Sunday, June 7, 2015

BHAJ GOVINDAM :: ADI SHANKRA CHARY'S COMPOSITION :: आदि शंकराचार्य कृत :: भज गोविन्दम्

 BHAJ GOVINDAM :: ADI SHANKRA CHARY'S COMPOSITION
 आदि शंकराचार्य कृत :: भज गोविन्दम् 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By: Pt. Santosh  Bhardwaj
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भज गोविन्दं भज गोविन्दं, गोविन्दं भज मूढ़मते। संप्राप्ते सन्निहिते काले, न हि न हि रक्षति डुकृञ् करणे॥1॥
Photoहे मोह से ग्रसित बुद्धि (-सोचने समझने, राह निकलने में असमर्थ व्यक्ति) वाले मनुष्य ! गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो; क्योंकि मृत्यु के समय व्याकरण के नियम याद रखने से आपकी रक्षा नहीं हो सकती है। 
O deluded-confused-unable to find a way out,  chant the names of Almighty-Govind, worship Govind, love Govind,  since memorizing the rules of grammar (-daily chores-routine) cannot save one at the time of death.
One who is not thoughtful, insensitive, irresponsible should pray to the God.

मूढ़ जहीहि धनागमतृष्णाम्, कुरु सद्बुद्धिमं मनसि वितृष्णाम्। यल्लभसे निजकर्मोपात्तम्,वित्तं तेन विनोदय चित्तं॥2॥
हे मोहित बुद्धि! धन एकत्र करने के लोभ को त्यागो। अपने मन से इन समस्त कामनाओं का त्याग करो। सत्य के पथ का अनुसरण करो, अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त हो, उससे ही अपने मन को प्रसन्न रखो। 
O deluded-illusioned! Give up the lust to amass wealth. Reject all desires such desires from the mind and take up the path of virtuousness-piousity-righteousness. One should be content-satisfied happy with the money earned through honest means. One should earn money through righteous means without fraud, cheating, deceiving, forgery etc.
नारीस्तनभरनाभीदेशम्, दृष्ट्वा मागा मोहावेशम्। एतन्मान्सवसादिविकारम्, मनसि विचिन्तय वारं वारम्॥3॥
स्त्री शरीर पर मोहित होकर आसक्त मत हो। अपने मन में निरंतर स्मरण करो कि वह मांस-वसा आदि के विकार के अतिरिक्त कुछ और नहीं हैं। 
One should not be governed by lust, sexuality, sensuality, passions towards women since they are nothing except a means to corrupt the mind.
The woman's anatomy is nothing more than flesh. Under the influence of delusion, one is not able to isolate himself from vulgarity, wretchedness.One should deliberate-meditate over this again and again mentally.

नलिनीदलगतजलमतितरलम्, तद्वज्जीवितमतिशयचपलम्। विद्धि व्याध्यभिमानग्रस्तं, लोक शोकहतं च समस्तम्॥4॥
जीवन कमल-पत्र पर पड़ी हुई पानी की बूंदों के समान अनिश्चित एवं अल्प (-क्षणभंगुर) है। यह समझ लो कि समस्त विश्व रोग, अहंकार और दु:ख में डूबा हुआ है। 
Life is as ephemeral as water drops on a lotus leaf. Be aware that the whole world is troubled by disease, ego and grief. One did not exist before and he will not exist thereafter, as well.
यावद्वित्तोपार्जनसक्त:, तावन्निजपरिवारो रक्तः। पश्चाज्जीवति जर्जरदेहे, वार्तां कोऽपि न पृच्छति गेहे॥5॥
जब तक व्यक्ति धनोपार्जन में समर्थ है, तब तक परिवार में सभी उसके प्रति स्नेह प्रदर्शित करते हैं, परन्तु अशक्त हो जाने पर उसे सामान्य बातचीत में भी नहीं पूछा जाता है। 
As long as one is fit and capable to earn money, everyone in the family show affection- respect towards him. But afterwards, when his body becomes weak-he turns old, no one cares-inquiries about him. No one feels the need to consult him. Even the servants  ignore him.
यावत्पवनो निवसति देहे, तावत् पृच्छति कुशलं गेहे। गतवति वायौ देहापाये, भार्या बिभ्यति तस्मिन्काये॥6॥
जब तक शरीर में प्राण रहते हैं तब तक ही लोग कुशल पूछते हैं। शरीर से प्राण वायु के निकलते ही पत्नी भी उस शरीर से डरती है। 
People are concerned about one till he alive. As soon as the soul-vital air -Pran Vayu, escape the body, near and dear too wish to remain away-aloof from it. On the other hand they are afraid of it. Even the wife prefer to remain away from the corpse-dead body-remains, out of fear (-ghost).
बालस्तावत् क्रीडासक्तः, तरुणस्तावत् तरुणीसक्तः। वृद्धस्तावच्चिन्तासक्तः, परे ब्रह्मणि कोऽपि न सक्तः॥7॥
बचपन में खेल में रूचि होती है, युवावस्था में युवा स्त्री के प्रति आकर्षण होता है, वृद्धावस्था में चिंताओं से घिरे रहते हैं, पर प्रभु से कोई प्रेम नहीं करता है। 
One idles away-waste childhood in sports-play, during youth, he is attached to woman, in old age he keeps worrying about future, but it seldom that he prefers to be engrossed with Govind-the Par Brahmn Parmeshwar at any stage. In fact, he does not know, understand the significance-importance of it.
का ते कांता कस्ते पुत्रः, संसारोऽयमतीव विचित्रः। कस्य त्वं वा कुत अयातः, तत्त्वं चिन्तय तदिह भ्रातः॥8॥
कौन तुम्हारी पत्नी है, कौन तुम्हारा पुत्र है, ये संसार अत्यंत विचित्र है, तुम कौन हो, कहाँ से आये हो, बन्धु ! इस बात पर तो पहले विचार कर लो। 
Who is your wife ? Who is your son? Indeed, strange is this world. O dear, think again and again who are you and from where have you come. One does not know his origin, earlier incarnations-previous births.
सत्संगत्वे निस्संगत्वं, निस्संगत्वे निर्मोहत्वं। निर्मोहत्वे निश्चलतत्त्वं निश्चलतत्त्वे जीवन्मुक्तिः॥9॥
सत्संग से वैराग्य, वैराग्य से विवेक, विवेक से स्थिर तत्त्वज्ञान और तत्त्वज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। 
Interaction with saints brings detachment, detachment leads to gist-nectar-elixir pertaining to the Almighty and this leads to Salvation-Liberation-Assimilation in the Ultimate-Almighty.
वयसि गते कः कामविकारः, शुष्के नीरे कः कासारः। क्षीणे वित्ते कः परिवारः, ज्ञाते तत्त्वे कः संसारः॥10॥
आयु बीत जाने के बाद काम भाव नहीं रहता, पानी सूख जाने पर तालाब नहीं रहता, धन चले जाने पर परिवार नहीं रहता और तत्त्व ज्ञान होने के बाद संसार नहीं रहता। 
As soon as one grows old he looses potency-vigor-strength, after drying ponds-lakes loose their status as reservoirs, loss of wealth-poverty drives away the relatives and with the awakening of gist of the understanding of the Almighty; one looses charm of this world.
मा कुरु धनजनयौवनगर्वं, हरति निमेषात्कालः सर्वं। मायामयमिदमखिलम् हित्वा, ब्रह्मपदम् त्वं प्रविश विदित्वा॥11॥
धन, शक्ति और यौवन पर गर्व मत करो, समय क्षण भर में इनको नष्ट कर देता है| इस विश्व को माया से घिरा हुआ जान कर तुम ब्रह्म पद में प्रवेश करो। 
One should not boast of wealth, strength-power-might and youth-vigor-vitality. The time-Kal will perish all these in a fraction of moment. He should consider this world to be illusion-perishable-destructible and make efforts to attain-achieve the Par Brahmn  Parmeshwar.
दिनयामिन्यौ सायं प्रातः, शिशिरवसन्तौ पुनरायातः। कालः क्रीडति गच्छत्यायुस्तदपि न मुन्च्त्याशावायुः॥12॥
दिन और रात, शाम और सुबह, सर्दी और बसंत बार-बार आते-जाते रहते हैं।  काल की इस क्रीडा के साथ जीवन नष्ट होता रहता है; परन्तु इच्छाओ का अंत कभी नहीं होता है। 
Desires never vanish-diminish-satisfied from the mind of one with the expiry of time. He has to control-rein them. This can be achieved by diverting oneself towards the Almighty, through prayers-devotion. Day and night, dusk and dawn, winter and spring come and go, cyclically. In this sport of Time entire life goes away, but the storm of desire never departs or diminishes.
द्वादशमंजरिकाभिरशेषः कथितो वैयाकरणस्यैषः। उपदेशोऽभूद्विद्यानिपुणैः, श्रीमच्छंकरभगवच्चरणैः॥12-1॥
बारह गीतों का ये उपदेश (-पुष्पहार, bouquet, garland), सर्वज्ञ प्रभुपाद श्री शंकराचार्य द्वारा एक वैयाकरण को प्रदान किया गया
This bouquet of twelve verses-shlok-rhymes was imparted to a grammarian by the all-knowing, god-like Shri Shankrachary. This is apiece of preaching.
काते कान्ता धन गतचिन्ता, वातुल किं तव नास्ति नियन्ता। त्रिजगति सज्जनसं गतिरैका, भवति भवार्णवतरणे नौका॥13॥
तुम्हें पत्नी और धन की इतनी चिंता क्यों है, क्या उनका कोई नियंत्रक नहीं है। तीनों लोकों में केवल सज्जनों का साथ ही इस भवसागर से पार जाने की नौका है। 
One should not worry about his wealth, family all the time. He should have faith in God who controls every thing. The virtuous company of the diligent-righteous-pious  helps one in sailing through this vast reservoir of deeds-actions-mistakes-vices. Oh deluded! Why do you worry about your wealth and wife? Is there no one to take care of them? Only the company of saints can act as a  boat in three worlds to take you out from this ocean-cycle of births and rebirths.
जटिलो मुण्डी लुञ्छितकेशः, काषायाम्बरबहुकृतवेषः। पश्यन्नपि च न पश्यति मूढः, उदरनिमित्तं बहुकृतवेषः॥14॥
बड़ी जटाएं, केश रहित सिर, बिखरे बाल, काषाय (-भगवा) वस्त्र और भांति भांति के वेश; ये सब अपना पेट भरने के लिए ही धारण किये जाते हैं, अरे मोहित मनुष्य तुम इसको देख कर भी क्यों नहीं देख पाते हो! 
Matted and untidy hair, shaven heads, orange-saffron colored cloths are all a way to earn livelihood by those who do not wish to earn their bread through righteous-honest means-hard work. O deluded man why don't you understand it, even after seeing.
अङ्गं गलितं पलितं मुण्डं, दशनविहीनं जतं तुण्डम्। वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं, तदपि न मुञ्चत्याशापिण्डम्॥15॥
क्षीण अंगों, पके हुए बालों, दांतों से रहित मुख और हाथ में दंड लेकर चलने वाला वृद्ध भी आशा-पाश से बंधा रहता है। 
Even an old man with weak limbs, hairless head, toothless mouth, walking with the help of a stick, still has high hopes-unfulfilled desires. Desires are unending. Fulfillment of one desire leads to yet another new one.
अग्रे वह्निः पृष्ठेभानुः, रात्रौ चुबुकसमर्पितजानुः। करतलभिक्षस्तरुतलवासः, तदपि न मुञ्चत्याशापाशः॥16॥
सूर्यास्त के बाद, रात्रि में आग जला कर और घुटनों में सर छिपाकर सर्दी बचाने वाला, हाथ में भिक्षा का अन्न खाने वाला, पेड़ के नीचे रहने वाला भी अपनी इच्छाओं के बंधन को छोड़ नहीं पाता है। 
One who warms his body by fire after sunset living in the open under the sky-homeless, curls his body to  his knees to avoid cold;  eats the begged food and sleeps beneath the tree, he is also bound by desires, even  in these difficult situations. Desires never die.
कुरुते गङ्गासागरगमनं, व्रतपरिपालनमथवा दानम्। ज्ञानविहिनः सर्वमतेन, मुक्तिं न भजति जन्मशतेन॥17॥
किसी भी धर्म के अनुसार ज्ञान रहित रह कर गंगासागर जाने से, व्रत रखने से और दान देने से सौ जन्मों में भी मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती है। 
Its not possible to attain Salvation by visiting religious places of worship-pilgrimages, fasting, donations-charity, without understanding the gist of the religiosity, even in hundred births, by following any of the religion-Varnashram Dharm.
सुर मंदिर तरु मूल निवासः, शय्या भूतल मजिनं वासः।सर्व परिग्रह भोग त्यागः, कस्य सुखं न करोति विरागः॥18॥
देव मंदिर या पेड़ के नीचे निवास, पृथ्वी जैसी शय्या, अकेले ही रहने वाले, सभी संग्रहों और सुखों का त्याग करने वाले वैराग्य से किसको आनंद की प्राप्ति नहीं होगी। 
Renunciation-detachment-relinquishment leads to bliss-Parmanand-Ultimate pleasure-Salvation. Reside in a temple or below a tree, sleep on mother earth as your bed, stay alone, leave all the belongings and comforts, such renunciation can give all the pleasures to anybody.
योगरतो वाभोगरतोवा, सङ्गरतो वा सङ्गवीहिनः। यस्य ब्रह्मणि रमते चित्तं, नन्दति नन्दति नन्दत्येव॥19॥
कोई योग में लगा हो या भोग में, संग में आसक्त हो या निसंग हो, पर जिसका मन ब्रह्म में लगा है; वो ही आनंद करता है, आनन्द ही आनंद करता है। 
One may like meditative practice or worldly pleasures, may be attached or detached. But only one who  fixing-trains his mind on God lovingly enjoys bliss, enjoys bliss, enjoys bliss.
भगवद् गीता किञ्चिदधीता, गङ्गा जललव कणिकापीता। सकृदपि येन मुरारि समर्चा, क्रियते तस्य यमेन न चर्चा॥20॥
जिन्होंने भगवद् गीता का थोडा सा भी अध्ययन किया है, भक्ति रूपी गंगा जल का कण भर भी पिया है, भगवान कृष्ण की एक बार भी समुचित प्रकार से पूजा की है, यम के द्वारा उनकी चर्चा नहीं की जाती है। 
Those who have studied-understood-learnt Geeta, worship Bhagwan Shri Krashn with love & affection even for a while-once-a little-fraction of second, drink just a drop of water from the holy Ganga, Yam Raj-the deity of death has no control over them.
पुनरपि जननं पुनरपि मरणं, पुनरपि जननी जठरे शयनम्। इह संसारे बहुदुस्तारे, कृपयाऽपारे पाहि मुरारे॥21॥
बार-बार जन्म, बार-बार मृत्यु, बार-बार माँ के गर्भ में शयन, इस संसार से पार जा पाना बहुत कठिन है। हे कृष्ण!  कृपा करके मेरी इससे रक्षा करें। 
Repeated births and death, stay in the mother's womb, makes it extremely difficult to go beyond this universe. Hey Murari! Please help me pass through all this by extending your grace-mercy.
रथ्या चर्पट विरचित कन्थः, पुण्यापुण्य विवर्जित पन्थः। योगी योगनियोजित चित्तो, रमते बालोन्मत्तवदेव॥22॥
रथ के नीचे आने से फटे हुए कपडे पहनने वाले, पुण्य और पाप से रहित पथ पर चलने वाले, योग में अपने चित्त को लगाने वाले योगी, बालक के समान आनंद में रहते हैं। 
One who wears rags-teared cloths by coming under the chariot, travel-move on the path free from virtues and sins- a state of equanimity, trains their minds in the devotion to the Almighty through Yog-meditation, enjoys like a carefree exuberant child.
कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः, का मे जननी को मे तातः। इति परिभावय सर्वमसारम्, विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम्॥23॥
तुम कौन हो, मैं कौन हूँ, कहाँ से आया हूँ, मेरी माँ कौन है, मेरा पिता कौन है? सब प्रकार से इस विश्व को असार समझ कर इसको एक स्वप्न के समान त्याग दो। 
Who are you ? Who am I ? From where have I come ? Who is my mother, who is my father ? Ponder over these and after understanding-realizing this world to be meaningless like a dream, relinquish it.
त्वयि मयि चान्यत्रैको विष्णुः, व्यर्थं कुप्यसि मय्यसहिष्णुः। भव समचित्तः सर्वत्र त्वं, वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम्॥24॥
तुममें, मुझमें और अन्यत्र भी सर्वव्यापक विष्णु ही हैं, तुम व्यर्थ ही क्रोध करते हो, यदि तुम शाश्वत विष्णु पद को प्राप्त करना चाहते हो तो सर्वत्र समान चित्त वाले हो जाओ। 
Bhagwan Vishnu resides in me, you and everything-every one else. So, your anger is meaningless-useless. If you wish to attain the eternal status of Vishnu, practice equanimity all the time, in all the things.
शत्रौ मित्रे पुत्रे बन्धौ, मा कुरु यत्नं विग्रहसन्धौ। सर्वस्मिन्नपि पश्यात्मानं, सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम्॥25॥
शत्रु, मित्र, पुत्र, बन्धु-बांधवों से प्रेम और द्वेष मत करो, सबमें अपने आप को ही देखो, इस प्रकार सर्वत्र ही भेद रूपी अज्ञान को त्याग दो। 
Bhagwan Vishnu is present in each and every one of us, in the form of soul. Its only the body which discriminate between the two. Try not to win the love of your friends, brothers, relatives and son(s) or to fight with your enemies. See yourself in each and everyone and give up ignorance of duality everywhere. Practice equanimity. [One must be ready to protect his kith and kin and him self, in stead of surrendering to situations, till he is a household undergoing Grahasthashram (-गृहस्थाश्रम) Varnashram Dharm.]
कामं क्रोधं लोभं मोहं, त्यक्त्वाऽत्मानं भावय कोऽहम्। आत्मज्ञान विहीना मूढाः, ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः॥26॥
काम, क्रोध, लोभ, मोह को छोड़ कर, स्वयं में स्थित होकर विचार करो कि मैं कौन हूँ ? जो आत्म-ज्ञान से रहित मोहित व्यक्ति हैं; वो बार-बार छिपे हुए इस संसार रूपी नरक में पड़ते हैं। 
Give up desires, anger, greed and delusion. Ponder over your real self-nature. Those devoid of the knowledge of self, come in this world-a hidden hell, endlessly.
गेयं गीता नाम सहस्रं, ध्येयं श्रीपति रूपमजस्रम्। नेयं सज्जन सङ्गे चित्तं, देयं दीनजनाय च वित्तम्॥27॥
भगवान विष्णु के सहस्त्र नामों को गाते हुए उनके सुन्दर रूप का अनवरत ध्यान करो, सज्जनों के संग में अपने मन को लगाओ और गरीबों की अपने धन से सेवा करो। 
Sing thousand glories of Bhagwan Vishnu, constantly remembering his various forms in your heart. Enjoy the company of virtuous-righteous-pious-noble people and do acts of charity for the poor, down trodden and the needy.
सुखतः क्रियते रामाभोगः,पश्चाद्धन्त शरीरे रोगः।  यद्यपि लोके मरणं शरणं, तदपि न मुञ्चति पापाचरणम्॥28
सुख के लिए लोग आनंद-भोग करते हैं, जिसके बाद इस शरीर में रोग हो जाते हैं। यद्यपि इस पृथ्वी पर सबका मरण सुनिश्चित है, फिर भी लोग पापमय आचरण को नहीं छोड़ते। 
People use this body for pleasure-enjoyment-passions-sexuality-sensuality-lust, which gets diseased in the end. Though in this world everything ends in death, man does not give up the sinful conduct. Greed, un fulfilled desires always keep him pushing to wretchedness-vices-sins-mis conduct.
अर्थंमनर्थम् भावय नित्यं, नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम्।  पुत्रादपि धनभजाम् भीतिः, सर्वत्रैषा विहिता रीतिः॥29॥
धन अकल्याणकारी है और इससे जरा सा भी सुख नहीं मिल सकता है, ऐसा विचार प्रतिदिन करना चाहिए। धनवान व्यक्ति तो अपने पुत्रों से भी डरते हैं; ऐसा सबको पता ही है। 
Keep on thinking that money is root cause of all troubles. It cannot give even a bit of happiness-pleasure. A rich man fears even his own sons, who are willing to kill him for the sake of wealth, luxuries. This is the law nature pertaining to riches and applicable to every one-everywhere.
प्राणायामं प्रत्याहारं, नित्यानित्य विवेकविचारम्।  जाप्यसमेत समाधिविधानं, कुर्ववधानं महदवधानम्॥30॥
प्राणायाम, उचित आहार, नित्य इस संसार की अनित्यता का विवेक पूर्वक विचार करो, प्रेम से प्रभु-नाम का जाप करते हुए समाधि में ध्यान दो, बहुत ध्यान दो। 
Perform-conduct-practice Pranayam, the regulation of life forces, take proper food, constantly distinguish the permanent from the fleeting.  Chant the holy names of God with love and meditate, with utmost attention. One must utilize his prudence-intelligence to abandon vices-sins-wretchedness.
गुरुचरणाम्बुज निर्भर भक्तः, संसारादचिराद्भव मुक्तः। सेन्द्रियमानस नियमादेवं, द्रक्ष्यसि निज हृदयस्थं देवम्॥31॥
गुरु के चरण कमलों का ही आश्रय मानने वाले भक्त बनकर सदैव के लिए इस संसार में आवागमन से मुक्त हो जाओ, इस प्रकार मन एवं इन्द्रियों का निग्रह कर अपने हृदय में विराजमान प्रभु के दर्शन करो। 
One must take shelter-asylum-protection under the auspiciousness of his Guru-guide like a devotee and set him self free from the clutches of this perishable world. This will help him in acquiring control over sensuality-vulgarity-useless thoughts-dirty ideas-irrational thoughts. One should become free from repeated cycles of death and births.  This will lead to self control over mind, ideas and retain the Almighty in the heart.
मूढः कश्चन वैयाकरणो, डुकृञ्करणाध्ययन धुरिणः।  श्रीमच्छम्कर भगवच्छिष्यै, बोधित आसिच्छोधितकरणः॥32॥
इस प्रकार व्याकरण के नियमों को कंठस्थ करते हुए किसी मोहित वैयाकरण के माध्यम से बुद्धिमान श्री भगवान शंकर के शिष्य बोध प्राप्त करने के लिए प्रेरित किये गए। 
Thus through a deluded grammarian lost in memorizing rules of the grammar, the all knowing  Shri Shankar motivated his disciples for enlightenment.
भजगोविन्दं भजगोविन्दं, गोविन्दं भजमूढमते। नामस्मरणादन्यमुपायं, नहि पश्यामो भवतरणे॥33॥
गोविंद को भजो, गोविन्द का नाम लो, गोविन्द से प्रेम करो क्योंकि भगवान के नाम जप के अतिरिक्त इस भव-सागर से पार जाने का अन्य कोई मार्ग नहीं है। 
O the deluded minded, chant Govind, worship Govind, love Govind; as there is no other way to cross the life's ocean except lovingly remembering the holy names of God.
आदि शंकराचार्य
महा भारत के बाद धीरे-धीरे देश में धर्म और अध्यात्म के नाम पर अराजकता फैलती चली गई। चार्वाक, लोकायत, कापालिक, शाक्त, सांख्य, बौद्ध, माध्यमिक तथा अन्य बहुत से सम्प्रदाय और शाखाएं बन गई थी। इस प्रकार के सम्प्रदायों की संख्या लगभग 72 हो गई थी। सब आपस में एक दूसरे के विरोधी थे। कहीं कोई शान्ति नहीं। अनाचार, अन्धविश्वास, द्वन्द और संघर्ष का बोलबाला था। लगता था हर तीसरे व्यक्ति का अपना दर्शन, अपना सिद्धान्त और अपना अनुगामी दल है। आध्यात्मिक क्षेत्र में हुए ऐसे पतन के समय शंकराचार्य का अवतरण हुआ।
आदि शंकराचार्य का जन्म केरल प्रदेश के कालडी नाम के गांव में सन् 788 में हुआ। यह गांव कल-कल करती सदानीरा पेरियार नदी के किनारे है। परिवार में काफी समय तक कोई बच्चा न होने के कारण शंकर का जन्म परिवार के लिए अत्यधिक प्रसन्नता दायक था। शंकर की माता आर्यम्बा के स्वप्न में साक्षात् भगवान शंकर ने दर्शन दिए और आशीर्वाद दिया कि वे स्वयं उनकी कोख से जन्म लेंगे। नवजात शिशु का नाम शंकर रखा गया। बालक शंकर बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि थे और इन्होंने बालपन में ही वेद, पुराण, वेदांग, उपनिषदों आदि का अध्ययन कर लिया था। साथ ही इनकी रूचि अन्य धर्मों और सम्प्रदायों के धर्मग्रंथों को पढ़ने में भी थी।
बचपन से ही इन्हें प्राकृत, अवधी और संस्कृत भाषाओं का ज्ञान था। शंकर ने एक वर्ष की आयु में संस्कृत, दो वर्ष की आयु में अपनी भाषा मलयालम और तीन वर्ष की आयु में पढ़ना सीख लिया था। बालपन से ही काव्य और पुराणों में इनकी रूचि थी। पांच वर्ष की आयु में इनका उपनयन संस्कार हुआ।
पांच वर्षीय बालक शंकर ने चतुश्पाठी विद्यार्थियों और उनके गुरू के बीच वार्तालाप (-परिचर्चा, विचार-विमर्श, शास्त्रार्थ) को सुना। उनके बीच के संवाद में अचानक हस्तक्षेप कर उन्होंने अपना मत रखा, जिससे वे सभी हत प्रभ रह गए। थे।
उन्होंने कहा कि वह काफी समय से उनकी बातचीत सुन रहे थे परन्तु एक बिन्दु पर आकर वह स्वयं को रोक नहीं सके क्योंकि दोनों ही अपने-अपने तर्कों से विमुख हो रहे थे। उन्होंने उस विषय पर एक समन्वित पक्ष सामने रखा था। 
सात वर्ष की आयु में ही उनके पिता का देहान्त हो गया और आठ वर्ष की आयु में वे सन्यासी हो गये। शंकर अपनी माता के साथ पेरियार नदी में स्नान के लिए गए जहाँ इनका पैर फिसल गया और इन्हें लगा कि एक मगरमच्छ ने उनकी टांग पकड़ ली है। ये वहीं से ज़ोर से चिल्लाये, ‘‘मां, मुझे मगरमच्छ खींच रहा है, यह मुझे खा जायेगा, मुझे सन्यासी बन जाने की आज्ञा दे दें। मैं सन्यासी बनकर मरना चाहता हूं।’’माता के सामने और कोई विकल्प नहीं था। उसने हां कर दी। शंकर ने नदी में ही अपथ-सन्यास की दीक्षा अपने मन ही मन में ली। अवश्यम्भावी मृत्यु के समय लिए गए सन्यास को अपथ सन्यास कहते हैं। कहते हैं मगरमच्छ ने इन्हें तुरन्त छोड़ दिया। ये पानी से बाहर आये, सन्यासी बन ही गए थे। अपनी माता को अपने सम्बन्धियों की देखभाल में छोड़कर देशाटन के लिए निकल गये।
घूमते-घूमते शंकर हिमालय में बदरीनाथ पहुंच गए और उन्होंने वहां स्वामी गोविन्दपाद आचार्य से भेंट की। शंकर को लगा कि वे ही उनके वास्तविक गुरु हैं। शंकर ने उनके चरण स्पर्श किए स्वामी ने शंकर से पूछा, ‘‘तुम कौन हो?’’ शंकर ने कहा, ‘‘गुरुदेव, न तो मैं अग्नि हूं, न वायु, न मिट्टी, न पानी, मैं एक सनातन आत्मा हूं जो सर्व व्याप्त है।’’ गोविन्दाचार्य इस उत्तर से अत्यन्त प्रसन्न हुए और शंकर को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया। गुरु ने शंकर को अद्वैतवाद की शिक्षा दी और बाद में उसे काशी जाने का आदेश दिया।
काशीवास शंकर के लिए वरदान सिद्ध हुआ। काशी प्रवास में ही उन्हें भगवान् विश्वनाथ के साक्षात् दर्शन हुए। भगवान् विश्वनाथ ने उन्हें आशीर्वाद दिया और आज्ञा दी कि वेदान्त शास्त्रों पर भाष्य की रचनाकर सनातन धर्म की रक्षा करो।भगवान् विश्वनाथ की इस आज्ञा को शिरोधार्य कर इन्होंने प्रस्थानत्रयी भाष्यों की रचना की।
वहाँ रहकर उन्होंने ब्रह्मसूत्र, गीता और उपनिषदों की व्याख्याएं लिखी।अनेक स्तोत्रों की रचना की जिनमें शिवभुजयं, शिवानन्द लहरी, शिवपादादिके शान्तस्तोत्र, वेदसार शिवस्तोत्र, शिवपराधक्षमापनस्तोत्र, दक्षिणामूर्ति अष्टक, मृत्युंजयमानसिकपूजा, शिव पंचाक्षरस्तोत्र, द्वादशलिंगस्तोत्र, दशशलोकी स्तुति आदि उल्लेखनीय हैं। यही समय था जब शंकर शंकराचार्य बन गए और उन्होंने सम्पूर्ण देश की यात्रा और सनातन धर्म की पुनःस्थापना की।
बड़े-बड़े विद्वानों से शास्त्रार्थ किए और उन सबको अपने दृष्टिकोण की ओर मोड़ा। उन्होंने भास्कर भट्ट, दण्डी, मयूरा हर्ष, अभिनव गुप्ता, मुरारी मिश्रा, उदयनाचार्य, धर्मगुप्त, कुमारिल, प्रभाकर आदि मूर्धन्य विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया।
उनकी भेंट महिष्मति के मण्डन मिश्र से हुई। मण्डन मिश्र कर्म मीमांसा के विद्वान थे और सन्यासियों के प्रति उनके मन में एक प्रकार की घृणा थी। जब शंकराचार्य मण्डन मिश्र से मिले, उस समय वे अन्य विद्वानों से घिरे बैठे थे। शंकराचार्य और मण्डन मिश्र में किसी धार्मिक विषय पर वाद-विवाद हो गया। शंकर ने मिश्र जी को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। मण्डन मिश्र सहमत हो गए।
निर्णायक के रूप में उपस्थित विद्वानों ने मण्डन मिश्र की पत्नी उदया भारती को चुना जो विदुषी थी। निश्चित हुआ कि यदि शंकर हार गए तो वे गृहस्थ हो जाएंगे और यदि मण्डन मिश्र हार गए तो वे सन्यासी हो जाएंगे। शास्त्रार्थ 17 दिन तक चला। मण्डन मिश्र की पत्नी ने निर्णायक की भूमिका में दोनों विद्वानों के गले में एक-एक माला डाल दी और कहा, ‘‘जिस किसी की माला के फूल पहले मुरझाने लगे तो वह स्वयं को पराजित मान लें।’’ यह कहकर वो अपने घर के कामकाज में व्यस्त हो गई। सत्रहवें दिन मण्डन मिश्र की माला के फूल मुरझाने लगे। उन्होंने पराजय स्वीकार कर ली।
परन्तु उदया भारती ने यह पराजय स्वीकार नहीं की। उन्होंने शंकर से कहा, ‘‘मैं मण्डन मिश्र की अर्धांगिनी हूं। आपने अभी मण्डन के अर्धभाग को पराजित किया है, अभी आपने मुझसे शास्त्रार्थ करना है।’’ शंकर ने महिला से शास्त्रार्थ करने से मना किया। भारती ने अनेक उदाहरण दिए जहां महिलाओं ने शास्त्रों और अध्यात्म का अध्ययन किया था। शंकर अनिच्छा से भारती से शास्त्रार्थ के लिए सहमत हुये। इस बार फिर शास्त्रार्थ की प्रक्रिया 17 दिन तक चली। अन्त में जब भारती को लगा कि शंकर को पराजित करना कठिन है, तब उन्होंने कामशास्त्र का सहारा लिया। उन्होंने शंकर से कामशास्त्र सम्बंधी प्रश्न पूछने शुरू किये।
शंकर ने पहले इसमें आनाकानी की। भारती अपनी जिद्द पर अड़ी रही। अन्ततः शंकर ने एक महीने का समय मांगा क्योंकि वे इस ज्ञान से अनभिज्ञ थे। शंकर काशी गए। वहाँ योग विद्या से अपने शरीर को छोड़ा। अपने शिष्यों से अपने शरीर की रक्षा करने का कहा और स्वयं एक सद्यमृत राजा अमरूक के शरीर में प्रवेष कर गए। राजा जीवित हो गया। यद्यपि राजा के रूप में जीवित व्यक्ति के कर्म, गुण, व्यवहार वास्तविक राजा से भिन्न थे। फिर भी वे राजा के रूप में राजगृह में रहे।
गृहस्थ जीवन, पारिवारिक व्यवहार और दाम्पत्य रहस्यों को समझा। वे एक महीने बाद पुनः अपने चोले में आ गए और लौटकर उन्होंने मण्डन मिश्र की पत्नी से फिर शास्त्रार्थ करने के लिए कहा। अब वे उनके कामशास्त्र सम्बन्धी प्रश्नों के उत्तर देने के लिए तैयार हो गए, परन्तु मण्डन मिश्र और भारती ने पराजय मान कर शंकर का नमन किया। शंकर ने मण्डन मिश्र का नामकरण सुरेश्वराचार्य किया और उन्हें श्रृँगेरी मठ का भार सौंप दिया।
उनकी माता का नियम था कि प्रतिदिन प्रातः नदी में स्नान किए बगैर कुछ भी खाना-पीना अनास्था है। एक दिन इनकी माता नदी स्नान करने गई तो वे काफी समय तक लौटी नहीं। प्रतीक्षा करने के बाद बालक शंकर माता को ढूंढने निकले। रास्ते में देखा कि इनकी माता अधमरी-सी सड़क पर लेटी हैं। इन्होंने माता को उठाया, उन्हें स्नान कराया और धीरे-धीरे घर ले आये।
उसी दिन निश्चय किया कि यदि माता नदी तक जाने में असमर्थ हैं तो क्यों नहीं नदी को गांव तक लाया जाये। प्राचीन समय में भगीरथ ने भी तो ऐसा ही किया था। बालक शंकर ने हृदय से अभ्यर्थना की और अन्ततः नदी ने अपना रूख शंकर के गांव की ओर, नहीं, उनके घर की ओर मोड़ दिया। शंकर की माता गद्गद थी। आज भी नदी इनके घर के पास से उसी प्रकार बहती है।
शंकराचार्य को हिन्दू, बौद्ध तथा जैन मत के लगभग 80 प्रधान सम्प्रदायों के साथ शास्त्रार्थ में प्रवृत्त होना पड़ा था। हिन्दू धर्मावलम्बी लोग यथार्थ वैदिक धर्म से विच्युत होकर अनेक संकीर्ण मतवादों में विभक्त हो गए थे। आचार्य शंकर ने वेद की प्रामाणिकता की प्रतिष्ठा की और हिन्दु धर्म के ‘‘सभी मतवादों का संस्कार कर जनसाधारण को वेदानुगामी बनाया। वेद का प्रचार उनका अन्यत्र प्रधान अवदान है। शंकर को वेदान्त के अद्वैतवाद सम्प्रदाय का प्रवर्तक माना जाता है।
इन्होंने अनेक शास्त्रों का भाष्य लिखा। इनके अद्वैतवाद के अनुसार संसार का अन्तिम सत्य ‘दो नहीं’ एक होता है। इसी का नाम ब्रह्म है। ‘एकमेव हि परमार्थसत्यं ब्रह्म।’ अर्थात् ब्रह्म ही सर्वोच्च सत्य है। यही एक सत्य है शेष सभी असत्य है। शंकर ने हिन्दुत्व को पौराणिक धर्म से मोड़कर उपनिषदों की ओर उन्मुख कर दिया। 1200 वर्ष पूर्व के उस अस्त-व्यस्त बौद्धिक वातावरण में यह कार्य कितना कठिन साध्य था, इसका अनुमान लगाना भी सम्भव नहीं है।
इनका एक अत्यंत महत्वपूर्ण परन्तु सबसे छोटा ग्रंथ है ‘भज गोविन्दम्’। इसमें वेदान्त के मूल आधार की शिक्षा अत्यंत सरल गेय शब्दों में दी गई है। इसके श्लोकों की लय अत्यधिक मधुर है और इन्हें सरलता से याद किया जा सकता है। इसमें मात्र 31 श्लोक हैं। इसकी गणना भक्तिगीतों में की जाती है। इनमें पहले बारह श्लोक ‘‘द्वादष मंजरिका स्तोत्रम्’’ के नाम से प्रसिद्ध हैं। इसका अर्थ है बारह श्लोक रूपी फूलों का गुच्छा। चौदह श्लोक ‘‘चतुर्दश मंजरिका स्तोत्रम्’ के नाम से विख्यात हैं। आचार्य के प्रत्येक शिष्य ने एक-एक श्लोक को गुरु प्रेरणा के रूप में कहा। इसके बाद आचार्य शंकर ने पुनः चार श्लोकों के माध्यम से सभी सच्चे साधकों को आशीर्वाद दिया। पहला श्लोक टेक रूप में है।
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम्गो विन्दम भज मूढमते। सम्प्राप्ते सान्निहिते काले न हि न हि रक्षति डुकृकरणें॥ 
सभी ग्रंथों की रचना के पीछे उनका एक ही भाव था कि मनुष्य को ब्रह्म का सान्निध्य प्राप्त करने का मार्ग स्पष्ट दिखायी देना चाहिए। अद्वैत को प्रमुखता देते हुए भी शंकर ने शिव, विष्णु, शक्ति और सूर्य पर स्तोत्र लिखे। इनका आग्रह समाज में समन्वय लाने का था। इन्हें आध्यात्मिक सुधारक भी माना जाता है क्योंकि शाक्त मन्दिरों में बलि देने की प्रथा का इन्होंने विरोध किया।
बदरिकाश्रम, द्वारका, जगन्नाथपुरी और श्रृंगेरी देश की चार दिशाओं में चार मठों की स्थापना का काम सबसे अहम था। इस तरह से देश की भौगोलिक एकता को प्रत्यक्ष करने का गम्भीर कार्य शंकराचार्य ही कर सकते थे। इन मठों के अध्यक्ष आचार्य श्री शंकराचार्य के नाम से ही जाने जाते हैं। शंकर ने देश के घुमक्कड़ साधुओं और सन्तों को एकत्र कर दस प्रमुख समूहों में एकत्रित किया। प्रत्येक मठ को इन्होंने एक-एक वेद का उत्तरदायित्व सौंपा :- बदरिकाश्रम के ज्योतिर्मठ को अथर्ववेद दिया, श्रृंगेरी के शारदापीठ को यजुर्वेद, जगन्नाथपुरी के गोवर्धनमठ को ऋग्वेद और द्वारका के कलिका मठ को सामवेद सौंपा।
ब्रह्मसूत्र, श्रीमदभगवद्गीता और उपनिषदों के भाष्य, शंकराचार्य ने कहते हैं, श्री बदरीनाथ की व्यास गुफा और ज्योर्तिमठ की गुफा में रहते हुए लिखे थे। इन्हें प्रस्थानत्रयी भी कहते हैं। ज्योर्तिमठ में इन्हें दिव्य ज्योतिर्मठ के दर्शन हुए। स्वामी अपूर्वानन्द ने अपनी पुस्तक ‘आचार्य शंकर’ में आचार्य के जीवन की अनेक अलौकिक और चमत्कारिक घटनाओं का उल्लेख किया है। प्रदेश के राजा राजशेखर शंकर के बालपन से इनसे प्रभावित थे और समय रहते वे इनके परम शिष्य हो गए। राजा राजशेखर एक साहित्यिक व्यक्ति थे और साहित्य रचना ही उनकी रूचि थी।
एक बार काफी समय बाद राजा और शंकर की जब भेंट हुई तो शंकराचार्य ने उनसे उनकी साहित्यिक गतिविधियों के बारे में चर्चा की। राजा ने अत्यंत खिन्न स्वर में उत्तर दिया कि ‘‘उन्होंने अब साहित्यिक गतिविधियां समाप्त कर दी हैं क्योंकि कुछ समय पूर्व ही उनके तीन नाटक, संभवतः ईश्वर शाप के कारण, अग्नि में भस्मीभूत हो गए हैं। इस चोट के कारण अब मेरा कुछ लिखने का मन नहीं करता।’’ शंकर भी यह सुनकर अत्यंत क्षुब्ध हुए।
उन्होंने कहा, ‘‘आपका कष्ट मैं समझता हूं क्योंकि ग्रंथकार के लिए ग्रंथ उसकी सनातन के समान होते हैं। यह आपकी मानस सृष्टि थी। आपने ये तीनों नाटक मुझे पढ़कर सुनाये थे। मुझे तीनों ही नाटक आदि से अन्त तक अक्षरषः याद हैं। आप चाहें तो उन्हें मुझसे सुनकर लिख कर पुनरूद्धार कर सकते हैं।’’ राजा को इससे आश्चर्य हुआ और प्रसन्नता भी हुई।
राजा ने पुलकित होकर कहा, ‘‘आचार्य, कृपया सुनायें, मैं लिपिक बुलाता हूं, वह लिख लेगा।’’ कुछ ही दिनों में तीनों नाटक पुनः लिख लिए गए। राजा ने पढ़ा और देखा कि यह उनकी रचना की अविकल पुनःस्थापना थी। आनन्द, विस्मय और कृतज्ञता से राजा ने बार-बार आचार्य को प्रणाम किया। यह आचार्य की अलौकिक स्मरण शक्ति का चमत्कार था।
जीवन भर वैदिक धर्म की पुनर्प्रतिष्ठा के लिए शंकराचार्य ने जो प्रयत्न किए, उन्हें भविष्य में क्रियाशील रखने का प्रबन्ध करके उन्होंने 32 वर्ष की अल्पायु में महाप्रस्थान करने का निश्चय किया। अपने शिष्यों के साथ केदारधाम पहुँचे और उन्हें सम्बोधित करते हुए कहा, ‘‘वत्स, इस शरीर का कार्य समाप्त हो गया है।

अब स्वरूप में लीन होने का समय आ गया है। तुम लोगों को कुछ ज्ञातव्य हो तो पूछ लो।’’ परमशिष्य प्युपाद ने सजल नयनों से कहा, ‘‘हे देव, आपकी कृपा से हम लोग कृतकृत्य तथा सफल मनोरथ है।’’ शिष्यों को आशीर्वचन देते हुए शंकराचार्य ने स्वर्गारोहण किया।

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