Monday, May 26, 2014

SON पुत्र

SON पुत्र 
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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हिन्दु चाहता है कि उसके घर में पुत्र का जन्म हो, ताकि पितरों को पानी देने वाला हो जाये-उसका श्राद्ध करने वाला हो, वंश आगे बढ़े, अन्यथा पुत्र हो पुत्री, कुछ भी फर्क नहीं पड़ता। आज के समय में पिता की देखभाल पुत्री ज्यादा करती है, क्योंकि पिता से उसका स्वभाविक लगाव होता है। माँ का स्वभाविक लगाव पुत्र से ज्यादा  होता है। पिता चाहता है कि उसका वारिस हो, संपत्ति की देखभाल, बढ़ोतरी, इस्तेमाल करने वाला हो-ना कि खाने-उड़ाने, बर्बाद करने वाला। पुत्र को आज्ञाकारी, समझदार, धार्मिक, बुद्धिमान, चिंतनशील, विचारवान, शालीन, कुशाग्र बुद्धि, ईमानदार, भरोसे के लायक, सहनशील, प्रगतिशील, आध्यात्मिक होना चाहिये। शास्त्रों में पुत्र को पिता की आत्मा-स्वरुप कहा गया है
* कलयुग में पुत्र का स्वरूप ऐसा होगा, यह कहना संभव नहीं है। फिर भी उम्मीद पर दुनियां कायम है।
* हमें श्रवण कुमार की चाहत नहीं करनी चाहिये, क्योंकि उसके लिए हमें अँधा होना पड़ेगा और पुत्र को तथा स्वयं अपने  को भी अकाल मृत्यु का सामना करना पड़ेगा।
* राम जैसे  की कामना पुत्र को वनवास व स्वयं को मृत्यु प्रदान करेगी।
* प्रह्लाद ने हिरण्य कश्यप जैसे राक्षस का पुत्र होकर भी भगवत भक्ति की।
* कंस ने उग्रसेन का पुत्र होकर भी भगवान से दुश्मनी की। वास्तव में वो एक यक्ष की नाजायज संतान और पूर्व जन्म का राक्षस ही था।
* दशरथ जैसा भाग्य शाली कौन जिनके घर भगवान राम ने जन्म लिया?!
* विद्वान व्यक्ति पुत्र और शिष्य परम्परा को बनाये रखते हैं। इस अभिप्रय से पुत्र शिष्य की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है। शिष्य केवल शेष पापों से बचता है परन्तु पुत्र समस्त पापों से रक्षा कर लेता है।पुत्र का यह कर्तव्य है कि वो शास्त्रों के अनुरूप अपने माँ-बाप का ख्याल रखे, उनकी आज्ञा-इच्छाओं का पालना करे।माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी संतान को समुचित विद्या उपलब्ध करायें। उसमें उचित-अनुचित की समझ उत्पन्न करें। उसे संसार में शुद्ध-पवित्र जीवन जीने के लायक बनायें। बच्चे में शुरू से ही परमात्मा के प्रति समर्पण-भक्ति भाव, अच्छे संस्कार उत्पन्न करें। उसकी संगत का ध्यान रखें और गलत संगत से बचायें। घर में शुरू से बड़े-बूढ़ों की सेवा-सत्कार का माहौल होना चाहिये। माँ-बाप को चाहिये की वे बच्चे को गलत-अपशब्द न बोलें।समयानुसार माँ-बाप को अपना लाड़-प्यार शब्दों में भी व्यक्त करते रहना चाहिये। यह अति आवश्यक है कि बच्चे के अचानक शान्त-दुखी-गमगीन-उपद्रवी-झगड़ालू होने पर उचित ध्यान दें। उसके स्कूल-कॉलेज में आचरण का जायजा लें। घर में जब भी मौका मिले बच्चे से खुलकर बात करें। जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार उसे बिगाड़ देगा। परन्तु उसकी उचित-आवश्यक जरूरतों को पूरा करने का अपनी सीमा में रहकर भरकस प्रयास करें। 
बात-बात पर-हर वक्त बच्चे को झिड़कना-डाँटना-फटकारना नहीं चाहिए।
दूसरे-अन्य लोगों के सामने बच्चे को कभी भी नहीं डाँटना-मारना चाहिये। 
बेकसूर बच्चे को कभी भी झिड़कना-डाँटना-फटकारना-मारना नहीं चाहिए।
घर में कभी अपशब्दों-गालियों का प्रयोग न करें। 
बड़े-बूढ़ों से सम्मान पूर्वक-तहजीब से पेश आयें। उनकी जरूरतें पूरी करें। 
नशा-शराब खोरी न करें। बच्चों के सामने पराई औरतों के साथ कभी भी छेड़खानी, मजाक, हँसी ठट्ठा न करें। 
हमेशा विनम्रता पूर्वक, नम्र व मध्यम स्वर में-सभ्यता के दायरे में, बात-चीत करें। 
बच्चे के साथ मारपीट न करें और दूसरों के सामने अपनी औलाद की बुराई न करें।
अपने बच्चे की शिकायत भूलकर भी स्कूल में न करें। 
समय-समय पर बच्चे का बस्ता देखते रहें। जब वह इंटरनेट का प्रयोग करे, तो वह क्या-क्या लॉग करता है पर ध्यान दें। अवांछित लॉगिंग तुरन्त रोकें और उसे समझाएँ। 
सुबह जल्दी उठने और रात को समय से सोने की आदत डालें। देर तक अकेला जगने ने दें। उपन्यास-नोवल न पड़ने दें। टेलफोन-मोबाइल का प्रयोग केवल आवश्यकतानुसार ही करने दें। 
वक्त-वे वक्त आने वाले उसके दोस्तों पर नजर रखें और ज्यादा देर घर से बाहर रहने पर पूछताछ जरूर करें। अपने स्तर से बहुत ज्यादा ऊँचे अथवा बेहद निम्न वर्ग के लोगों से उचित बनाये रखने के लिये समझाएँ। उसकी कॉपी-किताब पढ़ाई-लिखाई सम्बन्धी आवश्यकताओं को तुरन्त पूरा करें। उसका गृहकार्य पूरा करवाएं।
 जिस विषय में वह कमजोर हो उस पर विशेष ध्यान दें। 
उसके खाने-पीने, नहाने-धोने, जगने-सोने, पर उचित और समयानुसार ध्यान दें।
उसे नियमित व्यायाम, योगासन और सैर करने को कहें।
बच्चे की मदद घर के काम-काज, बाजार, खरीदारी में लेते रहें।
अपने उम्र से बड़े लोगों से दूर रखें विपरीत लिंग से विशेषतः दूर रखें।
TWELVE TYPES OF SONS :: Rousseau, Kshetraj, Duttak, Kratrim, Gudhotpann and Apviddh. They may be considered as the ones who will perform last rites, look after deceased's wealth-property-revenue dealings, equality in the use of surname-family title, family trade-practices-profession and prestige.
Other than these six more categories are also there :: Kanin, Sgodh, Kreet, Punarbhav, swam Dutt and Parshav. They are only for the name sake and are not treated at par as far as family name -title are concerned.
(1). Aurous :: Reproduced by oneself through socially accepted-recognised marriage.
(2). Kshetraj :: Reproduced by the wife from other suitable person with the consent of the husband, without involvement of lust-sexuality-sensuality-passion, when the husband becomes impotent  insane, addicted. This practice is still prevalent in India and is called NIYOG PRATHA.
(3). Duttak :: A child adopted by the parents is called Duttak. No gifts, donations, money transactions are made in lieu of the child's adoption. 
(4). Kratrim (artificial) :: A child handed over by a friend or his son, some eminent/enlightened person is kratrim.
(5). Gooddh :: A child about whom no one knows that who brought him into the family fold-house.
(6). Apviddh :: Child brought one himself from out side-elsewhere.
(7). Kanin :: A child born out of an unmarried girl.
(8). Sgodh :: A child born out of a pregnant girl after marriage.
(9). Kreet :: A child bought after by paying money.
(10). Punarbhav :: He may be of two types :- (10.1). The son born out of the daughter/girl married to one person and snatched from him and married to some one else. The child born from the first person-husband.after the child is born. (10.2). The girl is married to one person, snatched forcibly and married to some one else. The child is born from the second husband-person.
(11). Swayam Dutt :: If a person/child offers himself to a person due to famine/drought  or some unavoidable circumstances due to the scarcity of food grain-eatables-money, he is Swayam Dutt.
(12). Parshav :: A child born of a Shudr  married-unmarried girl by a Brahmn. 
बारह प्रकार के पुत्र :: औरस, क्षेत्रज, दत्त, कृत्रिम, गूढोत्पन्न और अपविद्ध-ये छ: पुत्रों से ऋण, पिण्ड, धन की क्रिया, गोत्र साम्य, कुल वृति और प्रतिष्ठा रहती है।

 इनके अतिरिक्त कानीन, सगोढ़, क्रीत, पौनर्भव, स्वयं दत्त और पार्शव -इनके द्वारा ऋण एवं पिंड आदि का कार्य नहीं होता-ये केवल नामधारी होते हैं व गोत्र एवं कुल से सम्मत नहीं होते।
(1). औरस :: अपने द्वारा उत्पन्न किया गया पुत्र। 
(2). क्षेत्रज :: पति के नपुंसक, पागल-उन्मत्त या व्यसनी होने पर उसकी आज्ञा से काम वासना रहित पत्नी द्वारा उत्पन्न पुत्र। 
(3). दत्तक :: गोद लिया हुआ, माता-पिता द्वारा दूसरे को दिया गया-इसके एवज में कोई धन, अनुग्रह, प्रतिकार नहीं प्राप्त किया गया हो।
(4). कृत्रिम :: श्रेष्ठजन, मित्र के पुत्र और मित्र द्वारा दिए गया पुत्र।
(5). गूढ़: वह पुत्र जिसके विषय में यह ज्ञान न हो कि वह  गृह में किसके द्वारा लाया गया।
(6). अपविद्ध :: बाहर से स्वयं लाया गया पुत्र।
(7). कानीन :: कुँवारी कन्या से उत्पन्न पुत्र।
(8). सगोढ़ :: गर्भिणी कन्या से विवाह के बाद उत्पन्न पुत्र।
(9).  क्रीत :: मूल्य देकर ख़रीदा गया पुत्र।
(10). पुनर्भव :: यह दो प्रकार का होता है-एक कन्या को एक पति के हाथ में देकर, पुन: उससे छीन कर दूसरे के हाथ में देने से जो पुत्र उत्पन्न होता है।
(11). स्वयंदत्त :: दुर्भिक्ष-व्यसन या किसी अन्य कारण से जो स्वयं को किसी अन्य के हाथ में सोंप दे। 
(12). पार्शव :: व्याही गई या क्वाँरी अविवाहिता शूद्रा के गर्भ से ब्राह्मण का पुत्र।



(1). ज्ञात वंशावली :: गौड़ ब्राह्मण। गौत्र :- भरद्वाज (हरसानियाँ दुबे), शाखा :- मारद्वन्द्विनी, निकास :- अटारी (गुड़गाँव-गुरु गाँव), अटारी से माला गढ़-बुलन्दशहर, माला गढ़ से सिलारपुर-नोयडा, सिलारपुर से सलैमपुर (ककोड़)। सिलारपुर से शादी बाबा सलैमपुर पहुँचे। शादी बाबा के 3 पुत्र हुए :- रामस्वरूप, जियाराम, फूली। रामस्वरूप के 4 पुत्र हुए :- हरगुलाल, शिवलाल, रतनलाल, दाताराम। हरगुलाल के औलाद नहीं थी। शिवलाल के 3 पुत्र थे :: विद्या भूषण, राधे श्याम और कर्ण सिंह-मदन मोहन। विद्या भूषण के 5 पुत्र हुए :- संतोष कुमार, विनोद कुमार, देवेश कुमार, दिनेश कुमार और राजेश तथा एक लड़की जो सबके बड़ी है :- आशा कुमारी। सन्तोष का पुत्र :- प्रशान्त और प्रशान्त का पुत्र विराज। बड़ी बेटी है नाम है वेदा। 
(1.2). पण्डित रामस्वरूप महज 26 वर्ष  के थे के थे जब वे परमात्मा को प्यारे हुए। उनके 4 लड़के प. हरगुलाल, शिव दयाल, रतनलाल, दाता राम और एक लड़की चमेली थी। प. हरगुलाल फ़ौज में केवल 11-12 की उम्र में भर्ती हुए और हवलदार के तौर पर 102  देशों की यात्रा की। फ़ौज में ही लिख-पढ़ गए। उनकी पत्नी  का देहान्त बहुत कम उम्र में हो गया। रिटायरमेंट के बाद वे सिकंद्राबाद की कचहरी में नौकरी पर लग गए। उन्होंने अपने भाई शिव दयाल के बड़े पुत्र को अपने साथ रख सिकंद्राबाद में पढ़ाया। रतल लाल भी कम उम्र में चल बसे। पo हर गुलाल के मृत शरीर का अँगूठा लगाकर दाताराम ने उनकी 27 बीघे जमीन और बैठक हथिया ली। दाताराम ने पहले भी रतनलाल की बहू राजवती के गहने चुराए थे। दाता राम ने बँटवारे में शिवदयाल को घर का कुछ नहीं दिया और सभी कुछ हड़प लिया। शिवदयाल का छोटा बेटा कामचोर, नकारा था। भाईयों की जायदाद अपने नाम  था कराना चाहता था जो हो नहीं पाई। पo शिव दयाल के बड़े पुत्र विद्या भूषण बेहद मेहनती, ईमानदार थे। उन्होंने अपने छोटे भाई राधे श्याम को अपने बच्चों की कीमत पर पढ़ाया-लिखाया। राधेश्याम  ईमानदार, अच्छे, मेहनती इन्जीनियर, मगर अविवेकी व्यक्ति रहे। पo विद्या भूषण का छोटा बेटा निकम्मा-नालायक बेटा भी बेहद बेईमान, मक्कार साबित हुआ। उसने अपने पिता की सारी सम्पत्ति नकली वसीयत  के जरिये  कब्जे में कर रक्खी है। उसकी बड़ी बहन और भांजा भी पूरी तरह इस षड्यंत्र में शामिल हैं। जहाँ बड़े भाई बेहद ईमानदार, मेहनती थे, वहीं सबसे छोटे काहिल, कामचोर और बेईमान।
(2). बंसी की वंशी सही बज रही है, मगर फिर भी वो चाहता है कि माँ-बाप बड़ा मकान उधार के धन से ले लें। 12 लाख महीने का कमाता है। उसका कहना है कि 27 साल की में वो अपने चाचा-ताऊओं के बच्चों से ज्यादा कमाता है। फिर भी वो असंतुष्ट-नाखुश है और अकारण अपने माँ-बाप को परेशान किये हुए है। नई गाड़ी किश्तों पर ले ली है। बहन पढ़ रही है। उसकी शादी को भी पैसा चाहिये। पिता रिटायर होने को है। माँ भी बहुत ज्यादा दिन नौकरी नहीं कर पायेगी। दादा का सारा धन और सम्पति चाचा और बुआ ने लूट लिया। चाचा के नालायक बच्चे सवा करोड़ की गाड़ी में चलते देखता है तो आक्रोश स्वभाविक है, जो माँ-बाप पर ही निकलता है।स्वभाव का बहुत अच्छा है। किसी काम को मना नहीं करता। ताऊ की लड़की की शादी में जी-जान से मदद की, परन्तु बड़ाई-प्रसंशा के दो बोल भी सुनने को नहीं मिले। क्या ही अच्छा हो कि वो वस्तु-स्थिति को भी समझने लगे!
सन्तान :: पूर्व जन्मों के कर्मों से ही इस जन्म में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नि, प्रेमी-प्रेमिका, मित्र-शत्रु, सगे-सम्बन्धी इत्यादि संसार के जितने भी रिश्ते नाते हैं, मिलते हैं; क्योंकि इन सबका परस्पर कुछ लेना-देना होता है।
सन्तान के रुप में सामान्यतया कोई पूर्वजन्म का  कोई सम्बन्धी ही आकर जन्म लेता है, जिसे शास्त्रों में चार प्रकार से बताया गया है :-
(1). ऋणानुबन्ध :- पूर्व जन्म का कोई ऐसा जीव जिससे ऋण लिया हो या उसका किसी भी प्रकार से धन नष्ट किया हो, वह घर में सन्तान बनकर जन्म लेगा और धन बीमारी में या व्यर्थ के कार्यों में तब तक नष्ट करेगा, जब तक उसका हिसाब पूरा ना हो जाये।
(2). शत्रु पुत्र :- पूर्व जन्म का कोई दुश्मन बदला लेने के लिये घर में सन्तान बनकर आयेगा और बड़ा होने पर माता-पिता से मारपीट, झगड़ा या उन्हें सारी जिन्दगी किसी भी प्रकार से सताता ही रहेगा। हमेशा कड़वा बोलकर उनकी बेइज्जती करेगा व उन्हें दुःखी रखकर खुश होगा।
(3). उदासीन पुत्र :- इस प्रकार की सन्तान ना तो माता-पिता की सेवा करती है और ना ही कोई सुख देती है। बस, उनको उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ देती है। विवाह होने पर यह माता-पिता से अलग हो जाते हैं।
(4). सेवक पुत्र  :- पूर्व जन्म में यदि किसी की खूब सेवा की है तो वह अपनी की हुई सेवा का ऋण उतारने के लिए पुत्र या पुत्री बनकर आता है और सेवा करता है। अपने माँ-बाप की सेवा की है, तो ही औलाद बुढ़ापे में सेवा करेगी, वर्ना कोई पानी पिलाने वाला भी पास नहीं होगा।
इन चार प्रकार में कोई सा भी जीव आ सकता है  जैसे किसी गाय की निःस्वार्थ भाव से सेवा की है तो वह भी पुत्र या पुत्री बनकर आ सकती है। यदि आपने गाय को स्वार्थ वश पालकर उसको दूध देना बन्द करने के पश्चात घर से निकाल दिया तो वह ऋणानुबन्ध पुत्र या पुत्री बनकर जन्म लेगी। यदि किसी निरपराध जीव को सताया है तो वह जीवन में शत्रु बनकर आयेगा और बदला लेगा।

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