Saturday, June 4, 2016

SHRADDH-HOMAGE TO MANES (1) तर्पण श्राद्ध

SHRADDH-HOMAGE TO MANES (1)
तर्पण-श्राद्ध
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  By :: Pt. Santosh  Bhardwaj   
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श्राद्ध एवं श्रद्धा :: श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। श्राद्ध में श्राद्धकर्ता का यह अटल विश्वास रहता है कि मृत या पितरों के कल्याण के लिए ब्राह्मणों को जो कुछ भी दिया जाता है वह उसे या उन्हें किसी प्रकार अवश्य ही मिलता है। [स्कन्द पुराण]
श्रद्धा को देवत्व दिया गया है और वह देवता के समान ही सम्बोधित हैं।[ॠग्वेद]
बृहस्पति ने कहा कि देव मुझ में विश्वास (श्रद्धा) रखें तो मैं उनके पुरोहित का पद प्राप्त करूँ।[तैत्तिरीय संहिता]
श्रत् एवं श्रद्धा का सत्य के अर्थ में व्यक्त किया गया है। [निरुक्त]
प्रजापति ने श्रद्धा को सत्य में और अश्रद्धा को झूठ में रख दिया है और सत्य की प्राप्ति श्रद्धा से होती है। [वाज. सं.]
श्राद्धिन् एवं श्राद्धिक वह है जिसने श्राद्ध भोजन कर लिया हो। श्राद्ध शब्द श्रद्धा  प्रकट करता है।[पाणिनी]
श्रद्धा चेत्तस: संप्रसाद:। सा हि जननीव कल्याणी योगिनं पाति॥[योगसूत्र] 
श्रद्धा को मन का प्रसाद या अक्षोभ (स्थैर्य) कहा गया है।
प्रत्ययो धर्मकार्येषु तथा श्रद्धेत्युदाह्रता। नास्ति ह्यश्रद्धधानस्य धर्मकृत्ये प्रयोजनम्॥[देवल] 
धार्मिक कृत्यों में जो प्रत्यय या विश्वास होता है, वही श्रद्धा है, जिसे प्रत्यय नहीं है, उसे धार्मिक कर्म करने का प्रयोजन नहीं है।
श्रद्धायुक्त व्यक्ति शाक से भी श्राद्ध करे, भले ही उसके पास अन्य भोज्य पदार्थ न हों।[कात्यायन श्राद्ध सूत्र]
जहाँ पर पितरों की संतुष्टि के लिए श्राद्ध पर बल दिया गया है। [मनु]
श्राद्ध का सम्बन्ध श्रद्धा से है और श्राद्ध में जो कुछ भी दिया जाता है, वह पितरों के द्वारा प्रयुक्त होने वाले उस भोजन में परिवर्तित हो जाता है, जिसे वे कर्म एवं पुनर्जन्म के अनुसार नये शरीर के रूप में पाते हैं। अनुचित एवं अन्यायपूर्ण ढंग से प्राप्त धन से जो श्राद्ध किया जाता है, वह चाण्डाल, पुक्कस तथा अन्य नीच योनियों में उत्पन्न लोगों की सन्तुष्टि का साधन होता है।[मार्कण्डेय पुराण]
श्राद्ध की प्रशस्तियाँ :: पितरों के कृत्यों से दीर्घ आयु, स्वर्ग, यश एवं पुष्टिकर्म (समृद्धि) की प्राप्ति होती है। [बौधायन धर्मसूत्र]
श्राद्ध से यह लोक प्रतिष्ठित है और इससे योग (मोक्ष) का उदय होता है। [हरिवंश पुराण]
श्राद्ध से बढ़कर श्रेयस्कर कुछ नहीं है।[सुमन्तु]
यदि कोई श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है तो वह ब्रह्मा, इन्द्र, रुद्र एवं अन्य देवों, ऋषियों, पक्षियों, मानवों, पशुओं, रेंगने वाले जीवों एवं पितरों के समुदाय तथा उन सभी को जो जीव कहे जाते हैं, एवं सम्पूर्ण विश्व को प्रसन्न करता है। [वायुपुराण]
पितृपूजन से आयु, पुत्र, यश, कीर्ति, पुष्टि (समृद्धि), बल, श्री, पशु, सौख्य, धन, धान्य की प्राप्ति होती है।[यम]
प्रपितामह को दिया गया पिण्ड स्वयं वासुदेव घोषित है, पितामह को दिया गया पिण्ड संकर्षण तथा पिता को दिया गया पिण्ड प्रद्युम्न घोषित है और पिण्ड कर्ता स्वयं अनिरुद्ध कहलाता है। [श्राद्धसार एवं श्राद्धप्रकाश द्वारा उदधृत विष्णु धर्मोत्तर पुराण]
विष्णु को तीनों पिण्डों में अवस्थित समझना चाहिए।[शान्तिपर्व]
अमावस्या के दिन पितर लोग वायव्य रूप धारण कर अपने पुराने निवास के द्वार पर आते हैं और देखते हैं कि उनके कुल के लोगों के द्वारा श्राद्ध किया जाता है कि नहीं। ऐसा वे सूर्यास्त तक देखते हैं। जब सूर्यास्त हो जाता है, वे भूख एवं प्यास से व्याकुल हो निराश हो जाते हैं, चिन्तित हो जाते हैं, बहुत देर तक दीर्घ श्वास छोड़ते हैं और अन्त में अपने वंशजों को कोसते (उनकी भर्त्सना करते हुए) चले जाते हैं। जो लोग अमावस्या को जल या शाक-भाजी से भी श्राद्ध नहीं करते, उनके पितर उन्हें अभिशापित कर चले जाते हैं।[कूर्म पुराण]
तर्पण :: आवाहन, पूजन, नमस्कार के उपरान्त तर्पण किया जाता है। जल में दूध, जौ, चावल, चन्दन डाल कर तर्पण कार्य में प्रयुक्त करते हैं। मिल सके, तो गंगा जल भी डाल देना चाहिए। तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है। स्वगर्स्थ आत्माओं की तृप्ति किसी पदार्थ से, खाने-पहनने आदि की वस्तु से नहीं होती, क्योंकि स्थूल शरीर के लिए ही भौतिक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। मरने के बाद स्थूल शरीर समाप्त होकर, केवल सूक्ष्म शरीर ही रह जाता है। सूक्ष्म शरीर को भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि की आवश्यकता नहीं रहती, उसकी तृप्ति का विषय कोई, खाद्य पदार्थ या हाड़-मांस वाले शरीर के लिए उपयुक्त उपकरण नहीं हो सकते। सूक्ष्म शरीर में विचारणा, चेतना और भावना की प्रधानता रहती है, इसलिए उसमें उत्कृष्ट भावनाओं से बना अन्तःकरण या वातावरण ही शान्तिदायक होता है।
पिण्ड :: श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके पिण्ड बनाते हैं, उसे 'सपिण्डीकरण' कहते हैं। पिण्ड का अर्थ है शरीर। चावल के पिण्ड जो पिता, दादा, परदादा और पितामह के शरीरों का प्रतीक हैं, आपस में मिलकर फिर अलग बाँटते हैं। 
पिंडदान :: गया में आश्विन-कृष्णपक्ष में बहुत अधिक लोग श्राद्ध करने जाते हैं। पूरे श्राद्ध पक्ष वे वहाँ रहते हैं। श्राद्धपक्ष के लिए पिंडदान आदि का क्रम इस प्रकार है। 
भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी पुनपुन तट पर श्राद्ध।
भाद्रपद पूर्णिमा फल्गु नदी में स्नान और नदी पर खीर के पिंड से श्राद्ध।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा ब्रह्मकुंड, प्रेतशिला, राम कुंड एवं रामशिला पर श्राद्ध और काकबलि।
आश्विन कृष्ण द्वितीया उत्तरमानस, उदीची, कनखल, दक्षिणमानस और जिह्वालोल तीर्थों पर पिंडदान।
आश्विन कृष्ण तृतीया सरस्वती स्नान, मतंगवापी, धर्मारण्य और बोधगया में श्राद्ध।
आश्विन कृष्ण चतुर्थी ब्रह्मसरोवर पर श्राद्ध, आम्रसेचन और काकबलि।
आश्विन कृष्ण पंचमी विष्णुपद मंदिर में रुद्रपद, ब्रह्मपद और विष्णुपद पर खीर के पिंड से श्राद्ध।
आश्विन कृष्ण षष्ठी से अष्टमी तक विष्णुपद के सोलह वेदी नामक मंडप में 14 स्थानों पर और पास के मंडप में दो स्थानों पर पिंडदान होता है।
आश्विन कृष्ण नवमी रामगया में श्राद्ध और सीता कुंड पर माता, पितामही को बालू के पिंड दिए जाते हैं।
आश्विन कृष्ण दशमी गय सिर और गय कूप के पास पिंड दान किया जाता है।
आश्विन कृष्ण एकादशी मुंडपृष्ठ, आदि गया और धौत पाद में खोवे या तिल-गुड़ से पिंडदान।
आश्विन कृष्ण द्वादशी भीमगया, गोप्रचार और गदालोल में पिंडदान।
आश्विन कृष्ण त्रियोदशी फल्गु में स्नान करके दूध का तर्पण, गायत्री, सावित्री तथा सरस्वती तीर्थ पर क्रमशः प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल स्नान और संध्या।
आश्विन कृष्ण चतुर्दशी वैतरणी स्नान और तर्पण।
आश्विन अमावस्या अक्षय वट के नीचे श्राद्ध और ब्राह्मण-भोजन।
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा गायत्री घाट पर दही-अक्षत का पिंड देकर गया श्राद्ध समाप्त किया जाता है।
श्राद्ध के नियम :: दैनिक पंच यज्ञों में पितृ यज्ञ को ख़ास बताया गया है। इसमें तर्पण और समय-समय पर पिण्ड दान भी सम्मिलित है। पूरे पितृ पक्ष भर तर्पण आदि करना चाहिए। इस दौरान कोई अन्य शुभ कार्य या नया कार्य अथवा पूजा-पाठ अनुष्ठान सम्बन्धी नया काम नहीं किया जाता। साथ ही श्राद्ध नियमों का विशेष पालन करना चाहिए। परन्तु नित्य कर्म तथा देवताओं की नित्य पूजा जो पहले से होती आ रही है, उसको बन्द नहीं करना चाहिए।
अनुष्ठान :: अपने दिवंगत बुजुर्गों को हम दो प्रकार से याद करते हैं :-
स्थूल शरीर के रूप में और भावनात्मक रूप से। स्थूल शरीर तो मरने के बाद अग्नि को या जलप्रवाह को भेंट कर देते हैं, इसलिए श्राद्ध करते समय हम पितरों की स्मृति कर उनके भावनात्मक शरीर की पूजा करते हैं ताकि वे तृप्त हों और हमें सपरिवार अपना स्नेहपूर्ण आर्शीवाद दें।
श्राद्ध सूक्ष्म शरीरों के लिए वही काम करते हैं, जो जन्म के पूर्व और जन्म के समय के संस्कार स्थूल शरीर के लिए करते हैं। यहाँ से दूसरे लोक में जाने और दूसरा शरीर प्राप्त करने में जीवात्मा की सहायता करके मनुष्य अपना कर्तव्य पूरा कर देता है। इसलिए इस क्रिया को श्राद्ध कहते हैं, जो श्रृद्धा से बना है। श्राद्ध की क्रियाएँ दो भागों में बँटी हुई हैं। पहला प्रेत क्रिया और दूसरा पितृ क्रिया। ऐसा माना जाता है कि मरा हुआ व्यक्ति एक वर्ष में पितृ लोक पहुँचता है। अत: सपिंडीकरण का समय एक वर्ष के अन्त में होना चाहिए। परन्तु इतने दिनों तक अब लोग प्रतिक्षा नहीं कर पाते हैं। इस स्थिति में सपिंडीकरण की अवधि छह महीने से अब 12 दिन की हो गई है। इसके लिए गरुड़ पुराण का निम्न श्लोक आधार है :-
अनित्यात्कलिधर्माणांपुंसांचैवायुष: क्षयात्।अस्थिरत्वाच्छरीरस्य द्वादशाहे प्रशस्यते।।
कलियुग में धर्म के अनित्य होने के कारण पुरुषों की आयु क्षीणता तथा शरीर के क्षण भंगुर होने से बारहवें दिन सपिंडी की जा सकती है। वर्णानुसार यह दिन आगे भी बढ़ जाता है। बारहवाँ दिन उनके लिए है, जिनकी शुद्धि दस दिन में हो जाती है।
श्राद्ध सूक्ष्म शरीरों के लिए वही काम करते हैं, जो कि जन्म के पूर्व और जन्म के समय के संस्कार स्थूल शरीर के लिए करते हैं। इसलिए शास्त्र पूर्व जन्म के आधार पर ही कर्म काण्ड में श्राद्धादि कर्म का विधान निर्मित करते हैं। 
जिस प्रकार सभी संस्कार प्रकृति के कार्य को सहायता पहुँचाने के लिए बने हैं, उसी प्रकार प्रेत क्रिया का भी उद्देश्य यही है कि वह प्राणमय कोश की, अन्नमय कोश के यथावत रहने के समय तक उस पर अवलंबित रहने की प्रकृति को नष्ट कर दे और जब तक प्रकृति अपनी साधारण प्रक्रिया में पहुँचाना चाहे, उस मनुष्य को भूलोक में इस प्रकार धारण किए रहे। इस विषय में सबसे पहला आवश्यक कार्य यह है कि अन्नमय कोश नष्ट कर दिया जाए और वह दाह करने से हो जाता है।
छान्दोग्योपनिषद में उल्लेख है :–
ते प्रेतं दिष्टमितो अग्नय ऐ हरन्ति यत एवेतो यत: संभूतो भवति। 
जैसा निर्दिष्ट है, वे मृतात्मा को अग्नि के पास ले जाते हैं, जहाँ से वह आया था और जहाँ से वह उत्पन्न हुआ था। शव में आग लगाने से पूर्व दाहकर्ता चिता की परिक्रमा करता है और उस पर इस मंत्र के साथ जल छिड़कता है :–
अयेत वीत वि च सर्पत अत:।
जाओ, अपसरण करो, विदा हो जाओ, जब तक दाह होता रहता है, तब तक कहा जाता है। बाद में बची हुई अस्थियों-हड्डियों का संचय करके प्रवाह कर दिया जाता है। इसके बाद मनोमय कोष के विश्लेषण करने का काम आता है, जिससे प्रेत बदल कर पितृ हो जाता है। सभी संस्कारों विवाह को छोड़कर श्राद्ध ही ऐसा धार्मिक कृत्य है, जिसे लोग पर्याप्त धार्मिक उत्साह से करते हैं। विवाह में बहुत से लोग कुछ विधियों को छोड़ भी देते हैं, परन्तु श्राद्ध कर्म में नियमों की अनदेखी नहीं की जाती है। क्योंकि श्राद्ध का मुख्य उद्देश्य परलोक की यात्रा की सुविधा करना है।
श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन :: श्राद्ध के दौरान पंडितों को खीर-पूरी खिलाने का महत्त्व होता है। माना जाता है कि इससे स्वर्गीय पूर्वजों की आत्मा तृप्त होती है। पुरुष के श्राद्ध में ब्राह्मण को तथा स्त्री के श्राद्ध में ब्राह्मण महिला को भोजन कराया जाता है। लोग अपनी श्रद्धा अनुसार खीर-पूरी तथा सब्जियाँ बनाकर उन्हें भोजन कराते हैं तथा बाद में वस्त्र व दक्षिणा देकर व पान खिलाकर विदा करते हैं। सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर अपने पूर्वज का चित्र रखकर पंडित नियम पूर्वक पूजा व संकल्प कराते हैं। इस दिन बिना प्याज व लहसुन का भोजन तैयार किया जाता है। बाद में पंडित व पंडिताइन के श्रद्धा पूर्वक पैर छूकर उन्हें भोजन कराते हैं। भोजन में खीर-पूरी व पनीर, सीताफल, अदरक व मूली का लच्छा तैयार किया जाता है। उड़द की दाल के बड़े बनाकर दही में डाले जाते हैं। पंडित सर्वप्रथम गाय का नैवेद्य निकलवाते हैं। इसके अलावा कौओं व चिड़िया, कुत्ते के लिए भी ग्रास निकालते हैं। पितृ अमावस्या को आख़िरी श्राद्ध करके पितृ विसर्जन किया जाता है तथा पितरों को विदा किया जाता है। कई जगहों पर अमावस्या के दिन पंडित बहुत कम मिलते हैं, क्योंकि एक धारणा यह है कि श्राद्ध का भोजन या तो कुल पंडित या किसी ख़ास ब्राह्मण को कराया जाता है। कई जगह व्यस्त होने के चलते भी पंडितों की कमी रहती है। मान्यता है कि ब्राह्मणों को खीर-पूरी खिलाने से पितृ तृप्त होते हैं। यही वजह है कि इस दिन खीर-पूरी ही बनाई जाती है।
ऐसी मान्यता है कि कौओं को खाना खिलाने से पितरों को खाना मिलता है। श्राद्ध के दौरान पितरों को खाना खिलाने के तौर पर सबसे पहले कौओं को खाना खिलाया जाता है। जो व्यक्ति श्राद्ध कर्म कर रहा है वह एक थाली में सारा खाना परोसकर अपने घर की छत पर जाता है और ज़ोर ज़ोर से 'कोबस कोबस' कहते हुए कौओं को आवाज़ देता है। 

श्राद्ध विधि :: श्राद्ध दिवस से पूर्व दिवस को बुद्धिमान पुरुष श्रोत्रिय आदि से विहित ब्राह्मणों को पितृ-श्राद्ध तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए निमंत्रित करें। पितृ-श्राद्ध के लिए सामर्थ्यानुसार अयुग्म तथा वैश्व-देव-श्राद्ध के लिए युग्म ब्राह्मणों को निमंत्रित करना चाहिए। निमंत्रित तथा निमंत्रक क्रोध, स्त्रीगमन तथा परिश्रम आदि से दूर रहे।
पितर या पितृ गण :: पितृ गण मनुष्य के पूर्वज  हैं, जिनका उसके ऊपर ऋण है। पितृगणों ने कोई ना कोई उपकार मनुष्य के जीवन के लिए  अवश्य किया है। 
मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है, पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है। आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है, वहाँ पूर्वज  मिलते हैं। अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं कि इस आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया।  
इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार  पर सूर्य लोक की तरफ बढती है। वहाँ से आगे,  यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को बेध कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है, जो परमात्मा में समाहित  होती है, जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता।   
मनुष्य लोक एवं पितृ लोक  में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश, मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं।श्राद्ध और पितर :: श्राद्धों का पितरों के साथ अटूट संबंध है। पितरों के बिना श्राद्ध की कल्पना नहीं की जा सकती। श्राद्ध पितरों को आहार पहुँचाने का माध्यम मात्र है। मृत व्यक्ति के लिए जो श्रद्धायुक्त होकर तर्पण, पिण्ड, दानादि किया जाता है, उसे 'श्राद्ध' कहा जाता है और जिस मृत व्यक्ति के एक वर्ष तक के सभी और्ध्व दैहिक क्रिया कर्म संपन्न हो जायें, उसी की 'पितर' संज्ञा हो जाती है।
मेरे वे पितर जो प्रेत रूप हैं, तिलयुक्त जौ के पिण्डों से तृप्त हों। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रह्मा से लेकर तिनके तक, चर हो या अचर, मेरे द्वारा दिये जल से तृप्त हों। [वायु पुराण]
"श्रद्धया इदं श्राद्धम्‌" जो श्र्द्धा से किया जाय, वह श्राद्ध है। प्रेत और पित्तर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति-शान्ति के लिए श्रद्धा पूर्वक जो अर्पित किया जाए वह श्राद्ध है।
जो कुछ उचित काल, पात्र एवं स्थान के अनुसार उचित-शास्त्रानुमोदित, विधि द्वारा पितरों को लक्ष्य करके श्रद्धा पूर्वक ब्राह्मणों को दिया जाता है, श्राद्ध कहलाता है।[ब्रह्म पुराण]
पिण्ड, पितृ यज्ञ उपरान्त, अन्वाहार्य श्राद्ध उसी दिन सम्पादित होता है।[गोभिल गृह्य सूत्र]
मासिक श्राद्ध को अन्वाहाय कहते हैं। मासिक श्राद्ध, पिण्ड पितृ यज्ञ से पृथक् होता है। [शांखायन गृह्य सूत्र]
पितृ यज्ञ अर्थात् पिण्ड पितृ यज्ञ के सम्पादन के उपरान्त वह ब्राह्मण जो अग्नि होत्री अर्थात् आहिताग्नि है, उसे अमावास्या के दिन प्रति मास पिण्डान्वाहार्यक श्राद्ध करना चाहिए। [मनु]
आहिताग्नि को श्रौताग्नि में पिण्ड पितृ यज्ञ करना होता था और उसी दिन उसके उपरान्त एक अन्य श्राद्ध करना पड़ता था।
जो लोग श्रौताग्नि नहीं रखते थे, उन्हें अमावास्या के दिन गृह्यग्नियों में पिण्डान्वाहार्यक (या केवल अन्वाहार्य) नामक श्राद्ध करना होता था और उन्हें स्मार्त अग्नि में पिण्ड पितृ यज्ञ भी करना पड़ता था।
वर्तमान-तत्कालिक समय में अग्निहोत्री पिण्ड पितृ यज्ञ नहीं करते या करते भी हों तो वर्ष में केवल एक बार और पिण्डान्यावाहार्यक श्राद्ध लुप्त प्रायः हो गया है। 
स्मार्त यज्ञों में पशु-बलि नहीं होती, प्रत्युत उसके स्थान पर माष (उर्द) का अर्पण होता है।
आहिताग्नि श्रौताग्नियों में माँस अर्पित नहीं करते, प्रत्युत उसके स्थान पर पिष्ट पशु (आटे से बनी पशु प्रतिमा) की आहुतियाँ देते हैं।
पितरों का उद्देश्य करके, उनके कल्याण के लिए श्रद्धापूर्वक किसी वस्तु का या उससे सम्बन्धित किसी द्रव्य का त्याग श्राद्ध है। [मिताक्षरा]
पितरों का उद्देश्य करके, उनके लाभ के लिए यज्ञिय वस्तु का त्याग एवं ब्राह्मणों के द्वारा उसका ग्रहण प्रधान श्राद्ध स्वरूप है।[कल्पतरु] 
पितर लोग, यथा :– वसु, रुद्र एवं आदित्य, जो कि श्राद्ध के देवता हैं, श्राद्ध से संतुष्ट होकर मानवों के पूर्वपुरुषों को संतुष्टि देते हैं। [याज्ञवल्क्यस्मृति]
मनुष्य के तीन पूर्वज, यथा :- पिता, पितामह एवं प्रपितामह क्रम से पितृ-देवों अर्थात् वसुओं, रुद्रों एवं आदित्य के समान हैं और श्राद्ध करते समय उनकों पूर्वजों का प्रतिनिधि मानना चाहिए।
श्राद्ध से इन बातों का निर्देश होता है :-  होम, पिण्डदान एवं ब्राह्मण तर्पण (ब्राह्मण संतुष्टि भोजन आदि से); श्राद्ध इन तीनों के साथ गौण अर्थ में समझा जा सकता है।
उचित समय पर शास्त्र सम्मत विधि द्वारा पितरों के लिए श्रद्धा भाव से मन्त्रों के साथ जो दान-दक्षिणा आदि, दिया जाय, वही श्राद्ध कहलाता है।
20 अंश रेतस (सोम) को 'पितृॠण' कहते हैं।
28 अंश रेतस के रूप में 'श्रद्धा' नामक मार्ग से भेजे जाने वाले 'पिण्ड' तथा 'जल' आदि के दान को श्राद्ध कहते हैं। इस श्रद्धावान मार्ग का संबंध मध्याह्न काल में श्राद्ध करने का विधान है।
हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रुद्र और आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के वक़्त वे ही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि वे श्राद्ध कराने वालों के शरीर में प्रवेश करके और ठीक ढंग से रीति-रिवाजों के अनुसार कराये गये श्राद्ध-कर्म से तृप्त होकर वे अपने वंशधर को सपरिवार सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का आर्शीवाद देते हैं। श्राद्ध-कर्म में उच्चारित मन्त्रों और आहुतियों को वे अन्य सभी पितरों तक ले जाते हैं।
इस दृश्य संसार में स्थूल शरीर वाले को जिस प्रकार इन्द्रिय भोग, वासना, तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है, उसी प्रकार पितरों का सूक्ष्म शरीर शुभ कर्म से उत्पन्न सुगन्ध का रसास्वादन करते हुए तृप्ति का अनुभव करता है। उसकी प्रसन्नता तथा आकांक्षा का केन्द्र बिन्दु श्रद्धा है। श्रद्धा भरे वातावरण के सान्निध्य में पितर अपनी अशान्ति खोकर आनन्द का अनुभव करते हैं, श्रद्धा ही इनकी भूख है, इसी से उन्हें तृप्ति होती है। इसलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए श्रद्धा एवं तर्पण किये जाते हैं।  
माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा है। इसलिए धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई हैं। जन्मदाता माता-पिता को मृत्यु-उपरांत लोग विस्मृत न कर दें, इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। 
श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक हैं। पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है उसी को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध संस्कार में आवाहन, पूजन, नमस्कार के उपरान्त तर्पण किया जाता है। तर्पण में प्रधानतया जल का ही प्रयोग होता है। उसे थोड़ा सुगंधित एवं परिपुष्ट बनाने के लिए जल में गंगा जल, दूध, जौ, चावल, चन्दन तिल, फूल जैसी दो-चार मांगलिक वस्तुएँ डाली जाती हैं। कुशाओं के सहारे जौ की छोटी-सी अंजलि मन्त्रोच्चार पूवर्क डालने मात्र से पितर तृप्त हो जाते हैं। तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है। स्वगर्स्थ आत्माओं की तृप्ति किसी पदार्थ से, खाने-पहनने आदि की वस्तु से नहीं होती, क्योंकि स्थूल शरीर के लिए ही भौतिक उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। मरने के बाद स्थूल शरीर समाप्त होकर, केवल सूक्ष्म शरीर ही रह जाता है। सूक्ष्म शरीर पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी आदि का प्रभाव नहीं पड़ता। उसकी तृप्ति का विषय कोई, खाद्य पदार्थ या हाड़-मांस वाले शरीर के लिए उपयुक्त उपकरण नहीं हो सकते। सूक्ष्म शरीर में विचारणा, चेतना और भावना की प्रधानता रहती है, इसलिए उसमें उत्कृष्ट भावनाओं से बना अन्तःकरण या वातावरण ही शान्तिदायक होता है।
इस क्रिया के साथ आवश्यक श्रद्धा, कृतज्ञता, सद्भावना, प्रेम, शुभ कामना का समन्वय अवश्य होना चाहिए। यदि श्रद्धाञ्जलि इन भावनाओं के साथ की गयी है, तो तर्पण का उद्देश्य पूरा हो जायेगा, पितरों को आवश्यक तृप्ति मिलेगी, किन्तु यदि इस प्रकार की कोई श्रद्धा भावना तर्पण करने वाले के मन में नहीं होती और केवल लकीर पीटने या फिर मात्र पानी के इधर-उधर फैलाने से कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध नहीं होगा।  इसलिए पितृ-कर्मों के करने वाले छोटे-छोटे क्रिया-कृत्यों को करने के साथ-साथ दिवंगत आत्माओं के उपकारों का स्मरण करें, उनके सद्गुणों तथा सत्कर्मो के प्रति श्रद्धा व्यक्त करें। 
कृतज्ञता तथा सम्मान की भावना उनके प्रति रखें और यह अनुभव करें कि यह जलांजलि जैसे अकिंचन उपकरणों के साथ, अपनी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करते हुए स्वगीर्य आत्माओं के चरणों पर अपनी सद्भावना के पुष्प चढ़ा रहा हूँ। इस प्रकार की भावनाएँ जितनी ही प्रबल होंगी, पितरों को उतनी ही अधिक तृप्ति मिलेगी। जिस पितर का स्वगर्वास हुआ है, उसके किये हुए उपकारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना, उसके अधूरे छोड़े हुए पारिवारिक एवं सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा करने में तत्पर होना तथा अपने व्यक्तित्व एवं वातावरण को मंगलमय ढाँचे में ढालना मरणोत्तर संस्कार का प्रधान प्रयोजन है। गृह शुद्धि, सूतक निवृत्ति का उद्देश्य भी इसी के निमित्त की जाती है, किन्तु तर्पण में केवल इन्हीं एक पितर के लिए नहीं, पूर्व काल में गुजरे हुए अपने परिवार, माता के परिवार, दादी के परिवार के तीन-तीन पीढ़ी के पितरों की तृप्ति का भी आयोजन किया जाता है। इतना ही नहीं इस पृथ्वी पर अवतरित हुए सभी महान् पुरुषों की आत्मा के प्रति इस अवसर पर श्रद्धा व्यक्त करते हुए अपनी सद्भावना के द्वारा तृप्त करने का प्रर्यत्न किया जाता है।
श्राद्ध करने को उपयुक्त :: साधारणत: पुत्र ही अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं। किन्तु शास्त्रानुसार ऐसा हर व्यक्ति जिसने मृतक की सम्पत्ति विरासत में पायी है और उससे प्रेम और आदर भाव रखता है, उस व्यक्ति का स्नेहवश श्राद्ध कर सकता है। विद्या की विरासत से भी लाभ पाने वाला छात्र भी अपने दिवंगत गुरु का श्राद्ध कर सकता है। पुत्र की अनुपस्थिति में पौत्र या प्रपौत्र भी श्राद्ध-कर्म कर सकता है। नि:सन्तान पत्नी को पति द्वारा, पिता द्वारा पुत्र को और बड़े भाई द्वारा छोटे भाई को पिण्ड नहीं दिया जा सकता। किन्तु कम उम्र का ऐसा बच्चा, जिसका उपनयन संस्कार न हुआ हो, पिता को जल देकर नवश्राद्ध कर सकता। शेष कार्य उसकी ओर से कुल पुरोहित करता है।
श्राद्ध के लिए ::
उचित द्रव्य हैं :- तिल, माष (उड़द), चावल, जौ, जल, मूल, (जड़युक्त सब्जी) और फल।
तीन चीज़ें शुद्धिकारक हैं :- पुत्री का पुत्र, तिल और नेपाली कम्बल या कुश।
तीन बातें प्रशंसनीय हैं :- सफ़ाई, क्रोधहीनता और चैन (त्वरा (शीघ्रता)) का न होना।
महत्त्वपूर्ण बातें :- अपरान्ह का समय, कुशा, श्राद्धस्थली की स्वच्छ्ता, उदारता से भोजन आदि की व्यवस्था और अच्छे ब्राह्मण की उपस्थिति।
अनुचित बातें :- कुछ अन्न और खाद्य पदार्थ जो श्राद्ध में नहीं प्रयुक्त होते; मसूर, राजमा, कोदों, चना, कपित्थ, अलसी, तीसी, सन, बासी भोजन और समुद्र जल से बना नमक। भैंस, हिरणी, उँटनी, भेड़ और एक खुर वाले पशु का दूध भी वर्जित है पर भैंस का घी वर्जित नहीं है। श्राद्ध में दूध, दही और घी पितरों के लिए विशेष तुष्टिकारक माने जाते हैं। श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि में कभी नहीं किया जाता है। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है।
श्राद्ध में कुश और तिल का महत्त्व :: दर्भ या कुश को जल और वनस्पतियों का सार माना जाता है। यह भी मान्यता है कि कुश और तिल दोनों विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरुड़ पुराण के अनुसार, तीनों देवता ब्रह्मा, विष्णु, महेश कुश में क्रमश: जड़, मध्य और अग्रभाग में रहते हैं। कुश का अग्रभाग देवताओं का, मध्य भाग मनुष्यों का और जड़ पितरों का माना जाता है। तिल पितरों को प्रिय हैं और दुष्टात्माओं को दूर भगाने वाले माने जाते हैं। मान्यता है कि बिना तिल बिखेरे श्राद्ध किया जाये तो दुष्टात्मायें हवि को ग्रहण कर लेती हैं।
कम ख़र्च में श्राद्ध :: विष्णु पुराण के अनुसार दरिद्र व्यक्ति केवल मोटा अन्न, जंगली साग-पात-फल और न्यूनतम दक्षिणा, वह भी ना हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को देना चाहिए या किसी गाय को दिन भर घास खिला देनी चाहिए अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करनी चाहिए कि हे! प्रभु मैंने हाथ वायु में फैला दिये हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों।
पितृ पक्ष :: भाद्रपद पूर्णिमा-आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या सोलह दिन पितृपक्ष कहलाते हैं। इन पंद्रह दिनों में लोग अपने पितरों-पूर्वजों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्यु तिथि पर पार्वण श्राद्ध करते हैं। पिता-माता आदि पारिवारिक मनुष्यों की मृत्यु के पश्चात्‌ उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धा पूर्वक किए जाने वाले कर्म को पितृ श्राद्ध कहते हैं।
अनुष्ठान श्राद्ध-कर्म में पके हुए चावल, दूध और तिल को मिश्रित करके पिण्ड-शरीर रचना करते हैं। यह एक पारंपरिक विश्वास है कि हर पीढ़ी के भीतर मातृकुल तथा पितृकुल दोनों में पहले की पीढ़ियों के समन्वित गुणसूत्र उपस्थित होते हैं। यह प्रतीकात्मक अनुष्ठान जिन जिन लोगों के गुणसूत्र (chromosomes-each chromosome has millions of genes, carriers of heredity characters) श्राद्ध करने वाले की अपनी देह में हैं, उनकी तृप्ति के लिए होता है।
आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ब्रह्माण्ड की ऊर्जा तथा उस उर्जा के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। वह सूक्ष्म शरीर जो आत्मा भौतिक शरीर छोड़ने पर धारण करती है, प्रेत कहलाता है। प्रिय के अतिरेक की अवस्था प्रेत है, क्योंकि आत्मा जो सूक्ष्म शरीर धारण करती है, तब भी उसके अन्दर मोह, माया भूख और प्यास का अतिरेक होता है। सपिण्डन के बाद वह प्रेत, पित्तरों में सम्मिलित हो जाता है।
पितृपक्ष भर में जो तर्पण किया जाता है, उससे वह पितृ प्राण स्वयं आप्यापित होता है। पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से अंश लेकर वह अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से वह चक्र उर्ध्वमुख होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से पितर उसी ब्रह्मांडीय उर्जा के साथ वापस चले जाते हैं। इसलिए इसको पितृपक्ष कहते हैं और इसी पक्ष में श्राद्ध करने से पित्तरों को प्राप्त होता है।
भाद्रपद में ही श्राद्ध :: हमारा एक माह चंद्रमा का एक अहोरात्र होता है। इसीलिए ऊर्ध्व भाग पर रह रहे पितरों के लिए कृष्ण पक्ष उत्तम होता है। कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उनके दिनों का उदय होता है। अमावस्या उनका मध्याह्न है तथा शुक्ल पक्ष की अष्टमी अंतिम दिन होता है। धार्मिक मान्यता है कि अमावस्या को किया गया श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान उन्हें संतुष्टि व ऊर्जा प्रदान करते हैं। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पृथ्वी लोक में देवता उत्तर गोल में विचरण करते हैं और दक्षिण गोल भाद्रपद मास की पूर्णिमा को चंद्रलोक के साथ-साथ पृथ्वी के नज़दीक से गुजरता है। इस मास की प्रतीक्षा हमारे पूर्वज पूरे वर्ष भर करते हैं। वे चंद्रलोक के माध्यम से दक्षिण दिशा में अपनी मृत्यु तिथि पर अपने घर के दरवाज़े पर पहुँच जाते है और वहाँ अपना सम्मान पाकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नई पीढ़ी को आर्शीवाद देकर चले जाते हैं। ऐसा वर्णन 'श्राद्ध मीमांसा' में मिलता है। इस तरह पितृ ॠण से मुक्त होने के लिए श्राद्ध काल में पितरों का तर्पण और पूजन किया जाता है। भारतीय संस्कृति एवं समाज में अपने पूर्वजों एवं दिवंगत माता-पिता के स्मरण श्राद्ध पक्ष में करके उनके प्रति असीम श्रद्धा के साथ तर्पण, पिंडदान, यक्ष तथा ब्राह्मणों के लिए भोजन का प्रावधान किया गया है। पितरों के लिए किए जाने वाले श्राद्ध दो तिथियों पर किए जाते हैं। प्रथम मृत्यु या क्षय तिथि पर और दूसरा पितृ पक्ष में। जिस मास और तिथि को पितृ की मृत्यु हुई है अथवा जिस तिथि को उनका दाह संस्कार हुआ है, वर्ष में उम्र उस तिथि को एकोदिष्ट श्राद्ध किया जाता है।
एकोदिष्ट श्राद्ध में केवल एक पितर की संतुष्टि के लिए श्राद्ध किया जाता है। इसमें एक पिण्ड का दान और एक ब्राह्मण को भोजन कराया जाता है। यदि किसी को अपने पूर्वजों की मृत्यु की तिथियाँ याद नहीं है, तो वह अमावस्या के दिन ज्ञात-अज्ञात पूर्वजों का विधि-विधान से पिंडदान तर्पण, श्राद्ध कर सकता है। इस दिन किया गया तर्पण करके 15 दिन के बराबर का पुण्य फल मिलता है और घर परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में विशेष उन्नति होती है। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई है, तो पितृदोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्मशांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करना चाहिए। सामर्थ्यनुसार किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ ब्राह्मण से श्रीमद्‌ भागवत पुराण की कथा अपने पितरों की आत्मशांति के लिए करवा सकते हैं। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश वृद्धि में रुकावट, आकस्मिक बीमारी, धन से बरकत न होना सारी सुख सुविधाओं के होते भी मन असंतुष्ट रहना आदि परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है।
मातामह श्राद्ध :: मातामह श्राद्ध अपने आप में एक ऐसा श्राद्ध है जो एक पुत्री द्वारा अपने पिता को व एक नाती द्वारा अपने नाना को तर्पण किया जाता है। इस श्राद्ध को सुख शांति का प्रतीक माना जाता है क्योंकि यह श्राद्ध करने के लिए कुछ आवश्यक शर्तें है अगर वो पूरी न हो तो यह श्राद्ध नहीं निकाला जाता। शर्त यह है कि मातामह श्राद्ध उसी औरत के पिता का निकाला जाता है जिसका पति व पुत्र ज़िन्दा हो अगर ऐसा नहीं है और दोनों में से किसी एक का निधन हो चुका है या है ही नहीं तो मातामह श्राद्ध का तर्पण नहीं किया जाता।
मनुष्य पर तीन प्रकार के ऋण प्रमुख माने गए हैं :- पितृ ऋण, देव ऋण तथा ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण सर्वोपरि है। पितृ ऋण में पिता के अतिरिक्त माता तथा वे सब बुजुर्ग भी सम्मिलित हैं, जिन्होंने हमें अपना जीवन धारण करने तथा उसका विकास करने में सहयोग दिया।
पितृपक्ष में लोग मन कर्म एवं वाणी से संयम का जीवन जीते हैं; पितरों को स्मरण करके जल चढाते हैं; निर्धनों एवं ब्राह्मणों को दान देते हैं। पितृपक्ष में प्रत्येक परिवार में मृत माता-पिता का श्राद्ध किया जाता है, परंतु गया श्राद्ध का विशेष महत्व है। वैसे तो इसका भी शास्त्रीय समय निश्चित है, परन्तु "गया सर्वकालेषु पिण्डं दधाद्विपक्षणं" कहकर सदैव पिंडदान करने की अनुमति दे दी गई है।
 एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन्। यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति।
जो अपने पितरों को तिल-मिश्रित जल की तीन-तीन अंजलियाँ प्रदान करते हैं, उनके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है। 
जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है; उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है, उसका जन्म भी निश्चित है। ऐसे कुछ विरले ही होते हैं, जिन्हें मोक्ष प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढ़ियों तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता हैं। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात् ही स्व-पितृ तर्पण किया जाता है। 
जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथी को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर-परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है। [धर्म-दर्शन]
पितृ दोष के कारण :: परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होने से, अपने माता-पिता आदि सम्मानीय जनों का अपमान करने से, मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध नहीं करने से, उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों को दोष लगता है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश-वृद्धि में रूकावट, आकस्मिक बीमारी, संकट, धन में बरकत न होना, सारी सुख सुविधाएँ होते भी मन असन्तुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं। यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो तो, पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाएँ। अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ जनों का अपमान न करें। प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें। यदि इन सभी क्रियाओं को करने के पश्चात् पितृ दोष से मुक्ति न होती हो तो ऐसी स्थिति में किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण से श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा करवायें। श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा कोई भी श्रद्धालु पुरुष अपने पितरों की आम शांति के लिए करवा सकता है। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
तीन प्रकार के प्रमुख श्राद्ध :: नित्य, नैमित्तिक एवं काम्य श्राद्ध ।[मत्स्य पुराण]
पांच प्रकार के श्राद्ध ::  नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि और पार्वण श्राद्ध।[यमस्मृति] 
नित्य श्राद्ध ::  प्रतिदिन किए जानें वाले श्राद्ध को नित्य श्राद्ध कहते हैं। इस श्राद्ध में विश्वेदेव को स्थापित नहीं किया जाता। केवल जल से भी इस श्राद्ध को सम्पन्न किया जा सकता है।
नैमित्तिक श्राद्ध ::  किसी को निमित्त बनाकर जो श्राद्ध किया जाता है, उसे नैमित्तिक श्राद्ध कहते हैं। इसे एकोद्दिष्ट के नाम से भी जाना जाता है। एकोद्दिष्ट का मतलब किसी एक को निमित्त मानकर किए जाने वाला श्राद्ध जैसे किसी की मृत्यु हो जाने पर दशाह, एकादशाह आदि एकोद्दिष्ट श्राद्ध के अन्तर्गत आता है। इसमें भी विश्वेदेवोंको स्थापित नहीं किया जाता।
काम्य श्राद्ध ::  किसी कामना की पूर्ति के निमित्त जो श्राद्ध किया जाता है, वह काम्य श्राद्ध के अन्तर्गत आता है।
वृद्धि श्राद्ध :: किसी प्रकार की वृद्धि में जैसे पुत्र जन्म, वास्तु प्रवेश, विवाहादि प्रत्येक मांगलिक प्रसंग में भी पितरों की प्रसन्नता हेतु जो श्राद्ध होता है, उसे वृद्धि श्राद्ध कहते हैं। इसे नान्दी श्राद्ध या नान्दी मुख श्राद्ध के नाम भी जाना जाता है, यह एक प्रकार का कर्म कार्य होता है। दैनंदिनी जीवन में देव-ऋषि-पित्र तर्पण भी किया जाता है।
पार्वण श्राद्ध :: पार्वण श्राद्ध पर्व से सम्बन्धित होता है। किसी पर्व जैसे पितृपक्ष, अमावास्या या पर्व की तिथि आदि पर किया जाने वाला श्राद्ध पार्वण श्राद्ध कहलाता है। यह श्राद्ध विश्वेदेव सहित होता है।
सपिण्डन श्राद्ध :: सपिण्डन शब्द का अभिप्राय पिण्डों को मिलाना। पितर में ले जाने की प्रक्रिया ही सपिण्डन है। प्रेत पिण्ड का पितृ पिण्डों में सम्मेलन कराया जाता है। इसे ही सपिण्डन श्राद्ध कहते हैं।
गोष्ठी-समूह श्राद्ध :: सामूहिक या समूह में सम्पन्न किए गये श्राद्ध गोष्ठी कहलाते हैं।
शुद्धयर्थ श्राद्ध ::  शुद्धि के निमित्त किये गये श्राद्ध शुद्ध यर्थ श्राद्ध कहलाते हैं यथा शुद्धि हेतु ब्राह्मण भोजन कराना।
कर्माग श्राद्ध :: कर्माग का सीधा साधा अर्थ कर्म का अंग होता है अर्थात् किसी प्रधान कर्म के अंग के रूप में जो श्राद्ध सम्पन्न किए जाते हैं, उन्हें कर्माग श्राद्ध कहते हैं।
यात्रार्थ श्राद्ध ::  यात्रा के उद्देश्य से किया जाने वाला श्राद्ध यात्रार्थ श्राद्ध कहलाता है, जैसे तीर्थ में जाने के उद्देश्य से या देशान्तर जाने के उद्देश्य से जिस श्राद्ध को सम्पन्न कराना चाहिए वह यात्रार्थ श्राद्ध ही है। इसे घृत श्राद्ध भी कहा जाता है।
पुष्ट्यर्थश्राद्ध :: पुष्टि के निमित्त जो श्राद्ध सम्पन्न हो, जैसे शारीरिक एवं आर्थिक उन्नति के लिए किया जाना वाला श्राद्ध पुष्ट्यर्थ श्राद्ध कहलाता है।
श्राद्ध के 96 अवसर :: एक वर्ष की अमावास्याएं 12,  पुणादितिथियां 4, मन्वादि तिथियां 14, संक्रान्तियां 12, वैधृति योग 12, व्यतिपात योग 12, पितृ पक्ष 15, अष्टका श्राद्ध 5, अन्वष्टका 5 तथा पूर्वेद्यु 5 ।   [धर्मसिन्धु]
पुराणोक्त पद्धति :: एकोदिष्ट श्राद्ध, पार्वण श्राद्ध, नाग बलि कर्म, नारायण बलि कर्म, त्रिपिण्डी श्राद्ध। 
महालय श्राद्ध पक्ष में श्राद्ध कर्म उपरोक्त कर्मों हेतु विभिन्न संप्रदायों में विभिन्न प्रचलित परिपाटियाँ चली आ रही हैं। अपनी कुल-परंपरा के अनुसार पितरों की तृप्ति हेतु श्राद्ध कर्म अवश्य करना चाहिए।
उपयुक्त श्राद्ध कर्म स्थल गया :: बिहार स्थित बोध गया विष्णु पद मन्दिर, वह स्थान है जहाँ स्वयं भगवान विष्णु के चरण उपस्थित हैं। दूसरा सबसे प्रमुख स्थान फल्गु नदी है।  मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम ने स्वयं इस स्थान पर अपने पिता राजा दशरथ का पिंड दान किया था। इस स्थान पर आकर कोई भी व्यक्ति अपने पितरो के निमित्त पिंड दान करता है तो उसके पितृ उससे तृप्त रहते हैं और वह व्यक्ति अपने पितृऋण से उरिण हो जाता है। इस स्थान का नाम गया इसलिए रखा गया, क्योंकि भगवान विष्णु ने यहीं पर असुर गयासुर का वध किया था। इसके अलावा हरिद्वार, ऋषिकेश, त्र्यंबकेश्वर में भी श्राद्ध का प्रावधान है। 
तर्पण को छः भागों में विभक्त किया गया है :- (1). देव-तर्पण, (2). ऋषि-तर्पण, (3). दिव्य-मानव-तर्पण, (4). दिव्य-पितृ-तर्पण, (5). यम-तर्पण और (6). मनुष्य-पितृ-तर्पण।  
देवर्षि मनुष्य पितृ तर्पण विधि :: प्रातःकाल संध्योपासना करने के पश्चात् बायें और दायें हाथ की अनामिका अङ्गुलि में निम्न मन्त्र को पढते हुए पवित्री (पैंती) धारण करें :-
पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः
फिर हाथ में त्रिकुश, यव, अक्षत और जल लेकर निम्नाङ्कित रूप से संकल्प पढें :-
ॐ विष्णवे नम:। हरि: ॐ तत्सदद्यैतस्य श्रीब्रह्मणो द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भरतखण्डे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशे अमुकसंवत्सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रोत्पन्न: अमुकशर्मा (वर्मा, गुप्त:) अहं श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थं देवर्पिमनुष्यपितृतर्पणं करिष्ये। 
तीन कुश ग्रहण कर निम्न मंत्र को तीन बार कहें :-
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमोनमः। 
तदनन्तर एक ताँवे अथवा चाँदी के पात्र में श्वेत चन्दन, जौ, तिल, चावल, सुगन्धित पुष्प और तुलसी दल रखें, फिर उस पात्र के ऊपर एक हाथ या प्रादेश मात्र लम्बे तीन कुश रखें, जिनका अग्रभाग पूर्व की ओर रहे। इसके बाद उस पात्र में तर्पण के लिये जल भर दें। फिर उसमें रखे हुए तीनों कुशों को तुलसी सहित सम्पुटाकार दायें हाथ में लेकर बायें हाथ से उसे ढँक लें और निम्नाङ्कित मन्त्र पढते हुए देवताओं का आवाहन करें :-
ॐ विश्वेदेवास ऽआगत श्रृणुता म ऽइम, हवम् ।एदं वर्हिनिषीदत ॥[शु० यजु० 7.34]
हे विश्वेदेवगण ! आप लोग यहाँ पदार्पण करें, हमारे प्रेमपूर्वक किये हुए इस आवाहन को सुनें और इस कुश के आसन पर विराजमान हों।
 विश्वेदेवा: श्रृणुतेम, हवं मे ये ऽअन्तरिक्षे य ऽउप द्यवि ष्ठ ।येऽअग्निजिह्वाऽउत वा यजत्राऽआसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयद्ध्वम् ॥[शु० यजु० 33.53]
‘हे विश्वेदेवगण ! आपलोगोंमें से जो अन्तरिक्ष में हों, जो द्य्लोक (स्वर्ग) के समीप हों तथा अग्नि के समान जिह्वावाले एवं यजन करने योग्य हों, वे सब हमारे इस आवाहन को सुनें और इस कुशासन पर बैठकर तृप्त हों।
आगच्छन्तु महाभागा ब्रह्माण्डोदर वर्तिनः। ये यत्र  विहितास्तत्र सावधाना भवन्तु ते॥ 
इस प्रकार आवाहन कर कुश का आसन दें और उन पूर्वाग्र कुशों द्वारा दायें हाथ की समस्त अङ्गुलियों के अग्रभाग अर्थात् देवतीर्थ से ब्रह्मादि देवताओं के लिये पूर्वोक्त पात्र में से एक-एक अञ्जलि तिल चावल-मिश्रित जल लेकर दूसरे पात्र में गिरावें और निम्नाङ्कित रूप से उन-उन देवताओं के नाम मन्त्र पढते रहें :-
देव तपर्णम् :: देव शक्तियाँ ईश्वर की वे महान विभूतियाँ हैं, जो मानव-कल्याण में सदा निःस्वार्थ भाव से प्रयत्न रत हैं। जल, वायु, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, विद्युत् तथा अवतारी ईश्वर अंगों की मुक्त आत्माएँ एवं विद्या, बुद्धि, शक्ति, प्रतिभा, करुणा, दया, प्रसन्नता, पवित्रता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ सभी देव शक्तियों में आती हैं। यद्यपि ये दिखाई नहीं देतीं, तो भी इनके अनन्त उपकार हैं। यदि इनका लाभ न मिले, तो मनुष्य के लिए जीवित रह सकना भी सम्भव न हो। इनके प्रति कृतज्ञता की भावना व्यक्त करने के लिए यह देव-तर्पण किया जाता है। यजमान दोनों हाथों की अनामिका अँगुलियों में पवित्री धारण करें।
ॐ आगच्छन्तु महाभागाः, विश्वेदेवा महाबलाः। ये तपर्णेऽत्र विहिताः सावधाना भवन्तु ते॥ 
जल में चावल डालें। कुश-मोटक सीधे ही लें। यज्ञोपवीत सव्य (बायें कन्धे पर) सामान्य स्थिति में रखें। तर्पण के समय अंजलि में जल भरकर सभी अँगुलियों के अग्र भाग के सहारे अपिर्त करें। इसे देवतीर्थ मुद्रा कहते हैं। प्रत्येक देव शक्ति के लिए एक-एक अंजलि जल डालें। पूवार्भिमुख होकर देते चलें।
ॐ ब्रह्मादयो देवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्।
ॐ ब्रह्मा तृप्यताम्। ॐ विष्णुस्तृप्यताम्। ॐ रुद्रस्तृप्यताम्। ॐ प्रजापतिस्तृप्यताम्। ॐ देवास्तृप्यन्ताम्। 
ॐ छन्दांसि तृप्यन्ताम्। ॐ वेदास्तृप्यन्ताम्। ॐ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। ॐ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम्। 
ॐ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम्। ॐ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ संवत्सररू सावयवस्तृप्यताम्। ॐ देव्यस्तृप्यन्ताम्। 
ॐ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्। ॐ देवानुगास्तृप्यन्ताम्। ॐ नागास्तृप्यन्ताम्। ॐ सागरास्तृप्यन्ताम्। 
ॐ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ॐ सरितस्तृप्यन्ताम्। ॐ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्। ॐ यक्षास्तृप्यन्ताम्। 
ॐ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ॐ पिशाचास्तृप्यन्ताम्। ॐ सुपर्णास्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतानि तृप्यन्ताम्। 
ॐ पशवस्तृप्यन्ताम्। ॐ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्। ॐ ओषधयस्तृप्यन्ताम्। ॐ भूतग्रामश्चतुर्विधस्तृप्यताम्। 
ऋषि तर्पण :: दूसरा तर्पण ऋषियों के लिए है। व्यास, वसिष्ठ, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, नारद, चरक, सुश्रुत, पाणिनी, दधीचि आदि ऋषियों के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति ऋषि तर्पण द्वारा की जाती है। ऋषियों को भी देवताओं की तरह देवतीर्थ से एक-एक अंजलि जल दिया जाता है। 
इसी प्रकार निम्नाङ्कित मन्त्रवाक्यों से मरीचि आदि ऋषियों को भी एक-एक अञ्जलि जल दें :-
ॐ मरीच्यादि दशऋषयः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान्जलाञ्जलीन्।
ॐ मरीचिस्तृप्यताम्। ॐ अत्रिस्तृप्यताम्। ॐ अङ्गिरास्तृप्यताम्। ॐ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। 
ॐ पुलहस्तृप्यताम्।  ॐ क्रतुस्तृप्यताम्। ॐ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ॐ प्रचेतास्तृप्यताम्। ॐ भृगुस्तृप्यताम्। ॐ नारदस्तृप्यताम्॥ 
दिव्य मनुष्य तर्पण :: तीसरा तर्पण दिव्य मानवों के लिए है। जो पूर्ण रूप से समस्त जीवन को लोक कल्याण के लिए अपिर्त नहीं कर सकें, पर अपना, अपने परिजनों का भरण-पोषण करते हुए लोक मंगल के लिए अधिकाधिक त्याग-बलिदान करते रहे, वे दिव्य मानव हैं। राजा हरिश्चंद्र, रन्तिदेव, शिवि, जनक, पाण्डव, शिवाजी, महाराणा प्रताप, भामाशाह, तिलक जैसे महापुरुष इसी श्रेणी में आते हैं। दिव्य मनुष्य तर्पण उत्तराभिमुख किया जाता है। जल में जौ डालें। 
इसके बाद जनेऊ को माला की भाँति गले में धारण कर अर्थात्  पूर्वोक्त कुशों को दायें हाथ की कनिष्ठिका के मूल-भाग में उत्तराग्र रखकर स्वयं उत्तराभिमुख हो निम्नाङ्कित मन्त्रों को दो-दो बार पढते हुए दिव्य मनुष्यों के लिये प्रत्येक को दो-दो अञ्जलि यव सहित जल प्राजापत्य तीर्थ कनिष्ठिका के मूला-भाग) से अर्पण करें :-
ॐ सनकादयः दिव्यमानवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान्जलाञ्जलीन्॥ 2 पुनरावृत्ति॥ 
ॐ सनकस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति॥ ॐ सनन्दनस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति॥ 
ॐ सनातनस्तृप्यताम्॥2 पुनरावृत्ति॥ ॐ कपिलस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति
ॐ आसुरिस्तृप्यताम्॥2 पुनरावृत्ति॥ ॐ वोढुस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति ॥ 
ॐ पञ्चशिखस्तृप्यताम्॥ 2 पुनरावृत्ति
दिव्य-पितृ-तर्पण :: चौथा तर्पण दिव्य पितरों के लिए है। जो कोई लोक सेवा एवं तपश्चर्या तो नहीं कर सके, पर अपना चरित्र हर दृष्टि से आदर्श बनाये रहे, उस पर किसी तरह की आँच न आने दी। अनुकरण, परम्परा एवं प्रतिष्ठा की सम्पत्ति पीछे वालों के लिए छोड़ गये। ऐसे लोग भी मानव मात्र के लिए वन्दनीय हैं, उनका तर्पण भी ऋषि एवं दिव्य मानवों की तरह ही श्रद्धा पूवर्क करना चाहिए। इसके लिए दक्षिणाभिमुख हों। 
तत्पश्चात उन कुशों को द्विगुण भुग्न करके उनका मूल और अग्रभाग दक्षिण की ओर किये हुए ही उन्हें अंगूठे और तर्जनी के बीच में रखे और स्वयं दक्षिणाभिमुख हो बायें घुटने को पृथ्वी पर रखकर अपसव्य भाव से जनेऊ को दायें कंधे पर रखकर पूर्वोक्त पात्रस्थ जल में काला तिल मिलाकर पितृ तीर्थ से अंगुठा और तर्जनी के मध्य भाग से दिव्य पितरों के लिये निम्नाङ्कित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए तीन-तीन अञ्जलि जल दें :-
ॐ कव्यवाडादयो दिव्यपितरः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलिन्।
ॐ कव्यवाडनलस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
ॐ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
ॐ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
ॐ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अग्निष्वात्ता: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
ॐ सोमपा: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
ॐ बर्हिषद: पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं गङ्गाजलं वा) तेभ्य: स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
यम तर्पण :: यम नियन्त्रण-कर्त्ता शक्तियों को कहते हैं। जन्म-मरण की व्यवस्था करने वाली शक्ति को यम कहते हैं। मृत्यु को स्मरण रखें, मरने के समय पश्चात्ताप न करना पड़े, इसका ध्यान रखें और उसी प्रकार की अपनी गतिविधियाँ निधार्रित करें, तो समझना चाहिए कि यम को प्रसन्न करने वाला तर्पण किया जा रहा है। राज्य शासन को भी यम कहते हैं। अपने शासन को परिपुष्ट एवं स्वस्थ बनाने के लिए प्रत्येक नागरिक को, जो कत्तर्व्य पालन करता है, उसका स्मरण भी यम तर्पण द्वारा किया जाता है। अपने इन्द्रिय निग्रहकर्त्ता एवं कुमार्ग पर चलने से रोकने वाले विवेक को यम कहते हैं। इसे भी निरंतर पुष्ट करते चलना हर भावनाशील व्यक्ति का कत्तर्व्य है। इन कत्तर्व्यों की स्मृति यम-तर्पण द्वारा की जाती है। इसी  प्रकार निम्नलिखित मन्त्र-वाक्यों को पढते हुए चौदह यमों के लिये भी पितृतीर्थ से ही तीन-तीन अञ्जलि तिल सहित जल दें :-
ॐ यमादिचतुदर्शदेवाः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलिन्।
ॐ यमाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ धर्मराजाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ मृत्यवे नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ अन्तकाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ वैवस्वताय नमः॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ कालाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ सर्वभूतक्षयाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ औदुम्बराय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ दध्नाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ नीलाय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ परमेष्ठिने नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ वृकोदराय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ चित्राय नम:॥ 3 पुनरावृत्ति॥ ॐ चित्रगुप्ताय नम: ॥ 3 पुनरावृत्ति॥ 
तत्पश्चात् निम्न मन्त्रों से यम देवता को नमस्कार करें :-
ॐ यमाय धमर्राजाय, मृत्यवे चान्तकाय च। वैवस्वताय कालाय, सवर्भूतक्षयाय च॥
औदुम्बराय दध्नाय, नीलाय परमेष्ठिने। वृकोदराय चित्राय, चित्रगुप्ताय वै नमः॥
मनुष्य-पितृ-तर्पण :: इसके बाद अपने परिवार से सम्बन्धित दिवंगत नर-नारियों का क्रम आता है। पिता, बाबा, पर बाबा, माता, दादी, पर दादी। नाना, पर नाना, बूढ़े नाना, नानी पर नानी, बूढ़ी नानी। पतनी, पुत्र, पुत्री, चाचा, ताऊ, मामा, भाई, बुआ, मौसी, बहिन, सास, ससुर, गुरु, गुरुपतनी, शिष्य, मित्र आदि।
यह तीन वंशावलियाँ तर्पण के लिए है। पहले स्वगोत्र तर्पण किया जाता है :-
गोत्रोत्पन्नाः अस्मत् पितरः आगच्छन्तु गृह्णन्तु एतान् जलाञ्जलीन्।
अस्मत्पिता (पिता) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3 पुनरावृत्ति
अस्मत्पितामह (दादा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3 पुनरावृत्ति
अस्मत्प्रपितामहः (परदादा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥3 पुनरावृत्ति
अस्मन्माता (माता) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा गायत्रीरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3 पुनरावृत्ति
अस्मत्पितामही (दादी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा सावित्रीरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥3 पुनरावृत्ति
अस्मत्प्रत्पितामही (परदादी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा लक्ष्मीरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति ॥
अस्मत्सापतनमाता (सौतेली माँ) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
मनुष्य पितृ तर्पण इसके पश्चात् निम्नाङ्कित मन्त्र से पितरों का आवाहन करें :- 
ॐ उशन्तस्त्वा निधीमह्युशन्त: समिधीमहि। उशन्नुशत ऽआवह पितृन्हाविषे ऽअत्तवे॥[शु. यजु.16.70] 
‘हे अग्ने ! तुम्हारे यजन की कामना करते हुए हम तुम्हें स्थापित करते हैं। यजन की ही इच्छा रखते हुए तुम्हें प्रज्वलित करते हैं। हविष्य की इच्छा रखते हुए तुम भी तृप्ति की कामनावाले हमारे पितरों को हविष्य भोजन करने के लिये बुलाओ। 
ॐ आयन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निष्वात्ता: पथिभिर्देवयानै:। 
अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिव्रुवन्तु तेऽवन्तस्मान्॥ [शु. यजु.16.58] 
‘हमारे सोमपान करने योग्य अग्निष्वात्त पितृगण देवताओं के साथ गमन करने योग्य मार्गों से यहाँ आवें और इस यज्ञ में स्वाधा से तृप्त होकर हमें मानसिक उपदेश दें तथा वे हमारी रक्षा करें।’ 
तदनन्तर अपने पितृगणों का नाम-गोत्र आदि उच्चारण करते हुए प्रत्येक के लिये पूर्वोक्त विधि से ही तीन-तीन इसके बाद निम्नाङ्कित नौ मन्त्रों को पढते हुए पितृ तीर्थ से जल गिराता रहे :- 
ॐ उदीरतामवर ऽउत्परास ऽउन्मध्यमा: पितर: सोम्यास:। 
असुं य ऽईयुरवृका ऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥  [शु.य.16.46] 
इस लोक में स्थित, परलोक में स्थित और मध्यलोक में स्थित सोमभागी पितृगण क्रम से ऊर्ध्वलोकों को प्राप्त हों । जो वायु रूप को प्राप्त हो चुके हैं, वे शत्रु हीन सत्यवेत्ता पितर आवाहन करने पर यहाँ उपस्थित हो और हम लोगों की रक्षा करें।
ॐ अङ्गिरसो न: पितरो नवग्वा ऽअथर्वाणो भृगव: सोम्यास:। 
तेषां वय, सुमतौ यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे स्याम। [शु.य. 16.70] 
अङ्गिरा के कुल में, अथर्व मुनि के वंश में तथा भृगुकुल में उत्पन्न हुए नवीन गति वाले एवं सोम पान करने योग्य जो हमारे पितर इस समय पितृ लोक को प्राप्त हैं, उन यज्ञ में पूजनीय पितरों की सुन्दर बुद्धि में तथा उनके कल्याण कारी मन में हम स्थित रहें। अर्थात् उनकी मन-बुद्धि में हमारे कल्याण की भावना बनी रहे।
ॐ आयन्तु न: पितर: सोम्यासोऽग्निष्वात्ता:पथिभिर्देवयानै:। 
अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् ॥ [शु.य. 16.58]  
ॐ ऊर्ज्जं वहन्तीरमृतं घृतं पय: कीलालं परिस्त्रुतम्। स्वधास्थ तर्पयत मे पितृन्॥ [शु.य.16.34]
हे जल! तुम स्वादिष्ट अन्न के सारभूत रस, रोग-मृत्यु को दूर करनेवाले घी और सब प्रकार का कष्ट मिटानेवाले दुग्ध का वहन करते हो तथा सब ओर प्रवाहित होते हो, अतएव तुम पितरों के लिये हविः स्वरूप होये इसलिये मेरे पितरों को तृप्त करो। 
ॐ पितृभ्य:स्वधायिभ्य: स्वधा नम: पितामहेभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधा नम: प्रपितामहेभ्य: स्वधायिभ्यं: स्वधा नम:। अक्षन्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृप्यन्त पितर: पितर:शुन्धध्वम्॥ [शु.य.16.36] 
स्वधा (अन्न) के प्रति गमन करने वाले पितरों को स्वधा संज्ञक अन्न प्राप्त हो, उन पितरों को हमारा नमस्कार है। स्वधा के प्रति जाने वाले पिता महों को स्वधा प्राप्त हो, उन्हें हमारा नमस्कार है। स्वधा के प्रति गमन करनेवाले प्रपिता महों को स्वधा प्राप्त हो, उन्हें हमारा नमस्कार है। पितर पूर्ण आहार कर चुके, पितर आनन्दित हुए, पितर तृप्त हुए हे पितरो ! अब आप लोग आचमन आदि करके शुद्ध हों। 
ॐ ये चेह पितरो ये च नेह याँश्च विद्ययाँऽउ च न प्रविद्द्म। 
त्वं वेत्थ यति ते जातवेदरू स्वधाभिर्यज्ञ, सुकृतं जुपस्व॥ [शु.य. 16.67]
जो पितर इस लोक में वर्तमान हैं और जो इस लोक में नही किन्तु पितृ लोक में विद्यमान हैं तथा जिन पितरों को हम जानते हैं और जिनको स्मरण न होने के कारण नही जानते हैं, वे सभी पितर जितने हैं, उन सबको हे जात वेदा-अग्निदेव! तुम जानते हो। पितरों के निमित्त दी जाने वाली स्वधा के द्वारा तुम इस श्रेष्ठ यज्ञ का सेवन करो-इसे सफल बनाओ।
 ॐ मधु व्वाता ऽऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धव:। माध्वीन: सन्त्वोषधी:॥ [शु.य.13.27] 
यज्ञ की इच्छा करनेवाले यजमान के लिये वायु मधु पुष्प रस-मकरन्द की वर्षा करती है। बहने वाली नदियाँ मधु के समान मधुर जल का स्नोत बहाती हैं। समस्त ओषधियाँ हमारे लिये मधु-रस से युक्त हों।
 ॐ मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव, रज:। मधु द्यौरस्तु न पिता॥ [शु.य.13.28] 
हमारे रात-दिन सभी मधुमय हों। पिता के समान पालन करने वाला द्यु लोक हमारे लिये मधु मय-अमृत मय हो। माता के समान पोषण करनेवाली पृथिवी की धूलि हमारे लिये मधु मयी हो।
 ॐ मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँऽअस्तु सूर्यः। माध्वीर्गावो भवन्तु न:॥ [शु.य.13.26]  
ॐ मधु। मधु। मधु। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। तृप्यध्वम्। 
वनस्पति और सूर्य भी हमारे लिये मधुमान् मधुर रस से युक्त हों। हमारी समस्त गौएँ माध्वी-मधु के समान दूध देनेवाली हों।
अब नीचे लिखे मन्त्र का पाठ मात्र करे :- 
ॐ नमो व: पितरो रसाय नमो व: पितर: शोषाय नमो व: पितरो जीवाय नमो वर: पितर: स्वधायै नमो व: पितरो घोराय नमो व: पितरो मन्यवे नमो वर: पितर: पितरो नमो वो गृहान्न:पितरो दत्त सतो व: पितरो देष्मैतद्व: पितरो व्वास ऽआधत्त॥ [शु.य.2.32] 
हे पितृगण। तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली रस स्वरूप वसन्त-ऋतु को नमस्कार है, शोषण करने वाली ग्रीष्म-ऋतु को नमस्कार है, जीवन-स्वरूप वर्षा-ऋतु को नमस्कार है, स्वधा रूप शरद-ऋतु को नमस्कार है, प्राणियों के लिये घोर प्रतीत होनेवाली हेमन्त-ऋतु को नमस्कार है, क्रोध स्वरूप शिशिर-ऋतु को नमस्कार है। अर्थात् तुमसे सम्बन्ध रखनेवाली सभी ऋतुएँ तुम्हारी कृपा से सर्वथा अनुकूल होकर सबको लाभ पहुँचानेवाली हों। हे षडऋतुरूप पितरो! तुम हमें साध्वी पत्नी और सत्पुत्र आदि से युक्त उत्तम गृह प्रदान करो। हे पितृगण! इन प्रस्तुत दातव्य वस्तुओं को हम तुम्हें अर्पण करते हैं, तुम्हारे लिये यह सूत्ररूप वस्त्र है, इसे धारण करो।
द्वितीय गोत्र तर्पण इसके बाद द्वितीय गोत्र मातामह आदि का तर्पण करे, यहाँ भी पहले की ही भाँति निम्नलिखित वाक्यों को तीन-तीन बार पढकर तिल सहित जल की तीन-तीन अञ्जलियाँ पितृ तीर्थ से दे, यथा :- 
अस्मन्मातामह: नाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं गङ्गाजलं वा तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
 अस्मत्प्रमातामह: परनाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो रुद्ररूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
अस्मद्वृद्धप्रमातामह: बूढे परनाना अमुकशर्मा अमुकसगोत्र आदित्यरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
अस्मन्मातामही नानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मत्प्रमातामही परनानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा रुद्ररूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
अस्मद्वृद्धप्रमातामही बूढी परनानी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा आदित्यरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
पत्न्यादितर्पण अस्मत्पत्नी भार्या अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मत्सुतरू बेटा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ ॥
अस्मत्कन्या बेटी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मत्पितृव्य: पिता के भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मन्मातुल: मामा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥अस्मद्भ्राता अपना भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मत्सापत्नभ्राता सौतेला भाई अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
अस्मत्पितृभगिनी बूआ अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मन्मातृभगिनी मौसी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मदात्मभगिनी अपनी बहिन अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मत्सापत्नभगिनी सौतेली बहिन अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥
अस्मच्छवशुर: श्वशुर अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मद्गुरु: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ अस्मदाचार्यपत्नी अमुकी देवी दा अमुकसगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
अस्मच्छिष्य: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥  अस्मत्सखा अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ अस्मदाप्तपुरुष: अमुकशर्मा अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नम:॥3 पुनरावृत्ति॥ 
इसके बाद सव्य होकर पूर्वाभिमुख हो नीचे लिखे श्लोकों को पढते हुए जल गिरावे :-
देवासुरास्तथा यक्षा नागा गन्धर्वराक्षसा:। पिशाचा गुह्यका: सिद्धा: कूष्माण्डास्तरव: खगा:॥ 
जलेचरा भूमिचराः वाय्वाधाराश्च जन्तव:। प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु मद्दत्तेनाम्बुनाखिला:॥ 
नरकेषु समस्तेपु यातनासु च ये स्थिता:। तेषामाप्ययनायैतद्दीयते सलिलं मया॥ 
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङ्क्षिण:॥ 
देवता, असुर , यक्ष, नाग, गन्धर्व, राक्षस, पिशाच, गुह्मक, सिद्ध, कूष्माण्ड, वृक्ष वर्ग, पक्षी, जलचर जीव और वायु के आधार पर रहने वाले जन्तु-ये सभी मेरे दिये हुए जल से भीघ्र तृप्त हों। 
जो समस्त नरकों तथा वहाँ की यातनाओं में पङेपडे दुरूख भोग रहे हैं, उनको पुष्ट तथा शान्त करने की इच्छा से मैं यह जल देता हूँ । जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में बान्धव रहे हों अथवा किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सब तथा इनके अतिरिक्त भी जो  मुझ से जल पाने की इच्छा रखते हों, वे भी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हों।
ॐ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवषिंपितृमानवा:। तृप्यन्तु पितर: सर्वे मातृमातामहादय:॥ 
अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आ ब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम्॥ 
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवा:। ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा॥ 
ब्रह्मा जी  से लेकर कीटों तक जितने जीव हैं, वे तथा देवता, ऋषि, पितर, मनुष्य और माता, नाना आदि पितृगण-ये सभी तृप्त हों मेरे कुल की बीती हुई करोडों पीढियों में उत्पन्न हुए जो-जो पितर ब्रह्म लोक पर्यम्त सात द्वीपों के भीतर कहीं भी निवास करते हों, उनकी तृप्ति के लिये मेरा दिया हुआ यह तिल मिश्रित जल उन्हें प्राप्त हो जो मेरे बान्धव न रहे हों, जो इस जन्म में या किसी दूसरे जन्म में मेरे बान्धव रहे हों, वे सभी मेरे दिये हुए जल से तृप्त हो जायँ। 
निष्पीडन :: तत्पश्चात् वस्त्र को चार आवृत्ति लपेट कर जल में डुबावे और बाहर ले आकर निम्नाङ्कित मन्त्र को पढते हुए अपसव्य-होकर अपने बाएँ भाग में भूमिपर उस वस्त्र को निचोड़े । पवित्रक को तर्पण किये हुए जल मे छोड दे। यदि घर में किसी मृत पुरुष का वार्षिक श्राद्ध आदि कर्म हो तो वस्त्र-निष्पीडन नहीं करना चाहिये। वस्त्र-निष्पीडन का मन्त्र यह है :- 
ये के चास्मत्कुले जाता अपुत्रा गोत्रिणो मृतारू। ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रनिष्पीडनोदकम्॥ 
भीष्म तर्पण :: अन्त में भीष्म तर्पण किया जाता है। दक्षिणाभिमुख हो पितृ तर्पण के समान ही अनेऊ अपसव्य करके हाथ में कुश धारण किये हुए ही बाल ब्रह्मचारी भक्त प्रवर भीष्म के लिये पितृ तीर्थ से तिल मिश्रित जल के द्वारा तर्पण करे। ऐसे परमार्थ परायण महा मानव, जिन्होंने उच्च उद्देश्यों के लिए अपना वंश चलाने का मोह नहीं किया, भीष्म उनके प्रतिनिधि माने गये हैं, ऐसी सभी श्रेष्ठात्माओं को जलदान दें :-
ॐ वैयाघ्रपदगोत्राय, सांकृतिप्रवराय च। गंगापुत्राय भीष्माय, प्रदास्येऽहं तिलोदकम्॥
अपुत्राय ददाम्येतत्, सलिलं भीष्मवमर्णे॥
अर्घ्य दान फिर शुद्ध जल से आचमन करके प्राणायाम करे। तदनन्तर यज्ञोपवीत सव्य कर बाएँ कंधेपर करके एक पात्र में शुद्ध जल भरकर उसके मध्यभाग में अनामिका से षडदल कमल बनावे और उसमें श्वेत चन्दन, अक्षत, पुष्प तथा तुलसीदल छोड दे। फिर दूसरे पात्र में चन्दल से षडदल-कमल बनाकर उसमें पूर्वादि दिशा के क्रम से ब्रह्मादि देवताओं का आवाहन-पूजन करे तथा पहले पात्र के जल से उन पूजित देवताओं के लिये अर्ध्य अर्पण करे। 
अर्ध्यदान के मन्त्र निम्नाङ्कित हैं :-
 ॐ ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमत: सुरुचो व्वेन ऽआव:। 
स बुध्न्या ऽउपमा ऽअस्य व्विष्ठा: सतश्च योनिमसतश्व व्विव:॥ [शु.य. 13.3]
ॐ ब्रह्मणे नम:। ब्रह्माणं पूजयामि॥ 
सर्वप्रथम पूर्व दिशा से प्रकट होनेवाले आदित्यरूप ब्रह्मने भूगोल के मध्यभाग से आरम्भ करके इन समस्त सुन्दर कान्ति वाले लोकों को अपने प्रकाश से व्यक्त किया है तथा वह अत्यन्त कमनीय आदित्य इस जगत् की निवास-स्थान भूत अवकाश युक्त दिशाओं को, विद्यमान-मूर्त्त पदार्थ के स्थानों को और अमूर्त्त वायु आदि के उत्पत्ति स्थानों को भी प्रकाशित करता है।
 ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा निदधे पदम्। समूढमस्यपा, सुरे स्वाहा॥ ॐ विष्णवे नम:। विष्णुं पूजयामि॥ 
सर्वव्यापी त्रिविक्रम वामन अवतार धारी भगवान् श्री हरी विष्णु ने इस चराचर जगत् को विभक्त करके अपने चरणों से आक्रान्त  किया है । उन्होंने पृथ्वी, आकाश और द्युलोक-इनतीनों तीनो स्थानों में अपना चरण स्थापित किये हैं अथवा उक्त तीनों स्थानों में वे क्रमश: अग्नि, वायु तथा सूर्य रूप से स्थित हैं। इन विष्णु भगवान् के चरण में समस्त विश्व अन्तर्भूत है। इम इनके निमित्त स्वाहा हविष्य दान करते हैं। 
ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नम:। वाहुब्यामुत ते नम:॥ ॐ रुद्राय नम:। रुद्रं पूजयामि॥ 
हे रुद्र! आप के क्रोध और वाण को नमस्कार है तथा आपकी दोनों भुजाओं को नमस्कार हैं।
ॐ तत्सवितुर्व रेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्॥ ॐ सवित्रे नम:। सवितारं पूजयामि॥ 
हस स्थावर-जङ्गमरूप सम्पूर्ण विश्व को उत्पन्न करनेवाले उन निरति शय प्रकाश मय सूर्य स्वरूप परमेश्वर के भजने योग्य तेज का ध्यान करते हैं, जो कि हमारी बुद्धियों को सत्कर्मों की ओर प्रेरित करते रहते हैं।
 ॐ मित्रस्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि। द्युम्नं चित्रश्रवस्तमम्॥ ॐ मित्राय नम:। मित्रं पूजयामि॥ 
मनुष्यों का पोषण करनेवाले दीप्तिमान् मित्र देवता का यह रक्षण कार्य सनातन, यश रूप से प्रसिद्ध, विचित्र तथा श्रवण करने के योग्य है।
 ॐ इमं मे व्वरूण श्रुधी हवमद्या च मृडय।   त्वामवस्युराचके॥ ॐ वरुणाय नम:। वरूणं पूजयामि॥ 
हे संसार-सागर के अधिपति वरुणदेव! अपनी रक्षा के लिये मैं आपको बुलाना चाहता हूँ, आप मेरे इस आवाहन को सुनिये और यहाँ शीघ्र पधारकर आज हमें सब प्रकार से सुखी कीजिये।
फिर भगवान सूर्य को अर्ध्य दें :-
 एहि सूर्य सहस्त्राशों तेजो राशिं जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणाघ्र्य दिवाकरः। 
हाथों को उपर कर उपस्थाप मंत्र पढ़ें :-
चित्रं देवाना मुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरूणस्याग्नेः। 
आप्राद्यावा पृथ्वी अन्तरिक्ष सूर्यआत्माजगतस्तस्थुशश्च। 
फिर परिक्रमा करते हुए दशों दिशाओं को नमस्कार करें। 
ॐ प्राच्यै इन्द्राय नमः। ॐ आग्नयै अग्नयै नमः। ॐ दक्षिणायै यमाय नमः। ॐ नैऋत्यै नैऋतये नमः। 
ॐ पश्चिमायै वरूणाय नमः। ॐ वाव्ययै वायवे नमः। 
ॐ उदीच्यै कुवेराय नमः। ॐ ईशान्यै ईशानाय नमः। 
ॐ ऊध्र्वायै ब्रह्मणै नमः। ॐ अवाच्यै अनन्ताय नमः। 
सव्य होकर पुनः देवतीर्थ से तर्पण करें :-
ॐ ब्रह्मणै नमः। ॐ अग्नयै नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ औषधिभ्यो नमः। ॐ वाचे नमः। 
ॐ वाचस्पतये नमः। ॐ महद्भ्यो नमः। ॐ विष्णवे नमः। ॐ अद्भ्यो  नमः। ॐ अपां  पतये नमः। 
ॐ वरूणाय नमः। 
फिर तर्पण के जल को मुख पर लगायें और तीन बार ॐ अच्युताय नमः मंत्र का जप करें।
इतर तर्पण :: जिनको आवश्यक है, केवल उन्हीं के लिए तर्पण कराया जाए :-
अस्मत्पतनी अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मत्सुतः (बेटा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। 
इदं अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मत्कन्याः (बेटी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मत्पितृव्यः (चाचा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मन्मातुलः (मामा) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मद्भ्राता (अपना भाई) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मत्सापतनभ्राता (सौतेला भाई) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वुसरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मत्पितृभगिनी (बुआ) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मान्मातृभगिनी (मौसी) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मदात्मभगिनी (अपनी बहिन) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मत्सापतनभगिनी (सौतेली बहिन) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मद श्वशुरः (श्वसुर) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मद श्वशुरपतनी (सास) अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मद्गुरु अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मद् आचायर्पतनी अमुकी देवी दा अमुक सगोत्रा वसुरूपा तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्यै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मत् शिष्यः अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मत्सखा अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मद् आप्तपुरुषः (सम्मानीय पुरुष) अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
अस्मद् पतिः अमुकशमार् अमुकसगोत्रो वसुरूपस्तृप्यताम्। 
इदं सतिलं जलं तस्मै स्वधा नमः॥ 3 पुनरावृत्ति
निम्न मन्त्र से पूर्व विधि से प्राणि मात्र की तुष्टि के लिए जल धार छोड़ें :-
ॐ देवासुरास्तथा यक्षा, नागा गन्धवर्राक्षसाः। पिशाचा गुह्यकाः सिद्धाः, कूष्माण्डास्तरवः खगाः॥
जलेचरा भूनिलया, वाय्वाधाराश्च जन्तवः। प्रीतिमेते प्रयान्त्वाशु, मद्दत्तेनाम्बुनाखिलाः॥
नरकेषु समस्तेषु, यातनासुु च ये स्थिताः। तेषामाप्यायनायैतद्, दीयते सलिलं मया॥
ये बान्धवाऽबान्धवा वा, येऽ न्यजन्मनि बान्धवाः। ते सवेर् तृप्तिमायान्तु, ये चास्मत्तोयकांक्षिणः॥
आब्रह्मस्तम्बपयर्न्तं, देवषिर्पितृमानवाः। तृप्यन्तु पितरः सवेर्, मातृमातामहादयः॥
अतीतकुलकोटीनां, सप्तद्वीपनिवासिनाम्। आब्रह्मभुवनाल्लोकाद्, इदमस्तु तिलोदकम्
 ये बान्धवाऽबान्धवा वा, येऽ न्यजन्मनि बान्धवाः। ते सवेर् तृप्तिमायान्तु, मया दत्तेन वारिणा॥
श्राद्ध-पितृ तर्पण ::
(1). पितृ पक्ष का (महालय पक्ष) का महत्त्व :: वृश्चिक राशिमें प्रवेश करनेसे पूर्व, जब सूर्य कन्या एवं तुला राशि में होता है, वह काल महालय कहलाता है।
इस कालावधि में पितर यम लोक से आकर अपने परिवार के सदस्यों के घर में वास करते हैं। इसीलिए शक संवत अनुसार भाद्र पद कृष्ण प्रतिपदासे भाद्रपद अमावास्या तक के एवं विक्रम संवत अनुसार आश्विन कृष्ण प्रतिपदा से आश्विन अमावस्या तक के पंद्रह दिनकी कालावधि में पितृ तर्पण एवं तिथि के दिन पितरोंका श्राद्ध अवश्य करना चाहिए ।
ऐसा करनेसे पितृव्रत यथा सांग पूरा होता है। इसीलिए यह पक्ष पितरोंको प्रिय है। इस पक्षमें पितरोंका श्राद्ध करनेसे वे वर्ष भर तृप्त रहते हैं। जो लोग पितृ पक्ष में कुछ कारण वश महालय श्राद्ध नहीं कर पाते, उन्हें पितृ पक्ष के उपरांत सूर्य के वृश्चिक राशिमें प्रवेश करने से पहले तो महालय श्राद्ध करना ही चाहिए।
श्राद्धं कन्यागते भानौ यो न कुर्याद् गृहाश्रमी। धनं पुत्राः कुततस्य पितृकोपाग्निपीडनात्॥ 
यावच्च कन्यातुलयोः क्रमादास्ते दिवाकरः। शून्यं प्रेतपुरं तावद् यावद् वृश्चिकदर्शनम्॥ [महाभारत]
कन्या राशि में सूर्य के रहते, जो गृहस्थाश्रमी श्राद्ध नहीं करता, उसे पितरों की कोपाग्नि के कारण धन, पुत्र इत्यादि की प्राप्ति कैसे होगी? उसी प्रकार सूर्य जब तक कन्या एवं तुला राशियों से वृश्चिक राशि में प्रवेश नहीं करता, तब तक पितृ लोक रिक्त रहता है।
पितृ लोक के रिक्त रहने का अर्थ है, उस काल में कुल के सर्व पितर आशीर्वाद देनेके लिए अपने वंशजों के समीप आते हैं। वंशजों द्वारा श्राद्ध न किए जानेपर शाप देकर चले जाते हैं। अतः इस कालमें श्राद्ध करना महत्त्वपूर्ण है। 
(2). पितृ पक्ष अर्थात महालय में श्राद्ध के लिए आने वाले पितर गण :: (2-1). पितृ त्रय - पिता, दादा, पर दादा, (2-2). मातृ त्रय - माता, दादी, पर  दादी,  (2-3). सापत्न माता - सौतेली मां, (2-4). माता मह त्रय :- मां के पिता, नाना एवं परनाना,  (2-5). माता मही त्रय - मां की माताजी, नानी एवं पर नानी, (2-6). भार्या, पुत्र, पुत्रियां, चाचा, मामा, भाई, बुआ, मौसियां बहनें, ससुर, अन्य आप्तजन, (2-7). श्राद्ध कर्ता किसी के शिष्य हों, तो गुरु और (2-8). श्राद्धकर्ता किसी के गुरु हों, तो शिष्य। 
यह स्पष्ट है कि मनुष्य मृत्यु के पश्चात पुनर्जन्म लेकर पुनः-पुनः उसी परिवार में तब तक आता है जब तक कि उसके उस परिवार सम्बन्धी संस्कार उपस्थित हैं। मृत्यु के उपरांत भी जीव के सुख एवं उन्नति से संबंधित इतना गहन अभ्यास केवल हिंंदू धर्म ने ही किया है। 
(3). भरणी श्राद्ध :- गया जाकर श्राद्ध करनेपर जो फल मिलता है, वही फल पितृ पक्ष के भरणी नक्षत्र पर करने से मिलता है। शास्त्रानुसार भरणी श्राद्ध वर्ष श्राद्ध के पश्चात् करना चाहिए । वर्ष श्राद्ध से पूर्व सपिंडीकरण (-सपिंडी) श्राद्ध किया जाता है । तत्पश्चात् भरणी श्राद्ध करने से मृतात्मा को प्रेत योनि से छुडाने में सहायता मिलती है। यह श्राद्ध प्रत्येक पितृ पक्ष में करना चाहिए।पूर्वजों का बहुत-प्रेत-पिशाच योनि में होना अहितकर है। 
कालानुरूप प्रचलित पद्धतिनुसार व्यक्ति की मृत्यु होनेके पश्चात् 12 वें दिन ही सपिंडीकरण श्राद्ध किया जाता है। इसलिए, कुछ शास्त्रज्ञों के मतानुसार व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात् उस वर्ष पडने वाले पितृ पक्ष में ही भरणी श्राद्ध कर सकते हैं ।
(4). सर्व पित्री अमावस्या :- यह पितृ पक्ष की अमावस्या का  नाम है। इस तिथि पर कुल के सर्व पितरों को उद्देशित कर श्राद्ध करते हैं। वर्ष भर में सदैव एवं पितृ पक्ष की अन्य तिथियों पर श्राद्ध करना संभव न हो, तब भी इस तिथि पर सबके लिए श्राद्ध करना अत्यंत आवश्यक है; क्योंकि पितृ पक्ष की यह अंतिम तिथि है।
शास्त्र में बताया गया है कि, श्राद्ध के लिए अमावस्या की तिथि अधिक उचित है, जबकि पितृ पक्ष की अमावस्या सर्वाधिक उचित तिथि है।
इस दिन प्रायः सभी घरों में कम से कम एक ब्राह्मण को तो भोजन का निमंत्रण दिया ही जाता है। उस दिन मछुआरे, ठाकुर, बुनकर, कुनबी इत्यादि जातियों में पितरोंके नामसे भात का अथवा आटे का पिंड दान दिया जाता है और अपनी ही जाति के कुछ लोगों को भोजन कराया जाता है । इन में इस दिन ब्राह्मणों को सीधा (-अन्न सामग्री) देने की भी परंपरा प्रचलित है।
(5). पितृ पक्ष में भगवान् दत्तात्रेय का नाम जपने का महत्त्व :- पितृ पक्ष में श्री गुरु देव दत्त का नाम जप अधिकाधिक करने से पितरों को गति प्राप्त होने में सहायता मिलती है।
(6). परिवार में किसी की मृत्यु होने पर उस वर्ष महालय श्राद्ध न करना :- परिवारमें जिस व्यक्तिके पिता अथवा माता  की मृत्यु हो गई हो, उस श्राद्धकर्ता को उनके लिए उनके देहांत के दिन से आगे एक वर्ष तक महालय श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती; क्योंकि, उनके लिए वर्ष भरमें श्राद्धकर्म किया ही जाता है।
श्राद्ध कर्ता पुत्र के अतिरिक्त अन्यों को, उदा. श्राद्ध कर्ता के चचेरे भाई एवं जिन्हें सूतक लगता है, ऐसे लोगोंको अपने पिता इत्यादि के लिए प्रति वर्ष की भांति महालय श्राद्ध करना चाहिए। किंतु, सूतक के दिनों में महालय पक्ष पडने पर श्राद्ध न करें। सूतक समाप्त होनेपर आने वाली अमावस्या पर श्राद्ध अवश्य करें।
(7). महालय श्राद्ध के लिए आमंत्रित ब्राह्मण :- महालय श्राद्ध के समय प्रत्येक पितर के लिए एक ब्राह्मण होना चाहिए। ब्राह्मण को पितृ स्थान पर बिठाकर देवस्थान पर शालिग्राम अथवा बाल कृष्ण की मूर्ति-प्रतिमा-तस्वीर रखें। देवस्थान पर बाल कृष्ण एवं पितृ स्थान पर दर्भ रखें अथवा दोनों ही स्थानों पर दर्भ रखें । इसे चट अथवा दर्भबटु (-कुश से बनी कूंची) कहते हैं । चट रखकर किए गए श्राद्ध को चट श्राद्ध कहते हैं । इस श्राद्धमें दक्षिणा भी देते हैं।
श्राद्ध से पितरों की पूर्ती ::
नारद जी कहते हैं :– अर्जुन ! इसके बाद राजा करन्धम ने महाकाल से पूछा – भगवन ! मेरे मन में सदा ये संशय रहता है की मनुष्यों द्वारा पितरों का जो तर्पण किया जाता है, उसमें जल तो जल में ही चला जाता है; फिर हमारे पूर्वज उस से तृप्त कैसे होते हैं ? इसी प्रकार पिंड आदि का सब दान भी यहीं देखा जाता है। अतः हम यह कैसे कह सकते हैं कि यह पितर आदि के उपभोग में आता है ?”
महाकाल ने कहा :– राजन ! पितरों और देवताओं की योनि ही ऐसी होती है कि वे दूर की कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा भी ग्रहण कर लेते हैं और दूर की स्तुति से भी संतुष्ट होते हैं। इसके सिवा ये भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते और सर्वत्र पहुचते हैं। पांच तन्मात्राएँ, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति, इन नौ तत्वों का बना हुआ उनका शरीर होता है। इसके भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं। इसलिए देवता और पितर गंध तथा रस तत्व से तृप्त होते हैं।  शब्द तत्व से रहते हैं तथा स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं और किसी को पवित्र देख कर उनके मन में बड़ा संतोष होता है। जैसे पशुओं का भोजन तृण और मनुष्यों का भोजन अन्न कहलाता है, वैसे ही देवयोनियों का भोजन अन्न का सार तत्व है। सम्पूर्ण देवताओं की शक्तियाँ अचिन्त्य एवं ज्ञानगम्य हैं। अतः वे अन्न और जल का सार तत्व ही ग्रहण करते हैं, शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं स्थित देखी जाती है। 
करन्धम ने पूछा :– श्राद्ध का अन्न तो पितरों को दिया जाता है, परन्तु वे अपने कर्म के अधीन होते हैं।  यदि वे स्वर्ग अथवा नर्क में हों, तो श्राद्ध का उपभोग कैसे कर सकते हैं ? और वैसी दशा में वरदान देने में भी कैसे समर्थ हो सकते हैं ?
महाकाल ने कहा :– नृपश्रेष्ठ ! यह सत्य है कि पितर अपने अपने कर्मों के अधीन होते हैं, परन्तु देवता, असुर और यक्ष आदि के तीन अमूर्त तथा चार वर्णों के चार मूर्त; ये सात प्रकार के पितर माने गए हैं। ये नित्य पितर हैं, ये कर्मों के अधीन नहीं, ये सबको सब कुछ देने में समर्थ हैं। वे सातों पितर भी सब वरदान आदि देते हैं। उनके अधीन अत्यंत प्रबल इकतीस गण होते हैं। राजन ! इस लोक में किया हुआ श्राद्ध उन्ही मानव पितरों को तृप्त करता है। वे तृप्त होकर श्राद्धकर्ता के पूर्वजों को जहाँ कहीं भी उनकी स्थिति हो, जाकर तृप्त करते हैं। इस प्रकार अपने पितरों के पास श्राद्ध में दी हुई वस्तु पहुँचती है और वे श्राद्ध ग्रहण करने वाले नित्य पितर ही श्राद्ध कर्ताओं को श्रेष्ठ वरदान देते हैं। 
राजा ने पूछा :– विप्रवर ! जैसे भूत आदि को उन्हीं के नाम से ‘इदं भूतादिभ्यः” कह कर कोई वस्तु दी जाती है, उसी प्रकार देवता आदि को संक्षेप में क्यों नहीं दिया जाता है ? मंत्र आदि के प्रयोग द्वारा विस्तार क्यों किया जाता है ?
महाकाल ने कहा :– राजन ! सदा सबके लिए उचित प्रतिष्ठा करनी चाहिए। उचित प्रतिष्ठा के बिना दी हुई कोई वस्तु देवता आदि ग्रहण नहीं करते। घर के दरवाजे पर बैठा हुआ कुत्ता, जिस प्रकार ग्रास (फेंका हुआ टुकड़ा) ग्रहण करता है, क्या कोई श्रेष्ठ पुरुष भी उसी प्रकार ग्रहण करता है ? इसी प्रकार भूत आदि की भाँती देवता कभी अपना भाग ग्रहण नहीं करते। वे पवित्र भोगों का सेवन करने वाले तथा निर्मल हैं। अतः अश्रद्धालु पुरुष के द्वारा बिना मन्त्र के दिया हुआ जो कोई भी हव्य भाग होता है, उसे वे स्वीकार नहीं करते। यहाँ मन्त्रों के विषय में श्रुति भी इस प्रकार कहती है :–
"सब मन्त्र ही देवता हैं, विद्वान पुरुष जो जो कार्य मन्त्र के साथ करता है, उसे वह देवताओं के द्वारा ही संपन्न करता है। मंत्रोच्चारणपूर्वक जो कुछ देता है, वह देवताओं द्वारा ही देता है। मन्त्रपूर्वक जो कुछ ग्रहण करता है, वह देवताओं द्वारा ही ग्रहण करता है। इसलिए मंत्रोच्चारण किये बिना मिला हुआ प्रतिग्रह न स्वीकार करे। बिना मन्त्र के जो कुछ किया जाता है, वह प्रतिष्ठित नहीं होता।" 
इस कारण पौराणिक और वैदिक मन्त्रों द्वारा ही सदा दान करना चाहिए।  
राजा ने पूछा :– कुश, तिल, अक्षत और जल, इन सब को हाथ में लेकर क्यों दान दिया जाता है ? मैं इस कारण को जानना चाहता हूँ।  
महाकाल ने कहा  :– राजन ! प्राचीन काल में मनुष्यों ने बहुत से दान किये और उन सबको असुरों ने बलपूर्वक भीतर प्रवेश करके ग्रहण कर लिया। तब देवताओं और पितरों ने ब्रह्मा जी से कहा :– "स्वामिन ! हमारे देखते देखते दैत्यलोग सब दान ग्रहण कर लेते हैं। अतः आप उनसे हमारी रक्षा करें, नहीं तो हम नष्ट हो जायेंगे।” तब ब्रह्मा जी ने सोच विचार कर दान की रक्षा के लिए एक उपाय निकला। पितरों को तिल के रूप में दान दिया जाए, देवताओं को अक्षत के साथ दिया जाए तथा जल और कुश का सम्बन्ध सर्वत्र रहे। ऐसा करने पर दैत्य उस दान को ग्रहण नहीं कर सकते। इन सबके बिना जो दान किया जाता है, उस पर दैत्य लोग बलपूर्वक अधिकार कर लेते हैं और देवता तथा पितर दुखपूर्वक उच्ह्वास लेते हुए लौट जाते हैं। वैसे दान से दाता को कोई फल नहीं मिलता। इसलिए सभी युगों में इसी प्रकार (तिल, अक्षत, कुश और जल के साथ) दान दिया जाता है। 

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