Tuesday, February 2, 2016

CONCH & THE CURING IMPACT OF MELODIOUS SOUND PRODUCED BY IT शंख और शंख ध्वनि

CONCH & THE CURING IMPACT OF MELODIOUS SOUND PRODUCED BY IT 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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शंख और शंख ध्वनि
‘शंखकल्प संहिता’ और सभी आध्यात्मिक ग्रंथों, पौराणिक मतों के अनुसार देवताओं और दानवों ने अमृत की खोज के लिए मंदराचल पर्वत की मथानी से क्षीरसागर मंथन किया, उससे 14 प्रकार के रत्न प्राप्त हुए। आठवें रत्न के रूप में शंखों का जन्म हुआ जिसमें तथा मुख्य दक्षिणावर्ती शंख, गोमुखी शंख और भी कई प्रकार के शंख प्राप्त हुए। प्रतिदिन घर में शंखनाद करने से सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है। शंख ध्वनि से सूक्ष्म जीवाणुओं का नाश होता है। शंख में पंच तत्वों का संतुलन बराबर बनाए रखने की प्रचुर क्षमता होती है।शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है, जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है। इसको अन्य नामों से भी पुकारा जाता है  यथा :: शंख, समुद्रज, कंबु, सुनाद, पावनध्वनि, कंबु, कंबोज, अब्ज, त्रिरेख, जलज, अर्णोभव, महानाद, मुखर, दीर्घनाद, बहुनाद, हरिप्रिय, सुरचर, जलोद्भव, विष्णुप्रिय, धवल, स्त्रीविभूषण, पांचजन्य, अर्णवभव आदि। शंख ध्वनि घर में सुलह शान्ति प्रदायक है। 
शंखस्तुविमल: श्रेष्ठश्चन्द्रकांतिसमप्रभ: अशुद्धोगुणदोषैवशुद्धस्तु सुगुणप्रद:॥ 
निर्मल व चन्द्रमा की कांति के समानवाला शंख श्रेष्ठ होता है जबकि अशुद्ध अर्थात् मग्न शंख गुणदायक नहीं होता। गुणोंवाला शंख ही प्रयोग में लाना चाहिए। क्षीरसागर में शयन करने वाले सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के एक हाथ में शंख अत्यधिक पावन माना जाता है। इसका प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष रूप से किया जाता है।
नादब्रह्म :: शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख की ध्वनि को ॐ की ध्वनि के समकक्ष माना गया है। शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है। जहाँ शंख ध्वनि होती है वहाँ देवी-देवताओं का वास होता है और व्याधियों से मुक्ति प्राप्त होती है। भूत-प्रेत और राक्षस  भाग जाते हैं। यह वास्तुदोष दूर करने के साथ-साथ आरोग्य वृद्धि, आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-दोष शांति, विवाह आदि की रुकावट भी दूर दूर करता है। 
भगवान्  शिव को छोड़कर सभी देवताओं पर शंख से जल अर्पित किया जा सकता है। भगवान् शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था, अत: शंख का जल भगवान् शिव को निषेध है। योग में शंख प्रक्षालन और शंख मुद्रा होती हैं।  आयुर्वेद में शंख पुष्पी और शंख भस्म का प्रयोग किया जाता है। प्राचीनकाल में शंख लिपि भी हुआ करती थी। 
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृत: करे। नमित: सर्वदेवैश्य पाञ्चजन्य नमो स्तुते॥ 
शंख का प्रयोग प्राय: पूजा-पाठ में किया जाता है। अत: पूजारंभ में शंखमुद्रा से शंख की प्रार्थना की जाती है। शंख को हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण और पवित्र माना गया माना गया है। 
शंख का रासायनिक संयोग :- अर्कट, मेवाड़ी, सुपंखी, प्रवाश्म, लौह, शिलामंडूर, एवं चिपिलिका है। इसमें वामावर्ती पूजा, यज्ञ आदि में, दक्षिणावर्ती अन्तः औषधि के रूप में, हेममुख बाह्य औषधि के रूप में, पुन्जिका विशानुघ्ना एवं नारायण दर्शन के लिये। 
शंख मुख्यतः 3 प्रकार के होते हैं :: दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख अथवा वामावर्ती, दक्षिणावर्ती तथा गणेश शंख। 
अन्य प्रकार :-  हेममुख, पुन्जिका, नारायण, लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरूड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख, गोमुखी शंख, पांचजन्य शंख, अन्नपूर्णा शंख, मोती शंख, हीरा शंख, शेर शंख आदि प्रकार के होते हैं।  
वामवर्ती शंख का पेट बाईं ओर खुला होता है। इसके बजाने के लिए एक छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं। वामावर्ती अपने आयतन के अनुपात में बीस गुणा कम भार का होता है। 
प्रथम प्रहर में पूजन करने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। द्वितीय प्रहर में पूजन करने से धन-सम्पत्ति में वृद्धि होती है। तृतीय प्रहर में पूजन करने से यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। चतुर्थ प्रहर में पूजन करने से संतान प्राप्ति होती है। प्रतिदिन पूजन के बाद 108 बार या श्रद्धा के अनुसार मंत्र का जप करें।
भगवान् श्री कृष्ण के शंख का नाम पाञ्चजन्य था जिसको उन्होंने पांचजन्य नामक समुद्र में स्थित राक्षस को मर कर प्राप्त किया था।  उस राक्षस ने उनके गुरु संदीपन के पुत्र का वध किया था। भगवान् ने उनके मरे हुए पुत्र को धर्मराज से पुनः प्राप्त करके वापस किया था। 
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:। पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:॥ [महाभारत]
अर्जुन के पास देवदत्त, युधिष्ठिर के पास अनंतविजय, भीष्म के पास पोंड्रिक, नकुल के पास सुघोष, सहदेव के पास मणिपुष्पक था। सभी के शंखों का महत्व और शक्ति अलग-अलग थी। कई देवी देवतागण शंख को अस्त्र रूप में धारण किए हुए हैं। महाभारत में युद्धारंभ की घोषणा और उत्साहवर्धन हेतु शंख नाद किया गया था।
अथर्ववेद के अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है :- शंखेन हत्वा रक्षांसि। भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है। यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला व्यक्ति अपिक्षित है।
धन प्राप्ति में सहायक शंख ::  शंख समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह अनमोल रत्नों में से एक है। लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने के कारण इसे लक्ष्मी भ्राता भी कहा जाता है। यही कारण है कि जिस घर में शंख होता है, वहाँ लक्ष्मी का वास होता है। 
शंख पूजन का लाभ ::  शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है।  तीर्थाटन से जो लाभ मिलता है, वही लाभ शंख के दर्शन और पूजन से मिलता है। 
शंख से शिवलिंग, कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं। [ब्रह्मवैवर्त पुराण]
शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं होते।
शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंख वादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है। गोरक्षा संहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्य संहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्ती शंख को आयुर्वद्धक और समृद्धि दायक कहा गया है।
पेट में दर्द रहता हो, आंतों में सूजन हो अल्सर या घाव हो तो दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है। कालसर्प योग में भी यह रामबाण का काम करता है।
शंख से वास्तु दोष का निदान :: शंख से वास्तु दोष भी मिटाया जा सकता है। शंख को किसी भी दिन लाकर पूजा स्थान पर पवित्र करके रख लें और प्रतिदिन शुभ मुहूर्त में इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए तो घर में वास्तु दोष का प्रभाव कम हो जाता है। शंख में गाय का दूध रखकर इसका छिड़काव घर में किया जाए तो इससे भी सकारात्मक उर्जा का संचार होता है।
विश्व का सबसे बड़ा शंख केरल राज्य के गुरुवयूर के श्रीकृष्ण मंदिर में सुशोभित है, जिसकी लंबाई लगभग आधा मीटर है तथा वजन दो किलोग्राम है।
गणेश शंख :: इस शंख की आकृति भगवान श्रीगणेश की तरह ही होती है। यह शंख दरिद्रता नाशक और धन प्राप्ति का कारक है।
अन्नपूर्णा शंख :: इसका उपयोग घर में सुख-शान्ति और श्री समृद्धि के लिए अत्यन्त उपयोगी है। गृहस्थ जीवन यापन करने वालों को प्रतिदिन इसके दर्शन करने चाहिए।
कामधेनु शंख ::  इसका उपयोग तर्क शक्ति को और प्रबल करने के लिए किया जाता है। इस शंख की पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
मोती शंख ::  इस शंख का उपयोग घर में सुख और शांति के लिए किया जाता है। मोती शंख हृदय रोग नाशक भी है। मोती शंख की स्थापना पूजा घर में सफेद कपड़े पर करें और प्रतिदिन पूजन करें, लाभ मिलेगा। यदि मोती शंख को कारखाने में स्था‍पित किया जाए तो कारखाने में तेजी से आर्थिक उन्नति होती है। यदि व्यापार में घाटा हो रहा है, दुकान से आय नहीं हो रही हो तो एक मोती शंख दुकान के गल्ले में रखा जाए तो इससे व्यापार में वृद्धि होती है। यदि मोती शंख को मंत्र सिद्ध व प्राण-प्रतिष्ठा पूजा कर स्थापित किया जाए तो उसमें जल भरकर लक्ष्मी के चित्र के साथ रखा जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आर्थिक उन्नति होती है। मोती शंख को घर में स्थापित कर रोज "ॐ श्री महालक्ष्मै नम:" 11 बार बोलकर 1-1 चावल का दाना शंख में भरते रहें। इस प्रकार 11 दिन तक प्रयोग करें। यह प्रयोग करने से आर्थिक तंगी समाप्त हो जाती है।
ऐरावत शंख ::  इसका उपयोग मनचाही साधना सिद्ध को पूर्ण करने के लिए, शरीर की सही बनावट देने तथा रूप रंग को और निखारने के लिए किया जाता है। प्रतिदिन इस शंख में जल डाल कर उसे ग्रहण करना चाहिए। शंख में जल प्रतिदिन 24-28 घण्टे तक रहे और फिर उस जल को ग्रहण करें, तो चेहरा कांतिमय होने लगता है।
विष्णु शंख ::  इस शंख का उपयोग लगातार प्रगति के लिए और असाध्य रोगों में शिथिलता के लिए किया जाता है। इसे घर में रखने भर से घर रोगमुक्त हो जाता है।
पौण्ड्र शंख :: इसका उपयोग मनोबल बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग विद्यार्थियों के लिए उत्तम है। इसे विद्यार्थियों को अध्ययन कक्ष में पूर्व की ओर रखना चाहिए।
मणि पुष्पक शंख :: इसकी पूजा-अर्चना से यश कीर्ति, मान-सम्मान प्राप्त होता है। उच्च पद की प्राप्ति के लिए भी इसका पूजन उत्तम है।
देवदत्त शंख ::  इसका उपयोग दुर्भाग्य नाशक माना गया है। इस शंख का उपयोग न्याय क्षेत्र में विजय दिलवाता है। इस शंख को शक्ति का प्रतीक माना गया है। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोग इसकी पूजा कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
दक्षिणावर्ती शंख :: द्विधासदक्षिणावर्तिर्वामावत्तिर्स्तुभेदत: दक्षिणावर्तशंकरवस्तु पुण्ययोगादवाप्यते यद्गृहे तिष्ठति सोवै लक्ष्म्याभाजनं भवेत्। 
दक्षिणावर्ती शंख पुण्य के ही योग से प्राप्त होता है। यह शंख जिस घर में रहता है, वहां लक्ष्मी की वृद्धि होती है। इसका प्रयोग अर्घ्य आदि देने के लिए विशेषत: होता है। ये दो प्रकार के होते हैं नर और मादा। जिसकी परत मोटी हो और भारी हो वह नर और जिसकी परत पतली हो और हल्का हो, वह मादा शंख होता है। इसकी स्थापना यज्ञोपवीत पर करनी चाहिए। शंख का पूजन केसर युक्त चंदन से करें। प्रतिदिन नित्य क्रिया से निवृत्त होकर शंख की धूप-दीप-नैवेद्य-पुष्प से पूजा करें और तुलसी दल चढ़ाएं।
इस शंख को दक्षिणावर्ती इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जहां सभी शंखों का पेट बाईं ओर खुलता है वहीं इसका पेट विपरीत दाईं और खुलता है। इस शंख को देव स्वरूप माना गया है। दक्षिणावर्ती शंख के पूजन से खुशहाली आती है और लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ सम्पत्ति भी बढ़ती है। इस शंख की उपस्थिति ही कई रोगों का नाश कर देती है। दक्षिणावर्ती शंख पेट के रोग में भी बहुत लाभदायक है। यदि पेट मे दर्द रहता हो, आंतों में सूजन हो अल्सर या घाव हो तो दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। विशेष कार्य में जाने से पहले दक्षिणावर्ती शंख के दर्शन करने भर से उस काम के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है। शंख ध्वनि से सूक्ष्म जीवाणुओं का नाश होता है। इसके मध्य में वरूण, पृष्ठ में ब्रह्मा व अग्रभाग में गंगा का निवास है। इसके पूजन से मंगल ही मंगल और लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ सम्पत्ति भी बढ़ती है। जहां शंखनाद और शंख पूजन होता है वहां लक्ष्मी स्थायी-वास करती हैं। यही नहीं, कालसर्प योग में भी यह रामबाण का काम करता है। दक्षिणावर्ती शंख से शिवजी का अभिषेक करने से अतिशीघ्र लाभ प्राप्त होता है। विशेष कार्य में जाने से पूर्व दक्षिणावर्ती शंख के दर्शन करने से वह कार्य सिद्ध होता है।
प्रथम प्रहर में पूजन करने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। द्वितीय प्रहर में पूजन करने से धन सम्पत्ति में वृद्धि होती हैं। तृतीय प्रहर में पूजन करने से यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। चतुर्थ प्रहर में पूजन करने से सन्तान प्राप्ति होती है।
जिस घर में इस शंख का पूजन होता है, वहाँ माँ लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है। इस शंख की उत्पत्ति भी माता लक्ष्मी की तरह समुद्र मंथन से हुई है। दूसरा कारण यह है कि यह शंख श्री हरि विष्णु को अति प्रिय है, इस शंख को विधि-विधान से घर में प्रतिष्ठित किया जाए तो घर के वास्तुदोष भी समाप्त होते हैं।
हेम मुख एवं नारायण शंख में मुँह कटा नहीं होता। हेम मुख का काठिन्य या रासायनिक घनत्व इसके परिमाण क़ी तुलना में 1:2 का अनुपात रखता है। नारायण शंख भी दक्षिणावर्ती ही होता है। किन्तु इसमें पांच या इससे अधिक वक्र चाप होते हैं। पांच से कम चाप वाले को दक्षिणावर्ती शंख कहते है। इनमें से प्रत्येक शंख बिल्कुल स्वच्छ एवं शुभ्र वर्ण का होता। नारायण एवं दक्षिणावर्ती शंख बिल्कुल चिकने, बिना किसी चिन्ह एवं आयतन के अनुपात में भार साथ गुणा होता है। 
शंख के घटक तत्व अपने निर्माण में वृद्धि या ह्रास के चलते ज्यादा या अल्प प्रभाव वाले होते है। जैसे पुन्जिका शंख में प्रवाश्म (क्लोरोमेंथाज़िन) साठ प्रतिशत होता है। 
इसे घर में रखने से खाने पीने क़ी चीजो में सडन नहीं होती है. किन्तु माँस मछली या इस तरह के भोज्य पदार्थ से निकलने वाली सिलिफोनिक टेट्रा मेंडाक्लीन या ट्राईमेंथिलिकेट हाइड्राक्सायिड का रासायनिक समायोजन एसिटिक डिक्लोफेनिक एसिड, कार्बोमेंट्राजिन होजोल, पैराफ्लेक्सी मेट्रोब्रोमायिड, टरमेरिक एसिड, टार्टारिक एसिड आदि के संयोग से पुन्जिका शंख का क्लोरोमेंथाजिन फ्रोक्सोज़ोनिक गुआनायिड या फफूंद में बदल जाता है और समस्त भोज्य पदार्थ दूषित हो जाता है। चूंकि यह प्रक्रिया बहुत धीमी गति से होती है, अतः इसका अनुमान या आभास नहीं हो पाता। इसके अलावा घर में सूक्ष्म विषाणु प्रवेश नहीं पाते। मोटे शब्दों में फंगस ड़ीजीजेज या संक्रामक बीमारियों का खतरा समाप्त हो जाता है। 
इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति को घरो में इस शंख को रखना चाहिए। किन्तु किसी भी शंख को यदि घर में रखना हो तों उसे नित्य प्रति धोना पडेगा तथा उसमें पानी भर कर रखना पडेगा। 
उत्तरा के गर्भ में परीक्षित क़ी रक्षा करने के लिये भगवान् वासुदेव गर्भ में घुस कर अश्वत्थामा के तार्क्ष्य अस्त्र के प्रभाव से बचाने के लिये पुन्जिका शंख को उत्तरा के सिरहाने रख कर उसकी रक्षा करते रहे। (वायु पुराण) 
जो विषाणु उस अस्त्र से उत्पन्न हो गये थे, उन्हें भगवान अपने चक्र एवं गदा से समाप्त करते रहे और पुन्जिका शंख के प्रभाव से नए विषाणुओं का उत्पन्न होना रुक गया था।  कुंडली में नीलार्धिका या ऐसे ही दुर्योग के होने पर इस शंख का सहयोग विधान है। 
हेम मुख शंख में फेनासिलिक लिनियोडायिड अपने अन्य अवयओं के साथ उपस्थित होता है।  इसे आयुर्वेद में प्राक्दोलिक क्षार कहते हैं।यह एक बहुत ही सघन प्रभाव वाला विष एवं अनूर्जता अवरोधी पदार्थ होता है। 
वात वाहिनियो पर इसका बहुत ही अच्छा प्रभाव होता है. शिरो रोग में भी यह बहुत विकट प्रभाव दिखाता है.कुंडली में परान्जलिका, सायुज्य उल्का, भ्रान्दुप, अन्कालिक आदि दुर्योग या गुरु-शनि कृत दोष के भय के शमन हेतु इसका प्रयोग किया जाता है। 
इसे स्वच्छ पत्थर पर घिस कर सिर पर नियमित रूप से लगाने पर अर्ध कपारी जैसा दुर्गम रोग भी शांत हो जाता है। 
शुक्राचार्य अपने शिष्यों क़ी दुर्वृत्ती से सदा दुखी रहा करते थे। राक्षस माँस-मदिरा का बहुतायत में सेवन करते थे। इनके दुष्प्रभाव को रोक कर उन्हें स्वस्थ रखने के लिये शुक्राचार्य इस शंख के लेप का प्रयोग करते थे। 
दक्षिणावर्ती शंख कैल्सीफ्लेमाक्सीडीन ग्लिमोक्सिलेट का मिश्रण होता है। शरीर के चार आतंरिक अँग इससे ज्यादा प्रभावित होते हैं। 
आलिन्द-हृदय का एक भाग, प्लीहा, पित्ताशय एवं तिल्ली (Spleen)। किन्तु इसको घर में रखने से पहले बहुत एहतियात रखना पड़ता है। यह एक उच्च उत्प्रेरक होता है। 
यदि कुंडली में किसी भी तरह सूर्य एवं राहू अच्छी स्थिति में हो तों इसे घर में न रखें। अन्य स्थिति में यह सुख शान्ति दायक, मनोवृत्ती को सदा सुव्यवस्थित रखते हुए तंत्रिका तंत्र को सदिश एवं सक्रिय रखता है। 
नारायण शंख में डेकट्राफ्लेविडीन सेंथासीनामायिड जैसा यौगिक उपस्थित होते हैं। 
यह एक उच्च स्तरीय परिपोषक है। इसमें इतनी क्षमता है कि आनुवांशिक अवयवो तक को इच्छानुसार बदल सकता है। जो विज्ञान के लिये अभी अब तक एक पहेली बना हुआ है.
कुंडली में घोर विषकन्या, स्थूल मांगलिक, विषघात, एवं देवदोष जो राहू, शनि, मंगल तथा सूर्यकृत दुष्प्रभाव के कारण उत्पन्न होते है, सब दूर हो जाते हैं। 
ताम्र पट्टिका पर गोमुखी विधि से बने श्रीयंत्र के ऊपर नारायण शंख एवं पारद शिवलिंग घर में रखने से कितना क्या मिल सकता है, इसका सीमा निर्धारण कही भी नहीं प्राप्त होता है। अर्थात यह योग एक अक्षुण एवं अमोघ फल देने वाला योग माना गया है। 
शंख का धार्मिक एवम वैज्ञानिक महत्व :: अर्थवेद के अनुसार शंखेन हत्वा रक्षांसि अर्थात शंक से सभी राक्षसों का नाश होता है और यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का ह्दय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला व्यक्ति अपिक्षित है। यजुर्वेद में ही यह भी कहा गया है कि यस्तु शंखध्वनिं कुर्यात्पूजाकाले विशेषतः, वियुक्तः सर्वपापेन विष्णुनां सह मोदते अर्थात पूजा के समय जो व्यक्ति शंख-ध्वनि करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह भगवान विष्णु के साथ आनंद करता है।
प्रतिदिन शंख फूकने वाले को सांस से संबंधित बीमारियां जैसे-दमा आदि एवं फेफड़ों के रोग नहीं होते। इसके अलावा कई अन्य बीमारियों जैसे :-प्लीहा व यकृत से संबंधित रोगों तथा इन्फलूएंजा आदि में शंख-ध्वनि अत्यंत लाभ प्रद है।
शंख की ध्वनि जहाँ तक जाती है, वहाँ तक स्तित अनेक वीमारियों के कीटाणुओं के ह्दय दहल जाते हैं व मूर्छित होकर नष्ट होने लगते हैं। महाभारत में युद्ध के आरंभ, युद्ध के एक दिन समाप्त होने आदि मौकों पर शंख-ध्वनि करने का जिक्र आया है। इसके साथ ही पूजा आरती, कथा, धार्मिक अनुष्टानों आदि के आरंभ व अंत में भी शँख-ध्वनि करने का विधान है। इसके पीछे धार्मिक आधार तो है ही, वैज्ञानिक रूप से भी इसकी प्रामाणिकता सिद्ध हो चुकी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि शंख-ध्वनि के प्रभाव में सूर्य की किरणें बाधक होती हैं।
अतः प्रातः व सायंकाल में जब सूर्य की किरणें निस्तेज होती हैं, तभी शंख-ध्वनि करने का विधान है। इससे आसपास का वातावरण तता पर्यावरण शुद्ध रहता है।.
आयुर्वेद के अनुसार शंखोदक भस्म से पेट की बीमारियाँ, पीलिया, कास प्लीहा यकृत, पथरी आदि रोग ठीक होते हैं।
ऋषि श्रृंग की मान्यता है कि छोटे-छोटे बच्चों के शरीर पर छोटे-छोटे शंख बाँधने तथा शंख में जल भरकर अभिमंत्रित करके पिलाने से वाणी-दोष नहीं रहता है। बच्चा स्वस्थ रहता है। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि मूक एवं श्वास रोगी हमेशा शंख बजायें तो बोलने की शक्ति पा सकते हैं।
रूक-रूक कर बोलने व हकलाने वाले यदि नित्य शंख-जल का पान करें, तो उन्हें आश्चर्यजनक लाभ मिलेगा। दरअसल मूकता व हकलापन दूर करने के लिए शंख-जल एक महौषधि है।
हृदय रोगी के लिए यह रामबाण औषधि है। दूध का आचमन कर कामधेनु शंख को कान के पास लगाने से `ॐ' की ध्वनि का अनुभव किया जा सकता है। यह सभी मनोरथों को पूर्ण करता है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि ::
 यस्तु शंखध्वनिं कुर्यात्पूजाकाले विशेषतः, वियुक्तः सर्वपापेन विष्णुनां सह मोदते। 
पूजा के समय जो व्यक्ति शंख-ध्वनि करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और वह भगवान विष्णु के साथ आनंद करता है।
ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, पूजा के समय शंख में जल भरकर देवस्थान में रखने और उस जल से पूजन सामग्री धोने और घर के आस-पास छिड़कने से वातावरण शुद्ध रहता है। क्योकि शंख के जल में कीटाणुओं को नष्ट करने की अद्भूत शक्ति होती है। साथ ही शंख में रखा पानी पीना स्वास्थ्य और हमारी हड्डियों, दांतों के लिए बहुत लाभदायक है। शंख में गंधक, फास्फोरस और कैल्शियम जैसे उपयोगी पदार्थ मौजूद होते हैं। इससे इसमें मौजूद जल सुवासित और रोगाणु रहित हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में इसे महाऔषधि माना जाता है।
तानसेन ने अपने आरंभिक दौर में शंख बजाकर ही गायन शक्ति प्राप्त की थी। अथर्ववेद के चतुर्थ अध्याय में शंखमणि सूक्त में शंख की महत्ता वर्णित है।
अथर्ववेद के अनुसार :: शंख से राक्षसों का नाश होता है - शंखेन हत्वा रक्षांसि। भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है।
यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला व्यक्ति अपिक्षित है। गोरक्षा संहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्य संहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्ती शंख को आयुर्वद्धक और समृद्धि दायक कहा गया है।
श्रीदक्षिणामूर्ति अष्टोत्तर शतनामस्तोत्र ॥
॥ अथ ध्यानम्॥
वटवृक्ष तटासीनं योगी ध्येयाङ्घ्रि पङ्कजम्। शरश्चन्द्र निभं पूज्यं जटामुकुट मण्डितम् ॥1॥
गङ्गाधरं ललाटाक्षं व्याघ्र चर्माम्बरावृतम्। नागभूषं परम्ब्रह्म द्विजराजवतंसकम् ॥2॥
अक्षमाला ज्ञानमुद्रा वीणा पुस्तक शोभितम्। शुकादि वृद्ध शिष्याढ्यं वेद वेदान्तगोचरम्॥3॥
युवानां मन्मथारातिं दक्षिणामूर्तिमाश्रये।
॥ दक्षिणामूर्तिस्तोत्र ॥
॥ अथ दक्षिणामूर्ति अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं ॥
ॐ विद्यारूपी महायोगी शुद्ध ज्ञानी पिनाकधृत्। रत्नालङ्कृत सर्वाङ्गी रत्नमौळिर्जटाधरः॥1॥
गङ्गाधर्यचलावासी महाज्ञानी समाधिकृत्। अप्रमेयो योगनिधिर्तारको भक्तवत्सलः॥2॥
ब्रह्मरूपी जगद्व्यापी विष्णुमूर्तिः पुरातनः। उक्षवाहश्चर्मवासाः पीताम्बर विभूषणः॥3॥
मोक्षदायी मोक्ष निधिश्चान्धकारी जगत्पतिः। विद्याधारी शुक्ल तनुः विद्यादायी गणाधिपः॥4॥
प्रौढापस्मृति संहर्ता शशिमौळिर्महास्वनः। साम प्रियोऽव्ययः साधुः सर्व वेदैरलङ्कृतः॥5॥
हस्ते वह्निधरः श्रीमान् मृगधारी वशङ्करः। यज्ञनाथ क्रतुध्वंसी यज्ञभोक्ता यमान्तकः॥6॥
भक्तानुग्रह मूर्तिश्च भक्तसेव्यो वृषध्वजः। भस्मोध्दूलित सर्वाङ्गः चाक्षमालाधरोमहान् ॥7॥
त्रयीमूर्तिः परम्ब्रह्म नागराजैरलङ्कृतः। शान्तरूपो महाज्ञानी सर्व लोक विभूषणः॥8॥
अर्धनारीश्वरो देवोमुनिस्सेव्यस्सुरोत्तमः। व्याख्यानदेवो भगवान् रवि चन्द्राग्नि लोचनः॥9॥
जगद्गुरुर्महादेवो महानन्द परायणः। जटाधारी महायोगी ज्ञानमालैरलङ्कृतः॥10॥
व्योमगङ्गा जल स्थानः विशुद्धो यतिरूर्जितः। तत्त्वमूर्तिर्महायोगी महासारस्वतप्रदः॥11॥
व्योममूर्तिश्च भक्तानां इष्टकाम फलप्रदः। परमूर्तिः चित्स्वरूपी तेजोमूर्तिरनामयः॥12॥
वेदवेदाङ्ग तत्त्वज्ञः चतुःष्षष्टि कलानिधिः। भवरोग भयध्वंसी भक्तानामभयप्रदः॥13॥
नीलग्रीवो ललाटाक्षो गज चर्मागतिप्रदः। अरागी कामदश्चाथ तपस्वी विष्णुवल्लभः॥14॥
ब्रह्मचारी च सन्यासी गृहस्थाश्रम कारणः। दान्तः शमवतां श्रेष्ठो सत्यरूपो दयापरः॥15॥
योगपट्टाभिरामश्च वीणाधारी विचेतनः। मतिप्रज्ञा सुधाधारी मुद्रापुस्तक धारणः॥16॥
वेतालादि पिशाचौघ राक्षसौघ विनाशनः। राज यक्ष्मादि रोगाणां विनिहन्ता सुरेश्वरः॥17॥
॥ इति श्री दक्षिणामूर्ति अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥


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