Sunday, August 2, 2020

होली HOLI :: FESTIVAL OF COLOURS

होली
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj

dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com santoshhastrekhashastr.wordpress.com bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com santoshkathasagar.blogspot.com bhartiyshiksha.blogspot.com santoshhindukosh.blogspot.com
ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
होली पर्व :: इस पर्व का प्राचीनतम नाम वासन्ती नव सस्येष्टि है अर्थात् बसन्त ऋतु के नये अनाजों से किया हुआ यज्ञ, परन्तु होली होलक का अपभ्रंश है।
"तृणाग्निं भ्रष्टार्थ पक्वशमी धान्य होलक:" 
[शब्द कल्पद्रुम कोष] 
अर्धपक्वशमी धान्यैस्तृण भ्रष्टैश्च होलक: होलकोऽल्पानिलो मेद: कफ दोष श्रमापह।
[भाव प्रकाश]
तिनके की अग्नि में भुने हुए (अधपके) शमो-धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। यह होलक वात-पित्त-कफ तथा श्रम के दोषों का शमन करता है।
होलिका :- किसी भी अनाज के ऊपरी पर्त को होलिका कहते हैं, जैसे :- चने का पट पर (पर्त) मटर का पट पर (पर्त), गेहूँ, जौ का गिद्दी से ऊपर वाला पर्त। इसी प्रकार चना, मटर, गेहूँ, जौ की गिदी को प्रह्लाद कहते हैं। होलिका को माता इसलिए कहते हैं कि वह चनादि का निर्माण करती (माता निर्माता भवति) यदि यह पर्त पर (होलिका) न हो तो चना, मटर रुपी प्रह्लाद का जन्म नहीं हो सकता। जब चना, मटर, गेहूँ व जौ भुनते हैं तो वह पट पर या गेहूँ, जौ की ऊपरी खोल पहले जलता है, इस प्रकार प्रह्लाद बच जाता है। उस समय प्रसन्नता से जय घोष करते हैं कि होलिका माता की जय अर्थात् होलिका रुपी पट पर (पर्त) ने अपने को देकर प्रह्लाद (चना-मटर) को बचा लिया।
स :- अधजले अन्न को होलक कहते हैं। इसी कारण इस पर्व का नाम होलिकोत्सव है और बसन्त ऋतुओं में नये अन्न से यज्ञ (येष्ट) करते हैं। इसलिए इस पर्व का नाम "वासन्ती नव सस्येष्टि" है। यथा :- वासन्तो-वसन्त ऋतु। नव-नये। येष्टि-यज्ञ। इसका दूसरा नाम "नव सम्वतसर" है। मानव सृष्टि के आदि से आर्यों की यह परम्परा रही है कि वह नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव पितरों को समर्पित करते थे। तत्पश्चात् स्वयं भोग करते थे। हमारा कृषि वर्ग दो भागों में बँटा है :- (1). वैशाखी, (2). कार्तिकी। इसी को क्रमश: वासन्ती और शारदीय एवं रबी और खरीफ की फसल कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल का आरम्भ है। अब तक चना, मटर, अरहर व जौ आदि अनेक नवान्न पक चुके होते हैं। अत: परम्परानुसार पितरों देवों को समर्पित करें, कैसे सम्भव है। 
"अग्निवै देवानाम मुखं"
अग्नि देवों-पितरों का मुख है जो अन्नादि शाकल्यादि आग में डाला जायेगा। वह सूक्ष्म होकर पितरों देवों को प्राप्त होगा।
आर्यों में चातुर्य्यमास यज्ञ की परम्परा है। वेदज्ञों ने चातुर्य्यमास यज्ञ को वर्ष में तीन समय निश्चित किये हैं :- (1). आषाढ़ मास, (2). कार्तिक मास (दीपावली) (3). फाल्गुन मास (होली) यथा 
"फाल्गुन्या पौर्णामास्यां चातुर्मास्यानि प्रयुञ्जीत मुखं वा एतत सम्वत् सरस्य यत् फाल्गुनी पौर्णमासी आषाढ़ी पौर्णमासी"
फाल्गुनी पौर्णमासी, आषाढ़ी पौर्णमासी और कार्तिकी पौर्णमासी को जो यज्ञ किये जाते हैं वे चातुर्यमास कहे जाते हैं आग्रहाण या नव संस्येष्टि।
हम प्रतिवर्ष होली जलाते हैं। उसमें आखत डालते हैं, जो आखत हैं-वे अक्षत का अपभ्रंश रुप हैं, अक्षत चावलों को कहते हैं और अवधि भाषा में आखत को आहुति कहते हैं। कुछ भी हो चाहे आहुति हो, चाहे चावल हों, यह सब यज्ञ की प्रक्रिया है। हम जो परिक्रमा देते हैं यह भी यज्ञ की प्रक्रिया है। क्योंकि आहुति या परिक्रमा सब यज्ञ की प्रक्रिया है, सब यज्ञ में ही होती है। इस प्रक्रिया से सिद्ध हुआ कि यहाँ पर प्रतिवर्ष सामूहिक यज्ञ की परम्परा रही होगी इस प्रकार चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस होली रुपी विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते थे। हम जो गुलरियाँ बनाकर अपने-अपने घरों में होली से अग्नि लेकर उन्हें जलाते हो। यह प्रक्रिया छोटे-छोटे हवनों की है। सामूहिक बड़े यज्ञ से अग्नि ले जाकर अपने-अपने घरों में हवन करते थे। बाहरी वायु शुद्धि के लिए विशाल सामूहिक यज्ञ होते थे और घर की वायु शुद्धि के लिए छोटे-छोटे हवन करते थे दूसरा कारण यह भी था।
"ऋतु सन्धिषु रोगा जायन्ते" 
ऋतुओं के मिलने पर रोग उत्पन्न होते हैं, उनके निवारण के लिए यह यज्ञ किये जाते थे। यह होली शिशिर और बसन्त ऋतु का योग है। रोग निवारण के लिए यज्ञ ही सर्वोत्तम साधन है। अब होली प्राचीनतम वैदिक परम्परा के आधार पर समझ गये होंगे कि होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है।
हिरण्यकशिपु और होलिका कथा :: होलिका हिरण्य कश्यपु नाम के राक्षस की बहिन थी। उसे यह वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यपु का प्रह्लाद नाम का आस्तिक पुत्र विष्णु की पूजा करता था। वह उसको कहता था कि तू विष्णु को न पूजकर मेरी पूजा किया कर। जब वह नहीं माना तो हिरण्यकश्यपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठे। वह प्रह्लाद को आग में गोद में लेकर बैठ गई, होलिका जल गई और प्रह्लाद बच गया। होलिका की स्मृति में होली का त्यौहार मनाया जाता है जो नितान्त मिथ्या है।इसलिए आओ सब मिलकर अपने इस पवित्र पर्व को इसके वास्तविक स्वरूप मे मनाये।
दैत्यों के आदि पुरुष कश्यप और उनकी पत्नी दिति के दो पुत्र हुए। हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष। हिरण्यकशिपु ने कठिन तपस्या द्वारा ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके यह वरदान प्राप्त कर लिया कि न वह किसी मनुष्य-पशु द्वारा, न दिन में-न रात में, न घर के अंदर -न बाहर, न किसी अस्त्र के प्रहार से और न किसी शस्त्र के प्रहार से, उसके प्राणों को कोई डर रहेगा। इस वरदान ने उसे अहंकारी-स्वेच्छाचारी बना दिया और वह अपने को अमर समझने लगा। उसने देव राज इंद्र से स्वर्ग छीन लिया और वह तीनों लोकों को प्रताड़ित करने लगा। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान् मानें और उसकी पूजा करें। उसने अपने राज्य में भगवान् श्री हरी विष्णु की पूजा को वर्जित कर दिया। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद, भगवान् श्री हरी विष्णु का परम् भक्त था। यातनाओं एवं प्रताड़ना के बावजूद वह भगवान् श्री हरी विष्णु की पूजा करता रहा। क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने अपनी बहन होलिका से कहा कि वह अपनी गोद में प्रह्लाद को लेकर प्रज्ज्वलित अग्नि में प्रवेश करे, क्योंकि होलिका को वरदान था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। जब होलिका ने प्रह्लाद को लेकर अग्नि में प्रवेश किया तो प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ, मगर होलिका जलकर राख हो गई। अन्तिम प्रयास में हिरण्यकशिपु ने लोहे के एक खंभे को गर्म कर लाल कर दिया तथा प्रह्लाद को उसे गले लगाने को कहा। एक बार फिर भगवान् श्री हरी विष्णु प्रह्लाद को उबारने आए। वे खंभे से नरसिंह के रूप में प्रकट हुए तथा हिरण्यकशिपु को महल के प्रवेश द्वार की चौखट पर, जो न घर का बाहर था न भीतर, गोधूलि बेला में, जब न दिन था न रात, आधा मनुष्य, आधा पशु जो न नर था न पशु, ऐसे नरसिंह के रूप में अपने लंबे तेज़ नाखूनों से जो न अस्त्र थे न शस्त्र, मार डाला। इस प्रकार हिरण्यकश्यप अनेक वरदानों के बावजूद अपने दुष्कर्मों के कारण भयानक अंत को प्राप्त हुआ। [विष्णुपुराण]
प्राचीन काल में ढुंढा अथवा ढौंढा नामक राक्षसी एक गाँव में घुसकर बालकों को कष्ट देती थी। वह रोग एवं व्याधि निर्माण करती थी। उसे गांव से निकालने हेतु लोगों ने बहुत प्रयत्न किए। परन्तु वह जाती ही नहीं थी। अंत में लोगों ने सर्वत्र अग्नि जलाकर उसे डराकर भगा दिया। वह भयभीत होकर गाँव से भाग गई। [भविष्यपुराण]
होली भी संक्रान्ति के समान देवी हैं। षड्विकारों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता होलिका देवी में है। विकारों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता प्राप्त करने के लिये होलिका देवी से प्रार्थना की जाती है। इसलिए होली को उत्सव के रूप में मनाते हैं।
होली भी अग्निदेव की उपासना का ही एक अंग है। अग्निदेव की उपासना से व्यक्ति में तेजत्त्व बढ़ता है। होली के दिन अग्निदेव का तत्त्व 2% कार्य रत रहता है। इस दिन अग्निदेव की पूजा करने से जातक को तेजत्त्व का लाभ होता है। इससे व्यक्ति में से रज-तम की मात्रा घटती है। होली के दिन किए जाने वाले यज्ञों के कारण प्रकृति मानव के लिए अनुकूल हो जाती है। इससे समय पर एवं अच्छी वर्षा होने के कारण सृष्टि संपन्न बनती है। इसीलिए होली के दिन अग्निदेव की पूजा कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। घरों में सुबह पूजा की जाती है। सार्वजनिक रूप से मनाई जाने वाली होली रात में मनाई जाती है।
पृथ्वी, आप, तेज, वायु एवं आकाश इन पञ्च तत्त्वों की सहायता से देवत्त्व को पृथ्वी पर प्रकट करनेके लिए यज्ञ ही एक माध्यम है। जब पृथ्वी पर एक भी स्पंदन नहीं था, उस मन्वान्तर के प्रथम त्रेता युग में पञ्च  तत्त्वों में विष्णु तत्त्व प्रकट होने का समय आया। तब परमेश्वर द्वारा एक साथ सात ऋषि-मुनियों को स्वपन् दृष्टांत में यज्ञ के बारे में ज्ञान हुआ। उन्होंने यज्ञ की तैयारियाँ प्रारम्भ कीं। देव ऋषि नारद के मार्ग दर्शनानुसार यज्ञ का शुभारम्भ हुआ। मंत्र घोष के साथ सबने विष्णु तत्त्व का आवाहन किया। यज्ञ की ज्वालाओं के साथ यज्ञ कुण्ड में विष्णु तत्त्व प्रकट होने लगा। इससे पृथ्वी पर विद्यमान अनिष्टकारी शक्तियों को कष्ट होने लगा। उनमें भगदड़ मच गई। उन्हें अपने कष्ट का कारण समझ में नहीं आ रहा था। धीरे-धीरे भगवान् श्री हरी विष्णु पूर्ण रूप से प्रकट हुए। ऋषि-मुनियोंके साथ वहाँ उपस्थित सभी भक्तों को भगवान् श्री हरी विष्णु के दर्शन हुए। उस दिन फाल्गुन पूर्णिमा थी। इस प्रकार त्रेता युग के प्रथम यज्ञ के स्मरण में होली मनाई जाती है।
होली का महत्व मनुष्य के व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन के साथ ही साथ नैसर्गिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक कारणों से भी है। यह बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है। यह दुष्प्रवृत्ति एवं अमंगल विचारों का नाश कर, सद्प्रवृत्ति का मार्ग दिखाने वाला यह उत्सव है। यह अनिष्टकारी शक्तियों को नष्ट कर ईश्वरीय चैतन्य प्राप्त करने का अवसर है। आध्यात्मिक साधना में अग्रसर होने हेतु बल प्राप्त करने का यह अवसर है। यह उत्सव वसंत ऋतु के शुभागमन हेतु मनाया जाता है। इस त्यौहार के माध्यम से अग्निदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।
होली प्रदीपन पद्धति :: होली का उत्सव मनाने की तैयारी महीने भर पहले से ही आरम्भ हो जाती है। इसमें बच्चे घर-घर जाकर लकडियाँ इकट्ठी करते हैं। पूर्ण मासी को होली की पूजा से पूर्व उन लकडियों की विशिष्ट पद्धति से रचना की जाती है। तत्पश्चात उसकी पूजा की जाती है। पूजा करनेके उपरान्त उसमें अग्नि प्रदीप्त-प्रज्वलित की जाती है। 
होली रखना :: 
आवश्यक सामग्री :: अरण्ड का पेड़, नारियल का वृक्ष-तना अथवा सुपारी के वृक्ष का तना अथवा तैयार गन्ना। गन्ने के टुकड़े न करें। गाय के गोबर के उपले और लकड़ियाँ।
सामान्यत: ग्राम देवता के देवालय के सामने होली रखी और जलाई जाती है। अन्य सुविधा जनक स्थान का निषेध नहीं है। जिस स्थान पर होली जलानी हो, उस स्थान पर सूर्यास्त के पूर्व झाड़ू लगाकर स्वच्छ करें। गाय के गोबर से चौका लगायें। अरण्डी का पेड, नारियल अथवा सुपारी के पेड़ के तने को बीचों बीच गाढ़ें। उसके चारों ओर उपलों एवं लकड़ियों की शंकुआकार रचना करें। उस स्थान पर रंगोली बनायें। होली की ऊँचाई 6 फुट के लगभग रखें। 
होली का शंकुआकार इच्छा शक्ति का प्रतीक है। इस रचना में घनी भूत होने वाला अग्नि स्वरूपी तेजत्त्व भूमण्डल पर आच्छादित होता है। इससे भूमि को लाभ होता है। इसके साथ ही पाताल से भूगर्भ की दिशा में प्रक्षेपित कष्ट दायक स्पंदनों से भूमि की रक्षा होती है।
होली की इस रचना में घनी भूत तेज के अधिष्ठान के कारण भूमंडल में विद्यमान स्थान देवता, वास्तु देवता एवं ग्राम देवता जैसे क्षुद्र देवताओं के तत्त्व जागृत होते हैं। इससे भूमण्डल में विद्यमान अनिष्ट शक्तियों के उच्चाटन का कार्य सहजता से साध्य होता है।
शंकु के आकार में घनीभूत अग्नि रूपी तेज के सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति की मन शक्ति जागृत होने में सहायता होती है। इससे उनकी कनिष्ठ स्वरूप की मनोकामना पूर्ण होती है एवं व्यक्ति को इच्छित फलप्राप्ति होती है।
होली के कारण साधारणतः मध्य वायु मण्डल एवं भूमि के पृष्ठ भाग के निकट का वायु मण्डल शुद्ध होने की सम्भावना ज्यादा रहती है। होली में यज्ञ सामग्री, घी, तिल जौ, कपूर, सुपारी आदि पदार्थ वायु मण्डल में विषाणुओं का नाश करते हैं और वायु में उपस्थित हानि कारक पदार्थों को अपने साथ लेकर भूमि पर गिरते हैं। 
होली की ऊँचाई पुरुष जितनी होने से होली द्वारा प्रक्षेपित तेज की तरंगों के कारण उर्ध्व दिशा का वायु मण्डल शुद्ध बनता है। तत्पश्चात् यह ऊर्जा जड़त्व धारण करती है एवं मध्य वायु मण्डल तथा भूमि के पृष्ठ भाग के निकट के वायु मण्डल में घनी भूत होने लगती है। इसी कारण से होलीकी ऊँचाई साधारणतः छः फुट होनी चाहिए। इससे शंकु स्वरूप रिक्ति में तेज की तरंगें घनी भूत होती हैं एवं मध्य मण्डल में उससे आवश्यक ऊर्जा निर्मित होती है।
गन्ना प्रवाही रजो गुणी तरंगों का प्रक्षेपण करने में अग्रसर होता है। इसके सामीप्य के कारण होली में विद्यमान शक्ति रूपी तेज तरंगें प्रक्षेपित होने में सहायता मिलती है। गन्ने का तना होली में घनी भूत हुए अग्नि रूपी तेजत्त्व को प्रवाही बनाता है एवं वायु मण्डल में इस तत्त्व का फव्वारे के समान प्रक्षेपण करता है। यह रजो गुण युक्त तरंगों का फव्वारा परिसर में विद्यमान रज-तमात्मक तरंगों को नष्ट करता है। इस कारण वायु मण्डल की शुद्धि होने में सहायता मिलती है। गन्ने में मौजूद मिठास अग्नि प्रज्वलित करने में सहायक है।  
अरण्ड से निकलने वाले धूँए के कारण अनिष्ट शक्तियों द्वारा वातावरण में प्रक्षेपित की गई दुर्गन्ध युक्त वायु नष्ट होती है।
मूलतः रजो गुण धारण करना यह सुपारी की विशेषता है। इस रजो गुण की सहायता से होली में विद्यमान तेजत्त्व की कार्य करने की क्षमता में वृद्धि होती है।
गाय के शरीर में 33 करोड देवताओं का वास होता है। ब्रह्माण्ड में विद्यमान सभी देवताओं के तत्त्व तरंगों को आकृष्ट करने की अत्यधिक क्षमता गाय में होती है। इसीलिए उसे गौ माता कहते हैं। यही कारण है कि गौ मातासे प्राप्त सभी वस्तुएं भी उतनी ही सात्त्विक एवं पवित्र होती हैं। गोबर से बनाए उपलों में से 5% सात्त्विकता का प्रक्षेपण होता है, तो अन्य उपलों से प्रक्षेपित होने वाली सात्त्विकता का प्रमाण केवल 2% प्रतिशत ही रहता है। अन्य उपलों में अनिष्ट शक्तियों की शक्ति आकृष्ट होनेकी संभावना भी होती है। इससे व्यक्ति की ओर कष्ट दायक शक्ति प्रक्षेपित हो सकती है। कई स्थानों पर लोग होलिका पूजन षोडशोपचारों के साथ करते हैं। यदि यह सम्भव न हो, तो न्यूनतम पंचोपचार पूजन तो अवश्य करना चाहिए।
होलिका-पूजन एवं प्रदीपन हेतु आवश्यक सामग्री :: पूजा की थाली, हल्दी-कुमकुम, चन्दन, फूल, तुलसी दल, अक्षत, अगरबत्ती, फूलबाती, निरांजन, कर्पूर, , दिया सलाई, कलश, आचमनी, पंच पात्र, ताम्र पात्र, घंटा, समई, तेल एवं बाती, मीठी रोटी का नैवेद्य परोसी थाली, गुड़ डालकर बनाइ बिच्छू के आकार की पूरी अग्नि को समर्पित करने के लिए। 
सूर्यास्त के समय पूजन कर्ता शूचिर्भूत होकर होलिका पूजनके लिए सिद्ध हों। पूजक पूजा स्थानपर रखे पीढ़े पर बैठें। उसके पश्चात आचमन करें। अब होलिका पूजन का निम्न संकल्प करें :-
काश्यप गोत्रे उत्पन्नः विनायक शर्मा अहं। मम सपरिवारस्य श्रीढुंढाराक्षसी प्रीतिद्वारा तत्कर्तृक सकल पीडा परिहारार्थं तथाच कुलाभिवृद्ध्यर्थंम्। श्रीहोलिका पूजनम् करिष्ये।
काश्यप के स्थान पर अपना गौत्र नाम उच्चारित करें।  
अब चन्दन  एवं पुष्प चढ़ाकर कलश, घंटी तथा दीपपूजन करें। तुलसी के पत्ते से संभार प्रोक्षण अर्थात पूजा साहित्य पर प्रोक्षण करें। अब कर्पूर की सहायता से होलिका प्रज्वलित करें। होलिका पर चन्दन चढायें। होलिका पर हल्दी चढायें। कुमकुम चढाकर पूजन आरम्भ करें।
पुष्प चढाएं। अगरबत्ती दिखाएं। दीप दिखाएं।
होलिका को मीठी रोटी का नैवेद्य प्रदीप्त होली में अर्पित करें। दूध एवं घी एकत्रित कर उसका प्रोक्षण करे। होलिका की तीन परिक्रमा करें। परिक्रमा पूर्ण होने पर मुँह पर उलटे हाथ रखकर ऊँचे स्वर में चिल्लाएं। गुड़ एवं आटे से बने बिच्छू आदि कीटक मंत्र पूर्वक अग्नि में समर्पित करें। सब मिलकर अग्नि के भय से रक्षा होने हेतु प्रार्थना करें।
कई स्थानों पर होली के शान्त होने से पूर्व इकट्ठे हुए लोगों में नारियल, चकोतरा जैसे फल बाँटे जाते हैं। सामान्यतया होली पूजन करने वाले श्रद्धालु मूँगफली और रेवड़ी बाँटते हैं। मिठाईयाँ भी वितरित की जाती हैं। कई स्थानों पर सारी रात नृत्य-गायन में व्यतीत की जाती है।
होली पूजन के समय पुजारी और जातक दोनों की ओर ईश्वरीय चैतन्य शक्ति-ऊर्जा का प्रवाह होता है। पूजा भली-भाँति ग्रहण करने से इसका लाभ प्राप्त होता है।
मंत्र पठन करते समय पुजारी और जातक दोनों का ईश्वर से सायुज्य होता है। इससे मंत्र पठन भाव पूर्ण रीति से होने के लिए ईश्वरीय शक्ति का प्रवाह उनकी ओर होता है। इसके कारण पूजा विधि के लिए भी शक्ति प्राप्त होती है।
होली की पूजा करते समय पूजक एवं पुरोहित दोनों के आज्ञा चक्र के स्थान पर एकाग्रता एवं सेवा भाव का प्रकाश पुँज-गोला निर्माण होता है।
पुरोहित द्वारा बताए अनुसार पूजक मंत्रोच्चार करता है। इस मंत्रोच्चारके कारण दोनों के आज्ञा चक्र के स्थान पर मंत्र शक्ति का कार्यरत वलय निर्माण होता है।
पूजा करते समय दोनों में सात्विक भाव का वलय निर्माण होता है।
सात्त्विक पुरोहित में प्रार्थना एवं गुरु कृपा का गोला निर्माण होता है। इस कारण वे सेवा कर पाते हैं एवं उन्हें सात्त्विकता का अधिक लाभ प्राप्त होता है।
मंत्र पठन एवं होली में प्रयुक्त उचित प्रकार के वृक्षों की लकड़ियों के कारण सात्त्विक पुरोहित में शक्ति का वलय कार्यरत होता है एवं उससे वातावरण में शक्ति का प्रक्षेपण होता है।
दोनों के देह की शुद्धि होती है एवं उनके चारों ओर ईश्वरीय शक्ति का सुरक्षा कवच निर्माण होता है।
पूजा में प्रकट हुई शक्ति के कारण होली के सभी ओर भूमि के समानान्तर शक्ति का एवं चैतन्य का वलय निर्माण होता है।
होली प्रज्वलित करने के लिए पूजक-जातक द्वारा हाथ में लिए प्रदिप्त अर्थात जलाते हुए कर्पूर में तेजत्व का वलय निर्माण होता है। उससे चमकीले कणोंका वातावरण में प्रक्षेपण होता है।
अग्नि द्वारा शक्ति का वलाय निर्माण होता है तथा उससे शक्ति की तरंगे होली की रचना की ओर प्रक्षेपित होती हैं।
प्रदिप्त कर्पूरमें मंत्र शक्ति का वलय भी निर्माण होता है तथा उसके द्वारा मंत्र शक्ति की तरंगें होली की ओर प्रक्षेपित होती हैं।
मंत्र शक्ति की बाहरी ओर चैतन्य का वलय निर्माण होता है। उससे होली की रचना की ओर चैतन्यता की तरंगों का प्रक्षेपण होता है।
होली प्रदीपन करते समय अग्नि में विद्यमान शक्ति प्रवाह के रूप में पूजक को प्राप्त होती है।
पूजक के चारों ओर तेजत्त्व का, शक्ति का एवं चैतन्य का सुरक्षा कवच निर्माण होता है।
होली की रचना में सगुण शक्ति एवं सगुण चैतन्य के वलय निर्माण होते है। इन वलयों द्वारा शक्ति के तथा चैतन्य के प्रवाहों का वातावरण में प्रक्षेपण होता है। कुछ मात्रा में शक्ति के वलयों का भी वातावरण में प्रक्षेपण होता है। यह प्रक्षेपण आवश्यकता के अनुसार कभी तीव्र गति से, तो कभी धीमी गति से होता है।
होली में अग्नि प्रदीप्त करते समय बीच में रखे गन्ने की ऊपरी नोंक में ईश्वरीय शक्ति एवं चैतन्यके प्रवाह आकृष्ट होते हैं। इन प्रवाहों द्वारा शक्ति एवं चैतन्य के कार्य रत वलयों का निर्माण होता है। इन वलयों द्वारा वातावरण में शक्ति एवं चैतन्य के प्रवाह प्रक्षेपित होते हैं।
इन कार्यरत वलयों द्वारा चैतन्य का सर्पिलाकार प्रवाह होली की रचना की ओर आकृष्ट होता है। वातावरण में शक्ति के समानान्तर वलय उर्ध्व दिशा में प्रसारित होते हैं।
शक्ति एवं चैतन्य के भूमि से समानान्तर वलय अधो दिशा में प्रसारित होते हैं। शक्ति एवं चैतन्य का प्रक्षेपण उर्ध्व तथा अधो दिशा में होने से सभी दिशाओं की अनिष्ट कारी शक्तियाँ नष्ट होती हैं। होली से तेजत्वात्मक मारक शक्ति के कणों-तरंगों का वातावरण में प्रक्षेपण होता है। इससे वातावरण में विद्यमान अनिष्ट कारी शक्तियांँ नष्ट होती हैं। इस शक्ति के कारण वहाँ उपस्थित व्यक्तियों पर आध्यत्मिक प्रभाव उत्पन्न होता है।  
होलिका देवी को निवेदित करने के लिए एवं होली में अर्पण करनेके लिए उबाली हुई चने की दाल एवं गुड़ का मिश्रण भरकर मीठी रोटी बनाते हैं। इस मीठी रोटी का नैवेद्य होली प्रज्वलित करने के उपरान्त उसमें समर्पित किया जाता है। होली में अर्पण करने के लिए नैवेद्य बनाने में प्रयुक्त घटकों में तेजोमय तरंगों को अति शीघ्रता से आकृष्ट, ग्रहण एवं प्रक्षेपित करनेकी क्षमता होती है। इन घटकों द्वारा प्रक्षेपित सूक्ष्म वायु से नैवेद्य निवेदित करने वाले व्यक्ति की देह में पंच प्राण जागृत होते हैं। उस नैवेद्य को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने से व्यक्ति में तेजोमय तरंगों का संक्रमण होता है तथा उसकी सूर्य नाड़ी कार्यरत होने में सहायता मिलती है। सूर्य नाड़ी कार्यरत होने से व्यक्ति को कार्य करने के लिए बल प्राप्त होता है।
HOLI होली :: आनन्द और उल्लास यह पर्व पूरे देश में किसी न किसी रूप में मनाया जाता है। बँगाल को छोड़ कर पूरे देश में होली जलाई जाती है। बँगाल में इस दिन भगवान् श्री कृष्ण की प्रतिमा को झूला झूलाने का प्रचलन है, यद्यपि वहाँ भी तीन दिन के लिये पूजा मण्डप में अग्नि जलाई जाती है। होली के मौजूदा स्वरुप का विस्तृत वर्णन जैमिनी गृह सूत्र [1.3.15-16], काठक गृह सूत्र [73.1] लिंग पुराण, बाराह पुराण, हेमाद्रि और भविष्योत्तर पुराण के अलावा वात्स्यायन के काम सूत्र में भी है। 
निर्णय सिन्धु पृष्ठ 227, स्मृति कौस्तुभ पृष्ठ (516 से 519) और पुरश्चरण चिन्तामणि के पृष्ठ (308-319) पर होली का वर्णन अत्यन्त विस्तार  से प्राप्त होता है। भविष्योत्तर पुराण और कामसूत्र ने इसका सन्बन्ध वसन्त ऋतु के आगमन से किया है। होलिका हेमन्त यानि पतझड़ के आगमन की सूचना देती है और बसन्त की प्रेममय काम लीलाओं की घोतक है। मस्ती से भरे गाने, रंगों की फुहार और संगीत बसन्त के आने के उल्लास पूर्ण समय का परिचय देते हैं जो कि रंगों से भरी पिचकारियों और अबीर गुलाल के आपसी आदान प्रदान को प्रकट होती है। कहीं-कहीं तो लोग दो तीन दिन तक मिट्टी का कीचड़ और गानों से मतवाले होकर होली का हुडदंग मचाते हैं। कहीं-कहीं लोग भद्दे मजाकों और अश्लील गानों का मज़ा भी लेते हैं।
होली के मौके पर एक दिन पहले होली विधि-विधान से रखी जाती है और उसका पूजन किया जाता है। चौराहे पर जली हुई होली की आग से तांत्रिक मन्त्रों का अनुष्ठान करके प्यार, पैसा और शोहरत पाई जा सकती है। किसी को अपने वश में किया जा सकता है और बुरे ग्रहों के उपचार किये जा सकते हैं।साल की चार महत्वपूर्ण तान्त्रिक रातों में एक होली की भी रात होती है। इस दिन कोशिश करके अपनी उन्नति का रास्ता खोला जा सकता है। दूसरों के जादू-टोने से बचा जा सकता है। माता सरस्वती और माता महालक्ष्मी की कृपा पाई जा सकती है।
राशि के अनुरूप होली के रंग :- 
(1). मेष :- लाल, (2). वृष :- नीला, (3). मिथुन :- हरा, (4). कर्क :- गुलाबी, (5). सिंह :- संतरी-नारँगी, (6). कन्या :- हरा,  (7). तुला :- नीला, (8). वृश्चिक :- मेहरून, (9). धनु :- पीला, (10). मकर :- नीला, (11). कुम्भ :- बैंगनी और (12). मीन :- पीला। रंगों, अबीर-गुलाल में खुशबू मिला सकते हैं। 
राशि के अनुरूप-अनुकूल खुशबू-महक :: 
(1). मेष :- गुलाब, (2). वृष :- चमेली, (3). मिथुन :- चम्पा, (4). कर्क :- लवैन्डर, (5). सिंह :- कस्तूरी, (6). कन्या :- नाग चम्पा, (7). तुला :- बेला, (8). वृश्चिक :- रोज मैरी,(9). धनु :- केसर, (10). मकर :- कस्तूरी, मृगमद, मृगनाभि, मुश्कम्बर, (11). कुम्भ :- चन्दन और (12). मीन :- लैमन ग्रास। 
होली खेलने के लिये वस्त्रों के राशि के अनुरूप-अनुकूल  रंग ::
(1). मेष :- लाल या मेहरून, (2). वृष :- सफेद या आसमानी नीला, (3). मिथुन :- हरा, (4). कर्क :- गुलाबी, (5). सिंह :- सफेद, (6). कन्या :- हरा, (7). तुला :- आसमानी  नीला और सफेद, (8). वृश्चिक :- मेहरून अथवा मटियाला-गेहुँआ,
(9). धनु :- हल्का पीला, (10). मकर :- नीला , (11). कुम्भ :- ब्लू या काला और  (12). मीन :- सुनहरा। 
होली खेलना :: 
(1). सुबह सुबह पहले भगवान् को रंग लगा कर ही होली खेलना शुरू करना चाहिये। 
(2). एक दिन पहले जब होली जलाई जाये तो उसमें भाग जरुर लें अन्यथा अगले दिन सुबह सूरज निकलने से पहले जलती हुई होली के निकट जाकर तीन परिक्रमा करें। होली में अलसी, मटर, चना गेहूँ की बालियाँ और गन्ना इनमें से जो कुछ भी मिल जाये, उसे होली की आग में जरुर डालें। 
(3). परिवार के सभी सदस्यों के पैर के अँगूठे से लेकर हाथ को सिर से ऊपर पूरा ऊँचा करके कच्चा सूत नाप कर होली में डालें। 
(4). होली की विभूति यानि भस्म (राख) घर जरुर लायें, पुरुष इस भस्म को मस्तक पर और महिला अपने गले में धारण करें, इससे एश्वर्य बढ़ता है। 
(5). घर के बीच में एक चौकोर टुकड़ा साफ कर के उसमें कामदेव का पूजन करें।
(6). होली के दिन दाम्पत्य भाव से अवश्य रहें।
(7). होली के दिन मन में किसी के प्रति शत्रुता का भाव न रखें, इससे साल भर शत्रुओं पर भारी पड़ेंगे।
(8). घर आने वाले मेहमानों को सौंफ और मिश्री जरुर खिलायें, इससे प्रेम भाव बढ़ता है। 
होली पूजन पूजन के लाभ ::
(1). छ: बाली अलसी और तीन बाली गेंहू को होली की आग में भूनकर आधी जली हुई बालियों को लाल कपड़े में लपेट कर दुकान, कारखाने में रखने से व्यापारबढ़ता है। 
(2). पत्तियों सहित गन्ना ले जा कर होली की आग में इस तरह डाल दें कि गन्ने की पत्तियाँ आग में जल जायें। बचे हुये गन्ने को लाकर घर के दक्षिण-पश्चिम कोने में खड़ा करने  से  धन लाभ की सम्भावना बनती है। 
होली दहन :: होली के जलने के बाद वहाँ से आग अपने घर लानी चाहिये। घर में गोबर के उपले से आग जला कर उसमे नारियल की गरी और गेहूँ की बाली भून कर खानी चाहिये। ऐसा करने से दीर्घायु और समाज में सम्मान प्राप्त होता है। यह क्रिया रात में होली जलने के बाद और सूर्योदय के पहले करनी चाहिये। 
रात में होली जलाने के बाद भोर के समय घर के बीच एक चौकोर टुकड़ा साफ़ करके उसमें "क्लीं" लिख कर उसमें कामदेव का पूजन करना चाहिये। कामदेव को पाँच अलग-अलग रंग के फूल अबीर, गुलाल, सुगंध और पक्वान अर्पित करने चाहियें। पूजा के उपरान्त पति देह में रति का वास हो जाता है। ये होली का अत्यावश्यक कृत्य है। 
होली  का प्रयोजन :: (1). जाड़े के बाद शरीर की सफाई, (2).  तन के साथ मन की भी सफाई, (3). पूरी तरह साफ़ हो जाना (रेचन, अतिसार, दस्त)। यहीं  मौसम बदलना शुरू हो जाता है। (4). शत्रुता के भाव और शत्रु का अन्त तथा (5). मैत्री और मुदिता का उदय। 
विध्न बाधाओं  दूर करना :: 
(1). अफ़सर का वशीकरण :: अफ़सर का चित्र लेकर उस पर घी और शहद लगाकर मिट्टी के कुल्हड़ में रखें। इसके ऊपर दही भर दें और उस पर थोड़ी सी होली की भस्म दाल दें। उस कुल्हड़ का मुँह लाल कपड़े से बाँध कर किसी ऊँची जगह पर रख दें।  ऐसा करने से अफ़सर आपके वश में हो जायेंगे। अफ़सर को अपने वश में करना तो ठीक है, लेकिन अगर स्थिति का दुरूपयोग किया तो इसके भयंकर परिणाम हो सकते हैं। 
(2). मुकदमा जीतने के लिये :: होली की आग लाकर उसके कोयले से स्याही बनाकर लोहे की सलाई से मुकदमा नम्बर और शत्रु पक्ष का नाम सात कागजों पर लिख कर पुन: होली की अग्नि के पास जायें और सात परिक्रमा करें, हर परिक्रमा पर एक कागज़ होली की आग में दाल दें तो शत्रु स्वयं समझौता कर लेता है और मुक़दमे में सफलता मिलती है। 
(3). तंत्र मंत्र, जादू-टोना, काली नजर से रक्षा :- होली की आग से अंगारे लाकर उसे पीस कर उससे स्याही बनायें। एक सफ़ेद कपड़े पर एक मनुष्य की आकृति बना कर उसमें काले तिल भर कर पुन: होली में डाल दें तो दूसरे का किया-धरा नष्ट हो जाता है। 
(4). बुरी नजर से बचाव :: एक मुट्ठी काले तिल, छः काली मिर्च, छः लौंग, एक टुकड़ा कपूर बच्चे या बड़े के ऊपर से उतार कर होली में डाल दें, पुरानी बुरी नजर उतर जायेगी और आगे भी बुरी नज़र बचाव होगा। 
(5). व्यापार-व्यवसाय की बुरी नज़र-हाय से सुरक्षा :: एक दिन पहले फिटकरी के छ: टुकड़े अपनी दुकान, दफ़्तर आदि में रात में छोड़ दें। होली की शाम उन्हें ले जाकर कपूर, अलसी, गन्ने के टुकड़े और गेहूँ के साथ मिला कर होली में डाल दें।  
(6). बच्चे का मन पढाई में मन लगाने के लिये :: एक 4 मुखी और एक 6 मुखी रुद्राक्ष के बीच में गणेश रुद्राक्ष लगवा कर बच्चे को पहनायें। फिर उसे होली की अग्नि के करीब ले जाकर सात चक्कर लगवायें। हर बार बच्चा एक मुट्ठी गुलाल होली की ओर उछालता जाये। इससे विद्या प्राप्ति की बाधा दूर होगी और पढ़ाई में ध्यान- मन लगेगा। 
(7). कामयाबी हासिल करने के लिये :: होली की आग से कोयला लाकर चूर्ण करके, उसके आगे नृसिंह के तीन नामों :- उग्रं, वीरं, महाविष्णुं का जप 10,000 बार करें। इस चूर्ण को गाय के घी के साथ तिलक लगाकर काम पर जायें तो हर काम में कामयाबी मिलेगी।
रिश्ते-नाते  के अनुरूप  विशेष अंग पर होली के रंग :: माता :- पैर, पिता :- छाती, पत्नी-पति :- सर्वांग, पति-पत्नी को आपस में जी भर कर होली खेलना अत्यन्त शुभ शकुन माना जाता है।, बड़ा भाई :- मस्तक, छोटा भाई :- भुजायें, बड़ी बहन :- हाथ और पीठ, छोटी बहन :- गाल, बड़ी भाभी-देवर :- हाथ और पैर, ननद और देवरानी :- सर्वांग, छोटी भाभी :- सर और कन्धे, ननद :- सर्वांग, चाची-चाचा :- सर से रंग उड़ेलें, साले-सरहज :- मर्यादा  के दायरे में पूरा शरीर।  
ताई-ताऊ :- पैर और माथे पर, मामा-मामी :- मर्यादा  के दायरे में पूरा शरीर, बुआ-फूफा :- जी भर कर रंग लगायें, मौसी-मौसा :- मर्यादा  के दायरे में रंग लगायें, पड़ोसी :- इत्र सहित सिर्फ सूखा रंग ही लगायें, मित्र :- खुलकर रंग लगायें, अफ़सर :- माथे पर टिका लगायें, अफ़सर की पत्नी :- हाथ में रंग देकर नमस्कार कर लें-शिष्टाचार की सीमा के अन्दर रंग लगायें, अनजाने व्यक्तियों को :- सामाजिक मर्यादा और शिष्टाचार का पूरा ध्यान रखें। 
राशि के अनुकूल खाना :: मेष :- मसूर की दाल की बनी कोई चीज, वृष :- कोई सुगन्धित मिठाई, मिथुन :- मूग की दाल से बनी कोई चीज, कर्क :- दूध से बनी कोई चीज, सिंह :- गरम-गरम कोई चीज, कन्या :- पिस्ते से बनी कोई मिठाई, तुला :- दही या मलाई से बनी कोई चीज, वृश्चिक :- कोई ऐसी चीज जिसमें लाल मिर्च पड़ी हो, धनु :- केसर से बनी कोई मिठाई या गुझिया, मकर :- चाकलेट या काली मिर्च से बनी कोई चीज, कुम्भ :- दही बड़े या कोई चीज जिसमे काला नमक, मीन :- बेसन से बनी कोई मिठाई। 
होली खेलने के बाद की राशि  के अनुकूल प्रक्रियाएँ :: 
मेष :- नये कपड़े पहन कर सीधे घर के मन्दिर में जायें और भगवान् का आशीर्वाद लें। 
वृष :- नये कपड़े पहनने के तुरन्त बाद सीढ़ियाँ चढ़ें या गणेश जी के दर्शन करें। 
मिथुन :- खजूर खायें या मोज़े जरुर पहनें। 
कर्क :- केसर की पत्ती मुँह में डालें।
सिंह :- लाल सिन्दूर का टीका मस्तक पर लगायें।
कन्या :- कपूर को हाथ में मसल कर सूँघना चाहिये। 
तुला :- शहतूत खाना चाहिये। 
वृश्चिक :- सर पर टोपी लगाना या पगड़ी बाँधना विशेष शुभ होता है। 
धनु :- नये कपड़े पहनने के बाद बाँई आँख से चाँदी को स्पर्श करना शुभ होगा। 
मकर :- नये कपड़े में एक पेन लगाकर घर से निकले। 
कुम्भ :- नये कपड़े पहनने से पहले चेहरे को दही से धोना चाहिये और कपड़ो पर सुगन्ध जरुर लगानी चाहिये।
मीन :- नये कपड़े पहनने के बाद थोड़ा गुड़ खाना शुभ रहेगा। 
होलाष्टक ::  होला + अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, जो दिन होता है, वह होलाष्टक कहलाता है। सामान्य रुप से देखा जाये तो होली एक  दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है। 
होलाष्टक के समय शुभ कार्य वर्जित होते है, यह फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी को लगता है होलाष्टक फिर आठ दिनों तक रहता है और सभी शुभ मांगलिक कार्य रोक दिए जाते हैं, यह दुलहंडी पर रंग खेलकर खत्म होता है।
फाल्गुन शुक्ल अष्टमी पर 2 डंडे स्थापित किए जाते हैं। जिनमें एक को होलिका तथा दूसरे को प्रह्लाद माना जाता है। इससे पूर्व इस स्थान को गंगा जल से शुद्ध किया जाता है; फिर हर दिन इसमे गोबर के उपल, लकड़ी घास और जलने में सहायक चीजें डालकर इसे बड़ा किया जाता है।
होलाष्टक के दिन ही कामदेव ने शिव तपस्या को भंग किया था, इस कारण  भगवान् शिव अत्यंत क्रोधित हो गये थे, उन्होंने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया था, हालाँकि कामदेव ने देवताओ की इच्छा और उनके अच्छे के लिए भगवान् शिव को तपस्या से उठाया था।
कामदेव के भस्म होने से समस्त संसार शोक में डूब गया, उनकी पत्नी रति ने  भगवान् शिव से विनती की वे उन्हें फिर से पुनर्जीवित कर दे तब भगवान् भोलेनाथ से द्वापर में उन्हें फिर से जीवन देने की बात कही।
एक दूसरी कथा के अनुसार राजा हरिण्य कशिपु ने अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद को भगवद् भक्ति से हटाने और हरिण्य कशिपु को ही भगवान की तरह पूजने के लिये अनेक यातनाएं दी लेकिन जब किसी भी तरकीब से बात नहीं बनी तो होली से ठीक आठ दिन पहले उसने प्रह्लाद को मारने के प्रयास आरंभ कर दिये थे। लगातार आठ दिनों तक जब भगवान् अपने भक्त की रक्षा करते रहे तो होलिका के अंत से यह सिलसिला थमा। इसलिये आज भी भक्त इन आठ दिनों को अशुभ मानते हैं। उनका यकीन है कि इन दिनों में शुभ कार्य करने से उनमें विघ्न बाधाएं आने की संभावनाएं अधिक रहती हैं।
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार होलाष्टक मे सभी शुभ कार्य करना वर्जित रहते हैं, क्योकी इन आठ दिवस 8 ग्रह उग्र रहते है। इन आठ दिवसो मे अष्टमी को चन्द्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मगल और पूर्णिमा को राहू उग्र रहते हैं। इसलिये इस अवधि में शुभ कार्य करने वर्जित है।
होलाष्टक में वर्जित कार्य :- 
विवाह :- होली से पूर्व के 8 दिनों में भूलकर भी विवाह न करें। यह समय शुभ नहीं माना जाता है, जब तक कि कोई विशेष योग आदि न हो।
नामकरण एवं मुंडन संस्कार :- होलाष्टक के समय में अपने बच्चे का नामकरण या मुंडन संस्कार कराने से बचें।
भवन निर्माण :- होलाष्टक के समय में किसी भी भवन का निर्माण कार्य प्रारंभ न कराएं। होली के बाद नए भवन के निर्माण का शुभारंभ कराएं।
हवन-यज्ञ :- होलाष्टक में कोई यज्ञ या हवन अनुष्ठान करने की सोच रहे हैं, तो उसे होली बाद कराएं। इस समय काल में कराने से आपको उसका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होगा।
नौकरी :- होलाष्टक के समय में नई नौकरी ज्वॉइन करने से बचें। अगर होली के बाद का समय मिल जाए तो अच्छा होगा। अन्यथा किसी ज्योतिषाचार्य से मुहूर्त दिखा लें।
भवन, वाहन आदि की खरीदारी :- संभवत हो तो होलाष्टक के समय में भवन, वाहन आदि की खरीदारी से बचें। शगुन के तौर पर भी रुपए आदी न दें।
होलाष्टक में पूजा-अर्चना की के लिए किसी भी प्रकार की मनाही नही होती। होलाष्टक के समय में अपशकुन के कारण मांगलिक कार्यों पर रोक होती है। हालांकि होलाष्टक में ईश्वर की पूजा-अर्चना की जाती है। इस समय में आप अपने ईष्ट देव की पूजा-अर्चना, भजन, आरती आदि करें, इससे आपको शुभ फल की प्राप्ति होगी।परंतु सकाम (किसी कामना से किये जाने वाले यज्ञादि कर्म) किसी भी प्रकार का हवन, यज्ञ कर्म भी इन दिनों में नहीं किये जाते।
सनातन हिंदू धर्म में 16 प्रकार के संस्कार बताये जाते हैं, इनमें से किसी भी संस्कार को संपन्न नहीं करना चाहिये। हालांकि दुर्भाग्यवश इन दिनों किसी की मौत होती है तो उसके अंत्येष्टि संस्कार के लिये भी शांति पूजन करवाया जाता है।
Contents of these above mentioned blogs are covered under copy right and anti piracy laws. Republishing needs written permission from the author. ALL RIGHTS ARE RESERVED WITH THE AUTHOR.
संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

Friday, May 29, 2020

श्रीकृष्णस्तोत्रं इन्द्ररचितम्

श्रीकृष्णस्तोत्रं इन्द्ररचितम्
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com santoshhastrekhashastr.wordpress.com bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com santoshkathasagar.blogspot.com bhartiyshiksha.blogspot.com santoshhindukosh.blogspot.com palmistryencyclopedia.blogspot.com
santoshvedshakti.blogspot.com
ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
किसी भी प्रकार के बन्धन से मुक्ति हेतु इस स्तोत्र का गुरुवार को परायण करें। भगवान् श्री कृष्ण का ऐसा चित्र जिसमें उन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठा रखा हो, अपने सामने रखें, पीले कपड़ें पहने, पीले वस्त्र, दाल, फल-फूल चढ़ाएं और दान करें। माखन-मिश्री का भोग लगायें। 
Bhagwan Shri Krashn asked the people to worship Govardhan Parwat instead of Dev Raj Indr. Under the impact of ego, infuriated Dev Raj Indr begun torrential rains to punish the residents of Vrandavan. Bhagwan Shri Krashn raised the Parwat over his little finger and kept the Gokul residents under it, till the ego of Indr was not vanished. Indr tried to attack the Parwat with Vajr, but Bhagwan Shri Krashn immobilised his limbs. Dev Guru Brahaspati asked him to pray to the Almighty who had descended over the earth, as Shri Krashn with this Stotr-prayer. Any one under trouble may pray to the God with this Stotr to release himself of stress, troubles, sorrow, pains. He may opt for Thursday for the recitation of this prayer. 
इन्द्र उवाच ::
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्। 
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥1॥
भक्‍तध्यानाय सेवायै नानारूपधरं वरम्। 
शुक्लरक्‍तपीतश्यामं युगानुक्रमणेन च॥2॥
शुक्लतेजःस्वरूपं च सत्ये सत्यस्वरूपिणम्। 
त्रेतायां कुङ्कुमाकारं ज्वलन्तं ब्रह्मतेजसा॥3॥
द्वापरे पीतवर्णं च शोभितं पीतवाससा। 
कृष्णवर्णं कलौ कृष्णं परिपूर्णतमं प्रभुम्॥4॥
नवधाराधरोत्कृष्टश्यामसुन्दरविग्रहम्। 
नन्दैकनन्दनं वन्दे यशोदानन्दनं प्रभुम्॥5॥
गोपिकाचेतनहरं राधाप्राणाधिकं परम्। 
विनोदमुरलीशब्दं कुर्वन्तं कौतुकेन च॥6॥
रूपेणाप्रतिमेनैव रत्‍नभूषणभूषितम्। 
कन्दर्पकोटिसौन्दर्यं विभ्रतं शान्तमीश्वरम्॥7॥
क्रीडन्तं राधया सार्धं वृन्दारण्ये च कुत्रचित्। 
कृत्रचिन्निर्जनेऽरण्ये राधावक्षःस्थलस्थितम्॥8॥
जलक्रीडां प्रकुर्वन्तं राधया सह कुत्रचित्। 
राधिकाकबरीभारं कुर्वन्तं कुत्रचिद्वने॥9॥
कुत्रचिद्राधिकापादे दत्तवन्तमलक्‍तकम्। 
राधार्चवितताम्बूलं गृह्णन्तं कुत्रचिन्मुदा॥10॥
पश्यन्तं कुत्रचिद्राधां पश्यन्तीं वक्रचक्षुषा। 
दत्तवन्तं च राधायै कृत्वा मालां च कुत्रचित्॥11॥
कुत्रचिद्राधया सार्धं गच्छन्तं रासमण्डलम्। 
राधादत्तां गले मालां धृतवन्तं च कुत्रचित्॥12॥
सार्धं गोपालिकाभिश्च विहरन्तं च कुत्रचित्। 
राधां गृहीत्वा गच्छन्तं तां विहाय च कुत्रचित् ॥13॥
विप्रपत्‍नीदत्तमन्नं भुक्‍तवन्तं च कुत्रचित्। 
भुक्‍तवन्तं तालफलं बालकैः सह कुत्रचित्॥14॥
वस्त्रं गोपालिकानां च हरन्तं कुत्रचिन्मुदा। 
गवां गणं व्याहरन्तं कुत्रचिद्बालकैः सह॥15॥
कालीयमूर्ध्‍नि पादाब्‍जं दत्तवन्तं च कुत्रचित्। 
विनोदमुरलीशब्दं कुर्वन्तं कुत्रचिन्मुदा॥16॥
गायन्तं रम्यसङ्गीतं कुत्रचिद्बालकैः सह। 
स्तुत्वा शक्रः स्तवेन्द्रेण प्रणनाम हरिं भिया॥17॥
पुरा दत्तेन गुरुणा रणे वृत्रासुरेण च। 
कृष्णेन दत्तं कृपया ब्रह्मणे च तपस्यते॥18॥
एकादशाक्षरो मन्‍त्रः कवचं सर्वलक्षणम्। 
दत्तमेतत्कुमाराय पुष्करे ब्रह्मणा पुरा॥19॥
तेन चाङ्गिरसे दत्तं गुरवेऽङ्गिरसा मुने। 
इदमिन्द्रकृतं स्तोत्रं नित्यं भक्‍त्या च यः पठेत् ॥20॥
इह प्राप्य दृढां भक्‍तिमन्ते दास्यं लभेद्‍ध्रुवम्। 
जन्ममृत्युजराव्याधिशोकेभ्यो मुच्यते नरः॥21॥
न हि पश्यति स्वप्नेऽपि यमदूतं यमालयम्। 
इति श्रीब्रह्मवैवर्ते इन्द्रकृतं श्रीकृष्णस्तोत्रं समाप्तम्।
Contents of these above mentioned blogs are covered under copyright and anti piracy laws. Republishing needs written permission from the author. ALL RIGHTS ARE RESERVED WITH THE AUTHOR.
संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
skbhardwaj1951@gmail.com

Monday, April 20, 2020

DEITY RIVER SARASWATI देवी सरस्वती नदी ऋग्वेद (6)

देवी सरस्वती नदी
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com santoshhastrekhashastr.wordpress.com bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com
santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com santoshkathasagar.blogspot.com bhartiyshiksha.blogspot.com santoshhindukosh.blogspot.com palmistrycncyclopedia.blgspot.com
santoshvedshakti.blogspot.com
ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47] 
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (61) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- सरस्वती; छन्द :- जगती, गायत्री, त्रिष्टुप्।
इयमददाद्रभसमृणच्युतं दिवोदासं वध्रयश्वाय दाशुषे। या शश्वन्तमाचखादावसं पणिं ता ते दात्राणि तविषा सरस्वति
इन्हीं सरस्वती देवी ने हव्यदाता वध्र्यश्व को वेगवान तथा ऋण मोचक दिवोदास नाम का एक पुत्र दिया। उन्होंने बहुत आत्मतर्पक तथा दानविमुख पणि का नाश किया। हे सरस्वति देवी! आपके ये दान बहुत महान हैं।[ऋग्वेद 6.61.1]
तर्पक :: तृप्त कर देने वाला; satisfying.
Saraswati Devi granted a dynamic, son called Divodas to Vadrayshv who discharged debt. He killed Pani who was restricted to himself and discarded donations. Hey Saraswati Devi! Your grant is great-glorious.
इयं शुष्मेभिर्बिस खाइवारुजत्सानु गिरीणां तविषेभिरूर्मिभिः।
पारावतघ्नीमवसे सुवृक्तिभिः सरस्वतीमा विवासेम धीतिभिः॥
ये सरस्वती देवी मृणाल खननकारी के सदृश प्रबल और वेगवान तरंगों के साथ पर्वत के तटों को तोड़ देती हैं। रक्षा के लिए हम प्रार्थना और यज्ञ द्वारा दोनों तटों का विनाश करने वाली सरस्वती देवी की परिचर्या करते हैं।[ऋग्वेद 6.61.2]
Saraswati Devi destroys the mountain banks with its strong currents creating waves which produce sound like Mranal. For protection we worship Saraswati Devi who destroys both the river banks and organise Yagy to please her. 
सरस्वति देवनिदो निबर्हय प्रजां विश्वस्य बृसयस्य मायिनः।
उत क्षितिभ्योऽवनीरविन्दो विषमेभ्यो अस्रवो वाजिनीवति
हे सरस्वती देवी! आपने देव निन्दकों का वध किया और सर्वव्यापी वृसय या त्वष्टा के पुत्र का संहार किया अथवा आपकी सहायता से इन्द्र देव ने संहार किया। हे अन्न सम्पन्ना सरस्वती देवी! आपने मनुष्यों को संरक्षित भूभाग प्रदान किया और उनके लिए जल की वर्षा भी की।[ऋग्वेद 6.61.3]
Hey Saraswati Devi! You killed the cynic of demigods-deities and the son of Twasta along with Indr Dev. Hey Saraswati Devi, possessing stock of food grains! You granted protected land to the humans and showered rains for them.
प्र णो देवी सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती। धीनामवित्र्यवतु
हे दान शालिनी, अन्न देने वाली और स्तोताओं की रक्षा कारिणी सरस्वती देवी! अन्न द्वारा उत्तम प्रकार से हमारी तृप्ति करें।[ऋग्वेद 6.61.4]
Hey Saraswati Devi making donations, granting us food grains & protector of the Stotas! Satisfy-content us with best quality food grains.
यस्त्वा देवि सरस्वत्युपब्रूते धने हिते। इन्द्रं न वृत्रतूर्ये
हे देवी सरस्वती देवी! जो व्यक्ति इन्द्र देव के सदृश आपकी प्रार्थना करता है, वही व्यक्ति जिस समय धन प्राप्ति के लिए युद्ध में आपका आवाहन करता है; उस समय उसकी रक्षा आप करती हैं।[ऋग्वेद 6.61.5]
Hey Saraswati Devi! The person who worship you like Indr Dev & invoke you for wealth in the war, is protected by you.
त्वं देवि सरस्वत्यवा वाजेषु वाजिनि। रदा पूषेव नः सनिम्
हे अन्न शालिनी सरस्वती देवी! आप युद्ध में हमारी रक्षा करें और पूषा देव की तरह हमारे भोग के लिए धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.61.6]
Hey possessor of food grains, Saraswati Devi! Protect us during war and grant us food grains like Pusha Dev and wealth for utilisation.
उत स्या नः सरस्वती घोरा हिरण्यवर्तनिः। वृत्रघ्नी वष्टि सुष्टुतिम्॥
भीषण, सुवर्ण रथ पर आरूढ़ होकर शत्रु घातिनी वही सरस्वती देवी स्तोताओं की रक्षा करती हैं।[ऋग्वेद 6.61.7]
Fierce, slayer of the enemy, riding the golden charoite Saraswati Devi protect the Stotas.
यस्या अनन्तो अह्रुतस्त्वेषश्चरिष्णुरर्णवः। अमश्चरति रोरुवत्
उन सरस्वती देवी का अपरिमित, अकुटिल, दीप्त और अप्रतिहत गति जलवर्षक वेग प्रचण्ड शब्द करता हुआ विचरण करता है।[ऋग्वेद 6.61.8]
The continuous flow of water of radiant Saraswati Devi showering rains make terrific sound.
सा नो विश्वा अति द्विषः स्वसॄरन्या ऋतावरी। अतन्नहेव सूर्यः
नियत भ्रमणकारी सूर्य देव जिस प्रकार से दिन को ले आते हैं, उसी प्रकार वे सरस्वती देवी हमारे समस्त शत्रुओं को पराजित करती हुई जलरूपी बहिनों को हमारे पास ले आवें।[ऋग्वेद 6.61.9]
The way regularly-daily revolving Sun-Sury Dev brings the day, similarly Saraswati Devi defeat our all enemies and brings the sisters in the form of water.
उत नः प्रिया प्रियासु सप्तस्वसा सुजुष्टा। सरस्वती स्तोम्या भूत्
सप्त नदी रूपिणी, सप्त भगिनी संयुता, प्राचीन ऋषियों द्वारा सेविता और हमारी प्रियतमा सरस्वती देवी सदैव हमारे लिए स्तुत्य हैं।[ऋग्वेद 6.61.10]
Our affectionate Saraswati Devi, possessing seven currents and associated with seven currents-sisters is always worshipable for us.
आपप्रुषी पार्थिवान्युरु रजो अन्तरिक्षम्। सरस्वती निदस्पातु
पृथ्वी और स्वर्ग के विस्तीर्ण प्रदेशों को जिन्होंने अपनी दीप्ति से पूर्ण किया, वही सरस्वती देवी निन्दकों से हमारी रक्षा करें।[ऋग्वेद 6.61.11]
Let Saraswati Devi who pervaded the heavens and earth with her aura, protect us from the cynic.
त्रिषधस्था सप्तधातुः पञ्च जाता वर्धयन्ती। वाजेवाजे हव्या भूत्
त्रिलोक व्यापिनी, गंगा आदि सप्त नदियों से युक्ता, चारों वर्णों और निषाद की समृद्धि विधायिनी सरस्वती देवी संग्राम में लोगों के आह्वान करने योग्य हैं।[ऋग्वेद 6.61.12]
Devi Saraswati who pervade the three abodes, associated with seven rivers like Ganga etc., benefiting the four Varn and the Nishad, granting prosperity, deserve to be invoked during war.
प्र या महिम्ना महिनासु चेकिते द्युम्नेभिरन्या अपसामपस्तमा। 
रथ इव बृहती विभ्वने कृतोपस्तुत्या चिकितुषा सरस्वती
जो माहात्म्य और कीर्ति द्वारा देवों में प्रसिद्ध हैं, जो नदियों में सबसे वेगवती हैं और श्रेष्ठता के कारण जो अतीव गुणवती हैं, वही सरस्वती देवी ज्ञानी स्तोता की स्तुति पात्रा होती हैं।[ऋग्वेद 6.61.13]
Devi Saraswati who's glory and renown is famous in the demigods-deities, is the fastest amongest the rivers, virtuous due to her excellence, is worshipped by the enlightened Stota.
सरस्वत्यभि नो नेषि वस्यो माप स्फरीः पयसा मा न आ धक्।
जुषस्व नः सख्या वेश्या च मा त्वत्क्षेत्राण्यरणानि गन्म
हे सरस्वती देवी! हमें प्रशस्त धन प्रदान करें। हमें हीन न करें। अधिक जल द्वारा हमें उत्पीड़ित न करें। आप हमारी मित्रता और गृह को स्वीकार करें। हम आपके पास से निकृष्ट स्थान में न जाएँ।[ऋग्वेद 6.61.14]
Hey Saraswati Devi! Grant us the best riches. Do not degrade us. Do not torture-tease us with excess water. Accept our friendship and house. We should not be deviated-diverted to the worst places far away from you.(26.10.2023)
Contents of these above mentioned blogs are covered under copyright and anti piracy laws. Republishing needs written permission from the author. ALL RIGHTS ARE RESERVED WITH THE AUTHOR.
संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

Sunday, February 12, 2017

सरण्यू (ऋग्वेद 10)

सरण्यू (ऋग्वेद 10)
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj

dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com santoshhastrekhashastr.wordpress.com bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com santoshkathasagar.blogspot.com bhartiyshiksha.blogspot.com santoshhindukosh.blogspot.com palmistryencyclopedia.blogspot.com
santoshvedshakti.blogspot.com
ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
त्वष्टा दुहित्रे वहतुं कृणोतीतीदं विश्वं भुवनं समेति।
यमस्य माता पर्युह्यमाना महो जाया विवस्वतो ननाश
त्वष्टा नाम के देव अपनी कन्या सरण्यू का विवाह करने वाले है; इस उपलक्ष में सारा संसार आ गया है। जिस समय यम की माता का विवाह हुआ, उस समय महान् विवस्वान् की स्त्री अदृष्ट हुई।[ऋग्वेद 10.17.1]
Twasta want to marry his daughter Saranyu, whole universe participated in the marriage. When the mother of Yam got married wife of great Vivasvan disappeared.
अपागूहन्नमृतां मर्येभ्यः कृत्वी सवर्णामददुर्विवस्वते।
उताश्विनावभरद्यत्तदासीदजहादु द्वा मिथुना सरण्यूः
अमर सरण्यू को मनुष्यों के पास छिपाया गया। सरण्यू के सदृश एक स्त्री का निर्माण करके विवस्वान् को उसे दिया गया। उस समय अश्व रुपिणी सरण्यू ने अश्विद्वय अर्थात् दो अश्वों को गर्भ में धारण किया और यमज सन्तान को उत्पन्न किया।[ऋग्वेद 10.17.2]
Immortal Saranyu was hidden from the humans. A woman like Saranyu was produced and handed over to Vivasvan. Saranyu adopted the form of a mare and wore two horses in her womb and produced twins.

 
Contents of these above mentioned blogs are covered under copyright and anti piracy laws. Republishing needs written permission from the author. ALL RIGHTS RESERVED WITH THE AUTHOR.
संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
skbhardwaj1951@gmail.com

Thursday, February 9, 2017

XXX SHRADDH श्राद्ध :: SHRADDH-HOMAGE TO MANES (4) श्राद्ध कर्म

 SHRADDH श्राद्ध
SHRADDH-HOMAGE TO MANES (4) श्राद्ध कर्म
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com hindutv.wordpress.com santoshhastrekhashastr.wordpress.com  bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com  santoshkipathshala.blogspot.com santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com     santoshhindukosh.blogspot.com 
यज्ञ :: शसगरों में प्रत्येक गृहस्थ के लिये निम्न पाँच यज्ञों को नित्य करने का निर्देश है। 
ब्रह्म यज्ञ :- प्रतिदिन अध्ययन और अध्यापन करना ही ब्रह्म-यज्ञ है।
देव यज्ञ :- देवताओं की प्रसन्नता हेतु पूजन-हवन आदि करना।
पितृ यज्ञ :- श्राद्ध और 'तर्पण' करना ही पितृ यज्ञ है।
भूत यज्ञ :- बलि और वैश्व देव की प्रसन्नता हेतु जो पूजा की जाती है, उसे भूत यज्ञ कहते हैं।
मनुष्य यज्ञ :- इसके अन्तर्गत अतिथि सत्कार आता है।
श्राद्ध करने की योग्यता :: जो कोई व्यक्ति मृतक की सम्पत्ति ले लेता है, उसे उसके लिए श्राद्ध करना चाहिए अथवा जो भी कोई श्राद्ध करने की योग्यता रखता है अथवा श्राद्ध का अधिकारी है, वह मृतक की सम्पत्ति ग्रहण कर सकता है।[विष्णु धर्मोत्तर]
इन्द्र ने सम्राट मान्धाता से कहा कि अनार्य-दस्यु यवन, किरात आदि अनार्य-दस्यु पितृ यज्ञ कर सकते हैं और ब्राह्मणों को धन भी दे सकते हैं।[शान्ति पर्व]
म्लेच्छों को पितरों के लिए श्राद्ध करना चाहिये है। [वायु पुराण]
पुत्रहीन पत्नी को (मरने पर) पति द्वारा पिण्ड नहीं दिया जाना चाहिए, पिता द्वारा पुत्र को तथा बड़े भाई के द्वारा छोटे भाई को भी पिण्ड नहीं दिया जाना चाहिए। निमि ने अपने मृत पुत्र का श्राद्ध किया था, किन्तु उन्होंने आगे चलकर पश्चाताप किया, क्योंकि वह कार्य धर्मसंकट था।[गोभिलस्मृति]
पिता को पुत्र का एवं बड़े भाई को छोटे भाई का श्राद्ध नहीं करना चाहिए। [अपरार्क]
कभी-कभी यह सामान्य नियम भी नहीं माना जा सकता। [बृहत्पराशर]
स्नेहवश किसी के लिए भी श्राद्ध करने की, विशेषत: गया, में अनुमति दी है। ऐसा कहा गया है कि केवल वही पुत्र कहलाने योग्य है, जो पिता की जीवितावस्था में उसके वचनों का पालन करता है, प्रति वर्ष (पिता की मृत्यु के उपरान्त) पर्याप्त भोजन, (ब्राह्मणों) को देता है और जो गया में (पूर्वजों) को पिण्ड देता है।[बौधायन एवं वृद्धशातातप]
उपनयन विहीन बच्चा शूद्र के समान है और वह वैदिक मंत्रों का उच्चारण नहीं कर सकता, परन्तु अन्त्येष्टि कर्म से सम्बन्धित वैदिक मंत्रों का उच्चारण कर सकता है। अल्पवयस्क पुत्र भी, यद्यपि अभी वह उपनयन विहीन होने के कारण वेदाध्ययन रहित है, अपने पिता को जल तर्पण कर सकता है, नव श्राद्ध कर सकता है और 'शुन्धन्तां पितर:' जैसे मंत्रों का उच्चारण कर सकता है, किन्तु श्रौताग्नियों या गृह्यग्नियों के अभाव में वह पार्वण जैसे श्राद्ध नहीं कर सकता।[मेधातिथि]
अनुपनीत-जिनका अभी उपनयन संस्कार नहीं हुआ है, बच्चों, स्त्रियों तथा शूद्रों को पुरोहित द्वारा श्राद्धकर्म कराना चाहिए या वे स्वयं भी बिना मंत्रों के श्राद्ध कर सकते हैं; किन्तु वे केवल मृत के नाम एवं गोत्र या दो मंत्रों, यथा :– देवेभ्यो नम: एवं पितृभ्य: स्वधा नम: का उच्चारण कर सकते हैं। पुरुषों, स्त्रियों एवं उपनीत तथा अनुपनीत बच्चों को भी श्राद्ध करना चाहिये।[स्मृत्यर्थसार] 
प्रपौत्र द्वारा श्राद्ध :: पिता, पितामह एवं प्रपितामह तीन स्व-सम्बन्धी पूर्व पुरुषों का श्राद्ध किया जाता है।[तैत्तिरीय संहिता एवं तैत्तिरीय ब्राह्मण]  
सात प्रकार के व्यक्ति एक-दूसरे से अति सम्बन्धित हैं और वे अविभक्तदाय सपिण्ड कहे जाते हैं :– प्रपितामह, पिता, स्वयं व्यक्ति-जो अपने से पूर्व से तीन को पिण्ड देता है, उसके सहोदर भाई, उसका पुत्र-उसी की जाति वाली पत्नी से उत्पन्न, पौत्र एवं प्रपौत्र। सकुल्य वे हैं जो विभक्तदायाद हैं, मृत की सम्पत्ति उसे मिलती है, जो मृत के शरीर से उत्पन्न हुआ है।[बौधायन धर्मसूत्र]
पुत्र के जन्म से व्यक्ति उच्च लोकों-स्वर्ग आदि की प्राप्ति करता है, पौत्र से अमरता प्राप्त करता है और प्रपौत्र से वह सूर्य लोक पहुँच जाता है। व्यक्ति के तीन वंशज समान रूप से व्यक्ति को आध्यात्मिक लाभ पहुँचाते हैं।[मनु] 
आह्विक यज्ञ :: वह आह्विक यज्ञ जिसमें पितरों को स्वधा (भोजन) एवं जल दिया जाता है, पितृयज्ञ कहलाता है [शतपथ ब्राह्मण एवं तैत्तिरीय आरण्यक] 
पितृयज्ञ को तर्पण-जल से पूर्वजों की संतुष्टि, करना कहा है। [मनु]
प्रत्येक गृहस्थ को प्रतिदिन भोजन या जल या दूध, मूल एवं फल के साथ श्राद्ध करना चाहिए और पितरों को संतोष देना चाहिए। प्रारम्भिक रूप में श्राद्ध पितरों के लिए अमावस्या के दिन किया जाता था। अमावस्या दो प्रकार की होती है; विनोवाली एवं कुहू। आहिताग्नि (अग्निहोत्री) सिनीवाली में श्राद्ध करते हैं तथा इनसे भिन्न एवं शूद्र लोग कुहू अमावस्या में श्राद्ध करते हैं।[मनु] 
श्राद्ध की कोटियाँ :: श्राद्ध (या सभी कृत्य) तीन कोटियों में विभाजित किये गये हैं; नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य।
नित्य श्राद्ध :: वह किसी निश्चित अवसर पर किया जाए यथा–आह्विक, अमावास्या के दिन वाला या अष्टका के दिन वाला।
नित्य कर्म यथा :- अग्निहोत्र, दर्श पूर्णमास याग, अवश्य करने चाहिए, भले ही कर्ता उनके कुछ उपकृत्यों को करने में असमर्थ हो। काम्य कृत्यों के सभी भाग सम्पादित होने चाहिए और यदि कर्ता सोचता है कि वह सबका सम्पादन करने में असमर्थ है तो उसे काम्य कृत्य करने ही नहीं चाहिए।[जैमिनिय] 
पंचमहायज्ञ कृत्य, जिनमें पितृयज्ञ भी सम्मिलित है, नित्य कहे जाते हैं अर्थात् उन्हें बिना किसी फल की आशा के करना चाहिए, उनके न करने से पाप लगता है। नित्य कर्मों को करने से प्राप्त फल की जो चर्चा धर्मशास्त्रों में मिलती है, वह केवल प्रशंसा मात्र ही है। उससे केवल यही व्यक्त होता है कि कर्मों के सम्पादन से व्यक्ति पवित्र हो जाता है। किन्तु ऐसा नहीं है कि वे अपरिहार्य नहीं है और उनका सम्पादन तभी होता है, जब व्यक्ति किसी विशिष्ट फल की आशा रखता है अर्थात् इन कर्मों का सम्पादन काम्य अथवा इच्छाजनित नहीं है।
श्राद्ध का सम्पादन प्रत्येक मास के अन्तिम पक्ष में होना चाहिए, दोपहर को श्रेष्ठता मिलनी चाहिए और पक्ष के आरम्भिक दिनों की अपेक्षा अन्तिम दिनों को अधिक महत्त्व देना चाहिए। [आपस्तम्ब धर्मसूत्र]
श्राद्ध प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष में चतुर्थी को छोड़कर किसी भी दिन किया जा सकता है। [गौतम एवं वसिष्ठ]
यदि विशिष्ट रूप में उचित सामग्रियों या पवित्र ब्राह्मण उपलब्ध हो या कर्ता किसी पवित्र स्थान (यथा–गया) में हो तो श्राद्ध किसी भी दिन किया जा सकता है। [गौतम, कूर्म पुराण]
गया में किसी भी दिन श्राद्ध किया जा सकता है। [अग्नि पुराण]
नैमित्तिक श्राद्ध :: जो ऐसे अवसर पर किया जाए जो कि अनिश्चित सा हो, यथा :– पुत्रोत्पत्ति आदि पर, उसे  कहा जाता है।
काम्य श्राद्ध :: जो किसी विशिष्ट फल के लिए किया जाए यथा :– स्वर्ग, संतति आदि की प्राप्ति के लिए। कृत्तिका या रोहिणी पर किया गया श्राद्ध।
विष्णु धर्मसूत्र द्वारा वर्णित दिनों में किये जाने वाले श्राद्ध नैमित्तिक हैं और जो विशिष्ट तिथियों एवं सप्ताह के दिनों में कुछ निश्चित इच्छाओं की पूर्ति के लिए किये जाते हैं, वे काम्य श्राद्ध कहे जाते हैं। 
परा. मा. के मत से नित्य कर्मों का सम्पादन संस्कारक जो कि मन को पवित्र बना दे और उसे शुभ कर्मों की ओर प्रेरित करे, कहा जाता है। किन्तु कुछ परिस्थितियों में यह अप्रत्यक्ष अन्तर्हित रहस्य-परम तत्त्व की जानकारी की अभिकांक्षा भी उत्पन्न करता है।
श्राद्ध फल :: संक्रान्ति पर किया गया श्राद्ध अनन्त काल तक के लिए स्थायी होता है। जन्म के दिन एवं कतिपय नक्षत्रों में श्राद्ध करना चाहिए। कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तक किये गये श्राद्धों के फलों का उल्लेख आपस्तम्ब धर्मसूत्र, अनुशासन पर्व, वायु पुराण, याज्ञवल्क्य, ब्रह्म पुराण, विष्णु धर्मसूत्र, कूर्म पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण में किया गया है।
रविवार को श्राद्ध करने वाला रोगों से सदा के लिए छुटकारा पा जाता है और वे जो सोम, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र एवं शनि को श्राद्ध करते हैं, क्रम से सौख्य (या प्रशंसा), युद्ध में विजय, सभी इच्छाओं की पूर्ति, अभीष्ट ज्ञान, धन एवं लम्बी आयु प्राप्त करते हैं। [विष्णु धर्मसूत्र]
कूर्म पुराण में सप्ताह के कतिपय दिनों में सम्पादित श्रोद्धों से उत्पन्न फलों का उल्लेख किया है।
विष्णु धर्मसूत्र ने कृत्तिका से भरणी-अभिजित को भी सम्मिलित करते हुए; तक के 28 नक्षत्रों में सम्पादित श्राद्धों से उत्पन्न फलों का उल्लेख किया है।
अग्नि पुराण में आया है कि वे श्राद्ध जो किसी तीर्थ या युगादि एवं मन्वादि दिनों में किये जाते हैं वे पितरों को अक्षय संतुष्टि देते हैं। 
विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, पद्म पुराण, वराह पुराण, प्रजापति स्मृति एवं स्कन्द पुराण का कथन है कि वैशाख शुक्ल तृतीया, कार्तिक शुक्ल नवमी, भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी एवं माघ की अमावास्या युगादि तिथियाँ अर्थात् चारों युगों के प्रथम दिन कही जाती हैं, वे पितरों को अक्षय संतुष्टि देती हैं।
मत्स्य पुराण, अग्नि पुराण, सौर पुराण, पद्म पुराणने 14 मनुओं या मन्वन्तरों की प्रथम तिथियाँ इस प्रकार दी हैं :–आश्विन शुक्ल नवमी, कार्तिक शुक्ल द्वादशी, चैत्र एवं भाद्रपद शुक्ल तृतीया, फाल्गुन की अमावास्या, पौष शुक्ल एकादशी, आषाढ़ शुक्ल दशमी एवं माघ शुक्ल सप्तमी, श्रावण कृष्ण अष्टमी, आषाढ़, कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र एवं ज्येष्ठ की पूर्णिमा; पितरों को अक्षय संतुष्टि देती हैं।
मत्स्यपुराण की सूची स्मृतिच, कृत्यरत्नाकर, परा. मा.एवं मदनपारिजात, स्कन्द पुराण एवं स्मृत्यर्थसार, स्कन्दपुराण-नागर खण्ड, में श्वेत से लेकर तीन कल्पों की प्रथम तिथियाँ श्राद्ध के लिए उपयुक्त ठहरायी गयी हैं और वे पितरों को अक्षय संतुष्टि देती हैं। 
श्राद्ध और ग्रहण ::
आपस्तम्ब धर्मसूत्र, मनु, विष्णु धर्म सूत्र, कूर्म पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, भविष्य पुराण ने रात्रि, संध्या (गोधूलि काल) या जब सूर्य का तुरत उदय हुआ हो तब–ऐसे कालों में श्राद्ध सम्पादन मना किया है। किन्तु चन्द्र ग्रहण के समय छूट दी है। आपस्तम्ब धर्मसूत्र ने इतना जोड़ दिया है कि यदि श्राद्ध सम्पादन अपरान्ह्न में आरम्भ हुआ हो और किसी कारण से देर हो जाए तथा सूर्य डूब जाए तो कर्ता को श्राद्ध सम्पादन के शेष कृत्य दूसरे दिन ही करने चाहिए और उसे दर्भों पर पिण्ड रखने तक उपवास करना चाहिए।
अपरान्ह्न :: दोपहर और सँध्या के बीच का समय सामान्यतया अपरान्ह्न माना गया है। श्राद्ध काल के लिए मनु द्वारा व्यवस्थित अपरान्ह्न के अर्थ के विषय में अपरार्क, हेमाद्रि एवं अन्य लेखकों तथा निबन्धों में विद्वत्तापूर्ण विवेचन उपस्थित किया गया है। कई मत प्रकाशित किये गये हैं। कुछ लोगों के मत से मध्यान्ह्न के उपरान्त दिन का शेषान्त अपरान्ह्न है। पूर्वाह्न शब्द ऋग्वेद में आया है। इस कथन के आधार पर कहा है कि दिन को तीन भागों में बांट देने पर अन्तिम भाग अपरान्ह्न कहा जाता है। तीसरा मत यह है कि पाँच भागों में विभक्त दिन का चौथा भाग अपरान्ह्न है। इस मत को मानने वाले शतपथ ब्राह्मण पर निर्भर हैं। दिन के पाँच भाग ये हैं :–प्रात:, संगव, मध्यन्दिन (मध्यान्ह्न), अपरान्ह्न एवं सायाह्न (सांय या अस्तगमन)। इनमें प्रथम तीन स्पष्ट रूप से ऋग्वेद में उल्लिखित हैं। प्रजापति स्मृति में आया है कि इनमें प्रत्येक भाग तीन मुहूर्तों तक रहता है। इसने आगे कहा है कि कुतप सूर्योदय के उपरान्त आठवाँ मुहूर्त है और श्राद्ध को कुतप में आरम्भ करना चाहिए तथा उसे रौहिण मुहूर्त के आगे नहीं ले जाना चाहिए। श्राद्ध के लिए पाँच मुहूर्त (आठवें से बारहवें तक) अधिकतम योग्य काल हैं।
कुतप :: यह कु-निन्दित अर्थात् पाप एवं तप-जलाना से बना है। इसके आठ अर्थ ये हैं :– मध्याह्न, खड्गपात्र-गेंडे के सींग का बना पात्र, नेपाल का कम्बल, रूपा-चाँदी, दर्भ, तिल, गाय एवं दौहित्र-कन्या का पुत्र। अमावास्या, महालय, अष्टका एवं अन्वष्टका के श्राद्ध अपरान्ह्न में ही किये जाते हैं। वृद्धि श्राद्ध और आम श्राद्ध-जिनमें केवल अन्न का ही अर्पण होता है, प्रात: काल में किये जाते हैं। [स्मृति वचन एवं हेमाद्रि]
यदि मुख्य काल में श्राद्ध करना सम्भव: न हो तो उसके पश्चात् वाले गौण काल में उसे करना चाहिए, किन्तु कृत्य के मुख्य काल एवं सामग्री संग्रहण के काम में प्रथम को ही वरीयता देनी चाहिए और सभी मुख्य द्रव्यों को एकत्र करने के लिए गौण काल के अतिरिक्त अन्य कार्यों में उसकी प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए।[त्रिकाण्ड मण्डन]
श्राद्ध स्थल :: कर्ता को प्रयास करके दक्षिण की ओर ढालू भूमि खोजनी चाहिए, जो कि पवित्र हो और जहाँ पर मनुष्य अधिकतर न जाते हों। उस भूमि को गोबर से लीप देना चाहिए, क्योंकि पितर लोग वास्तविक स्वच्छ स्थलों, नदी-तटों एवं उस स्थान पर किये गए श्राद्ध से प्रसन्न होते हैं, जहाँ पर लोग बहुधा कम ही जाते हैं। [मनु]
श्राद्ध स्थल चतुर्दिक से आवृत, पवित्र एवं दक्षिण की ओर ढालू होना चाहिए। [याज्ञवल्क्य] 
बैलों, हाथियों एवं घोड़ों की पाठ पर, ऊँची भूमि या दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए।[शंख] 
वन, पुण्य पर्वत, तीर्थस्थान, मन्दिर; इनके निश्चित स्वामी नहीं होते और ये किसी की वैयक्तिक सम्पत्ति नहीं हैं।[कूर्म पुराण]
गया :: विष्णुपद मंदिर का निर्माण भगवान विष्णु के पांव के निशान पर इस मंदिर का निर्माण कराया गया है। यहाँ पितृदान भी किया जाता है। यहाँ फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने से मृत व्यक्ति को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। विष्णुधर्मसूत्र ने श्राद्ध योग्य जिन 55 तीर्थों के नाम दिये हैं, उनमें गयाशीर्ष, अक्षयवट, फल्गु, उत्तर मानस, मतंग-वापी, विष्णुपद प्रमुख हैं। यहाँ व्यक्ति जो कुछ दान करता है उससे उसे अक्षय फल मिलता है। 
पितरों के लिए गया में जाना, फल्गु-स्नान करना, पितृ तर्पण करना, गदाधर-विष्णु एवं गयाशीर्ष का दर्शन करना चाहिये है। [अत्रि-स्मृति 55-58]
गया तीर्थ में किये गये श्राद्ध से उत्पन्न अक्षय फल का उल्लेख किया है।[शंख]
नासिक :: नासिक से लगभग 28 किलोमीटर की दूरी पर स्थित त्रयंबकेश्वर गौतम ऋषि की तपोभूमि है। गौतम ऋषि ने भगवान् शिव की तपस्या करके माँ गंगा को यहाँ अवतरित करने का वरदान माँगा था, जिसके फलस्वरूप यहाँ गोदावरी नदी की धारा प्रवाहित हुई। इसलिए गोदावरी को दक्षिण भारत की गंगा भी कहा जाता है। इस स्थान पर किया श्राद्ध और पिण्ड दान सीधा पितरों तक पहुँचता है। इससे पितरों को प्रेत योनी से मुक्ति मिलती है और वह उत्तम लोक में स्थान प्राप्त करते हैं। यहाँ श्राद्ध, तर्पण, पिण्डदान एवं पितरों की संतुष्टि हेतु ब्राह्मण भोजन करवाने से पितर तृप्त होकर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
श्राद्ध वर्जना :: म्लेच्छदेश में न तो श्राद्ध करना चाहिए और न ही जाना चाहिए; उसमें पुन: कहा गया है कि म्लेच्छदेश वह है जिसमें चार वर्णों की परम्परा नहीं पायी जाती है। [विष्णु धर्मसूत्र] 
ने व्यवस्था दी है कि त्रिशंकु देश, जिसका बारह योजन विस्तार है, जो कि महानदी के उत्तर और कीकट (मगध) के दक्षिण में है, श्राद्ध के लिए योग्य नहीं हैं। [वायु पुराण]
कारस्कर, कलिंग, सिंधु के उत्तर का देश और वे सभी देश जहाँ वर्णाश्रम की व्यवस्था नहीं पायी जाती है, श्राद्ध के लिए यथा साध्य त्याग देने चाहिए। 
निम्नलिखित देशों में श्राद्ध कर्म का यथासम्भव परिहार करना चाहिए :- किरात देश, कलिंग, कोंकण, क्रिमि, दशार्ण, कुमार्य-कुमारी अन्तरीप, तंगण, क्रथ, सिंधु नदी के उत्तरी तट, नर्मदा का दक्षिणी तट एवं करतोया का पूर्वी भाग।[ब्रह्मपुराण] 
विसर्जन श्राद्ध के 3 प्रकार ::  (1). पिण्ड विसर्जन, (2). पितृ विसर्जन और (3). देव विसर्जन।
उदक कर्म :: मृतक के लिए जल दान की क्रिया को उदक कर्म कहते हैं।
श्राद्ध और पितर :: श्राद्धों का पितरों के साथ अटूट संबंध है। पितरों के बिना श्राद्ध की कल्पना नहीं की जा सकती। श्राद्ध पितरों को आहार पहुँचाने का माध्यम मात्र है। मृत व्यक्ति के लिए जो श्रद्धायुक्त होकर तर्पण, पिण्ड, दानादि किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है और जिस 'मृत व्यक्ति' के एक वर्ष तक के सभी और्ध्व दैहिक क्रिया कर्म संपन्न हो जायें, उसी की 'पितर' संज्ञा हो जाती है।
मेरे वे पितर जो प्रेतरूप हैं, तिलयुक्त जौं के पिण्डों से तृप्त हों। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, चर हो या अचर, मेरे द्वारा दिये जल से तृप्त हों। [वायु पुराण]
पिण्डदान :: पिण्ड दाहिने हाथ में लिया जाए। मन्त्र के साथ पितृतीथर् मुद्रा से दक्षिणाभिमुख होकर पिण्ड किसी थाली या पत्तल में क्रमशः स्थापित करें। 
(1).  प्रथम पिण्ड देवताओं के निमित्त :-
ॐ उदीरतामवर उत्परास, ऽउन्मध्यमाः पितरः सोम्यासः।
असुं यऽईयुरवृका ऋतज्ञाः, ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु।
(2).  दूसरा पिण्ड ऋषियों के निमित्त :-
ॐ अंगिरसो नः पितरो नवग्वा, अथवार्णो भृगवः सोम्यासः।
तेषां वय सुमतौ यज्ञियानाम्, अपि भद्रे सौमनसे स्याम॥
(3). तीसरा पिण्ड दिव्य मानवों के निमित्त :-
ॐ आयन्तु नः पितरः सोम्यासः, अग्निष्वात्ताः पथिभिदेर्वयानैः।
 अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तः, अधिब्रवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥
(4). चौथा पिण्ड दिव्य पितरों के निमित्त :-
ॐ ऊजरँ वहन्तीरमृतं घृतं, पयः कीलालं परिस्रुत्। स्वधास्थ तपर्यत मे पितृन्॥
(5).  पाँचवाँ पिण्ड यम के निमित्त :-
ॐ पितृव्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः, पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः, प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। अक्षन्पितरोऽमीमदन्त, पितरोऽतीतृपन्त पितरः, पितरः शुन्धध्वम्॥
(6).  छठवाँ पिण्ड मनुष्य-पितरों के निमित्त-
ॐ ये चेह पितरो ये च नेह, याँश्च विद्म याँ२ उ च न प्रविद्म।
 त्वं वेत्थ यति ते जातवेदः, स्वधाभियर्ज्ञ सुकृतं जुषस्व॥
(7). सातवाँ पिण्ड मृतात्मा के निमित्त :-
ॐ नमो वः पितरो रसाय, नमो वः पितरः शोषाय, नमो वः पितरो जीवाय; 
नमो वः पितरः स्वधायै, नमो वः पितरो घोराय। 
नमो वः पितरो मन्यवे, नमो वः पितरः पितरो; 
नमो वो गृहान्नः पितरो, दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः, पितरो वासऽआधत्त
(8). आठवाँ पिण्ड पुत्रदार रहितों के निमित्त :-
ॐ पितृवंशे मृता ये च, मातृवंशे तथैव च। गुरुश्वसुरबन्धूनां, ये चान्ये बान्धवाः स्मृताः॥
  ये मे कुले लुप्तपिण्डाः, पुत्रदारविवजिर्ताः। तेषां पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
(9). नौवाँ पिण्ड उच्छिन्न कुलवंश वालों के निमित्त-
ॐ उच्छिन्नकुलवंशानां, येषां दाता कुले नहि। धमर्पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
(10). दसवाँ पिण्ड गभर्पात से मर जाने वालों के निमित्त-
ॐ विरूपा आमगभार्श्च, ज्ञाताज्ञाताः कुले मम। तेषां पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
(11). ग्यारहवाँ पिण्ड इस जन्म या अन्य जन्म के बन्धुओं के निमित्त :-
ॐ अग्निदग्धाश्च ये जीवा, ये प्रदग्धाः कुले मम। भूमौ दत्तेन तृप्यन्तु, धमर्पिण्डं ददाम्यहम्॥
(12). बारहवाँ पिण्ड इस जन्म या अन्य जन्म के बन्धुओं के निमित्त :-
ॐ ये बान्धवाऽ बान्धवा वा, ये ऽन्यजन्मनि बान्धवाः। तेषां पिण्डो मया दत्तो, ह्यक्षय्यमुपतिष्ठतु॥
यदि तीर्थ श्राद्ध में, पितृपक्ष में से एक से अधिक पितरों की शान्ति के लिए पिण्ड अपिर्त करने हों, तो नीचे लिखे वाक्य में पितरों के नाम-गोत्र आदि जोड़ते हुए वाञ्छित संख्या में पिण्डदान किये जा सकते हैं।
 ... गोत्रस्य अस्मद् ...नाम्नो, अक्षयतृप्त्यथरँ इदं पिण्डं तस्मै स्वधा॥ 
पिण्ड समपर्ण के बाद पिण्डों पर क्रमशः दूध, दही और मधु चढ़ाकर पितरों से तृप्ति की प्राथर्ना की जाती है।
निम्न मन्त्र पढ़ते हुए पिण्ड पर दूध दुहराएँ :- 
ॐ पयः पृथिव्यां पयऽओषधीषु, पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः। पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्।
पिण्डदाता निम्नांकित मन्त्रांश को दुहराएँ :- 
ॐ दुग्धम्। दुग्धम्। दुग्धम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्॥
निम्नांकित मन्त्र से पिण्ड पर दही चढ़ाएँ :-
ॐ दधिक्राव्णे ऽअकारिषं, जिष्णोरश्वस्य वाजिनः। सुरभि नो मुखाकरत्प्रण, आयु षि तारिषत्।
पिण्डदाता निम्नांकित मन्त्रांश दुहराएँ :-
ॐ दधि। दधि। दधि। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्।
नीचे लिखे मन्त्रों साथ पिण्डों पर शहद चढ़ाएँ :-
ॐ मधुवाताऽऋतायते, मधु क्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीनर्: सन्त्वोषधीः।
ॐ मधु नक्तमुतोषसो, मधुमत्पाथिर्व रजः। मधु द्यौरस्तु नः पिता।
ॐ मधुमान्नो वनस्पतिर, मधुमाँअस्तु सूयर्:। माध्वीगार्वो भवन्तु नः। 
पिण्डदानकर्त्ता निम्नांकित मन्त्रांश को दुहराएँ :-
ॐ मधु। मधु। मधु। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। 
श्राद्ध दिवस से पूर्व दिवस को बुद्धिमान पुरुष श्रोत्रिय आदि से विहित ब्राह्मणों को ‘पितृ-श्राद्ध तथा ‘वैश्व-देव-श्राद्ध’ के लिए निमंत्रित करें। पितृ-श्राद्ध के लिए सामर्थ्यानुसार अयुग्म तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए युग्म ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए। निमंत्रित तथा निमंत्रक क्रोध, स्त्रीगमन तथा परिश्रम आदि से दूर रहे। श्राद्ध-दिवस पर निम्न प्रक्रिया का पालन निमंत्रित तथा निमंत्रक को करना विहित है। 
श्राद्ध कर्म संक्षिप्त विधि ::
(1). सर्व प्रथम ब्राह्मण का पैर धोकर सत्कार करें।
(2). हाथ धोकर उन्हें आचमन कराने के बाद साफ आसन प्रदान करें।
(3). देवपक्ष के ब्राह्मणों को पूर्वाभिमुख तथा पितृ-पक्ष व मातामह-पक्ष के ब्राह्मणों को उत्तराभिमुख बिठाकर भोजन कराएं।
(4). श्राद्ध विधि का ज्ञाता पुरुष यव-मिश्रित जल से देवताओं को अर्घ्य दान कर विधि-पूर्वक धूप, दीप, गंध, माला निवेदित करें।
(5).  इसके बाद पितृ-पक्ष के लिए अपसव्य भाव से यज्ञोपवीत को दाएँ कन्धे पर रखकर निवेदन करें, फिर ब्राह्मणों की अनुमति से दो भागों में बंटे हुए कुशाओं का दान करके मंत्रोच्चारण-पूर्वक पितृ-गण का आह्वान करें तथा अपसव्य भाव से तिलोसक से अर्घ्यादि दें।
(6). यदि कोई अनिमंत्रित तपस्वी ब्राह्मण या कोई भूखा पथिक अतिथि रुप में आ जाए तो निमंत्रित ब्राह्मणों की आज्ञा से उसे यथेच्छा भोजन निवेदित करें।
(7). निमंत्रित ब्राह्मणों की आज्ञा से शाक तथा लवणहीन अन्न से श्राद्ध-कर्ता यजमान निम्न मंत्रों से अग्नि में तीन बार आहुति दें-
प्रथम आहुतिः- “अग्नये काव्यवाहनाय स्वाहा”
द्वितीय आहुतिः- “सोमाय पितृमते स्वाहा”
(8). आहुतियों से शेष अन्न को ब्राह्मणों के पात्रों में परोस दें।
(9). इसके बाद रुचि के अनुसार अन्न परोसें और अति विनम्रता से कहें कि ‘आप भोजम ग्रहण कीजिए”।
(10). ब्राह्मणों को भी तद्चित और मौन होकर प्रसन्न मुख से सुखपूर्वक भोजन करना चाहिए तथा यजमान को क्रोध और उतावलेपन को छोड़कर भक्ति-पूर्वक परोसते रहना चाहिए।
(11). फिर ऋग्वेदोक्त ‘रक्षोघ्न मंत्र’ ॐ अपहता असुरा रक्षांसि वेदिषद इत्यादि ऋचा का पाठ कर श्राद्ध-भूमि पर तिल छिड़कें तथा अपने पितृ-रुप से उन ब्राह्मणों का ही चिंतन करे तथा निवेदन करें कि ‘इन ब्राह्मणों के शरीर में स्थित मेरे पिता, पितामह और प्रपितामह आदि आज तृप्ति लाभ करें। 
एकोद्दिष्ट श्राद्ध ::  एकोद्दिष्ट श्राद्ध का मतलब किसी एक को निमित्त मानकर किए जाने वाला श्राद्ध जैसे किसी की मृत्यु हो जाने पर दशाह, एकादशाह आदि एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। इसमें विश्वेदेवों को स्थापित नहीं किया जाता।
एकोदिष्ट श्राद्ध मृत्यु की तिथि के दिन किया जाता है जिसमें एक पिंड और एक बलि, जबकि पार्वण श्राद्ध में पिता का श्राद्ध अष्टमी तिथि को और माता का नवमी को होता है। इसमें छह पिंड और दो बलि दी जाती हैं। श्राद्ध के पहले तर्पण किया जाता है। तर्पण का जल सूर्योदय से आधे पहर तक अमृत, एक पहर तक मधु, डेढ़ पहर तक दूध और साढ़े तीन पहर तक जल के रूप में पितरों को प्राप्त होता है।  जो मनुष्य नास्तिकता और चंचलता से तर्पण करता है, उसके पितृ पिपासित होकर अपने आत्मज का स्वेद (पसीना) पीते हैं। 
तर्पण की सामग्री :: जल, कुश, तिल, जौ, चन्दन, अक्षत, खगौती, श्वेत पुष्प,जौ, कुश और जल को हाथ में लेकर भगवान् विष्णु के नाम से यह शुरू होता है।  
श्राद्धकर्ता स्नान करके पवित्र होकर धुले हुए दो वस्त्र धोती और उत्तरीय धारण करता है। वह गायत्री मंत्र पढ़ते हुए शिखाबंधन करने के बाद श्राद्ध के लिए रखा हुआ जल छिड़कते हुए सभी वस्तुओं को पवित्र करता है। उसके बाद तीन बार आचमनी कर हाथ धोकर विश्वदेवों के लिए दो आसन देता है। उन दोनों आसनों के सामने भोजन पात्र के रूप में पलाश अथवा तोरई का एक-एक पत्ता रखा जाता है। 

गौमय से लिपी हुई शुद्ध भूमि पर बैठकर श्राद्ध की सामग्रियों को रखकर सबसे पहले भोजन तैयार करना चाहिए। ईशान कोण में पिण्ड दान के लिए पाक-शुद्ध सामग्री रखी जाती है। श्राद्ध में पितरों के लिए पूड़ी, सब्जी, मिठाई, खीर, रायता आदि-आदि श्रद्धा-सामर्थ के अनुरूप शामिल हैं। इस प्रक्रिया में प्रपितामह, पितामह, पिता [क्रमशः आदित्य, रूद्र और वसु स्वरुप] को जल अर्पित किया जाता है।  देवताओं को सव्य होकर [दायें कंधे पर जनेऊ] और पितरों को असव्य होकर [बायें कंधे पर जनेऊ] कुश, तिल और जौ के साथ मंत्रानुसार जल अर्पित किया जाता है। इसी तरह बायें हाथ की अनामिका उंगली में मोटक धारण करना, बाँयी कमर पर नींवी रोपित करना, गोबर के ऊपर रखकर दिया जलाना और अंत में उसे एक पत्ते से एक बार में बुझाना। प्रेतात्माओं के लिए भी भोजन देना, कव्वे, कुत्ते और गाय के लिए भोजन देना। चीनी, मधु, कुश, तुलसी, दूध मिलाकर पिंड बनाते समय मन्त्र पढ़ते हुए पितरों को याद करना, घर के खिड़की दरवाजे खोले रखना, इस मान्यता के साथ कि पितृ आये हुए  हैं, पितरों की पातली में यह कहते हुए दोबारा भोजन डालना कि आपको कुछ और चाहिए। श्राद्ध के उपरान्त ब्राह्मणों को भोजन कराना, यथोचित दक्षिणा, सीधा (सूखी भोजन सामग्री) और वस्त्र प्रदान करना, रायता वगैरह गाँव में खासकर बिरादरी में भेजना आदि आदि।