Thursday, February 9, 2017

REINCARNATION-REBIRTH पुनर्जन्म [KARM (4) कर्म ]

KARM (4) कर्म 
REINCARNATION-REBIRTH पुनर्जन्म

 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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व्यभिचारात्तु भर्तुःस्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम्।
शृगालयोनिं चाप्नोति पापरोगैश्च पीड्यतेमनु स्मृति 9.30॥ 
स्वामी के विरुद्ध आचरण करने वाली स्त्री (व्याभिचारिणी) इस लोक में निदित होती है और मरने के बाद श्रृगाल  (गीदड़, सियार) योनि में उत्पन्न होकर अनेक प्रकार के रोगों को भोगती है। 
The woman who acts against her husband and enters into sexual relation with some one else not invite slur bad name (tainted) but also suffer from various diseases like AIDS, chlamydia gonorrhea and syphilis rebirth as a jackal in next birth.
She virtually spoil her life for momentary enjoyment and suffer throughout the life being inflicted by serious incurable diseases, slur-taint, isolation and dishonour till death finally comes to her.
योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्येSनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम्॥कठोपनिषद 2.2.7
नचिकेता यमराज संवाद :: अपने अपने शुभ कर्मों के अनुसार और शास्त्र, गुरु, सङ्ग, शिक्षा, व्यवसाय, आदि के द्वारा देखे-सुने हुए भावों से निर्मित, अन्त:कालीन  वासना के अनुसार, मरने के पश्चात, कितने ही जीवात्मा तो दूसरा शरीर धारण करने के लिये शुक्र के साथ माता की योनि में प्रवेश कर जाते हैं। जिनके पुण्य-पाप समान होते हैं, वे मनुष्य का और जिनके पुण्य कम तथा पाप अधिक होते हैं, वे पशु-पक्षी का शरीर धारण करके उत्पन्न होते हैं और कितने ही, जिनके पाप अत्यधिक होते हैं, वे स्थावर भाव को प्राप्त होते हैं अर्थात वृक्ष, लता, तृण, पर्वत आदि जड़ शरीरों में उत्पन्न होते हैं। 
परिवादात्खरो भवति श्र्वा वै भवति निन्दक:। 
परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरी॥मनु स्मृति 2.201॥
गुरु का उपहास करने वाला मरने पर गधा, निन्दा करने से कुत्ता, उसकी सम्पति का भोग करने से कृमि और ईर्ष्या करने से कीड़ा होता है। 
One who makes fun of his teacher becomes an ass, on censuring-defaming he becomes a dog, on using his property a worm and on envying becomes an insect in next incarnation.
ब्राह्मण का हत्यारा ब्रह्म राक्षस बनता है। 
मन्दिर में पूजा-पाठ सवेतन करने वाला, मन्दिर के दान-धर्म में घपला करने वाला कुत्ता बनता है। 
Neglecting parents is a great sin. Those who neglect, tease, torture their parents eventually go the hells. Those who murder their parents too get worst possible hells and on their release from the hells; they have to spend millions of years in the form of various worms, insects and ultimately they become trees, shrubs etc.
उपासने ये गृहस्था: परपाकमबुद्धय:। तेन ते प्रेत्य पशुतां व्रजन्त्यन्नादिदायिनाम्मनु स्मृति 3.104
जो गृहस्थ अज्ञान वश दूसरे का अन्न खाते फिरते हैं, वे दोष से जन्मान्तर में अन्नदाताओं के पशु होते हैं। 
The ignorant house hold who venture eating food of others, get rebirth as animals of those who fed them.
केतितस्यु यथान्यायं हव्यकव्ये द्विजोत्तमः। कथञ्चिदप्यतिक्रामन् पापः सूकरतां व्रजेत्मनु स्मृति 3.190
देवकर्म या पितृकर्म में निमन्त्रित ब्राह्मण निमन्त्रण स्वीकार करके किसी कारण से यदि भोजन न करे तो उस पाप के कारण वह जन्मान्तर में सूअर होता है। 
If the Brahmn fails to turn up for accepting the sacred food for the purpose of offerings to the Manes, deities or the demigods due to one or the other reason he will be subjected to became a pig-hog in next birth by virtue of this sin.
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोकेप्राप्नोति निन्द्यताम्। शृगालयोनिं प्राप्नोति पापरोगैश्च पीड्यतेमनु स्मृति 5.164
पर पुरुष के साथ व्यभिचार करने से स्त्री संसार में निन्दित समझी जाती है और मरने के बाद शृगाल (गीदड़ी) होती है तथा कुष्ठादि रोगों से पीड़ित होती है। The who is involved in sex with the other man is disgraced in the world and become a jackal in next birth and suffers from diseases like leprosy in the current birth. 
She may have venereal-sexually transmitted diseases, AIDS, HIV etc.There is no one to look after her in old age and she gets a painful death.
शरीरजैः कर्मदोषैर्याति स्थावरतां नरः। वाचिकैः पक्षिमृगतां मानसैरन्त्यजातिताम्
जो मनुष्य शरीर से चोरी, पर स्त्री गमन, श्रेष्ठों को मारने आदि दुष्ट कर्म करता है, उसको वृक्ष आदि स्थावर योनियों में मिलता है। वाणी से किये गये पाप कर्मों के फलस्वरूप पक्षी और मृग आदि तथा मन से किये दुष्ट कर्मों के कारण उसे चाण्डाल आदि का शरीर प्राप्त होता है।
हर गुर निंदक दादुर होई; जन्म सहस्र पाव तन सोई। 
द्विज निंदक बहु नरक भोग करि; जग जनमइ बायस सरीर धरि॥[रामचरित मानस]
भगवान् शंकर और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य अगले जन्म में मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत्‌ में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है। 
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी; रौरव नरक परहिं ते प्रानी। 
होहिं उलूक संत निंदा रत, मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥[रामचरित मानस]
जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है। 
सब कै निंदा जे जड़ करहीं; ते चमगादुर होइ अवतरहीं। 
सुनहु तात अब मानस रोगा; जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥[रामचरित मानस]
जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं। 
NEXT INCARNATION-BIRTH OF THE SINNER पाप का फल :: 
ब्रह्म हत्यारा पुरुष-व्यक्ति मृग, कुत्ते, सूअर और ऊँटो की योनि में जाता है। इनसे मुक्ति के बाद राजयक्ष्मा का रोगी बनता है। 
मदिरा पान करने वाला गधे, चाण्डाल तथा मल्लेछ (मुसलमान, अंग्रेज) बनता है और उसके दाँन्त काले पड़ जाते हैं। 
सोना चुराने वाला कीड़े-मकोड़े और पतिंगे की योनि पाता है।उसका नाख़ून खराब होता है। 
गुरु (-कोई भी पूज्य व्यक्ति) पत्नी  से गमन करने वाला तृण अथवा लता बनता है और इससे मुक्ति के बाद मनुष्य योनि में कोढ़ी होता है।
अन्न चुराने वाला मायावी-राक्षस होता है। 
वाणी-कविता आदि की चोरी करने वाला गूंगा होता है। 
धान्य का अपहरण करने वाला अतिरिक्त अंग के साथ जन्म लेता है।
चुगलखोर की नाक और मुँह से बदबू आती है। 
तेल चुराने वाला तेल पीने वाला कीड़ा बनता है।
दूसेरों की स्त्री और ब्राह्मण का धन चुराने वाला निर्जन वन में ब्राह्मण राक्षस होता है। 
रत्न चोर नीच जाति में जन्म लेता है।
उत्तम गंध का चोर छछूंदर होता है। 
शाक पात चुराने वाला मुर्गा बनता है। 
अनाज की चोरी करने वाला चूहा बनता है। 
पशु चोर -बकरा, दूध चराने वाला -कौवा, सवारी की चोरी करने वाला- ऊँट, फल चुराकर खाने वाला-बन्दर या गृद्ध बनता है। 
शहद चोर-डाँस, घर का सामान चुराने वाला-गृह काक होता है। 
वस्त्र हड़पने वाला-कोढ़ी, चोरी-चोरी रस का स्वाद लेने वाला-कुत्ता और नमक चोर-झींगुर बनता है।
जीव, भोग देह का परित्याग करके पुनः गर्भ में आता है।जीव वायु रूप होकर गर्भ में प्रवेश करता है। केवल मनुष्योँ को मृत्यु के उपरांत एक आतिवाहिक संज्ञक शरीर प्राप्त होता है। अन्य किसी भी प्राणी को वह नहीं मिलता और न ही वे यमलोक को ले जाये जाते हैं।
यह लोक कर्म भूमि है और परलोक फल भूमि। यम दूत जब किसी पुण्य वान को धर्मराज के पास लेकर जाते हैं, तो वे उसका पूजन करते हैं और यदि कोई पापी ले जाया जाता है तो उसे दण्ड मिलता है। भोग देह दो प्रकार की हैं: शुभ और अशुभ।  भोग देह के द्वारा कर्मफल भोग लेने के बाद जीव पुनः मर्त्य लोक में गिरा दिया जाता है। उसके त्यागे हुए शरीर को निशाचर खा जाते हैं। 
यदि जीव भोगदेह के माध्यम से पहले स्वर्ग का सुख पाता है तो उसे पुनः पापियों के योग्य भोग शरीर धारण कर नरक की यातना सहनी पड़ती है और तदुपरान्त जीव को पशु पक्षी या तियर्ग योनि-कीड़े मकोड़े के रूप में जन्म लेना पड़ता है। 
यदि पहले पाप का फल भोग कर प्राणी स्वर्ग जाता है तो उसे देवोचित शरीर मिलता है। स्वर्ग जाने वाले प्राणी को भोग काल समाप्त होने पर पवित्र आचार विचार वाले धनवानों के घर जन्म प्राप्त होता है। 
जो जिस पाप से सम्बन्ध रखता है उसका कोई न कोई चिन्ह लेकर पुनर्जन्म लेता है।  [अग्नि पुराण ]  
One who kills a Brahmn becomes deer, dog, camel and there after suffers from tuberculosis as a human being in still next birth.
One who consumes wine becomes ass, chandal-untouchable, Mallechchh-Muslim-European & his teeth becomes black due to decay.
One who steals gold becomes insect and on liberation from the species of insects, he will become human again but his teeth becomes black due to decaying.
One who indulge into intercourse with the wife of his teacher or any respected person's wife, becomes tree-shrub-straw and suffers from leprosy in next birth as a human being.
One who steal food grain, will become a demon.
One who steals the scripts of the other's writings become dumb in next birth. 
One who indulge in the theft of grains-food-cereals is born with an extra limb.
Backbiters are born with foul smelling mouth and nose.
Oil thief becomes the insect, which drinks oil.
One who steal the wife of other person or Brahmn's money-wealth, becomes demon in an inhabited jungle. 
Jewel thief gets birth in a low caste family.
Scents thief becomes foul smelling rat. One who steal food grain becomes mouse.
One who steal vegetables-leafy vegetables becomes cock.
Animal thief becomes male goat, domestic goods thief becomes camel, fruit thief becomes monkey or vulture.
Honey thief becomes mosquito and thief of domestic goods becomes a crow.
Cloth stealer will become leprosy patient, one who enjoys juices without offering it to others, will become a dog like the priest, who depends upon the salary from the temple or misuse temples funds, Salt thief will become cricket-an insect.
One is born with the sign of the sin he committed in his previous incarnation.
दशसूनासमं चक्रं दशचक्रसमो ध्वजः। दशध्वजसमो वेशो दशवेशसमो नृपःमनु स्मृति 4.85॥
दस वधिकों के समान एक तेली होता है, दस तेलियों के बराबर एक कलाल होता है, दस कलालों के बराबर एक वेशोपजीवी होता है हुए दस वेशोपजीवियों के समान एक राजा होता है। 
One Teli-oil extractor is as sinful-bad as ten butchers, one Kalal-liquor-wine maker is as vicious as 10 Teli, one Veshopjeevi is as much degraded as ten wine makers and one king other than the Kshtriy Vansh-caste is as wicked as ten Veshopjeevi.
दश सूनासहस्राणि यो वाहयति सौनिकः। तेन तुल्यः स्मृतो राजा घोरस्तस्य प्रतिग्रहः॥मनु स्मृति 4.86॥ 
जो वधिक दस हजार प्राणियों की हिंसा करता है, उसके तुल्य राजा होता है। इसलिए उसका दान भयानक होता है। 
The king is as sinful as the butcher who kills ten thousand animals. Therefore, one must not accept offerings from such kings.
All kings are not sinners. There had been kings who are still remembered for their virtues, righteousness, piousness. But knowingly or unknowingly the kings commit crimes against humanity and suffer in the hells thereafter. The present day kings, Neta-ministers are no exception. Their offerings bring misery to the priests who accept the money from them. For the time being life become easy for them but bring misery in next several births.
Like wise the priests, temple heads-Mahants, office bearers of the trusts who run the trusts of the temple and make use of the money for their person purposes, find suitable birth in hells, since the money poured into the coffers of the temple is generally in lieu of removal of tortures from pains, sorrow, diseases.
यो राज्ञः प्रतिगृह्णाति लुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः। स पर्यायेण यातीमान्नरकानैकविंशतिम्मनु स्मृति 4.87॥
जो कृपण और शास्त्र की आज्ञा न मानने वाले राजा से दान लेता है, वह क्रम से 21 नरकों में गिरता है। 

One who accepts donations, offerings from the king who does not spend money for the welfare of the citizens and discards the scriptures goes to 21 sets of dreaded hells, in succession.
अलिङ्गो लिङ्गिवेषेण यो वृत्तिमुपजीवति। स लिङ्गिनां हरत्येनस्तिर्यग्योनौ च जायते॥मनु स्मृति 4.200॥
जो ब्रह्मचारी न होकर भी ब्रह्मचारी के चिन्ह धारण करके, उनकी वृत्ति से जीवन-निर्वाह करता है, वह ब्रह्मचारियों के पापों को अपने लिये बटोरता है और मरने के बाद वह कुत्ते आदि तिर्यग योनियों में जन्म लेता है। 
One who is not a celibate but earns his livelihood by pretending to be a celibate by wearing the marks-signs meant for the celibate, collects the sins of the celibate and as a result of it get birth in inferior species like dogs.
यावन्ति पशुरोमाणि तावत्कृत्वो हि मारणम्। वृथापशुघ्नः प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि॥मनु स्मृति5.38
देवतादि के उद्देश्य के बिना वृथा पशुओं को मारने वाला मनुष्य मरने पर उन पशुओं की रोम संख्या के बराबर जन्म-जन्म में मारा जाता है। 
One who kills animals without justification gets rebirth as animal to be slaughtered as many times as there are hair on the body of the animal killed by him.
Normally, the animals killed by the beasts, carnivorous are those organism who killed the innocent animals, when they themselves were humans.
यज्ञार्थं पशवः सृष्टाः स्वमेव स्वयंभुवा। यज्ञस्य भूत्यै सर्वस्य तस्माद्यज्ञे वधोऽवधः॥मनु स्मृति5.39
स्वयं ब्रह्मा जी ने यज्ञ के लिये और सब यज्ञों की समृद्धि के लिये पशुओं के निर्माण किया है, इसलिये यज्ञ में पशुओं का वध अहिंसा है। 
Brahma Ji him self evolved the animals to be sacrificed in Yagy, so that they are released from their sins and get rebirth as humans in next births. Therefore, this sacrifice is not not treated as violence. As such the animal to be sacrificed has to be beheaded in a single stroke.
The horse sacrificed during Ashw Medh Yagy used to be converted into Kapoor (Camphor, कपूर)  by enchantment of sacred Mantrs, by the holy-highly specialised priests.
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