Wednesday, September 16, 2015

SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (18.6) श्रीमद् भगवद्गीता षष्ठोSध्याय:

SHRIMAD BHAGWAD GEETA (6) श्रीमद् "अथ भगवद्गीता षष्ठोSध्याय‎"
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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कर्म योग और ज्ञान योग दोनों ही कल्याणकारी हैं, परन्तु कर्म योग इन दोनों में श्रेष्ठ है। 
श्रीभगवानुवाच :-
अनाश्रितः कर्मफलं; कार्यं कर्म करोति यः। स संन्यासी च योगी च; न निरग्निर्न चाक्रियः॥6.1॥ 
श्री भगवान् कहते हैं :- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर, करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी और योगी है न कि केवल अग्नि या क्रियाओं का त्याग करने वाला।
Bhagwan Shri Krashn said: One who, performs his duty without the desire-motive of rewards (recognition, honours, appreciation) i.e., the fruits of actions (deeds, performance), is a sage-recluse and a Yogi and not the one who has deserted fire and actions.
जब तक मनुष्य की साँस चल रहे है, तब तक कर्म हो रहा है। उसे अपने लिए नियत वर्णाश्रम धर्म-कर्तव्य का पालन करते रहना चाहिए। कर्तव्य कर्म करते हुए वह सुनिशिचित करे कि कर्मों में कोई राग-द्वेष नहीं है, वे विशुद्ध सेवा भावना से किये जाने चाहिए। किसी भी कर्म को करते समय व्यक्ति यह सुनिश्चित करे कि उसे फलेच्छा कतई नहीं है। राग और कर्म फल की इच्छा उसे अशांत करते हैं, जबकि कर्म फल का त्याग उसे नैष्ठिकी शांति प्रदान करता है। स्थूल शरीर से परसेवा, सूक्ष्म शरीर से दूसरों का हित चिंतन और कारण शरीर से प्राप्य समाधि का फल भी जन सेवा में ही लगा दे। शरीर के ये तीनों रूप संसार से अभिन्न मगर स्वरूप से भिन्न हैं। शरीर एक साधन और उसके द्वारा की गई परमार्थ क्रियाएँ साधक को त्यागी बनाती हैं। त्यागी में आसक्ति नहीं है। वह बंधन मुक्त है। उसमें ममता का अभाव हो गया है। 
कर्तव्य कर्म को बेझिझक, संयम पूर्वक, ध्यान और लग्न से करना चाहिए। कर्तव्य कर्म का त्याग किसी भी परिस्थित में नहीं करना चाहिए। जो हमारी सामर्थ-सामर्थ्य में है, शास्त्र और लोक मर्यादा के दायरे में है, उसे अवश्य प्राणपन से निष्काम भाव से परमार्थ में करे। 
इस प्रकार कर्म करने वाला सन्यासी और योगी भी है। वह निर्लिप्त है, सुख-दुःख का अनुभव नहीं करता। वह योगी है, क्योंकि सिद्धि-असिद्धि में सम रहता है। उसके कर्तृत्व-कर्तापन का अहंकार और भोक्तृत्व-कर्मफल की इच्छा का अंत हो चुका है। 
अग्नि रहित होना, यज्ञ (हवन, अग्निहोत्र, भोजन पकाना) आदि क्रियाएँ त्यागना है। उसके अन्तर्मन में पदार्थों का राग (लगाव, अपनापन) न होने से वह सन्यासी है। वह योगी है, क्योंकि उसने उत्पत्ति, विनाशशील वस्तुओं, कर्मफल का आश्रय नहीं ले रक्खा। किसी स्थान पर एकान्त में निष्क्रिय होकर समाधि लगाकर बैठने से, कोई योगी नहीं बन जाता। जब मनुष्य में कर्मों का वेग, निष्काम भाव से, समता प्राप्त करके लोकहित, लोकार्थ, लोक हितार्थ करके कम हो जाये, तब वह एकांत में जप-तप, परमात्मा का ध्यान करे।  
By the time one is respiring-alive, he is performing. He should do all his duties assigned to him by the scriptures, as per his caste and age (Varnashram Dharm). He should perform without hesitation, attachment or enmity with the desire to serve. Service rendered by him should not be motivated by the desire of return (reward, out put, gain). Desire for gains-returns, irritate-disturb him. Rejection of the reward for the benefits-welfare of the society fills him with satisfaction-pleasure. Serving the needy (poor, depressed through physical means-bodily), utilisation of thinking-mental faculties by planning to serve the masses and offering achievements of inner self for the enlightenment-progress of the humanity should be his main motive. These faculties of the body are associated with the body (nature, world), but the soul in this body-the driving force, is associated with the Almighty. The is a means and utilisation of it for humanity, which makes him relinquished-detached. He is free from attachments, bonds, affections.
One should perform carry out his jobs with devotion, concentration, honestly, faithfully, without hesitation in accordance with the Varnashram Dharm-duties assigned to him through lineage. One must not run away from his responsibilities, duties, assignments. Any thing within capability, capacity, limits, in accordance with the social strata, deserve to be carried out. One should never escape responsibility. What ever he does, should be free from the desire (motive of rewards, results, profits).
One who is performing-not escaping his duties, is a recluse-sage and a Yogi. He is unconcerned, detached, relinquished and does not feel gratified or disturbed by pleasure or pains. He is equanimous in achievements and failures. He is free from the ego of being the doer (performer, achiever). He has no desires to be egoists, suffering from the falsehood of having done some thing or to be the user-consumer having finished-conquered all desires.
One becomes neutral to the utilisation of fire in the form of Yagy (Hawan, Agnihotr, sacrificial fires) and cooking food etc. He is a recluse (Sanyasi, wanderer, sage, ascetic), since inner self has no attachment for material objects (world, survival). He is a Yogi, since he is not dependent over the evolution, perishable goods, commodities and the reward of some kind of achievement. One do not turn into a Yogi just by performing Yogasan and free from actions. He should move to Samadhi-Staunch meditation only when, he has done the duties assigned to him for the welfare of humanity having attained equanimity at some lonely-deserted peaceful safe place. He should perform Jap-recitation of God's names-prayers devoted to him, Tap-ascetic practices and meditation.
यं संन्यासमिति प्राहु-र्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन॥6.2॥ 
हे अर्जुन! जिसको लोग-समाज संन्यास कहता है, उसी को तुम योग समझो, क्योंकि संकल्पों का त्याग किये बिना कोई भी मनुष्य योगी नहीं हो सकता। 
O Pandav! What the people-society calls enunciation-relinquishment-resignation-asceticism-abandonment, one should consider-recognize that as Yog, since none can become a Yogi without rejecting-renouncing the desires.   
सन्यास और कर्मयोग दोनों ही मनुष्य का कल्याण करने वाले हैं। जब नियत कर्तव्य कर्म को फलेच्छा और आसक्ति का त्याग करके परमार्थ में किया जाता है तो वह सात्विक त्याग, पदार्थ और क्रियाओं से सम्बन्ध विच्छेद करने वाला योग है। सन्यासी राग-द्वेष और कर्तव्याभिमान का त्यागी है। अतः सन्यासी और कर्मयोगी दोनों ही त्यागी हैं। मनुष्य के मन तरह तरह के विचार-बातें-यादें बैठी रहती हैं। इनमें जिसके साथ भी प्रियता-अप्रियता-संकल्प उत्पन्न हो गया वही उसे भोगी बना देता है। इनका त्याग किये बिना परमात्मा से संयोग नहीं हो सकता। पदार्थ में सुख-महत्व-सुन्दरता का भाव असत् भोग की ओर ले जाता है। अतः इनका त्याग योगी होने के लिए आवश्यक है। संकल्प का त्याग किये बिना कर्म योगी, ज्ञान योगी, भक्ति योगी, हठ योगी, लय योगी नहीं हुआ जा सकता। 
Sanyas (relinquishment, resignation, asceticism, abandonment, renunciation) and Karm Yog both are beneficial to the humans. When a practitioner perform the prescribed and essential-mandatory Varnashram Dharm-duties, without the desire for reward, towards the service of the mankind, it is Satvik (pure, virtuous, righteous) rejection, leading to Yog-assimilation in the Almighty. The relinquished has abandoned-rejected the attachments, enmity and the ego of being the performer and has become a Yogi. Both the relinquished and the Karm Yogi are detached, having rejected all allurements. The human has various incentives, ideas, thoughts, memories occupying his mind. His interaction with any of them, lure-turn him into a consumer (Bhogi ). Without coming out of the shadow of these, he can not unite with the Almighty. Attraction towards the material objects, comforts, pleasures trails-moves him to contempt (virtual, falsehood, illusion). Hence rejection-desertion of these is essential. Unless-until, one reject the purpose-motive, he can not become a Karm Yogi, Gyan yogi, Bhakti Yogi, Hath yogi or Lay Yogi.
आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥6.3॥ 
योग में स्थित होने की इच्छा वाले मुनि-मनन शील योगी, के लिए योग की प्राप्ति में कर्तव्य कर्म करना ही कारण कहा जाता है और योग में स्थित हो जाने पर उन संकल्पों का शांत हो जाना ही उसके कल्याण में कारण कहा जाता है। 
जो मनन शील, चिन्तन शील, विचार शील व्यक्ति योगारूढ़ होना चाहता है, उसके  निष्काम भाव से कर्तव्य-कर्म करना आवश्यक है। जब भाव ही नहीं है तो अभाव कैसा और कहाँ ? प्राकृत शरीर, मन, बुद्धि, अहम् आदि को संसार की सेवा में अर्पित कर देना क्रियाओं के प्रवाह को संसार की ओर मोड़ देगा और वो स्वयं योग की प्राप्ति कर लेगा। परमार्थ में किये गए कर्म बन्धनकारी नहीं हैं, क्योकि यहाँ राग-द्वेष, मोह-ममता, कामना नहीं हैं। असत् के साथ सम्बन्ध भी खत्म हो गया है। उसमें जड़ता तो है ही नहीं। उसे शान्ति ही शान्ति है। परन्तु उस शांति में सुख, आनन्द, मज़ा लेना भी तो बन्धनकारी ही है। इस स्थिति में साधक की रूचि फल प्राप्ति में न होने से उसे प्राप्ति और अप्राप्ति में समता प्राप्त हो गई। अतः वो इस शान्ति का भी त्याग करके स्वयं को परमात्म तत्व की प्राप्ति में संलग्न के लेता है। शान्ति में रमण से  तत्व ज्ञान और तत्व ज्ञान में संतुष्टि से परम प्रेम मिलता है। Please refer to :: THE GIST OF ENLIGHTENMENT तत्व ज्ञान santoshhindukosh.blogspot.com
For a monk, who wishes to attain Yog, performance of duties-action is said to be the reason and once he is stabilised in Yog, renunciation-rejection of desires is said to be the reason-motive.
One who is thoughtful and want to become stabilised in the Yog, perform his duties with dedication without attachment, desire for rewards-outcome. Once the motive for gain is lost, he is full of contentment-satisfaction. He has presented his body, mind, intelligence and ego for the service of mankind. This provides him equanimity between non attainment and attainment. Putting oneself to the service of the mankind does not create bonds (ties, attachment) with the world, since enmity, attachments, desires, allurements, illusion, bonds-ties are lost completely. At this juncture, he devote himself to the gist of the Almighty. Contentment divert-leads him to the gist, nectar, elixir of the truth, Ultimate, which fills him with Bliss-Parmanand.
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥6.4॥ 
जिस समय वह त्यागी पुरुष  न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सभी संकल्पों का वह त्यागी योगारूढ़ होता है। 
When the relinquished is not indulged (involved, attached) to sensualities (sexuality, passions, consumption, resolutions) or the deeds-ambitions, he is said to have attained-established him self in Yog-assimilation in the Almighty.
मनुष्य यह विचार करके कि जो कुछ भी उत्पन्न हुआ है, वह नष्ट प्रायः है, निर्लिप्त हो जाये। जो कुछ भी प्रारब्ध वश  मिला है, उसमें वो भोग बुद्धि न रखकर परमार्थ हेतु प्राप्त साधन समझे। कभी भी सुख भोग की कामना न करे और देव वश प्राप्त वस्तुओं से सुख प्राप्त होने पर उनके अधीन न हो। यदि उसके अपने निर्वाह से अधिक सामग्री है तो वह उसे अभाव ग्रस्त को अर्पित कर दे। मनुष्य को कभी भी इन्द्रियों और कर्म के प्रति आसक्ति नहीं होने चाहिए। कर्मों के फल के प्रति उसे उदासीन हो जाना चाहिए। मनुष्य स्वयं परमात्मा का अंश होने से नित्य अपरिवर्तनशील है। परन्तु पदार्थ और क्रियाएँ प्रकृति का अंश होने से निरन्तर परिवर्तनशील-नश्वर हैं। मनुष्य संकल्प और विकल्प की तलाश न करे। संकल्प का त्याग करने वाला; योगी तो स्वतः ही हो जाता है। संकल्प से मुक्ति पाने के लिए मनुष्य यह विचार कर ले कि मेरा जन्म अपने उद्धार के लिए हुआ है। कर्म योग का साधक आसक्ति रहित होकर कर्तव्य को पूरा करते रहे। ज्ञान योग के साधक को इस निश्चय पर दृढ़ रहना चाहिए कि सत्ता परमात्म तत्व की है, संकल्पों की नहीं। अतः उनके प्रति राग-द्वेष ने रखकर उदासीन रहे। भक्ति योग का साधक यह विचार करे कि जो भी कोई संकल्प मस्तिष्क में आता है, वो या तो भूतकाल से सम्बंधित है अथवा भविष्यकाल से। अथवा उस पर विचार करना उचित नहीं है। अतः वो अपना मन परमात्मा की भक्ति में ही लगाये। सिद्धि-असिद्धि में सम और संकल्पों में उदासीन, निर्लिप्त, त्यागी योगारूढ़ रहे। 
The humans should remember that what ever has evolved, will perish and should become detached-neutral. Whatever has come to him by way of destiny, should be utilised for the sake, welfare, benefit of the mankind without being involved-inclined mentally. Its with him and he is the custodian-caretaker only. One should never think of involving in pleasures. Whatever is in excess with him should be spent-donated-given-spent over the welfare of needy. He should not have the ego of having done some thing for others. He should perform, but should never be inclined to the deeds (ambitions, goals, targets, motives, resolutions). He should be neutral to the result-reward of his actions done for the sake of others. He is a component of the Almighty and his body is a component of nature. He (as a soul) is forever-everlasting, while the body (resolutions, aims) are perishable. All goods and actions are part of the nature and will come to an end sooner or later, but he (as a soul) will remain till infinity, unless-until the soul immerse in the Almighty. Rejection of resolutions, disconnect him with the nature and he turn into a Yogi. He should forget the resolutions or their alternatives. He should remember that he is born to make efforts for Salvation. As a Karm Yogi, he has to perform without attachment for the welfare of the society. As a Gyan Yogi, he has to achieve the gist of the God (enlightenment not the fulfilment-contemplation of resolutions). As a Bhakti Yogi, he has to be aware that neither the past nor the future are meant for resolutions and the present is meant for the prayers (dedication, devotion to the Almighty). So, one has to be neutral to achievements and failures and the resolutions as well, simultaneously.
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धु-रात्मैव रिपुरात्मनः॥6.5॥ 
मनुष्य स्वयं अपने विवेक युक्त मन द्वारा इस भव-सागर से अपना उद्धार करे और अपना पतन न करे, क्योंकि वह स्वयं ही अपना मित्र है और शत्रु है। 
One should make use of prudence to cut the bonds (with friends, relatives, objects, events etc., world as a whole) to cross-swim over the ocean of reincarnations and make efforts not to be degraded, since he is his own friend and enemy as well.
मनुष्य का अहम्, राग, द्वेष, कामना, ममता, अभिलाषा, संकल्प-विकल्प, आसक्ति, असत् उसे संसार में बाँधे रखते हैं। ज्ञान-विवेक इस माया जाल को काटने में सहायक है। पदार्थ, क्रिया और संकल्प-मनोकामना अभाव उसे निर्लिप्त नहीं होने देते। कठोर निर्णय उसे इस दुविधा से मुक्ति दिला देता है। परमात्मा की शरणागति, उसकी बेड़ियों को काटती है। शरीर सहित अपने साधनों को संसार की सेवा-परमार्थ में लगाकर, बुद्धि से सही-गलत, जड़-चेतन, सत-असत्त, शरीर-आत्मा, परमात्मा का चिंतन करके, मन को भगवान् के ध्यान में भक्ति भाव से लगाकर सहज योग को प्राप्त किया जा सकता है। गुरु, संत जन, वेद, पुराण, शास्त्र केवल मार्ग दर्शक हैं। करना तो सब कुछ स्वयं को ही पड़ेगा। कोई अन्य जबरदस्ती उद्धार नहीं कर सकता। ज्ञान दिशा निर्धारित करता है कि क्या गलत है, क्या सही है? परन्तु केवल ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है। बुराई-असत्य को तो स्वयं को ही छोड़ना पड़ेगा। मन, इन्द्रियाँ, प्राण को तो स्वयं ही सेवा, चिंतन-मनन, भक्ति, ध्यान में लगाना होगा। यदि यह ज्ञान-ज्ञात है कि सत्य-असत्य, सत-असत्, पुण्य-पाप, गति-अधोगति क्या है; तो फिर शेष रह जाती है, प्रक्रिया जो कि प्रभु प्राप्ति निश्चय ही करा देगी। असत्य, असत्, पाप  शत्रु हैं, क्योंकि वे पुनर्जन्म-अधोगति की ओर ले जाते हैं और सत्य, सत, पुण्य मित्र हैं, क्योंकि वे ही मनुष्य को धर्म-मुक्ति, मोक्ष की ओर ले जाते हैं। सत्य, सत, पुण्य, प्रभु की शरणागति प्रभु की कृपा दृष्टि दिला देती हैं। 
Human's ego, attachments, enmity, desires, affections, resolutions keep him bonded with the world-birth and death cycles, reincarnations. Gyan, enlightenment, prudence, help one in cutting these strings. Wealth, comforts, consumption, scarcity (deficiency, tensions, botheration), do not let him become detached. Once, he has decided to come out of these, he can easily attain Salvation by obtaining equanimity, neutrality towards these false notions (illusions, virtuality, falsehood). Shelter (protection, asylum) under the Almighty, cut all bonds. One should put all his means-efforts, along with the body, in the service of humanity-mankind, utilize his intelligence-thinking for concluding what is right or wrong, virtuous or sin, real or fake, devote himself to the God and always meditate in him. Once awareness has come, its application will automatically lead to the relinquishment. Sin, wretchedness-vices, untrue-falsehood are the enemies, since they lead one to reincarnations-downfall. Truth, virtues, piousity, morality, righteousness, auspiciousness are friends; since they grant Salvation. God's mercy is available to only those who deserve it.
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥6.6॥
जिस मनुष्य ने स्वयं को जीत लिया है, उसके लिए वह स्वयं ही बंधु-मित्र है तथा जिसके द्वारा अपने आप को नहीं जीता गया है, उसके लिए वह स्वयं ही शत्रु के सदृश है। 
One, who has conquered his inner self (a component of his soul) through proper discrimination, is his own friend and one who has not conquered his inner self, is his, own enemy.
अपने में अपने आप को जीतना अर्थात अन्तःकरण को जीतना; स्वयं को काबु-वश में करना है। स्वयं-अन्तःकरण शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि आदि से अलग और उनके ऊपर है। उनकी निर्भरता को त्यागना अर्थात आत्म विजय, असत् का त्याग और समभाव में स्थित होना है। अन्तःकरण को ब्रह्म में लीन करना, समता प्राप्त करना स्वयं को विजय करना है। मन बड़ा ही चंचल है और यह मनुष्य को नित्य नई दिशाओं-आयामों में ले जाता है। कर्तव्य-कर्म, बुद्धि-विवेक, सोच-विचार, तप-ध्यान, श्रद्धा-भक्ति प्रभु की शरणागति इसे संयम प्रदान करती है। जिस व्यक्ति  का मन-ध्यान भटकता है, वो निरन्तर लालायित रहता है। उसकी कामनाएँ बढ़ती जाती हैं। अपनी लालसा-कामना  की पूर्ति के हेतु वो प्रयास, छल-छंद, जोड़-तोड़ करता रहता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं का शत्रु है, उसे अन्य किसी शत्रु की जरूरत कदापि है ही नहीं। मान-बड़ाई, धन-दौलत, पद-गरिमा, जमीन-जायदाद, भोग-विलास की चाहत में वो एक के बाद दूसरा षड्यंत्र करता चला जाता है और उसका पतन-अधोगति निश्चित हो जाती है। मनुष्य इन्द्रियों, मन, शरीर, बुद्धि का गुलाम ना बने बल्कि इनको अपने अधीन रखे। 
One has to win his inner self who is the master of body, senses, organs, mind, intelligence. Inner self becomes a component of the Brahm. He has to over come-over power the vices, gain equanimity to win the self. The mind is very inconsistent, unsteady, quivering, lightening, fidgety. It sways the humans in all possible directions. Adaptability-dedication to Varnashram Dharm-duties, intelligence-prudence, thinking: analysing-synthesis, asceticism-meditation, devotion-faith, shelter-asylum under the Almighty, provides him control over the wavering thoughts-ideas. Self restrain-control, consistent-continuous efforts,  moderation-temperance are the means to divert the inner self towards the Almighty. One who attains this is friend of him self. One who's mind moves-divert in all possible directions uncontrolled, make efforts to fulfill his bad desires-motives, earn wealth through fair, foul, dubious means, gain honour (get praise, glory, respect). He conspire to attain pleasures, comforts, high ranks, which ensure his downfall into hells-lower abodes, birth as insects-worms etc. His downfall is impenitent. He should overcome his wretched drives, vices, control-discipline his brain and should never become slave of senses, motives, desires and negative-distracting ideas to attain immortality.
जितात्मनः प्रशान्तस्य  परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥6.7॥ 
जिस व्यक्ति ने अपने आप पर विजय पा ली है और वह सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान में निर्विकार है, उसे परमात्मा को नित्य प्राप्त है।
One who is serene (शाँत, quiet, calm, tranquil, sober, silent) and has attained self-control-restraint, is established in Supreme Self and is indifferent to cold and heat, to pleasure and pain and to honor and disgrace.
अनात्मा वो है जो शारीरिक पदार्थ के साथ अपनापन रखने के कारण स्वयं का शत्रु है। जितात्मा वो है जो शारीरिक तत्व के साथ अपनापन न रखके अपने साथ मित्रता का व्यवहार करता है। जितात्मा दुनिया का हितैषी है। यहाँ शीत और उष्ण शब्द अनुकूलता और प्रतिकूलता, सिद्धि-असिद्धि, शरीरिक कष्ट-सुख के लिए आए हैं, जो कि जितात्मा को विचलित नहीं करते। उसके अन्तःकरण में शान्ति व्याप्त है। उसके अंतर्मन (conscience) में वाह्य करण सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख और मान-अपमान प्रभाव नहीं डालते, क्योंकि इनके प्रति उसमें समता का भाव उत्पन्न हो गया है। वो निर्लिप्त-निर्विकार है। मान-सम्मान, आदर-निरादर प्रारब्ध का परिणाम हैं, जिन्हें वह सहजता से लेता है और प्रभावित नहीं होता। उस प्रशान्त को साम्यावस्था प्राप्त है। अतः वो हर वक्त, हर घड़ी भगवान् के साथ है; उसे परमात्म तत्व प्राप्त हो चुका है।  
One who gives weightage-importance to the body is his own enemy. One who has overcome the bodily comforts (impacts, sensations, feelings), is his own friend and the greatest benefactor of the whole world. The terms hot & cold are used for favourable & against situations, achievements & failures, insult and honor to which, he is neutral. His inner self is full of peace-tranquillity and solace. His conscience is not affected by external factors like summer or winter, pleasure or pains, disgrace or reverence. He has attained equanimity. He is detached (pure, pious, uncontaminated). He is aware that insult or reverence, are due to the destiny and bound to come and so he does not bother about them. He takes them lightly. Prashant-the pacified (serene, content), has reached that stage where he observes the Almighty in everything, everyone including himself. He is synonymous-icon to the God. 
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥6.8॥ 
जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जो कूट की तरह निर्विकार और जितेन्द्रिय है और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण समान हैं, ऐसे योगी को युक्त-योगारूढ़ कहा जाता है।
The Yogi who is content with enlightenment (awareness, knowledge & science-intricacies of the eternal) and is defect less-pure, has conquered his senses, like the KOOT (rectangular block of iron used to give shape to iron, silver & gold) and gives equal weightage-importance to mud, stone and gold, is said to be connected to self.
कर्म योग में भी जानकारी-ज्ञान की आवश्यकता है कि क्या करना है, क्या कर्तव्य है, कब और कितना करना है ? कर्मों की सिद्धि और असिद्धि में सम रहना (उसके गूढ़ रहस्य को समझना-जानना) विज्ञान है। स्थूल शरीर से क्रिया, सूक्ष्म शरीर से चिंतन तथा कारण शरीर से समाधि करना ज्ञान नहीं है। क्रिया, चिंतन, समाधि (State of trance, release, profound meditation with the mind successfully fixed upon the Ultimate, senses completely restrained in the final stage of Yog, absorption, intense meditation, concentrate and penetration in the Ultimate-Almighty) आदि कर्मों का आरम्भ और समापन तथा फल का भी आदि और अंत है। स्वयं परमात्मा का अंश होने के कारण नित्य और निरन्तर है, जिसको अनित्य कर्म और उसके फल से संतुष्टि प्राप्त नहीं होगी। इस बात का अहसास ज्ञान और कर्मों की पूर्ति और अपूर्ति, सिद्धि और असिद्धि में सम रहना विज्ञान है। कूट जिसे अहरन के नाम से भी जानते हैं, लोहे का बना एक ऐसा पिंड है जिस पर लोहा, चाँदी और सोने को घड़ा जाता है। उस पर घड़ी जाने वाली वस्तुएँ उपकरण, औजार गहने आकृति ग्रहण करते हैं, परन्तु वह एक समान बना रहता है। सिद्ध पुरुष (accomplished, realized) विभिन्न परिस्थितियों में एक समान निर्विकार-निर्लिप्त बना रहता है। कर्म फल के त्याग से साधक को इन्द्रिय संयम प्राप्त हो जाता है तथा राग-द्वेष से मुक्ति मिल जाती है और वो जितेन्द्रिय हो जाता है। स्वर्ण, मिट्टी का ढेला और पत्थर-हीरे भी उसके लिए एक समान हो जाते हैं। ज्ञान-विज्ञान से युक्त जितेन्द्रिय (with senses and passions subdued), निर्विकार और समबुद्धि से युक्त सिद्ध कर्म योगी समता में युक्त योगारूढ़ हो जाता है। 
Image result for image iron smithKarm Yog too need information-knowledge-learning about what to do, when to do, how to do, how much to do, where to do etc. To develop balance-equanimity, between success and failure is science. To perform through the material body, thoughts-meditation with the micro body and stanch meditation with the abstract body (Karan Sharir) is not enlightenment. Working, thinking and penetrating into the Almighty have a beginning and termination. Likewise the reward-compensation of the deeds too have initiation and end. Understanding & realisation of this is enlightenment-Gyan and equanimity-neutrality to wards attainment-success & failure, acquisition and non acquisition is science. The soul, own self-inner self is a component of the Almighty and is always-for ever and continuous, which is not touched-affected by the perishable deeds and their outcome-compensation, like the KOOT which a rectangular block of iron used to beat gold, silver, iron to give shape into ornament, weapons, instruments etc., without being affected in shape or size-configuration. One who has established him self in the God, remains unperturbed (disturbed, untouched, unmoved, uncontaminated) in all situations. Rejection of the compensation for the deeds, leads to control over the senses, attachments and hatred-enmity. The practitioner turn into a winner over the self-with senses and passions subdued. He gives equal weightage to mud, stone-diamonds and the gold. He is mature with enlightenment & science (extract, elixir, nectar) of the Eternal, unsmeared-engrossed with equanimity. He is on his way to assimilation in God-Liberation.
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥6.9॥ 
सुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य, बन्धु, धर्मात्मा और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है।
He, who treats the well-wishers, the friends, the foes, the indifferent, the neutral-mediators, the envious, the relatives, the righteous and the sinful equally, prevails-excels.
निर्जीव और पशु-पक्षियों में समता सरल है; परन्तु इन्सानों में सम बुद्धि उत्पन्न करना अत्यंत कठिन है। व्यक्ति का आचरण देखकर भी जिसकी बुद्धि और विचार में कोई विषमता या पक्षपात नहीं होता; ऐसा सम बुद्धि वाला पुरुष श्रेष्ठ है। 
सुहृदय वो है जो माता की तरह ही, मगर ममता रहित होकर, बिना किसी कारण के सबका भला चाहने वाला हो। मित्र वह है जो उपकार के बदले उपकार करता है। 
अरि (शत्रु, दुश्मन) वो है जो अपने स्वार्थवश, किसी अन्य कारण या अकारण ही द्वेष, अहित, अपकार करता है। उदासीन-तटस्थ वो है जो किसी के वाद-विवाद में पक्षपात रहित रहता है और अपनी ओर से किसी से कुछ नहीं कहता। 
मध्यस्थ वो है जो वाद-विवाद, मार-पीट को रोककर, समझौता (मेल-हित) करने की चेष्टा करता है। अपने सम्बन्धी, मित्र, बन्धु) के प्रति बर्ताव करने में मन में कोई विषम भाव नहीं लाता। श्रेष्ठ आचरण करने वालों, पापियों के साथ व्यवहार में, उनका हित करने में, दुःख-मुसीबत में सहायता करने में उसके अन्तःकरण कोई पक्षपात या विषम भाव नहीं होता। 
श्रेष्ठ मनुष्य जानता है कि सबमें एक ही परमात्मा विराजमान है। तत्व बोध होने से मनुष्य में सम भाव आता है और वह समबुद्धि हो जाता है। सुहृदय सिद्ध कर्म योगी पक्षपात रहित होकर सेवा, परमार्थ, पर हित करता है। जिसकी साधु और पापी में समबुद्धि हो गई हो निश्चय ही श्रेष्ठ है। समता की अपार असीम, अनन्त महिमा है। समदृष्टा किसी का बुरा नहीं मानता, बुरा नहीं करता, बुरा नहीं सोचता, किसी में बुराई नहीं देखता, किसी की बुराई नहीं सुनता और किसी की बुराई नहीं कहता-करता। 
Its easy to develop-grow equanimity towards lifeless, birds & animals, but really difficult to grow equanimity towards the humans of different behaviour, habits, nature, region, religion, attitude, culture, tendencies, mental level, social status etc. One is definitely a great man if he does not react-behave differently, without favor or discrimination, (contrast, abnormality, incongruity, inequality, disparity, irregularity). 
One is good at heart if he think of the benefit-welfare of all without attachment & discrimination, without any reason, without the desire of reciprocation and is tender like the mother. One is a friend-relative if he reciprocate the timely help, gratitude. 
Enemy-foe is one who is envious & do not hesitate in harming without logic-reason due to his selfishness-with bad intentions. 
One is neutral if he do not interfere-indulge in the quarrel (dispute, confrontation) of others. Mediator is one who tries to resolve the disputes of two parties. 
The great man do not react, show or bring and irrationality-abnormality, in their behaviour-dealings towards the friends, relatives, acquaintances, enemies-foes. The pious (righteous, virtuous, great soul) discriminate (differentiate, distinguish) while dealing with the sinners, for helping them in destitute (बेसहारा, दीन, निःसहाय, अकिंचन, निराश्रित, मुहताज, बेकस, निरालंब, निराश्रय, miserable, necessitous, penniless, unobtrusive, pauper, indigent, poor, needy, dependent, devoid, helpless, hapless, defenceless, helpless, homeless, house less) trouble-bad luck. The great souls-enlightened are aware that the same Almighty resides in all creatures-humans. The moment Ttvgyan-gist of the Almighty comes to one, he acquires equanimity in him automatically. The accomplished, relinquished Karm Yogi with tender heart, helps every one, without discrimination. One is definitely-surely a great man if he has grown equanimity towards the devil-sinner and the saint-sage. The grandeur (बडप्पन, प्रताप, महिमा, शोभा, महत्व), greatness, (बडाई, अधिकार, भलमनसाहत, श्रेष्ठता, गुरुत्व) of equanimity is beyond limits, infinite. One who has attained equanimity, does take any thing against him to his heart, does not listen-mind bad words spoken to him by others, does not speak bad-slur against others, does not find fault with others,  does not listen any thing bad pertaining to others, and does not speak bad.
योगी युञ्जीत सततमा-त्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥6. 10॥ 
भोग बुद्धि से संग्रह न करने वाला, इच्छा रहित और अन्तःकरण-मन को वश में रखने वाला योगी, अकेला एकान्त में स्थित होकर मन को निरन्तर परमात्मा में लगाये।
The Yogi, who has rejected all desires should not accumulate for comforts, control his inner self, stay alone and concentrate his mind in the Almighty.
ध्यान योग में योगी को चित्त वृत्तियों का निरोध करना है, क्योंकि उसका लक्ष्य ध्येय केवल परमात्म प्राप्ति है। यह योगी-साधक को संसार से विमुख करके परमात्मा में लगा देगा। इसके लिए, उसे अपने लिये सुख बुद्धि से कुछ भी संग्रह नहीं करना। भोगेच्छा, कामना, आशा का त्याग भी उसे करना है। साधक को अन्तःकरण सहित चित्त को वश में रखना है। वो कोई भी नया काम राग पूर्वक न करे। उसे ध्यान साधना एकान्त में करनी चाहिए, ताकि उसका मन भटके नहीं। एकान्त में ध्यान करने के लिए जाने से पहले वो यह सुनिश्चित कर ले कि अब संसार में उसके लिए कोई कार्य-जिम्मेवारी नहीं है। उसे केवल प्रभु का स्मरण-चिंतन ही करना है। वह ध्यान के समय तो तत्परता से चिन्तन करे ही, व्यवहार में भी निर्लिप्त रहे। 
There is always a possibility of distraction due to interest in worldly affairs for the practitioner. He has to control his tendencies, desires, motives and channelise-divert, all his energy-power into the Almighty. He has to isolate him self from the worldly affairs. He has to reject all sort of accumulation for seeking comforts-pleasure. For this, he has to reject desire for comforts, passions and expectations. Not only the inner self needs to be reigned, but its the motives-maneuvers, which deserve to be restricted (curtailed, rejected). He should not initiate any new ventures endeavours-activities with attachments. He has to move to some isolated-deserted place for meditation-asceticism, so that outer world does not affect him, his mind does not distract, memory does not intrigue him. Still, he should ascertain that he has fulfilled all responsibilities and nothing is left for him to do-accomplish. His sole aim (goal, target) is relinquishment and assimilation in the Almighty. The time available with him after meditation should be spent without attachment, desires, motives, affections, accumulations etc.
शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥6.11॥
शुद्ध-पवित्र स्थान, जिस पर क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र से बने स्थिर आसन की स्थापना कर, जो न अधिक ऊँचा है और न अधिक नीचा, साधक अपने आसन को स्थापित करे।
The practitioner-devotee has to worship at a clean place, make a firm seat using grass, skin of a deer and cloth in that order, which is neither too high nor too low.
साधना के लिए स्वाभाविक स्थान गंगा नदी का किनारा, पवित्र गुफ़ा, जंगल-वन, तुलसी, आँवला, पीपल आदि के सन्निकट चुनना चाहिए। वह स्थान गाय के गोबर से लीपा हुआ हो और उस पर लकड़ी या पत्थर की चौकी स्थापित की गई हो। धरती पर कुश, कपड़ा और फिर स्वतः मरे हुए मृग की खाल और उसके ऊपर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर, आसन बनाया जाये। कुश शारीरिक विद्युत आवेश को पृथ्वी में प्रवेश करने से रोकने के लिए है। जो भी चौकी या आसन हो, वो समतल भूमि पर स्थित हो और कीड़े-मकोड़ों से रहित-सुरक्षित हो। आसन हिले डुले नहीं। साधना में प्रयुक्त आसन, गोमुखी, माला, सन्ध्या के पंचपात्र, आचमनी आदि अपने ही हों। जूती-खड़ाऊँ, कुर्ता-वस्त्र भी अपने ही हों। कभी भी पुण्यात्मा, संत-महापुरुषों, गुरुआदि के आसन पर नहीं  बैठना चाहिए और ना ही उसे पैर या अशुद्ध वस्तु से छूना 
The place of worship-site should be pious, disturbance free. One can choose a quite location near holy river Maa Ganga, pond, forest, cave, or Tulsi, Anvla, Peepal groove. This site should be applied with cow dung-a disinfectant and covered with Munj (tough Asiatic grass-straw) chatai, deer skin-(the deer who died natural death) and finally with the clean cloth, to prevent the flow of charges developed in the body during ascetic practice-prayer-Sadhna. The seat should be balanced and safe from insects like ants-spiders. One has to use his own beads, seat, pot, etc. during the compose (calm, cool-headed, self-controlled, serene, tranquil, relaxed, at ease, self-possessed, unruffled, unperturbed, unflustered, undisturbed, unmoved, unbothered, untroubled, unagitated) postures; prayers-meditation. It should be remembered that the practitioner should never disrespect-dishonour the seat of his Guru-teacher, sags, saints in any way.
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्या-द्योगमात्मविशुद्धये॥6.12॥
उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए, मन को एकाग्र करके,  अन्तःकरण की शुद्धि के लिये योग का अभ्यास करे।
On should comfortably occupy the seat,  concentrate his mind, control the actions of the mind and the senses and practice Yog for the purification of inner self.
आसन आराम दायक हो, ताकि योगी लम्बे समय, लगभग 3 घण्टे तक हिले-डुले बगैर, शान्ति पूर्वक, सिद्धासन, पद्मासन या सुखासन में बैठे। इस दौरान मन, चित्त, इन्द्रियों, क्रियाओं को वश में रखे। मन को एकाग्र और शाँत रखते हुए परमात्मा का चिंतन-ध्यान करे। अन्तःकरण की शुद्धि ही ध्यान योग का मकसद-ध्येय है। 
The seat should be comfortable, so that the practitioner is able to devote long hours in one sitting say 3 hours. He can adopt Siddhasan, Padmasan or Sukhasan for sitting postures. This is the time when he has to isolate him self from the external-outer world and concentrate solemnly in the Ultimate. All his thoughts-ideas, energies should be channelised into the Almighty. He can form a mental image of the Almighty and keep concentrating in him. The sole aim is to penetrate into the God, by breaking the obstacles, barriers of the this world-nature.
KUSH-MUNJ MAT-POOJA ASAN-SEAT :: Kush grass is sacred. Yogis-Sages often sit on Kush-Munj grass mats when they perform meditation.
Image result for Images matsA prayer mat is used as a Asan-Chatai or seat while performing Pooja, prayers, meditation, worship. It may be square-round or circular. It allows the Yogi to maintain that serene state of mind without being affected by the adversity of the environment surrounding him and cuts off his direct connection from the earth to check the flow of electric charges into the earth. It is also a remarkable insulator, both physically and metaphysically. 
Image result for Images matsKush signifies sharpness or pointed ends. It emerges from the Almighty. Evil forces like, ghosts, spirits, demons, etc. keep away from the place, where it is used. This is considered to be the holiest of all the places of pilgrimage-Tirth Sthal (तीर्थ स्थल).  The spot where Gautom Rishi finally secured Ganga on earth had Kush-Durv grass spreaded over there. Kush grass is considered purifying and rings woven of it are sometimes worn in worship to keep the hands ritually pure. Durvasa Rishi got his name from Durv since he survived over the juice-extract of Durv grass, only.
वस्त्रासने दरिद्रयम् पाषाण रोग सम्भवः; मेदिनयम् दुःखमाप्नोति काष्ठे भवति निष्फलं। 
Vastrasane Daridrayam, Pashan Rog Sambhavah; Medinayam Dukhamapnoti Kashthe Bhavati Nishphalam. 
Image result for Yogiraj ShivBhagwan Shiv reveals the malefic effects of ignorantly choosing the wrong Asan-the seat for meditation. Sitting on a seat of cloth leads one to misfortune, sitting on stone floor or on a rock brings diseases; do not sit on the ground directly as it brings sorrow and a seat made of wood is ineffective. All these seats are grounding energies, whereas a proper seat is one, that generates energy for Tapas (penance for Liberation). With grounding energies, Tap Shakti-Ascetic Power  (the power of meditation) will be drained away into earth. Whereas a proper Asan-a mat of Kush, retains energy, protects and retains the Guru Shakti (the soul power) in the practitioner.
When one sit for meditation (Dhyan) with the right resolution (Sankalp), seated on the right Asan & posture, his seat becomes a Shakti Peeth (Power Pedestal), as the Shakti-Kundlini (the Serpent Power in the spine) will start rising within him and the ascetic will become Sada Shiv. 
समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥6.13॥ 
शरीर, सिर और गले को सीधा और स्थिर रखते हुए, अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए और अन्य दिशाओं को न देखते हुए, स्थिर होकर बैठे।
The Yogi-practitioner should keep his body, head and the neck straight-erect and still, fix his gaze on the tip of his nose, without looking around into the other directions and sit still.  
साधक को चाहिये कि वो अपने सर-मस्तिष्क, गर्दन और कमर-रीढ़ को स्थिर-अविचल रखे। इस अवस्था में मनुष्य की चिंतन शक्ति एक दम बढ़ जाती है और नींद भाग जाती है। चेतना का स्तर बढ़ जाता है। मन शान्त हो जाता है। किसी भी अन्य दिशा में देखने से एकग्रता भंग हो जायेगी। नासिका के अग्र भाग को देखते हुए ध्यान केंद्रित करना है अर्थात परिदृश्य दृष्टिगोचर न हो। इस अवस्था में चिन्तन, मनन, ध्यान लगभग 3 घंटे तक कायम रखने का निर्देश दिया है। 
The practitioner has to maintain his head, neck and the backbone erect. This posture involves the tail point and the tip of the head, to be kept vertically erect. The mental capabilities of the devotee increase enormously in this posture. His thought process becomes very efficient and the level of concentration-meditation enhances many fold. The brain becomes calm and composed. As a matter of experience one loss his sleep. Enlightenment  comes automatically after due practice. The head should face some distant point through the middle of eye brows, straight over the nose, so that nothing around is visible. He has to make mental image of the Almighty and recite his name quietly, repeatedly for around 3 hours at a stretch. This process is adopted to awake KUNDLINI by the Yogis.
Those who find difficulty in learning may also adopt this posture for better memory understanding of the text.
प्रशान्तात्मा विगतभी-र्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥6.14॥ 
जिसका अन्तःकरण शाँत है, जो भय रहित है और जो ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित है, ऐसा सावधान ध्यान योगी मन का संयम करके मेरे में चित्त लगाता हुआ, मेरे परायण होकर बैठे।
The serene-cautious Dhyan Yogi, who has attained peace, solace, tranquillity in his heart & mind-inner self, is fearless and devoted to celibacy, should concentrate in the Almighty while retaining his stillness. 
राग-द्वेष से रहित शुद्ध चित्त-अन्तःकरण वाले ध्यान योगी को रिद्धि-सिद्धि, हर्ष-शोक कामनाएँ परेशान नहीं करतीं। अतः वो शान्त है। शरीर के प्रति मैं या मेरे पन की भावना उसमें नहीं है, इसलिए वो भय रहित है। शरीर रहे या जाये, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। उसने ब्रह्मचर्य व्रत धारण कर रक्खा है। विषय-भोग, कामनाएँ-वासनाएँ, मान-सम्मान, शब्द, रूप, रस, गन्ध में उसकी भोग बुद्धि नहीं, अपितु निर्वाह बुद्धि है। सब तरफ से ध्यान हटाकर वो केवल परमात्मा की लीलाएँ, गुण, प्रभाव, महिमा, कथा-कहानियाँ आदि का ही चिंतन करता है। इस प्रक्रिया के दौरान वह अत्यंत-अत्यधिक सावधान और जाग्रत है। उसका उद्देश्य केवल मात्र परमपिता परमात्मा ही है। मन से बार-बार किसी वस्तु का मनन किया जाता है और चित्त से केवल एक ही वस्तु-ध्येय का चिन्तन किया जाता है। 
The Dhyan Yogi-ascetic devoted to meditation, is free from attachments-enmity. Accomplishments-failures, pleasure-pain do not hurt-disturb him. It makes him quite-peaceful. He has no inclination for the body in the form of ego, pride or arrogance (I, My, Me, id, ego, super ego). Whether the body survives or perish does not affect him. He is fearless. He has withdrawn him self from the activities of the living world. He practices celibacy. Sex, sensualities, lust, passions, immorality do not over power him. Comforts, honours, pleasing-hurting words, pleasing essence-scents, smells, extracts do not attract him. He is neutral to them. He observes-sees them, but remain isolated-unattached from them. He pulls out his attention from the world and put it into the Almighty, solemnly. He remembers the glory, stories, characteristics, effects-impacts of the God only and discards every thing other then them in his memory. Events of the past do not haunt him. He is very attentive-awake in this state of devotion-meditation, to the God. He has only one thing in his mind and that is the Ultimate. Only one thing is left in his thoughts and that is nothing other than the Almighty.
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥6.15॥ 
नियंत्रित मन वाला योगी इस प्रकार मन को निरंतर मुझ में लगाता हुआ, मुझ में सम्यक स्थितिवाली जो निर्वाण परम आनंद रूपी शान्ति है, को प्राप्त होता है।
The Yogi-devotee, who has controlled his gestures-mind and always keeps it aligned-fixed with the Almighty, attains the Ultimate peace, solace, tranquillity (the blissful peace of Liberation).
साधक को चाहिए कि वो स्वयं को धर्म, जाति-पाँति, गृहस्थ आदि विषयों से मुक्त कर, स्वयं को केवल ध्यान योगी ही माने। वह केवल परमात्मा से अपना सम्बन्ध माने। अपना उद्देश्य ऋद्धि-सिद्धि से ऊपर तय करे। इस प्रकार अन्तःकरण और बहिःकरण की स्वाभाविक प्रवृति हो जायेगी। योगी निरंतर-सतत् अभ्यास जारी रखे। ध्यान योग में निर्विकल्प में स्थिति और बोध को प्राप्त करे। यही परम् निर्वाण प्रदायक शांति-नैष्ठिक शांति उसे प्राप्त हो जाएगी।  
One has to elevate himself above the religion, Varn, caste-structure, status as a house holder-family dweller and align all his energies with the Ultimate. He should consider his relation with the God only. He should not restrict himself up to the attainment of Riddhi and Siddhi-accomplishment (prosperity, wealth, opulence, attainment of enlightenment & super natural powers). This will turn him into a practitioner having achieved purification of inner self and outer manifestations. His inborn inclination towards the Almighty will evolve, with which he should continue uninterrupted-continuously. This will lead him to the Ultimate peace, solace, tranquillity. Thereafter, its only bliss and assimilation in the Ultimate.
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥6.16॥
हे अर्जुन! यह योग न तो अधिक खाने वाले का, न ही बिलकुल न खाने वाले का, न अधिक शयन करने वाले का और न ही सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
Hey Arjun! This Yog is not possible for the one who eats too much, beyond his hunger-appetite or who the one does not eat at all, nor for him who sleeps too much or is always awake. 
जरूरत-भूख से अधिक खाने वाला, आसन पर अधिक-समुचित-पर्याप्त काल तक बैठ नहीं सकता, क्योंकि मल-मूत्र उत्सर्जन उसे सतायेंगे। अधिक खाने वाला नींद, आलस्य  का शिकार भी होता है। बिलकुल न खाने वाला कमजोरी, थकान और शिथिलता का शिकार होता है। ज्यादा सोने वाला दर्द, स्वप्न, आलस्य का शिकार होता है। बिल्कुल न सोने वाले को नींद सताती है। सात्विक प्रवृति वाले मनुष्य भगवत भजन-कीर्तन, कथा-चरित्र सुनना-कहना आदि में रस विभोर होकर नींद थकान आलस्य, भूख-प्यास भूल जाता है। परन्तु राजसिक-तामसिक प्रवृति वाला इनसे प्रभावित हुए बगैर नहीं रहता। 
One who eats too much suffers from indigestion, acidity, desire for excretion-urination, which is bound to hinder the Dhyan Yog (concentration, meditation, asceticism). He is attacked by sleep, (dizziness, laziness, idleness). Other one, who avoids taking food becomes weak. One who sleeps too much suffers from pain, laziness, dreams etc. When there is no sleep, it becomes difficult to concentrate or to do any thing, what to say of asceticism-Yog. Those with virtuous tendencies and perform, enjoy, relish recitation of God's names, listening-saying, Gods stories-character, forget sleep, hunger, thirst. Those with aristocratic-Rajsik style, wickedness-Tamsik suffers the most from sleep, hunger. Such people can not devote time for the God or the service of man kind.
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥6.17॥
दुःखों का नाश करने वाला योग तो सम्यक्-यथा योग्य आहार और विहार करने वाले का, कर्मों में सम्यक् चेष्टा करने वाले का और सम्यक् प्रकार से सोने और जागने वाले का ही सिद्ध होता है।
The Yog which destroys sorrow-pain, is possible for the one who consume (take, utilise) moderate food, perform other activities moderately-modestly, whose actions are moderate, whose sleep and waking is moderate.
भोजन सत्य, न्याय और सदाचार पूर्वक कमाए गए धन से प्राप्त किया गया हो, सात्विक हो, अपवित्र न हो। भोजन स्वाद और पुष्टि बुद्धि से नहीं, अपितु साधन बुद्धि से किया जाये। भोजन उतना ही किया जाये, जितना कि पच सके या उससे थोड़ा कम। वह शरीर के अनुकूल हो, हल्का हो। धूमना-फिरना, व्यायाम, योगासन उतना ही किया जाये, जितने से शरीर थके नहीं। वर्ण-आश्रम धर्म-कार्य निर्वाह, देश-काल, आवश्यकता-परिस्थितियों के अनुसार-अनुकूल, कुटुम्बियों के निर्वाह, समाज के हितचिंतन, परमार्थ, कर्तव्य-कर्म शास्त्रानुसार प्रसन्न चित्त से किये जाएँ। पर्याप्त नींद का लेना जरूरी है, ताकि शरीर स्वस्थ रहे, थकान मिटे, आलस्य न हो। दिन में सोना हितकर नहीं है। जल्दी सोना और जल्दी जागना चाहिए। मनुष्य योनि में जन्म साधना के लिए मिला है। अतः उसमें लगना भी जरूरी है। इस प्रकार जीवन निर्वाह करते हुए ध्यान योगी में दुःखों का अभाव हो जायेगा। योग में भोग का अभाव है, मगर भोग में योग का अभाव नहीं है। यह प्रक्रिया सभी प्रकार के योग में प्रयुक्त हो सकती है। 
The food one consumes, should be obtained from the money earned through righteous-honest means. It should be pure. It should be utilized just to survive not for the sake of taste or body building. Only that much food should be eaten, which can be digested easily by the body. It would be better if one use a bit less than his hunger-appetite. It should be light and able to sustain the body. Walking-running, physical exercise, Yogasan should be within limits, so that the body is free from stress and strain. One has to earn according to his Varnashram Dharm, country-region, necessities-requirements for him self and his family, in accordance with the scriptures, for the welfare of the society-others. One has to take sufficient sleep. But he should avoid sleeping during the day. He should get up early and sleep early. The incarnation as a human being is meant for the efforts to become free from birth and death. He should make endeavours to achieve Salvation. If these principles are followed, he would have no worries-tensions-difficulties. Its not possible to become a consumer, while practicing Yog; but one can become a Yogi while consuming-performing various other activities simultaneously. These procedures are meant for all sorts of Yog-ascetic practitioners.
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥6.18॥ 
जब नियंत्रित किया हुआ चित्त अपने स्वरूप-आत्मा में ही स्थिर हो जाता है और सम्पूर्ण पदार्थों से निःस्पृह (सभी भोगों में इच्छा से रहित) हो जाता है, तब वह पुरुष योगी है; ऐसा कहा जाता है।
One, without any desires is said to have become a Yogi, when the restrained mind-gestures (restricts themselves) remains still within the Self.
चित्त की 5 अवस्थाएँ हैं :- (1). मूढ़ (idiot, duffer, silly), (2). क्षिप्त (mental wreak),  (3). विक्षिप्त (a muck, lunatic, madman, neurosis, deranged, insane, distracted, distraught, brain sick, deranged, unsound, unstable, demented, rabid), (4). एकाग्र और (5). निरुद्ध (Constrained, Detained)। 
मूढ़ और क्षिप्त वृत्तिवाला योग का अधिकारी नहीं होता। विक्षिप्त जिसका चित्त कभी स्वरूप में लगता है कभी नहीं लगता योग का अधिकारी है। चित्त वृत्ति के एकाग्र होने पर सविकल्प समाधि होती है। एकाग्र वृति वाले का चित्त जब निरुद्ध अवस्था में होता है, तब निर्विकल्प समाधि होती है। निर्विकल्प समाधि को ही योग कहा गया है। 
वश में किया गया चित्त (संसार के चिंतन से रहित), अपने स्वतः सिद्ध स्वरूप (जो जब यह सब कुछ नहीं था, तब भी वह था; जब यह सब कुछ नहीं रहेगा, तब भी वो रहेगा, जो सबके उत्पन्न होने से पहले भी था और सबका लय होने के बाद में भी रहेगा, जो अभी भी ज्यों का त्यों है) में स्थित हो जाता है। उस स्वरूप के सिवाय रस और आनन्द मन को कहीं भी प्राप्त नहीं है। जैसे-जैसे, जिस क्षण वश में किया चित्त स्वरूप में स्थित हो जायेगा और वह  प्राप्त-अप्राप्त, दृष्ट-अदृष्ट, एहलौकिक-पारलौकिक, श्रुत-अश्रुत सम्पूर्ण पदार्थों-भोगों से निःस्पृह हो जाता है, वह योगी हो जाता है। स्वरूप में स्थित ध्यान योगी वासना, कामना, आशा, तृष्णा, स्पृहा, जीवन निर्वाह से रहित होता है और योगी हो जाता है। 
Brain has 5 stages :- (1). When one does not understand any thing. (2). He is a mental wreak. (3). He is a lunatic-insane. (4). His brain is concentrated (fixed, deeply involved in  a certain aspect). & (5). The brain has been constrained (over come, mastered). Idiot & mental wreak can not understand or practice Yog. A lunatic hover between concentration and fluctuations i.e., disturbed-destabilised states. He may or may not be trained as a Yogi. One who has controlled his senses, motives, gestures, fluctuations attains staunch mediation stage. One who has constrained-relinquished reaches the Ultimate Samadhi and is sure to become a Yogi.
The wavering mind has to be controlled-reigned from the thought of the eventual world. It has to be fixed in its real form-entity, the inner self, which used to be there when nothing was there, which is present-is still there, as such and will continue to exist, which will retain it self even, when each and every thing has gone (destroyed, doomed, perished). One can not experience the real-true bliss, rejoice, happiness else where, except his true state-the inner self. Slowly and gradually one will detach from accomplishment-failures, visible or hidden, present abode (earth) or the other worlds (heavens, nether world, hells), heard or assumed. This is the stage which stabilises him as a Yogi. Now, he do not need any thing, has no motivations, desires-expectations, sensualities-passions.
यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥6.19॥ 
जिस प्रकार वायु रहित स्थान में रखे दीपक की ज्योति अचल रहती है, वैसी ही उपमा (quotation, example)  आत्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के नियंत्रित चित्त की कही गई है। 
The Yogi with a controlled mind and gestures is comparable to the lamp, which glows without flicker. 
स्पंदन रहित वायु के स्थान में दीपक की लौ बिलकुल भी नहीं झपकती। उसी प्रकारअभ्यासरत योगी का मन-चित्त स्वरूप-परमात्मा के सिवाय किसी अन्य वस्तु का चिन्तन, स्मरण, मनन नहीं करता। मनुष्य का मन-चित्त स्वभाव से चञ्चल है, जिसको काबू में रखना बेहद कठिन है। जिस प्रकार दीपक की लौ प्रकाशवान है; उसी प्रकार साधक का चित्त भी स्वरूप से जाग्रत-प्रकाशित है। समाधि में भी चित्तवृत्ति जाग्रत रहती है।  
A lamp continues flickering with the slightest gush of air. If it is kept at a place where air does not flow-blow, it glows with stable light. The Yogi has to control his brain during practice so that it does not fluctuate with the worldly thoughts-ideas-memory. Its awake continuously while performing the exercise with unification in self-the Almighty. His body is stable, mind is stable and he is immersed in the prayer of the Ultimate. The human brain-psyche  is very active-fertile and think of all sorts of things and its really very difficult to restrain it. The way the wick of the lamp shines creating a luminous zone around it, the Yogi too create an aura around him being alert (conscious, active), which is a sign of his asses to his inner self-Soul and the God.
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥6.20॥ 
योग के अभ्यास से नियंत्रित चित्त परमावस्था में शांत हो जाता है और ध्यान के द्वारा स्वयं अपने आपमें, अपने आपको-आत्मा को देखता हुआ स्वयं में ही सन्तुष्ट रहता है। 
One who has become quiescent (मौन, स्थिर, अचल, निष्क्रिय, सुप्त, निश्चल, mute, voiceless, taciturn, stable, static, stationary, constant, stagnant, immovable, invariable, irreplaceable, unshakeable, still, idle, deed less, effortless, idle, immobile, restrained) by the practice of Yog; while, seeing the Self-soul-inner self by the self, he is satisfied in his own Self.
ध्यान योग में मन को स्वरूप में लगाना है, जिसे धारणा (concept, idea, steadfastness, holding in the mind) के  नाम से जानते हैं। चित्त का प्रवाह केवल स्वरूप में हो जाता है जो, ध्यान कहलाता है। इस दौरान ध्याता, ध्यान और ध्येय में से साधक केवल ध्येय पर केंद्रित हो जाता है। यह अवस्था ही समाधि है। चित्त एकाग्र अवस्था में आ जाता है। और अंत में केवल ध्येय शेष रहता जो कि निरुद्ध अवस्था है। निरुद्ध अवस्था में सबीज समाधि  सूक्ष्म वासना के कारण से  सिद्धियां प्रकट हो जाती हैं, जो सांसारिक दृष्टि से ऐश्वर्य परन्तु पारमार्थिक दृष्टि से विध्न हैं। इस समय वह स्वयं में सन्तुष्ट है। इस अवस्था में योगी उपराम हो जाता है। उसका चित्त से सर्वथा सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है। उसे स्वयं अपने आप-स्वरूप में संतोष होने लगता है। कर्म योग में यह अवस्था उसे तब मिलती है, जब वह कामनाओं का त्याग करके अपने-आपसे संतुष्ट हो जाता है। ध्यान योग करण सापेक्ष और कर्मयोग  करण निरपेक्ष है। 
One concentrate him self in the inner self, soul, Almighty, which is steadfastness. All energies start flowing into the Self, which is deep penetration-stabilisation. During this process the practitioner, stabilises over  the goal-Almighty and pin point-concentrate only over the target-God. This is Samadhi. The brain acts-flows unilaterally into the Almighty. Ultimately only the Almighty remains over the scene which is the state, when one has become isolated (disconnected, cutoff) from every thing (activity, event, happening)  around him. This is the state where all sorts of accomplishments occur before the practitioner, but he solemnly rejects them all. These accomplishments occur due to the presence of desires-passions some where within him, but he over power them as well. These accomplishments are comforts-pleasures but obstacles for him, since he is restrained from the Ultimate devotion-sacrifice, by these. The Yogi finds him self content-satisfied and rejects all these accomplishments. He is free from gestures, variations, deviations. He starts finding contentment within him self. This stage is reached when he rejects all sorts of motives (desires, allurements, attainments) and he finds contentment within Self, while practicing Karm Yog. Dhyan Yog does not involve the senses (organs, implements, faculties). Karm Yog utilised all faculties available within the body.
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥6.21॥
जो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य (इन्द्रियों से परे, केवल शुद्ध व सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य अनन्त आनन्द) है, उस सुख का जिस अवस्था में अनुभव करता है और जिस सुख में स्थित हुआ यह ध्यानयोगी तत्व (आत्मा के स्वरूप) से फिर कभी विचलित नहीं होता। 
The Dhyan Yogi will never deviate from the Self on experiencing the Ultimate pleasure-bliss, which can be achieved-transcend beyond the limits of the senses or can be grasped through pure and sharp intelligence-prudence; which he experiences in a steady state.
आत्यन्तिक सुख वह सुख है जो ध्यान योगी अपने आप में महसूस करता है। यह तीनों गुणों (सात्विक, राजसिक, तामसिक) से अतीत, अक्षय, अत्यन्त ऐकान्तिक और स्वतः सिद्ध है। यह सात्विक सुख से भी बेहतर है जो कि परमात्म विषयक बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होता है। अतीन्द्रिय अर्थात इन्द्रियों की सीमा से ऊपर राजस सुख से भी उत्तम, पराधीनता से परे, मन की पहुँच से ऊपर जो कि स्वयं  द्वारा ही अनुभव किया जाता है। अतीन्द्रिय वो लोग (साधक, योगी, सिद्ध) होते हैं, जो किसी भी बात को स्वतः जान लेते हैं। यह सुख बुद्धिग्राह्य अर्थात तामस सुख से भी विलक्षण है, जिसमें निद्रा, आलस्य, प्रमाद हैं; जिसमें बुद्धि-विवेक कार्य नहीं करते। ध्यान योगी इसको अपने आपमें अनुभव करता है। वह इससे चलायमान-विचलित नहीं है। 
The extreme (Ultimate pleasure, bliss) experienced by the Dhyan Yogi is over and above the three types of comforts a human being can experience through virtues, authority and nefarious, wicked, vicious activities. This type of pleasure can be achieved by the person who has attained the gist of the Almighty. The sixth sense (intuition, farsightedness) is often talked about those, who can see the future. This state is icon to the state of the practitioner who has gone beyond the limits-realms of the nature. The intelligence-prudence too lack in grasping this Ultimate state achieved by the Dhyan Yogi.This pleasure is experienced within self and is permanent-forever. The Yogi does not deviate from this.
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥6.22॥ 
जिस लाभ को प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं है और इस लाभप्रद स्थिति में योगी बड़े से बड़े दुःख से भी दुखी नहीं होता।
The supreme gain (Ultimate pleasure-bliss is the last stage of attainment above which the Yogi has nothing to obtain-gain) is the Ultimate gain beyond which the Yogi has nothing to gain-achieve and he does not move even after getting worst possible pain. 
तामस, विषयजन्य और सात्विक सुख से भी ऊपर आत्यन्तिक सुख (परमानन्द, परमात्म प्राप्ति) है, जिसके ऊपर अन्य कोई सुख नहीं है। इस अवस्था को प्राप्त करके योगी अन्य किसी सुख की अपेक्षा नहीं करता। इस स्थिति में बड़े से बड़ा दुःख भी आ जाये तो उसे विचलित नहीं करता। परमानन्द कर्म, ज्ञान, ध्यान और भक्ति योग की कसौटी है। 
The 4 routes of Salvation takes one to bliss, beyond which there is nothing to gain-acquire. This is the state which when reached by the Yogi, make him unmoved-unconcerned in the greatest possible pain (trouble, tortures). The 3 types of pleasures known to the humans are Tamas (lethargic, sloth, laziness), Rajas (comforts, luxuries) and the Satvik (virtuousness).
तं विद्याद्‌दुःखसंयोग-वियोगं योगसंज्ञितम्।स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥6.23॥ 
जिसे समझकर दुःख भरे संसार के संयोग से वियोग हो जाता है, उसी को योग के नाम से जानना चाहिए। उस ध्यान योग का अभ्यास निरन्तर, सतत, उत्साह युक्त (धीर) चित्त से निश्चयपूर्वक करना चाहिये।
The understanding which, generate detachment-severance from the union-association with pain is called union-Yog, must be practiced with determination and without being loosing heart, bored.  
मनुष्य द्वारा इस दुःख रूपी संसार से अपना सम्बन्ध मान लेना उचित नहीं है। इससे जब संयोग ही नहीं तो वियोग कैसा ? शरीर और संसार का संयोग अस्थाई-अस्वभाविक है। यह संसार भी अनित्य-नश्वर है। आत्मा-परमात्मा, अनश्वर (नित्य, निरन्तर, चिरस्थाई) हैं, जबकि शरीर नश्वर-नष्टप्राय: है। संसार के साथ सम्बन्ध मानते ही चिरस्थाई के साथ सम्बन्ध नित्ययोग की विस्मृति हो जाती है। मनुष्य का इस संसार में जो दुःखों से संयोग हुआ है, उसका वियोग ही योग है। दुखों के संयोग का अभाव साध्य रूपी समता है, जिसका अभ्यास साधक-ध्यान योगी को दृढ़ निश्चय से, उकताए बिना निरन्तर सततरूप से करते रहना चाहिए। मानों तो दुःख-कष्ट है, अन्यथा नहीं। मनुष्य को यही समझना है कि बीमारी, परिस्थिति, दुःख-कष्ट केवल पापों का समाप्त-नष्ट होना मात्र हैं। अनेकानेक जन्मों के संचित पाप धीरे-धीरे समाप्त होते चले जायेंगे और साधक अपनी ध्यानावस्था में शनै-शनै परमात्मा में लीन होता चला जायेगा।    
The basic-root cause of worries-pains is one's assumption that this world belongs to him.  One considers himself to be part and partial of this world-nature. The moment this thought-ides creep into the mind, his association with the Ultimate-eternal is masked-hibernated. The soul is a component of the Almighty not the nature. The body is a component of the nature awarded to one to utilize it, as a tool to immerse in the eternal. The relationship (bond, ties) with the perishable world are temporary. The soul and the Supreme are for ever. The detachment of bonds with the worries-pains is Yog. Pains-worries are merely the embodiment of sins in previous births which when discarded-rejected, does not affect the practitioner. He knows that if they have come, they will vanish as well, sooner or later. He adopts a neutral stance-gesture towards them and bears them with ease, peacefully. This awards him equanimity with pleasure-pain. This equanimity is Yog. He has to continue with this practice with firm determination, as a routine, till he takes births. Slowly and gradually these sins will be over and he will be successful in attaining assimilation in the Almighty.
संकल्पप्रभवान् कामांस्-त्यक्त्वा सर्वानशेषतः। मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥6.24॥
शनैः शनैरुपरमेद्‌बुद्ध्या धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥6.25॥ 
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदा-त्मन्येव वशं नयेत्॥6.26॥ 
ध्यान योगी को चाहिए कि वो संकल्प  से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूरी तरह से छोड़ कर, मन द्वारा इन्द्रिय समूह को सम्यक् प्रकार से  रोककर, धीरे-धीरे बुद्धि को शाँत करते हुए, धैर्य पूर्वक मन को आत्मा में स्थित करते हुए, कुछ भी विचार न करे। स्थिर न रहने वाला, यह चंचल मन जिस-जिस शब्दादि विषय में विचरता है, उस-उस विषय से इसे हटाकर बार-बार एक परमात्मा में ही स्थित करे।
The Dhyan Yogi-practitioner should abandon-reject all fancy born desires-motives, which develop due to his pledges (vows, notions, conviction, conception) by restraining all the senses from all quarters, by the mind. Slowly and gradually, he should calm down his intelligence and fix the mind-gestures into the Almighty with patience-firmness, without deviating or making other considerations. He should restrain the wavering (fluctuating, unsteady mind), under control and fix it into meditation, concentration, thinking remembrances-memory of the God. 
मनुष्य अपने आसपास के वातावरण-परिदृश्य को देखकर अन्यानेक कामनाएँ, कल्पनाएँ, विचार, संकल्प करने लगता है। इन्द्रियाँ और मन यह सब देखकर भोग के लिए ललचाने लगते हैं। यहीं ध्यान योगी को नियंत्रण करके आसक्तियों का सर्वथा त्याग करना है। इस नियंत्रण का प्रयास करते-करते उसे विचलन-उकताहट होने लगती है।उसे इस अवस्था में  सांसारिक उपक्रमों के प्रति उदासीनता अख्तियार करनी है। इनकी उपेक्षा करने से मन धीरे-धीरे काबू में आने लगेगा। धैर्यपूर्वक मन काबू में  आने पर उसे परमात्म तत्व  में स्थापित करना कठिन नहीं होगा। संकल्प-विकल्प, साकार-निराकार, सभी में परमात्म तत्व विहित है, जिसे दृढ़ निश्चय से ही केवल और केवल परमात्मा में लगाना है। यह मन को एकाग्र करके विवेक पूर्वक सांसारिक परिदृश्य से हटाकर सहज भाव से संभव है। मन चंचल है तो क्या ? मनुष्य तो मनुष्य है। एक बार ठान ली सो ठान ली। फिर पीछे कदम कैसे और क्यों हटाना ?!
जब-जब प्रलोभन उत्त्पन्न हों, मन को बलपूर्वक साधकर ध्येय-परमात्मा में पुनर्स्थापित करो। जहाँ-जहाँ, जिस-जिस वस्तु में मन विचरण करे-जाये, उसमें परमात्मा को देखो और स्मरण करो। घबराओ मत। तुम उसे याद कर रहे हो तो वो भी तुन्हें याद कर रहा है। यदि तुम उससे मिलना चाह रहे हो तो, वो भी तुम से मिलने को लालायित-बेचैन है। सोच लो कि तुम केवल उसके और वो  तुम्हारा है। अन्य कल्पनाएँ-विचारों को बलपूर्वक दिमाङ्ग से बाहर निकल दो। इस दौरान सभी संकल्प-विकल्प छोड़ दो। सामने देखते हुए पलक क्षण भर को झपकाओ। साँस तेजी से बाहर निकालो, अन्दर खींचो और रोको। फिर धीरे-धीरे स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त करो। 
One looks around and grow uncontrolled desires. Senses and the mind becomes greedy and wish to attain them all, unrestricted. This is the stage where the role of Dhyan Yog appears. He has to restrain him self through strong will-power & firm determination. He has to reject all considerations, attachments, desires, false notions and concentrate him self into the Almighty. He starts boring and becomes hopeless-disheartened. But remember, to achieve something better; one has to do more labour. One's efforts have to be whole hearted, without deviation, without compromise, without losing heart-steam. 
There is a trick: Form an attitude of ignoring all of them. As soon one adopts "no concern" attitude for these, they too stop bothering him. Patience is a must. It takes time. Everything around is a creation of the Almighty; so look-feel-find HIM in all of them and the problem is solved. Now slowly, gradually and surely think of HIM and only HIM. Withdraw your self from everything around, from the scene and direct all efforts-energy into HIM alone. Just concentrate and see what happens?! 
A human is human! Once, he decides something to do-achieve; no power on earth can pull him back-retract. A firm decision will open the vistas leading to the Almighty.
When ever there is some temptation (greed, allurement, inducement), concentrate in the Almighty with might-strong will. Where ever and when ever the thoughts go, see the Almighty there in them all. Don't loss heart. If you are remembering HIM, HE too is bothering about you. If you wish to meet-see HIM, HE too reciprocate you. Imagine-consider that you belong to HIM and HE too is yours. Remove all other thought, ideas, forcefully out of the mind, imaginations, assumptions. Stop thinking of anything else. Straighten your sight, blink the eyes for a fraction of second, exhale the air, have a deep breath, hold the air inside the lungs for some time and gain normal situation-working gradually.
प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्। उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥6.27॥
जिसके सब पाप नष्ट हो गए हैं, जिसका रजोगुण शाँत हो गया है, जिसका मन सर्वथा शाँत और निर्मल है, ऐसे ब्रह्म रूप बने हुए योगी को निश्चित ही उत्तम (सात्विक) सुख प्राप्त होता है।
The Yogi who has assumed Brahm hood (Ultimate form) by losing all sins, who's lethargic, authoritarian tendencies and passions are lost (have become passive, quite, silent, inactive), who's mind is quite (peaceful, tranquil), is sure to attain-achieve the Satvik-virtuous comforts. 
पाप नष्ट होने का अभिप्राय है, तमोगुण से निवृति, प्रमाद और मोह का त्याग। रजोगुण लोभ, वासना, नवीन उद्यम की प्रवृति का प्रतीक है। दोनों ही स्थितियों में माँस, मदिरा, भोग की प्रधानता है और आत्म सन्तुष्टि का अभाव है। तृप्ति प्राप्त नहीं हुई है। सम्बन्ध, राग-द्वेष, कामना पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। ध्यान योगी इन सब विषय-वासनाओं पर विजय प्राप्त कर, मन की शान्ति हासिल कर चुका है। उसका मन अब भटकता नहीं है। वह निष्पाप है। उसे ब्रह्म रूप की प्राप्ति हो चुकी है। ऐसी अवस्था में स्वाभाविक है कि उसे सात्विक सुख की प्राप्ति हो जाये। 
Tamas is darkness. The Tamsik individual is lethargic-lazy and shirks work. He enjoy sleep, meat, wine, sex. He has all sorts of bonds with the world. He commits crime-sins, one after another. One with Rajsik attitude is full of ego, intolerance, arrogance, authoritarian attitude. This individual looks for new ventures, activities, projects and physical comforts-luxuries. Both these people love meat, wine, women and are never satisfied with what they posses. Desires, allurements, relations, motivations, always knock at their door. Dhyan Yogi has won all these tendencies by fixing his mind in the Ultimate. He experiences undefined supreme pleasure-bliss. He has no interest in sensuality-passions, worldly possessions. He is satisfied quite-tranquil. His mind does not roam in search of any thing new. He is virtuous (righteous, pious, honest, truthful) and sinless. He is icon to the creator-the Brahm. This state fills him with Satvik pleasure-relaxation. 
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शम-त्यन्तं सुखमश्नुते॥6.28॥ 
इस प्रकार अपने आपको निरंतर परमात्मा में लगाते हुए, वह निष्पाप योगी सुख पूर्वक परब्रह्म की अनुभूति करते हुए अति आनंद प्राप्त करता है। 
The Yogi who has freed himself from the clutches of sins by concentrating and meditating; always experiences the presence of the Almighty, attaining the Ultimate pleasure-bliss.
ध्यानावस्था में योगी अपने स्वरूप में स्थित होकर निरंतर परमात्मा में लीन होकर अपना अभ्यास बनाये रखता है। इससे वह ममता-अहंता रहित हो जाता है, जिसकी परिणति पापों से मुक्ति में होती है। परमात्मा में मन लगाने से, जड़ता से मुक्ति मिलती है। सगुण प्रभु में तल्लीन होने से संसार स्वतः ही छूट जाता है। मनुष्य के अहंकार का नाश हो जाता है। इस अवस्था में योगी को परम सुख (अत्यंत सुख, आत्यंतिक सुख) की अनुभूति होती है। यह स्थिति परमात्म तत्व की प्राप्ति की सूचक है। 
During the state of meditation-trans, the Yogi-practitioner dissolves-immerse himself in the Almighty. He maintains this practice and perform this as a routine-regularly. His attachments, connections, affections with the world are lost-disconnected. A state is achieved, when he becomes sinless, pious, pure, unsmeared. Concentration-meditation, leads to penetration into the Almighty and freedom from static world. The devotee observes the God with characteristic features. He is deeply involved-immersed in him. His ego is lost. He experiences bliss. This is the state which indicates his realisation of the gist (nectar, extract of the Ultimate, Eternal).
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥6.29॥ 
सब जगह अपने स्वरूप को देखने वाला, ध्यान योग से युक्त अन्तःकरण वाला साँख्य योगी, अपने स्वरूप को  सम्पूर्ण प्रणियों में स्थित देखता है और सम्पूर्ण प्राणियों को अपने स्वरूप में देखता है। 
The Sankhy Yogi who possess Dhyan Yog, observes (sees, finds, identifies) all living organisms-creatures in him and perceives him self in them. 
जिस प्रकार मनुष्य सोने से बने गहनों में केवल सोने को; जलाशय, समुद्र, नदी आदि में केवल पानी को देखता है, उसी प्रकार ध्यान योग से युक्त एक साँख्य योगी नाना प्रकार की वस्तओं और प्राणियों में स्वयं को पाता है। ध्यान योग का अभ्यास करते हुए उसका अन्तःकरण पूर्णरूप से अपने स्वरूप में केंद्रित हो गया है। इस अवस्था में वह अपने अन्तःकरण से भी अलग हो जाता है। संसार परिवर्तनशील है और इसका परिवेश निरन्तर बदलता रहता है। इन सबमें योगी सत्ता रूप से परिवर्तनशील  स्वरूप को ही देखता है। उसकी सत्ता तो प्राणियों में है, मगर उनकी सत्ता उसमें  नहीं है। व्यवहार में प्रत्येक प्राणी के साथ बर्ताव अलग होते हुए भी समदर्शी योगी को स्थिति एकरूप ही नजर आती है। 
The Dhyan Yogi perceives himself in each and every object, creature like the presence of water in ponds, lakes, ocean and gold in jewellery. The practice of Dhyan Yog has enabled him to concentrate only over the common component present in  himself and the rest of the world. This is the stage where his inner self too is separated from him self. The world is experiencing change continuously, but the Yogi only perceives the unchanging self in it. He identifies himself with the others but they do not have their identity in him. In practice his behavior-interaction with each one of them may be different but he has attained equanimity in all of them.
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति। तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥6.30॥ 
जो भक्त सब में मुझे देखता है और मुझ में सबको देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और मेरे लिए वह अदृश्य नहीं होता।
The devotee-practitioner of Yog who finds-sees Me in every one and sees-observes everyone in Me, is always in my sight and I am also in his sight.
जो व्यक्ति-भक्त हर काल, वस्तु, संसार, परिदृश्य, व्यक्ति में प्रभु को देखता है, प्रभु भी उस साधक को हर वक्त निहारते रहते हैं, उसका ध्यान रखते हैं। जो भक्त हर वक्त, हर घड़ी परमात्मा को देखता-खोजता-ढूँढ़ता रहता है, परमात्मा उससे छिपने का प्रयास नहीं करते। ऐसे व्यक्ति को भगवान् भी सब जगह देखते हैं। जो मालिक के शरणागत है, उसे वो आश्रय अवश्य प्रदान करते हैं। जो व्यक्ति भगवान् से विमुख है, संसार में आसक्त है, उसके लिए परमात्मा अदृश्य ही हैं। जिसके दिल में मालिक के लिए भाव नहीं है, उसके लिए वो अदृश्य ही हैं। वे सभी प्राणियों में समान भाव से उपस्थित हैं। न तो कोई उनका द्वेषी है और न कोई प्रिय। जो भक्तिभाव से उनका भजन, स्मरण, ध्यान करता है, उसके वे अपने हैं और वो उनका। 
The Almighty always keep a protective close watch over his devotees, who finds-identifies him in every phase of time, good, world, scene-sight. The Almighty does not hide him self from the devotee who is always chasing, searching, tracing, following HIM. Such a person do find (see, observe, perceive) the God everywhere and in every thing. One who seek shelter (asylum, refuse) under the Almighty is obliged by him. For one, who is always (indifferent, averse, atheist) to him, attached with the world, for him the Almighty is out of sight-invisible. One who has no place for the God in his heart, for him the God is invisible. He is present in all creatures with the same feelings. None is his enemy or favourite. One who remembers HIM, prays to HIM, meditate-concentrate in HIM, prostrate before HIM, HE is always with him. HE belongs to that devotee.
सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः। सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥6.31॥ 
परमात्मा में एकत्व भाव से स्थित हुआ जो भक्तियोगी, सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित परमात्मा का भजन करता है, वह सब प्रकार से कर्म हुए भी, निरन्तर परमात्मा  में स्थित है।
The Bhakti Yogi who has immersed in the Almighty, who prays to the Almighty dwelling in each and every creature, is united with the Almighty, in spite of doing all his Varnashram Dharm (Karm, duties).
सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित परमात्मा की भक्त के साथ अत्यधिक प्रेमवश अभिन्नता हो गई है। भक्त का अहंम् नष्ट हो चुका है। जिस प्रकार दो शरीर होते हुए भी दो मित्र अथवा पति-पत्नी एक प्राण-अन्तरंग हो जाते हैं, उसी प्रकार भक्त और भगवान् भी एक हो गए हैं। यह सम्पूर्ण, चराचर जगत भगवत्स्वरूप ही है, यह मानना उसका भजन ही है। जिस प्रकार गंगाजल से माँ गंगा की पूजा की जाती है, उसी प्रकार कर्मों के द्वारा उस सृष्टि कर्ता की पूजा की जाती है। सृष्टि के पहले, सृष्टि के समय और सृष्टि के बाद भी, परमात्मा प्रत्येक कण-प्राणी में विद्यमान है। परमात्मा से एकत्व होने पर भक्त सोते-जागते, उठते-बैठते, खाते-पीते, जो भी क्रिया-कलाप करता है, वह परमात्मा में ही स्थित होकर करता है। अन्य सभी प्राणी भी यद्यपि परमात्मा में ही निवास करते हैं, तथापि उनके ह्रदय में अहंता-ममता होने से वे परमात्मा से विमुख हैं। 
Extreme love, affection & devotion has merged the devotee and the Almighty into one entity. They are inseparable. The devotee has lost his ego. He is close to the Almighty, like the two close friends or the husband & wife who have immersed into each other. One consider every particle and creature to be Eternal creation. The Almighty was present before evolution, HE created the world and still maintains it. HE was present in all cosmic era. One who perform his Varnashram duties with devotion, is in fact praying HIM all the time. This is icon to offering prayers to Maa Ganga with Ganga Jal. With the loss of identity into the Almighty, all his actions are icon to being performed by HIM only. Other creatures also are components of HIM, but they find attachment in the worldly affairs, making the distinction clear.
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन। सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥6.32॥
हे अर्जुन! जो भक्त-योगी अपने शरीर की उपमा से सब जगह मुझे समान देखता है और सुख या दुःख को भी समान देखता है, वह परम योगी  माना गया है।
The devotee-Yogi who perceives the Almighty by comparing his presence in his body everywhere and has developed equanimity in pleasure and pain is deemed to be a perfect Yogi. 
कोई भी व्यक्ति, कभी भी यह नहीं चाहेगा कि उसके शरीर में कहीं पीड़ा हो। वह हर अंग को ठीक कार्य करते हुए देखना चाहता है। सभी प्राणियों में भगवान् को देखने वाला भक्त सभी प्राणियों को समान रूप से आनंदित और कार्यरत देखना चाहता है। उसकी चेष्टा रहती है कि सभी को सर्वत्र आराम, सुख, आनन्द मिले। भक्त-योगी अपने कष्ट, दर्द, बीमारी, दुःख, परेशानी की  उपेक्षा, अपने अन्दर-अन्तःकरण में पीड़ा सहने की सामर्थ्य होने से, भले ही कर दे, परन्तु वो अन्य किसी को भी कष्ट होने पर उसके निवारण का उपाय-प्रयास अवश्य करेगा। यह स्थिति उसे उच्च कोटि का योगी बन देती है। 
None in this world would like to experience pain, trouble, torture over his body. He want his body to function perfectly. The Yogi has developed equanimity with all creatures of this world and considers them to be of his own, being a component of the Almighty. He deals with them according to Varnashram Dharm, situation-occasion.He desires to see that all of them are happy and enjoying. He may not treat his body ailments due to the neutrality developed by him in his body or the strength to tolerate it, but he feels the pains of the other organisms and tries to help & rectify them. This tendency makes him a Yogi of the highest level (class, order).
अर्जुन उवाच :- 
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन। एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥6.33॥ 
अर्जुन कहते हैं :- हे मधुसूदन! आपने समतापूर्वक जो यह योग कहा है, मन की चंचलता के कारण मैं इस योग की  स्थिर स्थिति को नहीं देख पाता हूँ।
Arjun said :- O the destroyer of demon Madhu! The Yog, taught (explained, preached) by you with equanimity can not be perceived (grasped, understood) by me, due to the flirtatious-restlessness of mind. 
मनुष्य के लिए आवश्यक है कि वह प्राप्ति-अप्राप्ति को लेकर चित्त में समता उत्पन्न करे। यह समता उसके लिए कल्याण कारी है। जब मनुष्य लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु को समान समझने लगता है, उसे पाप नहीं लगता। जब मनुष्य की पाप में सम बुद्धि रहती है, तो भी उसे पाप नहीं लगता। समबुद्धि से किये गए कार्यों से बन्धन नहीं होता। जो  व्यक्ति कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्य-कर्म करता है, वो सन्यासी और योगी है। कर्मफल त्याग की सिद्धि समता है। ध्यान योग समता प्रदायक है। कर्मयोग से समता प्राप्त करना सरल है। मन की चंचलता के कारण मनुष्य के द्वारा ध्यान योग से समता प्राप्त करना, अर्जुन को मुश्किल लगा। 
It is essential for a devotee-practitioner to develop equanimity in his gestures-acts & practice. Equanimity is beneficial for humans for their welfare. The stage when an individual adopts a neutral stance towards profit-loss, victory-defeat, pleasure-pain, death-birth, he become sinless. He becomes sinless, when he perform without the motive of gain, reward, out put, reward, favourable result. He attains sainthood leading to Assimilation in the God. Rejection of the fruits of endeavours too is equanimity. Meditation, concentration of mind in the Ultimate too is equanimity. Arjun found the process of attaining equanimity through concentration very difficult-hazardous, due to flirtatious mind and easy to have it through the deeds without attachment.
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्‌दृढम्।तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥6.34॥ 
क्योंकि हे श्री कृष्ण! (वास्तव में, सचमुच) यह मन बड़ा चंचल, प्रमथनशील-क्षोभ युक्त स्वभाव वाला, बड़ा दृढ़ और बलवान है; इसलिए उसका वश में करना, मैं वायु को रोकने की भाँति अत्यन्त कठिन मानता हूँ।
Hey Krashn, since the mind is verily, (really, indeed, in reality, virtually, practically, actually, factually, in reality, in sooth) restless, turbulent, strong and obstinate. Therefore, I find its really very difficult to control like the wind. 
अर्जुन ने भगवान् श्री कृष्ण से प्रार्थना की कि वो ही कृपा करके मन को अपने में लगा लें। मन चंचल, प्रमाथि- वाला, जिद्दी और बलवान है। काम-वासना, कामना के निवास स्थलों में से एक यह मन भी है। अन्य इन्द्रियाँ भी प्रमथि हैं। शास्त्रों  में तो मन को ही मोक्ष और बंधन का कारण माना है। काम को वश में करने से चंचलता बाधक नहीं रहती। देहाभिमान दूर होने से परमात्म तत्व की प्राप्ति होती है। परमात्म तत्व मन की अस्थिरता को दूर करता है। ज्ञान, ध्यान, भक्ति चंचलता को नष्ट करते हैं। शास्त्रों में मन की तुलना वायु से की गई है; जिसे काबू में करना कठिन है। 
Arjun requested Bhagwan Shri Krashn for a favour. He said that it will be very kind of him if he him self mould (cast, direct) the mind towards him. The brain in fact is very flirtatious. It deviates in all possible directions, in search of pleasure through sensuality, passions. He compared it with the air which is really very difficult to control. Brain is the seat of sexuality, lust, desires, passions, pleasures. Scriptures say that its the brain which is responsible for directing one to Salvation or attachments. Ego is yet another factor, which is also a function of the brain. One who has earned the gist (nectar, elixir) of the Ultimate is sure to tide over all deviations (destruction, fluctuations, flirtation). It rejects all disturbing factors and puts the brain on the right track i.e., towards the Almighty. Enlightenment, meditation-analysis & synthesis, devotion are the tools which provide stability to the brain.
श्रीभगवानुवाच  :- 
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥6.35॥ 
श्री भगवान् बोले कि हे महाबाहो! तुम्हारा यह कहना सही है कि यह मन निःसंदेह बड़ा चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में हो जाता है।
Bhagwan Shri Krashn agreed with Arjun that the mind-mood (psyche, gestures) was really very flirtatious and it was very difficult to control it. But it could be controlled through practice, indifference, restraint and detachment i.e., asceticism.
भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को महाबाहो इसलिए कहा क्योंकि उनके जैसे व्यक्ति के लिए मन को काबू में करना एक साधारण सी बात थी। एक धैर्यवान शूरवीर के लिए यह कोई कठिन कार्य नहीं था। कौन्तेय इसलिए कहा क्योंकि उनकी माता कुन्ती बहुत  विरक्त महिला थीं। अर्जुन में निरन्तर कठोर अभ्यास के आदत थी। उन्हें अपने लक्ष्य के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता था। 
Bhawan Shri Krashn addressed Arjun as Maha Baho (mighty warrior)  to remind him of his faculties of restraint, practice and endeavour. It was not a difficult task for Arjun to bring his mind, faculties (mood, gestures) under control. He was one of greatest warriors of his times. He attained this through rigorous, continuous practice and restraint. When Bhagwan Shri Krashn addressed him as Kountey, it clearly reminded him of his mother who had lived the life of a recluse, ascetic in spite of being with them. Arjun always concentrated over his aim-target, neglecting every thing around. One who wish to establish command over his faculties has to first restraint him self and then aim Salvation.
Ensure that the aim-target is clear. There is not confusion or alternatives. Channelise all energy into it with full confidence and faith in God. Any thought or idea which creep into meditation has to be pulled out with determination and practice. Find the Almighty in each and every thing which haunt the concentration. Ignore all other ideas and continue.
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥6.36॥
जिसका मन पूरा वश में नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है और उपाय पूर्वक यत्न करने वाले तथा वश में किए हुए मन वाले साधक द्वारा उसका प्राप्त होना सहज है, यह मेरा मत है, भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा।
One who has not controlled his mind completely, will find it difficult to attain Yog-assimilation in the Almighty. Its easy-convenient for one who has made sincere efforts  to control it and the one who has controlled it, will find it easy to avail it, this is the opinion of Bhagwan Shri Krashn.  
ध्यान योगी के लिए मन को वश में करना नितान्त आवश्यक है। साधक के लिए मन, इन्द्रिय संयम अति आवश्यक है। विषय भोगों में राग उसके लिए निषिद्ध है। जो साधक उपयोगी आहार-विहार, सोना-जागना, आदि नियमों का पालन तत्परता और दृढ़ता पूर्वक करता है, उसके लिए सिद्धि सरल है। परमात्म तत्व को जानना, समझना, समर्पण, इच्छा का त्याग, मन की शुद्धि में सहायक हैं। एकाग्रता और राग का अभाव परमात्म तत्व प्रदायक है। व्यवहार में साधक यह सुनिश्चित करे कि उसका ध्यान-मन किसी अन्य-ओर या किसी अन्यथा (अतिरिक्त वस्तु, चिंतन, प्रलोभन, दिशा) में न फंसे, क्योंकि यह ध्यान भटकने वाला और पाप पैदा करने वाला है। मन का निग्रह अभ्यास और वैराग्य से संभव है। चित्तवृत्तियों का निरोध अभ्यास से संभव है।
Its essential for the Dhyan Yogi-practitioner to control his mind from deviations (flirtations, overtures). Controlling the sense organs (sensuality, passions), is equally important. Attachment to comforts-passions is a taboo for him. The practitioner who follow strict rules-schedule regarding  life, can easily achieve control over his gestures (moods, thoughts, ideas). Understanding the gist of the Almighty helps him in restraining one self. Concentration and detachment helps him understand the gist of the Ultimate. The devotee should ascertain that he does not owe anything to any one, which is another cause of deviations from concentration leading to sins. Controlling the brain is possible through restraint and practice. Control over swinging of the brain  too is easy through restraint & practice.
अर्जुन उवाच :-
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः। अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥6.37॥
अर्जुन कहते हैं :- हे श्रीकृष्ण! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु उसके अभ्यास से रहित है, इस कारण योग से विचलित मन वाला साधक योग की सिद्धि को न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है ?
Arjun requested Bhagwan Shri Krashn to explain the impact of lack of practice with the means of Salvation, over the devotee, practitioner, Yogi, ascetic. 
ऐसा साधक जो जप-तप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि में रूचि और श्रद्धा रखता है, परन्तु अन्तःकरण और बहिःकरण वश में न होने से साधन में शिथिल-तत्पर नहीं है; विषयासक्ति, असावधानी के कारण अन्तकाल में उसकी गति क्या होती है ? साधक पापों से तो दूर हो गया; अतः नर्क में तो जायेगा नहीं, स्वर्ग की कामना उसने की नहीं, तो फिर अंत समय पर परमात्मा की याद न रहने अथवा कुछ और चिंतन करने से उसकी क्या गति होगी? ऐसा माना जाता है कि साधन भ्रष्ट होने से, मन के विचलित होने से, सांसारिक आसक्ति रहने से पुनर्जन्म होता है।  
There are the practitioners of different categories, faiths, paths, who fail to continue their endeavour to achieve assimilation in the Almighty due to lack of concentration, practice, attachment with the perishable world, viral thoughts etc. and are distracted. They fail to remember the God when their end comes. Due to the impact faith in the God, asceticism, Yog, enlightenment, virtuous company, recitation of HIS names, they will be spared from the hells. They did not desire for the heaven. So, they may get rebirth to complete the task they assigned-selected for them selves.
कच्चिन्नोभयविभ्रष्ट-श्छिन्नाभ्रमिव नश्यति। अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥6.38॥ 
हे महाबाहो! संसार के आश्रय से रहित भगवत्प्राप्ति के मार्ग में मोहित अर्थात विचलित, इस प्रकार दोनों ओर से भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न-भिन्न बादल की भाँति नष्ट तो नहीं हो जाता ?
Does not one, who has distracted from the eternal path of worshiping the Almighty and this world simultaneously; vanish like a cloud into pieces. 
साधक-योगी ने भगवत प्राप्ति संसार हेतु के सुख, ऐशो-आराम, आदर-सत्कार, यश-प्रतिष्ठा, की कामना को त्याग दिया है। किसी कारण, विघ्न, परिस्थिति वश उसका ध्यान बँट गया और अन्ततोगत्वा वह विचलित हो गया। उसे परमात्मा की विस्मृति हो गई। इस प्रकार वह दोनों से ही भ्रष्ट हो गया। सामान्यतया बादल ऊँचे पहाड़ पर जाकर बरसता है। हवा के झोंके बादल की दिशा में परिवर्तन करने के साथ-साथ, उससे कहीं कम या कहीं ज्यादा बारिश करवा देते हैं। इस प्रकार बादल गंतव्य तक नहीं पहुँच पाता। परन्तु उसका मूल उद्देश्य बरसना है जो कि पूरा हो गया। 
The Yogi-practitioner has rejected the comforts, attractions, allurements of the world. He does not crave for respect, fame, honour any more. He is on the eternal path of assimilation in the Almighty-Liberation. Hurdles, distractions, interference, troubles, difficulties might force him to stop or discontinue in between. His determination is shaken, but his faith is not lost. The goal of the cloud is to reach the high mountain peaks. But in reality, the clouds serve the purpose of raining all over the land, terrains; which is accomplished. The devotee should not be disheartened and rerun.
सन्यासी, साधक, योगी आवश्यकता महसूस होने पर स्वयं को जन कल्याण के लिए प्रस्तुत कर देता है, भले ही उसे अपनी साधना में विराम लगाना पड़े। कार्य संपादन के उपरान्त वो फिर से तपस्या-साधना शुरू कर देता है। उसके लिए भक्ति, जन कल्याण महत्वपूर्ण हैं न कि मुक्ति-मोक्ष में लगने वाला समय। इस कारण वह पुनर्जन्म में भी जन कल्याण से पीछे नहीं हटता, क्योंकि उसका भक्ति भाव अगले जन्म में भी साथ जाता है। अष्टावक्र जी की मान्यता है कि जनकल्याण हेतु साधक स्वयं को व्यक्त-प्रस्तुत कर सकता है। 
The ascetic, recluse, Yogi comes forward for helping the people in distress. He do not care if he has to give a temporary break to his meditation-dedication, to the service of the Almighty, to help the people in distress. He prefer to restart his Tapasya again, once the social welfare-deed is complete. He do not mind devoting time or repeated births to the service of man kind, since the virtuousness goes along with him to the next births. Ashtawakr Ji has said that for social cause, the ascetic-Yogi may reveal him self from the hiding.
एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः। त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥6.39॥ 
हे श्रीकृष्ण! मेरे इस संशय को पूरी तरह से दूर करने में आप योग्य हैं, क्योंकि आपके अतिरिक्त दूसरा कोई इस संशय को दूर करने में समर्थ नहीं है।
Arjun said that only the Almighty Bhagwan Shri Krashn could resolve his query, since none was capable of explaining this intricate situation. 
अर्जुन का संदेह-संशय उस अवस्था से है, जिसमें साधक विचलित होने से पड़ गया है। उन्हें भगवान् श्री कृष्ण के अतिरिक्त कोई व्यक्ति सक्षम नज़र नहीं आता, जो उनकी दुविधा को दूर कर सके। शास्त्र की व्याख्या बड़ी कठिन-जटिल है और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति की व्याख्या में भी अंतर आ जाता है। केवल परमात्मा ही सही अर्थ बताने में सक्षम हैं, क्योंकि उनका कोई स्वार्थ-भेद नहीं है। परमात्मा को व्यक्ति के आवागमन का पूरा ज्ञान है। अतः योगभ्रष्ट व्यक्ति का भविष्य में क्या होना है, यह तो अन्तर्यामी भगवान् श्री कृष्ण सहज ही बता सकते हैं। 
Arjun is questioning the Almighty about that state (intricate situation, circumstances)  in which a practitioner falls, the moment his ascetic practices are hindered. He do not find any one else capable of answering the intricate query and bring him out of the confusion. As a matter of fact, interpretation of scriptures differs from person to person, depending upon his capabilities, knowledge, mental state, reasoning, prudence etc. The Almighty Bhagwan Shri Krashn is the only person on this earth, who could resolve his doubts, since he do not discriminate-differentiate between organisms and he has no grudge with any one. He is the only one who can see through all dimensions of time. So, its quite easy for him to explain what is going to happen to the Yogi, who has been disturbed or who has taken a chance for social welfare in between.
श्रीभगवानुवाच :-
पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। न हि कल्याणकृत्कश्चिद्‌ दुर्गतिं तात गच्छति॥6.40॥ 
श्री भगवान कहते हैं :- हे पार्थ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही। क्योंकि हे प्रिय! कल्याणकारी काम करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता।
The Almighty Shri Krashn assured Arjun that one who is dedicated to the welfare of man kind, never falls down in hells and remains intact in this abode and the other abodes. 
भगवान् कृष्ण ने अर्जुन तो तात (अत्यंत, अत्यधिक प्रिय) सम्बोधन से पुकारा। भगवान् अर्जुन को जब तात कहकर सम्बोधित करते है तो वे यह जाहिर करते हैं कि उन्हें अपने भक्त बहुत प्रिय हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि साधक द्वारा अर्जित योग का क्षय कभी भी नहीं होता। किसी कारण वश यदि उसे निम्न योनियों में भी जाना पड़ता है, तो भी उनसे छूटने के बाद भी उसका योगबल स्थिर बना रहता है। जो सन्मार्ग पर चल पड़ा वो प्रभु का हो गया। देर-सबेर उसे फिर से परमात्मा की स्मृति हो ही जाती है और वो पुनः अपने प्रयास में जुट जाता है। जनकल्याण, भक्ति भाव  के संस्कार एक बार बन जायें तो मनुष्य का साथ जन्म जन्मांतरों तक बनाये रखते हैं, जब तक कि उसे मोक्ष प्राप्त न हो जाये। 
The Almighty addressed Arjun as Parth and Tat, which indicates that he loved him a lot. It shows that the Almighty never leaves the devotee in the lurch. He is always with the practitioner and keeps his earning in the form of Yog intact. In case if one has to take birth in some other lower species due to his immediate attachments-causes, he is allowed to recover it, like the king Bharat who was born as a deer and his memory remained intact, helping him in discarding it and regain his path of renunciation. King Bharat is known for deeds for the benefit of his countrymen. India got its name from him, millions of years ago. One of kings in Chandr Vansh also had the name as Bharat (Virath, known as Bhardwaj as well, but not Bhrdwaj Rishi). He too was dedicated to serve his countrymen and ruled for more than 27,500 years. Once the Yogi comes back to his practice, he is welcome to the club-fold of renunciators. Once the virtues arise in him as a social benefactor-devotee, they continues in him thereafter as well, in next incarnations till he is able to attain Salvation.
प्राप्य पुण्यकृतां लोकानु-षित्वा शाश्वतीः समाः। शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥6.41॥
योग भ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर, उनमें बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्री मान पुरुषों के घर में जन्म लेता है।
Having attained to the abodes-heavens of the righteous and having dwelt there for eternal years, he who failed in Yog is reborn in a house of the pure and wealthy. 
जो साधक अन्तकाल में किसी वजह से विचलित हो भी गया, तो भी उसे स्वर्गादि लोक तो प्राप्त होते ही हैं। उसे वहाँ रहकर भोगों से अरुचि हो जाती है; क्योंकि उसका योग साधना के पीछे, भोग-कामना का उद्देश्य नहीं था। वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु, फिर से धरा पर उच्च, पवित्र कुल में जन्म ग्रहण करता है। उसकी अथक यात्रा फिर से शुरू हो जाती है।योगभ्रष्ट का उच्च लोकों में जाना योग का प्रभाव है। वो वहाँ भोगों में नहीं फँस सकता। हकीकत में देखा जाये तो यह साँप और सीढ़ी के खेल जैसा लगता है। कोई योगी पहले प्रयास में और कोई अन्यानेक प्रयासों में, अपनी मंजिल पा ही लेता है। स्वर्गादि में भोग के उद्देश्य से यज्ञ, हवन, अग्निहोत्र आदि करने वाले भी पहुँचते हैं। परन्तु उनके पुण्य क्षीण होते ही, उन्हें पुनः पृथ्वी पर आना ही पड़ता है, क्योंकि भोग के लिए उनका उच्च लोकों में जाना कर्मजन्य है। अतः मनुष्य, साधक-योगी को दृढ़ निश्चय के साथ अपने सत्प्रयास कायम रखने चाहिए। कभी पूर्व जन्म के किसी अनुचित कर्म की वजह से बाधा आ भी जाये, तो वह भी भगवत् कृपा है, जो उसे तपा-निखार कर भगवत्प्राप्ति कराती है। 
The practitioner of Yog who could not complete his eternal journey, should neither be disappointed nor perturbed, since its due to his some deed in previous life. Let it pass smoothly. Keep on with the ascetic practice-Yog, without losing heart. Two possibilities are there after the death. He may be sent to some higher abode-heaven for a limited period to experience comforts, joys, sensuality, passions which are not his immediate goal. He discarded them long ago to seek asylum under the Almighty. So, he will be sent back to accomplish his goal. Here again, his pious deeds-virtues in previous births will come forward to help him. The Almighty has awarded him yet another chance to cleanse him self. He becomes as clean as gold, burnt in fire repeatedly. The other possibility is his rebirth in some pious (virtuous-righteous) family, so that he advances further in his ascetic faculties, leading to the Ultimate, ultimately. As a matter of fact, its the game of ladder and snake. One may reach the Almighty straight in one single attempt by accumulating his virtuous deeds or he may clear the hurdles one after another. If he is determined no hurdle can stop him in attaining his goal. There are a few who perform Yagy, Hawan, Agnihotr, charity, social service-welfare with the motive of attaining Swarg-heaven. They will reach there, but will be sent back as soon as their accumulated pious deeds are spent-en cashed. 
मोक्ष मार्ग का अनुयायी-साधक कामेच्छा-कामना-वासना के कारण पथभ्रष्ट होकर-भटक कर, यदि तपस्या, साधना, योग से विचलित हो जाता है और उसे छोड़ देता है तो भी प्रभु उसे स्वर्ग भेज हैं; ताकि उसे इन  सबसे तुष्टि-तृप्ति प्राप्त हो जाये और वो इनके प्रति बेरुखा, उदासीन हो जाये अथवा इनसे सर्वथा दूर हो जाये और पुनर्जन्म लेने पर ये दोष उसे परेशान-विचलित न कर पायें। 
The Yogi who has deviated from the path of Salvation due to sexuality, passions, lust, flirtations, sensuality is sent to the heaven by the Almighty, so that his thirst-hunger are satisfied-quenched and he no more chase them. Once contemplation-satisfaction comes to him, he devote him self to ascetic practices, Yog, meditation whole heartedly with full concentration-attention, in his new incarnation after returning to earth, again.
The Mughal called Akbar was an ascetic-Brahmn in his previous birth. By mistake he swallowed cow's hair along with milk, which led to his birth as a Muslim. He attained heaven thereafter in spite of being a lascivious and Muslim. He may be granted another chance to achieve Moksh-Salvation.
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥6.42॥
अथवा वैराग्यवान-योग भ्रष्ट पुरुष उन लोकों में न जाकर ज्ञानवान योगियों के ही कुल में जन्म लेता है जो  कि निःसंदेह ही अत्यन्त दुर्लभ है।
Else, he is born in the family of wise, learned, enlightened Yogis which is certainly rare and fortunate. 
वह साधक जिसकी वासना शांत नहीं हुई थी वो स्वर्ग पहुँचकर वापस श्रीमान-श्रीमंत के घर में जन्म लेता है, परन्तु जो वैरागी था, वासना से दूर था, वो योगभ्रष्ट तो स्वर्ग में न जाकर सीधे ही श्रेष्ठ ज्ञानी और जीवन मुक्त योगियों के परिवार-कुल में जन्म प्राप्त कर अपना अभ्यास जारी रखता है। यह जन्म अति दुर्लभ है। यह संग दुर्लभ, अगम्य और अमोध है। यह कभी निष्फल नहीं होता।

The practitioner of Yog-asceticism who was not satisfied with his sensuality (passions, sexuality, lust and was distracted would go to heaven and take birth on earth in well to do virtuous families. The Yogi-ascetic who was composed and remained aloof from allurements, rejected passions, sexuality, sensuality and do not go to the heaven. Instead he gets birth directly in the family of enlightened, learned, Yogis and keeps, continues, maintains his endeavours to assimilate in the Ultimate. This birth helps him in his endeavours since he is guided, helped in reaching his ultimate goal. The company of ascetics, Yogis, meditators is really rarest of rare and shows that he is very fortunate. Dev Rishi Narad has said that this association is incohabitable, inaccessible, incomprehensible, unattainable and impenetrable never goes fruitless.


तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्। यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥6.43॥ 
हे कुरुनन्दन! वहाँ पर उसे पहले मनुष्य जन्म की अर्जित योग शक्ति, अनायास ही प्राप्त हो जाती है। उसकी सहायता से वह पुनः साधन की सिद्धि में विशेषता से जुट जाता है और पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है। 
O the descendant of  Kuru! In his new incarnation as a human being, the distracted ascetic obtains his earned-accumulated knowledge of Yog and ascetic practices spontaneously (without effort, involuntarily, ease) and he strives with more confidence than before for perfection. उसकी पारमार्थिक पूँजी योगभ्रष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती। उसकी आत्मा में ध्यान-योग के जो संस्कार पड़े थे, वो पूर्ववत बने रहते हैं। वैराग्यवान साधक सीधे ही जीवन्मुक्त महापुरुषों, तत्वज्ञ योगियों के कुल में जन्म लेता है, जहाँ उसे अनायास ही पूर्वजन्म की साधना संपत्ति मिल जाती है। उसे वह बुद्धि संयोग प्राप्त होता है, जो उसे योग साधना के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।
The efforts made by him for social welfare, Yogic-ascetic practice, meditation previously are not lost. Their impact remains over his soul. He is born with the virtues in the family of the detached, who are well versed with the gist of the Ultimate. He obtains the enlightenment he earned in his previous births. He has the chance to be with the intellectuals who will push him forward into Yogic tradition and practice leading to Salvation. 
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥6.44॥ 
वह श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट मनुष्य, भोगों के पराधीन होता हुआ भी, उस पहले मनुष्य जन्म में किये हुए अभ्यास-साधन के कारण ही परमात्मा की ओर खिंच जाता है, क्योंकि योग-समबुद्धि समता का जिज्ञासु भी, वेद में कहे हुए सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर जाता है।
The distracted Yogi of the previous births, who has obtained birth in the family of learned-enlightened, is dragged towards the Almighty due to the practice of Yog in earlier births, since the equanimity attained by him helps in crossing the barriers of performances done with the motive of rewards, results, benefits. 
योगियों के कुल में जन्म लेने से संगत उसके पूर्व जन्म के योग-समता के संस्कारों को जाग्रत कर देता है और वह अनजाने में ही परमात्म तत्व की ओर खिंचा चला जाता है। स्वर्ग में रहकर भोगों के प्रति जो उसका लगाव-भूख थी, वह मिट जाती है। वेदों का जिज्ञासु भी सकाम कर्मों का अतिक्रमण कर जाता है तो फिर योगभ्रष्ट के लिए यह कतई कठिन नहीं है कि वह पुनः योग में प्रवत्त न हो जाये। उसका उद्धार होगा और पतन नहीं होगा, यह भी निश्चित है। 
Birth of the distracted Yogi in the family of enlightened ensures that he is again blessed with the practice of Yog and equanimity. He has crossed the limit-barriers, which indulges him in the attainments of comforts, pleasures, passions through deeds-performances, described in the Veds. He is pulled towards the gist of the Ultimate (eternal, the Almighty). His span in the heaven provided him with some satisfaction towards passions, which are made available to him in this birth as well. But the family environment is sufficient to put him back on the right track of Salvation. His return to the fore of enlightened-Yogis ensures that he will not fall in the hells, as anticipated by Arjun. His previous ability-practice of Yog will definitely put him back on the right track.
प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥6.45॥ 
प्रयत्न पूर्वक अभ्यास करने वाला योगी पिछले अनेक जन्मों के संस्कारों से इसी जन्म में संसिद्ध हो, सभी पापों से रहित होकर शीघ्र ही परमगति को प्राप्त हो जाता है। 
The Yogi who make efforts to continue his practice of Yog-asceticism-meditation, due to the impact of many previous births, becomes sinless-pure and assimilate in the Almighty.
जो व्यक्ति तत्परता से निरन्तर योगाभ्यास में लगा है, वह भी पथभ्रष्ट होकर भी पुनः वेदों से ऊपर उठकर परमगति को प्राप्त कर सकता है। परमात्मतत्व और समता की चाहत उसे राग-द्वेष, हर्ष-शोक आदि द्वन्दों नहीं फँसने देती, क्योंकि वो योगी है। उसमें परमात्मा की ओर अग्रसर होने की उत्कण्ठा, लगन, उत्साह, तत्परता है जो कि नित्य प्रति बढ़ती रहती है। साधन के प्रति उसकी सजगता बनी रहती है। उसके अन्तःकरण के सब पाप नष्ट हो जाते हैं। भोग, संग्रह, मान सम्मान बड़ाई, आदि की इच्छा सर्वथा मिट जाती है। अनेकानेक जन्म लेकर उसने जो शुद्धि प्राप्त की है, वह सफल होने लगती है। इस अवस्था के प्राप्त होने पर बड़े से बड़ा दुःख उसे विचलित नहीं करता और वो आत्यन्तिक सुख को प्राप्त होता है।
अजामिल को भगवान् का नाम "नारायण" लेने से अनायास ही वैकुण्ठ की प्राप्ति हो गई, क्योंकि उसके पूर्वजन्म के संचित संस्कार मिटे नहीं थे।  
The person who is practicing Yog with full concentration-dedication, regains the right track of devotion to the Almighty and rises above the Veds i.e., crosses the barriers of efforts, performances, deeds to achieve Salvation. The desire for the understanding of the gist of the Almighty and equanimity tends to loss the feelings of enmity, anguish, envy, pleasure-sorrow etc., since he is a Yogi. His intense desire, penchant (diligence, tenacity) activeness goes on increasing day by day to assimilate in the God. He is very careful, cautious, keen towards the means, methods, procedures for practicing Yog-asceticism. All sins in his inner self, heart, soul vanishes. His needs for comforts, passions, sensuality, sexuality are satisfied (are over) for ever. The purity (virtuousness, piousness, righteousness), he has attained after practicing Yog in many-many births, have started paying off. He is not going to distract from the path any more. He is experiencing bliss-Parmanand and he is not distracted by the gravest pain. He is sure to achieve Liberation.
Ajamil-a learned & distinguished Brahmn was distracted just seeing a passionate pair of Bheel community-tribal with low virtues-morals, but his accumulated virtues in previous births earned him a birth in Vaekunth Lok just by saying Narayan at the time of breathing his last.  
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः। कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥6.46॥
योगी तपस्वियों, ज्ञानियों और सकामभाव से कर्म करने वालों से भी श्रेष्ठ है; इसलिए हे अर्जुन! तुम योगी हो जाओ।
Bhawan Shri Krashn directed Arjun to become a Yogi, since a Yogi is superior to ascetics-austerity observers, enlightened and those who perform with the desire of fruits (rewards, favourable results).
तपस्वी वो है जो ऋद्धि-सिद्धि पाने के लिए भूख-प्यास, धूप-ताप को सहता है। इन सकाम तपस्वियों से पारमार्थिक रूचि-ध्येय वाला योगी श्रेष्ठ है। शास्त्रों का ज्ञान रखने वाले ज्ञानी-विद्वान अगर सांसारिक भोग-ऐश्वर्य में रूचि रखते हैं तो उनसे एक योगी श्रेष्ठ है। उच्च लोकों में जाने की कामना से जो यज्ञ, पुण्य, दान, तीर्थ करता है तो उससे भी योगी श्रेष्ठ है। निष्काम योगी का ध्येय केवल और केवल परमात्मा है। भोग और योग मेल नहीं खाते। 
An ascetic tolerates thirst-hunger, hot-cold weather to obtain all sorts of luxuries. The Yogi who is committed to social-human welfare is definitely superior to the ascetics. The learned, scholar, philosopher who is desirous of comforts, pleasure, joy, passions is surely inferior to a determined Yogi who wish to assimilate in the eternal. The Yogi who is detached and does not crave for any thing expect for the God's love, is better than those who perform sacrifices, charity, pilgrimages, pious acts, just to attain higher abodes. Voluptuary tendencies and Yog do not coexist. 
योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना। श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥6.47॥
सभी योगियों में भी जो श्रद्धा वान भक्त-योगी मुझ में तल्लीन हुए मन से मुझ को निरन्तर भजता है, वह योगी मेरे मन में श्रेष्ठतम है।
Of all Yogis, one who is, full of reverence, worships ME with his inner self abiding in ME continuously, he is accepted by ME as the most befitting-above all. 
जड़ता से सम्बन्ध विच्छेद करने के लिए जो भी साधक कर्मयोग, साँख्ययोग, हठयोग, मन्त्रयोग, लययोग आदि के द्वारा अपने स्वरूप की प्राप्ति-अनुभव करने में जुटे हैं, वे योगी सकाम  तपस्वी, ज्ञानियों और कर्मियों से श्रेष्ठ हैं  तथा उनमें भी केवल परमात्मा से सम्बन्ध जोड़ने वाला ही श्रेष्ठ है। वह भगवान् के प्रति श्रद्धा, भक्ति और विश्वास के साथ भजन करने वाला है। मैं परमात्मा का हूँ और वो मेरे हैं; ऐसा विचार कर जब भक्त भजन करता है तो वो उनमें ही तल्लीन हो जाता है। संसार से विमुख होकर अपना उद्धार करने में लगा योगी युक्त श्रेणी में आता है। जो सगुण-निराकार की शरण ग्रहण करता है, वो युक्ततर है। परन्तु जो सगुण परमात्मा की शरण में है, वो युक्ततम है। युक्ततम होने पर कर्मयोग, ज्ञानयोग भक्तियोग आदि श्रद्धा पूर्वक भजन करने से ये सभी उसमें आ जाते हैं। वो कभी पथभ्रष्ट नहीं होगा। भक्ति योगी को सर्वश्रेष्ठ बताने का अभिप्राय यह है कि वो विकार हीन है। 
The practitioner who wish to devoid-detach himself of static-inertial perishable nature through the practice of Karm Yog, Sankhy Yog, Hath Yog, Mantr Yog, Lay Yog is superior to the ascetics, enlightened and dedicated performers and amongest them, one who is trying to establish relationship with the Almighty is best. He recites the prayers-verses in the honor of the Almighty due to his faith, devotion and dedication. He considers him self to be that of the Almighty and the Almighty to be of his own and develops rapport with HIM. One who has deserted-renounced the world is a good devotee of the primary segment-level. The other one who takes shelter-asylum under him is a better devotee of the middle segment-level. But one who is under the protection-shelter of the Almighty is the Ultimate devotee. He has all the capabilities of the Karm Yogi, Sankhy Yogi and the Bhakti Yogi. He will never be distracted since the Bhaktiyogi is pure, pious, virtuous, righteous and untainted-unsmeared.
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे आत्मसंयमयोगो नाम षष्ठोऽध्यायः॥6॥ 
हरि ॐ तत् सत्! इस प्रकार ब्रह्मविद्या का योग करवाने वाले शास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता रूपी उपनिषत् में भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद रूपी आत्म-संयम योग नाम वाला छठा अध्याय सम्पूर्ण हुआ। 


Hari Om tat Sat: Om, that is the Truth! This completes the sixth chapter of Shri Mad Bhagwad Gita, an Upanishat to unify one with the Almighty. This sixth chapter depicts the conversation between Bhagwan Shri Krashn and Arjun and is named as the Yog of Self Control.
Revision has been completed today at Noida on 26.12.2017 and devoted to the pious learners by the grace of the God.

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