Saturday, May 30, 2015

INNER SELF-PSYCHE चित्त, मन, अन्तः करण



INNER SELF-PSYCHE
  चित्त, मनअन्तः करण

 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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अंतःकरण के चार अंग :: मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।  
चित्त :: पतंजलि के योगसूत्र के अनुसार चित्त वृत्तियों का निरोध ही योग है। मानव जीवन में परमात्मा को पाने के लिए जितने भी साधन हैं उनमें चित्त अनमोल है। परमेश्वर चित्त रूप में मनुष्य में रहकर कर्मो का फल देता है।जैसा चित्त होगा वैसा ही फल प्राप्त होगा। चित्त से ही मनुष्य शाँत, भ्राँत, मेधावी, कवि, बुध्दिवान, कलाकार, संगीतकार, योगी होता है। चित्त से ही शास्त्रों में उपाधि, समाधी प्राप्त होती है। चित्त ही गुरु, शक्ति संचालक, निर्विकल्प पद है। चित्त भ्रष्ट व्यक्ति सदा कष्ट में रहता हुआ, मोक्ष मार्ग से भटक जाता है। मलिन चित्त ही घोर नरक का एकमात्र कारण है। 
दुःख का कारण मन :: मनुष्य के सुख दुःख का कारण न अन्य व्यक्ति, न देवता, न शरीर, न ग्रह, कर्म और काल आदि ही हैं। श्रुतियाँ और महात्मा जन मन को ही इसका परम कारण बताते हैं और मन ही इस सारे संसार-चक्र को चला रहा है। [श्रीमद्भागवत 11. 23.43]
यह मन बहुत बलवान है। इसी  ने विषयों, उनके कारण गुणों और उनसे सम्बन्ध रखने वाली वृत्तियों की सृष्टि की है। उन वृत्तियों के अनुसार ही सात्विक, राजस और तामस-अनेकों प्रकार के कर्म होते हैं। कर्मों के अनुरुप ही जीवों की गतियाँ (जन्म-पुनर्जन्म) होती हैं। [श्रीमद्भागवत 11. 23.44]
मन ही समस्त चेष्टाएँ करता है। उसके साथ रहने पर भी आत्मा निष्क्रिय ही है। वह ज्ञान शक्ति प्रधान है और जीव का सनातन सखा है। मन अपने अलुप्त ज्ञान से वह सब कुछ देखता रहता है। मन के द्वारा ही उसकी अभिव्यक्ति होती है। जब जीव मन को स्वीकार करके उसके द्वारा विषयों का भोक्ता बन बैठता है, तब कर्मों के साथ आसक्ति होने के कारण वह उनसे बंध जाता है। [श्रीमद्भागवत 11. 23.45]
दान, अपने धर्म का पालन, नियम, यम, वेदाध्ययन, सत्कर्म और ब्र्ह्मचर्यादि श्रेष्ठ व्रत-इन सबका अन्तिम फल यही है कि मन एकाग्र हो जाये और  परमात्मा में लग जाये। मन का समाहित हो जाना ही परम योग है। [श्रीमद्भागवत 11. 23.46]
जिसका मन शान्त और समाहित है, उसे दान आदि समस्त कर्मों का फल प्राप्त हो चुका है। अब उनसे कुछ लेना बाकीनहीं है। और  जिसका मन चंचल हैं अथवा आलस्य से अभिभूत हो रहा है, उसको इन दानादि शुभ कर्मों से अब तक कोई लाभ नहीं हुआ। [श्रीमद्भागवत 11. 23.47]
सभी इन्द्रियाँ मन के  वश में हैं। मन किसी इंद्री के वश में नहीं है। यह मन बलवान से बलवान, अत्यन्त भयंकर देव है। जो इसको अपने वश में कर लेता है, वही देव-देव इन्द्रियों का विजेता है। [श्रीमद्भागवत 11. 23.48]
सचमुच मन बहुत बड़ा शत्रु है। इसका आक्रमण असह्य है। यह बाहरी शरीर को ही नहीं, हृदयादि मर्म स्थानों को भी बेधता रहता है। इसे जीतना बहुत कठिन है।  मनुष्य को चाहिये कि पहले इसी शत्रु पर विजय प्राप्त करे। मूर्ख लोग इसे जीतने का प्रयास नहीं करते और दूसरे मनुष्यों से झूठ-मूठ झगड़ा-बखेड़ा करते रहते हैं और इसी जगत के लोगों को ही मित्र-शत्रु-उदासीन बना लेते हैं। [श्रीमद्भागवत 11. 23.49]
साधारणतः मनुष्यों की बुद्धि भ्रष्ट है और वे शरीर को मैं-मेरा कहते फिरते हैं। वे एक दूसरे में अन्तर करने लगते हैं जिसके परिणाम स्वरूप अनन्त अज्ञानान्धकार में ही भटकते रहते हैं। [श्रीमद्भागवत 11.23.50]
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥श्रीमद्भागवत गीता 6-18॥ 
जब नियंत्रित किया हुआ चित्त अपने स्वरूप-आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और सम्पूर्ण पदार्थों से निःस्पृह (-सभी भोगों में इच्छा से रहित) हो जाता है तब वह पुरुष योगी है-ऐसा कहा जाता है।मन से बार-बार किसी वस्तु का मनन-चिंतन-स्मरण-ध्यान किया जाता है और चित्त से केवल एक ही वस्तु-ध्येय का चिन्तन किया जाता है। 
FIVE STATES OF MIND-MOOD चित्त की 5 अवस्थाएँ हैं :- मूढ़ (-idiot, duffer, silly), क्षिप्त (-mental wreak),  विक्षिप्त (-a muck, lunatic, madman, neurosis, deranged, insane, distracted, distraught, brain sick, deranged, unsound, unstable, demented, rabid), एकाग्र और निरुद्ध (-Constrained, Detained)। 
मूढ़ और क्षिप्त वृत्तिवाला योग का अधिकारी नहीं होता। विक्षिप्त जिसका चित्त कभी स्वरूप में लगता है कभी नहीं लगता योग का अधिकारी है। चित्त वृत्ति के एकाग्र होने पर सविकल्प समाधि होती है। एकाग्र वृति वाले का चित्त जब निरुद्ध अवस्था में होता है तब निर्विकल्प समाधि होती है। निर्विकल्प समाधि को ही योग कहा गया है। 
वश में किया गया चित्त (-संसार के चिंतन से रहित), अपने स्वतः सिद्ध स्वरूप (-जो जब यह सब कुछ नहीं था, तब भी वह था; जब यह सब कुछ नहीं रहेगा तब भी वो रहेगा, जो सबके उत्तपन्न होने से पहले भी था और सबका लय होने के बाद में भी रहेगा, जो अभी भी ज्यों का त्यों है) में स्थित हो जाता है। उस स्वरूप के सिवाय रस और आनन्द मन को कहीं भी प्राप्त नहीं है। जैसे-जैसे, जिस क्षण वश में किया चित्त स्वरूप में स्थित हो जायेगा और वह  प्राप्त-अप्राप्त, दृष्ट-अदृष्ट, एहलौकिक-पारलौकिक, श्रुत-अश्रुत सम्पूर्ण पदार्थों-भोगों से निःस्पृह हो जाता है वह योगी हो जाता है।  स्वरूप में स्थित ध्यान योगी वासना, कामना, आशा, तृष्णा, स्पृहा, जीवन निर्वाह से रहित होता है और योगी हो जाता है। 
मन मानव मस्तिष्क का वह हिस्सा या प्रक्रिया है जो किसी ज्ञातव्य को ग्रहण करने, सोचने और समझने का कार्य करता है। यह मस्तिष्क की वह स्थिति है जो मनुष्य को विवेक, चिंतन शक्ति, स्मरण-शक्ति, निर्णय शक्ति, बुद्धि, भाव, इंद्रियाग्राह्यता, एकाग्रता, व्यवहार, परिज्ञान (-अंतर्दृष्टि), इत्यादि में सक्षम बनाती है। यह वास्तविकता और कल्पना, बुद्धि, चेतना, तर्क-शक्ति, स्मरण-शक्ति, निर्णय-शक्ति, इच्छा-शक्ति, अनुकूलन, समाकलन, भेद करने की प्रवृत्ति कारण है।मन और शरीर का आपस में गहरा सम्बन्ध है। जब मन शान्त होता है तो शरीर को सकून महसूस होता है। अगर मन में तनाव और अशान्ति है तो शरीर में कहीं न कहीं दर्द का अनुभव होने लगता है। शान्त मन शालीनता को स्वत: ही प्रकट करता  है।
CONSCIOUS सचेतन :- यह मन का लगभग दसवां हिस्सा होता है, जिसमें स्वयं तथा वातावरण के बारे में जानकारी (चेतना) रहती है। दैनिक कार्यों में व्यक्ति मन के इसी भाग को व्यवहार में लाता है।
UNCONSCIOUS अचेतन :- यह मन को अनजाने-अनचाहे मूल-प्रवृत्ति दबी-ढँकी इच्छाओं, आवश्यकताओं यथा भूख, प्यास, यौन इच्छाएं से जोड़े रखता है। 
SEMICONSCIOUS अर्धचेतन या पूर्व चेतन :- सचेतन तथा अचेतन मन याददास्त, स्मरण-शक्ति का नियामक है और किसी घटना क्रमप्रसंग को याद करने में प्रयोग कर सकता है।
BASIC-INHERENT TENDENCIES मूल-प्रवृत्ति :- यह मन का वह भाग है, जिसमें मूल-प्रवृत्ति की इच्छाएं यथा उत्तर जीवित यौनता, आक्रामकता, भोजन आदि संबंधी इच्छाएं निवास करती हैं, जो जल्दी ही संतुष्टि चाहती हैं तथा खुशी-गम के सिद्धांत पर आधारित होती हैं। ये इच्छाएं अतार्किक तथा अमौखिक होती हैं और चेतना में प्रवेश नहीं करतीं।
EGO अहम्-अहंकार-घमण्ड :- यह मन का सचेतन भाग है जो मूल-प्रवृत्ति की इच्छाओं को वास्तविकता के अनुसार नियंत्रित करता है।  विवेक इसे नियंत्रित कर सकता है।  विवेक स्वार्थ परता, तनाव-चिन्ताओं  को नियंत्रित करता है। यह मनुष्य को पर्यावरण-सामाजिकता-नैतिकता में सामंजस्य उत्पन्न करने में सहायता पैदा करता है। 
अर्जुन ने पूछा, हे कृष्ण! यह मन बड़ा चंचल है। मनुष्य को भटकाता रहता है। जिस प्रकार वायु को वश में नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार मन को वश में करना मुझे कठिन लगता है। इसे वश में करने का उपाय बताएं।भगवान् श्री कृष्ण ने कहा, अर्जुन, निस्संदेह मन ठहर नहीं सकता, परंतु अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है। सतत् अभ्यास करनेवाला, लोभ, मोह और ममता से विरत हो जाने वाला व्यक्ति मन को वश में कर सकता है।
मन को वश में करने का उपाय यह है कि हम शरीर और संसार की जगह आत्मा को जानने का प्रयास करें। मन को पवित्र एवं उत्कृष्ट विचारों के चिंतन में लगाए रखें। इसके लिए नेत्रों, कानों और जिह्वा का संयम आवश्यक है। न बुरा देखें, न बुरा सुनें और न बुरा उच्चारित करें। यदि दूषित दृश्य देखेंगे और अश्लील वार्ता सुनेंगे, तो मन स्वतः दूषित हो उठेगा।मन उसी का पवित्र रह सकता है, जो पवित्र वातावरण में रहता है।जो व्यक्ति ईमानदारी और परिश्रम से अर्जित धन से प्राप्त सात्विक भोजन ग्रहण करता है, वही मन को वश में रखने में समर्थ हो सकता है। गृहस्थी में मनुष्य का मन एक मदमस्त हाथी की तरह व्यवहार करता है, परिणाम देता है, बगिया उजाड़ता है और झोपड़ी, टापरी तोड़ता है। इसे कहते हैं अशांत मन। जब जब मन अशांत है तब तब गृहस्थी में स्वयं स्वतः ही अकारण परेशानियाँ उत्पन्न हजाती हैं। मन शांत करने के लिए परमात्मा को स्मरण करना चाहिए। एकान्त वास, चिन्तन, मनन, आत्म निरीक्षण भी इसमें सहायक हैं। 
The speed of the inner self is fastest in the world. संसार में मन की गति सबसे तीव्र है। मन बड़ा चंचल है। मन के भेद किसी के सामने मत खोलो। मन की गहराई समुद्र की तरह अथाह है। मन दिशाहीन होकर भटक जाता है। मन की बात मन में ही रहने दो और उचित--अनुकूल समय आने पर धर्म के अनुरूप-धर्मानुसार कार्य करो। वक्त से पहले गलत लोगों के सामने अपना निश्चय-प्रण-विचार प्रकट करने से असफलता ही हासिल होगी। मन लगाने-बहलाने के लिए मनुष्य नित नए तरीके-उपाय सोचता-ढूँढता-फिरता है। देव ऋषि नारद: ह्रदय में रहने वाले परमात्मा के उसी स्वरूप को जिसको मैंने महात्माओं से सुना था; मैं मन ही मन ध्यान करने लगा। [श्री मद् भागवत 1.1.16]
आदिराज पृथु के स्तुति करने पर भगवान् श्री हरी ने उन्हें भक्ति का वरदान दिया और कहा कि तुम्हारा चित्त मुझ में लगा है ऐसा हों पर पुरुष सहज में हेई मेरी उस माया को पार कर लेता है जिसके बन्धन से छूटना अत्यन्त कठिन है। [श्री मद् भागवत 4.21.31 व 32]
जिस मनःप्रधान लिंगशरीर की सहायता से मनुष्य कर्म करता है, वह तो मरने के बाद भी उसके साथ रहता है; अतः वह परलोक में अपरोक्ष रूप से स्वयं उसी के द्वारा उनका फल भोगता है।   [श्री मद् भागवत 4.29.60]
मन के द्वारा जीव जिन स्त्री-पुत्रादि को ये मेरे हैं और देहादि को यह मैं हूँ ऐसा कहकर मानता है, उनके किये हुए पाप-पुन्यादि रूप कर्मों को भी यह अपने ऊपर ले लेता है और उनके कारण इसे व्यर्थ ही फिर से जन्म लेना पड़ता है।  [श्री मद् भागवत 4.29.62]
मनका तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुँख माँहीं;  मनवा तो चहुँदिश फिरे, ये तो सुमिरन नाहीं। [कबीर दास]
मन चंगा तो कठौती में गँगा [रैदास]
प्रश्न: क्या मनुष्य का मन ही उसके सारे क्रिया-कलाप पर नियंत्रण रखता है और मनुष्य कभी भी अपने मन के विरुद्ध कुछ भी नहीं कर सकता है? 
प्रश्न; क्या: मनुष्य का ज्ञान उसके सारे क्रिया-कलाप नियंत्रित करता है। क्या मन भी ज्ञान का दास है और वह भी ज्ञान द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन करने को बाध्य है?
 मनुष्य का मन सचमुच बहुत चंचल होता है और उसके वशीभूत होकर मनुष्य सांसारिक वासना के अधीन हो जाता है। ज्ञान सचमुच मनुष्य को मन का कहा करने से पहले विचार कर लेने को कहता है और किसी निर्णय के लिए प्रेरित करता है।
ज्ञान संयम के बल पर मनुष्य अपने मन को वश में रख सकता है।
मनुष्य के शरीर पर उसका मन बार-बार नियंत्रण करने की चेष्टा करता है पर ज्ञान के बल पर विवेकशील मनुष्य मन को अपने पर हावी नहीं होने देता है। 
मन और ज्ञान में अन्योनाश्रय सम्बन्ध है तथा दोनों का अपना-अपना महत्व है। जो पूरी तरह अपने मन के वश में हो जाता है उसका सर्वनाश अवश्यम्भावी है। मन अगर रथ है तो ज्ञान सारथि। बिना सारथि रथ अधूरा है। 
समाधान: मनुष्य को बुद्धि, विवेक, ज्ञान और विचार करके मन को वश में रखना चाहिये। [बैताल  बत्तीसी ]
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥Shri Mad Bhagwat Geeta 6-34॥ 
क्योंकि हे श्रीकृष्ण! (-वास्तव में, सचमुच) यह मन बड़ा चंचल, प्रमथनशील-क्षोभ युक्त स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है; इसलिए उसका वश में करना, मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त कठिन मानता हूँ। 
अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण से प्रार्थना की कि वो ही कृपा करके मन को अपने में लगा लें। मन चंचल, प्रमाथि- वाला, जिद्दी और बलवान है। काम-वासना, कामना के निवास स्थलों में से एक यह मन भी है। अन्य इन्द्रियाँ भी प्रमाथि हैं। शास्त्रों  में तो मन को ही मोक्ष और बंधन का कारण माना है। काम को वश में करने से चंचलता बाधक नहीं रहती। देहाभिमान दूर होने से परमात्मतत्व की प्राप्ति होती है। परमात्मतत्व मन की अस्थिरता को दूर करता है। ज्ञान, ध्यान, भक्ति चंचलता को नष्ट करते हैं। मन की तुलना  वायु से की है जिसे काबू में करना कठिन है। 
Hey Krashn, since the mind is verily, (really, indeed, in reality, virtually, practically, actually, factually, in reality, in sooth) restless, turbulent, strong and obstinate. Therefore, I find its really very difficult to control like the wind. 
Arjun requested Bhagwan Shri Krashn for a favor. He said that it will be very kind of him if he him self mould-direct the mind towards him. The brain in fact is very flirtatious. It deviates in all possible directions, in search of pleasure through sensuality, passions. He compared it with the air which is really very difficult to control. Brain is the seat of sexuality, lust, desires, passions, pleasures. Scriptures say that its the brain which is responsible for directing one to Salvation or attachments. Ego is yet another factor, which is also a function of the brain. One who has earned the gist-nectar-elixir of the Ultimate is sure to tide over all deviations-destruction-distortions-fluctuations-flirtation. It rejects all disturbing factors and puts the brain on the right track i.e., towards the Almighty. Enlightenment, meditation-analysis & synthesis, devotion are the tools which provide stability to the brain.
श्री भगवानुवाच ::
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्येते॥ 
श्री भगवान् बोले :- हे महाबाहो ! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है लेकिन हे कुंतीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है। 
मन :: 
भगवान् विष्णु के अवतार ऋषभदेव जी के पुत्र जड़ भरत जी, का राजा रहूगण को उपदेश :- पहले भारत का नाम अजनाभखण्ड था जो कि भरत जी के नाम से ही भारत पड़ा। महाराज जड़ भरत ने जब शासन त्यागकर सन्यास धारण किया तब उनकी आयु एक करोड़ वर्ष थी और वे अपनी युवास्था में थे। सब कुछ त्याग चुके भरत जी को एक हिरण शावक से लगाव हो गया और उन्हें हिरण की योनि में जाना पड़ा। तब उन्होंने जल में पिछले पैरों पर खड़े होकर परमात्मा का ध्यान करते हुए अपने प्राण त्यागे। अगले जन्म में वे वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण के घर में जन्में। उन्हें अपने पूर्व जन्मों की याददाश्त शेष थी।  उन्होंने हर चीज से अपना सम्बन्ध-मोह त्याग दिया और  पागल-विक्षिप्त होने का प्रदर्शन करने लगे। कोई उन्हें कुछ काम करने को कहता तो वे कर देते। खाने को देता तो खा लेते अन्यथा अपने राम-अपने में मस्त। एक दिन राजा रहूगण ने उन्हें अपनी पालकी ढ़ोने के लिए बेगार में पकड़ लिया। राजा ने जब तेज चलने को कहा तो कहारों बताया कि बेगार में पकड़े गए भरत जी ठीक से नहीं चल रहे थे। राजा ने जब उन्हें बुरा-भला और दण्ड देने की बात कही तो भरत जी ने उसे कुछ बातें कहीं जिनसे उसे यह स्पष्ट हो गया की वे कहार नहीं अपितु बहुत विद्वान-प्रकाण्ड पण्डित हैं। उन्होंने कहा की वे जीव हत्या के भय से दो कदम आगे देख कर चल रहे थे। राजा उनके पैरों में गिर गया और उपदेश की प्रार्थना करने लगा तो भरत जी ने उसे अपने पूर्व जन्मों का वृतान्त बताया और निम्न उपदेश दिया :: 
जब तक मनुष्य का मन सत्व, रज अथवा तमोगुण के वशीभूत रहता है, तब तक वह बिना किसी अंकुश के उसकी ज्ञान इन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से शुभाशुभ कर्म करता रहता है। [श्रीमद्भागवत 5.11.4]
यह मन वासनामय, विषयासक्त, गुणों से प्रेरित, विकारी और बहुत एवं इन्द्रियरूप सोलह कलाओं में मुख्य है। यही भिन्न-भिन्न नामों से देवता और मनुष्यादि रूप धारण करके शरीर रूप उपाधियों के भेद से जीवों की उत्तमता और अधमता का कारण है। [श्रीमद्भागवत 5.11.5]
यह मायाजाल मन संसार चक्र में छलने वाला है, यही अपनी देह के अभिमानी जीव से मिलकर उसे कालक्रम से प्राप्त जुए सुख-दुःख और इनसे व्यतिरिक्त मोहरूप अवश्यम्भावी फलों की अभिव्यक्ति करता है।[श्रीमद्भागवत 5.11.6]
जब तक यह मन रहता है, तभी तक जाग्रत और स्वप्नावस्था का व्यवहार प्रकाशित होकर जीव का दृश्य बनता है। इसलिये पण्डितजन मन को ही त्रिगुणमय अधम संसार और गुणातीत परमोत्कृष्ट मोक्षपद का कारण बताते हैं। [श्रीमद्भागवत 5.11.7]
विषयासक्त और कर्मों में उलझा हुआ मन तरह-तरह की वृत्तियों का सहारा-आश्रय लिए रहता है और इनसे मुक्त होने पर अपने तत्व में लीन हो जाता है। [श्रीमद्भागवत 5.11.8]
5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 ज्ञानेन्द्रियाँ और एक अहँकार-ये मन की 11 वृत्तियाँ हैं तथा 5 प्रकार के कर्म, 5 तन्मात्रा और एक शरीर-ये 11 उनके आधारभूत विषय कहे जाते हैं। [श्रीमद्भागवत 5.11.9]
गंध, रूप, स्पर्श, रस, भाषण और लेना-देना आदि व्यापार-ये 5 कर्मेन्द्रियों के विषय हैं। तथा ये शरीर मेरा है , इस प्रकार स्वीकार करना अहँकार का विषय है। कुछ लोग अहँकार को बारहवीं वृत्ती और उसके शरीर को बारहवाँ विषय मानते हैं।[श्रीमद्भागवत 5.11.10]
ये मन की ग्यारह वृत्तियाँ द्रव्य-विषय, स्वभाव, आशय-संस्कार, कर्म और काल के द्वारा सैंकड़ों, हजारों और करोड़ों भेदों में परिणित हो जाती हैं। किन्तु इनकी सत्ता क्षेत्रज्ञ आत्मा की सत्ता से ही है। [श्रीमद्भागवत 5.11.11]
ऐसा होने पर भी मन से क्षेत्रज्ञ का कोई सम्बन्ध नहीं है। यह तो जीव की माया निर्मित उपाधि है। यह प्राय: संसार बन्धन में डालने वाले अविशुद्ध कर्मों में प्रवृत्त रहता है। इसकी उपयुक्त वृत्तियाँ प्रवाह रूप से नित्य ही रहती हैं। जाग्रत और स्वप्न के समय वे प्रकट हो जाती हैं और सुषुप्ति में छिप जाती हैं। इन दोनों ही अवस्थाओं में क्षेत्रज्ञ, जो विशुद्ध चिन्मात्र है, मन की इन वृत्तियों को साक्षिरूप से देखता रहता है। [श्रीमद्भागवत 5.11.12]
यह क्षेत्रय परमात्मा सर्वव्यापक, जगत का आदि कारण, परिपूर्ण, अपरोक्ष, स्वयंप्रकाश, अजन्मा, ब्रह्मादि का भी नियन्ता और अपने अधीन रहनेवाली माया के द्वारा सबके अंतःकरणों में रहकर जीवों को प्रेरित करनेवाला समस्त भूतों का आश्रयरूप भगवान् वासुदेव है। [श्रीमद्भागवत 5.11.13]
जिस प्रकार वायु सम्पूर्ण स्थावर-जङ्गम प्राणियों में प्राणरूप से प्रविष्ट होकर उन्हें प्रेरित करती है, उसी प्रकार वह परमेश्वर भगवान् वासुदेव सर्वसाक्षी आत्मस्वरूप से इस सम्पूर्ण प्रपञ्च में ओतप्रोत है। [श्रीमद्भागवत 5.11.14]
जब तक मनुष्य ज्ञानोदय के द्वारा इस माया का तिरस्कार कर, सबकी आसक्ति छोड़कर तथा काम-क्रोधादि (-काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह, अहंकार) 6 शत्रुओं को जीतकर आत्म तत्व को नहीं जान लेता और जब तक वह आत्मा के उपाधि रूप मन को संसार-दुःख का क्षेत्र नहीं समझता, तब तक वह इस लोक में यों ही भटकता रहता है, क्योंकि यह चित्त उसके शोक, मोह, रोग, राग, लोभ, और वैर आदि के संस्कार तथा ममता की वृद्धि करता है। [श्रीमद्भागवत 5.11.15 व 16]
यह मन-चित्त ही मनुष्य का सबसे बलवान शत्रु है। उपेक्षा करने से इसकी शक्ति और भी बढ़ जाती है। यह स्वयं तो मिथ्या है, फिर भी यह मनुष्य के आत्मस्वरूप को आच्छादित किये रहता है। इसलिए साधक के लिए आवश्यक है कि वो इसे सावधान होकर श्री गुरु और हरि के चरणों की उपासना के अस्त्र से इसे नष्ट कर दे। [श्रीमद्भागवत 5.11.17]
चित्त और समाधि :: जिसका चित्त एक क्षण भी आत्मतत्त्व में स्थित होता है, उसकी अत्यन्त समाधि है। 
हे साधो! जिनका नित्य प्रबुद्ध चित्त है, वे जगत् के कार्य भी करते हैं पर आत्मतत्त्व में स्थित हैं, तो वे सर्वदा समाधि में स्थित हैं और जो पद्मासन बाँधकर बैठते हैं और ब्रह्माञ्जली हाथ में रखते हैं पर चित्त आत्मपद में स्थित नहीं होता और विश्रान्ति नहीं पाते तो उनको समाधि कहाँ? वह समाधि नहीं कहाती। 
हे भगवन्! परमार्थ तत्त्वबोध आशारूपी सब तृणों को जलानेवाली अग्नि है। तूष्णीम होने का नाम समाधि नहीं है। 
हे साधो! जिसका चित्त समाहित, नित्य तृप्त और सदा शान्त रूप है और जो यथा भूतार्थ है अर्थात् जिसे ज्यों का त्यों ज्ञान हुआ है और उसमें निश्चय है, वह समाधि कहाती है, तूष्णीम् होने का नाम समाधि नहीं है। जिसके हृदय में संसार रूप सत्यता का क्षोभ नहीं है, जो निरहंकार है और अनउदय ही उदय है वह पुरुष समाधि में कहलाता है। ऐसा जो बुद्धिमान है वह सुमेरु से भी अधिक स्थित है। 
हे साधो! जो पुरुष निश्चिन्त है, जिसका ग्रहण और त्याग बुद्धि निवृत्त हुई है, जिसे पूर्ण आत्मतत्त्व ही भासता है, वह व्यवहार भी करता दृष्ट आता है, तो भी उसकी समाधि है। जिसका चित्त एक क्षण भी आत्मतत्त्व में स्थित होता है उसकी अत्यन्त समाधि है और क्षण-क्षण बढ़ती जाती है, निवृत्त नहीं होती। जैसे अमृत के पान किये से उसकी तृष्णा बढ़ती जाती है, तैसे ही एक क्षण को भी समाधि बढ़ती ही जाती है। जैसे सूर्य के उदय हुए सब किसी को दिन भासता है, तैसे ही ज्ञानवान् को सब आत्मतत्त्व भासता है-कदाचित् भिन्न नहीं भासता। जैसे नदी का प्रवाह किसी से रोका नहीं जाता तैसे ही ज्ञानवान् की आत्मदृष्टि किसी से रोकी नहीं जाती और जैसे काल की गति काल को एक क्षण भी विस्मरण नहीं होती, तैसे ही ज्ञानवान् की आत्मदृष्टि विस्मरण नहीं होती। जैसे चलने से ठहरे पवन को अपना पवन भाव विस्मरण नहीं होता, तैसे ही ज्ञानवान् को चिन्मात्र तत्त्व का विस्मरण नहीं होता और जैसे सत् शब्द बिना कोई पदार्थ सिद्ध नहीं होता, तैसे ही ज्ञानवान् को आत्मा के सिवाय कोई पदार्थ नहीं भासता। जिस ओर ज्ञानवान् की दृष्टि जाती है, उसे वहाँ अपना आप ही भासता है-जैसे उष्णता बिना अग्नि नहीं, शीतलता बिना बरफ नहीं और श्यामता बिना काजर नहीं होता तैसे आत्मा बिना जगत् नहीं होता। 
हे साधो! जिसको आत्मा से भिन्न पदार्थ कोई नहीं भासता उसको उत्थान कैसे हो? मैं सर्वदा बोधरूप, निर्मल और सर्वदा सर्वात्मा समाहितचित हूँ, इससे उत्थान मुझको कदाचित् नहीं होगा। आत्मा से भिन्न मुझ को कोई नहीं भासता सब प्रकार आत्मतत्त्व ही मुझको भासता है। 
हे साधो! आत्मतत्त्व सर्वदा जानने योग्य है। सर्वदा और सब प्रकार आत्मा स्थित है, फिर समाधि और उत्थान कैसे हो? जिसको कार्य कारण में विभाग कलना नहीं फुरती और जो आत्मतत्त्व में ही स्थित है उसको समाहित असमाहित क्या कहिये? समाधि और उत्थान का वास्तव में कुछ भेद नहीं। आत्म तत्त्व सदा अपने आप में स्थित है, द्वैतभेद कुछ नहीं तो समाहित असमाहित क्या कहिये?
तूष्णीम् :: silently, quietly; तूष्णीम् भव  :: became silent.  

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