इन्द्रापर्वता बृहता रथेन वामीरिष आ वहतं सुवीराः।
वीतं हव्यान्यध्वरेषु देवा वर्षेथां गीर्भिरिळया मदन्ता॥
हे द्योतमान इन्द्र देव और पर्वत! महान् रथ पर मनोहर और सुन्दर पुत्र से युक्त अन्न लावें। हमारे यज्ञ में आप दोनों हव्य का भक्षण करें। हव्य द्वारा हर्षित होकर हमारे स्तुति लक्षण वचनों से वर्द्धित होवें।[ऋग्वेद 3.53.1]
हे इन्द्र देव, पर्वत! अपने महान रथ पर श्रेष्ठ संतान परिपूर्ण अन्न लाओ। तुम ज्योर्तिमान हो। हमारे यज्ञ में पधारकर हवि का सेवन करो। हवियों द्वारा पुष्ट होते हुए
हमारी श्रेष्ठ प्रार्थनाओं से वृद्धि को ग्रहण करो।
Hey Indr Dev & Parwat! Bring beautiful sons and food grains over your lovely charoite. On being happy by eating the offerings in our Yagy, become happy by listening to the prayers-hymns.
तिष्ठा सु कं मघवन्मा परा गाः सोमस्य नु त्वा सुषुतस्य यक्षि।
पितुर्न पुत्रः सिचमा रभे त इन्द्र स्वादिष्ठया गिरा शचीवः॥
हे मघवन्! इस यज्ञ में कुछ काल तक आप सुख पूर्वक निवास करें। हमारे यज्ञ से चले मत जावें, क्योंकि सुन्दर अभिषुत सोम द्वारा हम शीघ्र ही आपका यजन करते हैं। हे शक्ति सम्पन्न इन्द्र देव! मधुर वचनों द्वारा पुत्र जिस प्रकार से पिता आश्रय ग्रहण करता है, उसी प्रकार ही हम सुमधुर स्तुतियों द्वारा आपका आश्रय ग्रहण करते हैं।[ऋग्वेद 3.53.2]
हे इन्द्र देव! कुछ समय तक इस यज्ञ में आनन्द पूर्वक रहो। हमारे यज्ञ में उपस्थित रहो। हम रमणीक निष्पन्न सोम रस द्वारा तुम्हारा यज्ञ करते हैं। तुम अत्यन्त बली हो, जनक के वस्त्रों को मीठे वचन बोलते हुए शिशु पकड़ते हो।
Hey Indr Dev! Stay in our Yagy comfortably for some time. We perform-conduct Yagy with nicely extracted Somras. Hey mighty Indr Dev! We seek asylum under you like a son seeks shelter under his son. We desire protection under you by singing pleasing sacred hymns for you.
शंसावाध्वर्यो प्रति मे गृणीहीन्द्राय वाहः कृणवाव जुष्टम्।
एदं बर्हिर्यजमानस्य सीदाथा च भूदुक्थमिन्द्राय शस्तम्॥
हे अध्वर्युओं! हम दोनों प्रार्थना करेंगे। आप हमें उत्तर दें। हम दोनों इन्द्र देव के उद्देश्य से प्रीति युक्त प्रार्थना करते हैं। आप याजकगण के कुश के ऊपर उपवेशन करें। इन्द्र देव के लिए हम दोनों के द्वारा किया गया उकथ प्रशस्त है।[ऋग्वेद 3.53.3]
हे अध्वर्युओं! हम दोनों उन इन्द्रदेव की प्रार्थना करेंगे। तुम हमको सदुपदेश करो। हम इन्द्रदेव के प्रति श्रद्धा परिपूर्ण रहते हुए उनका पूजन करें। तुम यजमान के कुशारूप आसन पर विराजमान होओ। हमारे द्वारा प्रदत्त उक्त प्रार्थना इन्द्र देव के लिए आकृष्ट करने वाली हो।
Hey priests performing the Yagy! We will pray to Indr Dev. You guide us. Both of us pray-worship Indr Dev with love. Sit over the Kush mat. Prayers made by us will attract Indr Dev.
जायेदस्तं मघवन्त्सेदु योनिस्तदित्त्वा युक्ता हरयो वहन्तु।
यदा कदा च सुनवाम सोममग्निष्ट्वा दूतो धन्वात्यच्छ॥
हे मघवन्! स्त्री ही घर होती है और स्त्री ही पुरुषों का मिश्रण स्थान है। रथ में युक्त होकर अश्व आपको उस घर में ले जावे। हम जब कभी आपके लिए सोमरस को अभिषुत करेंगे, तब हमारे द्वारा प्रहित, दृतस्वरूप अग्नि देव आपके निकट गमन करें।[ऋग्वेद 3.53.4]
अभिषुत :: जो यज्ञ के लिए स्नान कर चुका हो, निचोड़ा हुआ, (अभिषेचन, अभिषेचनीय, अभिषेच्य, अभिसंग, अभिसंताप); यह अतीव मधुर सोम तुम्हारे लिये अभिषुत हुआ है; anointed, bathed for the Yagy, squeezed.
हे इन्द्र देव! नारी ही पुरुषों का वास स्थान है। रथयुक्त अश्व तुमको इस भवन में भेजें। हम जब कभी तुम्हारे सोम को संस्कारवान करें, तब हमारे द्वारा अभिषिक्त अग्नि दूत रूप से तुम्हें प्राप्त हो।
Hey Indr Dev! The wife constitute home, living with husband. Let the charoite deploying horses bring to that house. When ever we anoint, extract tasty, sweet Somras and chant Mantr, let Agni Dev approach-come to you.
परा याहि मघवन्नाच याहीन्द्र भ्रातरुभयत्रा ते अर्थम्।
यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो रासभस्य॥
हे मघवन्! आप हमारे इस यज्ञ में आगमन करें। हे पोषक! दोनों स्थानों में आपका प्रयोजन है; क्योंकि वहाँ घर में स्त्री है और यहाँ सोमरस है। गृह गमन के लिए आप महान् रथ के ऊपर अधिष्ठान करें।[ऋग्वेद 3.53.5]
हे इन्द्र देव! तुम दूरस्थ देश में विचरण करते हुए हमारे यहाँ पधारो। तुम सभी का पालन करने वाले हो, तुम्हारा प्रयोजन दोनों स्थानों पर है। जिस घर में नारी है, वहाँ सोम है। तुम रथ पर आरोहण कर ग्रह को ग्रहण करके अश्वों को खोल दो।
Hey Indr Dev! Visit our Yagy. Hey nurturer! You are desirous of both Home and Somras. For visiting your home ride the charoite (after drinking Somras).
अपाः सोममस्तमिन्द्र प्र याहि कल्याणीर्जाया सुरणं गृहे ते।
यत्रा रथस्य बृहतो निधानं विमोचनं वाजिनो दक्षिणावत्॥
हे इन्द्र देव! यहीं रुककर सोमरस का पान कर घर जावें। आपके रमणीय घर में मङ्गलकारिणी स्त्री और सुन्दर ध्वनि है। गृह गमन के लिए आप महान् रथ के ऊपर अवस्थान करें अथवा अश्व को रथ से विमुक्त करो इस यज्ञ में रुकें।[ऋग्वेद 3.53.6]
रमणीक :: मनोहर, आभासी, जाली, आनंदमय, हर्षजनक, आनंदपूर्ण, आनंदित, आनंद देने वाला, सुहावना, ललित, आनंदकर; delightful, delectable, enjoyable, colourful.
सुखद, रमणीय, सुहावना, ख़ुशगवारहे इन्द्र देव! तुम यहाँ आकर सोम पान करो। सोम पान करके ही गृह को गमन करना। तुम्हारे घर में सौभाग्यवती रमणीय नारी है। तुम गृह जाने के लिए रथ पर चढ़ो और यहाँ अश्वों को खोल दो।
Hey Indr Dev! Go to your house after drinking Somras. Your delightful, beautiful & attractive house has righteous-virtuous wife and auspicious pleasing-sounds. Either go to your house over the great charoite or release the horses and stay here.
इमे भोजा अङ्गिरसो विरूपा दिवस्पुत्रासो असुरस्य वीराः।
विश्वामित्राय ददतो मघानि सलत्रसावे प्र तिरन्त आयुः॥
हे इन्द्र देव! यज्ञ करने वाले ये भोज सुदास राजा के याजक हैं, नाना रूप हैं अर्थात् अङ्गिरा मेधातिथि आदि है। देवों से भी बलवान् रुद्र के पुत्र बलवान् मरुत मुझ विश्वामित्र के लिए अश्वमेध में महनीय धन देते हुए अन्न को भली-भाँति वर्द्धित करें।[ऋग्वेद 3.53.7]
हे इन्द्र देव! यह भोज और सुदास राजा की ओर से यत्न करते हैं। यह अंगिरा, मेधातिथि आदि अनेक रूप वाले हैं, देवगणों, बली रुद्र उत्पन्न मरुद्गण अश्वमेध यज्ञ में मुझ वैश्वामित्र को उत्तम धन प्रदान करो और अन्न की वृद्धि करो।
Hey Indr Dev! The performers of Yagy, Bhoj & Sudas are making offerings-sacrifices, with Angira & Medhatithi as the priests. Let Marut the son of mighty Rudr, mightier than the demigods-deities, provide me i.e., Vishwa Mitr with a lot of money and food grains.
रूपरूपं मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानस्तन्वं १परि स्वाम्।
त्रिर्यद्दिवः परि मुहूर्तमागात्स्वैर्मन्त्रैरनृतुपा ऋतावा॥
इन्द्र देव जिस रूप की कामना करते हैं, उस रूप के हो जाते हैं। मायावी इन्द्रदेव अपने शरीर को नानाविध बनाते हैं। वे ऋतवान् होकर भी अऋतु में सोमपान करते हैं। वे स्वकीय स्तुति द्वारा आहूत होकर, स्वर्ग लोक से मुहूर्त बीच में तीनों सवनों में गमन करते हैं।[ऋग्वेद 3.53.8]
इन्द्र जैसी कामना करते हैं वैसा ही रूप बना लेते हैं। वे अपने शरीर को माया द्वारा विविध रूप को बनाने में समर्थ हैं। वे ऋतुओं को प्रेरित करने वाले होकर भी सोमपान करने में किसी ऋतु विशेष का ध्यान नहीं रखते। वे अपनी ही प्रार्थनाओं द्वारा पुकारे जाकर तीनों सवनों में पहुँचते हैं।
Indr Dev assumes desired body shape & size. Illusive Indr Dev mould his body in various ways. Though devoted to the seasonal changes yet he drink Somras in adverse situations as well. He mobilize in the three parts of the day as and when addressed by the devotees with prayers-worship.
Somras can be used in all seasons, all parts of the year. Dev Raj responds to the prayers, requests of the worshipers throughout the solar day.
महाँ ऋषिर्देवजा देवजूतोऽस्तभ्नात्सिन्धुमर्णवं नृचक्षाः।
विश्वामित्रो यदवहत्सुदासमप्रियायत कुशिकेभिरिन्द्रः॥
अत्यधिक सामर्थ्यवान्, अतीन्द्रियार्थ द्रष्टा द्योतमान तेजों के जनयिता, तेजों द्वारा आकृष्ट और अध्वर्यु आदि के उपदेष्टा विश्वामित्र ने जलवान सागर को निरुद्ध वेग किया। पिजवन के पुत्र सुदास राजा ने जब विश्वामित्र से यज्ञ कराया, तब इन्द्र देव ने कुशिक गोत्रोत्पन्न ऋषियों के साथ उत्तम व्यवहार किया।[ऋग्वेद 3.53.9]
अत्यन्त समर्थ, तेजस्वी तेजों को उत्पन्न करने वाले अध्वर्यु आदि को उपदेश देने वाले वैश्वामित्र ने जल से पूर्ण सागर को गति को बाँध दिया। जब उन वैश्वामित्र ने पिजवन पुत्र सुदास को यज्ञकर्म में लगाया, तब इन्द्रदेव ने कौशिकों के प्रति अपना श्रेष्ठ व्यवहार व्यक्त किया।
Highly capable, possessing intuition, producer of shine, Vishwa Mitr, preached the Ritviz who were attracted towards him due to his aura and regulated the flow of ocean currents. When king Sudas son of Pijvan managed to conduct-perform the Yagy by Vishwa Mitr, Indr Dev acted decently with the Kaushiks.
हंसाइव कृणुथ श्लोकमद्रिभिर्मदन्तो गीर्भिरध्वरे सुते सचा।
देवेभिर्विप्रा ऋषयो नृचक्षसो वि पिबध्वं कुशिकाः सोम्यं मधु॥
हे मेधावियों, हे अतीन्द्रियार्थ द्रष्टाओं, हे नेतृगण के उपदेशको, हे कुशिक गोत्रोत्पन्नों, हे पुत्रों! यज्ञ में पत्थरों द्वारा सोमरस के अभिषुत होने पर आप लोग स्तुतियों द्वारा देवताओं को प्रसन्न करते हुए श्लोक (मन्त्र) का भली-भाँति उच्चारण करें, जिस प्रकार से हँस शब्दों का भली-भाँति उच्चारण करते हैं। उसी प्रकार देवगण के साथ आप लोग मधुर सोम रस का पान करें।[ऋग्वेद 3.53.10]
हे विद्वानो! परमहंसी! हे ऋषियों! हम सभी को देखने वालों! तुम यज्ञ अनुष्ठान में पाषणों से सोम के संस्कारित होने पर प्रार्थनाओं से देवताओं को हर्षित करो। हंसों के तुल्य ऋग्वेद स्तोत्रों का उच्चारण करो। देवों के साथ मधुर सोम रस का पान करो।
Hey intellectuals, Kaushik clan descendants, possessor of intuition-power to peep into the future, preachers-guides of the Rishi-Muni conducting Yagy-Hawan! Recite-pronounce the sacred hymns-Mantr, Strotr properly to please-amuse the demigods-deities and enjoy Somras with them.
उप्र प्रेत कृशिकाश्चेतयध्वमश्वं राये प्र मुञ्चता सुदासः।
राजा वृत्रं जङ्घनत्प्रागपागुदगथा यजाते वर आ पृथिव्याः॥
हे कुशिक गोत्रोत्पन्नो, हे पुत्रो! आप लोग अश्व के समीप जाकर अश्व को उत्तेजित करें। धन के लिए सुदास के अश्व को छोड़ दें। राजा इन्द्र देव ने विघ्न कारक वृत्र का पूर्व, पश्चिम और उत्तर देश में वध किया। इसलिए सुदास राजा पृथ्वी के उत्तम स्थान में यज्ञ कार्य सम्पादित करें।[ऋग्वेद 3.53.11]
उत्तेजित :: उकसाना, भड़काना; excite, agitate, elated.
हे कौशिको! तुम अश्व के समीप जाकर इसे उत्तेजित करो। सुदास राजा के अश्व को धन के लिए छोड़ो। इन्द्रदेव ने बाधा उत्पन्न करने वाले पुत्र का पूर्व, पश्चिम तथा उत्तर में संहार किया। राजा सुदास ने महान भू-भाग में पावन कर्म संस्कार किया।
Hey descendants of Kaushik! Go to the horse and excite-agitate it. Let the horse of Sudas roam for money. Indr Dev killed Vrata Sur in east, West & North directions, so Sudas has conducted the Yagy at the most auspicious part-land of the earth.
The horse used to be released for conducting Ashw Medh Yagy, i.e., bringing the other kings to his fold and collect taxes from them.
य इमे रोदसी उभे अहमिन्द्रमतुष्टवम्। विश्वामित्रस्य ब्रह्मेदं भारतं जनम्॥
हे कुशिक पुत्रो! हमने द्यावा-पृथ्वी द्वारा इन्द्र देव की प्रार्थना की। स्तोता विश्वामित्र का यह इन्द्र विषयक स्तोत्र भरत कुल के मनुष्यों की रक्षा करे।[ऋग्वेद 3.53.12]
हे कौशिको। हमने क्षितिज धरा के सहयोग से इन्द्र देव की अर्चना की है, प्रार्थना करने वाले विश्वामित्र का इन्द्रदेव के प्रति कहा गया श्लोक भरत वंशियों की सुरक्षा करें।
Hey descendants of Kaushik! We worshiped Dev Raj Indr along with the heaven and the earth. Let this Strotr composed by Vishwa Mitr protect the Bharat clan-descendants.
विश्वामित्रा अरासत ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे। करदिन्नः सुराधसः॥
विश्वामित्र के वंशवालों ने वज्रधर इन्द्र के लिए स्तुति की। इन्द्र देव हम लोगों को उत्तम धन से युक्त करें।[ऋग्वेद 3.53.13]
विश्वामित्र के वंशजों ने वज्रधारी इन्द्रदेव का पूजन किया है। वे इन्द्रदेव हमको महान धन से सुशोभित करें।
Descendants of Vishwa Mitr prayed-worshiped Indr Dev. Let Indr Dev reward us with valuables-riches.
किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावो नाशिरं दुह्रे न तपन्ति धर्मम्।
आ नो भर प्रमगन्दस्य वेदो नैचाशाखं मघवन्रन्यया नः॥
हे इन्द्र देव! अनार्यों के निवास योग्य देशों में कीकट समूह के बीच में गौएँ आपके लिए क्या करेंगी? ये सोमरस के साथ मिश्रित होने के योग्य दुग्ध दान नहीं करती। दुग्ध प्रदान द्वारा वे पात्र को भी दीप्त नहीं करतीं। हे धनवान् इन्द्र देव! उन गौओं को आप हमारे निकट लावें और प्रमगन्द के धन का भी आनयन करें। हे मघवन्, नीच वंश वालों को आप नियमित करें।[ऋग्वेद 3.53.14]
कीकट :: मगध देश का प्राचीन वैदिक नाम, तंत्र के अनुसार चरणाद्रि-चुनार से लेकर गुद्धकुट-गिद्धौर तक कीकट देश है, मगध उसी के अंतर्गत है। घोड़ा, प्राचीन काल की एक अनार्य जाति आदि जो कोकट देश में बसती थी, निर्धन, गरीब, कृपण, कजुंस। Generally, barbarians, those people who did not follow any rule regulations, virtues inhabited the deserts lands in Arab countries.
हे इन्द्र देव! कीकट लोग जो कि अनार्य हैं, वे गायों का क्या उपयोग करते हैं? वे न तो दूध पीते हैं, न घृत निकालते हैं। हे इन्द्र देव! उन गायों को हमारे समीप ले आओ, अधिक धन प्राप्त करने की कामना से धन उधार देने वालों के धनों को भी प्राप्त करवा दो।
Hey Indr Dev! The cows will serve no purposes in the lands inhabited by the Keekat, being Anary-barbarians, ignorant, meat eaters. The cows there do not yield milk, good enough to be added to Somras. The milk pot do not shine with their milk. Hey Indr Dev! Bring these cows to us. Give us the valuable of those who land money for the sake of interest. Regulate-control the people low origin.
ससर्परीरमतिं बाधमाना बृहन्मिमाय जमदग्निदत्ता।
आ सूर्यस्य दुहिता ततान देवेष्वमृतमजुर्यम्॥
अग्नि देव को प्रज्वलित करने वाले ऋषियों द्वारा सूर्य से लाकर हम लोगों को दी गई, अज्ञान को बाधित करने वाली, रूप, शब्द तथा सभी जगह सर्पणशीला वाक (वचन) आकाश में प्रभूत शब्द करती हैं। सूर्य की पुत्री वाग्देवता इन्द्र देव आदि देवताओं के पास पत्थर रहित अमृत है।[ऋग्वेद 3.53.15]
अग्नि को चैतन्य करने वाले ऋषियों द्वारा सूर्य से ग्रहण कर, हमको दी गयी अज्ञान को हटाने वाली रूप और ध्वनि से परिपूर्ण लपकती हुई वाणी ध्वनि द्वारा ज्ञान को प्रकट करती है। सूर्य की दुहिता वाणी अमृत रूप अन्न को विस्तृत करती है।
The language, voice-speech provided to us, which eliminated ignorance, brought from the Sun by the Rishis-sages who ignite Agni-fire, elaborating structure, alphabets. (Thus we are able to converse-talk.) The daughter of Sun-Sury Narayan and Indr Dev who gave us language, has the elixir-nectar without stones.
ससर्परीरभरत्तूयमेभ्योऽधि श्रवः पाञ्चजन्यासु कृष्टिषु।
सा पक्ष्या ३ नव्यमायुर्दधाना यां मे पलस्तिजमदग्नयो ददुः॥
गद्य-पद्य रूप से सभी जगह सर्पणशीला वाग्देवता चारों वर्ण तथा निषाद में जो अन्न विद्यमान है, उससे अधिक अन्न हमें शीघ्र दें। दीर्घ आयु वाले जमदग्नि आदि मुनियों ने जिस वचन को सूर्य से लाकर हमें दिया, पक्षों के निर्वाहक सूर्य की पुत्री वह वाग्देवता, हमारे लिए नूतन अन्न दान प्रदान करें।[ऋग्वेद 3.53.16]
लपकती हुई गद्य रूपिणी वाणी सभी ओर से ज्ञान रूप अन्न को हमें दें। दीर्घजीवी ऋषियों ने जिस वाणी को सूर्य से प्राप्त कर हमकों दिया है, वह सूर्य की दुहिता वाणी हमको नव जीवन प्रदान करें।
Let the deity of speech grant us enlightenment in the form of food stuff. Let the words-voice, speech of the daughter of Sun Vagdevta, grant us new lease of life brought to us by the Rishis like Jamdagni.
स्थिरौ गावौ भवतां वीळुरक्षो मेषा वि वर्हि मा युगं वि शारि।
इन्द्रः पातल्ये ददतां शरीतोररिष्टनेमे अभि नः सचस्व॥
सुदास के यज्ञ में अवभृथ करने के उपरान्त यज्ञशाला से जाने की इच्छा करते हुए विश्वामित्र रथाङ्ग की प्रार्थना करते हैं। गोद्वय स्थिर होवें अक्ष दृढ़ होवें। दण्ड जिससे विनष्ट न हो, युग जिससे विनष्ट न हो, युग जिससे विशीर्ण न हो। पतनशील कीलकद्वा के विशीर्ण होने के पहले ही इन्द्रदेव धारित करें। हे अहिंसित नेमिविशिष्ट स्थ! आप हम लोगों के अभिमुख आगमन करें।[ऋग्वेद 3.53.17]
दोनों वृषभ स्थिर हों। धुर अटल हों, जिससे दंड नष्ट न हो, जुआ न सूख जाए, दोनों कीलें न उखड़ें। वे इन्द्र देव रथ को गिरने से बचाएँ। हे अरिष्ट नेमि रथ! तू हमको पथ में पहले जाता हुआ हमेशा प्राप्त हो।
Let both the horses be steady, the axle be strong, the pole should not be defective, the yoke should not be rotten. May Devraj Indr preserve the two yoke-pins from decay & the charoite with uninjured felloes (the outer rim of the wheel), to which the spokes are fixed, be ready for us.
FELLOES :: रथ के पहिये की बहरी सतह; the outer rim of the wheel.
बलं धेहि तनूषु नो बलमिन्द्रानळुत्सु नः।
बलं तोकाय तनयाय जीवसे त्वं लि बलदा असि॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों के शरीर में बल प्रदान करें, हमारे बैलों को बल प्रदान करें और हमारे पुत्र-पौत्रों को चिरजीवी होने के लिए बल प्रदान करें, क्योंकि आप स्वयं बलप्रद हैं।[ऋग्वेद 3.53.18]
हे इन्द्र देव! तुम अत्यन्त शक्तिशाली हो। हमारे शरीर को जल से परिपूर्ण करो। हमारे ऋषभों को शक्तिशाली बनाओ, पुत्र-पौत्रादि को दीर्घ जीवी होने के लिए बल प्रदान करो।
Hey Indr Dev! You are mighty-powerful. Grant strength-power along with our oxen-bulls. Grant longevity (life span ranging from 400 years-100 years in Sat Yug to Kali Yug respectively) our sons and grandsons.
None is immortal-for ever. Maximum life one can enjoy is 8 Prardh, the life span of Bhagwan Shiv.
अभि व्ययस्व खदिरस्य सारमोजो धेहि स्पन्दने शिंशपायाम्।
अक्ष वीळो वीळित वीळयस्व मा यामादस्मादव जीहिपो नः॥
हे इन्द्र देव! रथ के खदिर-काष्ठ के सार को दृढ़ करें, रथ के शीशम के काष्ठ को दृढ़ करें। हम लोगों के द्वारा दृढ़ीकृत अक्ष, आप दृढ़ करें। हमारे गमनशील इस रथ से हमें फेंक मत देना।[ऋग्वेद 3.53.19]
हे इन्द्र देव! रथ के खदिर के काष्ठ के सार को दृढ़ बनाओ। शीशम के काष्ठ को भी दृढ़ करो। हे अक्ष! तुम हमारे द्वारा मजबूती से निर्मित किये गये हो। अतः स्थिर बनी। कहीं हमारे विचरणशील रथ से हमको पृथक न कर देना।
Hey Indr Dev! Enforce the wood Khadir & Sheesham used in the charoite. Give strength to the excel of our charoite. Do not through us away from our moving charoite.
अयमस्मान्वनस्पतिर्मा च हा मा च रीरिषत्।
स्वस्त्या गृहेभ्य आवसा आ विमोचनात्॥
वनस्पतियों द्वारा निर्मित यह रथ हम लोगों को त्यक्त न करे, न विनष्ट करे। जब तक हम लोग घर न प्राप्त करें, जब तक रथ चलता रहे और जब तक कि अश्व विमुक्त न हो जायें, तब तक हम लोगों का मङ्गल हो।[ऋग्वेद 3.53.20]
यह रथ वृक्षों की लकड़ियों द्वारा बनाया गया है। यह हमको छोड़ न दे। जब तक हमको गृह प्राप्त न हो, तब तक यह रथ चलता रहे और जब तक अश्वों का खोल न दिया जाये तब तक हमारा कल्याण हो।
This charoite made of wood, should neither reject nor destroy us. This charoite should continue moving till we reach our home-destination. The horses should not be released till our welfare is incomplete.
इन्द्रोतिभिर्बहुलाभिर्नो अद्य याच्छ्रेष्ठाभिर्मघञ्छूर जिन्व।
यो नो द्वेष्ट्यधरः सस्पदीष्ट यमु द्विष्मस्तमु प्राणो जहातु॥
हे शूर धनवान् इन्द्र देव! हम लोग शत्रुओं के हिंसक है। हम लोगों को आप प्रभूत और श्रेष्ठ आश्रम दान द्वारा प्रसन्न करें। जो हम लोगों से द्वेष करता है, वह निकृष्ट व पतित है। हम लोग जिससे द्वेष करते हैं, उसके प्राणों का हरण करें।[ऋग्वेद 3.53.21]
प्रभूत :: प्रचुर, विपुल, प्रभूत, ज़्यादा, विस्तृत, विस्तीर्ण; spacious, dominant, ample, abundant.
हे पराक्रमी! हे शत्रु संहारक इन्द्रदेव! तुम शत्रुओं का पतन करने के कर्म में पराक्रमी श्रेष्ठ सेनाओं से हमको परिपूर्ण करके विजय ग्रहण कराओ और हर्षित करो। हमसे शत्रुता करने वाला भली-भाँति नीचा देखे। जिससे हम द्वेष करें, उसके प्राण उसका त्याग करें।
Hey brave-mighty wealthy Indr Dev! We are the destroyers of the enemy. Grant us excellent spacious homes-Ashram, shelter. One who is envious to us is worst and degraded-depraved. Kill-destroy the people who are envious to us.
परशुं चिद्वि तपति शिम्बलं चिह्नि वृश्चति।
उखा चिदिन्द्र येपन्ती प्रयस्ता फेनमस्यति॥
हे इन्द्र देव! जिस प्रकार से कुठार को पाकर वृक्ष प्रतप्त होता है, उसी प्रकार हमारे शत्रु प्रतप्त हो। शाल्मली पुष्प जिस प्रकार से अनायास ही वृन्तच्युत हो जाता है, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं के अवयव विच्छिन्न हो। प्रहत जलस्रावी स्थाली पाककाल में जिस प्रकार से फेनोद्गीर्ण करती है, उसी प्रकार मेरी मन्त्र सामर्थ्य से प्रहत होकर शत्रु मुख द्वारा फेनोद्गीर्ण करें।
[ऋग्वेद 3.53.22]हे इन्द्रदेव! जैसे तपती हुई पतीली उबलते हुए फेन निकालती है, वैसे ही हमारे शत्रुओं के मुख मार्गों को निकालें, जैसे सेमर का फूल अनायास ही छिन्न-भिन्न हो जाता है, वैसे ही हमारे शत्रुओं के तन कट कर गिर जायें। जैसे आग पर कुठार को तपाता है, वैसे ही शत्रु सेना संतप्त हो। Hey Indr dev! The way-manner in which the tree is troubles by the axe, our enemy too be troubled-tortured. The way the flowers of Shalmali tree detach the body organs our our enemy fall out of their body. The manner in which a cooking pot pour froth may Mantr Shakti should make the enemy release blood from his mouth.
न सायकस्यचिकिते जनासो लोघं नयन्ति पशु मन्यमानाः।
नावाजिनं वाजिना हासयन्ति न गर्दभं पुरो अश्वान्नयन्ति॥
वसिष्ठ के भृत्यों से विश्वामित्र बोले, हे पुरुषों! अवसान करने वाले विश्वामित्र की मन्त्र-सामर्थ्य को आप लोग नहीं जानते हैं। तपस्या का क्षय न हो जाय, इसी लोभ से चुपचाप बैठे हुए को पशु मानकर ले जा रहे हैं। वसिष्ठ मेरे साथ स्पर्द्धा करने के योग्य नहीं हैं, क्योंकि प्राज्ञ व्यक्ति मूर्ख व्यक्ति को उपहासास्पद नहीं करते हैं, घोड़े के सामने गदहा नहीं लाया जाता है।[ऋग्वेद 3.53.23]
हे मनुष्य! अस्त्रादि के तुल्य अपने प्राणों का अंत करने वाले के अज्ञान को तुम नहीं जानते। वे लालच के वशीभूत हुए अपने को पशु के तुल्य आगे ले जाते हैं। ज्ञानी पुरुष अज्ञानी मनुष्य से सामना करके हंसी नहीं उड़वाते। क्योंकि घोड़े की तुलना गधा नहीं करता।
Vishwamitr told the associates of Vashishth, Hey Humans! You are not aware of the Mantr Shakti (power of the sacred hymns)-powers of Vishwamitr. You are carrying a person sitting quietly-performing ascetics, considering him an ass, due to your greed. Vashishth can not compete with me. Enlightened people do not make fun of the ignorant, while talking to him.
Vishwamitr is no match to Vashishth.
Please refer to :: ब्रह्म ऋषि वशिष्ठ (ब्रह्मा 1) VASHISHTH santoshhindukosh.blogspot.com
राज ऋषि विश्वामित्र ASCETIC VISHAWAMITR santoshhindukosh.blogspot.com
इम इन्द्र भरतस्य पुत्रा अपपित्वं चिकितुर्न प्रपित्वम्।
हिन्वन्त्यश्वमरणं न नित्यं ज्यावाजं परि णयन्त्याजौ॥
हे इन्द्र देव! भरत वंशीय अपगमन जानते हैं, गमन नहीं जानते हैं अर्थात् शिष्टों के साथ उनकी संगति नहीं है। संग्राम में सहज शत्रु के सदृश उन लोगों के प्रति वे अश्व प्रेरण करते हैं और धनुर्धारण करते है।[ऋग्वेद 3.53.24]
शिष्ट :: सभ्य, धीर और शांत; learned, polite.
हे इन्द्र देव! यह भरतवंशी प्रार्थक्य जानते हैं और मेल भी जानते हैं। ये संग्राम काल में प्रेरित अश्व के तुल्य धनुष की प्रत्यंचा का घोष करते हैं।
Hey Indr Dev! These sons of Bharat, understand severance-detach from Vashishth, not association with them; they urge their steeds against them as against a constant foe; they bear a stout bow for their destruction in battle.
SEVERANCE :: पृथक्करण, विच्छेद, विभाजन; dissolution, decomposable, caesura, Disruption, disunion.
Hey Indr Dev! The descendants of Bharat do not detach themselves from the learned-enlightened. They shot arrows over the enemies in the war.
इमा उ वां भृमयो मन्यमाना युवावते न तुज्या अभूवन्।
क्व १ त्यदिन्द्रावरुणा यशो वां येन स्मा सिनं भरथः सखिभ्यः॥
हे इन्द्रा-वरुण! शत्रुओं को वश में करने वाले आपके गतिशील शस्त्र सज्जनों की रक्षा करने वाले हैं, वे किसी के द्वारा नष्ट न हों। आप जिससे अपने मित्र बन्धुओं को अन्नादि प्रदत्त करते हैं, वह यश कहाँ स्थित है?[ऋग्वेद 3.62.1]
हे इन्द्रा-वरुण! सभी को ढकने वाले अंधकार के समान सभी को वशीभूत करने वाले तुम दोनों की विचरणशील क्रियाएँ जानी जाती हैं। वे क्रियाएँ तुम्हारे तपस्वियों के लाभ के लिए हैं तथा किसी तरह भी पतन के योग्य नहीं हैं।
हे इन्द्रा-वरुण! तुम्हारी यह कीर्ति और तेज कहाँ है? जिसके द्वारा तुम सखाओं के लिए अन्न और शक्ति की वृद्धि करते हो।
Hey Indr-Varun! Let your dynamic Shastr-weapons, which protect the gentle men & keep the enemies under control, never be destroyed by any one. Where is your might-power with which you grant food grains to the friends, relatives?!
अयमु वां पुरुतमो रयीयञ्छश्वत्तममवसे जोहवीति।
सजोषाविन्द्रावरुणा मरुद्भिर्दिवा पृथिव्या शृणुतं हवं मे॥
हे इन्द्रा-वरुण! धन की इच्छा करने वाले ये महान् याजक गण अन्न के लिए आप दोनों का सदैव आह्वान करते हैं। मरुद्गण, द्युलोक और पृथ्वी के साथ मिलकर आप दोनों मेरी प्रार्थना का श्रवण करें।[ऋग्वेद 3.62.2]
हे इन्द्रा-वरुण! धन की अभिलाषा करने वाले यह साधक तुम दोनों को अन्न की प्राप्ति के लिए आमंत्रित करते हैं। हे मरुतों! आकाश और धरती से संगत तुम मेरे श्लोकों को श्रवण करो।
Hey Indr Varun! The great Ritviz always invoke you for wealth & food grains. Marud Gan, heavens, earth and both of you listen-respond to my prayers-requests.
अस्मे तदिन्द्रावरुणा वसु ष्यादस्मे रयिर्मरुतः सर्ववीरः।
अस्मान्वरूत्रीः शरणैरवन्त्वस्मान्होत्रा भारती दक्षिणाभिः॥
हे इन्द्रा-वरुण! हम लोगों को उसी अभिलषित धन की प्राप्ति हो। हे मरुद्गण! सर्वकर्म-समर्थ पुत्र और पशुसंघ हम लोगों पास हो। सभी के द्वारा भजनीय देव पत्नियाँ द्वारा हम लोगों की रक्षा करें। होत्रा भारती उदार वचनों द्वारा हम लोगों का पालन करें।[ऋग्वेद 3.62.3]
हे इन्द्रा-वरुण! हमको शक्ति, अलौकिक ऐश्वर्य प्राप्त हो। तुम्हारी रक्षित सेनाएँ अपने शत्रु नाशक साधनों तथा शत्रुओं द्वारा हमारी रक्षा करें। सबका पालन करने वाली, प्रदान करने योग्य और उदार वचनों द्वारा हमारा पोषण करें।
Hey Indr Varun! Grant us divine wealth, comforts, luxuries and power. Hey Marud Gan! We should be blessed with sons capable of performing all sorts of endeavours-Karm and cattle. Let the revered-honoured by all, wives of the demigods-deities protect-nourish us with sweet-encouraging words.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (16) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
आ सत्यो यातु मघवाँ ऋजीषी द्रवन्त्वस्य हरय उप नः।
तस्मा इदन्धः सुषुमा सुदक्षमिहाभिपित्वं करते गृणानः॥
सोमवान और सत्यवान इन्द्र देव हमारे निकट पधारें। इनके अश्व हमारे निकट आगमन करें। हम याजक गण इनके उद्देश्य से सार विशिष्ट अन्न रूप सोमरस का अभिषव करेंगे। वे तृप्त होकर हम लोगों के अभीष्ट को पूर्ण करें।[ऋग्वेद 4.16.1]
सोम के स्वामी सत्य से परिपूर्ण इन्द्रदेव हमारे निकट पधारें, इनके अश्व हमारे यहाँ आयें। हम यजमान इन्द्र देव के लिए ही अन्न के सार रूप सोम को सिद्ध करेंगे। वे हमारे द्वारा पूजनीय होकर हमारी इच्छा को पूरी करें।
Let truthful, possessor of Som, Indr dev come close-near us. His horses should come close to us. We Ritviz-desirous, will extract Somras from the specific food grains. He should accomplish our desires on being satisfied.
अव स्य शूराध्वनो नान्तेऽस्मिन्नो अद्य सबने मन्दध्यै।
शंसात्युक्थमुशनेव वेद्याश्चिकितुषे असूर्याय मन्म॥
हे शत्रुओं को अभिमत करने वाले इन्द्र देव! इस माध्यन्दिन के सवन में आप हम लोगों को विमुक्त करें, जिस प्रकार से गन्तव्य मार्ग के अन्त में मनुष्य घोड़ों को छोड़ देता है। जिससे इस सवन में हम आपको हर्षित करें। हे इन्द्र देव! आप सर्वविद हो और असुरों के हिंसक हैं। यजमान लोग उशना के तुल्य हम आपके लिए मनोहर स्तोत्र का उच्चारण करते हैं।[ऋग्वेद 4.16.2]
हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं को भयभीत करने वाले हो। दिवस के इस बीच सवन में जैसे अपने निर्दिष्ट जगह पर जाकर अश्वों को विमुक्त किया जाता है, वैसे ही तुम हमें विमुक्त करो, जिससे सवन में हम तुम्हें पुष्ट करें। हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं का विनाश करने वाले एवं सभी के स्वामी हो। उशना के समान यजमान जन तुम्हारे लिए सुन्दर स्तोत को कहते हैं।
Hey Indr Dev! You create fear-terror in the enemies. Release us in the middle segment of the day, just like the person who releases the horses at the end of his journey, so that we may be able to please & nourish you. You are aware of all that happens and slay the demons-giants. The hosts-Ritviz sing beautiful hymns-Strotr in your praise-honour.
कविर्न निण्यं विदथानि साधन्वृषा यत्सेकं विपिपानो अर्थात्।
दिव इत्था जीजनत्सप्त कारूनह्ना चिच्चक्रुर्वयुना गृणन्तः॥
विद्वान जिस प्रकार से गूढ़ अर्थ का सम्पादन करते हैं, उसी प्रकार अभीष्ट वर्षी इन्द्र देव कार्यों को सम्पादित करते हैं। जब सेचन योग्य सोमरस का अधिक परिमाण में पान करके ये हर्षित होते हैं, तब द्युलोक सप्त संख्यक रश्मियों को वास्तव में उत्पन्न कर देते हैं। स्तूयमान (worth praising) रश्मियाँ दिन में भी मनुष्यों के ज्ञान का सम्पादन करती हैं।[ऋग्वेद 4.16.3]
विद्वान जिस प्रकार से गूढ़ विषयों का सम्पादन करते हैं, उसी प्रकार अभीष्ट वर्षी इन्द्र देव कार्यों को सम्पादित करते हैं। जब सेवन के योग्य सोम को अधिक परिमाण में पान करके पुष्टि को ग्रहण करते हैं, तब अम्बर से सप्त रश्मियाँ मनुष्य के लिए ज्ञानमयी होती हैं।
Indr Dev materialise the tasks in the same manner, in which the scholars decipher the intricate words-text. He become happy after drinking Somras in large doses-quantity. The heaven generate the praise worthy rays which enlighten the humans.
DECIPHER :: कूट (गूढ़) लेखन को पढ़ लेना या समझ लेना; कूटवाचन करना; learn to pronounce, to succeed in reading or understanding, something that is not clear.
स्व१र्यद्वेदि सुदृशीकमर्कैर्महि ज्योती रुरुचुर्यद्ध वस्तोः।
अन्धा तमांसि दुधिता विचक्षे नृभ्यश्चकार नृतमो अभिष्टौ॥
जब प्रभूत एवं ज्योति स्वरूप द्युलोक रश्मियों द्वारा अच्छी तरह से दर्शनीय होता है, तब देवगण उस स्वर्ग में निवास करने के लिए दीप्ति युक्त होते हैं। नेतृ श्रेष्ठ सूर्य ने आगमन करके मनुष्यों को अच्छी तरह से देखने के लिए घनी भूत अन्धकार को नष्ट कर दिया।[ऋग्वेद 4.16.4]
जब दीप्ति स्वरूप अम्बर किरणों के द्वारा उक्त तरह से दर्शनीय होता है, तब देवता गण तेज से चमकते हुए, उस स्वर्ग में निवास करते हैं। सभी का नेतृत्व करने वाले सविता देव ने प्रकट होकर मनुष्यों को देखने के लिए गंभीर अंधेरे का पतन कर डाला।
The demigods become aurous-radiant, when the heaven is lit with the rays of light. The Sun-Sury Dev appeared and vanished the dense darkness.
ववक्ष इन्द्रो अमितमृजीष्यु १ भे आ पप्रौ रोदसी महित्वा।
अतश्चिदस्य महिमा विरेच्यभि यो विश्वा भुवना बभूव॥
सोम विशिष्ट इन्द्र देव अमित महिमा धारित करते हैं। वे अपनी महिमा के बल से द्यावा और पृथ्वी दोनों को परिपूर्ण करते हैं। इन्द्र देव ने समस्त भुवनों को अभिभूत किया है। इनकी महिमा समस्त भुवनों से अधिक है।[ऋग्वेद 4.16.5]
सोमवान इन्द्र देव अत्यधिक महिमावान हो जाते हैं। वे अपनी महिमा से नभ और धरती दोनों को सम्पन्न करते हैं। इन्द्र देव ने सभी लोकों को व्याप्त किया है, क्योंकि वे सभी लोकों से श्रेष्ठ हैं।
Possessor of Somras, Indr Dev has immense glory. He compensate the earth & sky by virtue of his glory-might. Indr Dev has enchanted all abodes, since he is the beast amongest all abodes.
विश्वानि शक्रो नर्याणि विद्वानपो रिरेच सखिभिर्निकामैः।
अश्मानं चिद्ये बिभिदुर्वचोभिर्व्रजं गोमन्तमुशिजो वि वव्रुः॥
इन्द्र देव सम्पूर्ण मनुष्यों के हितकर वृष्टि आदि कार्य को जानते हैं। उन्होंने अभिलाषकारी और मित्र भूत मरुतों के लिए जल वर्षण किया। जिन मरुतों ने वचन रूप ध्वनि से पर्वतों को विदीर्ण किया, उन मरुतों ने इन्द्र देव की अभिलाषा करके गोपूर्ण गोशाला के भण्डार खोल दिये।[ऋग्वेद 4.16.6]
वे इन्द्र देव मनुष्यों के लिए हितकारक सभी कार्यों को जानते हुए जल-वृष्टि आदि करते हैं। उन्होंने अभिलाषा पूर्ण मित्र भाग वाले मरुद्गण के लिए जल-वृष्टि की थी। जिन मरुद्गण ने वाणी की ध्वनि से ही पर्वतों को चीर डाला, उन्होंने इन्द्रदेव की इच्छा करते हुए धेनुओं से पूर्ण गोष्ठ खोल दिया।
Indr Dev is aware of all that which is beneficial-essential for the humans. He showered rains for the desirous friendly Marud Gan. Marud Gan teared-destroyed the mountains just by their loud voice. They opened the gates of cow shed remembering Indr Dev.
अपो वृत्रं वद्रिवांसं पराहन्प्रावत्ते वज्रं पृथिवी सचेताः।
प्रार्णांसि समुद्रियाण्यैनोः पतिर्भवञ्छवसा शूर धृष्णो॥
हे इन्द्र देव! आपके लोक पालक वज्र ने जलावरक मेघ को प्रेरित किया। चेतनावती भूमि आपसे संगत हुई। हे शूर और वर्षणशील इन्द्र देव! आप अपने बल से लोकपालक होकर समुद्र सम्बन्धी और आकाश स्थित जल को प्रेरित किया।[ऋग्वेद 4.16.7]
हे इन्द्रदेव! आपका वज्र लोकों का रक्षक है। उसने जलों के आवरण रूपी बादल को गतिमान किया। वह चैतन्य पृथ्वी तुमसे पूर्ण हुई। तुम अत्यन्त शक्तिशाली एवं घर्षणशील हो । हे इन्द्रदेव! तुम अपनी ही शक्ति से संसार के तीनों लोकों का पालन करते हुए समुद्र की ओर आकाश में स्थित जल को प्रेरित करो।
Hey Indr Dev! Your Vajr is the protector & nurturer of the universe. It inspires-motivate the water possessing clouds. The earth is conscious due to you. Hey brave, mighty, powerful and rain showering Indr Dev! You became the supporter of the universe and manages-inspires the water in the ocean and the sky.
अपो यदद्रिं पुरुहूत दर्दराविर्भुवत्सरमा पूर्व्यं ते।
स नो नेता वाजमा दर्षि भूरिं गोत्रा रुजन्नङ्गिरोभिर्गृणानः॥
हे बहुजनाहूत इन्द्र देव! जब आपने वृष्टि जल को लक्ष्य करके बादलों को विदीर्ण किया तब आपके लिए पहले ही सरमा ने पणियों द्वारा अपहृत गौओं को प्रकट किया। अङ्गिराओं द्वारा स्तूयमान होकर आप हमें प्रचुर अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.16.8]
हे इन्द्र देव! तुम अनेकों द्वारा पुकारे गये हो। जब तुमने वृष्टि वाले जल को देखकर बादल को चीर डाला था, तब तुम्हारे लिए सरमा ने पणियों द्वारा चुरायी गयी धेनुओं का भेद खेल दिया था। तुम अंगिराओं द्वारा पूजनीय होकर जन्म देते और हमारा कल्याण करते हो।
Hey Indr Dev! Worshiped-prayed by many people-humans you shattered-teared the clouds and made them rain. Sarma disclosed the secret that the Pani-demons had stolen the cows. Having prayed praised by Angira you grant us sufficient food grains and look after us & our welfare.
अच्छा कविं नृमणो गा अभिष्टौ स्वर्षाता मघवन्नाधमानम्। ऊतिभिस्तमिषणो द्युम्नहूतौ नि मायावानब्रह्मा दस्युरर्त॥
हे धनवान इन्द्र देव! मानव आपको सम्मानित करते हैं। आपने धन प्रदान करने के लिए कुत्स के अभिमुख गमन किया। याचना करने पर शत्रुओं के उपद्रवों से आश्रयदान द्वारा आपने उनकी रक्षा की। कपटी ऋत्विकों के कार्यों को अपनी अनुज्ञा से जानकर आपने कुत्स के धन लोभी शत्रुओं को युद्ध में विनष्ट कर दिया।[ऋग्वेद 4.16.9]
कपटी :: छली, मिथ्याभिमानी, अभिमानी, मिथ्या दावेदार, धूर्त, असत, कृत्रिम, साधन-संपन्न; cheat, insidious, pretentious, disingenuous, deceptor.
हे धनेश्वर इन्द्र! प्राणी जगत तुम्हारा सम्मान करते हैं। धन देने के लिए कुत्स के सम्मुख गए थे। बुलाने पर तुमने शत्रुओं के उपद्रवों से उनको बचाकर शरण दी थी। अपनी सुमति से कपटी ऋत्विकों के कार्यों को तुमने जान लिया तथा कुत्स के धन की कामना करने वाले शत्रु को मार दिया।
Hey wealthy Indr Dev! The humans pray-respect you. You requested Kuts to grant wealth-riches. You protected him on being requested and sheltered him. You realised the designs of the deceptor Ritviz and destroyed the greedy enemies of Kuts in the war-battle.
आ दस्युध्ना मनसा याह्यस्तं भुवत्ते कुत्सः सख्ये निकामः।
स्वे योनौ नि षदतं सरूपा वि वां चिकित्सदृतचिद्ध नारी॥
हे इन्द्र देव! आपने मन में शत्रुओं को मारने का संकल्प करके कुत्स के घर में आपने आगमन किया। कुत्स भी आपके साथ मैत्री करने के लिए लालायित हुए थे, तब आप दोनों अपने स्थान में उपविष्ट हुए। आपकी सत्य दर्शिनी पत्नी शची आप दोनों का समान रूप देखकर द्विविधा में पड़ गई।[ऋग्वेद 4.16.10]
उपविष्ट :: आसीन, विराजमान, अध्यासीन, अभिनिविष्ट, बैठा हुआ, जमकर बैठा हुआ; seated, contained.
अवस्थित :: अवस्थान, टिकाव, विद्यमानता, स्थिति, मौक़ा, मुहल्ला; location, locality, locale.
हे इन्द्र देव! तुमने शत्रुओं को समाप्त करने का निश्चय कर लिया और कुत्स के घर जा पहुँचे। कुत्स भी तुम्हारी मित्रता के लिए लालायित था। तब तुम दोनों अपने स्थल पर अवस्थित हुए। सत्य को देखने वाले तुम्हारी भार्या तुम दोनों का एक जैसा रूप देखकर अत्यन्त धर्म संकट में पड़ गई।
Hey Indr Dev! You decided to eliminate the enemy and reached the house of Kuts. Kuts too was eager to have friendship with you. Thereafter, you both seated together. Devi Shachi, your wife became confused, when she found both of you having the same-alike figure.
यासि कुत्सेन सरथमवस्युस्तोदो वातस्य हर्योरीशानः।
ऋज्रा वाजं न गध्यं युयूषन्कविर्यदहन्यार्याय भूषात्॥
शत्रुओं का वध करने वाले, वायु के तुल्य गति वाले अश्वों के स्वामी, हे इन्द्र देव! जिस दिन दूरदर्शी कुत्स ग्रहणीय अन्न के तुल्य ऋजुगामी (straight moving) अश्व द्वय को अपने रथ युक्त करके आपत्ति से निस्तीर्ण होने में समर्थ हुए, उस दिन हे इन्द्र देव! आपने कुत्स की रक्षा करने की इच्छा से उसके साथ एक रथ पर गमन किया। आप शत्रु नाशक और वायु के सदृश घोड़ों के अधिपति हैं।[ऋग्वेद 4.16.11]
जब रानी कुत्स स्वीकार करने योग्य अन्न के समान तीव्रगामी दोनों अश्वों को अपने रथ में जोड़कर संकट से छुटकारा पाने में सफल हुई, तब हे इन्द्रदेव! तुमने उसके मार्ग पर उसकी रक्षा करने के लिए एक साथ गमन किया। तुम शत्रुओं का विनाश करने वाले पवन के समान गति वाले अश्वों के दाता हो।
Slayer of enemies, possessor of fast moving horses like Pawan-air, Hey Indr Dev! The day when you deployed your horses in the charoite which are like the acceptable food grains, free from troubles-tensions, you rode the charoite to protect Kuts.
कुत्साय शुष्णमशुषं नि बर्हीः प्रपित्वे अह्नः कुयवं सहस्रा।
सद्यो दस्यून्प्र मृण कुत्स्येन प्र सूरश्चक्रं वृहतादभीके॥
हे इन्द्र देव! आपने कुत्स के लिए सुख रहित शुष्ण का वध किया। दिवस के पूर्व भाव में आपने कुयव नाम वाले असुर को मारा। बहुत परिजनों से आवृत होकर आपने उसी समय वज्र द्वारा शत्रुओं को भी विनष्ट किया। आपने संग्राम में सूर्य के चक्र को छिन्न कर दिया।[ऋग्वेद 4.16.12]
हे इन्द्र देव! तुमने कुत्स के कारण शुष्ण को समाप्त कर डाला। दिन के प्रारम्भ में तुमने कुयव नामक दैत्य का वध किया, उसी समय तुमने सूर्य के चक्र को भी तोड़ दिया।
For Kuts, you slained the unhappy Shushn and in the forepart of the day, you slained Kuyav surrounded by thousands of his relatives with the thunderbolt; you have swiftly destroyed the Demons and you have cut them to pieces in the battle, with the wheel of the chariot of the Sun.
Hey Indr Dev! You killed Shushn-demon for the sake of Kuts. Earlier in the morning you killed Kuyav, another demon & enemies surrounded by many of their relatives with your Vajr & the wheel of the charoite of Sun-Sury Narayan in the war.
त्वं पितुं मृगयं शूशुवांसमृजिश्वने वैदथिनाय रन्धीः।
पञ्चाशत्कृष्णा नि वपः सहस्रात्कं न पुरो जरिमा वि दर्दः॥
हे इन्द्र देव! आपने पिप्रु नामक असुर को तथा प्रवृद्ध मृगय-प्रवृक नामक असुर का वध किया। आपने विदीथ के पुत्र ऋजिश्वा को बन्दी बनाया। आपने पचास हजार कृष्ण वर्ण राक्षसों का वध किया। वृद्धावस्था जिस प्रकार से रूप को विनष्ट करती है, उसी प्रकार से आपने शम्बर के नगरों को विनष्ट कर दिया।[ऋग्वेद 4.16.13]
हे इन्द्र देव! तुमने पिप्रू और प्रवृक नामक दैत्य को मार दिया। तुमने वैदधि के पुत्र ऋजिश्वा को बनाया और पचास सहस्र काले वर्ण वाले असुरों का वध किया। जैसे बुढ़ापा रूप का नाश करता है वैसे ही तुमने शत्रु के नगरों का नाश कर दिया।
Hey Indr Dev! You killed Pipru & Mragay, the demons. You imprisoned Rijshva, son of Vithith. You killed 50,000 black skinned-coloured demons. The way old age takes over living being you destroyed the cities of Shambar demon.
सूर उपाके तन्वं १ दधानो वि यत्ते चेत्यमृतस्य वर्पः।
मृगो न हस्ती तविषीमुषाणः सिंहो न भीम आयुधानि बिभ्रत्॥
हे इन्द्र देव! आप मरण रहित है। जब आप सूर्य के निकट अपना शरीर धारित करते हैं, तब आपका रूप प्रकाशित होता है। सूर्य के समीप सबका रूप मलिन हो जाता है, किन्तु इन्द्र देव का रूप और भासमान होता है। हे इन्द्र देव! आप मृग विशेष के तुल्य शत्रुओं को दग्ध करके आयुध धारित करते हैं और सिंह के तुल्य भयंकर विकराल हो जाते हैं।[ऋग्वेद 4.16.14]
हे इन्द्र देव! तुम अविनाशी हो। तुम जब सूर्य के निकट प्रकट होते हो तब तुम्हारा रूप अत्यन्त ज्योतिवान होता है। सूर्य के सामने सभी फीके पड़ जाते हैं, परन्तु इन्द्र देव का रूप अधिक तेजोमय होता जाता है। हे इन्द्र देव! तुम मृगया के समान शत्रुओं को जलाते और अस्त्र धारण करते हो तथा उस समय शेर के समान विकराल हो जाते हो।
Hey Indr Dev! You are immortal. When you are close to the Sun, you become shinning. Anyone else looses his aura while in the proximity of Sun. You kill the enemy like hunting the deer and possess the weapons to destroy the enemy like furious lion.
इन्द्रं कामा वसूयन्तो अग्मन्त्स्वर्मीळ्हे न सवने चकानाः।
श्रवस्यवः शशमानास उक्थैरोको न रण्वा सुदृशीव पुष्टिः॥
राक्षस जनित भय को निवारित करने के लिए इन्द्र देव की कामना करने वाले और धन की इच्छा करने वाले स्तोता लोग युद्ध सदृश यज्ञ में इन्द्र से अन्न की याचना करते हैं, स्तोत्रों द्वारा उनकी प्रार्थना करते हैं और उनके निकट गमन करते हैं। इन्द्र देव उस समय स्तोताओं के लिए आवास स्थान के तुल्य होते हैं और रमणीय तथा दर्शनीय लक्ष्मी के तुल्य होते हैं।[ऋग्वेद 4.16.15]
असुरों द्वारा उत्पन्न भय को दूर करने के लिए इन्द्र का आश्रय अभिलाषा वाले एवं धन की कामना करने युद्ध के समान यज्ञ में इन्द्र से अन्न चाहते हैं। वे स्तोत्रों द्वारा अन्न की स्तति करते हुए उनके नजदीक जाते हैं। उस समय वे इन्द्र उनके लिए आश्रय स्थान के समान रक्षा करते हैं और रमणीय एवं दर्शनीय धन के समान ऐश्वर्य सम्पन्न होते हैं।
The Ritviz request-pray to Indr Dev to relieve them from the fear of the demons and desire wealth & food grains in the Yagy which is like a war. They recite hymns and move closer to Indr Dev. At this moment Indr Dev is like shelter-home for them-worshipers. He become beautiful-attractive, possessing wealth and grandeur.
तमिद्व इन्द्रं सुहवं हुवेम यस्ता चकार नर्या पुरूणि।
यो मावते जरित्रे गध्यं चिन्मक्षू वाजं भरति स्पार्हराधाः॥
जिन इन्द्र देव ने मनुष्यों के कल्याण के लिए प्रसिद्ध कार्य किये, जो स्पृहणीय धन विशिष्ट हैं, जो हमारे सदृश स्तोता के लिए ग्रहणीय अन्न को शीघ्र लाते हैं, हे याजक गणों! हम स्तोता लोग उन इन्द्र देव का शोभन आवाहन आपके लिए करते हैं।[ऋग्वेद 4.16.16]
इन्द्र देव ने मनुष्यों के कल्याण के लिए असंख्यक विख्यात कर्म किये हैं। वे इन्द्र देव धन-ऐश्वर्य से परिपूर्ण एवं इच्छा के योग्य हैं। वे हमारे तपस्वी को प्राप्त करने योग्य अन्न को शीघ्र ले आते हैं। हे मनुष्यों! तुम्हारे लिए हम तपस्वीगण उन इन्द्र देव का सुन्दर आह्वान करते हैं।
Indr Dev performed numerous deeds for the welfare of the humans. He possess wealth and grandeur. He gives food grains to the hosts-devotees quickly. Hey Ritviz-devotees! We ascetics invoke Indr Dev.
तिग्मा यदन्तरशनिः पताति कस्मिञ्चिच्छूर मुहुके जनानाम्।
घोरा यदर्य समृतिर्भवात्यध स्मा नस्तन्वो बोधि गोपाः॥
हे शूर इन्द्र देव! मनुष्यों के किसी भी युद्ध में अगर हम लोगों के बीच में तीक्ष्ण अशनिपात हो अथवा शत्रुओं के साथ अगर हम लोगों का घोरतर युद्ध हो, तब हे स्वामिन्! आप हम लोगों के शरीर की रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.16.17]
हे इन्द्रदेव! तुम पराक्रमी हो। मनुष्यों द्वारा होने वाले संग्राम में हमारे मध्य तीक्ष्ण वज्रपात हो या शत्रुओं से हमारा अत्यन्त घोर युद्ध हो, तब तुम हमारी देह को अपने निमंत्रण में रखते हुए प्रत्येक प्रकार से हमारी सुरक्षा करना।
Hey brave Indr Dev! Protect us-our bodies if we entangle in a war with the humans, involve in furious war with the enemy or lightening strike us.
भुवोऽविता वामदेवस्य धीनां भुवः सखावृको वाजसातौ।
त्वामनु प्रमतिमा जगन्मोरुशंसो जरित्रे विश्वध स्याः॥
हे इन्द्र देव! आप वामदेव के यज्ञ कार्य के रक्षक होवें। आप हिंसा रहित हैं। आप युद्ध में हम लोगों के सुहृद होवें। आप मतिमान हैं। हम लोग आपके निकट गमन करें। आप सर्वदा हम के प्रशंसक हों।[ऋग्वेद 4.16.18]
सुहृद :: मित्र, सखा; soft-kind hearted, cordial, affectionate, crony.
हे इन्द्र देव! तुम वामदेव द्वारा किये जाने वाले यज्ञ कार्य के रक्षक हो। तुम किसी के द्वारा हिंसित नहीं किये जाते। तुम युद्ध में हमारे प्रति सहृदयता का बर्ताव करो। तुम अत्यन्त सुन्दर मति वाले हो। तुम हमारे नजदीक आओ। हे इन्द्र! तुम हमेशा स्तोताओं की प्रशंसा करने वाले बनो।
Hey Indr Dev! You should protect the Yagy of Vam Dev. You are be non violent. You should favour us in the war. You are intelligent-prudent. We should be close to you. Appreciate-like our hymns praising you.
एभिर्नृभिरिन्द्र त्वायुभिष्टा मघवद्भिर्मघवन्विश्व आजौ।
द्यावो न घुम्नैरभि सन्तो अर्यः क्षपो मदेम शरदश्च पूर्वीः॥
हे धनवान इन्द्र देव! हम शत्रुओं को जीतने के लिए समस्त युद्ध में आपकी अभिलाषा करते हैं। धनी जिस प्रकार धन द्वारा दीप्त होता है, हम भी उसी प्रकार हव्य युक्त होकर पुत्र-पौत्रादि परिजनों के साथ दीप्त हों और शत्रुओं को पराजित करके रात्रि एवं सम्पूर्ण संवत्सरों में आपकी प्रार्थना करें।[ऋग्वेद 4.16.19]
हे इन्द्र देव! तुम समृद्धिवान हो। हम युद्धों में तुम्हारी इच्छा करते हैं। जैसे धनवान अपने धन से चमकता है, वैसे ही हम भी धन तथा पुत्र-पौत्रादि परिवार वालों के संग ज्योति से परिपूर्ण हों। हम अपने शत्रुओं को पराजित कर रात दिन और वर्षों में प्रसन्नता से तुम्हारा पूजन करते रहें।
Hey wealthy Indr Dev! We expect you to favours us in the war to win the enemy. The way a rich become glorious we too should be glorious with sons & grandsons. Win the enemy and worship-pray you in all segments of the day & night.
एवेदिन्द्राय वृषभाय वृष्णे ब्रह्माकर्म भृगवो न रथम्।
नू चिद्यथा नः सख्या वियोषदसन्न उग्रोऽविता तनूपाः॥
इन्द्र देव के साथ हम लोगों की मैत्री जिस कार्य से वियुक्त न हो, तेजस्वी और शरीर पालक इन्द्र देव जिससे हम लोगों के रक्षक हों, हम लोग उसी प्रकार का आचरण करेंगे। दीप्त रथ निर्माता जिस प्रकार रथ बनाते हैं, उसी प्रकार हम लोग भी अभीष्ट वर्षी तथा नित्य तरुण इन्द्र देव के लिए स्तोत्र की रचना करते हैं।[ऋग्वेद 4.16.20]
हम वही कार्य करेंगे, जिससे इन्द्र सहित हमारी मैत्री का विच्छेदन न हो और शरीर के रक्षक तेजस्वी इन्द्र हमारे पालन कर्ता बनें। कुशल रथ निर्माता जैसे रथ बनाता है, वैसे ही हम भी कामनाओं की वर्षा करने वाले प्रतिदिन इन्द्र के लिए सुन्दर स्तोत्रों को रचते हैं।
We should act-behave with aurous & our protector Indr Dev in such a manner that our friend ship with him continues. The way a builder of charoite builds it, we should compose attractive Strotr-hymns to worship youthful Indr Dev who accomplish our desires.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे इन्द्र देव! आप पूर्व वर्ती ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर तथा हम लोगों द्वारा स्तूयमान होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार आप स्तोताओं के अन्न को प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्र को रचते हैं। जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.16.21]
हे इन्द्र देव! तुम प्राचीन काल में ऋषियों द्वारा अर्चित होकर और हमारे द्वारा नमस्कृत होकर जल द्वारा नदी पूर्ण करने के तुल्य समान प्रार्थना करने वालों के लिए अन्न धन की वृद्धि करते हो। हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोकों की रचना करते हैं जिससे रथ आदि से परिपूर्ण हुए वंदना के संकल्पों द्वारा तुम्हें हमेशा हर्षित करते रहें।
Hey Indr Dev! On being praised by the ancient rishis and us, you increase the food grains of the Hosts-devotees the way water completes the rivers. Hey Indr Dev! We always compose fresh hymns-Strotr in your honour so that we have charoites and worship-pray, serve you.(13.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (17) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्, एकपदा विराट।
त्वं महाँ इन्द्र तुभ्यं ह क्षा अनु क्षत्रं मंहना मन्यत द्यौः।
त्वं वृत्रं शवसा जघन्वान्त्सृजः सिन्धूँरहिना जग्रसानान्॥
हे इन्द्र देव! आप महान् है। महत्त्व से युक्त होकर पृथ्वी ने आपके बल का अनुमोदन किया एवं द्युलोक ने भी आपके बल का अनुमोदन किया। लोकों को आवृत करने वाले वृत्र नामक असुर को आपने बल द्वारा मारा। वृत्रासुर ने जिन नदियों को अवरुद्ध किया, आपने उन नदियों को विमुक्त कर दिया।[ऋग्वेद 4.17.1]
हे इन्द्र देव! तुम श्रेष्ठ हो। महती पृथ्वी ने तुम्हारी शक्ति का समर्थन किया आकाश ने तुम्हारी शक्ति का अनुमोदन किया। तुमने अपनी शक्ति से लोकों को ढक देने वाले वृत्रासुर को समाप्त किया। वृत्र ने नदियों को वशीभूत किया, तुमने उनको स्वतंत्र कर दिया।
Hey Indr Dev! You are the best-great. Earth & the heaven too supported your might. Vratr was killed by your power. You released the river blocked by Vrata Sur.
तव त्विषो जनिमब्रेजत द्यौ रेजद्भूमिर्भियसा स्वस्य मन्योः।
ऋघायन्त सुभ्व: १ पर्वतास आर्दन्धन्वानि सरयन्त आपः॥
हे इन्द्र देव! आप दीप्तिमान है। आपके जन्म होने पर द्युलोक आपके कोपभय से कम्पित हुआ, पृथ्वी कम्पित हुई और वृद्धि प्रदान के लिए बृहत मेघ समूह आपके द्वारा आबद्ध हुआ। इन मेघों ने प्राणियों की पिपासा को विनष्ट करके मरुभूमि में जल प्रेरण किया।[ऋग्वेद 4.17.2]
हे इन्द्र देव! तुम अत्यन्त तेजस्वी हो। तुम्हारे प्रकट होने पर नभ तुम्हारे क्रोध के डर से काँप गया। उस समय पृथ्वी भी काँप गई और बादलों के दल को तुमने बाँध लिया। तुम्हारी प्रेरणा से प्राणियों की प्यास मिटाने के लिए उन मेघों ने मरुभूमि में जल की वर्षा की।
Hey Indr Dev! You are energetic. Your appearance led to trembling of heavens, earth and the clouds prepared to rain. The clouds quenched the thirst of the living beings and the deserts too got water-rain showers.
भिद्गिगिरिं शवसा वज्रमिष्णन्नाविष्कृण्वानः सहसान ओजः।
वधीद्वृत्रं वज्रेण मन्दसानः सरन्नापो जवसा हतवृष्णीः॥
शत्रुओं के अभिभवकर्ता इन्द्र देव ने तेज प्रकाशित करके और बल पूर्वक वज्र का प्रेरण करके पर्वतों को विदीर्ण किया। सोमपान से हर्षित होकर इन्होंने वज्र द्वारा वृत्रासुर को विनष्ट किया। वृत्रासुर के विनष्ट होने पर जल आवरण रहित होकर वेग से आने लगा।[ऋग्वेद 4.17.3]
शत्रुओं को पराजित करने वाले इन्द्र देव ने अपने तेज की ज्योति और शक्ति द्वारा वज्र को चलाकर पर्वतों को चीर डाला। सोमपान करके पुष्ट होने के बाद इन्द्रदेव ने अपने वज्र से वृत्र को समाप्त कर डाला। उस वृत्र के समाप्त होने पर जल की वर्षा होने लगी।
Defeater of the enemies Indr Dev lit by his aura, projected Vajr with force to smash the mountains. Pleased by drinking Somras, he killed Vrata Sur with Vajr. With the killing of Vratr, rain waters showered.
सुवीरस्ते जनिता मन्यत द्यौरिन्द्रस्य कर्ता स्वपस्तमो भूत्।
य ईं जजान स्वर्यं सुवज्रमनपच्युतं सदसो न भूम॥
हे इन्द्र देव! आप अतिशय स्तुत्य, उत्तम वज्र विशिष्ट, स्वर्ग स्थान से अच्युत अर्थात् विनाश रहित और महिमावान हैं। आपको जिन द्युतिमान प्रजापति ने उत्पन्न किया, वे अपने को सुन्दर पुत्रवान मानते थे। आपको जन्म देने वाले प्रजापति उत्तम कर्म करने वाले थे।[ऋग्वेद 4.17.4]
तुम अत्यन्त पूजनीय वज्र से युक्त, अलौकिक स्थान के अधिपति और अविनाशी हो। तुम अत्यन्त महिमा वाले हो, जिन तेजस्वी प्रजापति ने तुम्हें प्रकट किया था, वे अपने को सुन्दर पुत्र वाला मानते थे।
Hey Indr Dev! You are honoured-revered, possess excellent Vajr, immortal. Radiant-energetic Prajapati who produced you, considered himself to have a beautiful-handsome son, performer of auspicious, righteous, virtuous deeds.
य एक इच्च्यावयति प्र भूमा राजा कृष्टीनां पुरुहूत इन्द्रः।
सत्यमेनमनु विश्वे मदन्ति रातिं देवस्य गृणतो मघोनः॥
सम्पूर्ण प्रजाओं के राजा, बहुजनाहूत और देवों के बीच में एकमात्र प्रधान इन्द्र देव शत्रु जनित राय को विनष्ट करते हैं। द्युतिमान और धनवान बन्धु इन्द्र देव के उद्देश्य से वास्तव में समस्त याजकरण प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.5]
इन्द्र के जन प्रजापति का कर्म अत्यन्त उत्तम और शंसा के योग्य था। मनुष्य मात्र के स्वामी, अनेकों द्वारा पुकारे गये, देवताओं के सुख इन्द्रदेव शत्रु द्वारा रचित किये गये भय को मिटाते हैं। वे समृद्धि और ज्योर्तिवान। उन मित्र रूप इन्द्रदेव के लिए यजमान श्लोकों द्वारा नमस्कार करते हैं।
Emperor of all living beings, worshiped by many and the only leader amongest the demigods-deities, destroy the enemies. Radiant and wealthy-rich, brotherly Indr Dev is worshiped-prayed by the Ritviz-hosts.
सत्रा सोमा अभवन्नस्य विश्वे सत्रा मदासो बृहतो मदिष्ठाः।
सत्राभवो वसुपतिर्वसूनां दत्रे विश्वा अधिथा इन्द्र कृष्टीः॥
सम्पूर्ण सोमरस वास्तव में इन्द्र देव के निमित्त हैं। ये मद कारक सोम महान इन्द्र देव लिए सचमुच हर्ष कारक हैं। हे इन्द्र देव! आप धनपति हैं, केवल धनपति ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण पशुओं के भी पति हैं। हे इन्द्र देव! धन के लिए आप वास्तव में समस्त प्रजाओं को धारित करते है।[ऋग्वेद 4.17.6]
सभी सोम इन्द्रदेव के लिए उत्पन्न होते हैं। यह सोम बल उत्पन्न करने वाला है तथा उन पर श्रेष्ठ इन्द्र को प्रसन्नता प्रदान करते हैं। हे इन्द्र देव! तुम ऐश्वर्यवान् सभी प्रजाओं का पालन-पोषण करने वाले हो।
Entire Somras is meant for Indr Dev. Intoxicating Somras produces great pleasure-happiness in Indr Dev. Hey Indr Dev! You are not only the owner of wealth but also all the leader of living beings, animals-cattle. Hey Indr Dev! You protect-shelter the living beings with wealth.
त्वमद्य प्रथमं जायमानोऽमे विश्वा अधिथा इन्द्र कृष्टीः।
त्वं प्रति प्रवत आशयानमहिं वज्रेण मघवन्वि वृश्चः॥
हे धनवान इन्द्र देव! पूर्व में ही उत्पन्न होकर आपने वृत्रभीत होकर सम्पूर्ण प्रजाओं को धारित किया। आपने उदकवान देश के उद्देश्य से जल निरोधक वृत्रासुर को छिन्न-भिन्न किया।[ऋग्वेद 4.17.7]
हे धन ऐश्वर्य सम्पन्न इंद्र देव! तुमने उत्पन्न होते ही वृत्र के भय से बचाने के लिए प्रजाओं की रक्षा की। तुमने सभी प्रदेशों को जल युक्त कर देने के उद्देश्य से जल को रोकने वाले शत्रु को नष्ट कर दिया।
Hey grandeur possessing Indr Dev! You appeared in the past and supported the populace. You eliminated Vrata Sur to maintain water supply in all regions, throughout the world.
सत्राहणं दाधृषिं तुम्रमिन्द्रं महामपारं वृषभं सुवज्रम्।
हन्ता यो वृत्रं सनितोत वाजं दाता मघानि मघवा सुराधाः॥
अनेक शत्रुओं के हन्ता, अत्यन्त दुर्द्धर्ष शत्रुओं के प्रेरक, महान, विनाश रहित, अभीष्टवर्षी और शोभन वज्र विशिष्ट इन्द्र देव की प्रार्थना हम लोग करते हैं। जिन इन्द्र देव ने वृत्रासुर असुर ने को मारा, जो अन्नदाता और शोभन धन से युक्त हैं तथा जो धन दान करते हैं, हम उनकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.8]
अनेक शत्रुओं को समाप्त करने वाले, विकराल शत्रुओं को शिक्षा प्रदान करने वाले, महान एवं अविनाशी इन्द्रदेव का पूजन करते हैं। वे इन्द्रदेव अभिष्टों की वृष्टि करने वाले और सुन्दर वज्र वाले हैं। उन्होंने वृत्र का पतन किया था। वे अन्न प्रदान करने वाले उज्ज्वल वनों के अधिपति हैं। सदैव धन प्रदान करते रहते हैं, उन इन्द्र का हम पूजन करते हैं।
We worship immortal, great, desire accomplishing, Vajr possessing Indr Dev, who eliminated several enemies. We pray Indr Dev, who killed Vrata Sur, grants food grains, has grandeur and donate money.
अयं वृतश्चातयते समीचीर्य आजिषु मघवा शृण्व एकः।
अयं वाजं भरति यं सनोत्यस्य प्रियासः सख्ये स्याम॥
जो धनवान इन्द्र देव संग्राम में अद्वितीय सुने जाते हैं, वे मिलित और विस्तृत शत्रु सेना को विनष्ट करते हैं। वे जो अन्न याजक गणों को देते हैं, उसी अन्न को वे धारित भी करते हैं। इन्द्र देव के साथ हम लोगों की मित्रता प्रीति युक्त हो।[ऋग्वेद 4.17.9]
जो इन्द्र अत्यन्त धनवान एवं युद्ध में अद्वितीय वीर माने गये हैं, वे सुसंगत और विशाल शत्रु सेना को समाप्त करने में सक्षम हैं। वे जिस अन्न और धन को धारण करते हैं, वही यजमान को देते हैं। इन इन्द्र सहित हमारा मित्र भाव अटूट रहे।
Highly rich and exceptional brave warrior Indr Dev, destroys the well arranged-managed enemy army in the war. He distribute food grain possessed by him to those requesting for it. Let our association with him be friendly-affectionate.
अयं शृण्वे अध जयन्नुत घ्नन्नयमुत प्र कृणुते युधा गाः।
यदा सत्यं कृणुते मन्युमिन्द्रो विश्वं दृळ्हं भयत एजदस्मात्॥
शत्रु विजयी और शत्रु हिंसक होकर इन्द्र देव सभी जगह प्रख्यात हैं। ये शत्रुओं के पास से पशुओं को छीन लाते हैं। इन्द्र देव जब वास्तव में कोप करते हैं, तब स्थावर और जंगमरूप समस्त जगत इनसे डरने लगता है।[ऋग्वेद 4.17.10]
वे इन्द्र शत्रुओं से पशुओं को छीन लेते हैं। जब ये आक्रोशित होते हैं, तब यह स्थावर जंगम रूप का अखिल संसार इन्द्रदेव के भय से नितान्त भयग्रस्त हो जाता है।
Winner & destroyer of the enemy Indr Dev, is famous every where. He snatches the cattle from the enemy. When Indr Dev grow angry fixed and movable living beings become afraid of him.
समिन्द्रो गा अजयत्सं हिरण्या समश्विया मघवा यो ह पूर्वीः।
एभिर्नृभिर्नृतमो अस्य शाकै रायो विभक्ता संभरश्च वस्वः॥
जिन धनवान इन्द्र देव ने असुरों को जीता, शत्रुओं के रमणीय धन को जीता, अश्व समूह को जीता तथा अनेक शत्रु सेनाओं को जीता, वे सामर्थ्यवान नेतृ श्रेष्ठ स्तोताओं द्वारा प्रार्थित होकर पशुओं के विभाजक तथा धन के धारक हों।[ऋग्वेद 4.17.11]
जिन समृद्धिशाली इन्द्रदेव ने दैत्यों पर विजय ग्रहण की थी तथा शत्रुओं के महान धन पर अधिकार प्राप्त किया था। जिन इन्द्रदेव ने शत्रुओं को जीतकर उनके अश्वों को अपने अधिकार में कर लिया था, वे सर्व समर्थ इन्द्र, सभी में अग्रणी एवं वन्दना करने वालों से पूजनीय होकर पशुओं को बाँटने और धनादि के रक्षक हैं।
Let Indr Dev winner of the demons, collector-possessor of their wealth & horses, mighty-powerful leader should distribute the cattle and protect wealth, on being prayed-worshiped.
कियत्स्विदिन्द्रो अध्येति मातुः कियत्पितुर्जनितुर्यो जजान।
यो अस्य शुष्यं मुहुकैरियर्ति वातो न जूतः स्तनयद्भिर भैः॥
हे इन्द्र देव! आप अपनी जननी के समीप कितना बल प्राप्त करते हैं और पिता के समीप कितना बल प्राप्त करते हैं। जिन इन्द्र देव ने अपने पिता प्रजापति के समीप से इस दृश्यमान जगत को उत्पन्न किया तथा उन्हीं प्रजापति के समीप से जगत को मुहुर्मुहः बल प्रदान किया, वे इन्द्र देव गर्जनशील मेघ द्वारा प्रेरित वायु के तुल्य आहूत होते हैं।[ऋग्वेद 4.17.12]
इन्द्र देव ने अपने माता-पिता से कितनी शक्ति को प्राप्त किया था? जिन इन्द्र देव ने अपने पिता प्रजापति के निकट से इस संसार को रचित करके संसार को बल प्रदान किया है, उन इन्द्र देव की गर्जना करने वाले बादल से प्रेरित पवन के समान आह्वान किया जाता है।
Some portion of his strength; Indr derives from his mother, some portion from his father; he who, though his progenitor, has begotten the world and animates its vigour repeatedly, as the wind is driven by thundering clouds.
Hey Indr Dev! You get power-mighty, strength in the company of your parents. Indr Dev produced the world and granted strength to it. He is worshiped like the roar of clouds who pray to Pawan Dev.
क्षियन्तं त्वमक्षियन्तं कृणोतीयर्ति रेणुं मघवा समोहम्।
विभञ्जनुरशनिमाँइव द्यौरुत स्तोतारं मघवा वसौ धात्॥
हे धनवान इन्द्र देव! आप निराश्रितों को आश्रय प्रदत्त करते हैं और किए गए पापों को विनष्ट करते हैं। आप द्युलोक के सदृश सुदृढ़ वज्र धारण करने वाले हैं, क्योंकि आप शत्रुओं का संहार करने वाले हैं। आप धनवान हैं, इसलिए प्रार्थना करने वालों को धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.13]
इन्द्र देव धनवान हैं, वे धन हीन प्राणियों को धन से पूर्ण करते हैं। अंतरिक्ष के समान अटल वज्र युक्त शत्रु को मारने-वाले इन्द्र देव भी पापों को नष्ट करते हैं और वंदना करने वालों को धन प्रदान करते हैं।
Hey rich-wealthy Indr Dev! You grant shelter-protection to homeless and eliminates the sins. You possess the strong Vajr like the heaven and the slayer of the enemies. You grant money-riches on being prayer-worshiped.
अयं चक्रमिषणत्सूर्यस्य न्येतशं रीरभत्ससृमाणम्।
आ कृष्ण ईं जुहुराणो जिघर्ति त्वचो बुध्ने रजसो अस्य योनौ॥
इन्द्र देव ने सूर्य के आयुध को प्रेरित किया और युद्ध के लिए जाने वाले एतश-प्रकाश युक्त को निवारित किया। कुटिल गति और कृष्ण वर्ण मेघ ने तेज के मूलभूत और जल के स्थान स्वरूप अन्तरिक्ष में स्थित इन्द्र देव को अभिषिक्त किया।[ऋग्वेद 4.17.14]
अभिषेक :: प्रतिष्ठापन, समझाना, बतलाना, स्नान; coronation, consecration, ablution, anointment.
इन्द्र देव ने सूर्य के अस्त्र को शिक्षा प्रदान की तथा संग्रामोद्यत एतश का निवारण किया। तिरछी गति और काले रंग वाले बादल ने तेज आश्रय रूप और जल से पूर्ण अंतरिक्ष में निवास करने वाले इन्द्रदेव का अभिषेक किया था।
Indr Dev inspired the weapons of aurous-radiant Sury Bhagwan-Sun. Dark clouds coronated Indr dev in the space with water.
असिक्न्यां याजकगणो न होता॥
जिस प्रकार से रात्रि काल में याजकगण सोमरस द्वारा इन्द्र देव को अभिषिक्त करते हैं। वे भी रात्रि में ही सभी मनुष्यों को परम ऐश्वर्य प्रदत्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.15]
जैसे यजमान अंधेरी रात में भी इन्द्र का आह्वान करता है, वैसे ही इन्द्र देव प्रजाओं को रात में भी ऐश्वर्य आदि प्रदान करते हैं।
As the sacrificer-hosts, Ritviz pours the oblation at night upon the fire, Indr Dev grant their wishes at night too.
The way the Ritviz coronate Indr Dev at night, he too grants grandeur to them during the night as well.
गव्यन्त इन्द्रं सख्याय विप्रा अश्वायन्तो वृषणं वाजयन्तः।
जनीयन्तो जनिदामक्षितोतिमा च्यावयामोऽवते न कोशम्॥
हम मेधावी स्तोता गौओं की अभिलाषा करते हैं, अश्वों की अभिलाषा करते हैं, अन्न की अभिलाषा करते हैं और स्त्री की अभिलाषा करते हैं। हम मित्रता के लिए कामना पूरक, भार्याप्रद और सर्वदा रक्षक इन्द्र देव को, लोग जिस प्रकार से प्यासे लोग कुओं में जल पात्र को भरकर निकालते हैं, उसी प्रकार अवनमित करेंगे।[ऋग्वेद 4.17.16]
हम मेधावी स्तोता गाय, अन्न और सुन्दर संतान उत्पन्न करने वाली नारी की कामना करते हैं। हम अभीष्ट पूर्ण करने वाले, संतानदात्री पत्नी को देने वाले तथा सदैव अक्षय सुरक्षा प्रदान करने वाले इन्द्रदेव के सखा भाव को उसी तरह चाहते हैं, जिस प्रकार कुएँ से जल निकालने की अभिलाषा करने वाले मनुष्य जल पात्र को ग्रहण करना चाहते हैं।
We the intelligent worshipers-devotees are desirous of cows, horses, & wife. We desirous humbled, love friendly Indr Dev sheltering us, like the thirsty person who wish to draw water from the well, to seek wife to produce sons.
त्राता नो बोधि ददृशान आपिरभिख्याता मर्डिता सोम्यानाम्।
सखा पिता पितृतमः पितॄणां कर्तेमु लोकमुशते वयोधाः॥
हे इन्द्र देव! आप आप्त है। रक्षक रूप से सभी को देखते हुए आप हमारे रक्षक होवें। आप सोम योग्य याजक गणों के अभिद्रष्टा और सुखयिता है। प्रजापति के समान आपकी ख्याति है। आप पालकों के बीच श्रेष्ठ हैं। आप इस संसार के स्रष्टा हैं और याजकों के अन्न प्रदाता हैं।[ऋग्वेद 4.17.17]
आप्त :: मिला हुआ, कुशल, संबंधी, मित्र, विश्वस्त व्यक्ति, शब्द प्रमाण, अर्हत लब्धि, प्राप्त, प्रामाणिक, कुशल, दक्ष, विश्वास करने योग्य, विश्वसनीय तत्वज्ञ व्यक्ति; concerned, reliable expert person.
हे इन्द्र देव! तुम हमारी रक्षा करने वाले, देखने वाले, सखा उपदेशकर्त्ता शोभित गुणों से युक्त हों। तुम हमारे पूर्व पुरुषों के भी पिता तुल्य, संतानों को सुख देने वाले सखा, ज्ञान और पराक्रम प्रदान करने वाले हो। तुम महान लोकों की कामना करने वाले को उत्तम पद प्रदान करते हो।
Hey Indr Dev! You are reliable concerned & expert. Protect us. You are comforter & well wisher of the Somras deserving Ritviz. You are famous as Prajapati & best amongest the nurturers. You are the creator of the universe and grant food grains to the worshipers.
Here Dev raj Indr is symbolic of Bhagwan Brahma & Bhagwan Shri Hari Vishnu.
सखीयतामविता बोधि सखा गृणान इन्द्र स्तुवते वयो धाः।
चक्रमा सबाध आभिः शमीभिर्महयन्त इन्द्र॥
हे इन्द्र देव! हम आपसे मित्रता की अभिलाषा करते हैं। आप हमारे रक्षक होवें। आप प्रार्थित होते हैं, आप हमारे मित्र होवें। आप स्तोताओं को अन्न प्रदान करें। हे इन्द्र देव! हम बाधा युक्त होकर भी स्तुति रूप कर्म द्वारा पूजा करके आपका आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.17.18]
हे इन्द्र देव! हम तुम्हारा सखा भाव चाहते हैं। तुम हमारे पोषक बनो। तुम्हारी अर्चना की जाती है, तुम हमारे सखा बनो। वदंना करने वाले यजमानों को अन्न प्रदान करो। हे इन्द्रदेव! हमारे महान कर्मों में बाधा उपस्थित होने पर तुम्हें स्मरण करते हैं। तुम हमारे आह्वान पर ध्यान आकृष्ट करते हुए हमें धन प्रदान करो।
Hey Indr Dev! We desire your friendship. Become our protector. You are worshiped-prayed. Grant food grains to the worshipers. Hey Indr Dev! We remember-call, invoke you as and when face problems.
स्तुत इन्द्रो मघवा यद्ध वृत्रा भूरीण्येको अप्रतीनि हन्ति।
अस्य प्रियो जरिता यस्य शर्मन्नकिर्देवा वारयन्ते न मर्ताः॥
जब इन्द्र देव हम लोगों के द्वारा प्रार्थित होते हैं, तब वे अकेले ही अनेक अभिगन्ता शत्रुओं का वध कर डालते हैं। जिस इन्द्र देव की शरण में वर्तमान स्तोता का निवारण न देवगण करते हैं और न मनुष्य गण करते हैं, उन इन्द्र देव को स्तोता प्रिय होता है।[ऋग्वेद 4.17.19]
जब हम उन इन्द्रदेव की वंदना करते हैं तब वे अकेले ही बहुत से असुरों को समाप्त कर देते हैं। उनको विद्वान स्तोता बहुत ही प्रिय हैं। उनके आश्रय में रहने वाले को दवेता या मनुष्य कोई नहीं रोक सकता है।
One being invoked-worshiped, Indr Dev alone eliminate the demons-enemies. He likes the enlightened worshipers-devotees. Those under his asylum-protection can not be restrained by any one.
एवा न इन्द्रो मघवा विरप्शी करत्सत्या चर्षणीधृदनर्वा।
त्वं राजा जनुषां धेह्यस्मे अधि श्रवो माहिनं यज्जरित्रे॥
विविध शब्दवान, समस्त प्रजाओं के धारक, शत्रु रहित और धनवान इन्द्र देव इस प्रकार प्रार्थित होकर हम लोगों के सत्य रूप अभिलषित को सम्पादित करें। हे इन्द्र देव! आप समस्त जन्म धारियों के राजा हैं। स्तोता जिस महिमा युक्त यश को प्राप्त करता है, वह यश आप अधिक मात्रा में हम लोगों को प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.17.20]
हे इन्द्र देव ! तुम अत्यन्त धनवान, विविध ध्वनि वाले, समस्त प्रजाओं के रक्षक तथा शत्रुओं से शून्य हो। वे हमारी इस प्रकार की प्रार्थना को सुनकर हमारी सर्वश्रेष्ठ मनोकामनाओं को पूर्ण करें। हे इन्द्र देव! तुम समस्त रचित प्राण धारियों के स्वामी हो। जिस महिमा वाले सुन्दर कीर्ति की प्रार्थना करने वाला ग्रहण करता है, वह अत्यन्त कीर्ति हमको प्रदान करो।
Addressed as knowledgeable of various languages-dialects, nurturer of various living beings, without any enemy, let wealthy Indr Dev, accomplish our desires. Hey Indr Dev! You are the emperor-leader of all living beings. Grant us the fame which an honourable-revered worshiper gains by virtue of composing-singing beautiful hymns.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर तथा हम लोगों के द्वारा स्तूत होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को आप प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्र करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.17.21]
हे इन्द्र देव! तुम पुरातन काल में हुए ऋषियों के द्वारा पूजनीय हुए हमारे द्वारा भी स्तुत्य होकर जल द्वारा नदी को पूर्ण करने के समान, अन्न की वृद्धि करते हो। हम तुम्हारे लिए नए श्लोक रचते हैं। जिससे हम रथ युक्त हुए सदैव तुम्हारी अर्चना करते रहें।
Hey Indr Dev! Praised by the ancient-earlier sages, Rishi Gan, worshiped by us; grant us food grains like the water which fills the rivers. We compose beautiful Strotr in your honour, for you so that we possess charoite and pray you, sing hymns in your honour.(18.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (18) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, अदिति, छन्द :- त्रिष्टुप्।
अयं पन्था अनुवित्तः पुराणो यतो देवा उदजायन्त विश्वे।
अतश्चिदा जनिषीष्ट प्रवृद्धो मा मातरममुया पत्तवे कः॥
इन्द्र देव कहते हैं, "यह योनि निर्गमण रूप मार्ग अनादि और पूर्वापर लब्ध है। इसी योनि मार्ग से सम्पूर्ण देव और मनुष्य उत्पन्न हुए हैं; इसलिए आप गर्भ में प्रवृद्ध होकर इसी मार्ग द्वारा उत्पन्न होवें। माता की मृत्यु के लिए कार्य मत करो"।
यह रास्ता अनादि समय से चलता आ रहा है, जिसके द्वारा विभिन्न भोगों और एक दूसरे को चाहने वाले नर-नारी ज्ञानीजन आदि रचित होते हुए प्रवृद्ध होते हैं। उच्चस्थ पदवी वाले समर्थवान व्यक्ति भी इस परम्परागत रास्ते से ही रचित होते हैं। हे मनुष्य! अपनी जननी माता को अनादर करने का प्रयास न करें।[ऋग्वेद 4.18.1]
Indr Dev said that the sequence of birth through the womb-vagina has been prevalent ever since. All demigods-deities appeared through this route. Establish yourself in the womb and prevent mother's death.
नाहमतो निरया दुर्गर्तैत्तिरश्चता पार्श्वान्निर्गमाणि।
बहूनि मे अकृता कर्त्वानि युध्यै त्वेन सं त्वेन पृच्छै॥
वामदेव कहते हैं, "हम इस योनि मार्ग द्वारा नहीं निर्गत होंगे। यह मार्ग अत्यन्त दुर्गम है। हम पार्श्व भेद करके निर्गत होंगे। दूसरों के द्वारा अकरणीय बहुत से कार्य हमें करने हैं। हमें एक के साथ युद्ध करना है। हमें एक के साथ वाद-विवाद करना है"।[ऋग्वेद 4.18.2]
निर्गत :: बाहर आया हुआ, निःसृत; issued, come forth, gone forth.
निर्गतहम पूर्वोक्त योनि मार्ग से नहीं बच सकते। टेढ़े रास्ते से पशु-पक्षी के रूप में जन्म लेकर भी जीवन बड़े दुख से व्यतीत होता है। मैं चाहता हूँ कि इस फंदे से निकल जाऊँ। मुझे अनेक कष्ट न उठाने पड़ें। बार-बार का झगड़ा सब झमेला मात्र है। हमको संसार पथ के किनारे लगने का प्रयास करना चाहिये।
Vamdev said that he would not like to follow that route of birth, since it was very tough, intricate, difficult. We would prefer lateral route. We have to conduct several tasks deferred by others, undertake wars & have debate.
परायतीं मातरमन्वचष्ट न नानु गान्यनु नू गमानि।
त्वष्टुगृहे अपिबत्सोममिन्द्रः शतधन्यं चम्वोः सुतस्य॥
इन्द्र देव कहते हैं, "हमारी माता मर जायगी, तथापि हम पुरातन मार्ग का अनुधावन नहीं करेंगे, शीघ्र बहिर्गत होंगे"। (इन्द्र ने जो यथेच्छा चरण किए, उसी को वामदेव कहते हैं) इन्द्र देव अभिषवकारी त्वष्टा के घर में सोमाभिषव फलक द्वारा अभिषुत सोमरस का पान बलपूर्वक किया, वह सोमरस बहुत धन द्वारा क्रीत था।[ऋग्वेद 4.18.3]
जैसे अपनी जननी की मृत्यु पर कोई व्यक्ति कहता है कि मैं भी इसके पीछे ही चला जाऊँ या न जाऊँ। कालोपरांत वह ज्ञान-धैर्य आदि से शांत होकर पिता के घर में पुत्र बनकर रहता हुआ जीवन का उपयोग करता है। उसी प्रकार विवेकी होकर त्वष्टा के गृह में सोमपान करता है। अदिति ने उस शक्तिशाली इन्द्र को महीनों वर्षों तक धारण किया था। उस श्रेष्ठ इन्द्रदेव ने अनेक विशिष्ट कार्य किए। उनकी समानता उत्पन्न हुए अथवा आगे उत्पन्न होने वालों में से कोई नहीं कर सकता।
Indr Dev said that he would not discard that route which may kill his mother-Aditi. Indr Dev consumed the Somras at Twasta's house which was bought with a lot of money.
किं स ऋधक्कृणवद्यं सहस्रं मासो जभार शरदश्च पूर्वीः।
नही न्वस्य प्रतिमानमस्त्यन्तर्जातेषूत ये जनित्वाः॥
"अदिति ने इन्द्र देव को अनेक मासों और अनेक संवत्सरों तक गर्भ में धारित किया। इन्द्र देव ने यह विरुद्ध कार्य क्यों किया अर्थात गर्भ में बहुत दिनों तक रहकर इन्द्र देव ने माता अदिति को कष्ट दिया"। इन्द्र देव के ऊपर किये गये आक्षेप को सुनकर अदिति कहती हैं, "हे वामदेव! जो उत्पन्न हुए हैं और जो देवादि उत्पन्न होंगे, उनके साथ इन्द्र की तुलना कदापि नहीं हो सकती"। [ऋग्वेद 4.18.4]
अदिति ने उस शक्तिशाली इन्द्र को महीनों वर्षों तक धारण किया था। उस श्रेष्ठ इन्द्रदेव ने अनेक विशिष्ट कार्य किए। उनकी समानता उत्पन्न हुए अथवा आगे उत्पन्न होने वालों में से कोई नहीं कर सकता।
Vamdev accused Indr Dev of staying in the womb of his mother for many months and years, torturing her. Aditi, his mother replied that those who were born and those were going to take birth could not be compared with Indr Dev.
अवद्यमिव मन्यमाना गुहाकरिन्द्रं माता वीर्येणा न्यृष्टम्।
अथोदस्थात्स्वयमत्कं वसान आ रोदसी अपृणाज्जायमानः॥
गह्वर रूप सूतिका गृह में उत्पन्न इन्द्र देव को निन्दनीय मानकर माता ने उन्हें अतिशय सामर्थ्यवान किया। अनन्तर, उत्पन्न होते ही इन्द्र देव ने अपने ओज को धारित करके खड़े हुए और द्यावा-पृथ्वी को अपने तेज से परिपूर्ण कर दिया।[ऋग्वेद 4.18.5]
गह्वर :: गड्ढा, बिल, विवर, गुफा, अँधेरा एवं गहरा स्थान, देवालय, मंदिर, गहरा, घना, दुर्गम; deep, precipice, chasm.
अदिति ने उस इन्द्र को गति देने में समर्थ मानते हुए अदृश्य रूप से धारण किया और फिर इन्द्र देव ने अपनी ही सामर्थ्य से रचित तेज को धारण करते हुए सर्वोच्च वर्ग और आकाश-पृथ्वी दोनों को युक्त किया।
Deeming it disreputable that he should be brought forth in secret, his mother Aditi endowed Indr Dev with extraordinary vigour; therefore, as soon as born he sprung up of his own accord, invested with splendour and filled both heaven and earth.
Mother Aditi nourished Indr Dev secretly, considering him to be capable, keeping him invisible and granted him extraordinary vigour. Thereafter, Indr Dev lit the earth and sky-heaven with his aura-radiance as soon he took birth.
एता अर्षन्त्यललाभवन्तीर्ऋतावरीरिव संक्रोशमानाः।
एता वि पृच्छ किमिदं भनन्ति कमापो अद्रिं परिधिं रुजन्ति॥
"अ-ल-ला शब्द करती हुई अथवा हर्ष ध्वनी करती हुई ये जलवती नदियाँ इन्द्र देव के महत्त्व को प्रकट करने के लिए हर्ष पूर्वक बहुविध शब्द करती हुई बहती है। हे ऋषि! आप इन नदियों से पूछो कि ये क्या बोलती है? यह शब्द इन्द्र देव के माहात्म्य का सूचक है। मेरे पुत्र इन्द्र देव ने ही उदक के आदरक मेघ को विदीर्ण करके जल को प्रवर्तित किया।[ऋग्वेद 4.18.6]
अत्यन्त ध्वनि करती जल से पूर्ण सरिताएँ इन्द्र के महत्त्व को प्रकट करती हुई कहती है कि हे विद्वान! यह सरिताएँ क्या कहती हैं, यह इनसे पूछो। क्या यह इन्द्र देव का यशोगान करती हैं। इन्द्र का यशोगान रोकने वाले मेघ को फाड़कर जल की वर्षा की थी।
The river show their pleasure, generating several thrilling sounds depicting the significance of Indr Dev. Hey Rishi! ask these river what they speak? This statement signify the greatness-importance of Indr Dev. Her son-Indr Dev teared into the clouds and produced rains.
किमु ष्विदस्मै निविदो भनन्तेन्द्रस्यावद्यं दिधिषन्त आपः।
ममैतान्पुत्रो महता वधेन वृत्रं जघन्वाँ असृजद्वि सिन्धून्॥
वृत्र वध से ब्रह्म हत्या रूप पाप को प्राप्त करने वाले इन्द्र देव को वेद वाणी क्या कहती है? जल फेन रूप से इन्द्र देव के पाप को धारित करता है। मेरे पुत्र इन्द्र देव ने महान् वज्र से वृत्रासुर का वध किया और इन नदियों को प्रवाहित किया।[ऋग्वेद 4.18.7]
वृत्र की हत्या करने पर इन्द्र देव को ब्रह्म हत्या का जो पाप लगा, उस सम्बन्ध में वेद वाणी क्या कहती है? इन्द्र देव के उस पाप को जल ने फेन के रूप में धारण किया। इन्द्र देव ने अपने श्रेष्ठ वज्र द्वारा वृत्र को विदीर्ण कर सरिताओं को प्रवाहमान किया।
What is the opinion of Ved regarding the slaying of Vratr leading to the sin of Brahm Hatya-murder of a Brahman? The water bears the foam over it, as the sin of Indr Dev. Aditi's son Indr dev killed Vrata Sur and let the rivers flow.
ममचन त्वा युवतिः परास ममचन त्वा कुषवा जगार।
ममचिदापः शिशवे ममृड्युर्ममच्चिदिन्द्रः सहसोदतिष्ठत्॥
वामदेव कहते हैं, “आपकी युवती माता अदिति ने हर्षित होकर आपको उत्पन्न किया। कुषवा नाम की राक्षसी ने प्रमत्त होकर आपको ग्रास बनाया। हे इन्द्र देव! उत्पन्न होने पर आपको जल समूह ने प्रमत्त होकर सुखी किया"। इन्द्र देव ने हर्षित होकर अपने वीर्य के प्रभाव से सूतिका गृह में राक्षसी को निगलने का प्रयास किया था।[ऋग्वेद 4.18.8]
हे इन्द्र देव! अत्यन्त प्रसन्नता वाली नारी अदिति ने ममतामय होकर तुम्हें जन्म दिया। कुषवा नाम की राक्षसी से तुम्हें अपना ग्रास बनाने का प्रयत्न किया। तुम्हारे उत्पन्न होते ही सुख प्रदान किया। तुम अपनी क्षमता से सूतिका गृह से उस राक्षसी को मार देने को तैयार हुए।
Vam Dev addressed Indr Dev and said that his young mother gave him birth. The intoxicated demoness Kushva engulfed him. Hey Indr Dev! Water bodies made you happy as soon as you were born. Indr Dev became happy and tried to swallow the demoness.
ममच्चन ते मघवन्व्यंसो निविविध्वाँ अप हनू जघान।
अधा निविद्ध उत्तरो बभूवाञ्छिरो दासस्य सं पिणग्वधेन॥
हे धनवान इन्द्र देव! व्यंस नामक राक्षस ने प्रमत्त होकर आपके हनुद्वय (चिबुक के अधोभाग) को विद्ध करके अपहृत किया। हे इन्द्र देव! इसके अनन्तर अधिक बलवान होकर आपने व्यंस राक्षस के सिर को वज्र द्वारा पीस डाला।[ऋग्वेद 4.18.9]
हे समद्धि के स्वामी इन्द्रदेव! मद से परिपूर्ण होकर व्यंस नामक दैत्य ने तुम्हारी ठोढ़ी के आधे हिस्से में आघात पहुँचाया, जब तुमने शक्ति से व्यंस के सिर को वज्र से अच्छी तरह से कुचल डाला।
Hey wealthy-rich Indr Dev! The demon called Vyans struck your chin, under intoxication and abducted you. Thereafter, you became mighty and powdered his head with Vajr.
गृष्टिः ससूव स्थविरं तवागामनाधृष्यं वृषभं तुम्रमिन्द्रम्।
अरीळ्हं वत्सं चरथाय माता स्वयं गातुं तन्व इच्छमानम्॥
सकृत्प्रसूता (एक बार ब्यायी हुई) गौ जिस प्रकार से बछड़े का प्रसव करती है, उसी प्रकार इन्द्र की माता अदिति ने अपनी इच्छा से सञ्चरण करने के लिए इन्द्र देव को प्रसव है। इन्द्र देव अवस्था में वृद्ध, प्रभूत बलशाली, अनभिभवनीय, अभीष्टवर्षी, प्रेरक, अनभि स्वयं गमनक्षम और शरीराभिलाषी हैं।[ऋग्वेद 4.18.10]
जैसे गाय शक्तिशाली बछड़े को उत्पन्न करती है, वैसे ही इन्द्र की जननी अदिति अपनी इच्छा पर चलने वाले, सभी शक्तियों से सम्पन्न, सर्व विजेता इन्द्र को जन्म देती है। वह इन्द्र सभी के प्रेरक, अविनाशी, सर्वव्याप्त, अभीष्टों की वर्षा करने वाले एवं कर्मों का फल देने में सक्षम हैं।
The way a cow give birth to the calf, Mata Aditi channelized-centralised her powers and gave birth to Indr Dev. Indr Dev is possessor of might, power, desires granting, inspiring, all pervading-dynamic and capable of awarding the rewards of endeavours-Karm.
उत माता महिषमन्ववेनदमी त्वा जहति पुत्र देवाः।
अथाब्रवीद् वृत्रमिन्द्रो हनिष्यन्त्सखे विष्णो वितरं विक्रमस्व॥
इन्द्र की माता अदिति ने महिमावान इन्द्र देव से पूछा, "हे मेरे पुत्र इन्द्र देव, अग्नि देव आपको त्याग रहे हैं"। इन्द्र देव ने श्री हरी विष्णु से कहा, "हे मित्र श्री विष्णु! आप यदि वृत्रासुर को मारने की इच्छा करते हैं, तो अत्यन्त पराक्रमशाली होवें"।[ऋग्वेद 4.18.11]
माता अदिति श्रेष्ठ समृद्धि वाले तुम इन्द्र देव की अभिलाषा करती हुई कहती हैं कि हे पुत्र इन्द्र देव! यह सभी विजयाभिलाषी पराक्रमी तुम्हें ग्रहण होते हैं। तब इन्द्रदेव ने कहा, हे विष्णो! तुम वृत्र को वध करने की कामना करते हुए अत्यन्त पराक्रमी बनो।
Indr Dev's mother Mata Aditi, inquired of the mighty Indr Dev, whether the deities, Agni Dev etc. had deserted him? Indr Dev asked Shri Hari Vishnu if he purposed to slay Vrata Sur and become mighty possessing great valour.
कस्ते मातरं विधवामचक्रच्छयुं कस्त्वामजिघांसच्चरन्तम्।
कस्ते देवो अधि मार्डीक आसीद्यत्प्राक्षिणाः पितरं पादगृह्य॥
हे इन्द्रदेव! आपके अतिरिक्त किस देव ने माता को विधवा किया! आप जिस समय शयन कर रहे थे अथवा जाग रहे थे; उस समय किसने आपको मारना चाहा? कौन देवता देने में आपकी अपेक्षा अधिक हैं? किस कारण वश आपने पिता के दोनों चरणों को पकड़कर उनका वध किया?[ऋग्वेद 4.18.12]
हे इन्द्र देव! तुम्हारा कौन सा शत्रु पैरों को पकड़ सकता कर तुम्हारे पिता को
मारकर माता की विधवा बना सकता है? तुमको सोते समय या चलते समय कौन मार सकता है? तुम्हारे अतिरिक्त ऐसा कौन सा देवता है, जो ऊँची पदवी पा सकता है।
Who has made your mother a widow!? Who has sought to slay you while the sleeping or walking!? Which deity has been more gracious than you since you slained the father, having seized him by the foot?
Hey Indr Dev! Who can kill your father holding his legs making your mother a widow!? Who can kill while moving or sleeping?! Which deity other than you can attain a high post, designation?!
अवर्त्या श्रुन आन्त्राणि पेचे न देवेषु विविदे मर्डितारम्।
अपश्यं जायाममहीयमानामधा मै श्येनो मध्वा जभार॥
हमने भूख से पीड़ित होकर कुत्ते की अँतड़ी को पकाकर खाया। हमने देवों के बीच में इन्द्र देव के अतिरिक्त अन्य देव को सुख दायक नहीं पाया। हमने अपनी पत्नी को असम्मानित होते देखा। इसके अनन्तर इन्द्र देव हमारे लिए मधुर जल लावें।[ऋग्वेद 4.18.13]
हमने निर्धनता वश कुत्ते की आत्रों को भी पकाया, तब तुम्हारे लिए देवों में इन्द्रदेव के अतिरिक्त कोई भी सुख प्रदान करने वाला नहीं हुआ। जब हमने अपनी पत्नी को अपमानित होते देखा, तब इन्द्र देव ने ही हमारी सुरक्षा की और मधुर रस प्रदान किया।
We cooked & ate the intestine of the dog due to intolerable hunger. We did not find any other demigod-deity who could grant us comfort. We saw our wife being insulted. Indr Dev granted us solace and offered us water-sweep sap.(21.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (19) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
एवा त्वामिन्द्र वज्रिन्नत्र विश्वे देवासः सुहवास ऊमाः।
महामुभे रोदसी वृद्धमृष्वं निरेकमिवृणते वृत्रहन्ये॥
हे वज्रवान इन्द्र देव! इस यज्ञ में शोभन आह्वान से युक्त तथा रक्षक निखिल देवगण और दोनों द्यावा-पृथ्वी वृत्र वध के लिए एक मात्र आपका ही आवाहन करती हैं। आप स्तूयमान, महान गुणोत्कर्ष से प्रवृद्ध और दर्शनीय हैं।[ऋग्वेद 4.19.1]
हे वज्रिन! इस अनुष्ठान में सुन्दर आह्वान वाले तथा सुरक्षा सामर्थ्य वाले समस्त देवता और अम्बर धरा, वृत्र पतन के लिए केवल तुमको ही भजते हैं। तुम वंदना योग्य एवं गुणों के उत्कर्ष से वृद्धि करते हुए तथा दर्शनीय हो।
Hey Vajr possessing Indr Dev! The earth and sky-heavens invoke you to kill Vratr-demon, in the Yagy. You are praise worthy, possessing great characters-qualities, worship able, worth seen.
अवासृजन्त जिव्रयो न देवा भुवः सम्राळिन्द्र सत्ययोनिः।
अहन्नहिं परिशयानमर्णः प्र वर्तनीररदो विश्वधेनाः॥
हे इन्द्र देव! वृद्ध पिता जिस प्रकार से युवा पुत्र को प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार देवगण आपको असुर वध के लिए प्रेरित करते हैं। हे इन्द्र देव! आप सत्य विकास स्वरूप है। तब से आप समस्त लोकों के अधीश्वर हुए है। जल को लक्ष्य करके परिशयन करने वाले वृत्रासुर का आपने वध किया। सबको प्रसन्न करने वाली नदियों का आपने ही खनन किया।[ऋग्वेद 4.19.2]
हे इन्द्र देव! जैसे वृद्ध पिता अपने पुत्र को शिक्षा प्रदान करता है, वैसे ही देवतागण तुमको राक्षसों के संहार की शिक्षा देते हैं। तुम सत्य के विकसित रूप हो। तुम सभी भुवनों के दाता हो। जल को लक्ष्य कर सोते हुए वृत्र को तुमने मार दिया। सबको सन्तुष्ट करने वाली सरिताओं को तुमने प्रवाहित किया।
Hey Indr Dev! The demigods-deities inspired-encouraged you to kill Vrata Sur. You are embodiment of truth. Since then, you are the leader of all abodes. You killed Vrata Sur resting-sleeping the waters. You desilted-excavated the rivers.
अतृप्णुवन्तं वियतमबुध्यमबुध्यमानं सुषुपाणामिन्द्र।
सप्त प्रति प्रवत आशयानमहिं वज्रेण रिणा अपर्वन्॥
हे इन्द्र देव! आपने भोग में अतृप्त, शिथिलाङ्ग, दुर्विज्ञान, अज्ञान भावापन, सुप्त और सपणशील जल को आच्छादित करके सोने वाले वृत्रासुर को पौर्णमासी में वज्र द्वारा मारा।[ऋग्वेद 4.19.3]
हे इन्द्र देव! तुमने अपृप्त इच्छा वाले अज्ञानी, कमजोर, बुरे विचार वाले, लुप्त एवं शांत जल ढक लेने वाले, विश्राम करते वृत्र की वज्र द्वारा हत्या की।
Hey Indr Dev! You killed Vrata Sur who was not content-dissatisfied, had weak limbs, possessed bad ideas vices-wickedness, ignorant-idiot, lazy, shadowing the waters, sleeping on full moon day.
अक्षोदयच्छवसा क्षाम बुध्नं वार्ण वातस्तविषीभिरिन्द्रः।
दृळ्हान्यौभ्नादुशमान ओजोऽवाभिनत्ककुभः पर्वतानाम्॥
वायु जैसे बल द्वारा जल को हिलाती है, उसी प्रकार परमैश्वर्यवान इन्द्र देव बल द्वारा अन्तरिक्ष को क्षीण जल करके पीस डालते हैं। बलाभिलाषी इन्द्र देव दृढ़ मेघ को भग्न करते हैं और पर्वतों के पक्षों को छिन्न-भिन्न करते हैं।[ऋग्वेद 4.19.4]
पवन अपनी शक्ति से जल को क्षुब्ध करते हैं, वैसे ही परम समृद्धि से परिपूर्ण इन्द्र देव अपनी शक्ति से अम्बर को सूक्ष्म तेज से युक्त कर जल को छिन्न-भिन्न करते हैं। वे जल की अभिलाषा करने वाले इन्द्रदेव बादलों और शैलों को तोड़ डालते हैं।
Indr Dev, by his strength, agitated the exhausted firmament, as wind, by its violent gusts, agitates the water, exulting in his strength, he divided the large clouds and shattered the peaks of the mountains.
The way air shake the water with its power, Indr Dev associate the sky with his energy and tear the clouds into pieces and shatter the peaks of the mountains.
अभि प्र दगुर्जनयो न गर्भं रथाइव प्र ययुः साकमद्रयः।
अतर्पयो विसृत उब्ज ऊर्मीन्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून्॥
हे इन्द्र देव! माताएँ जिस प्रकार पुत्र के निकट गमन करती हैं, उसी प्रकार मरुतों ने आपके निकट गमन किया, जिस प्रकार से वृत्रासुर को मारने के लिए आपके साथ वेगवान रथ गया। आपने विसरणशील नदियों को जल से पूर्ण किया, मेघ को भग्न किया और वृत्रासुर द्वारा आवृत जल को प्रवाहित किया।[ऋग्वेद 4.19.5]
हे इन्द्र देव! जैसे जननी पुत्र की ओर जाती है, वैसे ही मरुत तुम्हारे समीप गए थे। वैसे ही वृत्र वध के लिए तुम्हारे समीप रथ पहुँचा था। तुमने सरिताओं को जल से परिपूर्ण कर दिया। मेघ को विदीर्ण कर वृत्र द्वारा रोके हुए जल को गिरा दिया।
विदीर्ण :: चीयर-फाड़ करना, तोड़ देना; teared-torn, cloven, cleft, laciniate, rimose.
Hey Indr Dev! Marud Gan approached you like the mother who become close to her son and similarly your charoite reached you. You filled the dried rivers with water. You laciniate-teared the clouds and released the water blocked by Vrata Sur.
त्वं महीमवनिं विश्वधेनां तुर्वीतये वय्याय क्षरन्तीम्।
अरमयो नमसैजदर्णः सुतरणाँ अकृणोरिन्द्र सिन्धून्॥
हे इन्द्र देव! आपने महती तथा सबको प्रीति देने वाली और तुर्वीति तथा वय्य राजा के लिए अभीष्ट फल देने वाली भूमि को अन्न-जल से अचल किया तथा हे इन्द्र देव! आपने नदियों को (सुगमता से तैरने के योग्य) बना दिया।[ऋग्वेद 4.19.6]
हे इन्द्र देव! तुम सभी को प्रेम करने वाली तुर्वीति से और सम्राट वय्य के लिए इच्छित फलदायिनी धरा को अन्न से परिपूर्ण कर दिया और जल से युक्त किया था। हे इन्द्र देव तुमने जल को सुविधा पूर्वक तैरने के योग्यतम कर दिया।
You have made the vast, all cherishing and exuberant earth, delighted with abundant food and tremulous water, for the sake of Turviti and Vayy, you have made the rivers easy to be crossed, swimmed.
Hey Indr Dev! You filled the earth with food grains for he sake king Vayy of the Turvas-Turviti, made the river comfortable for swimming.
प्राग्रुवो नभन्वो ३ न वक्वा ध्वस्त्रा अपिन्वद्युवतीर्ऋतज्ञाः।
धन्वान्यज्राँ अपृणक्तृषाणाँ अधोगिन्द्रः स्तर्यो ३ दंसुपत्नीः॥
इन्द्र देव ने शत्रु हिंसक सेना के तुल्य तटध्वंसिनी, जल युक्ता तथा अन्न जनयित्री नदियों को भली-भाँति पूर्ण किया। इन्होंने दस्युओं द्वारा नियन्त्रित गौओं को दुहा।[ऋग्वेद 4.19.7] तट बन्ध
शत्रु का विनाश करने वाली सेना के सम्मुख इन्द्र ने किनारों को तोड़ने वाली जल से पूर्ण अन्नोत्पादिनी नदियों को परिपूर्ण किया, उन्होंने जल विहीन शुष्क प्रदेशों को वर्षा द्वारा पूर्ण किया और प्यासे यात्रियों को शांति प्रदान की। जिन गायों पर राक्षसों ने अधिकार कर लिया था, उस प्रसव से निवृत्र हुई गायों को इन्द्र ने दुहा था।
Dev Raj Indr filled food grain producing rivers with water, which were like the enemy army breaking the embarkment. He milked the cows abducted by the demons.
पूर्वीरुषसः शरदश्च गूर्ता वृत्रं जघन्वाँ असृजद्वि सिन्धून्।
परिष्ठिता अतृणद्बद्बधानाः सीरा इन्द्रः स्त्रवितवे पृथिव्या॥
वृत्रासुर को मारकर इन्द्र ने तमिस्रा द्वारा आच्छादित अनेक उषाओं को तथा संवत्सरों को विमुक्त किया एवं वृत्र द्वारा निरुद्ध जल को भी विमुक्त किया। इन्द्र देव ने मेघ के चारों ओर वर्तमान तथा वृत्र द्वारा अवरुद्ध नदियों को प्रवाहित कर पृथ्वी को तृप्त किया।[ऋग्वेद 4.19.8]
तमिस्रा से ढकी हुई असंख्य उषाओं और वृष्टि को इन्द्र देव ने वृत्र को समाप्त करके विमुक्त किया और वृत्र द्वारा रोकी गई नदियों को धरा पर प्रवाहमान होने के लिए छोड़ा।
Indr Dev killed Vrata Sur and released many Usha & days from darkness releasing waters blocked by Vrata Sur. Dev Raj made the cloud rain and maintained the flow of rivers.
वमृीभिः पुत्रमग्रुवो अदानं निवेशनाद्धरिव आ जभर्थ।
व्य १ न्धो अख्यदहिमाददानो निर्भूदुखच्छित्समरन्त पर्व॥
हे हरि नामक घोड़े वाले इन्द्र देव! आपने उपजिह्विका द्वारा भक्ष्यमान अग्रू पुत्र को दीमक के स्थान से बाहर किया। बाहर किये जाते समय वह अग्रू पुत्र यद्यापि नेत्रहीन था, फिर भी उसने सर्प को अच्छी तरह से देखा। उसके बाद चीटियों के द्वारा काटे गये अङ्गों को आपने जोड़ा।[ऋग्वेद 4.19.9]
हे महान अश्वों के स्वामी इन्द्र देव! उपजिह्वाका द्वारा प्रथक किये अग्रु पुत्र को तुमने दीमक के बिल से निकाला। निकलते समय वह अग्रु पुत्र नेत्र हीन था। तब भी उसने साँप को भली प्रकार देखा। उपजिह्विका द्वारा भक्षण किये अंगों को इन्द्र देव ने जोड़ दिया था।
Hey Indr Dev, master of horses named Hari! You released the son of Agru with your minor-sub tongue from the termite mould. Tough Agru's son was blind yet he saw the snake clearly. Thereafter, you joined his organs-limbs cut by the ants.
प्र ते पूर्वाणि करणानि विप्राविद्वाँ आह विदुषे करांसि।
यथायथा वृष्ण्यानि स्वगूर्तापांसि राजन्नर्याविवेषीः॥
हे राजमान प्राज्ञ इन्द्र देव! आप सर्व वेता है। वर्षण योग्य और स्वयं सम्पन्न मनुष्यों के वृष्टि सम्बन्धी कर्मों को आपने जिस प्रकार से किया, वाम देव उन सकल पुरातन कर्मों का उल्लेख करते है।[ऋग्वेद 4.19.10]
हे बुद्धि मान इन्द्रदेव! तुम सभी कुछ जानते हो। वर्षा के योग्य और प्राणियों को सम्पन्न करने वाली वर्षा सम्बन्धी धर्मों का किस प्रकार तुमने किया था, उन सभी कर्मों का वामदेव ने उल्लेख किया है।
Hey intelligent-prudent Indr Dev! You are enlightened-all knowing. Vam Dev described your ancient deeds-endeavours pertaining to rain, leading to human welfare.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर तथा हम लोगों के द्वारा प्रशंसित होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को आप प्रवृद्ध करते है। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्रों रचते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.19.11]
हे इन्द्र देव! तुम प्राचीन मुनियों द्वारा पूजित बने और हमारे द्वारा भी वंदित किये गये हो। तुम जल के द्वारा नदी को पूर्ण करने के तुल्य प्रार्थना करने वालों के अन्न की वृद्धि करते हो। हे इन्द्र देव ! हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोकों को कहते हैं, जिसके द्वारा हम रथीवान बने तुम्हारी वंदना और परिचर्या करते रहे।
Hey Indr Dev! You were praised by the ancient sages and us filling the rivers with water and granting food grins to the devotees-worshipers. We compose new Strotr-hymns in your honour on becoming the owners of charoite and worship-pray, serve you.(22.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (20) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
आ न इन्द्रो दूरादा न आसादभिष्टिकृदवसे यासदुग्रः।
ओजिष्ठेभिर्नृपतिर्वज्रबाहुः संगे समत्सु तुर्वणिः पृतन्यून्॥
अभीष्टप्रद और तेजस्वी इन्द्र देव! हम लोगों को आश्रय प्रदान करने के लिए दूर से पधारें; हम लोगों को आश्रय प्रदान करने के लिए पास से आगमन करें। वे संग्राम में संगत होने पर शत्रुओं का वध करते हैं। वे वज्रबाहु मनुष्यों के पालक और तेजस्वी मरुतों से युक्त हैं।[ऋग्वेद 4.20.1]
हे इन्द्र देव! तुम अभिलाषाओं के प्रदान करने वाले और तेज से परिपूर्ण हो। तुम हमको आश्रय देने के लिए दूर हो, तो भी आओ, निकट हो तो भी पधारकर हमारी सुरक्षा करो। तुम संग्राम स्थान में शत्रुओं का नाश करते हो। तुम वज्र धारण करने वाले हो। तुम प्राणियों के पालनकर्त्ता एवं तेजस्वी मरुद्गण से युक्त हो।
Hey Indr Dev! You accomplish our desires & possess radiance-aura. Whether far or near come and grant asylum-shelter, protection to us. You kill the enemy in the war, possessing Vajr. You are the nurturer of the living beings and associated with the Marud Gan.
आ न इन्द्रो हरिभिर्यात्वच्छार्वाचीनोऽवसे राधसे च।
तिष्ठाति वज्री मघवा विरप्शीमं यज्ञमनु नो वाजसातौ॥
हम लोगों के अभिमुख वर्ती इन्द्र देव आश्रय और धन प्रदान करने के लिए हम लोगों के पास अश्वों के साथ पधारें। वज्रवान, धनशाली और महान इन्द्र देव युद्ध में उपस्थित होने पर हमारे इस यज्ञ में उपस्थित होवें।[ऋग्वेद 4.20.2]
हमारे सामने आने वाले इन्द्र आश्रय देने और धन प्रदान करने के लिए अपने अश्वों के साथ हमारे समीप आएँ। वे इन्द्र वज्रधारी, धनैश्वर्य से युक्त एवं श्रेष्ठ हैं, युद्ध का अवसर होने पर वे हमारे कार्यों में सहयोगी बनें।
Let Indr Dev granting us asylum, come to us with his horses. Vajr wielding-possessing, rich-wealthy and great Indr Dev join us in the Yagy after the war.
Wield :: रखना, चलाना, बरतना, हिलाना, सँभालना, फिराना, प्रबंध करना, काम में लगाना, हाथ लगाना, शक्ति, अधिकार आदि रखना और उनका प्रयोग-उपयोग करना, हथियार पास रखना और उसे इस्तेमाल करने के लिए तैयार रहना; to have and use power, authority, to hold and be ready to use a weapon.
इमं यज्ञं त्वमस्माकमिन्द्र पुरो दधत्सनिष्यसि क्रतुं नः।
श्वघ्नीव वज्रिन्त्सनये धनानां त्वया वयमर्य आजियेम॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों को पुरःसर करके हमारे द्वारा किये जाने वाले यज्ञों को ग्रहण करें। हे वज्र धर! हम आपके स्तोता हैं। जिस तरह से व्याध हिरणों का शिकार करता है, उसी प्रकार से हम आपके द्वारा धन लाभ के लिए युद्ध में विजय प्राप्त करें।[ऋग्वेद 4.20.3]
हे इन्द्र देव! हमारे साथ सखाभाव रखते हुए हमारे द्वारा किये जाते हुए इस अनुष्ठान को हविपूर्ण करो। हे वज्रिन! हम आपकी प्रार्थना करते हैं। जैसे शिकारी हिरणों का शिकार करता है वैसे हम तुम्हारी शक्ति से धन ग्रहण करने हेतु युद्ध में विजेता हों।
Hey Indr Dev! Accept our offerings in the Yagy as a friend. Hey Vajr possessing Indr Dev! You are our deity. The way a tiger hunt the deer, in the same way you should benefited us with wealth, winning war.
उशन्नु षु णः सुमना उपाके सोमस्य नु सुषुतस्य स्वधावः।
पा इन्द्र प्रतिभृतस्य मध्वः समन्यसा ममदः पृष्ठ्येन॥
हे अन्नवान इन्द्र देव! आप प्रसन्न मन से हम लोगों के समीप आगमन कर हमारी कामना करके उत्तम रूप से अभिषुत, सम्भूत और मादक सोमरस का पान करें एवं माध्यन्दिन सवन में उदीयमान स्तोत्र के साथ सोमपान करके हर्षित होवें।[ऋग्वेद 4.20.4]उदीयमान :: उगता हुआ, उदित होता हुआ, उठता या उभरता हुआ, होनहार, विकासशील, प्रगतिशील, उन्नतिशील; budding, assurgent, ascendant, nascent.
हे इन्द्र देव! तुम अन्नों के दाता हो, तुम प्रसन्न युक्त मन से हमारे नजदीक आओ तथा हमको चाहते हुए उत्तम प्रकार से सिद्ध किये गये सोमरस को पियो। दिन के मध्य वंदना सवन में उज्जवल स्तोत्र सहित हर्ष प्रदायक सोम को ग्रहण करो।
Hey Indr Dev! You are the provider of food grains. Come to us happily, drink the intoxicating Somras extracted by us, during the mid day and enjoy along with the recitation of ascendant, nascent hymns.
वि यो ररप्श ऋषिभिर्नवोभिर्वृक्षो न पक्वः सृण्यो न जेता।
मर्यो न योषामाभिमन्यमानोऽच्छा विवक्मि पुरुहूतमिन्द्रम्॥
जो पके फल वाले वृक्ष के तुल्य एवं आयुध कुशल विजयी व्यक्ति के तुल्य हैं और जो नूतन ऋषियों द्वारा विविध प्रकार से स्तूयमान होते हैं, उन पुरुहूत इन्द्र देव के उद्देश्य से हम प्रार्थना करते हैं। जिस प्रकार से मनुष्य अपनी स्त्री की प्रशंसा करता है।[ऋग्वेद 4.20.5]
पुरुहूत :: जिसका आह्वान बहुतों ने किया हो, जिसकी बहुत से लोगों ने स्तुति की हो; invoked by many.
जो इन्द्र देव पके फल वाले वृक्ष के समान और अस्त्र कुशल विजेता के समान पराक्रमी हैं, जो नये ऋषियों के द्वारा असंख्य तरह से पूजनीय होते हैं, उन इन्द्रदेव के लिए हम प्रशंसा से परिपूर्ण श्लोक उच्चारित करते हैं।
We worship Indr Dev, like a man who praise his wife, who is like the tree granting ripe fruits, expert-skilled in using weapons, winner, praised & invoked by the sages-Rishis. We praise-honour him with hymns.
गिरिर्न यः स्वतवाँ ऋष्व इन्द्रः सनादेव सहसे जात उग्रः।
आदर्ता वज्रं स्थविरं न भीम उनेव कोशं वसुना न्यृष्टम्॥
जो पर्वत के तुल्य प्रवृद्ध और महान हैं, जो तेजस्वी हैं और जो शत्रुओं को अभिभूत करने के लिए सनातन काल में पैदा हुए हैं, वे इन्द्र देव जल द्वारा पूर्ण जलपात्र के तुल्य तेज पूर्ण बृहत वज्र का आदर करते हैं।[ऋग्वेद 4.20.6]
जो शैल के समान विस्तृत हैं, जो तेज से तेजस्वी हैं, जो शत्रुओं को वश में करने के लिए प्राचीन समय में उत्पन्न हुए, वे इन्द्र जल से भरे हुए पात्र के समान अत्यन्त तेजस्वी एवं श्रेष्ठ वज्र के धारण करने वाले हैं।
Indr Dev, who is vast-broad like the mountain, radiant born in ancient-times, eternal, enchant the enemy, respect-honour Vajr like the pot full of water.
न यस्य वर्ता जनुषा न्वस्ति न राधस आमरीता मघस्य।
उद्वावृषाणस्तविषीव उग्रास्मभ्यं दद्धि पुरुहूत संयः॥
हे इन्द्र देव! आपके जन्म से ही कोई निवारक नहीं रहा। यज्ञादि कर्म के लिए आपके द्वारा प्रदत्व धन का नाशक कोई नहीं रहा। हे बलशाली, तेजस्वी, पुरुहूत! आप अभीष्टवर्षी हैं। आप हम लोगों को धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.20.7]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे प्राकट्य समय से ही तुम्हें कोई रोकने वाला नहीं हुआ। यज्ञादि शुभ कार्यों के लिए तुम्हारे द्वारा किये गये धन का पत्तन करने वाला भी कोई नहीं हुआ। वे बलशाली! तुम बहुत ही तेजस्वी और अभिलाषाओं की वृष्टि करने वाले हो। हमारे लिए धन प्रदान करो।
Hey Indr Dev! There is none to obstruct-restrain you since your birth. There is no one to destroy the grants made by you. Hey mighty-powerful, radiant, invoked by many, you are desires accomplishing. Give us money.
ईक्षे रायः क्षयस्य चर्षेणीनामुत व्रजमपवर्तासि गोनाम्।
शिक्षानरः समिथेषु प्रहावान्वस्वो राशिमभिनेतासि भूरिम्॥
हे इन्द्र देव! आप प्रजाओं को धन और घर का पर्यवेक्षण करते हैं और विरोधक असुरों गौओं के समूह को उन्मुक्त करते हैं। हे इन्द्र देव! आप शिक्षा के विषय में प्रजाओं के नेता या शासक हैं और युद्ध में प्रहार करने वाले हैं। आप प्रभूत धनराशि के पार हैं।[ऋग्वेद 4.20.8]
पर्यवेक्षक :: काम की देखभाल करनेवाला अधिकारी; supervisor.
हे इन्द्र देव! तुम प्राणियों के धन एवं ग्रहों के पर्यवेक्षक हो। तुम विघ्न प्रदान करने वाले असुरों से गौओं के दल को युक्त करते हो। तुम शैक्षणिक कार्यों में अग्रणी और युद्ध काल में नेतृत्व कर शत्रुओं पर वार करते हो। तुम उत्पन्न सम्पन्नकर्त्ता हो।
Hey Indr Dev! You supervise the wealth-money and houses of he populace, release the cows from the demons captivity. Hey Indr dev! You are the leader of the populace in educational matters and strike the enemy in the war. You possess grandeur-wealth.
कया तच्छृण्वे शच्या शचिष्ठो यया कृणोति मुहु का चिदृष्वः।
पुरु दानुषे विचयिष्ठो अंहोऽथा दधाति द्रविणं जरित्रे॥
अतिशय प्राज्ञ इन्द्रदेव किस प्रज्ञाबल से विश्रुत होते हैं? महान् इन्द्रदेव जिस प्रज्ञाबल से मुहुर्मुहः कर्मसमूह का सम्पादन करते हैं (उसी के द्वारा विश्रुत हैं)। वे याजकगणों के बहुत से पापों को विनष्ट करते हैं और याजकों को धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.20.9]
तुम शैक्षणिक कार्यों में अग्रणी और युद्ध काल में नेतृत्व कर शत्रुओं पर वार करते हो। तुम उत्पन्न सम्पन्नकर्त्ता हो। वह सबसे अधिक बुद्धि वाले इन्द्रदेव किस वाणी, बल और बुद्धि से परिपूर्ण हैं। किन कार्यों के द्वारा वह श्रेष्ठ इन्द्रदेव बार-बार असंख्य कर्मों को करते हैं। वे मनुष्यों को पापों को समाप्त करते हुए वंदना करने वालों को धन ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।
मा नो मर्धीरा भरा दद्धि तन्नः प्र दाशुषे दातवे भूरि यत्ते।
नव्ये देष्णे शस्ते अस्मिन्त उक्थे प्र ब्रवाम वयमिन्द्र स्तुवन्तः॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों की हिंसा न करें; बल्कि हम लोगों के पोषक बनें। हे इन्द्र देव! आपका जो प्रभूत धन हव्य दाता को दान देने के लिए आपका है, वह धन लाकर हमें दें। हम आपका भजन करते हैं। इस नूतन दान योग्य और प्रशस्त उक्थ में हम आपका विशेष रूप से भजन करते हैं।[ऋग्वेद 4.20.10]
हे इन्द्र देव! हमारा नाश न हो। तुम्हारे लिए जो प्राणी अपने को अर्पित करते हैं उनको अपना लेने योग्य ऐश्वर्य दो। हमारी अर्चना स्वीकार हो।
Hey Indr Dev! Do not vanish us; nurture us. Grant us the money meant for charity-donation for those who make offerings to you. We worship-pray you. Accept our requests.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे इन्द्र देव! आप पूर्व वर्ती ऋषियों द्वारा प्रशंसित होकर तथा हम लोगों के द्वारा स्तुत होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार आप स्तोताओं के अन्न को प्रवृद्ध करते है। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्रों की रचना करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.20.11]
हे इन्द्र देव! तुम प्राचीन काल में ऋषियों एवं अब हमारे द्वारा भी पूज्य हुए हो। तुम नदी के पूर्ण करने वाले जलों के समान हम वंदनाकारियों के अन्न की वृद्धि करते हो। तुम अश्ववान हो, हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोक की उत्पत्ति करते हैं, जिसके द्वारा हम पथ संयुक्त बन तुम्हारी प्रार्थना और परिचर्या करते हैं।
Hey Indr Dev! You were worshiped-prayed by the ancient Rishis-sages. Having been worshiped by us you increase our stock of food grains just like the waters which fill the rivers, on being requested-prayed. We have compose new hymns in your honour so that we possess charoites and become rich.(25.02.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (21) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- पंक्ति, त्रिष्टुप्।
आ यात्विन्द्रोऽवस उप न इह स्तुतः सधमादस्तु शूरः।
वावृधानस्तविषीर्यस्य पूर्वीर्द्यौर्न क्षत्रमभिभूति पुष्यात्॥
जिनका बल प्रभूत है। जो सूर्य के तुल्य अभिभव समर्थ बल का पोषण करते हैं, वे हम लोगों के समीप रक्षा के लिए आवें। पराक्रमवान और प्रवृद्ध इन्द्र देव हमारे साथ प्रसन्न हों।[ऋग्वेद 4.21.1]
प्रभूत :: उत्पन्न, जो हुआ हो, निकला हुआ, उद्गत, बहुत अधिक, प्रचुर, पूर्ण, पूरा, पक्व, पका हुआ, उन्नत, उद्गम, भूत, उद्गम; excellent, outstanding, regeneratory, sufficient, ample, abundant.
वीरेश्वर इन्द्र वंदनाओं द्वारा हमारी सुरक्षा हेतु पधारें। वह वृद्धि को ग्रहण हुए हमारी प्रसन्नता से ही प्रसन्नता को मानें। जो शक्ति, कौशल से सम्पन्न और सूर्य के समान तेजस्वी हैं, वे इन्द्र देव हमको पराजित करने वाले होकर पोषण करें।
May Indr Dev possessing aura-radiance like the Sun, come to us for protection and being praised by us, being the mighty hero, be exhilarated along with us. He possess employ his own over powering vigour.
Let mighty Indr Dev possessing radiance like the Sun, come to protect us. Let him enjoy with us. He possess valour and ample, abundant power, might.
तस्येदिह स्तवथ वृष्ण्यानि तुविद्युम्नस्य तुविराधसो नॄन्।
यस्य क्रतुर्विदथ्यो ३ न सम्राट् साह्वान्तरुत्रो अभ्यस्ति कृष्टीः॥
हे स्तोताओ! यज्ञार्ह सम्राट के तुल्य जिनका अभिभव कारक तथा त्राण कारक कर्म शत्रु सम्बन्धिनी प्रजाओं को अभिभूत करता है, उन प्रभूत यशा तथा अतिशय धन शाली इन्द्र देव के बलभूत नेता मरुतों की आप लोग इस यज्ञ में प्रार्थना करें।[ऋग्वेद 4.21.2]
हे मनुष्यों! यज्ञ आदि शुभ कर्म करने वाला राजा के समान जिनका सबको करने वाला कर्म शत्रुओं की सेना को पराजित करने में सक्षम हैं तथा हमारे रक्षक हैं, उस यशस्वी एवं ऐश्वर्यशाली इन्द्र के पराक्रम के कारण रूप मरुद्गण का इस यज्ञ स्थान में वंदना करो।
Hey humans! Pray-worship Marud Gan for the success of the Yagy, who are the reason behind the valour of revered Indr Dev possessing wealth-riches, grandeur and might, who is capable of crushing the enemy and our protector.
आ यात्विन्द्रो दिव आ पृथिव्या मक्षू समुद्रादुत वा पुरीषात्।
स्वर्णरादवसे नो मरुत्वान्परावतो वा सदनादृतस्य॥
हे इन्द्र देव! हम लोगों को आश्रय देने के लिए मरुतों के साथ स्वर्ग लोक से, भूलोक से, अन्तरिक्ष लोक से, जल से, आदित्य लोक से, दूर देश से और जल के स्थान भूत मेघ लोक से यहाँ पधारें।[ऋग्वेद 4.21.3]
हे इन्द्र देव! हमको शरण देने के लिए स्वर्ग, धरा, अंतरिक्ष, सूर्य-मंडल में या जिस दूर स्थल में भी हो, वही से मरुद्गण के साथ पधारो।
Hey Indr Dev! Come to protect us along with the Marud Gan from heavens, space, earth, water, Adity Lok, distant places and the abode of clouds or where ever you are.
स्थूरस्य रायो बृहतो य ईशे तमु ष्टवाम विदथेष्विन्द्रम्।
यो वायुना जयति गोमतीषु प्र धृष्णुया नयति वस्यो अच्छ॥
जो स्थूल एवं महान् धन के अधिपति हैं, जो प्राण रूप बल द्वारा शत्रु सेना को जीतते हैं, जो प्रगल्भ हैं और जो स्तोताओं को श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं, यज्ञ स्थल में हम उन इन्द्र देव के उद्देश्य से प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.21.4]
प्रगल्भ :: चतुर, होशियार, प्रतिभाशाली, संपन्न बुद्धि वाला, उत्साही, हिम्मती, साहसी, प्रायः बढ़-चढ़कर बोलने वाला, अधिक बोलने वाला, वाचाल, निडर, निर्भय, पुष्ट, प्रौढ़, उद्धत, जिसमें नम्रता न हो, हाज़िर जवाब, समय पर ठीक उत्तर देने वाला; profound, forward, magniloquent.
जो स्थिर और सर्वश्रेष्ठ समृद्धियों के स्वामी हैं, जो प्राण रूप शक्ति से शत्रु की सेनाओं को हराते हैं, जो अत्यन्त कुशल हैं और प्रार्थनाओं को करने वालों को उत्तम धन प्रदान करते हैं, उन शत्रुहन्ता इन्द्रदेव के लिए हम इस यज्ञ स्थान में प्रार्थना करते हैं।
We request-solicit the presence of Indr Dev in our Yagy, who is the owner of great wealth, winner of the enemy, forward, grants money to the devotees.
उप यो नमो नमसि स्तभायन्नियर्ति वाचं जनयन्यजध्यै।
ऋञ्जसानः पुरुवार उक्थैरेन्द्रं कृण्वीत सदनेषु होता॥
जो निखिल लोकों का स्तम्भन करके यज्ञार्थ गर्जनशील वचन को उत्पन्न करते हैं और हव्य प्राप्त करके वृष्टि द्वारा अन्न प्रदान करते हैं, जो प्रसाधन योग्य तथा उक्थ (स्तोत्र, hymns) द्वारा स्तुति योग्य हैं, यज्ञ गृह में होता उन इन्द्र देव का आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.21.5]
स्तम्भन :: निश्चल, निस्तब्ध, सुन्न; repressed, appalled, paralyzed, stunted, transfixed, slaphappy, paralysed, flabbergasted, restrained, benumbed, spaced out.
उक्थ :: श्लोक, स्तोत्र; hymns.
जो सभी संसार को स्तंभित करते हुए गर्जन शब्द कों उत्पन्न करते हैं और हवियाँ स्वीकार कर वर्षा द्वारा अन्न प्रदान करते हैं, जो उत्तम स्तोत्र द्वारा श्लोक के पात्र हैं, उन इन्द्र को यज्ञ-स्थान में हम आमंत्रित करते हैं।
We invoke Indr Dev, who stun all abodes, create roaring-thundering sound for the Yagy, accept offerings and grant food grains, deserve worship-prayers with excellent Strotr, at our Yagy site.
धिषा यदि धिषण्यन्तः सरण्यान्त्सदन्तो अद्रिमौशिजस्य गोहे।
आ दुरोषाः पास्त्यस्य होता यो नो महान्त्संवरणेषु वह्निः॥
जब इन्द्र देव की प्रार्थना के अभिलाषी याजक गण के गृह में निवासकारी स्तोता युद्ध प्रार्थना सहित उनके निकट उपगत होते हैं, तब वे इन्द्र देव आवें। वे करें। वे याजक गणों के होता है। उनका क्रोध अत्यन्त भयंकर है।[ऋग्वेद 4.21.6]
जब इन्द्र देव की प्रार्थना की इच्छा करने वाले के गृह में निवास करते हुए प्रार्थना करने वाले इन्द्र देव के सामने श्लोक उपस्थित हों, तब वे इन्द्र देव प्रस्थान करें। वे युद्ध भूमि में हमारे सहायक हों।
When the repeaters of his commendations, abiding in the dwelling of the worshipper, approach Indr Dev with praise, may he who is our great sustainer in conflicts, whose wrath is difficult to be appeased, becomes the ministering priest of the master of the house.
When the hosts-priests staying in the house of the Ritviz, make prayers devoted to war, let Indr Dev come at that occasion. His wrath-anger is tremendous.
सत्रा यदींभार्वरस्य वृष्णः सिषक्ति शुष्मः स्तुवते भराय।
गुहा यदीमौशिजस्थ गोहे प्र यद्धिये प्रायसे मदाय॥
जगद्भर्ता अर्थात् जगत का पालन-पोषण करने वाले प्रजापति के पुत्र एवं अभीष्टवर्षी इन्द्र देव का बल स्तोत्र कारी यजमानों की सेवा करता है। वह बल वास्तव में याजक गणों के भरण के लिए गुहारूप हृदय उत्पन्न होता है, यजमानों के गृह और कर्म में वास्तव में अवस्थान करता है तथा यजमानों की अभीष्ट प्राप्ति और हर्ष के लिए निःसंदेह वह बल उत्पन्न होता है। इन्द्र देव का बल यजमानों का सदैव पालन करता है।[ऋग्वेद 4.21.7]
वे इन्द्र देव अत्यन्त तेज वाले यजमानों के होता रूप हैं। प्रजापति के पुत्र, संसार का पालन-पोषण करने वाले, इच्छाओं की वर्षा करने वाले, इन्द्र का बल स्तोता यजमान का रक्षक है। वह शक्ति यजमानों का पालन करने के लिए शरीर के गुफा रूपी मन में प्रकट होती है। वह शक्ति यजमानों के घरों और कर्मों में व्याप्त होती हुई हर्ष और अभीष्ट प्राप्ति के लिए उत्पन्न होती हुई सदैव पोषण करती है।
Desires fulfilling-accomplishing, nurtures the universe & the hosts, son of Prajapati, Indr Dev is like the host of the Ritviz. His might, valour takes care of the Ritviz & protects them. His power appear in the innerself of the Ritviz, generating happiness, pervade their homes & endeavours.
वि यद्वरांसि पर्वतस्य वृण्वे पयोभिर्जिन्वे अपां जवांसि।
विदगौरस्य गवयस्य गोहे यदी वाजाय सुध्यो ३ वहन्ति॥
इन्द्र देव ने मेघ के द्वार को अपावृत किया और जल के वेग को जल समूह द्वारा परिपूर्ण किया; इसलिए जब सुकर्मा याजक गण इन्द्र देव को अन्न प्रदान करते हैं, तब वे याचकों को गौर मृग और गवय मृग प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.21.8]
इन्द्र देव ने बादल के द्वार को खोल डाला। जल की चाल को युक्त किया। जब श्रेष्ठ कार्य वाले यजमान इन्द्रदेव को हवियाँ प्रदान करते हैं। तब वे गौ आदि धन की प्राप्ति करते हैं।
Indr Dev opened the source of clouds and accelerated the flow of waters. The Ritviz made offerings of food grains for Indr Dev and in return they got cows & wealth.
भद्रा ते हस्ता सुकृतोत पाणी प्रयन्तारा स्तुवते राध इन्द्र।
का ते निषत्तिः किमु नो ममत्सि किं नोदुदु हर्षसे दातवा उ॥
हे इन्द्र देव! आपका कल्याण कारक हस्त द्वय (दोनों हाथ) सत्कर्म का अनुष्ठान करता है। एवं आपका हस्त द्वय याजक गण को धन प्रदान करता है। हे इन्द्र देव! आपकी स्थिति क्या है? क्यों आप हम लोगों को हर्षित नहीं करते? क्यों आप हम लोगों को धन देने के लिए प्रसन्न नहीं होते?[ऋग्वेद 4.21.9]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे दोनों हाथ कल्याणकारी हैं। हे इन्द्र देव! तुम्हारे उच्च पद की क्या स्थिति है? तुम हमको धन प्रदान करने हेतु हर्षित क्यों नहीं होते?
Hey Indr Dev! Both of your hands are busy in welfare, virtuous deeds granting money to the Ritviz. What's your position!? Don't you become happy having provided us riches?!
एवा वस्व इन्द्रः सत्यः सम्राड्ढन्ता वृत्रं वरिवः पूरवे कः।
पुरुष्टुत क्रत्वा नः शग्धि रायो भक्षीय तेऽवसो दैव्यस्य॥
इस प्रकार प्रार्थित होकर सत्यवान, धनेश्वर और वृत्रहन्ता इन्द्र देव याजक गणों को धन देते हैं। हे बहु स्तुत! हम लोगों की प्रार्थना के लिए आप हमें धन-धान्य प्रदान करें। जिससे हम दिव्य ऐश्वर्य का सेवन कर सकें।[ऋग्वेद 4.21.10]
सत्य से परिपूर्ण, धनों के दाता वृत्र को मारने वाले इन्द्र की यह स्तुति किये जाने पर वे यजमानों को प्रदान करते हैं। हे इन्द्रदेव! तुम अनेकों द्वारा पूजनीय हो। हमारी वंदना श्रवण कर हमें धन प्रदान करो जिससे हम दिव्य ऐश्वर्य का उपयोग कर सकें।
On being worshiped-prayed truthful, donator of riches, killer of Vratr Indr Dev grants wealth to the Ritviz. Hey Indr Dev! Worshiped by several people, grant us wealth & food grains so that we can enjoy divine grandeur.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रार्थित होकर तथा हम लोगों के द्वारा स्तूयमान होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को आप प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्रों का गायन करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.21.11]
हे इन्द्र देव! तुम पूर्व कालीन ऋषियों द्वारा वंदित हुए हो। अब हमारे द्वारा वंदनीय होकर जल द्वारा नदी को पूर्ण करने वाले के तुल्य वंदना करने वालों के अन्न की वृद्धि करो। हे अश्ववान इन्द्र देव! हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोक रचते हैं। जिसके द्वारा हम श्रेष्ठ रथ से परिपूर्ण हुए तुम्हारा पूजन और परिचर्या करते रहें।
Hey Indr Dev! Prayed-worshiped by ancient sages-Rishis, praised by us, you fill our godown-stores with food grains, just as the water fills the river. Hey the master of horses named Hari we compose new hymns in your honour-praise, so that we posses chariots and continue serving you.(01.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (22) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
यन्न इन्द्रो जुजुषे यच्च यष्टि तन्नो महान्करति शुष्या चित्।
ब्रह्म स्तोमं मघवा सोममुक्था यो अश्मानं शवसा बिभ्रदेति॥
महान बलवान इन्द्र देव हम लोगों के हविष्यान्न का सेवन करते हैं। वे धनवान हैं। वे वज्र धारित करके बल से युक्त होकर आगमन करते हैं। इन्द्र देव हव्य, स्तोम, सोमरस और प्रार्थना को स्वीकार करते हैं।[ऋग्वेद 4.22.1]
हे महा बलिष्ठ इन्द्र देव! हमारा हव्य रूप अन्न भक्षण करते हैं। वे समृद्धिवान वज्र धारण कर, बलशाली बनकर आते हैं। हविरन्न, प्रार्थना, सोम तथा श्लोकों को प्राप्त करते हैं।
Mighty, great Indr Dev accept our offerings of food grains. he is rich. He arrives wielding Vajr becoming powerful. He accept our prayers, offerings, Somras, Strotr-hymns.
वृषा वृषन्धिं चतुरश्रिमस्यनुग्रो बाहुभ्यां नृतमः शचीवान्।
श्रिये परुष्णीमुषमाण ऊर्णां यस्या पर्वाणि सख्याय विव्ये॥
अभीष्टवर्षी इन्द्र देव दोनों बाहुओं से वृष्टि कारी चतुर्धारा विशिष्ट वज्र को शत्रुओं के ऊपर फेंकते हैं। वे उग्र, नेतृ श्रेष्ठ और कर्मवान होकर आच्छादन कारिणी परुष्णी नदी की आश्रय के लिए सेवा करते हैं। इन्होंने परुष्णी के भिन्न-भिन्न प्रदेश को मित्रता के लिए आवृत्त किया।[ऋग्वेद 4.22.2]
वे इन्द्रदेव इच्छाओं की वृष्टि करने वाले हैं। वे विकाराल कार्य वाले, अग्रणी करने वाले बनकर परुष्णी नदी को आश्रय देने के लिए पूर्ण करते हैं। उन इन्द्र ने परुष्णी नदी को मंत्रों के कर्म के लिए सम्पन्न किया।
Desires-accomplishments fulfilling, rain producing Indr Dev, launch four edged Vajr with both hands over the enemies. The great leader turn furious, duty bound & serve Parushni river granting protection to her. He pervaded various regions of Parushni river friendly.
यो देवो देवतमो जायमानो महो वाजेभिर्महद्भिश्च शुष्मैः।
दधानो वज्रं बाह्वोरुशन्तं द्याममेन रेजयत्प्र भूम॥
जो दीप्तिमान, जो दातृ श्रेष्ठ और जो उत्पन्न होते ही प्रभूत अन्न तथा महाबल से युक्त हुए, वे दोनों बाहुओं में कामयमान वज्र धारित करके बल द्वारा द्युलोक और भूलोक को प्रकम्पित करते हैं।[ऋग्वेद 4.22.3]
जो अत्यन्त प्रकाशवान, उत्तम दानी, उत्पन्न होते ही अन्न और अत्यन्त शक्तिशाली हो गए। वे इन्द्र दोनों भुजाओं में वज्र उठाकर अपनी शक्ति से नभ और पृथ्वी को कंपा देते थे।
Excellent donor, radiant turn mighty-powerful as soon as he took birth and possessed a lot of food grains. He wield Vajr in both hands and shake the heaven and earth.
विश्वा रोधांसि प्रवतश्च पूर्वीर्द्यौर्ऋष्वाज्जनिमन्नेजत क्षाः।
आ मातरा भरति शुष्म्या गोर्नृवत्परिज्मन्नोनुवन्त वाताः॥
महान इन्द्र देव के जन्म होने पर समस्त पर्वत, अनेक समुद्र, द्युलोक और पृथ्वी उनके भय से कम्पित हुई। बलवान इन्द्र देव गतिशील सूर्य के माता-पिता द्यावा-पृथ्वी को धारित करते हैं। उनके द्वारा प्रेरित होकर वायु मनुष्य के तुल्य शब्द करती है।[ऋग्वेद 4.22.4]
उन श्रेष्ठ इन्द्र के प्राकट्य पर सभी शैल, सभी समुद्र, नभ और धरती उनके डर से कंपित हो गए। वे बलशाली, इन्द्रदेव गतिमान आदित्य, माता-पिता, अम्बर, धरा को धारण करते हैं। इन्द्र देव द्वारा प्रेरणा प्राप्त पवन मनुष्य के तुल्य ध्वनिकारी होता है।
The moment Indr Dev, evolved, the mountains, ocean, heavens and the earth trembled due to his fear. Mighty Indr Dev support the father of Sun, the earth and sky. Air inspired by him sound like the humans.
ता तू त इन्द्र महतो महानि विश्वेष्वित्सवनेषु प्रवाच्या।
यच्छूर धृष्णो धृषता दधृष्वानहिं वज्रेण शवसाविवेषीः॥
हे इन्द्र देव! आप महान हैं, आपका कर्म महान है और आप समस्त सवन में स्तुति योग्य हैं। हे प्रगल्भ, शूर, इन्द्र देव! आपने सम्पूर्ण लोक को धारित करके धर्षणशील वज्र द्वारा बल पूर्वक अहि को विनष्ट कर दिया।[ऋग्वेद 4.22.5]
हे इन्द्र देव! तुम सर्वश्रेष्ठ हो, तुम्हारा कार्य महत्त्वशील है और तुम समस्त सवनों में वंदनाओं के पात्र हो। तुम अत्यन्त मेधावी एवं पराक्रमी हो। तुमने शक्ति पूर्वक अपने वज्र से अहि का पतन किया था और समस्त लोकों को धारण किया था।
Hey Indr Dev! You are great. Your endeavours-efforts are great. You deserve worship-prayers during the three segments of the day. Hey intelligent-prudent, brave Indr Dev! You support the entire universe and killed Ahi-demon with you Vajr forcibly.
ता तू ते सत्या तुविनृम्ण विश्वा प्र धेनवः सिस्रते वृष्ण ऊध्नः।
अधा ह त्वद्वृषमणो भियानाः प्र सिन्धवो जवसा चक्रमन्त॥
हे अधिक बलशाली इन्द्र देव! आपके वे सकल कर्म निश्चय ही सत्य हैं। हे इन्द्र देव! आप अभीष्टवर्षी है। आपके भय से गौएँ अपने ऊधः प्रदेशों में दूध टपकाती हैं। हे हर्षण शील! नदियाँ आपके भय से वेग पूर्वक प्रवाहित होती हैं।
हे इन्द्र देव! तुम अत्यन्त शक्तिशाली हो। तुम्हारे सभी कर्म भय से ओत-प्रोत हैं। तुम अभीष्टों की वर्षा करने वाले हो। तुम्हारे डर से गौएँ दूध की रक्षक हैं। नदियाँ तुम्हारे डर से प्रवाहित होती हैं।
Hey mighty-powerful Indr Dev! Your endeavours are truthful. You grant-accomplish desires. Cows yield milk due to your fear. The river maintain their flow at high speed due to your fear.
अत्राह ते हरिवस्ता उ देवीरवोभिरिन्द्र स्तवन्त स्वसारः।
यत्सीमनु प्र मुचो बद्बधाना दीर्घामनु प्रसितिं स्यन्दयध्यै॥
हे हरि वान इन्द्र देव! जब आपने वृत्र द्वारा बद्ध इन नदियों को दीर्घ कालिक बन्धन के अनन्तर प्रवाहित होने के लिए मुक्त किया, तब उसी समय वे प्रसिद्ध द्युतिमती नदियाँ आपके द्वारा रक्षित होने के लिए आपका प्रार्थना करती थीं।[ऋग्वेद 4.22.7]
हे अश्व वान इन्द्र देव! जब तुमने वृत्र द्वारा रोकी गयी इन नदियों को बहुत कालो परान्त प्रवाहमान के लिए छोड़ा, तभी उसी समय वे सुन्दर नदियाँ तुम्हारी शरण के लिए प्रार्थना करती थीं।
Hey the master of horses named Hari, Indr Dev! The beautiful rivers blocked by Vratr used to worship-pray you, when you released them.
पिपीळे अंशुर्मद्यो न सिन्धुरा त्वा शमी शशमानस्य शक्तिः। अस्मद्र्यक्शुशुचानस्य यम्या आशुर्न रश्मि तुव्योजसं गोः॥
हर्ष जनक सोम निष्पीड़ित हुआ है, स्पन्दमान होकर यह आपके निकट आगमन करे। शीघ्र गामी आरोही गमनशील अश्व की दृढ़बल्गा धारण करके जिस प्रकार से अश्व को प्रेरित करता है, उसी प्रकार आप दीप्तिमान स्तोता की प्रार्थना को हमारे निकट प्रेरित करें।[ऋग्वेद 4.22.8]
हर्षोत्पादक सोम सिद्धस्थ हुआ। वह गतिमान होकर तुम्हारे समीप आए। तीव्रगामी सवार चलने वाले अश्व की लगाम पकड़कर जैसे उसे प्रेरणा देता है, उसी प्रकार तुम पवित्र कर्म वाले स्तोता की वंदना को प्रेरणा प्रदान करो।
Pleasure generating Somras has been extracted for you, move quickly to drink it. The manner in which a fast moving rider holds the reins of the horse and inspire-kick him, like wise direct-inspire the prayers of the virtuous hosts to us.
अस्मे वर्षिष्ठा कृणुहि ज्येष्ठा नृम्णानि सत्रा सहुरे सहांसि।
अस्मभ्यं वृत्रा सुहनानि रन्धि जहि वधर्वनुषो मर्त्यस्य॥
हे सहन शील इन्द्र देव! आप सर्वदा शत्रुओं का नाश करने करने वाला, प्रवृद्ध और प्रशस्त बल हम लोगों को प्रदान करें। वध योग्य शत्रुओं को हमारे वशी भूत करें। हिंसक मनुष्यों के अस्त्रों को नष्ट करें।[ऋग्वेद 4.22.9]
हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं को हमेशा हराने वाला श्रेष्ठ बल हमें दो। मृत करने योग्य शत्रुओं को हमारे अधिकार में करो और हिंसा करेन वाले विरोधियों के हथियारों का पतन करो।
Hey tolerant Indr Dev! Grant us the strength, power, might to us to kill-eliminate the enemy. Let the enemy fit for slaying, come under under our control. Destroy the weapons-Astr of the enemy.
TOLERANT :: सहनशील, सहने योग्य, सहिष्णु; large hearted, patient, passive, staying, bearable, endurable.
अस्माकमित्सु शृणुहि त्वमिन्द्रास्मभ्यं चित्राँ उप माहि वाजान्।
अस्मभ्यं विश्वा इषणः पुरंधीरस्माकं सु मघवन्बोधि गोदाः॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों की प्रार्थना श्रवण करें। हम लोगों को विविध प्रकार का अन्न प्रदान करें। हमारे लिए समस्त बुद्धि प्रेरित करें। हमारे लिए आप गौ प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.22.10]
हे इन्द्र देव! हमारी प्रार्थना को सुनो। हमको विविध भाँति का अध्ययन आदि प्रदान करो। हमारे लिए मतियों की शिक्षा प्रदान करो और हमको धेनुएँ प्रदान करो।
Hey Indr Dev! Listen-respond to our prayers. Give us various kinds of food grains. Inspire-motivate our intelligence. Grant us cows.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रार्थित होकर तथा हम लोगों के द्वारा प्रशंसित होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्रों का गान करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.22.11]
हे इन्द्र देव! तुम प्राचीन ऋषियों द्वारा पूजनीय, हम भी अब तुम्हारी वंदना करते हैं। तुम जल द्वारा नदी को पूर्ण करने के समान वदंना करने वालों के लिए अन्न की वृद्धि करते हो। हे इन्द्र! तुम अश्वों के दाता हो। हम तुम्हारे लिए नए श्लोक की रचना करते हैं। जिससे हम रथ वाले बनकर तुम्हारी वंदना और परिचर्या करते रहें।
Hey Indr Dev! The manner in which you fill the rivers with water on being requested by the ancient sages-Rishis, in the same manner grant food grains to the hosts-devotees. Hey Indr Dev! We pray you with the beautiful Strotr, so that we possess charoite and keep on serving you.(03.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (23) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
कथा महामवृधत्कस्य होतुर्यज्ञं जुषाणो अभि सोममूधः।
पिबन्नुशानो जुषमाणो अन्धो ववक्ष ऋष्वः शुचते धनाय॥
हम लोगों की प्रार्थना महान इन्द्र देव को किस प्रकार से वर्द्धित करेगी? वे किस होता के यज्ञ में प्रसन्न होकर आगमन करते हैं? महान इन्द्र देव सोम रस का आस्वादन करते हुए तथा अन्न की कामना और सेवा करते हुए किस याजकगण को देने के लिए प्रदीप्त धन को धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.23.1]
हमारी वन्दना इन्द्र देव को किस प्रकार वृद्धि करेंगी? वे किस होता के अनुष्ठान में प्रेम भाव से पधारते हैं । इन्द्र देव श्रेष्ठ हैं। वे सोमरस का स्वाद लेते हुए तथा हवि की अभिलाषा करते हुए उज्जवल धन को किस यजमान के लिए धारण करते हैं?
How can our prayers-worship promote-boost Indr Dev?! In whose-the host's Yagy, he join-participate?! Great Indr Dev sips-drink Somras & grants riches to the host who wish to have food grains and serve him.
को अस्य वीरः सधमादमाप समानंश सुमतिभिः को अस्य।
कदस्य चित्रं चिकिते कदूती वृधे भुवच्छशमानस्य यज्योः॥
कौन वीर इन्द्रदेव के साथ सोमपान करता है? कौन व्यक्ति इनके अनुग्रह को प्राप्त करता है? कब इनके विचित्र धन वितरित होंगे? कब ये स्तोता याजकगण को वर्द्धित करने के लिए रक्षा युक्त होंगे?[ऋग्वेद 4.23.2]
इन्द्र सहित कौन सोम रस पियेगा? कौन उनकी दया प्राप्त करेगा? उनका अलौकिक धन कब बाँटा जायेगा? अपने श्लोक को बढ़ाने के लिए किसकी रक्षा करेंगे? हे इन्द्र! तुम श्रेष्ठ यश से युक्त होकर होता की बात कैसे श्रवण करते हो?
Who is the brave person who will enjoy Somras with Devraj Indr?! Who pleases him and gets his favours?! When will his amazing riches be distributed?! When will these Stota-Ritviz be protected to flourish-accomplish their desirous?!
कथा शृणोति हूयमानमिन्द्रः कथा शृण्वन्नवसामस्य वेद।
का अस्य पूर्वीरुपमातयो ह कथैनमाहुः पपुरिं जरित्रे॥
हे इन्द्र देव! परमैश्वर्य से युक्त होकर आप होता की कथा को क्योंकर श्रवण करते हैं? स्तोत्रों को सुनकर प्रार्थना करने वाले होता की रक्षण कथा को क्योंकर जानते हैं? इन्द्र देव के पुरातन दान कौन हैं? वे दान इन्द्र देव को स्तोताओं की अभिलाषा के पूरक क्यों कहते हैं? [ऋग्वेद 4.23.3]
तुम श्लोकों को सुनकर ही वंदनाकर्त्ता की सुरक्षा को कैसे जानते हो? तुम्हारे प्राचीन दान कौन से हैं? तुम्हारे वे दान वंदनाकारी की कामना को पूर्ण करने वाले क्यों कहे जाते हैं?
How is that Indr Dev hears (the worshipper) who invokes him and hearing, how does he know his necessities? What are his gifts of old; why have they termed him the fulfiller (of the desires) of him who offers praise?
Hey Indr Dev! Blessed with Ultimate grandeur, how do you respond to the prayers of the devotees?! How do you manage to protect the devotee?! What are the tales of charity of Indr Dev? Why these donations are related to accomplishments of the desires of the devotees?
कथा सबाधः शशमानो अस्य नशदभि द्रविणं दीध्यानः।
देवो भुवन्नवेदा म ऋतानां नमो जगृभ्वाँ अभियज्जुजोषत्॥
जो याजकगण पीड़ा युक्त होकर इन्द्र देव की प्रार्थना करते हैं और यज्ञ द्वारा दीप्ति युक्त होते हैं, वे किस प्रकार से इन्द्र सम्बन्धी धन प्राप्त करते हैं? जब द्युतिमान इन्द्र देव हव्य ग्रहण करके हमारे ऊपर प्रसन्न होते हैं, तब वे हमारी प्रार्थना को विशेष रूप से जानते हैं।[ऋग्वेद 4.23.4]
जो यजमान दुख में पड़कर इन्द्र देव की प्रार्थना करते और अनुष्ठान के द्वारा ज्योति पाते हैं, वे इन्द्र देव के धन को कैसे ग्रहण करते हैं। जब ज्योतिवान इन्द्र देव सेवन करके हम पर प्रसन्न होते हैं, तब वे हमारे श्लोकों को ठीक तरह से समझते हैं।
How do the Ritviz get money-wealth from Indr Dev, when they worship-pray to him under distress-pain, conducting the Yagy? Radiant Indr Dev answer our prayers when he accept our offerings and become happy with us.
कथा कदस्या उषसो व्युष्टौ देवो मर्तस्य सख्यं जुजोष।
कथा कदस्य सख्यं सखिभ्यो ये अस्मिन्कामं सुयुजं ततस्त्रे॥
द्योतमान इन्द्र देव उषा के प्रारम्भ में (प्रभात में) किस प्रकार और कब मनुष्यों के बन्धुत्व की सेवा करते हैं? जो होता इनके उद्देश्य से सुयोग तथा कमनीय हव्य को विस्तारित करते हैं, उन बन्धुओं के प्रति कब और किस प्रकार से अपनी मित्रता को इन्द्र देव प्रकाशित करते हैं?[ऋग्वेद 4.23.5]
प्रकाशवान इन्द्र उषा बेला में कब और किस प्रकार प्राणियों में सखा भाव बनाते हैं? इन्द्र देव के लिए जो होता सुन्दर हव्य को बढ़ाते हैं। तब उनके प्रति इन्द्र कब और कैसे अपना सखा भाव प्रदर्शित करते हैं?
How & when does Indr Dev generate brotherhood with the humans in the morning-dawn, Usha? How & when does Indr Dev extend friendship with the hosts-Ritviz accepting the beautiful offerings by them?
किमादमत्रं सख्यं सखिभ्यः कदा नु ते भ्रात्रं प्र ब्रवाम।
श्रिये सुदृशो वपुरस्य सर्गाः स्व १ र्ण चित्रतममिष आ गोः॥
हे इन्द्र देव! हम याजक आपके शत्रु पराभवकारी मित्र को स्तोताओं के निकट किस प्रकार से भली-भाँति कहेंगे? कब हम आपके भ्रातृत्व का प्रचार करेंगे? सुदर्शन इन्द्र देव का उद्योग स्तोताओं के कल्याण लिए होता है। सूर्य के तुल्य गतिशील इन्द्र देव का अतिशय दर्शनीय शरीर सभी के द्वारा अभिलषित है।[ऋग्वेद 4.23.6]
हे इन्द्र देव! यजमान शत्रु को पराजित करने वाले तुम्हारे सखा भाव को किस प्रकार वंदना करने वालों से कहेगी? कब हम तुम्हारे बन्धु भाव को प्रचारित करेंगे? श्रेष्ठ दर्शन करने वाले इन्द्र देव के समस्त कर्म वंदना करने वालों के लिए सुख कारक होते हैं। सूर्य के समान अत्यन्त दर्शनीय इन्द्र देव के शरीर की सभी अभिलाषा करते हैं।
Hey Indr Dev! How can we recite the Strotr-hymns meant for the destruction of the enemy? when will we extend our brotherhood? Endeavors of Indr Dev are aimed at the benefit of the Ritviz. Invocation of dynamic Indr Dev like the Sun, is pleasant for the devotees-Ritviz.
द्रुहं जिघांसन्ध्वरसमनिन्द्रां तेतिक्ते तिग्मा तुजसे अनीका।
ऋणा चिद्यत्र ऋणया न उग्रो दूरे अज्ञाता उषसो बबाधे॥
द्रोह करने वाली, हिंसा करने वाली तथा इन्द्र देव को न जानने वाली राक्षसी को मारने के लिए पूर्व से ही तीक्ष्ण आयुधों को अत्यन्त तीक्ष्ण करते हैं। ऋण भी हम लोगों को उषा काल में बाधित करता है, ऋण विनाशक बलवान इन्द्र देव उन उषाओं को दूर से ही अज्ञात भाव से पीड़ित करते हैं।[ऋग्वेद 4.23.7]
द्रोह :: नमकहरामी, बेवफ़ाई, राज-द्रोहिता, दुष्टता, हानिकरता, नुक़सानदेहता, कपट, द्वेष, डाह, दुष्ट भाव, बदख़्वाहता; malignancy, disloyalty, malevolence.
द्रोह और हिंसा करने वाली, इन्द्र की शक्ति को न जानने वाली असुरों को मारने के लिए वे पहले से ही शस्त्रों को तेज रखते हैं। जैसे ऋणि व्यक्ति सभी धन को समाप्त करता है, वैसे ही इन्द्र देव उन उषाओं को पीड़ित करते हैं।
The weapons are sharpened prior-before killing the demoness possessing envy, malevolence and violence. Indr Dev discharge loans that trouble a person in the morning-dawn calming Usha.
Loans haunt every one. Payment of loans start troubling right with the beginning of the day.
ऋतस्य हि शुरुधः सन्ति पूर्वीर्ऋतस्य धीतिर्वृजिनानि हन्ति।
ऋतस्य श्लोको बधिरा ततर्द कर्णा बुधानः शुचमान आयोः॥
ऋत (सत्य, आदित्य अथवा यज्ञ) देव के पास बहुत जल है। ऋतदेव की प्रार्थना पाप को नष्ट करती है। ऋतदेव का बोध योग्य तथा दीप्तिमान् स्तुति वाक्य मनुष्यों के बधिर कर्ण (जिन्हें सुनाई नहीं देता) में भी प्रवेश पाता है।[ऋग्वेद 4.23.8]
ऋतु देव अनेक जल से परिपूर्ण हैं। उनकी प्रार्थना पापों को दूरस्थ करती है। उनको ज्ञान प्रदान करने वाली प्रार्थना बहरे व्यक्ति के भी कानों में पहुँच जाती है।
Rit Dev (Truth, Adity-Sun, Yagy) possess plenty of water. His prayer-worship destroys sin. Acknowledgement-awareness of Rit Dev leads to hearing by the deaf, who are devoted to prayers-worship.
ऋतस्य दृळ्हा धरुणानि सन्ति पुरूणि चद्रा वपुषे वपूंषि।
ऋतेन दीर्घमिषणन्त पृक्ष ऋतेन गाव ऋतमा विवेशुः॥
वयुष्मान् ऋतदेव के दृढ़, धारक, आह्लादक आदि अनेक रूप हैं। लोग ऋतदेव के निकट प्रभूत अन्न की इच्छा करते हैं। ऋतदेव द्वारा गौएँ दक्षिणा रूप से यज्ञ में प्रवेश करती हैं।[ऋग्वेद 4.23.9]
ऋतु देव के असंख्य रूप हैं। तपस्वीगण उनसे अन्न की विनती करते हैं। इनके द्वारा धेनु दक्षिणा के रूप में अनुष्ठान में पधारती हैं।
Rit Dev has several forms like determined, bearer and blissful. People-Humans request him for granting food grains. Cows come to the Yagy for Dakshina-donating (to Brahmans).
ऋतं येमान ऋतमिद्वनोत्यृतस्य शुष्मस्तुरया उ गव्युः।
ऋताय पृथ्वी बहुले गभीरे ऋताय धेनू परमे दुहाते॥
स्तोता लोग ऋतदेव को वशीभूत करने के लिए उनकी भक्ति करते हैं। ऋतदेव का बल शीघ्र ही जल कामना करता है। विस्तीर्णा तथा दुरवगाहा द्यावा-पृथ्वी ऋतदेव की है। प्रीति वायिका तथा उत्कृष्टा द्यावा-पृथ्वी ऋतदेव के लिए दुग्ध दोहन करती है।[ऋग्वेद 4.23.10]
स्तुति करने वाले ऋतुदेव को वश में करने के लिए उनका पूजन करते हैं। उनका पराक्रम जल की कामना करता है। पृथ्वी ऋतृदेव के लिए दूध दुहती है।
Those who wish to be blessed by Rit Dev, worship-pray him. His might desire rains, he produces rains. Both the heavens & the earth belong to Rit Dev. The earth draw milk-milch for Rit Dev.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रार्थित होकर तथा हम लोगों के द्वारा प्रशंसित होकर जिस प्रकार से जल नदी को पूर्ण करता है, उसी प्रकार स्तोताओं के अन्न को आप प्रवृद्ध करते है। हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्तोत्र का उच्चारण करते हैं, जिससे हम लोग रथवान होकर स्तुति द्वारा सदा आपकी सेवा करते रहें।[ऋग्वेद 4.23.11]
हे इन्द्र देव! तुम पूर्वज जल द्वारा नदी को पूर्ण करने के समान स्तोताओं के अन्नों को बढ़ाते हो। मुनियों द्वारा पूज्यनीय हुए हो अब हम भी तुम्हारा पूजन करते हैं। हे इन्द्र देव! तुम अश्ववान हो। हम तुम्हारे लिए नवीन श्लोक की उत्पत्ति करते हैं जिससे हम रथ वाले होकर तुम्हारी प्रार्थना और परिचर्या करते हैं।
Hey Indr Dev! Having been worshiped by us and ancient sages, you maintain water in the rivers and grant food grains to the Stota (devotees seeking food stuff). Indr Dev possess the horses named Hari. We recite newly composed excellent hymns in your honour, to seek charoite.(08.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (24) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्, अनुष्टुप्।
का सुष्टुतिः शवसः सूनुमिन्द्रमर्वाचीनं राधस आ ववर्तत्।
ददिर्हि वीरो गृणते स गोपतिर्निष्षिधां नो जनासः॥
हम लोगों को धन देने के लिए तथा हम लोगों के अभिमुख किस प्रकार से सुन्दर प्रार्थना बल के पुत्र इन्द्र देव को आवर्तित करे। हे याजकों! वीर तथा पशु पालक इन्द्र देव हम लोगों को शत्रुओं का धन दें। हम लोग उनकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.1]
शक्ति के पुत्र इन्द्र देव को सुन्दर प्रार्थना द्वारा धन प्रदान करने के लिए हम किस तरह से पुकारें? हे मनुष्य! पशुओं का पोषण करने वाले पराक्रमी इन्द्रदेव हमको शत्रुओं का धन प्रदान करें। हम उनका पूजन करते हैं।
Let us pray to Indr Dev, son of Shakti for granting us wealth-riches. Hey Ritviz! Let brave and protector of cattle give us money of the enemy. We worship Indr Dev.
स वृत्रहत्ये हव्यः स ईड्यः स सष्टुत इन्द्रः सत्यराधाः।
स यामन्ना मघवा मर्त्याय ब्रह्मण्यते सुष्वये वरिवो धात्॥
वृत्रासुर को मारने के लिए इन्द्र देव संग्राम में आहूत होते हैं। वे स्तुति योग्य हैं। वे सुन्दर रूप से प्रार्थित होने पर याजक गणों को धन देने के लिए सत्य धन होते हैं। धनवान इन्द्र देव स्तोत्राभिलाषी तथा सोमाभिलाषी याजकगण को धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.2]
वृत्र के लिए इन्द्र देव संग्राम में पुकारे जाते हैं। वे वंदना के पात्र हैं। उत्तम ढंग से स्तुति किये जाने पर वे यजमानों को धन प्रदान करने के लिए सत्य स्वरूप बनते हैं। वे ऐश्वर्यवान इंद्र देव के श्लोक की ओर सोम की अभिलाषा वाले, यजमान को धन प्रदान करते हैं।
Worship able Indr Dev is invoked in the war to kill Vrata Sur. On being prayed beautifully, he ensure granting of wealth to the Ritviz-devotees. Wealthy Indr Dev grant desires recitation of Strotr and Somras from the Ritviz to give them money.
तमिन्नरो वि ह्वयन्ते समीके रिरिक्वांसस्तन्वः कृण्वत त्राम्।
मिथो यत्त्यागमुभयासो अग्मन्नरस्तोकस्य तनयस्य सातौ॥
मनुष्यगण युद्ध में इन्द्र देव का ही आह्वान करते हैं। याजकगण शरीर को तपस्या द्वारा क्षीण करके उन्हीं को त्राणकर्ता करते हैं। याजकगण तथा स्तोता दोनों ही परस्पर संगत होकर पुत्र-पौत्र लाभ के लिए इन्हीं के समीप जाते हैं।[ऋग्वेद 4.24.3]
युद्ध में प्राणी इन्द्र देव को आहूत करते हैं। यजमान और प्रार्थनाकारी दोनों मिलकर संतति लाभ के लिए इन्द्र देव के निकट जाते हैं।
Humans invoke Indr Dev in the war. The Ritviz reduce their body through ascetics and consider him as the protector. The Ritviz and the Stota, both go to him for having sons & grandsons.
क्रतूयन्ति क्षितयो योग उग्राशुषाणासो मिथो अर्णसातौ।
सं यद्विशोऽववृत्रन्त युध्मा आदिन्नेम इन्द्रयन्ते अभीके॥
हे बलवान इन्द्र देव! चतुर्दिक में व्याप्त मनुष्य जल लाभ के लिए एकत्र होकर यज्ञ करते हैं। जब युद्धकारी लोग युद्ध में एकत्रित होते हैं, तब कौन इन्द्र देव की अभिलाषा करता है।[ऋग्वेद 4.24.4]
हे इन्द्र देव! तुम शक्तिशाली हो। चारों दिशाओं में रहने वाले व्यक्ति जल के लिए संगठित होकर अनुष्ठान करते हैं। जब संग्राम करने वाले युद्ध भूमि में एकत्र होते हैं, तब इनमें से कौन इन्द्र देव की इच्छा करते हैं?
Hey Indr Dev, you are mighty! The humans gather together and conduct Yagy for the sake of Yagy. Who invoke Indr Dev, when the warriors gather for the war?
आदिद्ध नेम इन्द्रियं यजन्त आदित्यक्तिः पुरोळाशं रिरिच्यात्।
आदित्सोमो वि पपृच्याद सुष्वीनादिज्जुजोष वृषभं यजध्यै॥
उस समय युद्ध में कोई योद्धा बलवान इन्द्र देव की पूजा करते हैं। अनन्तर कोई पुरोडाश पकाकर करके इन्द्र देव को देते हैं। उस समय सोमाभिषव करने वाले याजकगण अनभिषुत सोम वाले याजकगण को धन से पृथक कर देते हैं। उस समय कोई अभीष्टवर्षी इन्द्र देव के उद्देश्य से यज्ञ करने की अभिलाषा करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.5]
उस समय कोई वीर सशक्त इन्द्र का पूजन करते और कोई पुरोडाश लाकर इन्द्र को देते हैं। उस समय सोम सिद्ध करने वाले यजमान, सोम सिद्ध न करने वाले यजमान को धनविहीन कर देते हैं। उस समय अभिलाषाओं की बरसात करने वाले इन्द्र के लिए सभी यज्ञ करने की कामना करते हैं।
At that moment some warrior pray to Indr Dev and bring baked Purodas to him. The Ritviz who extract Somras isolate that Ritviz who do not involve himself in the extraction of Somras from receiving money. Every one wish to conduct Yagy for the sake of Indr Dev, who accomplish desires.
कृणोत्यस्मै वरिवो य इत्थेन्द्राय सोममुशते सुनोति।
सध्रीचीनेन मनसाविवेनन्तमित्सखायं कृणुते समत्सु॥
जो सोमाभिलाषी स्वर्ग लोक स्थित इन्द्र देव के उद्देश्य से अभिषव करते हैं, उन्हें इन्द्र देव धन प्रदान करते हैं। एकान्त चित्त से इन्द्र देव की अभिलाषा करने वाले तथा सोमाभिषव करने वाले याजक गण के साथ संग्राम में इन्द्र देव मित्रता करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.6]
अद्भुत संसार में वास करने वाले इन्द्रदेव के लिए जो सोम की इच्छा करने वाले उसे सिद्धस्थ करते हैं। इन्द्र देव उनको धन-प्रदान करते हैं। एकाग्रचित भाव से इन्द्रदेव की इच्छा करने वाले तथा सोम सिद्धस्थ करने वाले यजमान से वे इन्द्रदेव संग्राम क्षेत्र में सखा भाव दृढ़ करते हैं।
Indr Dev grants money to those who extract Somras for him. Indr Dev become friendly in the war with those devotees-Ritviz who extract Somras for him & concentrate-meditate him.
य इन्द्राय सुनवत्सोममद्य पचात्पक्तीरुत भृज्जाति धानाः।
प्रति मनायोरुचथानि हर्यन्तस्मिन्दधद्वृषणं शुष्ममिन्द्रः॥
जो आज इन्द्र देव के लिए सोमाभिषव करते हैं, जो पुरोडाश पकाते हैं और जो भूजने योग्य जौ को भूँजते हैं, उसी स्तोत्रकारी के स्तोत्र को स्वीकार करके इन्द्र देव याजकगण की अभिलाषा के पूरक बल को धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.24.7]
आज जो इन्द्रदेव के लिए सोमरस निकालते हैं, जो पुरोडाश लाते और भूनने योग्य जौं को भूनते हैं, उस श्लोक को स्वीकार करने वाले इन्द्र यजमान की इच्छा पूर्ण करने वाले पराक्रम को धारण करते हैं।
One who extract Somras for Indr Dev today, bake Purodas and roast barley, he accept his prayers and acquire the strength to accomplish his desires.
यदा समर्यं व्यचेदृघावा दीर्घं यदाजिमभ्यख्यदर्यः।
अचिक्रदद् वृषणं पत्न्यच्छा दुरोण आ निशितं सोमसुद्भिः॥
जब शत्रुओं के हिंसक स्वामी इन्द्र देव शत्रुओं को जानते हैं, जब वे दीर्घ संग्राम में व्याप्त रहते हैं, तब उनकी पत्नी सोमाभिषवकारी ऋत्विक कारक द्वारा तीक्ष्णीकृत अर्थात सोमपान करने से उत्साहवान तथा अभीष्टवर्षी इन्द्र देव का यज्ञगृह में आह्वान करती है।[ऋग्वेद 4.24.8]
जब वे शत्रु संहारक ईश्वर इन शत्रुओं को जान लेते हैं और जब वे भीषण युद्ध में संलग्न होते हैं तब उनकी पत्नी सोम सिद्धस्थ करने वाले ऋत्विक द्वारा सोमपान में दुष्ट और इच्छाओं की वृष्टि करने वाले इन्द्र देव का आह्वान करती हैं।
Wife of energetic Indr Dev, who is busy in the war destroying the enemy having identified them; who accomplish desires, invoke him at the Yagy site, when the Ritviz extract Somras.
भूयसा वस्नमचरत्कनीयोऽविक्रीतो अकानिषं पुनर्यन्।
स भूयसा कनीयो नारिरेचीद्दीना दक्षा वि दुहन्ति प्र वाणम्॥
कोई बहुत पुण्य द्वारा अल्प धन प्राप्त करता है, फिर क्रेता के निकट गमन करके 'हमने विक्रय नहीं किया है' कहकर अवशिष्ट मूल्य की प्रार्थना करता है। विक्रेता 'बहुत दिया है' कहकर अल्प मूल्य का अतिक्रम नहीं करता है। चाहे 'समर्थ होओ या असमर्थ, विक्रय काल में जो वचन हुआ है, अब वही रहेगा।[ऋग्वेद 4.24.9]
कोई पुण्य करके कम धन पाता है, फिर क्रय करने वाले के समीप जाकर हमने बेचा नहीं, ऐसा कहकर शेष धन माँगता है। खरीदने वाला उससे अधिक धन नहीं देता।
A man has realized a small price for an article of great value and again comes back to the buyer & says, "this has not been sold; I require the full price"; but he does not recover a small price by a large equivalent; whether helpless or clever they adhere to their bargain.
One gains little money even after earning a lot of virtues (paying a lot for it). He demands his money back from the seller but the seller refuse to refund.
क इमं दशभिर्ममेन्द्रं क्रीणाति धेनुभिः।
यदा वृत्राणि जङ्घनदथैनं मे पुनर्ददत्॥
कौन हमारे इन्द्र देव को दस गायों द्वारा खरीदेगा? जब ये शत्रुओं का वध करेंगे, तब इनको फिर मुझे देना।[ऋग्वेद 4.24.10]
इन्द्र को कौन दस गायों के समान धन से खरीद सकता है? वह जब वृद्धि करते हुए शत्रुओं की हत्या कर डालते हैं तब वह उसके गवादि धन को मुझे ही सौंप देते हैं।
Who can buy our Indr Dev for ten cows?! Give him to me when he kill the enemies.
नू ष्टुत इन्द्र नू गृणान इषं जरित्रे नद्यो ३ न पीपेः।
अकारि ते हरिवो ब्रह्म नव्यं धिया स्याम रथ्यः सदासाः॥
हे इन्द्र देव! आप पूर्ववर्ती ऋषियों द्वारा प्रार्थित होकर तथा हम लोगों के द्वारा प्रशंसित होकर, जिस प्रकार से जल नदियों को पूर्ण करता है, उसी प्रकार आप स्तोताओं के अन्न को प्रवृद्ध करते हैं। हे हरि विशिष्ट इंद्र देव! हम आपके उद्देश्य से अभिनव स्त्रोत्रों का गान करते हैं। जिससे हम लोग रथवान होकर सदा आपकी सेवा करते रहें।
[ऋग्वेद 4.24.11]
हे इन्द्र देव! तुम पूर्वज मुनियों के द्वारा अर्चित हो । अब तुम्हारी प्रार्थना करते हैं। तुम जल से परिपूर्ण नदी के समान स्तुति करने वालों के अन्न की वृद्धि करते हो। हे इन्द्र देव! तुम अश्ववान हो । हम तुम्हारे लिए नये श्लोक रचते हैं जिससे हम रथवाले होकर तुम्हारी वंदना करते हैं।
Hey Indr Dev you enrich the Stota with food grains, the way the river is filled with water on being worshiped by ancient sages-Rishis and praised by us. Hey Indr Dev you possess the horses named Hari. We sing newly composes hymns, Strotr-prayers for you so that we have charoite and keep serving you.(09.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (25) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
को अद्य नर्यो देवकाम उशन्निन्द्रस्य सख्यं जुजोष।
को वा महेऽवसे पार्याय समिद्धे अग्नौ सुतसोम ईट्टे॥
आज कौन मनुष्य हितकर, देवताभिलाषी, कामयमान मनुष्य इन्द्र देव के साथ मैत्री चाहता है? सोमाभिषवकारी कौन व्यक्ति अग्नि देव के प्रज्वलित होने पर महान तथा पारगामी आश्रय लाभ के लिए इन्द्र देव की स्तुति करता है?[ऋग्वेद 4.25.1]
हितकारक, देवों की इच्छा करने वाला कौन-सा व्यक्ति आज इन्द्र देव से मित्रता स्थापित करने की इच्छा रखता है? सोम का अभिषण करने वाला ऐसा कौन-सा मनुष्य है जो अग्नि प्रदीप्त होने पर इन्द्र देव की सुरक्षा करने वाली शरण की 'इच्छा' से उनका पूजन करता है।
What friend of man or worshipper of the demigods, deserving the friendship of Indr Dev, has today enjoyed it or what offeror of the libation on the kindled fire praises him sufficiently for his great and unbounded protection?
Which human who is desirous, helping, beneficial, wish to invoke demigods & wish to be friendly with Indr Dev? Which human being who extract Somras, worship Indr Dev & seek asylum under him after the ignition of fire-Agni, desirous of great & Ultimate gains?
Ultimate gain is Moksh, emancipation, Salvation.
को नानाम वचसा सोम्याय मनायुर्वा भवति वस्त उस्राः।
क इन्द्रस्य युज्यं कः सखित्वं को भ्रात्रं वष्टि कवये क ऊती॥
कौन याजकगण स्तुति वाक्य द्वारा सोमार्ह इन्द्र देव के निकट झुकता है? कौन इन्द्र देव की स्तुति की कामना करता है? कौन इन्द्र देव द्वारा प्रदत्त गौओं को धारित करता है? कौन इन्द्र देव की सहायता करने की इच्छा करता है? कौन इन्द्र देव के साथ मित्रता की इच्छा करता है? कौन इन्द्र देव के भ्रातृत्व की इच्छा करता है? कौन क्रान्तदर्शी इन्द्र देव से आश्रय प्रार्थना करता है?[ऋग्वेद 4.25.2]
कौन सा यजमान इन्द्र देव के सम्मुख वंदना करता हुआ नमन करता है? कौन इन्द्र की वंदना का रक्षक है? इन्द्र को प्रदान की हुई गौओं को कौन लेता है? इन्द्र की सहायता कौन चाहता है? कौन उनमें सखा भाव का अभिलाषी है? कौन उनसे बंधुत्व भाव रखना चाहता है? कौन उस तेजस्वी इन्द्रदेव के शरण की विनती करता है।
Who prostrate before Indr Dev, who is desirous of Somras? Who wish to pray-worship Indr Dev? Who support-nurture cows for the sake of Indr Dev? Who wish to help-support Indr Dev? Who wish to be friendly with Indr Dev? Who wish to be brotherly with Indr Dev? Who seek asylum under radiant Indr Dev?
को देवानामवो अद्या वृणीते क आदित्याँ अदितिं ज्योतिरीट्टे।
कस्याश्विनाविन्द्रो अग्निः सुतस्यांशोः पिबन्ति मनसाविवेनम्॥
आज कौन याजक गण इन्द्र देव आदि देवताओं से रक्षा के लिए प्रार्थना करता है? कौन आदित्य, अदिति तथा उदक की प्रार्थना करता है? अश्विनी कुमार, इन्द्र और अग्नि देव किस याजकगण की प्रार्थना से प्रसन्न होकर अभिषुत सोम का यथेच्छ रूप से पान करते हैं?[ऋग्वेद 4.25.3]
उदक :: उत्तर दिशा, जल-पानी, east direction, water.
कौन यजमान इन्द्रदेव आदि देवों की सुरक्षा करने के लिए विनती करता है? आदित्य, अदिति और उदक की प्रार्थना कौन करता है? अश्विनी कुमार, इन्द्रदेव और अग्नि किस यजमान के स्तोत्र से हर्ष पाकर छने हुए सोम रस को अपनी इच्छा के अनुसार पीते हैं?
Which devotee request Indr Dev & demigods-deities for protection? Who worship Adity, Aditi & Udak? Ashwani Kumars, Indr and Agni Dev drink Somras pleased with who's request-prayer?
तस्मा अग्निर्भारतः शर्म यंसज्ज्योक्पश्यात्सूर्यमुच्चरन्तम्।
य इन्द्राय सुनवामेत्याह नरे नर्याय नृतमाय नृणाम्॥
जो याजक गण कहते हैं कि नेता मनुष्यों के बन्धु एवम् नेताओं के बीच में श्रेष्ठ नेता इन्द्र देव के लिए सोमाभिषव करेंगे, उन याजक गणों को हविर्भर्ता अग्नि देव सुख प्रदान करें तथा चिर काल से उदित सूर्य देव को देखें।[ऋग्वेद 4.25.4]
चिरकाल :: बहुत समय, दीर्घकाल; long period of time, forever.
जो यजमान प्राणियों के सखा उत्तम नेतृत्व वाले इन्द्र के लिए सोम सिद्ध करने का निश्चय करते हैं। ऐसे यजमानों की हवियों के स्वामी अग्नि देव सुख प्रदान करें और हमेशा होने वाले सूर्य देव के दर्शन करने वाला बनायें।
Let Agni Dev grant comforts-pleasure to the Ritviz who under take to extract Somras for the best leader of humans Indr Dev and let they see rising Sun for a long period of time.
न तं जिनन्ति बहवो न दभ्रा उर्वस्मा अदितिः शर्म यंसत्।
प्रियः सुकृत्प्रिय इन्द्रे मनायुः प्रियः सुप्रावीः प्रियो अस्य सोमी॥
अल्प अथवा अधिक शत्रु उन याजक गणों को हिंसित न करें, जो याजक गण इन्द्र देव के लिए सोमाभिषव करते हैं। इन्द्र देव की माता अदिति उन याजक गणों को अधिक सुख प्रदान करें। शोभन यज्ञ करने वाले याजक गण इन्द्र देव के प्रिय हों। जो इन्द्र देव की स्तुति की कामना करता है, वे इन्द्र देव के प्रिय होवें। जो इन्द्र देव के निकट साधुभाव से गमन करते हैं, वे इन्द्र देव के प्रिय होवें। सोमवान याजक गण इन्द्र देव के प्रिय होवें।[ऋग्वेद 4.25.5]
अदिति इनको बनावें, सुन्दर यज्ञ आदि शुभ कर्म करने वाले यजमानों को इन्द्र देव प्रेम करें। इन्द्र देव की प्रार्थना करने के अभिलाषी उनके प्रेम भाजन बनें। जो शील स्वभाव वाले एवं प्रिय सोम की सिद्धि करते हैं, वे इन्द्र देव के प्रेम पात्र बनें।
The enemy should not harm small or large numbers-groups of Ritviz who extract Somras for Indr Dev. Let Aditi, mother of Indr Dev grant comforts to the Ritviz. Those Ritviz who perform Yagy should be dear to Indr Dev. Those who wish to worship Indr Dev should be dear to him. Those who visit Indr Dev saintly, should be dear to him. Ritviz possessing Somras should be dear to Indr Dev.
सुप्राव्यः प्राशुषाळेष वीरः सुष्वेः पक्तिं कृणुते केवलेन्द्रः।
नासुष्वेरापिर्न सखा न जामिर्दुप्राव्योऽवहन्तेदवाचः॥
जो व्यक्ति इन्द्र देव के निकट गमन करता है और सोमाभिषव करता है उसके पवित्र कार्य को शीघ्र अभिनवकारी तथा विक्रान्त इन्द्र देव स्वीकार करते हैं। जो याजकगण सोमाभिषव नहीं करता, उसके लिए इन्द्र देव व्याप्त नहीं होते हैं, मित्र नहीं होते हैं और बन्धु भी नहीं होते हैं। जो व्यक्ति इनके निकट गमन नहीं करता और उनकी प्रार्थना नहीं करता, इन्द्र देव उसकी हिंसा करते हैं।[ऋग्वेद 4.25.6]
विक्रांत :: प्रतापी, तेजस्वी, वीर, बहादुर, साहसी, हिम्मत वाला; valiant.
इन्द्र के समीप जाने वाले और सोम सिद्ध करने वाले यजमान के पाप-कर्म को पराक्रमी इन्द्र स्वीकार नहीं करते हैं। सोम का अभिषेक न करने वाले यजमान के लिए इन्द्र व्याप्त नहीं होते। वे उसमें सख्य और बंधु भाव को नहीं रखते। इन्द्र देव के निकट न जाने वाला उसकी प्रार्थना न करने वाला उनके द्वारा हिंसित किया जाता है।
Indr Dev accepts-recognise the virtuous-pious deeds of one who become close to him and extract Somras for him. One who is adverse, is not recognised as a friend or relative, brother and is vanished.
न रेवता पणिना सख्यमिन्द्रोऽसुन्वता सुतपाः सं गृणीते।
आस्य वेदः खिदति हन्ति नग्नं वि सुष्वये पक्तये केवहो भूत्॥
अभिषुत सोमपायी इन्द्र देव सोमाभिषव कर्म रहित, धनवान और लोभी बणिकों (बनियों) के साथ मैत्री संस्थापित नहीं करते। वे उनके निरर्थक धन को उद्धरित कर और नष्ट करते हैं। वे सोमाभिषवकारी तथा हव्य पाककारी याजकगण के असाधारित मित्र होते हैं।[ऋग्वेद 4.25.7]
सिद्ध सोम पान करने वाले इन्द्रदेव सोम सिद्ध करने वाले काम से विमुख धनिक एवं लोलुप के साथ मित्रता का भाव नहीं बनाते। वे उनके किसी काम न आने वाले धन का पतन कर देते हैं। वे सोमाभिषवकर्त्ता तथा हविरत्न के पाक-कर्त्ता यजमान से अत्यन्त बंधु भाव स्थापित करते हैं।
Indr Dev do not establish friendly relations with those rich, greedy-Vaeshy, who not extract Somras for him. He destroys their useless wealth. Those Ritviz who extract Somras & make offerings of cooked food stuff to him is his great-close friend.
इन्द्रं परेऽवरे मध्यमास इन्द्रं यान्तोऽवसितास इन्द्रम्।
इन्द्रं क्षियन्त उत युध्यमाना इन्द्रं नरो वाजयन्तो हवन्ते॥
उत्कृष्ट तथा निकृष्ट व्यक्ति इन्द्र देव का आह्वान करते हैं एवम् मध्यम व्यक्ति भी इनका ही आह्वान करते हैं। चलने वाले लोग इनका आह्वान करते हैं तथा उपविष्ट लोग भी इनका ही आह्वान गृह में रहने वाले लोग इनका आह्वान करते हैं तथा युद्ध करने वाले भी इनका ही आह्वान करते हैं। अन्न की इच्छा करने वाले लोग भी इन्हीं इन्द्र देव का आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.25.8]
ऊँचे, नीचे, मध्यम सभी तरह के प्राणी इन्द्र को आहुत करते हैं। गमनशील, उपविष्ट, ग्रहों में वास करने वाले, समर भूमि में जाने वाले तथा अन्न की अभिलाषा वाले सभी जीव इन्द्र का आह्वान करते हैं।
Excellent, depraved (upper & lower class) and the middle class gentry invoke Indr Dev. Dynamic as well as those who stay in homes too invoke him. Those who wish to have war invoke him. Desirous of food grains invoke him.(11.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (26) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
अहं मनुरभवं सूर्यश्चाहं कक्षीवाँ ऋषिरस्मि विप्रः।
अहं कुत्समार्जुनेयं न्यृञ्जेऽहं कविरुशना पश्यता मा॥
हम प्रजापति हैं, हम सबके प्रेरक सविता हैं, हम ही दीर्घतमा के पुत्र मेधावी कक्षीवान ऋषि हैं, हमने ही अर्जुनी पुत्र कुत्स को भली-भाँति अलंकृत किया, हम ही उशना नामक कवि हैं। हे मनुष्यों! हमें अच्छी तरह से देखो।[ऋग्वेद 4.26.1]
हम प्रजापति, सबको प्रेरणा प्रदान करने वाले एवं हम ही दीर्घतमा के विद्वान पुत्र कक्षीवान ऋषि हैं हम कवि उशना हैं। हमने ही अर्जुन के पुत्र कुत्स को भली-भांति प्रशंसित किया था। हे मनुष्यों! हम ही क्रांतदर्शी और सर्वप्रिय हैं।
We are Praja Pati, Savita-who inspire all, Medhavi Kakshivan Rishi-son of Dirghtama and poet Ushna. We decorated Kuts the son of Arjuni. Hey humans! Look at us carefully.
अहं भूमिमददामार्यायाहं वृष्टिं दाशुषे मर्त्याय।
अहमपो अनयं वावशाना मम देवासो अनु केतमायन्॥
हमने आर्य को पृथ्वी प्रदान किया। हमने हव्यदाता मनुष्य को सस्य की अभिवृद्धि के लिए वृष्टि प्रदान किया। हमने शब्दायमान जल या आनयन किया। देवगण हमारे सङ्कल्प का अनुगमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.26.2]
मैंने ही ध्वनि करते हुए जल को अभिप्रेरित किया। मेरी इच्छा पर समस्त देवता चलते हैं।
We granted earth to the Ary. We provided rains to the humans to boost vegetation. I inspired rains making sound. Demigods-deities fulfil our objective.
अहं पुरो मन्दसानो व्यैरं नव साकं नवतीः शम्बरस्य।
शततमं वेश्यं सर्वताता दिवोदासमतिथिग्वं यदावम्॥
हमने सोमपान से मत्त होकर शम्बर के निन्यानबे नगरों को एक काल में ही ध्वस्त किया। जिस समय हम यज्ञ में अतिथियों के अभिगन्ता राजर्षि दिवोदास का पालन कर रहे थे, उस समय हमने दिवोदास को सौ नगर निवास करने के लिए दिए।[ऋग्वेद 4.26.3]
सोमपान करके मैंने शम्बर के निन्यानवें शहरों को एक ही समय में नष्ट कर डाला। जब मैं अनुष्ठान में सुरक्षा कर रहा था तब मैंने उनके निवास के लिए सौ पुरी प्रदान की थी।
Having drunk, we destroyed 99 habitats-cities of Shambar-a demon. When Rajrishi Divodas was looking after the guests, we granted him 100 cities to him.
प्र सु ष विभ्यो मरुतो विरस्तु प्र श्वेनः श्येनेभ्य आशुपत्वा।
अचक्रया यत्स्वधया सुपर्णो हव्यं भरन्मनवे देवजुष्टम्॥
हे मरुद्गण! श्येन पक्षी पक्षियों के बीच में प्रधान है। अन्य श्येनों की अपेक्षा शीघ्रगामी श्येन प्रधान है। क्योंकि देवों द्वारा सेवित सोमरूप हव्य को मनुष्यों के लिए स्वर्गलोक से चक्र रहित रथ द्वारा सुपर्ण लाया था।[ऋग्वेद 4.26.4]
 |
| श्येन पक्षी FALCON |
हे मरुतों ! तुम बाज पक्षियों में प्रधान तत्व हो। दूसरे की उपेक्षा तुम शीघ्रगामी हो। देवताओं द्वारा सेवन किये जाने वाले सोमरूपी हव्यों को स्वर्ग के बिना पहिये के रथ द्वारा अद्भुत संसार से लाकर मनुष्यों को प्रदान किया था।Hey Marud Gan! Falcon is supreme amongest the birds. Amongest the falcons, fast moving Shyen is best. Suparn brought Somras from the heaven for the humans in the charoite which had no wheels.
भरद्यदि विरतो वेविजानः पथोरुणा मनोजवा असर्जि।
तूयं ययौ मधुना सोम्येनोत श्रवो विविदे श्येनो अत्र॥
जब भयभीत होकर श्येन पक्षी द्युलोक से सोमरस लाया, तब वह विस्तीर्ण अन्तरिक्ष मार्ग में मन के तुल्य वेग युक्त होकर उड़ा एवं सोममय मधुर अन्न के साथ वह शीघ्र गया और सोमरस लाने के कारण सुपर्ण ने इस लोक में यश प्राप्त किया।[ऋग्वेद 4.26.5]
जब श्येन पक्षी डरकर आकाश से सोम को लाया तब वह विशाल अंतरिक्ष के रास्ते के हृदय के तुल्य गतिवाला होकर उड़ा। सम रूप मधु के साथ वह शीघ्र गया और सोम लाने से उसका ऐश्वर्य फैल गया।
When the Falcon, intimidating (its guardians), carried off from hence the Somras it was at large; flying swift as thought along the vast path of the firmament-space, it went rapidly with the sweet Somras and the hawks thence acquired the celebrity in this world.
When fearful-afraid, Shyen-Falcon brought Somras from the heaven, it flew at high speed through the vast space-sky with the speed of the innerself-brain and Suparn-Falcon earned honour over the earth due to this act.
ऋजीपी श्येनो ददमानो अंशुं परावतः शकुनो मन्द्रं मदम्।
सोमं भरद्दादृहाणो देवावान्दिवो अमुष्मादुत्तरादादाय॥
देवों के साथ होकर ऋजुगामी और प्रशंसित गमन श्येन पक्षी ने दूर से सोम को धारित करके एवं स्तुति योग्य तथा मदकर सोम को उन्नत द्युलोक से ग्रहण करके दृढभाव से उसको ले आए।[ऋग्वेद 4.26.6]
द्रुतगामी और यशस्वी श्येन पक्षी देवगणों सहित दूर से सोम को उठाकर स्तुत एवं प्रसन्नता पूर्वक सोम को उच्च नभ से लेकर दृढ़ता पूर्वक धरती पर चला आया।
Fast flying Falcon on being praised picked up toxicating Somras & brought it up to the earth from the heavens.
आदाय श्येनो अभरत्सोमं सहस्रं सवाँ अयुतं च साकम्।
अत्रा पुरंधिरजहादरातीर्मदे सोमस्य मूरा अमूरः॥
श्येन पक्षी ने सहस्र और अयुत संख्यक यज्ञ के साथ सोमरस को ग्रहण करके उस अन्न का आनयन किया। उस सोमरस के लाये जाने पर बहुकर्म विशिष्ट प्राज्ञ इन्द्र देव ने सोम सम्बन्धी हर्ष के उत्पन्न होने पर मूर्ख शत्रुओं का वध किया।[ऋग्वेद 4.26.7]
श्येन ने हजारों लाखों अनुष्ठान कार्यों द्वारा सोम को प्राप्त किया और वह उसको ले आया। सोम के लाने पर बहुकर्मा एवं मेधावी इन्द्र देव ने सोम से रचित शक्ति से अज्ञानी शत्रुओं का पतन किया।
Falcon accepted Somras after thousands-millions, uncounted prayers and brought it. It amused Indr Dev and he killed the imprudent-brainless, duffer enemies.(13.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (27) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्, शक्वरी।
गर्भे नु सन्नन्वेषामवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वा।
शतं मा पुर आयसीररक्षन्नध श्येनो जवसा निरदीयम्॥
गर्भ में विद्यमान होकर ही हम (वामदेव) ने इन्द्र देव आदि समस्त देवों के जन्म को यथाक्रम से जाना। अर्थात् परमात्मा के समीप से सब देव उत्पन्न हुए हैं। सैकड़ों लौहमय शरीरों ने हमारा पालन किया। अभी हम श्येन के तुल्य स्थित होकर आवरण रहित आत्मा को जानते हुए शरीर से निर्गत होते हैं।[ऋग्वेद 4.27.1]
गर्भ में वास करते हमने इन्द्रादि समस्त देवताओं के प्राकट्य को उत्तमता से जान लिया था। लौह से निर्मित स्थित नगरियों में हमारा पोषण हुआ था। हम ज्ञान से परिपूर्ण हो बाज के तुल्य विशालगति से उड़ जाने वाली आत्मा को जानते हुए देह बंधन से छूट जाते हैं।
We understand the significance of Indr Dev and all the demigods-deities, while staying in the womb. We were nurtured-grown by hundred of bodies like the iron. At present we become like the Falcon & free from the body. The soul leaves the body recognising it.
न घा स मामप जोषं जभाराभीभास त्वक्षसा वीर्येण।
ईर्मा पुरंधिरजहादरातीरुत वाताँ अतरच्छूशुवानः॥
उस गर्भ ने हमारा पर्याप्त रूप से अपहरण नहीं किया अर्थात् गर्भ में निवास करते समय हमें मोह नहीं हुआ। हमने गर्भस्थ दुःख को तीक्ष्ण वीर्य द्वारा अर्थात् ज्ञान सामर्थ्य से पराभूत किया। सभी के प्रेरक परमात्मा ने गर्भ स्थित शत्रुओं का वध किया और वर्द्धमान होकर गर्भ में क्लेशकारक वायु को अतिक्रान्त किया।[ऋग्वेद 4.27.2]
उस गर्भ में रहते हुए भी हम मोह में नहीं फँसे। हमने गर्भ के दुःखों को ज्ञान के पराक्रम से प्राप्त किया। सबको प्रेरणा देने वाले परमात्मा ने गर्भ में स्थित शत्रु रूपी कीटाणुओं का नाश किया और वृद्धि को प्राप्त होकर कष्ट पहुँचाने वाली वायु का शमन किया।
We remained free from worldly allurements during our stay in the womb. We overcome the pain, sorrow, worries with the help of enlightenment. The Almighty who inspire all, killed our enemies-microorganism (germs, virus, bacteria, fungus etc.) and we overcome the air-gas which troubled us.
अव यच्छ्येनो अस्वनीदध द्योर्वि यद्यदि वात ऊहुः पुरंधिम्।
सृजद्यदस्मा अव ह क्षिपज्ज्यां कृशानुरस्ता मनसा भुरण्यन्॥
सोमाहरण काल में जब श्येन ने द्युलोक से अधोमुख होकर शब्द किया, जब सोमपालों ने श्येन के निकट से सोमरस छीन लिया, जब शरप्रक्षेपक सोमपाल कृशानु ने मनोवेग से जाने की इच्छा करके धनुष की केटि पर प्रत्यञ्चा चढ़ाई और श्येन के प्रति शरक्षेपण किया तब श्येन ने सोमरस का आनयन किया।[ऋग्वेद 4.27.3]
सोम लाते समय जब बाज ने क्षितिज के नीचे की ओर मुख करके ध्वनि की, तब सोम के रक्षकों ने श्येन से सोम को छीन लिया, जब सोम रक्षक शुशुवान ने हृदय की गति से जाने वाले के लिए धनुष पर डोरी और श्येन की तरफ बाण को चलाया, तब श्येन सोम को लेकर आया।
The Falcon-Shyen faced the horizon making sound leading to snatching of Somras by its protectors. At this moment Krashanu loaded his bow & arrow, allowing Falcon-Shyen to fly with the speed of mind, allowing Shyen to bring Somras.
ऋजिप्य ईमिन्द्रावतो न भुज्यं श्येनो जभार बृहतो अधि ष्णोः।
अन्तः पतत्पतत्र्यस्य पर्णमद्य यामनि प्रसितस्य तद्वेः॥
अश्विनी कुमारों ने जिस प्रकार सामर्थ्यवान् इन्द्र विशिष्ट देश से भुज्यु नामक राजा का अपहरण किया, उसी प्रकार ऋजुगामी श्येन ने इन्द्र रक्षित महान द्युलोक से सोमरस का आहरण किया। उस समय युद्ध में कृशानु के आयुधों से विद्ध होने पर उस गमनशील पक्षी का एक पतनशील पंख गिर पड़ा।[ऋग्वेद 4.27.4]
जैसे अश्विनी कुमारों ने इन्द्र के स्वामित्व वाले देश से राजा भृज्यु का अपहरण किया था, उसी प्रकार इन्द्र से रक्षित श्रेष्ठ आकश से ऋजुगामी सोम को लेकर आया। उस समय कृशनु से लड़ने के कारण उस श्येन का एक पंख बाण से बिंध जाने के कारण गिर गया।
The manner in which Ashwani Kumars abducted king Bhujyu from the domain of Indr Dev, in the same way fast moving falcon abducted Somras. At that moment one of his feathers was cut by the arrow of Krashanu.
अध श्वेतं कलशं गोभिरक्तमापिण्यानं मघवा शुक्रमन्यः। अध्वर्युभिः प्रयतं मध्वो अग्रमिन्द्रो मदाय प्रति धत्पिबध्यै शूरो मदाय प्रति धत्पिबध्यै॥
इस समय विक्रमवान इन्द्र देव शुभ पात्र स्थित, गव्य मिश्रित, तृप्तिकर, सारसमन्वित एवं अध्वर्युओं द्वारा प्रदत्त सोम लक्षण अन्न का और मधुर सोमरस का हर्ष के लिए पहले ही पान करें।[ऋग्वेद 4.27.5]
महापराक्रमी इन्द्रदेव शुद्ध सुरभित, भव्य-मिश्रित, संतुष्टि दायक, सात रूप सोम के अध्वर्युओं द्वारा दिये जाने पर उसके हर्ष दायक इसको इस समय पियें।
Let mighty Indr Dev drink Somras granting pleasure, kept in the pious pot, mixed with cow milk, satisfying with seven flavours, provided by the worshipers-devotees.(14.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (28) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
त्वा युजा तव तत्सोम सख्य इन्द्रो अपो मनवे सस्रुतस्कः।
अहन्नहिमरिणात्सप्त सिन्धूनपावृणोदपिहितेव खानि॥
हे सोम! इन्द्र देव के साथ आपकी मैत्री होने पर इन्द्र देव ने आपकी सहायता से मनुष्यों के लिए सरणशील जल को प्रवाहित किया, वृत्रासुर का वध किया, सर्पणशील जल को प्रेरित किया और वृत्रा सुर द्वारा तिरोहित जल द्वारों को खोल दिया।[ऋग्वेद 4.28.1]
हे सोम! जब इन्द्र देव तुम्हारे सखा बने हुए तब तुम्हारी सहायता से उन्होंने पुरुषों के लिए जल को प्रवाहमान किया और वृत्र का पतन किया। वृत्र द्वारा रोके हुए द्वार को खोलकर तुमने जल को शिक्षित किया।
Hey Som! When you became a friend of Indr Dev, he made the water flow and killed Vrata Sur & opened the blockade of water created by Vrata Sur.
त्वा युजा नि खिदत्सूर्यस्येन्द्रश्चक्रं सहसा सद्य इन्दो।
अधि ष्णुना बृहता वर्तमानं महो द्रुहो अप विश्वायु धायि॥
हे सोम! इन्द्र देव ने आपकी सहायता से क्षण भर में प्रेरक सूर्य के रथ के ऊपर स्थित बृहत अन्तरिक्ष में वर्तमान द्विचक्र रथ के एक चक्र को बलपूर्वक तोड़ डाला। प्रभूत द्रोहकारी सूर्य के सर्वतोगामी चक्र को इन्द्र देव ने अपहृत कर लिया।[ऋग्वेद 4.28.2]
चक्र :: आवर्तन, वृत्त, मंडली, घेरा, चक्कर, क्षेत्र, पहिया, चक्र, चाक, चक्का; cycle, circle, wheel.
हे सोम! तुम्हारी सहायता से ही इन्द्र ने सूर्य के रथ के ऊपर स्थित दो चक्रों वाले रथ के एक चक्र को पल भर में अलग कर दिया। सूर्य के सर्वत्र गतिमान चक्रों को स्पर्धा के कारण इन्द्र देव ने ले लिया।
Hey Som! Indr Dev destroyed one of the two disc-cycles over the charoite of Sun in the sky with might. He took away, snatched the competitive disc moving in all directions.
अहन्निन्द्रो अदहदग्निरिन्दो पुरा दस्यून्मध्यन्दिनादभीके।
दुर्गे दुरोणे क्रत्वा न यातां पुरू सहस्त्रा शर्वा नि बर्हीत्॥
हे सोम! आपके पान से बलवान इन्द्र देव ने मध्याह्नकाल के पहले ही संग्राम में शत्रुओं को मार डाला और अग्नि देव ने भी कितने शत्रुओं को जला डाला। किसी कार्य से रक्षा शून्य दुर्गम स्थान से जाने वाले व्यक्ति को जिस प्रकार से चोर मार डालते हैं, उसी प्रकार इन्द्र देव ने सहस्र शत्रु सेनाओं का वध किया।[ऋग्वेद 4.28.3]
हे सोम! तुमको पान कर वीर इन्द्र देव ने मध्याह्न समय से पूर्व ही शत्रुओं को युद्ध में समाप्त कर दिया और अग्नि ने भी असंख्य शत्रुओं को समाप्त कर दिया। जैसे अरक्षित मार्ग से जाने वाले धनिक को चोर मार देता है वैसे असंख्य शत्रु सेनाओं को इन्द्रदेव ने समाप्त कर डाला।
Hey Som! After drinking you, mighty Indr Dev killed the enemies in the mid day and Agni Dev burnt several enemies. Indr Dev killed the thousands of enemies like the rich being killed while moving through an unsafe route.
विश्वस्मात्सीमधमाँ इन्द्र दस्यून्विशो दासीरकृणोरप्रशस्ताः।
अबाधेथाममृणतं नि शत्रूनविन्देथामपचितिं वधत्रैः॥
हे इन्द्र देव! आप इन दस्युओं को सभी सदगुणों से रहित करते हैं। आप कर्महीन मनुष्यों (दासों) को गर्हित (निन्दित) बनाते हैं। हे इन्द्र देव और सोम! आप दोनों शत्रुओं को बाधा दो और उनका वध करें। उन्हें मारने के लिए लोगों से सम्मान ग्रहण करें।[ऋग्वेद 4.28.4]
हे इन्द्र देव! तुम समस्त दुष्टों को सद्गुणों से विहीन करते हो। तुम उन वस्तुओं को निंदा के योग्य करते हो। हे इन्द्र देव और सोम! तुम दोनों ही शत्रुओं के आक्रमण-कार्य में विघ्न डालते हुए उनका विनाश करो, उनका वध करने हेतु की जाने वाली प्रार्थनाओं को स्वीकार करो।
Hey Indr Dev! You devoid the dacoits of virtues and make the humans vulnerable, who avoid work-efforts, endeavours. Hey Indr Dev & Som! You apply breaks to both the enemies and kill them. Accept the prayers felicitations by the humans, pertaining to the slaying of the enemies.
एवा सत्यं मघवाना युवं तदिन्द्रश्च सोमोर्वमश्व्यं गोः।
आदर्दृतमपिहितान्यशृना रिरिचथुः क्षाश्चित्ततृदाना॥
हे सोम! आप और इन्द्र देव ने महान अश्व समूह और गो समूह को दान किया एवं पणियों द्वारा आच्छादित गोवृन्द और भूमि को बल द्वारा विमुक्त किया। हे धन युक्त इन्द्र देव और सोम! आप दोनों शत्रुओं के हिंसक है। आप दोनों ने इस प्रकार से जो कुछ किया है, वह सत्य है।[ऋग्वेद 4.28.5]
हे सोम! तुम और इन्द्र देव ने विशाल अश्वों और गौओं के संगठन को दान किया था। हे इन्द्र देव और सोम! तुम दोनों ही अत्यन्त समृद्धिशाली हो। तुम दोनों शत्रुओं का नाश करने में समर्थ हों। तुम दोनों जो भी कार्य करते हो, वह सभी सच है।
Hey Som! You and Indr Dev donated a large group of horses and the cows, released the land under the control of Ahi-demons with force-might having cows herds. Hey wealthy Indr Dev & Som! You are the destroyer of the enemy. What ever you did in this manner is true.(15.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (29) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
आ नः प्रार्थित उप वाजेभिरूती इन्द्र याहि हरिभिर्मन्दसानः।
तिरश्चिदर्यः सवना पुरूण्याङ्गुषेभिर्गृणानः सत्यराधाः॥
हे इन्द्र देव! आप प्रशंसित होकर हम लोगों को रक्षित करने के लिए हम लोगों के अन्न युक्त अनेक यज्ञों में अश्वों के साथ पधारें। आप आनन्दमय, स्वामी, स्तोत्रों द्वारा प्रशंसित और सत्यधन हैं।[ऋग्वेद 4.29.1]
हे इन्द्र देव! हमारे द्वारा पूजनीय होने पर हमारी सुरक्षा के लिए हविरत्न से परिपूर्ण हमारे यज्ञों में अश्वों से युक्त पधारो। तुम हर्षित हृदय वाले, श्लोकों द्वारा पूजनीय, सत्यस्वरूप एवं स्वर्ग के स्वामी हो।
Hey Indr Dev! On being worshiped, join our Yagy having food grains for offerings, with your horses, to protect us. You are blissful, lord truthful and revered-honoured with hymns.
आ हि ष्मा याति नर्यश्चिकित्वान्हूयमानः सोतृभिरुप यज्ञम्।
स्वश्वो यो अभीरुर्मन्यमानः सुष्वाणेभिर्मदति सं ह वीरैः॥
मनुष्यों के हितकारी तथा सर्ववेत्ता इन्द्र देव सोमाभिषवकारियों द्वारा आहूत होकर यज्ञ के उद्देश्य से आगमन करें। वे सुन्दर अश्वों से युक्त हैं, वे निर्भय हैं, वे सोमाभिषवकारियों द्वारा स्तुत होते हैं एवं वीर मरुतों के साथ आनन्दित होते हैं।[ऋग्वेद 4.29.2]
प्राणियों को कल्याण करने वाले, सभी ज्ञानों को जानने वाले, इन्द्र सोम सिद्ध करने वालों द्वारा आमंत्रित किये जाने पर यज्ञ के लिए आएँ। वे इन्द्र सुशोभित घोड़ों वाले, निडर, पूज्य तथा वीर मरुद्गण सहित पुष्टि को प्राप्त होते हैं।
Let all knowing Indr Dev, helping humans, join the Yagy on being worshiped by those who extract Somras. He is fearless, possess beautiful horses, prayed by the extractors of Somras and enjoy with Marud Gan.
श्रावयेदस्य कर्णा वाजयध्यै जुष्टामनु प्र दिशं मन्दयध्यै।
उद्वावृषाणो राधसे तुविष्मान्करन्न इन्द्रः सुतीर्थाभयं च॥
हे स्तोता! आप इन्द्र देव के कर्णद्वय में इन्द्र देव का शुभ करने के लिए और सब दिशाओं में अतिशय हर्षित करने के लिए स्तोत्रों को श्रवण करावें। सोमरस से सिक्त बलवान इन्द्र देव हम लोगों के धन के लिए शोभन तीर्थों को भय रहित करें।[ऋग्वेद 4.29.3]
हे मनुष्यों! इन्द्र देव की शक्ति की वृद्धि के लिए तथा उन्हें प्रत्येक प्रकार से सन्तुष्ट करने के लिए उनके दोनों कानों में श्लोक को श्रवण कराओ। सोम रस से सींचे गये पराक्रमी इन्द्रदेव हमारे धन के लिए उत्तम स्थानों को भय से मुक्त करें।
Hey Stota-worshipers! Let Indr Dev listen-hear the hymns through both ears, make all direction happy and auspiciousness. Satisfied by drinking Somras let mighty Indr Dev make the pilgrimage fearless for our wealth.
अच्छा यो गन्ता नाधमानमूती इत्था विप्रं हवमानं गृणन्तम्।
उप त्मनि दधानो धुर्या ३ शून्त्सहस्त्राणि शतानि वज्रबाहुः॥
वज्रबाहु इन्द्र देव अपने वशीभूत सहस्र संख्यक तथा शत संख्यक शीघ्रगामी अश्वों को रथ वहन प्रदेश में संस्थापित करते हैं एवं रक्षा करने के लिए याचक, मेधावी आह्लादकारी और प्रार्थनाकारी याजकगण के समीप जाते हैं।[ऋग्वेद 4.29.4]
भुजाओं में वज्र धारण करने वाले इन्द्र देव अपने बहुसंख्यक अश्वों को रथ में चलने के लिए जोड़ते हैं और रक्षा करने के लिए मेधावी हर्ष प्रदान करने वाले, वंदना करते हुए याचक यजमान के समीप जाते हैं।
Bearing Vajr in his arms, Indr Dev deploy his hundreds and thousands of fast moving horses in the charoite and move to the intelligent Ritviz-hosts who make pleasant prayers.
त्वोतासो मघवन्निन्द्र विप्रा वयं ते स्याम सूरयो गृणन्तः।
भेजानासो बृहदिवस्य राय आकाय्यस्य दावने पुरुक्षोः॥
हे धनवान इन्द्र देव! हम लोग आपके स्तोता हैं। हम लोग आपके द्वारा रक्षित हैं, मेधावी और स्तुतिकारी है। आप दीप्ति विशिष्ट, स्तुति योग्य और अन्न विशिष्ट है। ऐश्वर्य प्रदान करने के समय हम मनुष्य आपकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.29.5]
हम वंदनाकारी विद्वान तुम्हारे निकट रक्षित हैं। तुम ज्योतिवान अन्नवान और वन्दनाओं के पात्र हों। धन प्रदान करने वाले समय में हम तुम्हारा यजन करें।
Hey rich Indr Dev! We are your worshipers. We are protected by you, and worship you. You are radiant, deserve prayers and grant food grains. We are intelligent, pray you when you grant us grandeur.(16.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (30) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- गायत्री, अनुष्टुप।
नकिरिन्द्र त्वदुत्तरो न ज्यायाँ अस्ति वृत्रहन्। नकिरेवा यथा त्वम्॥
हे शत्रु संहारक इन्द्र देव! इस लोक में आपकी अपेक्षा कोई भी श्रेष्ठ नहीं है, आपकी अपेक्षा कोई भी प्रशस्यतर नहीं है। हे इन्द्र देव! आप जिस प्रकार लोक में प्रसिद्ध हैं, उस तरह कोई भी प्रसिद्ध नहीं है।[ऋग्वेद 4.30.1]
हे इन्द्र देव! तुम वृत्र का संहार करने वाले हो। इस संसार में तुमसे बढ़कर कोई श्रेष्ठ नहीं है। तुमसे बढ़कर इस संसार में कोई दूसरा महान नहीं है। तुमसे बढ़कर कोई विशाल भी नहीं है। तुम संसार में जितने प्रसिद्ध हो, उतना विख्यात भी कोई नहीं है।
Hey slayer of the enemy Indr Dev! No other person in this world is as famous-popular as you are.
सत्रा ते अनु कृष्टयो विश्वा चक्रेव वावृतुः। सत्रा महाँ असि श्रुतः॥
सभी जगह व्याप्त चक्र जिस प्रकार शकट अर्थात गाड़ी का अनुवर्तन करता है, उसी प्रकार प्रजागण आपका अनुवर्तन करते हैं। हे इन्द्र देव! आप सचमुच महान और गुणों द्वारा विख्यात हैं।[ऋग्वेद 4.30.2]
हे इन्द्र देव! सर्वव्यापी पहिया जैसा गाड़ी के पीछे चलता है, वैसे ही प्रजाजन भी तुम्हारे पीछे चलते हैं। तुम मेधावी हो। तुम अपने गुणों द्वारा देवताओं में प्रसद्धि हो।
Verily men are attached to you as are all the wheels to the body of the wagon-cart; in truth you are great and renowned.
The humans are attached with you like the wheels are attached to the cart. You are intelligent and known for your qualities-virtues amongest the demigods-deities.
विश्वे चनेदना त्वा देवास इन्द्र युयुधुः। यदहा नक्तमातिरः॥
विजय की अभिलाषा से सब देवों ने बलरूप से आपकी सहायता प्राप्त करके असुरों के साथ युद्ध किया। उस समय आपने अहर्निश शत्रुओं का वध किया।[ऋग्वेद 4.30.3]
अहर्निश :: दिन-रात लगातार; round the clock, photeolic.
हे इन्द्र देव! विजय की अभिलाषा वाले जब देवों ने शक्ति के रूप में तुम्हारी सहायता ग्रहण करके असुरों से युद्ध किया था।
The demigods-deities fought with the demons with your help-support. At that time you continuously killed the demons, day & night.
यत्रोत बाधितेभ्यश्चक्रंकुत्साय युध्यते। मुषाय इन्द्र सूर्यम्॥
हे इन्द्र देव! जिस युद्ध में आपने युद्धकारी कुत्स एवं उसके सहायकों के लिए सूर्य के रथ चक्र का भी अपहरण कर लिया।[ऋग्वेद 4.30.4]
तब तुमने युद्धरत कुत्स और उसके सहायकों के लिए सूर्य पर चक्र को घुमाया और अपने व्यक्तियों की सुरक्षा की थी।
Hey Indr Dev! You controlled the cycle of the Sun, while fighting with Kuts-demon & his warriors.
यत्र देवाँ ऋघायतो विश्वाँ अयुध्य एक इत्। त्वमिन्द्र वनूँरहन्॥
हे इन्द्र देव! जिस युद्ध में आपने एकाकी होकर देवों के बाधक सकल राक्षसों के साथ युद्ध किया तथा उन हिंसकों का वध कर दिया।[ऋग्वेद 4.30.5]
हे इन्द्र देव! युद्ध में तुमने अकेले ही हिंसा करने वाले तथा सभी देवताओं को विघ्न देने वाले असुरों से युद्ध किया था, उसमें उन सभी को तुमने मार दिया था।
Hey Indr Dev! You killed all the violent demons single handily in the war.
यत्रोत मर्त्याय कमरिणा इन्द्र सूर्यम्। प्रावः शचीभिरेतशम्॥
हे इन्द्र देव! जिस संग्राम में आपने एतश ऋषि के लिए सूर्य की भी हिंसा की, उस समय युद्ध कर्म द्वारा आपने एतश की रक्षा की।[ऋग्वेद 4.30.6]
हे इन्द्र देव! तुम जिस संग्राम में एतश के लिए सूर्य पर भी आक्रमण किया था, उस घोर संग्राम द्वारा तुमने एतश मुनि की भली-भांति रूप से रक्षा की थी।
Hey Indr Dev you discomfited Sun, for protecting Etash by your exploits.
DISCOMFIT :: परेशान, अशांत; make (someone) feel uneasy or embarrassed.
Hey Indr Dev! You protected Etash Muni in that furious war with your fighting skills and disturbed the Sun.
किमादुतासि वृत्रहन्मघवन्मन्युमत्तमः। अत्राह दानुमातिरः॥
हे आवरक अन्धकार के हननकर्ता धनवान इन्द्र देव! उसके बाद क्या आप अत्यन्त क्रोधवान हुए? इस अन्तरिक्ष में और दिवस में आपने दानु पुत्र वृत्रासुर का वध कर दिया।[ऋग्वेद 4.30.7]
हे वृत्र रूप आवरणकारी अंधकार को दूर करने वाले इन्द्र और दुष्टों पर अत्यधिक क्रोध करने वाले हो। तुम प्रजाओं को छिन्न-भिन्न करने वाले असुरों का वध करो।
Hey remover of darkness, wealthy Indr Dev! Thereafter, your became angry and killed Vrata Sur the son of Danu in the space, during the day.
एतद्धेदुत वीर्य १ मिन्द्र चकर्थ पौंस्यम्।
स्त्रियं यद्दुर्हणायुवं वधीर्दुहितरं दिवः॥
हे इन्द्र देव! आपने बल को इस प्रकार से सामर्थ्य युक्त किया। आपने सूर्य देव तथा द्युलोक की दुहिता पुत्री उषा का भी वध किया।[ऋग्वेद 4.30.8]
हे इन्द्र देव! तुम पुरुषोचित्त वीर कर्मों को करने वाले हो। जैसे सूर्य अपने उजाले से उषा को नष्ट कर देता है, वैसे ही तुम एकत्र हुई शत्रु सेना को समाप्त कर दो।
Hey Indr Dev! You performed like a great warrior. The way Sun shines and replace Usha-day break, you destroyed the enemy armies.
दिवश्चिद्धा दुरितं महन्मदीययानाम्। उषासमिन्द्र स पिणक्॥
हे महान इन्द्र देव! आपने द्युलोक की दुहिता तथा पूजनीया उषा को सम्पिष्ट किया।[ऋग्वेद 4.30.9]
संपुष्टि :: पुष्टिकरण; पक्का करना; nourish.
Hey mighty Indr Dev! You have enriched revered, glorious dawn Usha-the daughter of heaven-Sun.
Hey great Indr Dev! You nourished Usha, the honoured daughter of heaven.
अपोषा अनसः सरत्संपिष्टादह बिभ्युषी। नि यत्सीं शिश्नथद्वृषा॥
अभीष्टवर्षी इन्द्रदेव ने जब उषा के शकट को भग्न किया, तब उषा भयभीत होकर इन्द्र देव द्वारा भग्न शकट के ऊपर से अवतीर्ण हुई।[ऋग्वेद 4.30.10]
अभिलाषाओं के वर्षक इन्द्र देव जब तुमने उषा के रथ को छिन्न-भिन्न कर डाला था, तब उषा भयभीत होकर इन्द्र द्वारा तोड़े हुए रथ के ऊपर से प्रकट हुई थी।
Hey great, desires accomplishing Indr Dev! When you destroyed the charoite of Usha, she appeared over the broken charoite.
एतदस्या अनः शये सुसंपिष्टं विपाश्या। ससार सीं परावतः॥
इन्द्र देव द्वारा विचूर्णित उषा देवी का शकट विपाशा नदी के किनारे पर गिर पड़ा। शकट के टूट जाने पर उषा देवी दूर देश में चली गई।[ऋग्वेद 4.30.11]
इन्द्र द्वारा तोड़ा गया वह उषा का रथ विपाशा नदी के किनारे जा पड़ा। रथ के भस्म होने पर उषा दूर देश में अचेत अवस्था में जाकर गिरी।
Powdered-broken cart of Usha fell over the bank of river Vipasha. Usha shifted else where-other region, due to the breaking of her cart.
उत सिन्धुं विबाल्यं वितस्थानामधि क्षमि। परि ष्ठा इन्द्र मायया॥
हे इन्द्र देव! आपने सम्पूर्ण जलों तथा तिष्ठमाना नदी को पृथ्वी के ऊपर बुद्धि बल से सभी जगह संस्थापित किया।[ऋग्वेद 4.30.12]
हे इन्द्र देव! तुमने सभी जलों को तथा तिष्ठमाना नदी को इस भूमण्डल पर अपनी बुद्धि के पराक्रम से प्रकट किया था।
Hey Indr Dev! You established water & Tishthmana river over the earth by virtue of your intelligence.
उत शुष्णस्य धृष्णुया प्र मृक्षो अभि वेदनम्। पुरो यदस्य संपिणक्॥
हे इन्द्र देव! आप वर्षणकारी है। जिस समय आपने शुष्ण नामक असुर के नगरों को नष्ट किया, उस समय आपने उसके धनों को लूट लिया।[ऋग्वेद 4.30.13]
हे इन्द्रदेव तुम वृष्टि करने वाले हो। अब तुमने शुष्ण के नगरों का विनाश किया था तब तुमने उसके धन को भी लूटा था।
Hey Indr Dev! You cause rains. You destroyed & plundered the cities of demon Shushn.
PLUNDERED :: लूटा, डाका डालना, चुराना; rob, flay, ransack, loot, despoil, pillage, depredate, reave, reive, steal, thieve, pilfer, filch, purloin, lift.
उत दासं कौलितरं बृहतः पर्वतादधि। अवाहन्निन्द्र शम्बरम्॥
हे इन्द्र देव! आपने कुलितर के पुत्र दास शम्बर को बृहत पर्वत के ऊपर से नीचे की ओर गिरा कर मार डाला।[ऋग्वेद 4.30.14]
हे इन्द्र देव! तुमने कौलितर के पुत्र शम्बर नामक राक्षस को शैल से नीचे गिराकर मार दिया।
Hey Indr Dev! You threw the son of Kulitar, Shambar from the high mountain and killed him.
उत दासस्य वर्चिनः सहस्राणि शतावधीः। अधि पञ्च प्रधींरिव॥
हे इन्द्र देव! चक्र के चतुर्दिक स्थित शंकु (हिंसक) के तुल्य वर्चि नामक दास के चतुर्दिक स्थित पञ्चशत संख्यक और सहस्र संख्यक अनुचरों को आपने विशेष रूप से मार डाला।[ऋग्वेद 4.30.15]
हे इन्द्र देव! चक्र के चारों ओर स्थित शंकु के समान वर्चि नामक दस्यु के चारों ओर स्थित पाँच सौ सहस्त्र संख्यक के दासों को तुमने मार दिया था।
Hey Indr Dev! You killed the five hundred thousand followers-servants, soldiers surrounding the disc in all directions like Shanku-violent; of the slave called Varchi.
उत त्यं पुत्रमग्रुवः परावृक्तं शतक्रतुः। उक्थेष्विन्द्र आभजत्॥
शतकर्मा इन्द्र देव ने अग्रु के पुत्र परावृत्त को स्तोत्रों का पाठ करने योग्य बनाया।[ऋग्वेद 4.30.16]
हे इन्द्रदेव! तुमने प्रशंसा के योग्य कार्यों में भी उन अग्रु पुत्रों को दुखों से बचाकर यज्ञ का भागी बनाया।
Thousand Yagy performing Indr Dev enabled Paravratt the son of Agru, recite the sacred hymns-Strotr.
उत त्या तुर्वशायदु अस्नातारा शचीपतिः। इन्द्रो विद्वाँ अपारयत्॥
ययाति के शाप से अनभिषिक्त प्रसिद्ध राजा यदु और तुर्वश को शची के पति विद्वान इन्द्र देव ने अभिषेक योग्य बनाया।[ऋग्वेद 4.30.17]
अभिषेक :: प्रतिष्ठापन, समझाना, बतलाना, स्नान; coronation, consecration, ablution, anointment.
शचि पति इन्द्र ने ययापि के शाप से च्युत यदु और तुर्वश को संकट से दूर किया।
Indr Dev, the husband of Shachi, enabled king Yadu & Turvash for re-coronation, who were to be cursed by Yayati.
उत त्या सद्य आर्या सरयोरिन्द्र पारतः। अर्णाचित्ररथावधीः॥
हे इन्द्र देव! आपने तत्क्षण सरयू नदी के पार में रहने वाले आर्यत्वाभिमानी अर्ण और चित्ररथ नामक राजा का वध किया।[ऋग्वेद 4.30.18]
हे इन्द्र! तुमने तत्क्षण सरयू के पार रहने वाले अर्ण तथा चित्र रथ राजा को मार दिया था।
Hey Indr Dev! You killed immediately king Arn & Chitr Rath who lived across the river Saryu.
अनु द्वा जहिता नयोऽन्यं श्रोणं च वृत्रहन्। न तत्ते सुम्नमष्टवे॥
हे वृत्र हन्ता इन्द्र देव! आपने बन्धुओं द्वारा त्यागे गये अन्ध और पंगु को अनुनीत किया अर्थात उनके अन्धत्व और पंगुत्व को विनष्ट किया। आपके द्वारा प्रदत्त सुख का अतिक्रमण करने में कोई भी समर्थ नहीं हो सकता।[ऋग्वेद 4.30.19]
पंगु :: लँगड़ा, गतिहीन, वात रोग से ग्रस्त व्यक्ति; लुंज-पुंज, लंगड़ा-लूला, असन्तोषजनक, कच्चा, अपूर्ण; crippled, lame, lacerated.
हे वृत्र नाशक इन्द्रदेव! तुमने बंधुओं द्वारा त्यागे गये नेत्रहीन एवं अपंग पर भी दया की थी। तुम्हारे द्वारा दिए सुख को नष्ट करने में कोई भी सक्षम नहीं हैं।
Hey slayer of Vratr Indr Dev! You cured the blind and crippled, discarded by the brothers. No one can vanish the comforts granted by you.
शतमश्मन्मयीनां पुरामिन्द्रो व्यास्यत्। दिवोदासाय दाशुषे॥
इन्द्र देव ने प्रदाता याजकगण दिवोदास को शम्बर के पाषाण निर्मित शत संख्यक नगर प्रदान किया।[ऋग्वेद 4.30.20]
इन्द्र देव ने हविदान करने वाले यजमान दिवोदास को शम्बर के पत्थर से बने सौ नगर दिये।
Indr Dev granted the hundred cities of Shambar built with stone, to Divodas who made offering for him.
अस्वापयद्दभीतये सहस्रा त्रिंशतं हथैः। दासानामिन्द्रो मायया॥
इन्द्र देव ने दभीति के लिए अपनी शक्ति से तीस हजार राक्षसों को हनन-साधन आयुधों के द्वारा पृथ्वी पर सुला दिया।[ऋग्वेद 4.30.21]
इन्द्र ने अपनी माया से दस्युओं की तीन सौ सहस्त्र सेना का नाश करने के लिए यज्ञ करने वाले अस्त्रों से धरती पर सुला दिया।
Indr Dev slayed (laid them over the earth), thirty thousand demons for Dabhiti with his might & power.
स घेदुतासि वृत्रहन्त्समान इन्द्र गोपतिः। यस्ता विश्वानि चिच्युषे॥
हे इन्द्र देव! आपने इन समस्त शत्रुओं को प्रच्युत किया। हे शत्रुओं के हिंसक इन्द्र देव! आप गौओं के पालक है। आप सम्पूर्ण याजकगणों के लिए समान रूप से प्रख्यात है।[ऋग्वेद 4.30.22]
हे इन्द्र! तुम वृत्र का संहार करने वाले हो। तुमने समस्त शत्रु सेनाओं को युद्ध क्षेत्र में विचलित कर दिया। तुम धेनुओं के पोषणकर्त्ता हो।
Hey Indr Dev! You destroyed all the enemies. You serve-nurture the cows. You are honoured by the Ritviz.
उत नूनं यदिन्द्रियं करिष्या इन्द्र पौंस्यम्। अद्या नकिष्टदा मिनत्॥
हे इन्द्र देव! जिस लिए आपने अपने बल को सामर्थ्यवान किया, इसीलिए आज भी कोई व्यक्ति उसको हिंसा नहीं कर सकता।[ऋग्वेद 4.30.23]
तुम जिस शक्ति और समृद्धि को धारण करते हो, उसकी हिंसा आज भी कोई मनुष्य करने में समर्थ नहीं है।
Hey Indr Dev! None can destroy your power, might & strength.
वामवास त आदुरे देवो ददात्वर्यमा।
वामं पूषा वामं भगो वामं देवः करूळती॥
हे शत्रु विनाशक इन्द्रदेव! अर्यमा देवता आपको वह मनोहर धन प्रदान करें, दन्त हीन पूषा वह मनोहर धन प्रदान करें और भग वह मनोहर धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.30.24]
हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं का पतन करने वाले हो, अर्यमा सुन्दर धन को प्रदान करें। दन्त विहीन पूषा और भग भी रमणीय धन को प्रदान करें।
Hey destroyer of the enemy Indr Dev! Let Aryma, Pusha-who has no teeth & Bhag grant you lovely riches, gifts.(20.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (31) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- गायत्री।कया नश्चित्र आ भुवदूती सदावृधः सखा। कया शचिष्ठया वृता॥
सर्वदा वर्द्धमान, पूजनीय और मित्र भूत इन्द्र देव किस तर्पण द्वारा हमारे अभिमुख आगमन करेंगे? किस प्रज्ञा युक्त श्रेष्ठ कर्म द्वारा हम लोगों के अभिमुख आगमन करेंगे।[ऋग्वेद 4.31.1]
वे हमेशा वृद्धि करने वाले, पूषा के पात्र सखा रूपी इन्द्र देव किस पुष्प द्वारा हमारे सामने पधारेंगे। किस गतिवान के महान कार्य से प्रभावित हुए वे हमारे सम्मुख पधारेंगे।
By what means will Indr Dev, who is ever augmenting, wonderful, our friend, be present with us, by what most effective rite?
By which means, always advancing-progressing, revered Indr Dev will invoke in front of us? Which intelligent & excellent endeavour will bring him to us?
कस्त्वा सत्यो मदानां मंहिष्ठो मत्सदन्धसः। दृळ्हा चिदारुजे वसु॥
हे इन्द्र देव! पूजनीय, सत्य भूत और हर्षकर सोमरसों के बीच में कौन सोमरस शत्रुओं के धन को विनष्ट करने के लिए आपको हर्षित करेगा?[ऋग्वेद 4.31.2]
हे इन्द्र देव! सत्य रूपी और हर्षित करने वाले सोम रसों के मध्य, शत्रुओं के धन का पतन करते हुए तुम्हें कौन सा सोमरस संतुष्ट करेगा?
Hey Indr Dev! Which Somras amongest the honoured-respected, blissful, truthful Somras will please-motivate you to destroy the wealth of the enemy?
अभी षु णः सखीनामविता जरितॄणाम्। शतं भवास्यूतिभिः॥
हे इन्द्र देव! आप मित्र स्वरूप स्तोताओं के रक्षक है। आप बहुत प्रकार की रक्षा के साथ हमारे अभिमुख आगमन करें।[ऋग्वेद 4.31.3]
हे इन्द्र देव! तुम सखा रूप वंदना करने वालों के रक्षक हो, अपने अनेक रक्षा साधनों के साथ हमारे सम्मुख पधारो।
Hey Indr Dev! you are the protector of the friendly Stota-household. Invoke here with various means of safety, in front of us.
अभी न आ ववृत्स्व चक्रं न वृत्तमर्वतः। नियुद्भिश्चर्षणीनाम्॥
हे इन्द्र देव! हम लोग आपके उपगन्ता हैं। आप हम मनुष्यों की प्रार्थना से प्रसन्न होकर हमारे निकट वृत्ताकार चक्र के तुल्य पधारें।[ऋग्वेद 4.31.4]
हे इन्द्र देव! हम तुम्हारे मार्ग पर चलने वाले हैं। हम प्राणियों की प्रार्थनाओं से प्रसन्न होते हुए तुम हमारे सम्मुख वृत्ताकार चक्र के सम्मुख आओ।
Hey Indr Dev! We are your followers. Be happy with our prayers and obelize us by coming to us like a rotating wheel (while pool).
प्रवता हि क्रतूनामा हा पदेव गच्छसि। अभक्षि सूर्वे सचा॥
हे इन्द्र देव! आप यज्ञ के प्रवण प्रदेश में अपने स्थान को जानकर आगमन करते हैं। हम सूर्य के साथ आपकी उपासना करते हैं।[ऋग्वेद 4.31.5]
हे इन्द्र देव! तुम यज्ञ में अपने स्थान को समझते हुए यहाँ पधारो। सूर्य के साथ हम तुम्हारा पूजन करते हैं।
Hey Indr Dev! Maintaining your dignity in the Yagy, you arrive here. WE worship you along with the Sun.
सं यत्त इन्द्र मन्यवः सं चक्राणि दधन्विरे। अध त्वे अध सूर्ये॥
हे इन्द्र देव! आपके लिए सम्पादित प्रार्थना और कर्म जब हम लोगों के द्वारा अनुमन्यमान होते हैं, तब वे पहले आपके होते हैं और उसके पश्चात सूर्य देव के होते हैं।[ऋग्वेद 4.31.6]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे लिए सम्पादन की गई वंदना तथा कार्य जब एक साथ ऊपर उठते हैं तब वे पहले तुम्हारे और फिर सूर्य के होते हैं।
Hey Indr Dev! When we perform prayers and make offerings we worship you first, followed by the Sun.
उत स्मा हि त्वामाहुरिन्मघवानं शचीपते। दातारमविदीधयुम्॥
हे कर्म पालक इन्द्र देव! आपको लोग धनवान, स्तोताओं के अभीष्टप्रद और दीप्तिमान कहते है।[ऋग्वेद 4.31.7]
हे इन्द्र देव! तुम कार्यों के रक्षक हो। तुमको धनशाली और वंदनाकारी की कामना पूर्ण करने वाला तथा तपस्वी कहा जाता है।
Hey Indr Dev! You protect our efforts-endeavours. Public calls you rich-wealthy, worship deserving, glorious-radiant.
उत स्मा सद्य इत्परि शशमानाय सुन्वते। पुरू चिन्मंहसे वसु॥
हे इन्द्र देव! आप क्षण भर में ही स्तुति कारी तथा सोमाभिषवकारी याजक गण को बहुत धन प्रदत करते हैं।[ऋग्वेद 4.31.8]
हे इन्द्र देव! सोम सिद्ध करने वाले तथा प्रार्थना करने वाले यजमान को तुम तुरन्त ही अनेक सा धन प्रदान करते हो।
Hey Indr Dev! You grant a lot of riches-wealth to the worshipers, those who extract Somras for you.
नहि ष्मा ते शतं चन राधो वरन्त आमुरः। न च्यौत्नानि करिष्यतः॥
हे इन्द्र देव! बाधक राक्षस आदि आपके शत परिमित धन का निवारण नहीं कर सकते। शत्रुओं की हिंसा करने वाले आपके बल का निवारण नहीं कर सकते।[ऋग्वेद 4.31.9]
हे इन्द्र! विघ्न देने वाले राक्षस भी तुम्हारे सैंकड़ों ऐश्वर्य को रोक नहीं पाते। विभिन्न बल वाले वीर कर्मा भी तुम्हारी शक्ति को नहीं रोक पाते।
Hey Indr Dev! The demons creating obstacles, can not check-prohibit your grandeur. The violent who kill the opponents, can not prohibit your might, power, strength.
अस्माँ अवन्तु ते शतमस्मान्त्सहस्रमूतयः। अस्मान्विश्वा अभिष्टयः॥
हे इन्द्र देव! आपकी शत संख्यक रक्षा हम लोगों की रक्षा करे। आपकी सहस्र संख्यक रक्षा हम लोगों की रक्षा करे। आपका समस्त अभिगमन हम लोगों की सुरक्षा करें।[ऋग्वेद 4.31.10]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे हजारों रक्षा साधन हमारे रक्षक हों। तुम्हारे हजारों रक्षा साधन हमारी रक्षा करें। तुम्हारी सभी प्रेरणाएँ रक्षा में सहायक हों।
Hey Indr Dev! Let your multiple-thousands means protect us.
अस्माँ इहा वृणीष्व सख्याय स्वस्तये। महो राये दिवित्मते॥
हे इन्द्र देव! इस यज्ञ में आप हम याजक गणों के मित्र, अविनाशी तथा दीप्ति युक्त धन का भागी बनावें।[ऋग्वेद 4.31.11]
हे इन्द्र देव! हम यजमानों को इस यज्ञ में सखा रूप, कभी नष्ट न होने वाला तथा प्रकाश से युक्त धन का अधिकारी बनाओ।
Hey Indr Dev! You should share-enjoy the imperishable, glorious wealth in this Yagy, being our friend-the Ritviz.
अस्माँ अविड्ढि विश्वहेन्द्र राया परीणसा। अस्मान्विश्वाभिरूतिभिः॥
हे इन्द्र देव! आप प्रतिदिन हम लोगों की अपने महान धनों द्वारा रक्षा करें और समस्त रक्षा कर्मों द्वारा हमारी रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.31.12]
हे इन्द्र देव! प्रतिदिन अपने श्रेष्ठ धन द्वारा हमारे रक्षक बनो।
Hey Indr Dev! Protect us and our wealth eceryday.
अस्मभ्यं ताँ अपा वृधि व्रजाँ अस्तेव गोमतः। नवाभिरिन्द्रोतिभिः॥
हे इन्द्र देव! आप शूर के तुल्य नूतन रक्षा द्वारा हम लोगों के लिए गो विशिष्ट गोव्रज (गौओं के निवास स्थान) का उद्धार करें।[ऋग्वेद 4.31.13]
हे इन्द्र! वीर के समान अपने नए रक्षा साधन द्वारा हमारे लिए गौओं के वास को पुष्ट करो।
Hey Indr Dev! Like a brave person you should protect & support the cows sheds with new means-weapons.
अस्माकं धृष्णुया रथो द्युमाँ इन्द्रानपच्युतः। गव्युरश्वयुरीयते॥
हे इन्द्र देव! हम लोगों का शत्रु धर्षक, दीप्तिमान, विनाश रहित, गोयुक्त और अश्व युक्त रथ सभी जगह गमन करे। आप उस रथ के साथ हम याजकों की रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.31.14]
हे इन्द्र देव! तुम हमारे शत्रुओं को मारने वाले अत्यन्त तेजस्वी, अविनाशी गायों से युक्त अश्वों वाले रथ में सभी ओर जाने वाले हो। तुम उस रथ के साथ हमारे रक्षक बन जाओ।
Hey Indr Dev! Let our radiant, imperishable chariots having cows & horse roam every where. Protect us along with that charoite.
अस्माकमुत्तमं कृषि श्रवो देवेषु सूर्य। वर्षिष्ठं द्यामिवोपरि॥
हे सभी के प्रेरक सूर्य देव! आपने जिस प्रकार से सेचन समर्थ द्युलोक को ऊपर में स्थापित कर दिया, उसी प्रकार से देवों के बीच में हम लोगों के यश को उत्कृष्ट करें।[ऋग्वेद 4.31.15]
हे सूर्य! तुम सबको प्रेरणा प्रदान करते हो। तुमने बरसात में समर्थ नभ को जैसे उच्च स्थापित किया है, वैसे ही देवताओं के बीच हमारे यज्ञ को बढ़ाओ।
Hey Sury Dev-Sun, inspiring all! The way-manner in which you have established the heavens at a high altitude in the sky, enhance-boost the glory of our Yagy, amongest the demigods-deities.(23.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (32) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र, अश्व, छन्द :- गायत्री।
आ तू न इन्द्र वृत्रहन्नस्माकमर्धमा गहि। महान्महीभिरूतिभिः॥
हे शत्रु हिंसक इन्द्र देव! आप शीघ्र ही हम लोगों के निकट आगमन करें। आप महान है। महान रक्षा के साथ आप हमारे निकट आगमन करें।[ऋग्वेद 4.32.1]
हे इन्द्र देव! तुम शत्रुओं के शोषणकर्त्ता हो। तुम हमारे सामने शीघ्रतम पधारो। तुम सर्वश्रेष्ठ हो। अपनी सर्वश्रेष्ठ रक्षाओं से युक्त हमारे सम्मुख आओ।
Hey slayer-destroyer of the enemy, great Indr Dev! Come to us quickly and grant asylum-protection.
भृमिश्चिद्धासि तूतुजिरा चित्र चित्रिणीष्वा। चित्रं कृणोष्यूतये॥
हे पूजनीय इन्द्र देव! आप भ्रमणशील और हम लोगों के अभीष्टदाता है। चित्र कर्म युक्त प्रजा को आप रक्षा के लिए धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.2]
हे इन्द्र देव! तुम पूजा के योग्य हो। तुम विचरणशील हो। तुम हमको इच्छित फल प्रदान करते हो। तुम प्रजा को पोषण के लिए धन देते हो।
Hey Indr Dev! You deserve worship. You are dynamic and accomplish our desires. You nourish, support and nurture the humans-populace.
दभ्रेभिश्चिच्छशीयांसं हंसि व्राधन्तमोजसा। सखिभिर्ये त्वे सचा॥
हे इन्द्र देव! जो याजकगण आपके साथ संगत होते हैं, उन थोड़े से भी याजकगणों के साथ आप उत्प्लवमान तथा वर्द्धमान शत्रुओं को अपने बल से विनष्ट करते है।[ऋग्वेद 4.32.3]
हे इन्द्र देव! जो यजमान तुम्हारे अनुकूल होते हैं, उन थोड़े यजमानों सहित तुम उच्छृंखल, बड़े हुए शत्रुओं को अपने उत्तम बल से नष्ट करते हो।
Hey Indr Dev! You kill-destroy the enemy with the small numbers of the Ritviz who are associated with you, with your might-power.
वयमिन्द्र त्वे सचा वयं त्वाभि नोनुमः। अस्माँ अस्माँ इदुदव॥
हे इन्द्र देव! हम याजकगण आपसे संगत हुए हैं। हम अधिक परिमाण में आपकी प्रार्थना करते हैं। आप हम सबकी विशेष रूप से रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.32.4]
सुसंगत :: सिलसिलेवार, क्रमबद्ध, तर्कयुक्त, तर्कसंगत, परंपरा-संबंधी, संसक्त, स्पष्ट, संगत, बद्ध; compatible, coherent, sequential, sequent, virtuous-auspicious-pious company.
हे इन्द्र देव! हम यजमान तुम्हारे द्वारा सुसंगत हुए हैं। हम तुम्हारी अत्यन्त प्रार्थना करते हैं। तुम्हारा विशेष रूप से पोषण करते हैं।
Hey Indr Dev! We hosts-Ritviz attained your virtuous company. We have increased the quantum of your worship-prayer. Take care of us, specially.
स नश्चित्राभिरद्रिवोऽनवद्याभिरूतिभिः। अनाधृष्टाभिरा गहि॥
हे वज्र धर! आप मनोहर, अनिन्दित और शत्रुओं के द्वारा अग्रहर्षित अर्थात अनाक्रमणीय रक्षाओं के साथ हमारे निकट आगमन करें।[ऋग्वेद 4.32.5]
वे वज्रिन! आनन्दमयी! दिव्य शत्रुओं के द्वारा पराजित न होने वाले, तुम अपनी समृद्ध सुरक्षाओं से युक्त हमारे निकट पधारो।
Wielder of the thunderbolt-Vajr, come to us with wondrous, irreproachable, irresistible protections.
Hey Vajr wielding! Hey attractive, blissful, undefeated by the enemy, come to us with the means of protection for us.
भूयामो षु त्वावतः सखाय इन्द्र गोमतः। युजो वाजाय घृष्वये॥
हे इन्द्र देव! हम आपके सदृश गोयुक्त देवता के मित्र है। प्रभूत अन्न के लिए आपके साथ संयुक्त होते हैं।[ऋग्वेद 4.32.6]
हे इन्द्र देव! हम तुम्हारे तुल्य धेनु सहित पुरुष के उपयोगी हैं। हम महान धन के लिए तुम्हारी सहायता को चाहते हैं।
Hey Indr Dev! We are friendly with the demigods-deities possessing cows. We associate-coordinate our self with you for plenty of food grains & money.
त्वं ह्येक ईशिष इन्द्र वाजस्य गोमतः। स नो यन्धि महीमिषम्॥
हे इन्द्र देव! जिस कारण आप ही एक गोयुक्त अन्न के स्वामी हैं; इसलिए आप हमें प्रभूत अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.32.7]
हे इन्द्र देव! तुम अकेले हो गाय, घोड़े आदि के दाता हो। हमको बहुत सा अन्नादि धन प्रदान करो।
Hey Indr Dev! You are the owner of food grains & cows. Grant us sufficient food grains.
न त्वा वरन्ते अन्यथा यद्दित्ससि स्तुतो मघम्। स्तोतृभ्य इन्द्र गिर्वणः॥
हे स्तुति योग्य इन्द्र देव! जब आप प्रार्थित होकर स्तोताओं को धन प्रदान करने की इच्छा करते हैं, तब कोई भी उसे रोक नहीं सकता।[ऋग्वेद 4.32.8]
हे इन्द्र देव! तुम स्तुति के पात्र हो स्तुति करने वालों को धन देने की कामना करते हो। तुम्हारे उस दान को तब रोकने की शक्ति किसी में नहीं है।
Hey Indr Dev! When you decide to grant riches to the Stota, none is capable of obstructing you.
अभित्वा गौतमा गिरानूषत प्रदानवे। इन्द्र बाजाय घृषवये॥
हे इन्द्र देव! आपको लक्ष्य करके गौतम नाम वाले ऋषि धन और प्रभूत अन्न के लिए प्रार्थना वाक्य द्वारा आपकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.9]
हे इन्द्र देव! तुम्हारे उद्देश्य से गौतम वंशज मुनि अन्न के लिए श्लोक द्वारा पूजन करते हैं।
Hey Indr Dev! Rishis with the title Gautom request-pray you for food grains and money by using sacred Strotr-hymns.
प्र ते वोचाम वीर्या३या मन्दसान आरुजः। पुरो दासीरभीत्य॥
हे इन्द्र देव! सोमपान से हर्षित होकर के आप क्षेपक असुरों के सम्पूर्ण नगरों में अभिगमन करके उन्हें विदीर्ण कर देते हैं। हे इन्द्र देव! हम स्तोता आपके उसी वीरता का कीर्तन करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.10]
हे इन्द्र देव! तुम सोमपान करके पराक्रमी बने क्षेपक राक्षसों के समस्त पुरों में जाकर तोड़ते हो।
Hay Indr Dev! You become happy after drinking Somras and destroy the habitats-cities of the demons. We the Stota, sing the glory of your valour, bravery.
ता ते गृणन्ति वेधसो यानि चकर्थ पौंस्या। सुतेष्विन्द्र गिर्वणः॥
हे इन्द्र देव! आप स्तुति योग्य है। आपने जिन बलों को प्रदर्शित किया। हे इन्द्र देव! प्राज्ञगण सोमाभिषव होने पर आपके उसी बल का संकीर्तन करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.11]
हे इन्द्र देव! तुम वंदना के पात्र हो। तुम जिन बलों को प्रकट करते हो, तुम्हारे उन्हीं बलों को मेधावी लोग सोम के सिद्ध होने पर उच्चारण करते हैं।
Hey Indr Dev! You deserve worship. You demonstrate-exhibit your might, power & valour. The intelligent-prudent sing the glory of your strength after extracting Somras.
अवीवृधन्त गोतमा इन्द्र त्वे स्तोमवाहसः। ऐषु धा वीरवद्यशः॥
हे इन्द्र देव! स्तोत्र वाहक गौतम ऋषि आपको स्तोत्र द्वारा वर्द्धित करते हैं। आप उन्हें पुत्र-पौत्र युक्त कर अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.32.12]
हे इन्द्र! स्तोत्रों को वहन करने वाले गौतम वंशज स्तोत्र से तुम्हें बढ़ाते हैं। तुम उन्हें पुत्रादि से परिपूर्ण अन्न प्रदान करो।
Hey Indr Dev! Gautom Rishi who possess (has the Strotr in his memory) the Strotr, enhance-boost you, through the Strotr. Bless him with sons & grandsons.
यच्चिद्धि शश्वतामसीन्द्र साधारितस्त्वम्। तं त्वा वयं हवामहे॥
हे इन्द्र देव! यद्यपि आप सभी यजमानों के साधारण देवता हैं, तथापि हम स्तोता आपका आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.13]
हे इन्द्र देव! तुम सात यजमानों के विख्यात देवता हो। हम प्रार्थना करने वाले तुम्हें पुकारते हैं।
Hey Indr Dev! Even though you are our demigod-deity, yet we invoke you.
अर्वाचीनो वसो भवास्मे सु मत्स्वान्धसः। सोमानामिन्द्र सोमपाः॥
हे निवासप्रद इन्द्र देव! आप हम यजमानों के समक्ष पधारें। आप सोमपान करने वाले हैं, आप सोमरूप अन्न द्वारा प्रसन्न होवें।[ऋग्वेद 4.32.14]
हे इन्द्र देव! तुम महान निवास प्रदान करते हो। तुम यजमानों के सम्मुख पधारो। हे सोमपान करने वाले इन्द्रदेव! तुम सोम रूप अन्न से पुष्टि को प्राप्त होओ।
Hey Indr Dev! You are the provider of best residence-habitat to us. We invoke you. You enjoy Somras. Be happy with the grains like the Som.
अस्माकं त्वा मतीनामा स्तोम इन्द्र यच्छतु। अर्वागा वर्तया हरी॥
हे इन्द्र देव! हम आपके स्तोता हैं। हमारा स्तोत्र आपको हमारे निकट ले आए। आप अश्वद्वय को हमारे अभिमुख प्रेरित करें।[ऋग्वेद 4.32.15]
हे इन्द्र देव! हम तुम्हारी स्तुति करने वाले हैं, हमारा स्तोत्र तुम्हें हमारे निकट लाए। तुम दोनों अश्वों को हमारे सम्मुख मोड़ों।
Hey Indr Dev! We are your worshipers. Let our Strotr bring you close to us i.e., in our proximity. Direct your horses towards us.
पुरोळाशं च नो घसो जोषयासे गिरश्च नः। वधूयुरिव योषणाम्॥
हे इन्द्र देव! आप हमारे पुरोडाश रूप अन्न का भक्षण करें। स्त्री कामी पुरुष जिस प्रकार से स्त्रियों के वचन की सेवा करता है, उसी प्रकार आप हमारे स्तुति वाक्य का सेवन करें।
हे इन्द्र देव! तुम हमारे पुरोडाश का भक्षण करो जैसे पुरुष स्त्रियों के संकल्पों को सुनता है उसी तरह तुम हमारे संकल्पों को ध्यान पूर्वक सुनो।
Hey Indr Dev! Please eat-accept the offerings of backed barley lobs made by us. Listen to our words the way a lascivious hear-respond to the women.
सहस्त्रं व्यतीनां युक्तानामिन्द्रमीमहे। शतं सोमस्य खार्यः॥
हम स्तोता इन्द्र देव के निकट शिक्षित, शीघ्र गामी तथा सहस्र संख्यक अश्वों की याचना करते हैं एवं शत संख्यक सोम-कलश की याचना करते हैं अर्थात् अपरिमित कलश वाले यज्ञ की याचना करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.17]
हम वंदना करने वाले इन्द्र के पास सीखे हुए शीघ्र चलने वाले सहस्त्रों अश्वों को माँगते हैं और सैकड़ों सोम कलशों की याचना करते हैं।
The Ritviz, devotee, hosts pray-request Indr Dev to grant them trained-skilled fast moving thousand horses, hundred pots-vessels full of Somras for the Yagy.
सहस्रा ते शता वयं गवामा च्यावयामसि। अस्मत्रा राध एतु ते॥
हे इन्द्र देव ! हम आपकी सैकड़ों और हजारों गौओं को आपसे प्राप्त करते हैं। हम लोगों का धन आपके निकट से आवें।[ऋग्वेद 4.32.18]
हे इन्द्र! हम तुम्हारी सैकड़ों तथा हजारों गायों को अपने सम्मुख प्राप्त करें। हमारा धन तुम्हारे पास से यहाँ आए।
Hey Indr Dev! We receive hundreds & thousands of cows from you. Please bring our riches-wealth to us.
दश ते कलशानां हिरण्यानामधीमहि। भूरिदा असि वृत्रहन्॥
हे इन्द्र देव! हम आपके समीप से दश कुम्भ परिमित सुवर्ण प्राप्त करते हैं। हे शत्रु हिंसक इन्द्र देव! आप सहस्र प्रद होते हैं।[ऋग्वेद 4.32.19]
हे इन्द्र! हम तुम्हारे दस कलशों में स्वर्ण धारण करें। हे वृत्र के हननकर्त्ता इन्द्र देव! तुम अपरिचित दान करने वाले हो।
Hey Indr dev! let us receive gold in 10 vessels. Hey slayer of Vratr Indr Dev! You conceal your identity while making donations.
भूरिदा भूरि देहि नो मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि॥
हे इन्द्र देव! आप बहुप्रद है। आप हम लोगों को बहुत धन प्रदान करें। अल्प धन न दे। आप बहुत धन हम लोगों के लिए लावें, क्योंकि आप हम लोगों को प्रभूत धन देने की इच्छा करते हैं।[ऋग्वेद 4.32.20]
बहुप्रद :: व्ययशील, उडाऊ, फजूल खर्च, बहुत, अतिव्ययी; extravagant, lavish.
हे इन्द्र देव! तुम हमें अपरिमित धन प्रदान करने की इच्छा करते हो। तुम बहुत साधन दाता लेकर हमको अत्यन्त धन प्रदान करो। स्वल्प धन न दो। अनेक असंख्य समृद्धि प्रदान करो।
Hey Indr Dev! You are extravagant, lavish. Give us a lot of money since you you wish to give us more.
भूरिदा ह्यसि श्रुतः पुरुत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि॥
हे वृत्र हिंसक विभ्रान्त इन्द्र देव! आप बहुप्रद रूप से अनेकों यजमानों के निकट विख्यात है। आप हम लोगों को धन का भागी बनावें।[ऋग्वेद 4.32.21]
विभ्रांत :: घूमता हुआ, चक्कर खाता हुआ, भ्रम में पड़ा हुआ, विभ्रमयुक्त, विक्षुब्ध-व्याकुल, चारों ओर फैला हुआ; dynamic.
हे वृत्र के शोषण करने वाले पराक्रमी इन्द्रदेव! तुम अनेक धन देने वाले के रूप में यजमानों में विख्यात हो। तुम हमको धन का अधिकारी बनाओ।
Hey slayer of Vratr dynamic Indr Dev! You are known for your habit of donating lavishly. Share money with us.
प्र ते बभ्रु विचक्षण शंसामि गोषणो नपात्। माभ्यां गा अनु शिश्रथः॥
हे प्राज्ञ इन्द्र देव! हम आपके पिङ्गलवर्ण अश्व द्वय की प्रशंसा करते हैं। हे गोप्रद! आप स्तोताओं का विनाश नहीं करते। आप इस अश्व द्वय द्वारा हमारी गौओं को नष्ट न करें।[ऋग्वेद 4.32.22]
हे मेधावी इन्द्रदेव ! हम तुम्हारे लाल रंग वाले दोनों अश्वों की प्रार्थना करते हैं। तुम धेनुओं का दान प्रदान करने वाले हो। तुम वंदना करने वालों को नष्ट नहीं करते। तुम अपने दोनों अश्वों द्वारा हमारी गायों को कष्ट न देना।
Hey intelligent Indr Dev! We appreciate you red coloured horses. Hey donor of cows, you never destroy your worshipers. Use these horses to protect our cows.
कनीनकेव विद्रधे नवे द्रुपदे अर्भके। बभ्रु यामेषु शोभेते॥
हे इन्द्र देव! दृढ़, नव और क्षद्र द्रुमाख्य स्थान में स्थित कमनीय शाल भञ्जिका द्वय (पुतलिका) के तुल्य आपके पिङ्गल वर्ण दोनों घोड़े यज्ञ में शोभा पाते हैं।[ऋग्वेद 4.32.23]
हे इन्द्र देव! जाने योग्य मार्ग में जैसे लाल वर्ण के दो अश्व शोभा पाते हैं, उसी प्रकार स्थिरता नवीन खूंटे के समान कार्यों में दृढ़ स्त्री-पुरुष रूप यजमान सुशोभित होते हैं।
Hey Indr Dev! The way your red coloured horses are gracious over the movable road, the men & women too are gracious in the Yagy.
अरं म उस्त्रयाम्णेऽरमनुस्त्रयाम्णे। बभ्रु यामेष्वस्त्रिधा॥
हे इन्द्र देव! हम जब बैलों से युक्त रथ द्वारा गमन करें अथवा जब पैरों द्वारा गमन करें, तब आपके अहिंसक तथा पिङ्गल वर्ण अश्व द्वय हमारे लिए मंगलकारी हों।[ऋग्वेद 4.32.24]
हे इन्द्र देव! जब हम बैलों से जुते रथ में बैठकर चलें या पैदल यात्रा करें तब तुम्हारे हिंसा रहित लाल रंग वाले दोनों घोड़े हमारे लिए सुखकारी हों।
Hey Indr Dev! Let your red coloured horses be helpful to us when we walk on foot or travel in the charoite deploying oxen.(26.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (33) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- ऋभुगण, छन्द :- त्रिष्टुप्।
प्र ऋभुभ्यो दूतनिव वाचमिष्य उपस्तिरे श्वैतरीं धेनुमीळे।
ये वातजूतास्तरणिभिरेवैः परि द्यां सद्यो अपसो बभूवुः॥
हम याजक गण ऋभुओं के निकट दूत के तुल्य स्तुति वाक्य प्रेरित करते हैं। हम उनके निकट सोम उपस्तरण के लिए पयोयुक्त गौ की याचना करते हैं। ऋभुगण वायु के समान गमन करने वाले है। वे जगत् के उपकार जनक कर्म को करने वाले हैं। वे वेग से जाने वाले घोड़ों द्वारा अन्तरिक्ष को क्षण मात्र में परिव्याप्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.33.1]
हम यजमान ऋभुगण के लिए दूत के समान वंदना वाणी को प्रेरित करते हैं। हम उनके समीप सोम उपस्थित करने हेतु दुग्ध वाली गौओं की विनती करते हैं। ऋभुगण पवन के समान चलने वाले तथा संसार का हित करने वाले कार्यों को करते हैं। वे अपने वेगवान घोड़ों से पल भर में अंतरिक्ष को विद्यमान करते हैं।
We, the hosts, Ritviz express ourselves as a messenger, to the Ribhu Gan, reciting prayers. We request them to grant us cows yielding milk. Ribhu Gan moves as fast as air. They preform deeds pertaining to the welfare-benefit of the universe-world. Their horses pervade the space with the blink of eye.
यदारमक्रन्नृभवः पितृभ्यां परिविष्टी वेषणा दंसनाभिः।
आदिद्देवानामुप सख्यमायन्धीरासः पुष्टिमवहन्मनायै॥
जब ऋभुओं ने माता-पिता को परिचर्या द्वारा युवा किया एवं चमस निर्माणादि अन्य कार्य करके वे अलंकृत हुए, तब इन्द्रादि देवों के साथ उन्होंने उसी समय मित्र-लाभ किया। वीर ऋभुगण प्रकृष्ट मनस्वी हैं। वे यजमानों के लिए पुष्टि धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.33.2]
जब ऋभुगण ने अपनी माता को युवावस्था दी और चमस बनाने आदि कार्यों को करते हुए यशवान हुए तब उसी समय उनकी मित्रता इंद्रादि देवताओं के साथ हो गई। वे मनस्वी एवं धैर्यवान हैं तथा यजमान के लिए पराक्रम धारण करते हैं।
मनस्वी :: चिन्तन शील, विचार शील; intelligent person, thoughtful person, contemplative person.
Ribhu Gan granted youth to their parents, developed Chamas and gained fame & honours. They gained -enjoyed the friendship of the demigods-deities. They are thoughtful and have patience. The rise-possess valour to protect the devotees, Ritviz.
पुनर्ये चक्रुः पितरा युवाना सना यूपेव जरणा शयाना।
ते वाजो विभ्वाँ ऋभुरिन्द्रवन्तो मधुप्सरसो नोऽवन्तु यज्ञम्॥
ऋभुओं ने यूप काष्ठ के तुल्य जीर्ण और लेटे हुए अपने माता-पिता को नित्य युवा किया। बाज विभु और ऋभु इन्द्र देव के साथ सोम पान करके हम लोगों के यज्ञ की रक्षा करें।[ऋग्वेद 4.33.3]
ऋभुगणों ने ही यूप के समान जीर्ण और लुढ़के पड़े हुए माता-पिता को तरुणाई प्रदान की। वे शक्तिशाली और ऋभु इन्द्रदेव के साथ सोमपान करते हुए हमारे अनुष्ठान के रक्षक हों।
They made their parents younger day by day, who were lying like the dead log. Let Vibhu & Ribhu Gan drink Somras along with Indr Dev and protect-shield our Yagy.
यत्संवत्समृभवो गामरक्षन्यत्संवत्समृभवो मा अपिंशन्।
यत्संवत्समभरन्भासो अस्यास्ताभिः शमीभिरमृतत्वमाशुः॥
ऋभुओं ने संवत्सर पर्यन्त मृतक गौ का पालन किया। ऋभुओं ने उस गौ के माँस-शरीर को संवत्सर पर्यन्त अवयव युक्त किया एवं संवत्सर पर्यन्त उसके शरीर के सौन्दर्य की रक्षा की। इन सकल कार्यों द्वारा उन्होंने देवत्व को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 4.33.4]
ऋभुगण ने एक वर्ष तक मृत धेनु की सेवा की। उन्होंने उस धेनु के शरीर को अवयवों से सम्पन्न किया और वर्ष भर उनकी सुरक्षा की। अपने इन कर्मों से वे देवत्व को ग्रहण कर सके।
For a year the Ribhus preserved the dead cow & invested it with flesh & other organs, continued its beauty they obtained by their acts of immortality.
The Ribhu Gan nursed-preserved the dead cow for a year and produced flesh and other organs in her. They attained divinity by virtue of this act.
ज्येष्ठ आह चमसा द्वा करेति कनीयान्त्रीन्कृणवामेत्याह।
कनिष्ठ आह चतुरस्करेति त्वष्ट ऋभवस्तत्पनयद्वचो वः॥
ज्येष्ठ ऋभु ने कहा, “एक चमस को दो करेंगे।" उसके अवरज विभु ने कहा, "तीन करेंगे।" उसके कनिष्ठ वाज ने कहा, “चार प्रकार से करेंगे"। हे ऋभुओं! आपके गुरु त्वष्टा ने इस चतुष्करण रूप आपके वचन को अङ्गीकार किया।[ऋग्वेद 4.33.5]
बड़े ऋभु ने एक चमस को दो करने की कामना प्रकट की। बीच के ऋभुगण ने तीन करने की और छोटे ऋभु ने चार करने को कहाँ। हे ऋभुगण ! तुम्हारे मरु त्वष्टा ने इस तुम्हारी "चार करने" वाली बात को स्वीकार कर लिया।
The eldest Ribhu said that they would convert one Chamas to two. The second-middle one said that they world make three Chamas out of one. The youngest said that they would convert it into four. Twasta as Guru accepted their plea.
सत्यमूचुर्नर एवा हि चक्रुरनु स्वधामृभवो जग्मुरेताम्।
विभ्राजमानांश्चमसाँ अहेवावेनत्त्वष्टा चतुरो ददृश्वान्॥
मनुष्य रूप ऋभुओं ने सत्य कहा; क्योंकि उन्होंने जैसा कहा, वैसा किया। इसके अनन्तर ऋभु गण तृतीय सवन गत स्वधा के भागी हुए। दिवस के तुल्य दीप्तिमान चार चमसों को देखकर त्वष्टा ने उसकी कामना की और उसे अङ्गीकार किया।[ऋग्वेद 4.33.6]
उस पुरुष रूपी वाले ऋभुओं ने जो कहा, वही किया। उनका कथन सत्य को प्राप्त हुआ। फिर वे ऋभुगण तीसरे सवन में स्वधा अधिकारी बने। दिन के समान ज्योतिवान चार चमसों को देखकर त्वष्टा ने कामना करते हुए प्राप्त किया।
Ribhu Gan in the form of humans, did what they said. Thereafter, they became entitled-eligible for the third session-evening Swadha. Twasta accepted the four shinning Chamas.
द्वादश द्यून्यदगोह्यस्यातिथ्ये रणन्नृभवः ससन्तः।
सुक्षेत्राकृण्वन्ननयन्त सिन्धू न्ध न्वातिष्ठन्नोषधीर्निम्नमापः॥
अगोपनीय सूर्य के घर में जब ऋभु गण आर्द्रा से लेकर वृष्टि कारक बारह नक्षत्रों तक अतिथि रूप से सुख पूर्वक निवास करते हैं, तब वे वृष्टि द्वारा खेतों को शस्य सम्पन्न करते और नदियों को प्रेरित करते हैं। जल विहीन स्थान में औषधियाँ उत्पन्न होती हैं और नीचे की ओर जल जमा होता है।[ऋग्वेद 4.33.7]
प्रत्यक्ष प्रकाशवान सूर्य लोक में जब वे ऋभुगण आर्द्रा से वर्षा कारक बारह नक्षत्रों तक अतिथि रूप में रहते हैं। तब वे वर्ष द्वारा कृषि को धान्यपूर्ण करते और नदियों को बहने वाला बनाते हैं। जल रहित स्थान में दवाइयाँ पैदा होती और निचले स्थानों में जल भरा रहता है।
When Ribhu Gan reside in the house of Sun, starting from Adra- constellation & the rain causing 12 constellations comfortably, they make the earth green with vegetation and inspire the rivers. Medicines grow over those places where there in no water (stagnations) and water is stored in low lying regions.
रथं ये चक्रुः सुवृतं नरेष्ठां ये धेनुं विश्वजुवं विश्वरूपाम्।
त आ तक्षत्वृभवो रयिं नः स्ववसः स्वपसः सुहस्ताः॥
ऋभु गण, जिन्होंने सुचक्र और चक्र विशिष्ट रथ का निर्माण किया, जिन्होंने विश्व की प्रेरयित्री और बहुरूपा गायों को उत्पन्न किया, वे सुकर्मा, अन्न युक्त और सुहस्त ऋभु हम लोगों को धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.33.8]
जिन्होंने सुन्दर पहियों वाले रथ का निर्माण किया था, जिन्होंने संसार को शिक्षित करने वाले तथा अनेक रूपिणी धेनु को प्रकट किया था, वे श्रेष्ठतम कर्म वाले सुन्दर अन्नवास और सिद्ध ऋभुगण हमारे धन का सम्पादन करें।
Let Ribhu Gan engaged in virtuous, pious endeavours, who created the charoite with beautiful wheels and cows, grant us wealth along with food grains.
अपो ह्येषामजुषन्त देवा अभि क्रत्वा मनसा दीध्यानाः।
वाजो देवानामभवत्सु कर्मेन्द्रस्य ऋभुक्षा वरुणस्य विभ्वा॥
इन्द्र देव आदि देवों ने वर प्रदान रूप कर्म द्वारा एवं प्रसन्न हृदय से देदीप्यमान होकर इन ऋभुओं के अश्व, रथ आदि निर्माण रूप कर्म को स्वीकार किया। शोभन कर्म करने वाले कनिष्ठ वाज सभी देवों के सम्बन्धी हुए, ज्येष्ठ ऋभु इन्द्र देव के सम्बन्धी हुए और मध्यम विभु वरुण देव के सम्बन्धी हुए।[ऋग्वेद 4.33.9]
इन्द्रादि देवगणों ने वर देने जैसे कर्म द्वारा तथा प्रसन्न चित्त हृदय से तेजस्वी होकर ऋभु गण के अश्व, रथ आदि के निर्माण कार्य को स्वीकार किया । श्रेष्ठ कर्म वाले छोटे-बड़े ऋभु इन्द्र से सम्बन्धित हुए।
Demigods-deities including Indr Dev, accomplishing desires, accepted the endeavours of Ribhu Gan like creation of charoite, horses etc. and became relatives. Young Vaj and other demigods-deities became relatives, the middle-second Vibhu became relative of Varun Dev.
ये हरी मेधयोक्था मदन्त इन्द्राय चक्रुः सुयुजा ये अश्वा।
ते रायस्पोषं द्रविणान्यस्मे धत्त ऋभवः क्षेमयन्तो न मित्रम्॥
हे ऋभुओं! जिन्होंने अश्व द्वय को प्रज्ञा तथा स्तुति द्वारा बलिष्ठ किया, जिन्होंने उस अश्व द्वय को इन्द्र के लिए सुयोजमान किया, वही ऋभुगण हम लोगों को मंगलकांक्षी मित्र के तुल्य धन, पुष्टि गौ आदि धन तथा सुख प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.33.10]
जिन ऋभुओं ने दो अश्वों को वृद्धि और प्रशंसा के माध्यम से पुष्ट किया, वह ऋभु हमारे लिए मंगलकारी सखा के समान धन, गौ, जल इत्यादि और सभी सुख प्रदान करें।
The Ribhus who who created and grew the twin horses and made them strong for Indr Dev, should become our friend, grant us wealth, nourished cows and comforts-luxuries.
इदाह्नः पीतिमुत वो मदं धुर्न ऋते श्रान्तस्य सख्याय देवाः।
ते नूनमस्मे ऋभवो वसूनि तृतीये अस्मिन्त्सवने दधात॥
चमस आदि निर्माण के अनन्तर तृतीय सवन में देवों ने आप लोगों को सोमपान तथा तदुत्पन्न हर्ष प्रदान किया। तपो युक्त व्यक्ति को छोड़कर दूसरे के मित्र देव गण नहीं होते। हे ऋभुओं! इस तृतीय सवन में आप निश्चय ही हम लोगों को ऐश्वर्य प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.33.10]
चमस आदि के बनने के बाद देवताओं ने तीसरे सवन में तुम्हारे लिए सोमपान से रचित हर्ष प्रदान किया था। देव गण तपस्वी के अतिरिक्त किसी अन्य के सखा नहीं बनते हैं। हे ऋभुओं! इस तीसरे सवन में तुम हमारे लिए अवश्य ही फल प्रदान करो।
The demigods-deities granted pleasure-enjoyment to Ribhu Gan, when they created Chamas in the third segment of the day-evening and offered them Somras. Hey Ribhu Gan! During this third segment of the day, you will definitely grant us grandeur.(29.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (34) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- ऋभुगण, छन्द :- त्रिष्टुप्।
ऋभुर्विभ्वा वाज इन्द्रो नो अच्छेमं यज्ञं रत्नधेयोप यात।
इदा हि वो धिषणा देव्यह्नामधात्पीतिं सं मदा अग्मता वः॥
हे ऋभु! विभु, वाज और इन्द्र देव, रत्न प्रदान करने के लिए आप लोग हमारे इस यज्ञ में पधारें, क्योंकि अभी दिन में वाक्देवी आप लोगों को सोमाभिषव सम्बन्धी प्रीति प्रदान करती हैं। इसलिए सोम जनित हर्ष आप लोगों के साथ संगत हों।[ऋग्वेद 4.34.1]
संगत :: अनुकूल, मुताबिक़, अविस्र्द्ध, तर्कयुक्त, सिलसिलेवार, अविरोधी, प्रासंगिक, उचित, अनुरूप, योग्य, प्रस्तुत; accompaniment, compatible, consistent, relevant.
हे ऋभु, विभु, बाज और इन्द्र देव! धन-धौलत के लिए हमारे इस अनुष्ठान में विराजो। अभी दिन में वाणी रूप वंदना तुम्हारे लिए सोम सिद्ध करने सम्बन्धी स्नेह प्रदान करती हैं। सोम से रचित हुई तुम्हारे साथ सुसंगत हो।
Hey Ribhu, Vibhu, Vaj & Indr Dev! Join our Yagy to grant jewels, gems. Vak Devi is affectionate with you during the day & help you extract Somras. Let the pleasure-happiness, enjoyment by virtue of Somras be compatible with you.
विदानासो जन्मनो वाजरत्ना उत ऋतुभिर्ऋभवो मादयध्वम्।
सं वो मदा अग्मत सं पुरंधिः सुवीरामस्मे रयिमेरयध्वम्॥
हे अन्न द्वारा शोभमान ऋभु गण! पहले आप लोगों का जन्म मनुष्यों में हुआ, अब देवत्व प्राप्ति को जान करके आप लोग देवों के साथ हर्षित होवें। हर्ष कर सोम और प्रार्थना आप लोगों के लिए एकत्र हुए हैं। आप लोग हमारे लिए पुत्र-पौत्र के लिए विशिष्ट धन प्रेरित करें।[ऋग्वेद 4.34.2]
हे ऋभुओं। तुम अन्न के द्वारा सुशोभित हो। पूर्व में तुम पुरुष थे अब देवता बने हो। इस बात का ध्यान करते हुए देवताओं को समीप पुष्टि को पाओ। हर्षकारी सोम और स्तोत्र तुम्हारे लिए सुसंगत हुए हैं। तुम हमारे लिए पुत्र-पौत्रादि से युक्त धन प्रदान करो।
सुशोभित :: सजा हुआ, संवारा हुआ, अलंकृत, विभूषित, मंडित, सुंदर, सुखद, शोभायमान, सुश्री, रमणीय; graceful, adorned, inwrought.
Hey Ribhu Gan! You should be adorned with food grains. Initially you got birth as humans and now you have attained divinity granting you pleasure. You have gathered for Somras and prayers. Grant riches for us & our sons, grandsons.
अयं वो यज्ञ ऋभवोऽकारि यमा मनुष्वत्प्रदिवो दधिध्वे।
प्र वोऽच्छा जुजुषाणासो अस्थुरभूत विश्वे अग्रियोत वाजाः॥
हे ऋभुओं! आप लोगों के लिए यह यज्ञ किया गया है। मनुष्य के तुल्य दीप्तिशाली होकर आप लोग इसे धारित करें। सेवमान सोम आप लोगों के निकट रहता है। हे वाजगण! आप लोग ही प्रथम उपास्य है।[ऋग्वेद 4.34.3]
हे ऋभुगण ! यह हवन तुम्हारे लिए किया गया है तुम इसे प्राणी के समान दीप्तिवान होकर करो। सेवा कारक सोम तुम्हारे निकट उपस्थित हैं। तुम हमारे मुख्य साध्य हो।
Hey Ribhu Gan! This Yagy has been organised for you. Become radiant-aurous and support it. Somras for drinking is available with you. Hey Vaj Gan! You deserve first worship.
अभूदु वो विद्यते रत्नधेयमिदा नरो दाशुषे मर्त्याय।
पिबत वाजा ऋभवो ददे वो महि तृतीयं सवनं मदाय॥
हे नेतृगण! आपके अनुग्रह से अभी इस तृतीय सवन में दान योग्य रत्न परिचर्याकारी, हव्य दाता याजक गण के लिए है। हे वाजगण! हे ऋभुगण! आप लोग पान करें। तृतीय सवन में हर्ष के लिए प्रभूत सोमरस हम आप लोगों के लिए प्रदत्त करते हैं।[ऋग्वेद 4.34.4]
हे अग्रगण्य ऋभुओं! हविदाता यजमान के लिए इस तीसरे सवन में तुम्हारे कृपा दृष्टि से दान योग्य रत्न ग्रहण हो। हम तुम्हारे लिए पुष्टिदायक सोम प्रदान करते हैं। तुम उसको ग्रहण करो।
Hey senior Ribhu Gan! During this third segment of the day-evening, jewels-gems are meant for the Ritviz to donate-charity. Hey Ribhu Gan! Hey Vaj Gan! Drink Somras offered by us for your pleasure-happiness.
आ वाजा यातोप न ऋभुक्षा महो नरो द्रविणसो गृणानाः।
आ वः पीतयोऽभिपित्वे अह्नामिमा अस्तं नवस्व इव ग्मन्॥
हे वाजो, हे ऋभुक्षाओ! आप लोग नेता है। महान धन की प्रार्थना करते हुए आप लोग हमारे निकट आगमन करें। दिवस की समाप्ति में अर्थात तृतीय सवन में जिस प्रकार से नव प्रसवा गौएँ घर की ओर जाती हैं, उसी प्रकार यह सोमरस का पान आप लोगों के निकट आगमन करता है।[ऋग्वेद 4.34.5]
ऋभुगण, श्रेष्ठ ऐश्वर्य की प्रशंसा करते हुए तुम हमारे समीप आओ। दिन की समाप्ति पर जैसे नवप्रसूता गायें अपने स्थान को वापस लौटती हैं, उसी प्रकार यह सोम रस तुम्हारे पीने के लिए तुम्हारी ओर आता है।
Hey Vaj! Hey Ribhu Gan! You are great. Come to us appreciating great wealth & grandeur. Come to the hosts-household like the cows laying the calf & who return home in the evening; for drinking Somras.
आ नपातः शवसो यातनोपेमं यज्ञं नमसा हूयमानाः।
सजोषसः सूरयो यस्य च स्थ मध्वः पात रत्नधा इन्द्रवन्तः॥
हे बलवानों! स्तोत्र द्वारा आहूत होकर आप लोग इस यज्ञ में आगमन करें। आप लोग इन्द्र देव के साथ प्रीत होते हैं और मेधावी हैं; क्योंकि आप लोग इन्द्र देव के सम्बन्धी हैं। आप लोग इन्द्र देव के साथ रत्न प्रदान करते हुए मधुर सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 4.34.6]
हे शक्ति से परिपूर्ण ऋभुओ। श्लोक द्वारा पुकारे जाने पर तुम इस अनुष्ठान पधारो। तुम इन्द्र देव के मित्र रूपी और मतिवान हो क्योंकि तुम इन्द्र देव के सम्बन्धी तुम मधुर सोमपान को इन्द्र देव के संग पान करते हुए रत्नादि धन प्रदान करो।
Hey mighty Ribhu Gan! On being invoked by the recitation of Strotr, join this Yagy. You are Indr Dev's affectionate, relatives & intelligent. Provide us jewels-gems & enjoy Somras.
सजोषा इन्द्र वरुणेन सोमं सजोषाः पाहि गिर्वणो मरुद्भिः।
अग्रेपाभिर्ऋतुपाभिः सजोषा ग्नास्पत्नीभी रत्नधाभिः सजोषाः॥
हे इन्द्र देव! आप रात्रयभिमानी वरुण देव के साथ समान प्रीति युक्त होकर सोमरस का पान करें। हे स्तुति योग्य इन्द्र देव! आप मरुतों के साथ संगत होकर सोमपान करें। प्रथम पानकारी ऋतुओं के साथ देव-पत्नियों के साथ और रत्न देने वाले ऋभुओं के साथ सोम रस का पान करें।[ऋग्वेद 4.34.7]
हे इन्द्र देव! वरुण सहित सम्यक दीप्तिवान होकर सोम पियो। पहले पीने वाले ऋभुओं, देवांगनाओं तथा रत्नादात्री सामर्थ्यो सहित सोमपान करो।
Hey worship deserving Indr Dev! Enjoy Somras with Varun Dev, Marud Gan, goddesses, wives of the demigods-deities & Ribhu Gan who provide us jewels-gems.
सजोषस आदित्यैर्मादयध्वं सजोषस ऋभवः पर्वतेभिः।
सजोषसो दैव्येना सवित्रा सजोषसः सिन्धुभी रत्नधेभिः॥
हे ऋभुओं! आदित्यों के साथ संगत होकर आप हर्षित होवें, पर्व में अर्चमान देव विशेष के साथ संगत होकर आप हर्षित होवें, देवों के हितकर सविता देव के साथ संगत होकर हर्षित होवें और रत्नदाता नद्यभिमानी देवों के साथ संगत होकर हर्षित होवें।[ऋग्वेद 4.34.8]
हे ऋभुओं! आदित्यों सहित मिलकर आनन्द को प्राप्त हो जाओ। उपासनीय देवताओं को ग्रहण करो। पर्वत के तुल्य अचल एवं रत्नदाता देवों के संग मिलकर हृष्ट-पुष्ट हो जाओ।
Hey Ribhu Gan! You should be happy in the company of Adity Gan, specific demigods-deities of the festivals, Savita Dev & the deities as great as the mountains who grant gems-jewels.
ये अश्विना ये पितरा य ऊती धेनुं ततक्षुर्ऋभवो ये अश्वा।
ये अंसत्रा य ऋधग्रोदसी ये विभ्वो नरः स्वपतानि चक्रुः॥
जिन ऋभुओं ने अपने रक्षण साधनों से अश्विनी कुमारों को सक्षम बनाया, जिन्होंने जीर्ण माता-पिता को युवा किया, जिन्होंने धेनु और अश्व का निर्माण किया, जिन्होंने देवों के लिए अंसत्रा कवच निर्माण किया, जिन्होंने द्यावा-पृथ्वी को पृथक किया, जो व्याप्त एवं नेता हैं और जिन्होंने सुन्दर अपत्य प्राप्ति साधन कार्य रूप किया, वे सर्व प्रथम सोमपान करने वाले हैं।[ऋग्वेद 4.34.9]
जिन्होंने अश्विनी कुमारों को बनाने आदि कर्मों से अपने प्रति स्नेहवान बनाया, जिन्होंने जीर्ण माता-पिता को तारुण्य किया, जिन्होंने गौ और घोड़े को निर्मित किया, जिन्होंने देवों के लिए उसका कवच बनाया। जिन्होंने आकाश और धरती को अलग किया, जिन्होंने सुन्दर से तान उत्पन्न करने वाला कार्य किया और जो सबके नेता रूप हैं, वे ऋभु मध्यम पान करने वाले हैं।
The Ribhu Gan, who made Ashwani Kumars capable, made their parents young, created cows & horses, produced shields for the demigods-deities, separated the sky & earth, who pervades each & every place & works as means for the off springs; are going to drink Somras first of all.
ये गोमन्तं वाजवन्तं सुवीरं रयिं धत्थ वसुमन्तं पुरुक्षुम्।
ते अग्रेपा ऋभवो मन्दसाना अस्मे धत्त ये च रातिं गृणन्ति॥
हे ऋभुओं! जो गोविशिष्ट, अन्नविशिष्ट, पुत्र-पौत्रादि विशिष्ट, निवास योग्य घर आदि धनों से युक्त तथा बहुत अन्न वाले धन को धारित करते हैं एवं जो धन की प्रशंसा करते हैं, वे प्रथम सोमपानकारी ऋभुगण हर्षित होकर हम लोगों को धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.34.10]
गौ, अन्न, संतान तथा निवास योग्य ही वह व्यक्ति है जो अनेक अन्न वाले, धनों के पालक हैं, जो धनों की प्रशंसा करने वाले हैं। वे ऋभुगण प्रथम सोमपान के द्वारा हृष्ट-पुष्ट होकर हमें धन ऐश्वर्य प्रदान करें।
Let Ribhu Gan drink Somras first of all, become healthy, happy with us and provide us riches. They possess cows, food grains, sons-grandsons, residence, various kinds of riches.
नापाभूत न वोऽतीतृषामानिःशस्ता ऋभवो यज्ञे अस्मिन्।
समिन्द्रेण मदथ सं मरुद्भिः सं राजभी रत्नधेयाय देवाः॥
हे ऋभुओं! आप लोग चले न जाना। हम आप लोगों को अत्यन्त तृषित नहीं करेंगे। हे देवो! आप लोग अनिन्दित होकर रमणीय धन प्रदान करने के लिए इस यज्ञ में इन्द्र देव के साथ हर्षित हों, मरुतों के साथ हर्षित होवें और अन्यान्य दीप्तिमान देवों के साथ हर्षित हों।[ऋग्वेद 4.34.11]
हे ऋभु गण! हमसे दूरस्थ मत जाना। तुम हमें अधिक समय वृषित न रहने देना। तुम सुन्दर धन देने के लिए इन्द्रदेव के साथ इस अनुष्ठान में हर्ष को ग्रहण होओ। मरुद्गण तथा अन्य तेजस्वी देवों के साथ पुष्टतम हो जाओ।
Hey Ribhu Gan! Do not desert us. We will not trouble-bother you. Hey demigods! You should be happy-pleased with us along with Indr Dev, several demigods-deities and grant riches-wealth for the Yagy.(31.03.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (35) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- ऋभुगण, छन्द :- त्रिष्टुप्।
इहोप यात शवसो नपातः सौधन्वना ऋभवो माप भूत।
अस्मिन्हि वः सवने रत्नधेयं गमन्त्विन्द्रमनु वो मदासः॥
हे बल के पुत्र, सुधन्वा के पुत्र ऋभुओं! आप सब इस तृतीय सवन में पधारें, अपगत न होवें। इस सवन में मदकर सोम रत्नदाता इन्द्र देव के अनन्तर आप लोगों के निकट गमन करें।[ऋग्वेद 4.35.1]
हे सुधन्वा के बलशाली पुत्रों! इस तृतीय सवन में यहाँ पधारो, कहीं अन्य विचरण मत करो। दृष्टि कारक सोम इस सवन में, रत्न दान करने वाले इन्द्र देव के पश्चात तुम्हारे सम्मुख आयें।
Hey Ribhu Gan, son of Sudhanva & grand son of Bal! Come here in the third segment of the day-evening. Do not move else where. Let Som come to you after the donor of jewels-gems Indr Dev.
आगन्नृभूणामिह रत्नधेयमभूत्सोमस्य सुषुतस्य पीतिः।
सुकृत्यया यत्स्वपस्यया चँ एकं विचक्र चमसं चतुर्धा॥
ऋभुओं का रत्न दान इस तृतीय सवन में मेरे निकट आवें; क्योंकि आप लोगों ने शोभन हस्त व्यापार द्वारा और कर्म की इच्छा द्वारा एक चमस को चार प्रकार से विनिर्मित किया है एवं अभिषुत सोमरस का पान किया।[ऋग्वेद 4.35.2]
ऋभुओं के द्वारा दिये जाने वाले रत्नों का दान इन तीसरे सवन में मेरे नजदीक पधारें। हे ऋभुगण! तुमने अपने हाथ की कला के माध्यम से एक चमस के चार बना दिये थे और सुसिद्ध सोम को पिया था।
Let the impact of donation of jewels-gems by Ribhu Gan, show its impact in the evening, since they created 4 Chamas out of one by virtue of your skills and drank Somras.
व्यकृणोत चमसं चतुर्धा सखे वि शिक्षेत्यब्रवीत।
अथैत वाजा अमृतस्य पन्थां गणं देवानामृभवः सुहस्ताः॥
हे ऋभुओं! आप लोगों ने चमस को चार प्रकार का बनाया एवं कहा कि, "हे मित्र अग्नि देव! अनुग्रह करें"। अग्नि देव ने आप लोगों से कहा, "हे वाजगण! हे ऋभुगण! आप लोग कुशल हस्त है। आप लोग अमरत्व पथ में अर्थात स्वर्ग मार्ग में गमन करें।”[ऋग्वेद 4.35.3]
हे ऋभुगण! तुमने एक चमस के चार करते हुए कहा था, हे मित्र रूप अग्ने! दया करो। तब अग्नि ने उत्तर दिया था, हे ऋभुओं! तुम हस्त कारोबार में मेधावी हो। तुम अमरत्व प्राप्ति के मार्ग पर जाओ।
Hey Ribhu Gan! You created 4 Chamas out of one and requested friendly Agni Dev to oblige you. Agni Dev told you, "Hey Vaj Gan! Hey Ribhu Gan"! You are skilled. You should attain immortality.
किंमयः स्विच्चमस एष आस यं काव्येन चतुरो विचक्र।
अथा सुनुध्वं सवनं मदाय पात ऋभवो मधुनः सोम्यस्य॥
जिस चमस को कौशलपूर्वक चार प्रकार का बनाया, वह चमस किस प्रकार का था? हे ऋत्विकों! आप लोग हर्ष के लिए सोमाभिषव करें। हे ऋभुओं! आप लोग मधुर सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 4.35.4]
जिस चमस की चालाकी पूर्वक चार बनाये गये थे, वह चमस कैसा था? हे ऋत्विजों! आनन्द के लिए सोम को सिद्ध करो! हे ऋभुओं! तुम मधुर सोम का पान करो।
What was the shape, size of the Chamas that was converted by you into four, skilfully?! Hey Ritviz! Drink Somras happily. Hey Ribhu Gan! Drink the sweet-tasty Somras.
शच्याकर्त पितरा युवाना शच्याकर्त चमसं देवपानम्।
शच्या हरी धनुतरावतष्टेन्द्रवाहावृभवो वाजरत्नाः॥
हे रमणीय सोम वाले ऋभुओं! आप लोगों ने कर्म द्वारा माता-पिता को युवा बनाया, कर्म द्वारा चमस को देवपान के योग्य चतुर्था किया और कर्म द्वारा शीघ्र गामी इन्द्र देव को वहन करने वाले अश्व द्वय को सम्पादित किया।[ऋग्वेद 4.35.5]
हे उत्तम सोम युक्त ऋभुगण! तुमने कला द्वारा अपने माता पिता को तारुण्य दिया। एक चमस के चार बनाये और इन्द्र के शीघ्र चलने वाले दोनों अश्वों को प्रकट किया।
Hey possessor of descent Somras Ribhu Gan! You made your parents young by using your skills, expertise & knowledge. You converted one Chamas into four by virtue of expertise. You evolved the fast moving horse duo for Indr Dev.
यो वः सुनोत्यभिपित्वे अह्नां तीव्रं वाजासः सवनं मदाय।
तस्मै रयिमृभवः सर्ववीरमा तक्षत वृषणो मन्दसानाः॥
हे ऋभुओं! आप लोग अन्नवान है। जो याजक गण आप लोगों के उद्देश्य से हर्ष के लिए दिवावसान में तीव्र सोमरस का अभिषव करता है, हे फलवर्षी ऋभुओं! आप लोग हर्षित होकर उन याजकों को हर प्रकार से पराक्रमी, उत्तम संतानों से युक्त ऐश्वर्य प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.35.6]
ऋभुगण! तुम अन्न के स्वामी हो। जो यजमान तुम्हारे आनन्द के लिए दिवस के अन्तिम दिन के अंतिम पहर को छानता है, उस यजमान के लिए तुम उत्तम अभीष्ट वर्षी होते हुए अनेक संतान परिपूर्ण धन के देने वाले बनों।
Hey Ribhu Gan! You possess food grains. You extract Somras for the public at the end of the day. Hey accomplishments granting-fulfilling Ribhu Gan! Become happy-pleased and grant versatile progeny & grandeur to the Ritviz.
प्रातः सुतमपिबो हर्यश्व माध्यंदिनं सवनं केवलं ते।
समृभुभिः पिबस्व रत्नधेभिः सखीयों इन्द्र चकृषे सुकृत्या॥
हे हरि विशिष्ट इन्द्र देव! आप प्रातः सवन में अभिषुत सोमरस का पान करें। माध्यन्दिन सवन केवल आपका ही है। हे इन्द्र देव! आपने शोभन कर्म द्वारा जिसके साथ मित्रता की है, उस रत्नदाता ऋभुओं के साथ आप तृतीय सवन में उनके साथ पान करें।[ऋग्वेद 4.35.7]
हे अश्ववान इंद्र! तुम सुसिद्ध सोम को प्राप्त सवन में पान करो। दिन के मध्यकाल वाला सवन केवल तुम्हारे लिए ही है । हे इन्द्र! अपने श्रेष्ठ कार्य द्वारा तुमने जिनके साथ मित्रता स्थापित की, उन रत्न दान करने वाले ऋभुगण के साथ तीसरे सवन में सोम पान करो।
Hey master of the horses named Hari, Indr Dev! Drink Somras during the first, second & third segment of the day. Drink Somras in the third segment of the day with Ribhu Gan, with whom you became friendly by virtue of your virtuous deeds; who grant jewels-gems.
ये देवासो अभवता सुकृत्या श्येना इवेदधि दिवि निषेद।
ते रत्नं धात शवसो नपातः सौधन्वना अभवतामृतासः॥
हे ऋभुओं! आप लोग सुकर्म द्वारा देवता बने। हे बल के पुत्रो! आप लोग श्येन (गृद्ध-विशेष) के तुल्य द्युलोक में प्रतिष्ठित होवें, आप लोग धनदान प्रदान करें। हे सुधन्वा के पुत्रो! आप लोग अमर हुए।[ऋग्वेद 4.35.8]
हे ऋभु गण! तुमने अपने उत्तम कार्यों से देवत्व प्राप्त किया। तुम श्येन के समान क्षितिज में ग्रहण होओ। हे सुधन्वा पुत्रों! तुम अमरत्व ग्रहण कर चुके हो, हमकों धन प्रदान करो।
Hey son of Sudhanva, Ribhu Gan! You have attained divinity by virtue of your auspicious-virtuous deeds. You should be honoured in the heavens like the Shyen-bird & grant us riches. You have attained immortality.
यत्तृतीयं सवनं रत्नधेयमकृणुध्वं स्वपस्या सुहस्ताः।
तदुद्भवः परिषिक्तं व एतत्सं मदेभिरिन्द्रियेभिः पिबध्वम्॥
हे सुहस्त ऋभुओं! आप लोग रमणीय सोमदान युक्त तृतीय सवन को शोभन कर्म की इच्छा से प्रयुक्त और प्रसाधित करते हैं, इसलिए आप लोग हर्षित इन्द्रियों के साथ अभिषुत सोमरस का पान करो।[ऋग्वेद 4.35.9]
हे ऋभुओं! तुम महान हस्त कला से सम्पूर्ण हो। तुम सुन्दर सोम से सम्पूर्ण तीसरे सवन को महान कार्यों की कामना से सुसिद्ध करते हो। अतः तुम हर्षित हृदय से सोम का पान करो।
Hey great experts in handicrafts, Ribhu Gan! Enjoy Somras in the third segment of the day with pleasure.(04.04.2023)
तं नो वाजा ऋभुक्षण इन्द्र नासत्या रयिम्।
समश्वं चर्षणिभ्य आ पुरु शस्त मघत्तये॥
हे वाजगण, हे ऋभुगण, हे इन्द्रदेव, हे अश्विनीकुमारों! आप सब हम प्रार्थना करने वालों को प्रचुर ऐश्वर्य और शक्ति प्राप्ति के लिए आशीर्वाद प्रदत्त करें।[ऋग्वेद 4.37.8]
हे ऋभुओं! हे इन्द्र देव! हे अश्विनी कुमारों ! हम प्रार्थना करने वालों को तुम दान के लिए महान धन और अश्वों के दान की शिक्षा प्रदान करो।
Hey Vaj Gan, Hey Ribhu Gan, Hey Indr Dev and Hey Ashwani Kumars! Grant us sufficient wealth-riches, grandeur responding to our prayers, blessing us.
दधिक्राव्ण इष ऊर्जो महो यदमन्महि मरुतां नाम भद्रम्।
स्वस्तये वरुणं मित्रमग्नि हवामह इन्द्रं वज्रबाहुम्॥
हम अन्न साधक, बल साधक, महान और स्तोताओं के कल्याण कारक दधिक्रा देव के नाम की प्रार्थना करते हैं। कल्याण के लिए हम वरुण, मित्र, अग्नि और वज्रबाहु इन्द्र देव का आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.39.4]
अन्न का साधन करने वाले, प्रार्थना। करने वालों का मंगल करने वाले श्रेष्ठ दधिक्रा देव का नाम संकीर्तन करते हैं। सुख की प्राप्ति के लिए हम मित्र वरुण, अग्नि में व्रज धारण करने वाले इन्द्र देव को आमंत्रित करते हैं।
We worship Dadhikra Dev who is the provider of food grains, great and beneficial to hosts-devotees. We invoke Mitr Dev, Varun Dev, Agni Dev and Indr Dev wielding Vajr.
WIELD :: रखना, चलाना, बरतना, हिलाना, सँभालना, फिराना, प्रबंध करना, काम में लगाना, हाथ लगाना, उपयोग करना; hold, to have and use power, authority, to hold and be ready to use a weapon.
इन्द्रमिवेदुभये विह्वयन्त उदीराणा यज्ञमुपप्रयन्तः।
दधिक्रामु सूदनं मर्त्याय ददथुर्मित्रावरुणा नो अश्वम्॥
जो युद्ध करने के लिए पराक्रम करते हैं और जो यज्ञ आरम्भ करते हैं, वे दोनों ही इन्द्र देव के तुल्य दधिक्रा देव का आह्वान करते हैं। हे मित्रा-वरुण! आप मनुष्यों के प्रेरक अश्व स्वरूप दधिक्रा देव को हमारे लिए धारित करें।[ऋग्वेद 4.39.5]
जो युद्ध को तैयार करते हैं और जो यज्ञ कर्म करते हैं, वह दोनों ही इन्द्र के समान दधिक्रा देव को आमंत्रित करते हैं। हे मित्रा-वरुण! तुम मनुष्यों को शिक्षा प्रदान करने वाले अश्व के रूप वाले दधिक्रा देव को हमारे लिए धारण करो।
Those who make efforts for the war & those who begin Yagy, both invoke Dadhikra Dev just like Indr Dev. Hey Mitra-Varun! You support Dadhikra Dev-in the form of horse, who inspire humans.
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (41) :: ऋषि :- वामदेव, गौतम, देवता :- इन्द्र देव, वरुण, छन्द :- त्रिष्टुप।
इन्द्रा को वां वरुणा सुम्नमाप स्तोमो हविष्माँअमृतो न होता।
यो वां हृदि क्रतुमाँ अस्मदुक्तः पस्पर्शदिन्द्रावरुणा नमस्वान्॥
हे इन्द्र देव, हे वरुण! हमारे द्वारा ज्ञान पूर्वक और विनम्रता पूर्वक उच्चारण किया हुआ कौन-सा स्तोत्र है, जो आपके हृदय को स्पर्श कर सके? हे इन्द्र देव, हे वरुण! अविनाशी और आहुति से युक्त अग्नि देव के तुल्य प्रदिप्त वह स्तोत्र आपके अन्तःस्थल में प्रवेश करे।[ऋग्वेद 4.41.1]
हे इन्द्र देव! हे वरुण! अमरतत्व-ग्रहण होता! अग्नि के तुल्य हवि परिपूर्ण कौन सा श्लोक तुम दोनों की कृपा दृष्टि ग्रहण कर सकता है? वह श्लोक हमारे द्वारा अर्पण हुआ हवियों से परिपूर्ण होकर तुम दोनों के अन्तः करण में प्रवेश करें।
Hey Indr Dev! Hey Varun Dev! Let us know the Strotr learnt by us which touches your heart. Which excellent Shlok can please you like the offerings in imperishable holy fire-Agni Dev?!
इन्द्रा ह यो वरुणा चक्र आपी देवौ मर्त सख्याय प्रयस्वान्।
स हन्ति वृत्रा समिथेषु शत्रूनवोभिर्वा महद्भिः स प्र शृण्वे॥
हे प्रसिद्ध इन्द्र और वरुण देव! जो मनुष्य हवि लक्षण अन्नवान होकर संख्या के लिए आप दोनों से मित्रता करता है, वह मनुष्य पापों का नाश करता है, युद्ध में शत्रुओं का विनाश करता हैं और महती रक्षा द्वारा प्रख्यात होता है।[ऋग्वेद 4.41.2]
हे इन्द्र, वरुण! तुम दोनों विख्यात हो। जो व्यक्ति पापों का विनाश करने में सक्षम है, वह संग्राम में शत्रु को मार देता है और विशाल रक्षा साधनों द्वारा विख्याति प्राप्त करता है।
Hey famous Indr Dev, Varun Dev! The humans who is friendly with you, makes offerings of food grains; destroys his sins. He kills the enemy in the war and becomes famous under your protection-shelter.
इन्द्रा ह रत्नं वरुणा धेष्ठेत्था नृभ्यः शशमानेभ्यस्ता।
यदी सखाया सख्याय सोमैः सुतेभिः सुप्रयसा मादयैते॥
हे प्रसिद्ध इन्द्र देव और वरुण देव! आप दोनों देव हम स्तोत्र करने वाले मनुष्यों के लिए रमणीय धन देने वाले होवें। यदि आप दोनों परस्पर मित्र हैं और मित्रता के लिए अभिषुत सोमरस तथा उत्तम अन्नों से प्रसन्न हैं, तो ऐश्वर्य प्रदान करने वाले हो।[ऋग्वेद 4.41.3]
हे प्रख्यात इन्द्र व वरुण! तुम दोनों देवता हम स्तोताओं को सुन्दर धन प्रदान करने वाले बनो। यदि तुम यजमान के मित्र रूप हो सखा भाव लिए सिद्ध किये गये इस सोम रस से पुष्टि को ग्रहण होओ और धन ग्रहण करने वाले बनो।
Hey famous Indr Dev & Varun Dev! You should be able to grant us grandeur, reciting hymns-verses in your honour. If both of you are friends and ready to drink Somras for the sake of friendship and pleased with the excellent grains used for extracting Somras, grant us grandeur.
इन्द्रा युवं वरुणा विद्युमस्मिन्नोजिष्ठमुग्रा नि वधिष्टं वज्रम्।
यो नो दुरेवो वृकतिर्दभीतिस्तस्मिन्मिमाथामभिभूत्योजः॥
हे उग्र इन्द्र देव और वरुण देव! आप दोनों इस शत्रु के ऊपर दीप्त और अतिशय तेजो विशिष्ट वज्र का प्रक्षेप करें। जो शत्रु हम लोगों के द्वारा दुर्दमनीय, अत्यन्त अदाता और हिंसक है, उस शत्रु के विरुद्ध आप दोनों अभिभव कर वज्र का प्रयोग करें।[ऋग्वेद 4.41.4]
हे इन्द्रदेव और वरुण! तुम दोनों विकराल कार्य वाले हो। हमारे शत्रु पर तुम दोनों ही अत्यन्त तेज वाले शस्त्र का प्रहार करो। जो शत्रु अदानशील, हिंसक तथा हमारे दमन किए हुए जाने योग्य नहीं हैं, उस शत्रु के विरुद्ध तुम दोनों उसे पराजित करने वाले शक्ति से हराओ।
Hey furious Indr Dev & Varun Dev! Strike radiant Vajr possessing enormous energy, over this enemy. Defeat the enemies who do not donate, are violent & not qualified to be vanished by us.
इन्द्रा युवं वरुणा भूतमस्या धियः प्रेतारा वृषभेव धेनोः।
सा नो दुहीयद्यवसेव गत्वी सहस्त्रधारा पयसा मही गौः॥
हे इन्द्र देव और वरुण देव! बैल जिस प्रकार से गाय से प्रेम करता है, उसी प्रकार आप दोनों स्तुतियों से प्रसन्न होवें। तृणादि का भक्षण करके सहस्र धारा महती गौ जिस प्रकार से दुग्ध दोहन के लिए उपस्थित रहती है, उसी प्रकार से स्तुति रूपा धेनु हम लोगों की अभिलाषाओं को पूर्ण करें।[ऋग्वेद 4.41.5]
तृणादि को भक्षण कर जैसे गौ दूध देती है, वैसे ही तुम्हारी वंदना रूपी धेनु इच्छाओं को सदैव प्रदान करती रहे।
Hey Indr Dev & Varun Dev! Be happy-affectionate with our hymns, the way the bull loves the cow. The manner in which the cow yield milk by eating straw, the prayers-worship should accomplish our desires.
तोके हिते तनय उर्वरासु सूरो दृशीके वृषणश्च पौंस्ये।
इन्द्रा नो अत्र वरुणा स्यातामवोभिर्दस्मा परितक्म्यायाम्॥
हे इन्द्र देव और वरुण देव! आप दोनों रात्रि में रक्षा युक्त होकर शत्रुओं की हिंसा करने के लिए अवस्थान करें, जिससे हम लोग पुत्र, पौत्र और उपजाऊ भूमि से लाभ प्राप्त कर सकें एवं चिरकाल पर्यन्त सूर्य देव को देख सकें अर्थात् चिरजीवी हों तथा सन्तान उत्पन्न करने की शक्ति को प्राप्त कर सकें।[ऋग्वेद 4.41.6]
हे इन्द्र और वरुण देव! शीघ्रकाल से तुम दोनों अपने सुरक्षा साधनों से परिपूर्ण होकर शत्रुओं का पतन करने के लिए चल दो जिससे हम सन्तान आदि धन एवं उर्वरा धरा को पास के उम्र पर्यन्त सूर्य के दर्शन करते रहें। हे इन्द्र और वरुण! गाय जैसे बैल को प्रेम करती है वैसे ही तुम दोनों स्तुतियों को प्रेम करने वाले बनो।
Hey Indr Dev & Varun Dev! Move to destroy the enemy at night, well equipped with the means of protections. We wish to survive for long accompanied by our sons & grandsons.
To see Sun means survival for long. Power to produce progeny means having sons & grandsons.
युवामिद्ध्यवसे पूर्व्याय परि प्रभूती गविषः स्वापी।
वृणीमहे सख्याय प्रियाय शूरा मंहिष्ठा पितरेव शंभू॥
हे इन्द्रदेव और वरुण देव! हम लोग धेनु लाभ की अभिलाषा से आप लोगों के निकट प्राचीन रक्षा की प्रार्थना करते हैं। आप दोनों क्षमता शाली, बन्धु स्वरूप, शूर एवं अतिशय पूजनीय हैं। हम लोग आप दोनों के निकट सुखदायक पिता के तुल्य मित्रता और स्नेह की प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 4.41.7]
हे इन्द्र वरुण! गाय की अभिलाषा करने वाले हम तुमसे हमारे पुरातन काल से चले आ रहे पोषण सामर्थ्य की विनती करते हैं। तुम दोनों ही सभी कर्मों को करने वाले हो, सखा रूप एवं अत्यन्त पूजनीय हो। तुम दोनों से हम पुत्र को प्रदान करने वाले पिता के तुल्य अत्यन्त प्रेम प्रदान करने की विनती करते हैं।
Hey Indr Dev & Varun Dev! We pray-request you to grant us cows from ancient times. You are mighty, brave, revered-worship able and brotherly with us. We expect fatherly love & affection from you.
ता वां धियोऽवसे वाजयन्तीराजिं न जग्मुर्युवयूः सुदानू।
श्रिये न गाव उप सोममस्थुरिन्द्रं गिरो वरुणं मे मनीषाः॥
हे शोभन फल देने वाले देवद्वय! योद्धा जिस प्रकार से संग्राम की कामना करता है, उसी प्रकार से हम लोगों की रत्नाभिलाषिणी स्तुतियाँ आप दोनों की कामना करती हुई रक्षा लाभ के लिए आप दोनों के निकट गमन करते हैं। दध्यादि द्वारा शोभन करने के लिए जिस प्रकार से गौएँ सोम के पास रहती हैं। उसी प्रकार हमारी आन्तरिक स्तुतियाँ इन्द्र देव और वरुण देव के पास जाती हैं।[ऋग्वेद 4.41.8]
हे इन्द्रा-वरुण! तुम दोनों देवता सुन्दर फल प्रदान करने वाले हो। जैसे शक्तिशाली पुरुष युद्ध की कामना करते हैं, वैसे ही हमारी स्तुतियाँ रत्नादि धन की कामना से रक्षा प्राप्ति के लिए तुम्हारे समीप जाती हैं। जैसे गायें दूध दही आदि सुन्दर पदार्थों के लिए तुम्हारे समीप जाती हैं, वैसे ही हमारी हार्दिक वंदनाएँ इन्द्र के समीप पहुँचती हैं।
Hey beautiful reward granting duo! The way a warrior desire to take part in the war, we desirous of jewels-gems recite hymns and move closer to you for safety. The way the cows move to you for milk & curd, our heartiest prayers reach Indr Dev & Varun Dev.
इमा इन्द्रं वरुणं मे मनीषा अग्मन्नुप द्रविणमिच्छमानाः।
उपेमस्थुर्जोष्टार इव वस्वो रघ्वीरिव श्रवसो भिक्षमाणाः॥
धन-लाभ के लिए जिस प्रकार से सेवक धनवानों के निकट गमन करते हैं, उसी प्रकार हमारी स्तुतियाँ सम्पत्ति लाभ की इच्छा से इन्द्र देव और वरुण देव के निकट गमन करें। भिक्षुक स्त्रियों के तुल्य अन्न की भिक्षा माँगते हुए इन्द्र देव के पास जावें।[ऋग्वेद 4.41.9]
जैसे सेवक गणा धन के लिए धनिकों की सेवा करने को जाते हैं, वैसे ही हमारी वंदनाएँ धन की इच्छा करती और वरुण के निकट जावें। वंदनाएँ अन्न की भीख माँगने वाले भिखारियों के तुल्य इन्द्र देव के पास पहुँचे।
The way the servants move closer to the wealthy, our prayers-hymns reach Indr Dev & Varun Dev for the sake of riches. Let our prayers fruitily like the bagger women, who go to Indr Dev expecting food grains.
अश्व्यस्य त्मना रथ्यस्य पुष्टेर्नित्यस्य रायः पतयः स्याम।
ता चक्राणा ऊतिभिर्नव्यसीभिरस्मत्रा रायो नियुतः सचन्ताम्॥
हम लोग बिना प्रयत्न के अश्व समूह, रथ समूह, पुष्टि एवं अविचल धन के स्वामी हों। वे दोनों देव गमन शील हों एवं नूतन रक्षा के साथ हम लोगों के अभिमुख अश्व और धन नियुक्त करें।[ऋग्वेद 4.41.10]
वे इन्द्र देव और वरुण दोनों देवता गमनशील हैं। अपने अभिनव रक्षा साधनों के साथ हमारे सम्मुख अश्व आदि पशु धन सम्पादित करें। तब हम बिना प्रयास किये ही अश्वों, रथों, बैलों और स्थिर धनों के अधीश्वर होंगे।
Hey Indr Dev & Varun Dev! You are the master of horses, charoites, might and immovable wealth. You both are dynamic. Appoint-grant horses and new wealth for our safety.
आ नो बृहन्ता बृहतीभिरूती इन्द्र यातं वरुण वाजसातौ।
यद्दिद्यवः पृतनासु प्रक्रीळान्तस्य वां स्याम सनितार ओजः॥
हे महान इन्द्र देव और वरुण देव! आप दोनों महान रक्षा के साथ आगमन करें। जिस अन्न प्रापक युद्ध में शत्रु सेना के आयुध क्रीड़ा करते हैं, उस युद्ध में हम लोग आप दोनों के अनुकम्पा से विजय प्राप्त कर सकें।[ऋग्वेद 4.41.11]
हे इन्द्रा-वरुण! तुम सर्वश्रेष्ठ हो। तुम अपने श्रेष्ठ सुरक्षा साधनों से युक्त यहाँ पधारो। अन्न प्राप्ति के जिस युद्ध में शत्रु सेना के हथियार आघात करते हैं, उस संग्राम में हम तपस्वी गण तुम दोनों देवों की कृपा दृष्टि से विजय ग्रहण करें।
Hey mighty-great Indr Dev & Varun Dev! Come to us with your great means of protection. We should be victorious in that war, in which you fight with your weapons for us & which yield food grains.(17.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (42) :: ऋषि :- त्रसदस्यु, पुरुकुत्स, देवता :- आत्मा, इन्द्र देव, वरुण, छन्द :- त्रिष्टुप।
मम द्विता राष्ट्रं क्षत्रियस्य विश्वायोर्विश्वे अमृता यथा नः।
क्रतुं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रेः॥
हम क्षत्रिय जाति में उत्पन्न (अतिशय बलवान) और सम्पूर्ण मनुष्यों के स्वामी हैं। हमारा राज्य दो प्रकार का है। सम्पूर्ण देवगण जिस प्रकार से हमारे हैं, उसी प्रकार समस्त प्रजा भी हमारी ही है। हम रूपवान और समीपस्थ वरुण देव है। देवगण हमारे यज्ञ की सेवा करते हैं।[ऋग्वेद 4.42.1]
हम क्षत्रिय हैं। समस्त व्यक्तियों के हम स्वामी हैं। हमारा राष्ट्र दो प्रकार का है। जैसे समस्त देव हमारे हैं, उसी प्रकार समस्त प्रजाजन भी हमारे ही हैं। हम सुन्दर रूप वाले एवं वरुण के समान यशस्वी हैं।
We are born in Kshatriy clan, mighty & king of all humans. Our kingdom is of two types. The manner in which the demigods-deities belong to us, the humans too belong to us. We are beautiful-handsome like Varun Dev.
Kshatriy is the second Varn in the Hindus. The British referred them as marshal castes. Generally, they are warriors and constitute the army.
अहं राजा वरुणो मह्यं तान्यसुर्याणि प्रथमा धारयन्त।
क्रतं सचन्ते वरुणस्य देवा राजामि कृष्टेरुपमस्य वव्रे:॥
हम ही राजा वरुण देव हैं। देवगण हमारे लिए ही असुर विघातक श्रेष्ठ बल धारण करते है। हम रूपवान और समीपस्थ वरुण देव हैं। देवगण हमारे यज्ञ की सेवा करते हैं, हम मनुष्य के स्वामी हैं।[ऋग्वेद 4.42.2]
देवता हमारे यज्ञ की सुरक्षा करते हैं। हम तरुण तेजस्वी सम्राट हैं। देवता हमारे लिए ही असुरों को समाप्त करने वाला बल धारण करते हैं। हम सुन्दर रूप वाले वरुण के अंतकस्थ हैं। हमारे यज्ञ के देवता रक्षक हैं और हम प्राणियों के दाता हैं।
We are like the king Varun Dev. We are close to Varun Dev and beautiful-youthful. The demigods-deities protect our Yagy. We are the king of humans.
अहमिन्द्रो वरुणस्ते महित्वोर्वी गभीरे रजसी सुमेके।
त्वष्टेव विश्वा भुवनानि विद्वान्त्समैरयं रोदसी धारयं च॥
हम इन्द्र देव और वरुण देव हैं। अपनी महत्ता के कारण विस्तीर्ण, दुरवगाहा, सुरूपा, द्यावा-पृथ्वी हम ही हैं। हम विद्वान हैं। हम सकल भूतजात को प्रजापति के तुल्य प्रेरित करते हैं। हम द्यावा-पृथ्वी को धारित करते हैं।[ऋग्वेद 4.42.3]
महत्ता :: महत्त्व, अहमियत, महिमा, प्रभुता, प्रभाव, अर्थ, अभिप्राय, गौरव, प्रतिष्ठा, महानता, विपुलता, विस्तार, अधिकता; importance, significance, greatness.
भूतजात :: मृत, दिवंगत, पितृगण; deceased, Manes-Pitres.
हम इन्द्र, वरुण और पृथ्वी भी स्वयं हैं। हम प्राणधारी मात्र को प्रजापति के तुल्य शिक्षा प्रदान करने वाले हैं। हम आकाश और पृथ्वी के धारण करने वाले तथा प्रज्ञावान हैं।
We are Indr Dev & Varun Dev. We constitute the sky-space (heaven) & the earth due to our significance & greatness and support them. We are learned-enlightened. We inspire the deceased, Manes-Pitres like Prajapati.
अहमपो अपिन्वमुक्षमाणा धारयं दिवं सदन ऋतस्य।
ऋतेन पुत्रो अदितेर्ऋतावोत त्रिधातु प्रथयद्वि भूम॥
हमने ही सिचमान जल की वर्षा की, उदक या आदित्य के स्थान भूत द्युलोक को धारित किया अथवा आकाश में आदित्य को धारित किया। जल के निमित्त से हम अदिति पुत्र ऋतावा (यज्ञवान) हुए। हमने व्याप्त आकाश को तीन प्रकार से प्रथित किया अर्थात परमेश्वर ने हमारे लिए ही क्षिति आदि तीन लोकों को बनाया।[ऋग्वेद 4.42.4]
क्षिति :: पृथ्वी, निवास स्थान; earth.
हमने ही वर्षा रूप जल को सींचा हैं। सूर्य के आश्रित जगत अम्बर को हमने ही धारण किया है। हम अदिति पुत्र जल के लिए यज्ञवान हुए हैं। हमने ही व्यापक नभ के तीनों लोकों के रूप में परिवर्तित किया है।
We showered rains for irrigation and supported the space-sky the abode of Sun. For the sake of water we turned into Ritava-the son of Aditi i.e., became performers of Yagy. We divided the space-sky into three abodes (earth, heavens and the Nether world).
मां नरः स्वश्वा वाजयन्तो मां वृताः समरणे हवन्ते।
कृणोम्याजिं मघवाहमिन्द्र इयर्मि रेणुमभिभूत्योजाः॥
सुन्दर अश्व वाले और युद्ध के इच्छुक नेता अनुगमन करते हैं। वे सब वृत होकर युद्ध के लिए संग्राम में हमारा ही आह्वान करते हैं। हम धनवान इन्द्र देव होकर युद्ध करते हैं। हम पराजित करने वाले बल से युक्त होकर धूल उड़ाते हैं।
युद्ध में नेतृत्व करने वाले, सुन्दर अश्ववान वीर हमारे पीछे चलते हैं। वे सभी संकल्पवान हुए युद्ध में हमकों ही आमंत्रित करते हैं। हम समृद्धिशाली इन्द्रदेव के रूप में अनुष्ठान करते हैं। हम शत्रु को पराजित करने वाली शक्ति से युक्त हैं। हमारी प्रबल गति से संग्राम स्थान में धूल उड़कर अम्बर में छा जाती है।
The warriors-stalwarts desirous of war, possessing beautiful horses follow us. They decide to fight and invoke us. We become wealthy Indr Dev and fight in the war. Our might produces-spread dust in the sky.
अहं ता विश्वा चकरं नकिर्मा दैव्यं सहो वरते अप्रतीतम्।
यन्मा सोमासो ममदन्यदुक्थोभे भयेते रजसी अपारे॥
हमने उन सभी कार्यों को किया। हम अप्रतिहत दैव बल से युक्त हैं। कोई भी हमे रोक नहीं सकता। जब सोमरस हमें हर्षित करता है एवं उक्थ समूह हमें हर्षित करता है, तब अपार और उभय द्यावा-पृथ्वी भयभीत हो जाती हैं।[ऋग्वेद 4.42.6]
हम अलौकिक पराक्रम से परिपूर्ण हैं। हमको हमारे कार्यों में कोई बाधित नहीं कर सकता। हमने इन सभी कार्यों को पूर्ण किया है। जब सोमरस और श्लोक हमें पुष्ट करते हैं, तब हमारे पराक्रम को देखकर विस्तृत नभ और भू-मण्डल दोनों ही चलायमान हो जाते हैं।
We possess extreme might and none can block us. We accomplished the current deeds. When Somras & hymns nourish-nurse us, the earth and the sky become movable-dynamic.
Each & every thing in the universe is movable-dynamic.
विदुष्टे विश्वा भुवनानि तस्य ता प्र ब्रवीषि वरुणाय वेधः।
त्वं वृत्राणि शृण्वषे जघन्वान्त्वं वृताँ अरिणा इन्द्र सिन्धून्॥
हे वरुण देव! आपके कर्म को सकल लोक जानते हैं। हे स्तोता! वरुण देव की प्रार्थना करें। हे इन्द्र देव! आपने रिपुओं का वध किया; यह आपकी प्रसिद्धि है। हे इन्द्र देव! आपने अवरुद्ध की हुई नदियों को प्रवाहित किया।[ऋग्वेद 4.42.7]
हे वरुण! तुम्हारे कार्य को सभी प्राणधारी जानते हैं। वंदना करने वालों! वरुण देव की प्रार्थना करो। हे इन्द्र देव! तुमने शत्रुओं का पतन किया है, तुम्हारे इस कार्य को सभी जानते हैं। तुमने रुकी हुई नदियों को भी प्रवाहित किया है।
Hey Varun Dev! Entire universe is aware of your might-power. Hey Stota! Pray-worship Varun Dev. Hey Indr Dev! You are famous since you killed the enemies. Hey Indr Dev! You made the dry-blocked rivers flow.
अस्माकमत्र पितरस्त आसन्त्सप्त ऋषयो दौर्गहे बध्यमाने।
त आयजन्त त्रसदस्युमस्या इन्द्रं न वृत्रतुरमर्धदेवम्॥
दुर्गह के पुत्र पुरुकुत्स के बन्दी होने पर इस देश या पृथ्वी के पालयिता सप्तर्षि हुए। उन्होंने इन्द्र देव और वरुण देव के अनुग्रह से पुरुकुत्स की स्त्री के लिए यज्ञ करके त्रसदस्यु को उपलब्ध किया। त्रसदस्यु इन्द्र देव के तुल्य शत्रु विनाशक और अर्द्धदेव देवताओं के समीप में वर्तमान या देवताओं के अर्द्धभूत इन्द्र देव के तुल्य थे।[ऋग्वेद 4.42.8]
पुरुकुत्स के बन्धन में पड़ने पर सप्तऋर्षि इस पृथ्वी के पालनकर्त्ता हुए। उन्होंने इन्द्र और वरुण की दया से पुरुकुत्स की पत्नी के लिए यज्ञ किया और त्रसदस्यु को पाया। वह त्रसदस्यु इन्द्र के समान शत्रुओं का नाश करने वाला हुआ और वह अर्द्ध देवत्व का भी अधिकारी हुआ।
When Purukuts, son of Durgah was arrested-imprisoned, Sapt Rishi Gan became the nurturers of the earth. They made Trasdasyu, who was as capable as Indr Dev in destroying the enemies, available for conducting the Yagy of the wife of Purukuts & the semi demigods by virtue of the grace of Indr Dev & Varun Dev.
पुरुकुत्सानी हि वामदाशब्द्धव्येभिरिन्द्रावरुणा नमोभिः।
अथा राजानं त्रसदस्युमस्या वृत्रहणं ददथुरर्धदेवम्॥
हे इन्द्र देव और वरुण देव! ऋषियों द्वारा प्रेरित होने पर पुरुकुत्स की पत्नी ने आप दोनों को हव्य और स्तुति द्वारा प्रसन्न किया। अनन्तर आप दोनों ने उसे शत्रु नाशक अर्द्ध देव राजा त्रसदस्यु को प्रदान किया।[ऋग्वेद 4.42.9]
हे इन्द्रा-वरुण! मुनि की शिक्षा से पुरुकुत्स की पत्नी ने तुम दोनों को हविरत्न और प्रार्थनाओं के द्वारा हर्षित किया। फिर तुम दोनों ने उसे अर्द्ध देवत्व ग्रहण शत्रुओं का पतन करने वाले त्रसदस्यु को प्रदान करके संतुष्ट होगी।
Hey Indr Dev & Varun Dev! On being inspired by the Rishis, the wife of Purukuts pleased both of you with offerings and prayers. Thereafter, you both sent her to Trasdasyu, who has had obtained semi demigod hood and was the slayer of of the enemy.
राया वयं ससवांसो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः।
तां धेनुमिन्द्रावरुणा युवं नो विश्वाहा धत्तमनपस्फुरन्तीम्॥
हम लोग आप दोनों की प्रार्थना करके धन द्वारा परितृप्त होंगे। देवगण हव्य द्वारा तृप्त हों और गौएँ तृणादि द्वारा परितृप्त हों। हे इन्द्र और वरुण! आप दोनों विश्व के हन्ता हैं। आप दोनों हम लोगों को सदा अहिंसित धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.42.10]
देवता हविरत्न से तथा गाय तृणादि से संतुष्टि को प्राप्त होती है। हे इन्द्रा वरुण! तुम दोनों विश्व की उत्पत्ति और संहार करने वाले हो। हमको स्थिर धन प्रदान करो।
You both are pleased with prayers-worship and the cow is satisfied by the straw. Hey Indr Dev & Varun Dev! You are the creator & destroyer of the universe. Grant us wealth which cannot be snatched from us.(18.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (46) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र देव, वायु देव, छन्द :- गायत्री।
अग्रं पिबा मधूनां सुतं वायो दिविष्टिषु। त्वं हि पूर्वपा असि॥
हे वायु देव! स्वर्ग प्रापक यज्ञ में आप सर्वप्रथम अभिषुत सोमरस का पान करें; क्योंकि आप सबसे पहले सोमरस का पान करने वाले हैं।[ऋग्वेद 4.46.1]
हे वायु! स्वर्ग में स्थान बनाने वाले अनुष्ठान में इस अभिषुत सोम रस को आकर पीओ क्योंकि तुम सबसे पहले सोमरस का पान करने वाले हो।
Hey Vayu Dev! Drink this freshly extracted Somras first of all, since you are one who clears the way to heavens and you are entitled to drink it first.
शतेना नो अभिष्टिभिर्नियुत्वाँ इन्द्रसारथिः। वायो सुतस्य तृम्पतम्॥
हे वायु देव! आप नियुद्वान् हैं और इन्द्र देव आपके सारथि हैं। आप अपरिमित कामनाओं को पूर्ण करने के लिए आगमन करें। आप अभिषुत सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 4.46.2]
हे वायु देव! हे इन्द्र देव! तुम दोनों सोमपान के द्वारा संतुष्टि को प्राप्त हो जाओ। हे वायु! तुम संसार के कल्याणकारी कर्म में नियुक्त हुए हो। तुम इन्द्र देव के सारथी होकर हमारी दृढ़ कामनाओं को पूरा करने के लिए यहाँ आओ।
Hey Vayu Dev! Indr Dev is your charioteer & you are appointed to perform the welfare of the humans-world. Invoke to accomplish our unfulfilled desires. Drink the freshly extracted Somras.
आ वां सहस्रं हरय इन्द्रवायू अभि प्रयः। वहन्तु सोमपीतये॥
हे इन्द्र देव और वायु देव! आप दोनों को हजारों संख्या वाले अश्व युक्त रथ द्रुतगति से सोमपान के लिए ले आवें।[ऋग्वेद 4.46.3]
हे इन्द्र और वायु! तुम दोनों को हजारों अश्व शीघ्रतापूर्वक सोमपान के लिए यहाँ ले आएँ।
Hey Indr Dev & Vayu Dev! Come here fast, riding the charoite pulled by thousands of horses, to drink the Somras.
रथं हिरण्यवन्धुरमिन्द्रवायू स्वध्वरम्। आ हि स्थाथो दिविस्पृशम्॥
हे इन्द्र देव और वायु देव! आप दोनों हिरण्मय निवासाधार काष्ठ से युक्त द्युलोक स्पर्शी और शोभन यज्ञशाली रथ पर आरोहण करें।[ऋग्वेद 4.46.4]
हे इन्द्रदेव और वायु! तुम दोनों स्वर्ण के उज्जवल काष्ठ के मूल वाले तथा अम्बर से तुम दोनों ही महान शक्तिशाली रथ से ही हवि प्रदान करने वाले यजमान के निकट पधारो।
Hey Indr Dev & Vayu Dev! Come to the Yagy of the Ritviz, for accepting offerings riding the charoite in which wood is studded with gold, from the heavens.
रथेन पृथुपाजसा दाश्वांसमुप गच्छतम्। इन्द्रवायू इहा गतम्॥
हे इन्द्र देव और वायु देव! आप दोनों प्रभूत बल सम्पन्न रथ द्वारा हव्य दाता याजक गण के निकट आगमन करें तथा इस यज्ञ मण्डप में पधारें।[ऋग्वेद 4.46.5]
तुम दोनों यजमान के लिए ही इस महान अनुष्ठान में पधारो।
Hey Indr Dev! Hey Vayu Dev! Visit the Yagy of the Ritviz making offerings, riding the charoite associated with your might.
इन्द्रवायू अयं सुतस्तं देवेभिः सजोषसा। पिबतं दाशुषो गृहे॥
इन्द्र देव और वायु देव! यह सोमरस आपके लिए अभिषुत किया गया है। आप दोनों देवताओं के साथ समान प्रीति युक्त होकर हव्य दाता याजक गण की यज्ञशाला में उसका पान करें।[ऋग्वेद 4.46.6]
हे इन्द्र देव! हे वायो! यह प्रसिद्ध सोम रखा है। तुम दोनों समान प्रीति वाले होकर हविदाता यजमान के यज्ञ स्थल में आकार सोम रस पीओ।
Hey Indr Dev! Hey Vayu Dev! This Somras has been extracted for you. Drink it along with the demigods-deities happily, in the Yagy Shala-house of the Ritviz.
इह प्रयाणमस्तु वामिन्द्रवायू विमोचनम्। इह वां सोमपीतये॥
हे इन्द्र देव और वायु देव! इस यज्ञ में आप दोनों का आगमन हो। यहाँ पधार कर सोमपान के निमित्त आप दोनों अपने अश्वों को रथ से मुक्त करें।[ऋग्वेद 4.46.7]
हे इन्द्रदेव! हे वायो! इस अनुष्ठान में तुम्हें सोमरस पान करने के लिए अश्व खोल दिए जाएँ। तुम दोनों इस यज्ञ स्थल में आओ।
Hey Indr Dev! Hey Vayu Dev! Join this Yagy. Come here and release your horses from the charoite.(23.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (47) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र देव, वायु देव, छन्द :- गायत्री।
वायो शुक्रो अयामि ते मध्वो अग्रं दिविष्टिषु।
आ याहि सोमपीतये स्पार्हो देव नियुत्वता॥
हे वायु देव! व्रतचर्यादि के द्वारा दीप्त-पवित्र होकर हम द्युलोक जाने की अभिलाषा से आपके लिए मधुर सोमरस का प्रथम आनयन करते हैं। हे वायु देव! आप स्पृहणीय हैं। आप अपने अश्व वाहन द्वारा सोमपान के लिए यहाँ आगमन करें।[ऋग्वेद 4.47.1]
हे वायो! महान कर्मानुष्ठानों द्वारा शुद्ध बने हुए हम अद्भुत संसार प्राप्ति की इच्छा करते हुए पहले तुम्हारे लिए ही सोमरस को लाते हैं। तुम अभिलाषा के योग्य हो। अपने वाहन के युक्त सोमपान करने के लिए उस स्थान से पधारो।
Hey Vayu Dev! We extract the sweet Somras with great efforts for you, adopting penances, fasts etc. You are desirable. Ride your charoite deploying horses and come here to drink Somras.
इन्द्रश्च वायवेषां सोमानां पीतिमर्हथः।
युवां हि यन्तीन्दवो निम्नमापो न सध्र्यक्॥
हे वायु देव! आप और इन्द्र देव इस गृहीत सोमरस के पान योग्य हो, आप दोनों ही सोमरस को प्राप्त करते हैं; क्योंकि जल जिस प्रकार से गर्त की ओर गमन करता है, उसी प्रकार से सकल सोमरस आप दोनों के अभिमुख गमन करते हैं।[ऋग्वेद 4.47.2]
हे वायो! उस ग्रहण किये हुए सोम पीने के पात्र तुम हो और इन्द्रदेव हैं। जैसे जल गड्ढे की ओर जाता है, वैसे ही सभी प्रकार के सोम तुम्हारे समीप जाते हैं।
Hey Vayu Dev! You and Indr dev are qualified to drink Somras. The way water moves to low lying areas, all sorts of Somras comes to you automatically.
वायविन्द्रश्च शुष्मिणा सरथं शवसस्पती।
नियुत्वन्ता न ऊतय आ यातं सोमपीतये॥
हे वायु देव! आप ही इन्द्र देव हैं। आप दोनों बल के स्वामी है। आप दोनों पराक्रमशाली और नियुद्गण से युक्त हैं। आप दोनों एक ही रथ पर आरोहण करके हम लोगों को आश्रय प्रदान करने के लिए और सोमरस का पान करने के लिए यहाँ पधारें।[ऋग्वेद 4.47.3]
तुम दोनों अत्यन्त शक्तिशाली एवं अश्वों से युक्त हो। तुम दोनों एक ही रथ पर विराजमान होकर सोमरस का पान करो तथा हमें आश्रय प्रदान करने के लिए यहाँ पर पधारो।
Hey Vayu Dev! You are Indr Dev. Both of you are mighty and possess the horses. Ride the same charoite and come to us for drinking Somras and grant us asylum-protection.
या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा।
अस्मे ता यज्ञवाहसेन्द्रवायू नि यच्छतम्॥
हे नायक तथा यज्ञ वाहक इन्द्र देव और वायु देव! आप दोनों के पास अनेकों द्वारा कामना किए जाने योग्य जो अश्व हैं, उन अश्वों को मुझ दान देने वाले यजमान को प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.47.4]
हे इन्द्रदेव और वायो! तुम दोनों ही यज्ञ हवन करने वालों एवं समस्त देवों में अग्रणी हो। हम तुमको हवि रत्न प्रदान करने वाले यजमान हैं। तुम्हारे पास अभिलाषा के योग्य जो अश्व हैं उन्हें हमें प्रदान करो।
Hey leaders and supporter of the Yagy Vayu Dev & Indr Dev! Grant me-the Ritviz, the horses which several people desire to have-possess.(23.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (49) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र देव, बृहस्पति, छन्द :- गायत्री।
इदं वामास्ये हविः प्रियमिन्द्राबृहस्पती। उक्थं मदश्च शस्यते॥
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव! आप दोनों के मुँह में हम इस प्रिय सोमरूप हवि का प्रक्षेप करते हैं। हम आप दोनों को उक्थ (शस्त्र) और मद जनक सोमरस प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 4.49.1]
हे इन्द्रदेव और बृहस्पति! तुम परमप्रिय सोमरूपी हविरत्न को तुम दोनों के मुख में डालते हैं। तुम दोनों को हम हर्षकारक सोमरस प्रदान करते हैं।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! We pour Somras as offering in your mouth. Somras gives joy-pleasure.
अयं वां परि षिच्यते सोम इन्द्राबृहस्पती। चारुर्मदाय पीतये॥
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव ! आप दोनों के मुँह में पान के लिए और हर्ष के लिए यह मनोहर सोमरस भली-भाँति से दिया जाता है।[ऋग्वेद 4.49.2]
हे इन्द्रदेव और बृहस्पति! तुम दोनों की दृष्टि के लिए तथा पान करने के लिए वह सुस्वादु सोमरस हम तुम्हारे मुख में डालते हैं।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! For your pleasure we provide you tasty Somras, to drink.
आ न इन्द्राबृहस्पती गृहमिन्द्रश्च गच्छतम्। सोमपा सोमपीतये॥
हे सोमरस पान करने वाले इन्द्र देव और बृहस्पति देव! आप दोनों सोमरस पान के लिए हमारे यज्ञगृह में पधारें।[ऋग्वेद 4.49.3]
हे इन्द्र देव और बृहस्पति! आप दोनों सोमरस पीने वाले हो। आप दोनों हमारे यज्ञ भवन में सोम पीने के लिए आओ।
Somras drinking Indr Dev & Brahaspati Dev! Visit our Yagy site to drink Somras.
अस्मे इन्द्राबृहस्पती रयिं धत्तं शतग्विनम्। अश्वावन्तं सहस्रिणम्॥
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव! आप दोनों हमें सैकड़ों गौएँ और हजारों अश्वों से युक्त ऐश्वर्य प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.49.4]
हे इन्द्र और बृहस्पति! आप दोनों ही हमें सैकड़ों गायों और हजारों अश्वों से युक्त धन प्रदान करो।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! Grant us grandeur constituting of hundreds of cows & thousands of horses.
इन्द्राबृहस्पती वयं सुते गीर्भिर्हवामहे। अस्य सोमस्य पीतये॥
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव! सोमरस के अभिषुत होने पर हम स्तुति द्वारा आप दोनों का सोमरस पान के लिए आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 4.49.5]
हे इन्द्र और बृहस्पते! हम तुम्हें सोम रस पीने के लिए बुलाते हैं।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! We invite-invoke your enjoying Somras.
सोममिन्द्राबृहस्पती पिबतं दाशुषो गृहे। मादयेथां तदोकसा॥
हे इन्द्र देव और बृहस्पति देव! आप दोनों हव्यदाता याजकगण के घर में सोमरसपान करें और उसके घर में निवास करके हर्षित होवें।
हे इन्द्र देव और बृहस्पते! हवि प्रदान करने वाले यजमान के गृह में निवास करते हुए आप दोनों सोम पान करके हर्षित हो जाओ।
Hey Indr Dev & Brahaspati Dev! Both of you enjoy Somras at the residence of the Ritviz and be pleased with them.(25.04.2023)
ऋग्वेद संहिता, चतुर्थ मण्डल सूक्त (50) :: ऋषि :- वामदेव गौतम, देवता :- इन्द्र देव, बृहस्पति, छन्द :- त्रिष्टुप्, जगती।
यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान्बृहस्पतिस्त्रिषधस्थो रवेण।
तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम्॥
वेद या यज्ञ के पालयिता बृहस्पति देव ने बलपूर्वक पृथ्वी की दसों दिशाओं को स्तम्भित किया। वे शब्द द्वारा तीनों स्थानों में वर्तमान हैं। उन आह्लादक जिह्वा विशिष्ट बृहस्पति देव को पुरातन, द्युतिमान मेधावियों ने पुरोभाग में स्थापित किया है।[ऋग्वेद 4.50.1]
वेद रक्षक बृहस्पति ने अपनी शक्ति से पृथ्वी की दसों दिशाओं को अपने वशीभूत किया। वे ध्वनि तीनों लोकों में विद्यमान हैं। उन विशिष्ट जिह्वा वाले, हर्षिता प्रदान करने वाले बृहस्पति को प्राचीन मुनियों ने पंडित के पद पर दृढ़ किया।
Protector-saviour of Veds Brahaspati stunned-controlled, over powered the all ten directions with might. They are present in three directions. The ancient scholars-enlightened established Brahaspati, who speaks pleasant, as a prime intellectual.
SAVIOUR :: रक्षक, मुक्तिदाता, उद्धारक, बचानेवाला; protector, defender, keeper, life saver, intercessor, rescuer, salvation, upholder, saver.
धुनेतयः सुप्रकेतं मदन्तो बृहस्पते अभि ये नस्ततस्त्रे।
पृषन्तं सुप्रमदब्धपूर्वं बृहस्पते रक्षतादस्य योनिम्॥
हे प्रभूत प्रज्ञावान बृहस्पति देव! जिनकी गति शत्रुओं को कँपाने वाली है, जो आपको आनन्दित करते हैं और जो आपकी प्रार्थना करते हैं, उनके लिए आप फलप्रद, वर्द्धन शील और अहिंसित होते हुए आप उनके विस्तृत यज्ञ की रक्षा करते है।[ऋग्वेद 4.50.2]
हे मेधावी बृहस्पति देव! तुम्हारी गति से शत्रुगण भयभीत हो जाते हैं जो आपको पुष्ट करने के लिए स्तुति करते हैं, तुम उनके लिए फल देने वाले, वृद्धि करने वाले तथा हिंसा रहित होते हो और तुम उनके श्रेष्ठ यज्ञ के पालनकर्त्ता हो।
Hey intelligent Brahaspati Dev! Your mighty create-generate fear amongest the enemy, though you are non violent. You support the vast-large scale Yagy of those, who worship-pray you, reward them & lead to their progress.
बृहस्पते या परमा परावत आ त ऋतस्पृशो नि षेदुः।
तुभ्यं खाता अवता अद्रिदुग्धा मध्वः श्चोतन्त्यभितो विरप्शम्॥
हे बृहस्पति देव! जो अत्यन्त दूरवर्ती स्वर्ग नामक उत्कृष्ट स्थान है, उस स्थान से आपके अश्व यज्ञ में आगमन करके प्रसन्न होते हैं। खात कूप के चारों तरफ से जिस प्रकार से जल स्राव होता है, उसी प्रकार से आपके चारों ओर स्तुतियों के साथ प्रस्तर द्वारा अभिषुत सोम मधुर रस का अभिसिञ्चन करता है।[ऋग्वेद 4.50.3]
हे बृहस्पति देव! जो दूरस्थ अद्भुत संसार है, वह अत्यन्त उत्कृष्ट है, वहाँ से तुम्हारे अश्व इस अनुष्ठान में आते हैं। जैसे खाद्य से भरे हुए कुएँ के चारों तरफ जल उबलता है, वैसे ही पाषाण द्वारा निष्पन्न मधुर सोमरस वंदनाओं के द्वारा तुम्हें चारों तरफ खींचता है।
Hey Brahaspati Dev! Horses become happy on being arrived from the distant heavens to the Yagy. The manner in which water discharges into the well, prayer-worship hover all around you and Somras obtained by crushing with stone, attracts you.
बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिषः परमे व्योमन्।
सप्तास्यस्तुविजातो रवेण वि सप्तरश्मिरधमत्तमांसि॥
मन्त्राभिमानी बृहस्पति देव जब महान सूर्य देव के निरतिशय आकाश में प्रथम जायमान हुए, तब सप्त छन्दोमय मुख विशिष्ट होकर और बहु प्रकार से सम्भूत होकर तथा शब्द युक्त एवं गमनशील तेजो विशिष्ट होकर उन्होंने अन्धकार का नाश कर दिया।[ऋग्वेद 4.50.4]
जब वे मंत्रज्ञ बृहस्पति सूर्यमण्डल में प्रथम बार प्रकट हुए, तब मुख से सप्त छंदोमय तथा शब्द से युक्त होकर उन गमनशील बृहस्पति ने अपने तेज से तम को नष्ट किया।
When expert of Mantr Shakti Brahaspati Dev appeared in the solar system-space for the first time, he recited the seven couplets composed of six stanzas and spelled several other related words, acquiring radiance-aura and vanished the darkness.
स सुष्टुभा स ऋक्वता गणेन वलं रुरोज फलिगं रवेण।
बृहस्पतिरुस्त्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद्वावशतीरुदाजत्॥
बृहस्पति देव ने दीप्ति युक्त और स्तुति शाली अङ्गिरा गण के साथ शब्द द्वारा बल नामक असुर को विनष्ट किया। उन्होंने शब्द करके भोग प्रदात्री और हव्य प्रेरिका गौओं को बाहर निकाला।[ऋग्वेद 4.50.5]
उन बृहस्पति ने वंदना करती हुई अंगिराओं सहित घोर शब्द द्वारा "बल" नामक असुर का संहार किया। उन्होंने शब्द से ही श्रेष्ठ दूध प्रदान करने वाली गायों को गुफा से निकाला था।
Brahaspati Dev associated with aura-radiance and the Angiras killed the demons names Bal. He uttered words which derived the milch cows out of the caves. These cows grant comforts and inspire offerings.
Brahaspati-Jupiter in the largest planet in space which emit light just like Sun.
एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः।
बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥
हम लोग इस प्रकार से पालक, सर्व देवता स्वरूप और अभीष्ट वर्षी बृहस्पति देव की यज्ञ द्वारा, हव्य द्वारा और स्तुति द्वारा, सेवा करेंगे। हे बृहस्पति देव! हम लोग जिससे सुपुत्रवान, वीर्यशाली और धन के स्वामी हो सकें।[ऋग्वेद 4.50.6]
हे बृहस्पति! सभी के देव स्वरूप, पोषण करने वाले, अभिलाषाओं की वृद्धि करने वाले हैं, हम अनुष्ठान में हविरल द्वारा वंदना किये उनकी प्रार्थना करेगे, जिससे हम संतान तथा शक्ति से परिपूर्ण समृद्धि का स्वामित्व ग्रहण कर सकें।
Hey Brahaspati Dev! You are the nurturer of all, like the Sun-Sury Dev & accomplish desires. We will make offerings and prayers for you, serve you to have virtuous sons, have wealth and might.
स इद्राजा प्रतिजन्यानि विश्वा शुष्मेण तस्थावभि वीर्येण।
बृहस्पतिं यः सुभृतं बिभर्ति वल्गयति वन्दते पूर्वभाजम्॥
जो बृहस्पति देव का सुन्दर रूप से पोषण करता है एवं उन्हें प्रथम हव्यग्राही कहकर उनकी स्तुति कर नमस्कार करता हैं, वह राजा अपने वीर्य द्वारा शत्रुओं के बल को अभिभूत करके अवस्थित करता है।[ऋग्वेद 4.50.7]
जो सम्राट बृहस्पति का भली प्रकार रक्षक है तथा प्रथम हव्य स्वीकार करने वाला मानकर उनको हवि प्रदान करता हुआ प्रणाम युक्त वंदना करता है। वह नृप अपने बल से शत्रुओं को सामर्थ्य को निरर्थक करता हुआ उसे हर लेता है।
The king who serve Brahaspati Dev, making offerings, prayers-worship for him, wins the enemies with his might-power.
स इत्क्षेति सुधित ओकसि स्वे तस्मा इळा पिन्वते विश्वदानीम्।
तस्मै विशः स्वयमेवा नमन्ते यस्मिन्ब्रह्मा राजनि पूर्व एति॥
जिस राजा के निकट ब्रह्मा (ब्रह्मण स्पति) अग्र गमन करते है, घर में निवास करता है। पृथ्वी उसके लिए सब काल में फल उत्पन्न करती है। प्रजागण स्वयं उसके निकट सदैव रहते हैं।[ऋग्वेद 4.50.8]
जिसके पास बृहस्पति सर्वप्रथम पधारते हैं, वह सम्राट संतुष्ट होकर अपने स्थान पर रहते हैं। उसके लिए धरा भी हर ऋतु में फल प्रदान करने वाली होती है। उसकी प्रजा उसके सामने सदैव सिर झुकाकर रहती है।
The empire of the king become stable, who is visited by Brahaspati Dev. The nature grants him all sorts of amenities. His citizens always abide by him.
अप्रतीतो जयति सं धनानि प्रतिजन्यान्युत या सजन्या।
अवस्यवे यो वरिवः कृणोति ब्रह्मणे राजा तमवन्ति देवाः॥
जो राजा रक्षण कुशल और धन रहित ब्राह्मण या बृहस्पति को धन दान करता है, वह अप्रतिहत रूप से शत्रुओं और प्रजाओं का धन जीतता है एवं महान होता है। देवगण उसी की रक्षा करते हैं।[ऋग्वेद 4.50.9]
सम्राट रक्षा चाहने वाले धनहीन विद्वान को धन प्रदान करता हैं, वह शत्रुओं का धन विजय करता है। देवता हमेशा उसकी रक्षा करते हैं।
The king who is able-expert in war fare, donate money to the Brahmans-poor, he over power the enemies and become great-mighty. The demigods-deities protect-save him.
इन्द्रश्च सोमं पिबतं बृहस्पतेऽस्मिन्यज्ञे मन्दसाना वृषण्वसू।
आ वां विशन्त्विन्दवः स्वाभुवोऽस्मे रयिं सर्ववीरं नि यच्छतम्॥
हे बृहस्पति देव! आप और इन्द्र देव इस यज्ञ में हर्षित होकर याजक गणों को धन प्रदान करें। सर्वव्यापक सोमरस आप दोनों के शरीर में प्रवेश करे। आप दोनों हम लोगों को पुत्र-पौत्रादि से युक्त धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 4.50.10]
हे बृहस्पते! तुम और इन्द्र दोनों ही यज्ञ में हर्ष प्राप्त कर यजमानों को धन प्रदान करो। यह सोमरस सर्वव्यापक है, यह तुम्हारे शरीरों में प्रविष्ट है। तुम दोनों ही हमारे लिए संतान से परिपूर्ण रमणीय धन को प्रदान करो।
Hey Brahaspati & Indr Dev! You should be happy-pleased and grant-donate money to the Ritviz in this Yagy. Let Somras be enjoyed-drunk by you. Grant us sons & grandsons along with money-riches.
बृहस्पत इन्द्र वर्धतं नः सचा सा वां सुमतिर्भूत्वस्मे।
अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्जजस्तमर्यो वनुषामरातीः॥
हे बृहस्पति देव और इन्द्र देव! आप दोनों हम लोगों को संवर्द्धित करें। हम लोगों के प्रति आप दोनों का अनुग्रह एक समय में ही प्रयुक्त होता है। आप दोनों हम लोगों के यज्ञ की रक्षा करते हुए हमारी प्रार्थना से जाग्रत होवें और याजकों के शत्रुओं का आप विनाश करें।[ऋग्वेद 4.50.11]
हे बृहस्पते! हे इन्द्रदेव! तुम दोनों ही हमको हर तरह से बढ़ाओ । हमारे प्रति तुम दोनों की दया एक साथ ही प्रेरित हो। हमारे इस यज्ञ के तुम दोनों ही रक्षक हो। वंदना से चैतन्य को ग्रहण हो जाओ।
Hey Brahaspati Dev! Hey Indr Dev! Both of you nurture-support us and oblige us together, at the same moment. Accept our prayers and protect our Yagy. Destroy the enemies of the Ritviz-hosts in the Yagy.(28.04.2023)
इन्द्राग्नी शतदाव्यश्वमेधे सुवीर्यम्।
क्षत्रं धारयतं बृहद्दिवि सूर्यमिवाजरम्॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! आप दोनों याचकों के लिए अपरिमित धन के दाता राजर्षि अश्वमेध को अन्तरिक्ष स्थित सूर्य की तरह शोभन बल के साथ महान् और अक्षय धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 5.27.6]
Hey Indr Dev & Agni Dev! Both of you grant-bestow upon unlimited wealth to Rajrishi Ashwmedh, like the glorious Sun in the space; for the needy.(11.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (29) :: ऋषि :- गौरिवीति शाक्त्य, देवता :- इन्द्र या उशना, छन्द :- त्रिष्टुप्।
त्र्यर्यमा मनुषो देवताता त्री रोचना दिव्या धारयन्त।
अर्चन्ति त्वा मरुतः पूतदक्षास्त्वमेषामृषिरिन्द्रासि धीरः॥
हे इन्द्र देव! मनु यज्ञ में जो तीन गुण हैं तथा अन्तरिक्ष में उत्पन्न होने वाले जो रोचमाम वायु, अग्नि और सूर्यात्मक तेज हैं, उनको मरुतों ने धारित किया है। शुद्ध बल वाले मरुद्गण आपकी प्रार्थना करते हैं। आप बुद्धिमान् हैं, इन मरुतों को देखें।[ऋग्वेद 5.29.1]
Hey Indr Dev! Marud Gan have supported the three characterices-qualities, traits in the Yagy performed by Manu and the energy-radiance, aura generated in the space i.e., Rochmam Vayu, Agni and the Sun. Marud Gan having pure power worship you. You are intelligent, look at Marud Gan.
अनु यदी मरुतो मन्दसानमार्चन्निन्द्रं पपिवांसं सुतस्य।
आदत्त वज्रमभि यदहिं हन्नपो यह्वीरसृजत्सर्तवा उ॥
जब मरुतों ने अभिषुत सोमरस के पान से तृप्त इन्द्र देव की प्रार्थना की तब इन्द्र देव ने वज्र धारित किया और वृत्रासुर को मारा एवं वृत्र निरुद्ध महान् जल-राशि को स्वेच्छानुसार से बहने के लिए मुक्त किया।[ऋग्वेद 5.29.2]
When Marud Gan satisfied Indr Dev by offering him extracted Somras and prayed-requested him, he wore Vajr, killed Vrata Sur and allowed the stored-blocked water to flow freely.
उत ब्रह्माणो मरुतो मे अस्येन्द्रः सोमस्य सुषुतस्य पेयाः।
तद्धि हव्यं मनुषे गा अविन्ददहन्नहिं पपिवाँ इन्द्रो अस्य॥
हे बृहत् मरुतों! आप सब और इन्द्रादि सहित भली-भाँति से हमारे इस अभिषुत सोमरस का पान करें। आप लोगों के द्वारा यह सोमात्मक हव्य पिया जावे, जिससे यजमान गौओं को प्राप्त करें। इसी सोमरस को पीकर इन्द्र देव ने वृत्रासुर का वध किया।[ऋग्वेद 5.29.3]
बृहत् :: बहुत बड़ा, विशाल, बहुत भारी, दृढ़, पक्का, मजबूत, बलिष्ठ, पर्याप्त, उच्च, ऊँचा स्वर, एक मरुत् का नाम, पैघ, विशाल; large, comprehensive.
Hey mighty Marud Gan! Drink this Somras extracted by us along with Dev Raj Indr & others and grant cows to the Ritviz-priests. Indr Dev killed Vrata Sur after drinking Somras.
आद्रोदसी वितरं वि ष्कभायत्संविव्यानश्चिद्भियसे मृगं कः।
जिगर्तिमिन्द्रो अपजर्गुराणः प्रति श्वसन्तमव दानवं हन्॥
सोमपान के अनन्तर इन्द्र देव ने द्यावा-पृथ्वी को निश्चल किया। गमनशील होकर इन्होंने मृगवत् पलायमान वृत्रासुर को भयभीत किया। दनु पुत्र (वृत्र) छिप रहा था और भय से श्वास ले रहा था। इन्द्र देव ने उसके प्रपंच को नष्ट करके उसका वध किया।[ऋग्वेद 5.29.4]
भयभीत :: शंकित, भयानक, भयावह, भयंकर; frightened, fearful, afraid.
प्रपंच :: माया, भ्रांति, मोह, ग़लतफ़हमी, भुलावा; delusion, illusion, illusory creation, mundane affairs, cast, spell.
After drinking Somras, Indr Dev made earth and the heavens stationary became dynamic frightened Vrata Sur, made him run like a dear. Indr Dev destroyed the cast-spell, illusion and killed him.
अध क्रत्वा मघवन्तुभ्यं देवा अनु विश्वे अददुः सोमपेयम्।
यत्सूर्यस्य हरितः पतन्तीः पुरः सतीरुपरा एतशे कः॥
हे धनवान् इन्द्र देव! आपके इस कर्म से वह्नि आदि निखिल देवताओं ने आपके अनुक्रम से सोमरस पान के लिए दिया। आपने एतश के लिए सम्मुखवर्ती सूर्य के अश्वों का गतिरोध किया।[ऋग्वेद 5.29.5]
एतश :: शानदार, चमकदार, wonderful, shinning.
Hey rich Indr Dev! Having accomplished this deed, Vahni and all other demigods-deities sipped Somras, in their order-sequence. For performing this wonderful act you blocked the horses of Sury Dev-Sun.
नव यदस्य नवतिं च भोगान्त्साकं वज्रेण मघवा विवृश्चत्।
अर्चन्तीन्द्रं मरुतः सधस्थे त्रैष्टुभेन वचसा बाधत द्याम्॥
जब धनवान् इन्द्र देव ने वज्र द्वारा शम्बर के निन्यान्बे नगरों को एक साथ ही विनष्ट किया, तब मरुतों ने युद्ध भूमि में इनकी स्तुति त्रिष्टुप् छन्द में की। इस तरह से मरुतों के मन्त्रों द्वारा प्रार्थित होने पर दीप्त इन्द्र देव ने शम्बर असुर का वध किया।[ऋग्वेद 5.29.6]
When mighty-powerful Indr Dev destroyed the 99 cities-fortress of Shambar with Vajr all together, Marud Gan prayed him with the recitation of Trishtup Chhand. On been worshiped by the Mantr recited by Marud Gan aurous Indr Dev killed the demon Shambar.
सखा सख्ये अपचत्तूयमग्निरस्य क्रत्वा महिषा त्री शतानि।
त्री साकमिन्द्रो मनुषः सरांसि सुतं पिबद्वृत्रहत्याय सोमम्॥
इन्द्र देव के मित्र रूप अग्नि देव ने मित्र इन्द्र देव के कार्य के लिए सौ महिषों को शीघ्र पकाया। परमैश्वर्य युक्तं इन्द्र देव ने वृत्रासुर को मारने के लिए मनु सम्बन्धी तीन पात्रों में स्थित सोमरस को एक काल में ही पिया।[ऋग्वेद 5.29.7]
Friendly Agni Dev roasted 100 buffalos to get the endeavour of Indr Dev accomplished. Indr Dev having ultimate grandeur consumed-drunk the Somras in the three pots related with Manu in one go.
त्री यच्छता महिषाणामघो मास्त्री सरांसि मघवा सोम्यापाः।
कारं न विश्वे अह्वन्त देवा भरमिन्द्राय यदहिं जघान॥
हे इन्द्र देव! जब आपने तीन सौ महिषों के माँस का भक्षण किया, धनवान् होकर जब आपने तीन पात्रों में स्थित सोमरस का पान किया, जब आपने वृत्र का वध किया, तब सब देवताओं ने युद्ध के लिए सोमपान से पूर्ण इन्द्र देव का आह्वान किया।[ऋग्वेद 5.29.8]
Hey Indr Dev! You enriched & ate the meat of 300 buffalos, drunk the Somras kept in 3 pots, thereafter you killed Vratr, then the demigods-deities invoked you for the war.
उशना यत्सहस्यै ३ रयातं गृहमिन्द्र जूजुवानेभिरश्वैः।
वन्वानो अत्र सरथं यया कुत्सेन देवैरवनोर्ह शुष्णम्॥
हे इन्द्र देव! आप और कवि जब अभिभवन शील एवं द्रुतगामी अश्वों के साथ कुत्स के घर में उपस्थित हुए, तब आपने शत्रुओं को हिंसित करके कुत्स और देवताओं के साथ एक ही रथ पर आरूढ़ हुए। हे इन्द्र देव! शुष्ण नामक असुर का वध आपने ही किया।[ऋग्वेद 5.29.9]
अभिभवन :: काबू में करना; Overpowering, over coming.
Hey Indr Dev! When you and Kavi reached house of Kuts riding fast moving, riding the horses capable of over powering, you destroyed the enemy and rode the charoite along with Kuts & demigods-deities. Hey Indr Dev! You killed the
प्रान्यच्चक्रमवृहः सूर्यस्य कुत्सायान्यद्वरिवो यातवेऽकः।
अनासो दस्यूँरमृणो वधेन नि दुर्योण आवृणङ्मृध्रवाचः॥
हे इन्द्र देव! पहले ही आपने सूर्य के दो चक्कों में से एक चक्के को पृथक किया एवं दूसरे एक चक्के को आपने शब्द रहित असुरों को हत बुद्धि करके वज्र द्वारा संग्राम में मारा।[ऋग्वेद 5.29.10]
Hey Indr Dev! You detached one wheel of the charoite of Sun and stunned-speechless the demons by the second wheel killing them in the war with Vajr.
स्तोमासस्त्वा गौरिवीतेरवर्धन्नरन्धयो वैदथिनाय पिप्रुम्।
आ त्वामृजिश्वा सख्याय चक्रे पचन्पक्तीरपिबः सोममस्य॥
हे इन्द्र देव! गौरिवीति ऋषि के स्तोत्र आपको प्रवर्द्धित करें। आपने विदथि पुत्र ऋजिश्वा के लिए पिप्रु नामक असुर को मारा। ऋजिश्वा नाम वाले किसी ऋषि ने आपकी मित्रता के लिए पुरोडाश आदि को पकाकर आपको निवेदित किया। आपने ऋजिश्वा के सोमरस का पान किया।[ऋग्वेद 5.29.11]
प्रवर्द्धित :: amplify, prolong.
Hey Indr Dev! Let the Strotr-sacred hymns of Rishi Gouriviti amplify, prolong you. You killed the demon Pipu for the sake of Vidathi's son Rijishwa. Rijishwa cooked barley cakes for you and offered them to you. You drunk-enjoyed Somras offered by Rijishwa.
नवग्वासः सुतसोमास इन्द्रं दशग्वासो अभ्यर्चन्त्यकैः।
गव्यं चिदूर्वमपिधानवन्तं तं चिन्नरः शशमाना अप व्रन्॥
नौ महीनों में समाप्त होने वाले और दस महीनों में समाप्त होने वाले यज्ञ को करने वाले अङ्गिरा लोग सोमाभिषव करके अर्चनीय स्तोत्रों द्वारा इन्द्र देव की प्रार्थना करते हैं। प्रार्थना करने वाले अङ्गिरा लोगों ने असुरों द्वारा आच्छादित गौ-समूह को मुक्त कर दिया।[ऋग्वेद 5.29.12]
Angiras accomplish the Yagy in a span of 9-10 months, worshiped Indr Dev with sacred hymns and extracted Somras. Worshiping Angiras freed the cows abducted-captivated by the demons.
CAPTIVATED :: मोहित, बंदी बनाना, मोह लेना, आकर्षण करना; capture, glamor, ravish, glamour, spellbind, fascinate, cast a spell.
कथो नु ते परि चराणि विद्वान्वीर्या मघवन्या चकर्थ।
या चो नु नव्या कृणवः शविष्ठ प्रेदु ता ते विदथेषु ब्रवाम॥
हे धनवान् इन्द्र देव! आपने जिस पराक्रम को प्रकट किया, हम उसको जानते हुए भी किस प्रकार से आपके लिए प्रकट करें कैसे स्तवन करें? हे बलवान् इन्द्र देव! आप जिस नूतन पराक्रम को प्रकट करेंगे, हम अपने यज्ञ में आपके उस पराक्रम का वर्णन करेंगे।[ऋग्वेद 5.29.13]
Hey rich Indr Dev! We are aware of your valour-bravery. How can we express our gratitude and worship you? Hey mighty-powerful Indr Dev! We will describe your valour-bravery in our Yagy.
एता विश्वा चकृवाँ इन्द्र भूर्यपरीतो जनुषा वीर्येण।
या चिन्नु वज्रिन्कृणवो दधृष्वान्न ते वर्ता तविष्या अस्ति तस्याः॥
हे इन्द्र देव! आप शत्रुओं द्वारा दुर्द्धर्ष्य हैं। आपने अपने प्रकृत बल से प्रत्यक्ष दृश्यमान सम्पूर्ण भुवनों को निर्मित किया। हे वज्र धर! शत्रुओं को शीघ्र ही विनष्ट करते हुए जो कुछ भी करते हैं, आपके उस बल या कर्म का निवारण कोई भी नहीं कर सकता।[ऋग्वेद 5.29.14]
दुर्द्धर्ष :: जिसका दमन करना कठिन हो। जिसे जल्दी दबाया या वश में न किया जा सके, जिसे परास्त करना या हराना कठिन हो, प्रचंड। प्रबल, धृतराष्ट्र के एक पुत्र का नाम, रावण की सेना का एक राक्षस
Hey Indr Dev! You can not be over powered by the demons. You created the visible abodes by your power. Hey Vajr wielding Indr Dev! Your endeavour to destroy the enemy is unmatched beyond their limits.
इन्द्र ब्रह्म क्रियमाणा जुषस्व या ते शविष्ठ नव्या अकर्म।
वस्त्रेव भद्रा सुकृता वसूयू रथं न धीरः स्वपा अतक्षम्॥
हे अतिशय बलवान् इन्द्र देव! हम लोगों ने आज आपके लिए जिन नूतन स्तोत्रों की रचना की, हम लोगों द्वारा विहित उन सकल स्तोत्रों को आप ग्रहण करें। हम धीमान्, शोभन कर्म करने वाले और धनाभिलाषी हैं। इन भजनीय स्तोत्रों को हम वस्त्र और रथ तुल्य आपको अर्पण करते हैं।[ऋग्वेद 5.29.15]
धीमान् :: बुद्धिमान्, प्रज्ञावान्; slowly, steady.
Hey extremely powerful Indr Dev! Accept the new compositions-hymns, Strotr by us. We are intelligent, prudent devoted to virtuous-pious deeds, desire wealth. We offer-present these worship able Strotr to you like cloths & chariots.(15.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (30) :: ऋषि :- बभ्रु आत्रेय, देवता :- इन्द्र ऋर्णचयेन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
क स्य वीरः को अपश्यदिन्द्रं सुखरथमीयमानं हरिभ्याम्।
यो राया वज्री सुतसोममिच्छन्तदोको गन्ता पुरुहूत ऊती॥
हे वज्रधर! बहुतों द्वारा आहूत इन्द्र देव दान योग्य धन के साथ सोमाभिषव करने वाले याजक गण की इच्छा करते हुए रक्षा के लिए याजक गण के घर में जाते हैं। वे पराक्रमी इन्द्र देव कहाँ विद्यमान् हैं? अपने दोनों घोड़ों द्वारा आकृष्ट सुखकर रथ पर जाने वाले इन्द्र देव को किसने देखा है?[ऋग्वेद 5.30.1]
Hey the wielder of Vajr! Worshiped by many, visits the homes of those who extract Somras for their protection, with money for donation. Where is mighty Indr Dev!? Has any one seen Indr Dev riding his comfortable & attractive charoite deploying the two horses?
अवाचचक्षं पदमस्य सस्वरुग्रं निधातुरन्वायमिच्छन्।
अपृच्छमन्याँ उत ते म आहुरिन्द्रं नरो बुबुधाना अशेम॥
हमने इन्द्रदेव के गुह्य और उग्र स्थान को देखा। अन्वेषण करते हुए हम आधारभूत इन्द्र देव के स्थान में गये। हमने अन्य विद्वानों से भी इन्द्र देव के सम्बन्ध में पूछा। पूछे जाने पर यज्ञ के नेता और ज्ञानाभिलाषियों ने हमसे कहा कि हम लोगों ने इन्द्र देव को प्राप्त किया है।[ऋग्वेद 5.30.2]
We have seen the secret and furious-dangerous places of Indr Dev. We reached the base of Indr Dev while making discovery. We enquired other learned-scholars as well. On being enquired the head of the Yagy, the priest and inquisitives told us that we had had-invoked Indr Dev.
प्र नु वयं सुते या ते कृतानीन्द्र ब्रवाम यानि नो जुजोषः।
वेददविद्वाञ्छृणवच्च विद्वान्वहतेऽयं मघवा सर्वसेनः॥
हे इन्द्रदेव! आपने जिन कार्यों को किया है, सोमाभिषव करने पर हम स्तोता उनका वर्णन करते हैं। आपने भी हमारे लिए जिन कर्मों का सेवन किया है, उन कर्मों को इसके पहले नहीं जानने वाले लोग जानें। जो लोग जानते हैं, वे नहीं जानने वालों को श्रवण करावें। सब सेनाओं से युक्त होकर धनवान् इन्द्र देव अश्व पर आरोहण कर उन जानने वाले और सुनने वालों की ओर गमन करें।[ऋग्वेद 5.30.3]
Hey Indr Dev! We the Stota, describe your great deeds after extracting Somras. Let those who are unaware of your endeavours made for us, should also know them. Those who are unaware of his deeds should also be told about these. Let rich-wealthy Indr Dev have all his armies; ride the horse & move to those listening & describing his glory.
स्थिरं मनश्चकृषे जात इन्द्र वेषीदेको युधये भूयसश्चित्।
अश्मानं चिच्छवसा दिद्युतो वि विदो गवामूर्वमुस्त्रियाणाम्॥
हे इन्द्र देव! उत्पन्न होते ही आपने सब शत्रुओं को जीतने के लिए चित्त को स्थिर किया। अकेले ही आपने अनेक राक्षसों से युद्ध करने के लिए प्रस्थान किया। गौओं के आवरक पर्वत को आपने बल द्वारा विदीर्ण किया। आपने दूध देने वाली गौवों के समूह को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 5.30.4]
Hey Indr Dev! You decided to win the enemies as soon as you were born. You alone moved to fight many demons. You destroyed the mountain blocking the cows with your might. You got the milk yielding cows.
परो यत्त्वं परम आजनिष्ठाः परावति श्रुत्यं नाम बिभ्रत्।
अतश्चिदिन्द्रादभयन्त देवा विश्वा अपो अजयद्दासपत्नीः॥
हे इन्द्र देव! आप सर्वप्रधान और उत्कृष्टतम हैं। दूर से ही श्रवणीय नाम को धारित करके जब आप उत्पन्न हुए थे, तब अग्नि आदि देवता भयभीत हुए। वृत्रासुर द्वारा पालित सकल उदक को इन्द्र देव ने वशीभूत कर लिया।[ऋग्वेद 5.30.5]
Hey Indr Dev! You are supreme and best. When you acquired name listened from a distance, (bearing a name widely renowned), demigods-deities like Agni Dev got afraid. Indr Dev controlled the water reserved by Vrata Sur.
तुभ्येदेते मरुतः सुशेवा अर्चन्त्यर्कं सुन्वन्त्यन्धः।
अहिमोहानमप आशयानं प्र मायाभिर्मायिनं सक्षदिन्द्रः॥
हे इन्द्र देव! ये स्तुति पाठ करने वाले सुखी मरुद्गण स्तोत्र द्वारा सुख उत्पन्न करते हैं। ये आपका ही स्तवन करते हैं और सोम लक्षण अन्न प्रदान करते हैं। जो वृत्रासुर समस्त जलराशि का आच्छादन करके गर्वित हुआ, अपनी शक्ति द्वारा इन्द्र देव ने उस कपटी और देवों को बाधा पहुँचाने वाले वृत्रासुर को नष्ट कर दिया।[ऋग्वेद 5.30.6]
Hey Indr Dev! Marud Gan who recite this prayer get comforts with this Strotr. They worship you and provide the grains having the characterices of Som. Deceptor troubling demigods-deities Vrata Sur who was proud of controlling the entire water bodies was destroyed by Indr Dev through his might.
वि षू मृधो जनुषा दानमिन्वन्नहन्गवा मघवन्त्संचकानः।
अत्रा दासस्य नमुचेः शिरो यदवर्तयो मनवे गातुमिच्छन्॥
हे धनवान् इन्द्र देव! हम लोग आपकी प्रार्थना करते हैं। आप देव पीड़क वृत्र को वज्र द्वारा पीड़ित करें। आपने जन्म से ही शत्रुओं का संहार किया है। इस युद्ध में आप हमारे सुख के लिए दस्यु नमुचि के सिर को काट डालें।[ऋग्वेद 5.30.7]
Hey wealthy Indr Dev! We worship-pray you. Torture-punish Vrata Sur who teased the demigods-deities. You killed the dacoits-demons soon after your birth. Cut the head of the dacoit Namuchi for our sake-comfort in the war.
युजं हि मामकृथा आदिदिन्द्र शिरो दासस्य नमुचेर्मथायन्।
अश्मानं चित्स्वर्यं १ वर्तमानं प्र चक्रियेव रोदसी मरुद्भ्यः॥
हे इन्द्र देव! आपने शब्द करने वाले और भ्रमणशील मेघ के तुल्य, दस्यु नमुचि असुर के मस्तक को चूर्ण करके हमारे साथ मित्रता की। उस समय मरुतों के प्रभाव से द्यावा-पृथ्वी के चक्र तुल्य घूमने लगीं।[ऋग्वेद 5.30.8]
Hey Indr Dev! You entered friendship with us after powdering the head of dacoit Namuchi who roared & was dynamic-movable like the clouds. At that moment the heaven & earth started moving-revolving like a wheel.
स्त्रियो हि दास आयुधानि चक्रे किं मा करन्नबला अस्य सेनाः।
अन्तर्ह्यख्यदुभे अस्य धेने अथोप प्रैद्युधये दस्युमिन्द्रः॥
दस्यु नमुचि ने स्त्रियों को युद्ध साधन बनाया। उस असुर की वह स्त्री सेना मेरा क्या कर लेगी? इस तरह सोचकर इन्द्र देव ने उन सेनाओं के बीच से उस असुर की दो प्रेयसी स्त्रियों को अपने घर में रख लिया और नमुचि से युद्ध करने के लिए प्रस्थान किया।[ऋग्वेद 5.30.9]
Dacoit Namuchi made the women a tool of war. Indr Dev thought that the women army could not harm him, kept two of Namuchi's lovers in his house and departed to fight demon Namuchi.
समत्र गावोऽभितोऽनवन्तेहेह वत्सैर्वियुता यदासन्।
सं ता इन्द्रो असृजदस्य शाकैर्यदीं सोमासः सुषुता अमन्दन्॥
जब गौएँ बछड़ों से विमुख हुई, तब उस समय वे नमुचि द्वारा अपहृत गौएँ इधर-उधर सभी जगह भटक रही थी। बभ्रु ऋषि द्वारा अभिषुत सोमरस से जब इन्द्र देव हर्षित हुए, तब समर्थवान् मरुतों के साथ इन्द्र देव ने बभ्रु की गौओं को बछड़ों के साथ मिला दिया।[ऋग्वेद 5.30.10]
When the cows were separated from their calf abducted by Namuchi, they started roaming hither & thither. When Indr Dev became happy-amused by drinking Somras offered by Babhru, he brought-joined the cows to the calf.
यदीं सोमा बभ्रुधूता अमन्दन्नरोरवृद्वृषभः सादनेषु।
पुरंदरः पपिवाँ इन्द्रो अस्य पुनर्गवामददादुत्रियाणाम्॥
जब बभ्रु के अभिषुत सोमरस ने इन्द्र देव को हर्षित किया, तब कामनाओं के पूरक इन्द्र देव ने युद्ध में महान् शब्द किया। पुरन्दर (नगर विनाशक) इन्द्र देव ने सोमरस का पान किया और बभ्रु को फिर से दुग्ध देने वाली गौएँ प्रदान की।[ऋग्वेद 5.30.11]
When Indr Dev was pleased with the Somras extracted-offered by Babhru Indr Dev made a loud sound, accomplishing desires. Purandar-destroyer of forts Indr Dev drunk Somras and granted milch cows to Babhru.
भद्रमिदं रुशमा अग्ने अक्रन्गवां चत्वारि ददतः सहस्रा।
ॠणंचयस्य प्रयता मघानि प्रत्यग्रभीष्म नृतमस्य नृणाम्॥
हे अग्नि देव! ऋणञ्चय राजा के किंकर रुशम देश वासियों ने मुझे चार हजार गौएँ देकर कल्याण कारक कर्म किया। नेताओं के बीच श्रेष्ठ नेता ऋणञ्चय राजा द्वारा प्रदत्त गौरूप रत्नों को मैंने ग्रहण किया।[ऋग्वेद 5.30.12]
Hey Agni Dev! King Rinachy's citizens of Kinkar country gave me four thousand cows as a welfare measure. I accepted cows amongest the best leaders like jewels.
सुपेशसं माव सृजन्त्यस्तं गवां सहस्त्रै रुशमासो अग्ने।
तीव्रा इन्द्रमममन्दुः सुतासोऽक्तोर्व्युष्टौ परितक्म्यायाः॥
हे अग्नि देव! ऋणञ्चय राजा के किंकर रुशम देश वासियों ने मुझे अलंकार और आच्छादन आदि से सुसज्जित घर तथा हजारों गौएँ दी। रात्रि के बीतने पर अर्थात् उषाकाल में सरस सोम ने इन्द्र देव को प्रसन्न किया। (गौओं को पाकर बभ्रु ने तुरन्त ही इन्द्र देव को सोमरस पिलाया)।[ऋग्वेद 5.30.13]
Hey Agni Dev! The residents-citizens of country Rusham King Rinachay decorated me, gave a house and thousands of cows. In the morning Indr Dev drunk Somras and became amused-happy.
औच्छत्सा रात्री परितक्म्या याँ ऋणञ्चये राजनि रुशमानाम्।
अत्यो न वाजी रघुरज्यमानो बभ्रुश्चत्वार्यसनत्सहस्रा॥
रुशम देश के राजा ऋणञ्चय के समीप में ही सभी जगह गमन करने वाली रात्रि बीत गई। बुलाये जाने पर बभ्रु ऋषि ने वेगवान् घोड़े के तुल्य चार हजार शीघ्रगामिनी गौओं को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 5.30.14]
The night passed in proximity of king Rinachay of the country Rusham. On being invited Babhru Rishi got four thousand cows comparable to fast moving horses.
चतुः सहस्रं गव्यस्य पश्वः प्रत्यग्रभीष्म रुशमेष्वग्ने।
घर्मश्चित्तप्तः प्रवृजे य आसीदयस्मयस्तम्वादाम विप्राः॥
हे अग्नि देव! हमने रुशम देशवासियों से चार हजार गौएँ प्राप्त की। हम मेधावी हैं। यज्ञ के लिए महावीर के तुल्य सन्तप्त सुवर्ण कलश को हमने रुशम देश वासियों से दूध दूहने के लिए प्राप्त किया।[ऋग्वेद 5.30.15]
Hey Agni Dev! We the inhabitants of the country Rusham got four thousand cows. We obtained a golden pot comparable to Mahavir, for milking cows for the Yagy.(18.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (31) :: ऋषि :- अवस्यु आत्रेय, देवता :- इन्द्र या कुत्स, छन्द :- त्रिष्टुप्।
इन्द्रो रथाय प्रवतं कृणोति यमध्यस्थान्मघवा वाजयन्तम्।
यूथेव पश्वो व्युनोति गोपा अरिष्टो याति प्रथमः सिषासन्॥
धनवान् इन्द्र देव जिस रथ पर अधिष्ठान करते हैं, उस रथ का संचालन भी करते हैं। गोपालक जिस प्रकार से पशुओं के समूह को प्रेरित करते हैं, उसी प्रकार से इन्द्र देव शत्रुसेना को प्रेरित करते हैं। शत्रुओं द्वारा अहिंसित और देवश्रेष्ठ इन्द्र देव शत्रुओं के धन की कामना करते हुए गमन करते हैं।[ऋग्वेद 5.31.1]
Wealthy Indr Dev operate the charoite, he rides. The manner the cow herd growers move-drive the cattle, Indr Dev too drive the enemies. Unharmed by the enemy Indr Dev move-drive to capture-possess their opulence.
आ प्र द्रव हरिवो मा वि वेनः पिशङ्गराते अभि नः सचस्व।
नहि त्वदिन्द्र वस्यो अन्यदस्त्यमेनांश्चिज्जनिवतश्चकर्थ॥
हे हरि नामक अश्व वाले इन्द्र देव! आप हम लोगों के अभिमुख भली-भाँति से आवें; किन्तु हम लोगों के प्रति हीन मनोरथ उदासीन होवें। हे बहुविध धन वाले इन्द्र देव! आप हम लोगों का सेवन करें। हे इन्द्र देव! दूसरी कोई भी वस्तु आपसे श्रेष्ठ नहीं है। जिनको पत्नी नहीं है, उनको आप स्त्री प्रदान करते है।[ऋग्वेद 5.31.2]
Hey Indr Dev master of horses named Hari! Invoke before us duly organised-neutral to the bad intensions-motives. Hey possessor of various opulence Indr Dev! Utilize our services. None is greater-better than you. You grant wife to the unmarried.
उद्यत्सहः सहस आजनिष्ट देदिष्ट इन्द्र इन्द्रियाणि विश्वा।
प्राचोदयत्सुदुघा वव्रे अन्तर्वि ज्योतिषा संववृत्वत्तमोऽवः॥
जब सूर्य का तेज उषा के तेज से बढ़ जाता है, तब इन्द्र देव याजकगणों को निखिल धन प्रदान करते हैं। वे निवारक पर्वत के बीच से दुग्ध दायिनी निरुद्ध गौओं को मुक्त करते हैं और अपने तेज द्वारा सर्वत्र व्याप्त अन्धकार को दूर करते हैं।[ऋग्वेद 5.31.3]
When the intensity of Sun rays increase with dawn-day break i.e., Usha Indr Dev grant opulence to his worshipers. He liberate the milch cows held between the mountains and remove darkness with his aura all around.
अनवस्ते रथमश्वाय तक्षन्त्वष्टा वज्रं पुरुहूत द्युमन्तम्।
ब्रह्माण इन्द्रं महयन्तो अर्कैरवर्धयन्नहये हन्तवा उ॥
हे बहुजनाहूत इन्द्र देव! ऋभुओं ने आपके रथ को घोड़ों से संयुक्त होने के योग्य बनाया, त्वष्टा ने आपके वज्र को द्युतिमान् किया। इन्द्र देव की पूजा करने वाले अङ्गिरा लोगों ने अथवा मरुतों ने वृत्रासुर वध के लिए स्तुतियों द्वारा इन्द्र देव को संवर्द्धित किया।[ऋग्वेद 5.31.4]
Hey Indr Dev worshiped-prayed by many! Ribhus made your horses capable to be deployed, Twasta made your charoite movable. Worshipers of Indr Dev Angiras & Marud Gan promoted-boosted him with the prayers-sacred hymns.
BOOST :: बढ़ाना, बढ़ावा देना, प्रोत्साहन, सहारा, संवर्द्धित करना; promotion, encouragement, prompting, solicitation, jog, incentive, encouragement, stimulus, stimulation, boost, fillip, support, recourse, sustenance, anchor, mainstay.
वृष्णे यत्ते वृषणो अर्कमर्चानिन्द्र ग्रावाणो अदितिः सजोषाः।
अनश्वासो ये पवयोऽरथा इन्द्रेषिता अभ्यवर्तन्त दस्यून्॥
हे इन्द्र देव! आप अभिलाषाओं के पूरक है। सेचन समर्थ मरुतों ने जब आपकी प्रार्थना की, तब सोमाभिषव करने वाले पत्थर भी प्रसन्न होकर संगत हुए। इन्द्र देव द्वारा प्रेषित होने पर अश्व हीन और रथ हीन मरुतों ने अभिगमन करके शत्रुओं को पराजित किया।[ऋग्वेद 5.31.5]
Hey Indr Dev! You accomplish the desires. When Marud Gan capable of watering-irrigation requested you, then the stones used for crushing-extracting Somras became happy-amused. Inspired by Indr Dev, though without horses & charoite, yet the Marud Gan attacked & defeated the enemies.
प्र ते पूर्वाणि करणानि वोचं प्र नूतना मघवन्या चकर्थ।
शक्तीवो यद्विभरा रोदसी उभे जयन्नपो मनवे दानुचित्राः॥
हे धनवान् इन्द्र देव! हम आपके पुरातन तथा नूतन कर्मों का स्तवन करते हैं। आपने जिन कार्यों को किया, हम उसे कहते हैं। हे वज्रधर इन्द्र देव! आप द्यावा-पृथ्वी को वशीभूत करके मनुष्यों के लिए विचित्र जल धारित करते है।[ऋग्वेद 5.31.6]
Hey wealthy Indr Dev! We narrate-describe your present & previous endeavours. Hey Vajr wielding Indr Dev! You mesmerize the heavens & earth and hold amazing water for the humans.
तदिन्नु ते करणं दस्म विप्राहिं यघ्नन्नोजो अत्रामिमीथाः।
शुष्णस्य चित्परि माया अगृभ्णाः प्रपित्वं यन्नप दस्यूँरसेधः॥
हे दर्शनीय तथा बुद्धिमान् इन्द्र देव! वृत्रासुर को मार करके आपने जो अपने बल को इस लोक में प्रकट किया, वह आपका ही कर्म है। आपने शुष्ण असुर की माया को जानकर उसे पकड़ा और युद्धस्थल में जाकर आपने असुरों को विनष्ट किया।[ऋग्वेद 5.31.7]
Hey beautiful-handsome Indr Dev! The might & valour which you demonstrated in this abode-world is your deed. You removes the cast of Shushn the demon, captured him and destroyed-vanished the demons in the war.
त्वमपो यदवे तुर्वशायारमयः सुदुघाः पार इन्द्र।
उग्रमयातमवहो ह कुत्सं सं ह यद्वामुशनारन्त देवाः॥
हे इन्द्र देव! नदी तट में प्रवृद्ध होकर अर्थात् अवस्था न करके यदु और तुर्वश राजाओं को आपने वनस्पतियों को बढ़ाने वाला जल प्रदान किया। हे इन्द्र देव! कुत्स के प्रति आक्रमण करने वाले भयानक शुष्ण को मारकर आपने कुंत्स को अपने घर में पहुँचा दिया। तब उशना और देवताओं ने आप दोनों की स्तुति की।[ऋग्वेद 5.31.8]
Hey Indr Dev! You granted water for irrigation to the kings Yadu & Turvash. Hey Indr Dev! You released Kuts from captivity, killed furious-dangerous Shushn and took him to his home. Then Ushna & demigods-deities prayed you.
इन्द्राकुत्सा वहमाना रथेना वामत्या अपि कर्णे वहन्तु।
निः षीमद्भ्यो धमथो निः षधस्थान्मघोनो हृदो वरथस्तमांसि॥
हे इन्द्र देव और कुत्स ! एक ही रथ पर आरूढ़ होकर आप दोनों को अश्व गण याजक गणों के निकट ले आयें। आप दोनों ने शुष्ण को उसके आवासभूत जल से दूर कर दिया। आप दोनों ने धनवान् याजक गणों के हृदय से अज्ञान रूपी अन्धकार को भी दूर कर दिया।[ऋग्वेद 5.31.9]
Hey Indr Dev & Kuts! Both of you rode the charoite together and the horses derived you to the Ritviz-worshipers. You removed-separated Sushn from his base, water. You removed the ignorance from the hearts-innerself of the worshipers-Ritviz.
वातस्य युक्तान्त्सुयुजश्चिदश्वान्कविश्चिदेषो अजगन्नवस्युः।
विश्वे ते अत्र मरुतः सखाय इन्द्र ब्रह्माणि तविषीमवर्धन्॥
हे इन्द्र देव! विद्वान् अवस्यु नामक ऋषि ने वायु तुल्य वेगवान् और रथ में भली भाँति से युक्त करने के योग्य अश्वों को प्राप्त किया। अवस्यु के मित्रभूत सकल स्तोताओं ने, स्तोत्रों द्वारा आपके बल को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 5.31.10]
Hey Indr Dev! Rishi Avasyu got the horses, fast moving like the air & deployed them in the charoite. All Stota, friendly with Avasyu, attained your strength-power by virtue of Strotr.
सूरश्चिद्रथं परितक्म्यायां पूर्वकरदुपरं जूजुवांसम्।
भरच्चक्रमेतशः सं रिणाति पुरो दधत्सनिष्यति क्रतुं नः॥
पूर्व में जब एतश ऋषि के साथ सूर्य देव का युद्ध हुआ, तब इन्द्र देव ने सूर्य देव के वेगवान् रथ की गति को अवरुद्ध कर दिया। इन्द्र देव ने पूर्व में द्विचक्र रथ के एक चक्र का हरण कर उसी चक्र द्वारा वे शत्रुओं को विनष्ट करते हैं। हम लोगों को पुरस्कृत करके इन्द्र देव हम लोगों के यज्ञ का सेवन करें।[ऋग्वेद 5.31.11]
In past, when Atash Rishi fought with Sury Dev, Indr Dev blocked his fast moving charoite. He took off one wheel of his charoite out of the two and destroy the enemy with that wheel. Let Indr Dev reward us and join our Yagy.
आयं जना अभिचक्षे जगामेन्द्रः सखायं सुतसोममिच्छन्।
वदन्ग्रावाव वेदिं भ्रियाते यस्य जीरमध्वर्यवश्चरन्ति॥
हे मनुष्यों! आप लोगों को देखने के लिए इन्द्र देव सोमाभिषव करने वाले मित्र स्वरूप याजक गणों की इच्छा करते हुए आये। अध्वर्युगण जिस पत्थर का प्रेरण करते हैं, वह सोमाभिषव करने वाला पत्थर शब्द करता हुआ वेदी के ऊपर आरोहण करता है।[ऋग्वेद 5.31.12]
Hey humans! Indr Dev visited the friends desirous of Somras to see them. The stone used by the priests for extracting Somras ride-stay over the Yagy Vedi making sound.
ये चाकनन्त चाकनन्त नू ते मर्ता अमृत मो ते अंह आरन्।
वावन्धि यज्यूँरुत तेषु धेह्योजो जनेषु येषु ते स्याम॥
हे अमरमण शील इन्द्र देव! जो मनुष्य आपकी कामना करता है और शीघ्रता पूर्वक आपकी अभिलाषा करता है, उस मरण शील मनुष्य का कोई अनर्थ नहीं होता। आप याजक गणों का सेवन करें, उनके प्रति प्रसन्न होवें। जिन मनुष्यों के बीच में हम लोग स्तोता हैं, वे सब आपके हों। हे इन्द्र देव! आप उन मनुष्यों को बल प्रदान करें।[ऋग्वेद 5.31.13]
अनर्थ :: दुर्घटना, महाविपदा, भयंकर घटना, अनर्थ, सर्वनाश; disaster, perversion.
Hey immortal Indr Dev! You accomplish the desires of one who wish to invoke you. He is protected from disasters. Be happy with the worshipers. Those who appoint us as Stota should belong to you. Hey Indr Dev! Grant them might-power.(18.06.2023)ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (32) :: ऋषि :- गातु आत्रेय, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
अदर्दरुत्समसृजो वि खानि त्वमर्णवान्बद्बधानाँ अरम्णाः।
महान्तमिन्द्र पर्वतं वि यद्वः सृजो वि धारा अव दानवं हन्॥
हे इन्द्र देव! आपने वर्षा करने वाले बादलों को विदीर्ण किया और मेघस्थ जल के निर्गमन द्वार को बनाया। हे इन्द्र देव! आपने प्रभूत मेघ को उद्घाटित करके जल बरसाया एवं दनु पुत्र वृत्रासुर का वध किया।[ऋग्वेद 5.32.1]
विदीर्ण :: चीर-फाड़ करना, तोड़ देना, टूटा हुआ, निहत; laciniate, fissured, teared-torn, cloven, cleft, rimose.
Hey Indr Dev! You teared the rain clouds, allowed to water stored in them to flow and killed Vrata Sur-son of Danu.
त्वमुत्साँ ऋतुभिर्बद्बधानाँ अरंह ऊधः पर्वतस्य वज्रिन्।
अहिं चिदुग्र प्रयुतं शयानं जघन्वाँ इन्द्र तविषीमधत्थाः॥
हे वज्रवान् इन्द्र देव! आप वर्षाकाल में निरुद्ध मेघों को बन्धन मुक्त करें। आप मेघ को बल सम्पन्न करें। हे उग्र इन्द्र देव! जल में शयन करने वाले वृत्रासुर को आपने मारा और अपने बल को प्रख्यात किया।[ऋग्वेद 5.32.2]
Hey Vajr wielding Indr Dev! Let the clouds rain during rainy season. Granted-invigorated the strength of the cloud. Hey furious Indr Dev! You killed Vrata Sur sleeping in the water and enhanced-boosted your reputation, fame & name.
त्यस्य चिन्महतो निर्मृगस्य वधर्जघान तविषीभिरिन्द्रः।
य एक इदप्रतिर्मन्यमान आदस्मादन्यो अजनिष्ट तव्यान्॥
अप्रतिद्वन्द्वी एक मात्र इन्द्र देव ने हवि प्रभूत हिरण के तुल्य शीघ्रगामी उस वृत्रासुर के आयुधों को अपने बल द्वारा विनष्ट कर दिया। उस समय वृत्रासुर के शरीर से दूसरा अतिशय बलवान असुर प्रसन्न हुआ।[ऋग्वेद 5.32.3]
Indr Dev without a rival, destroyed-annihilated the weapons of Vrata Sur who was quick like a deer, leading to added strength in the body of another demon.
त्यं चिदेषां स्वधया मदन्तं मिहो नपातं सुवृधं तमोगाम्।
वृषप्रभर्मा दानवस्य भामं वज्रेण वज्री नि जघान शुष्णम्॥
वर्षणशील बादलों के ऊपर प्रहार करने वाले वज्रधर इन्द्रदेव ने वज्र द्वारा बलवान् शुष्ण का वध किया। शुष्ण वृत्रासुर के क्रोध से उत्पन्न होकर अन्धकार में भ्रमण कर रहा था और सेचन समर्थ बादलों की रक्षा करते हुए वह समस्त प्राणियों के अन्न को स्वयं खाकर प्रसन्न होता था।
[ऋग्वेद 5.32.4]Vajr wielding Indr Dev, who strike the rain clouds, struck mighty Shushn who was roaming full of anger protecting the rain clouds and eating happily, the food grains of all living beings.
त्यं चिदस्य क्रतुभिर्निषत्तममर्मणो विददिदस्य मर्म।
यदीं सुक्षत्र प्रभृता मदस्य युयुत्सन्तं तमसि हर्म्ये धाः॥
हे बलवान इन्द्र देव! मादक सोमरस के पान से हर्षित होकर आपने अन्धकार में निमग्न युद्धाभिलाषी वृत्रासुर को जाना। अपने को अवध्य समझने वाले वृत्रासुर के प्राण स्थान को आपने उसके कार्यों द्वारा जाना।[ऋग्वेद 5.32.5]
Hey mighty Indr Dev! You identified Vrata Sur desirous of war-fight, hiding under darkness. You identified-sensed the location of Vrata Sur's source of his energy (Pran Vayu); who considered himself immortal.
त्यं चिदित्था कत्पयं शयानमसूर्ये तमसि वावृधानम्।
तं चिन्मन्दानो वृषभः सुतस्योचैरिन्द्रो अपगूर्या जघान॥
वृत्रासुर सुखकर उदक के साथ जल में शयन करता हुआ अन्धकार में वर्द्धमान हो रहा था। अभिषुत सोमरस पान से हर्षित होकर अभिलाषाओं के पूरक इन्द्र देव ने वज्र को ऊपर उठाकर उसका वध किया।[ऋग्वेद 5.32.6]
Vrata Sur was sleeping-resting comfortably under water, growing under the shroud of darkness. Amused by drinking Somras, Indr Dev, who accomplish desires, killed him with Vajr.
Vrata Sur himself wanted to be killed-released from the incarnation as a demon.
उद्यदिन्द्रो महते दानवाय वधर्यमिष्ट सहो अप्रतीतम्।
यदीं वज्रस्य प्रभृतौ ददाभ विश्वस्य जन्तोरधमं चकार॥
जब इन्द्र देव ने उस प्रभूत दानव वृत्रासुर के प्रति विजयी वज्र को उठाया और जब वृत्रासुर पर उसके द्वारा भीषण प्रहार किया, तब उसे समस्त प्राणियों की अपेक्षा निम्नतम स्थिति में पहुँचा दिया।[ऋग्वेद 5.32.7]
Indr Dev raised Vajr-thunder Volt and struck furiously over Vrata Sur, leading him to lowest level of all species-living beings.
त्यं चिदर्णमधुपं शयानमसिन्वं वव्रं मह्याददुग्रः।
अपादमत्रं महता वधेन नि दुर्योण आवृणङ्मृध्रवाचम्॥
उग्र इन्द्र देव ने महान्, गमनशील बादलों को घेरकर शयन करने वाले, जल-रक्षक, शत्रुओं के संहारक और सभी को आच्छादित करने वाले वृत्रासुर को पकड़ लिया और उसके अनन्तर संग्राम में पाद रहित परिमाण रहित और जुम्भाभिभूत वृत्रासुर को अपने प्रभूत वज्र द्वारा क्षत-विक्षत कर दिया।[ऋग्वेद 5.32.8]
Furious Indr Dev, protector of water-clouds, destroyer of the enemies caught Vrata Sur who tortured all living beings, slept by controlling the movable clouds, in them. Dev Raj cut-slew Vrata Sur was dimensionless, into pieces in the war, loosing his limbs.
को अस्य शुष्मं तविषीं वरात एको धना भरते अप्रतीतः।
इमे चिदस्य ज्रयसो नु देवी इन्द्रस्यौजसो भियसा जिहाते॥
इन्द्र देव के शोषक बल का निवारण कौन कर सकता है? किसी के द्वारा भी अप्रतीयमान इन्द्र देव अकेले ही शत्रुओं के धन का हरण करते हैं। द्युतिमान् द्यावा-पृथ्वी वेगवान इन्द्र देव के बल से भयभीत होकर शीघ्र ही चलायमान होती हैं।[ऋग्वेद 5.32.9]
Who can escape from the might of Indr Dev? He alone snatch the wealth of the enemies. Radiant heaven & earth move due to the fear of Indr Dev.
न्यस्मै देवी स्वधितिर्जिहीत इन्द्राय गातुरुशतीव येमे।
सं यदोजो युवते विश्वमाभिरनु स्वधाव्ने क्षितयो नमन्त॥
स्वयं धारणशील और द्युतिमान् द्युलोक इन्द्र देव के लिए नम्र होकर रहता है। भूमि अभिलाषिणी स्त्री के तरह वह इन्द्र देव के लिए आत्मसमर्पण करती है। जब इन्द्रदेव अपने समस्त बल को प्रजाओं के बीच में स्थापित करते हैं, तब मनुष्यगण अनुक्रम से बलवान् इन्द्रदेव के लिए नमस्कार करते हैं।[ऋग्वेद 5.32.10]नम्र :: विनीत, सविनय, निरहंकार, विनयपूर्ण, सरल, सादा, संकोच, शर्मीला, विनयशील; meek, humble, unassuming.
Self sustaining radiant heaven is meek-humble towards Indr Dev. It surrender itself to Indr Dev like a woman, desirous of land. Humans salute-prostrate in front of Indr Dev sequentially, when he demonstrate-illustrate his might before the populace.
एकं नु त्वा सत्पतिं पाञ्चजन्यं जातं शृणोमि यशसं जनेषु।
तं मे जगृभ्र आशसो नविष्ठं दोषा वस्तोर्हवमानास इन्द्रम्॥
हे इन्द्र देव! हमने ऋषियों से श्रवण किया है कि आप मनुष्यों के बीच में मुख्य हैं, सज्जनों के पालक हैं, पञ्चजन मनुष्यों के हित के लिए उत्पन्न हुए हैं और यशोयुक्त हैं। दिन-रात प्रार्थना करने वाली और अपनी अभिलाषाओं को कहने वाली हमारी सन्तान स्तुति योग्य इन्द्रदेव को प्राप्त करें।[ऋग्वेद 5.32.11]
Hey Indr Dev! We have heard from the Rishis-sages that you are the leader of humans and nurture-nourish the gentle, born for their welfare and is revered-respected. Let our progeny devoted to prayers during the day & night explaining their desires invoke Indr Dev.
एवा हि त्वामृतुथा यातयन्तं मघा विप्रेभ्यो ददतं शृणोमि।
किं ते ब्रह्माणो गृहते सखायो ये त्वाया निदधुः काममिन्द्र॥
हे इन्द्र देव! हमने सुना है कि आप समय-समय पर जन्तुओं को प्रेरित करते हैं और स्तोताओं को धन प्रदान करते हैं, यह मिथ्या ही मालूम पड़ता है। हे इन्द्र देव! जो स्तोता आपमें अपनी अभिलाषा स्थापित करते हैं, आपके वे महान् मित्र आपसे क्या प्राप्त करते हैं?[ऋग्वेद 5.32.12]
Hey Indr Dev! We have heard that you inspire living beings from time to time and grant wealth to the Stota, though it appears false-wrong. What can your great friends get, who put their desires forward-in front of you?(19.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (33) :: ऋषि :- प्राजापत्य संवरण, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
महि महे तवसे दीध्ये नॄनिन्द्रायेत्था तवसे अतव्यान्।
यो अस्मै सुमतिं वाजसातौ स्तुतो जने समर्यश्चिकेत॥
सम्बरण ऋषि अत्यन्त दुर्बल हैं। हम महाबलवान् इन्द्र देव के लिए प्रभूत स्तोत्र करते हैं, जिससे हमारे समान मनुष्य बलवान् हों। युद्ध में अन्न लाभ के लिए प्रार्थित होने पर इन्द्र देव स्तोताओं के साथ हमारे प्रति अनुग्रह प्रदर्शन करें।[ऋग्वेद 5.33.1]
Sambaran Rishi is too weak. We recite ample-abundant Strotr for the sake of highly powerful-mighty Indr Dev, so that the humans are mighty like us. On being requested for food grains during the war, let Indr Dev oblige us as well, along with demigods-deities.
स त्वं न इन्द्र धियसानो अर्कैर्हरीणां वृषन्योक्त्रमश्रेः।
या इत्था मघवन्ननु जोषं वक्षो अभि प्रार्यः सक्षि जनान्॥
हे अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाले इन्द्र देव! आप हम लोगों का ध्यान करते हुए एवं जो स्तोत्र आप में प्रेम उत्पन्न करें, उन स्तोत्रों द्वारा रथ में जुते हुए घोड़ों की लगाम को अपने हाथ में धारण करें। हे मघवन्! इस प्रकार से आप हमारे शत्रुओं को पराजित करें।[ऋग्वेद 5.33.2]
Hey desires accomplishing Indr Dev! Hold the reins of the horses deployed in the charoite, think of us and the Strotr which generate love for you in our hearts. Hey Maghvan-Indr Dev! In this manner we will be able to defeat the enemy.
न ते त इन्द्राभ्य १ स्मदृष्वायुक्तासो अब्रह्मता यदसन्।
तिष्ठा रथमधि तं वज्रहस्ता रश्मिं देव यमसे स्वश्वः॥
हे तेजोविशिष्ट इन्द्र देव! जो मनुष्य आपके भक्तों से भिन्न है और जो आपके साथ नहीं रहता, ब्रह्मकर्म से हीन होने के कारण वह मनुष्य आपका नहीं। हे वज्रधारी इन्द्र देव! इसलिए आप हमारे यज्ञ में आने के लिए उस रथ पर आरुण हों, जिस रथ का सञ्चालन आप स्वयं करते हैं।[ऋग्वेद 5.33.3]
Hey Indr Dev, possessor of special energy-power! The person who is different from your worshipers, is not associated with you, does not belong to you, being without the Brahm Karm-duties assigned by Brahma Ji. Hey Vajr wielding Indr Dev! Ride that charoite which is driven by you, while coming to join our Yagy.
पुरू यत्त इन्द्र सन्त्युक्था गवे चकर्थोर्वरासु युध्यन्।
ततक्षे सूर्याय चिदोकसि स्वे वृषा समत्सु दासस्य नाम चित्॥
हे इन्द्र देव! आपके अनेक वर्णनीय स्तोत्र हैं; इसीलिए आप उर्वरा भूमि के ऊपर जल वर्षण करने के लिए वृष्टि निरोध कारकों का संहार करते हैं। आप कामनाओं के पूरक हैं। आप सूर्य देव के अपने स्थान में वृष्टि प्रतिबन्ध कारक दासों के साथ युद्ध करके उनके नाम तक को नष्ट कर देते हैं।[ऋग्वेद 5.33.4]
Hey Indr Dev! There are several praise worthy-explanatory Strotr pertaining to you, hence you destroy the factors which block rains to fertile land. You accomplish desires. You destroy the slaves-factors in the abode of Sun, which obstruct rains.
वयं ते त इन्द्र ये च नरः शर्धो जज्ञाना याताश्च रथाः।
आस्माञ्जगम्यादहिशुष्म सत्वा भगो न हव्यः प्रभृथेषु चारुः॥
हे इन्द्र देव! हम लोग जो ऋत्विक याजकगण आदि हैं, वे सब आपके हैं। यज्ञ करके हम लोग आपके बल को बढ़ाते हैं और होम-हवन करने के लिये आपके निकट उपस्थित होते हैं। हे इन्द्र देव! आपका बल सर्वव्यापी है। आपके अनुग्रह से रणक्षेत्र में भग के तुल्य प्रशंसनीय (चारु) विश्वस्त सेवक आदि हमारे निकट आयें।[ऋग्वेद 5.33.5]
Hey Indr Dev! We all, the Ritviz, hosts etc. belong to you. We boost your power-might by performing Yagy. We come-approach you for conducting Hom-Hawan. Hey Indr Dev! Your power pervade all places. Let appreciable and reliable workers like Bhag come to us in the war.
पपृक्षेण्यमिन्द्र त्वे ह्योजो नृम्णानि च नृतमानो अमर्तः।
स न एनींवसवानो रयिं दाः प्रार्यः स्तुषे तुविमघस्य दानम्॥
हे इन्द्र देव!आपका बल पूजनीय है। आप सर्वव्यापी और अमरणशील हैं। अपने तेज से संसार को आच्छादित करके श्वेतवर्ण का प्रभूत धन हम लोगों को प्रदान करें। हम लोग प्रभूत धन देने वाले दाता से दान की प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 5.33.6]
Hey Indr Dev! You might deserve worship. You are immortal pervading every place. Illuminate the universe with your aura and grant us white coloured ample-abundant wealth. We request the donor who who donate ample wealth to us.
एवा न इन्द्रोतिभिरव पाहि गृणतः शूर कारून्।
उत त्वचं ददतो वाजसातौ पिप्रीहि मध्वः सुषुतस्य चारोः॥
हे शूर इन्द्र देव ! हम लोग आपकी प्रार्थना करते हैं और यजन करते हैं। आप रक्षा करके हम लोगों का पालन करें। युद्ध में आप अपने आच्छादक रूप को प्रदान करके हमारे अभिषुत सोमरस के द्वारा प्रसन्न होवें।[ऋग्वेद 5.33.7]
Hey brave Indr Dev! We worship-pray you and perform Yagy. Support, protect & nurture us. Be happy by drinking Somras extracted by us, granting us your protective form in the war.
उत त्ये मा पौरुकुत्स्यस्य सूरेस्त्रसदस्योर्हिरणिनो रराणाः।
वहन्तु मा दश श्येतासो अस्य गोरिक्षितस्य क्रतुभिर्नु सश्चे॥
गिरिक्षित गोत्रोत्पन्न पुरुकुत्स के पुत्र त्रसदस्यु हिरण्यवान् और प्रेरक हैं। उन्होंने हमें जो दस अश्व प्रदान किये, वे शुभ्रवर्ण वाले दसों अश्व हमें वहन करें। रथ नियोजनादि कार्यों द्वारा हम शीघ्र ही गमन करें।[ऋग्वेद 5.33.8]
Trasdasyu, son of Purukuts born in Girikshit dynasty is inspiring & possessor of gold. Let the ten white-fair coloured horses granted by him to us support-bear us. We should march quickly by managing the charoite.
उत त्ये मा मारुताश्वस्य शोणाः क्रत्वामघासो विदथस्य रातौ।
सहस्रा मे च्यवतानो ददान आनूकमर्यो वपुषे नार्चत्॥
मरुताश्व के पुत्र विदथ ने हमारे लिए जिन रक्त वर्ण और श्रेष्ठ (शीघ्र गामी) अश्वों को प्रदान किया, वे हमें वहन करें। उन्होंने हमको सहस्रों प्रकार के धन और अपने शरीर का अलंकार भी प्रदान किया।[ऋग्वेद 5.33.9]
Let the fast moving, red coloured horses granted to us Marutashrav's, son of Vidath bear-support us. They granted thousands of kinds wealth and jewels, ornaments for decorating our body.
उत त्ये मा ध्वन्यस्य जुष्टा लक्ष्मण्यस्य सुरुचो यतानाः।
मह्ना रायः संवरणस्य ऋषेर्व्रजं न गावः प्रयता अपि ग्मन्॥
पुत्र ध्वन्य ने हमें जो दीप्तिमान् और पराक्रमी अश्व प्रदान किया, वे हमें वहन करे। गौएँ जैसे वे गोचरण स्थान (गोष्ठ) को प्राप्त करती हैं, उसी प्रकार से उनके (ध्वन्य) द्वारा प्रदत्त महान् धन सम्बरण ऋषि के घर में उपस्थित हों।[ऋग्वेद 5.33.10]
Let the radiant & brave horses given to us by son Dhvany, bear-support us. Let the great wealth be present in the house-home of Sambaran Rishi granted by Dhvany, just like the cows occupy the cow shed.(20.06.2023)
ऋषि :-
जिनके शत्रु उत्पन्न नहीं हुए हैं और जो शत्रुओं का विनाश करते हैं, वे अक्षीण, स्वर्गप्रद और अपरिमित हव्य प्राप्त करते हैं। हे ऋत्विको! उन्हीं इन्द्र देव के लिए आप लोग पुरोडाश पकायें और अपने उचित कर्म को धारित करें। इन्द्र देव स्तोत्र वाहक और बहुस्तुत्य हैं।[ऋग्वेद 5.34.1]
अक्षीण :: जो क्षीण या दुबला-पतला) न हो, मोटा, हष्ट-पुष्ट, जो किसी तरह घटा न हो, अटूट, निरंतर, स्थायी, स्थिर, दृढ़, अक्षय, सदा भरपूर होनेवाला; unabated, unceasing.
His enemies are not born and he destroy the enemies, is unabated-unceasing, heavenly and get unlimited offerings. Hey Ritviz! Cook barley cakes for him and perform right-proper duties. Indr Dev is carrier of Strotr and worshiped by many people.
आ यः सोमेन जठरमपिप्रतामन्दत मघवा मध्वो अन्धसः।
यदींमृगाय हन्तवे महावधः सहस्रभृष्टिमुशना वधं यमत्॥
इन्द्र देव ने सोमरस द्वारा अपने उदर को परिपूर्ण किया और मधुर सोमरस के पान से प्रमुदित हुए, जबकि मृग नामक असुर को मारने की इच्छा करके उन्होंने अपरिमित तेज वाले महान वज्र को हाथ में उठाया।[ऋग्वेद 5.34.2]
Indr Dev filled his stomach with Somras and lifted great Vajr with infinite speed to kill the demons named Mrag.
यो अस्मै प्रंस उत वा य ऊधनि सोमं सुनोति भवति द्युमाँ अह।
अपाप शक्रस्ततनुष्टिमूहति तनूशुभ्रं मघवा यः कवासखः॥
जो याजक गण इन्द्र देव के लिए अहर्निश (दिन-रात) सोमाभिषव करते हैं, वे द्युतिमान् होते हैं। जो यजमान यज्ञ नहीं करते; लेकिन धर्म-सन्तति की कामना करते हैं और शोभनीय अलंकार आदि धारण करते हैं तथा धनवान होकर बुरे आचरण करने वालों पुरुषों से मित्रता करते हैं, ऐसे लोगों का इन्द्र देव परित्याग कर देते हैं।[ऋग्वेद 5.34.3]
The Ritviz-hosts who extract Somras day & night for Indr Dev become aurous-radiant. He rejects those who do not conduct Yagy, but are desirous of pious progeny, bear beautiful jams-jewels, ornaments and become friendly-intimate with the wicked on becoming rich.
यस्यावधीत्पितरं यस्य मातरं यस्य शक्रो भ्रातरं नात ईषते।
वेतीद्वस्य प्रयता यतंकरो न किल्बिषादीषते वस्व आकरः॥
जो मनुष्य यजमान के माता-पिता और भ्राता का वध करता है, उस यष्टा के पास इन्द्र देव नहीं जाते और उसके द्वारा प्रदत्त हव्य स्वीकार नहीं करते। वे धनाधिपति इन्द्र देव पाप से दूर रहते हैं।[ऋग्वेद 5.34.4]
Indr Dev neither visit the person-host, Ritviz who kills his parents & brothers nor accept his offerings. Wealthy Indr Dev keep-maintain distance from the sin-sinners.
न पञ्चभिदशभिर्वष्ट्यारभं नासुन्वता सचते पुष्यता चन।
जिनाति वेदमुया हन्ति वा धुनिरा देवयुं भजति गोमति व्रजे॥
शत्रुओं के वध के लिए इन्द्र देव पाँच या दस सहायकों की कामना नहीं करते। जो सोमाभिषव नहीं करता और बन्धुओं का पोषण नहीं करता, उसके साथ इन्द्र देव संगति नहीं करते हैं। शत्रुओं को कम्पायमान करने वाले इन्द्र देव उसे बाधा पहुँचाते हैं और उसका वध करते हैं। इन्द्र देव यज्ञ करने वाले याजकों को गौओं से युक्त गृह प्रदत्त करते हैं।[ऋग्वेद 5.34.5]
Indr Dev do not wish to have four or five companions-accomplices for killing the enemies. He do not keep-maintain company with one, who do not extract Somras and nourish-support his brothers. Indr Dev tremble-shake the enemies, obstruct them and kill them. He grant cows & houses to the people who conduct Yagy.
वित्वक्षणः समृतौ चक्रमासजोऽसुन्वतो विषुणः सुन्वतो वृधः।
इन्द्रो विश्वस्य दमिता विभीषणो यथावशं नयति दासमार्यः॥
संग्राम में शत्रुओं को क्षीण करने वाले इन्द्र देव रथ चक्र को वेगवान् करते हैं। सोमाभिषव नहीं करने वाले याजकगण से वे दूर रहते हैं और सोमाभिषण करने वाले यजमान को वर्द्धित करते हैं। विश्व शिक्षक और भय जनक स्वामी इन्द्र देव यथेच्छ कर्म सेवाकर्म करने वाले (मनुष्यों) को अपने वशीभूत कर लेते हैं।[ऋग्वेद 5.34.6]
Indr Dev, who weaken the enemy in the war increase the speed of the charoite wheels. He maintains distance from the Ritviz-people who do not extract Somras and boost the hosts, who do it. The Vishw Guru (teacher of the whole world), cause for fear, mesmerise-enchant the people who devote them selves to community welfare-service.
समींपणेरजति भोजनं मुषे वि दाशुषे भजति सूनरं वसु।
दुर्गे चन ध्रियते विश्व आ पुरु जनो यो अस्य तविषीमचुक्रुधत्॥
इन्द्र देव लोभियों के धन का हरण कर लते हैं और मनुष्यों की शोभा को बढ़ाने वाले उस धन को तथा बहुविध अन्य धन को लाकर यजन करने वाले याजक गणों को देते हैं अर्थात यज्ञ नहीं करने वालों का धन यज्ञ करने वालों को देते हैं। जो व्यक्ति इन्द्र देव को क्रोध युक्त करता है, वह व्यक्ति महान् कष्टों में घिर जाता है।[ऋग्वेद 5.34.7]
Indr Dev snatches the wealth of the greedy-avaricious and hand it over to the Ritviz. Any one who anger him is involved in various troubles, pains, tortures, difficulties.
सं यज्जनौ सुधनौ विश्वशर्धसाववेदिन्द्रो मघवा गोषु शुभ्रिषु।
युजं ह्य १ न्यमकृत प्रवेपन्युदीं गव्यं सृजते सत्वभिर्धुनिः॥
शोभन धन वाले और बृहत् साहाय्य वाले दो व्यक्ति जब शोभन गौओं के लिए परस्पर प्रतिद्वन्द्वी होते हैं, तब ऐसा जानकर इन्द्र देव यज्ञ करने वाले याजक गण की सहायता करते हैं। मेघों को कँपाने वाले इन्द्र देव उस यज्ञकारी याजक गण को गौ समूह प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 5.34.8]
When there are two rivals for acquiring cows, Indr Dev helps the Ritviz. Indr Dev, who shake-trembles the clouds, help the Ritviz involved in Yagy and grant-give him cows.
सहस्रसामाग्निवेशिं गृणीषे शत्रिमग्न उपमां केतुमर्यः।
तस्मा आपः संयतः पीपयन्त तस्मिन्क्षत्रममवत्त्वेषमस्तु॥
हे अङ्गनादि गुण विशिष्ट इन्द्र देव! हम अपरिमित धन के दाता, अग्नि वेश के शत्रि नामक राजर्षि की प्रार्थना करते हैं। वे उपमान भूत और प्रख्यात हैं। जलराशि उन्हें अच्छी तरह से सन्तुष्ट करें।[ऋग्वेद 5.34.9]
अँगना :: स्त्री, नारी, सुंदर अंगवाली स्त्री, कामिनी, सार्वभौम नामक उत्तर के दिग्गज की स्त्री, कन्या राशि, वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियाँ; woman, beautiful woman.
उपमान :: वह वस्तु या व्यक्ति जिससे उपमा दी जाए; समानता, समरूपता, अभेद, अनुरूपता; resemblance, similarity, analogy.
Hey Indr Dev with special features for the women! We worship-pray Shatri, a Raj Rishi, the son of Agni Vesh, the donor of unlimited wealth. He possess resemblance, similarity, analogy and is famous.(22.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (35) :: ऋषि :-प्रभूवसुरांगिरस , देवता :- इन्द्र, छन्द :- अनुष्टुप्, पंक्ति ।
यस्ते साधिष्ठोऽवस इन्द्र क्रतुष्टमा भर।
अस्मभ्यं चर्षणीसहं सस्निं वाजेषु दुष्टरम्॥
हे इन्द्र देव! आपका जो अतिशय साधक कर्म है, उसे हमारे संरक्षण के लिए प्रयुक्त करें। आपका कर्म शत्रुओं को पराजित करने वाला अति शुद्ध और युद्ध में कठिनता से पार पाये जाने वाला है।[ऋग्वेद 5.35.1]
Hey Indr Dev! Use your protective power-measures for us. Your endeavours are meant to defeat the enemy, highly pure-pious and very difficult to over power you in the war.
यदिन्द्र ते चतस्रो यच्छूर सन्ति तिस्रः।
यद्वा पञ्च क्षितीनामवस्तत्सु न आ भर॥
हे शूर इन्द्र देव! चार वर्णों में जो आपका रक्षा कार्य है, तीन लोकों में जो आपका रक्षा कार्य विद्यमान है और जो पञ्चजन सम्बन्धी आपका रक्षा कार्य है, उस समस्त रक्षा कार्य को आप हम लोगों के लिए भली-भाँति से अभिपूरित करें।[ऋग्वेद 5.35.2]
पंचजन :: पंचजन का अभिप्राय पाँच व्यक्तियों :- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद से है।
पाँच व्यक्ति :- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और निषाद जो यज्ञ के सहभागी हैं।[ऋग्वेद]
शूद्र और निषाद (धर्मसूत्र में जिन्हें ब्राह्मण और शूद्र स्त्री से उत्पन्न वर्ण संस्कार माना गया है) यज्ञभागी थे। समस्त शूद्र यज्ञ के पात्र थे।[यास्क]
पंचजन शब्द का अर्थ है, चार वर्ण :- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और पाँचवाँ निषाद।[निरुक्त]
ऋग्वेद में जातियों का वर्णन-विवरण नहीं है। सभी व्यक्ति समान थे और यज्ञ में निर्बाध हवि चढ़ाते थे। निषाद भी अप्रत्यक्ष रूप से यज्ञ याग के भाग थे।
याजक को तीन रात तक निषाद और वैश्य तथा राजन्य के साथ ठहरना होगा।[विश्वजित यज्ञ]
इस प्रकार आर्य समुदाय के निषाद आर्येत्तर थे।
गन्धर्व, पितर, देव, असुर-राक्षस, मनुष्य भी पंचजन कहे गए हैं।
Hey brave-mighty Indr Dev! Use your protective power-measures for the safety of the four Varn-castes & Panchjan 4 Varn :- Brahman, Kshatriy, Vaeshy, Shudr & Nishad as the fifth Varn, three abodes (earth, heavens, nether world), discharge your duty-liability for our sake.
आ तेऽवो वरेण्यं वृषन्तमस्य हूमहे।
वृषजूतिर्हि जज्ञिष आभूभिरिन्द्र तुर्वणिः॥
हे इन्द्र देव! आप इष्ट फलों को देने वाले, वृष्टि कर्ता और शीघ्र शत्रु संहारक हैं। आपका रक्षण कार्य वरणीय है। हम उसका आह्वान करते हैं। आप सर्वव्यापी मरुतों के साथ मिलकर हम सभी के लिए श्रेष्ठ दाता बनें।[ऋग्वेद 5.35.3]
Hey Indr Dev! You accomplish desires, cause rains and eliminate the enemy quickly. Your defence system is desirable. We invite you for our protection. Become the best donor joining the Marud Gan pervading all abodes.
वृषा ह्यसि राधसे जज्ञिषे वृष्णि ते शवः।
स्वक्षत्रं ते घृषन्मनः सत्राहमिन्द्र पौंस्यम्॥
हे इन्द्र देव! आप अभीष्ट फल वर्षक है। याजक गणों को धन देने के लिए आपने जन्म ग्रहण किया। आपका बल फल वर्षण करता है। आपका मन स्वभाव से ही बलवान् है और विरोधियों का दमनकारी है। हे इन्द्र देव! आपका पौरुष शत्रु संहारक है।[ऋग्वेद 5.35.4]
पौरुष :: पुरुषत्व, पुरुष की शक्ति, पुरुष होने का भाव; masculinity, manly strength, courage, vigour, virility.
Hey Indr Dev! You grant desires. You are born to grant wealth-riches to the Ritviz-hosts. Your might-power grant rewards. Your innerself is strong and repress-destroy the opponents. Your masculinity destroy the enemy.
त्वं तमिन्द्र मर्त्यममित्रयन्तमद्रिवः।
सर्वरथा शतक्रतो नि याहि शवसस्पते॥
हे इन्द्र देव! आप वज्रधारी हैं। आपका रथ सभी जगह अप्रतिहत गति से गमन करता है। आप सौ यज्ञों के अनुष्ठानकर्ता एवं बल के अधिपति हैं, जो मनुष्य आपके प्रति शत्रुता का आचरण करता है, आप उनके विरुद्ध चलते है।[ऋग्वेद 5.35.5]
अप्रतिहत :: जिसे कोई रोक न सके, निर्बाध, अप्रभावित, अंकुश; continuous.
अधिपति :: शासक, अधिपति, सर्वोच्च, अधिपति, श्रीमन्त, अधिपति, दूसरों पर अधिकार जमाना या बतलाना, अधिराज; overlord, lord, hegemonic.
Hey Indr Dev! You wield the Vajr. Your charoite moves-runs continuously. You are the performer of 100 Yagy and the lord of strength. Any one who opposes you, you act against him.
त्वामिवृत्रहन्तम जनासो वृक्तबर्हिषः।
उग्रं पूर्वीषु पूर्व्यं हवन्ते वाजसातये॥
हे शत्रुओं के हन्ता इन्द्र देव! यज्ञ करने वाले मनुष्य संग्राम में आपका ही आह्वान करते हैं, क्योंकि आप उग्र वीर और समस्त प्रजाओं के मध्य में पुरातन हैं।[ऋग्वेद 5.35.6]
Hey killer-slayer of the enemy Indr Dev! The fighter in the war invoke you since you are furious brave and eternal, amongest the populace.
अस्माकमिन्द्र दुष्टरं पुरोयावानमाजिषु।
सयावानं धनेधने वाजयन्तमवा रथम्॥
हे इन्द्र देव! आप हमारे रथ की रक्षा करें। यह रथ संग्राम में सब प्रकार के धन की इच्छा करता है, अनुचरों के साथ गमन करने वाला और दुस्तर है।[ऋग्वेद 5.35.7]
Hey Indr Dev! Protect our charoite. This charoite has the calibre, capacity to have all sorts of riches-wealth, moves along with the followers-servants and is intricate.
अस्माकमिन्द्रेहि नो रथमवा पुरन्ध्या।
वयं शविष्ठ वार्यंदिवि श्रवो दधीमहि दिवि स्तोमं मनामहे॥
हे इन्द्र देव! आप हमारे निकट आत्मीय होकर आवें। अपनी उत्कृष्ट बुद्धि द्वारा हमारे रथ की रक्षा करें। आप निरतिशय बलशाली और दीप्तिमान् हैं। आपके अनुग्रह से हम वरणीय धन या कीर्त्ति आप में स्थापित करते हैं। आप द्युतिमान् हैं इसलिए हम आपकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 5.35.8]
Hey Indr Dev! Join us as a friend & relative, well wisher. Protect our charoite with your prudence-brilliance. You are radiant and very powerful. By virtue of your obligation-kindness, we establish acceptable wealth & glory in you. You are aurous-radiant & hence we worship you.(24.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (36) :: ऋषि :-प्रभूवसुरांगिरस , देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्, जगती।
स आ गमदिन्द्रो यो वसूनां चिकेतद्दातुं दामनो रयीणाम्।
धन्वचरो न वंसगस्तृषाणश्चकमानः पिबतु दुग्धमंशुम्॥
इन्द्र देव हमारे यज्ञ में आगमन करें। जो देव धनों को देना जानते हैं, वे किस तरह के हैं? इन्द्र देव धन के दाता हैं अथवा स्वभाव से ही दानी हैं। धनुष के साथ गमन करने वाले धानुष्क के तुल्य साहस पूर्ण गमन करने वाले और अत्यन्त तृषित इन्द्र देव अभिषुत सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 5.36.1]
तृषित :: प्यासा, पिपासु, आकुल, विकल; घबराया हुआ, विशेष कामना रखने वाला; thirsty.
Let Indr Dev join our Yagy. What is the configuration of the demigods-deities, who just donate wealth? Indr Dev is a donor, who moves bravely with his bow & wish to drink extracted Somras.
आ ते हनू हरिवः शूर शिप्रे रुहत्सोमो न पर्वतस्य पृष्ठे।
अनु त्वा राजन्नर्वतो न हिन्वन् गीर्भिर्मदेम पुरुहूत विश्वे॥
हे अश्व द्वय सम्पन्न शूर इन्द्र देव! हम लोगों के द्वारा दिया गया सोमरस पर्वत शिखर के तुल्य आपकी संहारक हनु प्रदेश में आरोहण करे। हे राजमान इन्द्र देव! तृण द्वारा जिस प्रकार से घोड़े तृप्त होते हैं, उसी प्रकार से हम आपको स्तुतियों द्वारा प्रसन्न करते हैं। हे इन्द्र देव! आप बहु स्तुत हैं।[ऋग्वेद 5.36.2]
Hey brave Indr Dev, lord of the horses duo! Let the Somras offered by us, move to your destructive chin region, like conquering the mountain. Hey emperor Indr Dev, worshiped by several people! We make you happy by the recitation of scared hymns just as the horse is satisfied by the straw.
चक्रं न वृत्तं पुरुहूत वेपते मनो भिया मे अमतेरिदद्रिवः।
रथादधि त्वा जरिता सदावृध कुविन्नु स्तोषन्मघवन्पुरूवसुः॥
हे बहु स्तुत, वज्रवान् इन्द्र देव! भूमि में वर्तमान चक्र के समान हमारा हृदय दारिद्रता के भय से कम्पायमान् हो रहा है। हे सर्वदा वर्द्धमान इन्द्र देव! स्तोता पुरुवसु ऋषि शीघ्र ही बहुलता से आपकी प्रार्थना करते हैं। आप रथ पर आरूढ़ हैं।[ऋग्वेद 5.36.3]
Hey Indr Dev, worshipped by many, possessing Vajr! We are afraid of poverty during this cycle-era, Yug over the earth. Hey always growing-progressing Indr Dev! Stota-worshipper Puruvasu quickly recited sacred hymns to pray-worship you. You are riding the charoite.
एष ग्रावेव जरिता त इन्द्रेयर्ति वाचं बृहदाशुषाणः।
प्र सव्येन मघवन्यंसि रायः प्र दक्षिणिद्धरिवो मा वि वेनः॥
हे इन्द्र देव! प्रभूत फल को भोगने वाले स्तोता अभिषव करने वाले पाषाण के तुल्य आपकी प्रार्थना करते हैं। हे धनवान् और हरि नामक अश्व वाले इन्द्र देव! आप बाँयें हाथ से धन दान करते हैं और दाहिनें हाँथ से भी धन दान करते हैं। आप हमारी कामनाओं को विफल न करें।[ऋग्वेद 5.36.4]
Hey Indr Dev! The Stota rewarded by you, worship you like the stone, which is poured water over it. Hey rich and the lord of horses named Hari, Indr Dev! You donate with both of your hands. Kindly accomplish our desires-do not turn down our requests.
वृषा त्वा वृषणं वर्धतु द्यौर्वृषा वृषभ्यां वहसे हरिभ्याम्।
स नो वृषा वृषरथः सुशिप्र वृषक्रतो वृषा वज्रिन्भरे धाः॥
हे इन्द्र देव! आप अभिलाषाओं के पूरक है। अभीष्टवर्षी द्यावा-पृथ्वी आपको संवर्द्धित करें। आप वर्षणकारी हों। घोड़े आपको यज्ञस्थल में वहन करते हैं। हे शोभन हनु वाले, वज्रधर इन्द्र देव! आपका रथ कल्याणकारी है। संग्राम में आप हम लोगों की रक्षा करें।[ऋग्वेद 5.36.5]
Hey Indr Dev, accomplish our desires! Let the desires accomplishing heaven & earth grow-flourish you. Please manage rains. Your horses take you to the site of Yagy. Hey Vajr wielding Indr Dev, having beautiful chin! Your charoite leads to our welfare. Protect us in the war.
यो रोहितौ वाजिनौ वाजिनीवान्त्रिभिः शतैः सचमानावदिष्ट।
यूने समस्मै क्षितयो नमन्तां श्रुतरथाय मरुतो दुवोया॥
हे इन्द्र देव के सहायक मरुतों! अन्नवान् श्रुतरथ राजा ने हमें लोहित वर्ण वाले दो अश्व और तीन सौ गौएँ प्रदान की। नित्य तरुण उस श्रुतरथ राजा के लिए सकल प्रजा परिचर्या सम्पन्न होकर प्रणाम करती है।[ऋग्वेद 5.36.6]
परिचर्या :: उत्तर रक्षा, बाद की देखभाल, अनुरक्षण; nursing, after-care.
Hey Marud Gan, accomplice-companions of Indr Dev! King Shrutrath granted us two red coloured-skinned horses. and three hundred cows. Entire populace salute the always young king Shrutrath, after discharging their duties & nursing.
ACCOMPLICE :: सहयोगी, सह-अपराधी, सहकारी; cooperative, co-operative, accessary, associate.(27.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (37) :: ऋषि :- अत्रि भौमा, देवता :- इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
सं भानुना यतते सूर्यस्याजुह्वानो घृतपृष्ठः स्वञ्चाः।
तस्मा अमृध्रा उषसो व्युच्छान्य इन्द्राय सुनवामेत्याह॥
यथाविधि रूप से आवाहित अग्नि में हव्य प्रदान करने से अग्नि देव प्रदीप्त होकर सूर्य रश्मियों के साथ आहूयमान होते हैं। जो याजकगण "इन्द्रदेव के लिए होम करो" यह कहता है, उस यजमान के लिए उषा अहिंसित होती है।[ऋग्वेद 5.37.1]
Agni Dev glow like the Sun rays on being invoked for making offerings procedurally. The Ritviz who chant, "conduct Hawan for Indr Dev", Usha-dawn rise harmlessly-innoxiously for him.
समिद्धाग्निर्वनवत्स्तीर्णबर्हिर्युक्तग्रावा सुतसोमो जराते।
ग्रावाणो यस्येषिरं वदन्त्ययदध्वर्युर्हविषाव सिन्धुम्॥
अग्नि को प्रदीप्त करने वाले और कुश को विस्तृत करने वाले याजक गण सम्भजन करते हैं। पाषाणोत्तोलन पूर्वक जिन्होंने सोमरस निःसृत किया, वे प्रार्थना करते हैं। जिस अध्वर्यु के पाषाण से सुमधुर शब्द होता है, वह अध्वर्यु हव्य लेकर नदी के किनारे यजन कार्य करते हैं।[ऋग्वेद 5.37.2]
The Ritviz-hosts spread Kush grass and ignite fire for worship-prayers. One who extract Somras by crushing it with stones generating sweet-melodious sound, conduct Yagy over the river bed-bank.
वधूरियं पतिमिच्छन्त्येति य ईं वहाते महिषीमिषिराम्।
आस्य श्रवस्याद्रथ आ च घोषात्पुरु सहस्रा परि वर्तयाते॥
पत्नी-पति की इच्छा करती हुई, यज्ञ में उसी का अनुगमन करती है। इन्द्र देव इसी प्रकार से अनुगामिनी महिषी का आनयन करते हैं। इन्द्र देव का रथ हम लोगों के निकट प्रचुर धन वहन करे। वह अधिक शब्द करता है। वह चारों ओर से सहस्र धन निःक्षेप करे।[ऋग्वेद 5.37.3]
महिषी :: भैंस, महिष, सम्राट् की पत्नी; empress.
आनयन :: ले आना, लाना, उपनयन संस्कार; fetch.
अनुगामिनी :: अनुगमन करने वाली, पीछे चलने वाली, आज्ञाकारिणी; the woman who follows.
निक्षेप :: फेंकना, भेजना; deposit, deposition.
The wife follows her husband in the Yagy. Indr Dev similarly fetch the empress who follows. Let the charoite of Indr Dev bear-possess a lot of wealth, generating a lot of sound; deposit money from all sides.
न स राजा व्यथते यस्मिन्निन्द्रस्तीव्रं सोमं पिबति गोसखायम्।
आ सत्वनैरजति हन्ति वृत्रं क्षेति क्षितीः सुभगो नाम पुष्यन्॥
जिनके यज्ञ में इन्द्र देव दुग्ध मिश्रित मद जनक सोमरस का पान करते हैं, वे राजा कभी व्यथित नहीं होते। वे राजा अनुचरों के साथ सभी जगह गमन करते हैं, शत्रुओं का संहार करते हैं, प्रजाओं की रक्षा करते हैं और सुख-सम्भोग से युक्त होकर इन्द्र देव की प्रार्थना का पोषण करते हैं।[ऋग्वेद 5.37.4]
The kings in who's Yagy Indr Dev drink intoxicating Somras, never feel disturbed. They move all around with their soldiers and destroy-kill the enemy; protect the populace, have all sorts of comforts & worship-pray Indr Dev.
पुष्यात्क्षेमे अभियोगे भवात्युभे वृतौ संयती सं जयाति।
प्रियः सूर्ये प्रियो अग्ना भवाति य इन्द्राय सुतसोमो ददाशत्॥
जो इन्द्र देव को अभिषेत सोमरस प्रदान करता है, वह बन्धु-बान्धवों का पोषण करता है, वह प्राप्त धन की रक्षा करने और अप्राप्त धन की प्राप्ति में समर्थ होता है, वह वर्तमान तथा नियत अहोरात्र को जीतता है। वह सूर्य देव और अग्नि देव दोनों का ही प्रियपात्र होता है।[ऋग्वेद 5.37.5]
One who offers Somras to Indr Dev, nurse-support his friends & relatives, protect the money he has, win the present and the fixed day & night, is dear to both Sun-Sury Dev and Agni Dev.(28.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (38) :: ऋषि :- अत्रि भौमा, देवता :- इन्द्र, छन्द :- अनुष्टुप्।
उरोष्ट इन्द्र राधसो विभ्वी रातिः शतक्रतो।
अधा नो विश्वचर्षणे द्युम्ना सुक्षत्र मंहय॥
हे सर्वदर्शी, हे शोभन धन वाले इन्द्र देव! आपने बहुत से कर्म किये। आप प्रभूत धन का महान् दान करते हैं। आप हम लोगों को महान् धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 5.38.1]
Hey Indr Dev, looking all over-around and possessing beautiful wealth! You accomplished several endeavours-deeds. You donate ample wealth. Grant us a lot of wealth-riches.
यदीमिन्द्र श्रवाय्यमिषं शविष्ठ दधिषे।
पप्रथे दीर्घश्रुत्तमं हिरण्यवर्ण दुष्टरम्॥
हे महाबल शाली हिरण्य वर्ण इन्द्र देव! यद्यपि आप सुप्रसिद्ध प्रचुर अन्न के अधिपति हैं; तथापि यह अत्यन्त दुर्लभ रूप से सभी जगह कीर्तित होता है।[ऋग्वेद 5.38.2]
दुर्लभ :: कठिनता से प्राप्त होनेवाला, दुष्प्राप्य, अति प्रशस्त; rare, in short supply.
Hey highly powerful-mighty, golden skinned-coloured Indr Dev! You are the lord of rare food grains, famous all around.
शुष्मासो ये ते अद्रिवो मेहना केतसापः।
उभा देवावभिष्टये दिवश्च ग्मश्च राजथः॥
हे वज्रधर इन्द्र देव! पूजनीय एवं विख्यात कर्म करने वाले मरुद्गण आपके बल स्वरूप हैं। आप और वे दोनों ही पृथ्वी के ऊपर स्वेच्छा से भ्रमण करते हुए सब पर शासन करते हैं।[ऋग्वेद 5.38.3]
Hey Vajr wielding Indr Dev! Worship able-revered & famous Marud Gan are akin-like your might. Both of you roam over the earth freely as per your wish-will and govern everyone.
उतो नो अस्य कस्य चिद्दक्षस्य तव वृत्रहन्।
अस्मभ्यं नृम्णमा भरास्मभ्यं नृमणस्यसे॥
हे वृत्र हन्ता इन्द्र देव ! हम लोग आपकी उपासना करते हैं। आप हम लोगों को किसी क्षमताशाली शत्रु का धन लाकर प्रदान करें; क्योंकि आप हम लोगों को धनाढ्य करने के अभिलाषा करते हैं।[ऋग्वेद 5.38.4]
Hey slayer of Vratr Indr Dev! We worship you. Bring wealth of some capable-mighty enemy for us since we desire to be rich.
नू त आभिरभिष्टिभिस्तव शर्मञ्छतकता।
इन्द्र स्याम सुगोपाः शूर स्याम सगोपाः॥
हे सौ यज्ञ करने वाले इन्द्र देव! आपके अभिगमन से हम शीघ्र ही समृद्ध हों। हे इन्द्र देव! आपके सुख में हम अंशभागी हों। हे शूर! आपके द्वारा हम सुरक्षित हों।[ऋग्वेद 5.38.5]
Hey performer of hundred Yagy, Indr Dev! Your movement will make us rich. Let us become participant in your comforts-happiness. Hey brave! Let us be protected by you.(28.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (39) :: ऋषि :- अत्रि भौम, देवता :- इन्द्र, छन्द :- अनुष्टुप्, पंक्ति।
यदिन्द्र चित्र मेहनास्ति त्वादातमद्रिवः।
राधस्तन्नो विदद्वस उभयाहस्त्या भर॥
हे वज्र धर इन्द्र देव! आपका रूप अत्यन्त विचित्र है। देने के लिए आपके पास जो महामूल्य धन है, हे धनवान् इन्द्र देव! उसे आप हम लोगों को दोनों हाथों से प्रदत्त करें।[ऋग्वेद 5.39.1]
Hey Vajr wielding, wealthy Indr Dev! Your figure (shape & size) is amazing. Grant us the precious wealth possessed by you, with both of your hands.
यन्मन्यसे वरेण्यमिन्द्र द्युक्षं तदा भर।
विधाम तस्य ते वयमकूपारस्य दावने॥
हे इन्द्र देव! जिस अन्न को आप श्रेष्ठ समझते हैं, वह अन्न हम लोगों को प्रदान करें। हम आपके उस श्रेष्ठ अन्न के दान पात्र हों।[ऋग्वेद 5.39.2]
Hey Indr Dev! Grant us the food grains, which you consider excellent-best. We should be eligible for your excellent food grains.
यत्ते दित्सु प्रराध्यं मनो अस्ति श्रुतं बृहत्।
तेन द्दळ्हा चिदद्रिव आ वाजं दर्षि सातये॥
हे वज्र धर इन्द्र देव! आपका मन दान देने के लिए विश्रुत और महान् है। आप हम लोगों को सारवान् अन्न प्रदान करने के लिए आदर प्रदर्शित करते हैं।[ऋग्वेद 5.39.3]
विश्रुत :: famous.
Hey Vajr wielding Indr Dev! Your innerself-mind is famous & inclined to make great donations. We show our gratitude for respect-granting us food grains having extract.
मंहिष्ठ वो मघोनां राजानं चर्षणीनाम्।
इन्द्रमुप प्रशस्तये पूर्वीभिर्जुजुषे गिरः॥
इन्द्र देव हवि लक्षण धन से युक्त हैं। वे आप लोगों के अत्यन्त पूजनीय मनुष्यों के वे अधिपति हैं। स्तोता लोग प्राचीन स्तोत्रों द्वारा प्रशंसा करने के लिए उनकी सेवा करते हैं।[ऋग्वेद 5.39.4]
Indr Dev possess the wealth with the charctrices of offerings. He is the lord of revered-respected, honoured humans. The Stota appreciate him with the eternal-ancient Strotr and serve him.
अस्मा इत्काव्यं वच उक्थमिन्द्राय शंस्यम्।
तस्मा उ ब्रह्मवाहसे गिरो वर्धन्त्यत्रयो गिरः शुभ्भन्त्यत्रयः॥
इन्द्र देव के लिए ही यह काव्य, वाक्य और उक्थ उच्चरित हुआ है। वे स्तोत्र वाहक हैं। अत्रि ऋषि के पुत्र उनके निकट ही स्तोत्रों को उच्च स्वर से उच्चारित कर उद्दीपित करते हैं।[ऋग्वेद 5.39.5]
उक्थ :: कथन, सूक्ति; spelled, stated.
उद्दीपित :: जागरित किया हुआ; awakened.
This composition-poetry, sentences are spelled-stated for Indr Dev. He is the carrier of the Strotr. The sons of Atri Rishi recite-spell, awake the Strotr in his proximity with loud voice.(28.06.2023)
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (40) :: ऋषि :- अत्रि भौमा, देवता :- इन्द्र, सूर्य, छन्द :- उष्णिक्, त्रिष्टुप् अनुष्टुप्।
आ याह्यद्रिभिः सुतं सोमं सोमपते पिब। वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्रहन्तम॥
हे इन्द्र देव! हम लोगों के यज्ञ में आप उपस्थित हों। हे सोमरस के स्वामी इन्द्र देव! आकर पत्थरों-द्वारा अभिषुत सोमरस का पान करें। हे फल वर्षक, हे शत्रुओं के अतिशय हन्ता! फलवर्षी मरुतों के साथ आप सोमपान करें।[ऋग्वेद 5.40.1]
Hey Indr Dev! Join out Yagy. Hey the lord of Somras! Drink the Somras crushed & extracted with stones. Hey rewarding, slayer of the enemy! Drink Somras along with the Marud Gan, who accomplish desires.
वृषा ग्रावा वृषा मदो वृषा सोमो अयं सुतः। वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्रहन्तम॥
अभिषव साधन पाषाण वर्षणकारी है। सोमपान जनित हर्ष वर्षणकारी है। यह अभिषुत सोम वर्षणकारी है। हे फल वर्षक! शत्रुओं के अतिशय हन्ता! फलवर्षी मरुतों के साथ आप सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 5.40.2]
The stones used to extract Somras leads to rains. Drinking of Somras grant rains. This extracted Somras draws rains. Hey rewarding, destroyer of the enemy! Drink Somras along with the Marud Gan, who accomplish desires.
वृषा त्वा वृषणं हुवे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः। वृषन्निन्द्र वृषभिर्वृत्रहन्तम॥
वज्रधर इन्द्र देव! आप सोमरस के सेचन कर्ता और अभीष्ट वर्षी हैं। हम विचित्र रक्षा के लिए आपका आह्वान करते हैं। हे फलवर्षक शत्रुओं के अतिशय हन्ता! फलवर्षी मरुतों के साथ आप सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 5.40.3]
सेचन :: सिंचाई करना, सिंचन, पानी छिड़कना; pollination.
Hey Vajr wielding Indr Dev! Hey nurturer of Somras and desires accomplisher, we invoke you for our protection-safety. Hey rewarding slayer of the enemy! Drink-enjoy Somras along with the Marud Gan.
ऋजीषी वज्री वृषभस्तुराषाट्छुष्मी राजा वृत्रहा सोमपावा।
युक्त्वा हरिभ्यामुप यासदर्वाङ्माध्यन्दिने सवने मत्सदिन्द्रः॥
इन्द्र देव ऋजीषी और वज्रधर हैं। इन्द्र देव अभीष्टवर्षी, शत्रु संहारकर्ता, बलवान्, सभी के ईश्वर, वृत्र हन्ता और सोमपान कर्ता हैं। इस तरह के इन्द्र देव घोड़ों को रथ में नियोजित करके हम लोगों के अभिमुख पधारें और माध्यन्दिन सवन में सोमपान से हर्षित हों।[ऋग्वेद 5.40.4]
ऋजीषी :: कर्ता; nominative, singular, masculine.
Hey Vajr wielding, singularly doer Indr Dev! You are accomplisher of desires, slayer-killer of enemies, mighty-powerful, lord of all, killer of Vrata Sur and extractor of Somras. Let Indr Dev deploy horses in his charoite and come to us for drinking Somras during the day-noon.
यत्त्वा सूर्य स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः।
अक्षेत्रविद्यथा मुग्धो भुवनान्यदीधयुः॥
हे सूर्य देव! स्वर्भानु नामक असुर ने जब आपको अन्धकार से आच्छदित कर दिया, तब जैसे मनुष्य अन्धकार में अपने क्षेत्र या रास्ते को न जानकर भ्रमित हो जाता है, उसी प्रकार से सभी लोग तमिस्रा में सम्मोहित हो गये।[ऋग्वेद 5.40.5]
तमिस्रा :: अँधेरी रात, गहन-गहरा अँधेरा या अंधकार, क्रोध, द्वेष, राग आदि दूषित और तामसिक मनोविकार, अविद्या का वह रूप जो भोग-विलास की पूर्ति में बाधा पड़ने पर उत्पन्न होता है और जिससे मनुष्य क्रोध वैर आदि करने लगता है; darkness, anger, attachment.
Hey Sury-Sun Dev! When the demon Swarbhanu had covered-hidden you, every one became confused-illusioned unable to recognise their either the locality or the path.
स्वर्भानोरध यदिन्द्र माया अवो दिवो वर्तमाना अवाहन्।
गूळ्हं सूर्यं तमसापव्रतेन तुरीयेण ब्रह्मणाविन्ददत्रिः॥
हे इन्द्र देव! जब आपने सूर्य के अधोदेश में वर्त्तमान, स्वर्भानु असुर की द्युतिमान् माया को नष्ट किया, तब व्रत विघातक अन्धकार द्वारा समाच्छन्न सूर्य देव को अत्रि ने चार ऋचाओं द्वारा प्रकाशमान किया।[ऋग्वेद 5.40.6]
ऋचा :: incantation.
Hey Indr Dev! When you removed-eliminated the bright cast-illusion made by the demon Swarbhanu, the darkness spoiled the fasts-endeavours, Atri Rishi lit the Sun by four Mantr-sacred hymns.
मा मामिमं तव सन्तमत्र इरस्या द्रुग्धो भियसा नि गारीत्त्वं।
मित्रो असि सत्यराधास्तौ मेहावतं वरुणश्च राजा॥
सूर्य वाक्य :- हे अत्रि! ऐसी अवस्था वाले हम आपके हैं। अन्न की इच्छा से द्रोह करने वाले असुर भय जनक अन्धकार द्वारा हमें नहीं निगल जायें; इसलिए आप और वरुण देव दोनों हमारी रक्षा करें। आप हमारे मित्र और सत्य पालक हैं।[ऋग्वेद 5.40.7]
Sury Dev said :- Hey Atri! In this situation-condition, we belong to you. The demons desirous of food grains may not engulf us by virtue of fear some darkness, we request you and Varun Dev to protect us. You are our friend and stand by the truth.
ग्राव्णो ब्रह्मा युयुजानः सपर्यन् कीरिणा देवान्नमसोपशिक्षन्।
अत्रिः सूर्यस्य दिवि चक्षुराधात्स्वर्भानोरप माया अघुक्षत्॥
उस समय ऋत्विक् अत्रि ने सूर्य को उपदेश दिया, प्रस्तर खण्डों का घर्षण करके इन्द्र देव के लिए सोमाभिषव किया, स्तोत्रों द्वारा देवी की पूजा की और मन्त्र प्रभाव से अन्तरिक्ष में सूर्य देव चक्षु को स्थापित किया। उस समय उन्होंने स्वर्भानु की समस्त माया को दूर कर दिया।[ऋग्वेद 5.40.8]
At that moment Ritviz Atri advised Sury Dev, that he should rub the stones and extract Somras for Indr Dev, worshiped the Goddess-Maa Bhagwati and established Sury Dev Chakshu in the space eliminating-removing the darkness and cast-spell of Swarbhanu.
यं वै सूर्यं स्वर्भानुस्तमसाविध्यदासुरः।
अत्रयस्तमन्वविन्दन्नह्य १ न्ये अशक्नुवन्॥
असुर स्वर्भानु ने जिस सूर्य को अन्धकार द्वारा आच्छदित किया, अत्रि पुत्रों ने अवशेष में उन्हें मुक्त किया। दूसरा कोई ऐसा करने में समर्थ न हुआ।[ऋग्वेद 5.40.9]
Atri's sons liberated the Sun, which was engulfed with darkness by Swarbhanu. None other had this power.(29.06.2023)
समिन्द्र णो मनसा नेषि गोभिः सं सूरिभिर्हरिवः सं स्वस्ति।
सं ब्रह्मणा देवहितं यदस्ति सं देवानां सुमत्या यज्ञियानाम्॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों को प्रसन्न मन से गौएँ, अश्व और कल्याणकारी ऐवश्वर्य प्रदान करें। आप हमें यज्ञकर्म वाली और देवताओं को प्राप्त होने वाली बुद्धि प्रदान करें।[ऋग्वेद 5.42.4]
Hey Indr Dev! Grant us grandeur, cows and horses happily. Grant us intelligence that inspire us for Yagy and approach-invoke the demigods-deities.
देवो भगः सविता रायो अंश इन्द्रो वृत्रस्य संजितो धनानाम्।
ऋभुक्षा वाज उत वा पुरन्धिरवन्तु नो अमृतासस्तुरासः॥
भगदेव, धनस्वामी सविता, वृत्रहन्ता इन्द्र देव, भली-भाँति से धन के विजेता ऋभुक्षा, वाज़ और पुरन्धि आदि समस्त अमर शीघ्र ही हम लोगों के यज्ञ में उपस्थित होकर हम लोगों की रक्षा करें।[ऋग्वेद 5.42.5]
Let all the immortals :- Bhag Dev, lord of riches Savita, slayers of Vratr Indr Dev, winner of wealth Ribhuksha, Vaj and Purandhi join this Yagy quickly and protect us.
मरुत्वतो अप्रतीतस्य जिष्णोरजूर्यतः प्र ब्रवामा कृतानि।
न ते पूर्वे मघवन्नापरासो न वीर्यं १ नूतनः कश्चनाप॥
हम याजक गण मरुद्वान् इन्द्र देव के कार्यों का वर्णन करते हैं। वे युद्ध से कभी पलायमान नहीं होते। वे जयनशील और जरा रहित हैं। हे इन्द्र देव! आपके पराक्रम को कोई पुरातन पुरुष नहीं जान पाया, उनके पीछे होने वाले भी नहीं जान पाये। और क्या, किसी नवीन ने भी आपके पराक्रम को प्राप्त नहीं किया।[ऋग्वेद 5.42.6]
We, the Ritviz describe-appreciate the endeavours of Indr Dev and his associates Marud Gan. They are winning and free from aging. Hey Indr Dev! Neither your preceder nor the next to them could ascertain-assess your valour-bravery. Any one next to them could not do so.
प्र सू महे सुशरणाय मेधां गिरं भरे नव्यसीं जायमानाम्।
य आहना दुहितुर्वक्षणासु रूपा मिनानो अकृणोदिदं नः॥
महान् और शोभन रक्षक इन्द्र देव या पर्जन्य (पर्जन्य तीसरे आदित्य हैं, जो कि मेघों में निवास करते हैं)। इनका मेघों पर नियंत्रण हैं। देवता के लिए हम अतिशय स्तुत्य और सद्योजात प्रार्थना समर्पित करते हैं। इन्द्र देव वर्षणकारी हैं। वे कन्या रूपिणी पृथ्वी के हित के लिए नदियों का रूप-विधान करते हैं और हम लोगों को जल प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 5.42.13]
पर्जन्य :: गरजता तथा बरसता हुआ बादल, मेघ, इंद्र, विष्णु, कश्यप ऋषि के एक पुत्र जिसकी गिनती गंधर्वों में होती है, पर्जन्य तीसरे आदित्य हैं, जो कि मेघों में निवास करते हैं; clouds causing rains.
We present newly composed prayers to worshipable great, beautiful protector Indr Dev or Parjany deity-demigod. Indr Dev is rain producing. They flow rivers for the earth which is like a girl-daughter for them and provide us water.
असावि ते जुजुषाणाय सोमः क्रत्वे दक्षाय बृहते मदाय।
हरी रथे सुधुरा योगे अर्वागिन्द्र प्रिया कृणुहि हूयमानः॥
हे इन्द्र देव! आपकी सेवा के लिए, वृत्र वधादि कार्य के लिए, बल के लिए और महान् हर्ष के लिए सोमरस समर्पित किया जाता है। हे इन्द्र देव! इसलिए हम लोग आपका आह्वान करते हैं। आप प्रिय, सुशिक्षित और विनम्र अश्वद्वय को रथ में नियोजित करके हम लोगों के पास पधारें।[ऋग्वेद 5.43.5]
Hey Indr Dev! We serve you Somras for the killing of Vratr, extreme power and great pleasure. Hey Indr Dev! That's why, we invoke you. Deploy your dear, trained, polite horse duo in the charoite and come to us.
तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषदं स्वर्विदम्।
प्रतीचीनं वृजनं दोहसे गिराशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे॥
प्राचीन समय के याजकगण, हमारे पूर्ववर्ती लोग, समस्त प्राणी और आधुनिक लोग जिस प्रकार से इन्द्र देव की प्रार्थना करके अपने मनोरथ पूर्ण करते हैं; हे अन्तरात्मा! उसी प्रकार से आप भी उनकी प्रार्थना करके मनोरथपूर्ण होवें। वे देवों के बीच में ज्येष्ठ, कुशासीन, सर्वज्ञ, हम लोगों के सम्मुखवर्ती, बलशाली, वेगवान् और जयशील हैं। इस प्रकार की स्तुति द्वारा आप उन्हें संवर्द्धित करें।[ऋग्वेद 5.44.1]
Hey conscience! Let our desires be accomplished the way the ancient Ritviz, our ancestors, all living beings and the modern people-populace of current era, worship Indr Dev; by you. He is senior amongest the demigods-deities, occupying the Mat made of Kush, all knowing, accelerated and a winner. Let him be promoted with such requests, worship-prayers.
श्रिये सुदृशीरुपरस्य याः स्वर्विरोचमानः ककुभामचोदते।
सुगोपा असि न दभाय सुक्रतो परो मायाभिर्ऋत आस नाम ते॥
हे इन्द्र देव! आप स्वर्ग में प्रभा विस्तारित करते है। अवर्षणकारी मेघ के बीच में जो सुन्दर जलराशि है, उसे मनुष्यों के हित के लिए समस्त दिशाओं में प्रेरित करते है। वर्षा आदि सुन्दर कर्म द्वारा आप मनुष्यों की रक्षा करें। प्राणियों का वध आप न करें। शत्रुओं की माया का आप नाश करते है। आपका नाम सत्यलोक में विद्यमान हैं।[ऋग्वेद 5.44.2]
Hey Indr Dev! You spread your aura in the space. Release the water accumulated in the non rain clouds in all directions. Protect the humanity by causing rains and not killing the living beings. You destroy the chant-cast of the enemy. Your name is established in the Saty Lok.
विदा दिवो विष्यन्नद्रिमुक्थैरायत्या उषसो अर्चिनो गुः।
अपावृत व्रजिनीरुत्स्वर्गाद्वि दुरो मानुषीर्देव आवः॥
अङ्गिराओं की स्तुतियों से इन्द्र देव ने स्वर्ग से वज्र निक्षेप करके पणियों द्वारा अपहृत निगूढ़ गौओं का पुनः उद्धार किया। आगामिनी उषा की रश्मियाँ सभी जगह व्याप्त होती है। पुञ्जीभूत अन्धकार को विनष्ट करके सूर्य उदित होते हैं। मनुष्यों के गृह द्वारों को उन्होंने उन्मुक्त किया।[ऋग्वेद 5.45.1]
Indr Dev released the cows abducted by the demons named Panis, acknowledging the prayers-Stuti of Angiras. Rays at dawn cover the entire area. The Sun rises and vanish the darkness leading to opening of the doors by the household.
सूक्तेभिर्वो वचोभिर्देवजुष्टैरिन्द्रा न्व १ ग्नी अवसे हुवध्यै।
उक्थेभिर्हि ष्मा कवयः सुयज्ञा आविवासन्तो मरुतो यजन्ति॥
हे इन्द्र देव, हे अग्नि देव! हम रक्षा के लिए देवों के द्वारा सेवनीय उत्कृष्ट स्तोत्रों से आप दोनों का आह्वान करते हैं। उत्तम प्रकार से यज्ञ करने वाले मरुतों के सदृश कर्म तत्पर परिचरण करने वाले ज्ञानी लोग स्तोत्रों द्वारा आप दोनों की पूजा करते हैं।[ऋग्वेद 5.45.4]
सेवनीय :: सेवन करने के योग्य, आराध्य, पूज्य; edible.
Hey Indr Dev & Agni Dev! We invoke you with the recitation of best Strotr-sacred hymns, liked-admired by the demigods-deities for our safety. The quickly moving enlightened people, worship-pray with the recitation of Strotr like the Marud Gan, who perform the Yagy in best possible manner.
अनूनोदत्र हस्तयतो अद्रिरार्चन्येन दश मासो नवग्वाः।
ऋतं यती सरमा गा अविन्दद्विश्वानि सत्याङ्गिराश्चकार॥
इस यज्ञ में ऋत्विकों के हाथों द्वारा संचालित पाषाण खण्ड से शब्द उत्थित होता हैं, जिसके द्वारा नवग्वों और दशग्वों ने इन्द्र देव की पूजा की। यज्ञ में उपस्थित होकर सरमा ने गौओं को प्राप्त किया और अङ्गिराओं के समस्त स्तवादि कर्म सफल हुए।[ऋग्वेद 5.45.7]
In this Yagy the stones used by the Ritviz produced sound by virtue worship and Navgavs and Dashgavs worshiped Indr Dev. Sarma got cows by presenting himself in the Yagy and the Angiras all endeavours related to worship were accomplished.
अयं सोमश्चमू सुतोऽमत्रे परि षिच्यते। प्रिय इन्द्राय वायवे॥
हे इन्द्र देव और वायु देव! पत्थरों से कूटकर अभिषुत हुआ सोमरस पात्रों में छानकर भरा जाता है, यह इन्द्रदेव और वायुदेव के लिए प्रिय है। इस सोमरस को पीने के लिए यहाँ पधारें।[ऋग्वेद 5.51.4]
Hey Indr Dev & Vayu Dev! Come to drink Somras crushed with stones and filtered for you, kept in the pots.
इन्द्रश्च वायवेषां सुतानां पीतिमर्हथः।
ताञ्जुषेथामरेपसावभि प्रयः॥
हे वायु देव! आप और इन्द्र देव इस अभिषुत सोमरस का पान करने के योग्य हैं; इसीलिए अहिंसक होकर आप दोनों इस सोमरस का सेवन करें और सोमात्मक अन्न के उद्देश्य से आगमन करें।[ऋग्वेद 5.51.6]
Hey Vayu Dev! You alongwith Indr Dev is qualified to drink this extracted Somras. Invoke for the eating the food grains in the form of Somras, without being violent.
सुता इन्द्राय वायवे सोमासो दध्याशिरः।
निम्नं न यन्ति सिन्धवोऽभि प्रयः॥
इन्द्र देव तथा वायु देव के लिए दधि मिश्रित सोमरस अभिषुत हुआ है। हे इन्द्र देव और वायु देव! निम्नगामिनी नदियों के सदृश वह सोमरस आप दोनों के अभिमुख गमन करता है।[ऋग्वेद 5.51.7]
Hey Indr Dev & Vayu Dev! Somras mixed with curd has been extracted for you. It moves to you like the rivers flowing in the down ward direction.
ऋग्वेद संहिता, पञ्चम मण्डल सूक्त (86) :: ऋषि :- भौम अत्रि; देवता :- इन्द्राग्नी; छन्द :- विराट्पूर्वा, अनुष्टुप्।
इन्द्राग्नी यमवथ उभा वाजेषु मर्त्यम्।
दृळ्हा चित्स प्र भेदति द्युम्ना वाणीरिव त्रितः॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! आप दोनों युद्धों में मनुष्यों की रक्षा करते हैं। वे शत्रु सम्बन्धी द्युतिमान् धन को अतिशय भिन्न करते हैं। वे प्रति वादियों के वाक्य का खण्डन करते हैं और शत्रुओं के वाक्य के सदृश तीनों स्थानों में उपस्थित रहते हैं।[ऋग्वेद 5.86.1]
Hey Indr Dev & Agni Dev! Both of you protect the human beings in war. You differentiate-separate, distinguish the shinning wealth. You reject the statements of the opponents and occupy the three abodes like the words of the enemies.
या पृतनासु दुष्टरा या वाजेषु श्रवाय्या।
या पञ्च चर्षणीरभीन्द्राग्नी ता हवामहे॥
जो इन्द्र देव और अग्नि देव संग्राम में अनभिभवनीय हैं, जो संग्राम में या अन्न के विषय में स्तवनीय हैं और जो पञ्च श्रेणी के मनुष्यों की रक्षा करते हैं, उन दोनों महानुभावों का हम लोग स्तवन करते हैं।[ऋग्वेद 5.86.2]
We invoke Indr Dev and Agni Dev, who are irresistible in conflicts, renowned in battles & protect the five classes of humans.
We worship-pray Indr Dev and Agni Dev who are winners in war-conflict, worshiped for food grains and protector of humans.
तयोरिदमवच्छवस्तिग्मा दिद्युन्मघोनोः।
प्रति द्रुणा गभस्त्योर्गवां वृत्रघ्न एषते॥
इन दोनों का बल शत्रुओं को पराजित करने वाला है। क्योंकि जब ये दोनों देव एक रथ पर आरूढ़ होकर धेनुओं के उद्धारार्थ और वृत्रासुर के विनाशार्थ गमन करते हैं, तब इन दोनों धनवानों के हाथों में तीक्ष्ण वज्र विराजमान रहता है।[ऋग्वेद 5.86.3]
Their might defeats the enemy, since when they ride the charoite to release the cows and destruction of Vrata Sur, they possess sharp Vajr in their hands.
ता वामेषे रथानामिन्द्राग्नी हवामहे।
पती तुरस्य राधसो विद्वांसा गिर्वणस्तमा॥
हे गमनशील, धन के अधिपति सर्वज्ञ तथा निरतिशय वन्दनीय इन्द्र देव और अग्नि देव! युद्ध में रथ को प्रेरित करने के लिए हम लोग आप दोनों का आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 5.86.4]
Hey dynamic, lords of wealth, enlightened and worshipable Indr Dev & Agni Dev! We invoke you both, to inspire the charoite in war-battle.
ता वृधन्तावनु द्यून्मर्ताय देवावदभा।
अर्हन्ता चित्पुरो दधें ऽ शेव देवावर्वते॥
हे अहिंसनीय देवद्वय! आप दोनों अहिंसनीय हैं। हम लोग अश्व प्राप्ति के लिए आप दोनों की प्रार्थना करते हैं और सोमरस के तुल्य आगे स्थापित करते हैं।[ऋग्वेद 5.86.5]
Hey unhurt demigod duo! Both of you can not be harmed-hurt. We pray-request you both to have horses and establish you in front like Somras.
एवेन्द्राग्निभ्यामहावि हव्यं शूष्यं घृतं न पूतमद्रिभिः।
ता सूरिषु श्रवो बृहद्रयिं गृणत्सु दिघृतमिषं दिधृतम्॥
पत्थरों द्वारा कूटे हुए सोमरस के सदृश बल कारक हव्य सम्प्रति प्रवृत्त हुआ। आप दोनों ज्ञानियों को अन्न प्रदान करें। स्तोताओं को प्रभूत धन और अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 5.86.6]
Oblations-offerings capable of granting strength like the smashed Somras have been intended. Both of you should grant food grains to the intellectuals. Give wealth and food grains to the Stotas-hosts.(21.08.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (17) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :-त्रिष्टुप्, द्विपदा त्रिष्टुप्।
पिबा सोममभि यमुग्र तर्द ऊर्वं गव्यं महि गृणान इन्द्र।
वि यो धृष्णो वधिषो वज्रहस्त विश्वा वृत्रममित्रिया शवोभिः॥
हे बलशाली इन्द्र देव! अङ्गिराओं द्वारा स्तूयमान होकर आपने सोमरस का पान करने के लिए पणियों द्वारा अपहृत गौओं को खोज लिया। आप सोमरस का पान करें। हे शत्रुओं के विनाशक वज्रधर इन्द्र देव! बल से युक्त होकर आपने सम्पूर्ण शत्रुओं का विनाश किया।[ऋग्वेद 6.17.1]
Hey might Indr Dev! On being praised by the Angiras you traced the cows abducted by Pani; to drink Somras. Hey destroyer of enemies wielder of Vajr Indr Dev! You destroyed all enemies on being strengthened.
स ईंपहि य ऋजीषी तरुत्रो यः शिप्रवान्वृषभो यो मतीनाम्।
यो गोत्रभिद्वज्रभृद्यो हरिष्ठाः स इन्द्र चित्राँ अभि तृन्धि वाजान्॥
हे रस विहीन सोमरस के पानकर्ता इन्द्र देव! आप शत्रुओं से त्राण करने वाले, शोभन कपोल वाले और स्तोताओं की कामना के पूरक है। आप इस सोमरस का पान करें। हे इन्द्र देव! आप वज्रधर, पर्वतों या मेघों के विदारक और अश्वों के संयोजक हैं। आप हम लोगों के उत्कृष्ट अन्न को प्रकाशित करें।[ऋग्वेद 6.17.2]
Hey drunker of Somras without sap, Indr Dev! You are reliever from the enemy, has beautiful cheeks and accomplish the desires of the Stotas. Drink this Somras. Hey Indr Dev! You are holder of Vajr, destroyer of mountains & clouds and organiser of horses. Grant us excellent food grains.
एवा पाहि प्रत्नथा मन्दतु त्वा श्रुधि ब्रह्म वावृधस्वोत गीर्भिः।
आविः सूर्यकृणुहि पीपिहीषो जहि शत्रूँरभि गा इन्द्र तृन्थि॥
हे इन्द्र देव! आपने जिस प्रकार से पहले सोमरस का पान किया, वैसे ही हमारे इस सोमरस को पीवें। यह सोमरस आपको प्रसन्न करे। हमारे स्तोत्र को सुनें और स्तुतियों द्वारा वर्द्धमान होवें। सूर्य देव को आविष्कृत करें। हम लोगों को अन्न का भोजन करावें। हमारे शत्रुओं का विनाश करें। चोरों द्वारा अपहृत गौओं को खोजें।[ऋग्वेद 6.17.3]
Hey Indr Dev! Drink this Somras, as you did earlier. Let this Somras please you. Listen to our Strotr and progress by the impact of prayers. Discover Sun-Sur Dev. Feed us with food grains. Destroy our enemy. Trace the cows stolen by the thieves.
ते त्वा मदा बृहदिन्द्र स्वधाव इमे पीता उक्षयन्त द्युमन्तम्।
महामनूनं तवसं विभूतिं मत्सरासो जर्हृषन्त प्रसाहम्॥
हे अन्नवान इन्द्र देव! आप दीप्तिमान् है। यह पान किया गया मादक सोमरस आपको अतिशय सिंचित करे। हे इन्द्र देव! यह मदकारक सोमरस आपको अतिशय हर्षित करे। आप निखिल गुणवान्, प्रवृद्ध, विभववान और शत्रुओं को पराजित करने वाले है।[ऋग्वेद 6.17.4]
निखिल :: अखिल, सारा, समस्त, विश्वव्यापी, सम्पूर्ण; complete, entire, universal.
विभव :: ज्योति, धूमधाम, विशालता, संभाव्य, कार्यक्षम; potential, splendour.
Hey possessor of food grains Indr Dev! You are radiant. Let this Somras drunk by you greatly nourish you. Hey Indr Dev! Let this toxicating Somras please you. You are virtuous, universal, possessor of splendour and destroyer of enemies.
येभिः सूर्यमुषसं मन्दसानोऽवासयोऽप दृळ्हानि दर्द्रत्।
महामद्रिं परि गा इन्द्र सन्तं नुत्था अच्युतं सदसस्परि स्वात्॥
हे इन्द्र देव! सोमरस से तृप्त होकर आपने दृढ़ अन्धकार का भेदन किया और सूर्य देव तथा उषा देवी को अपने-अपने स्थानों पर निवेशित किया। आपने-अपने स्थान से अविचलित पर्वत को विदीर्ण किया, जिस पर्वत के चारों ओर पणियों द्वारा चुराई गई गौएँ पायीं।[ऋग्वेद 6.17.5]
Hey Indr Dev! On being satisfied by drinking Somras, you removed extreme darkness and establish Sury Dev & Usha Devi in their positions. You destroyed the rigid mountain around which cows were stolen by the Panis.
तव क्रत्वा तव तद्दंसनाभिरामासु पक्वं शच्या नि दीधः।
और्णोर्दुर उस्त्रियाभ्यो वि दृळ्होदूर्वाद्गा असृजो अङ्गिरस्वान्॥
हे इन्द्र देव! आपने अपनी बुद्धि, कार्य और सामर्थ्य के द्वारा अपरिपक्व गौओं को परिणत दुग्ध प्रदान किया अर्थात् अकाल में भी गौओं को क्षीरदायिनी बनाया। हे इन्द्र देव! आपने गौओं को बाहर आने के लिए पाषाणादि के दृढ़ द्वारों को उद्घाटित किया। अङ्गिराओं के साथ मिलकर आपने गौओं को गोष्ठों से उन्मुक्त किया।[ऋग्वेद 6.17.6]
Hey Indr Dev! You made the immature cows yield milk by making use of your intelligence, capability and endeavours. Hey Indr Dev! You opened the strong gates blocked with stones for the cows to move out. Along with Angiras, you released the cows from the sheds.
पप्राथ क्षां महि दंसो व्यु१र्वीमुप द्यामृष्वो बृहदिन्द्र स्तभायः।
अधारयो रोदसी देवपुत्रे प्रत्ने मातरा यह्वी ऋतस्य॥
हे इन्द्र देव! आपने महान् कर्म द्वारा विस्तीर्ण पृथ्वी को विशेष प्रकार से पूर्ण किया। अतः आप महान् है। आपने द्युलोक को धारित किया, जिससे वह निपतित न हो। आपने पोषण करने के लिए द्यावा-पृथ्वी को धारित किया। देवता लोग द्यावा-पृथ्वी के पुत्र हैं। द्यावा-पृथ्वी पुरातन, यज्ञ अथवा उदक का निर्माण करने वाले और महान हैं।[ऋग्वेद 6.17.7]
Hey Indr Dev! You made great endeavours to complete the broad earth. You are great. You hold the earth & heavens so that they do not fall. You held the earth & heavens for their nourishment. The demigods-deities are the sons of earth & heavens. Earth & heavens are eternal-ancient creators of Yagy and water.
अध त्वा विश्वे पुर इन्द्र देवा एकं तवसं दधिरे भराय।
अदेवो यदभ्यौहिष्ट देवान्स्वर्षाता वृणत इन्द्रमत्र॥
हे इन्द्र देव! जब वृत्रासुर संग्राम के लिए देवगण चले, तब सम्पूर्ण देवों ने एक आपको ही संग्राम के लिए अपना नेतृत्व कर्ता बनाया। आप अत्यन्त बलशाली हैं। आपने मरुद्गणों की संग्राम में सहायता की।[ऋग्वेद 6.17.8]
Hey Indr Dev! The demigods-deities elected-appointed you the leaders prior to move for the battle with Vrata Sur. You are capable & mighty. You helped the Marud Gan in the war.
अध द्यौश्चित्ते अप सा नु वज्राद्द्द्वितानमद्भियसा स्वस्य मन्योः।
अहिं यदिन्द्रो अभ्योहसानं नि चिद्विश्वायुः शयथे जघान॥
विपुल अन्न वाले इन्द्र देव ने जब सोने के लिए आक्रमणकारी वृत्रासुर का वध किया, तब हे इन्द्रदेव! आपके क्रोध और वज्र के भय से द्युलोक स्तब्ध रह गया।[ऋग्वेद 6.17.9]
When the possessor of enormous stock food grains killed the invader Vratra Sur for gold, the heavens was stunned with fear of your furiosity and the Vajr.
अध त्वष्टा ते मह उग्र वज्रं सहस्रभृष्टिं ववृतच्छताश्रिम्।
निकाममरमणसं येन नवन्तमहिं सं पिणगृजीषिन्॥
हे अत्यन्त बलशाली इन्द्र देव! देव शिल्पी त्वष्टा ने आपके लिए सहस्र धारा वाले और सौ पर्ववाले वज्र का निर्माण किया। हे नीरस सोमरस का पान करने वाले इन्द्र देव! उसी वज्र द्वारा आपने नियताभिलाष, उद्धत-प्रकृति और शब्दायमान वृत्रासुर का संहार किया।[ऋग्वेद 6.17.10]
Hey extremely powerful-mighty Indr Dev! Artisan of the demigods-deities Twasta built Vajr for you with hundred edges and thousand sharp points (the thousand-edged, the hundred-angled thunderbolt). Hey drinker of tasteless Somras with the passion & readiness-preparedness you slayed Vratra Sur who created loud noises.
वर्धान्यं विश्वे मरुतः सजोषाः पचच्छतं महिषाँ इन्द्र तुभ्यम्।
पूषा विष्णुस्त्रीणि सरांसि धावन्वृत्रहणं मदिरमंशुमस्मै॥
हे इन्द्र देव! सम्पूर्ण मरुद्गण समान प्रीतिभाजन होकर स्तोत्र द्वारा आपको पूजित करते हैं और आपके निमित्त पूषा तथा श्री विष्णु देव शत संख्यक महिषों का पाक करते हैं। तीन पात्रों को पूर्ण करने के लिए मद कारक और वृत्र विनाशक सोम धावित होता है अर्थात् पूषा और श्री विष्णु सोम पात्र को पूर्ण करें। सोम पान करने के बाद ही वृत्र विनाश में इन्द्र सामर्थ्यवान् होते हैं।[ऋग्वेद 6.17.11]
पाक :: भोजन आदि पकाने की क्रिया, पकाया हुआ भोजन, रसोई, छोटा, प्रशंसनीय, पवित्र; pure, cleanse.
Hey Indr Dev! All Marud Gan worship you with love with recitation of Strotr. Pusha and Shri Vishnu cleanse hundred buffalo for you. Somras become toxicating by extracting in three pots-vessels leading to slaying of Vratr. Indr became ready-capable of destroying Vratr.
आ क्षोदो महि वृतं नदीनां परिष्ठितमसृज ऊर्मिमपाम्।
तासामनु प्रवत इन्द्र पन्थां प्रार्दयो नीचीरपसः समुद्रम्॥
हे इन्द्र देव! आपने वृत्रासुर द्वारा समाच्छादित सर्वतः स्थित नदियों के जल को प्रवाहित किया, जिससे नदियाँ प्रवाहित हुईं। आपने उदक तरङ्ग को उन्मुक्त किया। हे इन्द्र देव! आपने उन नदियों को निम्न मार्ग से प्रवाहित किया। आपने वेग युक्त उदक को समुद्र में पहुँचाया।[ऋग्वेद 6.17.12]
सर्वतः :: सभी ओर, चारों तरफ़, पूरी तरह से, पूर्ण रूप से, सभी जगह; completely.
Hey Indr Dev! You made the river flow from all direction, restrained by Vratr. You release the waves-tides of water. Hey Indr Dev! You made the river water flowing at high speed to reach ocean.
एवा ता विश्वा चकृवांसमिन्द्रं महामुग्रमजुर्यं सहोदाम्।
सुवीरं त्वा स्वायुधं सुवज्रमा ब्रह्म नव्यमवसे ववृत्यात्॥
हे इन्द्र देव! इस प्रकार से आप सम्पूर्ण कार्यों के करने वाले, ऐश्वर्यशाली, महान् ओजस्वी, अजर, बलदाता, शोभन मरुतों से सहायता पाने वाले, अस्त्रधारी और वज्रधर है। हम लोगों का नवीन स्तोत्र आपको प्रसन्न करे, जिससे हम लोगों की रक्षा होवें।[ऋग्वेद 6.17.13]
Hey Indr Dev! You get help-support from Marud Gan are aurous, immortal, mighty, have grandeur and accomplish all of your endeavours, possessing arms-weapons and wield Vajr. Let our new Strotr please you, so that you protect us.
स नो वाजाय श्रवस इषे च राये धेहि द्युमत इन्द्र विप्रान्।
भरद्वाजे नृवत इन्द्र सूरीन्दिवि च स्मैधि पार्ये न इन्द्र॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों को बल, पुष्टि, अन्न और धन के लिए धारित करें। हम लोग शक्ति सम्पन्न और मेधावी हों। हे इन्द्र देव! हम भरद्वाज को परिचारकों से युक्त करने वालों को आप पुत्र-पौत्रों से युक्त करें। हे इन्द्र देव! आप आने वाले समय में हमारी रक्षा करें।[ऋग्वेद 6.17.14]
Hey Indr Dev! You grant-support us for strength, nourishment, food grains and wealth. Hey Indr Dev! Grant us sons & grand sons to the providers servants to Bhardwaj Rishi. Hey Indr Dev! protect in an hour of need.
अया वाजं देवहितं सनेम मदेम शतहिमाः सुवीराः॥
इस प्रार्थना के द्वारा हम लोग द्युतिमान् इन्द्र देव द्वारा प्रदत्त अन्न लाभ करें। हम लोग शोभन पुत्र-पौत्रों से युक्त होकर सौ वर्ष पर्यन्त भी सुखमय जीवन यापन करें।[ऋग्वेद 6.17.15]
Let us be favoured by aurous-radiant Indr Dev seeking food grains. We should survive comfortably for hundred years with excellent sons & grandsons. (09.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (18) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप् आदि।
तमु ष्टुहि यो अभिभूत्योजा वन्वन्नवातः पुरुहूत इन्द्रः।
अषाळ्हमुग्रं सहमानमाभिर्गीर्भिर्वर्ध वृषभं चर्षणीनाम्॥
हे भरद्वाज! आप अनभिभूत तेज वाले, शत्रुओं की हिंसा करने वाले, अधृष्य और बहुतों के द्वारा आहूत इन्द्र देव का स्तवन करें। आप इन स्तोत्रों द्वारा अनभिभूत, ओजस्वी, शत्रु विजयी और मनुष्यों के अभीष्ट पूरक इन्द्र देव को संवर्द्धित करें।[ऋग्वेद 6.18.1]
अधृष्य :: जिसका घर्षण न किया जा सके, जिसके पास जाना कठिन हो, अनभिगम्य, अजेय, घमण्डी; invincible, ill approachable, insuperable, proudy.
अभिभूत :: मुग्ध, भावविभोर, विह्वल, वशीभूत, पराजित, पराभूत; defeated, infatuated, fascinated.
संवर्धित :: बढ़ा हुआ, बढ़ाया हुआ, पाला पोसा या देखभाल किया हुआ; enhanced.
Hey Bhardwaj! Worship Indr Dev who is invincible, possessor of aura, slayer of the enemies-demons worshiped by many people. Promote-enhance Indr Dev, who is shining, slayer of enemies and accomplish humans desires, with these Strotr.
स युध्मः सत्वा खजकृत्समद्वा तुविम्रक्षो नदनुमाँ ऋजीषी।
बृहद्रेणुश्यवनो मानुषीणामेकः कृष्टीनामभवत्सहावा॥
इन्द्र देव संग्राम में रेणुओं के उत्थापक, मुख्य, बलवान्, योद्धा, दाता, युद्ध में संलग्न, सहानुभूति सम्पन्न, वर्षा द्वारा बहुतों के उपकारक, शब्द विधायक, तीनों सवनों में सोमपान करने वाले और मनु की सन्तानों की रक्षा करने वाले हैं।[ऋग्वेद 6.18.2]
रेणु :: धूल, बालू, पृथ्वी, संभालू के बीज, बिडंग, अत्यंत लघु परिमाण, कणिका, फूल के पराग कण; pollen grains, dust particles, micro.
उत्थापक :: उत्थान, उत्तोलक, उन्नति, भार उठाने का यन्त्र; lifter, lift, lifting gear, raise.
सहानुभूति :: संवेदना, हमदर्द, अनुकंपा, दया; sympathy, empathy.
Indr Dev raises dust in the war, head of the army, mighty, warrior, donor, engaged in the war, sympathetic, producer-causative of rains, synthesizer of words, drink Somras thrice during the day and protector of the progeny of Manu.
त्वं ह नु त्यददमायो दस्यूँरैकः कृष्टीरवनोरार्याय।
अस्ति स्विन्नु वीर्यं१ तत्त इन्द्र न स्विदस्ति तदृतुथा वि वोचः॥
हे इन्द्र देव! आप कर्म विहीन मनुष्यों को शीघ्र ही अपने वशीभूत करें। अकेले आपने ही कर्मानुष्ठानकारी आर्यों को पुत्र-दासादि प्रदान किया। हे इन्द्र देव! आप में इस प्रकार की पूर्वोक्त सामर्थ्य है अथवा नहीं? आप समय-समय पर अपने बल का विशेष परिचय देने के लिए कभी-कभी अपना पराक्रम प्रकट करें।[ऋग्वेद 6.18.3]
Hey Indr Dev control the humans who are unwilling to work. You granted son, slaves, servants etc. to the Ary. Hey Indr Dev! Do you possess this type of capability or not!? You show your might time & again.
सदिद्धि ते तुविजातस्य मन्ये सहः सहिष्ठ तुरतस्तुरस्य।
उग्रमुग्रस्य तवसस्तवीयोऽरध्रस्य रध्रतुरो बभूव॥
हे बलवान इन्द्र देव! आप संसार के बहुत यज्ञों में प्रादुर्भूत हुए हैं और हमारे शत्रुओं का विनाश भी किया। आप में प्रचण्ड और प्रवृद्ध बल है हम ऐसा समझते हैं। आप ओजस्वी, समृद्धि सम्पन्न, शत्रुओं द्वारा अजेय तथा जयशील शत्रुओं के संहारक हैं।[ऋग्वेद 6.18.4]
प्रादुर्भूत :: जिसका प्रादुर्भाव हुआ हो, जो प्रकट हुआ हो, सामने आया हुआ, उत्पन्न, जन्मा हुआ, उत्पादित, विकसित; evolved, born, appeared.
प्रचण्ड :: कठोर, उग्र, कड़ा; terrific, severe.
Hey might Indr Dev! You participated in many Yagy in the universe and slayed our enemies. We assume that you have terrific and highly developed strength. You are effective, powerful, invincible and destroyer of enemy.
तन्नः प्रत्नं सख्यमस्तु युष्मे इत्था वदद्भिर्वलमङ्गिरोभिः। हन्नच्युतच्युद्दस्मेषयन्तमृणोः पुरो वि दुरो अस्य विश्वाः॥
हे अविचलित पर्वतादि के संचालन कर्ता और मनोज्ञ दर्शन इन्द्र देव! हम लोगों का चिरकालानुवर्त्ती सखा भाव चिरस्थायी है। आपने स्तवकारी अङ्गिराओं के साथ अस्त्र निक्षेप करने वाले बल नामक असुर का वध करके उसके नगरों के द्वारों को खोल दिया।[ऋग्वेद 6.18.5]
मनोज्ञ :: प्रिय, सुंदर; lovely, pleasing.
Hey controller of static mountains etc., with pleasing personality, Indr Dev! Let our friendly relations since ever should remain-maintained. You opened the gates of the cities killing the demon Bal, who fought with Angiras.
स हि धीभिर्हव्यो अस्त्युग्र ईशानकृन्महति वृत्रतूर्ये।
स तोकसाता तनये स वज्री वितन्तसाय्यो अभवत्समत्सु॥
ओजस्वी और स्तोताओं की सामर्थ्य को बढ़ाने वाले इन्द्र महान् संग्राम में स्तुतियों द्वारा आहूत होते हैं। पुत्र लाभ के लिए इन्द्र देव आहूत होते हैं। वज्रधारी इन्द्र देव संग्राम में विशेष रूप से वन्दनीय हैं।[ऋग्वेद 6.18.6]
Indr Dev being effective and booster of the might of the Stotas, is worshiped in the war with prayers. Indr Dev is worshiped for having son. Vajr wielding Vajr Indr Dev, is especially worshiped in the war.
स मज्मना जनिम मानुषाणाममर्त्येन नाम्नाति प्र सर्खे।
स द्युनेन स शवसोत राया स वीर्येण नृतमः समोकाः॥
वे इन्द्र देव शत्रुओं को अपने बल से झुकाने वाले, यश, धन बल और वीरता में सर्वश्रेष्ठ है। वे मनुष्यों में उत्तम और सर्वोत्तम पद तथा स्थान को प्राप्त करें।[ऋग्वेद 6.18.7]
Indr Dev is best-excellent in lowering-bowing the enemies, fame, wealth, might, valour. Let him achieve the best and excellent position amongest the humans.
स यो न मुहे न मिथू जनो भूत्सुमन्तुनामा चुमुरिं धुनिं च।
वृणक्पितुं शम्बरं शुष्णमिन्द्रः पुरां च्यौनाय शयथाय नू चित्॥
जो इन्द्र देव संग्राम में कभी भी कर्त्तव्य विमूढ़ नहीं होते, जो कभी भी वृथा वस्तुओं को उत्पन्न नहीं करते; किन्तु जो प्रख्यात नाम वाले हैं, वही इन्द्र देव शत्रुओं के नगरों को विनष्ट करने के लिए और शत्रुओं को मारने के लिए शीघ्र ही कार्यरत होते हैं। हे इन्द्र देव! आपने चुमुरि, धुनि, पिप्रु, शम्बर और शुष्ण नामक असुरों का वध किया।[ऋग्वेद 6.18.8]
किंकर्तव्यविमूढ़ :: हतबुद्धि, हक्का-बक्का; bewildered, puzzle-headed, puzzle-pated.
Indr Dev is never puzzled in the war. Never generate useless materials. he is famous. He quickly act to kill the enemy and their forts-cities in the war. Hey Indr Dev! You killed the demons named Chumuri, Dhuni, Shambar and Shushn.
उदावता त्वक्षसा पन्यसा च वृत्रहत्याय रथमिन्द्र तिष्ठ।
धिष्व वज्रं हस्त आ दक्षिणत्राभि प्र मन्द पुरुदत्र मायाः॥
हे इन्द्र देव! आप ऊद्धर्वगामी और शत्रुओं के संहारकर्ता हैं। आप स्तवनीय बल से युक्त होकर शत्रुओं को मारने के लिए अपने रथ पर आरुढ़ होते हैं।दायें हाँथ में अपने अस्त्र वज्र को धारण करें। हे बहुत धन वाले इन्द्र देव! आप जाकर आसुरी माया को विशेष प्रकार से नष्ट करें।[ऋग्वेद 6.18.9]
Hey Indr Dev! You move in the upward direction and destroy the enemy. You ride the charoite possessing revered might; wielding Vajr in your right hand. Hey wealthy Indr Dev! Destroy the demonic enchantment using your special powers.
अग्निर्न शुष्कं वनमिन्द्र हेती रक्षो नि धक्ष्यशनिर्न भीमा।
गम्भीरय ऋष्वया यो रुरोजाध्वानयद्दुरिता दम्भयच॥
हे इन्द्र देव! अग्नि जिस प्रकार से वृक्षों को जलाती है, उसी प्रकार आपका वज्र शत्रुओं को नष्ट करता है। आप वज्र के समान भयंकर हैं। आप वज्र द्वारा राक्षसों को अतिशय नष्ट करें। इन्होंने अनभिभूत और महान् वज्र द्वारा शत्रुओं को नष्ट किया तथा ये संग्राम में भेदन करते हैं और समस्त दुरितों का भी भेदन करते हैं।[ऋग्वेद 6.18.10]
दुरित :: पाप, दुष्कृत; sinners.
Hey Indr Dev! The way fire burn the trees, your Vajr destroy the enemies. Your Vajr is furious. Destroy the demons to the maximum. You penetrate the enemies, destroy them and the sinners with Vajr.
आ सहस्रं पथिभिरिन्द्र राया तुविद्युम्न तुविवाजेभिरर्वाक्।
याहि सूनो सहसो यस्य नू चिददेव ईशे पुरुहूत योतोः॥
हे बहुधन सम्पन्न, बहुतों के द्वारा आहूत, बल पुत्र इन्द्र देव! कोई भी असुर आपको बल से पृथक करने में समर्थ नहीं हो सकता। धन से युक्त होकर आप असंख्य बलशाली वाहनों के द्वारा हमारे समक्ष पधारें।[ऋग्वेद 6.18.11]
Possessor of various kinds of wealth, worshiped by many, son of Bal, hey Indr Dev! No demon can separate you from Bal. Come to us possessing infinite wealth.
प्र तुविद्युम्नस्य स्थविरस्य घृष्वेर्दिवो ररप्शे महिमा पृथिव्याः।
नास्य शत्रुर्न प्रतिमानमस्ति न प्रतिष्ठिः पुरुमायस्य सह्योः॥
अति यश वाले, शत्रुओं के निहन्ता और प्रवर्धमान इन्द्र देव की महिमा स्वर्गलोक और पृथ्वी लोक से भी महान् है। बहुत बुद्धि वाले और शत्रुओं को अभिभूत करने वाले इन्द्र देव का कोई शत्रु नहीं है, कोई प्रतिनिधि नहीं है और न कोई आश्रय है।[ऋग्वेद 6.18.12]
निहन्ता :: हत्या करने वाला; killer.
Possessor of great fame & glory, killer of enemies and progressing Indr Dev is greater than the heavens & the earth. Possessor of great intelligence and enchanter of the enemy, Indr Dev has no enemy, representative and shelter.
प्र तत्ते अद्या करणं कृतं भूत्कुत्सं यदायुमतिथिग्वमस्मै।
पुरू सहस्रा नि शिशा अभि क्षामुत्तूर्वयाणं घृषता निनेथ॥
हे इन्द्र देव! आपका वह कर्म प्रकाशित होता है। आपने शुष्ण नामक राक्षस से कुत्स की और शत्रुओं के समीप से आयु तथा दिवोदास की रक्षा की। आपने वज्र के द्वारा शम्बर का वध करके उसका बहुत-सा धन अतिथिग्व को प्रदान किया। भूमि पर तीव्रगामी दिवोदास को कष्टों से सुरक्षित किया।[ऋग्वेद 6.18.13]
Hey Indr Dev! Your deeds-endeavours are acknowledged. You killed the demon Shushn and protected Kuts in addition to Ayu & Divodas from the enemies. You killed Shambar with Vajr and gave his lots of wealth to Atithigavy. You protected fast moving-dynamic Divodas from troubles, torture over the earth.
अनु त्वाहिघ्ने अध देव देवा मदन्विश्वे कवितमं कवीनाम्।
करो यत्र वरिवो बाधिताय दिवे जनाय तन्वे गृणानः॥
हे द्युतिमान इन्द्र देव! सम्पूर्ण स्तोतागण वृष्टि प्रदान करने के लिए आपका स्तवन कर रहे हैं। आप सम्पूर्ण मेधावियों में श्रेष्ठ है। स्तोताओं के स्तवन से प्रसन्न होकर आप दारिद्र्यादि से पीड़ित याजकगणों और उनके पुत्रों को धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 6.18.14]
Hey radiant Indr Dev! All Stotas worship you for rains. You are best amongest the intelligent people. On being happy-pleased you grant the worshiping Stotas suffering from poverty, wealth to them and their sons.
अनु द्यावापृथिवी तत्त ओजोऽमर्त्या जिहत इन्द्र देवाः।
कृष्वा कृत्नो अकृतं यत्ते अस्त्युक्थं नवीयो जनयस्व यज्ञैः॥
हे इन्द्र देव! द्यावा-पृथ्वी और अमर देव आपके बल को स्वीकार करते हैं। हे कर्मवीर इन्द्र देव! आप असम्पादित कार्यों का अनुष्ठान करें और उसके अनन्तर यज्ञ में अभिनव स्तोत्रों को इन्द्र देव कर्म करने की अपनी शक्ति के कारण पूजनीय हैं।[ऋग्वेद 6.18.15]
Hey Indr Dev! The earth & heavens accept your strength. Hey Karm Veer (one who perform) Indr Dev! Accomplish the unfinished jobs. During the Yagy Indr Dev is worshiped by virtue of his might.(11.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (19) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
महाँ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा उत द्विबर्हा अमिनः सहोभिः।
अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्॥
राजा की तरह स्तोता मनुष्यों की कामनाओं के पूरक प्रभूत इन्द्र देव यहाँ आगमन करें। दोनों लोकों के ऊपर पराक्रम को विस्तारित करने वाले और शत्रुओं द्वारा अहिंसनीय ये हम लोगों के निकट वीरत्व प्रकाशित करने के लिए वर्द्धित होते हैं। इन्द्र देव विस्तीर्ण शरीर वाले और प्रख्यात गुणयुक्त कर्म करने की अपनी शक्ति के कारण पूजनीय हैं।[ऋग्वेद 6.19.1]
Let Indr Dev who accomplish the desires of the Stotas come here like a king. He extend his valour over the two abodes-heaven & earth, unharmed by the enemy demonstrate-show his capacity-calibre of bravery. Indr Dev, possessor of wide body, qualities-traits and might is worshiped.
इन्द्रमेव धिषणा सातये धाद्बृहन्तमृष्वमजरं युवानम्।
अषाळ्हेन शवसा शूशुवांसं सद्यश्चिद्यो वावृधे असामि॥
इन्द्र देव उत्पन्न होते ही अत्यधिक वर्द्धमान होते हैं। हमारी स्तुति दान के लिए इन्द्र देव को धारित करती है। इन्द्र देव महान्, गमनशील, जरारहित, युवा और शत्रुओं द्वारा अनभिभूत होने वाले बल से युक्त हैं।[ऋग्वेद 6.19.2]
Indr Dev grew as soon as he was born. Our prayers support Indr Dev for charity. Indr Dev is great, dynamic, free from old age, young and possess the strength which can not be over powered by the enemy.
पृथू करस्ना बहुला गभस्ती अस्मद्र्य१ क्सं मिमीहि श्रवांसि।
यूथेव पश्वः पशुपा दमूना अस्माँ इन्द्राभ्या ववृत्स्वाजौ॥
हे इन्द्र देव! आप अन्न दान करने के लिए हम लोगों के अभिमुख अपने विस्तीर्ण, कार्यकर्ता और अतिशय दान शील हाथों को करें। हे इन्द्र देव! आप शान्त मन वाले हैं। पशु पालक जिस प्रकार से पशुओं के समूह को संचारित करता है, उसी प्रकार आप संग्राम में हम लोगों को संचारित करें।[ऋग्वेद 6.19.3]
Hey Indr Dev! Keep your broad, working & making extreme charity hands in front of us. Hey Indr Dev! You are calm, quite & compose. Handle us in the war just like the cattle growers tackle their herd.
तं व इन्द्रं चतिनमस्य शाकैरिह नूनं वाजयन्तो हुवेम।
यथा चित्पूर्वे जरितार आसुरनेद्या अनवद्या अरिष्टाः॥
हम स्तोता गण अन्नाभिलाषी होकर इस यज्ञ में समर्थ सहायक मरुतों के साथ शत्रु निहन्ता प्रसिद्ध इन्द्र देव की प्रार्थना करते हैं। हे इन्द्र देव! आपके पुरातन स्तोता के समान हम लोग भी निन्दा से रहित, पाप रहित और अहिंसित होवें।[ऋग्वेद 6.19.4]
We Stotas desirous of food grains worship, slayer of enemy Indr Dev, with the Marud Gan. Hey Indr Dev! Your eternal Stotas should be free from sins, unharmed and free from reproach-condemnation.
धृतव्रतो धनदाः सोमवृद्धः स हि वामस्य वसुनः पुरुक्षुः।
सं जग्मिरे पथ्या ३ रायो अस्मिन्त्समुद्रे न सिन्धवो यादमानाः॥
जिस प्रकार नदियाँ प्रवाहित होकर समुद्र में गिरती होती हैं, उसी प्रकार स्तोताओं का हितकर धन इन्द्र देव के प्रति गमन करता है। इन्द्र देव धन से कर्म करने वाले, वाञ्छित धन के स्वामी और सोमरस द्वारा प्रवर्द्धमान हैं।[ऋग्वेद 6.19.5]
The way the river flow to the ocean, the beneficial wealth of the Stotas should moves to Indr Dev. Indr Dev perform deeds with the wealth, possessor of desired wealth and grow-progress by drinking the Somras.
शविष्ठं न आ भर शूर शव ओजिष्ठमोजो अभिभूत उग्रम्।
विश्वा द्युम्ना वृष्ण्या मानुषाणामस्मभ्यं दा हरिवो मादयध्यै॥
हे पराक्रमशाली इन्द्र देव! आप हम लोगों को प्रकृष्ट तम बल प्रदान करें। हे शत्रुओं को अभिभूत करने वाले इन्द्र देव! आप हम लोगों को असह्य और अतिशय ओजस्वी दीप्ति प्रदान करें। हे अश्व वाले इन्द्र देव! आप हम लोगों को सेचन समर्थ, द्युतिमान् और मनुष्यों के भोग्य के लिए कल्पित सम्पूर्ण धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.19.6]
Hey Indr Dev possessing valour & might! Hey mesmeriser of the enemy Indr Dev! Grant us too sharp aura-radiance. Hey Indr Dev possessor of horses! Grant us the wealth which is nourishing, usable for comforts-pleasure for the humans.
यस्ते मदः पृतनाषाळमृध्र इन्द्र तं न आ भर शूशुवांसम्।
येन तोकस्य तनयस्य सातौ मंसीमहि जिगीवांसस्त्वोताः॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों को शत्रु सेनाओं को अभिभूत करने वाला और अहिंसित हर्ष प्रदान करें। आपके द्वारा रक्षित होकर हम लोग विजयी हों। पुत्र-पौत्र प्राप्ति के निमित्त हम लोग उसी हर्ष से आपका स्तवन करें।[ऋग्वेद 6.19.7]
Hey Indr Dev! Grant us pleasure that enchant the enemy and do not harm us. Let us be winner being protected by you. Blessed with sons & grant sons, let us worship-pray you with the same pleasure.
आ नो भर वृषणं शुष्ममिन्द्र धनस्पृतं शूशुवांसं सुदक्षम्।
येन वंसाम पृतनासु शत्रून्तवोतिभिरुत जामीरँजामीन्॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों को अभिलाषा पूरक सेना रूप बल प्रदान करें। वह (बल) धन का पालक, प्रवृद्ध और शोभन बल हो। हे इन्द्र देव! आपकी रक्षा द्वारा हम संग्राम में जिस बल में आत्मीय और अपरिचित शत्रुओं का वध कर सकें।[ऋग्वेद 6.19.8]
Hey Indr Dev! Grant us the strength, in the form of army which can accomplish our desires. The strength granted by you should be glorious, growing and protector of wealth. Hey Indr Dev! On being protected by you, we should be able to kill the known (friends & relatives against, harming us) and the unknown-unidentified enemies.
आ ते शुष्मो वृषभ एतु पश्चादोत्तरादधरादा पुरस्तात्।
आ विश्वतो अभि समेत्वर्वाङिन्द्र द्युम्नं स्वर्वद्धेह्यस्मे॥
हे इन्द्र देव! आपका अभीष्ट वर्षी बल पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और पूर्व की ओर से हमारे सम्मुख आगमन करें। वह प्रत्येक दिशा से होकर हमारे पास आवे। आप हमें सुखयुक्त, धनयुक्त करें।[ऋग्वेद 6.19.9]
Hey Indr Dev! The strength which accomplish the desires should concentrate upon us from the east, west, north & south. Let it come to us from all (10) directions. We should have pleasure-comforts and wealth.
नृवत्त इन्द्र नृतमाभिरूती वंसीमहि वामं श्रोमतेभिः।
ईक्षे हि वस्व उभयस्य राजन्धा रत्नं महि स्थूरं बृहन्तम्॥
हे इन्द्र देव! परिचारकों से युक्त और श्रोतव्य यश के साथ हम लोग श्रेष्ठ धन का उपभोग आपकी रक्षा के द्वारा करते हैं। हे राजमान इन्द्र देव! आप पार्थिव और दिव्य धन के स्वामी हैं; इसलिए आप हम लोगों को महान् असीम एवं गुणयुक्त रत्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.19.10]
Hey Indr Dev! We utilise the excellent riches with servants-slave and glory being protected by you. Hey radiant Indr Dev! You are the lord of material and divine wealth. Grant us unlimited quality jewels.
मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्यं शासमिन्द्रम्।
विश्वासाहमवसे नूतनायोग्रं सहोदामिह तं हुवेम॥
हम लोग अभिनव रक्षा के लिए इस यज्ञ में प्रसिद्ध इन्द्र देव का आह्वान करते हैं। वे मरुतों के साथ युक्त, अभीष्ट वर्षी, समृद्ध, शत्रुओं के द्वारा अकुत्सित, दीप्तिमान्, शासनकारी, लोक का अभिभव करने वाले, प्रचण्ड और बलवान् हैं।[ऋग्वेद 6.19.11]
अभिनव :: बिल्कुल नया, आधुनिक ढंग का; unique, maiden.
We invoke Indr Dev in this glorious-famous Yagy for excellent protection. Associated by the Marud Gan, he is desires accomplishing, prosperous, untainted by the enemy, radiant, ruler, resort to the welfare of humans, sharp and mighty.
जनं वज्रिन्महि चिन्मन्यमानमेभ्यो नृभ्यो रन्धया येष्वस्मि।
अधा हि त्वा पृथिव्यां शूरसातौ हवामहे तनये गोष्वप्सु॥
हे वज्रधर! हम जिन मनुष्यों के बीच में स्थित हैं, उन मनुष्यों से अपने को अधिक मानने वाले व्यक्ति को आप वशीभूत करें। हम लोग अभी इस लोक में युद्ध के समय में एवं पुत्र, पशु और उदक लाभ के निमित्त आपका आह्वान करते हैं।[ऋग्वेद 6.19.12]
Hey Vajr wielder! Control the person who considered himself to be above those with whom he interact-live. We invoke you in this abode-earth, during war for the safety of our sons, animals-cattle & water.
वयं त एभिः पुरुहूत सख्यैः शत्रोः शत्रोरुत्तर इत्स्याम।
घ्नन्तो वृत्राण्युभयानि शूर राया मदेम बृहता त्वोताः॥
हे बहुजनाहूत इन्द्र देव! हम लोग इन स्तोत्ररूप मित्रतापूर्ण कर्म के द्वारा आपके साथ समुदित शत्रुओं का संहार करें और उनकी अपेक्षा प्रबल हों। हे पराक्रमवान् इन्द्र देव! हम लोग आपके द्वारा रक्षित होकर महान् धन से प्रसन्न होवें।[ऋग्वेद 6.19.13]
Hey Indr Dev worshiped by many! Let us become capable of destroying the enemy by the Strotr like friendship and become mightier than them. Hey mighty Indr Dev! We should be blissful having attained great wealth under your asylum.(12.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (20) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्, विराट्।
द्यौर्न य इन्द्राभि भूमार्यस्तस्थौ रयिः शवसा पृत्सु जनान्।
तं नः सहस्रभरमुर्वरासां दद्धि सूनो सहसो वृत्रतुरम्॥
हे बलपुत्र इन्द्र देव! सूर्य देव जिस प्रकार से अपनी दीप्ति द्वारा पृथ्वी को आक्रान्त करते हैं; उसी प्रकार संग्राम में शत्रुओं को आक्रान्त करने वाला पुत्र रूप धन आप हमें प्रदान करें। जो सहस्रों प्रकार के धन का स्वामी, शस्यपूर्ण भूमि का अधिपति और शत्रुओं का निहन्ता हो।[ऋग्वेद 6.20.1]
आक्रांत :: जिस पर आक्रमण हुआ हो, जिसपर हमला किया गया हो, पराभूत, वशीभूत, अभिभूत, ग्रस्त, सताया हुआ, व्याप्त; infested, beleaguered, attacked, invaded.
Hey son of Bal Indr Dev! Grant us a son who can invade the enemy like the Sun-Sury Dev, who pervade the earth. He should be the owner of thousands kinds of wealth, agricultural land and slayer of the enemy.
दिवो न तुभ्यमन्विन्द्र सत्रासुर्यदेवेभिर्धायि विश्वम्।
अहिं यद्वृत्रमपो वव्रिवांसं हन्नृजीषिन्विष्णुना सचानः॥
हे इन्द्र देव! स्तोताओं ने स्तोत्रों द्वारा सूर्य देव के सदृश आप में वास्तव में समस्त बल अर्पित किया। हे नीरस सोमरस का पान करने वाले इन्द्र देव! आपने श्रीविष्णु के साथ युक्त होकर बल द्वारा जल निरोधक वृत्रासुर का वध किया।[ऋग्वेद 6.20.2]
Hey Indr Dev! The Stotas have filled you with might with the help of Strotrs, like the Sun. Hey drinker of tasteless Somras Indr Dev! You joined Shri Hari Vishnu and eliminated Vratr.
तूर्वन्नोजीयान्तवसस्तवीयान्कृतब्रह्येन्द्रो वृद्धमहाः।
राजाभवन्मधुनः सोम्यस्य विश्वासां यत्पुरां दर्लुमावत्॥
जब इन्द्र देव ने सम्पूर्ण शत्रु पुरियों के विदारक वज्र को प्राप्त किया, तब वे मधुर सोमरस के स्वामी हुए। इन्द्र देव हिंसकों की हिंसा करने वाले अतिशय ओजस्वी, बलवान्, अन्न देने वाले और प्रवृद्ध तेज वाले हैं।[ऋग्वेद 6.20.3]
Indr Dev became the master-owner of Somras when he destroyed all the cities-forts of the enemies with his Vajr. He destroy the violent, radiant, mighty and grants food grains.
शतैरपन्द्रन्पणय इन्द्रात्र दशोणये कवयेऽर्कसातौ।
वधैः शुष्णस्याशुषस्य मायाः पित्वो नारिरेचीत्किं चन प्र॥
हे इन्द्र देव! युद्ध में बहुत अन्न प्रदान करने वाले और आपकी सहायता करने वाले मेधावी कुत्स से भयभीत होकर शत संख्यक सेनाओं के साथ पणि नामक असुर ने पलायन किया। इन्होंने बलशाली शुष्ण नामक असुर की कपटता को आयुध द्वारा नष्ट करके उसके समस्त अन्न को अपहृत कर लिया।[ऋग्वेद 6.20.4]
Hey Indr Dev! Demon Pani became afraid of intelligent Kuts who used to supply food grains in the war and helped you and moved him away with his hundreds of his armies constituting of demons. He destroyed the cunningness of mighty demon Shushn with weapons and snatched his stock of food grains.
महो द्रुहो अप विश्वायु धायि वज्रस्य यत्पतने पादि शुष्णः।
उरु ष सरथं सारथये करिन्द्रः कुत्साय सूर्यस्य सातौ॥
वज्र के गिरने से जब शुष्ण ने प्राण त्यागा, तब महान् द्रोही शुष्ण का सम्पूर्ण बल नष्ट हो गया। इन्द्र देव ने सूर्य देव का संभजन करने के लिए सारथी भूत कुत्स को अपने रथ को विस्तृत करने के लिए कहा।[ऋग्वेद 6.20.5]
Shushn lost his might by the strike of Vajr and died. Indr Dev asked Kuts acting as charioteer to increase the dimensions of his charoite to worship Sury Dev-Sun.
प्र श्येनो न मदिरमंशुमस्मै शिरो दासस्य नमुचेर्मथायन्।
प्रावन्नमींसाप्यं ससन्तं पृणग्राया समिषा सं स्वस्ति॥
इन्द्र देव ने प्राणियों को उपद्रुत करने वाले नमुचि नामक असुर के मस्तक को चूर्ण किया एवं सप के पुत्र निद्रित नमी ऋषि की रक्षा करके उन्हें पशु आदि धन तथा अन्न से युक्त किया। उस समय श्येन पक्षी ने इन्द्र देव के लिए मदकर सोमरस का आनयन किया।[ऋग्वेद 6.20.6]
Indr Dev powdered the head of Namuchi, a demon who used to trouble-torture the humans, protected the Rishi Nidrit son of Sap, provided him with animals & food grains. At that moment Shyen-falcon brought Somras for him.
वि पिप्रोरहिमायस्य दृळ्हाः पुरो वज्रिञ्छवसा न दर्दः।
सुदामन्तद्रेक्णो अप्रमृष्यमृजिश्वने दात्रं दाशुषे दाः॥
हे वज्रधर इन्द्र देव! आपने तुरन्त माया वाले पिप्रु नामक असुर के दृढ़ दुर्गों को बल द्वारा विदीर्ण किया। हे शोभन दान सम्पन्न इन्द्र देव! आपने हव्य रूप धन प्रदान करने वाले राजर्षि ऋजिश्वा को अप्रतिबाध धन प्रदान किया।[ऋग्वेद 6.20.7]
Hey Vajr wielder Indr Dev! You demolished the forts of Piyu demon who was an enchanter, with your might. Hey Indr Dev rich in charity! You granted unlimited wealth to Rajrishi Rajishrawa who used to make offerings in the form of wealth.
स वेतसुं दशमायं दशोणिं तूतुजिमिन्द्रः स्वभिष्टिसुम्नः।
आ तुग्रं शश्वदिभं द्योतनाय मातुर्न सीमुप सृजा इयध्यै॥
मनोवांछित सुख प्रदाता इन्द्र देव ने वेतसु, दशोणि, तूतुजि, तुग्र और इभ नामक असुरों को राजा द्योतन के निकट सर्वदा गमन करने के लिए उसी प्रकार वशीभूत किया, जिस प्रकार से माता पुत्र को वश में करती है।[ऋग्वेद 6.20.8]
Desired comforts-pleasure granting Indr Dev moved the demons Vetsu, Dashoni, Tootuji, Tugr and Ibh to king Dhyotan mesmerising them like the mother who control her son.
स ईं स्पृधो वनते अप्रतीतो बिभ्रद्वज्रं वृत्रहणं गभस्तौ।
तिष्ठद्धरी अध्यस्तेव गर्ते वचोयुजा वहत इन्द्रमृष्वम्॥
शत्रुओं द्वारा नहीं निरस्त होने वाले इन्द्र देव हाथ में शत्रुओं को मारने वाले अपने आयुध को धारित करते हुए स्पर्द्धाकारी वृत्रादि शत्रुओं का विनाश करते हैं। शूर जिस प्रकार से रथ पर आरोहण करता है, उसी प्रकार वे अपने अश्वों पर आरोहण करते हैं। वचनमात्र से पूजित होकर वे दोनों घोड़े महान इन्द्रदेव का वहन करें।[ऋग्वेद 6.20.9]
Indr Dev who is undefeated by the enemies, wield the weapons in his hands for destroying the competing enemies like Vratr. The way a brave person ride his charoite, he rides his horses. The great horses worshiped through words, carry Indr Dev.
सनेम तेऽवसा नव्य इन्द्र प्र पूरवः स्तवन्त एना यज्ञैः।
सप्त यत्पुरः शर्म शारदीर्दर्द्धन्दासीः पुरुकुत्साय शिक्षन्॥
हे इन्द्र देव! आपकी रक्षा के द्वारा हम स्तोतागण नवीन धन के लिए उपासना करते हैं। मनुष्य स्तोतागण इस प्रकार से युक्त यज्ञों के द्वारा आपकी स्तुति करते हैं कि यज्ञ विद्वेषी प्रजाओं की हिंसा करते हुए पुरुकुत्स राजा को धन प्रदान करते हैं। हे इन्द्र देव! आपने शरत् नामक असुर की सात पुरियों को वज्र द्वारा विदीर्ण कर दिया।[ऋग्वेद 6.20.10]
Hey Indr Dev! Protected by you, we the Stotas; request for more wealth. The Stotas worship you by holding of Yagy so that king Purukuts who destroy the cities of envious demons, is granted money. Hey Indr Dev! You destroyed the seven cities-abodes of the demon called Sharat.
त्वं वृध इन्द्र पूर्व्यो भूर्वरिवस्यन्नुशने काव्याय।
परा नववास्त्वमनुदेयं महे पित्रे ददाथ स्वं नपातम्॥
हे इन्द्र देव! धनाभिलाषी होकर आप कवि पुत्र उशना के लिए प्राचीन उपकारक हुए। आपने नववास्त्व नामक असुर का वध किया और क्षमताशाली पिता उशना के निकट उसके देयपुत्र को उपस्थित किया।[ऋग्वेद 6.20.11]
Hey Indr Dev! Desirous of opulence, you helped the son of Kavi named Ushna. You killed the demons Navvastv and went to capable to father Ushna to produce-present his son Dey to him.
त्वं धुनिरिन्द्र धुनिमतीॠणोरपः सीरा न स्रवन्तीः।
प्र यत्समुद्रमति शूर पर्षि पारया तुर्वशं यदुं स्वस्ति॥
हे इन्द्र देव! आप शत्रुओं को कम्पायमान करने वाले हैं। आपने धुनि नामक असुर द्वारा निरुद्ध जल को नदी के सदृश प्रवहणशील बनाया। हे वीर इन्द्र देव! जब आप समुद्र का अतिक्रमण करके उत्तीर्ण होते हैं तब समुद्र के पार में वर्तमान उर्वशी और यदु को समुद्र पार कराते हैं।[ऋग्वेद 6.20.12]
Hey Indr Dev! You make the enemies tremble. You made the blocked water by the demon Dhuni, flow like a river. Hey brave Indr Dev! When you cross the ocean successfully, you help Urvashi and king Yadu to cross the sea.
तव ह त्यदिन्द्र विश्वमाजौ सस्तो धुनीचुमुरी या ह सिष्वप्।
दीदयदित्तुभ्यं सोमेभिः सुन्वन्दभीतिरिध्मभृतिः पक्थ्य१र्कैः॥
हे इन्द्र देव! संग्राम में उस तरह के सब कार्य आपके ही हैं। धुनी और चुमुरी नामक असुरों को आपने संग्राम में मार डाला। हे इन्द्र देव! इसके अनन्तर हव्यपाक करने वाले, ईंधन के भर्ता और आपके निमित्त सोमाभिषव करने वाले राजर्षि दभीति ने हवीरूप अन्न से आपको प्रदीप्त किया।[ऋग्वेद 6.20.13]
Hey Indr! All such deeds in the war are performed by you. You killed the demons Dhuni and Chumuri in the war. Hey Indr Dev! Thereafter, Rajrishi Dabhiti who cooked the offerings, supplied the fuel and extracted Somras for you; glorified you with the food grains & offerings.(14.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (21) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
इमा उ त्वा पुरुतमस्य कारोर्हव्यं वीर हव्या हवन्ते।
धियो रथेष्ठामजरं नवीयो रयिर्विभूतिरीयते वचस्या॥
हे शूर इन्द्र देव! बहुत कार्य की अभिलाषा करने वाले स्तोता भरद्वाज की प्रशंसनीय स्तुतियाँ आपका आह्वान करती हैं। इन्द्र देव रथ पर स्थित जरा रहित और नवीनतर हैं। श्रेष्ठ विभूति इनका अनुगमन करती हैं।[ऋग्वेद 6.21.1]
ऋषि भरद्वाज व्याकरण शास्त्र, धर्म शास्त्र, शिक्षा शास्त्र, राजनीति शास्त्र, अर्थ शास्त्र, धनुर्वेद, आयुर्वेद और भौतिक विज्ञान वेत्ता थे।
ऋषि भरद्वाज ने यन्त्र सर्वस्व नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्म मुनि ने विमानन शास्त्र के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिये विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन है।
Hey brave Indr Dev! Stuties-prayers of Stota Bhardwaj who perform several deeds, invoke you. Indr Dev is free from old age and young. Excellent grandeur follow him.
तमु स्तुष इन्द्रं यो विदानो गिर्वाहसं गीर्भिर्यज्ञवृद्धम्।
यस्य दिवमति मह्ना पृथिव्याः पुरुमायस्य रिरिचे महित्वम्॥
जो सब जानते हैं अथवा जो सभी के द्वारा जाने जाते हैं, जो स्तुतियों द्वारा आवाहनीय है और जो यज्ञ द्वारा प्रवर्द्धमान होते हैं, उन इन्द्र देव का हम स्तवन करते हैं। बहुत प्रज्ञा वाले इन्द्र देव का माहात्म्य द्यावा-पृथ्वी का अतिक्रमण करता है।[ऋग्वेद 6.21.2]
We worship & invoke Indr Dev who knows every thing and is known to everyone, invoked by the recitation of Stuties-sacred hymns and nourished by the Yagy. Blessed with many intelligence-sciences, the glory-significance of Indr Dev is higher than that of the earth & the heavens.
सइत्तमोऽवयुनं ततन्वत्सूर्येण वयुनवच्चकार।
कदा ते मर्ता अमृतस्य धामेयक्षन्तो न मिनन्ति स्वधावः॥
इन्द्र देव ने ही वृत्रासुर द्वारा विस्तीर्ण और अप्रकाशित अन्धकार को सूर्य देव द्वारा प्रकाशित किया। हे बलवान् इन्द्र देव! आप अमरणशील है। मनुष्यगण आपके स्वर्ग नामक स्थान का सर्वदा यजन करना चाहते हैं। वे किसी प्राणी की हिंसा नहीं करते।[ऋग्वेद 6.21.3]
Its Indr Dev who got the vast shroud of darkness removed by Sury Dev-Sun. Hey mighty Indr Dev! You are immortal. The humans always worship your abode, the heaven. You do not harm any one.
यस्ता चकार स कुह स्विदिन्द्रः कमा जनं चरति कासु विक्षु।
कस्ते यज्ञो मनसे शं वराय को अर्क इन्द्र कतमः स होता॥
जिन इन्द्र देव ने उन वृत्र वधादि प्रसिद्ध कार्यों को किया, वे अभी कहाँ वर्तमान हैं, किस देश और किन प्रजाओं के बीच में वर्त्तमान हैं। हे इन्द्र देव! किस तरह का यज्ञ आपके चित्त के लिए सुखकर होता है? आपका वरण करने में किस तरह का मन्त्र समर्थ होता है? आपका वरण करने में जो समर्थ होता है, वह कौन है?[ऋग्वेद 6.21.4]
Where is Indr Dev who killed Vrat etc., now; which abode-country, amongest which people? Hey Indr Dev! What type of Yagy is comfortable to you? What type of Mantr can help us contact-satisfy you? Who is capable of accepting you?
इदा हि ते वेविषतः पुराजाः प्रलास आसुः पुरुकृत्सखायः।
ये मध्यमास उत नूतनास उतावमस्य पुरुहूत बोधि॥
हे बहुत कार्यों को करने वाले इन्द्र देव! पूर्वकाल में उत्पन्न पुरातन अङ्गिरा आदि आज कल के समान कार्य करते हुए आपके स्तोता हुए। मध्यकालीन और नवीन भी आपके स्तोता हुए। इसलिए हे बहुजनाहूत इन्द्र देव! आप मुझ अर्वाचीन की प्रार्थना को श्रवण करें।[ऋग्वेद 6.21.5]
अर्वाचीन :: आधुनिक, नया; modern.
Hey Indr Dev, performer of various-several deeds! During ancient period Angira became your worshiper-Stota. During middle era and the current era too, people became your fans-worshipers. Hence hey Indr dev devoted to the welfare of all humans! Please listen-attend to me a person of the modern-current era my prayers.
तं पृच्छन्तोऽवरासः पराणि प्रत्ना त इन्द्र श्रुत्यानु येमुः।
अर्चामसि वीर ब्रह्मवाहो यादेव विद्म तात्त्वा महान्तम्॥
हे पराक्रमी इन्द्र देव! आज के मनुष्य आपसे पूछते हैं। आपकी अर्चना करते हैं। आपके प्राचीन और उत्कृष्ट महान् कार्यों को प्रार्थना रूप वचनों में बाँधते हैं। आपके जिन कार्यों को हम लोग जानते हैं, उन्हीं से हम लोग आपकी अर्चना करते हैं। आप महान् है।[ऋग्वेद 6.21.6]
Hey mighty Indr Dev! The humans of current era respect, honour, request & pray to you. They sing glory of your past and current deeds. We worship you through your great deeds known to us. You are great-adorable.
अभि त्वा पाजो रक्षसो वि तस्थे महि जज्ञानमभि तत्सु तिष्ठ।
तव प्रत्येन युज्येन सख्या वज्रेण धृष्णो अप ता नुदस्व॥
हे इन्द्र देव! राक्षसों का बल आपके अभिमुख प्रतिष्ठित है। आप भी उस प्रादुर्भूत महान् सम्मुख स्थिर होवें। हे शत्रुओं के धर्षक इन्द्र देव! स्थिर होकर आप अपने वज्र द्वारा उस बल का अपनोदन करें। आपका वज्र पुरातन, योजनीय और नित्य सहायक है।[ऋग्वेद 6.21.7]
Hey Indr Dev! The might of the demons is insignificant and concentrated-projected against you. Face them up, scatter them. Hey valiant destroyer of the enemies, Indr Dev! Stabilize your might with the Vajr, which is your ancient associate-accomplice.
स तु श्रुधीन्द्र नूतनस्य ब्रह्मण्यतो वीर कारुधायः।
त्वं ह्या३पिः प्रदिवि पितॄणां शश्वद्धभूथ सुहव एष्टौ॥
हे स्तोताओं के धारक वीर इन्द्र देव! आप हमारे स्तोत्रों को शीघ्र श्रवण करें। हम आधुनिक और स्तोत्र करने की इच्छा रखने वाले हैं। हे इन्द्र देव! यज्ञ में आप शोभन आह्वान वाले होकर पूर्वकाल में अङ्गिराओं के चिरकाल तक मित्र हुए। इसलिए आप हमारे स्तोत्रों को सुनें।[ऋग्वेद 6.21.8]
Hey supporter-nurturer of the Stotas, Indr Dev! Listen-attend to our Strotr quickly. We are modern and wish to have-recite Strotr (in your honour-dignity). Hey Indr Dev! You became friendly for long with the Angiras and was invoked honourably. Please listen to our Strotr.
प्रोतये वरुणं मित्रमिन्द्रं मरुतः कृष्वावसे नो अद्य।
प्र पूषणं विष्णुमग्निं पुरंधिं सवितारमोषधीः पर्वतांश्च॥
हे भरद्वाज! आप अभी हम लोगों की तृप्ति और रक्षा के लिए राज्याभिमानी वरुण, दिनाभिमानी मित्र, इन्द्र देव, मरुद्गण, पूषा, सर्वव्यापी श्री विष्णु, बहुकर्मकारी अग्नि देव, सभी के प्रेरक सविता, औषधियों के अभिमानी देव और पर्वतों की स्तुति करें।[ऋग्वेद 6.21.9]
Hey Bhardwaj! You should worship for our safety and contentment to Varun Dev, Mitr, Indr Dev, Pusha and all pervading Shri Hari Vishnu, Agni Dev-performer of various deeds the deities of medicines and the mountains.
इम उ त्वा पुरुशाक प्रयज्यो जरितारो अभ्यर्चन्त्यर्कैः।
श्रुधी हवमा हुवतो हुवानो न त्वावाँ अन्यो अमृत त्वदस्ति॥
हे बहुत शक्ति वाले अतिशय यजनीय इन्द्र देव! ये स्तोता लोग अर्चनीय स्तोत्रों के द्वारा आपका स्तवन करते हैं। हे अमरणशील इन्द्र देव! स्तूयमान होकर आप प्रार्थना करने वाले मेरे स्तोत्रों को श्रवण करें; क्योंकि आपके समान कोई दूसरा देव नहीं है।[ऋग्वेद 6.21.10]
Hey mighty and highly worshipable Indr Dev! The Stotas worship you with adorable Strotr. Hey immortal Indr Dev! Become aurous-radiant and listen to my prayers and Strotr, since no other demigod-deity is comparable to you.
नू म आ वाचमुप याहि विद्वान्विश्वेभिः सूनो सहसो यजत्रैः।
ये अग्निजिह्वा ऋतसाप आसुर्ये मनुं चक्रुरुपरं दसाय॥
हे बल पुत्र इन्द्र देव! आप सर्वज्ञ है। आप सम्पूर्ण यजनीय देवों के साथ शीघ्र ही मेरे स्तुति रूप वचन के अभिमुख आगमन करें। जो अग्नि देव देवों की जिह्वा हैं, जो यज्ञ में भोजन करते हैं और जिन्होंने राजर्षि मनु को, नष्ट करने के लिए, शत्रुओं के ऊपर किया, उन्हीं के साथ आगमन करें।[ऋग्वेद 6.21.11]
Hey son of Bal, Indr Dev! You are aware of all activities & events. Invoke quickly with all worshipable demigods-deities to listen to my prayers. Come-invoke with Agni Dev, who is the tongue of the demigods-deities, who dines in the Yagy, who attacked the enemies to protect Rajrishi Manu.
स नो बोधि पुरएता सुगेषूत दुर्गेषु पथिकृद्विदानः।
ये अश्रमास उरवो वहिष्ठास्तेभिर्न इन्द्राभि वक्षि वाजम्॥
हे इन्द्र देव! आप मार्ग निर्माता और विद्वान् है। आप सुख पूर्वक जाने योग्य मार्ग में तथा दुःख से जाने योग्य मार्ग में हम लोगों के अग्रसर होवें। श्रम रहित, महान् और वाहक श्रेष्ठ जो आपके अश्व हैं, उनके द्वारा हे इन्द्र देव! आप हम लोगों के लिए अन्न लावें।[ऋग्वेद 6.21.12]
Hey Indr Dev! You are path finder-innovator. Come forward to lead us through the comfortable and painful routes. Hey Indr Dev! Bring food grains with your great-excellent carrier horses which move without trouble-tiredness.(15.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (22) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
य एक इद्धव्यश्चर्षणीनामिन्द्रं तं गीर्भिरभ्यर्च आभिः।
यः पत्यते वृषभो वृष्ण्यावान्त्सत्यः सत्वा पुरुमायः सहस्वान्॥
जो इन्द्र देव प्रजाओं की आपत्तियों में एक मात्र आह्वान करने के योग्य हैं। जो स्तोताओं के प्रति आगमन करते हैं। जो अभीष्टवर्षक, बलवान्, सत्यवादी, शत्रु पीड़क, बहुप्रज्ञ और अभिभवकर्ता हैं, उन इन्द्र देव का स्तुतियों द्वारा हम स्तवन करते हैं।[ऋग्वेद 6.22.1]
Its only Indr Dev who respond to the invocation of the populace while in trouble, helping the Stotas. He accomplish desires, mighty, truthful, troubles the enemies and defeat them, worshiped by many; is worshiped by us with sacred hymns.
तमु नः पूर्वे पितरो नवग्वाः सप्त विप्रासो अभि वाजयन्तः।
नक्षद्दाभं ततुरिं पर्वतेष्ठामद्रोघवाचं मतिभिः शविष्ठम्॥
पुरातन, नौ महीनों में यज्ञ करने वाले सप्त संख्यक मेधावी, हमारे पिता अङ्गिरा आदि ने इन्द्र देव को बलवान् अथवा अन्नवान् करते हुए स्तुतियों द्वारा उनकी प्रार्थना की। इन्द्र देव गमनशील, शत्रुओं के हिंसक, पर्वतों पर अवस्थिति करने वाले और अनुल्लंघनीय संहारकर्ता हैं।[ऋग्वेद 6.22.2]
Ancient-eternal, performing Yagy for 9 months, blessed with 7 types of intelligence, our father Angira etc. worshiped him & recited Stuties to make him mighty and possessor of food grains. Indr Dev is dynamic, destroyer of the enemy, regulates the mountains and a destroyer who can not be ignored.
तमीमह इन्द्रमस्य रायः पुरुवीरस्य नृवतः पुरुक्षोः।
यो अस्कृधोयुरजरः स्वर्वान्तमा भर हरिवो मादयध्यै॥
बहुत पौत्रों से युक्त, परिचारकों के साथ और पशुओं के साथ हम लोग इन्द्र देव के निकट अविच्छिन्न, अक्षय और सुखदायक धन की याचना करते हैं। हे अश्वों के अधिपति! आप हम लोगों को सुखी करने के लिए यहाँ पधारें।[ऋग्वेद 6.22.3]
Blessed with many grandsons, servants and animals we pray to Indr Dev for continuous, imperishable comfortable wealth. Hey lord of horses! Invoke here for our happiness-pleasure.
तन्नौ वि वोचो यदि ते पुरा चिज्जरितार आनशुः सुम्नमिन्द्र।
कस्ते भागः किं वयो दुध्र खिद्वः पुरुहूत पुरूवसोऽसुरघ्नः॥
हे इन्द्र देव! जब पूर्वकाल में आपके स्तोताओं ने सुख प्राप्त किया, तब हम लोगों को भी वह सुख बतावें। हे दुर्द्धर्ष, शत्रु विजयी, ऐश्वर्यशाली, बहुजनाहूत इन्द्र देव! आप असुरों का वध करने वाले हैं। आपके लिए यज्ञ में कौन-सा भाग और कौन-सा हव्य कम्पित हुआ है?[ऋग्वेद 6.22.4]
Hey Indr Dev! Grant us the pleasure-comforts which you awarded to your worshipers, earlier. Hey invincible, winner of the enemy, possessor of grandeur, worshiped by many, hey Indr Dev! You are the slayer of the demons. Which segment and offerings in the Yagy are meant for you?
तं पृच्छन्ती वज्रहस्तं रथेष्ठामिन्द्रं वेपी वकरी यस्य नू गीः।
तुविग्राभं तुविकूर्मिं रभोदां गातुमिषे नक्षते तुम्रमच्छ॥
यागादि लक्षण कर्म से युक्त और गुणवाचक प्रार्थना करने वाले याजक गण वज्र धारण करने वाले और रथ पर अवस्थिति करने वाले इन्द्र देव की अर्चना करते हैं। इन्द्र देव बहुतों के ग्रहण करने वाले बहुकर्म करने वाले और बल के दाता हैं। वह यजमान सुख प्राप्त करता है और शत्रुओं के अभिमुख गमन करता है।[ऋग्वेद 6.22.5]
The Ritviz possess the traits of Yagy performer, describes the qualities of Indr Dev and pray to him while he rides the charoite. Indr dev perform various deeds-endeavours and grants him might. He gets comforts when he face the enemies under Indr Dev's protection.
अया ह त्यं मायया वावृधानं मनोजुवा स्वतवः पर्वतेन।
अच्युता चिद्वीळिता स्वोजो रुजो वि दृळ्हा धृषता विरप्शिन्॥
हे निज बल से बलवान् इन्द्र देव! आपने मन के सदृश गमन करने वाले और बहुत पर्व वाले वज्र से माया द्वारा प्रवृद्ध उस वृत्रासुर को चूर्ण किया। हे शोभन तेज वाले महान् इन्द्र देव! आपने धर्षक वज्र द्वारा नाश रहित, अशिथिल और दृढ़ पुरियों को नष्ट किया।[ऋग्वेद 6.22.6]
Hey mighty Indr Dev possessing strength of your own! You killed Vrata Sur having the power to enchant, moving with the speed of mind. Hey possessor of beautiful aura great Indr Dev! You destroyed the forts-cities of the demons which were considered imperishable with your sharp Vajr.
तं वो धिया नव्यस्या शविष्ठं प्रत्नं प्रत्नवत्परितंसयध्यै।
स नो वक्षदनिमानः सतहोन्दो विश्वान्यति दर्गहाणि॥
हे इन्द्र देव! हम चिरन्तन ऋषियों के समान नवीन स्तुतियों के द्वारा आपके गौरव को विस्तारित करते हैं। आप अतिशय बलवान् और प्राचीन है। अपरिमाण और शोभन वहनकारी इन्द्र देव! आप हम लोगों की समस्त विघ्नों से रक्षा करें।[ऋग्वेद 6.22.7]
Hey Indr Dev! We extend-spread your glory with the help of new compostions-Strotr. You are too mighty and eternal. Immeasurable performer of great deeds, hey Indr Dev! Protect us from all sorts of evils.
आ जनाय द्रुह्वणे पार्थिवानि दिव्यानि दीपयोऽन्तरिक्षा।
तपा वृषन्विश्वतः शोचिषा तान्ब्रह्मद्विषे शोचय क्षामपश्च॥
हे इन्द्र देव! आप साधु द्रोही राक्षसों के लिए द्यावा-पृथ्वी और अन्तरिक्ष स्थित स्थानों को सन्तप्त करते है। हे कामनाओं के वर्षक इन्द्र देव! आप अपनी दीप्ति द्वारा सभी जगह विद्यमान उन राक्षसों को भस्मीभूत करें। ब्राह्मण द्वेषी राक्षसों को दग्ध करने के लिए पृथ्वी और अन्तरिक्ष को दीप्त करें।[ऋग्वेद 6.22.8]
Hey Indr Dev! You destroy the abodes of the demons present over the earth and space. Hey accomplisher of desires Indr Dev! Destroy-roast, burn the demons with your radiant-aura, at all locations. Lit the earth & space to roast the demons envious of Brahmans.
भुवो जनस्य दिव्यस्य राजा पार्थिवस्य जगतस्त्वेषसंदृक्।
धिष्व वज्रं दक्षिण इन्द्र हस्ते विश्वा अजुर्य दयसे वि मायाः॥
हे दीप्य दर्शन इन्द्र देव! आप देवलोक वासी एवं पृथ्वी लोकवासी सभी लोगों के राजा हैं। हे अतिशय स्तवनीय इन्द्र देव! आप दाहिने हाँथ में वज्र धारित करके असुरों की माया को उच्छिन्न करते हैं।[ऋग्वेद 6.22.9]
Hey glorious-aurous Indr Dev! You are the lord of both earth & heavens. Hey highly adored Indr Dev! You wield the Vajr in your right hand and remove the enchantment-cast of the demons.
आ संयतमिन्द्र णः स्वस्तिं शत्रुतूर्याय बृहतीममृध्राम्।
यया दासान्यार्याणि वृत्रा करो वज्रिन्त्सुतुका नाहुषाणि॥
हे इन्द्र देव! आप हम लोगों को महान्, अहिंसित, संगच्छमान और कल्याणयुक्त सम्पत्ति प्रदान करें, जिससे शत्रुगण वर्षण करने में समर्थ न हों। हे वज्रधर इन्द्रदेव! जिस कल्याण के द्वारा आपने कर्महीन मनुष्यों को कर्मयुक्त बनाया और मनुष्य सम्बन्धी शत्रुओं को शोभन हिंसा से युक्त किया।[ऋग्वेद 6.22.10]
संगच्छमान :: सुव्यवस्थित; well organized-managed.
Hey Indr Dev! Grant us that asset which is great, well organised, can not be attacked-snatched by the enemy, blessed with welfare. Hey wielder of Vajr, Indr Dev! You made the lazy-useless fellow work and hurt the enemies of humans.
स नो नियुद्धिः पुरुहूत वेधो विश्ववाराभिरा गहि प्रयज्यो।
न या अदेवो वरते न देव आभिर्याहि तूयमा मद्र्यद्रिक्॥
हे बहुजनाहूत, विधाता, अतिशय यजनीय इन्द्र देव! आप सभी के द्वारा सम्भजनीय अश्वों के द्वारा हमारे निकट आगमन करें। जिन अश्वों का निवारण देव या असुर कोई भी नहीं करता; उन अश्वों के साथ आप शीघ्र ही हमारे पास पधारें।[ऋग्वेद 6.22.11]
Hey Indr Dev, worshiped by many, highly respected and the creator! Join us riding the respectable horses. Bring those horses to us quickly, which can not be hurt by both demigods-deities and the demons.(16.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (23) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
सुत इत्त्वं निमिश्ल इन्द्र सोमे स्तोमे ब्रह्मणि शस्यमान उक्थे।
यद्वा युक्ताभ्यां मघवन्हरिभ्यां बिभ्रद्वजं बाह्वोरिन्द्र यासि॥
हे इन्द्र देव! सोम के अभिषुत होने पर और महान् स्तोत्र के उच्चार्यमाण होने पर एवं शास्त्र विहित होने पर आप रथ में अपने अश्व को संयुक्त करते हैं। हे धनवान् इन्द्र देव! आप दोनों हाथों में वज्र धारित करके रथ में योजित अश्व द्वय के साथ आगमन करते हैं।[ऋग्वेद 6.23.1]
उच्चार्य :: उच्चारण करने योग्य; pronounced.
Hey Indr Dev! You deploy the horses in your charoite when Somras is extracted & great Strotr are recited as per scriptures. Hey wealthy Indr Dev! You wield Vajr in both hands and deploy the horse duo in the charoite for arrival.
यद्वा दिवि पार्ये सुष्विमिन्द्र वृत्रहत्येऽवसि शूरसातौ।
यद्वा दक्षस्य बिभ्युषो अबिभ्यदरन्धयः शर्धत इन्द्र दस्यून्॥
हे इन्द्र देव! आप स्वर्ग में शूरों द्वारा सम्भजनीय संग्राम में उपस्थित होकर अभिषवकारी याजकगण की रक्षा करते हैं एवं निर्भीक होकर धार्मिक तथा सन्त्रस्त याजकगण के विघ्नकारी असुरों को वशीभूत करते हैं।[ऋग्वेद 6.23.2]
Hey Indr Dev! You being worshiped by the brave-mighty in the heaven; protect the Ritviz who are religious and tortured by the demons.
पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोमं प्रणेनीरुग्रो जरितारमूती।
कर्ता वीराय सुष्वय उ लोकं दाता वसु स्तुवते कीरये चित्॥
इन्द्र देव ही अभिषुत सोमरस के पान कर्ता हैं। भीषण इन्द्र देव स्तवकारी को मार्ग से ले जाते हैं। ये यज्ञ करने में दक्ष तथा सोमाभिषव करने वाले याजकगण को स्थान प्रदान करते हैं एवं स्तोत्र करने वाले को धन प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 6.23.3]
Indr Dev is entitled to drink extracted Somras. He takes the extractor of Somras through the road. He grants money to the Ritviz who are expert in Yagy & extracting Somras
गन्तेयान्ति सवना हरिभ्यां बभ्रिर्वज्रं पपिः सोमं ददिर्गाः।
कर्ता वीरं नर्यं सर्ववीरं श्रोता हवं गृणतः स्तोमवाहाः॥
इन्द्र देव अपने दोनों अश्वों के साथ हृदय स्थानीय तीनों सवनों में गमन करते हैं। इन्द्र देव वज्र धारण करने वाले, अभिषुत सोमरस का पान करने वाले, गोदाता, मनुष्यों के हित के लिए बहुत से पुत्र प्रदान करने वाले और स्तवकारी याजकगण के स्तोत्र को श्रवण करने वाले तथा स्वीकार करने वाले हैं।[ऋग्वेद 6.23.4]
Indr Dev moves during the three segments of the day, dear to his heart, with his two horses. Indr Dev wield Vajr, drink the extracted Somras, donate cows and grant many sons for the benefit of the humans. He accepts-listens the prayers of the Ritviz who recite Strotr.
अस्मै वयं यद्वावान तद्विविष्म इन्द्राय यो नः प्रदिवो अपस्कः।
सुते सोमे स्तुमसि शंसदुक्थेन्द्राय ब्रह्म वर्धनं यथासत्॥
जो प्राचीन इन्द्र देव हम लोगों के लिए पोषणादि कर्म करते हैं, उन्हीं इन्द्र देव के अभिलषित स्तोत्र का हम लोग उच्चारण करते हैं। सोमाभिषुत होने पर हम लोग इनका स्तवन करते हैं। स्तुति का उच्चारण करते हुए हम लोग इनको हविलक्षण अन्न उस प्रकार से देते हैं, जिससे उनका वर्द्धन हो।[ऋग्वेद 6.23.5]
We worship Indr Dev with the suitable Strotr who nourishes-nurture us. We invoke him-pray to him after extracting Somras. On the recitation of Strotr we make offerings to him in the form of food grains for his growth.
ब्रह्माणि हि चकृषे वर्धनानि तावत्त इन्द्र मतिभिर्विविष्मः।
सुते सोमे सुतपाः शान्तमानि रान्द्रया क्रियास्म वक्षणानि यज्ञैः॥
हे इन्द्र देव! जिस तरह के स्तोत्रों को आपने स्वयं बढ़ाया, उस तरह के स्तोत्रों का आपके उद्देश्य से बुद्धि पूर्वक उच्चारण करते हैं। हे अभिषुत सोमरस पान कर्ता इन्द्र देव! आपके उद्देश्य से सोमाभिषव होने पर आपके उद्देश्य से निरतिशय, सुखदायक, कमनीय और हवि से युक्त स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं।[ऋग्वेद 6.23.6]
Hey Indr Dev! We prudently-intelligently recite the Strotr promoted by you. Hey drinker of extracted Somras Indr Dev! We recite the indestructible comfortable, attractive Strotr aided with offerings after extracting Somras.
स नो बोधि पुरोळाशं रराण: पिबातु सोमं गोऋजीकमिन्द्र।
एवं बर्हियजमानस्य सीदोरुं कृधि त्वायत 3 लोकम्॥
हे इन्द्र देव! आनन्दित होकर आप हम लोगों के पुरोडाश को स्वीकार करें। दही आदि से संस्कृत सोमरस को शीघ्र पिवें। सोमरस का पान करने के लिए यजमान द्वारा बिछाए गए कुश के आसन पर आसीन होवें। तदनन्तर आपकी इच्छा करने वाले याजकगण के स्थान को विस्तीर्ण करें।[ऋग्वेद 6.23.7]
Hey Indr Dev! Filled with pleasure, accept our Purodas. Drink the Somras treated with curd, quickly. Occupy the Kush Mat laid for you. Thereafter, extend the space of the Ritviz who invoke you.
स मन्दस्वा ह्यनु जोषमुग्र प्र त्वा यज्ञास इमे अश्नुवन्तु।
प्रेमे हवासः पुरुहूतमस्मे आ त्वेयं धीरवस इन्द्र यम्याः॥
हे उद्यतायुध इन्द्र देव! आप अपनी इच्छा के अनुसार प्रसन्न होवें। यह सोमरस आपको प्राप्त हो। हे बहुजना हूत इन्द्र देव! हमारे स्तोत्र आपको प्राप्त हों। यह प्रार्थना हम लोगों की रक्षा के लिए आपको नियुक्त करें।[ऋग्वेद 6.23.8]
Hey Indr Dev ready for the war! You should be pleased-happy as per your wish. Hey Indr Dev worshiped by many! Let this Somras reach you. Let our prayer appoint-inspire you for our protection.
तं वः सखायः सं यथा सुतेषु सोमेभिरी पुणता भोजमिन्द्रम्।
कुवित्तस्मा असति भरान मिन्द्रो S वसे वृधाति॥
हे स्तोताओं! सोमाभिषव होने पर अन्न दाता इन्द्र देव को सोमरस से तृप्त करें। इन्द्र देव के लिए सोमरस बहुत परिमाण में हो, जिससे वह हम लोगों का पोषण करें। इन्द्र देव अभिवर्षण शील याजकगण को तृप्ति में बाधा नहीं देते।[ऋग्वेद 6.23.9]
Hey Stotas! On Somras being extracted satisfy Indr Dev who grants us food grains, with it. The quantum of Somras should be large so that he can nourish-nurture us. Indr Dev do not block the satisfaction of the Ritviz who are haunted.
एवेदिन्द्रः सुते अस्तावि सोमे भरद्वाजेषु क्षयदिन्मघोनः।
असद्यथा जरित्र उत सूरिरिन्द्रो रायो विश्ववारस्य दाता॥
हविरन्न युक्त यजमान के स्वामी इन्द्र देव सोमरस के निर्मित होने से प्रसन्न होकर धन प्रदान करते हैं। जो स्तोताओं को ज्ञान युक्त करते हैं, ऐसे इन्द्र देव की भरद्वाज ऋषि ने स्तुति की।[ऋग्वेद 6.23.10]
On being satisfied with Somras Indr Dev grants wealth-money to the Ritviz. Indr dev who enlighten the Stotas, was worshiped by Bhardwaj Rishi.(17.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (24) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
वृषा मद इन्द्रे श्लोक उक्था सचा सोमेषु सुतपा ऋजीषी।
अर्चत्र्यो मघवा नृभ्य उक्थैर्द्यक्षो राजा गिरामक्षितोतिः॥
सोमवान् यज्ञ में इन्द्र देव का सोमपान जनित हर्ष याजक गण की कामनाओं का पूरक हों और वैदिकोपासना सहित स्तोत्र अभिलाषा वर्धक हो। अभिषुत सोमरस पान करने वाले, नीरस सोम का भी त्याग नहीं करने वाले धनवान् इन्द्र देव प्रार्थना करने वालों की स्तुतियों द्वारा अर्चनीय होते हैं। द्युलोक निवासी और स्तुतियों के अधिपति इन्द्र देव रक्षक होते हैं।[ऋग्वेद 6.24.1]
Let the Yagy having Som become accomplisher of Ritviz's desires by virtue of the pleasure granted to Indr Dev who drink the Somras. Wealthy Indr Dev, who drink tasteless Somras, is worshiped with Stuties. The resident of heavens and the lord of Stuties Indr Dev, be our protector.
ततुरिर्वीरो नर्यो विचेताः श्रोता हवं गृणत उर्व्यूतिः।
वसुः शंसो नरां कारुधाया वाजी स्तुतो विदथे दाति वाजम्॥
शत्रुओं के हिंसक, विक्रमवान् मनुष्यों के हितकर्ता, विवेकशील, हम लोगों के स्तोत्र को सुनने वाले, स्तोताओं के अतिशय रक्षक, गृह प्रदाता, स्तोताओं द्वारा प्रशंसनीय, स्तोताओं के धारक यज्ञ में स्तूयमान होने पर हम लोगों को अन्न प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 6.24.2]
Destroyer of the enemies, well wisher of mighty prudent humans, responding to our prayers, extremely protective of the Ritviz, residence awarding, praise worthy Indr Dev grant us food grains.
अक्षो न चक्रयोः शूर बृ॒हन्प्र ते मह्ना रिरिचे रोदस्योः।
वृक्षस्य नु ते पुरुहूत वया व्यू३ तयो रुरुहुरिन्द्र पूर्वीः॥
हे विक्रान्त इन्द्र देव! चक्र द्वय के अक्ष के समान आपकी बृहत् महिमा द्यावा-पृथ्वी को अतिक्रान्त करती है। हे बहुजनाहूत! वृक्ष की शाखाओं के सदृश आपका रक्षण कार्य वर्द्धमान होता है।[ऋग्वेद 6.24.3]
विक्रांत :: प्रतापी, तेजस्वी, बहादुर, वीर, शेर, साहस, हिम्मत; mighty, valiant.
Hey valiant Indr Dev worshiped by many! Your glory pervade the heaven & earth like the excel of the two wheels. Your protective measures grow-increase like the branches of the tree.
शचीवतस्ते पुरुशाक शाका गवामिव स्रुतयः सञ्चरणीः।
वत्सानां न तन्तयस्त इन्द्र दामन्वन्तो अदामानः सुदामन्॥
हे बहुकर्मा इन्द्र देव! आप प्रज्ञावान् है। आपकी शक्तियाँ उसी प्रकार से सभी जगह विचरण करती है, जिस प्रकार गौओं के मार्ग सर्वत्र सञ्चारी होते हैं। हे शोभनदान वाले इन्द्र देव! बछड़ों को बाँधने वाली डोरियों की तरह आपकी शक्तियाँ स्वयं अनिरुद्ध होकर बहुत से शत्रुओं को बन्धन युक्त करती है।[ऋग्वेद 6.24.4]
अनिरुद्ध :: असीम, अजेय, विजयी, निर्विरोध, जो निरुद्ध या रुका हुआ न हो, जिसमें कोई रुकावट न हो, स्वेच्छाचारी, भगवान् श्री कृष्ण के पौत्र और प्रद्युम्न जी के पुत्र जिन्हें ऊषा ब्याही थी, शिव, गुप्तचर-जासूस, विष्णु; unblocked, unopposed, unlimited, boundless, unstoppable, victorious, an incarnation of Bhagwan Shri Hari Vishnu, uncontrolled, unrestrained, without obstacles, name of grandson of Bhagwan Shri Krashn.
Hey performer of various deeds! You are intelligent. Your powers pervade all places like the routes of the cows. Hey granter of excellent donations! You tie the enemies like the cord which tie the calf unblocked-unopposed.
अन्यदद्य कर्वरमन्यदु श्वोऽसच्च सन्मुहुराचक्रिरिन्द्रः।
मित्रो नो अत्र वरुणश्च पूषार्यो वशस्य पर्येतास्ति॥
इन्द्र देव आज एक काम करते हैं, तो दूसरे दिन इससे कुछ विलक्षण ही कार्य करते हैं। वे पुनः-पुनः सत् और असत् कार्यों का अनुष्ठान करते हैं। इन्द्र देव, मित्र, वरुण, पूषा, सविता इस यज्ञ में हम लोगों की कामनाओं के पूरक हों।[ऋग्वेद 6.24.5]
Indr Dev perform one deed today and tomorrow he will do something amazing. He repeatedly under take Sat & Asat endeavours. Let Indr Dev, Mitr, Varun, Pusha, Savita accomplish our desires in this Yagy.
वि त्वदापो न पर्वतस्य पृष्ठादुक्थेभिरिन्द्रानयन्त यज्ञैः।
तं त्वाभिः सुष्टुतिभिर्वाजयन्त आजिं न जग्मुर्गिर्वाहो अश्वाः॥
हे इन्द्र देव! आपके पास से शस्त्र और हवि के द्वारा स्तोता लोग अपनी कामनाओं को प्राप्त करते हैं, जिस प्रकार से पर्वत के उपरि भाग से जल प्राप्त होता है। हे स्तुतियों द्वारा वन्दनीय इन्द्र देव! अश्वगण जिस प्रकार से वेगपूर्वक संग्राम में उपस्थित होते हैं, उसी प्रकार प्रार्थना करने वाले अन्नाभिलाषी भरद्वाज आदि स्तुतियों के साथ आपके पास आगमन करते हैं।[ऋग्वेद 6.24.6]
Hey Indr Dev! The Stotas accomplish their desires by virtue of weapons and offerings, just like the water obtained from the peaks of mountains. Hey Indr Dev worshiped with Stuties! The manner in which the horses quickly reach the battle field, desirous of food grains Rishis like Bhardwaj reach you with Stuties.
न यं जरन्ति शरदो न मासा न द्याव इन्द्रमवकर्शयन्ति।
वृद्धस्य चिद्वर्धतामस्य तनूः स्तोमेभिरुक्थैश्च शस्यमाना॥
संवत्सर और मास आदि जिस इन्द्र देव को वृद्ध नहीं बना सकते; दिवस जिस इन्द्र को अल्प नहीं बना सकते, उस प्रवर्द्धमान इन्द्र देव का शरीर हम लोगों की स्तुतियों द्वारा स्तूयमान होकर विकसित हो।[ऋग्वेद 6.24.7]
Let the body of Indr Dev become praise worthy & grow by virtue of our prayers, just like the various era of time (Samvatsar & Months) can not grow-make him old.
न वीळवे नमते न स्थिराय न शर्धते दस्युजूताय स्तवान्।
अज्रा इन्द्रस्य गिरयश्चिदृष्वा गम्भीरे चिद्भवति गाधमस्मै॥
हम लोगों की प्रार्थना द्वारा स्तूयमान इन्द्र देव दृढ़गात्र, संग्राम में अविचलित और दस्युओं द्वारा उत्साहित तथा प्रेरित याजकगण के वशीभूत नहीं होते। अर्थात् यद्यपि स्तोता बहुत गुण वाले हैं; तथापि इन्द्रदेव दस्यु सहित स्तोता के वशीभूत नहीं होते। महान् पर्वत भी इनके लिए सुगम है और अगाध स्थान भी इनके लिए सहज हो जाते हैं।[ऋग्वेद 6.24.8]
दृढ़गात्र :: दृढ़, दृढ़ पकड़ वाला, चिपचिपा; firm, strong, steadfast, tenacious, resolute, determined, clingy, sticky, viscous, gummy, tacky, glutinous.
By virtue of prayers praise worthy tenacious Indr Dev remain unperturbed unharmed-controlled by the dacoits and inspired by the Ritviz. Great mountains & difficult terrines are normal for him.
गम्भीरेण न उरुणामत्रिन्प्रेषो यन्थि सुतपावन्वाजान्।
स्था ऊ षु ऊर्ध्व ऊती अरिषण्यन्नक्तोर्व्युष्टौ परितक्म्यायाम्॥
हे बलवान् और सोमपान कर्ता इन्द्र देव! आप किसी के द्वारा भी गम्भीर और उदार चित्त से हम लोगों को अन्न और बल प्रदान करें। हे इन्द्र देव! आप दिन-रात हम लोगों की रक्षा के लिए तत्पर होवें।[ऋग्वेद 6.24.9]
Hey mighty and drinker of Somras, Indr Dev! Grant us might & food grains liberally; ready to protect us during the day & night.
सचस्व नायमवसे अभीक इतो वा तमिन्द्र पाहि रिषः।
अमा चैनमरण्ये पाहि रिषो मदेम शतहिमाः सुवीराः॥
हे इन्द्र देव! आप संग्राम में स्तुति कर्ता की रक्षा के लिए उनका रक्षण करें। निकटस्थ या दूरस्थ शत्रुओं से उनकी रक्षा करें। घर में अथवा कानन में रिपुओं से उनकी रक्षा करें। शोभन पुत्र वाले होकर हम लोग सौ वर्षों तक प्रमुदित होवें।[ऋग्वेद 6.24.10]
Hey Indr Dev! Protect the worshiper during the war from far or near enemies, house or forests. Let us survive for hundred years blessed with sons & grandsons.(18.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (25) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
या त ऊतिरवमा या परमा या मध्यमेन्द्र शुष्मिन्नस्ति।
ताभिरू षु वृत्रहत्येऽवीर्न एभिश्च वाजैर्महान्न उग्र॥
हे बलवान इन्द्र देव! आप युद्ध में हम लोगों की अधम, उत्तम और मध्यम सब प्रकार की रक्षा द्वारा भली-भाँति से पालन करें। हे भीषण इन्द्र देव! आप महान् हैं। आप हम लोगों को भोज्य साधन द्वारा अन्नों से युक्त करें।[ऋग्वेद 6.25.1]
Hey mighty &furious Indr Dev! You protect us by all means in the war. You are great. Grant us eatables and food grains.
आभिः स्पृधो मिथतीररिषण्यन्नमित्रस्य व्यथया मन्युमिन्द्र।
आभिर्विश्वा अभियुजो विषूचीरार्याय विशोऽव तारीर्दासीः॥
हे इन्द्र देव! आप हमारी स्तुतियों से शत्रु सेनाओं को नष्ट करने वाली हमारी सेना की हुए संग्राम में विद्यमान शत्रु के क्रोध को विनष्ट करें। यज्ञादि कार्य करने वाले याजक गण के लिए आप कार्यों को विनष्ट करने वाली सम्पूर्ण प्रजाओं को स्तुतियों द्वारा विनष्ट करें।[ऋग्वेद 6.25.2]
Hey Indr Dev! Our prayers make our army capable of destroying-defeating the enemy army. Calm down the anger of the enemy army in the war. Destroy all such people, who obstruct the activities like Yagy by the Ritviz.
इन्द्र जामय उत येऽजामयोऽर्वाचीनासो वनुषो युयुज्रे।
त्वमेषां विथुरा शवांसि जहि वृष्ण्यानि कृणुही पराचः॥
हे इन्द्र देव! ज्ञातिरूप निकटस्थ अथवा दूर देश स्थित जो शत्रु हमारे सम्मुख न होकर हिंसा के लिए उद्यत होते हैं, उन दोनों प्रकार के शत्रुओं बल को आप नष्ट करें। इनके वीर्यों को नष्ट करें और इन्हें पराजित करें।[ऋग्वेद 6.25.3]
ज्ञाति :: एक ही गोत्र या वंश में उत्पन्न मनुष्य, गोती; born in the same clan, dynasty.
Hey Indr Dev! Destroy all such enemies, close or distant, bent upon violence, related to us (born in the same clan, dynasty) with your might-power. Destroy their energy-fertility and defeat them.
शूरो वा शूरं वनते शरीरैस्तनूरुचा तरुषि यत्कृण्वैते।
तोके वा गोषु तनये यदप्सु वि क्रन्दसी उर्वरासु ब्रवैते॥
हे इन्द्र देव! आपके द्वारा अनुगृहीत वीर अपने शरीर से शत्रु वीरों को विनष्ट करता है, जबकि वे दोनों परस्पर विरोधी, शोभित शरीर से संग्राम में प्रवृत्त होते हैं। जबकि वे पुत्र, पौत्र, गौ, जल और उर्वरा के लिए शोर मचाते हुए विवाद करते हैं।[ऋग्वेद 6.25.4]
विवाद :: तर्क, तकरार, कलह, शास्रार्थ, झगड़ा, मतभेद, तकरार, विचार, झमेला; dispute, argue, quarrel, controversy, contention.
Hey Indr Dev! The brave person obliged by you destroy the enemy with his body, when they both are mutually opposite intend to take part in the war. They argue-quarrel over sons, grandsons, cows, water and fertilisers making noise.
नहि त्वा शूरो न तुरो न धृष्णुर्न त्वा योधो मन्यमानो युयोध।
इन्द्र नकिष्ट्वा प्रत्यस्त्येषां विश्वा जातान्यभ्यसि तानि॥
हे इन्द्र देव! विक्रान्त जन, शत्रु निहन्ता, विजयी और युद्ध में प्रकुपित योद्धा आपके साथ युद्ध करने में समर्थ नहीं होता। हे इन्द्र देव! इनके बीच में कोई भी आपका प्रतिद्वन्द्वी नहीं है। आप इन व्यक्तियों की अपेक्षा श्रेष्ठ योद्धा है।[ऋग्वेद 6.25.5]
Hey Indr Dev! The winner, destroyer of the enemy, winner and the furious warrior are unable to face you in the war. Hey Indr Dev! None of these is your rival. You are much superior fighter than these people.
स पत्यत उभयोर्नृम्णमयोर्यदी वेधसः समिथे हवन्ते।
वृत्रे वा महो नृवति क्षये यदि विंतन्तसैते॥
महान् शत्रुओं का विरोध करने के लिए अथवा परिचारकों से युक्त घर के लिए जो व्यक्ति परस्पर युद्ध करते हैं, उन दोनों के बीच में वही जन, धन-लाभ करता है, जिसके यज्ञ में ऋत्विक लोग इन्द्र देव का हवन करते हैं।[ऋग्वेद 6.25.6]
Only that rival wins in the war, who is supported by the Ritviz in the Yagy or performing Hawan for Indr Dev, opposing the great enemy or blessed with servants and house.
अध स्मा ते चर्षणयो यदेजानिन्द्र त्रातोत भवा वरूता।
अस्माकासो ये नृतमासो अर्य इन्द्र सूरयो दधिरे पुरो नः॥
हे इन्द्र देव! जब आपके पुरुष (स्तोता) कम्पित होते हैं। तब आप उनके पालक होवें। उनके रक्षक होवें। हे इन्द्र देव! हमारे जो नेतृतम पुरुष आपको प्राप्त करने वाले होते हैं, आप उनके त्राता होवें। हे इन्द्र देव! जिन स्तोताओं ने हमें पुरोभाग में स्थापित किया है, आप उन सबकी रक्षा करें।[ऋग्वेद 6.25.7]
Hey Indr Dev! Support-protect your Stota-worshiper when they tremble with fear. Hey Indr Dev! Protect our top leaders and those who appointed us in the front line.
अनु ते दायि मह इन्द्रियाय सत्रा ते विश्वमनु वृत्रहत्ये।
अनु क्षत्रमनु सहो यजत्रेन्द्र देवेभिरनु ते नृषह्ये॥
हे इन्द्र देव! आप महान् है। शत्रुवध के लिए आपमें समस्त शक्ति एकत्रित हुई है। हे यजनीय इन्द्र देव! युद्ध में समस्त देवों ने आपको शत्रुओं को अभिभूत करने वाला बल और विश्वधारक प्रदान किया।[ऋग्वेद 6.25.8]
Hey Indr Dev! You are great. You have concentrated all powers in you to kill the enemy. All demigods-deities granted you the might which can control the enemy and support the universe.
एवा नः स्पृधः समजा समत्स्विन्द्र रारन्थि मिथतीरदेवीः।
विद्याम वस्तोरवसा गृणन्तो भरद्वाजा उत त इन्द्र नूनम्॥
हे इन्द्र देव! इस प्रकार से प्रार्थित होकर आप युद्ध में हम लोगों को शत्रुओं को मारने के लिए प्रोत्साहित करें और प्रेरित करें। आप हम लोगों के लिए हिंसा करने वाली असुर सेना को पराजित करें। हे इन्द्र देव! आपकी प्रार्थना करने वाले हम भरद्वाज अन्न के साथ अवश्य ही निवास प्राप्त करें।[ऋग्वेद 6.25.9]
Indr Dev! On being worship-prayed, inspire-encourage us to eliminate the enemy in the war. For our sake defeat the demon's army which torture us. Hey Indr Dev! Let Bhardwaj Rishi who worship-pray you, attain food grains and residence.(19.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (26) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
श्रुधी न इन्द्र ह्वयामसि त्वा महो वाजस्य सातौ वावृषाणाः।
सं यद्विशोऽयन्त शूरसाता उग्रं नोऽवः पार्ये अहन्दाः॥
हे इन्द्र देव! हम स्तोता लोग अन्न लाभ करने के लिए सोमरस के द्वारा आपका सिंचन करते हुए आपका ही आह्वान करते हैं। आप हम लोगों के आह्वान को श्रवण करें। जब मनुष्य लोग युद्ध के लिए गमन करेंगे, तब आप हम लोगों की भली-भाँति से रक्षा करना।[ऋग्वेद 6.26.1]
Hey Indr Dev! We the Stota offer you Somras and invoke you for the sake of food grains. Listen-respond to us. Protect us carefully when we move-march for war.
त्वां वाजी हवते वाजिनेयो महो वाजस्य गध्यस्य सातौ।
त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं तरुत्रं त्वां चष्टे मुष्टिहा गोषु युध्यन्॥
हे इन्द्र देव! सभी के द्वारा प्रापणीय और महान अन्न लाभ करने के लिए वाजिनी पुत्र भरद्वाज अन्नवान होकर आपका स्तवन करते हैं। हे इन्द्र देव! आप सज्जनों के पालक और दुर्जनों के नाशक है। उपद्रुत होने पर भरद्वाज आपका आह्वान करते हैं। वे मुष्टि बल द्वारा शत्रुओं को विनष्ट करने वाले हैं। जब वे गौओं के लिए युद्ध करते हैं, तब आपके ऊपर निर्भर रहते हैं।[ऋग्वेद 6.26.2]
उपद्रुत :: उपद्रव ग्रस्त, जहाँ या जिस स्थान पर उपद्रव हुआ हो, ज्योतिष के अनुसार ग्रहण युक्त, जो किसी प्रकार के उपद्रव से पीड़ित हो, सताया हुआ; deuce, disturbance, disorder, brawl, outrage, tyranny, riot, row.
Hey Indr Dev! Son of Vajini Bhardwaj, worship you for food grains, for all. We nurture the virtuous and kill the wicked. Rishi Bhardwaj invoke you in case of disorder. He kill the enemies with the strike of his fist. He depend upon you, when he fights for the protection of cows.
त्वं कविं चोदयोऽर्कसातौ त्वं कुत्साय शुष्णं दाशुषे वर्क्।
त्वं शिरो अमर्मणः पराहन्नतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन्॥
हे इन्द्र देव! अन्न लाभ करने के लिए आप भार्गव ऋषि को प्रेरित करें। हव्य दाता कुत्स के लिए आपने शुष्ण असुर का संहार किया। आपने अतिथिग्व को सुखी करने के लिए शम्बरासुर का शिरच्छेदन किया। वह अपने को अमर मानता था।[ऋग्वेद 6.26.3]
Hey Indr Dev! Inspire Rishi Bhargav for food grains. You killed Shushn demon for Kuts who used to make offerings for you. You chopped the head of Shambrasur for the sake-safety of Atithigavy. Shambrasur considered himself immortal.
त्वं रथं प्र भरो योधमृष्वमावो युध्यन्तं वृषभं दशद्युम्।
त्वं तुग्रं वेतसवे सचाहन्त्वं तुजं गृणन्तमिन्द्र तूतोः॥
हे इन्द्र देव! आपने वृषभ नामक राजा को युद्ध साधन महान रथ प्रदान किया। जब वे शत्रुओं के साथ दस दिनों तक युद्ध कर रहे थे, तब आपने उनकी रक्षा की। वेतसु राजा के सहायक होकर आपने तुग्रासुर को मारा। आपने स्तव कर्ता तुजि राजा की समृद्धि को बढ़ाया।[ऋग्वेद 6.26.4]
Hey Indr Dev! You gave-granted a great-marvellous charoite to the king Vrashabh. You protected him when he was busy in the ten days war. You helped king Vetsu and killed Tragasur. You enhanced the prosperity of king Tuji who worshiped you.
त्वं तदुक्थमिन्द्र बर्हणा कः प्र यच्छता सहस्रा शूर दर्षि।
अव गिरेर्दासं शम्बरं हन्प्रावो दिवोदासं चित्राभिरूती॥
हे इन्द्र देव! आप शत्रु निहन्ता है। आपने प्रशंसनीय कार्यों का संपादन किया; क्योंकि हे वीर इन्द्र देव! आपने शत-शत और सहस्र-सहस्र शम्बर सेनाओं को विदीर्ण किया। आपने पर्वत से निर्गत, यज्ञादि कार्यों के विघातक शम्बरासुर का वध किया। विचित्र रक्षा द्वारा आपने दिवोदास की रक्षा की।[ऋग्वेद 6.26.5]
Hey Indr Dev! you are the slayer of the enemy. You accomplished praise worthy-appreciable deeds and destroyed thousands of army units of Shambar demon who used to create disturbances in Yagy. You protected Divodas through wonderful-amazing means.
त्वं श्रद्धाभिर्मन्दसानः सोमैर्दभीतये चुमुरिमिन्द्र सिष्वप्।
त्वं रजिं पिठीनसे दशस्यन्यष्टिं सहस्रा शच्या सचाहन्॥
हे इन्द्र देव! श्रद्धापूर्वक अनुष्ठित कार्यों द्वारा और सोमरस द्वारा प्रसन्न होकर आपने दभीति राजा के लिए चुमुरि नामक असुर का वध किया। हे इन्द्र देव! आपने पिठीनस को रजि नामक कन्या या राज्य प्रदान किया। आपने बुद्धि से साठ हजार योद्धाओं को युद्ध में मार डाला।[ऋग्वेद 6.26.6]
Hey Indr Dev! You killed demon Chamuri for the sake of king Dabhiti who pleased you with Somras and virtuous deeds faithfully-honourably. You granted Pithinas a girl called Raji and kingdom. You used brain-prudence to kill sixty thousand soldiers.
अहं चन तत्सूरिभिरानश्यां तव ज्याय इन्द्र सुम्नमोजः।
त्वया यत्स्तवन्ते सधवीर वीरास्त्रिवरूथेन नहुषा शविष्ठ॥
हे वीरों के साथी बलवत्तम इन्द्र देव! आप त्रिभुवनों के रक्षक और शत्रु विजयी हैं। स्तोता लोग आपके द्वारा प्रदत्त सुख और बल की प्रार्थना करते हैं। हे इन्द्र देव! हम भरद्वाज आपके द्वारा प्रदत्त उत्कृष्ट सुख और बल को अपने स्तोताओं के साथ प्राप्त करें।[ऋग्वेद 6.26.7]
Accomplice of the great brave, Indr Dev! You are the protector of the three abodes and winner of the enemy. The Stotas request you comforts and might. Let us have the excellent comforts-pleasures & might through Bhardwaj Rishi alongwith our Stotas.
वयं ते अस्यामिन्द्र द्युम्नहूतौ सखायः स्याम महिन प्रेष्ठाः।
प्रातर्दनिः क्षत्रश्रीरस्तु श्रेष्ठो घने वृत्राणां सनये धनानाम्॥
हे पूजनीय इन्द्र देव! हम लोग आपके मित्र भूत और स्तोता हैं। धन लाभार्थ किए गये इन स्तोत्रों द्वारा हम लोग आपके निरतिशय प्रीति भाजन हों। प्रातर्दन के पुत्र हमारे राजा क्षत्र श्री शत्रुओं का वध और धन-लाभ करके सबसे उत्कृष्ट हों।[ऋग्वेद 6.26.8]
Hey worshipable Indr Dev! We are your old-close friends and Stota. Let us have your affection & love & gain wealth through the recitation of these Strotr. Let our king Kshtr son of Pratardan, kill the enemies and gain wealth to become excellent.(20.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (27) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
किमस्य मदे किम्वस्य पीताविन्द्रः किमस्य सख्ये चकार।
रणा वा ये निषदि किं ते अस्य पुरा विविद्रे किमु नूतनासः॥
सोमरस से प्रसन्न होकर इन्द्र देव ने क्या किया? इस सोमरस को पान करके क्या किया? इस सोमरस के साथ मैत्री करके उन्होंने क्या किया? पुरातन और आधुनिक स्तोताओं ने सोमगृह में आपसे क्या प्राप्त किया?[ऋग्वेद 6.27.1]
What was done by Indr Dev on being pleased by drinking Somras? What he did after drinking Somras? What was the result of his friendship with Somras? What did the old & new Stotas get from Indr Dev in the house of Somras?
सदस्य मदे सद्वस्य पीताविन्द्रः सदस्य सख्ये चकार।
रणा वा ये निषदि सत्ते अस्य पुरा विविद्रे सदु नूतनासः॥
सोमरस के पान से प्रसन्न होकर इन्द्र देव ने सुन्दर (शोभन) कार्यों को किया। सोमरस का पान करके उन्होंने सुन्दर कर्म किए। इसके साथ उन्होंने शुभ कार्य किए। जो प्राचीन और नवीन स्तुति करने वाले हैं, उन्होंने आपके द्वारा सत्कार्य ही प्राप्त किया।[ऋग्वेद 6.27.2]
Indr Dev did many new tasks on being pleased by drinking Somras. He performed virtuous deeds on drinking Somras. He did auspicious deeds. The old and new Stotas got virtuous, righteous, auspicious deeds through Indr Dev.
नहि नु ते महिमनः समस्य न मघवन् मघवत्त्वस्य विद्म।
न राधसोराधसो नूतनस्येन्द्र नकिर्ददृश इन्द्रियं ते॥
हे धनवान इन्द्र देव! आपके समान दूसरे की महिमा हमें अवगत नहीं है। आपके सदृश धनवान और धन भी हमें अवगत नहीं। हे इन्द्र देव! आपके समान कोई भी सामर्थ्य नहीं दिखा सकता।[ऋग्वेद 6.27.3]
Hey Indr Dev! Your grandeur is unique. We never found one wealthy like you. None can show his capability-might like you.
एतत्त्यत्त इन्द्रियमचेति येनावधीर्वरशिखस्य शेषः।
वज्रस्य यत्ते निहतस्य शुष्मात्स्वनाच्चिदिन्द्र परमो ददार॥
हे इन्द्र देव! आपने जिस वीर्य द्वारा वरशिख नामक असुर के पुत्रों का संहार किया, आपका वह पराक्रम हम लोगों को ज्ञात नहीं है। हे इन्द्र देव! बलपूर्वक निक्षिप्त आपके वज्र के शब्द से ही बलिष्ठतम वरशिख के पुत्र विदीर्ण हो गए।[ऋग्वेद 6.27.4]
Hey Indr Dev! We are unaware of your might and valour with which you killed the sons of demon Varshikh. Hey Indr Dev! When you launched the Vajr powerfully, sons of the mightiest Varshikh were killed.
वधीदिन्द्रो वरशिखस्य शेषोऽभ्यावर्तिने चायमानाय शिक्षन्।
वृचीवतो यद्धरियूपीयायां हन्पूर्वे अर्धे भियसापरो दर्त्॥
इन्द्र देव ने चायमान राजा के अभ्यवर्ती नामक पुत्र को अभिलषित धन देते हुए वरशिख नामक असुर के पुत्रों का संहार किया। हरियूपिया नामक नदी या नगरी के पूर्व भाग में अवस्थित वरशिख के गोत्रोत्पन्न वृचीवान् के पुत्रों का इन्होंने वध किया। तब अपर भाग में अवस्थित वरशिख के श्रेष्ठपुत्र भयभीत हो गए।[ऋग्वेद 6.27.5]
Indr Dev granted desired wealth to Abhyvarti, son of king Chayman and killed the sons of Varshikh the demon. He killed the people born in the clan of Varshikh living in the city over the bank of river Hariyupiya. The sons of Varshikh living in the upper segment were gripped with fear.
त्रिंशच्छतं वर्मिण इन्द्र साकं यव्यावत्यां पुरुहूत श्रवस्या।
वृचीवन्तः शरवे पत्यमानाः पात्रा भिन्दानान्यर्थान्यायन्॥
हे बहुजनाहूत इन्द्र देव! युद्ध में आपको जीतकर अन्न अथवा यश प्राप्त करें ऐसी कामना करने वाले, यज्ञ पात्रों का भञ्जन करने वाले और कवच धारित करने वाले वरशिख के एक सौ तीस पुत्र यव्यावती के निकट आगमन करके एक काल में ही विनष्ट हो गए।[ऋग्वेद 6.27.6]
Hey Indr Dev, worshipped by many people! One hundred and thirty sons of Varshikh who used to destroy vessels used for Yagy & who wanted-wished to win you, have-attain food grains and glory-fame, wearing shields were destroyed in a single moment by you.
यस्य गावावरुषा सूयवस्यू अन्तरू षु चरतो रेरिहाणा।
स सृञ्जयाय तुर्वशं परादाद् वृचीवतो दैववाताय शिक्षन्॥
जिनके रोचमान, शोभन तृणाभिलाषी पुनः-पुनः घास का आस्वादन करने वाले अश्वगण द्यावा-पृथ्वी के बीच भाग में भ्रमण करते हैं; उन्हीं इन्द्र देव ने वृचीवान के पुत्र दैववात को प्रसन्न करते हुए तुर्वश (राजा) को सृञ्जय के अधीन कर दिया।[ऋग्वेद 6.27.7]
Indr Dev who's beautiful & shining horses enjoy the grass roaming between the earth & heavens; placed king Turvash under Sranjay to please Daevvat, son of Vrachiwan.
द्वयाँ अग्ने रथिनो विंशतिं गा वधूमतो मघवा मह्यं सम्राट्।
अभ्यावर्ती चायमानो ददाति दूणाशेयं दक्षिणा पार्थवानाम्॥
हे अग्नि देव! अतिशय धन देने वाले और राजसूय यज्ञ करने वाले चयमान के पुत्र राजा अभ्यवर्त्ती ने हमें स्त्रियों से युक्त रथ और बीस गौएँ प्रदान की। पृथु के वंशधर राजा अभ्यवर्ती की यह दक्षिणा अनश्वर है।[ऋग्वेद 6.27.8]
Hey Agni Dev! Highly donating and performer of Rajsuy Yagy Abhyvarti, son of king of Chayman granted us charoite with women and twenty cows. The donation-Dakshina by Abhyvarti, a descendent of king Prathu is imperishable.(21.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (28) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- गौ, इन्द्र; छन्द :-त्रिष्टुप्, जगती, अनुष्टुप्।
आ गावो अग्मन्नुत भद्रमक्रन्त्सीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्वस्मे।
प्रजावतीः पुरुरूपा इह स्युरिन्द्राय पूर्वीरुषसो दुहानाः॥
गौएँ हमारे घर आवें और हमारा कल्याण करें। वे हमारे गोष्ठ में उपवेशन करें और हमारे ऊपर प्रसन्न हों। इस गोष्ठ में नाना वर्ण वाली गौएँ सन्तति सम्पन्न होकर प्रात: काल में इन्द्र देव के लिए दुग्ध प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.28.1]
Let cows come to our house and resort to our welfare. They should reside in our cow shed and become happy with us. Cows of different colours should have progeny and yield milk for Indr Dev in the morning.
इन्द्रो यजने पृणते च शिक्षत्युपेद्ददाति न स्वं मुषायति।
भूयोभूयो रयिमिदस्य वर्धयन्नभिन्ने खिह्ये नि दधाति देवयुम्॥
इन्द्र देव यज्ञ करने वाले और प्रार्थना करने वाले को अपेक्षित धन प्रदान करते हैं। वे उन्हें सर्वदा धन प्रदान करते हैं और उनके स्वकीय धन को कभी नहीं लेते। वे निरन्तर उनके धन को बढ़ाते हैं और उन इन्द्राभिलाषी को शत्रुओं के द्वारा सुरक्षित स्थान में स्थापित करते हैं।[ऋग्वेद 6.28.2]
Indr Dev grants wealth to the doer of Yagy and his worshipers. He just keep on granting them money and do not take their wealth. He continuously increase their wealth and keep them at safe place.
न ता नशन्ति न दभाति तस्करो नासामामित्रो व्यथिरा दधर्षति।
देवाँश्च याभिर्यजते ददाति च ज्योगित्ताभिः सचते गोपतिः सह॥
गौएँ हमारे समीप से नष्ट न हों। चोर हमारी गौओं को न चुरायें। शत्रुओं का शस्त्र हमारी गौओं को क्षति न पहुँचावें । गोस्वामी याजकगण जिन गौओं से इन्द्रादि का यजन करते हैं और जिन गौओं को इन्द्रदेव के लिए प्रदान करते हैं, उन गौओं के साथ वे चिरकाल तक सुखी रहें।[ऋग्वेद 6.28.3]
Our cows should be safe. Thieves should not steal them. Enemy should not harm them. The owner of cows who worship Indr Dev with cows and grant them to him, should survive-live with the cows for long.
न ता अर्वा रेणुककाटो अश्नुते न संस्कृतत्रमुप यन्ति ता अभि।
उरुगायमभयं तस्य ता अनु गावो मर्तस्य वि चरन्ति यजनः॥
धूल उड़ाने वाले वेगगामी अश्व भी उन गौओं को न पा सकेगें। इन गौओं पर वध करने के लिए प्रहार न करें। यागशील मनुष्य की गौएँ निर्भय और स्वाधीन भाव से भ्रमण करती हैं।[ऋग्वेद 6.28.4]
The speeded horses who raise dust, will not be able to have-catch these cows. Do not strike the cows for killing them. Cows of the person who perform Yagy roam fearlessly and independently.
गावो भगो गाव इन्द्रो मे अच्छान् गावः सोमस्य प्रथमस्य भक्षः।
इमा या गावः स जनास इन्द्र इच्छामीद्धृदा मनसा चिदिन्द्रम्॥
गौएँ हमें धन प्रदान करनी वाली हों। इन्द्र देव हमें गौएँ प्रदान करें। गाय का दूध सबसे पहले सोमरस में मिलाया जाता है। हे मनुष्यों! ये गौएँ इन्द्र रूप हैं, श्रद्धायुक्त मन से हम जिनकी कामना करते हैं।[ऋग्वेद 6.28.5]
Let the cows yield money to us. Let Indr Dev grant cows to us. Cows milk is mixed with Somras at first. Hey Humans! These cows are like Indr Dev which are worshiped by us with faith-honour.
यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं चित्कृणुथा सुप्रतीकम्।
भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो बृहद्वो वय उच्यते सभासु॥
हे गौओं! आप हमें पुष्टि प्रदान करें। आप क्षीण और अमंगल अंग को सुन्दर बनावें। हे कल्याणयुक्त वचन वाली गौओं! हमारे गृह को कल्याणयुक्त करें। हे गौओं! यज्ञशाला में आपका महान् अन्न ही कीर्तित होता है।[ऋग्वेद 6.28.6]
Hey cows! Nourish us. Make our weak and unfit organs strong. Hey cows speaking welfare words! Make out house full of welfare. Hey cows! Your great food grains are appreciated-offered in the Yagy house.
प्रजावतीः सूयवसं रिशन्तीः शुद्धा अपः सुप्रपाणे पिबन्तीः।
मा वः स्तेन ईशत माघशंसः परि वो हेती रुद्रस्य वृज्याः॥
हे गौओ! आप सन्तान युक्त होवें। शोभन तृण का भक्षण करें और सुख से प्राप्त करने में योग्य तालाब आदि का निर्मल जल पीवें। आपका शासक चोर न हो और व्याघ्रादि आपके ईश्वर न हो अर्थात् हिंसक जन्तु आपके ऊपर आक्रमण न करें। कालात्मक परमेश्वर का आयुध आपसे दूर रहे।[ऋग्वेद 6.28.7]
Hey cows! You should have progeny. Eat good straw and drink the water from the pond comfortably. Your master-owner should not be a thief, the beasts should not be able to harm-overpower you. The weapons of death of the Almighty should keep away from you, at all times.
उपेदमुपपर्चनमासु गोषूप पृच्यताम्। उप ऋषभस्य रेतस्युपेन्द्र तव वीर्ये॥
हे इन्द्र देव! आपके बलाधान के निमित्त गौओं की पुष्टि प्रार्थित हों एवं गौओं के गर्भाधानकारी वृषभों का बल प्रार्थित हो अर्थात् गौओं के पुष्ट होने पर तत्सम्बन्धी क्षीरादि द्वारा इन्द्रदेव सन्तुष्ट होते हैं।[ऋग्वेद 6.28.8]
Hey Indr Dev! Its requested that the cows should be strong for your growth and the strength of the bulls who lead to their fertilisation. Indr Dev should be satisfied with the milk, curd, Ghee etc yielded by the cows.(22.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (29) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप।
इन्द्रं वो नरः सख्याय सेषुर्महो यन्तः सुमतये चकानाः।
महो हि दाता वज्रहस्तो अस्ति महामु रण्वमवसे यजध्वम्॥
हे याजकों! आपके नेतृ स्वरूप ऋत्विक लोग मित्र भाव से इन्द्र देव की परिचर्या करते हैं। वे महान स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं और उनकी बुद्धि शोभन तथा अनुग्रहात्मिका है; क्योंकि वज्रपाणि इन्द्र देव महान धन प्रदान करते हैं; इसलिए रमणीय और महान इन्द्र देव की पूजा, रक्षा के लिए करें।[ऋग्वेद 6.29.1]
रमणीय :: सुखद, रमणीय, सुहावना, ख़ुशगवार, मनोरम, रमणीय, सुहावना, ललित, आनंदकर, आनंदमय, हर्षजनक, आनंदपूर्ण, आनंदित, आनंद देने वाला, रमण योग्य, सुंदर; delightful, delectable, enjoyable.
Hey Hosts! The Ritviz who are like your eyes serve-worship Indr Dev like a friend. They recite great Strotrs which shows their excellent thoughts-ideas and obelizing nature, since Vajr wielding Indr Dev grants great wealth. Hence, worship delightful Indr Dev for protection.
आ यस्मिन्हस्ते नर्या मिमिक्षुरा रथे हिरण्यये रथेष्ठाः।
आ रश्मयो गभस्त्योः स्थूरयोराध्वन्नश्वासो वृषणो युजानाः॥
जिन इन्द्र देव के हाथ में मनुष्यों के हितकर धन संचित हैं, जो रथ पर चढ़ने वाले इन्द्र देव सुवर्णमय रथ पर आरूढ़ होते हैं, जिनके विशाल बाहुओं में रश्मियाँ नियमित हैं, जिन इन्द्र देव को सेचन करने वाले (बलिष्ठ) और रथ में युक्त अश्वगण वहन करते हैं, हम उन इन्द्र की स्तुति करते हैं।[ऋग्वेद 6.29.2]
We worship Indr Dev, who possess wealth beneficial for the humans. He rides the golden charoite, with the hands emitting light rays. Strong horses are deployed in his charoite.
श्रिये ते पादा दुव आ मिमिक्षुर्धृष्णुर्वज्री शवसा दक्षिणावान्।
वसानो अत्कं सुरभिं दृशे कं स्व१ र्ण नृतविषिरो बभूथ॥
हे इन्द्र देव! ऐश्वर्य लाभ के लिए भरद्वाज आपके चरणों में परिचरण समर्पित करते हैं। आप बल द्वारा शत्रुओं को पराजित करते हैं, वज्र धारण करते हैं और श्रोताओं को धन देते हैं। हे नेता इन्द्रदेव! आप सभी के दर्शनार्थ प्रशस्त और सतत गमनशीलरूप धारित करके सूर्यदेव के सदृश परिभ्रमणशील होते हैं।[ऋग्वेद 6.29.3]
Hey Indr Dev! Rishi Bhardwaj offer adoration at your feet for grandeur. You defeat the enemies with might, wield Vajr and grants wealth to the Stotas. Hey leader-lord Indr Dev! You adopt figure to rotate-revolve like the Sun-Sur Dev to be seen by all.
स सोम आमिश्लतमः सुतो भूद्यस्मिन्पक्तिः पच्यते सन्ति धानाः।
इन्द्रं नरः स्तुवन्तो ब्रह्मकारा उक्था शंसन्तो देववाततमाः॥
सोमरस के अभिषुत होने पर वह भली-भाँति मिश्रित हुआ है, जिसके अभिषुत होने पर पाक योग्य पुरोडाशादि पकाया जाता है। भुने जौ हवि के लिए संस्कृत होते हैं। हविर्लक्षण अन्न के कर्ता ऋत्विक लोग स्तोत्रों के द्वारा इन्द्र देव का स्तवन करते हैं। शास्त्रों का उच्चारण करते हुए वे देवता के निकटस्थ होते हैं।[ऋग्वेद 6.29.4]
Somras is extracted properly, thoroughly mixed & Purodas is backed. Roasted barley are ready for offerings. The Ritviz worship Indr Dev with the Strotr and keep food grains ready meant for offerings. Reciting the scriptures they become close to the demigods-deities.
न ते अन्तः शवसो धाय्यस्य वि तु बाबधे रोदसी महित्वा।
आ ता सूरिः पृणति तूतुजानो यूथेवाप्सु समीजमान ऊती॥
हे इन्द्र देव! आपके बल को हम लोग नहीं जानते। द्यावा-पृथ्वी आपके जिस महान् बल से भयभीत हो जाती है, गोपाल लोग जिस प्रकार से जल द्वारा गौओं को तृप्त करते हैं, उसी प्रकार स्तोता शीघ्र तृप्तिकारक हव्य द्वारा भली-भाँति यज्ञ करके आपको तृप्त करते हैं।[ऋग्वेद 6.29.5]
Hey Indr Dev! We are unaware of your might. The earth & heavens become afraid of your great strength. The way the cow heard satisfy the cows with water, the Stotas use satisfying offerings for the Yagy.
एवेदिन्द्रः सुहव ऋष्वो अस्तूती अनूती हिरिशिप्रः सत्वा।
एवा हि जातो असमात्योजाः पुरू च वृत्रा हनति नि दस्यून्॥
हरित नासा वाले महेन्द्र, इस प्रकार से सुख पूर्वक आह्वान करने के योग्य होते हैं। ये स्वयं उपस्थित अथवा अनुपस्थित हों; किन्तु स्तोताओं को धन प्रदान करते हैं। इस प्रकार से प्रादुर्भूत होकर उत्कृष्टतर बल वाले इन्द्र देव बहुत से वृत्रासुर जैसे राक्षसों तथा शत्रुओं को मारते हैं।[ऋग्वेद 6.29.6]
Indr Dev-Mahendr, with green nose deserve to be invoked comfortable. Whether he is present or not, he grants wealth to the Stotas. Indr Dev invoke and kill the demons & enemies with excellent might, power, strength.(23.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (29) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप।
भूय इद्वावृधे वीर्यायँ एको अजुर्यो दयते वसूनि।
प्र रिरिचे दिव इन्द्रः पृथिव्या अर्धमिदस्य प्रति रोदसी उभे॥
वृत्र वधादि वीर कार्य करने के लिए इन्द्रदेव पुनः प्रवृद्ध हुए। मुख्य और जरारहित इन्द्र देव स्तोताओं को धन प्रदान करें। इन्द्रदेव द्यावा-पृथ्वी का अतिक्रमण करते हैं। इनका आधा भाग ही द्यावा-पृथ्वी के सदृश है अर्थात् प्रतिनिधि है।[ऋग्वेद 6.30.1]
Indr Dev who killed Vratr etc., got ready again. Indr Dev, free from old age, grants wealth to the Stotas. He cross the limits of both earth & heavens. His half body is like the earth-heavens.
अधा मन्ये बृहदसुर्यमस्य यानि दाधार नकिरा मिनाति।
दिवेदिवे सूर्यो दर्शतो भूद्वि सद्मान्युर्विया सुक्रतुर्धात्॥
अभी हम इन्द्र देव के बल का स्तवन करते हैं। वह बल असुरों के वध में कुशल है। ये जिन कर्मों को धारित करते हैं, उनकी हिंसा कोई भी नहीं करता। वे प्रतिदिन वृत्रावृत सूर्य देव को दर्शनीय बनाते हैं। शोभन कर्म करने वाले इन्द्र देव ने भुवनों को विस्तारित किया।[ऋग्वेद 6.30.2]
We worship the might of Indr Dev. He is expert in killing the demons. His endeavours can not be hindered by any one. He makes the rotating-revolving Sun beautiful, Indr Dev performing great deeds, extended-expanded the abodes.
अद्या चिन्नू चित्तदपो नदीनां यदाभ्यो अरदो गातुमिन्द्र।
नि पर्वता अद्मसदो न सेदुस्त्वया दृळ्हानि सुक्रतो रजांसि॥
हे इन्द्र देव! पूर्व के समान आज भी आपका नदी सम्बन्धी कार्य विद्यमान है। नदियों के बहने के लिए आपने मार्ग बनाया। भोजनार्थ उपविष्ट मनुष्यों के समान पर्वतगण आपकी आशा से निश्चल भाव से उपविष्ट हैं। हे शोभन कर्म करने वाले इन्द्र देव! सम्पूर्ण लोक आपके द्वारा स्थिर हुए।[ऋग्वेद 6.30.3]
निश्चल :: अचल, स्थिर, अपरिवर्तनशील; immobile, static, stagnant.
Hey Indr Dev! Your endeavours pertaining to the rivers are still present-functional. You created path for the rivers to flow. The mountains are static like the hungry people. Hey performer of beautiful-appreciable deeds Indr Dev! You made the entire abode stationary-static.
सत्यमित्तन्न त्वावाँ अन्यो अस्तीन्द्र देवो न मर्त्यो ज्यायान्।
अहन्नहिं परिशयानमर्णोऽवासृजो अपो अच्छा समुद्रम्॥
हे इन्द्र देव! आपके सदृश अन्य देव नहीं हैं, यह यथार्थ है। आपके सदृश कोई दूसरा मनुष्य भी नहीं है। आपसे अधिक न कोई देव है, न मनुष्य, यह जो कहा जाता है, वो पूर्णतः सत्य है। जलराशि को ढँककर वृत्रासुर का आपने ही वध किया और समुद्र की ओर जल को प्रवाहित किया।[ऋग्वेद 6.30.4]
Hey Indr Dev! Its said that neither demigod-deity nor humans match you, is a fact. You killed Vrata sur covering the water bodies and made them flow into the ocean.
त्वमपो वि दुरो विषूचीरिन्द्र दृळ्हमरुजः पर्वतस्य।
राजाभवो जगतश्चर्षणीनां साकं सूर्यं जनयन्द्यामुषासम्॥
हे इन्द्र देव! वृत्रासुर से आवृत जल को सभी जगह प्रवाहित होने के लिए आपने मुक्त किया। आपने बादलों के दृढ़-बन्धन को छिन्न-भिन्न किया। सूर्य, उषा और स्वर्ग को प्रकाशमान करने वाले आप सम्पूर्ण संसार के राजा बनें।[ऋग्वेद 6.30.5]
Hey Indr Dev! You released the water blocked by Vrat Sur. You teared the clouds. You should become the king of the universe by virtue of making the Sun and Usha-day break, lighted.(23.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (31) :: ऋषि :- सुहोत्र भरद्वाज; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप, शक्वरी।
अभूरेको रयिपते रयीणामा हस्तयोरधिथा इन्द्र कृष्टीः।
वि तोके अप्सु तनये च सूरेऽवोचन्त चर्षणयो विवाचः॥
हे धन के पालक इन्द्र देव! आप धन के प्रधान स्वामी हैं। हे इन्द्र देव! आप अपनी दोनों भुजाओं में प्रजाओं को धारित करते हैं अर्थात् सम्पूर्ण जगत् आपकी आज्ञा का अनुवर्ती है। मनुष्यगण विविध प्रकार से आपका स्तवन पुत्र, शत्रु विजयी पुत्र-पौत्र और वर्षा के लिए करते हैं।[ऋग्वेद 6.31.1]
Hey supporter-grower of wealth Indr Dev! You are the lord of wealth. Hey Indr Dev! You support the populace with your both hands. The whole world follow your dictates. The humans worship you through different means for sons, grandsons and rains.
त्वद्भियेन्द्र पार्थिवानि विश्वाच्युता चिच्च्यावयन्ते रजांसि।
द्यावाक्षामा पर्वतासो वनानि विश्वं दृळ्हं भयते अज्मन्ना ते॥
हे इन्द्र देव! आपके भय से व्यापक और अन्तरिक्षोद्भव उदक पतन योग्य नहीं होने पर भी मेघ द्वारा बरसाये जाते हैं। हे इन्द्र देव! आपके आगमन से द्यावा-पृथ्वी, पर्वत, वृक्ष और सम्पूर्ण स्थावर प्राणिजात भयभीत हो जाते हैं।[ऋग्वेद 6.31.2]
Hey Indr Dev! The clouds shower rain due to your fear as soon as they are saturated. Hey Indr Dev! The earth, heavens, mountains, trees and the stationary organism-living being are gripped with fear with your arrival.
त्वं कुत्सेनाभि शुष्णमिन्द्राशुषं युध्य कुयवं गविष्टौ।
दश प्रपित्वे अध सूर्यस्य मुषायश्चक्रमविवे रपांसि॥
हे इन्द्र देव! कुत्स के साथ प्रबल शुष्ण के विरुद्ध आपने युद्ध किया। युद्ध में आपने कुयव का वध किया। युद्ध में आपने सूर्य देव के रथ चक्र का हरण किया। तब से सूर्य देव का रथ एक ही चक्र का हो गया। पापकारी राक्षसों का आपने वध किया।
[ऋग्वेद 6.31.3]Hey Indr Dev! You fought Shushn along with Kuts and killed Kuyav. You stole one wheel of Sury Dev's charoite in war and since then it runs over one wheel, only. You killed the sinner demons.
त्वं शतान्यव शम्बरस्य पुरो जघन्थाप्रतीनि दस्योः। अशिक्षो यत्र शच्या शचीवो दिवोदासाय सुन्वते सुतक्रे भरद्वाजाय गृणते वसूनि॥
हे इन्द्र देव! आपने असुर शम्बरासुर के सौ नगरों को ध्वस्त किया। हे प्रज्ञावान् तथा अभिषुत सोमरस द्वारा आनन्दित इन्द्रदेव! उस समय आपने सोमाभिषव करने वाले दिवोदास को प्रज्ञापूर्वक धन प्रदान किया तथा प्रार्थना करने वाले भरद्वाज को धन प्रदान किया।[ऋग्वेद 6.31.4]
Hey Indr Dev! You destroyed the hundred forts-cities of Shambrasur. Hey intelligent-prudent, happy by drinking Somras Indr Dev! You granted wealth to the extractor of Somras Divodas, intelligently and Bhardwaj who worshiped you.
स सत्यसत्वन्महते रणाय रथमा तिष्ठ तुविनृम्ण भीमम्।
याहि प्रपथिन्नवसोप मद्रिक् च श्रुत श्रावय चर्षणिभ्यः॥
हे अबध्य भट वाले तथा विपुल धन वाले इन्द्र देव! आप महान् युद्ध के लिए अपने भयंकर रथ पर आरूढ़ होवें। हे प्रकृष्ट मार्ग वाले इन्द्र देव! आप रक्षा के साथ हमारे सम्मुख आगमन करें। हे विख्यात इन्द्र देव! प्रजाओं के बीच में हमें प्रख्यात करें।
[ऋग्वेद 6.31.5]भट :: लोमड़ी, गीदड़-सियार इत्यादि जानवरों के रहने का स्थान, एक घास, चूल्हे की जली हुई मिट्टी, पहलवान, मल्ल, युद्ध करने या लड़ने वाला योद्धा, विद्वान, ज्ञानी, दार्शनिक, मराठा ब्रह्मणों की उपाधि, अपमान सूचक शब्द, एक प्रकार की गाली, स्याह, काला, दूषित, लिथड़ा हुआ, भट्ट जाना, भटना, फ़ुट डेढ़ फ़ुट ऊंचा जंगली पौधा जिसके पत्ते बहुत बड़े होते हैं, एक जाति, गवय्या, दरबारी गायक, भाट, बड़ा सूराख़, बिल, ग़ार जिस में लोमड़ी गीदड़ भेड़िया वग़ैरा रहते हैं; singer, wolf, intellectual, enlightened, warrior, animal.
Hey possessor of Bhat & enormous wealth Indr Dev! Ride your furious charoite for great war. Hey Indr Dev follower of excellent route! Join with protection. Hey famous Indr Dev! Make us famous amongest the populace.(24.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (32) :: ऋषि :- सुहोत्र भरद्वाज; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप।अपूर्व्या पुरुतमान्यस्मै महे वीराय तवसे तुराय।
विरप्शिने वज्रिणे शंतमानि वचांस्यासा स्थविराय तक्षम्॥
हमने महान्, विविध शत्रुओं को मारने वाले, बलवान् वेग सम्पन्न विशेष प्रकार से स्तुति योग्य वज्रधारी और प्रवृद्ध इन्द्र देव के लिए मुख द्वारा अपूर्व, सुविस्तीर्ण और सुख दायक स्तोत्रों का उच्चारण किया।
[ऋग्वेद 6.32.1]We recited pleased-comforting, unprecedented, long Strotr in the honour of worship deserving Indr Dev who is great, slayer of several enemies, mighty, dynamic, Vajr wielding, prosperous.
स मातरा सूर्येणा कवीनामवासयगुजदद्रिं गृणानः।
स्वाधीभिर्ऋकभिर्वावशान उदुस्त्रियाणामसृजन्निदानम्॥
इन्द्र देव ने मेधावी अङ्गिराओं के लिए जननी स्वपूर स्वर्ग और पृथ्वी को सूर्य द्वारा प्रकाशित किया एवं अङ्गिराओं द्वारा स्तूयमान होकर पर्वतों को चूर्ण किया। इन्द्र देव ने शोभन ध्यानशील स्तोता अङ्गिराओं द्वारा बारम्बार प्रार्थित होने पर गौओं को बन्धन से मुक्त किया।
[ऋग्वेद 6.32.2]Indr Dev lightened the earth & heavens with the Sun and destroyed the mountains on being praised by Angiras. He released the cows on being worshiped-prayed by Angiras repeatedly
स वह्निभिर्ऋक्वभिर्गोषु शश्वन्मितज्ञुभिः पुरुकृत्वा जिगाय।
पुरः पुरोहा सखिभिः सखीयन्दृळ्हा रुरोज कविभिः कविः सन्॥
बहुत कर्म करने वाले इन्द्र देव ने हवन करने वाले, प्रार्थना करने वाले और संकुचित-जानु अङ्गिराओं के साथ मिलकर गौओं के लिए शत्रुओं को पराजित किया। मित्रभूत, मेधावी अङ्गिराओं के साथ मित्राभिलाषी और दूरदर्शी होकर इन्द्र देव ने असुर पुरियों को ध्वस्त किया।
[ऋग्वेद 6.32.3]संकुचित :: संकोच युक्त, लज्जित, सिकुड़ा हुआ; narrow, contracted.
Executer of several endeavours-deeds Indr Dev defeated the enemies of cows on being requested by the Hawan performing Angiras, having contracted thighs. Farsighted Indr Dev destroyed the cities-forts of the demons in association with friendly, intelligent Angiras.
स नीव्याभिर्जरितारमच्छा महो वाजेभिर्महद्भिश्च शुष्मैः।
पुरुवीराभिर्वृषभ क्षितीनामा गिर्वणः सुविताय प्र याहि॥
हे कामनाओं के पूरक, हे स्तुति द्वारा संभजनीय इन्द्र देव! आप महान् अन्न, महान् बल और बहुत वत्सवती युवती वड़वा के साथ अपने स्तुति कर्ता को मनुष्यों के बीच में सुखी करने के लिए उनके समक्ष आगमन करते हैं।
[ऋग्वेद 6.32.4]बड़वा :: घोड़ी, सूर्य की पत्नी संज्ञा जिसने घोड़ी का रूप धारण कर लिया था,
सितारों के एक समूह का अवतार जो घोड़े के आकार का है, अश्विनी नक्षत्र, वासुदेव की एक परिचारिका-दासी, एक नदी, वड़वाग्नि; mare, fire in the ocean.
Hey desires accomplishing Indr Dev, worshiped by many! You invoke before the worshiper with lots of food grains, might and young mare to make him comfortable.
स सर्गेण शवसा तक्तो अत्यैरप इन्द्रो दक्षिणतस्तुराषाट्।
इत्था सृजाना अनपावृदर्थंदिवेदिवे विविषुरप्रमृष्यम्॥
हिंसकों के अभिभव कर्ता इन्द्र देव सदा उद्यत बल द्वारा सतत गमन शील तेज से युक्त होकर सूर्य के दक्षिणायन होने पर जल को मुक्त करते हैं। इस प्रकार विसृष्ट जलराशि उस क्षोभ शून्य समुद्र में प्रतिदिन गिरती है, जिससे वह जलराशि लौटकर अपने स्थान पर नहीं आती।
[ऋग्वेद 6.32.5]Destroyer of the violent, dynamic Indr Dev is always ready-prepared with energy-might to release water when the Sun moves to Southern half of the earth. The water thus released falls in the oceans without tides-waves and do not return back.(25.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (33) :: ऋषि :- शुनहोत्र भरद्वाज; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप।
य ओजिष्ठ इन्द्र तं सु नो दा मदो वृषन्त्स्वभिष्टिर्दास्वान्।
सौवश्यं यो वनवत्स्वश्वो वृत्रा समत्सु सासहदमित्रान्॥
हे अभीष्टवर्षक इन्द्र देव! आप हम लोगों को बलशाली, स्तुतियों द्वारा स्तवनकर्ता, शोभन यज्ञकर्ता और हव्य प्रदान करने वाला एक पुत्र प्रदान करें। वह पुत्र उत्कृष्ट अश्व पर आरूढ़ होकर संग्राम में शोभन अश्वों और प्रतिकूलताचारी शत्रुओं को पराजित करें।
[ऋग्वेद 6.33.1]Hey desires accomplishing Indr Dev! Grant us a son who is mighty, pray with Stutis-Strotr and perform decent Yagy. He should ride the excellent horse and defeat the enemy always opposing and acting in adverse directions riding beautiful horses.
त्वां ही ३ न्द्रावसे विवाचो हवन्ते चर्षणयः शूरसातौ।
त्वं विप्रेभिर्वि पणीरँशायस्त्वोत इत्सनिता वाजमव॥
हे इन्द्र देव! विविध स्तुति रूप वचन वाले मनुष्यगण युद्ध में रक्षा के लिए आपका आह्वान करते हैं। आपने मेधावी अङ्गिराओं के साथ पणियों का संहार किया। आपकी उपासना करने वाला पुरुष आपके द्वारा रक्षित होकर अन्न प्राप्त करता है।
[ऋग्वेद 6.33.2]Hey Indr Dev! The humans invoke-call you reciting various sacred hymns in the war, for protection. You killed the Pani demons with intelligent Angiras. One who pray-worship you, get food grains and protection from you.
त्वं ताँ इन्द्रोभयाँ अमित्रान्दासा वृत्राण्यार्या च शूर।
वधीर्वनेव सुधितेभिरत्कैरा पृत्सु दर्षि नृणां नृतम॥
हे शूर इन्द्रदेव! आप दस्युओं अथवा आर्यों दोनों प्रकार के शत्रुओं का संहार करते है। हे नेतृ श्रेष्ठ! जिस प्रकार काष्ठ छेदक कुठारादि से वृक्षों को काट देता है उसी प्रकार आप संग्राम में भली-भाँति प्रयुक्त अस्त्रों द्वारा शत्रुओं को काटें।
[ऋग्वेद 6.33.3]Hey brave Indr Dev! You destroy either the dacoits or the Ary, the two types of enemies. Hey great leader! The way the axe cuts-destroy the trees you should destroy the enemies loaded with various arm & ammunition; used properly in the war.
स त्वं न इन्द्राकवाभिरूती सखा विश्वायुरविता वृधे भूः।
स्वर्षाता यद्ध्वयामसि त्वा युध्यन्तो नेमधिता पृत्सु शूर॥
हे इन्द्र देव! आप सभी जगह गमन करने वाले हैं। आप श्रेष्ठ रक्षा के द्वारा हम लोगों की समृद्धि के वर्द्धक तथा मित्र होवें। कुछ पुरुषों से युक्त युद्ध करने वाले हम लोग धन प्राप्ति के लिए आपका आह्वान करते हैं।
[ऋग्वेद 6.33.4]Hey Indr Dev! You move every where. You should provide us best protection, increase our prosperity and be friendly with us. We are involved in fight with some people and invite-request you to seek money-riches.
नूनं न इन्द्रापराय च स्या भवा मृळीक उत नो अभिष्टौ।
इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्मन्दिवि ष्याम पायें गोषतमाः॥
हे इन्द्र देव! इस समय तथा दूसरे समय में आप निश्चय ही हमारे रहें। हम लोगों की अवस्था के अनुसार सुख प्रदान करें। इस प्रकार से प्रार्थना करने वाले हम लोगों के गौओं के संभजन करने वाले होकर आपके द्युतिमान सुख में अवस्थान करें। आप महान है।
[ऋग्वेद 6.33.5]Hey great Indr Dev! You should always be with us presently & in future. Grant us pleasure-comforts according to our age. In this manner being prayed-worshiped being worshiper of cows, grant us pleasure.(25.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (34) :: ऋषि :- शुनहोत्र भरद्वाज; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप।
सं च त्वे जग्मुर्गिर इन्द्र पूर्वीर्वि च त्वद्यन्ति विभ्वो मनीषाः।
पुरा नूनं च स्तुतय ऋषीणां पस्पृध्र इन्द्रे अध्युक्थार्का॥
हे इन्द्र देव! आप में असंख्य स्तोत्र संगत होते हैं। आपसे स्तोताओं की पर्याप्त प्रशंसा निर्गत होती है। पूर्वकाल में और इस समय में भी ऋषियों को स्तोत्र उपासना और मन्त्र इन्द्र देव की पूजा के विषय में परस्पर स्पर्द्धा करते हैं।[ऋग्वेद 6.34.1]
Hey Indr Dev! Innumerable Strotr are emerge out to you. Praises shower for the Stotas out of you. Old & current the Strotr & Mantr used to compete mutually recited by the Rishis in the honour of Indr Dev.
पुरुहूतो यः पुरुगूर्त ऋभ्वाँ एकः पुरुप्रशस्तो अस्ति यज्ञैः।
रथो न महे शवसे युजानो ३ स्माभिरिन्द्रो अनुमाद्यो भूत्॥
हम लोग सदैव इन्द्र देव को प्रसन्न करते हैं। वे बहुजनाहूत, बहुतों के द्वारा प्रबोधित, महान, अद्वितीय एवं याजकगणों द्वारा भली-भाँति प्रार्थित हैं। हम लोग महान् लाभ करने के लिए रथ के सदृश इन्द्रदेव के प्रति अनुरक्त होकर सदैव उनकी प्रार्थना करें।[ऋग्वेद 6.34.2]
प्रबोधित :: जगाया हुआ, ज्ञान दिया हुआ; enlightened.
We always keep Indr Dev happy-pleased. He is worshiped & enlightened by numerous people being great, unparalled, unique and prayed. We always worship him for great gains attached-attracted like the charoite.
न यं हिंसन्ति धीतयो न वाणीरिन्द्रं नक्षन्तीदभि वर्धयन्तीः।
यदि स्तोतारः शतं यत्सहस्त्रं गृणन्ति गिर्वणसं शं तदस्मै॥
समृद्धि विधायक स्तोत्र इन्द्र देव के सम्मुख गमन करें। कर्म और स्तुतियाँ इनको बाधित नहीं करती। सैकड़ों और हजारों स्तवकारी स्तुति भाजन इन्द्र देव की प्रार्थना करके प्रसन्नता उत्पन्न करते हैं।[ऋग्वेद 6.34.3]
Let the Strotr leading to prosperity be recited before Indr Dev. Endeavours and Stutis-prayers do not interfere with it. Hundreds and thousands of worshipers keep-make Indr Dev happy.
अस्मा एतद्दिव्य१र्चेव मासा मिमिक्ष इन्द्रे न्ययामि सोमः।
जनं न धन्वन्नभि सं यदापः सत्रा वावृधुर्हवनानि यज्ञैः॥
इस यज्ञ दिन में स्तोत्र के योग्य पूजा के साथ प्रदत्त होने के लिए इन्द्र देव के निमित्त मिश्रित सोमरस प्रस्तुत किया जाता है। मरुस्थल के अभिमुख गमन करने वाला जल जिस प्रकार प्राणियों का पोषण करता है, उसी प्रकार हव्य के साथ स्तोत्र इन्द्र देव को आनन्दित करते हैं।[ऋग्वेद 6.34.4]
Mixed Somras is prepared in this Yagy for prayers and offered to Indr Dev. The way the water nourish the living beings directed towards the deserts, the offerings-oblations aided with Strotr amuse Indr Dev.
अस्मा एतन्मह्याङ्गूषमस्मा इन्द्राय स्तोत्रं मतिभिरवाचि।
असद्यथा महति वृत्रतूर्य इन्द्रो विश्वायुरविता वृधश्च॥
सभी स्थानों में जाने वाले इन्द्र देव महान संग्राम में हम लोगों के रक्षक और समृद्धि विधायक है, अतः स्तोताओं का स्तोत्र आग्रह के साथ इनके प्रति उच्चारित होता है।[ऋग्वेद 6.34.5]
आग्रह :: ज़ोर, अनुरोध, बल, हठ, इसरार, टेक, ज़िद, दृढ़ता, विनती; importunity, pertinacity, request, insistence.
Indr Dev moving all places protects us in the war and grant us prosperity, hence Strotr are recited in his honour insistently.(26.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (35) :: ऋषि :- नरो भरद्वाज; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
कदा भुवन्रथक्षयाणि ब्रह्म कदा स्तोत्रे सहस्रपोष्यं दाः।
कदा स्तोमं वासयोऽस्य राया कदा धियः करसि वाजरत्नाः॥
हे इन्द्र देव! आप रथाधिरूढ़ के निकट हमारे स्तोत्र कब पहुँचेगें? कब आप मुझ स्तोत्र करने वाले को सहस्र पुरुषों के गो-समूह या पुत्र प्रदान करेगें? कब आप मुझ स्तोता के स्तोत्र को धन-द्वारा पुरस्कृत करेगें? कब आप अग्निहोत्रादि कार्य को अन्न द्वारा रमणीय बनावेंगे?[ऋग्वेद 6.35.1]
Hey Indr Dev! When will you ride your charoite and reach the Strotr-Stotas? When will you grant me cows or sons along with thousands of humans beings? When will you award me-the Stota, with money for the Strotr? When will you make the Agnihotr, Yagy, Hawan etc. attractive-enjoyable with food grains?
कर्हि स्वित्तदिन्द्र यन्नृभिर्नृवीरैर्वीरान्नीळयासे जयाजीन्।
त्रिधातु गा अधि जयासि गोष्विन्द्र द्युम्नं स्वर्वद्धेह्यस्मे॥
हे इन्द्र देव! कब आप हमारे पुरुषों के साथ शत्रुओं के पुरुषों को तथा हमारे पुत्रों के साथ शत्रुओं के पुत्रों को कब मिलायेंगे? (युद्ध में इस तरह का संश्लेषण कब होगा?) हमारे लिए आप कब संग्राम में जय प्राप्त करेगें ? कब आप गमनशील शत्रुओं से क्षीर, दधि और घृतादि धारित करनेवाली गौओं को जीतेगें? हे इन्द्र देव! कब आप हम लोगों को व्याप्त धन प्रदान करेगें?[ऋग्वेद 6.35.2]
Hey Indr Dev! When will arrange for the meeting of our enemy males with us and our children with their children-sons (cease fires, termination of war)? When will you attain victory for us in the war? When will you snatch-win the cows granting milk, curd, ghee etc. from the enemy? Hey Indr Dev! When will you grant us wealth?
कर्हि स्वित्तदिन्द्र यज्जरित्रे विश्वप्सु ब्रह्म कृणवः शविष्ठ।
कदा धियो न नियुतो युवासे कदा गोमघा हवनानि गच्छाः॥
हे बलवत्तम इन्द्र देव! कब आप स्तोता को विविध प्रकार का अन्न प्रदान करेगें? कब आप अपने यज्ञ और स्तोत्र को युक्त करेगें? कब आप स्तोत्रों को गोदायक करेगें?[ऋग्वेद 6.35.3]
Hey excellent might possessor Indr Dev! When will you grant food grains to the Stotas in different ways? When will you make the Strotr yielding cows?
स गोमघा जरित्रे अश्वश्चन्द्रा वाजश्रवसो अधि धेहि पृक्षः।
पीपिहीषः सुदुघामिन्द्र धेनुं भरद्वाजेषु सुरुचो रुरुच्याः॥
हे इन्द्र देव! आप गो दायक, अश्वों द्वारा आह्लादित करने वाला और बल द्वारा प्रसिद्ध अन्न हम प्रार्थना करने वाले भरद्वाज पुत्रों को प्रदान करें। आप अन्नों को तथा सुगमता से दुहने योग्य गौओं को परिपुष्ट करें। वे गौएँ जिससे शोभन दीप्ति वाली हों, वैसा ही आप करें।[ऋग्वेद 6.35.4]
Hey Indr Dev! Grant cows, horses, might and appreciable food grains to us-the sons-descendants of Bhardwaj Rishi. Nourish the food grains and cows which can be milked easily. Take such measures which can make the cows possess aura.
तमा नूनं वृजनमन्यथा चिच्छूरो यच्छक्र वि दुरो गृणीषे।
मा निररं शुक्रदुघस्य धेनोराङ्गिरसान्ब्रह्मणा विप्र जिन्व॥
हे इन्द्र देव! आप हमारे शत्रु को अन्य प्रकार से (जीवन के विपरीत अर्थात् मरण पथ से) युक्त करें। हे इन्द्र देव! आप शक्तिमान, वीर और शत्रु हन्ता हैं, इस प्रकार से हम लोग आपका स्तवन करते हैं। हे इन्द्र देव! आप विशुद्ध वस्तुओं के प्रदान कर्ता हैं। हम आपके स्तोत्रों के उच्चारण करने से विरत न हों। हे प्राज्ञ इन्द्र देव! आप अङ्गिराओं को अन्न द्वारा प्रसन्न करें।[ऋग्वेद 6.35.5]
Hey Indr Dev! Grant death to our enemy. We worship you as mighty, brave and slayer of the enemy. Grant us pure goods. We should not forget-avoid recitation of Strotr for you. Hey intelligent Indr Dev! Please the Angiras with food grains.(26.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (36) :: ऋषि :- नर भरद्वाज; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप।
सत्रा मदासस्तव विश्वजन्याः सत्रा रायोऽध ये पार्थिवासः।
सत्रा वाजानामभवो विभक्ता यद्देवेषु धारयथा असुर्यम्॥
हे इन्द्र देव! आपका सोमपान जनित हर्ष निश्चय ही सब लोगों के लिए हितकर है। आप अन्न दाता है। देवों के बीच में आप बल धारित करते है।[ऋग्वेद 6.36.1]
Hey Indr Dev! The pleasure-amusement generated in you by drinking Somras is beneficial to us. Grant us food grains. You possess might, strength, power amongest the demigods-deities.
अनु प्र येजे जन ओजो अस्य सत्रा दधिरे अनु वीर्याय।
स्यूमगृभे दुधयेऽर्वते च क्रतुं वृञ्जन्त्यपि वृत्रहत्ये॥
यजमान लोग विशेष प्रकार से इन्द्र देव के बल की पूजा करते हैं। वीरत्व प्राप्ति के लिए अथवा वीरकर्म करने के लिए याजकगण इन्द्र देव को पुरोभाग में धारित करते हैं। अविच्छिन्न शत्रु श्रेणी के निरोधकर्ता, हिंसाकारी और आक्रमणकारी इन्द्र देव वृत्रासुर का संहार करेंगे; इसलिए याजकगण उनकी सेवा करते हैं।[ऋग्वेद 6.35.2]
The Ritviz worship Indr Dev's might differently. They keep Indr Dev in the forward position for attaining victory. The Ritviz serve-worship him since he is destroyer of the enemies, violent and the attackers & he will kill Vrata Sur.
तं सध्रीचीरूतयो वृष्ण्यानि पौंस्यानि नियुतः सश्चुरिन्द्रम्।
समुद्रं न सिन्धव उक्थशुष्मा उरुव्यचसं गिर आ विशन्ति॥
संगत होकर मरुद्गण इन्द्र देव का सेवन करते हैं एवं वीर्य, बल और रथ में नियोजित अश्व भी इन्द्र देव का सेवन करते हैं। नदियाँ जिस प्रकार समुद्र में गिरती हैं, उसी प्रकार उपासना रूप बल वाली स्तुतियाँ विश्व व्यापी इन्द्रदेव तक पहुँचती हैं।[ऋग्वेद 6.36.3]
संगत :: प्रासंगिक, उचित, अनुरूप, योग्य, प्रस्तुत, अनुकूल, मुताबिक़, तर्कयुक्त, सिलसिलेवार, अविरोधी; compatible, consistent, relevant.
Marud Gan become compatible with Indr Dev and his horses deployed in the charoite, too enjoy his might. The way the river fall in the ocean, worships-prayers meet Indr Dev pervading the whole universe.
स रायस्खामुप सृजा गृणानः पुरुश्चन्द्रस्य त्वमिन्द्र वस्वः।
पतिर्बभूथासमो जनानामेको विश्वस्य भुवनस्य राजा॥
हे इन्द्र देव! स्तूयमान होने पर आप बहुतों के अन्न दायक और गृह प्रदायक धन की धारा को प्रवाहित करें। आप सम्पूर्ण प्राणी के उत्कृष्ट स्वामी और सम्पूर्ण भूतजात के असाधारित अधीश्वर हैं।[ऋग्वेद 6.36.4]
Hey Indr Dev! On being praised you grant food grains, residence to the worshipers. You are excellent master of all living beings and their lord.
स तु श्रुधि श्रुत्या यो दुवोयुर्द्यौर्न भूमाभि रायो अर्यः।
असो यथा नः शवसा चकानो युगेयुगे वयसा चेकितानः॥
हे इन्द्र देव! आप श्रोतव्य स्तोत्रों को शीघ्र सुनें। हम लोगों की परिचर्या की कामना करके सूर्य देव के सदृश शत्रुओं के धन को जीतें। आप बल युक्त है। प्रत्येक काल में स्तूयमान और हव्य रूप अन्न द्वारा भली-भाँति से ज्ञायमान होकर हमारे पास पहले के समान रहें।[ऋग्वेद 6.36.5]
Hey Indr Dev! Listen to the worthy Strotr quickly. Win the wealth of the enemies like the Sun-Sury Dev, for our welfare-benefit. You are mighty-strong. Being praised and offered with oblations significantly you should be close to us.(27.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (37) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
अर्वाग्रथं विश्ववारं त उगेन्द्र युक्तासो हरयो वहन्तु।
कीरिश्चिद्धि त्वा हवते स्वर्वानृधीमहि सधमादस्ते अद्य॥
हे उद्यतायुध इन्द्र देव! आपके रथ में युक्त अश्व हमारे सम्मुख आपके विश्ववन्दनीय रथ को ले आवें। गुणवान् स्तोता भरद्वाज ऋषि आपका आह्वान करते हैं। वे आपकी कृपा से आनन्दित होते हुए सिद्धि प्राप्त करें।[ऋग्वेद 6.37.1]
उद्यतायुध व्यक्ति :: अस्त्र-शस्त्र धारण किये हुए; person in arms.
Hey Indr Dev ready for war, wielding arms & ammunition! Let your horses bring your worshipable charoite. Virtuous Stota Bhardwaj Rishi invoke you. Let him attain-have accomplishment by virtue of your grace.
प्रो द्रोणे हरयः कर्माग्मन्युनानास ऋज्यन्तो अभूवन्।
इन्द्रो नो अस्य पूर्व्यः पपीयाद्युक्षो मदस्य सोम्यस्य राजा॥
हरित वर्ण सोमरस हमारे यज्ञ में प्रवाहित होता है और पवित्र होकर कलशों में भरा जाता है। पुरातन, दीप्ति सम्पन्न और मदकारक सोमरस के अधिपति इन्द्र देव हमारे सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 6.37.2]
Green coloured Somras flow in our Yagy and purified-cleansed & filled in urn-pitchers. Let the Lord of Somras Indr Dev drink our intoxicating Somras.
आसस्राणासः शवसानमच्छेन्द्रं सुचक्रे रथ्यासो अश्वाः।
अभि श्रव ऋज्यन्तो वहेयुर्नू चिन्नु वायोरमृतं वि दस्येत्॥
चतुर्दिक् गमन करने वाले, रथ में युक्त और सरलता पूर्वक गमन करने वाले अश्वगण सुदृढ़ रथ चक्र पर अवस्थित बलशाली इन्द्र देव को हमारे समक्ष ले आवें। अमृतमय सोमलक्षण हवि वायु से नष्ट न हों अर्थात् सोमरस के बिगड़ने के पहले ही इन्द्र देव सोमरस को पीवें।[ऋग्वेद 6.37.3]
Let the horses deployed in the charoite roaming in all directions bring Indr Dev to us. Let Indr Dev drink the Somras which is like the elixir prior to be spoiled by air.
वरिष्ठो अस्य दक्षिणामियर्तीन्द्रो मघोनां तुविकूर्मितमः।
यया वज्रिवः परियास्यंहो मघा च धृष्णो दयसे वि सूरीन्॥
निरतिशय बलशाली और बहुविधि कार्य करने वाले इन्द्र देव हविस्व रूप धन वाले व्यक्तियों के बीच में याजकगण को दक्षिणा प्रदान करते हैं। हे वज्रधर! आप दक्षिणा द्वारा पाप का नाश करें। हे शत्रु विजयी! आप वैसी दक्षिणा प्रेरित करें, जिससे धनराशि और स्तुतिकर्ता पुत्र हमें प्राप्त हों।[ऋग्वेद 6.37.4]
Highly powerful Indr Dev, performing various deeds, grant wealth like oblations to the Ritviz as Dakshina. Hey wielder of Vajr! Destroy the sin through Dakshina. Hey winner of the enemy! Let the Dakshina granted by you inspire wealth and sons singing Stuti-sacred hymns.
Dakshina :: Money granted for performing Yagy.
इन्द्रो वाजस्य स्थविरस्य दातेन्द्रो गीर्भिर्वर्धतां वृद्धमहाः।
इन्द्रो वृत्रं हनिष्ठो अस्तु सत्वा ता सूरिः पृणति तूतुजानः॥
इन्द्र देव श्रेष्ठ अन्न अथवा बल के दाता हैं। अत्यधिक तेजोयुक्त इन्द्र देव हम लोगों की प्रार्थना द्वारा वर्द्धित हों। शत्रुओं का संहार करने वाले इन्द्र देव शत्रुओं का नाश करें। प्रेरक इन्द्र देव वेगवान होकर हम लोगों को समस्त धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.37.5]
Indr Dev grant best food grains and strength-nourishment. Possessed with might let Indr dev flourish with our prayers. Let him destroy the enemy. Let inspiring Indr Dev grant us money quickly.(27.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (38) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
अपादित उदु नश्चित्रतमो महीं भर्षद्युमतीमिन्द्रहूतिम्।
पन्यसीं धीतिं दैव्यस्य यामञ्जनस्य रातिं वनते सुदानुः॥
आश्चर्यतम इन्द्र देव हम लोगों के पान पात्र से सोमरस का पान करें। वे महान और दीप्तिमान स्तुति को स्वीकार करें। दानशील इन्द्र देव धार्मिक याजकगण के यज्ञ में अतिशय स्तुत्य परिचरण और हव्य ग्रहण करें।[ऋग्वेद 6.38.1]
Amazing Indr Dev should drink Somras from our vessels. He should accept the great and glorious prayers. Highly donating Indr Dev should accept the prayers and offerings in the Yagy of holy-virtuous Ritviz.
दूराचिदा वसतो अस्य कर्णा घोषादिन्द्रस्य तन्यति ब्रुवाणः।
एयमेनं देवहूतिर्ववृत्यान्मद्रय् १ गिन्द्रमियमृच्यमाना॥
इन्द्र देव के दोनों कान दूर देश से भी स्तोत्र सुनने के लिए आते हैं। स्तोता उच्च स्वर से स्तोत्र पाठ करते हैं। इनका आह्वान करने वाली यह प्रार्थना स्वयं प्रेरित होकर इन्द्र देव को हमारे समीप ले आवें।[ऋग्वेद 6.38.2]
Indr Dev's ears hear the Strotr from a distant place. The Stotas recite Strotr in loud voice. Their invoking pryers inspire Indr Dev to come to them.
तं वो धिया परमया पुराजामजरमिन्द्रमभ्यनूष्यर्कैः।
ब्रह्मा च गिरो दधिरे समस्मिन्महाँश्च स्तोमो अधि वर्धदिन्द्रे॥
हे इन्द्र देव! आप प्राचीन और क्षय रहित है। हम उत्कृष्ट तम प्रार्थना और हव्य द्वारा आपका स्तवन करते हैं; इसीलिए इन्द्र देव में हव्य रूप अन्न और स्तोत्र निहित है। महान स्तोत्र अधिक वर्द्धमान होता है।[ऋग्वेद 6.38.3]
Hey Indr dev! You are eternal and immortal. We worship you with excellent prayers, hence Indr dev possess offerings in the form of food grains and Strotr. Great Strotr lead to more-better progress.
वर्धाद्यं यज्ञ उत सोम इन्द्रं वर्धाद्ब्रह्म गिर उक्था च मन्म।
वर्धाहैनमुषसो यामन्नक्तोर्वर्धान्मासाः शरदो द्याव इन्द्रम्॥
जिन इन्द्र देव को यज्ञ और सोमरस वर्द्धित करते हैं, जिन इन्द्र देव को हव्य, स्तुति, उपासना और पूजा वर्द्धित करती हैं, दिन और रात्रि की गति जिन्हें वर्द्धित करती है एवं जिन्हें मास, संवत्सर और दिन वर्द्धित करते हैं।[ऋग्वेद 6.38.4]
Indr Dev progress-grow due to the Yagy, Somras; offerings, Stuti-prayers, worship, the speed of day & night, months, fortnight and the day.
एवा जज्ञानं सहसे असामि वावृधानं राधसे च श्रुताय।
महामुग्रमवसे विप्र नूनमा विवासेम वृत्रतूर्येषु॥
हे मेधावी इन्द्र देव! आप इस प्रकार से प्रादुर्भूत, समृद्ध बलशाली और प्रचण्ड हैं। हम लोग आज धन, कीर्ति, रक्षा और शत्रु विनाश के लिए आपकी सेवा करते हैं।[ऋग्वेद 6.38.5]
प्रचण्ड :: कठोर, प्रचण्ड, उग्र, कडा; terrific, severe.
प्रादुर्भूत :: प्रकट हुआ, उत्पन्न; rarefied, outbreak, visitation.
Hey Indr Dev! You are terrific, mighty and rarefied. We serve-worship you for wealth, fame, protection and destruction of the enemy.(28.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (39) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
मन्द्रस्य कवेर्दिव्यस्य वह्नेर्विप्रमन्मनो वचनस्य मध्वः।
अपा नस्तस्य सचनस्य देवेषो युवस्व गृणते गोअग्राः॥
हे इन्द्र देव! आप हमारे उस सोमरस को पिवें, जो मदकारक पराक्रमकर्ता, स्वर्गीय, विज्ञ सम्मत फलदाता प्रसिद्ध और सेवनीय है। हे देव! आप हमें गो दुग्धादि एवं अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.39.1]
Hey Indr Dev! Drink our Somras which is famous for intoxication, valour, heavenly, in accordance with the learned-experts and useful. Hey deity! grant us cows, milk and food grains.
अयमुशानः पर्यद्रिमुस्रा ऋतधीतिभिर्ऋतयुग्युजानः।
रुजदरुग्णं वि वलस्य सानुं पर्णींर्वचोभिरभि योधदिन्द्रः॥
इन्हीं इन्द्र देव ने पर्वतों के बीच गुप्त रूप से रखी गयी गौवों के उद्धार के लिए यज्ञकर्ता अङ्गिरा लोगों के साथ होकर और उनके सत्य-रूप स्तोत्र द्वारा उत्तेजित होकर दुर्भेद्य पर्वत को भिन्न और ताड़ना द्वारा पणियों को पराजित किया।[ऋग्वेद 6.39.2]
Indr Dev released the cows in captivity in the tough terrain mountains secretly in association with Angiras on being excited by the truthful Strotr and defeated the demons called Panis.
अयं द्योतयदद्युतो व्य१क्तून्दोषा वस्तोः शरद इन्दुरिन्द्र।
इमं केतुमदधुर्नू चिदह्नां शुचिजन्मन उषसश्चकार॥
हे इन्द्र देव! इस सोमरस ने दीप्ति शून्य रात्रि, दिन और वर्ष; सबको प्रदीप्त किया। प्राचीन समय में देवों ने इस सोमरस को दिन का केतु स्वरूप स्थापित किया। इसी सोमरस ने अपनी दीप्ति से उषाओं को प्रकाशित किया।[ऋग्वेद 6.39.3]
Hey Indr Dev! This Somras has lighted the dark nights, days and the years. During ancient periods the demigods established this Somras as the motive for the day. This Somras lighted the Usha with its aura-radiance.
अयं रोचयदरुचो रुचानो ३ यं वासयद्वय्ृ १ तेन पूर्वीः।
अयमीयत ऋतयुग्भिरश्वैः स्वर्विदा नाभिना चर्षणिप्राः॥
इन्हीं इन्द्र देव ने सूर्य रूप से प्रकाशित होकर प्रकाश शून्य भुवनों को प्रकाशित किया और सभी जगह गतिशील दीप्ति द्वारा उषाओं का अन्धकार नष्ट किया। मनुष्यों के अभीष्ट फलदाता ये इन्द्र देव स्तोत्र द्वारा नियोजित होने वाले अश्वों द्वारा आकृष्ट और धनपूर्ण रथ पर आरूढ़ होकर गए।[ऋग्वेद 6.39.4]
Indr Dev lighted the dark abodes by assuming the task of Sun-Sury Dev and provided dynamic radiance by Usha. Accomplisher of humans prayers, Indr Dev rode the charoite controlled by the Strotr carrying wealth.
Here Indr Dev is a form of the Almighty.
नू गृणानो गृणते प्रत्न राजन्निषः पिन्व वसुदेयाय पूर्वीः।
अप ओषधीरविषा वनानि गा अर्वतो नॄनृचसे रिरीहि॥
हे पुरातन और प्रकाशमान इन्द्र देव! आप प्रार्थना किए जाने पर धन देने योग्य स्तोता को प्रचुर धन प्रदान करें। आप स्तोता को जल, औषधि, विषशून्य वृक्षावली, गौ, अश्व और मनुष्य प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.39.5]
Hey ancient-eternal Indr Dev! Grant sufficient wealth to the deserving Stota. Grant water, medicines, trees free from poison, cows, horses and humans.(28.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (40) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
इन्द्र पिब तुभ्यं सुतो मदायाव स्य हरी वि मुचा सखाया।
उत प्र गाय गण आ निषद्याथा यज्ञाय गृणते वयो धाः॥
हे इन्द्र देव! आपके मदवर्द्धन के लिए जो सोमरस अभिषुत हुआ है, उसे पान करें। अपने मित्रभूत दोनों अश्वों को रथ में नियोजित करें और इसके पीछे रथ में उन्हें छोड़ दें। स्तोताओं के बीच विराजित होकर हमारे द्वारा किए गए स्तोत्रों के उच्चारण में प्रेरणा दें। स्तोता याजकगण को अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.40.1]
Hey Indr Dev! Drink the Somras extracted for increasing intoxication-boosting energy. Deploy your two horses in the charoite and later release them. Present amongest the Stotas and inspire us for the recitation of the Strotr. Let the Stotas give food grains to the Ritviz.
अस्य पिब यस्य जज्ञान इन्द्र मदाय क्रत्वे अपिबो विरप्शिन्।
तमु ते गावो नर आपो अद्रिरिन्दुं समह्यन्पीतये समस्मै॥
हे महेन्द्र! आपने उल्लास और वीरता प्रकट करने के लिए जन्म लेते ही जिस प्रकार से सोमरस का पान किया, उसी प्रकार सोमरस का पान करें। आपके लिए सोमरस तैयार करने के लिए गौवें, ऋत्विक, जल और पत्थर इकट्ठे होते हैं।[ऋग्वेद 6.40.2]
उल्लास :: खुशी, हर्ष, उमंग; glee, frolic.
Hey Mahendr! Drink Somras just the way you had it soon after your birth to glee. Cows, Ritviz, water and stones gathered to prepare Somras for you.
समिद्धे अग्नौ सुत इन्द्र सोम आ त्वा वहन्तु हरयो वहिष्ठाः।
त्वायता मनसा जोहवीमीन्द्रा याहि सुविताय महे नः॥
हे इन्द्र देव! अग्नि प्रज्वलित हुई और सोमरस अभिषुत हुआ। ढ़ोने में शक्तिशाली आपके अश्व इस यज्ञ में आपको ले आवें। हम आपकी ओर चित्त लगाकर आपका आवाहन कर रहे हैं। आप हमारी विशाल समृद्धि के लिए यहाँ पधारें।[ऋग्वेद 6.40.3]
Hey Indr Dev! Fire was ignited and Somras was extracted. Let you strong horses capable of carrying, come in the Yagy. We are concentrating our mind in you to invoke you. Come here for our prosperity.
आ याहि शश्वदुशता ययाथेन्द्र महा मनसा सोमपेयम्।
उप ब्रह्माणि शृणव इमा नोऽथा ते यज्ञस्तन्वे ३ वयो धात्॥
हे इन्द्र देव! आप सोमरस के पान के लिए कई बार यज्ञ में उपस्थित हुए। इसलिए इस समय सोमरस के पान की इच्छा से महान् अन्तःकरण के साथ इस यज्ञ में आवें। हमारे स्तोत्रों को श्रवण करें। आपके देह की पुष्टि के लिए याजकगण आपको सोमरस प्रदान करता है।[ऋग्वेद 6.40.4]
Hey Indr Dev! You presented yourself many times in the Yagy for drinking Somras. Hence, you should be prepared with your innerself to drink Somras in the Yagy. The Ritviz have extract, offer Somras to you for strengthening your body.
यदिन्द्र दिवि पार्ये यदृधग्यद्वा स्वे सदने यत्र वासि।
अतो नो यज्ञमवसे नित्युत्वान्त्सजोषाः पाहि गिर्वणो मरुद्भिः॥
हे इन्द्र देव! आप दूरस्थित स्वर्ग, किसी अन्य स्थान या अपने घर में अथवा कहीं भी हों; वहीं से हमारी स्तुति श्रवण कर मरुद्गणों के साथ पधारकर हमारे इस यज्ञ की रक्षा करें।[ऋग्वेद 6.40.5]
Hey Indr Dev! Wherever you are, heaven, distant place or home listen-respond to our prayers and come along with Marud Gan to protect our Yagy.(29.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (41) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्।
अहेळमान उप याहि यज्ञं तुभ्यं पवन्त इन्दवः सुतासः।
गावो न वज्रिन्त्स्वमोको अच्छेन्द्रा गहि प्रथमो यज्ञियानाम्॥
हे इन्द्र देव! आप क्रोध रहित होकर हमारे यज्ञ में आवें, क्योंकि आपके लिए पवित्र सोमरस अभिषुत हुआ है। हे वज्रधर! जिस प्रकार से गौवें गोशाला में जाती हैं, उसी प्रकार सोमरस कलश में जाता है। इसलिए हे इन्द्र देव! आप पधारें। आप यज्ञ योग्य देवों में प्रधान हैं।[ऋग्वेद 6.41.1]
Hey Indr Dev! Join our Yagy free from anger, since Somras has been extracted for you. Hey wilder of Vajr! The ways cows come to the cow shed, Somras pour in the urn-pitcher. Hence, hey Indr Dev you arrive here being the senior-leader of the demigods-deities.
या ते काकुत्सुकृता या वरिष्ठा यया शश्वत्पिबसि मध्व ऊर्मिम्।
तया पाहि प्र ते अध्वर्युरस्थात्सं ते वज्रो वर्ततामिन्द्र गव्युः॥
हे इन्द्रदेव! आप जिस सुनिमित और सुविस्तृत जिह्वा से सदैव सोमरस का पान करते हैं, उसी जिह्वा से हमारे सोमरस का पान करें। सोमरस लेकर ऋत्विक लोग आपके सामने खड़े हैं। हे इन्द्र देव! शत्रुओं की गौओं को आत्मसात करने के लिए अभिलाषी आपका वज्र शत्रुओं का वध करें।[ऋग्वेद 6.41.2]
Hey Indr Dev! Drink Somras with your broad & regulated tongue here, as you always do so. The Ritviz are standing to serve Somras in front of you. Hey Indr Dev! To adopt the cows of the enemies kill the enemies with your Vajr.
एष द्रप्सो वृषभो विश्वरूप इन्द्राय वृष्णे समकारि सोमः।
एतं पिब हरिवः स्थातरुग्र यस्येशिषे प्रदिवि यस्ते अन्नम्॥
द्रवीभूत, अभीष्टवर्षी और विविध मूर्ति यह सोमरस मनोरथ वर्षक इन्द्र देव के लिए निर्मित हुआ है। हे अश्वों के अधिपति, सबके शासक और प्रचण्ड बलशाली इन्द्र देव! बहुत दिनों से जिसके ऊपर आपने प्रभुत्व किया और जो आपके लिए अन्न रूप माना गया, उसी सोमरस का आप पान करें।[ऋग्वेद 6.41.3]
This liquified Somras, accomplishing desires in various forms has been prepared by Indr Dev. Hey master-lord of horses, ruler of all, terrific mighty Indr Dev! Drink Somras which was under your rule and like food grains for you.
सुतः सोमो असुतादिन्द्र वस्यानयं श्रेयाञ्चिकितुषे रणाय।
एतं तितिर्व उप याहि यज्ञं तेन विश्वास्तविषीरा पृणस्व॥
हे इन्द्र देव! अभिषुत सोम अनभिषुत सोम से श्रेष्ठतर है और विचारशाली आपके लिए अधिक प्रसन्नताकारक है। शत्रु विजयी इन्द्र देव! आप यज्ञ साधन इस सोमरस के पास आवें और इसका पान करके समस्त शक्तियों का विकास करें।[ऋग्वेद 6.41.4]
Hey Indr Dev! Extracted Somras is better than the raw and grant pleasure, exhilarate you. Hey winner of the enemy Indr Dev! Drink this Somras and boost your powers.
ह्वयामसि त्वेन्द्र याह्यर्वाङरं ते सोमस्तन्वे भवाति।
शतक्रतो मादयस्वा सुतेषु प्रास्माँ अव पृतनासु प्र विक्षु॥
हे इन्द्र देव! हम आपका आवाहन करते हैं। आप हमारे सम्मुख आवें। हमारा यह सोमरस आपके शरीर के लिए पर्याप्त है। हे इन्द्र देव! अभिषुत सोमरस के पान के द्वारा प्रसन्न होवें और युद्ध में सभी शत्रुओं से हमारी चारों ओर से रक्षा करें।[ऋग्वेद 6.41.5]
Hey Indr Dev! We invoke you. Come to us. Our Somras is sufficient for your body. Hey Indr Dev! Drink this extracted Somras and be happy, protect us from all sides from the enemy.(29.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (42) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- बृहती, अनुष्टुप्।
प्रत्यस्मै पिपीषते विश्वानि विदुषे भर।
अरङ्गमाय जग्मयेऽपश्चाद्दघ्वने नरे॥
हे ऋत्विको! इन्द्र देव को सोमरस प्रदान करें; क्योंकि वे पिपासु, सर्वज्ञाता, सर्वगामी, यज्ञ में अधिष्ठाता, यज्ञ के नायक और सभी के अग्रगामी हैं।[ऋग्वेद 6.42.1]
पिपासु :: जो प्यासा हो, तृषित, पीने का इच्छुक; thirsty.
Hey Ritviz! Provide Somras to Indr Dev, since he wish to drink it, aware of every thing, capable of moving to every place, deity & leader of the Yagy and remain forward to all.
एमेनं प्रत्येतन सोमेभिः सोमपातमम्।
अमत्रेभिर्ऋजीषिणमिन्द्रं सुतेभिरिन्दुभिः॥
हे ऋत्विको! आप सोमरस के साथ अतिशय सोमरस पान कारी इन्द्र देव के पास उपस्थित होवें। अभिषुत सोमरस से भरे हुए पात्र के साथ बलशाली इन्द्र देव के सम्मुख प्रार्थना करें।[ऋग्वेद 6.42.2]
Hey Ritviz! Present yourself with the urn-pot full of Somras in front of Indr Dev. Make requests-prayers with the extracted Somras to mighty Indr Dev.
यदी सुतेभिरिन्दुभिः सोमेभिः प्रतिभूषथ।
वेदा विश्वस्य मेधिरो धृषत्तन्तमिदेषते॥
हे ऋत्विको! अभिषुत और दीप्त सोमरस के साथ इन्द्र देव के पास उपस्थित होवें। मेधावी इन्द्रदेव आपका अभिप्राय जानते हैं और शत्रु संहार के साथ वह तुम्हारे मनोरथ को पूर्ण कर देंगे।[ऋग्वेद 6.42.3]
Hey Ritviz! Present yourself in front of Indr Dev with the extracted & aurous Somras. Intellectual Indr Dev knows your purpose for the visit. Not only will he kill the enemies, he will accomplish your desires as well.
अस्माअस्मा इदन्यसोऽध्वर्यो प्र भरा सुतम्।
कुवित्समस्य जेन्यस्य शर्धतोऽभिशस्तेरवस्परत्॥
हे ऋत्विक्! एक मात्र इन्द्रदेव को ही सोमरूप अन्न का अभिषुत रस प्रदान करें। इन्द्र देव हमारे समस्त उत्साही और जीते जाने वाले शत्रुओं के द्वेष से हमारी सदैव रक्षा करेंगे।[ऋग्वेद 6.42.4]
उत्साही :: उत्साह युक्त, उत्साहशील, सरगर्म; enthusiastic, zealous.
Hey Ritviz offer the Somras extracted from the food grains only to Indr Dev. Indr Dev will always protect us from the envy of our enthusiastic, zealous enemies who have been won by us.(30.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (43) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- उष्णिक्।
यस्य त्यच्छम्बरं मदे दिवोदासाय रन्धयः।
अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब॥
हे इन्द्र देव! जिस सोमरस पान के उल्लास में आपने दिवोदास के लिए शम्बर का वध किया, वही सोमरस आपके लिए अभिषुत हुआ। इसलिए इसका आप पान करें।[ऋग्वेद 6.43.1]
Hey Indr Dev! The Somras for drinking which you killed Shambar for Divodas in glee, has been extracted for you. Therefore, you should drink it.
यस्य तीव्रसुतं मदं मध्यमन्तं च रक्षसे।
अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब॥
हे इन्द्र देव! जब सोम का मादक रस, प्रातः, मध्याह्न और सायं की पूजा में अभिषुत होता है, तब आप इसे धारित करते है। यही सोमरस आपके लिए अभिषुत हुआ है, आप इसका पान करें।[ऋग्वेद 6.43.2]
Hey Indr Dev! You support-hold the intoxicating Somras extracted in the morning, noon and the evening prayers. It has been extracted for you. Please drink it.
यस्य गा अन्तरश्मनो मदे दृळ्हा अवासृजः।
अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब॥
हे इन्द्र देव! जिस सोम के मादक रस का पान करके आपने पर्वत के बीच, अच्छी तरह से बँधी हुई गौवों को छुड़ाया था, वही सोमरस आपके लिए अभिषुत है, इसका आप पान करें।[ऋग्वेद 6.43.3]
Hey Indr Dev! The Somras for drinking which you released the cows kept-held in the mountains has been extracted for you, drink it.
यस्य मन्दानो अन्धसो माघोनं दधिषे शवः।
अयं स सोम इन्द्र ते सुतः पिब॥
हे इन्द्र देव! जिस सोमरूप अन्न के रसपान से उल्लसित होकर आप असाधारित बल को धारित करते हैं, वही सोमरस आपके लिए अभिषुत हुआ है। इसका आप पान करें।[ऋग्वेद 6.43.4]
Hey Indr Dev! The Somras for drinking which you glee-frolic & possess exemplary strength has been extracted for you, drink it.(30.09.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (44) :: ऋषि :- शंयु बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- अनुष्टुप्, विराट्, त्रिष्टुप्।
यो रयिवो रयिंतमो यो घुम्नैर्द्युम्नवत्तमः।
सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः॥
हे धनशाली और सोमरूप अन्न के रक्षक इन्द्र देव! जो सोम अतिशय धनशाली है और जो दीप्त यश के द्वारा समुज्ज्वल है, वही सोम अभिषुत होकर आपको आनन्दित करता है।[ऋग्वेद 6.44.1]
Hey wealthy and protector of the food grains in the form of Som, Indr Dev! The Som which is rich and famous gives you pleasure on being extracted.
यः शग्मस्तुविशग्म ते रायो दामा मतीनाम्।
सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः॥
हे विपुल सुखकारी और सोमरूप अन्न के रक्षाकारी इन्द्र देव! जो सोमरस आपकी प्रसन्नताकारक और आपके स्तोताओं का ऐश्वर्य विधायक है, वही सोम अभिषुत होकर आपको प्रसन्न करता है।[ऋग्वेद 6.44.2]
Hey protector of pleasure giving food grains in the form of Som, Indr Dev! The Somras gives you pleasure and grants grandeur to your Stotas on being extracted.
येन वृद्धो न शवसा तुरो न स्वाभिरूतिभिः।
सोमः सुतः स इन्द्र तेऽस्ति स्वधापते मदः॥
हे सोमरूप अन्न के रक्षक इन्द्र देव! जिस सोमरस के पान से प्रवृद्धबल होकर अपने रक्षक मरुतों के साथ शत्रुओं का विनाश करते हैं, वही सोम अभिषुत होकर आपको आनन्दित करता है।[ऋग्वेद 6.44.3]
Hey protector of Som in the form of food grains, Indr Dev! Drinking of which Somras makes you strong you to kill the enemies along with your protectors Marud Gan, is extracted for your happiness.
त्यमु वो अप्रहणं गृणीषे शवसस्पतिम्।
इन्द्रं विश्वासाहं नरं मंहिष्ठं विश्वचर्षणिम्॥
हे यजमानों! हम आपके लिए उन इन्द्र देव की प्रार्थना करते हैं, जो भक्तों के कृपालु, बल के स्वामी, विश्वजेता, यागादि क्रियाओं के नायक और श्रेष्ठ दाता तथा सर्वदर्शक हैं।[ऋग्वेद 6.44.4]
कृपालु :: दयालु, आसक्त, रिआयती, सज्जनतापूर्ण, सदय, रहमदिल, मेहरबान, अनुग्राही, तरस करनेवाला, समवेदनापूर्ण, merciful, indulgent, kind.
Hey Ritviz! We worship Indr Dev who is the Lord of might, merciful, leader in the celebrations like Yagy, best donor and watches every thing.
यं वर्धयन्तीद्गिरः पतिं तुरस्य राधसः।
तमिन्न्वस्य रोदसी देवी शुष्मं सपर्यतः॥
हमारी स्तुतियों द्वारा इन्द्र देव का जो शत्रु धन हरण करने वाला बल वर्द्धित होता है, उसी बल की परिचर्या स्वर्ग देव और पृथ्वी देवी करती हैं।[ऋग्वेद 6.44.5]
Swarg Dev (Heavens) & Prathvi Devi (Earth) serve that might-strength of Indr Dev with which he snatch the wealth of the enemy by virtue of our worship-prayers, Stuti.
तद्व उक्थस्य बर्हणेन्द्रायोपस्तृणीषणि।
विपो न यस्योतयो वि यद्रोहन्ति सक्षितः॥
हे स्तोताओं! इन्द्र देव के लिए अपना स्तोत्र विस्तृत करें; क्योंकि मेधावी व्यक्ति की भाँति इन्द्रदेव हमारे रक्षक हैं।[ऋग्वेद 6.44.6]
Hey Stotas! Expand your Strotr for the sake Indr Dev, since like an intellectual, he is our protector.
अविदद्दक्षं मित्रो नवीयान्पपानो देवेभ्यो वस्यो अचैत्।
ससवान्त्स्तौलाभिर्धौ तरीभिरुरुष्या पायुरभवत्सखिभ्यः॥
जो याजकगण यज्ञादि कार्य में दक्ष है, उसकी बातें इन्द्र देव जानते हैं। मित्र और नवीनतर सोमरस का पान करने वाले इन्द्रदेव स्तोताओं को श्रेष्ठ धन प्रदान करते हैं। हव्यरूपी अन्न भोजन करने वाले वह इन्द्र देव प्रवृद्ध और पृथ्वी को कम्पायमान करने वाले अश्वों के साथ स्तोताओं की रक्षा की कामना से आकर उनकी रक्षा करते हैं।[ऋग्वेद 6.44.7]
Indr Dev is aware of the deeds-endeavours of the Ritviz who are expert-skilled in Yagy etc. related jobs. Mitr and Indr Dev drink freshly extracted Somras and grant best riches to the Stotas. Indr Dev who eat offerings; ride the well nourished horses, which tremble the earth, come and protect the Stotas.
ऋतस्य पथि वेधा अपायि श्रिये मनांसि देवासो अक्रन्।
दधानो नाम महो वचोभिर्वपुर्दृशये वेन्यो व्यावः॥
यज्ञमार्ग में सर्वदर्शी सोमरस पीया गया। ऋत्विक लोग उसी सोमरस को इन्द्र देव का चित्त आकृष्ट करने के लिए प्रदर्शित करते हैं। शत्रुजेता और विशाल देह धारित करने वाले वही इन्द्र देव हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होकर हमारे सम्मुख प्रकट हों।[ऋग्वेद 6.44.8]
Somras was drunk in the Yagy which grants equanimity. The Ritviz demonstrate that Somras to attract the innerself of Indr Dev. Let the winner of enemies and possessor of huge body Indr Dev invoke in front of us.
द्युमत्तमं दक्षं धेह्यस्मे सेधा जनानां पूर्वीररातीः।
वर्षीयो वयः कृणुहि शचीभिर्धनस्य सातावस्माँ अविड्ढि॥
हे इन्द्र देव! आप हमें अतीव दीप्ति से युक्त बल प्रदान करें। अपने उपासकों के असंख्य शत्रुओं को दूर करें। अपनी बुद्धि से हमें यथेष्ट अन्न प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.44.9]
Hey Indr Dev! Grant us might along with radiance. Repel the numerous enemies of your worshipers. Grant us sufficient food grains by virtue of your intellect.
इन्द्र तुभ्यमिन्मघवन्नभूम वयं दात्रे हरिवो मा वि वेनः।
नकिरापिर्ददृशे मर्त्यत्रा किमङ्ग रचोदनं त्वाहुः॥
हे धनशाली इन्द्र देव! आपके लिए ही हम हव्य दे रहे हैं। हे अश्वों के स्वामी इन्द्र देव! हमारे प्रतिकूल न होना, मनुष्यों के बीच हम आपके अतिरिक्त किसी को अपना मित्र नहीं मानते। हे इन्द्र देव! यदि आपके अन्दर यह गुण न होता तो प्राचीन लोग आपको 'धनद' क्यों कहते?[ऋग्वेद 6.44.10]
Hey wealthy Indr Dev! We are making offerings for you. Hey Lord of horses! Don't be against us, since we do not consider any one else our friend, except you. The ancient people called-titled you Dhanad by virtue of your quality.
मा जस्वने वृषभ नो ररीथा मा ते रेवतः सख्ये रिषाम।
पूर्वीष्ट इन्द्र निष्षिधो जनेषु जह्यसुष्वीन्प्र वृहापृणतः॥
हे अभीष्टवर्षी इन्द्र देव! आप हमें कार्य विनाशक राक्षसादिकों के पास मत छोड़ना। आप धन युक्त हैं। आपकी मित्रता के ऊपर अवलम्बित होकर हम कोई विघ्न न प्राप्त कर सकें। मनुष्यों के बीच आपके लिए अनेक प्रकार के विघ्न उत्पन्न किये जाते हैं। जो अभिषव कर्ता नहीं हैं, उनका संहार करें और जो आपको हव्य नहीं देते, उनका विनाश करें।[ऋग्वेद 6.44.11]
अभिषव :: यज्ञादि के समय किया जाने वाला स्नान, यज्ञ, शराब चुआना, आसवन; distillation, Yagy, bathing prior to Yagy.
Hey desires accomplishing Indr Dev! Don't spare demons etc. who destroy our work, efforts-endeavours. Having dependence upon your friendship, we should not be hindered. Several types of obstructions are created for you, amongest-by the humans. Destroy those who do not bath prior to Yagy or distil Somras.
उदभ्राणीव स्तनयन्नियतन्द्रो राधांस्यश्र्व्यानि गव्या।
त्वमसि प्रदिवः कारुधाया मा त्वादामान आ दभन्मघोनः॥
गर्जन करने वाले पर्जन्य जिस प्रकार से मेघ उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार इन्द्र देव स्तोताओं को देने के लिए अश्व और गौर उत्पन्न करते हैं। हे इन्द्र देव! आप स्तोताओं के प्राचीन रक्षक है। आपको हव्य न देकर धनवान आपके प्रति अन्यथा आचरण न करें।[ऋग्वेद 6.44.12]
The way thundering Parjany Dev create clouds, similarly Indr Dev create horses and Gour for the Stotas. Hey Indr Dev! You are ancient-eternal protector of the Stotas. The rich should not act against you by failing to make offerings for you.(01.10.2023)
अध्वर्यो वीर प्र महे सुतानामिन्द्राय भर स ह्यस्य राजा।
यः पूर्व्याभिरुत नूतनाभिर्गीर्भिर्वावृधे गृणतामृषीणाम्॥
हे ऋत्विको! आप इन्हीं महेन्द्र को अभिषुत सोमरस अर्पित करें; क्योंकि ये ही सोम के स्वामी हैं। यही इन्द्र देव स्तोता ऋषियों के प्राचीन और नवीन स्तोत्रों के द्वारा परिवर्द्धित हुए हैं।[ऋग्वेद 6.44.13]
Hey Ritviz! Offer Somras to Mahendr since he is the Lord of Somras. Indr Dev flourished by the old and new Strotr of the Stota Rishis.
अस्य मदे पुरु वर्षांस विद्वानिन्द्रो वृत्राण्यप्रती जघान।
तमु प्र होषि मधुमन्तमस्मै सोमं वीराय शिप्रिणे पिबध्यै॥
ज्ञानी और अबाध प्रभाव इन्द्र देव ने इसी सोमरस का पान कर और उल्लसित होकर असंख्य प्रतिकूल आचरण करने वाले शत्रुओं का संहार किया।[ऋग्वेद 6.44.14]
Intellectual and showing extreme impact Indr Dev drunk this Somras and happily destroyed the numerous enemies who acted againt him.
पाता सुतमिन्द्रो अस्तु सोमं हन्ता वृत्रं वज्रेण मन्दसानः।
गन्ता यज्ञं परावतश्चिदच्छा वसुर्धीनामविता कारुधायाः॥
इन्द्र देव इस अभिषुत सोमरस का पान करें और इससे आनन्दित होकर वज्र द्वारा वृत्रासुर का संहार करें। गृहदाता, स्तोत्र रक्षक और याजकगण पालक वह इन्द्र देव दूर स्थान से भी हमारे यज्ञ में पधारें।[ऋग्वेद 6.44.15]
Let Indr Dev drink this extracted Somras and kill Vratasur with his Vajr, happily. Indr Dev who grant houses, protect the Strotr and nourish the Ritviz should reach in our Yagy even if far from us.
इदं त्यत्पात्रमिन्द्रपानमिन्द्रस्य प्रियममृतमपायि।
मत्सद्यथा सौमनसाय देवं व्य१स्मद्द्द्वेषो युयवद्वयंहः॥
इन्द्र देव के पीने के योग्य और प्रिय वह सोमरूप अमृत इन्द्र देव के द्वारा इस प्रकार पीया जाए कि वे हर्षित होकर हमारे ऊपर अनुग्रह करें और हमारे शत्रुओं तथा पाप को हमसे दूर करें।[ऋग्वेद 6.44.16]
Somras suitable for Indr Dev be drunk in this way he become happy and oblige us, repel our enemies and the sins.
एना मन्दानो जहि शूर शत्रूञ्जामिमजामिं मघवन्नमित्रान्।
अभिषेणाँ अभ्या३ देदिशानान्पराच इन्द्र प्र मृणा जही च॥
हे शौर्यशाली इन्द्र देव! इस सोमरस के पान से प्रसन्न होकर हमारे आत्मीय और अनात्मीय प्रतिकूलाचरण कर्ता शत्रुओं का विनाश करें। हे इन्द्र देव! हमारे सामने आए हुए अस्त्र छोड़ने वाले शत्रुओं का आयुधों सहित विनाश करें और उन्हें पराजित करके हमसे दूर भगाएँ।[ऋग्वेद 6.44.17]
Hey brave-valour possessing Indr Dev! Be happy by drinking this Somras, eliminate our own people and enemies who act against us. Hey Indr Dev! Kill those enemies who run away leaving behind their weapons, defeat them and destroy them with their arms and ammunition.
आसु ष्मा णो मघवन्निन्द्र पृत्स्व १ स्मभ्यं महि वरिवः सुगं कः।
अपां तोकस्य तनयस्य जेष इन्द्र सूरीन्कृणुहि स्मा नो अर्धम्॥
हे इन्द्र देव! हमारे इस समस्त युद्ध में अतुल धन हमें प्रदान करें। जय प्राप्ति में हमें समर्थ्यवान् बनावें। वर्षा, पुत्र और पौत्र के द्वारा हमें समृद्ध करें।[ऋग्वेद 6.44.18]
Hey Indr Dev! Grant us unlimited wealth in this war. Make us capable of winning the war. Enrich us with rains, son & grandson.
आ त्वा हरयो वृषणो युजाना वृषरथासो वृषरश्मयोऽत्याः।
अस्मत्राञ्चो वृषणो वज्रवाहो वृष्णे मदाय सुयुजो वहन्तु॥
हे इन्द्र देव! आपके अभीष्ट वर्षक, स्वेच्छा के अनुसार रथ में नियुक्त, अभीष्ट दाता रथ के ढोने वाले, जल वर्षक, किरणों द्वारा संयुक्त, द्रुत गामी, हमारे सामने आने वाले, सदैव युवा, वज्र वाहक और शोभन रूप से योजित अश्व बहुत नशा करने वाले सोमरस को पीने के लिए आपको इस यज्ञ में ले आवें।[ऋग्वेद 6.44.19]
Hey Indr Dev! Let your accomplishment granting, self deploying in the charoite, carrier of the desires accomplishing charoite, rain producing, associated with the rays, fast moving, appearing before us, always young horses bring you-the drinker of a lot of Somras, here.
आ ते वृषन्वृषणो द्रोणमस्थुर्घृतप्रुषो नोर्मयो मदन्तः।
इन्द्र प्र तुभ्यं वृषभिः सुतानां वृष्णे भरन्ति वृषभाय सोमम्॥
हे अभीष्ट वर्षी इन्द्र देव! आपके जलवर्षक और युवा अश्व जल का सेवन करने वाली समुद्र तरङ्गों के समान उल्लसित होकर आपके रथ में नियोजित हैं। आप युवा और काम वर्षक हैं। ऋत्विक लोग आपको पत्थरों द्वारा अभिषुत सोमरस अर्पण करते हैं।[ऋग्वेद 6.44.20]
Hey accomplishment granting Indr Dev! Let your young, rains showering horses, like the waves of the ocean, happily deploy in the charoite. You are young and sex stimulating. The Ritviz offer you the Somras extracted by crushing with stones.
वृषासि दिवो वृषभः पृथिव्या वृषा सिन्धूनां वृषभः स्तियानाम्।
वृष्णे त इन्दुर्वृषभ प्रीपाय स्वादू रसो मधुपेयो वराय॥
हे इन्द्रदेव! आप स्वर्ग के सेवन कर्ता, पृथ्वी के वर्षण कर्ता, नदियों के पूरण कर्ता और एकन, समवेत स्थावर जङ्गम विश्वभूतों के अभीष्टकर्ता हैं। हे अभीष्ट प्रदायक इन्द्र देव! आप श्रेष्ठ सेचनकारी हैं। आपके लिए मधु के सदृश पीने योग्य मीठा सोमरस आपके लिए प्रस्तुत है।[ऋग्वेद 6.44.21]
Hey Indr Dev! You are the resident of heavens, rain showering over the earth, filling the rivers with water, accomplisher of the desires of the stationary living beings. Hey desires accomplishing Indr Dev! You are the best nourisher. Somras as sweet as honey is ready for you to drink.
अयं देवः सहसा जायमान इन्द्रेण युजा पणिमस्तभायत्।
अयं स्वस्य पितुरायुधानीन्दुरमुष्णादशिवस्य मायाः॥
इस दीप्तिमान सोम ने मित्र इन्द्र देव के साथ जल लेकर बलपूर्वक पणि की प्रार्थना की। इसी सोम ने गोरूप धन को चुराने वाले द्वेषियों की माया और अस्त्रों को विनष्ट किया।[ऋग्वेद 6.44.22]
This radiant Som, along with Mitr & Indr Dev repelled Pani forcefully, snatching water from him. This Som destroyed the stealers of cows and the cast of envious along with their weapons.
अयमकृणोदुषसः सुपत्नीरयं सूर्ये अदधाज्ज्योतिरन्तः।
अयं त्रिधातु दिवि रोचनेषु त्रितेषु विन्ददमृतं निगूळ्हम्॥
इसी सोम ने उषाओं के पति स्वरूप सूर्य देव को शोभायमान किया। इसी सोम ने सूर्य मण्डल में दीप्ति स्थापित की। इसी सोम ने दीप्ति संयुक्त तीनों भुवनों के बीच स्वर्ग में गूढ़ भाव से अवस्थित त्रिविध अमृतों को प्राप्त किया।[ऋग्वेद 6.44.23]
This Som glorified the Sun who is like the husband of Ushas. This Som established radiance-aura in the solar system. This Som obtained the nectar-elixir from the shining three abodes where it was placed secretly, in three different ways.
अयं द्यावापृथिवी विष्कभायदयं रथमयुनक्सप्तरश्मिम्।
अयं गोषु शच्या पक्वमन्तः सोमो दाधार दशयन्त्रमुत्सम्॥
इसी सोम ने स्वर्ग और पृथ्वी को अपने-अपने स्थानों पर संस्थापित किया। इसी सोम ने सप्तरश्मि रथ को नियोजित किया। इसी सोम ने स्वेच्छानुसार गौओं के बीच परिणत दुग्ध के दस यन्त्रों के कूप को या बहुधारा विशिष्ट प्रस्रवण को स्थापित किया।[ऋग्वेद 6.44.24]
This Som established the heavens and the earth in their respective positions. It deployed the charoite with seven rays. This Som willingly established the ten machines to collect milk in the well amongest the cows.(02.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (45) :: ऋषि :- शंयु बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्रदेव, बृबुस्तक्षा; छन्द :- गायत्री, अतिनिवृत्, पादनिचृत्, अनुष्टुप्।
य आनयत्परावतः सुनीती तुर्वशं यदुम्। इन्द्रः स नो युवा सखा॥
जो उत्कृष्ट नीति द्वारा तुर्वश और यदु दूर देश से लाया, वही युवा इन्द्र देव हमारे मित्र होवें।[ऋग्वेद 6.45.1]
वह युवा इंद्र, जो अच्छे मार्ग दर्शन से, तुर्वशा और यदु को दूर से लाया, हमारे मित्र बनें।
Young Indr Dev who brought Turvash and Yadu under excellent policy from a distant place, should become our friend.
अविप्रे चिद्वयो दधदनाशुना चिदर्वता। इन्द्रो जेता हितं धनम्॥
जो व्यक्ति इन्द्र देव की प्रार्थना नहीं करता, उसे भी इन्द्र देव अन्न प्रदान करते हैं। इन्द्र देव धीरे-धीरे चलने वाले अश्वों पर चढ़कर शत्रुओं के मध्य निहित सम्पत्ति को जीतते हैं।[ऋग्वेद 6.45.2]
One who do not worship Indr Dev too gets food grains from him. Indr Dev rides the slow moving horses amongest the enemies to win them.
महीरस्य प्रणीतयः पूर्वीरुत प्रशस्तयः। नास्य क्षीयन्त ऊतयः॥
इन्द्र देव की नीतियाँ उत्कृष्ट और महान् हैं। उनकी स्तुतियाँ भी नाना प्रकार की हैं। उनकी रक्षा का कथन कभी क्षीण नहीं होता।[ऋग्वेद 6.45.3]
Indr Dev's policy, diplomacy is great. His prayers too are of different nature. His assurance for protection is never lost.
सखायो ब्रह्मवाहसेऽर्चत प्र च गायत। स हि नः प्रमतिर्मही॥
हे मित्रों! मन्त्र द्वारा आह्वान के योग्य उन्हीं इन्द्र देव की पूजा करें और उन्हीं की प्रार्थना करें; क्योंकि वही हमें वस्तुतः प्रकृष्ट बुद्धि प्रदान करते हैं।[ऋग्वेद 6.45.4]
Hey friends! Worship-pray Indr Dev who is able to be invoked through the Mantr, since its he who will grant us excellent intelligences- ideas.
त्वमेकस्य वृत्रहन्नविता द्वयोरसि। उतेदृशे यथा वयम्॥
हे वृत्र विनाशक इन्द्र देव! आप स्तुति करने वाले के रक्षक हैं। आप हम सब की रक्षा करें।[ऋग्वेद 6.45.5]
Hey slayer of Vratasur Indr Dev! You are the protector of the person who pray you.
नयसीद्वति द्विषः कृणोष्युक्थशंसिनः। नृभिः सुवीर उच्यसे॥
हे इन्द्र देव! हमारे पास से विद्वेषियों को दूर करें और स्तोताओं को समृद्धि प्रदान करें। आप शोभन पुत्र-पौत्रादि देने वाले हैं; इसलिए मनुष्य आपकी प्रार्थना करते हैं।[ऋग्वेद 6.45.6]
Hey Indr Dev! Repel the enviers away from us and grant success-progress of Stotas. You award glorious son and grandsons, hence the humans worship you.
ब्रह्माणं ब्रह्मवाहसं गीर्भिः सखायमृग्मियम्। गां न दोहसे हुवे॥
मैं स्तोत्र के बल से मित्र, महान मन्त्र द्वारा आह्वान के योग्य और स्तुति पात्र इन्द्र देव को गौ के समान अभीष्ट दूहने के लिए आवाहित करता हूँ।[ऋग्वेद 6.45.7]
I invoke Indr Dev with the strength-power of the Strotr who deserve to be invoked by the Mantr, worshipable and accomplishing like the milking of cow.
यस्य विश्वानि हस्तयोरूचुर्वसूनि नि द्विता। वीरस्य पृतनाषहः॥
वीर्यवान और शत्रु सेना को पराजित करने वाले इन्द्र देव के दोनों हाथों में दिव्य और पार्थिव धन है; ऐसा ऋषियों ने कहा हैं।[ऋग्वेद 6.45.8]
The Rishis have said that the mighty and defeater of the enemy armies Indr Dev possess divine and material wealth in his both hands.
वि दृकहानि चिदद्रिवो जनानां शचीपते। वृह माया अनानत॥
हे वज्रधारक और यज्ञपति इन्द्र देव! आप शत्रुओं के दृढ़ किलों, नगरों को नष्ट करते है। हे सर्वोन्नत इन्द्र देव! आप शत्रुओं की मायाओं को विनष्ट करें।[ऋग्वेद 6.45.9]
Hey wielder of Vajr and deity of Yagy! You destroy the strong forts & cities of the enemies. Hey most advanced-progressive Indr Dev! Destroy the enchant-cast of the enemies.
तमु त्वा सत्य सोमपा इन्द्र वाजानां पते। अहूमहि श्रवस्यवः॥
हे सत्य स्वभाव, सोमपायी और अन्न रक्षक इन्द्र देव! हम अन्नाभिलाषी होकर ऐसे गुणों से संयुक्त आपका ही आवाहन करते हैं।[ऋग्वेद 6.45.10]
Hey truthful, Somras drinking and protector of food grains, Indr Dev! Desirous of food grains, we invoke you who possess these qualities.
तमु त्वा यः पुरासिथ यो वा नूनं हिते धने। हव्यः स श्रुधी हवम्॥
हे इन्द्र देव! आप पहले आह्वान के योग्य थे और इस समय शत्रुओं के बीच रखे हुए आपको बुलाते हैं। आप हमारा आह्वान श्रवण करें।[ऋग्वेद 6.45.11]
You deserve to be invoked. Presently we invoke you surrounded by the enemies. Listen to our prayers-request.(03.10.2023)
धीभिरर्वद्भिरर्वतो वाजाँ इन्द्र श्रवाय्यान्। त्वया जेष्म हितं धनम्॥
हे इन्द्र देव! हमारे स्तोत्र को सुनकर आपके प्रसन्न होने पर आपकी कृपा से हम शत्रुओं के अश्व, उत्कृष्ट अन्न और गूढ़ धन को जीतने में समर्थ होवें।[ऋग्वेद 6.45.12]
Hey Indr Dev! On listening to our Strotr your happiness will make us capable of winning the horses, excellent food grains and secret wealth of the enemies.
अभूरु वीर गिर्वणो महाँ इन्द्र धने हिते। भरे वितन्तसाय्यः॥
हे वीर और स्तुति पात्र इन्द्र देव! आप शत्रुओं के बीच निहित धन की प्राप्ति के लिए युद्ध में शत्रुओं को जीतने में समर्थ हुए।[ऋग्वेद 6.45.13]
Hey brave and worship deserving Indr Dev! You were successful in winning the enemy along with their wealth in the war.
या त ऊतिरमित्रहन्मक्षूजवस्तमासति। तया नो हिनुही रथम्॥
हे रिपुञ्जय इन्द्र देव! आपकी गति अतिशय वेग से संयुक्त है। शत्रुओं को जीतने के लिए आप उसी वेग से हमारे रथ को चलने की प्रेरणा प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.45.14]
Hey winner of the enemy Indr Dev! Your moments are associated with extremely high speed. Inspire-motivate our charoites to accelerate, run-move with that speed to win the enemy.
स रथेन रथीतमोऽस्माकेनाभियुग्वना। जेषि जिष्णो हितं धनम्॥
हे जयशील और रथि श्रेष्ठ इन्द्र देव! आप हमारे शत्रु विजयी रथ के द्वारा शत्रुओं के द्वारा निहित धन को जीतें।[ऋग्वेद 6.45.15]
Hey winner and excellent amongest the charoite drivers! Win the accumulated wealth of the enemy through our charoite, known for winning the enemy.
य एक इत्तमु ष्टुहि कृष्टीनां विचर्षणिः। पतिर्जज्ञे वृषक्रतुः॥
जो सर्वदर्शी और वर्षणशील हैं, जिन्होंने एक-एक मनुष्यों के अधिपति रूप से जन्म धारित किया, उन्हीं इन्द्र देव की प्रार्थना करें।[ऋग्वेद 6.45.16]
Worship that Indr Dev who watches every thing and cause rains, born as the leader of each & every human being.
यो गृणतामिदासिथापिरूती शिवः सखा। स त्वं न इन्द्र मृळय॥
हे इन्द्र देव! आप रक्षा के कारण सुखदाता और मित्र हैं। हमारी प्रार्थना पर आपने प्राचीन समय में मित्रता प्रकट की। इस समय हमें सुखी करें।[ऋग्वेद 6.45.17]
Hey Indr Dev! By virtue of your protective, grants comforts and is friendly. Make us comfortable.
धिष्व वज्रं गभस्त्यो रक्षोहत्याय वज्रिवः। सासहीष्ठा अभि स्पृधः॥
हे वज्रधर इन्द्र देव! आप राक्षसों के नाश के लिए अपने हाथों में वज्र धारित करते हैं और स्पर्द्धा करने वाले शत्रुओं को भली-भाँति पराजित करते हैं।[ऋग्वेद 6.45.18]
Hey Vajr wielding Indr Dev! You hold Vajr in the hands for the destruction of demons and competing enemies thoroughly.
प्रत्नं रयीणां युजं सखायं कीरिचोदनम्। ब्रह्मवाहस्तमं हुवे॥
जो धनद, मित्र, स्तोताओं के उत्साहदाता और मन्त्रों के द्वारा आह्वान के योग्य हैं, उन्हीं प्राचीन इन्द्र देव का मैं आह्वान करता हूँ।[ऋग्वेद 6.45.19]
I invoke eternal-ancient Indr Dev who is wealthy, encouraging deserve to be invoked through Mantrs.
स हि विश्वानि पार्थिवाँ एको वसूनि पत्यते। गिर्वणस्तमो अध्रिगुः॥
जो स्तुति द्वारा वन्दनीय और तीव्रगामी गति हैं, वही एक मात्र इन्द्र देव ही समस्त पार्थिव धनों के ऊपर एकाधिपत्य करते हैं।[ऋग्वेद 6.45.20]
Worshipable through Stutis, dynamic, Indr Dev is the only owner of all material wealth.
स नो नियुद्धिरा पृण कामं वाजेभिरश्विभिः। गोमद्भिर्गोपते घृषत्॥
हे गौओं के अधिपति! आप बड़वा लोगों के साथ पधार कर अन्न, असंख्य अश्वों और धेनुओं से भली-भाँति हमारे मनोरथ को पूर्ण करें।[ऋग्वेद 6.45.21]
Hey master-leader of the cows! Come with Badava-Agni, with food grains, innumerable horses and cows to accomplish our desire.
तद्वो गाय सुते सचा पुरुहूताय सत्वने। शं यद्गवे न शाकिने॥
हे स्तोताओं! जिस प्रकार से घास गौ के लिए सुख दायक होती है, उसी प्रकार सोमरस के तैयार होने पर इन्द्र देव का सुख दायक स्तोत्र भी बहुसंख्यक लोगों के द्वारा वन्दनीय होता है। रिपुञ्जय इन्द्र देव के पास एकत्रित होकर गान करें।[ऋग्वेद 6.45.22]
Hey Stotas! The way grass is comforting for the cow, Somras on being ready, the comforting Strotr of Indr Dev is worshipable by numerous people. Let us gather around defeater of the enemy Indr Dev and sing in his glory.
न घा वसुर्नि यमते दानं वाजस्य गोमतः। यत्सीमुप श्रवद्गिरः॥
गृह प्रदाता इन्द्र देव जिस समय हमारा स्तोत्र सुनते हैं, उस समय वे गौवों के साथ अन्न प्रदान करने में विरत नहीं होते।[ऋग्वेद 6.45.23]
When house granting-awarding Indr dev listen to our Strotr, he (do not alienate) donate cows and food grains.
कुवित्सस्य प्र हि व्रजं गोमन्तं दस्युहा गमत्। शचीभिरप नो वरत्॥
दस्युओं के वधकर्ता इन्द्र देव कुवित्स की असंख्य धेनुओं वाली गोशाला में और उन्होंने अपने बुद्धि बल से हमारे लिए उस निगूढ़ गोवृन्द को प्रकट किया।[ऋग्वेद 6.45.24]
Destroyer of the dacoits Indr Dev showed-brought numerous cows in the cow shed of Kuvits on the strength of his intelligence.
इमा उ त्वा शतक्रतोऽभि प्र णोनुवुर्गिरः। इन्द्र वत्सं न मातरः॥
बहुविध कर्मों के अनुष्ठाता इन्द्र देव! जिस प्रकार से गौवें बार-बार बछड़ों के सामने जाती है, उसी प्रकार हमारी ये सारी स्तुतियाँ बार-बार आपकी ओर जाती हैं।[ऋग्वेद 6.45.25]
Hey endeavourer of many procedural rites, Yagy, sacrifices Indr Dev! The way cows move to their calf many times, our Stutis-prayers too move to you.
दूणाशं सख्यं तव गौरसि वीर गव्यते। अश्वो अश्वायते भव॥
हे इन्द्र देव! आपकी मित्रता का विनाश नहीं होता। हे वीर! आप गौ चाहने वाले को गौ और अश्व चाहने वाले को अश्व प्रदान करते है।[ऋग्वेद 6.45.26]
Hey Indr Dev! Your valour is never lost. Hey brave! You provide cows to the desirous of cows and the horses to the desirous of horses.
स मन्दस्वा ह्यन्धसो राधसे तन्वा महे। न स्तोतारं निदे करः॥
हे इन्द्र देव! महाधन के लिए प्रदत्त सोमरस का पान करके अपने को हृदय पुष्ट करें। आप अपने उपासक को निन्दक के हाथ नहीं सौंपते।[ऋग्वेद 6.45.27]
Hey Indr Dev! Nourish your heart by drinking Somras for granting great wealth. You do not hand over your worshiper to the cynic.
इमा उ त्वा सुतेसुते नक्षन्ते गिर्वणो गिरः। वत्सं गावो न धेनवः॥
हे प्रार्थना द्वारा वन्दनीय इन्द्र देव! जिस प्रकार से दूध देने वाली गौवें बछड़ों के पास जाती हैं, उसी प्रकार बार-बार सोमरस के अभिषुत होने पर हमारी ये स्तुतियाँ अतिवेग से आपकी ओर जाती हैं।[ऋग्वेद 6.45.28]
Hey Indr Dev worshiped with prayers-Stutis! The way the milch cows move to their calf, our Stutis too direct to you, when the Somras is extracted.
पुरूतमं पुरूणां स्तोतॄणां विवाचि। वाजेभिर्वाजयताम्॥
यज्ञ मण्डप में हव्य रूप अन्न के साथ दिये गये असंख्य स्तोताओं के स्तोत्र, असंख्य शत्रुओं के नाशक आपको बलशाली करें।[ऋग्वेद 6.45.29]
Let the offerings of food grains in the Yagy Mandap with the recitation of Strotr by numerous Stotas make you mighty-strong enough to destroy numerous enemies.
अस्माकमिन्द्र भूतु ते स्तोमो वाहिष्ठो अन्तमः। अस्मान्राये महे हिनु॥
हे इन्द्र देव! अतीव उन्नति कारक हमारे स्तोत्र आपके पास जावे। हमें महाधन की प्राप्ति के लिए प्रेरित करें।[ऋग्वेद 6.45.30]
Hey Indr Dev! Let our highly progressive Strotr reach you and inspire you to give us great wealth.
अधि बृबुः पणीनां वर्षिष्ठे मूर्धन्नस्थात्। उरुः कक्षो न गाङ्ज्ञः/गाङ्गयः॥
गङ्गा के ऊँचे तटों के समान प्राणियों के बीच ऊँचे स्थान पर बृबु ने अधिष्ठान किया।[ऋग्वेद 6.45.31]
Brabu carried out rites, religious ceremonies among the living beings who were over tall like elevated banks of Ganga.
यस्य वायोरिव द्रवद्भद्रा रातिः सहस्रिणी। सद्यो दानाय मंहते॥
मैं धनार्थी हूँ, बृबु ने मुझे वायु वेग के समान वदान्यता के साथ एक हजार गौवें तत्काल प्रदान की।[ऋग्वेद 6.45.32]
I seek wealth. Brabu granted me thousand cows with the speed of wind immediately.
तत्सु नो विश्वे अर्य आ सदा गृणन्ति कारवः।
बृबुं सहस्त्रदातमं सूरिं सहस्रसातमम्॥
हम सब लोग प्रार्थना करके हजारों गायें देने वाले विद्वान और हजारों स्तोत्रों के पात्र उन्हीं बृबु की सदैव प्रसंशा करते हैं।[ऋग्वेद 6.45.33]
We all appreciate enlightened and deserving like the thousands of Strotr Brabu, who granted thousands cows to us.(04.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (46) :: ऋषि :- शंयु बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र; छन्द :- प्रगाथ।
त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः।
तवां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः॥
हम स्तोता हैं। अन्न प्राप्ति के लिए आपका आवाहन करते हैं। आप साधुओं के रक्षक है; इसलिए अश्वों से युक्त युद्ध में शत्रुओं को जीतने के लिए वे आपका ही आवाहन करते हैं।[ऋग्वेद 6.46.1]
We are Stotas. We invoke you for the sake of food grains. You are the protector of sages. You are invoked during the war to win the enemy in which horses are deployed.
स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया महः स्तवानो अद्रिवः।
गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे॥
हे विचित्र वज्रपाणि वज्री! जिस प्रकार से आप युद्ध में विजयी पुरुष को यथेष्ट अन्न देते है, उसी प्रकार आप हमारी प्रार्थना से प्रसन्न होकर हमें यथेष्ट गौ और रथ वहन करने में समर्थ अश्व प्रदान करें; क्योंकि आप शत्रु नाशक और प्रतापी हैं।[ऋग्वेद 6.46.2]
Hey amazing Vajr wielding Vajri! The way you provide food grains to the winner in the war, give us sufficient cows and horses capable of pulling charoite as well, since you are glorious, destroyers of the enemy.
यः सत्राहा विचर्षणिरिन्द्रं तं हूमहे वयम्।
सहस्रमुष्क तुविनृम्ण सत्पते भवा समत्सु नो वृधे॥
जो प्रबल शत्रुओं के निधन कर्ता और सर्वदर्शी हैं, उन्हीं इन्द्र देव को हम बुलाते हैं। सहस्रशेक, अतुल धन युक्त और सत्पालक इन्द्र देव युद्ध स्थल में आप हमें समृद्धि प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.46.3]
We invoke Indr Dev who is the slayer of the enemy and visualise every thing. Hey possessor of innumerable wealth, protector of the truthful grant us prosperity at the war field.
बाधसे जनान्वृषभेव मन्युना घृषौ मीळह ऋचीषम।
अस्माकं बोध्यविता महाधने तनूष्वप्सु सूर्ये॥
हे इन्द्र देव! जैसा ऋचा में वर्णन मिलता है, वैसा ही आपका रूप है। आप तुमुल युद्ध बैल की तरह अत्यन्त क्रोध के साथ हमारे शत्रुओं पर आक्रमण करें। जिससे हम सन्तति, जल और सूर्य का दर्शन कर सकें, उसके लिए आप युद्धभूमि में हमारे रक्षक बनें।[ऋग्वेद 6.46.4]
तुमुल :: सेना की धूम, लड़ाई की हलचल, सेना की भिड़न्त, गहरी मुठभेड़, बहेड़े का पेड़, हलचल उत्पन्न करने वाला, शोरगुल से युक्त, भयंकर, तीव्र, घोर या भीषण युद्ध, मुठभेड़, घमासान, सेना का कोलाहल, बहेड़े का वृक्ष; fierce war.
Hey Indr Dev! You appear as per your description in the scriptures-Richas-hymns. Attack the enemy furiously in the fierce war like bull. Be our protector in the war so that we can have progeny, water and see the Sun.
इन्द्र ज्येष्ठं न आ भरँ ओजिष्ठं पपुरि श्रवः।
येनेमे चित्र वज्रहस्त रोदसी ओ सुशिप्र प्राः॥
हे शोभन हनु वाले और अद्भुत वज्र पाणि इन्द्र देव! जिस अन्न से आप स्वर्ग और पृथ्वी का पोषण करते हैं, हमारे पास वही प्रकृष्टतम, अत्यन्त बलवर्द्धक और पुष्टिकारक अन्न ले आयें।[ऋग्वेद 6.46.5]
Hey possessor of beautiful chin and amazing Vajr Indr Dev! Grant us the food grains with which you nourish the heavens & the earth. Bring us the nourishing, strengthening and excellent food grains.
त्वामुग्रमवसे चर्षणीसहं राजन्देवेषु हूमहे।
विश्वा सु नो विथुरा पिब्दना वसोऽमित्रान्त्सुषहान्कृधि॥
हे दीप्तिशाली इन्द्र देव! आप हमारी रक्षा करेंगे; इसलिए आपका आवाहन करते हैं। आप देवों में सबसे बलवान् और शत्रुजयी हैं। हे गृहदाता इन्द्रदेव! आप समस्त राक्षसों से हमारी रक्षा करें, जिससे हम शत्रुओं के ऊपर विजय प्राप्त कर सकें।[ऋग्वेद 6.46.6]
Hey radiant Indr Dev! We invoke you since we know that you will help us. You are the mightiest amongest the demigods-deities and winner of the enemy. Hey granter of house Indr Dev! You protect us from the demons so that we can win over-over power the enemies.
यदिन्द्र नाहुषीवाँ ओजो नृम्णं च कृष्टिषु।
यद्वा पञ्च क्षितीनां द्युम्नमा भर सत्रा विश्वानि पौंस्या॥
हे इन्द्र देव! मनुष्यों में जो कुछ बल और धन है और पाँचों जनों में जो अन्न हैं, वो सब समस्त महान बल के साथ हमें प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.46.7]
मनुष्यों में जो भी ताकत और ऐश्वर्य मौजूद है, पाँचों वर्गों के लोगों का भरण-पोषण जो भी हो, इंद्र को हमारे पास लाएं, साथ ही सभी महान मर्दाना ऊर्जाओं को भी हमारे पास लायें।
Hey Indr Dev! Bring the strength-might, wealth and the food grains for the nourishment of the five Varn-castes, classes of the humans for us.
यद्वा तृक्षौ मघवन्द्रुह्यावा जने यत्पूरौ कच वृष्ण्यम्।
अस्मभ्यं तद्रिरीहि सं नृषाह्येऽमित्रान्पृत्सु तुर्वणे॥
हे ऐश्वर्य शाली इन्द्र देव! शत्रुओं के साथ युद्ध प्रारम्भ होने पर हम उन्हें युद्ध में जीत सकें, इसके लिए आप हमें तक्षु, द्राह्य और पुरु का समस्त बल प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.46.8]
Hey Indr Dev possessing grandeur! Grant us the strength of Takshu, Drahy and Puru prior to the beginning of war with the enemies so that we can win them.
इन्द्र त्रिधातु शरणं त्रिवरूथं स्वस्तिमत्।
छर्दिर्यच्छ मघवद्भ्यश्च मह्यं च यावया दिद्युमेभ्यः॥
हे इन्द्र देव! हव्य रूप धन से युक्त मनुष्यों को और मुझे एक ऐसा गृह दें, जो लकड़ी, ईंट और पत्थर का बना हुआ हो और जिसमें शीत, ताप और ग्रीष्म न सतावें तथा जो गृह समृद्ध और आच्छादक हो। शत्रुओं से समस्त दीप्ति युक्त आयुधों को (हमसे) दूर करें।[ऋग्वेद 6.46.9]
Hey Indr Dev! Grant the humans houses made of wood, bricks & stones, possessing wealth in the form of offerings; capable of protecting from the cold, heat and summer with prosperity and protection. Keep off the weapons of the enemies possessing radiance-fire, light.
ये गव्यता मनसा शत्रुमादभुरभिप्रघ्नन्ति धृष्णुया।
अध स्मा नो मघवन्निन्द्र गिर्वणस्तनूपा अन्तमो भव॥
हे ऐश्वर्य शाली इन्द्र देव! जिन्होंने हमारी गौवें अपहृत करने के लिए हमारे ऊपर शत्रुवत् आक्रमण किया, उनसे हमारी रक्षा करने के लिए हमारे पास आवें।[ऋग्वेद 6.46.10]
Hey Indr Dev, possessing grandeur! Come to us for protection from those who attacked us like enemies to abduct our cows.
अध स्मा नो वृधे भवेन्द्र नायमवा युधि।
यदन्तरिक्षे पतयन्ति पर्णिनो दिद्यवस्तिग्ममूर्धानः॥
हे इन्द्र देव! इस समय हमें धन प्रदान करें। जिस समय पक्ष युक्त तीक्ष्णाग्र और दीप्त शत्रुओं के बाण आकाश से गिरते हैं, उस समय जो हमारी रक्षा करते हैं, उनकी रक्षा आप युद्धभूमि में करें।[ऋग्वेद 6.46.11]
Hey Indr Dev! Grant us money at this moment. Protect those in the battle field who protect us from the sharp, fire arms-arrows falling from the sky.
यत्र शूरासस्तन्वो वितन्वते प्रिया शर्म पितॄणाम्।
अध स्मा यच्छ तन्वे३तने च छर्दिरचित्तं यावय द्वेषः॥
शत्रुओं के सामने जिस समय वीर लोग अपनी देह को दिखाते और पैतृक स्थानों का परित्याग करते हैं, उस समय आप हमें और हमारी सन्तानों को शरीर रक्षा के लिए गुप्त रूप से कवच दें और शत्रुओं को दूर करें।[ऋग्वेद 6.46.12]
Grant us and our children protective shields secretly, repel our enemies when the warriors leave their parental abodes showing their bodies-muscles.
यदिन्द्र सर्गे अर्वतश्चोदयासे महाधने।
असमने अध्वनि वृजिने पथि श्येनाँ इव श्रवस्यतः॥
महायुद्ध प्रारम्भ होने पर आप विकट मार्ग से हमारे अश्वों को कठिन रास्ते से जाने वाले, तेजगति और अभिषार्थी बाज पक्षी के समान भेजें।[ऋग्वेद 6.46.13]
With the onset of great war direct our horses to move through the difficult route with high speed like the nominee falcon.
सिन्धूँरिव प्रवण आशुया यतो यदि क्लोशमनु ष्वणि।
आ ये वयो न ववृतत्यामिषि गृभीता बाह्वोर्गवि॥
यद्यपि डर के मारे घोड़े जोर-जोर से हिनहिनाते हैं, तथापि निम्न गामिनी नदियों के सदृश वे ही वेग गामी और दृढ़ संयत घोड़े, बाज पक्षियों की तरह धेनु प्राप्ति के लिए प्रवृत्त संग्राम में बार-बार दौढ़ते हैं।[ऋग्वेद 6.46.14]
Though horses neigh with fear, yet they move fast like the river flowing in the down ward direction. The strong and balanced horses run like the falcon in the war for attaining cows in the war.(06.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (47) :: ऋषि :- गर्ग भारद्वाज; देवता :- सोम, इन्द्रदेव, रथ, दानस्तुति, दुन्दुभि; छन्द :- त्रिष्टुप्, अनुष्टुप्, बृहती, गायत्री, जगती।
स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायं तीव्रः किलायं रसवाँ उतायम्।
उतो न्व१स्य पपिवांसमिन्द्रं न कश्चन सहत आहवेषु॥
यह अभिषुत सोमरस सुस्वादु, मधुर, तीव्र और रसवान है। इसका इन्द्र देव पान कर लेते हैं, तब संग्राम में उनके सामने कोई ठहर नहीं सकता।[ऋग्वेद 6.47.1]
This extracted Somras is tasty, sweet, sharp and juicy. No one dare confront him in the war when he drinks it.
अयं स्वादुरिह मदिष्ठ आस यस्येन्द्रो वृत्रहत्ये ममाद।
पुरूणि यश्र्च्यौत्ना शम्बरस्य वि नवतिं नव च देह्यो ३ हन्॥
इस यज्ञ में पीने पर ऐसे ही सोमरस ने अत्यन्त हर्ष प्रदान किया। वृत्रासुर के विनाश के समय इन्द्र देव ने इसे पीकर प्रसन्नता प्राप्त की। इसने शम्बर की निन्यानबे पुरियों का विनाश किया।[ऋग्वेद 6.47.2]
Somras produced extreme pleasure-excitement on drinking in the Yagy. At the occasion of killing Vratasur Indr Dev became happy on drinking it. It led to the destruction of 99 cities-forts of Shambar.
अयं मे पीत उदियर्ति वाचमयं मनीषामुशतीमजीगः।
अयं षळुर्वीरमिमीत धीरो न याभ्यो भुवनं कच्चनारे॥
पीने पर यह सोमरस मेरे वाक्य की स्फूर्ति को बढ़ाता है। यह अभिलषित बुद्धि को प्रदान करता है। इसी सुबुद्धि सोमरस ने स्वर्ग, पृथ्वी, दिन-रात्रि, जल और औषधि आदि छः अवस्थाओं की सृष्टि की। भूतगण में कोई भी इससे दूर ठहर नहीं सकता।[ऋग्वेद 6.47.3]
On drinking Somras intensify the impact of my words. It grants desired ideas-thoughts. It led to the evolution-creation of heavens, earth, day-night, water and medicines etc. six states. Amongest the ancient-deceased people none could distinct-keep off it.
अयं स यो वरिमाणं पृथिव्या वर्ष्माणं दिवो अकृणोदयं सः।
अयं पीयूषं तिसृषु प्रवत्सु सोमो दाधारोर्व १ न्तरिक्षम्॥
फलत: इसी सोमरस ने पृथ्वी का विस्तार और स्वर्ग की दृढ़ता की। इसी सोमरस ने औषधि, जल और धेनु नामक तीन उत्कृष्ट आधारों में रस दिया।[ऋग्वेद 6.47.4]
As a result-outcome, this Somras extended earth and stabilized the heaven. It led to the creation of sap-juice in the three excellent states viz medicines, water and the cows.
अयं विदच्चित्रदृशीकमर्णः शुक्रसद्मनामुषसामनीके।
अयं महान्महता स्कम्भनेनोद्द्यामस्तभ्नाद् वृषभो मरुत्वान्॥
निर्मल आकाश में स्थित उषा के पहले यही सोमरस विचित्र दर्शन सूर्य ज्योति को प्रकट करता है। जलवर्षी और बलशाली यह सोमरस ही मरुतों के साथ सुदृढ़ स्तम्भ द्वारा स्वर्ग को धारित किये हुए हैं।[ऋग्वेद 6.47.5]
In the clear sky prior to day break-Usha, this Somras visualised the Sun rays. This rain showering and mighty-energetic Somras stabilizes-holds the heavens in association with the Marud Gan.
धृषत्पिब कलशे सोममिन्द्र वृत्रहा शूर समरे वसूनाम्।
माध्यंन्दिने सवन आ वृषस्व रयिस्थानो रयिमस्मासु धेहि॥
हे वीर इन्द्र देव! धन प्राप्ति के लिए आरम्भ किए गये युद्ध में आप शत्रुओं का संहार करें। साहस के साथ कलश में स्थित सोमरस का पान करें। मध्याह्न के यज्ञ में आप बहुत सोमरस का पान करें। हे धनपात्र! हमें धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.47.6]
Hey brave-mighty Indr Dev! Destroy the enemies in the war initiated for having wealth-riches. Drink the Somras kept in the urn with courage. Drink a lot of Somras during the day kept in the pitcher during the midday. Hey lord pf riches! grant us wealth.
इन्द्र प्रणः पुरएतेव पश्य प्र नो नय प्रतरं वस्यो अच्छ।
भवा सुपारो अतिपारयो नो भवा सुनीतिरुत वामनीतिः॥
हे इन्द्र देव! मार्ग रक्षक के सदृश आप अग्रगामी होकर हमारे प्रति दृष्टि रखें और हमारे सामने श्रेष्ठ धन ले आवें। आप भली-भाँति हमें दुःखों और शत्रुओं से बचावें और उत्कृष्ट नेता होकर हमें अभिलषित धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.47.7]
Hey Indr Dev! Keep an eye over us like a guide, the person who protect the roads and bring excellent wealth for us. You protect us properly-carefully from the enemies, pains & sorrow being an excellent leader and grant us plenty-a lot of money.
उरुं नो लोकमनु नेषि विद्वान्त्स्वर्वज्ज्योतिरभयं स्वस्ति।
ऋष्वा त इन्द्र स्थविरस्य बाहू उप स्थेयाम शरणा बृहन्ता॥
हे इन्द्रदेव! आप ज्ञानी है। हमें विस्तीर्ण लोक में सुखमय और भयशून्य आलोक में भी निर्विघ्न ले जावें। आप प्राचीन हैं। आपका अभय, सुखद, कल्याणकारी तेज, हमें आपके वरदहस्त के आश्रय में प्राप्त हों।[ऋग्वेद 6.47.8]
Hey eternal, enlightened Indr Dev! Take us to the comfortable broad abodes free from fear without trouble. Grant us asylum under your fear free and beneficial aura-energy.
वरिष्ठे न इन्द्र वन्धुरे धा वहिष्ठयोः शतावन्नश्वयोरा।
इषमा वक्षीषां वर्षिष्ठां मा नस्तारीन्मघवन्त्रयो अर्यः॥
हे धनाढ्य इन्द्र देव! आप हमें अपने पराक्रमी अश्वों के पीछे विस्तृत रथ पर आरूढ करें। विविध अन्नों के बीच आप हमारे लिए प्रकृष्टतम अन्न ले आवें। हे मघवन्! कोई भी धनवान् धन में हमारा अतिक्रमण न कर सकें।[ऋग्वेद 6.47.9]
Hey wealthy Indr Dev! Deploy your mighty horses in your broad charoite and let us ride it. Select the beast food grains amongest various food grains for us. Hey Maghvan! None of the rich people should be as wealthy as us.
इन्द्र मृळ मह्यं जीवातुमिच्छ चोदय धियमयसो न धाराम्।
यत्किं चाहं त्वायुरिदं वदामि तज्जुषस्व कृधि मा देववन्तम्॥
हे इन्द्र देव! आप मुझे सुखी करें। मेरी जीवन वृद्धि करने में प्रसन्न होवें। लौहमय खड्ग की धार के सदृश मेरी बुद्धि को तेज करें। आपको प्रसन्न करने के लिए इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, वो सब आप ग्रहण करें। देवगण मेरी रक्षा करें।[ऋग्वेद 6.47.10]
Hey Indr Dev! Make me comfortable. Be happy with my progress. Sharpen my mind like a sharp sword. Realise what I am describing you to please you. Let the demigods-deities protect me.
त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रं हवेहवे सुहवं शूरमिन्द्रम्।
ह्वयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्रं स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः॥
जो शत्रुओं से रक्षा करते हुए सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं, जो अनायास आह्वानयोग्य, शौर्यशाली और सभी कार्यों को करने में समर्थ हैं, मैं उन्हीं बहुलोक वन्दनीय इन्द्र देव को प्रत्येक यज्ञ में आवाहित करता हूँ। हे धनवान् इन्द्र देव! हमें समृद्धि प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.47.11]
I invoke Indr Dev who is revered in all abodes, brave, mighty, protect us from the enemies and accomplish our desires, capable o executing all endeavours. Hey wealthy Indr Dev! make us prosper.(07.10.2023)
इन्द्रः सुत्रामा स्ववाँ अवोभिः सुमृळीको भवतु विश्ववेदाः।
बाधतां द्वेषो अभयं कृणोतु सुवीर्यस्य पतयः स्याम॥
शोभन रक्षा करने वाले और धनशाली इन्द्र देव रक्षा द्वारा हमें सुख देते हैं। वही सर्वज्ञ इन्द्र देव हमारे शत्रुओं का वध करके हमें निर्भय करते हैं। उनकी प्रसन्नता से हम अतीव वीर्यशाली बनें।[ऋग्वेद 6.47.12]
Protecting & wealthy Indr Dev protect and comfort us. He makes us fearless by killing our enemies. Let us become mighty by virtue of his pleasure.
तस्य वयं सुमतौ यज्ञियस्यापि भद्रे सौमनसे स्थाम।
स सुत्रामा स्ववाँ इन्द्रो अस्मे आराचिद् द्वेषः सनुतर्युयोतु॥
हम उन्हीं योगार्ह इन्द्र देव के अनुग्रह, बुद्धि और कल्याणवाही प्रीति के पात्र बनें। रक्षक और धनी वही इन्द्र देव शत्रुओं को बहुत दूर ले जावें।[ऋग्वेद 6.47.13]
हम उस आराध्य देव के पक्ष में उसकी शुभ सद्भावना में भी बने रहें; वह रक्षा करने वाले और ऐश्वर्यशाली इंद्र उन सभी को, जो हमसे घृणा करते हैं, हमसे दूर, विनाश की ओर ले जाए।
Let us become capable of Indr Dev's favours, mercy, intelligence and benefit-welfare means. Let Indr Dev drive-repel our enemies away from us to destruction.
अव त्वे इन्द्र प्रवतो नोर्मिर्गिरो ब्रह्माणि नियुतो धवन्ते।
उरू न राधः सवना पुरूण्यपो गा वज्रिन्युवसे समिन्दून्॥
हे इन्द्र देव! स्तोताओं की स्तुति, उपासना, विशाल धन और प्रचुर अभिषुत सोमरस, निम्र देश प्रवण जलराशि के सदृश आपकी ओर जाते हैं। हे वज्रधर इन्द्र देव! आप जल, गौ का दूध, दही, सोमरस में भली-भाँति मिलाते हैं।[ऋग्वेद 6.47.14]
Hey Indr Dev! Prayers by the Stotas, worship, huge amounts of wealth and lots of extracted Somras move towards you; like the vast amount of water moving towards low lying regions. Hey Vajr wielding Indr Dev! You properly-thoroughly mix the water, cow milk, curd and the Somras.
क ईं स्तवत्कः पृणात्को यजाते यदुग्रमिन्मघवा विश्वहावेत्।
पादाविव प्रहरन्नन्यमन्यं कृणोति पूर्वमपरं शचीभिः॥
भली-भाँति कौन मनुष्य इन्द्र देव की स्तुति, प्रसन्नता और यज्ञ करने में समर्थ है? धनशाली इन्द्र देव प्रतिदिन अपनी उम्र शक्ति को जानते हैं। जिस प्रकार से पथिक अपने पैरों को कभी आगे और कभी पीछे करता है, उसी प्रकार इन्द्र देव अपने बुद्धि बल से स्तोता को कभी पीछे और कभी आगे करते हैं।[ऋग्वेद 6.47.15]
Which human being is capable of worshiping, pleasing and conducting Yagy for Indr Dev? Wealthy Indr Dev is aware of his age and might-strength. The way a walker moves his feet forward and backward; similarly Indr Dev move the Stota ahead and back by virtue of his intelligence.
शृण्वे वीर उग्रमुग्रं दमायन्नन्यमन्यमतिनेनीयमानः।
एधमानद्विळुभयस्य राजा चोष्कूयते विश इन्द्रो मनुष्यान्॥
प्रबल शत्रु का दमन करके और स्तोताओं का स्थान सदा परिवर्तन करके इन्द्र देव अपनी वीरता के लिए प्रसिद्धि प्राप्त करते हैं। उद्धत व्यक्तियों के द्वेषी और स्वर्गीय तथा पार्थिव धनों के अधिपति इन्द्र देव अपने सेवकों को रक्षा के लिए बार-बार बुलाते हैं।[ऋग्वेद 6.47.16]
दमन :: रोक, निरोध, नियंत्रण, पराजय, आधिपत्य, वशीकरण, शमन, दबाव, अवरोध, छिपाव, स्तंभन, आत्मनियंत्रण, बलपूर्वक शांत करने का काम; suppression, repression, subjugation.
उद्धत :: अक्खड़, अविनीत; tearing, insubordinate.
द्वेष :: राग का विरोधी भाव, वैमनस्यता, विरोध, शत्रुता, वैर; malice, hatred.
Indr Dev is famous for his valour by suppression, repression of the enemy & change the position of his Stotas (for their safety). Hateful towards the subordinate and master of all material wealth Indr Dev repeatedly call his servants for protection.
परा पूर्वेषां सख्या वृणक्ति वितर्तुराणो अपरेभिरेति।
अनानुभूतीरवधून्वानः पूर्वीरिन्द्रः शरदस्तर्तरीति॥
इन्द्र देव पूर्वतन प्रशस्त कर्मों के अनुष्ठाताओं की मित्रता त्याग देते हैं और उनसे द्वेष करके उनकी अपेक्षा निकृष्ट व्यक्तियों के साथ मित्रता करते हैं। अथवा अपनी उपासना से रहित व्यक्तियों को छोड़कर परिचारकों के साथ अनेक वर्षों तक रहते हैं।[ऋग्वेद 6.47.17]
Indr Dev rejects the friendship of the people who performed great deeds and become hatful of them and become friendly with the lowest people. Alternatively, he resides with his servants for many years by rejecting those who are faithless.
रूपरूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय।
इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश॥
समस्त देवों के प्रतिनिधि इन्द्र देव तीन प्रकार की मूर्तियाँ धारित करते हैं और इन रूपों को धारित कर वे अलग-अलग प्रकट होते हैं। वे माया द्वारा अनेक रूप धारित करके याजक गणों के पास उपस्थित होते हैं; क्योंकि इन्द्र देव के रथ में हजारों अश्व जोते जाते हैं।
[ऋग्वेद 6.47.18]Indr Dev, leader-representative of the demigods-deities assumes three shapes and appear-invoke separately. He assumes many forms and appear before the Ritviz by virtue of cast. Charoites of Indr Dev are deployed with thousands of horses.
युजानो हरिता रथे भूरि त्वष्टेह राजति।
को विश्वाहा द्विषतः पक्ष आसत उतासीनेषु सूरिषु॥
रथ में इन्द्र देव ही घोड़े जोतकर त्रिभुवनों के अनेक स्थानों में प्रकट होते हैं। दूसरा कौन व्यक्ति प्रतिदिन उपस्थित स्तोताओं के बीच जाकर शत्रुओं से उनकी रक्षा करता है?[ऋग्वेद 6.47.19]
Indr Dev appear at various places of the three abodes deploying his horses in the charoite. Who else will appear between the Stotas everyday and protect them from the enemies?
अगव्यूति क्षेत्रमागन्म देवा उर्वी सती भूमिरंहूरणाभूत्।
बृहस्पते प्र चिकित्सा गविष्टावित्था सते जरित्र इन्द्र पन्थाम्॥
हे देवो! हम आकाश में घूमते-घूमते उस देश में आ पहुँचे हैं, जहाँ गौवें नहीं हैं। विस्तृत पृथ्वी दस्युओं को आश्रय देती है। हे बृहस्पति देव! आप धेनुओं के अनुसन्धान में हमें परिचालित करें। हे इन्द्र देव! इस प्रकार से पथभ्रष्ट अपने उपासकों को रास्ता दिखावें।[ऋग्वेद 6.47.20]
Hey demigods-deities we have reached roaming in the sky in that place where there is no cow. Broad earth shelter the dacoits as well. Hey Brahaspati Dev! Guide us in the discovery of cows. Hey Indr Dev! Guide the distracted worshipers.
दिवेदिवे सदृशीरन्यमर्धं कृष्णा असेधदप सद्मनो जाः।
अहन्दासा वृषभो वस्नयन्तोदव्रजे वर्चिनं शम्बरं च॥
इन्द्र देव अन्तरिक्ष स्थित गृह से सूर्य रूप से प्रकट होकर दिन का अपरार्द्ध प्रकाशित करने के लिए प्रतिदिन समान रीति से रात्रि को दूर करते हैं। "उदवज्र" नामक देश में शम्बर और वर्चो नाम के दो धनार्थी दासों का वर्षक इन्द्र देव ने संहार किया।[ऋग्वेद 6.47.21]
Indr Dev appear as Sun in the space and remove darkness. He destroyed the two slaves named Shambar & Varcho, who sought wealth in the country called Udvajr.
प्रस्तोक इन्नु राधसस्त इन्द्र दश कोशयीर्दश वाजिनोऽदात्। दिवोदासादतिथिग्वस्य राधः शाम्बरं वसु प्रत्यग्रभीष्म॥
हे इन्द्र देव! प्रस्तोक ने आपके स्तोताओं को सोने से भरे दस कोश और दस घोड़े प्रदान किये। अतिथिग्व ने शम्बर को जीतकर जो धन प्राप्त किया, उसी धन को हमने दिवोदास से पाया।[ऋग्वेद 6.47.22]
Hey Indr Dev! Prastok gave ten pots & ten horses to your Stotas. The wealth which was obtained by Atithigavy by winning Shambar, we obtained it from Divodas.
दशाश्वान्दश कोशान्दश वस्त्राधिभोजना।
दशो हिरण्यपिण्डान्दिवोदासादसानिषम्॥
दिवोदास ने दस घोड़े, दस सोने के खजानें, वस्त्र, यथेष्ट अन्न और दस हिरण्य पिण्ड हमें प्रदान किये।[ऋग्वेद 6.47.23]
Divodas gave us ten horses, ten treasures of gold, cloths, sufficient food grains and ten golden lobs.
दश रथान्प्रष्टिमतः शतं गा अथर्वभ्यः। अश्वथः पायवेऽदात्॥
मेरे भाई अश्वत्थ ने पायु को घोड़ों के साथ दस रथ और अथर्व गोत्रीय ऋषियों को एक सौ गायें प्रदान कीं।[ऋग्वेद 6.47.24]
My brother Ashvtth gave ten charoites with horses to Payu and one hundred cows to the descendants of Athrv Rishi.(08.10.2023)
महि राधो विश्वजन्यं दधानान् भरद्वाजान्त्सार्ञ्जयो अभ्ययष्ट॥
भरद्वाज पुत्र ने सबकी भलाई के लिए जो ये सब ऐश्वर्य ग्रहण किया, सृञ्जय पुत्र ने उनकी पूजा की।[ऋग्वेद 6.47.25]
Sranjay's son worshiped Bhardwaj for accepting the grandeur for the welfare-benefit of all.
वनस्पते वीडवङ्गो हि भूया अस्मत्सखा प्रतरणः सुवीरः।
गोभिः संनद्धो असि वीळयस्वास्थाता ते जयतु जेत्वानि॥
वनस्पतियों से निर्मित रथ आपके सब अवयव दृढ़ हों। आप हमारे रक्षक और मित्र बनें। आप प्रतापी वीरों से युक्त होवें। आप गोचर्म द्वारा बाँधे गए हैं। हमें सुदृढ़ करें। आपके ऊपर आरूढ़ रथी अनायास ही युद्ध में शत्रुओं को जीतने में समर्थ हो।[ऋग्वेद 6.47.26]
Let the charoite made of vegetation be tough-strong. You should become our protector & friend. You should have the brave-mighty people. You have been tied with cow's skin. Make us strong. The charoite driver riding you should be able to win the enemy at random-once.
दिवस्पृथिव्याः पर्योज उद्धृतं वनस्पतिभ्यः पर्याभृतं सहः।
अपामोज्मानं परि गोभिरावृतमिन्द्रस्य वज्रं हविषा रथं यज॥
हे ऋत्विको! आप हव्य से रथ का यज्ञ करें। यह रथ स्वर्ग और पृथ्वी के सारांश से बना है, वनस्पतियों के स्थिरांश से घटित है, जल के वेग के सदृश वेगवान् है, गोचर्म द्वारा ढका हुआ तथा वज्र के समान है।[ऋग्वेद 6.47.27]
Hey Ritviz! Perform Yagy-Pooja of the charoite with offerings. This charoite is made of the extract of the heavens & earth, formed with the extract of vegetation, possess the speed like water, covered with cow skin and as strong as Vajr.
इन्द्रस्य वज्रो मरुतामनीकं मित्रस्य गर्भो वरुणस्य नाभिः।
सेमां नो हव्यदातिं जुषाणो देव रथ प्रति हव्या गृभाय॥
हे दिव्य रथ! आप हमारे यज्ञ में प्रसन्न होकर हव्य ग्रहण करें; आप इन्द्र देव के वज्र स्वरूप मरुतों के अग्रवर्ती, मित्र के गर्भ और वरुण की नाभि हैं।[ऋग्वेद 6.47.28]
Hey divine charoite! Happily accept the offerings in our Yagy. You are like the Vajr of Indr Dev, forward moving, moving ahead of Marud Gan, stomach of Mitr and naval of Varun Dev.
उप श्वासय पृथिवीमु॒त द्यां पुरुत्रा ते मनुतां विष्ठितं जगत्। स दुन्दुभे सजूरिन्द्रेण देवैर्दूराद्दवीयो अप सेध शत्रून्॥
हे युद्ध दुन्दुभि! अपने शब्द से स्वर्ग और पृथ्वी को परिपूर्ण करो। स्थावर और जंगम इस बात को जानें कि आप इन्द्र देव और अन्य देवों के साथ मिलकर हमारे शत्रुओं को हमसे दूर करें।[ऋग्वेद 6.47.29]
Hey Dev Dundubhi! Fill the heavens & the earth with your sound. Let stationary-fixed and movable beings know that you repel our enemies in association with Devraj Indr and other demigods-deities.
आ क्रन्दय बलमोजो न आ धा निः ष्टनिहि दुरिता बाधमानः।
अप प्रोथ दुन्दुभे दुच्छुना इत इन्द्रस्य मुष्टिरसि वीळयस्व॥
हे दुन्दुभि! हमारे शत्रुओं को रुलाएँ और हमें बल प्रदान करें। इतने जोर से बजो कि दुर्द्धर्ष शत्रुओं को दुःख मिले। हे दुन्दुभि! जो हमारा अनिष्ट करके आनन्दित होते हैं, उन्हें दूर हटावें। आप इन्द्रदेव की मुष्टिका के सदृश हैं; इसलिए हमें दृढ़ता प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.47.30]
Hey Dundubhi! Make our enemies weep-cry and grant us strength. Make such a loud-harsh sound that the enemy is pained. Hey Dundubhi! Repel-remove those who become happy by our bad luck. You are like the fist of Indr Dev, hence grant us strength.
आमूरज प्रत्यावर्तयेमाः केतुमद्दुन्दुभिर्वावदीति।
समश्वपर्णाश्चरन्ति नो नरोऽस्माकमिन्द्र रथिनो जयन्तु॥
हे इन्द्र देव! हमारी समस्त गौवों को रोककर हमारे पास ले आवें। सभी के पास घोषणा करने के लिए दुन्दुभि नियत उच्च स्वर करता है। हमारे सेनानी घोड़ों पर आरूढ़ हुए हैं। है इन्द्र देव! हमारे रथारूढ़ सैनिक और सेनाएँ युद्ध में विजयी होवें।[ऋग्वेद 6.47.31]
Hey Indr Dev! Stop all of our cows and bring them to us. Dundubhi make loud noise to make announcement. Our soldiers have rode the horses. Hey Indr Dev! Let our soldiers riding the charoite and the army become victorious.(09.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (59) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र देव, अग्रि; छन्द :- बृहती, अनुष्टुप्।
प्र नु वोचा सुतेषु वां बीर्या३यानि चक्रथुः।
हतासो वां पितरो देवशत्रव इन्द्राग्री जीवथो युवम्॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! आपने जो वीरता प्रकट की है, उसी वीरता का वर्णन हम सोमरस के अभिषुत होने पर बड़े आग्रह के साथ करते हैं। देवद्वेष्टा असुर आपके द्वारा मारे गये हैं और आप लोग रक्षक हैं।[ऋग्वेद 6.59.1]
Hey Indr Dev & Agni Dev! We describe-stress over your valour on extracting Somras. Demons envious of demigods-deities are killed by you. You are the protectors of humans.
बळित्या महिमा वामिन्द्राग्नी पनिष्ठ आ।
समानो वां जनिता भ्रातरा युवं यमाविहेहमातरा॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! आप लोगों का जो जन्म माहात्म्य प्रतिपादित होता है, वह सब यथार्थ और अतीव प्रशस्य है। आप दोनों के एक ही पिता हैं। आप यम के भाई हैं और आपकी माता सभी जगह विद्यमान हैं।[ऋग्वेद 6.59.2]
Hey Indr Dev and Agni Dev! The glory associated with your birth-evolution is real and deserve appreciation. Father of both of you is the same. You are the brothers of Yam-Dharm Raj. Your mother is omnipresent.
ओकिवांसा सुते सचाँ उ श्वा सप्ती इवादने।
इन्द्रान्व १ ग्री अवसेह वज्रिणा वयं देवा हवामहे॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! जिस प्रकार से तेज चलने वाले दोनों अश्व भक्षणीय घास की ओर जाते हैं आप भी उसी प्रकार सोमरस के अभिषुत होने पर एक साथ जाते हैं। अपनी रक्षा के लिए आज हम वज्रधर और दानादि गुण से युक्त इन्द्रदेव और अग्निदेव को इस यज्ञ में बुलाते हैं।[ऋग्वेद 6.59.3]
Hey Indr Dev & Agni Dev! The way fast moving horses are attracted towards grass, you invoke as soon as Somras is extracted. We invite Vajr wielder donor Indr Dev and Agni Dev for our protection in the Yagy.
य इन्द्राग्नी सुतेषु वां स्तवत्तेष्वृतावृधा।
जोषवाकं वदतः पज्रहोषिणा न देवा भसथश्चन॥
हे यज्ञ के समृद्धिदाता इन्द्र देव और अग्नि देव! आपका स्तोत्र प्रसिद्ध है। जो व्यक्ति सोमरस के अभिषुत होने पर प्रेम रहित स्तोत्र द्वारा कुत्सित रूप से आपकी प्रार्थना करता है, उसका दिया हुआ सोमरस आप स्पर्श नहीं करते।[ऋग्वेद 6.59.4]
Hey enricher of the Yagy Indr Dev & Agni Dev! Your Strotr is famous. You do not touch the Somras extracted by a person with impious prayers associated with the Strotr without affection & love.
इन्द्राग्नी को अस्य वां देवो मर्तश्चिकेतति।
विषूचो अश्वान्युयुजान ईयत एकः समान आ रथे॥
हे दीप्ति सम्पन्न इन्द्र देव और अग्नि देव! जिस समय आपमें से एक सूर्यात्मक इन्द्र देव नाना प्रकार से गमन करने वाले अश्वों को जोतकर अग्नि देव के साथ एक रथ पर आरूढ़ होकर जाते हैं, उस समय कौन मनुष्य आपके इस कार्य का विचार करेगा या जानेगा (कोई भी नहीं)?[ऋग्वेद 6.59.5]
Hey radiant Indr Dev & Agni Dev! The manner in which one of you, Indr Dev deploy the horses in the charoite with vivid movements and ride it along with Agni Dev, who will not think of this action by you.
इन्द्राग्नी अपादियं पूर्वागात्पद्वतीभ्यः।
हित्वी शिरो जिह्वया वावदचरत्त्रिंशत्पदा न्यक्रमीत्॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! पैरों से रहित यही उषा प्राणियों के शिरोवेश को उत्तेजित करके और उनकी जिह्वाओं से उच्च शब्द कराकर पैरों से युक्त और निद्रित जीवों की अभिमुखवर्त्तिनी हो रही हैं और इसी प्रकार तीस पद (मुहूर्त) अतिक्रम करती हैं।[ऋग्वेद 6.59.6]
मुहूर्त :: कार्य हेतु निश्चित किया गया विशिष्ट समय, काल गणना के अनुसार कार्य हेतु निश्चित किया गया समय; auspicious moment, auspicious beginning.
Hey Indr Dev & Agni Dev! Usha without legs, activate the minds of the humans, make them speak, awake the slept living beings, moves forward and continue like this for thirty feet i.e., Muhurt (designated auspicious time period).
इन्द्राग्नी आ हि तन्वते नरो धन्वानि बाह्वोः।
मा नो अस्मिन्महाधने परा वर्कतन वर्क्तं गविष्टिषु॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! योद्धा लोग दोनों से हाथों धनुष फैलाते हैं। इस महासंग्राम में गौवों के अनुसन्धान के समय हमें न छोड़ना।[ऋग्वेद 6.59.7]
Hey Indr Dev and Agni Dev! The warriors expend-stretch the bow with both hands. Do not discard us during the great war for the recovery of cows.
इन्द्राग्नी तपन्ति माघा अर्यो अरातयः। अप द्वेषांस्या कृतं युयुतं सूर्यादधि॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! हनन परायण और आक्रमण कर्ता शत्रु हमें पीड़ित कर रहे हैं। उन्हें आप दूर करें और उन्हें सूर्य दर्शन से भी वञ्चित करें।[ऋग्वेद 6.59.8]
Hey Indr Dev & Agni Dev! The attacker-invader enemies are torturing us. Repel them and prohibit them from seeing the Sun.
इन्द्रानी युवोरपि वसु दिव्यानि पार्थिवा।
आ न इह प्र यच्छतं रथिं विश्वायुपोषसम्॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! आप लोग दिव्य और पार्थिव समस्त धनों के स्वामी हैं; इसलिए इस यज्ञ में हमें जीवन पोषक समस्त धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.59.9]
Hey Indr Dev & Agni Dev! You are the lord of divine and material wealth, hence grant us all sorts of riches for sustaining life & carrying out the Yagy.
इन्द्रानी उक्थवाहसा स्तोमेभिर्हवनश्रुता।
विश्वाभिर्गीर्भिरा गतमस्य सोमस्य पीतये॥
स्तोत्र द्वारा आकर्षणीय इन्द्र देव और अग्नि देव! हमारे इस सोमरस का पान करने के लिए यहाँ पधारें, क्योंकि आप लोग स्तोत्रों और उपासनाओं से युक्त आह्वान श्रवण करते हैं।[ऋग्वेद 6.59.10]
Hey Indr Dev & Agni Dev invoked by the Strotr! Come for drinking our Somras, since you respond to the prayers-worship and recitation of Strotr-sacred hymns.(24.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (60) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्राग्नि; छन्द :- त्रिष्टुप्, बृहती, अनुष्टुप् गायत्री।
शनाथद्वृत्रमुत सनोति वाजमिन्द्रा यो अग्नी सहुरी सपर्यात्।
इरज्यन्ता वसव्यस्य भूरे: सहस्तमा सहसा वाजयन्ता॥
जो विशाल धन के स्वामी हैं, जो बलात शत्रु हन्ता हैं और जो अन्नाभिलाषी इन्द्र देव और अग्नि देव की सेवा करते हैं, वे शत्रुओं का संहार करते हुए और अन्न प्राप्त करते हैं।[ऋग्वेद 6.60.1]
Those who possess a lot of wealth, kills the enemy at once, desirous of food grains and server Indr Dev & Agni Dev, they obtain food grains while killing the enemies.
ता योधिष्टमभि गा इन्द्र नूनमपः स्वरुषसो अग्न ऊळहाः।
दिशः स्वरुषस इन्द्र चित्रा अपो गा अग्ने युवसे नियुत्वान्॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! आपने अपहरण की गई गौओं, जलराशि, सूर्य और उषा के लिए युद्ध किया। हे इन्द्रदेव! आपने दिशाओं, सूर्य, उषाओं, विचित्र जल और गौओं को सार के साथ योजित किया। हे अश्वों के अधिपति अग्निदेव! आपने भी ऐसे कार्य किये।[ऋग्वेद 6.60.2]
योजित :: मिलाया हुआ, युक्त, बनाया हुआ, जिसकी योजना की गई हो, योजना के रूप में लाया हुआ, जोड़ा या मिलाया हुआ, किसी काम या बात में लगाया हुआ, बनाया या रचा हुआ, रचित, नियमों आदि से बँधा हुआ, नियमबद्ध; ; connected, planned, organised.
Hey Indr Dev & Agni Dev! You fought the war for cows, water, Sun and Usha. Hey Indr Dev! You connected the directions, Sun, Ushas, amazing water and the cows through their extract. Hey Lord of horses Agni Dev! You too performed such jobs-deeds.
आ वृत्रहणा वृत्रहभिः शुष्मैरिन्द्र यातं नमोभिरग्ने अर्वाक्।
युवं राधोभिरकवेभिरिन्द्राग्ने अस्मे भवतमुत्तमेभिः॥
हे वृत्रहन्ता इन्द्र देव और अग्नि देव! आप हमारे हव्यान्न द्वारा परिपुष्ट होने के लिए शत्रुनाशक बल के साथ हमारे सामने पधारें। आप लोग अनिन्द्य और अत्युत्कृष्ट धन के साथ हमारे पास आविर्भूत होवें।[ऋग्वेद 6.60.3]
अनिंद्य :: प्रशंसनीय, जिसकी निंदा न की जा सकती हो, श्रेष्ठ, सुंदर; appreciable, irreproachable, unexceptionable, beautiful.
Hey slayer of Vratr, Indr Dev & Agni Dev! Invoke before us with your might to destroy the enemy & to be nourished with our offerings. Come to us with appreciable and excellent wealth.
ता हुवे ययोरिदं पप्ने विश्वं पुरा कृतम्। इन्द्राग्नी न मर्धतः॥
प्राचीन समय में ऋषियों द्वारा जिनके समस्त वीरकार्य कीर्त्तित हुए, मैं उन्हीं इन्द्र देव और अग्नि देव का आवाहन करता हूँ। वे स्तोताओं की हिंसा नहीं करते।[ऋग्वेद 6.60.4]
I invoke Indr Dev & Agni Dev whose bravery and valour were appreciated by the Rishis during ancient times-periods. They do not harm their Stotas-worshipers.
उग्रा विघनिना मृध इन्द्राग्नी हवामहे। ता नो मृळात ईदृशे॥
हम प्रचण्ड बलशाली, शत्रु हन्ता इन्द्र देव और अग्नि देव का आवाहन करते हैं। वे हमें ऐसे में कृत कार्य करके सुखी बनावें।[ऋग्वेद 6.60.5]
प्रचण्ड :: कठोर, उग्र, तीक्ष्ण, कड़ा; terrific, severe.
We invoke terrific, mighty and destroyer of the enemy Indr Dev & Agni Dev. Let should make us comfortable.
हतो वृत्राण्यार्या हतो दासानि सत्पती। हतो विश्वा अप द्विषः॥
हे साधुओं के रक्षक इन्द्र देव और अग्नि देव! धार्मिकों और अधार्मिकों द्वारा कृत समस्त उपद्रवों का निवारण करते हैं। उन्होंने समस्त विरोधियों का संहार किया।[ऋग्वेद 6.60.6]
निवारण :: रोकना, दूर करना, हटाना; prevention, eradication, prohibit.
Hey protector of the sages Indr Dev and Agni Dev! You eradicate the misdeeds and troubles created by the religious and irreligious. You killed all opponents.
इन्द्राग्नी युवामिमे३भि स्तोमा अनूषत। पिबतं शंभुवा सुतम्॥
हे वृत्र हन्ता इन्द्र देव और अग्नि देव! ये स्तोता आपकी प्रार्थना करते हैं। हे सुखदाता इंद्रदेव और अग्निदेव! आप इस अभिषुत सोमरस का पान करें। [ऋग्वेद 6.60.7]
Hey killer of Vratr Indr Dev & Agni Dev! These Stotas worship-pray you. Hey comforter Indr Dev & Agni Dev! Drink this extracted Somras.
या वां सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा। इन्द्राग्नी ताभिरा गतम्॥
हे नेता इन्द्रदेव और अग्निदेव! याजकों द्वारा प्रशंसा किए जाते हुए, आप दोनों उनसे प्रदत्त हविष्यान्न के लिए यज्ञशाला में अपने तेज चलने वाले अश्व की सहायता से आकर दान देने वालों की सहायता करें।[ऋग्वेद 6.60.8]
Hey leaders Indr Dev & Agni Dev! Come riding your fast moving horses to the Yagy house to accept the offerings on been appreciated and help the donors.
ताभिरा गच्छतं नरोपेदं सवनं सुतम्। इन्द्राग्नी सोमपीतये॥
हे नेता इन्द्र देव और अग्नि देव! इस सवन में अभिषुत सोमरस का पान करने के लिए यहाँ पधारें।[ऋग्वेद 6.60.9]
Hey leaders Indr Dev & Agni Dev! Come to drink the extracted Somras during this period-part of the day.
तमीळिष्व यो अर्चिषा वना विश्वा परिष्वजत्। कृष्णा कृणोति जिह्वया॥
हे स्तोता! जो अग्नि देव अपनी शिखा द्वारा समस्त वनों को ढक लेते हैं और ज्वालारूप जिव्हा द्वारा उन्हें काला कर देते हैं, आप उन्हीं अग्नि देव की प्रार्थना करें।[ऋग्वेद 6.60.10]
Hey Stota! Worship Agni Dev who cover the forests with their tip and make them black with their tongue in the form of flames.
य इद्ध आविवासति सुम्नमिन्द्रस्य मर्त्यः। द्युम्नाय सुतरा अपः॥
जो मनुष्य प्रज्वलित अग्नि में इन्द्र देव के लिए सुखकर हव्य प्रदान करते है, इन्द्र देव उन्हीं मनुष्यों के दीप्ति सम्पन्न अन्न के लिए कल्याणकारी जल की वर्षा करते हैं।[ऋग्वेद 6.60.11]
Indr Dev make rains for the welfare of those humans who make pleasure giving offerings in the ignited fire.
ता नो वाजवतीरिष आशून्पिपृतमर्वतः। इन्द्रमग्निं च वोळ्हवे॥
हे इन्द्र देव और अग्रि देव! हमें बल युक्त अन्न प्रदान करें और हमारे हव्य को बलवान करने के लिए हमें वेगवान अश्व प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.60.12]
Hey Indr Dev & Agni Dev! Grant us food grains which grant strength and give us fast moving horses to make our offerings powerful.
उभा वामिन्द्राग्नी आहुवध्या उभा राधसः सह मादयध्यै।
उभा दाताराविषां रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम्॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! होम द्वारा आपको अनुकूल करने के लिए मैं आप दोनों का आवाहन करता हूँ। हव्य द्वारा तत्काल तृप्ति करने के लिए मैं आप दोनों का आवाहन करता हूँ। आप दोनों अन्न और धन को देने वाले हैं; इस लिए मैं अन्न प्राप्ति के लिए आप दोनों का आवाहन करता हूँ।[ऋग्वेद 6.60.13]
Hey Indr Dev & Agni Dev! I invoke both of you to make favourable. I invoke you to have satisfaction with the offerings immediately-instantaneously. Both of you grant wealth & food grains, hence I invoke you to seek food grains.
आ नो गव्येभिरश्यैर्वसव्यैरुप ३ गच्छतम्।
सखायौ देवौ सख्याय शंभुवेन्द्राग्नी ता हवामहे॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! आप गौओं, अश्वों और विपुल धन के साथ हमारे सम्मुख पधारें। हम मित्रता के लिए मित्रभूत, दानादि गुणों से युक्त और सुख देने वाले इन्द्र देव और अग्नि देव का आवाहन करते हैं।[ऋग्वेद 6.60.14]
Hey Indr Dev & Agni Dev! Come to us with cows, horses and a lot of wealth. We invoke Indr Dev & Agni Dev who are like friends, possess virtues like donation and comforts-pleasure for friendship.
इन्द्रानी शृणुतं हवं याजकगणस्य सुन्वतः।
वीतं हव्यान्या गतं पिबतं सोम्यं मधु॥
हे इन्द्र देव और अग्नि देव! आप सोमरस रस तैयार करने वाले याजकगण का आह्वान श्रवण करें। हवि की इच्छा से आएँ और मधुर सोमरस का पान करें।[ऋग्वेद 6.60.15]
Hey Indr Dev & Agni Dev! Respond to the invocation of the Ritviz who extract Somras. Come with the desire of offerings and drink sweet Somras.(25.10.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (68) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र देव, वरुण; छन्द :- त्रिष्टुप जगती।
श्रुष्टी वां यज्ञ उद्यतः सजोषा मनुष्वद् वृक्तबर्हिषो यजध्यै।
आ य इन्द्रावरुणाविषे अद्य महे सुम्नाय मह आववर्तत्॥
हे महान इन्द्र देव और वरुण देव! मनु के सदृश कुश-विस्तारक याजकगण के अन्न और सुख के लिए जो यज्ञ आरम्भ होता है, आज आप लोगों के लिए वही क्षिप्र यज्ञ ऋत्विकों के द्वारा प्रवृत्त किया गया।[ऋग्वेद 6.68.1]
Hey great Indr Dev & Varun Dev! The Yagy which initiate by spreading Kush Mat-cushion like Manu for food grains & benefit-comforts of the Ritviz, has been directed towards you.
ता हि श्रेष्ठा देवताता तुजा शूराणां शविष्ठा ता हि भूतम्।
मघोनां मंहिष्ठा तुविशुष्म ऋतेन वृत्रतुरा सर्वसेना॥
आप श्रेष्ठ हैं, यज्ञ में धन देने वाले हैं और वीरों में अतीव बलवान हैं। दाताओं में श्रेष्ठ दाता तथा बहुबलशाली सत्य के द्वारा शत्रुओं के हिंसक और सब प्रकार की सेना से युक्त हैं।[ऋग्वेद 6.68.2]
You are excellent, grant lots of wealth for the Yagy and mightiest amongest the brave. Best amongest the donors, your mighty-truthful powers destroy the violent enemies and are have all sorts of armies.
ता गृणीहि नमस्येभिः शूषैः सुम्नेभिरिन्द्रावरुणा चकाना।
वज्रेणान्यः शवसा हन्ति वृत्रं सिषकयन्यो वृजनेषु विप्रः॥
स्तुति, बल और सुख के द्वारा स्तुत इन्द्र देव और वरुण देव की प्रार्थना करें। उनमें से एक इन्द्र देव वृत्रासुर का वध करते हैं, दूसरे प्रजा में युक्त (वरुण) उपद्रवों से रक्षा करने के लिए बलशाली होते हैं।[ऋग्वेद 6.68.3]
Let us worship Indr Dev & Varun Dev with Stuti, strength and comforts. One of them Indr Dev kills Vrata Sur and the other one i.e., Varun Dev protect the populace from all sorts of trouble.
ग्नाश्च यन्नरश्च वावृधन्त विश्वे देवासो नरां स्वगूर्ताः।
प्रैभ्य इन्द्रावरुणा महित्वा द्यौश्च पृथिवि भूतमुर्वी॥
हे इन्द्र देव और वरुण देव! समस्त पुरुष और स्त्री एवं समस्त देवगण द्यावा- पृथ्वी स्वतः उद्यत होकर जब आपको स्तुति द्वारा वर्द्धित करते हैं, तब महमिान्वित होकर आप लोग उनके प्रभु बनें।[ऋग्वेद 6.68.4]
Hey Indr Dev & Varun Dev! You should become the lord of the all men & women with all demigods-deities who will automatically worship-pray to grow-promote you.
स इत्सुदानुः स्वँवा ऋतावेन्द्रा यो वां वरुण दाशति त्मन्।
इषा स द्विषस्तरेद्दास्वान्वंसद्रयिं रयिवतश्च जनान्॥
हे इन्द्र देव और वरुण देव! जो याजक आपको स्वयं हवि देता है, वह सुन्दर दान वाला और यज्ञशाली होता है। वही दाता जय प्राप्त अन्न के साथ शत्रुओं के हाथ से सुरक्षित रहकर धन और सम्पत्तिशाली पुत्र प्राप्त करता है।[ऋग्वेद 6.68.5]
GRACIOUS :: वैभवपूर्ण, सुख-सुविधापूर्ण, व्यक्ति या उसका अच्छा आचरण, दयालु, नम्र और उदार; descent behaviour of a person, kind, polite and generous, showing the easy comfortable way of life that rich people can have.
Hey Indr Dev & Varun Dev! The Ritviz who make offerings to you become a gracious-glorious donor and performer of Yagy. That donor wins the enemies & remain protected, gets wealth and prosperous son.
यं युवं दाश्वध्वराय देवा रयिं धत्थो वसुमन्तं पुरुक्षुम्।
अस्मे स इन्द्रावरुणावपि ष्यात्प्र यो भनक्ति वनुषामशस्तीः॥
हे इन्द्र देव और वरुण देव! आप हविदाता को धनानुगामी और बहु अन्नशाली जो धन देते हैं और जिससे हम अपनी निन्दा करने वालों को दूर कर सकें, वैसा ही धन हमें प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.68.6]
Hey Indr Dev & Varun Dev! You grant wealth and various food grains to the one (who makes offerings in the Yagy for you). Grant us riches so that we can repel those who reproach us.
उत नः सुत्रात्रो देवगोपाः सूरिभ्य इन्द्रावरुणा रयिः ष्यात्।
येषां शुष्मः पृतनासु साह्रान्प्र सद्यो द्युम्ना तिरते ततुरिः॥
हे इन्द्र देव और वरुण देव! हम आपके स्तोता हैं। जो धन सुरक्षित है और जिसके रक्षक देवगण हैं, वही धन हम स्तोताओं को प्रदान करें। हमारा बल संग्राम में शत्रुओं को परास्त करने वाला और हिंसक होकर तत्काल उनके यज्ञ को नष्ट करे।[ऋग्वेद 6.68.7]
Hey Indr Dev & Varun Dev! We are your worshipers-Stotas. Grant us the wealth which is safe and protected by the demigods-deities. Our strength and power should be such that we are able to defeat the enemy in the war and destroy his Yagy-endeavours by becoming violent immediately.
नू न इन्द्रावरुणा गृणाना पृङ्क्तं रयिं सौश्रवसाय देवा।
इत्था गृणन्तो महिनस्य शर्धोऽपो न नावा दुरिता तरेम॥
हे इन्द्र देव और वरुण देव! आप लोग प्रार्थित होकर सुअन्न के लिए हमें शीघ्र धन प्रदान करें। हे देवों! आप लोग महान हैं। हम इस प्रकार आपके बल की प्रार्थना करते हैं। हम नौका द्वारा जल के समान पापों से मुक्त हो जावें।[ऋग्वेद 6.68.8]
Hey Indr Dev & Varun Dev! On being worshipped you grant us pious food grains quickly. Hey deities! You are great. In this manner we worship your might & power. Let us become free from the sins caused by water through boat.
I Delhi Yamuna river is extremely polluted. Maa ganga else where too face the same agony-trouble. Any one who take a dip in them invite numerous diseases-sins for him. Its advised not to enter these river for a bath or cross them. The governments are gross failure.
प्र सम्राजे बृहते मन्म नु प्रियमर्च देवाय वरुणाय सप्रथः।
अयं य उर्वी महिना महिव्रतः क्रत्वा विभात्यजरो न शोचिषा॥
जो वरुण देव महिमान्वित, महाकर्मा, प्रज्ञायुक्त तेज युक्त और अजर हैं, जो विस्तीर्ण हैं, वहीं धन हम स्तोताओं को प्रदान करें। हमारा बल संग्राम में शत्रुओं को परास्त करने वाला और हिंसक होकर तत्काल उनके यज्ञ को नष्ट करे।[ऋग्वेद 6.68.9]
Varun Dev, who is free form old age, glorious, performer of great deeds, aurous and vast; grant us-Stotas wealth-riches. Our war should be aimed-able to defeat the enemy by becoming violent and destroy their endeavours at the same moment.
इन्द्रावरुणा सुतपाविमं सुतं सोमं पिबतं मद्यं धृतव्रता।
युवो रथो अध्वरं देववीतये प्रति स्वसरमुप याति पीतये॥
हे इन्द्र देव और वरुण देव! आप सोमरस का पान करने वाले हैं; इसलिए इस मादक और अभिषुत सोमरस का पान करें। हे धृतव्रत मित्र और वरुणदेव! देवों के पान के लिए आपका रथ यज्ञ की ओर आता है।[ऋग्वेद 6.68.10]
धृतव्रत :: (1). जिसने कोई व्रत धारण किया हो, धार्मिक क्रिया करनेवाला, निष्ठाशील, जिसकी निष्ठा द्दढ़ हो, पुरुवेशीय जयद्रथ के पुत्र विजय का पौत्र।etermined-firm.
(2). वरुण देव के नियम सर्वदा ही निश्चित तथा दृढ हैं और इसीलिए उन्हें धृतव्रत कहा जाता है। स्वयं देवता भी इनके नियम का पालन करते हैं। शब्द का प्रयोग सविता-सूर्य देव के लिये भी किया गया है।[ऋग्वेद 4.53.4]
Hey Indr Dev & Varun Dev! You drink Somras, hence drink this intoxicating and extracted Somras. Hey determined-firm Mitr & Varun Dev! Your charoite approaches the Yagy for the demigods to drink Somras.
इन्द्रावरुणा मधुमत्तमस्य वृष्णः सोमस्य वृषणा वृषेथाम्।
इदं वामन्धः परिषिक्तमस्मे आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयेथाम्॥
हे कामवर्षी इन्द्र देव और वरुण देव! आप अतीव मधुर और मनोरथवर्षक सोमरस का पान करें। आपके लिए इस सोमरूप अन्न को बनाया गया है; इसलिए कुश के आसन पर बैठकर इस यज्ञ में सोमरस को ग्रहण करें।[ऋग्वेद 6.68.11]
Hey desires accomplishing Indr & Varun Dev! You should drink extremely-highly sweet and ambitions fulfilling Somras. Somras has been extracted for you from the food grains, hence sit over the Kush Mat and accept Somras in this Yagy.(06.11.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (69) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्र देव, विष्णु; छन्द :- विषुप्।
सं वां कर्मणा समिषा हिनोमीन्द्राविष्णू अपसस्पारे अस्य।
जुषेथां यज्ञं द्रविणं च धत्तमरिष्टैर्नः पथिभिः पारयन्ता॥
हे इन्द्र देव और श्री विष्णु! आपके निमित्त हम हवि और उत्तम स्तोत्र प्रेषित करते हैं। आप दोनों प्रसन्न होकर यज्ञ में पधारे और हमें धन प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.69.1]
Hey Indr Dev & Vishnu Dev! We make offering for you and recited excellent Strotr-sacred hymns. Both of you become happy with us and join the Yagy.
या विश्वासां जनितारा मतीनामिन्द्राविष्णू कलशा सोमधाना।
प्र वो गिरः शस्यमाना अवन्तु प्र स्तोमासो गीयमानासो अर्कैः॥
हे इन्द्र देव और श्री विष्णु! आप स्तुतियों के पिता हैं। आप कलश स्वरूप और सोम के निधानभूत हैं। कहे जाने वाले स्तोत्र आपको प्राप्त होते हैं। स्तोताओं द्वारा गायन किए गए स्तोत्र आपको प्राप्त होते है।[ऋग्वेद 6.69.2]
Hey Indr Dev & Vishnu Dev! you are the father-source of the Strotr-Stutis. You are like the Kalash-pitcher & basis of som. The Strotr composed & recited by the worshipers are directed towards you.
इन्द्राविष्णू मदपती मदानामा सोमं यातं द्रविणो दधाना।
सं वामञ्जन्त्वक्तुभिर्मतीनां सं स्तोमासः शस्यमानास उक्थैः॥
हे इन्द्र देव और श्री विष्णु! आप सोम के अधिपति हैं। धन देते हुए आप सोम के सम्मुख आवें। स्तोताओं के स्तोत्र, उक्थों के साथ आपको तेज द्वारा बढ़ायें।[ऋग्वेद 6.69.3]
उक्थ :: श्लोक, स्तोत्र, कथन, कथन, उक्ति, स्तोत्र, सूक्ति, साम-विशेष, प्राण, ऋषभक नाम की औषधि; Strotr, Sukt, spelled, stated, hymns.
Hey Indr Dev & Shri Vishnu! You are the lord of Som. Come to Som while granting wealth. Enhance boost your aura with the compositions and recitations sacred hymns.
आ वामश्वासो अभिमातिषाह इन्द्राविष्णू सधमादो वहन्तु।
जुषेथां विश्वा हवना मतीनामुप ब्रह्माणि शृणुतं गिरो मे॥
हे इन्द्र देव और श्री विष्णु! हिंसकों को हराने वाले और एकत्रमत्त अश्वगण आपका वहन करें। स्तोताओं के समस्त स्तोत्रों का आप सेवन करें। मेरे स्तोत्रों और वचनों को भी श्रवण करें।[ऋग्वेद 6.69.4]
Hey Indr Dev & Shri Vishnu! Let the horses of the same nature, capable of defeating the violent enemy, carry you. Respond to all Strotr of the Stotas. Respond to my prayers-Strotr and requests as well.
इन्द्राविष्णू तत्पनयाय्यं वां सोमस्य मद उरु चक्रमाथे।
अकृणुतमन्तरिक्षं वरीयोऽप्रथतं जीवसे नो रजांसि॥
हे इन्द्र देव और श्री विष्णु! सोमरस का मद या हर्ष उत्पन्न होने पर आप लोग विस्तृतरूप से परिक्रमा करते है। आपने अन्तरिक्ष को विस्तृत किया। आपने लोकों को हमारे जीने के लिए प्रसिद्ध किया। आपके ये सब कर्म प्रशंसा योग्य हैं।[ऋग्वेद 6.69.5]
Hey Indr Dev & Shri Vishnu! You revolve comprehensively under the impact of Somras. You extended the space-universe. You made the abodes suitable for our living. All these endeavours of yours, deserve appreciation-applaud.
इन्द्राविष्णू हविषा वावृधानाग्राद्वाना नमसा रातहव्या।
घृतासुती द्रविणं धत्तमस्मे समुद्रः स्थः कलशः सोमधानः॥
घृत और अन्न से युक्त इन्द्र देव और श्री विष्णु! आप सोमरस के पान से बढ़ते हैं और सोम के अग्रभाग का भक्षण करते हैं। नमस्कार के साथ याजकगण आपको हव्य देते हैं। आप हमें धन प्रदान करें। आप लोग समुद्र की तरह हैं। आप सोम का भण्डार और कलश के रूप हैं।[ऋग्वेद 6.69.6]
Hey possessor of Ghee and food grains Indr Dev & Shri Vishnu! You boost by the consumption of Somras and eat the upper segment of Som. The Ritviz salute and make offerings to you. You are like the ocean. You are the store house of Som and appear like Kalash.
इन्द्राविष्णू पिबतं मध्वो अस्य सोमस्य दस्त्रा जठरं पृणेथाम्।
आ वामन्यांसि मदिराण्यग्मन्नुप ब्रह्माणि शृणुतं हवं मे॥
हे दर्शनीय इन्द्र देव और श्री विष्णु! आप इस मदकारी सोमरस को पीकर उदर को भरें। आपके पास मदकर सोमरूप अन्न जावे। मेरा स्तोत्र और आवाहन ध्यानपूर्वक श्रवण करें।[ऋग्वेद 6.69.7]
Hey Indr Dev & Shri Vishnu! Fill your stomach with Somras. Let the intoxicating Som come to you as a food grain. Listen-respond to my invocation seriously.
उभा जिग्यथुर्न परा जयेथे न परा जिग्ये कतरश्चनैनोः।
इन्द्रश्च विष्णो यदपस्पृधेथां त्रेधा सहस्त्रं वि तदैरयेथाम्॥
हे इन्द्र देव और श्री विष्णु! आप विजयी होवें; कभी पराजित न होवें। आप दोनों में से कोई भी पराजित होने वाला नहीं है। आपने जिस वस्तु के लिए असुरों के साथ युद्ध किया, वह यद्यपि लोक, वेद और वचन के रूप में स्थित और असंख्य है, तथापि आपने अपनी वीरता से उसे प्राप्त किया।[ऋग्वेद 6.69.8]
Hey Indr Dev & Shri Vishnu! You should be a winner and never defeated. None of you can be defeated. Though the commodity for which you fought with the demons is available in unlimited quantum, like abode, Ved and words yet you obtained-attained it with your valour-bravery.(08.11.2023)
ऋग्वेद संहिता, षष्ठम मण्डल सूक्त (72) :: ऋषि :- भरद्वाज बार्हस्पत्य; देवता :- इन्द्रदेव, सोमा; छन्द :- त्रिष्टुप्।
इन्द्रासोमा महि तद्वां महित्वं युवं महानि प्रथमानि चक्रथुः।
युवं सूर्यं विविदथुर्युवं स्व ९ विश्वा तमांस्यहतं निदश्च॥
हे इन्द्र देव और सोम देव! आपकी महिमा महान है। आपने महान और मुख्य भूतों को बनाया आपने सूर्य और जल को प्राप्त किया। आपने समस्त अन्धकारों और निन्दकों को दूर किया।[ऋग्वेद 6.72.1]
निन्दक :: अपमानकारी, अपवादी, उपहासात्मक, मुँहफट, बुराई करने वाला, मानव द्वेषी; चुगलखोर, आक्षेपक, निन्दोपाख्यान लेखक, उपहासात्मक; detractor, slanderer,
cynical, cynic, backbiter, denigrator, satirist, satirical.Hey Indr Dev & Som Dev! Your glory is great-ever lasting. You created great material and obtained Sun and water. You repelled all sorts of darkness and detractor, slanderer, satirical.
इन्द्रासोमा वासयथ उषासमुत्सूर्य नयथो ज्योतिषा सह।
उप द्यां स्कम्भथुः स्कम्भनेनाप्रथतं पृथिवीं मातरं वि॥
हे इन्द्र देव और सोम देव! आप उषा को प्रकाशित करें और सूर्य देव को ज्योति के साथ ऊपर उठावें तथा अन्तरिक्ष के द्वारा द्युलोक को स्तम्भित करें। माता पृथ्वी को प्रसिद्ध करें।[ऋग्वेद 6.72.2]
Hey Indr Dev and Som Dev! Let Usha appear and the Sun rise up with his light and make the heavens stable in respect of the space. Make mother earth famous.
इन्द्रासोमावहिमपः परिष्ठां हथो वृत्रमनु वा द्यौरमन्यत।
प्रार्णांस्यैरयतं नदीनामा समुद्राणि पप्रथुः पुरूणि॥
हे इन्द्र देव और सोम देव! जल को रोकने वाले अहि वृत्रासुर का वध करें। द्युलोक ने आपको संवर्द्धित किया। नदी के जल को प्रेरित करके, जल द्वारा समुद्र को पूर्ण करें।[ऋग्वेद 6.72.3]
Hey Indr Dev & Som Dev! Kill Vratra Sur who blocked the flow of water. The heavens have grown-nourished, nurtured you. Inspire the river waters to fill the oceans.
इन्द्रासोमा पकमामास्वन्तर्नि गवामिद्दद्यथुर्वक्षणासु।
जगृभथुरनपिनद्धमासु रुशच्चित्रासु जगतीष्वन्तः॥
हे इन्द्र देव और सोम देव! आपने कम उम्र वाली गौओं के थनों में परिपक्व दूध को स्थापित किया। नाना वर्ण की गौओं में आपने आबद्ध और शुक्लवर्ण दुग्ध को धारित कराया।[ऋग्वेद 6.72.4]
Hey Indr Dev & Som Dev! You generated ripe milk in the udders of immature cows. Cows of various colours produce white milk.
इन्द्रासोमा युवमङ्ग तरुत्रमपत्यसाचं श्रुत्यं रराथे।
युवं शुष्मं नर्यं चर्षणिभ्यः सं विव्यथुः पृतनाषाहमुग्रा॥
हे इन्द्र देव और सोम देव! आप लोग तारक, सन्तानयुक्त और श्रवणयोग्य धन हमें शीघ्र प्रदान करें। हे उग्र इन्द्र देव और सोम देव! मनुष्यों के लिए हितकर और शत्रु सेना को पराजित करने वाले बल को आप हमें प्रदान करें।[ऋग्वेद 6.72.5]
Hey Indr Dev & Som Dev! Grant us the wealth which is purifying, help in release from reincarnations, associated with progeny, good to listen-heard, quickly. Hey furious Indr Dev & Som Dev! Grant us might which is beneficial to the humans and capable of defeating the enemy army.
ऋग्वेद संहिता, दशम मण्डल सूक्त (55) :: ऋषि :- बृहदुक्थ, वामदेव, देवता :-इन्द्र, छन्द :- त्रिष्टुप्।
दूरे तन्नाम गुह्यं पराचैर्यत्त्वा भीते अह्वयेतां वयोधै।
उदस्तभ्नाः पृथिवीं द्यामभीके भ्रातुः पुत्रान्मघवन्तित्विषाणः॥
हे इन्द्र देव! आपका शरीर दूर है। पराङ्मुख होकर मनुष्य उसको छिपाते हैं। जिस समय द्यावा-पृथ्वी उसको अन्न के लिए बुलाते हैं, उस समय आप अपने पास की मेघराशि को प्रदीप्त करते हैं और पृथिवी से आकाश को ऊपर पकड़े रखते हैं।[ऋग्वेद 10.55.1]
Hey Indr dev! Your body is away.
महत्तन्नाम गुह्यं पुरुस्पृग्येन भूतं जनयो येन भव्यम्।
प्रत्नं जातं ज्योतिर्यदस्य प्रियं प्रियाः समविशन्त पञ्च॥
आपका विस्तृत स्थानों में व्याप्त गुह्य शरीर (अन्तरिक्ष) अत्यन्त प्रकाण्ड है। उससे आपने भूत और भविष्य को उत्पन्न किया है। जिन ज्योतिर्मय वस्तुओं को उत्पन्न करने की इच्छा हुई, उससे सब प्राचीन वस्तुएँ उत्पन्न हुई; उससे पञ्चजन (चारों वर्ण और निषाद) प्रसन्न हुए।[ऋग्वेद 10.55.2]
Your vast body pervaded over the space is eminant-colossoal. You produced-evolved past and future out of it. The luminous bodies desired by you led to evolution of ancient-eternal objects and the Panch Jan (Brahman, Kshatriy, Vaeshy, Shudr, Nishad) evolved out of it.
आ रोदसी अपृणादोत मध्यं पञ्च देवाँ ऋतुशः सप्तसप्त।
चतुस्त्रिंशता पुरुधा वि चष्टे सरूपेण ज्योतिषा विव्रतेन॥
इन्द्र देव ने अपने शरीर से द्युलोक, भूलोक और अन्तरिक्ष को पूर्ण किया। हे इन्द्र देव! समय-समय पर पाँच जातियों (देव, मनुष्य, पितर, असुर और राक्षस) और सात तत्त्वों (सात मरुद्गण, सात सूर्य किरण, सात लोक आदि) को अपने प्रदीप्त नानविध कार्यों के द्वारा धारण किया है। वह सब कार्य एक ही भाव से चलते हैं। इस सम्बन्ध में मेरे साथ तैंतीस देवता (आठ वसु, एकादश रुद्र, द्वादश आदित्य, प्रजापति, वषट्कार और विराट्) इन्द्र देव की सहायता करते है।[ऋग्वेद 10.55.3]
Indr Dev completed heaven, earth and the space with his body. Hey Indr Dev! Time to time, 5 castes-Varn, 7 basic components :- 7 Marud Gan, & rays, & abodes etc., supported by virtue of your differnt endeavours-efforts. They all move in unison. 33 demigods-deities (8 Vasu, 11 Rudr, 12 Adity, 2 Ashwani Kumars) in addition to Prajapati, Vashatkar and Virat) help-suppot Indr Dev.
यदुष औच्छः प्रथमा विभानामजनयो येन पुष्टस्य पुष्टम्।
यत्ते जामित्वमवरं परस्या महन्महत्या असुरत्वमेकम्॥
हे देवी उषा! नक्षत्रादि आलोकाधारी पदार्थों में आपने सबसे पहले आलोक दिया। जो पुष्ट है, उसको आपने और भी पुष्ट किया। आप ऊपर रहती हैं; किन्तु निम्नस्थ मनुष्यों के साथ आपकी मित्रता है। यह आपका महत्व और एक ही प्रकृष्ट बलत्व है।[ऋग्वेद 10.55.4]
Hey Devi Usha! You produced more lustere as compared to constellations and other luminous objects. You nourished one who is already nourished. You remain on the top but you are friendly with the humans low over the ground. This is your majesty and strength.
विधुं दद्राणं समने बहूनां युवानं सन्तं पलितो जगार।
देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार सह्यः समान॥
जिस समय इन्द्र देव युवा रहते हैं, उस समय सब कार्य करते हैं; उन द्रावक के भय से युद्ध में कितने ही शत्रु भागते है; परन्तु अनेक कालों का वृद्ध काल उनका ग्रास कर लेता है। उनकी महत्वजनक क्षमता देखिए कि वे कल जीवित थे, आज मर गये।[ऋग्वेद 10.55.5]
In his youth Indr Dev used to perform all sorts of deeds and the enemy ran away due to his fear. Growing age-Kal has his impact over him as well. He was alive till yesterday but now he is dead.
Indr is the king of demigods and a unit of time, since he has a fixed life span.
शाक्मना शाको अरुणः सुपर्ण आ यो महः शूरः सनादनीळः।
यचिकेत सत्यमित्तन्न मोघं वसु स्पार्हमुत जेतोत दाता॥
एक सुन्दर पक्षी आ रहा है। उसका बल अद्भूत है, सर्वसमर्थ है। वह महान, विक्रान्त, प्रचीन और बिना घोंसले का है। वह जो करना चाहता है, वह अवश्य ही हो जाता है। वह अभिलषणीय सम्पत्ति को जीतता और उसे स्तोताओं को दे देता है।[ऋग्वेद 10.55.6]
A beautiful bird is arriving. His might-power is amazing & he is capable to doing every thing. Any thing he want to do is accomplished. He wins the desired wealth-property and grant it to the Stotas.
ऐभिर्ददे वृष्ण्या पौंस्यानि येभिरौक्षत्रहत्याय वज्री।
ये कर्मणः क्रियमाणस्य मह्न ऋतेकर्ममुदजायन्त देवाः॥
वज्रधर इन्द्र देव ने मरुतों के साथ वर्षक बल को प्राप्त किया। मरुतों के साथ इन्द्र देव ने वर्षा की और वृत्रासुर का वध करके पृथ्वी को अभिषिक्त किया। हे महान् इन्द्र देव! जिस समय आप कार्य करते हैं, उस समय स्वयं मरुद्गण वृष्टि की उत्पत्ति के कार्य में लग जाते हैं।[ऋग्वेद 10.55.7]
Vajr wielding Indr Dev got strength-support from Marud Gan. He produced rains, killed Vratra Sur and crowned-anointed the earth. Hey great Indr Dev! When ever you are engased, Marud Gan, by themselves generate rains.
युजा कर्माणि जनयन्विश्वौजा अशस्तिहा विश्वमनास्तुराषाट्।
पीत्वी सोमस्य दिव आ वृधानः शूरो निर्युधाधमद्दस्यून्॥
मरुतों की सहायता से इन्द्र देव ये कर्म करते हैं। उनको तेज सर्वगन्ता है। वे राक्षसों को मारते हैं। उनका मन विश्वव्यापी है। वे क्षिप्र विजयी हैं। इन्द्र देव ने आकाश से आकर और सोमपान करके अपने शरीर को बढ़ाया और शस्त्रों से असुरों का वध किया।[ऋग्वेद 10.55.8]
Inder Dev perfom such deeds with the help of Marud Gan. His majesty is spreaded all around. His innerself pervades the whole univeese. He attains victory quickly. Indr Dev arrived from the sky-space and drunk Somras, extended his body size and killed demons with weapons.