Sunday, January 29, 2017

अग्नि FIRE

अग्नि FIRE
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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अग्नि का सर्वप्रथम स्थान :: पृथ्वी आदि स्थानीय देवों में अग्नि का सर्वप्रथम स्थान है। अग्नि यज्ञीय अग्नि का प्रतिनिधि रूप है। यज्ञ के द्वारा मनुष्य का सम्बन्ध देवों से होता है। अत: यज्ञ की अग्नि मनुष्य और देवता के बीच सम्बन्ध का सूचक है। परन्तु अग्नि का स्वरूप भौतिक भी है। इनका स्वरूप गरजते हुए वृषभ के समान बतलाया गया है। उन्हें सिर और पैर नहीं हैं परन्तु जिह्वा लाल है। उत्पत्ति के समय अग्नि का स्वरूप बछड़े के समान है, परन्तु प्रज्वलित होने पर उनका स्वरूप अश्व के समान है। उनकी ज्वाला को विद्युत के समान कहा गया है। काष्ठ और घृत को उनका भोजन माना गया है। अग्नि धूम पताका के समान ऊपर की ओर जाता है। इसी कारण से अग्नि को धूमकेतु कहा गया है। यज्ञ के समय इनका आह्वान किया जाता है कि ये कुश के आसन पर विराजमान हों तथा देवों के हविष को ग्रहण करें। अग्नि का जन्म स्थान स्वर्ग माना गया है। स्वर्ग से मातरिश्वा इन्हें धरती पर लाये। अग्नि ज्ञान का प्रतीक है। वह सभी प्राणियों के ज्ञाता देव हैं। अत: इन्हें 'जातवेदा:' कहा गया है। अग्नि को द्युस्थानीय देवता सूर्य भी माना गया है। अग्नि को 'त्रिविध' तथा 'द्विजन्मा' भी कहा गया है। उनका प्रथम जन्म स्वर्ग में तथा दूसरा जन्म जल में (पृथ्वी पर) बतलाया गया है। अग्नि दानवों के भक्षक तथा मानवों के रक्षक माने गए हैं। इनका वर्णन दो सौ वैदिक सूक्तों में प्राप्त होता है।
जो ऊपर की ओर जाता है (अगि गतौ, अंगेनलोपश्च, अंग्+नि और नकार का लोप) वह अग्नि है।
My photoधर्म की वसु नामक पत्नी से अग्नि उत्पन्न हुए। उनकी पत्नी स्वाहा से पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए। 
छठे मन्वन्तर में वसु की वसुधारा नामक पत्नी से द्रविणक आदि पुत्र हुए, जिनमें 45 अग्नि-संतान उत्पन्न हुए। इस प्रकार सब मिलाकर 49 अग्नि हैं। विभिन्न कर्मों में अग्नि के भिन्न-भिन्न नाम हैं। लौकिक कर्म में अग्नि का प्रथम नाम पावक है। 
गृहप्रवेश आदि में निम्नांकित अन्य नाम प्रसिद्ध हैं :-
अग्नेस्तु मारुतो नाम गर्भाधाने विधीयते।पुंसवने चन्द्रनामा शुगांकर्मणि शोभन:॥ 
सीमन्ते मंगलो नाम प्रगल्भो जातकर्मणि।नाग्नि स्यात्पार्थिवी ह्यग्नि: प्राशने च शुचिस्तथा
सत्यनामाथ चूडायां व्रतादेशे समुद्भव:।गोदाने सूर्यनामा च केशान्ते ह्यग्निरुच्यते
वैश्वानरो विसर्गे तु विवाहे योजक: स्मृत:।चतुर्थ्यान्तु शिखी नाम धृतिरग्निस्तथा परे
प्रायश्चित्ते विधुश्चैव पाकयज्ञे तु साहस:।लक्षहोमे तु वह्नि:स्यात कोटिहोमे हुताश्न:
पूर्णाहुत्यां मृडो नाम शान्तिके वरदस्तथा।पौष्टिके बलदश्चैव क्रोधाग्निश्चाभिचारिके
वश्यर्थे शमनी नाम वरदानेऽभिदूषक:।कोष्ठे तु जठरी नाम क्रव्यादो मृतभक्षणे
विभिन्न रुप :: गर्भाधान में मारुत" कहते हैं। पुंसवन में चन्द्रमा, शुगांकर्म में शोभन, सीमान्त में मंगल, जातकर्म में प्रगल्भ, नामकरण में पार्थिव, अन्नप्राशन में शुचि, चूड़ाकर्म में सत्य, व्रतबन्ध (उपनयन) में समुद्भव, गोदान में सूर्य, केशान्त (समावर्तन) में अग्नि, विसर्ग (अर्थात् अग्निहोत्रादिक्रियाकलाप) में वैश्वानर, विवाह में योजक, चतुर्थी में शिखी धृति में अग्नि, प्रायश्चित (अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृतिहोम) में विधु, पाकयज्ञ (अर्थात् पाकांग होम, वृषोत्सर्ग, गृहप्रतिष्ठा आदि में) साहस, लक्षहोम में वह्नि, कोटि होम में हुताशन, पूर्णाहुति में मृड, शान्ति में वरद, पौष्टिक में बलद, आभिचारिक में क्रोधाग्नि, वशीकरण में शमन, वरदान में अभिदूषक, कोष्ठ में जठर और मृत भक्षण में क्रव्यादम कहा गया है।
ऋग्वेद में अग्नि को देवमण्डल का प्राचीनतम सदस्य माना है। वैदिक संहिताओं और ब्राह्मण ग्रन्थों में इसका महत्त्वपूर्ण स्थान है। अग्नि व्योम में सूर्य, अन्तरिक्ष (मध्याकाश) में विद्युत और पृथ्वी पर साधारण अग्नि के रूप में स्थित है। 
ऋग्वेद में सर्वाधिक सूक्त अग्नि को ही अर्पित हैं। वह गृहपति है और परिवार के सभी सदस्यों से उसका स्नेहपूर्ण घनिष्ठ सम्बन्ध है। वह अन्धकार, निशाचर, जादू-टोना, राक्षस और रोगों को दूर करने वाला है। अग्नि है। पाचन और शक्ति निर्माण में इसका प्रमुख स्थान है। यज्ञीय अग्नि वेदिका में निवास करती है। वह समिधा, धृत और सोम से शक्तिमान होता है। वह मानवों और देवों के बीच मध्यस्थ और सन्देशवाहक है।
अग्नि दिव्य पुरोहित हैं और देवताओं का पौरोहित्य करते हैं।  वे यज्ञों के राजा है।नैतिक तत्वों से भी अग्नि का अभिन्न सम्बन्ध है। अग्नि सर्वदर्शी है। उसकी 1,000 आँखें हैं, जिनसे वे निरन्तर  मनुष्य के सभी कर्मों को निहारते रहते हैं। वे स्वयं गुप्तचर भी हैं और  मनुष्य के गुप्त जीवन को भी जानते हैं। वे ऋतुओं  के संरक्षक हैं। अग्नि पापों को तोलते हैं और पापियों को दण्ड देते हैं। वे पाप को क्षमा भी करते हैं। अग्नि की तुलना बृहस्पति और ब्रह्मणस्पति से भी की गई है। वे  मंत्र, धी (बुद्धि) और ब्रह्म के उत्पादक हैं। 
जैमिनी ने मीमांसासूत्र के "हवि:प्रक्षेपणाधिकरण" में अग्नि के (1). गार्हपत्य, (2). आहवनीय, (3). दक्षिणाग्नि, (4). सभ्य, (5). आवसथ्य और (6). औपासन छ: प्रकार  हैं। 
अग्नि को पाँच प्रकार का माना गया है। अग्नि उदात्त तथा विशद है। कर्मकाण्ड का श्रौत भाग और गृह्य का मुख्य केन्द्र अग्निपूजन ही है। देवमण्डल में इन्द्र के अनन्तर अग्नि का ही दूसरा स्थान है। जिसकी स्तुति लगभग दो सौ सूक्तों में वर्णित है। अग्नि के वर्णन में उसका पार्थिव रूप ज्वाला, प्रकाश आदि वैदिक ऋषियों के सामने सदा विद्यमान रहता है। अग्नि की उपमा अनेक पशुओं से दी गई है। प्रज्वलित अग्नि गर्जनशील वृषभ के समान है। उसकी ज्वाला सौर किरणों के तुल्य, उषा की प्रभा तथा विद्युत की चमक के समान है। उसकी आवाज़ आकाश की गर्जन जैसी गम्भीर है। अग्नि के लिए विशेष गुणों को लक्ष्य कर अनेक अभिधान प्रयुक्त करके किए जाते हैं। प्रज्वलित होने पर धूमशिखा के निकलने के कारण धूमकेतु इस विशिष्टिता का द्योतक एक प्रख्यात अभिधान है। अग्नि का ज्ञान सर्वव्यापी है और वह उत्पन्न होने वाले समस्त प्राणियों को जानता है। इसलिए वह 'जातवेदा:' के नाम से विख्यात है। अग्नि कभी द्यावापृथिवी का पुत्र और कभी द्यौ: का सूनु (पुत्र) कहा गया है। उसके तीन जन्मों का वर्णन वेदों में मिलता है। जिनके स्थान हैं :- स्वर्ग, पृथ्वी तथा जल। स्वर्ग, वायु तथा पृथ्वी अग्नि के तीन सिर, तीन जीभ तथा तीन स्थानों का बहुत निर्देश वेद में उपलब्ध होता है। अग्नि के दो जन्मों का भी उल्लेख मिलता है :-भूमि तथा स्वर्ग। अग्नि का जन्म स्वर्ग में ही मुख्यत: हुआ, जहाँ से मातरिश्वा ने मनुष्यों के कल्याणार्थ उसका इस भूतल पर आनयन किया। अग्नि देव को अन्य समस्त देवों में प्रमुख माना गया है। अग्नि का पूजन भारतीय संस्कृति का प्रमुख चिह्न है और वह गृहदेवता के रूप में उपासना और पूजा का एक प्रधान विषय है। इसलिए अग्नि 'गृहा', 'गृहपति' (घर का स्वामी) तथा 'विश्वपति' (जन का रक्षक) कहलाता है।[अवेस्ता]
राहुगण तथा विदेध माधव के नेतृत्व में अग्नि का सारस्वत मण्डल से पूरब की ओर जाने का वर्णन मिलता है।  इस प्रकार अग्नि की उपासना वैदिक धर्म का नितान्त ही आवश्यक अंग है।[शतपथ ब्राह्मण] 
अग्नि के रूप :: 
पिंगभ्रूश्मश्रुकेशाक्ष: पीनांगजठरोऽरुण:। छागस्थ: साक्षसूत्रोऽग्नि: सप्तार्चि: शक्तिधारक:॥ 
भौहें, दाढ़ी, केश और आँखें पीली हैं। अंग स्थूल हैं और उदर लाल है। बकरे पर आरूढ़ हैं, अक्षमाला लिये है। इसकी सात ज्वालाएँ हैं और शक्ति को धारण करता है।
अग्नि के शुभ लक्षण :: 
अर्चिष्मान् पिण्डितशिख: सर्पि:काञ्चनसन्निभ:। स्निग्ध: प्रदक्षिणश्चैव वह्नि: स्यात् कार्यसिद्धये॥ 
ज्वालायुक्त, पिण्डितशिख, घी एवं सुवर्ण के समान, चिकना और दाहिनी ओर गतिशील अग्नि सिद्धिदायक होता है।
देहजन्य अग्नि में शब्द-ध्वनि उत्पादन की शक्ति होती है :-
आत्मना प्रेरितं चित्तं वह्निमाहन्ति देहजम्। ब्रह्मग्रन्थिस्थितं प्राणं स प्रेरयति पावक:॥ 
पावकप्रेरित: सोऽथ क्रमदूर्ध्वपथे चरन्। अतिसूक्ष्मध्वनि नाभौ हृदि सूक्ष्मं गले पुन:॥ 
पुष्टं शीर्षे त्वपुष्टञ्च कृत्रिमं वदने तथा। आविर्भावयतीत्येवं पञ्चधा कीर्त्यते बुधै:॥ 
नकारं प्राणनामानं दकारमनलं विंदु:। जात: प्राणाग्निसंयोगात्तेन नादोऽभिधीयते॥ 
आत्मा के द्वारा प्रेरित चित्त देह में उत्पन्न अग्नि को आहत करता है। ब्रह्मग्रन्थि में स्थित प्रेरित वह प्राण क्रम से ऊपर चलता हुआ नाभि में अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि करता है तथा गले और हृदय में भी सूक्ष्म ध्वनि करता है। सिर में पुष्ट और अपुष्ट तथा मुख में कृत्रिम प्रकाश करता है। विद्वानों ने पाँच प्रकार का अग्नि बताया है। नकार प्राण का नाम है, दकार अग्नि का नाम है। प्राण और अग्नि के संयोग से नाद की उत्पत्ति होती है। सब देवताओं में इसका प्रथम आराध्यत्व ऋग्वेद के सर्वप्रथम मंत्र "अग्निमीले पुरोहितम्" से प्रकट होता है।[संगीतदर्पण]
योगाग्नि अथवा ज्ञानाग्नि के रूप में भी "अग्नि" का प्रयोग होता है :-
'ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा। 'ज्ञानाग्निदग्धकर्माणि तमाहु: पण्डितं बुधा:॥ [श्रीमद्भागवत गीता] 

अग्नि ::
अग्निः त्रिकोणः रक्तः। [ज्ञानसार 57]
अग्नि त्रिकोण व लाल होती है।
अग्नि के अंगारादि भेद :: 
इगालजालअच्ची मुम्मुरसुद्धागणी य अगणी य। ते जाण तेउजीवा जाणित्ता परिहरेदव्वा। [मूलाचार 221]
धुआँ रहित अंगार, ज्वाला, दीपक की लौ, कंडाकी आग और वज्राग्नि, बिजली आदिसे उत्पन्न शुद्ध अग्नि, सामान्य अग्नि-ये तेजस्कायिक जीव हैं, इनको जानकर इनकी हिंसाका त्याग करना चाहिए। 
[आचारांग निर्युक्ति 166; पंचसंग्रह-प्राकृत अधिकार संख्या 1.79; धवला पुस्तक संख्या 1.1.1.42.273, गा.151, भगवती आराधना -विजयोदयी टीका-गाथा संख्या 607.805, 608.805, तत्त्वार्थसार अधिकार संख्या 2.64.]
गार्हपत्य आदि तीन अग्नियों का निर्देश व उपयोग ::
त्रयोऽग्नयः प्रणेयाः स्युः कर्मारम्भे द्विजोत्तमैः। 
रत्नत्रितयसंकल्पादग्नीन्द्रमुकुटोद्भवाः॥महापुराण सर्ग संख्या 40.82॥ 
क्रियाओं के प्रारंभ में उत्तम द्विजों को रत्नत्रय का संकल्प कर अग्निकुमार देवों के इन्द्र के मुकुट से उत्पन्न हुई तीन प्रकारकी अग्नियाँ प्राप्त करनी चाहिए।  
तीर्थकृद्गणभृच्छेषकेवल्यन्तमहोत्सवे। 
पूजाङ्गत्वं समासाद्य पवित्रत्वमुपागताः॥महापुराण सर्ग संख्या 40.83॥  
ये तीनों ही अग्नियाँ तीर्थंकर, गणधर और सामान्य केवली के अन्तिम अर्थात् निर्वाणोत्सवमें पूजा का अंग होकर अत्यन्त पवित्रता को प्राप्त हुई मानी जाती है।    
कुण्डत्रये प्रणेतव्यास्त्रय एते महाग्नयः। 
गार्हपत्याहवनीयदक्षिणाग्निः प्रसिद्धयः॥महापुराण सर्ग संख्या 40.84॥ 
गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिणाग्नि नामसे प्रसिद्ध इन तीनों महाग्नियों को तीन कुण्डोंमें स्थापित करना चाहिए।  
अस्मिन्नग्नित्रये पूजां मन्त्रैः कुर्वन्न द्विजोत्तमः।
आहिताग्निरिति ज्ञेयो नित्येज्या यस्य सद्मनि॥महापुराण सर्ग संख्या 40.85॥ 
इन तीनों प्रकार की अग्नियों में मन्त्रों के द्वारा पूजा करनेवाला पुरुष द्विजोत्तम कहलाता है और जिसके घर इस प्रकारकी पूजा नित्य होती रहती है वह आहिताग्नि व अग्निहोत्री कहलाता है।  
हविष्याके च धूपे च दीपोद्बोधनसंविधौ। 
वह्नीनां विनियोगः स्यादमीषां नित्यपूजने॥महापुराण सर्ग संख्या 40.86॥ 
नित्य पूजन करते समय इन तीनों प्रकारकी अग्नियों का विनियोग नैवेद्य पकाने में, धूप खेने में और दीपक जलाने में होता है अर्थात् गार्हपत्य अग्निसे नैवेद्य पकाया जाता है, आहवनीय अग्निमें धूप खेई जाती है और दक्षिणाग्नि से दीप जलाया जाता है। 
प्रयत्नेनाभिरक्ष्यं स्यादिदमग्नित्रयं गृहे। 
नैव दातव्यमन्येभ्यस्तेऽन्ये ये स्युरसंस्कृताः॥महापुराण सर्ग संख्या 40.87॥ 
घरमें बड़े प्रयत्न से इन तीनों अग्नियों की रक्षा करनी चाहिए और जिनका कोई संस्कार नहीं हुआ है ऐसे अन्य लोगों को कभी नहीं देनी चाहिए। 
न स्वतोऽग्नेः पवित्रत्वं देवतारूपमेव वा। 
किन्त्वर्हद्दिव्यमूर्तीज्यासंबन्धात् पावनोऽनलः॥महापुराण सर्ग संख्या 40.88॥  
अग्निमें स्वयं पवित्रता नहीं है और न वह देवता रूप ही है किन्तु अर्हन्त देवकी दिव्य मूर्तिकी पूजा के सम्बन्ध से वह अग्नि पवित्र हो जाती है।  
ततः पूजाङ्गतामस्य मत्वार्चन्ति द्विजोत्तमाः। 
निर्वाणक्षेत्रपूजावत्तत्पूजातो न दुष्यति॥महापुराण सर्ग संख्या 40.89॥
इसलिए ही द्विजोत्तम लोग इसे पूजाका अंग मानकर इसकी पूजा करते हैं अतः निर्वाण क्षेत्रकी पूजा के समान अग्नि की पूजा करने में कोई दोष नहीं है। 
व्यवहारनयापेक्षा तस्येष्टा पूज्यता द्विजैः। 
जैनैरध्यवहार्योऽयं नयोऽद्यत्वेऽग्रजन्मनः॥महापुराण सर्ग संख्या 40.90॥   
ब्राह्मणों को व्यवहार नय की अपेक्षा ही अग्निकी पूज्यता इष्ट है, इसलिए जैन ब्राह्मणों को भी आज यह व्यवहार नय उपयोग में लाना चाहिए। 
अन्य संदर्भ :: यज्ञ में आर्ष यज्ञ, प्रकरण मोक्ष 5.1.; भगवती आराधना, विजयोदयी टीका, गाथा संख्या 8.1856,
अर्हत्पूजा से ही अग्नि पवित्र है, स्वयं नहीं[अग्नि 2]
क्रोधादि तीन अग्नियों का निर्देश :: 
  त्रयोऽग्नयः समुद्दिष्टा क्रोधकामोदराग्नयः। 
तेषु क्षमाविरागत्वानशनाहुतिभिर्वने[महापुराण सर्ग संख्या 67.202] 
स्थित्वर्षियतिमुन्यस्तशरणाः परमद्विजाः। इत्यात्मयज्ञमिष्टार्थमष्टमीमवनीं ययुः[महापुराण सर्ग संख्या 68.203]
क्रोधाग्नि कामाग्नि और उदराग्नि ये तीन अग्नियाँ बतलायी गयी हैं। इनमें क्षमा, वैराग्य और अनशन की आहुतियाँ देनेवाले जो ऋषि, यति, मुनि और अनगार रूपी श्रेष्ठ द्विज वनमें निवास करते हैं वे आत्मयज्ञ कर इष्ट अर्थ की देनेवाली अष्टम पृथिवी मोक्ष-स्थानको प्राप्त होते हैं।
पंचाग्नि का अर्थ पंचाचार :: 
पंचमहागुरु भक्ति-पंचहाचार-पंचग्गिसंसाहया सूरिणो दिंतु मोक्खंगयासंगया॥पंचाचार॥   
जो पंचाचार रूप पंचाग्नि के साधक हैं, वे आचार्य परमेष्ठी हमें उत्कृष्ट मोक्ष लक्ष्मी देवें।
प्राणायाम सम्बन्धी अग्निमण्डल :: 
स्फुलिङ्गपिङ्गलं भीममूर्ध्वज्वालाशतार्चितम्।
 त्रिकोणं स्वस्तिकोपेतं तद्बीजं वह्निमण्डलम्[ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 29.22.289] 
अग्निके स्फुलिंग समान पिंगल वर्ण भीम रौद्र रूप ऊर्ध्वगमन स्वरूप सैकड़ों ज्वालाओं सहित त्रिकोणाकार स्वस्तिक (साथिये) सहित, वह्निबीज से मण्डित ऐसा वह्निमण्डल है। 
बालार्कसंनि-भश्चोर्ध्वं सावर्त्तश्चतुरङ्गुलः। 
अत्युष्णो ज्वलनाभिख्यः पवनः कीर्तितो बुधैः[ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 29.27.289] 
जो उगते हुए सूर्य के समान रक्त वर्ण हो तथा ऊँचा चलता हो, आवर्तों (चक्रों) सहित फिरता हुआ चले, चार अंगुल बाहर आवे और अति ऊष्ण हो ऐसा अग्निमण्डल का पवन पण्डितोंने कहा है।
आग्नेयी धारणा का लक्षण :: 
ततोअसौ निश्चलाभ्यासात्कमलं नाभिमण्डले। 
स्मरत्यतिमनोहारि षोडशोन्नतपत्रकम्॥ ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.10.382॥ 
तत्पश्चात् (पार्थिवी धारणा के) योगी (ध्यानी) निश्चल अभ्यास से अपने नाभिमण्डल में सोलह ऊँचे-ऊँचे पत्रों के एक मनोहर कमल का ध्यान करे। 
प्रतिपत्रसमासीनस्वरमालाविराजितम्। 
कर्णिकायां महामन्त्रं विस्फुरन्तं विचिन्तयेत्॥ ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.11.382॥
तत्पश्चात् उस कमल की कर्णिका में महामन्त्र का (जो आगे कहा जाता है उसका) चिन्तवन करे और उस कमल के सोलह पत्रों पर `अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ लृ लॄ ए ऐ ओ औ अं अः इन 16 अक्षरों का ध्यान करे। 
रेफरुद्धं कलाबिन्दुलाञ्छितं शून्यमक्षरम्। 
लसदिन्दुच्छटाकोटिकान्तिव्याप्तहरिन्मुखम्॥ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.12.382॥ 
रेफ से रुद्ध कहिए आवृत और कला तथा बिन्दु से चिह्नित और शून्य कहिए हकार ऐसा अक्षर लसत कहिए दैदीप्यमान होते हुए बिन्दु की छटाकोटिकी कान्ति से व्याप्त किया है दिशा का मुख जिसने ऐसा महामन्त्र "हं" उस कमल की कर्णिका में स्थापन कर, चिन्तवन करे। 
तस्य रेफाद्विनिर्यान्ती शनैर्धूमशिखां स्मरेत्। 
स्फुलिङ्गसंततिं पश्चाज्ज्वालालीं तदनन्तरम्॥ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.13.382॥
तत्पश्चात् उस महामन्त्र के रेफ से मन्द-मन्द निकलती हुई धूम (धुएँ) की शिखा का चिन्तवन करे। तत्पश्चात् उसमें से अनुक्रम से प्रवाह रूप निकलते हुए स्फुलिंगों की पंक्ति का चिन्तवन करै और पश्चात् उसमें से निकलती हुई ज्वाला की लपटों को विचारे।    
तेन ज्वालाकलापेन वर्धमानेन संततम्। 
दहत्यविरतं धीरः पुण्डरीकं हृदिस्थितम् ॥ ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.14.382॥ 
तत्पश्चात् योगी मुनि क्रम से बढ़ते हुए उस ज्वाला के समूह से अपने हृदयस्थ कमल को निरन्तर जलाता हुआ चिन्तवन करे।
तदष्टकर्मनिर्माणमष्टपत्रमधोमुखम्। 
दहत्येव महामन्त्रध्यानोत्थः प्रबलोअनलः॥ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.15.382॥
वह हृदयस्थ कमल अधोमुख आठ पत्र का है। इन आठ पत्रों पर आठ कर्म स्थित हों। ऐसे नाभिस्थ कमल की कर्णिका में स्थित "र्हं" महामन्त्र के ध्यान से उठी हुई। प्रबल अग्नि निरन्तर दहती है, इस प्रकार चिन्तवन करे, तब अष्ट कर्म जल जाते हैं, यह चैतन्य परिणामों की सामर्थ्य है।  
ततो बहिः शरीरस्य त्रिकोणं वह्निमण्डलम्। 
स्मरेज्ज्वालाकलापेन ज्वलन्तमिव वाडवम्॥ ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.16.382॥
उस कमल के दग्ध हुए पश्चात् शरीर के बाह्य त्रिकोण वह्नि का चिन्तवन करै, सो ज्वाला के समूह से जलते हुए बडवानल के समान ध्यान करे।  
वह्निबीजसमाक्रान्तं पर्यन्ते स्वस्तिकाङ्कितम्। 
ऊर्ध्ववायुपुरोद्भूतं निर्धूमं काञ्चनप्रभम्॥ ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.17.382॥  
तथा अग्नि बीजाक्षर `र' से व्याप्त और अन्त में साथिया के चिह्न से चिह्नित हो, ऊर्ध्व वायुमण्डल से उत्पन्न धूम रहित कांचन की-सी प्रभावाला चिन्तवन करे। 
अन्तर्दहति मन्त्रार्चिर्बहिर्वह्निपुरं पुरम्। 
धगद्धगितिविस्फूर्जज्वालाप्रचयभासुरम् ॥ ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.18.382॥ 
इस प्रकार वह धगधगायमान फैलती हुई लपटों के समूहों से दैदीप्यमान बाहर का अग्निपुर (अग्निमण्डल) अन्तरंग की मन्त्राग्नि को दग्ध करता है।  
भस्मभावमसौ नीत्वा शरीरं तच्च पङ्कजम्। 
दाह्याभावात्स्वयं शान्तिं याति वह्निः शनैः शनैः॥ ज्ञानार्णव अधिकार संख्या 37.19.382॥
तत्पश्चात् यह अग्निमण्डल उस नाभिस्थ कमल और शरीरको भस्मीभूत करके दाह्य का अभाव होने से धीरे-धीरे अपने आप शान्त हो जाता है।



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