Friday, May 23, 2014

SIGNIFICANT NUMERALS महत्वपूर्ण संख्याएँ

SIGNIFICANT  NUMERALS महत्वपूर्ण संख्याएँ 

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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SIGNIFICANCE OF 1 का महत्त्व :: परमात्मा एक है। उसे भगवान्, ईश्वर, अल्लाह, खुदा, रब, परमेश्वर, Almighty, God जैसे नामों से जाना जाता है।
ब्रह्मा जी का एक दिन :: 1  कल्प 
SIGNIFICANCE OF 2 का महत्त्व :: 
परमात्मा के 2 रूप हैं :- व्यक्त और अव्यक्त, साकार और निराकार।
दो पक्ष :: कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष।  
SIGNIFICANCE OF 3 का महत्त्व :: 
त्रिदेव :- भगवान् ब्रह्मा, भगवान् विष्णु और भगवान् महेश (शिव)। 
त्रिदेवियाँ :- सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती। 
त्रेय ऋषि :- अंगिरा, वृहस्पति और भारद्वाज। Angira, Vrahaspati and Bhardwaj. 
त्रिलोक :- स्वर्ग, पृथ्वी व नर्क। 
त्रिवेणी :- माँ गँगा, माँ  यमुना और माँ सरस्वती। 
त्रिकाल :- भूत , भविष्य और वर्तमान। 
त्रिगुण :- सत्व, ऱज और तम। सात्विक, राजसिक, तामसिक। 
त्रिदोष :- पित्त, कफ़ और वात। 
तीन ऋण :: देव ऋण , पितृ ऋण और ऋषि ऋण।  
तीन मल ::  (1). पुरीष, (2). मूत्र और (3). स्वेद। 
त्रिविधि बंधन TRIPLE BOND :: (1).  ब्रह्म ग्रन्थि, (2).  विष्णु ग्रन्थि और  (3).  रुद्रग्रन्थि। 
तीन योनियाँ :- सुर, असुर और मनुष्य। 
तीन शरीर :: भौतिक, सूक्ष्म और कारण शरीर। 
तीन व्याह्रतियाँ :: सृष्टि से पूर्व ब्रह्मा जी ने स्वयं ज्ञान देह से "भू: र्भुवः स्वः" कहा-इसलिए यह ब्रह्म स्वरूप है। इसी कारण 'ऊँ' के पश्चात् गायत्री मन्त्र के आदि में ही इन्हें लगाया जाता है। 
(1). गायत्री मन्त्र में ऊँकार के पश्चात् - भूः भुवः स्वः - यह तीन व्याह्रतियाँ आती हैं। व्याह्रतियों का यह त्रिक् अनेकों बातों की ओर संकेत करता है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीन उत्पादक, पोषक, संहारक शक्तियों का नाम भूः भुवः स्वः है। सत, रज,तम इन तीन गुणों को भी त्रिविध गायत्री कहा गया है। भूः को ब्रह्म, भुवः को प्रकृति और स्वः को जीव भी कहा जाता है।
(2). अग्नि, वायु और सूर्य इन तीन प्रधान देवताओं का भी प्रतिनिधित्व यह तीन व्याह्रतियाँ करती हैं। तीनों लोकों का भी इनमें संकेत है। एक ऊँ की तीन संतान हैं- भूः भुवः स्वः।
(3). व्याह्रतियों में से तीनों वेदों का आविर्भाव हुआ। इस प्रकार के अनेकों संकेत व्याह्रतियों के इस त्रिक् में भरे हुये हैं । उन संकेतों का सार हमें सत्य, प्रेम और न्याय ही प्रतीत होता है।
(4). भूः विष्णु भगवान हैं तथा भुवः लक्ष्मी जी हैं, उन दोनों का दास स्वः रूपी जीव है।
(5). वेदों का सार उपनिषद है। उपनिषदों का सार गायत्री, गायत्री का सार "भूर्भुवः स्वः" ये तीन व्याह्रतियाँ हैं। 
गन्धत्रय :- सिन्दूर, हल्दी, कुंकुम। 
त्रिधातु :- सोना, चाँदी, लोहा। कुछ आचार्य सोना, चांदी और तांबे के मिश्रण को भी त्रिधातु कहते हैं। 
FIRE अग्नि तीन प्रकार की है :- (1). पिता गार्हपत्य अग्नि हैं, (2). माता दक्षिणाग्नि मानी गयी हैं और (3). गुरु आहवनीय अग्नि का स्वरूप हैं॥ वेद॥ 
Garhpaty Agni is a type of fire. Veds describe fire by the name of father, mother and the Guru-teacher.
तीन प्रकार के प्रमुख श्राद्ध :: नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य श्राद्ध ।[मत्स्य पुराण]
SIGNIFICANCE OF 4 का महत्त्व :: 
चार युग :: सत युग, त्रेता युग, द्वापर युग और कलियुग।   
चारपीठ :: शारदा पीठ (द्वारिका), ज्योतिष पीठ (जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धन पीठ (जगन्नाथपुरी) और शृंगेरीपीठ। 
चार वेद :: ऋग्वेद, अथर्वेद, यजुर्वेद और सामवेद।  
परमात्मा अवतार में 4 मूर्तियों में प्रकट होते हैं :- (1). राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघन। 
(2). कृष्ण, बलराम, प्रद्युम्न जी और अनिरुद्ध जी। 
4 धाम :- बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी और रामेश्वरम।  
4 धाम यात्रा :- गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ। 
4 आश्रम :- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास। 
चतुर्भुज :- भगवान् श्री हरी विष्णु। 
4 वर्ण :- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र। 
अंतःकरण के चार अंग :: मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार।  
यज्ञ के 4 अंग ::  'स्नान', 'दान', 'होम' तथा 'जप'। 
यज्ञ में 4 आधार ::  (1). व्यक्ति, (2). अग्नि, (3). वाणी और (4). चरु। 
जप करने की विधियाँ वैदिक मन्त्र का जप करने की चार विधियाँ :: (1). वैखरी, (2). मध्यमा, (3). पष्चरी और (4). परा शुरु।  
चार प्रकार के द्रव्यों की आहुतियाँ :: अग्निहोत्र में अग्नि में आहुत किये जाने वाले चार प्रकार के द्रव्यों की आहुतियाँ :- (1). गोधृत व केसर, कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थ, (2). मिष्ट पदार्थ शक्कर आदि, (3). शुष्क अन्न, फल व मेवे आदि तथा (4). ओषधियाँ व वनस्पतियाँ जो स्वास्थ्यवर्धक होती हैं।
SIGNIFICANCE OF 5 का महत्त्व :: 
5 ज्ञानेंद्रिय :- श्रोत-Ears,  त्वक्-Skin, चक्षु-Eyes,  रसन-Tongue एवं  घ्राण-Nose। 
5 कर्मेन्द्रिय :-  वाक् (वाणी)-Speech, हस्त-Hands, उपस्थ-Pennies, गुदा-Anus एवं पाद (पैर)-Legs.  
PANCH BHUT-TATV पञ्च तत्व-भूत  :: These five elements  are (1). Earth or Prathvi, पृथ्वी, (2). Water or Jal, जल, (3). Fire-Tej or Agni, अग्नि, (4). Air or Vayu, वायु and (5). Ether or Akash, आकाश। 
पंच तत्त्व :: पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु  और आकाश।  
पञ्च प्राण :: हिन्दु योग एवम दर्शन ग्रंथों में मुख्य प्राण पञ्च बताए गए हैं। इसके आलावा उपप्राण भी पाँच बताये गए हैं। पाँच प्राणों के नाम इस प्रकार हैं। (1). प्राण, (2). अपान, (3). समान, (4). उदान और (5). व्यान। 
(1). प्रधान वायु :-
(1.1). प्राण :: निवास स्थान-ह्रदय; श्र्वास को बाहर निकालना, खाये हुए अन्न को पचाना। 
(1.2). अपान :: निवास स्थान-गुदा; श्र्वास को अंदर ले जाना,मल-मूत्र को बाहर निकालना, गर्भ को बाहर निकालना। 
(1.3). समान :: निवास स्थान-नाभि; पचे हुए भोजन को समस्त अंगो, ऊतकों, कोशिकाओं तक ले जाना। 
(1.4). उदान :: निवास स्थान-कण्ठ; भोजन के गाढ़े और तरल भाग को अलग-अलग करना, सूक्ष्म शरीर को बाहर निकालना, दूसरे शरीर या लोक में ले जाना। 
(1.5). व्यान :: निवास स्थान-सम्पूर्ण शरीर; शरीर के सम्पूर्ण अंगों को सिकोड़ना और फैलाना। 
(2). उप प्रधान वायु :- 
(2.1). नाग :: कार्य-डकार लेना। 
(2.2). कूर्म :: कार्य-नेत्रों को खोलना और बन्द करना। 
(2.3). कृकर :: कार्य-छींकना। 
(2.4). देवदत्त :: कार्य-जम्हाई लेना।  
(2.5). धनंजय :: कार्य-मृत्यु के बाद शरीर को फुलाना।  

पञ्च प्राणमय कोष :: आत्मा के 5  कोष हैं। अन्नमय, मनोमय, प्राणमय,विज्ञानमय और आनंदमय। ये पाँचों आत्मा के आवरण है और आत्मा की शक्ति से ही अस्तित्व में रहते हैं। प्राण एक ऐसी ऊर्जा है, जिससे सभी जीवधारी प्राणी जीवन पाते हैं। शरीर को चलाने के कारण इसको जीवनी शक्ति भी कहा जाता है।  प्राण शरीर को स्वस्थ रखता है, कार्य की द्रष्टि से इसके 5 भाग हैं जिनको पञ्च प्राण कहा जाता है। नासिका से ह्रदय तक प्राण वायु, ह्रदय से नाभि तक  समान वायु, नाभि से पैर तक अपान वायु, गर्दन से सिर तक उदान वायु व सम्पूर्ण शरीर में फैली है व्यान वायु। ये वायु इन  सम्बंधित अंगों को  बल देती रहती है। इनमें से जब किसी प्राण  की शक्ति कम होती है तब वहाँ बीमारी आती है। प्राण को बढाने के लिए योग में प्राणायाम का वर्णन किया गया है। यही प्राण मन व इंद्रियों को गति देने का कार्य करता है। ये प्राण  बड़ा शक्तिशाली  है, जब  तक ये शरीर के साथ होता है, जीवन रहता है, लेकिन जैसे ही ये अपनी शक्तियों को शरीर से समेटकर शरीर का साथ छोड़ देता है, उस अवस्था को मृत्यु  कहा जाता है। प्राण जन्म देने  में भी उतना ही सहायक है, जितना मृत्यु  में। इसकी शक्ति को देखते हुए कई बार इस प्राण को ही आत्मा समझ लिया जाता है, जबकि  ये तो आत्मा का एक कोष (आवरण) है। उपनिषदों में प्राण को आत्मा की छाया  कहा है।  
पञ्चमहायज्ञ ::
अध्यापनं ब्रह्मयज्ञ:पितृ यज्ञस्तु तर्पणम्। होमो दैवो बलिभौर्तो नृयज्ञोSतिथिपूजनम्॥मनु स्मृति 3.70॥  
पितरों का तर्पण करना, वेद का पठन-पाठन, ब्रह्मयज्ञ, पितृयज्ञ, देवयज्ञ, होम करना, जीवों को अन्न की बलि देना और नृयज्ञ अतिथि का आदर-सत्कार करना ये ही पञ्चमहायज्ञ हैं। 
Teaching & learning of Veds, sacrifice to the manes, Brahmn Yagy, Pitr Yagy, Dev Yagy, offering grains-meals to organism (insects like ants, animals like cows, dogs etc.) welcoming-hospitality to the guest and offering food and drinks and the offerings to the deceased are 5 types of oblations (बलि, आहुति, नैवेद्य, हव्य, बलिदान, यज्ञ, क़ुरबानी; holocaust, immolation, offering, sacrifice, a thing presented or offered to God or a demigods).
पञ्चयज्ञ :: 
अहुतं च हुतं चैव तथा प्रहुतमेव च। ब्राह्मयंहुतं प्राशितं  च पञ्चयज्ञान्प्रचक्षते॥3.73 
अहुत, हुत, प्रहुत, ब्राह्मयहुत और प्राशित, ये पञ्चयज्ञ कहलाते हैं। 
Ahut, Hut, Prahut, Brahmyhut and Prashit are called 5 kinds of Yagy-sacrifices.
पड्चांग :- किसी वनस्पति के पुष्प, पत्र, फल, छाल और जड़। 
पञ्चतन्मात्रा (Panch Tan Matra) :: पञ्चतन्मात्रा  शब्द-word-sound-speech, created by mouth , स्पर्श-touch, experience through skin, रूप-shape-size-form perceived through eyes, रस-juice-extract experience through tongue, गंध-smell-scent, experienced through nose का विशेष महत्व उल्लेखित है और इसे इन्द्रियों का विषय माना गया है। 
पंचोपचार :- गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, तथा नैवेद्य द्वारा पूजन करने को “पंचोपचार“ कहते हैं।
पंचामृत Panchamrat:- दूध, दही, घृत, मधु (शहद) तथा शक्कर इनके मिश्रण को “पंचामृत“ कहते हैं।Its is a  mixture of cow's urine, milk, curd and Ghee with honey. गाय के दूध, दही, घी और गौ मूत्र के साथ शहद का मिश्रण पंचमत्र कहलाता है। 
यज्ञ के पाँच प्रकार :: लोक क्रिया, सनातन, गृहस्थ, पंचभूत और मनुष्य। 
गृहस्थ धर्म के यज्ञ :: (1). ब्रह्मयज्ञ, (2). देवयज्ञ, (3). पितृयज्ञ, (4). वैश्वदेवयज्ञ-भूतयज्ञ-पञ्चबलि, (4.1). गोबलि, (4.2). कुक्कुरबलि, (4.3). काकबलि, (4.4). देवबलि एवं (5). अतिथि यज्ञ-मनुष्य यज्ञ-श्राद्ध संकल्प। 
Panch Gavy पंचगव्य :- गाय के दूध, घृत, मूत्र तथा गोबर इन्हें सम्मिलित रूप में “पंचगव्य“ कहते है।
Its  a concoction prepared by mixing five products from viz. Cow's dung, urine, milk, curd and ghee.
पंच कर्म :: (1). संध्योपासन, (2). उत्सव, (3). तीर्थ यात्रा, (4). संस्कार  और  (5). धर्म।  
पांच तरह के यज्ञ :: (1). ब्रह्मयज्ञ, (2). देवयज्ञ, (3). पितृयज्ञ, (4). वैश्वदेव यज्ञ, (5). अतिथि यज्ञ।
पंचयज्ञ :: 
एकमप्याशयेद्विप्रं पित्रर्थे पञ्चयज्ञिके। न चैवात्रशयेत्किंञ्चिद्वैश्र्वदेवं प्रति द्विजम्॥मनु स्मृति: 3.83
पंचयज्ञ के अन्तर्गत पितृ के निमित्त एक ब्राह्मण को अवश्य भोजन करावे, पर वैश्य देव के निमित्त ब्राह्मण को भोजन कराने की आवश्यकता नहीं है। 


Under the procedure of Pitr Yagy, the house hold must offer food to one Brahmn for the satisfaction of the manes. For the sake of Vaeshy Dev there is no such compulsion.
पंचधातु :- सोना, चाँदी, लोहा, तांबा और जस्ता। 
वात दोष के पांच भेद :: (1). समान वात, (2).  व्यान वात, (3). उदान वात, (4). प्राण वात और (5). अपान वात हैं।वात दोष को  वायु दोष भी कहते हैं।
पित्त दोष के पांच भेद होते हैं :: (1). पाचक पित्त, (2). रंजक पित्त, (3). भ्राजक पित्त, (4). लोचक पित्त और (5). साधक पित्त। 
इसी प्रकार कफ दोष के पांच भेद होते हैं :: (1). श्लेष्मन कफ, (2). स्नेहन कफ, (3). रसन कफ, (4). अवलम्बन कफ और (5). क्लेदन कफ। 
पंचायतन पूजा :- पंचायतन पूजा में पाँच देवताओं "विष्णु, गणेश, सूर्य, शक्ति तथा शिव" का पूजन किया जाता है। 
प्रकार की साधना :-
(1). अभाविनी :- पूजा के साधना तथा उपकरणों के अभाव से, मन से अथवा जलमात्र से जो पूजा साधना की जाती है, उसे अभाविनी कहते हैं। 
(2). त्रासी :- जो त्रस्त व्यक्ति तत्काल अथवा उपलब्ध उपचारों से या मानसापचारों से पूजन करता है, उसे त्रासी कहते हैं। यह साधना समस्त सिद्धियाँ देती है। 
(3). दोर्वोधी :- बालक, वृद्ध, स्त्री, मूर्ख अथवा ज्ञानी व्यक्ति द्वारा बिना जानकारी के की जानी वाली पूजा दाबांधी कही जाती है। 
(4). सौतकी :- सूत की व्यक्ति मानसिक सन्ध्या करा कामना होने पर मानसिक पूजन तथा निष्काम होने पर सब कार्य करें। ऐसी साधना को भौतिकी कहा जाता है। 
(5). आतुरो :- रोगी व्यक्ति स्नान एवं पूजन न करें। देव मूर्ति अथवा सूर्यमण्डल की ओर देखकर, एक बार मूल मन्त्र का जप कर उस पर पुष्प चढ़ायें। फिर रोग की समाप्ति पर स्नान करके गुरू तथा ब्राम्हणों की पूजा करके पूजा विच्छेद का दोष मुझे न लगें-ऐसी प्रार्थना करके विधि पूर्वक इष्ट देव का पूजन करे तो इस साधना को आतुर कहा जाएगा। अपने श्रम का महत्व- पूजा की वस्तुएं स्वयं लाकर तन्मय भाव से पूजन करने से पूर्ण फल प्राप्त होता है तथा अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गए साधनों से पूजा करने पर आधा फल मिलता है। 
पांच प्रकार के श्राद्ध ::  नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण श्राद्ध।[यमस्मृति] 
छह दर्शन :: वैशेषिक, न्याय, सांख्य, योग, पूर्व मिसांसा, दक्षिण मिसांसा।  
SIX TYPES OF FIRE अग्नि के 6 प्रकार :: जैमिनी ने मीमांसासूत्र के "हवि:प्रक्षेपणाधिकरण" में अग्नि के (1). गार्हपत्य, (2). आहवनीय, (3). दक्षिणाग्नि, (4). सभ्य, (5). आवसथ्य और (6). औपासन छ: प्रकार  हैं। 
तर्पण को छः भागों में विभक्त किया गया है :: (1). देव-तर्पण, (2). ऋषि-तर्पण, (3). दिव्य-मानव-तर्पण, (4). दिव्य-पितृ-तर्पण, (5). यम-तर्पण और (6). मनुष्य-पितृ-तर्पण।  
SIGNIFICANCE OF 7 का महत्त्व :: 
7 SEAS सप्तद्वीप :: (1). जम्बूद्वीप, (2). प्लक्षद्वीप, (3). शाल्मलद्वीप, (4). कुशद्वीप, (5). क्रौंचद्वीप ,(6). शाकद्वीप और (7). पुष्करद्वीप। 
7 PILGRIMAGE-DIVINE CITIES सप्त पुरियाँ :: (1). अयोध्या, (2). मथुरा। (3). माया (हरिद्वार), (4). काशी, (5). कांची, (6). अवंतिका (उज्जयिनी) और (7). द्वारका। 
7 OCEANS  सप्त सागर :: (1). खारे पानी का सागर, (2). इक्षुरस का सागर, (3). मदिरा का सागर, (4). घृत का सागर, (5). दधि का सागर, (6). दुग्ध का सागर और (7). मीठे जल का सागर। 
7 DIVINE RIVERS सप्त नदी :: (1). गंगा, (2). गोदावरी, (3). यमुना, (4). सिंधु, (5). सरस्वती, (6). कावेरी और (7). नर्मदा। 
7 SAGES सप्त ऋषि :: (1). केतु, (2). पुलह, (3). पुलस्त्य, (4). अत्रि, (5). अंगिरा, (6). वशिष्ट और (7). मारीचि। OR THE NAMES DIFFER IN DIFFERENT KALP-BRAHMA JI'S DAY.
सप्त ऋषि :: विश्वामित्र, जमदाग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्री, वशिष्ठ और कश्यप!
7 DAYS सप्त दिवस :: (1). सोमवार, (2). मंगलवार, (3). बुधवार, (4). गुरुवार, (5). शुक्रवार, (6). शनिवार और (7). रविवार। 
7 PLANETS सप्त ग्रह :: (1). सूर्य, (2). चन्द्र, (3). मंगल, (4). बुध, (5). ब्रहस्पति, (6). शुक्र और (7). शनि। 
7 ABODES सप्त लोक :: (1). अतल, (2). वितल, (3). नितल, (4). गभस्तिमान, (5). महातल, (6). सुतल और (7). पाताल। 
7 DIMENSIONS सप्त आयामों ::  शास्त्रों में सप्त लोक, सप्त ऋषि, सप्त देवियाँ, सप्त नगरी, सप्त रंग, सूर्य की सप्त किरणें, सप्त घोड़ों का वर्णन विस्तारपूर्वक किया गया है। उपरोक्त सात समूह वस्तुतः चेतना की सात परतें, सात आयाम हैं-जिनका आलंकारिक वर्णन इन रूपों में किया गया है।
सामान्यतया तीन आयाम तक ही मनुष्य का बोध क्षेत्र है। लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई या गहराई के अंतर्गत समस्त पदार्थ सत्ता का अस्तित्व है। इन्द्रियों की बनावट भी कुछ ऐसी है कि वह मात्र तीन आयामों का अनुभव कर पाती है :- लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई जो भी पदार्थ स्थूल नेत्रों को दृष्टिगोचर होते हैं, उनके यही तीन परिमाण हैं। इसके पश्चात् चतुर्थ, पंचम, षष्ठ, सप्तम आयाम कितना विलक्षण एवं शक्ति-सम्पन्न है।
चतुर्थ आयाम अनेक रहस्य अपने अन्दर छिपाये हुए है और जिज्ञासुओं को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। योगियों का अदृश्य हो जाना, कुछ पलों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँच जाना, संभवतः चतुर्थ आयाम में पहुँचकर ही संभव हो सका होगा।  चतुर्थ आयाम जानकारी हमारे ऋषियों को अति प्राचीन-आदि काल से ही है।
इसका बोध होते ही ज्ञान का एक अनंत क्षेत्र खुल सकता है। तब यह संसार भिन्न रूप में दिखाई पड़ने लगता है। उन मान्यताओं को जिन्हें हम सत्य यथार्थ मानते हैं, संभव है भ्रांति मात्र लगने लगे। अनुसार काल को भूत, वर्तमान, भविष्य की सीमाओं से नहीं बाँधा जा सकता है। 
पाँचवाँ आयाम विचार जगत् से संबंधित है। विचारों के माध्यम से वस्तुओं के स्वरूप की कल्पना की जाती है। विचार जगत् में उठने वाली तरंगें वातावरण एवं मनुष्यों को प्रभावित करती हैं तथा अपने अनुरूप लोगों को चलने के लिए बाध्य करती हैं।
पंचम आयाम की रहस्यमय शक्ति को जानने एवं उसको करत लगत कर सदुपयोग करने से ही बड़ी-बड़ी आध्यात्मिक क्रान्तियाँ संभव हो सकी हैं। कन्दरा में बैठे ऋषि एक स्थान पर बैठकर अपने विचारों को पंचम आयाम में प्रस्फुटित करते रहते हैं तथा अभीष्ट परिवर्तन कर सक ने में समर्थ होते हैं।
छठा आयाम भावना जगत् है। इस लोक में मात्र देवता निवास करते हैं। इस आलंकारिक वर्णन में एक तथ्य छिपा है कि भावों में ही देवता निवास करते हैं अर्थात् भाव सम्पन्न व्यक्ति देव तुल्य हैं। भावना की शक्ति असीम है।
आत्मा का परमात्मा से मिलन कितना आनन्ददायक होता है-इसका अनुमान भौतिक मनः स्थिति द्वारा लगा सकना संभव नहीं है। तत्त्वज्ञानी उसी आनन्द की मस्ती में डूबे रहते हैं तथा जन-मानस को उसे प्राप्त करने की प्रेरणा देते रहते हैं।
तुलसीदास जड़-चेतन सबमें परमात्म सत्ता का अनुभव करते हुए लिखते हैं-
सीयराम मय सब जग जानी। ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्यां जगत्।
ईशावास्योपनिषद् तथा रामायण के इस उद्धरण में अद्वैत स्थिति का वर्णन किया गया है। सप्तम आयाम की यही स्थिति है। इसमें पहुँच ने पर जड़-चेतन में विभेद नहीं दिखता। सर्वत्र एक ही सत्ता दृष्टिगोचर होती है।
शिव-शक्ति का, ब्रह्म-प्रकृति का, जड़-चेतन का, जीव-ब्रह्म की एकरूपता सातवें आयाम में दिखाई पड़ ने लगती है। इसी को ब्राह्मी स्थिति कहते हैं। इसे प्राप्त करने के बाद कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहता। सातवें आयाम का ही वर्णन लोक के रूप में किया गया है।
सात लोकों का अस्तित्व मनुष्य के इर्द-गिर्द एवं भीतर बाहर स्थित है। उसमें से इन्द्रियों एवं यंत्र-उपकरणों से तो मात्र तीन को ही अनुभव किया जा सकता है। चौथे लोक में यदि प्रवेश संभव हो सके, तो इन्हीं इन्द्रियों और इन्हीं यंत्र-उपकरणों से ऐसा कुछ देखा-समझा जा सकेगा, जिसे आज की तुलना में अकल्पनीय और प्रत्याशित एवं अद्भुत ही कहा जाएगा।
भूः, भुवः, स्वः के बाद यह चौथा आयाम चेतना जगत् और भौतिक जगत् का घुला-मिला स्वरूप है। इसे तप लोक कहा गया है। तपस्वी इसमें अभी भी प्रवेश पाते और अतीन्द्रिय क्षमताओं से सम्पन्न सिद्ध कहलाते हैं।
इसके ऊपर के जनः महः और सत्य लोक विशुद्धतः चेतनात्मक हैं। उनमें प्रवेश पाने वाला दैवी शक्तियों से सम्पन्न होता है, उस तरह की मनःस्थिति एवं परिस्थिति में होता है, जिसे पूर्ण पुरुष, जीवन्मुक्त, परमहंस एवं देवात्मा जैसे शब्दों में सामान्य जनों द्वारा तो कहा-सुना ही जा सकता है।
ब्रह्मांड का स्वरूप :: यह ब्रह्मांड अंडाकार है। यह ब्रह्मांड जल या बर्फ और उसके बादलों से घिरा हुआ है। इससे जल से भी दस ‍गुना ज्यादा यह अग्नि तत्व से ‍आच्छादित है और इससे भी दस गुना ज्यादा यह वायु से घिरा हुआ माना गया है। वायु से दस गुना ज्यादा यह आकाश से घिरा हुआ है और यह आकाश जहाँ तक प्रकाशित होता है वहाँ से यह दस गुना ज्यादा ‘तामस अंधकार’ से घिरा हुआ है और यह तामस अंधकार भी अपने से दस गुना ज्यादा महत्तत्व से घिरा हुआ है जो असीमित, अपरिमेय और अनंत है। उस अनंत से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है और उसी से उसका पालन होता है और अंतत: यह ब्रह्मांड उस अनंत में ही लीन हो जाता है। अनंत महत्तत्व से घिरा ‘तामस अंधकार’ और उससे ही घिरे ‘आकाश’ को स्थान और समय कहा गया है। इससे ही दूरी और समय का ज्ञान होता है। आकाश से ही वायुतत्व की उत्पत्ति होती है। वायु से ही तेज अर्थात अग्नि की और अग्नि से जल, जल से पृथ्‍वी की सृष्टि हुई। इस धरती पर जो जीवन है वह खुद धरती और आकाश का है।
7 पाताल लोक ::  (1). तल, (2). अतल, (3). वितल, (4). तलातल, (5). रसातल, (6). महितल और  (7). पाताल।
7 स्वर्ग-ऊर्ध्व लोक ::  (1). भू, (2). भुवः, (3). स्व, (4). मह, (5). जन, (6). तप और (7). सत्य  लोक। 
7 लोकों को मूलत: दो श्रणियों में विभाजित किया गया है :: (1). कृतक लोक और (2).अकृतक लोक।
कृतक लोक ::  इसमें ही प्रलय और उत्पत्ति का चक्र चलता रहता है। कृतक त्रैलोक्य जिसे त्रिभुवन या मृत्युलोक भी कहते हैं। यह नश्वर और परिवर्तनशील मानते हैं। इसकी एक निश्चितआयु है। त्रैलोक्य के नाम हैं- भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक। यही लोक पाँच तत्वों से निर्मित हैं :- आकाश, अग्नि, वायु, जल और जड़। इन्हीं पाँच तत्वों को वेद क्रमश: जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंदमय कोष कहते हैं।
(1). भूलोक (-धरती, पृथ्वी) :: जितनी दूर तक सूर्य, चंद्रमा आदि का प्रकाश जाता है, वह पृथ्वी लोक कहलाता है, लेकिन भूलोक से तात्पर्य जिस भी ग्रह पर पैदल चला जा सकता है।
(2). भुवर्लोक (-आकाश) ::  पृथ्वी और सूर्य के बीच के स्थान को भुवर्लोक कहते हैं। इसमें सभी ग्रह-नक्षत्रों का मंडल है।
(3). स्वर्गलोक (-अंतरिक्ष) ::  सूर्य और ध्रुव के बीच जो चौदह लाख योजन का अन्तर है, उसे स्वर्गलोक कहते हैं। इसी के बीच में सप्तर्षि का मंडल है। अकृतक लोक समय और स्थान शून्य है।
अकृतक लोक :: जन, तप और सत्य लोक तीनों अकृतक लोक कहलाते हैं। अकृतक त्रैलोक्य अर्थात जो नश्वर नहीं है अनश्वर है। जिसे मनुष्य स्वयं के सद्‍कर्मों से ही अर्जित कर सकता है। कृतक और अकृतक लोक के बीच स्थित है ‘महर्लोक’ जो कल्प के अंत के प्रलय में केवल जनशून्य हो जाता है, लेकिन नष्ट नहीं होता। इसीलिए इसे कृतकाकृतक लोक कहते हैं।
(4). महर्लोक :: ध्रुवलोक से एक करोड़ योजन ऊपर महर्लोक है।
(5). जनलोक :: महर्लोक से बीस करोड़ योजन ऊपर जनलोक है।
(6). तपलोक :: जनलोक से आठ करोड़ योजन ऊपर तपलोक है।
(7). सत्यलोक :: तपलोक से बारह करोड़ योजन ऊपर सत्यलोक है।
जिन के घर में यज्ञ नहीं होता उनके सात लोक नष्ट हो जाते हैं। इनमें भी जो ‘महर्लोक’ हैं वह जनशून्य अवस्था में रहता है जहाँ आत्माएं स्थिर रहती हैं, यहीं पर महाप्रलय के दौरान सृष्टि भस्म के रूप में विद्यमान रहती है। यह लोग त्रैलोक्य और ब्रह्मलोक के बीच स्थित है।
सन्ध्या के मन्त्रों में शरीर के सात अंगों का वर्णन :: (1). ओ३म् भू: पूनातु शिरसि। (2). ओ३म् भुव: पूनातु नेत्रयो:।(3). ओ३म् स्व: पूनातु कण्ठे। (4). ओ३म् मह: पूनातु हृदये। (5). ओ३म् जन: पुनातु नाभ्याम। (6). ओ३म् तप: पुनातु पादयो। (7). ओ३म् सत्यम् पुनातु पुन: शिरसि। ओ३म् खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र। यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे। 
ब्रह्माण्ड के सात लोक :: (1). पृथ्वी, (2). वायु, (3). अन्तरिक्ष, (4). आदित्य, (5). चन्द्रमा, (6). नक्षत्र और (7). ब्रह्म लोक। ये ही लोक हैं; जिनमें प्राणी रहा करता है।  परन्तु यज्ञ न करने अथवा देव ऋण से उऋण न होने वाले जिस लोक में भी जायेंगे वह उनके लिए शान्ति का स्थान ना होगा। सातवें ब्रह्म लोक में तो अशुभकर्मी जा ही नहीं सकते।
सप्त धातु :: (1). रस धातु, (2). रक्त धातु, (3). माँस धातु, (4). मेद धातु, (5). अस्थि धातु, (6). मज्जा धातु और (7). शुक्र धातु। सप्त धातु, वातादि दोषों से कुपित होंतीं हैं। जिस दोष की कमी या अधिकता होती है, सप्त धातुयें तदनुसार रोग अथवा शारीरिक विकृति उत्पन्न करती हैं। 
सात व्याह्रतियाँ  :- ब्रह्मा जी ने ॐ बीज मंत्र से वर्ण माला उत्पन्न की। उन्होंने ही ॐ बीज मंत्र से  यज्ञ के लिए भू:, भूव:, स्व:, महा, जन, तप, सत्यम सात व्याह्रती उत्पन्न कीं।
अग्नि की 7  जिह्नाएँ :- (1.1) हिरण्या, (1.2). गगना, (1.3). रक्ता, (1.4). कृष्णा, (1.5). सुप्रभा, (1.6). बहुरूपा एवं (1.7). अतिरिक्ता। 
कतिपय आचार्याें ने अग्नि की सप्त जिह्नाओं के नाम इस प्रकार बताये हैं :- (2.1). काली, (2.2). कराली, (2.3). मनोभवा, (2.4). सुलोहिता, (2.5). धूम्रवर्णा, (2.6). स्फुलिंगिनी तथा (2.7). विष्वरूचि। 
SIGNIFICANCE OF 8 :: 
आठ योग :: यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समािध। 
अष्टाङ्ग आयुर्वेद :: (1). शल्य, (2). शालाक्य , (3). काय चिकित्सा, (4). भूत विद्या, (5). कौमार भृत्य, (6). अगद तन्त्र, (7). रसायन और (8). बाजीकरण। 
अंक माया-परिवर्तन का प्रतीक है। 
दोनों (परा, अपरा ) प्रकृतिरूप मणियाँ  परमेश्वर रूप सूत्र से गुथी हुई हैं :– यही मणि माला का सूत्र है।*
भगवान ने जगदुत्पत्तिरूप अपरा प्रकृति का वर्णन 8 भेदों  में किया है। 
‘भूमिरापोनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च, अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा’ [गीता 7.4]। 
यहाँ मन से अहंकार का, बुद्धि से महत्व का और अहंकार से अव्यक्त का तात्पर्य है। 
दूसरी प्रकृति परा है :–
‘अपरेयामितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे परां, जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत’ [गीता 7.5]। 
अपरा प्रकृति के 8 भेद बताये है, इनके गुण भिन्न-भिन्न सँख्या के होते हैं :-
प्रकृति को पैदा करने वाला मूल है ब्रह्म, वह है एक एवं सत्। 
उससे उत्पन्न अहंकार (अव्यक्त प्रकृति) दूसरी सँख्या में है, इसके 2 गुण है :– एक ब्रह्म का और दूसरा उसका अपना आवरण। 
उससे उत्पन्न बुद्धि (महान) 3 गुणों वाली होती है, पहले वाले 2 गुण और तीसरा उसका अपना, विक्षेप। 
मन ब्रह्म का चौथा विकार है; उसके 4 गुण होते है 3 पहले के और चौथा उसका अपना, मल। 
पाँचवाँ विकार (आकाश) 5 गुणों वाला होता है, 4 पहले के गुण और एक उसका अपना। इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिए। 
छठा विकार वायु है, उसके 6 गुण होते हैं। 
सातवाँ  विकार है, अनल (अग्नि), उसके 7 गुण हैं। 
आठवाँ  विकार है जल; इसके 8 गुण हैं। 
नौवाँ विकार है भूमि (पृथ्वी), उसके 9 गुण हैं। 
यहि बात मनुस्मृति में भी कही गयी है, बाद का गुण अपने से पहले के गुण को भी ले लेता है। अतः जो जितनी सँख्या वाला है, उसके उतने ही गुण है। 
इस अष्टधा प्रकृति से ही समस्त ब्रह्माण्ड की सृष्टि होती है। यह संसार बंधनरूप अपरा प्रकृति है। इसमें ब्रह्म के एक भेद को तो गिनना नहीं है; वह तो माला में सुमेरु स्थानीय है, उसे गिना नहीं जाता। 
शेष अष्टधा प्रकृति के 2+3+4+5+6+7+8+9=44 कुल भेद हुए। ब्रह्म की परा प्रकृति जीवरूपा कही गयी है। 
अष्टगन्ध :- (1). अगर, तगर, गोरोचन, केसर, कस्तूरी, ष्वेत चन्दन लाल चन्दन और सिन्दूर (देव पूजन हेतु)। (2). अगर लालचन्दन, हल्दी, कुंकुम, गोरोचन, जटामांसी, षिलाजीत और कपूर (देवी पूजन हेतु)। 
अष्टधातु :- सोना, चांदी, लोहा, तांबा, जस्ता, रांगा, कांसा और पारा। 
मुख्यत: आठ प्रकार के यज्ञ कुण्ड प्रयोग में लए जाते हैं। 
(1). योनी कुंड :– योग्य पुत्र प्राप्ति हेतु।
(2). अर्ध चंद्राकार कुंड :– परिवार मे सुख शांति हेतु । पर पति-पत्नी दोनों को एक साथ आहुति चाहिये।
(3. त्रिकोण कुंड  :– शत्रुओं पर पूर्ण विजय हेतु।
(4). वृत्त कुंड  :- जन कल्याण और देश मे शांति हेतु।
(5). सम अष्टास्त्र कुंड :– रोग निवारण हेतु।
(6). सम षडास्त्र कुंड  :– शत्रुओ मे लड़ाई झगड़े करवाने हेतु।
(7). चतुष् कोणा स्त्र कुंड  :– सर्व कार्य की सिद्धि हेतु।
(8). पदम कुंड  :– तीव्रतम प्रयोग और मारण प्रयोगों से बचने हेतु।
सामान्य पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन के लिए चतुर्वर्ग के आकार के इस कुंड का ही प्रयोग करना चाहिये।
अष्ट सिद्धयाँ :: सिद्धि अर्थात पूर्णता की प्राप्ति होना व सफलता की अनुभूति मिलना। सिद्धि को प्राप्त करने का मार्ग एक कठिन मार्ग हो ओर जो इन सिद्धियों को प्राप्त कर लेता है, वह जीवन की पूर्णता को पा लेता है। असामान्य कौशल या क्षमता अर्जित करने को ‘सिद्धि’ कहा गया है. चमत्कारिक साधनों द्वारा ‘अलौकिक शक्तियों को पाना जैसे : दिव्यदृष्टि, अपना आकार छोटा कर लेना, घटनाओं की स्मृति प्राप्त कर लेना इत्यादि. ‘सिद्धि’ इसी अर्थ में प्रयुक्त होती है। 
शास्त्रों में अनेक सिद्धियों की चर्चा की गई है और इन सिद्धियों को यदि नियमित और अनुशासनबद्ध रहकर किया जाए तो अनेक प्रकार की परा और अपरा सिद्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। सिद्धियाँ दो प्रकार की होती हैं : एक परा और दूसरी अपरा। यह सिद्धियां इंद्रियों के नियंत्रण और व्यापकता को दर्शाती हैं। सब प्रकार की उत्तम, मध्यम और अधम सिद्धियाँ अपरा सिद्धियां कहलाती हैं। 
मुख्य सिद्धियाँ आठ प्रकार की कही गई हैं। इन सिद्धियों को पाने के उपरांत साधक के लिए संसार में कुछ भी असंभव नहीं रह जाता।सिद्धियां क्या हैं व इनसे क्या हो सकता है इन सभी का उल्लेख मार्कंडेय पुराण तथा ब्रह्मवैवर्तपुराण में प्राप्त होता है। 
(1). अणिमा सिद्धि :: अति सूक्ष्म रूप धारण करना। इससे व्यक्ति सूक्ष्म रूप धर कर एक प्रकार से दूसरों के लिए अदृश्य हो जाता है। इसके द्वारा आकार में लघु होकर एक अणु रुप में परिवर्तित हो सकता है। अणु एवं परमाणुओं की शक्ति से सम्पन्न हो साधक वीर व बलवान हो जाता है। अणिमा की सिद्धि से सम्पन्न योगी अपनी शक्ति द्वारा अपार बल पाता है। इस के सिद्द होने पर व्यक्ति सूक्ष्म रूप का होकर कही भी आ जा सकता है। 
(2). लघिमा सिद्धि :: स्वयं का भार न के बराबर करना और पल भर में वे कहीं भी आ-जा सकने की क्षमता। इस दिव्य महासिद्धि के प्रभाव से योगी सुदूर अनन्त तक फैले हुए ब्रह्माण्ड के किसी भी पदार्थ को अपने पास बुलाकर उसको लघु करके अपने हिसाब से उसमें परिवर्तन कर सकता है। 
(3). गरिमा सिद्धि ::  स्वयं का भार किसी विशाल पर्वत के समान करना। इस सिद्धि से मनुष्य अपने शरीर को जितना चाहे, उतना भारी बना सकता है। यह सिद्धि साधक को अनुभव कराती है कि उसका वजन या भार उसके अनुसार बहुत अधिक बढ़ सकता है, जिसके द्वारा वह किसी के हटाए या हिलाए जाने पर भी नहीं हिल सकता।
(4). प्राप्ति सिद्धि :: किसी भी वस्तु को तुरन्त-तत्काल प्राप्त कर लेना। पशु-पक्षियों की बोली-भाषा को समझ लेना और भविष्य में होने वाली घटनाओं को जान लेना। कुछ भी निर्माण कर लेने की क्षमता इस सिद्धि के बल पर जो कुछ भी पाना चाहें उसे प्राप्त किया जा सकता है। इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक जिस भी किसी वस्तु की इच्छा करता है, वह असंभव होने पर भी उसे प्राप्त हो जाती है। जैसे रेगिस्तान में प्यासे को पानी प्राप्त हो सकता है या अमृत की चाह को भी पूरा कर पाने में वह सक्षम हो जाता है, केवल इसी सिद्धि द्वारा ही वह असंभव को भी संभव कर सकता है। 
(5). प्राकाम्य सिद्धि :: पृथ्वी गहराइयों-पाताल तक जाने, आकाश में उड़ने और मनचाहे समय तक पानी में भी जीवित रह सकने का सामर्थ। कोई भी रूप धारण कर लेने की क्षमता प्राकाम्य सिद्धि की प्राप्ति है। इसके सिद्ध हो जाने पर मन के विचार आपके अनुरुप परिवर्तित होने लगते हैं। इस सिद्धि में साधक अत्यंत शक्तिशाली शक्ति का अनुभव करता है। इस सिद्धि को पाने के बाद मनुष्य जिस वस्तु कि इच्छा करता है उसे पाने में कामयाब रहता है। व्यक्ति चाहे तो आसमान में उड़ सकता है और यदि चाहे तो पानी पर चल सकता है। 
(6). महिमा सिद्धि :: विशाल रूप धारण करना। अपने को बड़ा एवं विशाल बना लेने की क्षमता को महिमा कहा जाता है। यह आकार को विस्तार देती है। विशालकाय स्वरुप को जन्म देने में सहायक है। इस सिद्धि से सम्पन्न होकर साधक प्रकृति को विस्तारित करने में सक्षम होता है। जिस प्रकार केवल ईश्वर ही अपनी इसी सिद्धि से ब्रह्माण्ड का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार साधक भी इसे पाकर उन्हें जैसी शक्ति भी पाता है। 
(7). ईशिता सिद्धि :: दैवीय शक्तियाँ प्राप्त करना। हर सत्ता को जान लेना और उस पर नियंत्रण करना ही इस सिद्धि का अर्थ है।  इस सिद्धि को प्राप्त करके साधक समस्त प्रभुत्व और अधिकार प्राप्त करने में सक्षम हो जाता है। सिद्धि प्राप्त होने पर अपने आदेश के अनुसार किसी पर भी अधिकार जमा सकता है, वह चाहे छोटे राज्यों से लेकर एक बड़े साम्राज्य ही क्यों न हो। इस सिद्धि को पाने पर साधक ईश रुप में परिवर्तित हो जाता है.
(8). वशिता सिद्धि :: जितेंद्रिय होना और मन पर नियंत्रण रखना। अतुलित बल की प्राप्ति। जीवन और मृत्यु पर नियंत्रण पा लेने की क्षमता को वशिता या वशिकरण कही जाती है।  इस सिद्धि के द्वारा जड़, चेतन, जीव-जन्तु, पदार्थ-प्रकृति, सभी को स्वयं के वश में किया जा सकता है।  इस सिद्धि से संपन्न होने पर किसी भी प्राणी को अपने वश में किया जा सकता है। 
दस गौण सिद्धियां : श्री मद् भागवत पुराण में भगवान् कृष्ण ने निम्न दस गौण सिद्धियों का वर्णन किया है 
(1). अनूर्मिमत्वम्, (2). दूरश्रवण, (3). दूरदर्शनम्, (4). मनोजवः, (5). कामरूपम्, (6). परकायाप्रवेशनम्, (7). स्वछन्द मृत्युः, (8). देवानां सह क्रीडा अनुदर्शनम्, (9). यथा संकल्प संसिद्धिः, (10). आज्ञा अप्रतिहता गतिः। 
अन्य सोलह गौण सिद्धियाँ : 
(1). वाक् सिद्धि :- मनुष्य जो भी वचन बोले जाए वे व्यवहार में पूर्ण हो, कभी व्यर्थ न. जाये, प्रत्येक शब्द का महत्वपूर्ण अर्थ हो।  वाक् सिद्धि युक्त व्यक्ति में श्राप और वरदान देने की क्षमता होती है। 
(2). दिव्य दृष्टि :- दिव्य दृष्टि का तात्पर्य हैं कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में भी चिन्तन किया जाये, उसका भूत, भविष्य और वर्तमान एकदम सामने आ जाये। भविष्य में क्या कार्य करना हैं, कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं, इसका ज्ञान होने पर व्यक्ति दिव्य दृष्टि से युक्त महापुरुष बन जाता हैं। 
(3). प्रज्ञा सिद्धि :- प्रज्ञा-मेधा अर्थात स्मरण शक्ति, बुद्धि, विवेक, ज्ञान इत्यादि। ज्ञान के सम्बंधित सारे विषयों को जो अपनी बुद्धि में समेट लेना। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से सम्बंधित ज्ञान के साथ-साथ मनुष्य के भीतर अंतर्मन में एक चेतना पुंज का जाग्रत होना। 
(4). दूरश्रवण :- भूतकाल में घटित कोई भी घटना, वार्तालाप को पुनः सुनने की क्षमता। 
(5). जल गमन :- इस सिद्धि को प्राप्त करके योगी जल, नदी, समुद्र पर इस तरह विचरण करता हैं मानों धरती पर गमन कर रहा हो। 
(6). वायुगमन :- इसका तात्पर्य हैं अपने शरीर को सूक्ष्मरूप में परिवर्तित करके मनुष्य एक लोक से दूसरे लोक में गमन कर सकता हैं, एक स्थान से दूसरे स्थान पर सहज तत्काल आ जा सकता हैं। 
(7). अदृश्यकरण :- अपने स्थूल शरीर को सूक्ष्म रूप में परिवर्तित कर अदृश्य कर देना। 
(8). विषोका :- स्वयं को अनेक रूपों में विभक्त-परिवर्तित कर लेना! एक स्थान पर अलग रूप हैंऔर दूसरे स्थान पर अलग रूप धारण कर लेना। 
(9). देव क्रियानुदर्शन :- इस क्रिया का पूर्ण ज्ञान होने पर विभिन्न देवताओं का साहचर्य प्राप्त कर सकता हैं। उन्हें पूर्ण रूप से अनुकूल बनाकर उचित सहयोग लिया जा सकता है। 
(10). कायाकल्प :- कायाकल्प का तात्पर्य हैं शरीर परिवर्तन। समय के प्रभाव से देह जर्जर हो जाती है।  इससे युक्त व्यक्ति सदैव रोगमुक्त और युवा ही बना रहता है। 
(11). सम्मोहन :- वशीकरण-सम्मोहन किसी भी अन्य व्यक्ति-प्राणी को अपने अनुकूल बनाने की क्रिया है। 
(12). गुरुत्व :- गुरुत्व का तात्पर्य हैं गरिमावान। जिस व्यक्ति में गरिमा होती हैं, ज्ञान का भंडार होता हैं, और देने की क्षमता होती हैं, उसे गुरु कहा जाता है।  भगवान् श्री कृष्ण को तो जगद्गुरु कहा गया है। 
(13). पूर्ण पुरुषत्व :- इसका तात्पर्य हैं अद्वितीय पराक्रम और निडर, एवं बलवान होना। 
(14). सर्व गुण संपन्न :- व्यक्ति में संसार के सभी उदात्त गुणों यथा  दया, दृढ़ता, प्रखरता, ओज, बल, तेजस्विता, इत्यादि का समावेश। इन्हीं गुणों के कारण मनुष्य विश्व में श्रेष्ठतम व अद्वितीय मन जाता है और इसी प्रकार यह विशिष्ट कार्य करके संसार में लोकहित एवं जनकल्याण करता है। 
(15). इच्छा मृत्यु :- इन कलाओं से पूर्ण व्यक्ति काल जयी होता हैं, काल का उस पर किसी प्रकार का कोई बंधन नहीं रहता, वह जब चाहे अपने शरीर का त्याग कर नया शरीर धारण कर सकता है। 
(16). अनुर्मि :- अनुर्मि का अर्थ है  मनुष्य पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी और भावना-दुर्भावनाका कोई प्रभाव न होना। 
नवधा भक्ति :: Please refer to नवधा भक्ति  santoshsuvichar.blogspot.com  
SIGNIFICANCE OF 9 :: 
अंक ब्रह्म का प्रतीक और अक्षय है। इसलिए सत्ययुग का प्रारंभ अक्षय नवमी से मान जाता है। आज भी कार्तिक शुक्ल नवमी को अक्षय नवमी कहते है। 
Number of beads in a rosary is 108. माला में मनकों की सँख्या 108 है।
Number of Purans is 18. पुराणों की सँख्या 18 है।
Up-Purans-sub titles is 18. उपपुराण भी 18 हैं।
Oup Puran are 18 in number. औपपुराण भी 18 हैं। 
Maha Bharat has 18 chapters. महाभारत के पर्व भी 18 हैं। 
Shri Mad Bhagwat Geeta has 18 chapters. गीता में भगवान श्रीकृष्ण के उपदेश भी 18 अध्यायों में संगृहीत हैं। 
Shri Mad Bhagwat has 18,000 rhymes-verses-Shlok. श्रीमद्भागवत के श्लोकों की सँख्या भी 18,000  है। 
Number of Vaners in the army of Bhagwan Shri Ram was 18 Padam.  भगवान राम की सेना में वानरों की सँख्या 18 पद्म 1015 ) थी। 
युगों की सँख्या भी ऐसी ही है -
सत्ययुग के सौर वर्ष 17,28,000  हैं। [ 1+7+2+8 = 18;  1+8 = 9] 
त्रेतायुग की सौर वर्ष  सँख्या 12,96,000 हैं। [1+2+9+6 = 18; 1+8 = 9]
द्वापरयुग की सौर वर्ष सँख्या 8,64,000 हैं। [8+6+4 = 18; 1+8 =9] 
कलियुग की सौर वर्ष सँख्या  4,32,000 है। [4+3+2 =9]
चार युगों के सौर वर्षों की सँख्या का जोड़ 43,20,000  (4.32 million) होता है। [4+3+2 =9]
71 चतुर्युग बीत जाने पर एक मन्वंतर होता है, जिसकी वर्ष संख्या 30,67,20,000  (306.72 million) है। [3+6+7+2 = 18; 1+8 =9]
प्रत्येक मन्वंतर के बाद एक संधिकाल होता है, जो कि एक सत्य युग के बराबर होता है।  (इस संधि-काल में प्रलय होने से पूर्ण पॄथ्वी जलमग्न हो जाती है)।  
इस तरह ब्रह्मा जी के एक दिन  में 14 मन्वंतर और 15 संधिकाल होते हैं, जिसे एक कल्प कहा जाता है। 
15 संधियों का योग 2,59,20,000 (25.92 million) वर्ष का है।  [2+5+9+2 = 18 , 1+8 = 9]
14 मन्वन्रोरों के कुल सौर वर्ष हैं = 42,940,80,000 (4.294 billion)।   [4+2+9+4+8=27; 2+7=9] 
इस तरह एक कल्प (14 मन्वन्तर +15 संधिकाल ) में कुल 4,32,00,00,000 (4.32 billion) सौर वर्ष होते हैं।[4+3+2 = 9]  यह ब्रह्मा जी का एक दिन है, उतनी ही अवधि की उसकी रात होती है। 
इस प्रकार ब्रह्मा के दिन-रात का जोड़ 86,40,00,000  सौर वर्ष का होता है। [8+6+4 = 18; 1+8 = 9] 
ब्रह्मा जी का एक मास 2,59,20,00,00,000 (259.2 billion) सौर वर्ष का होता है। [2+5+9+2 = 18; 1+8 = 9]
ब्रह्मा जी का एक वर्ष = 31,10,40,00,00,000 (3110.4 billion) सौर वर्ष।  
ब्रह्मा की आयु 100 दिव्य वर्ष  है, जो कि 31,10,40,00,00,000  (311.04 trillion) सौर वर्ष है, यहाँ भी [3+1+1+4 = 9] का योग है  और  ब्रह्म का प्रतीक है। यह अक्षय है; इसीलिए सत्ययुग का प्रारंभ अक्षय नवमी से मान जाता है।आज भी कार्तिक शुक्ल नवमी को अक्षय नवमी कहते है। इस 9 के ब्रह्म के अंक होने से महत्ता के कारण ही नव दुर्गा होती है। नवार्ण मंत्र के अक्षर भी 9, ग्रह भी 9 और नक्षत्र 27 (2+7 = 9) है। 
9 अंक होने से ही “ न क्षरतीति नक्षत्रं “ इस निर्वचन से नक्षत्र भी अक्षय होता है। राशियों के अक्षर भी 9 है।  तीन व्याहतियों के साथ गायत्री मंत्र के अक्षर भी 27 (2+7 = 9) है, इसलिए उसका जप 108 बार भी 1+8 = 9 होकर अक्षय फल वाला होता है। 
महाभारत युद्ध में मरने से केवल 9 योद्धा हो बचे थे। पाँच पाण्डव, भगवान् श्री कृष्ण, अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा। 
हमारे शरीर में छिद्र भी 9 हैं। 
27  नक्षत्र होते है, प्रत्येक नक्षत्र के 4 चरण होते हैं, इस तरह उनका भी गुणनफल  27 X 4 = 108 हुआ। इस तरह से नक्त्रोत्रों की माला के 108 सँख्या वाला होने से जपमाला की मणियों की सँख्या भी  108 है। 
ब्रह्माण्ड में  नक्षत्र माला का जिस स्थान पर दोनों ओर से सम्मलेन होता है, वह सुमेरु पर्वत  है, ऐसा वेदों में कहा गया है।  इसी प्रकार जपमाला का संयोजन स्थान भी सुमेरु है। 
सुमेरु को लाँघना नहीं पडता, इस प्रकार 9 अंक तथा उसके प्रतिनिधि ब्रह्म को भी लाँघना ठीक नहीं होता।  ऐसा कहा जाता है कि सुमेरु पर्वत का भी कोई अतिक्रमण नहीं कर सकता। 
संस्कृत में 54 अक्षर पाए जाते हैं और हर अक्षर के पुरुष और स्त्री लिंग भेद 108 होते हैं। इस तरह से संस्कृत भाषा में 108 विभिन्न अक्षरों का प्रयोग होता है। 
शास्त्रों के अनुसार मनुष्यों में 108 भौतिक कामनाएँ होती हैं और वह 108 तरह के झूठ बोल सकता है। 
हृदय चक्र से 108 नाड़ियाँ संचालित होती है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण सुषुम्ना नाडी है, जो सहस्रार चक्र तक जाती हैं। 
श्रीयंत्र में 54 बिंदु होते हैं, जहाँ पर 3 रेखाएँ जिन्हें मर्म कहते हैं, मिलती हैं। हर बिंदु के पुरुष वाचक और स्त्री वाचक दो भेद होते हैं। इस तरह से श्री यंत्र में 108 मर्म पाए जाते हैं। 
मनुष्य के मन में भूत, वर्त्तमान और भविष्य काल से सम्बंधित भावनाएँ होती हैं। हर काल से संबधित 36 भावनाएँ होती हैं। इस तरह कुल 108 भावनाएँ  होती हैं। 
पृथ्वी की सूर्य से दूरी सूर्य के व्यास की 108 गुना है। (The distance between the Earth and the Sun equals about 108 times the Sun's diameter)
सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास का 108 गुना है। Sun's diameter approximately equals 108 times the earth's diameter.)
पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी भी चन्द्रमा के व्यास का 108 गुना है।  (the distance between the earth and the moon equals about 108 times the moon's diameter.)
पवित्र गंगा नदी का विस्तार 12° देशांतर ( 79-91 ) से 9° (22-31) अक्षांश तक है जो कि कुल विस्तार 12 X 9 = 108° है।  (The sacred River Ganga spans a longitude of 12 degrees (79 to 91) and a latitude of 9 degrees (22 to 31). 12 times 9 equal 108.)
If one is able to be so calm in meditation as to have only 108 breaths in a day, enlightenment will come.
The angle formed by two adjacent lines in a pentagon equals 108 degrees.
There are said to be 108 Indian goddess names.
कृष्ण की गोपियों की संख्या भी 108 कही गयी है।   
भारत  में 108 प्रकार के नृत्य कहे गए हैं।
संयोग से प्रथम बार अंतरिक्ष की यात्रा करने वाला मानव यूरी गगारिन ने 108 मिनिट तक ही अंतरिक्ष की यात्रा तय की। (The first manned space flight lasted 108 minutes, and was on April 12, 1961 by Yuri Gagarin, a Soviet cosmonaut.)
Fahrenheit (°F) थर्मामीटर का उच्चतम तापमान भी 108° F ही होता है। ऐसा कहा जाता है की 108°  F बुखार होने पर व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है। 
 108 मणियों की माला जपने का क्या उद्देश्य ::
सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय को परोक्षता से 108 रूप में  कहा गया है। गीता में  भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं :-
"अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा " [7.6]
अर्थात् समस्त जगत की उत्पत्ति और प्रलय मैं ही हूँ।  और फिर कहा है :–
"मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव" [7.7]
अर्थात् यह सम्पूर्ण जगत मुझ परमेश्वर में ऐसे पिरोया हुआ है, जैसे सूत्र में मणियाँ। यहाँ माला का स्वरुप बता दिया गया। 
*जीव अपरा प्रकृति से निर्मित सम्पूर्ण अपरा प्रकृतिरूप 9 गुणों वाले जगत को धारण कर लेता है, अतः दसवाँ होने से 10 गुणों वाला होता है। 
9 पहले के गुण और 10 वाँ उसका अपना। पहले के 44 और ये 10 गुण मिलकर हो गए 54। यह मणियों की आधी माला तैयार हो गयी। 
यह आधी सँख्या केवल उत्पत्ति की है। उत्पत्ति के विपरीत प्रलय होता है, उसकी भी सँख्या 54 होगी।  जिसमें  ये सारे 54 गुण पुनः ब्रह्म  में विलीन हो जाते हैं। इस प्रकार 108 मणियों की माला हो जाती है। 
गीता  में यहाँ बताया गया है कि मुझ परमेश्वर से अतिरिक्त जगत का कारण अन्य कुछ भी नहीं है। यही एक माला का सुमेरु हुआ। प्रलयोत्पत्ति का उदाहरण केवल व्यावहारिक है; सुमेरु जीव-ब्रह्म की एकता बताता है। 
जीव और ब्रह्म मे अंतर यही है कि ब्रह्म की सँख्या  1 है, और जीव की 10। यहॉं  10  में शून्य माया का प्रतीक है।  जब तक वह जीव के साथ है, तब तक जीव बंधन में है। जब उस मायारूप शून्य को जीव त्याग देता है, तब वह भी 1 हो जाने से ब्रह्म हो जाता है अर्थात ब्रह्म में विलीन हो जाता है। 
माला का भी यही उद्देश्य है कि :- जीव जब तक 108 मणियों का विचार नहीं करता और कारण स्वरूप सुमेरु (ब्रह्म) तक नहीं पहुँचता, तब तक इस 108 में  घूमता रहता है। जब सुमेरु रूप अपने वास्तविक स्वरुप को प्राप्त कर लेता है; तब 108 से निवृत्त हो जाता है। माला समाप्त हो जाती है। सुमेरु को फिर लाँघा नहीं जाता। 
जो तात्पर्य प्रलय-उत्पत्ति का है, वही 108 संख्या की माला के जप का भी है। जिस प्रकार जीव ब्रह्म हो जाने पर उत्पत्ति-प्रलय से निवृत्त हो जाता है, उसी प्रकार ब्रह्म स्थानीय सुमेरु प्राप्त होने पर माला की आवृत्ति से भी निवृत्त हो जाता है। 
जब तक वह ब्रह्म भाव प्राप्त न हो तब तक 108 मणियों की माला की आवृत्ति होती रहेगी, अर्थात जन्म-मरण का चक्र चलता रहेगा। जब व्यक्ति माला के समाप्त होने पर भी जप करता रहता है; तब सुमेरु को  लाँघा नहीं जाता, परन्तु उसे उलटकर फिर शुरू से 108 का चक्र (उत्पत्ति-प्रलय) प्रारंभ कर देता है। 
यह जगत परमेश्वर से ही उत्पन्न, परमेश्वर में ही स्थित और परमेश्वर में ही विलीन होता है। यही भाव माला का सूत्र प्रदर्शित करता है। 
माला की मणियों की  108 सँख्या का विज्ञान ::
जपने के लिए 108 सँख्या होती है। तदर्थ माला की आवश्यकता होती है। बिना सँख्या के जप करना ठीक नहीं माना गया है। 
अप्समीपे जपं कुर्यात ससन्ख्यं तद्भवेत यथा, असन्ख्यमासुरं यस्मात तस्मात तद गणयेत ध्रुवं। [बृहत्पराशरस्मृति 4. 40] 
अब वही जपमाला के विषय में कहा गया है :-
स्फाटीकेंद्राक्षरुद्राक्षक्षै: पुत्रजीवसमुद्भवै: अक्षमाला प्रकर्तव्या प्रशस्ता चोत्तरोत्तरा, अभावे तक्षमालायः कुशग्रन्थाय पाणिना यथा कथश्चिद गणयेत ससन्ख्यं तद्भवेत यथा।  [बृहत्पराशरस्मृति 4.41, 4.42]
यहाँ रुद्राक्ष की माला को अन्य मालाओं से श्रेष्ठ माना गया है। उसमें  कीटाणु नाशक शक्ति भी हुआ करती है। सात्विक – विद्युत प्रदान शक्ति विज्ञान सम्मत होने से जप मे तुलसी की माला का उपयोग होता है। 
गले में तुलसी आदि की कंठी पहनने का भी यही लाभ है, मौन रूप से जप करने से गले की नसों पर जोर पडता है, जिससे गण्डमाला (thyroid) आदि रोग होंने की आशंका होती है। गले में  तुलसी की कंठी पड़ी रहने से गले से, उसका स्पर्श होते रहने से, इन रोगों के होने की आशंका खत्म हो जाती है। 
माला में तर्जनी अंगुली नहीं लगाई जाती यह ध्यान देने वाली बात है क्योंकि तर्जनी अंगुली दूसरों को डाटने वाली , मारने आदि का भय देने वाली होने से पापयुक्ता व निकृष्ट होती है।  और जप मे चाहिए पवित्रता; अतः तर्जनी अंगुली का माला मे स्पर्श नहीं कराया जाता। 
श्वास :: मनुष्य  के प्रत्येक पल में 6 श्वास निकलते हैं। ढाई पल या एक मिनट में 15 श्वास निकलते है। 1 घंटे में 900 श्वास हो जाते है। 12 घंटों में 10,800 श्वास हो जाते हैं और 24 घंटो में 21,600  श्वास होते हैं। 
इन 24 घंटों में श्वासों का आधा भाग यदि सोना, खाना तथा अन्य सांसारिक कार्यों के लिए रख दिया जाय और शेष आधा समय परमार्थ-साधना का स्थिर किया जाय तो 12 का घंटों का समय यानि 10,800  सांसों में मनुष्य अपने इष्टदेव को भी इतने बार स्मरण करना चाहिए ऐसा वेदों में नियम बनाया गया। 
यद्यपि दिन कभी 10 घंटों  का कभी 13 घंटों का भी होता है फिर भी उसका मध्य भाग 12 घंटों  का है। रात विश्राम के लिए होती है  उसमें रज तथा तमोगुण का बाहुल्य होता है। अतः इष्टदेव के स्मरण के लिए दिन के घंटे ही ठीक माने गए हैं। 
दिन के श्वास 10,800 माने गए हैं। 
परन्तु लोकयात्रा में यदि इतना संभव नहीं है तो कम से कम उसके 100वें भाग के बराबर तो भगवान् का स्मरण करना ही चाहिए, इसलिए 108 बार जप करने का विधान रखा गया है। इसकी पूर्ति के लिए 108 मनकों वाली माला का उपाय रखा गया। 
उपान्शुस्यात शतगुणाः, साहस्त्रोः मानसः स्मृतः – [मनु स्मृति 2.85]। 
यह जप की महिमा बताई गयी है। इसमें उपांशु (धीमे-धीमे) जप करने का फल 100 गुना बताया गया है और मन में जप करने का फल 1,000 गुना। माला की मणियाँ 108 होती हैं, उसके द्वारा उपांशु मंत्र जपने से 100 गुना फल होगा, तब 108 X 100 = 10,800 यह पूर्वोक्त दिन के श्वासों की संख्या पूर्ण हो जाति है। इसी कारण माला के मणियों की संख्या 108 रखना निराधार नहीं है। 
वेदों में माया का अंक 8  एवं ब्रह्म का अंक 9  माना गया है। माया में परिवर्तन होता है, ब्रह्म  में नहीं। 
9 X 1 = 9
9 X 2 = 18
9 X 3 = 27
यहाँ 18 मे 1+8 के और 27 मे 2+7 के जोडने पर मूलांक 9 ही होता है। इस प्रकार 9 के अग्रिम पहाड़े में  भी स्वयं जाना जा सकता है।  
माया का प्रतीक  8 का पहाड़ा :: 
8 X 1 = 8
8 X 2 = 16, (1+6=7).
8 X 3 = 24, (2+4=6).
8 X 4 = 32, (3+2=5).
8 X 5 =  40, (4+0=4).
8 X 6 =  48, (4+8=12; 1+2=3).
8 X 7 = 56, (5+6=11, 1+1=2).
8 X 8 = 64, (6+4=10, 1+0=1).
यहाँ एक ब्रह्म ही अवशिष्ट हुआ। ब्रह्म के अंक 9 में तो विकार नहीं होता-इसलिए 8 X 9 = 72, (7+2=9) यह यहाँ प्रत्यक्ष है |
हिन्दु सूर्य उपासक है। वेदों मे सूर्य के 12 भेद-आदित्य, कहे गए है; उनमें  12 वाँ भेद विष्णु है। सूर्य की 12 ही रशियाँ होती है, सूर्य को भी वेदों में  ब्रह्म कहा गया है। तब 12 अंको वाले सूर्य का 9 अंक वाले ब्रह्म से गुणन होने पर 108 सँख्या बनती है, जो कि 1+8 मिलकर 9 हो जाता है।  
 नवग्रह :- सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरू, शुक्र, शनि, राहु और केतु। 
नवरत्न :- माणिक्य, मोती, मूंगा, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम, गोमेद और वैदूर्य। 
इसके अतिरिक्त ब्रह्म अक्षरों के अनुसार भी 108 सँख्या का होता है :-
NUMERALS CORRESPONDING TO HINDI ALPHABETS
स्वर (vowels) ‘अ’ से ‘अः’ तक 16 हैं :: 
 
 आ 
 
ई  
उ  
ऊ  
ए  
 ऐ 
ओ  
औ  
ऋ  
ॠ (प्लुत) 
ऌ  
ॡ (प्लुत) 
अं  
अः 
 1
 2
 3
 4
 5
 6
 7
 8
 9
 10
 11
 12
13 
 14
 15
 1

कुल 33  व्यंजन (consonant) हैं :: 


 क 
 ख 
 ग 
 घ 
 ङ 
 1

 च 
 छ 
 ज 
 झ 
 ञ 
 6
10 

 ट 
 ठ 
 ड 
 ढ 
 ण 
 11
 12
13 
14 
15 

 त 
 थ 
 द 
 ध 
 न 
 16
17 
18 
19 
20

 प 
 फ 
 ब 
 भ 
 म 
 21
22 
23 
24 
25

य 
 र 
 ल 
 व 
 26
27
28 
29

श 
 ष 
 स 
 ह 
 30
31 
32 
33

 मनुष्य किसी की भी पद्धति से उपासना करें वो एक ही परब्रह्म को ही पहुँचती है। 
ब्रह्म वाचक शब्दों के अक्षरों का जोड़ करने पर भी 108 की सँख्या ही प्राप्त होती है जो कि महज़ सहयोग नहीं है। 
ब्रह्म ::  ब (23), र (27), ह (33) एवं म (25) से बना है :- अ सर्वत्र व्यापक होने से प्रथक नहीं गिना जाता। योग करने पर 108 प्राप्त हुआ। अतः :: [23+27+33+25 = 108].
संसार ::  स (32), अं (15) , स (32), आ (2), र (27) मिलकर [32+15+32+2+27 = 108] होती है। 
सीताराम :: स (32), ई (4), त (16), आ (2), र (27), आ (2), म (25),  मिलकर [32+4+16+2+27+2+25 =108 ]होती है। 
रामकृष्ण ::  र (27), आ (2), म (25), क (1), र (27), ॠ (7), ष (31), ण (15)  इनको जोडने पर भी [27+2+25+ 1+27+7+31+15 = 108] ही आता है।  
राम राम :: र = 27, आ = 2 , म  = 25; 27+2+25+27+2 +25 = 108
राधाकृष्ण ::  र (27), आ (2), ध (19), आ (2), क (1), ॠ (11), ष (31), ण (15); यहाँ भी योग [27+2+19+2+1 +11+31+15 = 108] होता है। 
कैलाशनाथ :: क (1), ऐ (8), ल (28), आ (2), श (30), न (20), आ (2), थ (17); इनका भी जोड़ [1+8+28+2+ 30+20+2+17 = 108] ही होता है। 
इस प्रकार माला के मणियों की संख्या का ब्रह्म से सम्बन्ध सिद्ध हुआ।  जहाँ 108  अंक 1 +8  जोड़कर 9  होता है, जो कि ब्रह्म का अंक है। 
नव निधियाँ ::
(1). पद्म निधि :- पद्मनिधि लक्षणो से संपन्न मनुष्य सात्विक होता है तथा स्वर्ण चांदी आदि का संग्रह करके दान करता है ।
(2). महापद्म निधि :- महाप निधि से लक्षित व्यक्ति अपने संग्रहित धन आदि का दान धार्मिक जनों में करता रहता है ।
(3). नील निधि :- नील निधि से सुशोभित मनुष्य सात्विक तेज से संयुक्त होता है। उसकी संपत्ति तीन पीढी तक रहती है।
(4). मुकुंद निधि :- मुकुन्द निधि से लक्षित मनुष्य रजोगुण संपन्न होता है। वह राज्य संग्रह में लगा रहता है।
(5). नन्द निधि :- नन्दनिधि युक्त व्यक्ति राजस और तामस गुणोंवाला होता है। वही कुल का आधार होता है।
(6). मकर निधि :- मकर निधि संपन्न पुरुष अस्त्रों का संग्रह करनेवाला होता है।
(7). कच्छप निधि :- कच्छप निधि लक्षित व्यक्ति तामस गुणवाला होता है। वह अपनी संपत्ति का स्वयं उपभोग करता है।
(8). शंख निधि :- शंख निधि एक पीढी के लिए होती है।
(9). खर्व निधि :- खर्व निधि वाले व्यक्ति के स्वभाव में मिश्रीत फल दिखाई देते हैं।
10 MAHA VIDYA दस महा विधा :: (1). महाकाली, (2). तारा, (3).  षोडशी त्रिपुर सुन्दरी, (4). भुवनेश्वरी, (5). छिन्नमस्ता, (6). त्रिपुर भैरवी, (7). धूमावती, (8). मातंगी, (9). कमला और  (10). BAGLA MUKHI DEVI (बगला मुखी देवी)। Please refer to 10 MAHA VIDYA दस महा विधा  santoshsuvichar.blogspot.com  
दषोपचार :- पाद्य, अर्ध्य, आचमनीय, मधुपक्र, आचमन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप तथा नैवेद्य द्वारा पूजन करने की विधि को “दषोपचार“ कहते है। 
दस दिशाएँ :: पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, अग्नि, आकाश एवं पाताल। 
बारह मास :: चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, अषाढ, श्रावण, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक, मार्गशीर्ष, पौष, माघ और फागुन।  
12 FORMS OF YAGY 12 प्रकार के यज्ञ :: निस्वार्थ भाव से दूसरों के हित-भले के लिए किये गए कर्तव्य-कर्म करने का नाम ही यज्ञ है। यज्ञ से सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं। मनुष्य बंधन मुक्त हो जाता है। कुल बारह प्रकार के यज्ञ कर्म हैं। 
(1). ब्रह्म यज्ञ :- प्रत्येक कर्म में कर्ता, करण, क्रिया, पदार्थ आदि सब को ब्रह्म रूप से अनुभव करना। 
(2). भगवदर्पण रूप यज्ञ :- सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थों को केवल भगवान् का और भगवान् के लिए ही मानना।
(3). अभिन्नता रूप यज्ञ :- असत् से सर्वथा विमुख होकर परमात्मा में विलीन हो जाना। परमात्मा से अलग अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। 
(4). संयम रूप यज्ञ :- एकान्तकाल में अपनी इन्द्रियों को विषयों से मुक्त रखना-प्रवृत न होने देना। 
(5). विषय हवन रूप यज्ञ :- व्यवहार काल में इन्द्रियों से संयोग होने पर भी उनमें राग द्वेष पैदा न होने देना। 
(6). समाधिरूप यज्ञ :- मन बुद्धि सहित सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणों की क्रियाओं को रोककर ज्ञान से प्रकाशित समाधि में स्थित हो जाना।
(7). द्रव्य यज्ञ :- सम्पूर्ण पदार्थों को निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा में लगा देना। 
(8). तपो यज्ञ :- अपने कर्तव्य के पालन में आने वाली कठिनाइयों को प्रसन्नता पूर्वक सह लेना। 
(9). योग यज्ञ-कार्य की सिद्धि :- असिद्धि में तथा फल की प्राप्ति-अप्राप्ति में सम रहना। 
(10). स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ :- दूसरों के हित के लिए सत्-शास्त्रों का पठन-पाठन, नाम-जप आदि करना। 
(11). प्राणायम रूप यज्ञ :- पूरक, कुम्भक और रेचक पूर्वक प्रणायाम करना। 
(12). स्तम्भ वृत्ति प्राणायाम रूप यज्ञ :- नियमित आहार करते हुए प्राण और अपान को अपने-अपने स्थानों पर रोक देना। 
पंद्रह तिथियाँ :: प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, पूर्णिमा और अमावास्या।  

सोलह का महत्व :: (1). सोलह वर्षीय कन्या-युवती-स्त्री और (2). हिन्दुओं में कृत्य जो किसी के मरने के दसवें या ग्यारहवें दिन होता है। 

षोडषोपचार :- आव्हान, आसन, पाद्य, अध्र्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, अलंकार, सुगन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, अक्षत, ताम्बुल, तथा दक्षिणा इन सबके द्वारा पूजन करने की विधि को “षोडषोपचार“ कहते है। 

16 वस्तुओं का वर्ग या समूह :: ईक्षण, प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, कर्म और नाम।]

सोलह कलाएँ :: भगवान् श्री राम 12 कलाओं के अवतार थे तो भगवान् श्री कृष्ण सम्पूर्ण 16 कलाओं के अवतार थे। चंद्रमा की सोलह कलाएं होती हैं। 16 कलाओं से युक्त व्यक्ति -ईश्वरीय गुणों से संपन्न-ईश्‍वर तुल्य-भगवान् होता है।चन्द्रमा के उदय और अस्त होने का काल 27 से 31 दिन के बीच रहता है। 
चन्द्रमा की सोलह कलाएँ  :- अमृत, मनदा, पुष्प, पुष्टि, तुष्टि, ध्रुति, शाशनी, चंद्रिका, कांति, ज्योत्सना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्ण और पूर्णामृत। इन्हीं को प्रतिपदा, दूज, एकादशी, पूर्णिमा आदि भी कहा जाता है।
उक्तरोक्त चंद्रमा के प्रकाश की 16 अवस्थाएं हैं उसी तरह मनुष्य के मन में भी एक प्रकाश है। मन को चंद्रमा के समान ही माना गया है। जिसकी अवस्था घटती और बढ़ती रहती है। चंद्र की इन सोलह अवस्थाओं से 16 कला का चलन हुआ। व्यक्ति का देह को छोड़कर पूर्ण प्रकाश हो जाना ही प्रथम मोक्ष है।
मानव मन की तीन अवस्थाएं :- जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति।
जगत तीन स्तरों वाला है :- (1). एक स्थूल जगत, जिसकी अनुभूति जाग्रत अवस्था में होती है। (2). दूसरा सूक्ष्म जगत, जिसका स्वप्न में अनुभव करते हैं और (3). तीसरा कारण जगत, जिसकी अनुभूति सुषुप्ति में होती है।
तीन अवस्थाओं से आगे: सोलह कलाओं का अर्थ संपूर्ण बोधपूर्ण ज्ञान से है। मनुष्‍य ने स्वयं को तीन अवस्थाओं से आगे कुछ नहीं जाना और न समझा। प्रत्येक मनुष्य में ये 16 कलाएं सुप्त अवस्था में होती है। अर्थात इसका संबंध अनुभूत यथार्थ ज्ञान की सोलह अवस्थाओं से है। इन सोलह कलाओं के नाम अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न-भिन्न मिलते हैं। यथा…
16 कलाओं का वर्गीकरण-नामकरण :- (1.1). अन्नमया, (1.2). प्राणमया, (1.3). मनोमया, (1.4). विज्ञानमया, (1.5). आनंदमया, (1.6). अतिशयिनी,(1.7). विपरिनाभिमी, (1.8). संक्रमिनी, (1.9). प्रभवि,  (1.10). कुंथिनी, (1.11). विकासिनी, (1.12). मर्यदिनी, (1.13). सन्हालादिनी, (1.14). आह्लादिनी, (1.15). परिपूर्ण और (1.16). स्वरुपवस्थित।
(2.1). श्री, (2.2). इला, (2.3). लीला, (2.4). कांति, (2.5). विद्या,(2.6). विमला, (2.7). उत्कर्शिनी, (2.8). ज्ञान, (2.9). क्रिया, (2.10). योग, (2.11). प्रहवि, (2.12). सत्य, (2.13). इसना और (2.14). अनुग्रह।
(2.1). प्राण, (2.2). श्रधा, (2.3). आकाश, (2.4). वायु, (2.5). तेज, (2.6). जल, (2.7). पृथ्वी, (2.8). इन्द्रिय, (2.9). मन, (2.10). अन्न, (2.11). वीर्य, (2.12). तप, (2.13). मन्त्र, (2.14). कर्म, (2.15). लोक और (2.16). नाम।
16 कलाएं दरअसल बोध प्राप्त योगी की भिन्न-भिन्न स्थितियां हैं। बोध की अवस्था के आधार पर आत्मा के लिए प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक चन्द्रमा के प्रकाश की 15 अवस्थाएं ली गई हैं। अमावास्या अज्ञान का प्रतीक है तो पूर्णिमा पूर्ण ज्ञान का।
19 अवस्थाएं :- भगवदगीता में भगवान् श्री कृष्ण ने आत्म तत्व प्राप्त योगी के बोध की उन्नीस स्थितियों को प्रकाश की भिन्न-भिन्न मात्रा से बताया है। इसमें अग्निर्ज्योतिरहः बोध की 3 प्रारंभिक स्थिति हैं और शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌ की 15 कला शुक्ल पक्ष की 01 हैं। इनमें से आत्मा की 16 कलाएं हैं।
आत्मा की सबसे पहली कला ही विलक्षण है। इस पहली अवस्था या उससे पहली की तीन स्थिति होने पर भी योगी अपना जन्म और मृत्यु का दृष्टा हो जाता है और मृत्यु भय से मुक्त हो जाता है।
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌। तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥8-24॥ 
जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि-अभिमानी देवता हैं, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छः महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। Please refer to SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (VIII) श्रीमद् भगवद्गीता अथाष्टमोSध्याय over santoshkipathshala.blogspot.com
Image result for old indian coinsभगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि जो योगी अग्नि, ज्योति, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण के छह माह में देह त्यागते हैं अर्थात जिन पुरुषों और योगियों में आत्म ज्ञान का प्रकाश हो जाता है, वह ज्ञान के प्रकाश से अग्निमय, ज्योर्तिमय, दिन के सामान, शुक्लपक्ष की चांदनी के समान प्रकाशमय और उत्तरायण के छह माहों के समान परम प्रकाशमय हो जाते हैं। अर्थात जिन्हें आत्मज्ञान हो जाता है। आत्मज्ञान का अर्थ है स्वयं को जानना या देह से अलग स्वयं की स्थिति को पहचानना।
Image result for old indian coins(1). अग्नि :- बुद्धि सतोगुणी हो जाती है दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव विकसित होने लगता है, (2). ज्योति :- ज्योति के सामान आत्म साक्षात्कार की प्रबल इच्छा बनी रहती है। दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव ज्योति के सामान गहरा होता जाता है, और (3). अहः :- दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव दिन के प्रकाश की तरह स्थित हो जाता है। 
इस प्रकृम में 16 कलाएँ :– 15 कला शुक्ल पक्ष + 01 एवं उत्तरायण कला=16 हैं। 
(1). बुद्धि का निश्चयात्मक हो जाना।
(2). अनेक जन्मों की सुधि आने लगती है।
(3). चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है।
(4). अहंकार नष्ट हो जाता है।
(5). संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं। स्वयं के स्वरुप का बोध होने लगता है।
(6). आकाश तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। कहा हुआ प्रत्येक शब्द सत्य होता है।
(7). वायु तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। स्पर्श मात्र से रोग मुक्त कर देता है।
Image result for old indian coins(8). अग्नि तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। दृष्टि मात्र से कल्याण करने की शक्ति आ जाती है।
(9). जल तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। जल स्थान दे देता है। नदी, समुद्र आदि कोई बाधा नहीं रहती।
(10). पृथ्वी तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। हर समय देह से सुगंध आने लगती है, नींद, भूख प्यास नहीं लगती।
(11). जन्म, मृत्यु, स्थिति अपने अधीन हो जाती है।
(12). समस्त भूतों से एक रूपता हो जाती है और सब पर नियंत्रण हो जाता है। जड़ चेतन इच्छानुसार कार्य करते हैं।
(13). समय पर नियंत्रण हो जाता है। देह वृद्धि रुक जाती है अथवा अपनी इच्छा से होती है।
(14). सर्व व्यापी हो जाता है। एक साथ अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है। पूर्णता अनुभव करता है। लोक कल्याण के लिए संकल्प धारण कर सकता है।
(15). कारण का भी कारण हो जाता है। यह अव्यक्त अवस्था है।
Image result for old indian coins(16). उत्तरायण कला :- अपनी इच्छा अनुसार समस्त दिव्यता के साथ अवतार रूप में जन्म लेता है जैसे राम, कृष्ण। यहाँ उत्तरायण के प्रकाश की तरह उसकी दिव्यता फैलती है।
सोलहवीं कला पहले और पन्द्रहवीं को बाद में स्थान दिया है। इससे निर्गुण सगुण स्थिति भी सुस्पष्ट हो जाती है। सोलह कला युक्त पुरुष में व्यक्त अव्यक्त की सभी कलाएं होती हैं। यही दिव्यता है।
16 ANNA आना :: एक रूपये में 16 आने होते थे। एक आना बराबर 4 पैसे। एक रूपये में 64 पैसे  होते थे। 
छप्पन भोग :: (1). भक्त (भात), (2). सूप (दाल), (3). प्रलेह (चटनी), (4). सदिका (कढ़ी), (5). दधि शाकजा (-दही शाक की कढ़ी), (6). सिखरिणी (सिखरन), (7). अवलेह (शरबत), (8). बालका (बाटी), (9). इक्षु खेरिणी (मुरब्बा), (10). त्रिकोण (शर्करा युक्त), (11). बटक (बड़ा),m(12). मधु शीर्षक (मठरी), (13). फेणिका (फेनी), (14). परिष्टïश्च (पूरी), (15). शतपत्र (खजला), (16). सधिद्रक (घेवर), (17). चक्राम (मालपुआ), (18). चिल्डिका (चोला), (19). सुधाकुंडलिका (जलेबी), (20). धृतपूर (मेसू), (21). वायुपूर (रसगुल्ला), (22. चन्द्रकला (पगी हुई), (23. दधि (महा रायता), (24). स्थूली (थूली), (25). कर्पूरनाड़ी (लौंगपूरी), (26). खंड मंडल (खुरमा), (27). गोधूम (दलिया), (28). परिखा, (29. सुफलाढय़ा (सौंफ युक्त), (30). दधिरूप (बिलसारू), (31). मोदक (लड्डू), (32). शाक (साग), (33). सौधान (अधानौ अचार), (34). मंडका (मोठ), (35). पायस (खीर), (36). दधि (दही), (37). गोघृत, (38). हैयंगपीनम (मक्खन), (39). मंडूरी (मलाई), (40). कूपिका (रबड़ी), (41). पर्पट (पापड़), (42). शक्तिका (सीरा), (43). लसिका (लस्सी), (44). सुवत, (45). संघाय (मोहन), (46). सुफला (सुपारी), (47). सिता (इलायची), (48). फल, (49). तांबूल, (50). मोहन भोग, (51). लवण, (52). कषाय, (53). मधुर, (54). तिक्त, (55). कटु, (56). अम्ल। 
गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण राधिका जी के साथ एक दिव्य कमल पर विराजते हैं। उस कमल की तीन परतें होती हैं। प्रथम परत में "आठ", दूसरी में "सोलह" और तीसरी में "बत्तीस पंखुड़िया" होती हैं। प्रत्येक पंखुड़ी पर एक प्रमुख सखी और मध्य में भगवान विराजते हैं। इस तरह कुल पंखुड़ियों संख्या छप्पन होती है। 
स्मृतियाँ :: मनु, विष्णु, अत्री, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगीरा, यम, आपस्तम्ब, सर्वत, कात्यायन, ब्रहस्पति, पराशर, व्यास, शांख्य, लिखित, दक्, शातातप और वशिष्ठ। 
DEMIGODS 33 कोटि देवतागण :: 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्वनीकुमार। अश्वनीकुमारों की जगह इन्द्र व प्रजापति को मिलाकर कुल 33 देवता होते हैं। ऋषि कश्यप की पत्नी अदिति से जन्मे पुत्रों को आदित्य कहा गया है। वेदों में जहां अदिति के पुत्रों को आदित्य कहा गया है, वहीं सूर्य को भी आदित्य कहा गया है।
12 आदित्य :: अदिति के पुत्र धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र, वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, सविता, त्वष्टा और विष्णु 12 आदित्य हैं। अन्य कल्प में ये नाम इस प्रकार थे :- अंशुमान, अर्यमन, इन्द्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, विवस्वान और विष्णु। इन्द्र, धाता, पर्जन्य, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा, भग, विवस्वान, विष्णु, अंशुमान और मित्र।अथवा इन्द्र, धाता, पर्जन्य, त्वष्टा, पूषा, अर्यमा, भग, विवस्वान, विष्णु, अंशुमान और मित्र। अथवा विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)। प्रचलित है कि गुणों के अनुरुप किसी व्यक्ति के अनेक नाम भी होते हैं। जिस प्रकार एक व्यक्ति के कई नाम होते हैं उसी प्रकार एक नाम के कई व्यक्ति हो सकते हैं। इन्हीं पर वर्ष के 12 मास नियु‍क्त हैं।
8 वसु :: धर, ध्रुव, सोम, अह:, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभास। 
11 रूद्र  :: , बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली। 
12 साध्य गण :- मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभस और विभु।  
10 विश्वेदेव :- क्रतु, दक्ष, श्रव, सत्य, काल, धुनि, कुरुवान, प्रभवान् और रोचमान।
7 पितर :- कव्यवाह, अनल, सोम, यम, अर्यमा, अग्निश्वात्त और बर्हिषत् ।
2 अश्वनीकुमार :: भगवान् सूर्य के पुत्र 2 अश्वनीकुमार देवताओं के वैद्य-चिकित्सक हैं। 
(1). इन्द्र : यह भगवान सूर्य का प्रथम रूप है। यह देवों के राजा के रूप में आदित्य स्वरूप हैं। इनकी शक्ति असीम है। इन्द्रियों पर इनका अधिकार है। शत्रुओं का दमन और देवों की रक्षा का भार इन्हीं पर है।इन्द्र को सभी देवताओं का राजा माना जाता है। वही वर्षा पैदा करता है और वही स्वर्ग पर शासन करता है। वह बादलों और विद्युत का देवता है। इन्द्र की पत्नी इन्द्राणी थी। इन्द्र एक पद है। स्वर्ग के शासन को इन्द्र कहा जाता है। इसे समय  इकाई के तौर पर भी प्रयोग किया जाता है यथा एक इंद्र का कार्यकाल।  
ऋग्वेद के तीसरे मंडल के वर्णनानुसार इन्द्र ने विपाशा (व्यास) तथा शतद्रु नदियों के अथाह जल को सुखा दिया जिससे भरतों की सेना आसानी से इन नदियों को पार कर गई। दशराज्य युद्ध में इन्द्र ने भरतों का साथ दिया था। सफेद हाथी पर सवार इन्द्र का अस्त्र वज्र है और वह अपार शक्ति संपन्न देव है। इन्द्र की सभा में गंधर्व संगीत से और अप्सराएं नृत्य कर देवताओं का मनोरंजन करते हैं।
(2). धाता : धाता हैं दूसरे आदित्य। इन्हें श्री विग्रह के रूप में जाना जाता है। ये प्रजापति के रूप में जाने जाते हैं। जन समुदाय की सृष्टि में इन्हीं का योगदान है। जो व्यक्ति सामाजिक नियमों का पालन नहीं करता है और जो व्यक्ति धर्म का अपमान करता है उन पर इनकी नजर रहती है। इन्हें सृष्टिकर्ता भी कहा जाता है।
(3). पर्जन्य : पर्जन्य तीसरे आदित्य हैं। ये मेघों में निवास करते हैं। इनका मेघों पर नियंत्रण हैं। वर्षा के होने तथा किरणों के प्रभाव से मेघों का जल बरसता है। ये धरती के ताप को शांत करते हैं और फिर से जीवन का संचार करते हैं। इनके बगैर धरती पर जीवन संभव नहीं।
(4). त्वष्टा : आदित्यों में चौथा नाम श्रीत्वष्टा का आता है। इनका निवास स्थान वनस्पति में है। पेड़-पौधों में यही व्याप्त हैं। औषधियों में निवास करने वाले हैं। इनके तेज से प्रकृति की वनस्पति में तेज व्याप्त है जिसके द्वारा जीवन को आधार प्राप्त होता है।त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप। विश्वरूप की माता असुर कुल की थीं। अतः वे चुपचाप असुरों का भी सहयोग करते रहे।
एक दिन इन्द्र ने क्रोध में आकर वेदाध्ययन करते विश्वरूप का सिर काट दिया। इससे इन्द्र को ब्रह्महत्या का पाप लगा। इधर, त्वष्टा ऋषि ने पुत्रहत्या से क्रुद्ध होकर अपने तप के प्रभाव से महापराक्रमी वृत्तासुर नामक एक भयंकर असुर को प्रकट करके इन्द्र के पीछे लगा दिया।
ब्रह्माजी ने कहा कि यदि नैमिषारण्य में तपस्यारत महर्षि दधीचि अपनी अस्थियां उन्हें दान में दें दें तो वे उनसे वज्र का निर्माण कर वृत्तासुर को मार सकते हैं। ब्रह्माजी से वृत्तासुर को मारने का उपाय जानकर देवराज इन्द्र देवताओं सहित नैमिषारण्य की ओर दौड़ पड़े।
(5). पूषा : पांचवें आदित्य पूषा हैं, जिनका निवास अन्न में होता है। समस्त प्रकार के धान्यों में ये विराजमान हैं। इन्हीं के द्वारा अन्न में पौष्टिकता एवं ऊर्जा आती है। अनाज में जो भी स्वाद और रस मौजूद होता है वह इन्हीं के तेज से आता है।
(6). अर्यमन : अदिति के तीसरे पुत्र और आदित्य नामक सौर-देवताओं में से एक अर्यमन या अर्यमा को पितरों का देवता भी कहा जाता है। आकाश में आकाशगंगा उन्हीं के मार्ग का सूचक है। सूर्य से संबंधित इन देवता का अधिकार प्रात: और रात्रि के चक्र पर है।आदित्य का छठा रूप अर्यमा नाम से जाना जाता है। ये वायु रूप में प्राणशक्ति का संचार करते हैं। चराचर जगत की जीवन शक्ति हैं। प्रकृति की आत्मा रूप में निवास करते हैं।
(7). भग : सातवें आदित्य हैं भग। प्राणियों की देह में अंग रूप में विद्यमान हैं। ये भग देव शरीर में चेतना, ऊर्जा शक्ति, काम शक्ति तथा जीवंतता की अभिव्यक्ति करते हैं।
(8). विवस्वान : आठवें आदित्य विवस्वान हैं। ये अग्निदेव हैं। इनमें जो तेज व ऊष्मा व्याप्त है वह सूर्य से है। कृषि और फलों का पाचन, प्राणियों द्वारा खाए गए भोजन का पाचन इसी अग्नि द्वारा होता है। ये आठवें मनु वैवस्वत मनु के पिता हैं।
(9). विष्णु : नौवें आदित्य हैं विष्णु। देवताओं के शत्रुओं का संहार करने वाले देव विष्णु हैं। वे संसार के समस्त कष्टों से मुक्ति कराने वाले हैं। माना जाता है कि नौवें आदित्य के रूप में विष्णु ने त्रिविक्रम के रूप में जन्म लिया था। त्रिविक्रम को विष्णु का वामन अवतार माना जाता है। यह दैत्यराज बलि के काल में हुए थे। हालांकि इस पर शोध किए जाने कि आवश्यकता है कि नौवें आदित्य में लक्ष्मीपति विष्णु हैं या विष्णु अवतार वामन।
12 आदित्यों में से एक विष्णु को पालनहार इसलिए कहते हैं, क्योंकि उनके समक्ष प्रार्थना करने से ही हमारी समस्याओं का निदान होता है। उन्हें सूर्य का रूप भी माना गया है। वे साक्षात सूर्य ही हैं। विष्णु ही मानव या अन्य रूप में अवतार लेकर धर्म और न्याय की रक्षा करते हैं। विष्णु की पत्नी लक्ष्मी हमें सुख, शांति और समृद्धि देती हैं। विष्णु का अर्थ होता है विश्व का अणु।
(10). अंशुमान : दसवें आदित्य हैं अंशुमान। वायु रूप में जो प्राण तत्व बनकर देह में विराजमान है वही अंशुमान हैं। इन्हीं से जीवन सजग और तेज पूर्ण रहता है।
(11). वरुण : ग्यारहवें आदित्य जल तत्व का प्रतीक हैं वरुण देव। ये मनुष्य में विराजमान हैं जल बनकर। जीवन बनकर समस्त प्रकृति के जीवन का आधार हैं। जल के अभाव में जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। वरुण को असुर समर्थक कहा जाता है। वरुण देवलोक में सभी सितारों का मार्ग निर्धारित करते हैं।
वरुण तो देवताओं और असुरों दोनों की ही सहायता करते हैं। ये समुद्र के देवता हैं और इन्हें विश्व के नियामक और शासक, सत्य का प्रतीक, ऋतु परिवर्तन एवं दिन-रात के कर्ता-धर्ता, आकाश, पृथ्वी एवं सूर्य के निर्माता के रूप में जाना जाता है। इनके कई अवतार हुए हैं। उनके पास जादुई शक्ति मानी जाती थी जिसका नाम था माया। उनको इतिहासकार मानते हैं कि असुर वरुण ही पारसी धर्म में ‘अहुरा मज़्दा’ कहलाए।
(12). मित्र : बारहवें आदित्य हैं मित्र। विश्व के कल्याण हेतु तपस्या करने वाले, साधुओं का कल्याण करने की क्षमता रखने वाले हैं मित्र देवता हैं। ये 12 आदित्य सृष्टि के विकास क्रम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
64 FIELDS OF STUDIES IN ANCIENT INDIA (कला) :: विद्याओं-विधाओं का वर्गीकरण-विभाजन पद गरिमा, वर्ण व्यवस्था के अनुरूप है। 
व्यवहारिक 44 कलाएँ :– (1). ध्यान, प्राणायाम, आसन आदि की विधि, (2). हाथी, घोड़ा, रथ आदि चलाना, (3). मिट्टी और कांच के बर्तनों को साफ रखना, (4). लकड़ी के सामान पर रंग-रोगन सफाई करना, (5). धातु के बर्तनों को साफ करना और उन पर पालिश करना, (6). चित्र बनाना, (7). तालाब, बावड़ी, कमान आदि बनाना, (8). घड़ी, बाजों और दूसरी मशीनों को सुधारना, (9). वस्त्र रंगना, (10). न्याय, काव्य, ज्योतिष, व्याकरण सीखना, (11). नाव, रथ, आदि बनाना, (12). प्रसव विज्ञान, (13). कपड़ा बुनना, सूत कांतना, धुनना, (14). रत्नों की परीक्षा करना, (15). वाद-विवाद, शास्त्रार्थ करना, (16). रत्न एवं धातुएं बनाना, (17). आभूषणों पर पालिश करना, (18). चमड़े की मृदंग, ढोल नगारे, वीणा वगैरेह तैयार करना, (19). वाणिज्य, (20). दूध दुहना, (21). घी, मरूवन तपाना, (22). कपड़े सीना, (23). तरना, (24). घर को सुव्यवस्थित रखना, (25). कपड़े धोना, (26). केश-श्रृंगार, (27). मृदु भाषण वाक्पटुता, (28). बांस के टोकने, पंखे, चटाई आदि बनाना, (29). कांच के बर्तन बनाना, (30).  बाग बगीचे लगाना, वृक्षारोपण, जल सिंचन करना, (31). शस्त्रादि निर्माण, (32). गादी गोदड़े-तकिये बनाना, (33). तैल निकालना, (34). वृक्ष पर चढ़ना, (35). बच्चों का पालन पोषण करना, (36). खेती करना, (37). अपराधी को उचित दंड देना, (38). भांति भांति के अक्षर लिखना, (39). पान सुपारी बनाना और खाना, (40). प्रत्येक काम सोच समझकर करना, (41). समयज्ञ बनना, (42). रंगे हुए चांवलों से मंडल मांडना, (43). सुगन्धित इत्र, तैल-धूपादि बनाना एवं, (44). हस्त कौशल-जादू के खेल से मनोरंजन करना। 
संगीत की 7 कलाएं :- (1). नृत्य, (2). वादन, (3). श्रृंगार, (4). आभूषण, (5). हास्यादि हाव-भाव, (6). शय्या-सजाना और (7). शतरंज आदि कौतुकी क्रीड़ा करना। संगीत और नृत्य की भी 64-64 विधाएँ हैं। 
आयुर्वेदशास्त्र की 8 कलाएं :- (1). आसव, सिर्का, आचार, चटनी, मुरब्बे बनाना, (2). कांटा-सूई आदि शरीर में से निकालना, आंख का कचरा कंकर निकालना, (3). पाचक चूर्ण बनाना, (4). औषधि के पौधे लगाना, (5). पाक बनाना, (6). धातु, विष, उपविष के गुण दोष जानना, (7). भभके से अर्क खीचना और (8). रसायन-भस्मादि बनाना। 
धनुर्वेद सम्बन्धी 5 कलाएं :- (1). लड़ाई लड़ना, (2). कुश्ती लड़ना, (3). निशाना लगाना और (4). व्यूह प्रवेश-निर्गमन एवं रचना। 
निम्न 64 कलाओं में पारंगत थे भगवान् श्री कृष्ण :- (1). नृत्य-नाचना, (2). वाद्य- तरह-तरह के बाजे बजाना, (3). गायन विद्या-गायकी, (4). नाट्य-तरह-तरह के हाव-भाव व अभिनय, (5). इंद्रजाल- जादूगरी, (6). नाटक आख्यायिका आदि की रचना करना, (7). सुगंधित चीजें- इत्र, तेल आदि बनाना, (8). फूलों के आभूषणों से श्रृंगार करना, (9). बेताल आदि को वश में रखने की विद्या, (10). बच्चों के खेल, (11). विजय प्राप्त कराने वाली विद्या, (12). मन्त्रविद्या, (13). शकुन-अपशकुन जानना, प्रश्नों उत्तर में शुभाशुभ बतलाना, (14). रत्नों को अलग-अलग प्रकार के आकारों में काटना, (15). कई प्रकार के मातृका यन्त्र बनाना, (16). सांकेतिक भाषा बनाना, (17). जल को बांधना, (18). बेल-बूटे बनाना, (19). चावल और फूलों से पूजा के उपहार की रचना करना। (देव पूजन या अन्य शुभ मौकों पर कई रंगों से रंगे चावल, जौ आदि चीजों और फूलों को तरह-तरह से सजाना), (20). फूलों की सेज बनाना, (21). तोता-मैना आदि की बोलियां बोलना-इस कला के जरिए तोता-मैना की तरह बोलना या उनको बोल सिखाए जाते हैं, (22). वृक्षों की चिकित्सा, (23). भेड़, मुर्गा, बटेर आदि को लड़ाने की रीति, (24). उच्चाटन की विधि, (25). घर आदि बनाने की कारीगरी, (26). गलीचे, दरी आदि बनाना, (27). बढ़ई की कारीगरी, (28). पट्टी, बेंत, बाण आदि बनाना यानी आसन, कुर्सी, पलंग आदि को बेंत आदि चीजों से बनाना।, (29). तरह-तरह खाने की चीजें बनाना यानी कई तरह सब्जी, रस, मीठे पकवान, कड़ी आदि बनाने की कला, (30). हाथ की फूर्ती के काम, (31). चाहे जैसा वेष धारण कर लेना, (32). तरह-तरह पीने के पदार्थ बनाना, (33). द्यू्त क्रीड़ा, (34). समस्त छन्दों का ज्ञान, (35). वस्त्रों को छिपाने या बदलने की विद्या, (36). दूर के मनुष्य या वस्तुओं का आकर्षण, (37).  कपड़े और गहने बनाना, (38). हार-माला आदि बनाना, (39). विचित्र सिद्धियां दिखलाना यानी ऐसे मंत्रों का प्रयोग या फिर जड़ी-बुटियों को मिलाकर ऐसी चीजें या औषधि बनाना जिससे शत्रु कमजोर हो या नुकसान उठाए, (40). कान और चोटी के फूलों के गहने बनाना-स्त्रियों की चोटी पर सजाने के लिए गहनों का रूप देकर फूलों को गूंथना, (41). कठपुतली बनाना, नाचना, (42), प्रतिमा आदि बनाना, (43). पहेलियां बूझना, (44). सूई का काम यानी कपड़ों की सिलाई, रफू, कसीदाकारी व मोजे, बनियान या कच्छे बुनना, (45). बालों की सफाई का कौशल, (46). मुट्ठी की चीज या मनकी बात बता देना, (47). कई देशों की भाषा का ज्ञान, (48). मलेच्छ-काव्यों का समझ लेना-ऐसे संकेतों को लिखने व समझने की कला जो उसे जानने वाला ही समझ सके, (49). सोने, चांदी आदि धातु तथा हीरे-पन्ने आदि रत्नों की परीक्षा, (50). सोना-चांदी आदि बना लेना, (51). मणियों के रंग को पहचानना, (52). खानों की पहचान, (53). चित्रकारी, (54). दांत, वस्त्र और अंगों को रंगना, (55). शय्या-रचना, (56). मणियों की फर्श बनाना यानी घर के फर्श के कुछ हिस्से में मोती, रत्नों से जड़ना, (57). कूटनीति, (58). ग्रंथों को पढ़ाने की चातुराई, (59). नई-नई बातें निकालना, 60). समस्यापूर्ति करना, (61). समस्त कोशों का ज्ञान, (62).  मन में कटक रचना करना यानी किसी श्लोक आदि में छूटे पद या चरण को मन से पूरा करना, (63). छल से काम निकालना एवं 64). कानों के पत्तों की रचना करना यानी शंख, हाथीदांत सहित कई तरह के कान के गहने तैयार करना।
64 KALA कला ARTS: According to the Vam Keshwar Tantr, there are 64 books called Kala. Many combinations depending over use and faculties are available.
(1). Vocal music, (2). Instrumental music, (3). Dance, (4). Acting, (5). Painting, (6). Making emblems, (7). Making garlands and other creations with flowers, (8). Artwork for mattresses, (9). Artwork for bedspreads, (10). Body aesthetics, (11). House decoration, (12). Making musical instruments operated by water (like Jal Tarang जल तरंग), (13). Making sound effects in water, (14). Costume and fashion design, (15). Making pearl necklaces, (16). Hair styling, (17). Art of dressing, (18). Making ear ornaments, (19). Flower decoration, (20). Food styling, (21). Magic, (22). Landscaping, (23). Manicure, (24). Pastry making, (25). Making drinks, (26). Sewing, (27). Making nets, (28). Solving and creating riddles, (29). Reciting poems, (30). Discoursing on epics and poetical works, (31). Reading, (32). Attending theatrical plays, (33). Completing verses left unfinished (-samasya, समस्या, problems) by others as a challenge, (34). Making cane furniture, (35). Woodworking, (36). Debate, (37). Architecture, (38). Assessing gold and gems, (39). Metallurgy, (40). Cutting and polishing diamonds, (41). Searching for ore, (42). Special knowledge of trees and plants, (43). Cock fighting, (44). Interpreting the songs of birds, (45). Massage, (46). Hair care, (47). Sign language, (48). Learning foreign languages, (49). Scholarship in local languages, (50). Predicting the future, (51). Mechanical engineering, (52). Strengthening memory power, (53). Learning by ear, (54). Instantaneous verse-making, (55). Decisiveness in action, (56). Pretence, (57). Prosody, (58). Preserving clothes, (59). Gambling, (60). Playing dice, (61). Playing with children, (62). Rules of respectful behavior, (63). Art of storytelling and entertaining, (like bards and minstrels) and (64). Grasping the essence of subjects.
64 subjects taught to girls along with sex education in ancient times in India as per Vatsyayan :: A female, therefore, should learn the Kam Shastr or at least a part of it, by studying its practice from some confidential friend. She should study alone in private the sixty-four practices that form a part of the Kam Shastr. Her teacher should either be the daughter of a nurse brought up with her and already married or a female friend who could be trusted in everything or the sister of her mother (i.e. her aunt) or an old female servant or a female beggar who may have formerly lived in the family or her own sister who could always be trusted.
As a matter of fact this subject is neither taught nor learnt by any one in today's world. So, every one is getting superfluous knowledge over this subject. Chances of exploitation are open. There was a time in India during Mughal era, when the Muslim Nababs-rulers of small units, used to send their boys to the prostitutes to learn manners. What they learnt side by side is not a mystery!
The girls were supposed to learn the following arts together with the Kam Sutr to become a suitable house wife:
(1). Singing, (2). Playing on musical instruments, (3). Dancing, (4). Union of dancing, singing, and playing instrumental music, (5). Writing, (6). drawing, (7). Tattooing, (8). Arraying and adorning an idol with rice and flowers, (9). Spreading and arranging beds or couches of flowers or flowers upon the ground, (10). Colouring the teeth, garments, hair, nails and bodies, i.e. staining, dyeing, colouring and painting the same, (11). Fixing stained glass into a floor, (12). The art of making beds, and spreading out carpets and cushions for reclining, (13). Playing on musical glasses filled with water, (14). Storing and accumulating water in aqueducts, cisterns and reservoirs, (15). Picture making, (15.i). trimming and (15.ii). decorating, (16). Stringing of rosaries, necklaces, garlands and wreaths, (17). Binding of turbans and chaplets and making crests and top-knots of flowers, (18). Scenic representations, stage playing Art of making ear ornaments Art of preparing perfumes and odours, (19). Proper disposition of jewels and decorations and adornment in dress, (20). Magic or sorcery, (21). Quickness of hand or manual skill, (22). Culinary art, i.e. cooking and cookery, (23). Making lemonades, sherbets, acidulated (-अम्लयुक्त पेय) drinks and spirituous extracts with proper flavor and colour, (24).  Tailor's work and sewing, (25). Making parrots, flowers, tufts, tassels, bunches, bosses, knobs, etc., out of yarn or thread, (26). Solution of riddles, enigmas, covert speeches, verbal puzzles and enigmatically (-रहस्यपूर्ण, गूढ़, अज्ञेय, पेचीदा, अस्पष्ट, गूढ) subtle, Enigmatic, Inexplicable, Mysterious, Mystic questions, (27). A game, which consisted in repeating verses and as one person finished, another person had to commence at once, repeating another verse, beginning with the same letter with which the last speaker's verse ended, whoever failed to repeat was considered to have lost, and to be subject to pay a forfeit or stake of some kind (-अंताक्षरी), (28). The art of mimicry or imitation, (29). Reading, including chanting and intoning, (30). Study of sentences difficult to pronounce. It is played as a game chiefly by women and children and consists of a difficult sentence being given and when repeated quickly, the words are often transposed or badly pronounced, (31). Practice with sword, single stick, quarter staff and bow and arrow, (32). Drawing inferences, reasoning or inferring, Carpentry or the work of a carpenter, (33). Architecture or the art of building, (34). Knowledge about gold and silver coins and jewels and gems, (35). Chemistry and mineralogy, (36). Colouring jewels, gems and beads, (37). Knowledge of mines and quarries, (38). Gardening; knowledge of treating the diseases of trees and plants, of nourishing them, and determining their ages, (39). Art of cock fighting, quail fighting and ram fighting, (40). Art of teaching parrots and starlings to speak, (41). Art of applying perfumed ointments to the body, and of dressing the hair with unguents and perfumes and braiding it, (42). The art of understanding writing in cipher and the writing of words in a peculiar way, (43). The art of speaking by changing the forms of words. It is of various kinds. Some speak by changing the beginning and end of words, others by adding unnecessary letters between every syllable of a word, and so on, (44). Knowledge of language and of the vernacular dialects, (45). Art of making flower carriages, (46). Art of framing mystical diagrams, of addressing spells and charms, and binding armlets, (47). Mental exercises, such as completing stanzas or verses on receiving a part of them or supplying one, two or three lines when the remaining lines are given indiscriminately from different verses, so as to make the whole an entire verse with regard to its meaning; or arranging the words of a verse written irregularly by separating the vowels from the consonants, or leaving them out altogether; or putting into verse or prose sentences represented by signs or symbols. There are many other such exercises, (48). Composing poems, (49). Knowledge of dictionaries and vocabularies, (50). Knowledge of ways of changing and disguising the appearance of persons, (51). Knowledge of the art of changing the appearance of things, such as making cotton to appear as silk, coarse and common things to appear as fine and good, (52). Various ways of gambling, (53). Art of obtaining possession of the property of others by means of Mantrs or incantations, (54). Skill in youthful sports, (55). Knowledge of the rules of society and of how to pay respect and compliments to others, (56). Knowledge of the art of war, of arms, of armies, etc., (57). Knowledge of gymnastics, (58). Art of knowing the character of a man from his features, (59). Knowledge of scanning or constructing verses, (60). Arithmetical recreations, (61). Making artificial flowers, (62). Making figures and images in clay
A public woman, endowed with a good disposition, beauty and other winning qualities and also versed in the above arts, obtains the name of a Ganika  (-गणिका, वैश्या, कोठेवाली, नगरवधु) or public woman of high quality and receives a seat of honor in an assemblage of men. She is, moreover, always respected by the king and praised by learned men, and her favor being sought for by all, she becomes an object of universal regard. The daughter of a king too as well as the daughter of a minister, being learned in the above arts, can make their husbands favourable to them, even though these may have thousands of other wives besides themselves. And in the same manner, if a wife becomes separated from her husband and falls into distress, she can support herself easily, even in a foreign country, by means of her knowledge of these arts. Even the bare knowledge of them gives attractiveness to a woman, though the practice of them may be only possible or otherwise according to the circumstances of each case. A man who is versed in these arts, who is loquacious  (-बातूनी, मुखर, वाचाल) and acquainted with the arts of gallantry, gains very soon the hearts of women, even though he is only acquainted with them for a short time.
चौंसठ योगिनी 
जीवन में योगदान :: स्त्री पुरुष की सहभागिनी है,पुरुष का जन्म सकारात्मकता के लिये और स्त्री का जन्म नकारात्मकता को प्रकट करने के लिये किया जाता है। स्त्री का रूप धरती के समान है और पुरुष का रूप उस धरती पर फ़सल पैदा करने वाले किसान के समान है।
स्त्रियों की शक्ति को विश्लेषण करने के लिये चौसठ योगिनी की प्रकृति को समझना जरूरी है। पुरुष के बिना स्त्री अधूरी है और स्त्री के बिना पुरुष अधूरा है।
योगिनी की पूजा का कारण शक्ति की समस्त भावनाओं को मानसिक धारणा में समाहित करना और उनका विभिन्न अवसरों पर प्रकट करना और प्रयोग करना माना जाता है,
बिना शक्ति को समझे और बिना शक्ति की उपासना किये यानी उसके प्रयोग को करने के बाद मिलने वाले फ़लों को बिना समझे शक्ति को केवल एक ही शक्ति समझना निराट दुर्बुद्धि ही मानी जायेगी,और यह काम उसी प्रकार से समझा जायेगा,जैसे एक ही विद्या का सभी कारणों में प्रयोग करना।
(1). दिव्ययोग की दिव्ययोगिनी :- योग शब्द से बनी योगिनी का मूल्य शक्ति के रूप में समय के लिये प्रतिपादित है,एक दिन और एक रात में 1440 मिनट होते है,और एक योग की योगिनी का समय 22.5 मिनट का होता है,सूर्योदय से 22.5 मिनट तक इस योग की योगिनी का रूप प्रकट होता है। 
यह जीवन में जन्म के समय,साल के शुरु के दिन में महिने शुरु के दिन में और दिन के शुरु में माना जाता है, इस योग की योगिनी का रूप दिव्य योग की दिव्य योगिनी के रूप में जाना जाता है, इस योगिनी के समय में जो भी समय उत्पन्न होता है वह समय सम्पूर्ण जीवन, वर्ष महिना और दिन के लिये प्रकट रूप से अपनी योग्यता को प्रकट करता है। इस योग में उत्पन्न व्यक्ति समय वस्तु नकारात्मकता को समाप्त करने के लिये योगकारक माने जाते है, इस योग में अगर किसी का जन्म होता है तो वह चाहे कितने ही गरीब परिवार में जन्म ले लेकिन अपनी योग्यता और इस योगिनी की शक्ति से अपने बाहुबल से गरीबी को अमीरी में पैदा कर देता है, इस योगिनी के समय काल के लिये कोई भी समय अकाट्य होता है, (2). महायोग की महायोगिनी :- यह योगिनी रूपी शक्ति का रूप अपनी शक्ति से महानता के लिये माना जाता है,अगर कोई व्यक्ति इस महायोगिनी के सानिध्य में जन्म लेता है,और इस योग में जन्मी शक्ति का साथ लेकर चलता है तो वह अपने को महान बनाने के लिये उत्तम माना जाता है, (3). सिद्ध योग की सिद्धयोगिनी :– इस योग में उत्पन्न वस्तु और व्यक्ति का साथ लेने से सिद्ध योगिनी नामक शक्ति का साथ हो जाता है,और कार्य शिक्षा और वस्तु या व्यक्ति के विश्लेषण करने के लिये उत्तम माना जाता है, (4). महेश्वर की माहेश्वरी :- महा-ईश्वर के रूप में जन्म होता है विद्या और साधनाओं में स्थान मिलता है, (5). पिशाच की पिशाचिनी :- बहता हुआ खून देखकर खुश होना और खून बहाने में रत रहना, (6). डंक की डांकिनी :- बात में कार्य में व्यवहार में चुभने वाली स्थिति पैदा करना, (7). कालधूम की कालरात्रि :- भ्रम की स्थिति में और अधिक भ्रम पैदा करना, (8). निशाचर की निशाचरी :- रात के समय विचरण करने और कार्य करने की शक्ति देना छुपकर कार्य करना, (9). कंकाल की कंकाली :- शरीर से उग्र रहना और हमेशा गुस्से से रहना,न खुद सही रहना और न रहने देना, (10). रौद्र की रौद्री :- मारपीट और उत्पात करने की शक्ति समाहित करना अपने अहम को जिन्दा रखना, (11). हुँकार की हुँकारिनी :- बात को अभिमान से पूर्ण रखना,अपनी उपस्थिति का आवाज से बोध करवाना, (12). ऊर्ध्वकेश की ऊर्ध्वकेशिनी :- खडे बाल और चालाकी के काम करना, (13). विरूपक्ष की विरूपक्षिनी :- आसपास के व्यवहार को बिगाडने में दक्ष होना, (14). शुष्कांग की शुष्कांगिनी :- सूखे अंगों से युक्त मरियल जैसा रूप लेकर दया का पात्र बनना, (15). नरभोजी की नरभोजिनी :- मनसा वाचा कर्मणा जिससे जुडना उसे सभी तरह चूसते रहना, (16). फ़टकार की फ़टकारिणी :- बात बात में उत्तेजना में आना और आदेश देने में दुरुस्त होना, (17). वीरभद्र की वीरभद्रिनी :- सहायता के कामों में आगे रहना और दूसरे की सहायता के लिये तत्पर रहना, (18). धूम्राक्ष की धूम्राक्षिणी :- हमेशा अपनी औकात को छुपाना और जान पहचान वालों के लिये मुसीबत बनना, (19). कलह की कलहप्रिय :- सुबह से शाम तक किसी न किसी बात पर क्लेश करते रहना, (20). रक्ताक्ष की रक्ताक्षिणी :- केवल खून खराबे पर विश्वास रखना, (21). राक्षस की राक्षसी :- अमानवीय कार्यों को करते रहना और दया धर्म रीति नीति का भाव नही रखना, (22). घोर की घोरणी :- गन्दे माहौल में रहना और दैनिक क्रियाओं से दूर रहना, (23). विश्वरूप की विश्वरूपिणी :- अपनी पहचान को अपनी कला कौशल से संसार में फ़ैलाते रहना, (24). भयंकर की भयंकरी :- अपनी उपस्थिति को भयावह रूप में प्रस्तुत करना और डराने में कुशल होना, (25). कामक्ष की कामाक्षी :- हमेशा समागम की इच्छा रखना और मर्यादा का ख्याल नही रखना, (26). उग्रचामुण्ड की उग्रचामुण्डी :- शांति में अशांति को फ़ैलाना और एक दूसरे को लडाकर दूर से मजे लेना, (27). भीषण की भीषणी. :- किसी भी भयानक कार्य को करने लग जाना और बहादुरी का परिचय देना, (28). त्रिपुरान्तक की त्रिपुरान्तकी :- भूत प्रेत वाली विद्याओं में निपुण होना और इन्ही कारको में व्यस्त रहना, (29). वीरकुमार की वीरकुमारी :- निडर होकर अपने कार्यों को करना मान मर्यादा के लिये जीवन जीना, (30). चण्ड की चण्डी :- चालाकी से अपने कार्य करना और स्वार्थ की पूर्ति के लिये कोई भी बुरा कर जाना, (31). वाराह की वाराही :- पूरे परिवार के सभी कार्यों को करना संसार हित में जीवन बिताना, (32). मुण्ड की मुण्डधारिणी :- जनशक्ति पर विश्वास रखना और संतान पैदा करने में अग्रणी रहना, (33). भैरव की भैरवी :- तामसी भोजन में अपने मन को लगाना और सहायता करने के लिये तत्पर रहना, (34). हस्त की हस्तिनी :- हमेशा भारी कार्य करना और शरीर को पनपाते रहना, (35). क्रोध की क्रोधदुर्मुख्ययी :- क्रोध करने में आगे रहना लेकिन किसी का बुरा नही करना, (36). प्रेतवाहन की प्रेतवाहिनी :- जन्म से लेकर बुराइयों को लेकर चलना और पीछे से कुछ नही कहना, (37). खटवांग खटवांगदीर्घलम्बोष्ठयी :- जन्म से ही विकृत रूप में जन्म लेना और संतान को इसी प्रकार से जन्म देना, (38). मलित की मालती, (39). मन्त्रयोगी की मन्त्रयोगिनी, (40). अस्थि की अस्थिरूपिणी, (41). चक्र की चक्रिणी, (42). ग्राह की ग्राहिणी, (43). भुवनेश्वर की भुवनेश्वरी, (44). कण्टक की कण्टिकिनी, (45). कारक की कारकी, (46). शुभ्र की शुभ्रणी, (47). कर्म की क्रिया, (48). दूत की दूती, (49). कराल की कराली, (50). शंख की शंखिनी, (51). पद्म की पद्मिनी, (52). क्षीर की क्षीरिणी, (53). असन्ध असिन्धनी, (54). प्रहर की प्रहारिणी, (55). लक्ष की लक्ष्मी, (56). काम की कामिनी, (57). लोल की लोलिनी, (58). काक की काकद्रिष्टि, (59). अधोमुख की अधोमुखी, (60). धूर्जट की धूर्जटी, (61). मलिन की मालिनी, (62). घोर की घोरिणी, (63). कपाल की कपाली और (64). विष की विषभोजिनी। 
चौंसठ योगिनी मंत्र :: (1). ॐ काली नित्य सिद्धमाता स्वाहा, (2). ॐ कपालिनी नागलक्ष्मी स्वाहा, (3). ॐ कुल्ला देवी स्वर्णदेहा स्वाहा, (4). ॐ कुरुकुल्ला रसनाथा स्वाहा, (5). ॐ विरोधिनी विलासिनी स्वाहा, (6). ॐ विप्रचित्ता रक्तप्रिया स्वाहा, (7). ॐ उग्र रक्ता भोग रूपा स्वाहा, (8). ॐ उग्रप्रभा शुक्रनाथा स्वाहा, (9). ॐ दीपा मुक्तिः रक्ता देहा स्वाहा, (10). ॐ नीला भुक्ति रक्त स्पर्शा स्वाहा, (11). ॐ घना महा जगदम्बा स्वाहा, (12). ॐ बलाका काम सेविता स्वाहा, (13). ॐ मातृ देवी आत्मविद्या स्वाहा, (14). ॐ मुद्रा पूर्णा रजतकृपा स्वाहा, (15). ॐ मिता तंत्र कौला दीक्षा स्वाहा, (16). ॐ महाकाली सिद्धेश्वरी स्वाहा, (17). ॐ कामेश्वरी सर्वशक्ति स्वाहा, (18). ॐ भगमालिनी तारिणी स्वाहा, (19). ॐ नित्यक्लिन्ना तंत्रार्पिता स्वाहा, (20). ॐ भेरुण्ड तत्त्व उत्तमा स्वाहा, (21). ॐ वह्निवासिनी शासिनि स्वाहा, (22). ॐ महावज्रेश्वरी रक्त देवी स्वाहा,(23). ॐ शिवदूती आदि शक्ति स्वाहा, (24). ॐ त्वरिता ऊर्ध्वरेतादा स्वाहा, (25). ॐ कुलसुंदरी कामिनी स्वाहा, (26). ॐ नीलपताका सिद्धिदा स्वाहा, (27). ॐ नित्य जनन स्वरूपिणी स्वाहा, (28). ॐ विजया देवी वसुदा स्वाहा, (29). ॐ सर्वमङ्गला तन्त्रदा स्वाहा, (30). ॐ ज्वालामालिनी नागिनी स्वाहा, (31). ॐ चित्रा देवी रक्तपुजा स्वाहा, (32). ॐ ललिता कन्या शुक्रदा स्वाहा, (33). ॐ डाकिनी मदसालिनी स्वाहा, (34). ॐ राकिनी पापराशिनी स्वाहा, (35). ॐ लाकिनी सर्वतन्त्रेसी स्वाहा, (36). ॐ काकिनी नागनार्तिकी स्वाहा, (37). ॐ शाकिनी मित्ररूपिणी स्वाहा, (38). ॐ हाकिनी मनोहारिणी स्वाहा, (39). ॐ तारा योग रक्ता पूर्णा स्वाहा, (40). ॐ षोडशी लतिका देवी स्वाहा, (41). ॐ भुवनेश्वरी मंत्रिणी स्वाहा, (42). ॐ छिन्नमस्ता योनिवेगा स्वाहा, (43). ॐ भैरवी सत्य सुकरिणी स्वाहा, (44). ॐ धूमावती कुण्डलिनी स्वाहा, (45). ॐ बगलामुखी गुरु मूर्ति स्वाहा, (46). ॐ मातंगी कांटा युवती स्वाहा, (47). ॐ कमला शुक्ल संस्थिता स्वाहा, (48). ॐ प्रकृति ब्रह्मेन्द्री देवी स्वाहा, (49). ॐ गायत्री नित्यचित्रिणी स्वाहा, (50). ॐ मोहिनी माता योगिनी स्वाहा, (51). ॐ सरस्वती स्वर्गदेवी स्वाहा, (52). ॐ अन्नपूर्णी शिवसंगी स्वाहा, (53). ॐ नारसिंही वामदेवी स्वाहा, (54). ॐ गंगा योनि स्वरूपिणी स्वाहा, (55). ॐ अपराजिता समाप्तिदा स्वाहा, (56). ॐ चामुंडा परि अंगनाथा स्वाहा, (57). ॐ वाराही सत्येकाकिनी स्वाहा, (58). ॐ कौमारी क्रिया शक्तिनि स्वाहा, (59). ॐ इन्द्राणी मुक्ति नियन्त्रिणी स्वाहा, (60). ॐ ब्रह्माणी आनन्दा मूर्ती स्वाहा, (61). ॐ वैष्णवी सत्य रूपिणी स्वाहा, (62). ॐ माहेश्वरी पराशक्ति स्वाहा, (63). ॐ लक्ष्मी मनोरमायोनि स्वाहा और (64). ॐ दुर्गा सच्चिदानंद स्वाहा। 
786-164 पैसे :: एक भारतीय रूपये में 64 पैसे होते थे। 


64 CHAKR :: Bhagwan Shiv granted 64 Chakr and their Mantr and Tantr to the world,

786 :: Its an aggregation of the numbers of Bhagwan Shri Krashn. (1). H(a)iri Kr(i)shna h-5, r-200, r-10, k-20, r-200, sh-300, n-50, a-1 = Aggregate of 786. The aggregate number of these letters (Hari Krishna) equals 786. (2). This is also the case of ‘Bismillaah al-Rahmaan al-Raheem’. Some believe to avoid using this number to avoid the danger of being indulging in infidelity.
श्राद्ध के 96 अवसर :: एक वर्ष की अमावास्याएं 12,  पुणादितिथियां 4, मन्वादि तिथियां 14, संक्रान्तियां 12, वैधृति योग 12, व्यतिपात योग 12, पितृ पक्ष 15, अष्टका श्राद्ध 5, अन्वष्टका 5 तथा पूर्वेद्यु 5 ।   [धर्मसिन्धु]


VAEDIC SYSTEM OF NUMBERING  वैदिक सँख्या प्रणाली 
सामान्य-प्रचलित सँख्या क्रम :: इकाई, दहाई, सैंकड़ा, हजार, दस हजार, लाख, दस लाख, करोड़, दस करोड़, अरब, दस अरब, खरब, दस खरब, नील (1013 Ten Trillion, Ten Billion), दस नील, पद्म (1015 One quadrillion, One billiard, SI prefix: Peta), दस पद्म  (1016, Ten Quadrillion, Ten Billion), शंख ( 1017 , One hundred quadrillion, One hundred billiard), दस शंख (गुलशन, 1018)।

हिन्दी-HINDI
FIGURES
INDEX-POWERS OF TEN 
 ENGLISH
इकाई-एक-Ek 
 1
 100
 One
 दहाई-दस-Das
 10
 101
 Ten, Scientific (SI Prefix): Deca.
 सैंकड़ा-सौ-Sou
 100
  102
 Hundred, SI Prefix: Hecto.
 हजार-सहस्र, Sahastr-Hajar
 1,000
 103
 Thousand
 दस हजार-अयुत, Ayut-Das Hajar
 10,000
 104
 Ten Thousand
 लाख-लक्ष, Lakh
 1,00,000
 105
 Hundred Thousand
 दस लाख-नियुत, Niyut-Das Lakh.
 10,00,000
106
 Million, SI Prefix: Mega.
 करोड़, कोटी, Koti-Kror (Crore)
 1,00,00,000
107
 Ten Million
 दस करोड़ Das Kror
 10,00,00,000
108
 Hundred Million
 अरब Arab
 1,00,00,00,000
109
 Billion
 दस अरब Das Arab
 10,00,00,00,000
1010
 Ten Billion
खरब, Kharab.

1011
 Hundred Billion
दस खरब, Das Kharab.
(शंकु, Shanku)
1,00,000 Koti
1012
 Trillion, Quintilian, 
SI Prefix: Exa.
महा शंकु, Maha Shanku. 
1,00,000 Shanku.
1017
One Hundred Quadrillion
वृन्द, Vrand.
1,00,000 Maha Shanku.
1022
Ten Sextillion
महावृन्द, Maha Vrand.
1,00,000 Vrand.
1027
One Octillion
पद्म, Padm.
1,00,000 Maha Vrand.
1032
One Hundred Nonillion
महापद्म, Maha Padm.
1,00,000 Padm.
1037
Ten Undecillion
खर्व, Kharv.
1,00,000 Maha-Padm.
1042
One Tredecillion
महाखर्व, Maha Kharv.
1,00,000 Kharv.
1047
One Hundred Quattuordecillion
समुद्र, Samudr.
1,00,000 Maha Kharv.
1052
Ten Sexdecillion
ओघ, Ogh.
1,00,000 Samudr.
1057
One Octodecillion
 महौघ, Mahaugh.

1,00,000 Ogh.
1062
One hundred Novemdecillion 


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