Tuesday, June 11, 2013

AUSPICIOUS INAUSPICIOUS OMENS शुभ अशुभ शकुन

AUSPICIOUS INAUSPICIOUS OMENS शुभाशुभ शकुन विचार 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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Spotting of white cloths, clear water, tree laden with fruits, clear sky,  grain crop in the fields, black grain is considered to be in auspicious. Cotton, Dung mixed with straw, money, embers-fire, home, shaved headed  naked sadhu having  massaged oil, iron, leather, mud, hair, mad person, impotent, too are inauspicious.  
Photoश्र्वेत वस्त्र, स्वच्छ जल, फल से भरा हुआ वृक्ष, निर्मल आकाश, खेत में लगे हुए अन्न और काला धान्य-इनका यात्रा के समय दिखाई देना अशुभ है। रुई, त्रण मिश्रित सूखा गोबर (कंडा ), धन, अंगार, गृह, करायल, मूँड़ मुड़ाकर तेल लगाया हुआ नग्न साधु, लोहा, कीचड़, चमड़ा, बाल, पागल मनुष्य, हिजड़ा, चांडाल, श्र्वपच, बन्धव की रक्षा करने वाला मनुष्य, गर्भिणी स्त्री, राख, खोपड़ी, हड्डी और फूटा हुआ बर्तन-युद्ध यात्रा के समय इनका दिखाई देना अशुभ है। बाजों का वह शब्द जिससे फूटे हुए झांझ की भयंकर ध्वनि सुनाई पड़ती हो, अच्छा नहीं माना गया है। पीछे से: "चले आओ"सुनाई  दे तो अशुभ है। "जाओ" शब्द आगे  से सुनाई दे तो निन्दित है। कहाँ जाते हो ? ठहरो, न जाओ ; वहां जाने से तुम्हें क्या लाभ है ?-ऐसे शब्द अनिष्ट के सूचक हैं। यदि ध्वजा के ऊपर चील आदि माँसाहारी पक्षी बैठ जाये, घोड़े, हाथी, आदि  लड़खड़ा कर गिर पड़ें, हथियार टूट जायें, हार आदि  के द्वारा मस्तक पर चोट लगे तथा छत्र और वस्त्र आदि को, कोई गिरा  दे तो, ये सब अपशकुन मृत्यु  का कारण बनते हैं। भगवान विष्णु की पूजा और स्तुति करने अमंगल का नाश होता है। यदि दूसरी बार इन अपशकुनों का दर्शन हो तो घर लौट आना चाहिये।      
यात्रा के समय श्वेत पुष्पों का दर्शन श्रेष्ठ है। भरे हुए घड़े का दिखाई देना तो बहुत ही श्रेष्ठ है। मांस, मछली, दूर का कोलाहल, अकेला वृध पुरुष, पशुओं में गौ, बकरे, घोड़े तथा हाथी, देव प्रतिमा, प्रज्वलित अग्नि, दूर्वा, ताजा गोबर, वेश्या, सोना, चाँदी, रत्न, बच, सरसों आदि औषधियाँ; मूँग, आयुधों में तलवार, छाता, पीढ़ा, राजचिन्ह, जिसके पास कोई रोता न हो ऐसा शव, फल, दही, दूध, अक्षत, दर्पण, मधु, शंख, ईख, शुभ सूचक वचन, भक्त पुरुषों का गाना-बजाना, मेघ की गंभीर आवाज-गर्जना, बिजली की चमक तथा मन का संतोष-ये सब सुभ सूचक शकुन हैं। सामने से : "चले आओ" सुनाई  दे तो शुभ है।"जाओ" शब्द पीछे से सुनाई दे तो उत्तम है। एक और सब प्रकार के शकुन और दूसरी ओर मन की प्रसन्नता-ये दोनों बराबर हैं।  
मृदं गां दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम्। प्रदक्षिणानि कुर्वीत प्रज्ञातांश्च वनस्पतीन्॥मनु स्मृति 4.39
बाहर जाते हुये मिट्टी का ढेर, गाय, देवमूर्ति, ब्राह्मण, घी, मधु, चौराहा, बड़े-बड़े प्रसिद्द वृक्ष; इन सबको मार्ग में अपने दाहिने करके चले। 


To keep the earth pile-mound, cow, God'd idol, Brahmn, Ghee-clarified butter, honey, cross roads famous big trees on the right is a good omen.
कौरवों के जन्म से पहले हस्तिनापुर में अशुभ शगुन :: धृतराष्ट्र जन्मजात नेत्रहीन थे। उनकी पत्नी गान्धारी ने अपनी इच्छा से आँखों पर पट्टी बाँध ली थी। धृतराष्ट्र चाहते थे कि उनके भाइयों की संतान होने से पहले उनको संतान हो जाए, क्योंकि नई पीढ़ी का सबसे बड़ा पुत्र ही राजा बनता।
गान्धारी गर्भवती हुई। महीने गुजरते गए मगर कुछ नहीं हुआ। उन्हें घबराहट होने लगी। फिर उन्हें पांडु के बड़े पुत्र युधिष्ठिर के जन्म की खबर मिली। धृतराष्ट्र और गान्धारी तो दुख और निराश में डूब गए।
चूंकि युधिष्ठिर का जन्म पहले हुआ था इसलिए स्वाभाविक रूप से राजगद्दी पर उसी का अधिकार था। ग्यारह, बारह महीने बीतने के बाद भी गान्धारी ने बच्चे को जन्म नहीं दिया। हताशा में उसने अपने पेट पर मुक्के मारे, मगर कुछ नहीं हुआ। फिर उसने अपने एक नौकर को एक छड़ी लाकर अपने पेट पर प्रहार करने को कहा। उसके बाद, उसका गर्भपात हो गया और माँस का एक काला सा लोथड़ा बाहर आया। लोग उसे देखते ही डर गए क्योंकि वह इंसानी माँस के टुकड़े जैसा नहीं था। वह कोई बुरी और अशुभ चीज लग रही थी।
अचानक पूरा हस्तिनापुर शहर डरावनी आवाजों से आतंकित हो उठा। सियार बोलने लगे, जंगली जानवर सड़क पर आ गए, दिन में ही चमगादड़ उड़ने लगे। ये शुभ संकेत नहीं थे और इसका मतलब था कि कुछ बुरा होने वाला है। इसे देखकर ऋषि-मुनि हस्तिनापुर से दूर चले गए। चारों ओर यह खबर फैल गई कि वहाँ से सारे ऋषि चले गए हैं। विदुर ने आकर धृतराष्ट्र से कहा कि कोई बड़ी मुसीबत आने वाली थी।  धृतराष्ट्र ने पूछा कि इसलिए उन्होंने लोग चीख-चिल्ला क्यों रहे थे और शोर किसलिए हो रहा था ?
एक बार जब व्यास ऋषि एक लंबी यात्रा से लौटे थे तो गान्धारी ने उनके जख्मी पैरों में मरहम लगाया था और उनकी बहुत सेवा की थी। तब उन्होंने गान्धारी को आशीर्वाद दिया था कि वो जो चाहे वर माँग सकती थी।
गान्धारी ने सौ पुत्र की इच्छा प्रकट की तो व्यास जी ने तथास्तु कह दिया। गर्भपात के बाद गान्धारी ने व्यास जी से पूछा कि उनका वर विफल हो गया था। भगवान् वेद व्यास ने उस माँस के लोथड़े को 100 टुकड़ों में बाँट कारण 100 घड़ों में रखवा दिया। समयानुसार गान्धारी को 100 लड़के और एक लड़की प्राप्त हुई। 


When ever and where ever animals, having two or more heads are spotted, ill/bad luck strike the people of that locality/region.
आकाश से महा भयानक उल्कापात  होना। गिद्ध, बाज, कंक, आदि पक्षियों द्वारा अत्यन्त कठोर शब्द करना।
वामन पुराण: महेश्वर जब अन्धक को दण्ड देने के लिए निकलने लगे तो उनकी बगल से श्रगालिनी स्थित होकर ऊँचे स्वर में बोलती हुई आगे-आगे जा रही थी।  मांसभक्षी प्रणियों का समूह प्रसन्नतापूर्वक रक्त के लिये  जा रहा था।  शूलपाणि का दाँया अंग फड़क उठा।  हारीत पक्षी मौन होकर पीछे की ओर जा रहे थे। ये शुभ लक्षण थे। 
रामायण: भगवान राम ने लोकोपवाद के डर से धोबी के कहने पर माँ सीता का त्याग कर दिया। ऐसा उस श्राप के कारण हुआ किसके द्वारा माता सीता ने अपने बालपन में एक तोती को अपने साथ, उसकी इच्छा के विपरीत महल में रख लिया।  ये धोबी पर्व जन्म में वही तोता था। माता सीता भगवान राम के आदेशानुसार लक्ष्मण जी के साथ वन में जाने लगीं तो  चौखट लाँघने से पहले ही लड़खड़ाकर गिर गईं। उनका दाहिनां नेत्र फड़कने लगा पुण्यमय पक्षी विपरीत दिशा से जाने लगे। मृग बायीं ओर से निकल के जाने लगे। इनके साथ अन्यानेक अपशकुन हुए।  
गीता  प्रथम अध्याय-शकुन 
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥31॥ 
भावार्थ:  हे केशव! मैं लक्षणों (-शकुनों) को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर श्रेय-लाभ-कल्याण भी नहीं देखता।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव: जो भी लक्षण प्रकट हो रहे हैं वे अशुभ की ओर इशारा कर रहे हैं। उल्कापात, असमय ग्रहण लगना, भूकम्प आना, पशु-पक्षियों का भयंकर बोली बोलना-कोलाहल, चन्द्रमा के दाग मिट जाना, रक्त की वर्षा होना, पशु-पक्षियों द्वारा अपने से भिन्न जाति के बच्चे पैदा करना आदि अनर्थ-तबाही की ओर इशारा करते हैं। मेरा मुँह सूखना, गाण्डीव का गिरना, शरीर का शिथिल होना, उत्साह  होना, संकल्प-विकल्पों का ठीक न होना, कम्पन होना आदि अच्छे लक्ष्ण नहीं हैं। सामान्यतया देखा जाता हैं कि पुच्छल तारे का दिखना, कुत्ते-सियार का रोना, पक्षियों का कोलाहल, साँप का सर्दी में बिल से निकलना आदि जब भी कभी होता है भयानक बरबादी-तबाही-महामारी लेकर आता है।
O! Keshav I am observing bad omens and do not find any gain-welfare-enhancement of reputation-honor by killing own relatives-friends in the war. (This war appears to be  counter productive.)
NIMITTANI CH PASHYAMI VIPRITANI KESHAVH: The omens which are appearing indicate misfortune-devastation. Meteorite-cosmic showers, untimely eclipse, earth quake, fearful-dangerous-terrible sounds by the birds-animals, loss of black spots of the moon, rain of blood, excreta and suppurate-pus, giving birth to different species by the animals and birds, indulgence of humans in sex during the day-openly points to destruction-devastation. Drying of my mouth-lips, excessive sweat, falling of Gandeev (-bow) from my hands, sudden loss of strength-weakening of body, trembling of body, maladjustment of various permutations and combinations goals-targets-indecisiveness, are not good omens. Its a common observation-feature that the citing of comets, weeping-growling of jackals and dogs in the residential areas, disturbing sounds by animals, coming out of snakes from the burrows during winters, are associated with massive-furious  destruction-calamity.

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