moving water inside the earth, braves-warriors who wish to fight, capable to moving in all directions, riding the charoite fast moving like the air.
यः स्मारुन्धानो गध्या समत्सु सनुतरश्चरति गोषु गच्छन्।
आविर्ऋजीको विदथा निचिक्यित्तिरो अरतिं पर्याप आयोः
जो संग्राम में एकत्री भूत पदार्थों को निरुद्ध करते हुए अत्यन्त भोग वासना से समस्त दिशाओं में गमन करते और वेग से विचरण करते हैं, जिनकी शक्ति आविर्भूत रहती हैं, वे ज्ञातव्य कर्मों को जानते हुए स्तुति कारी याजक गणों के शत्रुओं को तिरस्कृत करते हैं।[ऋग्वेद 4.38.4]
तिरस्कृत :: तुच्छ समझनेवाला; insult, despise, contempt, scorn.
घृणा करने वाला, तिरस्कारी, निंदात्मक, घृणात्मक, तिरस्कृतजो युद्ध में एकत्र हुए पदार्थों को रोकते हुए सभी दिशाओं में जाते हुए वेग से चलते हैं। जिनका बल स्वयं प्रकट होता है, वे किये जाने योग्य कर्मों के ज्ञाता स्तोता यजमानों के शत्रुओं को यशस्वी नहीं होने देते।
Those who, oppose the mingled multitude in battles, rushes eagerly, passing through the regions, whose vigour is manifestly, who, understanding what is to be known, puts to shame the adversary of the worshipers-Ritviz.
Those who block the collected goods in the war, move in all directions with high speed, their might emerges, they are aware of the endeavours of the Ritviz-worshipers and scorn-insult the enemy.
उत स्मैनं वस्त्रमथिं न तायुमनु क्रोशन्ति क्षितयो भरेषु।
नीचायमानं जसुरिं न श्येनं श्रवश्चाच्छा पशुमच्च यूथम्
मनुष्य जिस प्रकार से वस्त्रापहारक तस्कर को देखकर चीत्कार करता है, उसी प्रकार संग्राम में शत्रु गण दधिक्रा देव को देखकर चीत्कार करते हैं। पक्षिगण जिस प्रकार नीचे की ओर आने वाले क्षुधार्त्त श्येन पक्षी को देखकर पलायन करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य अन्न और पशु यूथ के उद्देश्य से गमन करने वाले दधिक्रा देव को देखकर चीत्कार करते हैं।[ऋग्वेद 4.38.5]
जैसे लोग वस्त्र चुराने वाले चोर को देखकर चिल्लाते हैं, वैसे ही संग्राम भूमि से दधिक्रा देव को देखकर शत्रुगण चीखते हैं। जैसे नीचे की ओर आते हुए भूखे बाज को देखकर पक्षी नहीं ठहरते, वैसे ही पुरुष अन्न और पशुओं के लिए जाते हुए दधिक्रा को देखकर चीखते हैं।
The enemy start crying like those who see the cloth thief on seeing Dadhikra Dev in the war & the birds move away when they see the hungry falcon attacking them. The humans and the cattle cry on seeing Dadhikra Dev while moving for the sake of food stuff.
उत स्मासु प्रथमः सरिष्यन्नि वेवेति श्रेणिभी रथानाम्।
स्त्रजं कृण्वानो जन्यो न शुभ्वा रेणुं रेरिहत्किरणं ददश्वान्
वे असुर सेनाओं में जाने की अभिलाषा करके रथ पंक्तियों से युक्त होकर गमन करते हैं। वे अलंकृत है। वे मनुष्यों के हितकर अश्व के तुल्य शोभायमान हैं। वे मुखस्थित लौह दण्ड या लगाम को दाँतों से खिंचते हुए धूल-धूसरित हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.6]
वे असुर सेनाओं में जाने की इच्छा से रथों की पंक्ति के समान गमन करते हैं। वे शोभित हैं और प्राणियों का हित करने वाले अश्वों की तरह सुन्दर लगते हैं। वे मुँह में पड़ी लगाम को चबाते और पाँव से उड़ती हुई धूल को चाटते हैं।
They desire to move to the enemy army in rows of chariots. They are decorated. They are comparable to horses busy in the welfare of humans. They pull the reins placed in their mouth and covered with dust.
उत स्य वाजी सहुरिर्ऋतावा शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्ये।
तुरं यतीषु तुरयन्नृजिप्योऽधि भ्रुवोः किरते रेणुमृञ्जन्
इस प्रकार का वह अश्व सहनशील, अन्नवान, स्वशरीर द्वारा संग्राम में कार्य साधन करता हैं। वह ऋजुगामी और वेग गामी है। शत्रु सेनाओं के बीच में वह वेग से गमन करता है। वह धूलि को उठाकर के भ्रूदेश के ऊपर विक्षिप्त करता है।[ऋग्वेद 4.38.7]
इस तरह यह अश्व अन्नवान, सहनशील और अपने शरीर के द्वारा संग्राम कार्य को सिद्ध करता है। वह गति से चलने वाला शत्रुओं की सेनाओं में गति से दौड़ता है। वह धूल को पैरों से उड़ाकर अपनी भौहों में धारण करता है।
In this manner that tolerant horse, having food grains-stuff, utilises his body in the war. He moves straight with high speed in enemy armies. He raise the dust with his hoofs above his head-eye brows and disturb the enemy.
उत स्मास्य तन्यतोरिव द्योर्ऋघायतो अभियुजो भयन्ते।
यदा सहस्रमभि षीमयोधीदुर्वर्तुः स्मा भवति भीम ऋञ्जन्
युद्धाभिलाषी लोग दीप्तिमान शब्दकारी वज्र के तुल्य हिंसाकारी दधिक्रा देव से भयभीत होते हैं। जब वे चारों ओर हजारों के ऊपर प्रहार करते हैं, तब वे उत्तेजित होकर भयंकर और अजेय हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.8]
अजेय :: असामान्य, अदम्य, अनभ्यस्त, ग़ैरमामूली, अपराजेय, न जीते जाते योग्य, दुर्गम, दुस्तर, अलंघ्य; invincible, insurmountable, unbeaten.
युद्ध की इच्छा करने वाले प्राणी निनाद करने वाले उज्जवल वज्र के समान घातक दधिक्रा से भयभीत होते हैं। जब वे सभी ओर से वार करते हैं तब वे महाबलशाली हो जाते हैं। उस समय उन्हें कोई रोक नहीं सकता।
People engaged in war are afraid of Dadhikra Dev due to the sound like Vajr created by him. He become furious and invincible when he strikes thousands of  enemies from  four directions.
उत स्मास्य पनयन्ति जना जूतिं कृष्टिप्रो अभिभूतिमाशोः।
उतैनमाहुः समिथे वियन्तः परा दधिक्रा असरत्सहस्रैः
मनुष्यों की अभिलाषा को पूर्ण करने वाले एवं वेगवान दधिक्रा देव के अभिभव कारक वेग की प्रार्थना मनुष्य गण करते हुए कहते हैं कि ये दधिक्रा देव हजारों शत्रुओं को भी पराभूत करके आगे बढ़ जाते हैं।[ऋग्वेद 4.38.9]
मनुष्यों की कामना पूर्ण करने वाले, अत्यन्त गति से परिपूर्ण दधिक्रा देव के विजयोल्लास से परिपूर्ण वेद की वंदनाकारी प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि रिपु पराजित होगा। दधिक्रा देव सहस्र संख्यक शक्ति के साथ संग्राम में जाते हैं। 
The humans worship the defeater of thousands of  enemies pray to fast moving Dadhikra Dev who accomplish the desires of the humans. 
आ दधिक्राः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्यइव ज्योतिषापस्ततान।
सहस्रसाः शतसा वाज्यर्वा पृणक्तु मध्वा समिमा वचांसि
सूर्य देव जिस प्रकार से तेज द्वारा जल प्रदान करते है, उसी प्रकार से दधिक्रा देव बल द्वारा पञ्चकृष्टि (देव, मनुष्य, असुर, राक्षस और पितृगण अथवा चारों वर्ण और निषाद) को व्याप्त कर देते है। शत-सहस्र दाता, वेगवान (दधिका देव) हमारे स्तुति वाक्य को मधुर फल द्वारा संयोजित करें।[ऋग्वेद 4.38.10]
सूर्य देव अपने तेज से जैसे जल वृद्धि करते हैं वैसे ही दधिक्रा देव जल द्वारा पश्चवृष्टि की वृद्धि करते हैं। सैकड़ों क्या हजारों फलों को प्रदान करने वाले दधिक्रा देव हमारी स्तुति रूप वचनों का अभीष्ट फल प्रदान करते हुए सम्पादन करें।
The way the Sun grant water due to his shine-aura, Dadhikra Dev too grant too grant water to the demigods-deities, humans, demons-giants, manes, the fours Varn and the Nishads. Let fast moving Dadhikra Dev who grants-accomplish hundreds & thousands wishes accept our prayers.(11.04.2023)
अनु कृष्णे वसुधिती येमाते विश्वपेशसा।
वायवा चन्द्रेण रथेन याहि सुतस्य पीतये
हे वायु देव! कृष्ण वर्ण, वसुओं की धात्री, विश्व रूपा द्यावा-पृथ्वी आपका अनुगमन करती है। हे वायु देव! आप सोमपान के लिए तेजस्वी रथ द्वारा पधारें।[ऋग्वेद 4.48.3]
हे वायु! काले रंग वाली, वसुओं को धारण करने वाली विश्वरूप अम्बर-धरा तुम्हारे पदचिह्नों पर चलती है। तुम अपने हर्षिता परिपूर्ण रथ के द्वारा सोम को पीने के लिए यहाँ विराजमान होओ।
Hey Vayu! Blackish heaven & earth constituting the universe, who supports the Vasus, follows you. Come to drink Somras in your radiant charoite.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (56) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- आकाश, पृथ्वी, छन्द :- त्रिष्टुप्, गायत्री।
मही द्यावापृथिवी इह ज्येष्ठे रुचा भवतां शुचयद्भिरकैः।
यत्सीं वरिष्ठे बृहती विमिन्वन्रुवद्धोक्षा पप्रथानेभिरेवैः
महती और श्रेष्ठा द्यावा-पृथ्वी इस यज्ञ में दीप्तिकर मन्त्र और सोमादि से युक्त होकर दीप्ति विशिष्ट हों। जिस लिए कि सेचनकारी पर्जन्य विस्तीर्ण और महती द्यावा-पृथ्वी को स्थापित करते हुए प्रथमान और गमन शील मरुतों के साथ सभी जगह शब्द करते हैं।[ऋग्वेद 4.56.1]
पर्जन्य :: गरजता तथा बरसता हुआ बादल-मेघ, इंद्र, विष्णु, कश्यप ऋषि के एक पुत्र जिसकी गिनती गंधर्वों में होती है।
Let the excellent & significant-important heaven & earth become aurous-shinning by the recitation of sacred hymns, chants-Mantr, associated by Somras. The vast-broad showering clouds make thundering sound along with the Marud Gan.
Vast and excellent Heaven and Earth, be present with splendour at this Yagy-sacrifice, attracted by sanctifying Mantr-chants, hymns; since that the showerer sounds everywhere with his heralds, the rapid winds, passing through the two spacious and mighty regions.
HERALD :: इस बात का संकेत होना कि कुछ घटित होने वाला है; indications that something is going to happen soon.
देवी देवेभिर्यजते यजत्रैमिनती तस्थतुरुक्षमाणे।
ऋतावरी अद्रुहा देवपुत्रे यज्ञस्य नेत्री शुचयद्धिरकैः
यजन योग्य, अहिंसक, अभीष्ट वर्षी, सत्य शील, द्रोह रहित, देवों के उत्पादक और यज्ञों के निर्वाहक द्यावा-पृथ्वी रूप देवी द्वय यष्टव्य देवों के साथ दीप्तिकर मन्त्रों या हवि लक्षण अन्नों से युक्त होवें।[ऋग्वेद 4.56.2]
द्रोह :: दुष्टता, हानिकरता, नुक़सानदेहता, कपट, नमकहरामी, बेवफ़ाई, राज-द्रोहिता, द्वेष, डाह, दुष्ट भाव, बदख़्वाहता; treachery, malignancy, disloyalty, malevolence.
Let worship deserving, non violent, accomplishment granting, truthful, free from treachery heaven & earth in the form of goddess duo, accompanied by the demigods-deities be associated with aurous, energetic, inspiring Mantr-chants offerings in the form of food grains. 
स इत्स्वपा भुवनेष्वास य इमे द्यावापृथिवी जजान।
उर्वी गभीरे रजसी सुमेके अवंशे धीरः शच्या समैरत्॥
जिन्होंने इस द्याव-पृथ्वी को उत्पन्न किया; जिन बुद्धिमान ने विस्तीर्ण, अविचला सुरूपा और आधार रहिता द्यावा-पृथ्वी को सम्यक रूप से कुशल कर्म द्वारा परिचालित किया, वे ही भुवनों के बीच में शोभन कर्मा हैं।[ऋग्वेद 4.56.3]
The intelligent, who created the earth-heavens, extended the unbalanced earth & heavens, operated them skilfully is present between the abodes, performing the great-beautiful deeds.
नू रोदसी बृहद्धिर्नो वरूथैः पत्नीवद्भिरिषयन्ती सजोषाः।
उरूची विश्वे यजते नि पातं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे द्यावा-पृथ्वी! आप दोनों हम लोगों के लिए अन्न दान की अभिलाषिणी और परस्पर सङ्गता है। विस्तीर्णा प्रदान करें, व्याप्ता एवं याग योग्या होकर आप दोनों हमें पत्नी युक्त महान गृह प्रदान करें तथा हम लोगों की सुरक्षा करें। हम लोग अपने अच्छे कर्म के द्वारा रथ और दास से युक्त होवें।[ऋग्वेद 4.56.4]
Hey earth & heavens, complementary of each other! You wish to donate food grains. Grant us protection, progress and houses along with wife. Let us become the possessors of charoite and servants by virtue of our pious-righteous deeds.
प्र वां महि द्यवी अभ्युपस्तुतिं भरामहे। शुची उप प्रशस्तये॥
हे द्युतिमती द्यावा-पृथ्वी! हम लोग आप दोनों के उद्देश्य से महान स्तुतियों को सम्पादित करेंगे। आप दोनों विशुद्ध हैं। हम लोग प्रशंसा करने के लिए आपके निकट गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.56.5]
Hey aurous-shinning, pure earth & heavens! We will perform-conduct great prayers for you. We come closure to you to appreciated you.
पुनाने तन्वा मिथः स्वेन दक्षेण राजथः। ऊह्याथे सनादृतम्॥
हे देवियों! आप दोनों अपनी मूर्तियों और बल द्वारा परस्पर प्रत्येक को शोधित करके शोभमाना होवें और सदैव यज्ञ का निर्वाह करें।[ऋग्वेद 4.56.6]
Hey goddesses! You should be established by virtue of your might, purify each & every one, always conducting Yagy.
मही मित्रस्य साधयस्तरन्ती पिप्रती ऋतम्। परि यज्ञं नि वेदथुः॥
हे महती द्यावा-पृथ्वी! आप दोनों मित्र भूत स्तोता को अभीष्ट फल प्रदान करती हैं। यज्ञ की पूर्णता के लिए संरक्षण देती हुई यज्ञ को अवलम्बन प्रदान करती हैं।[ऋग्वेद 4.56.7]
Hey earth & heavens! You grant rewards of our deeds like friends, support the Yagy to accomplish it.(07.05.2023)
प्र सुष्टुतिः स्तनयन्तं रुवन्तमिळस्पतिं जरितर्नूनमश्याः।
यो अब्दिमाँ उदनिमाँ इयर्ति ए विद्याता रोदसी उक्षमाणः
हे स्तोताओं! आपकी शोभन प्रार्थना गर्जनशील और शब्दकारी उदक स्वामी पर्जन्य के पास पहुँचती है। वे मेघों को धारण कर जल वर्षण करके द्यावा-पृथ्वी को वैद्युतालोक से आलोकित करके गमन करते हैं।[ऋग्वेद 5.42.14]
Hey Stota! Your beautiful prayers reach Parjany lord of thunder clouds and noisy lord of water. He take the form of clouds, rain over the earth & heavens lightening by causing electric sparks in the sky.
प्रैष स्तोमः पृथिवीमन्तरिक्षं वनस्पतींरोषधी राये अश्याः।
देवोदेवः सुहवो भूतु मह्यं मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्
धन के लिए हमारे द्वारा विहित यह स्तोत्र पृथ्वी, स्वर्ग, वृक्ष और औषधियों के निकट आगमन करे। हमारे लिए सब देवों का दिव्य आह्वान हो। माता पृथ्वी हम लोगों को दुर्मति में स्थापित न करें।[ऋग्वेद 5.42.16]
विहित :: उचित, मुनासिब, विधि के अनुरूप होनेवाला; canonical, ordained.
दुर्मति :: दुर्बुद्धि, आठ संवत्सरों में से एक जिसमें दुर्भिक्ष-अकाल होता है; bad-negative thoughts-ideas. 
अकाल :: अशुभ समय, भुखमरी (दुर्भिक्ष), असमय, अविनाशी; famine, dearth.
Let our Strotr ordained for wealth move closer to the earth, heavens, trees and vegetation-herbs. Let all demigods-deities be invoked for us. Mother earth should not put us in that Samvatsar-era which is dominated by hunger-famine & dearth.
आ सुष्टुती नमसा वर्तयध्यै द्यावा वाजाय पृथिवी अमृध्रे।
पिता माता मधुवचाः सुहस्ता भरे भरे नो यशसावविष्टाम्
हम अन्न-लाभ के लिए शोभन स्तव और हव्य द्वारा हिंसा रहित द्यावा-पृथ्वी को प्रसन्न करने की इच्छा करते हैं। प्रिय वचन, शोभन हस्त और यशोयुक्त मातृ-पितृ स्वरूपा द्यावा-पृथ्वी सम्पूर्ण यज्ञ में हम लोगों की रक्षा करें।[ऋग्वेद 5.43.2]
We wish to please harmless earth & heavens with beautiful verses-hymns and offerings for the sake of food grains. Let the revered-honoured, glorious earth & heavens, with beautiful hands and pleasing words protect us through the Yagy.
बृहद्वयो बृहते तुभ्यमग्ने धियाजुरो मिथुनासः सचन्त।
देवोदेवः सुहवो भूतु मह्यं मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात्
हे अग्नि देव! आप बृहत्स्वरूप है। धर्मकार्य द्वारा जीर्ण होकर स्त्री-पुरुष एक साथ ही आपको प्रभूत अन्न प्रदान करते हैं। देवगण हमारे द्वारा भली-भाँति से आहूत होवें। जननी स्वरूप पृथ्वी हमारे प्रति विरुद्ध बुद्धि धारण न करें।[ऋग्वेद 5.43.15]
जीर्ण :: बासी, पुराना, नीरस, बेस्वाद, फीका, चिरकालिक, स्थायी, बहुकालीन, नष्ट, बरबाद किया हुआ, छिन्न-भिन्न; chronic, dilapidated, stale. 
Hey Agni Dev! You are giant bodied-sized. On being dilapidated, old-tired woman & man together offer a lot of food grains. Let the demigods-deities be worshiped-prayed by us properly. Goddess earth like a mother should not posses thoughts against us.
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (84) :: ऋषि :- भौम अत्रि; देवता :- पृथ्वी; छन्द :- अनुष्टुप्।
बळित्था पर्वतानां खिद्रं बिभर्षि पृथिवि।
प्र या भूमिं प्रवत्वति मह्ना जिनोषि महिनि
हे पृथिवी देवी; हे मध्य-स्थान की देवी! आप यहाँ अन्तरिक्ष में पर्वतों या मेघों के भेदन को धारित करती हैं। आप बलशालिनी और श्रेष्ठ हैं; क्योंकि आप माहात्म्य द्वारा पृथ्वी प्रसन्न करती है।[ऋग्वेद 5.84.1]
हे अत्यन्त नीचे स्थान से युक्त आदर करने योग्य भूमि के सदृश वर्त्तमान! जो तुम मेघों के महत्त्व से भूमि को धारण करती इस प्रकार से सत्य को जिस कारण धारण करती हो तथा दीनता को विशेष करके नष्ट करती हो, इससे सत्कार करने योग्य हो। 
Hey Prathvi-Earth Devi! You bear the mountains and clouds in the space-sky. You are mighty-powerful and the best. Hence you deserve worship.
स्तोमासस्त्वा विचारिणि प्रति ष्टोभन्त्यक्तुभिः।
प्र या वाजं न हेषन्तं पेरुमस्य स्यर्जुनि
हे विविध प्रकार से गमन करने वाली पृथ्वी देवी! स्तोता लोग गमन शील स्तोत्रों द्वारा आपका स्तवन करते हैं। हे अर्जुनी! आप शब्द करने वाले अश्व के सदृश जलपूर्ण मेघ को प्रक्षिप्त करती हैं।[ऋग्वेद 5.84.2]
प्रक्षिप्त :: फेंका हुआ, मिलाया हुआ, डाला हुआ, पीछे से जोड़ा हुआ, आगे की ओर निकला हुआ; projected.
Hey Prathvi Devi, revolving with various speeds! The Stotas worship you with dynamic-excellent Strotr. Hey Arjuni! You regulate the clouds having water like a neighing horse.
Earth revolves as a planet of the solar system. It spins around its own axis. Its speed at the poles is low and high at the equator.
दृळ्हा चिद्या वनस्पतीन्क्ष्मया दर्धर्ण्योजसा।
यत्ते अभ्रस्य विद्युतो दिवो वर्षन्ति वृष्टयः
हे पृथ्वी देवी! जब विद्योतमान अन्तरिक्ष से आपके सम्बन्धी मेघ जलवर्षा करते हैं, तब आप दृढ़ भूमि के साथ वनस्पतियों को धारित करती हैं अथवा वनस्पतियों को दृढ़ करके धारण करती हैं।[ऋग्वेद 5.84.3]
Hey Prathvi Devi! When clouds rain from the sky associated with lightening, you bear the vegetation in the tight soil.(17.08.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (70) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- द्यावा-पृथिवी; छन्द :- जगती।
घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा।
द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा
हे द्यावा-पृथ्वी! आप जलवती, भूतों के आश्रय स्थल, विस्तीर्णा, प्रसिद्धा, जल दोहन कर्त्री, सुरूपा, वरुण के धारित द्वारा पृथक्रूप से धारिता, नित्या और बहुकर्मा हैं।[ऋग्वेद 6.70.1]
Hey radiant earth & heavens! You are the asylum of living beings & possess various forms. You are forever & perform several endeavours, draws water from the wells supported by affectionate Varun Dev.
असश्चन्ती भूरिधारे पयस्वती घृतं दुहाते सुकृते शुचिव्रते।
राजन्ती अस्य भुवनस्य रोदसी अस्मे रेतः सिञ्चतं यन्मनुर्हितम्
असंगता, बहुधारावती, जलवती और शुचिकर्मा द्यावा-पृथ्वी, सुकृती व्यक्ति को आप जल प्रदान करती हैं। हे द्यावा-पृथ्वी! आप भुवनों की अधिष्ठता हैं। आप हर्षित होकर हमें हितकारी फल प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.70.2]
असंगता :: विसंगतता, असंबद्धता, बेमेल; inconsistency, inconsequence, irrelevance. 
Inconsistent, possessing several currents of water, performing pious deeds earth & the heavens; grant water to the person performing virtuous jobs. Hey earth & heavens! You are the lord of abodes. On being happy reward us beneficially.
यो वामृजवे क्रमणाय रोदसी मर्तो ददाश धिषणे स साधति।
प्र प्रजाभिर्जायते धर्मणस्परि युवोः सिक्ता विषुरूपाणि सव्रता
हे सर्व निवासभूता द्यावा-पृथ्वी! जो मनुष्य आपको सरल गमन के लिए यह देता है, उसका मनोरथ सिद्ध होता है और अपत्यों के साथ बढ़ता है। कर्मों के ऊपर आपके द्वारा सिक्तरेत नानारूप है और वह समानकर्मा उत्पन्न होता है।[ऋग्वेद 6.70.3]
Hey abode of all earth & heavens! One who make offerings to you for your following straight path-route, his desires are accomplished and progress alongwith his progeny and encouraged with your conduct-movement. Several beings performing identical deeds are born here.
घृतेन द्यावापृथिवी अभीवृते घृतश्रिया घृतपृचा घृतावृधा।
उर्वी पृथ्वी होतृवूर्ये पुरोहिते ते इद्विप्रा ईळते सुम्नमिष्टये
द्यावा-पृथ्वी जल द्वारा ढकी हुई और जल का आश्रय करती हैं। वे जल से ओत-प्रोत हैं, जलवर्षा विधायिनी और विस्तृता है, सिद्धा और यज्ञ में पुरस्कृता है। यज्ञ के लिए विद्वान उनसे सुख की याचना करता है।[ऋग्वेद 6.70.4]
सिद्ध :: पूरा, निपुण, प्रमाणित, पूर्ण, निर्मित, पूरा, दोषहीन, निर्दोष, निपुण, प्रमाणित; proven, perfect, proved, finished.
Earth & heavens are covered with water and asylum the water. They are saturated with water, causes rains, perfect, vast-comprehensive, accomplished and rewarded in the Yagy. The enlightened worship-pray them for comforts-pleasure.
मधु नो द्यावापृथिवी मिमिक्षतां मधुश्चता मधुदुधे मधुव्रते।
दधाने यज्ञं द्रविणं च देवता महि श्रवो वाजमस्मे सुवीर्यम्
जल का क्षरण करने वाली, जल दूहने वाली, उदक कर्मा देवी तथा यज्ञ, धन, महान यश, अन्न और वीर्य देने वाली द्यावा-पृथिवी हमें मधु से सिंचित करे [ऋग्वेद 6.70.5]
क्षरण :: क्षीण होना, रिसना; corrosion, abrosia.
Let the water loosing, extracting, utilizing, Yagy conducting, possessor of great wealth, name fame and strengthening earth & the heavens nourish us with honey. 
ऊर्जनो द्यौश्च पृथिवी च पिन्वतां पिता माता विश्वविदा सुदंससा।
संरराणे रोदसी विश्वशंभुवा सनिं वाजं रयिमस्मे समिन्वताम्
हे पिता द्युलोक और माता पृथ्वी देवी! हमें अन्न प्रदान करें। संसार को जानने वाली, सुकर्मा परस्पर रममाण और सबको सुख प्रदान करने वाली द्यावा- पृथ्वी आप हमें पुत्र-पौत्रयुक्त, अन्न, बल, यश और धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.70.6]
Hey fatherly heavens and motherly earth! Grant us food grains. Aware of the universe, virtuous, performing pious deeds-endeavours, granting pleasure-comforts to all, grant us sons & grandsons, food grains, strength, name & fame and wealth.(09.11.2023)
 
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संतोष महादेव-सिद्ध व्यास पीठ, बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा

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