Monday, June 8, 2015

DEATH मृत्यु एक परम सत्य

DEATH मृत्यु एक परम सत्य
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh  Bhardwaj  
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Death is imminent and constitute an integral part of the life cycle and death cycle. One who is born must die, sooner or later. Demigods are not exception to this rule. Even the deities-goddess under go this cycle. None of the 14 abodes: 7 heavens and the 7 Tal are spared by it. Bhagwan Shri Ram and Bhagwan Shri Krashn took incarnation and left, as soon the deeds-purpose of their incarnation was over. All abodes under go this cycle. Bhagwan Brahma-Bhagwan Vishnu and Bhagwan Mahesh them self are bound-governed  by this rule with the life of 2 Parardh, 4 Parardh and 8 Parardh respectively. None of the abodes is spared by birth and destruction. As soon as the impact of virtues is over, the souls start descending to lower abodes .It reaches the earth, in the incarnation of human beings in a virtuous family. Here onward the next journey is decided, depending upon his deeds, virtues or sins. The sins will take him to hells. The soul may earn virtues, piousness, righteousness, honesty, devotion, values, ethics, leading to Salvation-a state of no return to earth. [Santosh]

One has faced-undergone suffering-setbacks-disasters-illness-agony-death in previous births innumerable times, having acquired rich experience in them. Activities which one is used to-experienced-practiced-repeatedly in previous lives are sufficient to develop skill and ability in doing them. Let such events do not destabilize-disturb one, having faced and survived them, a great number of times. They can be manoeuvred-handled quite easily. One should conquer them, without being afraid. These are the outcome of sins in previous births. All sinful acts should be avoided to protect self in present and future births. These troubles can not be escaped, since they are the outcome of deeds in previous many many births left to be experienced. So, one must face them smilingly, boldly-bravely. It's good to face them at a time when health is good-body has potential to face rigors-torture.
One always do so many things to improve his next births, but fails to make endeavors to rectify sinful errors-activities in present-current life. One must make efforts to safeguard the present by not indulging in sinful-unrighteous acts.
One remembers God and the God also remember his creations. He is always with his devotees to strengthen them. So, one has to be virtuous, righteous, honest, truthful, pious.
FEARING DEATH IS OF NO USE   मृत्यु भय व्यर्थ है :- मृत्यु एक परम सत्य है। मृत्यु अटल है और शाश्वत सत्य है। अत: उनसे डरना व्यर्थ है। विचलित मत होओ। दुनियां में हर परेशानी का समाधान है। डरो मत, साहस-धैर्य धारण करो। पाप-बुराई  से बचो। अभी इस परेशानी से निपट लोगे तो, अगले जन्म में नहीं झेलनी पडेगी। अगले जन्म के साथ साथ इस जन्म को भी सुधारो। भक्त व भगवान एक दूसरे को याद करते हैं। परमात्मा भक्त से कभी विलग-अलग नहीं होता। अत: उस पर भरोसा करो। अच्छे धार्मिक सत्य कर्म करते हुए उसे याद  करते रहो। कल्याण अवश्य होगा।
व्यक्ति समस्त प्रकार की यातनाओं, यंत्रणाओं, रोगों, व्याधि, बीमारीओं, रोगों व  मृत्यु का अनुभव अनंत  पूर्वजन्मों में  भी कर चुका है।  एक यही क्रिया है जो आत्मा स्वयं नहीं करती फिर भी उसे इसका अनन्त बार का अनुभव है।दुनियाँ में हर परेशानी का समाधान है। डरो मत साहस-धैर्य धारण करो। पूर्व जन्मों के कर्मों का फल तो हर हालत में भोगना पड़ेगा, उसको टाल तो सकते हो, मगर उससे बच नहीं सकते। अभी इस परेशानी से निपट लोगे तो अगले जन्म में नहीं झेलनी पडेगी। सभी आपत्तियों, विपत्तियों, संकटों, दुखों, दर्द, परेशानियों का हंस कर स्वागत करो; उन से डरो मत, संघर्ष मुकाबला करो।  पाप-बुराई  से बचो। दुनियां का हर संकट टल जायेगा ।अगले जन्म के साथ साथ इस जन्म को भी सुधारो । 
भक्त व भगवान एक दूसरे को याद करते हैं। परमात्मा भक्त से कभी विलग-अलग नहीं होता। अत: उस पर भरोसा करो। अच्छे धार्मिक सत्य कर्म करते हुए, उसे याद  करते रहो। तुम्हारा कल्याण अवश्य होगा।
जब कभी कोई व्यक्ति श्मशान में जाता है उसे जीवन की नीरसता याद आने लगती है उह भ्रम जाल लगता है, और वह कहता है, "अरे अन्त में यहीं तो आना है, फिर धोका, बेईमानी, झूँठ, लूट, चोरी, डकैती किस लिये !? परन्तु, जैसे ही श्मशान से बाहर निकलता है, वह सब कुछ भूलकर फिर से इन्हीं गोरख धंधों में लग जाता है। क्या यही जीवन है? क्या इसीलिए जीवन है ? मनुष्य जन्म अमोल है यह मानव मात्र की सेवा, अपना उद्धार सत कर्म, धर्म के लिए ही है। 
अभी 14 मार्च 2014 को बुलंद शहर में एक स्त्री की मृत्यु हो गई। परन्तु कुछ घण्टों बाद वो फिर से जीवित हो गई। उसने बताया कि ऊपर जाने पर यह पर कहा गया ये किसे उठा लाये।? जिसे लाना था वो तो दूसरे मोह्हले में रहती है। भूल सुधार तो हो गया, परन्तु देखो गलती तो धर्म राज के यहाँ भी हो सकती है। 
एक थे शादी बाबा। गाँव सलैमपुर, कस्बा ककोड़, जिला बुलंद शहर, उत्तर प्रदेश, भारत। वो मुसलमान थे। वो कब्र में दफनाने वक्त उठ बैठे। लोगों ने कहा भूत है, भागो। उन्होंने मातम मनाने वालों को रोका और कहा कि देखो वो जो शादी पण्डित हैं, मरना तो उन्हें था, वो लोग भूल से मुझे उठा के ले गये। शादी बाबा ने यमलोक, यमराज और चित्रगुप्त सहित समदूतों का जो वर्णन किया, वह गरुण पुराण से मेल खाता है। वहाँ जाकर देखा तो पता पड़ा कि मरना तो किसी और को था और मर कोई और गया। ख़ैर भूल सुधार तो हो गया। शादी बाबा उसके बाद 20 साल तक दिल्ली की जामा मस्जिद में हर जुम्मे को 70 मील का सफर, पैदल तय करके आते रहे। उन्हें अपने मरने-वापस जाने का मुकरर वक्त बता दिया गया था और वो उसी वक्त, दिन, तारीख पर गये। मजहब का झगड़ा यहाँ है, वहाँ नहीं। 
DEATH मृत्यु :- शरीर में जब वात का वेग बढ़ जाता है तो उसकी प्रेरणा से ऊष्मा अर्थात पित्त का प्रकोप भी हो जाता है।  वह पित्त सारे शरीर को घेर कर सारे सम्पूर्ण देशों को आवर्त के लेता है और प्राणों के स्थान और मर्मों का उच्छेद कर डालता है। फिर शीत से वायु का प्रकोप होता है और वायु अपने निकलने का स्थान-छिद्र ढूढ़ने लगती है। 
दो नेत्र, दो कान, दो नासिका और एक मुँख: ये सात छिद्र हैं और आठवाँ ब्रह्मरन्ध्र है। शुभ कार्य करने वाले मनुष्यों के प्राण प्रायः इन्हीं पूर्व सात मार्गों से निकलते हैं। धर्मात्मा जीव को उत्तम मार्ग और यान द्वारा स्वर्ग भेजा जाता है। 
नीचे भी दो छिद्र हैं: गुदा औए उपस्थ। पापियों के प्राण इन्हीं छिद्रों से निकलते है। 
योगी के प्राण मस्तक का भेदन करके ब्रह्मरन्ध्र से निकलते हैं और जीव इच्छानुसार अन्य लोकों में जाता है।
जीव को यमराज के दूत आतिवाहिक शरीर में पहुंचते हैं। यमलोक का मार्ग अति भयंकर और 86,000 योजन लम्बा है। यमराज के आदेश से चित्रगुप्त जीव को उसके पाप कर्मों के अनुरूप भयंकर नरकों में भेजते हैं। 
Enhancement of the flow of air in the body-blood enhances the bile juices as well. This bile covers the entire body through nervous system, blood circulatory system and the skin. It attacks-targets the soft points-centers of the other  airs (-heart, lungs) in the body. This lead to lowering of body temperature-cold.This cold strengthens the attack of the air in the body further, which start tracing the opening for release.
Humans have 2 ears, 2 nostrils, 2 eyes and a mouth, a total of 7 openings-outlets and the 8th is the Brahm Randhr-the ultimate outlet for the soul-Vital. The soul-Pran Vayu of pious-virtuous-righteous releases through these 7 openings. The pious-virtuous, righteous gets heaven by the sanction of Yam Raj. Chitr Gupt send him there through excellent routes by planes.
There are 2 more out lets for the release of Pran Vayu-the vital force-energy: The anus and the pennies. The soul of the wicked-sinner leaves the body through them.
The Yogi has the ultimate outlet for the soul-the Brahm Randhr. The soul explodes the skull and leaves the body to the abodes of its choice, in a divine formation-incarnation achieved by it.
The dead-deceased gets another identical non material body which is moved to hells through a distance of 86,000 Yojan which is very painful. There Yam Raj looks at him and Chitr Gupt thereafter send him to hells, which are extremely painful-torturous. What one gets here is the outcome of his deeds? As one sows, so he gets, here.This is absolute justice.
गरुड़ पुराण में बताया गया है कि यमलोक का रास्ता भयानक और पीड़ा देने वाला है। वहां एक नदी भी बहती है जोकि सौ योजन अर्थात एक सौ बीस किलोमीटर है। इस नदी में जल के स्थान पर रक्त और मवाद बहता है और इसके तट हड्डियों से भरे हैं। मगरमच्छ, सूई के समान मुखवाले भयानक कृमि, मछली और वज्र जैसी चोंच वाले गिद्धों का यह निवास स्थल है।
वैतरणी :: यम के दूत जब धरती से लाए गए व्यक्ति को इस नदी के समीप लाकर छोड़ देते हैं तो नदी में से जोर-जोर से गरजने की आवाज आने लगती है। नदी में प्रवाहित रक्त उफान मारने लगता है। पापी मनुष्य की जीवात्मा डर के मारे थर-थर कांपने लगती है। केवल एक नाव के द्वारा ही इस नदी को पार किया जा सकता है। उस नाव का नाविक एक प्रेत है। जो पिंड से बने शरीर में बसी आत्मा से प्रश्र करता है कि किस पुण्य के बल पर तुम नदी पार करोगे। जिस व्यक्ति ने अपने जीवनकाल में गौदान किया हो केवल वह व्यक्ति इस नदी को पार कर सकता है, अन्य लोगों को यमदूत नाक में काँटा फँसाकर आकाश मार्ग से नदी के ऊपर से खींचते हुए ले जाते हैं।
व्रत और उपवास का पालन करने से गोदान का फल प्राप्त होता है। दान वितरण है। इस नदी का नाम वैतरणी है। अत: दान कर जो पुण्य कमाया जाता है, उसके बल पर ही वैतरणी नदी को पार किया जा सकता है।
वैतरणी नदी की यात्रा को सुखद बनाने के लिए मृतक व्यक्ति के नाम वैतरणी गोदान का विशेष महत्व है। पद्धति तो यह है कि मृत्यु काल में गौमाता की पूँछ हाथ में पकड़ाई जाती है या स्पर्श करवाई जाती है। लेकिन ऐसा न होने की स्थिति में गाय का ध्यान करवा कर प्रार्थना इस प्रकार करवानी चाहिए।
वैतरणी गोदान मंत्र ::
धेनुके त्वं प्रतीक्षास्व यमद्वार महापथे। उतितीर्षुरहं भद्रे वैतरणयै नमौऽस्तुते

पिण्डदान कृत्वा यथा संभमं गोदान कुर्यात।[गरुड़ पुराण]
मृत्यु के पश्चात :: मरने के 47 दिन बाद आत्मा यमलोक में पहुँचती है। मृत्यु एक परम् सत्य है। मृत्यु के बाद आत्मा को कर्मों के अनुरूप गति-जन्म की प्रापि होती हैं। जो मनुष्य अच्छे कर्म करता है, वह स्वर्ग जाता है,जबकि जो मनुष्य जीवन भर बुरे कामों में लगा रहता है, उसे यमदूत नरक में ले जाते हैं। सबसे पहले जीवात्मा को यमलोक ले जाया जाता है। वहाँ यमराज उसके पापों के आधार पर उसे अनुरूप लोक और योनि प्रदान करते हैं।
जिस मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, वह बोल नहीं पाता। अंत समय में उसमें दिव्य दृष्टि उत्पन्न होती है और वह संपूर्ण संसार को एकरूप समझने लगता है। उसकी सभी इंद्रियाँ नष्ट हो जाती हैं। वह जड़ अवस्था में आ जाता है, यानी हिलने-डुलने में असमर्थ हो जाता है। इसके बाद उसके मुँह से झाग निकलने लगता है और लार टपकने लगती है। पापी पुरुष के प्राण नीचे के मार्ग-गुदा से निकलते हैं।
मृत्यु के समय दो यमदूत आते हैं। वे बड़े भयानक, क्रोधयुक्त नेत्र वाले तथा पाशदंड धारण किए होते हैं। वे नग्न अवस्था में रहते हैं और दाँतों से कट-कट की ध्वनि करते हैं। यमदूतों के कौए जैसे काले बाल होते हैं। उनका मुँह टेढ़ा-मेढ़ा होता है। नाखून ही उनके शस्त्र होते हैं। यमराज के इन दूतों को देखकर प्राणी भयभीत होकर मलमूत्र त्याग करने लग जाता है। उस समय शरीर से अंगूष्ठमात्र (अंगूठे के बराबर) जीव हा-हा शब्द करता हुआ निकलता है।
यमराज के दूत जीवात्मा के गले में पाश बाँधकर यमलोक ले जाते हैं। उस पापी जीवात्मा को रास्ते में थकने पर भी यमराज के दूत भयभीत करते हैं और उसे नरक में मिलने वाली यातनाओं के बारे में बताते हैं। यमदूतों की ऐसी भयानक बातें सुनकर पापात्मा जोर-जोर से रोने लगती है, किंतु यमदूत उस पर बिल्कुल भी दया नहीं करते।
इसके बाद वह अंगूठे के बराबर शरीर यमदूतों से डरता और काँपता हुआ, कुत्तों के काटने से दु:खी अपने पापकर्मों को याद करते हुए चलता है। आग की तरह गर्म हवा तथा गर्म बालू पर वह जीव चल नहीं पाता है। वह भूख-प्यास से भी व्याकुल हो उठता है। तब यमदूत उसकी पीठ पर चाबुक मारते हुए उसे आगे ले जाते हैं। वह जीव जगह-जगह गिरता है और बेहोश हो जाता है। इस प्रकार यमदूत उस पापी को अंधकार मय मार्ग से यमलोक ले जाते हैं।
यमलोक 99 हजार योजन (योजन वैदिक काल की लंबाई मापने की इकाई है। एक योजन बराबर होता है, चार कोस यानी 13.16 कि.मी) दूर है। वहाँ पापी जीव को दो-तीन मुहूर्त में ले जाते हैं। इसके बाद यमदूत उसे भयानक यातना देते हैं। यह याताना भोगने के बाद यमराज की आज्ञा से यमदूत आकाशमार्ग से पुन: उसे उसके घर छोड़ आते हैं।
घर में आकर वह जीवात्मा अपने शरीर में पुन: प्रवेश करने की इच्छा रखती है, लेकिन यमदूत के पाश से वह मुक्त नहीं हो पातीऔर भूख-प्यास के कारण रोती है। पुत्र आदि जो पिंड और अंत समयमें दान करते हैं, उससे भी प्राणी की तृप्ति नहीं होती, क्योंकि पापी पुरुषों को दान, श्रद्धांजलि द्वारा तृप्ति नहीं मिलती। इस प्रकार भूख-प्यास से बेचैन होकर वह जीव यमलोक जाता है।
जिस पापात्मा के पुत्र आदि पिंडदान नहीं देते हैं तो वे प्रेत रूप हो जाती हैं और लंबे समय तक निर्जन वन में दु:खी होकर घूमती रहती है। काफी समय बीतने के बाद भी कर्म को भोगना ही पड़ता है, क्योंकि प्राणी नरक यातना भोगे बिना मनुष्य शरीर नहीं प्राप्त होता। मनुष्य की मृत्यु के बाद 10 दिन तक पिंडदान अवश्य करना चाहिए। उस पिंडदान के प्रतिदिन चार भाग हो जाते हैं। उसमें दो भाग तो पंचमहाभूत देह को पुष्टि देने वाले होते हैं, तीसरा भाग यमदूत का होता है तथा चौथा भाग प्रेत खाता है। नवें दिन पिंडदान करने से प्रेत का शरीर बनता है। दसवें दिन पिंडदान देने से उस शरीर को चलने की शक्ति प्राप्त होती है।
शव को जलाने के बाद पिंड से हाथ के बराबर का शरीर उत्पन्न होता है। वही यमलोक के मार्ग में शुभ-अशुभ फल भोगता है। पहले दिन पिंडदान से मूर्धा (सिर), दूसरे दिन गर्दन और कंधे, तीसरे दिन से हृदय, चौथे दिन के पिंड से पीठ, पाँचवें दिन से नाभि, छठे और सातवें दिन से कमर और नीचे का भाग, आठवें दिन से पैर, नवें और दसवें दिन से भूख-प्यास उत्पन्न होती है। यह पिंड शरीर को धारण कर भूख-प्यास से व्याकुल प्रेतरूप में ग्यारहवें और बारहवें दिन का भोजन करता है।
यमदूतों द्वारा तेरहवें दिन प्रेत को बंदर की तरह पकड़ लिया जाता है। इसके बाद वह प्रेत भूख-प्यास से तड़पता हुआ यमलोक अकेला ही जाता है। यमलोक तक पहुंचने का रास्ता वैतरणी नदी को छोड़कर छियासी हजार योजन है। उस मार्ग पर प्रेत प्रतिदिन दो सौ योजन चलता है। इस प्रकार 47 दिन लगातार चलकर वह यमलोक पहुँचता है। मार्ग में सोलह पुरियों को पार कर पापी जीव यमराज के घर जाता है।
इन सोलह पुरियों के नाम इस प्रकार है :- सौम्य, सौरिपुर, नगेंद्रभवन, गंधर्व, शैलागम, क्रौंच, क्रूरपुर, विचित्रभवन, बह्वापाद, दु:खद, नानाक्रंदपुर, सुतप्तभवन, रौद्र, पयोवर्षण,शीतढ्य, बहुभीति। इन सोलह पुरियों को पार करने के बाद यमराजपुरी आती है। पापी प्राणी यमपाश में बंधा मार्ग में हाहाकार करते हुए यमराज पुरी जाता है।[गरुड़ पुराण]
मौत का आभास ::
अगर किसी व्यक्ति को अचानक चंद्रमा और सूरज काले दिखाई देने लगे, सभी दिशाएँ घूमती दिखें तो उसकी मौत 6 माह में हो सकती है।
अगर किसी व्यक्ति को चंद्रमा या सूर्य के आसपास काला या लाल घेरा दिखाई देने लगे तो समझना चाहिये कि उसकी मौत 15 दिन के अंदर होगी।
अगर किसी व्यक्ति को रात में चंद्रमा या तारे ठीक से ना दिखाई दें, तब ऐसा माना जाता है कि उसकी मौत एक महीने के अंदर हो सकती है।
यदि किसी इंसान का बाँया हाथ लगातार फड़कता रहे, तालू सूख जाए तो उसकी मौत भी एक महीने में हो जाती है।
जिस व्यक्ति को अचानक नीली मक्खियां घेर लें तो ऐसा माना जाता है कि अब उसकी उम्र एक महीने ही बची है।
जब किसी इंसान को पानी, तेल, घी और शीशे में अपनी परछाई दिखाई ना दे तो उसकी मौत में 6 महीने का समय ही शेष होता है।
किसी इंसान का शरीर सफेद या पीला हो जाए और शरीर पर लाल निशान दिखाई देने लगें, तो उसकी मौत 6 महीने में हो सकती है।

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