Monday, February 29, 2016

THE SACRED THREAD जनेऊ-यज्ञोपवीत


THE SACRED THREAD जनेऊ 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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Upper castes in Hindus, especially Brahmns, used to wear the sacred thread around the loin. This is generally made of white coloured cotton thread. Kshatriy and Vaishy may wear threads made out of hempen and wool respectively. 
Image result for images of brahmins wearing Janeu over the earImage result for images of Brahmns wearing Janeu over the ear. It has three to seven strands.  It suggests the development of a male, from a young boy to a man. It is believed that a boy cannot be surmised as Dwij (-twice born, second birth, initially one is born as an animal and education makes him a socially useful person) until he wears the Janeu. It represents initiation into education for Brahmns as well. Besides the Brahmns, Janeu thread is also worn by the Kshatriy-marshal community and Vaishy-trading-business community. The type of Janeu is different for different caste groups or sects of people of the Indian subcontinent. A celibate (-pure) bachelor is supposed to wear only one thread, a married man should wear two scared threads and if the married man has a child then he wears three threads. The three strands of the thread symbolises three debts of man: (1). The debt of one's teacher, (2). The debt of one's parents and ancestors and (3). The debt of the scholars, which one ought to repay during his life span. 
Image result for images of brahmins wearing Janeu over the earDuring the current age it may not be possible to find even a devout (-भक्त, धर्मनिष्ठ, धार्मिक, सच्चा, सरल, दिल-हृदय से समर्पित, devotee, Godly, votary, pious, devout, religious, virtuous, holy, righteous, sacred, devout, truthful, real, genuine, faithful, sincere, devout, simple, easy, effortless, straightforward, ingenious, devout, heartwarming, heartfelt, warmhearted, devout, soulful, hearty, heartfelt, warm, unpretentious, cordial), Brahmn wearing this, since it needs highest possible standards of purity and piousity. Brahmns are finding it very-very difficult to earn livelihood. They no more earn sufficient money in the form of donations, Dakshina-fees, gifts to survive. They are poverty stricken and the present regime is busy crushing them.
One is Brahm Gandh (-गंध) Janeu (with 5 knots or 3 knots), which is meant for Brahmns and the other is Vishnu Gandh Janeu (with one knot), meant for other classes. In case a Brahmn desires to become scholarly in the Veds, he must wear Janeu at 5 years of age. If a Kshatriy desires to gain strength, he should wear Janeu at 6 and if a Vaishy desires for success, he must wear the Janeu at 8 years of age. 
JANEU CEREMONY :: Brahmns celebrate the development of a boy through Upnayan Sanskar (-sacred thread ceremony). The ceremony is generally observed between the ages of seven and fourteen. In case the ceremony could not take place due to any reason all through this age period, then it is required to be done before the marriage. The purpose of thread ceremony is to prepare a young man to share the responsibilities of elders. The thread is worn by the man in the company of a group chant of Gayatri Mantr. The thread is twisted in upward direction to make certain that Satv Gun (Truthfulness, Virtuousness, Righteousness, piousity, honesty) prevails. The ceremony also suggests that the wearer of Janeu can participate in the family rituals, from now on wards. 
SIGNIFICANCE OF 3 STRANDS OF JANEU :: Brahmns use Janeu thread with three strands. These three strands of Janeu represents the (1). Trinity of Brahma, Vishnu and Mahesh, (2).  Maha Saraswati, Maha Lakshmi and Maha Kali, (3). The 3 divisions of time into past, present and future, (4). The three qualities (i). Satv, (ii). Rajas and (iii). Tamas, (5).  Three states of mind, wakefulness, dream and deep sleep, (6). Three dimensions of Heaven (-Swarg), Earth (-Mratyu Lok) and Nether Regions (-Patal Lok) and (7). Ida, Pingla and Shushmna Nadi, through which the Kundlini (-coiled, hidden) energy reveals in Pran and realisation.
PROCESS OF WEARING JANEU :: Its sanctity is regarded to get disturbed if it is not worn properly.  (1). To attend or perform any auspicious ceremony, one should wear Janeu hanging from the left shoulder: Upviti, (2). For attending or performing inauspicious event, one should wear Janeu hanging from the right shoulder: Prachanviti, (3). In case the person wears Janeu round the neck like a garland, then, he is called as Niviti, (4). While going for daily ablutions or doing impure tasks, the holy thread must be raised and its upper part ought to be put behind ear and (5). Both male and female can wear Janeu, yet a female should wear it around the neck and (6). Following a birth or death in the family, Janeu should be removed and again a new thread ought to be worn after 15 days of event.
One must replace the old or broken thread with a new thread, at some auspicious occasion or periodically.
SIGNIFICANCE OF UPNAYAN SANSKAR :: The strands of the thread also stand for purity of thoughts, words and deeds of the wearer. Through the ceremony of Upnayan, the boy is introduced to the concept of Brahmn and thus becomes qualified to lead the life of a Brahmchari-celibate as per the guidelines of the Manu Smrati. Wearing the sacred thread is extremely significant & auspicious as it marks the beginning of education for the child.
यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक संस्कार है। इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। यज्ञोपवीत धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है। शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो कि दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है और विद्युत प्रवाह की तरह कार्य करती है। यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है। इसका स्वरूप लाजवंती वनस्पति की तरह होता है। यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता।यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्यर्च नहीं है। 
यज्ञोपवीत (यज्ञ+उपवीत) एक संस्कृत शब्द है। द्विज-उच्च वर्णों में, उपनयन एक ऐसा संस्कार है, जिसमें ब्रह्मचारी को जनेऊ पहनाकर  विद्यारंभ कराया जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। कच्चे सूत से बना यह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया यह बन्धन उपवीत, यज्ञसूत्र या जनेऊ कहलाता है। 
यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। इसमें सात (5 या 3) ग्रंथियाँ लगायी जाती हैं। ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं।
यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र यह है ::
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ 
जनेऊ को यदि विधि विधान से धारण किया जाये तो अनेकों अनजान बाधाओं और रोगों से रक्षा हो सकती है। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें जिनका संबंध पेट की आंतों से है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती हैं; जिससे मल विसर्जन आसानी से होता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, अम्लता, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ को धर्म से जोड़ दिया गया है, जबकि इसका प्रयोग पूर्ण तय वैज्ञानिक और तथ्यों पर आधारित है।
जनेऊ पहनने से आदमी को लकवे से सुरक्षा मिल जाती है, क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दाँत पर दाँत बैठा कर रहना चाहिए, अन्यथा अधर्म होता है। दाँत पर दाँत बैठा कर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।  दाँये कान को इतना महत्व देने का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस कान की नस, गुप्तेंद्रिय और अंडकोष का आपस में अभिन्न संबंध है। मूत्रोत्सर्ग के समय सूक्ष्म वीर्य स्त्राव होने की संभावना रहती है।
दायें कान को ब्रह्म सूत्र में लपेटने पर शुक्र नाश से बचाव होता है। यदि बार-बार स्वप्नदोष होता हो तो दाँया कान ब्रह्म सूत्र से बांधकर सोने से रोग दूर हो जाता है। बिस्तर में पेशाब करने वाले लडकों को दायें कान में धागा बांधने से यह प्रवृत्ति रूक जाती है। किसी भी उच्छृंखल जानवर का दाँया कान पकडने से वह उसी क्षण नरम हो जाता है। जनेऊ पहनने वाला नियमों में बँधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। बिना यज्ञोपवीत धारण किये अन्न जल ग्रहण नहीं किया जाता। यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है :–
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ 
आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है, एक पुरुष को बताता है कि उसे दो लोगों का भार या ज़िम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का।
अब एक एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं, जो कि व्यक्ति को बताते हैं कि उस पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धांगों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देंखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् मनुष्य को  पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है| अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9=36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36=3+6=9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है।
अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2=11 होगा जो बताता है कि मनुष्य का  जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी ( 1 और 1 ) के मिलने से बना है। 1+1=2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है और चंद्रमा मनुष्य को शीतलता प्रदान करता है। जब मनुष्य अपने दोनो पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो उसे असीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।
अंडवृद्धि के सात कारण हैं। मूत्रज अंडवृद्धि उनमें से एक है। दायां कान सूत्रवेष्टित होने पर मूत्रज अंडवृद्धि का प्रतिकार होता है। इन सभी कारणों से मूत्र तथा पुरीषोत्सर्ग करते समय दाएं कान पर जनेऊ रखने की शास्त्रीय आज्ञा है। पूरे विधि विधान से धारण किया जनेऊ हर तरह की नकारात्मक शक्तियों (भूत-प्रेत आदि) और ग्रहों के दुष्प्रभावो से भी निश्चित रक्षा करता है। 

1 comment:

  1. यज्ञोपवीत संस्कार
    यज्ञोपवीत संस्कार को उपनयन संस्कार के नाम से भी जाना जाता है। यह संस्कार सोलहों संस्कारों में सबसे विशेष महत्व का है। माता पिता बालक के इस संस्कार के प्रति काफी जागरूक रहते हैं. इस संस्कार के बाद बालक में विद्या बुद्धि के क्षेत्र मे विशेष परिवर्तन दीखता है।

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