Monday, April 15, 2013

KARM (3) कर्म ::DEEDS कर्म

DEEDS कर्म 
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com  hindutv.wordpress.com  santoshhastrekhashastr.wordpress.com   bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com  santoshkipathshala.blogspot.com     santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com   
कर्म :: कार्यं Deeds, task, action, work, endeavour, act, occupation, effort, act, function, sacrifice. 
कर्तव्य :: जिम्मेवारी, Duty, responsibility.
विहित कर्म :: शास्त्र जिन कार्यों-कर्मों की आज्ञा देता है। यज्ञ-हवन-अग्निहोत्र, सांध्य और प्रातः कालीन संध्या-पूजा पाठ। 
The ordained-prescribed deeds, functions which are directed (determined, fit, proper, arranged, instituted, performed,  ordered) by the Shastr-scriptures. Its not possible for every one to do all these duties.
Prescribed duties :: Yagy-Hawan-Holy sacrifices in fire, feeding the guests, Brahmans, grant of dols (अनुदान राज्य, धनी-मानी व्यक्तियों द्वारा आश्रम, शिक्षण संस्थाओं, हस्पताल को दी गई धन राशि, भेंट, सहायता), morning & evening prayers.
निहित :: placed, kept, contained, latent, entrusted, vested.
निहित-नियत कर्म :: Nihit Karm are compulsory, fixed, mandatory. Varnashram Dharm & various physical activities taking place within the body as daily routine, which are a must for every one.  One can not neglect them out of ignorance, illusion, confusion or otherwise. There is no bar-restriction on performing-doing these. Till the body has the soul, it will continue with the functions such as respiration, excretion, etc. Its a component of Vihit Karm as per Varnashram Dharm, essential as per difficult situation are Nihit Karm. 
भाग्य और पुरुषार्थ :: भाग्य और पुरुषार्थ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कुछ व्यक्ति भाग्य के भरोसे रहते हैं और पुरुषार्थ पर विश्वास नहीं करते। कुछ लोग पुरुषार्थ पर ही विश्वास करते हैं, भाग्य के भरोसे नहीं रहते। भाग्य के भरोसे रहने वाला अपना वर्तमान और भविष्य दोनों को खराब करता है। 
भगवान् का भरोसा करना चाहिये, परन्तु भगवान् तो स्वयं कर्म करने को कहते हैं। भगवान् कभी अकर्मण्य व्यक्तियों का सहयोगी नहीं हो सकता। कुछ व्यक्तियों को जीवन में कुछ उपलब्धियाँ भाग्य के कारण हासिल हुई दिखाई देती है, परन्तु वो तो उस व्यक्ति के प्रारब्ध, संचित और तात्कालिक कर्मों का नतीजा ही हैं। पुण्य और पाप कभी प्राणी का पीछा नहीं छोड़ते और उस वक्त तक भटकाते हैं जब तक कि वह समता हासिल नहीं कर लेता। दुर्भाग्य, हारी-बीमारी, सुख-दुःख, सफलता-विफलता इसी का परिणाम है। सत्कर्म करते रहो, ईश्वर की शरणागति करो, वर्णाश्रम धर्म का पालन करो और शेष मालिक पर छोड़ दो। 
पंच कर्म :: मोक्ष प्राप्ति के लिए पंच कर्म (सत्कर्मों) की उपयोगिता प्रत्येक मनुष्य-साधक की लिए है। इसमें धर्म, जाती, बिरादरी, वर्ण बीच में नहीं आते। इनकी विशद विवेचना धर्मसूत्रों तथा स्मृतिग्रंथों में उपलब्ध है।
(1).  संध्योपासन  :- यद्यपि संध्या वंदन-मुख्य संधि पांच वक्त की होती है जिनमें प्रात: और संध्या की संधि का महत्व ज्यादा है। संध्या वंदन प्रार्थना और ध्यान के माध्यम से किया जा सकता है। यह सकारात्मकता प्रदान करतीं हैं, जीवन में उमंग, ऊर्जा पैदा करतीं हैं। 
(2).  उत्सव :- हर्ष, उल्लास, शादी-विवाह, जन्मोत्सव, तीज-त्यौहार, अनुष्ठान यह अवसर प्रदान करते हैं। ये परस्पर मधुर सम्बन्ध , सम्पर्क स्थापित करने में सहायक हैं। इनसे संस्कार, एकता और उत्साह का विकास होता है। पारिवारिक और सामाजिक एकता के लिए उत्सव जरूरी है। पवित्र दिन और उत्सवों में बच्चों के शामिल होने से उनमें संस्कार का निर्माण होता है वहीं उनके जीवन में उत्साह बढ़ता है। 
(3). तीर्थ यात्रा :- यह मनुष्य को पुण्य प्रदान करती है। पापों का नाश करती है। सामाजिकता का विकास करती है। 
(4).  संस्कार :- संस्कार मनुष्य को सभ्य-सामाजिक बनाते हैं। इनसे जीवन में पवित्रता, सुख, शांति और समृद्धि का विकास होता है। सोलह संस्कार जीवन के कर्म से जुड़े हैं और आवश्यकता के अनुरूप हैं। ये हैं :- गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, मुंडन, कर्णवेधन, विद्यारंभ, उपनयन, वेदारंभ, केशांत, सम्वर्तन, विवाह और अंत्येष्टि। 
(5).  धर्म :- धर्म का अर्थ है अपने वर्णाश्रम कर्तव्यों का पूरी निष्ठा-ईमानदारी से पालन। धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है। सेवा भावना, दया, दान आदि कर्तव्यों का पालन भी नियमित रूप से करते रहना चाहिए। (5.1). व्रत, (5.2). सेवा, (5.3). दान, (5.4). यज्ञ* और (5.5). कर्तव्य का पालन। यज्ञ के अंतर्गत वेदाध्ययन भी आता है जिसके अंतर्गत छह शिक्षा (-वेदांग, सांख्य, योग, निरुक्त, व्याकरण और छंद) और छह दर्शन (-न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य, वेदांत और योग) शामिल हैं। व्रत से मन और मस्तिष्क सुदृढ़ बनता है वहीं शरीर स्वस्थ और बनवान बना रहता है। दान से पुण्य मिलता है और व्यर्थ की आसक्ति हटती है जिससे मृत्युकाल में लाभ मिलता है। सेवा से मन को शांति मिलती है और धर्म की सेवा भी होती है। सेवा का कार्य ही धर्म है।
इन सभी से ऋषि ऋण, ‍‍देव ऋण, पितृ ऋण, धर्म ऋण, प्रकृति ऋण और मातृ ऋण से उपरति होती है।
पाँच तरह के यज्ञ :- (5.4.1). ब्रह्मयज्ञ, (5.4.2). देवयज्ञ, (5.4.3). पितृयज्ञ, (5.4.4). वैश्वदेव यज्ञ तथा (5.4.5). अतिथि यज्ञ।
शास्त्रों के अनुसार कर्म तीन प्रकार के कर्म :- काम्य, निषिद्ध और नित्य। बिना कर्म के ईश्वर भी फल देने में समर्थ नहीं है। सभी कर्मों के परिणाम विधाता तय करता है जो मनुष्य को शुभ और अशुभ फल उसके जन्म-जन्मांतरों के कर्मों के अनुरूप प्रारब्ध के रूप में प्रकट करता है। पूर्व अर्जित कर्म ही शुभ-अशुभ, रोग-वैराग आदि के रूप में प्रकट होते है  और फल के उपरांत नष्ट हो जाते हैं। 
कर्म फल-परिणाम की दृष्टि से कर्म :: प्रारब्ध, संचित और वर्तमान-तत्काल फलदाई हो सकते हैं। प्रारब्ध को पूरी तरह बदला नहीं जा सकता, परन्तु उसमे सुधार-संशोधन अवश्य किया जा सकता है। संचित कर्म और तत्काल कर्म भविष्य को बदलने में कुछ-कुछ सहायक हो सकते हैं। 
कर्म के 5  कारण :: अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न-भिन्न करण, नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ तथा दैव। सब भूतों में एक परमात्मा का ज्ञान सात्विक, भेद ज्ञान राजस और अतात्विक ज्ञान तामस है। निष्काम भाव से किया कर्म सात्विक, कामना के लिए किया कर्म राजसिक तथा मोहवश किया गया कर्म तामस है। कार्य की सिद्धि-असिद्धि में सम (निर्विकार) रहने वाला सात्विक, हर्ष-शोक करने वाला राजस तथा शठ और आलसी कर्ता तामस कहलाता है। कार्य-अकार्य के तत्व को समझने वाली बुद्धि सात्विक, उसे ठीक-ठीक न जानने वाली बुद्धि राजसिक तथा विपरीत धारणा रखने वाली बुद्धि तामसिक मानी  गयी है।
One should understand-realise the essence-gist of pious-righteous actions, vices-wretched-immoral actions-sins and inaction because the effects-results-outcome of actions is hidden-deep.
Deeds-actions can be divided into three categories according to their impact over the inner self-thinking of the individual. (1). Basic : (1.1). Vested-latent-contained-entrusted & (1.2). Ordained, prescribed-proper-determined-fit, (2). Deeds not accomplished-undone-inaction (-having no impact over the doer) & (3). Vices-sins-wretched-immoral acts. Any result oriented action performance is deed. Actions made-done without desire-motive turn into deed undone-not performed.Ordained, prescribed-proper-determined-fit performed with the desire-motive of harming others turn into sins. Any deed against the scriptures too is sin. Understanding of the fact that performances without involvement-attachment, is knowing the gist of deeds.Performances associated with equanimity, turn into deeds undone, how so ever intricate-horrific may they be. Understanding the gist of deeds undone and their summary rejection is essential. Its extremely difficult-intricate to know the orientation of the outcome-result of deeds due to the association of ego-pride and desire-motive for comforts-luxuries. [Shri Mad Bhagwat Geeta 4.16] For further studies please consult YOG :: (KARM, GYAN-SANKHY-ENLIGHTENMENT, DIVINITY-BHAKTI & PRANAYAM) योग: कर्म, ज्ञान-सांख्य, भक्ति, प्राणायाम santoshsuvichar.blogspot.com
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥4-17॥[श्रीमद्भागवद गीता] 
कर्म का तत्व-स्वरूप भी जानना चाहिए और विकर्म का तत्व-स्वरूप भी जानना चाहिए तथा अकर्म का तत्व-स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्मों की गति गहन-छिपी हुई-कठिन है। 
अन्तःकरण के भाव से कर्म के तीन भेद हैं। कर्म, अकर्म और विकर्म। सकामभाव से की गई कोई भी क्रिया कर्म बन जाती है। फलेच्छा, ममता, आसक्ति से रहित परमार्थ कर्म अकर्म बन जाता है। विहित कर्म यदि अहित की भावना अथवा दुःख पहुँचाने के भाव-इच्छा से किया गया तो वह भी विकर्म-पाप बन जायेगा तथा शास्त्र निषिद्ध कर्म तो विकर्म है ही। निर्लिप्त रहते हुए कर्म करना ही अकर्म के तत्व को जानना है।कामना से कर्म होते हैं और कामना बढ़ जाने से विकर्म। समतापूर्वक किया गया विकर्म भी अकर्म बन जाता है। विकर्म के तत्व को जानना है, उसका और कामना का स्वरूप से त्याग करना। कर्म की गति को कर्तव्याभिमान और फलेच्छा-सुखेच्छा के रहते जानना-समझना बेहद कठिन, क्लिष्ठ-मुश्किल है।
इष्ट और पूर्त कर्म ::
श्रद्धयेष्टं च पूर्तं च नित्यं कुर्यादतन्द्रितः। 
श्रद्धाकृते ह्यक्षये ते भवतः स्वागतैर्धनैः॥मनुस्मृति 4.226॥
इसलिये इष्ट (अग्निहोत्र, पूर्णमास, चातुर्मास) और पूर्त दोनों कर्मों को सदा आलस्य रहित होकर श्रद्धा पूर्वक करना चाहिये। न्यायोचित धन से श्रद्धा द्वारा किये गए ये दोनों शुभ कार्य मोक्ष के कारण होते हैं। 
Veds have described two types of Karm which one should do with faith-devotion without laziness. The first is Isht Karm that includes Yagy as daily  routine, monthly practice and after the completion of 4 months. Purt Karm are social-religious activities pertaining to digging of wells, water bodies for storage etc. However, one should utilise the money by earning it through honest-virtuous-pious means and offer happily with faith in the Almighty. These two practices leads one to Salvation-assimilation in the God-Moksh-freedom from rebirth.
दानधर्मं निषेवेत नित्यमैष्टिकपौर्तिकम्। 
परितुष्टेन भावेन पात्रमासाद्य शक्तितः॥मनुस्मृति 4.227॥ 
यज्ञ और पूर्त सम्बन्धी दान धर्म सत्पात्र को पाकर सदा प्रसन्न मन से यथाशक्ति करना चाहिये। 
One should donate freely-open heartedly-happily as per his ability for sacrifices in holy fire i.e., Yagy-Hawan-Agnihotr or construction of garden, inn, temple, roads, hospitals, water reservoirs, community center or some religious activity if he finds a suitable -deserving person performing that job.etc.
पूर्त :: पूरी तरह से भरा हुआ, छाया या ढका हुआ, आवृत्त, पालित, रक्षित, पूर्णता,  खोदने अथवा निर्माण करने का कार्य; पुष्करिणी, सभा, वापी, बावली, देवगृह, आराम बगीचा, सड़क, देवगृह, वापी आदि का बनवाना जो धार्मिक दृष्टि से उत्तम कर्म माना गया है; construction of garden, inn, temple, roads, hospitals, water reservoirs, community center etc. for religious purpose.
यत्किञ्चिदपि दातव्यं याचितेनानसूयया। 
उत्पत्स्यते हि तत्पात्रं यत्तारयति सर्वतः॥मनुस्मृति 4.228॥ 
किसी के याचना करने पर जो कुछ हो सके उसे श्रद्धा पूर्वक देना चाहिये, क्योंकि दानशील पुरुष के पास किसी दिन ऐसा पात्र-अतिथि भी आ जाता है, जो उसका सब पापों से उद्धार कर देता है। 
One should oblige-donate happily on being requested by some one-needy, since occasionally someone comes to the person who donates happily, who can liberate him from all sins.

No comments:

Post a Comment