Thursday, June 13, 2013

10 MAHA VIDYA महा विधा

10 MAHA VIDYA
महा विधा
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]

Mata Adi-Para Shakti appeared before the Trinity-creator and protector of all worlds i.e., Bhagwan Brahma, Vishnu & Mahesh, demigods & the deities in ten forms at different times and in different moods suited to the occasion. The manifestation of the ten forms Mata Adi Shakti is known as Das Maha Vidya.

Once during their numerous love games, things got out of hand between Bhagwan Shiv and Maa Parvati. What had started in jest turned into a serious matter with an incensed Bhagwan Shiv threatening to walk away from Maa Parvati. Coaxing or cajoling by Mata Parvati could not persuade him. Left with no choice, Maa Parvati multiplied herself into ten different forms for each of the ten directions. Thus however, hard Bhagwan Shiv tried to escape from his beloved Maa Parvati, he would find her standing as a guardian, guarding all escape routes, in all the 10 directions.

अघोरपंथ में विभिन्न प्रकार की सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने के लिए हासिल किया जाता है। प्रमुख रूप से 10 सिद्धियों को जाना गया है, जिनमें से 4 को काली कुल और छ: को श्री कुल में रखा गया है। काली कुल की 4 साधनायें हैं और श्री कुल की 6 साधनायें हैं। महाविद्या साधना करने के लिए किसी व्यक्ति का ब्राह्मण होना अनिवार्य नहीं है। महाविद्या की साधना कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इसमें जाति, वर्ग, लिंग आदि का कोई भेद नहीं है और सभी प्रकार के बन्धन से मुक्त है। सभी महाविद्याओं  में भैरव की उपासना भी कर लेनी चाहिए, क्योंकि ये महाविद्याएँ हैं; अतः इनकी क्रिया जटिल है। इनकी साधना शुरु करने से साधक-भक्त को पंच शुद्धियाँ :- स्थान शुद्धि, देह शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, देव शुद्धि और मंत्र शुद्धि; कर लेनी चाहिए।यह क्रिया किसी समर्थ, योग्य, अनुभवी साधक-गुरु के संरक्षण में  ही करनी चाहिये। 
आगम शास्त्र में अविद्या, विद्या एवं महाविद्या, इन तीन शब्दों का वर्णन है। जो साधना, रहस्य, ज्ञान सांसारिक कार्यों में साधक की सहायता करती हैं, उसे अविद्या कहते हैं। जो मुक्ति का मार्ग बताती हैं, उसे विद्या कहते हैं। जो भोग और मोक्ष दोनों देती है, उसे महाविद्या कहते हैं। इन महाविद्याओं के प्रकट होने की कथा इस प्रकार महाभागवत देवी पुराण में वर्णित है। 
(1). साधक स्वयं की देह को शुद्ध  करने के लिये मंत्रो के द्वारा स्नान करना चाहिये।
(2). पूजन स्थान का शोधन करना चाहिए है।
(3). देह का शोधन करने हेतु आसन पर आसीन होकर प्राणायाम तथा भूत शुद्धि की क्रिया से अपने शरीर का शोधन करना चाहिए।
(4). ईष्ट देवता की शरीर में प्रतिष्ठा कर नाना प्रकार के न्यास इत्यादि कर अपने शरीर को देव-भाव से अभिभूत कर अपने ईष्ट देवता का अन्तर्यजन करना चाहिये। शास्त्रों में कहा गया है :- "देवम् भूत्वा देवम् यजेत" अर्थात् देवता बनकर ही देवता की पूजा की जा सकती है।
(5). ईष्ट देवता बहिर्याग पूजन का मतलब यह है कि अन्दर तो देवता स्थापित है ही परन्तु उसको बाहर लाकर बाहर भी पूजा की जाती है। जैसे यंत्र आदि में स्थापित देवता की पूजा की जाती है। 
ईष्ट देवता का आह्वान कर मंत्र द्वारा संस्कार करना चाहिए। इसके पश्चात पंचोपचार, षोडषोपचार अथवा चौसठ उपचारों के द्वारा महाविद्या यंत्र में स्थित देवताओं का पूजन कर, उसमें स्थापित देवता की ही अनुमति प्राप्त कर पूजन करना चाहिए। फिर अन्तिम समय में तर्पण करके, हवन वेदी को देवता मानकर अग्नि रूप में पूजन कर विभिन्न प्रकार के द्रव्यों को भेंट कर उसे पूर्ण रूप से सन्तुष्ट करना चाहिए।इसके बाद देवता की आरती कर पुष्पांजलि प्रदान करनी चाहिये। इसके कवच-सहस्रनामं स्त्रोत्र आदि का पाठ करके स्वयं को देवता के चरणों में समर्पित करना चाहिए। तत्पश्चात देवता के विसर्जन की भावना कर देवता को स्वयं के हृदय में प्रतिष्ठित करना चाहिए और शेष सामग्रियों को जल में प्रवाहित कर देना चाहिए।
Each of the Devi's manifested forms made Bhagwan Shiv realise essential truths, made him aware of the eternal nature of their mutual love and most significantly established for always that she was his strength-might. They are inseparable thus Bhagwan Shiv is called Ardh Narishwar (अर्धनारीश्वर). This event enlightened Bhagwan Shiv more and he did not feel belittled by this awareness-spiritually awakened. Befittingly thus they are referred to as Maa Bhagwati's wisdom, known in Sanskrat as the Maha Vidya. Indeed in the process of spiritual learning Maa Bhagwati is the muse who guides and inspires one. She is the high priestess who unfolds the inner truths.

10 MAHA VIDYA KAVACH (SHIELD) दस महा विधा कवच :: This is the shield from evil forces which are always willing to harm the individual. This Ten Maha Vidya Strotr (prayer, lyrics, verse, rhyme-poetic composition) is very important due to its efficacy. One who recite this verse everyday with due procedure-methodology is granted protection from evils. Maa Bhagwati Parwati through her 10 forms, incarnation, divisions bless one with joy, happiness and totality.

श्री महा विधा कवच ::

विनियोग :: 

ॐ अस्य श्रीमहा-विधा-कवचस्य श्रीसदा-शिव ॠषि:, उष्णिक छन्द:, श्रीमहा-विधा देवता, सर्व सिद्धी-प्राप्त्यर्थे पाठे विनियोग:। 

ॠष्यादी न्यास ::  

श्रीसदा-शिव-ॠषये नम: शिरसी, उष्णिक-छन्दसे नम: मुखे, श्रीमहा-विधा-देवतायै नम: ह्रीदी, सर्व-सिद्धी-प्राप्त्यार्थे पाठे विनियोगाय नम: सर्वाङ्गे।

मानस-पूजन :: 

ॐ पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमहा-विधा-प्रीत्यर्थे समर्पयामी नम:। ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमहा-विधा-प्रीत्यर्थे समर्पयामी नम:। ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धुपं श्रीमहा-विधा-प्रीत्यर्थे घ्रापयामी नम:। ॐ रं अग्नी-तत्त्वात्मकं दीपं श्रीमहा-विधा-प्रित्यर्थे दर्शयामी नम:। 
ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेधं श्रीमहा-विधा-प्रीत्यर्थे निवेदयामी नम:। ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बुलं श्रीमहा-विधा-प्रित्यर्थे निवेदयामी नम:।

श्रीमहा विधा कवच ::

ॐ प्राच्यां रक्षतु मे तारा, काम-रुप-निवासिनी। 

आग्नेयां षोडशी पातु, याम्यां धुमावती स्वयम॥1॥ 

नैर्ॠत्यां भैरवी पातु, वारुण्यां भुवनेश्वरी। 

वायव्यां सततं पातु, छिन्नमस्ता महेश्वरी॥2॥ 

कौबेर्यां पातु मे देवी, श्रीविधा बगला-मुखी। 

ऐशान्यां पातु मे नित्यं महा-त्रिपुर-सुन्दरी॥3॥ 

उर्ध्वं रक्षतु मे विधा, मातङ्गी पिठ-वासिनी। 

सर्वत: पातु मे नित्यं, कामाख्या कालिका स्वयम॥4॥

ब्रह्म-रुपा-महा-विधा, सर्व-विधा-मयी स्वयम। 

शिर्षे रक्षतु मे दुर्गा, भालं श्रीभव-गेहिनी॥5॥

त्रिपुरा भ्रु-युगे पातु, शर्वाणी पातु नासिकाम। 

चक्षुषी चण्डिका पातु, श्रीत्रे निल-सरस्वती॥6॥

मुखं सौम्य-मुखी पातु, ग्रिवां रक्षतु पार्वती। 

जिह्वां रक्षतु मे देवी, जिह्वा-ललन-भीषणा॥7॥ 

वाग्-देवी वदनं पातु वक्ष: पातु महेश्वरी। 

बाहु महा-भुजा पातु, करांगुली: सुरेश्वरी॥8॥ 

पृष्‍ठत: पातु भिमास्या, कट्यां देवी दिगम्बरी। 

उदरं पातु मे नित्यं, महा-विधा महोदरी॥9॥ 

उग्र-तारा महा-देवी, जंघोरु परी-रक्षतु। 

गूदं मुष्कं च मेढुं च, नाभीं च सुर-सुन्दरी॥10॥ 

पदांगुली: सदा पातु, भवानी त्रिदशेश्वरी। 

रक्तं-मांसास्थी-मज्जादिन, पातु देवी शवासना॥11॥ 

महा-भयेषु घोरेषु, महा-भय-निवारीणी। 

पातु देवी महा-माया, कामाख्या-पिठ-वासिनी॥12॥ 

भस्माचल-गता दिव्य-सिंहासन-कृताश्रया। 

पातु श्रीकालिका-देवी, सर्वोत्पातेषु सर्वदा॥13॥ 

रक्षा-हिनं तु यत स्थानं, कवचेनापी वर्जितम। 

तत्-सर्व सर्वदा पातु, सर्व-रक्षण-कारीणी॥14॥ 

Bhagwati Kali is the Krashn Murti. Tara Devi is the blue form, Bagala is the tortoise incarnation, Dhumavati is the boar, Chhinnmasta is Nar Singh, Bhuvneshwari is Vaman, Matangi is the Ram form, Tripur is Jamdagni, Bhaervi is Bal Bhadr, Maha Lakshmi is Buddh, and Durga is the Kalki form.  

The worship prescribed as an astrological remedy for the 9 planets and the Lagn ::  Kali for Saturn, Tara for Jupiter, Maha Tri Pur Sundri (or Shodshi-Shri Vidya) for Mercury, Bhuvneshwari for Moon, Chhinnmasta for Rahu, Bhaervi for Lagn, Dhum Vati for Ketu, Bagala Mukhi for Mars, Matangi for Sun and Kamala for Venus.

प्रवृति के अनुसार दस महाविद्या के तीन समूह हैं। पहला :- सौम्य कोटि (त्रिपुर सुंदरी, भुवनेश्वरी, मातंगी, कमला), दूसरा :- उग्र कोटि (काली, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगलामुखी), तीसरा :- सौम्य-उग्र कोटि (तारा और त्रिपुर भैरवी)।

(1). KALI माँ काली :: 
दस महाविद्याओं में यह प्रथम हैं। कलियुग में इनकी पूजा अर्चना से शीघ्र फल मिलता है। देवी कालिका की काले हकीक की माला से 9, 11, 21 बार जाप करना चाहिए। कालिका की आराधना असाध्य बीमारी से मुक्ति, दुष्ट आत्माओं या क्रूर ग्रहों से बचाव के लिए की जाती है। इसके अलावा अकाल मृत्यु से बचाव और वाक सिद्धि प्राप्त करने के लिए माता काली की आराधना की जाती है। षटकर्म तो हर महाविद्या की देवी कर सकती है। षट कर्म मे मारण मोहन वशीकरण सम्मोहन उच्चाटन विदष्ण आदि आते हैं। परन्तु बुरे कार्य का अंजाम बुरा ही होता है। बुरे कार्य का परिणाम या तो समाज देता है या प्रकृति या प्रारब्ध या कानून देता ही है। इसलिए अपनी शक्ति से शुभ कार्य करने चाहिए।

मंत्र :: ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहाः। 

Maa Bhagwati Kali is the Krashn Murti-dark image of the Maa Parwati. Maha Vidya-Ultimate knowledge, are worshipped to attain all sorts of power. This is concentration (meditation, Sadhana) when the devotee worship one of the incarnations of Maa Bhagwati. This is a mode to please the deity and seek her blessings. Yantr and Mantr are considered very effective mediums-tools, through which worshippers can reach the target and fulfil their motive-desire.

Kali is the first of the Das Maha Vidya. She is eternal beyond the limits of time. She takes away the Tamas (laziness, negative thoughts-ides, darkness) and fills one with the light of wisdom, that is why, she is the embodiment of Gyan Shakti-enlightenment. She resides in the cremation grounds, where all creation dissolves. Mata Sati took the form of Kali. This form was fierce-fearful, her hair untied and loose, her body with the colour of a dark clouds. She had deep set eyes and eyebrows shaped like curved swords. She stood on a corpse, wore a garland of skulls and earrings made from the bones of corpses. She had four hands. On one hand, she had a skull and over the other she had a curved sword, with blood dripping on it. Other two hands had the Mudra-formation granting fearlessness & the other giving blessings. She roared and the ten directions were filled with that ferocious sound.

The exploits of Maa Kali are outlined in the Chandi Path. Maa killed the demons called Chand and Mund (चंड और मुंड) and also drank the blood of Rakt Beej (रक्त बीज़, seed, millions of demons who originated from the drops of blood). She is known as Kaushiki (कौशिकी), who came from within and is the slayer of Shumbh and Nishumbh (शुम्भ, निशुम्भ).

BEEJ MANTR :: 

(1). ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी कालिके स्वाहा। 

(2). ॐ क्रीं कालिकायै नमः। 

Om Kreem Kalikayae Namah. 

(3). नमः ऐं ऐं क्रोम क्रोम फट् स्वाहा काली कालिके हूँ। 

Namah Aim Aim Krom Krom Phat Swaha Kali Kalike Hoom.

(4). क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं हूँ हूँ दक्षिणे  कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूँ हूँ स्वाहा। 

Kreem Kreem Kreem Hreem Hreem Hoom Hoom Dakshine  Kalike Kreem Kreem Hreem Hreem Hoom Hoom Swaha.

GAYATRI MANTR :: 

ॐ महा काल्यै च विद्महे श्मशान वासिन्यै च धीमहि तन्नो काली प्रचोदयात्।

महाकाली महाविद्या दीक्षा ::

नाम :- माता कालिका,

शस्त्र :- त्रिशूल और तलवार,

वार :- शुक्रवार,

दिन :- अमावस्या,

ग्रंथ :- कालिका पुराण,

मंत्र :- "ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि कालिके स्वाहा"

दुर्गा का एक रूप :- माता कालिका 10 महाविद्याओं में से एक हैं। 

माँ काली के 4 रूप :- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली।

राक्षस वध :- रक्तबीज।

कालिका के प्रमुख तीन स्थान :- कोलकाता में कालीघाट पर जो एक शक्तिपीठ भी है। मध्यप्रदेश के उज्जैन में भैरवगढ़ में गढ़कालिका मन्दिर शक्तिपीठ है और गुजरात में पावागढ़ की पहाड़ी पर स्थित महाकाली का जाग्रत मन्दिर चमत्कारिक रूप से मनोकामना पूर्ण करने वाला है।

माँ महाकाली की कृपा से व्यक्ति शत्रुओं को निस्तेज एवं परास्त करने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह शत्रु आभ्यांतरिक हों या बाहरी, इस दीक्षा (Initiation, baptization) के द्वारा उन पर विजय प्राप्त कर लेता है। शक्ति स्वरूपा माँ महाकाली शत्रुओं का संहार कर अपने भक्तों को रक्षा कवच प्रदान करती हैं। जीवन में शत्रु बाधा एवं कलह से पूर्ण मुक्ति तथा निर्भीक होकर विजय प्राप्त करने के लिए यह दीक्षा अद्वितीय है। माँ के दर्शन भी इस दीक्षा के बाद ही सम्भव होते है, इस दीक्षा के माध्यम से कालिदास में ज्ञान का स्रोत फूटा था, जिससे उन्होंने मेघदूत, ऋतुसंहार जैसे अतुलनीय काव्यों की रचना की थी। 

महाकाली दीक्षा के माध्यम से व्यक्ति शत्रुओं को निस्तेज एवं परास्त करने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह शत्रु आभ्यांतरिक हों या बाहरी, इस दीक्षा के द्वारा उन पर विजय प्राप्त कर लेता है, क्योंकि महाकाली ही मात्र वे शक्ति स्वरूपा हैं, जो शत्रुओं का संहार कर अपने भक्तों को रक्षा कवच प्रदान करती हैं। जीवन में शत्रु बाधा एवं कलह से पूर्ण मुक्ति तथा निर्भीक होकर विजय प्राप्त करने के लिए यह दीक्षा अद्वितीय है। देवी काली के दर्शन भी इस दीक्षा के बाद ही सम्भव होते है, गुरु द्वारा यह दीक्षा प्राप्त होने के बाद ही कालिदास में ज्ञान का स्रोत फूटा था, जिससे उन्होंने मेघदूत, ऋतुसंहार जैसे अतुलनीय काव्यों की रचना की। इस दीक्षा से व्यक्ति की शक्ति भी कई गुना बढ़ जाती है।

काली माता का मंत्र ::  हकीक की माला से नौ माला "क्रीं ह्नीं ह्नुं दक्षिणे कालिके स्वाहा:" मंत्र का जाप कर सकते हैं। 

(2). MAA TARA श्मशान तारा :: 
मुख्य नाम :- तारा। अन्य नाम :- उग्र तारा, नील सरस्वती, एकजटा। भैरव :- अक्षोभ्य भगवान् शिव, बिना किसी क्षोभ के हलाहल विष का पान करने वाले। भगवान् विष्णु के 24 अवतारों से सम्बद्ध :- भगवान् श्री राम। कुल :- काली कुल। दिशा :- ऊपर की ओर। स्वभाव :- सौम्य उग्र, तामसी गुण सम्पन्न। वाहन :- गीदड़। सम्बंधित तीर्थ स्थान या मन्दिर  :- तारापीठ, रामपुरहाट, बीरभूम, पश्चिम बंगाल, भारत; सुघंधा, बांग्लादेश तथा सासाराम, बिहार, भारत। कार्य :- मोक्ष दात्री, भव-सागर से तारने वाली, जन्म तथा मृत्यु रूपी चक्र से मुक्त करने वाली। शारीरिक वर्ण :- नीला।

तारा नाम के रहस्य से ज्ञात होता हैं, ये तारने वाली हैं, मोक्ष प्रदाता हैं। जीवन तथा मृत्यु के चक्र से तारने हेतु, यह नाम तारा देवी के नाम-रहस्य को उजागर करता हैं। महाविद्याओं में देवी दूसरे स्थान पर विद्यमान हैं तथा देवी अपने भक्तों को वाक्-शक्ति प्रदान करने तथा भयंकर विपत्तिओं से अपने भक्तों की रक्षा करने में समर्थ हैं। शत्रु नाश, भोग तथा मोक्ष, वाक् शक्ति प्राप्ति हेतु देवी माँ की साधना विशेष लाभकारी सिद्ध होती है। सामान्यतः तंत्रोक्त पद्धति से साधना करने पर ही देवी माँ की कृपा प्राप्त की जा सकती है।

माँ तारा का निवास स्थान घोर महा-श्मशान हैं, जहाँ सर्वदा चिता जलती रहती हो तथा ज्वलंत चिता के ऊपर, देवी नग्न अवस्था या बाघाम्बर पहन कर खड़ी हैं। देवी, नर खप्परों तथा हड्डियों के मालाओं से अलंकृत हैं तथा सर्पों को आभूषण के रूप में धारण करती हैं। तीन नेत्रों वाली देवी उग्र तारा स्वरूप से अत्यन्त ही भयानक प्रतीत होती हैं।
देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध श्मशान भूमि से हैं, जो उनका निवास स्थान हैं। साथ ही श्मशान से सम्बंधित समस्त वस्तुओं-तत्वों जैसे मृत देह, हड्डी, चिता, चिता-भस्म, भूत, प्रेत, कंकाल, खोपड़ी, उल्लू, कुत्ता, लोमड़ी इत्यादि से देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। गुण तथा स्वभाव से देवी तारा, महा-काली से युक्त हैं।

माँ को श्मशान तारा के नाम से भी जाना जाता है की सिद्धि जिसे प्राप्त हो जाती है, वह व्यक्ति माँ तारा की गोद में एक बच्चे की तरह रहता है। जिसे श्मशान तारा की कृपा प्राप्त हो जाती है, उसका जीवन खुशियों से भर जाता है, श्मशान तारा की सिद्धि प्राप्त करने वाले व्यक्ति को वाक सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है। इसके अलावा श्मशान तारा की कृपा से उसे तीव्र बुद्धि और रचनात्मकता भी हासिल होती है। श्मशान तारा सिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने शत्रुओं को जड़ से खत्म कर सकता है। श्मशान तारा की आराधना करने के लिए मूँगा, स्फटिक या काले हकीक की माला का प्रयोग करना चाहिए। 

सर्वदा मोक्ष देने वाली और तारने वाली को तारा का नाम दिया गया है। सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ ने माँ तारा की पूजा की थी। आर्थिक उन्नति और बाधाओं के निवारण हेतु माँ तारा महाविद्या का महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी सिद्धि से साधक की आय के नित्य नये साधन बनते हैं। जीवन ऐश्वर्यशाली बनता है। इस की पूजा गुरुवार से आरम्भ करनी चाहिये। इससे शत्रुनाश, वाणी दोष निवारण और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

माँ तारा बीज मन्त्र ::

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रीं तारायै नमः। 

ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट।

She is the second of the Das  Maha Vidya or the deity of Great Wisdom, is a form of Maa Durga. Tantric manifestations of Maa Durga or Maha Devi, Kali or Parvati. Tara is perceived at core as the absolute, unquenchable hunger that propels all life. With the churning of the ocean the poison-Halahal (हलाहल) came up and Bhagwan Shiv engulfed it for the welfare of the universe, saving the world from destruction, resulting in him being unconscious. His throat turned blue and he earned the epithet Neel Kanth (नील कंठ). Maha Devi Durga appeared as Maa Tara and took Bhagwan Shiv in her lap. She suckled him, the milk from her breasts counteracting the poison and he recovered. 

Bhagwan Shiv had stopped her from rampaging by becoming an infant. Seeing the child, Mata Kali's maternal instinct came to the fore and when she was feeding him with her breast milk, Bhagwan Shiv sucked her rage out, while sucking the milk. Bhagwan Shiv assumed the form of an infant in front of Maa Bhagwati Kali. Tara is a form of Durga. She is the one who created 1st Seed from which the entire universe took birth in the form of Bhagwan Narayan. Maa Tara comes next to Kali & closely resembles her in appearance. Maa Tara too displays gentle (graceful, सौम्य) or fierce (उग्र) aspects. 

Maa Tara-the blue deity is a guide and a protector and helps to tide over the stormy sea of troubles and turmoil of life (भव सागर तारिणी). She is Tarini, deliverer or savoir, one who saves guides and transports to salvation. Maa Tara is the deity of accomplishments and is often propitiated by business persons for success.

Maa Tara is associated with the speaking prowess. And, some texts equate Maa Tara to Mata Saraswati the deity of learning-enlightenment and call her Neel (blue) Saraswati seated on a lotus. As she is the goddess of speech, she is related to breathe that manifests sound. Breath is the primal sound of life. Breath in which the sound originates is the carrier (transporter-Tarini) of knowledge conveyed through the speech. Maa Tara is the un-manifest speech that resides in breath and consciousness.

She is benevolent, compassionate, gentle and spirited young woman, eager to help and to protect. Tara as Maha Vidya is a rather fearsome goddess striking terror. She is also moody and harmful. But at times, Tara-Maha Vidya can also be benevolent and compassionate.

Maa Tara is described as seated in the pratyalidha Asan on the chest of a corpse stretched on a white lotus; she is supreme and laughing horribly; holding cleaver, blue lotus, dagger and bowl; uttering the Mantr Hum. She is of deep blue colour; her hair is braided with serpents, she is the Ugr-furious-ferocious Tara. Her tongue is always moving. Her forehead is decorated with ornaments made of bones. She bestows magical powers. A noticeable feature of Tara’s iconography is the halo of light-Aura (आभा, अलौकिक तेज) that surrounds her head. And, rising above her head is the ten headed serpent Akshobhay (the unperturbed or unshakeable) symbolising her Yogic powers.

Between Kali and Tara there are some similarities as also some differences. Maa Tara’s physical appearance resembles that of Kali Mata. Like Maa Kali, she has three bright red eyes; has four hands holding sword or head chopper, a scissors, a severed head and a lotus; wears the garland of skulls; is richly is bejewelled and has snakes as ornaments; dances on a corpse. Both Maa Kali and Tara Maa are strongly associated with death and dissolution; both stand upon inert male figure. And, both are associated with Bhagwan Shiv. Brahad Dharm Puran mentions Maa Tara as representing time, just as does Maa Kali. Whereas Maa Kali is the power of time (Kal-death) that inexorably causes all created things to perish, Tara Maa is associated with fire and particularly the fires of the cremation ground.

There are also differences in the depiction of the two deities. Maa Tara's complexion is blue whereas Maa Kali's can be black or deep blue. Maa Tara holds a bowl made from a skull in one hand, a pair of scissors in another, a blue lotus in the third hand and an axe in the fourth. The scissors and sword in the hands of Maa Tara are tools to remove the ego, the sense of mistaken identity that defines, limits and binds. They are not weapons of death and destruction. Maa Tara is draped in tiger skin around her waist and is not naked unlike Kali who symbolises absolute freedom. Unlike Maa Kali, whose hair flows loose and wild, Maa Tara’s hair of tawny colour is carefully bunched into a topknot (Jata). Whereas Maa Kali’s hair represents absolute freedom from constraint. Maa Tara’s is a symbol of Yogic asceticism and restraint. Kali Mata represents the highest form of wisdom or liberating knowledge and Maa Tara is related to the discipline of Yogic practices.

सर्व विघ्नों का नाश करने वाली महाविद्या तारा, स्वयं भगवान् शिव को अपना स्तन दुग्ध पान कराकर हलाहल की पीड़ा से मुक्त करने वाली हैं।
देवी महा-काली ने हयग्रीव नमक दैत्य के वध हेतु नीला वर्ण धारण किया तथा उनका वह उग्र स्वरूप उग्र तारा के नाम से विख्यात हुआ। ये देवी या शक्ति, प्रकाश बिंदु के रूप में आकाश के तारे के समान विद्यमान हैं, फलस्वरूप माँ तारा नाम से विख्यात हैं। शक्ति का यह स्वरूप सर्वदा मोक्ष प्रदान करने वाली तथा अपने भक्तों को समस्त प्रकार के घोर संकटों से मुक्ति प्रदान करने वाली हैं। माँ का घनिष्ठ सम्बन्ध जीवन और मरण रूपी चक्र या अन्य किसी प्रकार के संकट मुक्ति से है। 
भगवान् शिव द्वारा, समुद्र मंथन के समय हलाहल विष का पान करने पर, उनके शारीरिक पीड़ा (जलन) के निवारण हेतु, माँ तारा ने माता के स्वरूप में भगवान् शिव को अपना अमृतमय दुग्ध स्तन पान कराया था। जिसके कारण भगवान् शिव को समस्त प्रकार के शारीरिक पीड़ा से मुक्ति मिली, देवी, जगत-जननी माता के रूप में और घोर से घोर संकटों की मुक्ति हेतु प्रसिद्ध हुई। 
मुख्यतः माँ तारा की आराधना-साधना मोक्ष प्राप्त करने हेतु, वीरा-चार या तांत्रिक पद्धति से की जाती हैं, परन्तु भक्ति भाव युक्त साधना ही सर्वोत्तम है। 
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान इधर-उधर फैला हुआ हैं, उनके एकत्रित होने पर माँ तारा  के रूप का निर्माण होता हैं तथा वह समस्त ज्ञान इन्हीं  का मूल स्वरूप है।इसी वजह से इनका एक नाम नील-सरस्वती भी हैं।
प्रथम उग्र तारा, अपने उग्र तथा भयानक रूप हेतु जानी जाती हैं। देवी का यह स्वरूप अत्यंत उग्र तथा भयानक हैं, ज्वलंत चिता के ऊपर, शव रूपी शिव या चेतना हीन शिव के ऊपर, देवी प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी हैं। देवी उग्र तारा, तमो गुण सम्पन्न हैं तथा अपने साधकों-भक्तों के कठिन से कठिन परिस्थितियों में पथ प्रदर्शित तथा छुटकारा पाने में सहायता करती हैं।
द्वितीय नील सरस्वती, इस स्वरूप में माँ तारा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के समस्त ज्ञान की ज्ञाता हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ज्ञान इधर-उधर बिखरा हुआ पड़ा हैं, उन सब को एकत्रित करने पर जिस ज्ञान की उत्पत्ति होती हैं, वे ये देवी नील सरस्वती ही हैं। इस स्वरूप में देवी राजसिक या रजो गुण सम्पन्न हैं। देवी माँ परम ज्ञानी हैं, अपने असाधारण ज्ञान के परिणाम स्वरूप, ज्वलंत चिता के शव को भगवान् शिव स्वरूप में परिवर्तित करने में समर्थ हैं।
एकजटा, यह माँ तारा का तीसरे स्वरूप या नाम है। पिंगल जटा-जूट वाली माँ तारा सत्व गुण सम्पन्न हैं तथा अपने भक्त को मोक्ष प्रदान करने वाली और मोक्ष दात्री हैं। ज्वलंत चिता में सर्वप्रथम देवी, उग्र तारा के रूप में खड़ी हैं, द्वितीय नील सरस्वती, शव को जीवित कर शिव बनाने में सक्षम हैं तथा तीसरे स्वरूप में देवी एकजटा जीवित भगवान् शिव को अपने पिंगल जटा में धारण करती हैं या मोक्ष प्रदान करती हैं। 
माँ तारा अन्य आठ स्वरूपों में निम्न अष्ट तारा समूह का निर्माण करती हैं :- 
(1). तारा, (2). उग्र तारा, (3). महोग्र तारा, (4). वज्र तारा, (5). नील तारा, (6). सरस्वती, (7). कामेश्वरी और (8). भद्र काली-चामुंडा। 
माँ तारा, प्रत्यालीढ़ मुद्रा (जैसे की एक वीर योद्धा, अपने दाहिने पैर आगे किये युद्ध लड़ने हेतु उद्धत हो) धारण कर, शव या चेतना रहित भगवान् शिव के ऊपर आरूढ़ हैं। माँ का मस्तक पंच कपालों से सुसज्जित, नव-यौवन सम्पन्न, नील कमल के समान तीन नेत्रों से युक्त, उन्नत स्तन मण्डल और नूतन मेघ के समान कान्ति वाली हैं। विकट दन्त पंक्ति तथा घोर अट्टहास करने के कारण माँ का स्वरूप अत्यन्त उग्र प्रतीत होता हैं। माँ का स्वरूप बहुत डरावना और भयंकर हैं तथा वास्तविक रूप में माँ, चिता के ऊपर जल रही शव पर आरूढ़ हैं। इन्होंने अपना दाहिना पैर शव रूपी भगवान् शिव के छाती पर रखा हुआ है। माता घोर नील वर्ण की हैं, महा-शंख (मानव कपाल) की माला धारण किये हुए हैं, वह छोटे कद की हैं तथा कहीं-कहीं माता लज्जा निवारण हेतु बाघाम्बर भी धारण करती हैं। माँ के आभूषण तथा पवित्र यज्ञोपवीत सर्प हैं, साथ ही रुद्राक्ष तथा हड्डियों के बने हुए आभूषणों को धारण करती हैं। वह अपनी छोटी लपलपाती हुई जीभ मुँह से बाहर निकाले हुए तथा अपने विकराल दन्त पंक्तियों से दबाये हुए हैं। माता के शरीर से सर्प लिपटे हुए हैं, सिर के बाल चारों ओर उलझे-बिखरे हुए भयंकर प्रतीत होते हैं। देवी चार हाथों से युक्त हैं तथा नील कमल, खप्पर (मानव खोपड़ी से निर्मित कटोरी), कैंची और तलवार धारण करती हैं। देवी माँ, ऐसे स्थान पर निवास करती हैं जहाँ सर्वदा ही चिता जलती रहती हैं तथा हड्डियाँ, खोपड़ी इत्यादि इधर-उधर बिखरी पड़ी हुई होती हैं, सियार, गीदड़, कुत्ते इत्यादि हिंसक जीव इनके चारों ओर देखे जाते हैं।
स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, देवी तारा की उत्पत्ति मेरु पर्वत के पश्चिम भाग में, चोलना नदी के तट पर हुई। हयग्रीव नाम के दैत्य के वध हेतु देवी महा-काली ने ही, नील वर्ण धारण किया था। महाकाल संहिता के अनुसार, चैत्र शुक्ल अष्टमी तिथि में देवी माँ तारा प्रकट हुई थीं, इस कारण यह तिथि तारा-अष्टमी कहलाती हैं, चैत्र शुक्ल नवमी की रात्रि तारा-रात्रि कहलाती हैं।
सर्वप्रथम स्वर्ग-लोक के रत्नद्वीप में वैदिक कल्पोक्त तथ्यों तथा वाक्यों को देवी माँ काली के मुख से सुनकर, भगवान् शिव अपनी पत्नी पर बहुत प्रसन्न हुए। भगवान् शिव ने महाकाली से पूछा, आदि काल में अपने भयंकर मुख वाले रावण का विनाश किया, तब आश्चर्य से युक्त आप का वह स्वरूप तारा नाम से विख्यात हुआ। उस समय, समस्त देवताओं ने आप की स्तुति की थी तथा आप अपने हाथों में खड़ग, नर मुण्ड, वार तथा अभय मुद्रा धारण की हुई थी, मुख से चञ्चल जिह्वा बाहर आकर आप भयंकर रुपवाली प्रतीत हो रही थीं। आपका वह विकराल रूप देख सभी देवता भय से आतुर हो काँप रहे थे, आपके विकराल भयंकर रुद्र रूप को देखकर, उन्हें शान्त करने के निमित्त ब्रह्मा जी आप के पास गए थे। समस्त देवताओं को ब्रह्मा जी के साथ देखकर देवी, लज्जित हो आप खड़ग से लज्जा निवारण की चेष्टा करने लगी। रावण वध के समय आप अपने रुद्र रूप के कारण नग्न हो गई थी तथा स्वयं ब्रह्मा जी ने आपकी लज्जा निवारण हेतु, आपको व्याघ्र चर्म प्रदान किया था। इसी रूप में देवी लम्बोदरी के नाम से विख्यात हुई।
सर्वप्रथम वशिष्ठ मुनि ने देवी तारा की आराधना की थी, परिणाम स्वरूप देवी माँ वशिष्ठाराधिता के नाम से भी जानी जाती हैं। सर्वप्रथम मुनि-राज ने देवी तारा की उपासना वैदिक पद्धति से की, परन्तु वे देवी की कृपा प्राप्त करने में सफल नहीं हो सके। अलौकिक शक्तियों से उन्हें ज्ञात हुआ की देवी की आराधना का क्रम चीन देश में रहने वाले भगवान् बुद्ध को ज्ञात हैं, वे उन के पास जाये तथा साधना का सही क्रम, पद्धति जानकर देवी तारा की उपासना करें। तदनंतर वशिष्ठ मुनि ने चीन देश की यात्रा की तथा भगवान् बुद्ध से आराधना का सही क्रम ज्ञात किया, जिसे चिनाचार पद्धति, वीर साधना या आगमोक्ता पद्धति (तंत्र) कहा गया। भगवान् बुद्ध के आदेश अनुसार उन्होंने चिनाचार पद्धति से देवी की आराधना की तथा देवी कृपा लाभ करने में सफल हुए। बंगाल प्रान्त के बीरभूम जिले में वह स्थान आज भी विद्यमान हैं, जहाँ मुनिराज ने देवी की आराधना की थी, जिसे जगत-जननी तारा माता के सिद्ध पीठ तारा पीठ के नाम से जाना जाता हैं।
देवी उग्र तारा, अपने भक्तों के जीवन में व्याप्त हर कठिन परिस्थितियों से रक्षा करती हैं। देवी के साधक नाना प्रकार के सिद्धियों के युक्त होते हैं, गद्ध-पद्ध मयी वाणी साधक के मुख का कभी परित्याग नहीं करती हैं, त्रिलोक मोहन, सुवक्ता, विद्याधर, समस्त जगत को क्षुब्ध तथा हल-चल पैदा करने में साधक पूर्णतः समर्थ होता हैं। कुबेर के धन के समान धनवान, निश्चल भाव से लक्ष्मी वास तथा काव्य-आगम आदि शास्त्रों में शुक्राचार्य तथा देवगुरु बृहस्पति के तुल्य हो जाते हैं, मूर्ख हो या जड़ वह बृहस्पति के समान हो जाता हैं। साधक ब्रह्म-वेत्ता होने का सामर्थ्य रखता हैं तथा भगवान् ब्रह्मा, विष्णु और शिव के की साम्यता को प्राप्त कर, समस्त पाशों से मुक्त हो ब्रह्मरूप मोक्ष पद को प्राप्त करते हैं। पशु भय वाले इस संसार से मुक्ति लाभ करता हैं या अष्ट पाशों (घृणा, लज्जा, भय, शंका, जुगुप्सा, कुल, शील तथा जाति) में बँधे हुए पशु आचरण से मुक्त हो, मोक्ष (तारिणी पद) को प्राप्त करने में समर्थ होता है।
देवी माँ काली ही, नील वर्ण धारण करने के कारण तारा नाम से जानी जाती हैं तथा दोनों का घनिष्ठ सम्बन्ध हैं। जैसे दोनों भगवान् शिव रूपी शव पर प्रत्यालीढ़ मुद्रा धारण किये हुए आरूढ़ हैं, अन्तर केवल देवी काली शव रूपी शिव पर आरूढ़ हैं तथा देवी तारा जलती हुई चिता पर आरूढ़ हैं। दोनों का निवास स्थान श्मशान भूमि हैं, दोनों देवियों की जिह्वा मुँह से बाहर हैं तथा भयंकर दन्त-पंक्ति से दबाये हुए हैं, दोनों रक्त प्रिया हैं, भयानक तथा डरावने स्वरूप वाली हैं, भूत-प्रेतों से सम्बंधित हैं, दोनों देवियों का वर्ण गहरे रंग का है, एक गहरे काले वर्ण की हैं तथा दूसरी गहरे नील वर्ण की। दोनों देवियाँ नग्न विचरण करने वाली हैं, कहीं-कहीं देवी काली कटे हुई हाथों की करधनी धारण करती हैं, नर मुण्डों की माला धारण करती हैं, वहीं देवी तारा व्याघ्र चर्म धारण करती हैं तथा नर खप्परों की माला धारण करती हैं। दोनों की साधना तंत्रानुसार पंच-मकार विधि से की जाती हैं, सामान्यतः दोनों एक ही हैं। इनमें बहुत काम भिन्नताएं दिखती हैं। दोनों देवियों का वर्णन शास्त्रानुसार भगवान् शिव की पत्नी के रूप में किया गया हैं तथा दोनों के नाम भी एक जैसे ही हैं :- जैसे, हर-वल्लभा, हर-प्रिया, हर-पत्नी इत्यादि। हर भगवान् शिव का एक नाम है। परन्तु देवी तारा ने, भगवान् शिव को बालक रूप में परिवर्तित कर, अपना स्तन दुग्ध पान कराया था। समुद्र मंथन के समय कालकूट विष का पान करने के परिणाम स्वरूप, भगवान् शिव के शरीर में जलन होने लगी तथा वे तड़पने लगे, देवी ने उन के शारीरिक कष्ट को शांत करने हेतु अपने अमृतमय स्तन दुग्ध पान कराया। देवी काली के समान ही देवी तारा का सम्बन्ध निम्न तत्वों से हैं।
तामसिक, विध्वंसक प्रवृत्ति से सम्बंधित रखने वाले देवी देवता मुख्यतः श्मशान भूमि में वास करते हैं। व्यवहारिक दृष्टि से श्मशान वह स्थान हैं, जहाँ शव के दाह का कार्य होता हैं। परन्तु आध्यात्मिक या दार्शनिक दृष्टि से श्मशान का अभिप्राय कुछ और ही है। यह वह स्थान हैं जहाँ पंच या पञ्च महाभूत या देह में विद्यमान स्थूल तत्त्व, चिद्-ब्रह्म में विलीन होते हैं। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु तथा अग्नि इन महा भूतों से संसार के समस्त जीवों के देह का निर्माण होता हैं, समस्त जीव शरीर या देह इन्हीं पंच महाभूतों का मिश्रण हैं। श्मशान वह स्थान हैं जहाँ पञ्च भूत या तत्त्व के मिश्रण से निर्मित देह, अपने-अपने तत्त्व में विलीन हो जाते हैं। तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, श्मशान भूमि को इसी कारण-वश अपना निवास स्थान बनाते हैं। देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनाती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता है। मानव देह कई प्रकार के विकारों का स्थान हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि, अतः देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनाती हैं, जहाँ इन विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं। मन या हृदय भी वह स्थान है या कहें तो वह श्मशान हैं, जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता है। अतः देवी काली-तारा अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं।
मृत देह के दाह संस्कार हेतु, लकड़ियों के ढेर के ऊपर शव को रख कर जला देना, चिता कहलाता हैं। साधक को अपने श्मशान रूपी हृदय में सर्वदा ज्ञान रूपी अग्नि जलाये रखना चाहिए, ताकि अज्ञान रूपी अंधकार को दूर किया जा सके।
देवी शव रूपी भगवान् शिव पर विराजमान हैं या कहे तो शव को अपना आसन बनाती हैं, जिसके परिणाम स्वरूप ही शव में चैतन्य का संचार होता हैं। बिना शक्ति के भगवान् शिव, शव के ही सामान हैं, चैतन्य हीन हैं। देवी माँ की कृपा लाभ से ही, देह पर प्राण रहते हैं।
देवी काली, तारा घनघोर या अत्यंत काले वर्ण की हैं तथा स्वरूप से भयंकर और डरावनी हैं। परन्तु देवी के साधक या देवी जिन के हृदय में स्थित हैं, उन्हें डरने के आवश्यकता नहीं हैं, स्वयं काल या यम भी देवी से भय-भीत रहते हैं।
देवी काली-तारा के स्तन बड़े तथा उन्नत हैं, यहाँ तात्पर्य हैं कि देवी प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से तीनों लोकों का पालन करती हैं। अपने अमृतमय दुग्ध को आहार रूप में दे कर देवी अपने साधक को कृतार्थ करती हैं।
देवी माँ काली-तारा के विकराल दन्त पंक्ति बाहर निकले हुए हैं तथा उन दाँतों से उन्होंने अपने जिह्वा को दबा रखा हैं। यहाँ देवी रजो तथा तमो गुण रूपी जिह्वा को, सत्व गुण के प्रतीक उज्ज्वल दाँतो से दबाये हुए हैं।
देवी के बाल, घनघोर काले बादलों की तरह बिखरे हुए हैं और ऐसे प्रतीत होते हैं जैसे कोई भयंकर आँधी आने वाली हो।
द्वितीय महाविद्या तारा की कृपा से सभी शास्त्रों का पांडित्य, कवित्व प्राप्त होता है, साधक बृहस्पति के समान ज्ञानी हो जाता हैं। वाक् सिद्धि प्रदान करने से ये नील सरस्वती कही जाती हैं। सुख, मोक्ष प्रदान करने तथा उग्र आपत्ति हरण करने के कारण इन्हें ताराणी भी कहा जाता है।
देवी की साधना एकलिंग शिव मन्दिर (पाँच कोस क्षेत्र के मध्य एक शिव-लिंग), श्मशान भूमि, शून्य गृह, चौराहे, शवासन, मुण्डों के आसन, गले तक जल में खड़े हो कर, वन में करने का शास्त्रों में विधान हैं। इन स्थानों पर देवी की साधना शीघ्र फल प्रदायक होती हैं, विशेषकर सर्व शास्त्र वेत्ता होकर परलोक में ब्रह्म निर्वाण प्राप्त करता हैं।
कोमलासन (जिसका मुंडन संस्कार न हुआ हो या छः से दस मास के भीतर के गर्भच्युत मृत बालक), कम्बल का आसन, कुशासन अथवा विशुद्ध आसन पर बैठ कर ही देवी तारा की आराधना करना उचित हैं। नील तंत्र के अनुसार पाँच वर्ष तक के बालक का मृत देह भी कोमलासन की श्रेणी में आता हैं, कृष्ण मृग या मृग तथा व्याघ्र चर्म आसन पूजा में विहित हैं।[मत्स्य सूक्त]
लक्ष्मी, सरस्वती, रति, प्रीति, कीर्ति, शांति, तुष्टि, पुष्टि रूपी आठ शक्तियाँ नील सरस्वती की पीठ शक्ति मानी जाती हैं, देवी का वाहन शव हैं।
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव तथा परमशिव को षट्-शिव (6 शिव) कहा जाता है।
तारा, उग्रा, महोग्रा, वज्रा, काली, सरस्वती, कामेश्वरी तथा चामुंडा ये अष्ट तारा नाम से विख्यात हैं। देवी के मस्तक में स्थित अक्षोभ्य शिव अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं।
महा-शंख माला जो मनुष्य के ललाट के हड्डियों से निर्मित होती हैं तथा जिस में 50 मणियाँ होती हैं, से देवी की साधना करने का विधान हैं। कान तथा नेत्र के बीज के भाग को या ललाट का भाग महा-शंख कहलाता हैं, इस माला का स्पर्श तुलसी, गोबर, गंगा-जल तथा शाल-ग्राम से कभी नहीं करना चाहिये।
देवी की कृपा से साधक प्राण ज्ञान प्राप्त करने के साथ-साथ भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त करता है
गृहस्थ साधक को सदा ही देवी की सौम्य रूप में साधना पूजा करनी चाहिए। 
देवी अज्ञान रुपी शव पर विराजती हैं और ज्ञान की खडग से अज्ञान रुपी शत्रुओं का नाश करती हैं। 
लाल व नीले फूल और नारियल चौमुखा दीपक चढ़ाने से देवी माँ प्रसन्न होती हैं। 
देवी माँ के भक्तों को ज्ञान व बुद्धि विवेक में तीनों लोकों में कोई नहीं हरा पाता। 
देवी माँ की मूर्ती पर रुद्राक्ष चढ़ाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है। 
श्री सिद्ध तारा महाविद्या महामंत्र ::
"ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट"
इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे :-
(1). बिल्व पत्र, भोज पत्र और घी से हवन करने पर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। 
(2). मधु, शर्करा और खीर से होम करने पर वशीकरण होता है
(3). घृत तथा शर्करा युक्त हवन सामग्री से होम करने पर आकर्षण होता है।
(4). काले तिल व खीर से हवन करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।
विशेष पूजा सामग्रियाँ-पूजा में जिन सामग्रियों के प्रयोग से देवी की विशेष कृपा मिलती है, वे हैं :-
सफेद या नीला कमल का फूल, रुद्राक्ष से बने कानों के कुण्डल, अनार के दाने प्रसाद रूप में, सूर्य शंख, भोजपत्र पर ह्रीं लिख कर अर्पित करना, दूर्वा, अक्षत, रक्तचंदन, पंचगव्य, पञ्चमेवा व पंचामृत। 
पूजा में उड़द की दाल व लौंग काली मिर्च का चढ़ावे के रूप प्रयोग करें। 
सभी चढ़ावे चढ़ाते हुए देवी का निम्न मंत्र पढ़ें :-
"ॐ क्रोद्धरात्री स्वरूपिन्ये नम:"
(1). देवी तारा मंत्र :-
"ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट"
(2). देवी एक्जता मंत्र :-
"ह्रीं त्री हुं फट"
(3). नील सरस्वती मंत्र :-
"ह्रीं त्री हुं"
सभी मन्त्रों के जाप से पहले अक्षोभ्य ऋषि का नाम लेना चाहिए तथा उनका ध्यान करना चाहिए। 
देवी के यन्त्र को स्थापित करके व पूजन करें। 
यन्त्र के पूजन की विधि :- 
पंचोपचार पूजन करें, धूप, दीप, फल, पुष्प, जल आदि चढ़ाएँ। 
"ॐ अक्षोभ्य ऋषये नम: मम यंत्रोद्दारय-द्दारय"
का जाप करते हुये पानी के 21 बार छीटे दें व पुष्प धूप अर्पित करें। 
देवी को प्रसन्न करने के लिए सहस्त्र नाम त्रिलोक्य कवच आदि का पाठ शुभ माना गया है। 
तारा शतनाम :: 
श्री देव्युवाच :-
सर्वं संसूचितं देव नाम्नां शतं महेश्वर।
यत्नैः शतैर्महादेव मयि नात्र प्रकाशितम् ॥1॥
पठित्वा परमेशान हठात् सिद्ध्यति साधकः।
नाम्नां शतं महादेव कथयस्व समासतः॥2॥
श्री भैरव उवाच :-
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि भक्तानां हितकारकम्।
यज्ज्ञात्वा साधकाः सर्वे जीवन्मुक्तिमुपागताः॥3॥
कृतार्थास्ते हि विस्तीर्णा यान्ति देवीपुरे स्वयम्।
नाम्नां शतं प्रवक्ष्यामि जपात् स(अ)र्वज्ञदायकम्॥4॥
नाम्नां सहस्रं संत्यज्य नाम्नां शतं पठेत् सुधीः।
कलौ नास्ति महेशानि कलौ नान्या गतिर्भवेत्॥5॥
शृणु साध्वि वरारोहे शतं नाम्नां पुरातनम्।
सर्वसिद्धिकरं पुंसां साधकानां सुखप्रदम्॥6॥
तारिणी तारसंयोगा महातारस्वरूपिणी।
तारकप्राणहर्त्री च तारानन्दस्वरूपिणी॥7॥
महानीला महेशानी महानीलसरस्वती।
उग्रतारा सती साध्वी भवानी भवमोचिनी॥8॥
महाशङ्खरता भीमा शाङ्करी शङ्करप्रिया।
महादानरता चण्डी चण्डासुरविनाशिनी॥9॥
चन्द्रवद्रूपवदना चारुचन्द्रमहोज्ज्वला।
एकजटा कुरङ्गाक्षी वरदाभयदायिनी॥10॥
महाकाली महादेवी गुह्यकाली वरप्रदा।
महाकालरता साध्वी महैश्वर्यप्रदायिनी॥11॥
मुक्तिदा स्वर्गदा सौम्या सौम्यरूपा सुरारिहा।
शठविज्ञा महानादा कमला बगलामुखी॥12॥
महामुक्तिप्रदा काली कालरात्रिस्वरूपिणी।
सरस्वती सरिच्श्रेष्ठा स्वर्गङ्गा स्वर्गवासिनी॥13॥
हिमालयसुता कन्या कन्यारूपविलासिनी।
शवोपरिसमासीना मुण्डमालाविभूषिता॥14॥
दिगम्बरा पतिरता विपरीतरतातुरा।
रजस्वला रजःप्रीता स्वयम्भूकुसुमप्रिया॥15॥
स्वयम्भूकुसुमप्राणा स्वयम्भूकुसुमोत्सुका।
शिवप्राणा शिवरता शिवदात्री शिवासना॥16॥
अट्टहासा घोररूपा नित्यानन्दस्वरूपिणी।
मेघवर्णा किशोरी च युवतीस्तनकुङ्कुमा॥17॥
खर्वा खर्वजनप्रीता मणिभूषितमण्डना।
किङ्किणीशब्दसंयुक्ता नृत्यन्ती रक्तलोचना॥18॥
कृशाङ्गी कृसरप्रीता शरासनगतोत्सुका।
कपालखर्परधरा पञ्चाशन्मुण्डमालिका॥19॥
हव्यकव्यप्रदा तुष्टिः पुष्टिश्चैव वराङ्गना।
शान्तिः क्षान्तिर्मनो बुद्धिः सर्वबीजस्वरूपिणी॥20॥
उग्रापतारिणी तीर्णा निस्तीर्णगुणवृन्दका।
रमेशी रमणी रम्या रामानन्दस्वरूपिणी॥21॥
रजनीकरसम्पूर्णा रक्तोत्पलविलोचना।
इति ते कथितं दिव्यं शतं नाम्नां महेश्वरि॥22॥
प्रपठेद् भक्तिभावेन तारिण्यास्तारणक्षमम्।
सर्वासुरमहानादस्तूयमानमनुत्तमम्॥23॥
षण्मासाद् महदैश्वर्यं लभते परमेश्वरि।
भूमिकामेन जप्तव्यं वत्सरात्तां लभेत् प्रिये॥24॥
धनार्थी प्राप्नुयादर्थं मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात्।
दारार्थी प्राप्नुयाद् दारान् सर्वागमदितान्॥25॥
अष्टम्यां च शतावृत्त्या प्रपठेद् यदि मानवः।
सत्यं सिद्ध्यति देवेशि संशयो नास्ति कश्चन॥26॥
इति सत्यं पुनः सत्यं सत्यं सत्यं महेश्वरि।
अस्मात् परतरं नास्ति स्तोत्रमध्ये न संशयः॥27॥
नाम्नां शतं पठेद् मन्त्रं संजप्य भक्तिभावतः।
प्रत्यहं प्रपठेद् देवि यदीच्छेत् शुभमात्मनः॥28॥
इदानीं कथयिष्यामि विद्योत्पत्तिं वरानने।
येन विज्ञानमात्रेण विजयी भुवि जायते॥29॥
योनिबीजत्रिरावृत्त्या मध्यरात्रौ वरानने।
अभिमन्त्र्य जलं स्निग्धं अष्टोत्तरशतेन च॥30॥
तज्जलं तु पिबेद् देवि षण्मासं जपते यदि।
सर्वविद्यामयो भूत्वा मोदते पृथिवीतले॥31॥
शक्तिरूपां महादेवीं शृणु हे नगनन्दिनि।
वैष्णवः शैवमार्गो वा शाक्तो वा गाणपोऽपि वा॥32॥
तथापि शक्तेराधिक्यं शृणु भैरवसुन्दरि।
सच्चिदानन्दरूपाच्च सकलात् परमेश्वरात्॥33॥
शक्तिरासीत् ततो नादो नादाद् बिन्दुस्ततः परम्।
अथ बिन्द्वात्मनः कालरूपबिन्दुकलात्मनः॥34॥
जायते च जगत्सर्वं सस्थावरचरात्मकम्।
श्रोतव्यः स च मन्तव्यो निर्ध्यातव्यः स एव हि॥35॥
साक्षात्कार्यश्च देवेशि आगमैर्विविधैः शिवे।
श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यो मननादिभिः॥36॥
उपपत्तिभिरेवायं ध्यातव्यो गुरुदेशतः।
तदा स एव सर्वात्मा प्रत्यक्षो भवति क्षणात्॥37॥
तस्मिन् देवेशि प्रत्यक्षे शृणुष्व परमेश्वरि।
भावैर्बहुविधैर्देवि भावस्तत्रापि नीयते॥38॥
भक्तेभ्यो नानाघासेभ्यो गवि चैको यथा रसः।
सदुग्धाख्यसंयोगे नानात्वं लभते प्रिये॥39॥
तृणेन जायते देवि रसस्तस्मात् परो रसः।
तस्मात् दधि ततो हव्यं तस्मादपि रसोदयः॥40॥
स एव कारणं तत्र तत्कार्यं स च लक्ष्यते।
दृश्यते च महादेन कार्यं न च कारणम्॥41॥
तथैवायं स एवात्मा नानाविग्रहयोनिषु।
जायते च ततो जातः कालभेदो हि भाव्यते॥42॥
स जातः स मृतो बद्धः स मुक्तः स सुखी पुमान्।
स वृद्धः स च विद्वांश्च न स्त्री पुमान् नपुंसकः॥43॥
नानाध्याससमायोगादात्मना जायते शिवे।
एक एव स एवात्मा सर्वरूपः सनातनः॥44॥
अव्यक्तश्च स च व्यक्तः प्रकृत्या ज्ञायते ध्रुवम्।
तस्मात् प्रकृतियोगेन विना न ज्ञायते क्वचित्॥45॥
विना घटत्वयोगेन न प्रत्यक्षो यथा घटः।
इतराद् भिद्यमानोऽपि स भेदमुपगच्छति॥46॥
मां विना पुरुषे भेदो न च याति कथञ्चन।
न प्रयोगैर्न च ज्ञानैर्न श्रुत्या न गुरुक्रमैः॥47॥
न स्नानैस्तर्पणैर्वापि नच दानैः कदाचन।
प्रकृत्या ज्ञायते ह्यात्मा प्रकृत्या लुप्यते पुमान्॥48॥
प्रकृत्याधिष्ठितं सर्वं प्रकृत्या वञ्चितं जगत्।
प्रकृत्या भेदमाप्नोति प्रकृत्याभेदमाप्नुयात्॥49॥
नरस्तु प्रकृतिर्नैव न पुमान् परमेश्वरः।
इति ते कथितं तत्त्वं सर्वसारमनोरमम्॥50॥
इति श्रीबृहन्नीलतन्त्रे भैरवभैरवीसंवादे ताराशतनाम तत्त्वसारनिरूपणं विंशः पटलः।  
देवी को अति शीघ्र प्रसन्न करने के लिए अंग न्यास व आवरण हवन तर्पण व मार्जन सहित पूजा करें। 
देवी के इच्छा पूर्ति मंत्र ::
(1).  भय नाशक मंत्र :-
"ॐ त्रीम ह्रीं हुं"
नीले रंग के वस्त्र और पुष्प देवी को अर्पित करें। पुष्प माला, अक्षत, धूप दीप से पूजन करें। रुद्राक्ष की माला से 6 माला का मंत्र जप करें। मन्दिर में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है। नीले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या ऊनी कम्बल का आसन रखें। पूर्व दिशा की ओर मुख रखें। आम का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएँ। 
(2). शत्रु नाशक मंत्र :-
"ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सौ: हुं उग्रतारे फट"
नारियल वस्त्र में लपेट कर देवी को अर्पित करें। गुड़ से हवन करें। रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें। एकान्त कक्ष में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है। काले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या ऊनी कम्बल का आसन रखें। उत्तर दिशा की ओर मुख रखें। पपीते का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएँ। 
(3). जादू-टोना नाशक मंत्र :-
"ॐ हुं ह्रीं क्लीं सौ: हुं फट"
देसी घी डाल कर चौमुखा दीया जलाएँ। कपूर से देवी की आरती करें। रुद्राक्ष की माला से 7 माला का मंत्र जप करें। 
(4). लम्बी आयु का मंत्र :-
"ॐ हुं ह्रीं क्लीं हसौ: हुं फट"
रोज सुबह पौधों को पानी दें। रुद्राक्ष की माला से 5 माला का मंत्र जप करें। शिवलिंग के निकट बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है। भूरे रंग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या ऊनी कम्बल का आसन रखें। पूर्व दिशा की ओर मुख रखें। सेब का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएँ। 
(5). सुरक्षा कवच का मंत्र :-
"ॐ हुं ह्रीं हुं ह्रीं फट"
देवी को पान व पञ्च मेवा अर्पित करें। रुद्राक्ष की माला से 3 माला का मंत्र जप करें। मंत्र जाप के समय उत्तर की ओर मुख रखें। किसी खुले स्थान में बैठ कर मंत्र जाप से शीघ्र फल मिलता है। काले रग का वस्त्र आसन के रूप में रखें या उनी कम्बल का आसन रखें। उत्तर दिशा की ओर मुख रखें। केले व अमरुद का फल प्रसाद रूप में चढ़ाएँ। 
देवी की पूजा में सावधानियाँ व निषेध :- बिना “अक्षोभ ऋषि” की पूजा के तारा महाविद्या की साधना न करें। किसी स्त्री की निंदा किसी सूरत में न करें। साधना के दौरान अपने भोजन आदि में लौंग व इलाइची का प्रयोग न करें। देवी भक्त किसी भी कीमत पर भाँग के पौधे को स्वयं न उखाड़ें। टूटा हुआ आइना पूजा के दौरान आसपास न रखें। 
वाक् सिद्धि विकास हेतु श्री तारा साधना :: एक अनार निम्न मंत्र के उच्चारण के साथ गणेश जी व् अक्षोभ पुरुष को काट कर बली दें। 
ॐ गं उच्छिस्ट गणेशाय नमः भो भो देव 
प्रसिद प्रसिद मया दत्तं इयं बलिं गृहान हूँ फट। ॐ भं क्षं फ्रें नमो अक्षोभ्य काल पुरुष सकाय प्रसिद प्रसिद मया दत्तं इयं बलिं गृहान हूँ फट
इस मंत्र की एक माल जाप करें :- 
"क्षं अक्षोभ्य काल पुरुषाय नमः स्वाहा"
निम्न मंत्र की एक माला जाप करें :- 
"ह्रीं गं हस्तिपिशाची लिखे स्वाहा"
इन मंत्रों की एक एक माला जाप शरू में व अन्त में  करना अनिवार्य है। नील तारा देवी के बीज मंत्र की जाप से अत्यन्त भयंकर ऊर्जा का विस्फोट होता है। शरीर के अन्दर ऐसा लगता है, जैसे कि हवा में उड़ रहे होँ। एक ही क्षण में सातों आसमान के ऊपर विचरण की अनुभूति  होती है तो दूसरे ही क्षण अथाह समुद्र में गोता  लगाने  की। इतनी ऊर्जा का विस्फोट होगा कि कमजोरी महसूस होगी। शरीर उस ऊर्जा का प्रभाव व तेज सहन नहीं कर सकता; इसके लिए ही यह दोनों मात्र शुरू व अन्त में एक-एक माला से जाप अवश्य करें। 
मूल मंत्र :- "स्त्रीं"
जप के  उपरान्त रोज  देवी के दाहिने हात में समर्पण व क्षमा पार्थना करना ना भूलें। साधना समाप्त करने की उपरान्त  यथा साध्य हवन  करना व एक कुमारी कन्या को भोजन कराना चाहिये। 
वाक शक्ति का विकास :: अपने आपको वयक्त करने और बोलने की क्षमता के विकास हेतु बुधवार के दिन तारा यन्त्र की स्थापना करनी चाहिए। उसका पंचोपचार पूजन करने के पश्चात स्फटिक माला से निम्न मंत्र का 21 माला जप करना चाहिए :-
"ॐ नमः पद्मासने शब्दरुपे ऐं ह्रीं क्लीं वद वद वाग्वादिनी स्वाहा" 
21वें दिन हवन सामग्री मे जौ-घी मिलाकर उपरोक्त मंत्र से 108 आहुति दें और पूर्ण आहुति प्रदान करें। 
इस साधना से वाक शक्ति का विकास होता है और आवाज़ का कम्पन जाता रहता है। यह मोहिनी विद्या है एवं बहुत से प्रवचनकार, कथापुराण वाचक इसी मंत्र को सिद्ध कर जन समूह को अपने शब्द जालों से मोहते हैं। प्रतिदिन साधना से पूर्व माँ तारा का पूजन कर एक-एक माला "स्त्रीम ह्रीं हुं तारा कुल्लुका" एवं "अं मं अक्षोभ्य श्री"  की अवश्य करें।
तारा दीक्षा :: भगवती तारा के तीन स्वरूप हैं :- तारा, एकजटा और नील सरस्वती तारा के सिद्ध साधक के बारे में प्रचिलित है, वह जब प्रातः काल उठाता है, तो उसे सिरहाने नित्य दो तोला स्वर्ण प्राप्त होता है। भगवती तारा नित्य अपने साधक को स्वार्णाभूषणों का उपहार देती हैं। तारा दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक को जहाँ आकस्मिक धन प्राप्ति के योग बनने लगते हैं, वहीं उसके अन्दर ज्ञान के बीज का भी प्रस्फुटन होने लगता है, जिसके फलस्वरूप उसके सामने भूत भविष्य के अनेकों रहस्य यदा-कदा प्रकट होने लगते हैं। तारा दीक्षा प्राप्त करने के बाद साधक का सिद्धाश्रम प्राप्ति का लक्ष्य भी प्रशस्त होता हैं।
तारा माता का मंत्र ::  नीले काँच की माला से बारह माला प्रतिदिन "ऊँ ह्नीं स्त्रीं हुम फट" मंत्र का जाप कर सकते हैं। 
(3). BAGLA MUKHI DEVI बगला मुखी देवी ::
  बगलामुखी, दो शब्दों के मेल से बना है, पहला बगला तथा दूसरा मुखी। बगला से अभिप्राय है विरूपण का कारण और वक या वगुला पक्षी, जिस की क्षमता एक जगह पर अचल खड़े हो शिकार करना है, मुखी से तात्पर्य है मुख। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध अलौकिक, पारलौकिक जादुई शक्तिओं से भी हैं, जिसे इंद्रजाल कहा जाता हैं। देवी बगलामुखी, समुद्र के मध्य में स्थित मणिमय द्वीप में अमूल्य रत्नों से सुसज्जित सिंहासन पर विराजमान हैं। देवी त्रिनेत्रा हैं, मस्तक पर अर्ध चन्द्र धारण करती है, पीले शारीरिक वर्ण की है, देवी ने पीला वस्त्र तथा पीले फूलों की माला धारण की हुई है, देवी के अन्य आभूषण भी पीले रंग के ही हैं तथा अमूल्य रत्नों से जड़ित हैं। स्वतंत्र तंत्र के अनुसार, सत्य युग में इस चराचर संपूर्ण जगत को नष्ट करने वाला भयानक वातक्षोम (तूफान, घोर आँधी) आया। समस्त प्राणिओं तथा स्थूल वस्तुओं के अस्तित्व पर संकट गहरा रहा था तथा सब काल का ग्रास बनने जा रहे थे। सम्पूर्ण जगत पर संकट को आता हुआ देख, जगत के पालन कर्ता भगवान् श्री हरी विष्णु अत्यन्त चिन्तित हो गए। तदनंतर, भगवान् श्री हरी विष्णु सौराष्ट्र प्रान्त में गए तथा हरिद्रा सरोवर के समीप जाकर, अपनी सहायतार्थ देवी श्री विद्या महा त्रिपुर सुन्दरी को प्रसन्न करने हेतु तप करने लगे। उस समय देवी श्री विद्या, सौराष्ट्र के एक हरिद्रा सरोवर में वास करती थीं। भगवान् श्री हरी विष्णु के तप से सन्तुष्ट हो देवी आद्या शक्ति, बगलामुखी स्वरूप में, भगवान् श्री हरी विष्णु के सन्मुख अवतरित हुई तथा उनसे तप करने का कारण ज्ञात किया। तुरन्त ही अपनी शक्तिओं का प्रयोग कर, देवी बगलामुखी ने विनाशकारी तूफान को शान्त किया तथा इस सम्पूर्ण चराचर जगत की रक्षा की। 
माँ बगलामुखी आठवीं महाविद्या हैं। इनका प्रकाट्य स्थल गुजरात के सौरापट क्षेत्र में माना जाता है। हल्दी रंग के जल से इनका प्रकट होना बताया जाता है। इसलिए, हल्दी का रंग पीला होने से इन्हें पीताम्बरा देवी भी कहते हैं। इनके कई स्वरूप हैं। इस महाविद्या की उपासना रात्रि काल में करने से विशेष सिद्धि की प्राप्ति होती है। इनके भैरव महाकाल हैं। माँ बगलामुखी स्तंभन शक्ति की अधिष्ठात्री हैं अर्थात यह अपने भक्तों के भय को दूर करके शत्रुओं और उनके बुरी शक्तियों का नाश करती हैं। माँ बगलामुखी का एक नाम पीताम्बरा भी है। इन्हें पीला रंग अति प्रिय है, इसलिए इनके पूजन में पीले रंग की सामग्री का उपयोग सबसे ज्यादा होता है। देवी बगलामुखी का रंग स्वर्ण के समान पीला होता है, अत: साधक को माता बगलामुखी की आराधना करते समय पीले वस्त्र ही धारण करना चाहिए। यह स्तम्भन की देवी हैं। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की शक्ति का समावेश हैं माता बगलामुखी शत्रुनाश, वाकसिद्धि, वाद विवाद में विजय के लिए इनकी उपासना की जाती है। इनकी उपासना से शत्रुओं का नाश होता है तथा भक्त का जीवन हर प्रकार की बाधा से मुक्त हो जाता है। बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा का अपभ्रंश है, जिसका अर्थ होता है दुलहन।अत: माँ के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण ही इन्हें यह नाम प्राप्त है। बगलामुखी देवी रत्नजडित सिहासन पर विराजती हैं, रत्नमय रथ पर आरूढ़ हो शत्रुओं का नाश करती हैं। देवी के भक्त को तीनों लोकों में कोई नहीं हरा पाता, वह जीवन के हर क्षेत्र में सफलता पाता है, पीले फूल और नारियल चढाने से देवी प्रसन्न होतीं हैं। देवी को पीली हल्दी के ढेर पर दीप-दान करें। देवी की मूर्ति पर पीला वस्त्र चढाने से बड़ी से बड़ी बाधा भी नष्ट होती है। बगलामुखी देवी के मन्त्रों से दुखों का नाश होता है। पीताम्बरा की उपासना से मुकदमा में विजयी प्राप्त होती है। शत्रु पराजित होते हैं। रोगों का नाश होता है। साधकों को वाकसिद्धि हो जाती है। इन्हें पीले रंग का फूल, बेसन एवं घी का प्रसाद, केला, रात रानी फूल विशेष प्रिय है। पीताम्बरा का प्रसिद्ध मन्दिर मध्यप्रदेश के दतिया और नलखेडा (जिला-शाजापुर) और आसाम के कामाख्या में है।
बगलामुखी दीक्षा :: माता बगलामुखी की साधना युद्ध में विजय होने और शत्रुओं के नाश के लिए की जाती है। बगला मुखी के देश में तीन ही स्थान है। भगवान् श्री  कृष्ण और अर्जुन ने महाभारत के युद्ध के पूर्व माता बगलामुखी की पूजा-अर्चना की थी। इनकी साधना शत्रु भय से मुक्ति और वाक् सिद्धि के लिए की जाती है।
यह दीक्षा अत्यन्त तेजस्वी, प्रभावकारी है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक निडर एवं निर्भीक हो जाता है। प्रबल से प्रबल शत्रु को निस्तेज करने एवं सर्व कष्ट बाधा निवारण के लिए इससे अधिक उपयुक्त कोई दीक्षा नहीं है। इसके प्रभाव से रूका धन पुनः प्राप्त हो जाता है। भगवती बगुला मुखी अपने साधकों को एक सुरक्षा चक्र प्रदान करती हैं, जो साधक को आजीवन हर खतरे से बचाता रहता है।
हर  प्रकार की समस्या का समाधान और किसी भी परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए माँ बगलामुखी की साधना हल्दी की माला से 8, 16 या 21 बार की जाती है। वाक शक्ति से तुरन्त परिपूर्ण करने वाली, अपने साधक को खाने कि लिए दौड़ने वाली, शत्रुनाश, विवाद में विजय, हर प्रकार की प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता के लिए, सरकारी कृपा के लिए माँ बगलामुखी की साधना की जाती है। 
शत्रु बाधा को पूर्णतः समाप्त करने के लिये बहुत महत्वपूर्ण साधना है। इस विद्या के द्वारा दैवी प्रकोप की शान्ति, धन-धान्य प्राप्ति, भोग और मोक्ष दोनों की सिद्धि होती है। इसके तीन प्रमुख उपासक भगवान् ब्रह्मा, विष्णु व परशुराम जी हैं। परशुराम जी ने यह विद्या द्रोणाचार्य जी को दी थी और उन्होंने देवराज इन्द्र के वज्र को इसी बगला विद्या के द्वारा निष्प्रभावी कर दिया था। युधिष्ठिर ने भगवान् श्री कृष्ण के परामर्श पर कौरवों पर विजय प्राप्त करने के लिये बगलामुखी देवी की ही आराधना की थी। 
माँ बगलामुखी मन्दिर दतिया :: यहाँ माँ बगलामुखी का ऐतिहासिक मन्दिर है। यह पीतांबरा शक्ति पीठ के नाम से जाना जाता है। आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा अमर-अमर होने के कारण आज भी इस मन्दिर में पूजा-अर्चना करने आते हैं। 
कोटला :: इस मन्दिर की स्थापना 1,810 में हुई थी। यह पठानकोट से 5 किलोमीटर दूर काँगड़ा मार्ग पर स्थित है।
गंगरेट :: यह भी हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना में है। हर वर्ष यहाँ बहुत भारी मेला लगता है। इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र-मुम्बई में भी इनके प्रसिद्ध उपासना स्थल हैं। इस विद्या का उपयोग केवल तभी किया जाना चाहिए, जब कोई रास्ता ना बचा हो। इस विद्या को ब्रह्मास्त्र भी कहा जाता है और यह भगवान् श्री हरी विष्णु की संहारक शक्ति है। वाराणसी और वनखंड़ी जिला कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में माँ के मन्दिर हैं। 
मंत्र :: "ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:"। 
Bagla is the Goddess who stops all motion at the appropriate time, silences the mouths and words of all evil beings, and controls their tongues. May that the deity-Maa bless one with stillness when it is appropriate! 
(2.1). Bagla is the second Maha Vidya. Once the creation was in turmoil and being destroyed in many places (like the present scenario in the world). Brahma Ji became worried about his creation and wondered what the outcome of this turmoil would be. He then meditated to bring peace to the universe. Not succeeding, He then performed severe Tapasya (तपस्या)  to obtain the blessings of Tripurambika the Mother of the Three Worlds. Pleased with his austerities, she appeared before him as Maa Bagla in a yellow form and gave him a boon. Bagla grants all kinds of perfection to devotees who pray to her. 
(2.2). Once an Asur (demon, giant) named Ruru, the son of Durgam, performed severe penance to win the favour of Bhagwan Brahma. Since, Ruru was already very powerful, the demigods became very apprehensive of what might happen, if he obtained a boon from Brahma Ji. So, they did Aradhna (propitiation) to yellow water (yellow intuitively means peace). Pleased with their Tapasya, the Divine Mother appeared as Bagla. 
Most powerful divine spirit of the Das Maha Vidya is the Shri Bagala Mukhi Devi, worshipped by Bhagwan Maha Dev, an embodiment of Tamas. Like for the other demigods, deities and goddesses the Vedic Shastr Vidhi or Agam Shastr Vidhi are not to be adopted in consecrating and worshiping Maa Bagla Mukhi. In the worship and other related rituals, strict adherence is essential. Even a slightest deviation will result in severe punishment to the priest due to Devi's anger. Among the ten divine forms, known as Das Maha Vidya of Devi Para Shakti, Matangi, Bhuvneshwari, Tripur Sundri, Maha Lakshmi, these four forms are in the Satv Gun; Maha Kali, Tara, Bhaervi, Chhinn Mast are in Rajas Gun and Dhoom Vati is in Tamas Gun. But Bagala Mukhi Devi is the embodiment of all the three qualities :- Satv, Rajas and Tamas. Hence, the omnipotent Bagala Mukhi Devi can be either be made angry easily and pleased easily. Bagla Mukhi Devi smashes the devotee's misconceptions and delusions (or the devotee's enemies) with her cudgel. She is also known as Pitambar Maa (पीताम्बर माँ) in North India. Bagla Mukhi is derived from Bagla (बगुला मुखी, distortion of the original Sanskrit root Vagla-वगला and Mukh-मुख, meaning bridle and face, respectively. Thus, the name means one whose face has the power to capture or control. She thus represents the hypnotic power of the Goddess. Another interpretation translates her name as crane faced.
Performing the Bagala Mukhi Navakshari Mantr Yagy (नवाक्षरी मन्त्र यज्ञ) and doing Sarv Rog Saman, (सर्व रोग समान) Mantr hom (Hawan, Yagy, Agnihotr, होम, हवन, अग्निहोत्र, यज्ञ) on the Sukl Saptami  (शुक्ल सप्तमी) day will enable one to get rid of Pitr Shrap-Dosh (पितृ श्राप-दोष, defect, deformity), the sins of the previous birth and Rahu Dosh and the devotee will be hale and healthy.
On the full moon day in the night in the Bagala Mukhi Maha Mantr Yagy, doing the Praman hom (प्रमाण होम) with Bhagy Sukt (भाग्य सूक्त) and Mangal Sukt (मंगल सूक्त) Mantr will drive away the ill effects of the marriage and will provide Shubh Mangly Sidhhi (शुभ मांगल्य सिद्धि, विवाह के संदर्भ में), Santan Sidhhi (सन्तान सिद्धि, progeny, children), good married life, wealth, employment, promotion and higher education and will fulfil all your requirements.
ॐ क्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं स्तम्भं जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं नाशय ह्रीं ॐ स्वाहा। 
The cause of manifestation, existence merging into perfection in the casual body. Who stops Motion at the Appropriate time, silence the mouths and words of all evil beings, control their tongues, control, destroy intellect (or give them intelligence). Maya, Om, I am one with the God.
ॐ बगलमुख्यै विद्महे द्विभुजायै धीमहि।  तन्नो देवी प्रचोदयात्॥ 
Om! We meditate upon her, who stops Motion at the Appropriate time, contemplate her with two arms, may that goddess grant us increase.
ABHICHAR DOSH SHANTI MANTR अभिचार दोष शान्ति  मन्त्र (To remove Black Magic काले जादु, दुष्ट शक्तियों के नाश के लिए) :: 
ॐ बगलामुखी मम सर्व शत्रु परायुक्त सर्व दुष्टग्रह बधान क्षिप्रम यधस्थानेय उच्चाटयो उच्चाटयो हम फट स्वाहा:। 
Om Hreem Bagla Mukhi Mam Sarv Satruprayukt Sarvdushtgrah Badham Kshiprm Yadhsthaney Uchchatyo Uchchatyo Hum Phat Swaha:.
बगलामुखी मंत्र :: हल्दी या पीले काँच की माला से आठ माला "ऊँ ह्नीं बगुलामुखी देव्यै ह्नीं ओम नम:" पूर्ण करें। 
ह्मीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय
 जिह्वां कीलम बुद्धिं विनाशय ह्मीं ॐ स्वाहा।
इस मंत्र से काम्य प्रयोग भी संपन्न किये जाते हैं जैसे :-
(1). मधु. शर्करा युक्त तिलों से होम करने पर मनुष्य वश में होते हैं।
(2). मधु. घृत तथा शर्करा युक्त लवण से होम करने पर आकर्षण होता है।
(3). तेल युक्त नीम के पत्तों से होम करने पर विद्वेषण होता है।
(4). हरिताल, नमक तथा हल्दी से होम करने पर शत्रुओं का स्तम्भन होता है।
नवरात्रि में माँ बगलामुखी परिचय एवं साधना नियम :: माँ बगलामुखी की साधना करने के लिए सबसे पहले एकाक्षरी मंत्र "ह्ल्रीं" की दीक्षा अपने गुरुदेव के मुख से प्राप्त करें। एकाक्षरी मंत्र के एक लाख दस हजार जप करने के पश्चात क्रमशः चतुराक्षरी, अष्टाक्षरी, उन्नीसाक्षरी, छत्तीसाक्षरी (मूल मंत्र) आदि मंत्रों की दीक्षा अपने गुरुदेव से प्राप्त करें एवं गुरु आदेशानुसार मंत्रों का जाप पूरा करें।  
बगलामुखी पूजन :: माँ बगलामुखी की पूजा हेतु इस दिन प्रात: काल उठकर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर, पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। साधना अकेले में, मन्दिर में या किसी सिद्ध पुरुष के साथ बैठकर की जानी चाहिए। पूजा करने के लिये पूर्व दिशा की ओर मुख करके पूजा करने के लिए आसन पर बैठें। चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें। इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर संकल्प करें। इस पूजा में ब्रह्मचर्य का पालन करना आवशयक होता है। 
मंत्र सिद्ध करने की साधना में माँ बगलामुखी का पूजन यंत्र चने की दाल से बनाया जाता है और यदि हो सके तो ताम्रपत्र या चाँदी के पत्र पर इसे अंकित करें।
नवरात्रि के अवसर पर माँ बगलामुखी को प्रसन्न करने के लिए इस प्रकार पूजन करें :- साधक को माता बगलामुखी की पूजा में पीले वस्त्र धारण करना चाहिए। इस दिन सुबह जल्दी उठकर नित्य कर्मों में निवृत्त होकर पूर्व दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें। चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवती बगलामुखी का चित्र स्थापित करें। इसके बाद आचमन कर हाथ धोएं। आसन पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन, दीप प्रज्जवलन के बाद हाथ में पीले चावल, हरिद्रा, पीले फूल और दक्षिणा लेकर इस प्रकार संकल्प करें :-
संकल्प ::
ऊँ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु: अद्य…(अपने गोत्र का नाम) गोत्रोत्पन्नोहं …(नाम) मम सर्व शत्रु स्तम्भनाय बगलामुखी जप पूजनमहं करिष्ये। तदगंत्वेन अभीष्टनिर्वध्नतया सिद्ध्यर्थं आदौ: गणेशादयानां पूजनं करिष्ये।
मंत्र विनियोग ::
श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्रदये।
ह्रीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।
ऊँ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।
आवाहन :- 
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।
ध्यान ::
सौवर्णामनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्
हेमावांगरूचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्
हस्तैर्मुद़गर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै
व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्।
इसके बाद गणेश जी महाराज का पूजन करें। नीचे मंत्रों से माँ गौरी आदि षोडशमातृकाओं का पूजन करें :-
गौरी पद्मा शचीमेधा सावित्री विजया जया।
देवसेना स्वधा स्वाहा मातरो लोक मातर:
धृति: पुष्टिस्तथातुष्टिरात्मन: कुलदेवता।
गणेशेनाधिकाह्योता वृद्धौ पूज्याश्च षोडश
इसके बाद गंध, चावल व फूल अर्पित करें तथा कलश तथा नवग्रह का पंचोपचार पूजन करें।
तत्पश्चात इस मंत्र का जप करते हुए देवी बगलामुखी का आवाह्न करें :-
नमस्ते बगलादेवी जिह्वा स्तम्भनकारिणीम्।
भजेहं शत्रुनाशार्थं मदिरा सक्त मानसम्॥
आवाह्न के बाद उन्हें एक फूल अर्पित कर आसन प्रदान करें और जल के छींटे देकर स्नान करवाएं व इस प्रकार पूजन करें :-
गंध :: "ऊँ बगलादेव्यै नम: गंधाक्षत समर्पयामि" का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीला चन्दन  लगाएं और पीले फूल चढ़ायें।
पुष्प :: "ऊँ बगलादेव्यै नम: पुष्पाणि समर्पयामि" का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले फूल चढ़ाएं।
धूप :: "ऊँ बगलादेव्यै नम: धूपंआघ्रापयामि" मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को धूप दिखाएं।
दीप :: "ऊँ बगलादेव्यै नम: दीपं दर्शयामि" मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को दीपक दिखाएं।
नैवेद्य :: "ऊँ बगलादेव्यै नम: नैवेद्य निवेदयामि" मंत्र का उच्चारण करते हुए बगलामुखी देवी को पीले रंग की मिठाई का भोग लगाएं।
प्रार्थना  :-
जिह्वाग्रमादाय करणे देवीं, वामेन शत्रून परिपीडयन्ताम्।
गदाभिघातेन च दक्षिणेन पीताम्बराढ्यां द्विभुजां नमामि॥
क्षमा प्रार्थना :-
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥
मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे॥
अंत में माता बगलामुखी से ज्ञात-अज्ञात शत्रुओं से मुक्ति की प्रार्थना करें।
सावधानियाँ ::
(1). बगलामुखी साधना के दौरान पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अत्यधिक आवश्यक है।
(2). इस क्रम में स्त्री का स्पर्श, उसके साथ किसी भी प्रकार की चर्चा या सपने में भी उसका आना पूर्णत: निषेध है। अगर आप ऐसा करते हैं तो आपकी साधना खण्डित हो जाती है।
(3). किसी डरपोक व्यक्ति या बच्चे के साथ यह साधना नहीं करनी चाहिए। बगलामुखी साधना के दौरान साधक को डराती भी है। साधना के समय विचित्र आवाजें और खौफनाक आभास भी हो सकते हैं इसीलिए जिन्हें काले अंधेरों और पारलौकिक ताकतों से डर लगता है, उन्हें यह साधना नहीं करनी चाहिए।
(4). साधना से पहले आपको अपने गुरू का ध्यान जरूर करना चाहिए।
(5). मंत्रों का जाप शुक्ल पक्ष में ही करें। बगलामुखी साधना के लिए नवरात्रि सबसे उपयुक्त है।
(6). उत्तर की ओर देखते हुए ही साधना आरम्भ करें।
(7). मंत्र जाप करते समय अगर आपकी आवाज अपने आप तेज हो जाए तो चिंता ना करें।
(8). जब तक आप साधना कर रहे हैं तब तक इस बात की चर्चा किसी से भी ना करें।
(9). साधना करते समय अपने आसपास घी और तेल के दिये जलाएं।
(10). साधना करते समय आपके वस्त्र और आसन पीले रंग का होना चाहिए।
(11). मन्त्र ज्ञात ब्राह्मण सज्जन देवी के पूजन में वैदिक मंत्रों का ही प्रयोग करें।
यह विद्या शत्रु का नाश करने में अद्भुत है, वहीं कोर्ट, कचहरी में, वाद-विवाद में भी विजय दिलाने में सक्षम है। इसकी साधना करने वाला साधक सर्वशक्ति सम्पन्न हो जाता है। उसके मुख का तेज इतना हो जाता है कि उससे आँखें मिलाने में भी व्यक्ति घबराता है। सामनेवाले विरोधियों को शान्त करने में इस विद्या का अनेक राजनेता अपने ढंग से इस्तेमाल करते हैं। यदि इस विद्या का सदुपयोग किया जाए तो देशहित होगा।
मंत्र शक्ति का चमत्कार हजारों साल से होता आ रहा है। कोई भी मंत्र आबध या कीलित नहीं है यानी बँधे हुए नहीं हैं। सभी मंत्र अपना कार्य करने में सक्षम हैं। मंत्र का सही विधि द्वारा जाप किया जाए तो वह मंत्र निश्चित रूप से सफलता दिलाने में सक्षम होता है।
(4). SHODSHI त्रिपुर सुन्दरी-षोडशी :: 
इनकी चार भुजा और तीन नेत्र हैं। इन्हें ललिता, राज राजेश्वरी और ‍त्रिपुर सुन्दरी भी कहा जाता है। त्रिपुरा में स्थित त्रिपुर सुन्दरी की शक्तिपीठ है। यहाँ माता सती के वस्त्र और आभूषण गिरे थे। त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर शिव) की जननी होने से जगदम्बा ही त्रिपुरा हैं।  
षोडशी साधना को राजराजेश्वरी इस लिये भी कहा जाता है क्योंकि इनकी कृपा से साधारण व्यक्ति भी राजा बन सकता है। इनमें षोडश कलायें पूर्ण रूप से विकसित हैं। इसलिये इनका नाम माँ षोडशी हैं। इनकी उपासना श्री यंत्र के रूप में की जाती है। यह अपने उपासक को भोग, भक्ति और मुक्ति-मोक्ष दोनों ही साथ-साथ प्रदान करती हैं। बुध इनका अधिष्ठातृ ग्रह है।
संसार का कोई भी कार्य संपन्न करने के लिए त्रिपुर सुंदरी की आराधना की जानी चाहिए। जिस कार्य को करने में देवता भी सफल नहीं हो पाते, उसे त्रिपुर सुन्दरी सम्पन्न करती है। त्रिपुर सुन्दरी के अलावा इस संसार में ऐसी कोई भी साधना नहीं है जो भोग और मोक्ष एक साथ प्रदान करे। त्रिपुर सुन्दरी साधना करने के लिए रुद्राक्ष की माला से दस बार जाप किया जाना चाहिए। इस मंत्र के जाप के लिए रुद्राक्ष की माला का इस्तेमाल किया जा सकता है। कम से कम दस माला जप करें। 
सोलह का महत्व :: (1). सोलह वर्षीय कन्या, युवती, स्त्री और (2). हिन्दुओं में कृत्य जो किसी के मरने के दसवें या ग्यारहवें दिन होता है। 
16 वस्तुओं का वर्ग या समूह :: ईक्षण, प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, कर्म और नाम।
The worship of Devi in Shri Chakr is regarded as the highest form of the Devi worship. Originally Bhagwan Shiv granted 64 Chakr and their Mantr and Tantr to the world, to attain-accomplish spiritual and material desires. He evolved the Shri Chakr and the highly coveted and the most powerful Shodshakshari Mantr, which is the equivalent of all the other 64 put together. Shri Yantr is called Yantr Raj or King of the Yantr, Shri Vidya Tantr is called Tantr Raj and the Shodshi Mantr is called Mantr Raj.
Shodshi worship is the only one which grants the Sadhak both of them and Param i.e., Material and spiritual-Ultimate benefits.
The Shri Vidya or Shodshi Vidya was 1st taught in Saty Yug by Bhagwan Haygreev to Agasty and his wife Lopamudra. This is as per the Vaedic-Achar (वैदिक आचार) or Vaedic tradition (वैदिक परम्परा). During Treta Yug it was given to Bhagwan Parshu Ram by Dattatrey Ji who was the combined incarnation of Brahma, Vishnu and Mahesh and considered the greatest incarnation. Parshu Ram Ji gave it to his disciples and it is called Parshu Ram Kalp Sukt. This is as per the Kaulav-Achar or Kaulav tradition. Vaeshnav-Achar Shri Vidya also exists.
This is one of the manifestations of Maa Bhagwati-the Adi Shakti. When Mata Parvati discarded her form as Kali and assumed the form of Gauri. Still Bhagwan jokingly addressed her Kali. Mata Parvati became angry and moved into hiding. Bhagwan Shiv started missing her and began to search. Still he could not locate her. He was dismayed when Narad Ji reached there to pay obeisance to Bhagwan Shiv & Maa Parwati. Bhagwan Shiv narrated the whole sequence to Narad Ji. Narad Ji easily found her meditating at Sumeru Parwat. He reached there and said that Adi Dev was going to marry another woman so that she could feel jealous-envy and rush to Kaelash. The trick worked and Maa reached Kaelash and looked at Bhagwan Shiv's chest where she found another woman, a young girl of 16 years forgetting that it was she who's image was being reflected from the heart of Bhagwan Shiv. She could not hide her anxiety and questioned Bhagwan Shiv about that Shodshi (16 years old girl) Kanya. Bhagwan Shiv was relaxed to find her and said that it was her own reflection, since no other woman could find a place in Bhagwan Shiv's heart. Bhagwan Shiv turned this instance into a Maha Vidya. He said that she would manifest 16 forms of excellence! So, she unites the sixteen syllables of Shiv and Shakti, the Supreme Goddess of all Desires. This is the age when a girl has her beauty at her peak.
One who is most beautiful in all the three worlds is known as Shodshi, the girl of sixteen, is usually listed as the third Maha Vidya following Kali and Tara. Tri Pur Sundri is one of the Adi (primary) Maha Vidya. She was a well known Tantric deity even before she was grouped with the Maha Vidya. The goddess is depicted in three forms :- Tri Pur Bala (the young virgin; Tri Pur Sundri (the Ultimate beauty) and Tri Pur Bhaervi (the terrible). Tri Pur Bhaervi is emphasised in the Maha Vidya cult. While, her other two aspects are central to the Shri Vidya tradition rooted in the worship of Shri Chakr. In Shri Vidya, Tri Pur Sundri is celebrated as Lalita, Raj Rajeshwari, Kameshwari and Maha Tri Pur Sundri the most magnificent transcendental beauty without a comparison in three worlds, the conqueror of three levels of existence. Each of these forms emphasises a particular quality or function. In Shri Vidya, the Goddess is worshipped in her benign (सौम्य) and beautiful (सौन्दर्य) aspects, following the Shri Kul (family of Shri) tradition (सम्प्रदाय). Shri Vidya is still flourishing, particularly in South India.
Shodshi of sixteen years is at a delightful stage of a woman’s life. Her nature is to play, to seek new experiences and to charm others to her. Her innocence attracts all towards her. The other explanations mention :- She is called Shodshi because the Mantr of her Vidya is composed of sixteen seed syllables (Beejakshar: ka e i la Hreem; ha sa ka ha la Hreem; sa ka la Hreem; and Shreem). Another explanation sates that the number sixteen is also associated with sixteen, her individualised aspects, Kala or sixteen phases of moon (Shodash Kala). And, therefore this Vidya is also known as Chandr Kala Vidya, the wisdom of the lunar digits. The Beejakshars are invoked as forms of the Mother goddess. But, in the Maha Vidya cult, Shodshi is also seen as the embodiment of sixteen modification of desire.
Tri Pur Sundri, three is her dominant number. Her name is taken to mean :- “she who is beautiful in the three worlds” or “she whose beauty transcends the three worlds”. She is Tri Vidya Shakti :- Bala, Sundri and Bhaervi. The three cities (Tri-Pur) symbolise body, mind and consciousness. The triangle is the main motif of Tri Pur Sundri carrying various symbolism :- three fold process of creation, preservation and destruction; the three syllables of her Mantr; three Guns (characteristics, qualities, traits, factors) and three colours; three states of awareness etc.
It is explained that Maha Vidya as a group belong to the Kali Kul (family of Kali) as Kali is the most prominent Maha Vidya. Kali Kul (Vansh, family) generally is opposed to the conservative Brahmanical tradition, which ‘denies the experience of the Goddess’. Kali Kul is aligned to Shakt mode of worship. Further, some aspects and dispositions of Kali, the Adi Maha Vidya, are shared by all the other Maha Vidya. For these reasons, Tri Pur Sundri, though she basically belongs to Shri Kul, as Maha Vidya (Tri Pur Bhaervi), displays traces of aggression (उग्र) and horror (घोर). The Maha Vidya Tri Pur Sundri (भैरवी) is described as timeless youth, beautiful but frowning rather angrily. The Maha Vidya text Shodshi Tantr-Shastr describes her, at places, as ‘frightening, wild and perhaps dangerous’. The most unusual depiction of Tri Pur Sundri appears in the Vamkeshwar Tantr where she is smeared with ashes, wears tiger skin, ties her hair in a knot over the top of her head as a Jata-hair locks, carries a skull and holds a snake, a trident and a drum. She has a large bull as her vehicle.
Tri Pur Sundri as Maha Vidya combines in herself the determination of Kali, the knowledge of Tara and her own beauty and grace. Following the core ideology of the Maha Vidya, Tri Pur Sundri, like Kali and Tara, she exercises her domination over the male. She sits over the chest of Adi Dev Bhagwan Shiv, while the four major demigods support her throne as its legs.
Though Tri Pur Sundri is an Adi (primordial) Maha Vidya, she is not regarded as representing the highest state or absolute of reality (as Kali does). But, she represents a relative state of consciousness characterised by “I am this” (अहम्, इदम्). She is related to Yog and heightened awareness-consciousness)
Tri Pur Sundri is glowing like rising Sun spreading delights of joy, compassion and knowledge. She is depicted as a beautiful young girl of sixteen, of red and golden complexion, having four arms holding a noose, a goad, a sugarcane bow and five flower arrows. She is richly adorned with ornaments. She is sometimes shown seated on a lotus emerging out of the navel of Bhagwan Shiv, who is reclining below her. At other times she is seated on the chest of reclining Shiv or sitting on the lap of Bhagwan Shiv-Kameshwar. They are on a pedestal supported by the Tri Murti-Tri Dev :- Brahma, Vishnu & Mahesh. An aura of royalty distinguishes her demeanour and her attributes.
The weapons (Ayudh आयुध, Astr & Shastr अस्त्र-शस्त्र), she holds :- The noose symbolises attachment-indicates the captivating power of beauty, the goad signifies repulsion-the ability to dissociate from attachments, the sugarcane bow is like the mind-enlightenment and the arrows are the five sense objects. Bhagwan Shiv represents dormant consciousness the Sada Shiv Tatv (the ever auspicious but inert principle of consciousness) and Tri Pur Sundri is Maa Shakti.
मंत्र :: 

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी पादुकम् पूज्यामि नमः। 

Om Aim Hreem Shreem Shri Lalita Tri Pur Sundri Padukam Poojyami Namah.

रूद्राक्ष माला से दस माला "ऐ ह्नीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नम:" मंत्र का जाप कर सकते हैं।

MAHA SHODSHI MANTR महाषोडशी मन्त्र :: "ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः"
षोडशी त्रिपुर सुन्दरी दीक्षा :: महाविद्या समुदाय में त्रिपुरा नाम की अनेक देवियांँ हैं, जिनमें त्रिपुरा-भैरवी, त्रिपुरा और त्रिपुर सुन्दरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
त्रिपुर सुन्दरी दीक्षा प्राप्त होने से आद्याशक्ति त्रिपुरा शक्ति शरीर की तीन प्रमुख नाडियाँ इडा, सुषुम्ना और पिंगला जो मन बुद्धि और चित्त को नियंत्रित करती हैं, वह शक्ति जाग्रत होती है। 
भू भुवः स्वः यह तीनों इसी महाशक्ति से उद्भुत हुए हैं, इसी लिए इसे त्रिपुर सुन्दरी कहा जाता है। इस दीक्षा के माध्यम से जीवन में चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही साथ आध्यात्मिक जीवन में भी सम्पूर्णता प्राप्त होती है, कोई भी साधना हो, चाहे अप्सरा साधना हो, देवी साधना हो, शैव साधना हो, वैष्णव साधना हो, यदि उसमें सफलता नहीं मिल रहीं हो, तो उसको पूर्णता के साथ सिद्ध कराने में यह महाविद्या समर्थ है, यदि इस दीक्षा को पहले प्राप्त कर लिया जाए तो साधना में शीघ्र सफलता मिलती है। गृहस्थ सुख, अनुकूल विवाह एवं पौरूष प्राप्ति हेतु इस दीक्षा का विशेष महत्त्व है। मनोवांछित कार्य सिद्धि के लिए भी यह दीक्षा उपयुक्त है। इस दीक्षा से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
श्रीबाला त्रिपुर-सुन्दरी :: बाला, बाला-त्रिपुरा, त्रिपुरा-बाला, बाला-सुन्दरी, बाला त्रिपुर सुन्दरी, पिण्डी भूता त्रिपुरा, काम त्रिपुरा, त्रिपुर भैरवी, वाक त्रिपुरा, महालक्ष्मी त्रिपुरा, बाला भैरवी, श्री ललिता राज राजेश्वरी, षोडशी, श्री ललिता महात्रिपुरा सुन्दरी, के अन्य भेद सभी श्री श्री विद्या के नाम से पुकारे जाते हैं। इन सभी विद्याओं की उपासना ऊधर्वाम्नाय से होती है। 
बाला, बाला त्रिपुरा और बाला त्रिपुर सुन्दरी नामों से एक ही महा विद्या को सम्बोधित किया जाता है। किसी भी नाम से उपासना की जाये, उपासना तो जगन्माता भगवती की ही की जाती है।   
वेद, धर्म शास्त्र, पुराण, पञ्चरात्र आदि शास्त्रों में केवल एक परमेश्वरी का भिन्न-भिन्न नामों से वर्णन है।[नारदीय संहिता]
महा शक्ति एक ही है। कहीं मन्त्रोध्दार भेद से, कहीं आसन भेद से, कहीं सम्प्रदाय भेद से, कहीं पूजा भेद से, कहीं स्वरूप भेद से, कहीं ध्यान भेद से, त्रिपुरा के बहुत प्रकार हैं। कहीं त्रिपुरा भैरवी, कहीं त्रिपुरा ललिता, कहीं त्रिपुर सुंदरी, कहीं इन नामों से पृथक, कहीं मात्र त्रिपुरा या बाला ही कही जाती है। तीन पुरियों की प्राप्ति अभीष्ट होने से पर देवता को त्रिपुरा (त्रिपुर सुन्दरी) कहा गया है। विश्व भर में  तीन-तीन वस्तुओं के जितने भी समुदाय हैं, वे सब भगवती बाला त्रिपुर सुन्दरी के त्रिपुरा नाम में समाविष्ट हैं अर्थात संसार में त्रि-संख्यात्मक जो कुछ है, वे सभी वस्तुएँ त्रिपुरा के तीन अक्षरों वाले नाम से ही उत्पन्न हुई हैं।[लघ्वाचार्य]
उन्होंने त्रि-संख्यात्मक वस्तुओं में कतिपय त्रि-वर्गात्मक वस्तुओं के नाम भी गिनायें हैं, जैसे (1). स्वर्ग,  (2). पृथ्वी और (3). पाताल के लय होने पर भी पुन: उनको ज्यों का त्यों बना देने वाली भगवती का नाम त्रिपुरा है।  
त्रिपुरा :: तीन पुरों की अधीश्वरी। त्रिविध मार्ग होने से पुरियाँ भी तीन हैं।
तीन पुरियों में जाने के मार्ग :: सायुज्य, सारुप्य और सामीप्य मोक्ष। 
मुक्ति के 5 प्रकार ::  (1). सालोक्य, (2). सामीप्य, (3). सारूप्य,  (4). सायुज्य और (5). कैवल्य।  इनमें से सालोक्य का एक मार्ग है और कैवल्य का एक। 
त्रिमूर्ति :: (1). ब्रह्मा, (2). विष्णु और (3). महेश्वर। (जो सृष्टि से पूर्व जो विधमान थीं।) 
वेद त्रयी :: (1). ऋग,  (2). यजु और  (3). साम वेद से पूर्व विद्यमान थीं।  
त्रि-लोक ::  (1). स्वर्ग,  (2). पृथ्वी और (3). पाताल के लय होने पर भी पुन: उनको ज्यों का त्यों बना देने वाली भगवती का नाम त्रिपुरा है।  
तीन देवता :: (1). ब्रह्मा, (2). विष्णु और  (3). महेश।  देवता का अर्थ भी गुरु भी है।
तीन गुरु :: (1). गुरु, (2).परम गुरु और (3). परमेष्ठी गुरु। 
तीन अग्नि-ज्योति :: (1). गाहर्पत्य, (2). दक्षिनाग्नि और (3). आहवनीय। (अग्नि  का अर्थ ज्योति भी है।) 
तीन ज्योतियाँ :: (1). ह्रदय ज्योति, (2). ललाट ज्योति और (3). शिरो-ज्योति। 
तीन शक्ति ::  (1). इच्छा शक्ति, (2). ज्ञान शक्ति और (3). क्रिया शक्ति। 
शक्ति-तीन देवियाँ ::   (1). ब्रह्माणी, (2). वैष्णवी और (3). रुद्राणी।  
तीन स्वर :: (1). उदात्त, (2). अनुदात्त और (3). त्वरित अर्थात (1). अ-कार, (2). उ-कार और (3). बिन्दु।  
तीन लोक :: (1). स्वर्ग, (2). मृत्यु और (3). पाताल। लोक शब्द से देहस्थ चक्र का अर्थ भी लिया जाता है। 
तीन चक्र :: (1). आज्ञा, (2). शीर्ष  और (3). ब्रह्म ज्ञान। 
त्रि-पदी (तीन स्थान) :: (1). जालन्धर पीठ, (2). काम रूप पीठ और (3). उड्डियान-पीठ। पद शब्द से नाद शब्द का भी बोध होता है।  
तीन नाद ::  (1). गगनानंद, (2). परमानन्द और (3). कमलानन्द। 
त्रिपदी से तीन पदों वाली गायत्री भी ली जाती है। 
त्रि-पुष्कर (तीन तीर्थ) :: (1). शिर, (2). ह्रदय, (3). नाभि अथवा (1). ज्येष्ठ पुष्कर, (2). मध्यम पुष्कर, (3). कनिष्ठ पुष्कर।
त्रि-ब्रह्म (तीन ब्रह्म) :: (1). इड़ा, (2). पिंगला, (3). सुषुम्ना अर्थात (1). अतीत, (2). अनागत, (3). वर्तमान जैसे (1). ह्रदय, (2). व्योम, (3). ब्रह्म-रंध्र।
त्रयी वर्ण (तीन वर्ण) :: (1). ब्राह्मण, (2). क्षत्रिय, (3). वैश्य अथवा वर्ण शब्द से बीजाक्षरों का ग्रहण होता है :- (1). वाग बीज, (2). काम बीज और (3). शक्ति-बीज।
जो अपने पुत्रों को तथा संसार को बल प्रदान करती है, उसे बाला कहते हैं। जो संसार के प्राणियों को बल प्रदान करती हैं वह बाला हैं। बाला वही हैं जो मनुष्यों-प्राणियों के समस्त अंगों को बल प्रदान करती हैं। नख से शिखा तक, रक्त से ओज तक, बुद्धि से बल तक जो प्राणी को बल प्रदान करती हैं, वह शक्ति-मति हैं, उनके बिना प्राणी और देवगण यथा अग्नि, वरुण, पवन निस्सहाय हैं। बाला अर्थात सर्वशक्ति सम्पन्न। बाला का काम ही वृद्धि करना है।  वह मानव या किसी प्राणी-विशेष को ही बल प्रदान करती हो, ऐसा नहीं है। अनादि काल से ही जगन्माता इस संसार को बढाती चली आ रही हैं।  बाला (बल-वर्धिनी) का साधक-पुजारी, सेवक कभी निर्बल नहीं रह सकता।
विश्वात्मिका शक्ति श्री बाला :: शिव और शक्ति, सृष्टी के आदि कारण हैं।  उनकी इच्छा के  अनुरूप ही सृष्टी होती है। महा प्रलय के बाद जब "एकोहम बहु स्याम प्रजाये" की कल्पना होती है, तभी शक्ति तत्व, शिव तत्व से अलग होता है। 
उसके पहले वे एक ही रहते हैं। उस एक रहने का नाम नाद है अर्थात सृष्टि की कल्पना होने के समय निष्क्रिय शिव और सक्रिय शक्ति की जो विपरीत रति होती है, उसे ही नाद कहते हैं और इसी विपरीत रति द्वारा बिन्दु की उत्पति होती है।  शक्ति जब निष्कल शिव से युक्त होती है, तब वे चिद रूपिणी और विश्वोत्तीर्णा अर्थात विश्व के बाहर रहती हैं और जब वे सकल शिव के साथ होती हैं तब वे विश्वात्मिका होती हैं। परा शक्ति वे है, जो चैतन्य के साथ विश्रामावस्था में रहती हैं। इनको ही कादी विद्या में महाकाली कहा जाता है और हादी विद्या में महात्रिपुर सुन्दरी। 
श्रीबाला गायत्री मंत्र ::
बालाशक्तयै च विद्महे त्र्यक्षर्यै च धीमहि तन्नः शक्तिः प्रचोदयात्। 
ऐं वाकऐश्वर्ये विद्महे क्लीं कामेश्वर्ये धीमहि तन्नः शक्ति प्रचोदयात्॥ 
(5). CHHINNMASTA (छिन्नमस्ता) :: छिन्नमस्ता दश महाविद्याओं में षष्ठी महाविद्या हैं। इनका दूसरा नाम ‘प्रचण्ड चण्डिका’ भी हैं। हिरण्यकश्यपु और वैरोचन का मनोरथ पूर्ण करने वाली होने से वज्रवैरोचनीया भी कहलाती हैें। योगियों के लिए इनकी साधना सर्वश्रेष्ठ है। जो साधक कुण्डलिनी जागरण करना चाहते हैं उन्हें यह साधना गुरू मार्गदर्शन में अवश्य करनी चाहिए।माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप गोपनीय है। इनका सर कटा हुआ है। इनके बंध से रक्त की तीन धारायें निकल रही है। जिस में से दो धारायें उनकी सहस्तरीयां और एक धारा स्वयं देवी पान कर रही है। चतुर्थ, संध्या काल में छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती की सिद्धि हो जाती है। राहु इस महाविद्या का अधिष्ठाता ग्रह है।
यह देवी माता पार्वती का ही एक रूप है। देवी का मस्तक कटा हुए है इसीलिए उनको छिन्नमस्ता कहा गया है। उनके साथ उनकी सहचरणीं जया व विजया हैं। तीनों मिलकर उनके धड़ से निकली रक्त की तीन धाराओं का स्तवन करते हुए दर्शायी गई हैं। कामाख्या के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात माँ छिन्नमस्तिक मन्दिर काफी लोकप्रिय है। झारखंड की राजधानी राँची से लगभग 79 किलोमीटर की दूरी रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित माँ छिन्नमस्तिक का यह मन्दिर स्थित है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है। ‍
देवी छिन्नमस्ता बहुत ही जल्द शत्रुओं का विनाश कर सकती हैं। इसके अलावा अवाक सिद्धि, रोजगार में अचूक सफलता, नौकरी में पदोन्नति और विवाद में सफलता भी हासिल होती है। यह कुंडिली जागरण में सहायक है। अलावा पति या पत्नी को अपने वश में रखने के लिए भी देवी छिन्नमस्ता की आराधना की जाती है। छिन्नमस्ता देवी की आराधना रुद्राक्ष, हकीक की माला से या स्फटिक की माला से 11 या 20 बार मंत्र जाप करना चाहिए।

मंत्र :: श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट स्वाहा:।    

This is the sixth Maha Vidya. This manifestation is associated with the concept of self-sacrifice as well as the awakening of the Kundlini-spiritual energy. She is considered both as a symbol of self-control on sexual desire as well as an embodiment of sexual energy, depending upon interpretation. She symbolises both aspects of Devi: a life-giver and a life-taker. Her legends emphasise her sacrifice-sometimes with a maternal element, her sexual dominance and her self-destructive fury.
Once Maa Parvati went with Her friends Dakini and Varnini to take a bath in the Mandakini river. she was feeling very happy and a lot of love was welling up inside Her. Her complexion darkened and the feeling of love completely took over. Her friends on the other hand were hungry and asked Maa Parvati to give them some food. She asked  them to wait for a while and started walking. After a short while, Her friends once again appealed to Her, telling Her that She was the Mother of the Universe and they were Her off springs and requested to be fed quickly. Parvati replied that they should wait until they reached home. Her friends could not wait any longer and demanded that their hunger be satisfied immediately. The compassionate Parvati laughed and with her finger nail cut Her own head. Immediately the blood spurted in three directions. Her two friends drank the blood from two of the directions and the Goddess herself drank the blood from the third direction. Since, she cut Her own head, she is known as Chhinnmasta. 
Chhinnmasta shines like a lightning bolt from the Sun. She demonstrates the rare courage needed to make the highest conceivable sacrifice. The image of Chhinnmasta is a composite one, conveying reality as an amalgamation of sex, death, creation, destruction and regeneration. It is stunning representation of the fact that life, sex and death are an intrinsic part of the grand unified scheme that makes up the manifested universe. 
Chhinnmastika is a symbol of the perception of secrecy. She stands on the seat of white lotus. In her navel Yoni Chakr are situated. The directions itself are her apparel. Her two companions symbolizes the two qualities of Tamas (dark, demonic) and Rajas -humanly). She is alive even though her head is severed from her body. Her severed head is symbolic of introverted nature of accomplishment. The Chhinnmastika or Chhinnmasta Mantr should be chanted for 1,25,000 for the accomplishment of any desire. She is worshipped to obtain a son, remove poverty, gain wisdom, destroy the enemy or the seek poetic powers.
Before starting the Jap the Yantr must be worshipped.
MANTR :: (1). ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचनीये श्रीं ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा। 
(2). ॐ श्रीं  क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूँ हूँ फट् स्वाहा। Om Shreem Hreem Kleem Aim Vajr Vaerochniyae  Hoom Hoom Fat Swaha.
(3). ओम विरोचिन्यै विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात। 
छिन्नमस्ता महाविद्या दीक्षा :: माता का स्वरूप अतयंत गोपनीय है। चतुर्थ संध्याकाल में मां छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती की सिद्ध प्राप्त हो जाती है। कृष्ण और रक्त गुणों की देवियां इनकी सहचरी हैं। पलास और बेलपत्रों से छिन्नमस्ता महाविद्या की सिद्धि की जाती है। इससे प्राप्त सिद्धियां मिलने से लेखन बुद्धि ज्ञान बढ़ जाता है। शरीर रोग मुक्त होताते हैं। सभी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष शत्रु परास्त होते हैं। यदि साधक योग, ध्यान और शास्त्रार्थ में साधक पारंगत होकर विख्यात हो जाता है।
भगवती छिन्नमस्ता के कटे सर को देखकर यद्यपि मन में भय का संचार अवश्य होता है, परन्तु यह अत्यन्त उच्चकोटि की महाविद्या दीक्षा है। यदि शत्रु हावी हो, बने हुए कार्य बिगड़ जाते हों, या किसी प्रकार का आपके ऊपर कोई तंत्र प्रयोग हो, तो यह दीक्षा अत्यन्त प्रभावी है। इस दीक्षा द्वारा कारोबार में सुदृढ़ता प्राप्त होती है, आर्थिक अभाव समाप्त हो जाते हैं, साथ ही व्यक्ति के शरीर का कायाकल्प भी होना प्रारम्भ हो जाता है। इस साधना द्वारा उच्चकोटि की साधनाओं का मार्ग प्रशस्त हो जाता है, तथा उसे मौसम अथवा सर्दी का भी विशेष प्रभाव नहीं पङता है।
छीन्नमस्ता माता का मंत्र ::  रूद्राक्ष माला से दस माला प्रतिदिन 'श्रीं ह्नीं ऎं वज्र वैरोचानियै ह्नीं फट स्वाहा' मंत्र का जाप कर सकते हैं। जाप के नियम किसी जानकार से पूछें।
माँ छिन्नमस्ता के कटे सर को देखकर यद्यपि मन में भय का संचार अवश्य होता है, परन्तु यह अत्यन्त उच्चकोटि की महाविद्या दीक्षा है। यदि शत्रु बने हुए कार्य बिगड़ जाते हों या किसी प्रकार का तंत्र-मंत्र प्रयोग करते हों, तो यह दीक्षा अत्यन्त प्रभावी है। इस दीक्षा द्वारा कारोबार में सुदृढ़ता प्राप्त होती है, आर्थिक अभाव समाप्त हो जाते हैं, साथ ही व्यक्ति के शरीर का कायाकल्प भी होना प्रारम्भ हो जाता है। इस साधना द्वारा उच्चकोटि की साधनाओं का मार्ग प्रशस्त हो जाता है तथा उसे मौसम अथवा सर्दी का भी विशेष प्रभाव नहीं पङता है।
(6). BHUVNESHWARI भुवनेश्वरी :: इस संसार की स्वामिनी माँ भुवनेश्वरी, जो ह्रीं बीज मंत्र धारिणी हैं, वे माँ भुवनेश्वरी ब्रह्मा की भी आधिष्ठात्री देवी हैं। महाविद्याओं में प्रमुख माँ भुवनेश्वरी ज्ञान और शक्ति दोनों की समन्वित देवी मानी जाती हैं। जो भुवनेश्वरी सिद्धि प्राप्त करता है, उस साधक का आज्ञा चक्र जाग्रत होकर ज्ञान-शक्ति, चेतना-शक्ति, स्मरण-शक्ति अत्यन्त विकसित हो जाती है। भुवनेश्वरी को जगतधात्री अर्थात जगत-सुख प्रदान करने वाली देवी कहा गया है। दरिद्रता नाश, कुबेर सिद्धि, रति-प्रीति प्राप्ति के लिए भुवनेश्वरी साधना उत्तम मानी गई है। इस महाविद्या की आराधना एवं दीक्षा प्राप्त करने वाले व्यक्ति की वाणी में सरस्वती का वास होता है। इस महाविद्या की दीक्षा प्राप्त कर भुवनेश्वरी साधना सम्पन्न करने से साधक को चतुर्वर्ग लाभ प्राप्त होता ही है। यह दीक्षा प्राप्त कर यदि भुवनेश्वरी साधना सम्पन्न करें तो निश्चित ही पूर्ण सिद्धि प्राप्त होती है। सुख में वृद्धि करने और किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति करने के लिए भुवनेश्वरी माँ की साधना करनी चाहिए। भुवनेश्वरी माँ को प्रसन्न करना बेहद आसान है, वह अपने भक्त से बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाती हैं। भुवनेश्वरी माँ की आराधना करने के लिए स्फटिक की माला से कम से कम 11 या 21 बार जाप करना चाहिए।
महाविद्याओं में भुवनेश्वरी महाविद्या को आद्या शक्ति कहा गया है। माँ भुवनेश्वरी का स्वरूप सौम्य और अंग कांतिमय है। माँ भुवनेश्वरी की साधना से मुख्य रूप से वशीकरण, वाक सिद्धि, सुख, लाभ एवं शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। पृथ्वी पर जितने भी जीव हैं, सब को इनकी कृपा से अन्न प्राप्त होता है। इसलिये इनके हाथ में शाक और फल-फूल के कारण इन्हें माँ शाकंभरी नाम से भी जाना जाता है। चन्द्रमा इनका अधिष्ठातृ ग्रह है। यह साधना हर प्रकार के सुख मे वृद्धि करने वाली है। देवी भुवनेश्वरी की खास बात यह है कि यह बहुत ही कम समय मे प्रसन्न हो जाती हैं, परन्तु एक बार रुठ गई तो मनाना भी थोड़ा मुश्किल ही होता है। देवी माँ से कभी भी झूंठे वचन नहीं कहने चाहिए।

It is the fourth of the ten Maha Vidya and an aspect of Maa Durga as elements of the physical cosmos, in giving shape to the creation of the World. She is an incarnation of Adi Maa Shakti known as Adi Shakti i.e., one of the earliest forms of Shakti. She rules or commands the whole universe, possessing controlling influence of turning situations according to her desire. The word Bhuvneshwari is a compound of the words Bhuwan (cosmos, universe); Ishwari, meaning "Goddess-deity of the worlds" where the worlds are the Tri-Bhuvan or three abodes-regions of Bhoo (earth), Bhuvah (sky, atmosphere) and Svaḥ (heavens). Maa Parvati is Sagun Roop (the visible form with characteristics, embodiment) of Goddess Bhuvneswari. Her consort is Bhagwan Shiv. 
She is red in colour, seated on a lotus flower. Her body is resplendent and shining with jewels. She holds a noose (Pash) and a curved sword (Goad, Ankush) in two of her hands and the other two assume the Mudras of blessing and freedom from fear. 

Bhuvneshwari-the mother nature, is inseparable from the Creator of the World as the supreme goddesses who creates power of love, speech, gives freedom and breaks one free from attachment and sufferings making him believe that true love has no form. She is creator and protector and fulfils all the wishes of her Sadhaks (devotee, worshippers). Bhuvneshwari Tantr Sadhna-practice evokes 64 Yogini. The aspirant Sadhak, having perfected this Sadhna is bestowed with 64 divine virtues or the 64 Yogini from Maa Bhuvneshwari which helps to succeed in every venture, of the Sadhak-practitioner. This Sadhana can be started on first Monday of any Hindu calendar month.

BENEFITS OF BHUWANESHWARI SADHNA-TANTR ::
 A Tantr Sadhak of Das Maha Vidya desires beauty, good fortune, immovable property, house and vehicle. The aspirant Sadhak, having perfected-accomplished this Sadhna get all Asht Siddhis. This Sadhna evokes innumerable advantages for all round financial prosperity and stability, blesses with life long fixed assets and real estates. The results are realised instantly after the accomplishment of the Sadhna.

PROCEDURE-METHODOLOGY :: Its better, if one has some one to guide. i.e., the Guru, who has perfected the art of worship. Rigorous chanting of Mantr with purity, correct pronunciation, rhythm, intensity etc. Maa's image, statue-idol or a Yantr may suffice. One may start with 108 Beej Mantr and then may proceed to 1,008 and eventually 5,00,000. Stanch meditation is essential. The practitioner should make up his mind that he would not discard the worship in between.

The devotee is protected from (1). Planetary conjunction leading to poverty, (2). Obstacles of all types, (3). Social, financial and physical instance of misfortune, (4). Loss of confidence and memory, (5). Insensitivity, (6). Emotional immaturity, (7). Irresponsibility etc.

ASTROLOGICAL SIGNIFICANCE :: One is required to perform prayers devoted to Maa Bhagwati-Bhuvneshwari to over come the defects-dosh arising out of the Malefic Moon, (both Maha Dasha or Antar Dasha), from the suffering and agony. Nir Buddhi (idiocy, lack of intelligence) & mental illness. One may preform Vam Tantr Das Maha Vidya Tantrik Bhuvneshwari Puja. This is useful in awakening of Kundlini as well.

MAYA-ILLUSION :: Thus, Bhuvneshwari symbolises the dynamic power of the God which manifests itself in a multitude of visible and impermanent forms. All these manifestations are unreal because of their inconstancy and impermanence. She creates, casts a spell, since she controls the living beings. One who is attached to this perishable world keeps on moving from one incarnation to yet another. 

भुवनेश्वरी दीक्षा :: भुवनेश्वरी को आदिशक्ति और मूल प्रकृति भी कहा गया है। भुवनेश्वरी ही शताक्षी और शाकम्भरी नाम से प्रसिद्ध हुई। पुत्र प्राप्ति के लिए लोग इनकी आराधना करते हैं।
भुवनेश्वरी माता का मंत्र :: स्फटिक की माला से ग्यारह माला प्रतिदिन "ह्नीं भुवनेश्वरीयै ह्नीं नम:" मंत्र का जाप कर सकते हैं। 
मन्त्र :: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमः।

बीज मंत्र :: ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः। 

गायत्री मंत्र :: ॐ नारायण्यै विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात्॥

(7). त्रिपुर भैरवी ::
 नारद-पाञ्चरात्र के अनुसार यह माता काली का ही स्वरूप है। यह महाविद्या के रूप में छठी शक्ति है। ‍त्रिपुर का अर्थ ‍तीनों लोक। दुर्गा सप्तशती के अनुसार देवी त्रिपुर भैरवी, महिषासुर नामक दैत्य के वध के काल से सम्बंधित हैं। त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवी हैं। माता की चार भुजाएं और तीन नेत्र हैं। इन्हें षोडशी भी कहा जाता है। षोडशी को श्री विद्या भी माना जाता है। देवी अपने अन्य नमो से प्रसिद्ध है तथा ये सभी सिद्ध योगिनिया हैं :- (1). त्रिपुर भैरवी, (2). कौलेश भैरवी, (3). रूद्र भैरवी, (4). चैतन्य भैरवी, (5). नित्य भैरवी, (6). भद्र भैरवी, (7). श्मशान भैरवी, (8). सकल सिद्धि भैरवी, (9). संपत प्रदा भैरवी, (10). कामेश्वरी भैरवी इत्यादि। इसकी साधना से षोडश कला निपुण सन्तान की प्राप्ति होती है। देवी त्रिपुर भैरवी का घनिष्ठ सम्बन्ध काल भैरव से है, जो जीवित तथा मृत मानवों को अपने दुष्कर्मो के अनुसार दण्ड देते हैं तथा अत्यंत भयानक स्वरूप वाले तथा उग्र स्वभाव वाले हैं। काल भैरव, स्वयं भगवान् शिव के ऐसे अवतार हैं, जिन का सम्बन्ध बुराई नाश  से है।
 किसी भी प्रकार के तांत्रिक समाधान के लिए माँ त्रिपुर भैरवी साधना की जाती है। यह साधना प्रेत आत्माओं के लिए काफी खतरनाक है। इसके अलावा ऐसे व्यक्ति जो आकर्षक जीवन साथी की ख्वाहिश रखते हैं, उनके लिए यह साधना फायदेमंद है। किसी भी बुरे तांत्रिक प्रभाव से मुक्ति और शीघ्र विवाह के लिए भी इस सिद्धि को प्राप्त किया जाता है। 
आगम ग्रंथों के अनुसार त्रिपुर भैरवी एकाक्षर रूप है। शत्रु संहार एवं तीव्र तंत्र बाधा निवारण के लिये भगवती त्रिपुर भैरवी महाविद्या साधना बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इससे साधक के सौंदर्य में निखार आ जाता है। इस का रंग लाल है और यह लाल रंग के वस्त्र पहनती हैं। गले में मुंडमाला है तथा कमलासन पर विराजमान है। त्रिपुर भैरवी का मुख्य लाभ बहुत कठोर साधना से मिलता है। इनकी साधना तुरन्त प्रभावी है। जिस किसी तांत्रिक समस्या का समाधान नहीं हो रहा है, माँ उस समस्या का जड़ से विनाश करती हैं। माँ का मंत्र जप मूँगे की माला से कर सकते हैं और कम से कम पन्द्रह माला मंत्र जप करनी चाहिए।

भूत-प्रेत एवं इतर योनियों द्वारा बाधा आने पर जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। माँ त्रिपुर भैरवी दीक्षा से जहाँ प्रेत बाधा से मुक्ति प्राप्त होती है, वहीं शारीरिक दुर्बलता भी समाप्त होती है, व्यक्ति का स्वास्थ्य निखरने लगता है। 
त्रिपुर भैरवी दीक्षा :: इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद साधक में आत्म शक्ति त्वरित रूप से जाग्रत होने लगती है और बड़ी से बड़ी परिस्थितियों में भी साधक आसानी से विजय प्राप्त कर लेता है, असाध्य और दुष्कर से दुष्कर कार्यों को भी पूर्ण कर लेता है। दीक्षा प्राप्त होने पर साधक किसी भी स्थान पर निश्चिंत, निर्भय आ जा सकता है, ये इतर योनियाँ स्वयं ही ऐसे साधकों से भय रखती है।
माता भैरवी के अनेक रूप-भेद हैं जो इस प्रकार हैं यथा त्रिपुरा भैरवी, चैतन्य भैरवी, सिद्ध भैरवी, भुवनेश्वर भैरवी, संपदाप्रद भैरवी, कमलेश्वरी भैरवी, कौलेश्वर भैरवी, कामेश्वरी भैरवी, नित्याभैरवी, रुद्रभैरवी, भद्र भैरवी तथा षटकुटा भैरवी आदि। त्रिपुरा भैरवी ऊर्ध्वान्वय की देवी हैं। यह साधक को युक्ति और मुक्ति दोनों ही प्रदान करती है। इसकी साधना से षोडश कला निपुण सन्तान की प्राप्ति होती है। जल, थल और नभ में उसका वर्चस्व कायम होता है। आजीविका और व्यापार में इतनी वृद्धि होती है कि व्यक्ति संसार भर में धन श्रेष्ठ यानि सर्वाधिक धनी बनकर सुख भोग करता है।
भूत-प्रेत एवं इतर योनियों द्वारा बाधा आने पर जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। ग्रामीण अंचलों में तथा पिछडे क्षेत्रों के साथ ही सभ्य समाज में भी इस प्रकार के कई हादसे सामने आते है, जब की पूरा का पूरा घर ही इन बाधाओं के कारण बर्बादी के कगार पर आकर खड़ा हो गया हो। त्रिपुर भैरवी दीक्षा से जहाँ प्रेत बाधा से मुक्ति प्राप्त होती है, वहीं शारीरिक दुर्बलता भी समाप्त होती है, व्यक्ति का स्वास्थ्य निखारने लगता है। 
त्रिपुर भैरवी का मंत्र :: मूँगे की माला से पन्द्रह माला "ह्नीं भैरवी क्लौं ह्नीं स्वाहा:" मंत्र का जाप कर सकते हैं। 

(8). धूमावती :: 
सातवीं महाविद्या धूमावती को पार्वती का ही स्वरूप माना गया है। एक बार माता पार्वती भगवान् शिव के साथ कैलाश पर विराजमान थीं। उन्हें अकस्मात् बहुत भूख लगी और उन्होंने वृषभ-ध्वज पशुपति से कुछ खाने की इच्छा प्रकट की।
भगवान् शिव के द्वारा खाद्य पदार्थ प्रस्तुत करने में विलम्ब होने के कारण क्षुधा पीड़िता माँ पार्वती ने क्रोध से भर कर भगवान्  शिव को ही निगल लिया। ऐसा करने के फलस्वरूप माँ पार्वती के शरीर से धूम-राशि निस्सृत होने लगी जिस पर भगवान् शिव ने अपनी माया द्वारा माँ पार्वती से कहा, धूम्र से व्याप्त शरीर के कारण तुम्हारा एक नाम धूमावती पड़ेगा। 
महाप्रलय के समय जब सब कुछ नष्ट हो जाता है, स्वयं महाकाल भगवान् शिव भी अंतर्ध्यान हो जाते हैं, माँ धूमावती अकेली खड़ी रहती हैं और काल तथा अंतरिक्ष से परे काल की शक्ति को जताती हैं। उस समय न तो धरती, न ही सूरज, चाँद, सितारे रहते हैं। रहता है सिर्फ धुआँ और राख, वही चरम ज्ञान है, निराकार, न अच्छा, न बुरा, न शुद्ध, न अशुद्ध, न शुभ, न अशुभ, धुएँ के रूप में अकेली माँ धूमावती अकेली रह जाती हैं, सभी उनका साथ छोड़ जाते हैं। इसलिए अल्प जानकारी रखने वाले लोग उन्हें अशुभ घोषित करते हैं। 
बुरी नजर और दरिद्रता से मुक्ति, तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, भूत-प्रेत के डर से मुक्ति पाने के लिए धूमावती माँ की सिद्धि प्राप्त की जाती है। माँ धूमावती, जीवन की हर मुश्किल का समाधान करती है। धूमावती माँ की आराधना करने के लिए मोती या काले हकीक की माला से कम से कम नौ बार जाप करना चाहिए। माँ धूमावती का कोई स्वामी नहीं है। इसकी उपासना से विपत्ति नाश, रोग निवारण व युद्ध में विजय प्राप्त होती है। हर प्रकार की द्ररिद्रता के नाश के लिए, तंत्र-मंत्र के लिए, जादू-टोना, बुरी नजर और भूत-प्रेत आदि समस्त भयों से मुक्ति के लिए, सभी रोगों के लिए, अभय प्रप्ति के लिए, साधना में रक्षा के लिए, जीवन में आने वाले हर प्रकार के दुखों को प्रदान करने वाली देवी हैं। इन्हें अलक्ष्मी भी कहा जाता है। 
माँ धूमावती दीक्षा प्राप्त होने से साधक का शरीर मजबूत व् सुदृढ़ हो जाता है। आए दिन और नित्य प्रति ही यदि कोई रोग लगा रहता हो या शारीरिक अस्वस्थता निरन्तर बनी ही रहती हो, तो वह भी दूर होने लग जाती है। आखों में प्रबल तेज व्याप्त हो जाता है, जिससे शत्रु भी भयभीत रहते हैं। इस दीक्षा के प्रभाव से यदि किसी प्रकार की तंत्र बाधा या प्रेत बाधा आदि हो, तो वह भी क्षीण हो जाती है। इस दीक्षा को प्राप्त करने के बाद मन में अदभुद साहस का संचार हो जाता है और फिर किसी भी स्थिति में व्यक्ति भयभीत नहीं होता है। तंत्र की कई उच्चाटन क्रियाओं का रहस्य इस दीक्षा के बाद ही साधक के समक्ष खुलता है।
मंत्र :: ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:। 
(9). मातंगी ::
 दस महाविद्याओं में नौवीं देवी मातंगी हैं। हनुमान जी महाराज के गुरु मातंग ऋषि थे।माँ मातंगी  का सम्बन्ध प्रकृति, पशु, पक्षियों, जंगलों, वनों, शिकार इत्यादि से है। माँ मातंगी जंगल में वास करने वाले आदि वासियों, जन जातियों की देवी पूजिता हैं। उन्हें मातंग ऋषि की पुत्री के रूप से भी जाना जाता है। एक बार मातंग मुनि ने, सभी जीवों को वश में करने हेतु, नाना प्रकार के वृक्षों से परिपूर्ण वन में देवी श्री विद्या त्रिपुरा की आराधना की। मातंग मुनि के कठिन साधना से सन्तुष्ट हो देवी त्रिपुर सुन्दरी ने अपने नेत्रों से एक श्याम वर्ण की सुन्दर कन्या का रूप धारण किया। इन्हें राज मातंगी कहा गया तथा ये भी देवी मातंगी का ही एक स्वरूप हैं। तभी देवी मतंग कन्या के नाम से भी जानी जाती हैं। देवी की उत्पत्ति भगवान् शिव तथा माँ पार्वती के उच्छिष्ट भोजन से हुई थी। इसीलिए देवी का एक अन्य विख्यात नाम उच्छिष्ट चांडालिनी भी हैं तथा देवी का सम्बन्ध नाना प्रकार के तंत्र क्रियाओं से हैं। शक्ति संगम तंत्र के अनुसार, एक बार भगवान् विष्णु और उनकी पत्नी माता लक्ष्मी जी, भगवान् शिव तथा माता सती से मिलने हेतु कैलाश पर्वत गये। भगवान् विष्णु, अपने साथ खाने की कुछ सामग्री अपने साथ ले गए तथा जिसे उन्होंने भगवान् शिव को भेंट किया। भगवान् शिव तथा माता सती ने, उपहार स्वरूप प्राप्त हुए वस्तुओं को खाया, भोजन करते हुए खाने का कुछ भाग नीचे धरती पर गिरा। परिणामस्वरूप, उन गिरे हुए भोजन के भागों से एक श्याम वर्ण वाली कन्या ने जन्म लिया, जो मातंगी नाम से विख्यात हुई। देवी की आराधना सर्वप्रथम भगवान् विष्णु द्वारा की गई थी, तभी भगवान् विष्णु सुखी, सम्पन्न, श्रीयुक्त तथा उच्च पद पर विराजित हैं। नारद पंचरात्र के अनुसार, कैलाशपति भगवान् शिव को चांडा तथा देवी शिवा को ही उछिष्ट चांडालिनी कहा गया हैं। देवी मातंगी चौसठ प्रकार के ललित कलाओं से सम्बंधित विद्याओं से निपुण हैं तथा तोता इनके बहुत निकट है।घर-गृहस्थी के मामलों में आने वाली बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए मातंगी आराधना की जाती है। पुत्र प्राप्ति, विवाह में आने वाली परेशानियों के समाधान के लिए मातंगी माँ की आराधना की जाती है। मातंगी माँ की सिद्धि प्राप्त करने के बाद स्त्री सहयोग जल्दी और आसानी से मिलने लगता है। इसकी साधना से विवाह, सुखी, गृहस्थ जीवन, आकर्षक और ओजपूर्ण वाणी तथा गुणवान पति या पत्नी की, तत्पश्चात संतान की प्राप्ति होती है। इनकी साधना वाम मार्गी साधकों में अधिक प्रचलित है। इनकी कृपा से स्त्रियों का सहयोग सहज ही मिलने लगता है। चाहे वो स्त्री किसी भी वर्ग की स्त्री क्यों ना हो। इसके लिए स्फटिक की कम से कम बारह माला मंत्र जप करना चहिए।

जीवन में सरसता, आनन्द, भोग-विलास, प्रेम, सुयोग्य पति-पत्नी प्राप्ति के लिए माँ मातंगी दीक्षा अत्यन्त उपयुक्त मानी जाती है। इसके अलावा साधक में वाक् सिद्धि के गुण भी जाते हैं। उसमें आशीर्वाद व श्राप देने की शक्ति आ जाती है। उसकी वाणी में माधुर्य और सम्मोहन व्याप्त हो जाता है और जब वह बोलता है, तो सुनने वाले उसकी बातों से मुग्ध हो जाते है। इससे शारीरिक सौन्दर्य एवं कान्ति में वृद्धि होती है, रूप यौवन में निखार आता है। इस दीक्षा के माध्यम से ह्रदय में जिस आनन्द रस का संचार होता है, उसके फलतः हजार कठिनाई और तनाव रहते हुए भी व्यक्ति प्रसन्न एवं आनन्द से ओत-प्रोत बना रहता है।
मतंग भगवान् शिव का एक नाम है। भगवान् शिव की यह शक्ति असुरों को मोहित करने वाली और साधकों को अभिष्ट फल देने वाली है। गृहस्थ जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए लोग इनकी पूजा करते हैं। अक्षय तृतीया अर्थात वैशाख शुक्ल की तृतीया को इनकी जयंती आती है।
यह श्याम वर्ण और चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करती हैं। यह पूर्णतया वाग्देवी की ही पूर्ति हैं। चार भुजाएं चार वेद हैं। मां मातंगी वैदिकों की सरस्वती हैं।
पलास और मल्लिका पुष्पों से युक्त बेलपत्रों की पूजा करने से व्यक्ति के अन्दर आकर्षण और स्तम्भन शक्ति का विकास होता है। ऐसा व्यक्ति जो मातंगी महाविद्या की सिद्धि प्राप्त करेगा, वह अपने क्रीड़ा कौशल से या कला संगीत से दुनिया को अपने वश में कर लेता है। वशीकरण में भी यह महाविद्या कारगर होती है।
मंत्र :: ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:।
स्फटिक की माला से बारह माला उपरोक्त मंत्र का जाप करें। 

(10). कमला :: 
श्रीमद् भागवत के आठवें स्कन्द में देवी कमला की उत्पत्ति कथा है। दस महाविद्याओं में अन्तिम देवी कमला तांत्रिक लक्ष्मी के नाम से भी जानी जाती हैं। देवी कमला, जगत पालन कर्ता भगवान् श्री हरी विष्णु की पत्नी हैं। देवताओं तथा दानवों ने मिलकर, अधिक शक्ति सम्पन्न होने हेतु समुद्र का मन्थन किया। समुद्र मन्थन से जो18 रत्न प्राप्त हुए, जिनमें देवी लक्ष्मी भी थीं, जिन्हें भगवान् श्री हरी विष्णु को प्रदान किया गया तथा उन्होंने देवी का पाणिग्रहण किया। देवी का घनिष्ठ सम्बन्ध देवराज इन्द्र तथा कुबेर से है। इन्द्र देवताओं तथा स्वर्ग के राजा हैं तथा कुबेर देवताओं के खजाने के रक्षक के पद पर आसीन हैं। देवी लक्ष्मी ही देवराज इन्द्र तथा कुबेर को इस प्रकार का वैभव, राजसी सत्ता प्रदान करती हैं। भगवान् श्री हरी विष्णु ने भृगु की पुत्री लक्ष्मी से विवाह किया था। वही कालान्तर में कमला  में प्रकट हुईं। दीवावली के दिन देवी काली और कमला की पूजा की जाती है। शैव लोग काली की और वैष्णव लोग कमला की पूजा करते हैं। कमला को ही महालक्ष्मी कहा गया है। 
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार प्रकार के पुरुषार्थों को प्राप्त करना ही सांसारिक प्राप्ति का ध्येय होता है और इसमे से भी लोग अर्थ को अत्यधिक महत्त्व प्रदान करते हैं। इसका कारण यह है कि माँ भगवती कमला धन-सम्पत्ति, वाहन आदि की आधिष्ठात्री देवी हैं। उनकी आकर्षण शक्ति में जो मातृ शक्ति का गुण विद्यमान है, उस सहज स्वाभाविक प्रेम के पाश से वे अपने पुत्रों को बाँध ही लेती हैं। जो भौतिक सुख के इच्छुक होते हैं, उनके लिए माँ कमला सर्वश्रेष्ठ साधना है। यह दीक्षा सर्व शक्ति प्रदायक है, क्योंकि कीर्ति, मति, द्युति, पुष्टि, बल, मेधा, श्रद्धा, आरोग्य, विजय आदि दैवीय शक्तियाँ माँ कमला महाविद्या के अभिन्न अंग हैं।
दीक्षा के द्वारा साधक की पशुवृत्तियों का शमन होता है और जब साधक के चित्त में शुद्धता आ जाती है, उसके बाद ही इन दीक्षाओं के गुण प्रकट होने लगते हैं और साधक अपने अन्दर सिद्धियों का दर्शन कर सकता है। अखंड धन-दौलत की स्वामिनी देवी कमला की आराधना करने के बाद ही इन्द्र ने अब तक स्वर्ग का शासन संभालकर रखा हुआ है। संसार की सारी खूबसूरती देवी कमला की ही कृपा मानी जाती है। इनकी आराधना करने के लिए कमलगट्टे की माला से कम से कम दस या इक्कीस बार जाप किया जाना चाहिए। माँ कमला कमल के आसन पर विराजमान रहती है। श्वेत रंग के चार हाथी अपनी सूँड़ों में जल भरे कलश लेकर इन्हें स्नान कराते हैं। शक्ति के इस विशिष्ट रूप की साधना से दरिद्रता का नाश होता है और आय के स्रोत बढ़ते हैं। जीवन सुखमय होता है। यह दुर्गा का सर्व सौभाग्य रूप है। जहाँ कमला माँ हैं, वहाँ भगवान् श्री हरी विष्णु हैं। शुक्र इनका अधिष्ठातृ ग्रह है। यह देवी धूमावती की ठीक विपरीत है। जब तक माँ कमला की कृपा नहीं होगी माँ धूमावती जमी रहेंगी। इसलिए दीपावली पर भी इनका पूजन किया जाता है। इस संसार में जितनी भी सुन्दर कन्याएँ, सुन्दर वस्तु, पुष्प आदि हैं, वे सब माँ कमला का ही रूप हैं। हर प्रकार की साधना में रिद्धि- सिद्धि, अखंड धन-धान्य प्राप्ति, ऋण के चुकता करने हेतु माँ कमला की आराधना करें।

कमला दीक्षा :: दरिद्रता, संकट, गृहकलह और अशान्ति को दूर करती हैं माँ  कमला। इनकी सेवा और भक्ति से व्यक्ति सुख और समृद्धि पूर्ण रहकर शान्ति मय जीवन बिताता है।
श्वेत वर्ण के चार हाथी सूंड में सुवर्ण कलश लेकर सुवर्ण के समान कान्ति लिए हुए माँ का अभिषेक कर रहे हैं। कमल पर आसीन कमल पुष्प धारण किए हुए मांँ सुशोभित होती हैं। समृद्धि, धन, नारी, पुत्रादि के लिए इनकी साधना की जाती है।
कमला माता का मंत्र :: कमलगट्टे की माला से रोजाना दस माला "हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:"। मंत्र का जाप कर सकते हैं। 

 
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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)

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