Sunday, May 11, 2014

VARNASHRAM DHARM वर्णाश्रम धर्म

VARNASHRM DHARM वर्णाश्रम धर्म 
(CASTE-AGE CONFIGURATION AS RELIGION IN INDIA) 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj  
santoshkipathshala.blogspot.com     santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com   hindutv.wordpress.com    bhagwatkathamrat.wordpress.com    hinduism.blog.com    jagatguru.blog.com   jagatgurusantosh.blog.com
Dharm-Religion means-the duty assigned to us, as an individual, as a component of the family-household, member of a society, resident of a place, country, world and the universe as a whole-wrongly interpreted as worship. As a child, a teacher, a father, a mother, as a professional etc. 
PhotoSimplest-easiest way to achieve Salvation-Liberation-Assimilation in God, is to discharge one's own duties religiously-honestly-faithfully. Do not run away from your liabilities, perform them
Everything prescribed by the scriptures, leading to Sadgati (-improvement of Perlok- next birth, abode) by undertaking auspicious, pious acts and rejecting inauspicious acts. Whole hearted efforts, expenses made; devotion of body, mind and soul, physique, ability, status, rights, capabilities for the welfare of others (-mankind, society, world), leading to the welfare of the doer is Dharm.
Inherent prescribed, Varnashram functions-duties, devoid of virtues-excellence, are better than those belonging to others-carried out methodically with perfection, since carrying out of own righteous, natural deeds keeps the doer-performer,  free-untainted from sins, vices, wickedness.
To bring the devotee out of confusion, the Almighty asserts that he should immerse all his prescribed-ordained-Varnashram duties in him and come to his fore-refuse and that he will take care of the devotee, asks him not to worry as he will liberate–relieve him of all sins.
hindu flagAccomplishment is attained by an individual worshiping the Almighty, from whom all the organisms have evolved and by whom the entire universe is pervaded, through his natural, instinctive, prescribed, Varnashram related duties-deeds.
धर्म का तात्पर्य  है अपने कर्तव्य का भली भांति निर्वाह । 
मोक्ष प्राप्ति का सबसे सुगम उपाय है  अपने कर्तव्य का मेहनत, ईमानदारी, भरोसे के साथ , धर्म समझ कर पालन करना । 
मनुष्य को चाहिये कि वह अपने कर्तव्य से भागे नहीं-विमुख न हो .उसका पूरी निष्ठा से पालन करे  । 
गृहस्थ धर्म का पालन सन्यास से भी उत्तम है । 
पिता की भक्ति से इहलोक, माता की भक्ति से मध्य लोक और गुरु की भक्ति से इंद्र लोक प्राप्त होते हैं। जो इन तीनों की सेवा करता है, उसके सभी धर्म सफल हो जाते हैं; और जो इनका निरादर करता है उसकी  सभी क्रियाएं निष्फल होती हैं। जब तक ये जीवित हैं, तब तक इनकी नित्य सेवा-शुश्रूषा और इनका हित करना चाहिये। इन तीनों की सेवा-शुश्रूषा रूपी धर्म में पुरुष का सम्पूर्ण कर्तव्य पूरा हो जाता है, यही साक्षात धर्म  है।  One who serves-takes care of father entitles himself to the comforts-pleasures of this world, the one who is devoted to his mother attains the middle Lok (-heavens which lies in the middle of the 7 heavens) and the one who renders service to his teacher gets Indr Lok. One looks after the three, is capable of attaining all Dharm and the one, who neglects-discards them suffers from, all round failure-disaster-agony.Till, they are alive, one should do his best to please-nourish them, through service-devotion. Duties-deeds-ambitions are accomplished just by the care of the trio.This is the true Dharm.
गृहस्थाश्रम एवं धर्म :: गृहस्थाश्रम सबसे श्रेष्ठ है। Family way-life (-house hold) is superior to the other Ashram Dharm.
धर्म से ही अर्थ और काम उत्पन्न होते हैं। Dharm generates Arth as well as Kaam.
मोक्ष भी धर्म से ही उत्पन्न होता है। Salvation-liberation-assimilation in God too are generated through Dharm.
धर्म, अर्थ और काम-क्रमश: सत्व, रज और तम के द्योतक हैं। Dharm, Arth & Kaam represent Satv, Raj and Tam respectively.
जिस व्यक्ति में धर्म से समन्वित अर्थ और काम व्यवस्थित रहते हैं वह मोक्ष को  प्राप्त करता है।
One who achieves equanimity with Dharm by systematic balancing Arth and Kaam attains the Ultimate-the Almighty.
धर्म का तात्पर्य  है अपने कर्तव्य का भली भांति निर्वाह। 
मोक्ष प्राप्ति का सबसे सुगम उपाय है  अपने कर्तव्य का मेहनत, ईमानदारी, भरोसे के साथ , धर्म समझ कर पालन करना। 
मनुष्य को चाहिये कि वह अपने कर्तव्य से भागे नहीं-विमुख न हो .उसका पूरी निष्ठा से पालन करे .
गृहस्थ धर्म का पालन सन्यास से भी उत्तम है .
119px-Lotus-blank.svg.png
HOUSE HOLD-FAMILY LIFE गृहस्थाश्रम धर्म :: गृहस्थाश्रम  में प्रवेश करने वाला व्यक्ति, यथाविधि विद्या अध्ययन करके, सत्कर्मों द्वारा धन का उपार्जन करने के उपरांत ही, सुंदर लक्षणों से युक्त कन्या से शास्त्रोक्त विवाह करे। घर में भूख से तरसते बच्चे, पत्नी, माँ-बाप, चिथड़ों में लिपटे परिवार के सदस्यों को देखना किसे अच्छा लगता है ? अगर ग्रह्स्वामी का दिल इससे भी विचलित नहीं होता तो वह वज्र के सामान कठोर है और उसका जीवन   व्यर्थ है। धन के बगैर गृहस्थ जीवन बेमानी है। धन, स्त्री व संतान, त्रिवर्ग:- धर्म, अर्थ और काम में सहायक हैं। स्त्री विहीन पुरुष के सभी धर्म कार्य असफल ही रहतें हैं। विवाह व परामर्श, हमेंशा समान कुल(शील, धन और विद्या)में ही उचित है। इसी में प्रेम-स्नेह-मित्रता रहती है। धनवान व्यक्ति को विद्या, कुल, शील आदि गुणों से युक्त माना जाता है। शास्त्र , शिल्प, कला या कोई भी कैसा भी कर्म-उद्यम क्यों न हो, धन से ही संभव है। धन से ही पुन्य अर्जित होते हैं। धन व पुन्य एक दूसरे के कारक-पूरक हैं।  
 MAJOR COMMON TRAITS CHARACTERISTICS OF 4 VARN DHARM चारों वर्ण के लिए समान धर्म  :: Donation-charity. दान पुण्य। 
180px-SriYantra_construct.svg.pngHolding of short duration Hawan-Agni Hotr-Sacrifices in Fire. हवन, अग्नि-होत्र, यज्ञ, धूप बत्ती, अगर बत्ती, लोबान, शुद्ध देशी घी-सरसों के तेल का दीया जलाना, आरती करना-उतारना, पूजा-पाठ करना। 
Visiting Holy places.  तीर्थ स्थलों की यात्रा करना। 
Bathing in Holy rivers पवित्र नदियों में नहाना। 
Honoring the deserving and the deities. योग्य, आदरणीय-पूजनीय व्यक्तिओं व देवी देवताओं का सम्मान,  earning money for Dependents-अपने पर निर्भर व्यक्तियों हेतु धन कमाना। 
sex with own wife and that is too during ovulation. केवल अपनी पति के साथ और केवल ऋतु कल में संतान हेतु मैथुन-गर्भाधान। 
Kindness pity towards all creatures. सभी प्राणियों पर दया करना ,
Truth. सत्य। 
Avoidance of extreme labor. अत्यधिक कठिन श्रम न करना। 
Friendship. सभी से मित्रता पूर्ण व्यवहार। 
Cleanliness. शुद्धि, साफ सफाई। 
Doing of work without desires. इच्छा रहित कार्य-कर्म। 
Not to see-find faults with others. किसी के कार्य में कमी, गलती, बुराई न देखना-निकालना। 
lack of miserliness. कंजूसी न करना। 
MAJOR TRAITS CHARACTERISTICS OF BRAHMANS   ब्राह्मण गुण धर्म-लक्षण 
क्षमा: निन्दा, पराजय, आक्षेप, हिंसा, बन्धन और वध को तथा दूसरों के क्रोध से उत्तपन्न होने वाले दोषों को सह लेना। 
दया: अपने दुःख में करुणा तथा दूसरों के दुःख में सौहार्द पूर्ण सहानुभूति जो कि धर्म का साक्षात साधन है। 
विज्ञान: छहों अंग, चारों वेद, मीमांसा, विस्तृत न्याय शास्त्र, पुराण और धर्म शास्त्र। धर्म की वृद्धि, विधि पूर्वक विद्याद्ययन करके धन का उपार्जनकर धर्म-कार्य का अनुष्ठान। 
सत्य: सत्य से मनुष्य  इस लोक पर विजय पता है। यह परम पद है। 
दम: शरीर की उपरामता। 
शम: बुद्धि की निर्मलता। 
सदा आत्म चिन्तन : क्षर-अविनाशी पद को अध्यात्म समझना-जहां जाकर मनुष्य शोक में नहीं पड़ता।ज्ञान: जिस विद्या से षड्विध ऐश्वर्य युक्त परम देवता साक्षात भगवान् हृषिकेश का ज्ञान होता है। 
Barring a few exceptions majority of Brahmns are blessed with certain characteristics which differentiate them with the other Verns. कुछ अपवादों को छोड़ कर अधिकतर ब्राह्मण अपने स्वाभाविक गुणों के आधार पर पहचाने जाते हैं।
Highly developed brain power. अत्यधिक विकसित मस्तिष्क, मानसिक शक्ति।
study  and teaching of Purans-Veds-epics-scriptures.  पुराणों-वेदों-शास्त्रों-रामायण-महाभारत आदि का पढ़ना और पढ़ाना ।  
Courage. साहस, पौरुष।
Stout body and muscle power. मजबूत शरीर व मांसपेशियाँ-बाहुबल।
Learning-educating-meditation-prayers-Bhakti. पढ़ना-पढाना, स्वाद्ध्याय, चिंतन भक्ति।
fair color,गौर वर्ण।
Non consumption of meat-meat products-fish-eggs. मांस-मच्छी-अंडा-मांसाहार न करना।
Non consumption of narcotics-drugs-wine. धुम्रपान-बीडी, सिग्रेट न पीना; नशा शराब से दूर रहना।
Not to think of other women. अपनी पत्नी के अलावा अन्य स्त्री के बारे में न सोचना।
Not to harm or trouble any one. किसी को भी न सताना परेशान तंग न करना-हानि न पंहुचाना।
Tolerance-not to become angry. क्रोध न करना-काबु रखना।
Regular bathing, performance of rights-rituals-prayers, दैनिक स्नान पूजा पाठ प्रार्थना।
Making offerings to God-deities-ancestors.  भगवान देवी देवताओं पूर्वजों  को भेंट चढ़ाना।
Earning money through honest-righteous pure means. शुद्ध सात्विक साधनों द्वारा धन कमाना।
To keep own needs to the barest possible minimum. अपनी आवश्कताओं को न्यूनतम स्तर पर सीमित   रखना।
Tendency not to store for future.  संग्रह की  पृव्रति  का अभाव।
Should be devoted to for the development-growth-upliftment of society. समाज के उत्थान-विकास का प्रयास।
Harmonious relations-cordial relations with all creatures. सभी प्राणियों में सामंजस्य।
Weighs stones, gems and jewels equally. धन, जवाहरात, गहनों व पत्थरों को सामान समझना।
Inclination to sex with own wife only and that is too, during the ovulation period, during night only, avoidance of Rahu Kalam and eclipse. अपनी पत्नी के अलावा अन्य स्त्री से गर्भाधान न करना वह भी केवल ऋतू कल में-रात्रि में व ग्रहण में नहीं।
Pure vegetarian food descent behavior.  शुद्ध सात्विक आचार वयवहार, निरामिष  भोजन, सदाचार। 
BRAHMAN ब्राह्मण :: ब्रह्मा जी के मस्तिष्क से प्रकट हुए दैवीय सृष्टि के मनुष्य, ब्राह्मण कहलाये। ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों से ही सृष्टि की उत्पत्ति और वृद्धि हुई। कश्यप जी से पृथ्वी लोक व अन्य लोकों के समस्त प्राणी उत्पन्न हुए। मनु स्मृति के अनुरुप जिन मनुष्यों ने जप-तप, शिक्षा-दीक्षा प्राप्त की, वे ही ब्राह्मण हैं। जन्म से सभी शुद्र हैं और जो कोई भी वेतन-वृत्ति लेकर सेवा-नौकरी आदि कार्य करता है, वह शुद्र है।  
पूर्वकाल में ब्राह्मण होने के लिए मनुष्य को शिक्षा, दीक्षा और कठिन तप करना होता था। इसके बाद ही उस मनुष्य को ब्राह्मण कहा जाता था। गुरुकुल की अब वह परंपरा नहीं है। जिन लोगों ने ब्राह्मणत्व अपने प्रयासों से हासिल किया था उनके कुल में जन्मे लोग भी खुद को ब्राह्मण समझने लगे। ऋषि-मुनियों की वे संतानें खुद को ब्राह्मण मानती हैं, जबकि उन्होंने न तो शिक्षा ली, न दीक्षा और न ही उन्होंने कठिन तप किया। वे जनेऊ का भी अपमान करते देखे गए हैं।
आजकल के तथाकथित ब्राह्मण लोग शराब पीकर, मांस खाकर और असत्य वचन बोलकर भी खुद को ब्राह्मण समझते हैं। उनमें से कुछ तो धर्म विरोधी हैं, कुछ धर्म जानते ही नहीं, कुछ गफलत में जी रहे हैं, कुछ ने धर्म को धंधा बना रखा और कुछ पोंगा-पंडित और कथावाचक बने बैठे हैं।
जो ब्रह्म (ईश्वर) को छोड़कर किसी अन्य को नहीं पूजता वह ब्राह्मण। ब्रह्म को जानने वाला ब्राह्मण कहलाता है। जो पुरोहिताई करके अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है।
जो ज्योतिषी या नक्षत्र विद्या से अपनी जीविका चलाता है वह ब्राह्मण नहीं, ज्योतिषी है और जो कथा बांचता है वह ब्राह्मण नहीं कथा वाचक है। इस तरह वेद और ब्रह्म को छोड़कर जो कुछ भी कर्म करता है वह ब्राह्मण नहीं है। जिसके मुख से ब्रह्म शब्द का उच्चारण नहीं होता, वह ब्राह्मण नहीं है।
न जटाहि न गोत्तेहि न जच्चा होति ब्राह्मणो।यम्हि सच्चं च धम्मो च सो सुची सो च ब्राह्मणो॥
ब्राह्मण न तो जटा से होता है, न गोत्र से और न जन्म से। जिसमें सत्य है, धर्म है और जो पवित्र है, वही ब्राह्मण है। कमल के पत्ते पर जल और आरे की नोक पर सरसों की तरह जो विषय-भोगों में लिप्त नहीं होता,वही ब्राह्मण है। 
तसपाणे वियाणेत्ता संगहेण य थावरे।जो न हिंसइ तिविहेण तं वयं बूम माहणं॥
जो इस बात को जानता है कि कौन प्राणी त्रस्त है, कौन स्थावर है और मन, वचन और काया से किसी भी जीव की हिंसा नहीं करता, वही  ब्राह्मण है।
न वि मुंडिएण समणो न ओंकारेण बंभणो।न मुणी रण्णवासेणं कुसचीरेण न तावसो॥
सिर मुंडा लेने से ही कोई श्रमण नहीं बन जाता। ओंकार का जप कर लेने से ही कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता। केवल जंगल में जाकर बस जाने से ही कोई मुनि नहीं बन जाता। वल्कल वस्त्र पहन लेने से ही कोई तपस्वी नहीं बन जाता।
शनकैस्तु क्रियालोपदिनाः क्षत्रिय जातयः।वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणा दर्शनेन च॥
पौण्ड्रकाशचौण्ड्रद्रविडाः काम्बोजाः भवनाः शकाः ।पारदाः पहल्वाश्चीनाः किरताः दरदाः खशाः॥[मनुसंहिता 1.43, 1.44]
ब्राह्मणत्व की उपलब्धि को प्राप्त न होने के कारण उस क्रिया का लोप होने से पोण्ड्र, चौण्ड्र, द्रविड़ काम्बोज, भवन, शक, पारद, पहल्व, चीनी किरात, दरद व खश ये सभी क्षत्रिय जातियां धीरे-धीरे शूद्रत्व को प्राप्त हो गईं।
जाति का आधार :: जाति के आधार पर तथाकथित ब्राह्मणों के हजारों प्रकार हैं। उत्तर भारतीय ब्राह्मणों के प्रकार अलग तो दक्षिण भारतीय ब्राह्मणों के अलग प्रकार। उत्तर भारत में जहाँ सारस्वत, सरयुपा‍रि, गुर्जर गौड़, सनाठ्य, औदिच्य, पराशर आदि ब्राह्मण मिल जाएंगे तो दक्षिण भारत में ब्राह्मणों के तीन संप्रदाय हैं- स्मर्त संप्रदाय, श्रीवैष्णव संप्रदाय तथा माधव संप्रदाय। इनके हजारों उप संप्रदाय हैं।
भगवान् विष्‍णु के नाभि कमल से ब्रह्मा हुए, ब्रह्मा के ब्रह्मर्षि नामक पुत्र के वंश में पारब्रह्म नामक पुत्र हुआ, उससे कृपाचार्य हुए, कृपाचार्य के दो पुत्र हुए, उनका छोटा पुत्र शक्ति था। शक्ति के 5 पुत्र हुए।
उसमें से प्रथम पुत्र पाराशर से पारीक बना, दूसरे पुत्र सारस्‍वत के सारस्‍वत, तीसरे ग्‍वाला ऋषि से गौड़, चौथे पुत्र गौतम से गुर्जर गौड़, पांचवें पुत्र श्रृंगी से शिखवाल, छठे पुत्र दाधीच से दायमा या दाधीच। सप्तऋषियों की संतानें हैं, ब्राह्मण। 
ब्राह्मण के 8 भेद ::  ब्राह्मण होने का अधिकार सभी को है चाहे वह किसी भी जाति, प्रांत या संप्रदाय से हो। लेकिन ब्राह्मण बनने के लिए बेहद कठिन नियमों का पालन अनिवार्य है। मात्र, ब्राह्मण, श्रोत्रिय, अनुचान, भ्रूण, ऋषिकल्प, ऋषि और मुनि इनके 8 वर्ग-भरद हैं। इसके अलावा वंश, विद्या और सदाचार से ऊंचे उठे हुए ब्राह्मण ‘त्रिशुक्ल’ कहलाते हैं। ब्राह्मण को धर्मज्ञ विप्र और द्विज भी कहा जाता है।
(1). मात्र : ऐसे ब्राह्मण जो जाति से ब्राह्मण हैं, लेकिन वे कर्म से ब्राह्मण नहीं हैं, उन्हें मात्र कहा गया है। ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से कोई ब्राह्मण नहीं कहलाता। बहुत से ब्राह्मण ब्राह्मणोचित उपनयन संस्कार और वैदिक कर्मों से दूर हैं, तो वैसे मात्र हैं।उनमें से कुछ तो यह भी नहीं हैं। वे बस शूद्र हैं। वे तरह के तरह के देवी-देवताओं की पूजा करते हैं और रा‍त्रि के क्रियाकांड में लिप्त रहते हैं। वे सभी राक्षस धर्मी हैं।
(2). ब्राह्मण : ईश्वरवादी, वेदपाठी, ब्रह्मगामी, सरल, एकांतप्रिय, सत्यवादी और बुद्धि से जो दृढ़ हैं, वे ब्राह्मण कहे गए हैं। तरह-तरह की पूजा-पाठ आदि, पुराणिक, वेदसम्मत आचरण करता है, वह ब्राह्मण है।
(3). श्रोत्रिय : स्मृति अनुसार जो कोई भी मनुष्य वेद की किसी एक शाखा को कल्प और छहों अंगों सहित पढ़कर ब्राह्मणोचित 6 कर्मों में सलंग्न रहता है, वह श्रोत्रिय कहलाता है।
(4). अनुचान : कोई भी व्यक्ति वेदों और वेदांगों का तत्वज्ञ, पाप रहित, शुद्ध चित्त, श्रेष्ठ, श्रोत्रिय विद्यार्थियों को पढ़ाने वाला और विद्वान है, वह अनुचान माना गया है।
(5). भ्रूण : अनुचान के समस्त गुणों से युक्त होकर केवल यज्ञ और स्वाध्याय में ही संलग्न रहता है, ऐसे इंद्रिय संयम व्यक्ति को भ्रूण कहा गया है।
(6). ऋषि कल्प : जो कोई भी व्यक्ति सभी वेदों, स्मृतियों और लौकिक विषयों का ज्ञान प्राप्त कर मन और इंद्रियों को वश में करके आश्रम में सदा ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए निवास करता है, उसे ऋषि कल्प कहा जाता है।
(7). ऋषि : ऐसे व्यक्ति तो सम्यक आहार, विहार आदि करते हुए ब्रह्मचारी रहकर संशय और संदेह से परे हैं और जिसके श्राप और अनुग्रह फलित होने लगे हैं, उस सत्य प्रतिज्ञ और समर्थ व्यक्ति को ऋषि कहा गया है।
(8). मुनि : जो व्यक्ति निवृत्ति मार्ग में स्थित, संपूर्ण तत्वों का ज्ञाता, ध्याननिष्ठ, जितेन्द्रिय तथा सिद्ध है, ऐसे ब्राह्मण को मुनि कहते हैं।
किसी वेदपाठी परम्परा में यदि कोई बालक-बालिका जन्म ले तो उसके ब्राह्मणत्व को प्राप्त होने की सम्भावना बढ़ जाती हैं। 
लेकिन इसका इसका ये मतलब नहीं नहीं हैं कि ऐसा बालक-बालिका ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मण हो ही जाए। इसीलिए कहते हैं ::
जन्मना जायते शूद्रः संस्कारात्‌ भवेत द्विजः। वेद पाठात्‌ भवेत्‌ विप्रःब्रह्म जानातीति ब्राह्मणः॥ 
व्यक्ति जन्मतः शूद्र है। संस्कार से वह द्विज बन सकता है। वेदों के पठन-पाठन से विप्र हो सकता है। किंतु जो ब्रह्म को जान ले, वही ब्राह्मण कहलाने का सच्चा अधिकारी है।अतएव वर्ण निर्धारण मनुष्य के गुण और कर्म के आधार पर ही तय होता हैं न कि जन्म या वंश परम्परा से। [निरुक्त शास्त्र के प्रणेता यास्क मुनि, स्कन्द पुराण-नागर खण्ड अध्याय 239  श्लोक 31]
ब्राह्मण : जो समस्त दोषों से रहित, अद्वितीय, आत्मतत्व से युक्त है, वह ब्राह्मण है। चूँकि आत्मतत्व सत्, चित्त, आनंद रूप ब्रह्म भाव से युक्त होता है, इसलिए इस ब्रह्म भाव से संपन्न मनुष्य को ही (सच्चा) ब्राह्मण कहा जा सकता है। [वज्रसूचिका उपनिषत्]
ब्राह्मक्षत्रियवैष्यशूद्रा इति चत्वारो वर्णास्तेषां वर्णानां ब्राह्मण एव प्रधान इति वेदवचनानुरूपं स्मृतिभिरप्युक्तम्।
तत्र चोद्यमस्ति को वा ब्राह्मणो नाम किं जीवः किं देहः किं जातिः किं ज्ञानं किं कर्म किं धार्मिक इति॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ये चार वर्ण हैं। इन वर्णों में ब्राह्मण ही प्रधान है, ऐसा वेद वचन है और स्मृति में भी वर्णित है। 
मृगी से श्रृंगी ऋषि की, कुश से कौशिक की, जम्बुक से जाम्बूक की, वाल्मिक से वाल्मीकि की, मल्लाह कन्या (मत्स्यगंधा) से वेदव्यास की, शशक पृष्ठ से गौतम की, उर्वशी से वसिष्ठ की, कुम्भ से अगस्त्य ऋषि की उत्पत्ति वर्णित है। इस प्रकार पूर्व में ही कई ऋषि बिना (ब्राह्मण) जाति के ही प्रकांड विद्वान् हुए हैं, इसलिए केवल कोई जाति विशेष भी ब्राह्मण नहीं हो सकती है। 
ब्राह्मण :: जो आत्मा के द्वैत भाव से युक्त ना हो; जाति गुण और क्रिया से भी युक्त ण हो; षड उर्मियों और षडभावों आदि समस्त दोषों से मुक्त हो; सत्य, ज्ञान, आनंद स्वरुप, स्वयं निर्विकल्प स्थिति में रहने वाला, अशेष कल्पों का आधार रूप, समस्त प्राणियों के अंतस में निवास करने वाला, अन्दर-बाहर आकाशवत संव्याप्त; अखंड आनंद्वान, अप्रमेय, अनुभवगम्य, अप्रत्येक्ष भासित होने वाले आत्मा का करतल आमलकवत परोक्ष का भी साक्षात्कार करने वाला; काम-रागद्वेष आदि दोषों से रहित होकर कृतार्थ हो जाने वाला; शम-दम आदि से संपन्न; मात्सर्य, तृष्णा, आशा, मोह आदि भावों से रहित; दंभ, अहंकार आदि दोषों से चित्त को सर्वथा अलग रखने वाला हो, वही ब्राह्मण है; ऐसा श्रुति, स्मृति-पूरण और इतिहास का अभिप्राय है। इस (अभिप्राय) के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार से ब्राह्मणत्व सिद्ध नहीं हो सकता। आत्मा सत्-चित और आनंद स्वरुप तथा अद्वितीय है। इस प्रकार ब्रह्मभाव से संपन्न मनुष्यों को ही ब्राह्मण माना जा सकता है।[उपनिषद]
कर्म से कोई भी ब्राह्मण बन सकता है। 
विद्या तपश्च योनिश्च एतद् ब्राह्मणकारकम्। विद्यातपोभ्यां यो हीनो जातिब्राह्मण एव स:॥
विद्या, तप और ब्राह्मण-ब्राह्मणी से जन्म ये तीन बातें जिसमें पाई जायँ वही पक्का ब्राह्मण है, पर जो विद्या तथा तप से शून्य है वह जातिमात्र के लिए ब्राह्मण है, पूज्य नहीं हो सकता। [पतंजलि भाष्य 51.115]
जो जन्म से ब्राह्मण है किन्तु कर्म से ब्राह्मण नहीं है। उसे शुद्र (मजदूरी) के काम में लगा दो। [महाभारत]
जो निष्कारण (कुछ भी मिले ऐसी आसक्ति का त्याग कर के) वेदों के अध्ययन में व्यस्त हे और वैदिक विचार संरक्षण और संवर्धन हेतु सक्रीय हे वही ब्राह्मण  है -महर्षि याज्ञवल्क्य व पराशर व वशिष्ठ। [ शतपथ ब्राह्मण, ऋग्वेद मंडल 10, पराशर स्मृति]
शम, दम, करुणा, प्रेम, शील (चरित्रवान), निस्पृही जैसे गुणों का स्वामी ही ब्राह्मण है। [ श्रीमद भगवतगीता ]
ब्राह्मण वही हे जो “पुंस्त्व” से युक्त हे. जो “मुमुक्षु” हे. जिसका मुख्य ध्येय वैदिक विचारों का संवर्धन है। जो सरल है, जो नीतिवान है, वेदों पर प्रेम रखता है, जो तेजस्वी है, ज्ञानी है, जिसका मुख्य व्यवसाय वेदोका अध्ययन और अध्यापन कार्य है, वेदों, उपनिषदों, दर्शन शास्त्रों का संवर्धन करने वाला ही ब्राह्मण है। [जगद्गुरु शंकराचार्य]
कर्म से कोई भी ब्राह्मण बन सकता है। 
(1). ऐतरेय ऋषि दास अथवा अपराधी के पुत्र थे। परन्तु उच्च कोटि के ब्राह्मण बने और उन्होंने ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद की रचना की। ऋग्वेद को समझने के लिए ऐतरेय ब्राह्मण अतिशय आवश्यक माना जाता है। 
(2). ऐलूष ऋषि दासी पुत्र थे। जुआरी और हीन चरित्र भी थे। परन्तु बाद मेंउन्होंने अध्ययन किया और ऋग्वेद पर अनुसन्धान करके अनेक अविष्कार किये। ऋषियों ने उन्हें आमंत्रित कर के आचार्य पद पर आसीन किया। [ऐतरेय ब्राह्मण 2.19]
(3). सत्यकाम जाबाल गणिका (वेश्या) के पुत्र थे, परन्तु वे ब्राह्मणत्व को प्राप्त हुए। 
(4). राजा दक्ष के पुत्र पृषध शूद्र हो गए थे, प्रायश्चित स्वरुप तपस्या करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। [विष्णु पुराण 4.1.14]
(5). राजा नेदिष्ट के पुत्र नाभाग वैश्य हुए। पुनः इनके कई पुत्रों ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। [विष्णु पुराण 4.1.13]
(6). धृष्ट नाभाग के पुत्र थे, परन्तु ब्राह्मण हुए और उनके पुत्र ने क्षत्रिय वर्ण अपनाया। [विष्णु पुराण 4.2.2]
(7). भागवत के अनुसार राजपुत्र अग्निवेश्य ब्राह्मण हुए। 
(8). विष्णुपुराण और भागवत के अनुसार रथोतर क्षत्रिय से ब्राह्मण बने। 
(9). हारित क्षत्रिय पुत्र से ब्राह्मण हुए। [विष्णु पुराण 4.3.5]
(10). क्षत्रिय कुल में जन्में शौनक ने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया। [विष्णु पुराण 4.8.1]
वायु, विष्णु और हरिवंश पुराण कहते हैं कि शौनक ऋषि के पुत्र कर्म भेद से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए। इसी प्रकार गृत्समद, गृत्समति और वीतहव्य इसके उदाहरण हैं। 
(11). मातंग चांडाल पुत्र से ब्राह्मण बने। 
(12). ऋषि पुलस्त्य के पौत्र, जन्म से ब्राह्मण रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण राक्षस हुए। 
(13). राजा रघु का पुत्र प्रवृद्ध राक्षस हुआ। 
(14). त्रिशंकु राजा होते हुए भी कर्मों से चांडाल बन गए थे। 
(15). विश्वामित्र के पुत्रों ने शूद्रवर्ण अपनाया। विश्वामित्र स्वयं क्षत्रिय थे, परन्तु बाद उन्होंने ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया। 
(16). विदुर दासी पुत्र थे, तथापि वे ब्राह्मण हुए और उन्होंने हस्तिनापुर साम्राज्य का मंत्री पद सुशोभित किया। 
वेदों-उपनिषदों से दूर रहने वाला और ऊपर दर्शाये गुणों से अलिप्त व्यक्ति चाहे जन्म से ब्राह्मण हों या ना हों लेकिन ऋषियों को व्याख्या में वह ब्राह्मण नहीं है। 
ब्राह्मण का सम्मान :: ममः नियम में आबद्ध ब्राह्मण-वर्ग अपनी निरंतर उपासना व त्यागवृत्ति, सात्त्विकता एवं उदारता के कारण ईश्वरतत्त्व के सर्वाधिक निकट रहते हैं। धर्मशास्त्र, कर्मकांड के ज्ञाता एवं अधिकारी विद्वान होने के कारण परंपरागत मान्यता अनुसार पूजा-पाठ करने का अधिकार उन्हें ही है।
दैवाधीनं जगत्सर्वं, मंत्राधीनं देवता। ते मंत्रा विप्रं जानंति, तस्मात् ब्राह्मणदेवताः॥ 
यह सारा संसार विविध देवों के अधीन है। देवता मंत्रों के अधीन हैं। उन मंत्रों के प्रयोग-उच्चारण व रहस्य को विप्र भली-भांति जानते हैं। इसलिये ब्राह्मण स्वयं देवता तुल्य होते हैं। निरंतर प्रार्थना, धर्मानुष्ठान व धर्मोपदेश कर के ब्राह्मण सर्वाधिक सम्मानित होता है। ब्राह्मण का सम्मान परंपरागत लोक-व्यवहार में सदा सर्वत्र होता आया है।
BRAHMANS TODAY वर्तमान में ब्राह्मण :: It's very-very difficult, rather impossible to follow-observe the self imposed restrictions-prohibitions-dictates in the life of a Brahmn. It's clearly the reason behind the evolution of the other tree Vern-caste-creed in Hindu religion- society.
One is free to become a Brahmn just by following the long-long list of do's and don'ts.
Daksh Prajapati, who was born out of the right foot-toe of Brahma Ji, may be treated as a Shudr (-born out of the feet of Brahma Ji).
His 13 daughters, who were married to Kashyap-a Brahmn,  followed the dictates of Shashtr; gave birth to all life forms on earth.
Sanctity, righteousness, asceticism, virtuousness, religiosity, truthful, purity, piousity, poverty-donations-charity-kindness, fasting-content-satisfaction, teaching and learning-Purans-Veds-Epics-Shashtr, harmony-peace-soft spoken-decent behavior, tolerance, highly developed-fertile-creative brain, excellent memory-power to retention-grasp, not to envy-anger-greedy-perturbed-tease are synonyms to a Brahmn. 
Today's Brahmns are Brahmns only for the name sake.They are just the carriers of the genes-chromosomes-DNA of their ancestors-Rishis-fore fathers. They are changing with the changing times and do not hesitate-mind, adopting any profession-trade-business-job for the sake of earning money for survival, in the ever increasing race of fierce competition-in a world, which is narrowing down-shrinking, day by day, in an atmosphere of scientific advancement-discoveries-innovations-researches. How ever, which ever is the field, they work-choose, they assert their excellence-highly developed mental caliber-capabilities-capacities, and move ahead of others, facing-tiding over, all turbulence-difficulties-resistances.
संस्कार :: संस्कार का अभिप्राय उन धार्मिक कृत्यों से है, जो मनुष्य में अपने समुदाय का उपयोगी सदस्य बनाने के साथ-साथ उसके शरीर, मन और मस्तिष्क को पवित्रविकसित करके अभीष्ट गुणों को जन्म-विकास करते हैं। मनु और याज्ञवल्क्य के अनुसार संस्कारों से द्विजों के गर्भ और बीज के दोषादि की शुद्धि होती है।
कुमारिल के अनुसार मनुष्य दो प्रकार से समाज के योग्य-उपयुक्त बनता है : (1). पूर्व जन्म के कर्म के दोषों को दूर करने से और (2). इस जन्म में नए सत्  गुणों के विकास से।संस्कारों के द्वारा मनुष्य अपनी सहज प्रवृतियों का पूर्ण विकास करके अपना और समाज दोनों काकल्याण होता है। संस्कार केवल वर्तमान ही नहीं अपितु अगले जन्मों-पारलौकिक जीवन को भी पवित्र बनाते हैं।
हिन्दु धर्म वैदिक संस्कृति में सोलह संस्कारों का वर्णन है।ऋग्वेद और अथर्ववेद में विवाह, गर्भाधान और अंत्येष्टि से संबंधित धार्मिक कृत्यों का वर्णन है।यजुर्वेद में श्रौत यज्ञों का उल्लेख है। गोपथ और शतपथ ब्राह्मणों में उपनयन, गोदान आदि संस्कारों के साथ अन्य धार्मिक कृत्यों का उल्लेख भी है। तैत्तिरीय उपनिषद् में शिक्षा समाप्ति पर आचार्य की दीक्षांत शिक्षा मिलती है। 
गृहसूत्रों में विवाह, गर्भाधान, पुंसवन, सीमंतोन्नयन, जात-कर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्न-प्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन और समावर्तन संस्कारों का वर्णन किया गया है। अंत्येष्टि संस्कार का वर्णन अशुभ समझा जाता है। स्मृतियों के आचार प्रकरणों में संस्कारों का उल्लेख है और तत्संबंधी नियम दिए गए हैं। उपनयन संस्कार के द्वारा व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम और विवाह संस्कार के द्वारा गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है ।
वैखानस स्मृति सूत्र में शरीर संबंधी संस्कारों और यज्ञों में स्पष्ट अंतर मिलता है।प्रत्येक संस्कार से पूर्व अग्निहोत्र-यज्ञ-हवन-होम किया जाता है।आहुतियों की संख्या, हव्यपदार्थों और मंत्रों के प्रयोग में अलग-अलग परिवारों में गृहसूत्र के अनुसार  भिन्न हो सकती है।
ब्राह्मण संस्कार :: ब्राह्मण के तीन जन्म  होते हैं: (1).  माता के गर्भ से, (2). यज्ञोपवीत से व (3). यज्ञ की दीक्षा लेने  से। यज्ञोपवीतके समय गायत्री माता व और आचार्य पिता होते हैं। वेद की शिक्षा देने से आचार्य  पिता कहलाता है। यज्ञोपवीत के बिना, वह किसी भी वैदिक कार्य का अधिकारी नहीं होता। जब तक वेदारम्भ न हो, वह शूद्र के समान है।
जिस ब्राह्मण के 48 संस्कार विधि पूर्वक हुए हों, वही ब्रह्म लोक व ब्रह्मत्व को प्राप्त करता है। इनके बिना  वह शूद्र के समान है। गर्वाधन, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्न प्राशन, चूडाकर्म, उपनयन, चार प्रकार के वेदव्रत, वेदस्नान, विवाह, पञ्च महायज्ञ(जिनसे पितरों, देवताओं, मनुष्यों, भूत और ब्रह्म की तृप्ति होती है), सप्तपाकयज्ञ-संस्था-अष्टकाद्वय, पार्वण, श्रावणी, आग्रहायणी, चैत्री, शूलगव, आश्र्वयुजी, सप्तहविर्यज्ञ-संस्था-अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श-पौर्णमास, चातुर्मास्य, निरूढ-पशुबंध, सौत्रामणि, सप्त्सोम-संस्था-अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम। ये चालीस ब्राह्मण के संस्कार हैं। 
इनके साथ ब्राह्मण में 8 आत्म गुण भी होने चाहियें : 
अनसूया: दूसरों के गुणों में दोष बुद्धि न रखना, गुणी  के गुणों को न छुपाना, अपने गुणों को प्रकट न करना, दुसरे के दोषों को देखकर प्रसन्न न होना। 
दया: अपने-पराये, मित्र-शत्रु में अपने समान व्यवहार करना और दूसरों का  दुःख दूर करने की इच्छा रखना। 
क्षमा: मन, वचन या शरीर से दुःख पहुँचाने वाले पर क्रोध न करना व वैर न करना। 
अनायास: जिन शुभ कर्मों को करने से शरीर को कष्ट होता हो, उस कर्म को हठात् न करना। 
मंगल: नित्य अच्छे कर्मों को करना और बुरे कर्मों को न करना। 
अकार्पन्य: मेहनत, कष्ट व न्यायोपार्जित धन से, उदारता पूर्वक थोडा-बहुत नित्य दान करना।  
शौच: अभक्ष्य वस्तु का भक्षण न करना, निन्दित पुरुषों का संग न करना और सदाचार में स्थित रहना। 
अस्पृहा: ईश्वर की कृपा से थोड़ी-बहुत संपत्ति से भी संतुष्ट रहना और दूसरे के धन की, किंचित मात्र भी इच्छा न रखना। 
जिसकी गर्भ-शुद्धि हो, सब संस्कार विधिवत् संपन्न हुए हों और वर्णाश्रम धर्म का पालन करता हो, तो उसे अवश्य मुक्ति प्राप्त होती है । 
BRAHMAN DISCIPLINE :: The student-Brahmchari will begin-receiving lessons-instructions only after the sacred thread is granted to him-Janeu जनेऊ ceremony. It's essential to accept the sacred knowledge of the Veds. He is asked to wear a chain-garland-string of beads, skin, stick, cloths, sacred thread, recommended for the purpose of education.  He has to follow orders-dictates-sermons-rules-regulations-rituals-practices of his teacher-educator-Guru and remain  as an ascetic, like hermit. He has to become fresh every day by taking bath  and offering tributes to the deities, ancestors, saints. He has to collect flowers, fruits, water,  naturally dried wood, Kush-a grass with sharp edges, cow dung, pure clay-mud-earth and different type of of wood for making hut etc. He should not accept wine, meat-fish-egg-meat products, scents, flower garland-beads, various juices-extracts and reject the company of the women. Violence of any kind, speaking-telling lies, blame-censure-scorn-abuse-defamation-slander-criticism-blasphemy, betting, company of women, sensuality's-passions-sexual acts, greed, anger-envy are not allowed-have to be skipped. He has to remain alone-in solitude with control over himself and all of his faculties.
Begging, only as per need  with self restraint, control over speech-tongue-utterances, from such families only, who have faith in God-Veds-Hawan-Agnihotr, is allowed. In case alums from such families are not available, he may go to the relative of his Guru-own relatives-acquaintances. He should ensure that the alums are not collected from  the same-one family every day, unless-until their is an emergency. Grain collected through begging should constitute  his main food. Dependence over begging for survival is like fasting. One should not beg before- in front of-from  the sinners-wretched-wicked people. Scriptures-Shashtr do not consider this type of collection of alums as begging.
Hawan has to be performed every day by collecting dried wood and sacrifices in the fire are made. The disciple should stand before the Guru with folded hands, and sit  over the ground only when he is asked to sit and that is too without the mat-cushion-seat in high esteem.  He should wake up before the Guru and sleep only when the Guru has slept. He should not speak the name of the Guru and never mimic copy him. He should never criticize the teacher and speak slur against him. He should close his ears if some one is criticizing him and moves away from that place. He should  always remain away-aloof from the company of such people.
The disciple-student-child should come down-out of the vehicle to pay regards-respect to elders-Guru-high and mighty. He should behave with the relatives of the Guru in a manner, similar to that he practices with the Guru.  Wife of the Guru should be treated as the Guru himself, but touching her in any manner is prohibited. Never sit on the same cushion-seat-mat-bed, with sister, mother, daughter and the wife of the Guru-teacher-educator-master-revered-respected person
He should move-come out  of the village before dawn and dusk. Morning and evening prayers-offerings-recitations have to be performed near a water source-body.Mother, father, parents-guardians-elders and brothers must be regarded and should not be betrayed during trouble-difficult times-periods.
Regular service of the parents-Guru ensures education-enlightenment-knowledge. He should not follow any other practices-service unless until ordered by them. He has to adhere to his own Dharm.
ब्राह्मण छात्र धर्म :: यज्ञोपवीत संपन्न हो जाने पर वटु(विद्यार्थी) को व्रत का उपदेश ग्रहण करना चाहिये और वेदाध्ययन करना चाहिये। यज्ञोपवीत के समय जो मेखला, चर्म, दंड, वस्त्र, यज्ञोपवीत आदि धारण करने को कहा गया है, उन्हीं को धारण करे। अपनी तपस्या हेतु ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय होकर गुरु की सेवा में तत्पर रहे व नियमों का पालन करे। नित्य स्नान करके देवता, पितर और ऋषिओं का तर्पण करे। पुष्प, फल, जल, समिधा, मृतिका, कुश, और अनेक प्रकार के काष्ठों का संग्रह करे। मद्य, मांस, गंध,पुष्प माला, अनेक प्रकार के रस और स्त्रियों का परित्याग करे। प्राणियों की हिंसा, शरीर में उबटन लगाना, अंजन लगाना, जूता व छत्र धारण करना, गीत सुनना, नाच देखना, जुआ खेलना, झूंठ बोलना, निंदा करना, स्त्रियों के समीप बैठना,  काम-क्रोध-लोभादि के वशीभूत होना-इत्यादि ब्रह्मचारी के लिए वर्जित है-निषिद्ध हैं। उसे संयम पूर्वक एकाकी रहना है। उसे जल, पुष्प, गाय का  गोबर,  मृतिका और कुशा का संग्रह करे। आवश्कतानुसार भिक्षा नित्य लानी है। भिक्षा मांगते वक्त वाणी पर संयम रखे। जो ग्रहस्थी अपने कर्मों(वर्णाश्रम धर्म) में तत्पर हो, वेदादि का अध्ययन करे, यज्ञादि में श्रद्धावान हो उसके यहाँ से ही भिक्षा ग्रहण करे। इस प्रकार भिक्षा न मिलने पर ही, गुरु के कुल में व अपने बंधु-बांधव-पारिवारिक सदस्य-स्वजनों से भिक्षा प्राप्त करे। कभी भी एक ही परिवार से भिक्षा ग्रहण न करे। भिक्षान्न को मुख्य अन्न माने। भिक्षावृति से रहना, उपवास के बराबर माना गया है। महापातकियों से भिक्षा कभी स्वीकार न करे। इस प्रकार की भिक्षा को शास्त्र में भीख नहीं माना गया है। 
नित्य समिधा लाकर प्रतिदिन सायं काल व प्रात: काल हवन करे। 
ब्रह्मचारी गुरु के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गुरु की आज्ञा से ही बैठे, परन्तु आसन पर नहीं। गुरु के उठने से पूर्व उठे व सोने के बाद सोये, गुरु के समक्ष बड़ी विनम्रता से बैठे, गुरु का नाम न ले, गुरु की नक़ल न करे। गुरु की निंदा-आलोचना न करे, जहाँ  गुरु की निंदा-आलोचना  होती हो वहां से उठ जाये अथवा कान बंद कर ले। गुरु निंदक-आलोचकों से  सदा दूर ही रहे। 
वाहन से उतर कर  गुरु को अभिवादन-प्रणाम करे। एक ही वाहन, शिला, नौका आदि पर बैठ सकता है। गुरु के गुरु-श्रेष्ठ सम्बन्धी-गुरु पुत्र के साथ गुरु के समान ही व्यवहार करे।गुरु की सवर्णा स्त्री को गुरु के समान ही समझे परन्तु पैर दवाना, उबटन लगाना, स्नान कराना निषिद्ध हैं।बहन-बेटी-माता के साथ  कभी भी एक ही आसन पर न बैठे। 
गाँव में सूर्योदय व सूर्यास्त न होने दे-जल के निकट-निर्जन स्थान पर दोनों संध्याओं में संध्या-वंदन करे।  
माता, पिता, आचार्य व भाई का विपत्ति में भी अनादर न करे, सदा आदर करे। 
माता, पिता,आचार्य की नित्य सेवा-शुश्रूषा करने से ही विद्या मिल जाती है। इनकी आज्ञा से ही किसी अन्य धर्म का आचरण करे अन्यथा नहीं।  
MAJOR CHARACTERISTICS OF KSHATRIY  क्षत्रिय गुण धर्म :: Stout strong muscular body, physical strength. मजबूत शरीर, बाहु बल, साहस, पौरुष बहादुरी, हिम्मत।  
bears-carries, armors-weapons for the protection of community, poor, down trodden. शस्त्र धारण करना, समाज सेवा-रक्षा। 
protection and safety of dependents.  अपने पर निर्भर की रक्षा सहायता। 
joins army-forces as carrier.  सेना-फौज-शस्त्र बल में शामिल होना। 
punishment of out laws-criminals. अपराधियों, चोर, उच्क्कों, बदमाशों, उठाई गीरों  को दंड देना।  
donates liberally to Brahmns. ब्राह्मणों को खुले हाथ से दान देना। 
studies Shashtr-scriptures. शास्त्रों का अध्ययन करना। 
organize Yagy Hawan, Agnihotr, prayers, religious ceremonies. हवन, अग्नि होत्र, यज्ञ, प्रार्थना धार्मिक-सामाजिक कार्यों का आयोजन। 
nourishment-nurture of saints-Holy people-Brahmns. ब्राह्मण,साधु पुरुष, संत महात्मा आदि का पालन पोषण करना। 
MAJOR TRAITS-CHARACTERISTICS OF VAESHY वैश्य गुण धर्म :: Vaishy community constitute the 3rd Vern of Hinduism. It's major traits-characteristics include trading, agriculture, business and animal husbandry.  हिन्दु धर्म में वैश्य समुदाय की विशिष्ट भूमिका है। खेती बाड़ी, पशु पालन, व्यापार उनके प्रमुख कार्य हैं। 
They offer money to the Brahmns for helping in Yagy, Hawan, prayers, marriages, rituals, social activities. वे ब्राह्मणों को यज्ञ, हवन, प्रार्थना, शादी, सामाजिक कार्यों धन प्रदान करते हैं।
They contribute to exchequer through taxes. राज कोष में कर जमा करते हैं। 
Building hospitals-inns-temples, digging ponds-lakes, tree plantations and all sorts of socially useful works. धर्मशाला अस्पताल विद्यालय मंदिर का निर्माण, तालाब-झील  का खुदवाना, पेड़ लगवाना व अन्य सामाजिक कार्य करवाना। 
Donate money to poor, needy and Brahmns. ग़रीबों-जरुरतमंदों ब्राह्मणों को दान देना। 
Learning scriptures-Shastr. धार्मिक ग्रंथों-शास्त्रों  को पढ़ना। 
MAJOR TRAITS-CHARACTERISTICS OF VAESHY शूद्रों के गुण धर्म  :: Initially Shudr community evolved out of the feet of Brahma. It was a divine creation meant for manual jobs-functions. शूद्रों का उद्भव ब्रह्मा जी के पैरों से हुआ और उनकी विशेषता हाथ से कार्य करना है। 
brahman
प्रजापति ब्रह्मा 
Daksh Prajapati, too evolved out of the feet (-from the right toe) of Brahma Ji. His 13 daughters got married to Kashyap and entire Srashti (-life on earth) is the out come of his sexual intercourse-endeavors with his wives. दक्ष प्रजापति का जन्म ब्रह्मा जी के दायें पैर के अंगूठे से हुआ।इस के हिसाब से वे भी शुद्र हुए। उनकी 13 पत्नियों का विवाह कश्यप जी से हुआ, जिससे सभी प्राणियों का उदभव हुआ। इस हिसाब से न तो कोई जाति  हीन है, न महान, न तो कोई छोटा है, न बड़ा। सब बराबर हैं। 
Earning livelihood through the services of Dwijatis.  द्विजातियों  की सेवा। 
Craftsmanship as a profession.  दस्कारी। 
barter-sale of goods-merchandise.  वस्तुओं का आदान प्रदान बिक्री।  
high domicile and polite behavior.  उच्च उत्तम व्यवहार व नम्रता । 
honestly serving the masters.  ईमानदारी के साथ अपने स्वामी की सेवा।  
Performance of Yagy without the recitation of Mantr (-to protect from the ill effects of incorrect pronunciation).  यज्ञ-मन्त्र, रहित।  
Free to eat anything-wine consumption-smoking etc. मांस मीट मदिरा धुम्रपान के लिए स्वतंत्र । 
Protection of Brahmns. ब्राह्मणों की रक्षा। 
Anyone who has adopted service as a profession, is like a Shudr  till he does not adopt-revert back to the Nihit and Vihit Karm- duties of Dwijatis.  कोई भी व्यक्ति जो कि नौकरी केर रहा है, अपने कार्यकाल में शुद्र कहलायेगा। 
VARNASHRM DHARM वर्णाश्रम धर्म :: Accomplishment is attained by an individual worshiping the Almighty, from whom all the organisms have evolved and by whom the entire universe is pervaded, through his natural-instinctive-prescribed-Varnashram related deeds.

One should pray to the Almighty from whom the entire Universe has evolved, who operates the world, who is the creator-producer-founder and illuminator, administrator-organizer-who alone is complete amongest all–who was present before creation of infinite universes and who will remain after assimilation of infinite universes in him and who is pervaded in infinite universes, is worshiped automatically if the individual performs his natural-prescribed-Varnashram dutiesPerformance of the prescribed-Varnashram duties assigned to the individual, itself is worship of the God.
Duties assigned to Brahmns are: acquiring knowledge- learning and training for self, educating others, performing Yagy-sacrifices, accepting and making donations/charity, piousness-purity, performing natural deeds, Satvik food habits. All of his movements should be directed towards the service of the four Vern and the mankind, in whom the Almighty is pervaded. He has to perform all his duties happily, with pleasure and devotion to God as per his dictates, with wisdom.
Kshatriy has five natural-instinctive duties: protecting the people- bravery- spirited-majestic actions, donations, Yagy, studies, consumption of food, leading to worship of God pervaded in all communities, automatically.
Vaishy worship the God by his natural instincts, such as Yagy, studies, donations, accepting interest, agriculture, protection of cows and trade-business.
Shudr should perform his prescribed, natural duties-instinctive services to worship the God, inclusive of consumption of food, sleep-awakening with the realization of presence of God in all of the four Vern. Anyone who is getting paid for the job performed by him is considered as a Shudr.
FOUR STAGES-ASHRAMS OF HUMAN LIFE :: The 4 stages of life are called Ashrams-the spiritual shelter from cradle to grave-cremation. These Ashrams are the stages to fulfill the goals in life named Dharm Arth, Kam and Moksh. The Ashram system along with caste system is losing its hold during the present cosmic era-Kal Yug.
Early child hood constitutes the first stage in the life a Brahmchari. The child is supposed to be with his family till he acquires an age of 5 years. He in initiated into education by performing Janeu ceremony and sent to Guru Kul for education. He was provided education according to intelligence and taste in religion, philosophy, martial arts, astrology, medicine, dance-music, animal husbandry etc. Stress was laid over self-discipline, righteousness, piousness, virtuousness.
Brahmchary Ashram: This period is divided into various stages: Shaishwavastha (0-2 years), Balyavastha (3-12) years, Koumaryavastha (12-18 years), Kishoravastha Trunavastha (18-25 years). This is the period for celibate and simple living, free from sense of pleasure and material allurement, serving the guru (spiritual teacher), collection of alms, study-understand-assimilate the Veds in addition to normal trades, develop appropriate qualities: humility, discipline, simplicity, purity of thought, cleanliness, soft-heartedness etc.
Grahasth Ashram (25-60) years): It constitutes of married-family life as a household. Youvan (youth)-normally continue till 35-40 years. One earns sufficient money for his family and looks after their day today needs. Thereafter one turn into a Proudh and this stage is termed as Proudhavastha (middle age)-the stage of maturity continues till 60 years of age. There after its Vraddhavastha (-old age).
This is the period for earning and accumulating for the lean season, enjoy sensual pleasure according to ethical principles, performing and observing sacrifices, religious rituals, protection  and nourishment of  family members (-wife, children and elders), educating children spiritual-ethical values-norms, charity-donations according to capacity-capability and feed holy people, Brahmns, the poor and animals.
VRADDHAVASTHA (old age)is associated with Vanprasth and Sanyas Ashram.
Once the children have matured and settled, one may gradually retire from family responsibilities-withdrawal from the world-hectic life, along with his wife, and focus-train his mind on spiritual matters. One goes for pilgrimage-religious places-holy shrines-temples-holy rivers, accompanied by his wife. Sexuality-sensualities are forbidden-completely discarded. Vanprasth stands for forest-jungle abode. Wisdom-spirituality-ascetics dominate this stage. This stage begins when his duty as a householder comes to an end, having become a grandfather children are grown up, establishing themselves or becoming independent. All physical, material, sexual pleasures are forbidden. One retires from social and professional life, leaves his home and adopts forest asylum-shelter, spending his time in prayers. His wife accompanies him. The life is really harsh and full of rigors.  One devotes himself completely-whole heartedly to spirituality-austerity-penance-pilgrimage.
SANYASI-THE WANDERING ASCETIC-RECLUSE :: Human life is divided in four stages called Ashrams in Hinduism. Brahmchary (-the life of a celibate), Grahasth (-the life of a householder), Vanprasth (-the life of retirement or a forest recluse) followed by Sanyas (-sage-saint-hermit-sadhu). One who adopts the Sanyas or renunciation leads very austere and ascetic life, without the desire for comforts-luxuries. He remembers the Almighty with barest possible needs preparing for the next birth. One discards ownership, doer-ship, renounces all desires, relationships, attachments- possessions, and self-preservation-ego-identity. Equanimity, selflessness are integral features of Sanyas. Pains, sufferings, ridicule and criticism have no place in this Ashram.
Renunciation-Relinquishing-Retirement seems to be synonymous. In the 3rd stage called Vanprasth (-the Hermit), one withdraws him self from active life, leaving behind his family and household; goes to a forest or hermitage where he prepares himself for the hardships of the next stage, which is the life of renunciation and self-negation. It is said that he should opt for this after becoming grandfather. An individual spends his life in acquiring knowledge-1st stage: Brahmchary and becoming a household; Grahasth-2nd stage, performing obligatory duties towards himself, parents, family and the society.
Sanyas is the stage, which is like the preparation for Moksh-Salvation-Assimilation in God-Liberation. Desire for achievement-attainment of Salvation-Moksh assimilation in the Ultimate-too distract the devotee from the Almighty; since Bhakti Yog  weighs supreme to both to Karm Yog (-performance-deeds) and Gyan Yog (-enlightenment). One who has renounced shall not target-aim anything, how so ever high or valuable, it might be.
One, who enters this stage, is forbidden from maintaining any social or family contact. He is advised not to perform the sacrificial fire-Hawan-Agnihotr. One becomes Tapsvi-ascetic, an embodiment of fire-glow that manifests him as a radiant spiritual energy. One is also forbidden from the use of fire either for cooking-heating-warming or for ritualistic purposes. One is expected to subsist on whatever food he could find from begging only once a day and also progressively reduce his intake of food to become free from the desire to live or survive.
The Vaishy and Shudr communities are not bound-subjected to this obligation. In present times one cannot think of it either. It is however not compulsory for a person to become a Sanyasi only at this stage. While this is an ideal prescription in scriptures-Shashtr, there is no hard and fast rule for a person to enter the life of a Sanyasi. One can become Sanyasi at any stage in his life. One may seek guidance-advice-patronage from the enlightened-gurus-spiritual mentors, blessed with wisdom-enlightenment-prudence and ability. Their advice is useful-valuable for the ascetic life, leading to the spiritual path-journey.
The distinguished Brahmns generally follow this path to Salvation. One such may be found in one langoti-loin cloth or saffron robes.
वर्णाश्रम धर्म :: 
* मानव जीवन के 4 उद्देश्य हैं : धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष।

* पूर्ण आयु 4 भागों में विभक्त है : ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास।

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष एक दूसरे के पूरक हैं। धर्म से मोक्ष और अर्थ से काम साध्‍य माना गया है। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ जीवन में धर्म, अर्थ और काम का महत्व है। वानप्रस्थ और संन्यास में त्याग तथा मोक्ष का महत्व माना गया है।
* ऋषि-मुनि-त्यागी-निस्पृह-विरक्त-साधु वन में कुटी बनाकर, गुफाओं-कन्दराओं तथा पर्वतों पर  रहते थे। प्रभु आराधना, चित्त संयम, ध्यान, योग और तपस्या में उनका जीवन अर्पित होता था। 
गुरुकुल व आश्रमों में अध्यापन-शिक्षण-विद्या अध्ययन-वेदाध्यन का प्रावधान होता था ।सत्य, तर्क, दर्शन, विज्ञान, धर्म आदि 64 विषयों की शिक्षा का प्रावधान इन गुरुकुलों में होता था।  
ब्रह्मचर्य आश्रम का निर्वाह गुरुकुल में होता था। ये शिक्षा के साथ धर्म के केंद्र भी थे।शुद्ध  मन-मस्तिष्क, बुद्धि, चित्त, हृदय, प्राण, ध्यान, जिव्हा संयम, चेतना,  पुष्‍ट शरीर, प्रखर-सुसंस्कृत बुद्धि, प्रबुद्ध प्रज्ञा प्राप्त कर स्नातक  ग्रहस्थ जीवन में प्रवेश करता था। विवाह सम्पन्न  कर  सामाजिक दायित्व का व संतानोत्पत्ति कर पितृऋण-पितृ यज्ञ का निर्वाह-सम्पादन करता था।
वैदज्ञ मानते हैं कि ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम में रहकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का ज्ञान प्राप्त करते हुए  व्यक्ति को 50 वर्ष की उम्र के पश्चात वानप्रस्थ आश्रम में रहकर धर्म और ध्यान के साथ मोक्ष की अभिलाषा सहित मुमुक्ष हो चाहिए।
प्रत्येक गुरुकुल व आश्रमों की अपनी व्यवस्था-नियम होते हैं। आश्रम शिक्षा, धर्म और ध्यान व तपस्या के केंद्र थे। राज्य व समाज आश्रमों को आर्थिक सहायता प्रदान करते थे।मंदिर में पुजारी-पुरोहित, मठ-आश्रम में मठाधीश/महंत, गुरुकुल में कुलपति, प्राचार्य व आचार्य होते थे।राज्य को अनुशाषित रखने  में इनकी अहम भूमिका होती थी। राज्य, समाज, मंदिर, गुरुकुल  और आश्रम मिलकर धर्म संघ का निर्माण करते थे
जीवन को  व्यक्ति की उम्र 100 वर्ष मानकर  ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास; आश्रमों में बांटा गया है।
ब्रह्मचर्य : 25 वर्ष तक की आयु में शरीर, शिक्षा, मन और ‍बुद्धि का विकास। 
गृहस्थ आश्रम : 25 से 50 वर्ष की आयु। विवाह कर पति-पत्नी धार्मिक जीवन व्यतीत करते हुए परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह, व्यवसाय नौकरी करते हुए अर्थ और काम का सम्पादन।
वानप्रस्थ : 5से 75 तक की आयु से गृहस्थ भार से मुक्त होकर वन में निवास। धूप-ताप-बरसात-भूख को बर्दाश्त करना।   
संन्यास आश्रम : सब कुछ त्याग कर एक बार भिक्षा वृती द्वारा शेष जीवन का निर्वाह। 
120px-Nazi_Swastika.svg.pngSwastik-World wide: Ary-Hindu- Sanatan Dharm connection :: स्वास्तिक एक ऐसा चिन्ह है, जो कि दुनियां के हर भाग में मिलता है-पाया जाता है।  यह सनातन-हिन्दु(आर्य एक आदि नाम है जो हिन्दुओं के लिए अति प्राचीन कल से प्रयुक्त होता आ रहा है और वर्तमान में भी प्रयोग में आता है । धर्म के नौं चिन्हों में से एक है। इसका प्रयोग नाज़ी-जर्मनी, के चांसलर हिटलर के द्वारा किया गया।Swastik is a religious sign which has been found almost everywhere including ancient lost civilizations. Scriptures mention the origin of all life forms from one person-Kashyap, a son of Brahma Ji and his 13 wives. Initially life originated in Brahm Lok and there after it moved to the earth and other Lok (7 Heavens,7 Patals and 26 Hells).
भगवान राम द्वारा युद्ध में मारे गए वानरों को जीवन दान दिया गया व उनसे वर मांगने को कहा। वानरों ने रावण की अनेकों पुत्रियों से उनका विवाह करने की प्रार्थना की। भगवान राम ने उनकी इच्छा पूरी की व उनको जालंधर (-समुद्र पुत्र, माता लक्ष्मी के भाई) द्वारा उत्पन्न किये गये 7 द्वीपों-जिनमें से बर्लिन भी एक था में, बसाया। लाल मुंह वाले व्यक्ति उन्हीं वानरों व रावण पुत्रियों की सन्तति हैं।
Bhagwan Ram made the Vaners (-a breed resembling monkeys-due to tail, with rest of features like men) alive and asked them to seek some boons, who in turn requested to be married to the daughters of Ravan, produced through illegitimate relations with innumerable women forcibly. Bhagwan fulfilled their desire and awarded them with the 7 islands created by Jalandhar-son of Samudr and brother of Ma Laxmi.  One of such islands is Berlin now Germany.                
 हिंदु धर्म के चिन्ह: शंख, चक्र, गदा, कमल,  ध्वजा, ॐ ,स्वास्तिक, त्रिशूल, कलश।   
WORSHIP पूजा-अर्चना :: Worship and religion are two concepts which are closely nit together. One may worship a living being-legend, who is his ideal/God father/guardian/patron. Hero worship is prevalent in all societies.
This is curious that most of the places of worship have been built over the remains of ancient shrines/temples.
There is no doubt that these temples were devoted to the worship of SUN in addition to the various incarnations of the Almighty. Sun worship is prevalent in the traditional form of worship in the present communities-spreaded all over the world, although they have switched their loyalty to some other religion/faith. Rituals-dances-prayers, still portrait the significance of it, which needs to be studied by the currently surviving population of the world. Most curious-significant-astounding reality is that, almost each and every where these practices were in common. 
What is more peculiar is that the structures located thousands of miles/kilo meters apart have identical formations-designs-architecture. Is it not wonderful that almost all of them lie over certain longitude and latitude.
RELIGION AND POLITICS :: Religion and politics constitute the two sides of the same coin, which can never become one being on opposite sides of it, like the two banks of a river, in the present world. It can easily be proved with reference to the Arabs and Indians. As far as Indians are concerned they are one step further. Politics in India is purely pseudo secularism. Most of the political parties appease the converts, just to retain power at the cost of majority population. The dilemma is that the political heads of some of these so called seculars too belong to Hindu community.
As far as the head of the political party in power is concerned its really very difficult to say what is her religion. A Kashmiri Brahman's grand daughter marries a Muslim. Her sons had Hindu names and surnames. One of her son's, married to a Sikh girl. The elder one got married to a Christian. Their children have Hindu names and surnames but they marries Christians. The daughter has adopted a Christian surname. What is their true identity: Cosmopolitans/Indians/Italians ?
This family has been associated with numerous scandals and corruption cases at present and the past. Still the common Indian is not able to identify their real goal: destabilizing India. Yes, she some success now. The Indian  Rupee has gone down 66 times as compared to a Dollar in 66 years of misrule/mis management/her patronage.
Dirty politics has inflicted religion as well. One can find more than 534 factions/branches/tributaries in a single religion. If the religion is same, then why these factions/ if the God is one, then why so many religions/faiths/factions? The answer is to propagate/perpetuate/flourish these power hungry-shame less-root less-base less politicians.

No comments:

Post a Comment