Saturday, July 5, 2014

BRAHMA JI (1) ब्रह्मा जी

BRAHMA JI-THE CREATOR
 सृष्टि रचनाकार ब्रह्मा जी 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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ॐ गं गणपतये नमः।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्। 
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
A Golden (Hirany) egg, brighter than the Sun, appeared in water like a gigantic bubble, illuminating everything around, called Hirany Garbh (womb). Everything composing universe-all abodes including Heavens, Earth, Moon, Sun, Demons, Demi Gods, Humans and all that had to be created were present in it, in embryonic state-form.
From the navel of Chhudr Virat Purush, Bhagwan Narayan-Shri Hari Vishnu emerged; Brahma Ji emerged  on naval lotus of Bhagwan Shri Hari Vishnu.
Virat Purush-Vishnu, an incarnation of Maha Virat Purush-the son of Almighty Shri Krashn and Radha Ji, emerged out of it and evolved-created his three incarnations viz. Brahma, Vishnu & Mahesh. Brahma Ji is the creator with 7 characters.
Brahma Ji and Bhagwan Vishnu looked at each other and argued that the other one was created by him. Brahma Ji told that the entire universe was present in him. Bhagwan Vishnu entered in Brahma's mouth to see it and found that the entire universe was present there in the stomach. He jokingly allowed Brahma Ji to find what was there in him. Brahma Ji too found everything in him. Bhagwan Vishnu closed his mouth and allowed him to come off through the navel lotus. Brahma Ji asked him to ask for a boon. Bhagwan Vishnu asked him to accept himself as his father-Creator and Brahma Ji obliged.
Each Universe has a Chhudr (small, dwarf, pygmy, fragment, component) Virat Purush, from whom originated the Trinity of Brahma-the Creator, Vishnu-the Protector and Mahesh-the Destroyer.
ALMIGHTY-FORMLESS
ALMIGHTY WITH FORM SHRI KRASHN
SHRI KRASHN IN GAULOK
SHRI KRASHN⟶ BHAGWATI SARASWATI
↓                                         ↓
          VIRAT PURUSH-MAHA VISHNU🢨RADHA JI IN GAU LOK
  ↓
INFINITE UNIVERSES
 ↓
OUR UNIVERSE
GOLDEN EGG-SHELL
NARAYAN-BHAGWAN SHRI HARI VISHNU
NAVEL LOTUS
PRAJAPATI BRAHMA JI 
Brahma Ji requested Bhagwan Shiv-Mahesh to create life. He created eleven Rudr, who were all alike him. They are Dikpals (possessors of directions, 10 in number) now positioned in ten directions. Mahesh showed his inability to do this further. Dev Rishi Narad came off Brahma Ji’s forehead. Brahma Ji's forehead yielded the Sapt Rishi's.
BRAHMA JI'S CREATIONS :: 
(1). DIVINE CREATIONS :: Divine creations settled in heavens-higher abodes. Yaksh, Rakshash, Asur (Monsters-giants) who were the first to evolved from the thigh of Brahma Ji, ran towards him, to eat him, shouting Yaksh-Yaksh meaning :- eat him, followed by Rakshash, shouting Rakshash, Rakshash meaning: don't protect him. Brahma Ji told them that he was their father-creator and therefore they should not eat him. Brahma Ji rejected the original-that body to acquire a new one. Deserted body turned into night (darkness constituting of smoke, fog, mist, dust, evening, dawn, Sunset, morning; pleasing both Yaksh and Rakshash. Rakshash are termed as Demons & giants, Asur and Anti Demigods, as well, due to their nature habits, desire for sex-lust, darkness.
Sages evolved from the forehead-mind and other body parts were named :- 
HEART :: Bhragu, 
EYES :: Marichi, 
EARS :: Atri, 
HEAD :: Angira 
UDAN VAYU :: Pulasty, 
VYAN VAYU :: Puleha, 
APAN VAYU :: Kretu,
SAMAN VAYU :: Vashishth, 
SHADOW :: Kardam, 
DETERMINATION :: Dharm  along with innumerable sons including Kashyap.
FOREHEAD :: Bhagwan Shiv (Maheshwar, Ardhnarishwer) evolved from the centre of eye brows and the nose. 
Nondescript-uncharacteristic Brahm Shiv (Aling) is Ling (nature). Nature (ling) is a component of Shiv. Devoid of Sound-word, touch-figure, extract-elixir (juice), smell is Shiv. Non-descriptive, unmoved, undeteriorating, Aling, Nirgun-no specific characteristic-component is Shiv. The nature associated with word-sound, touch-feeling, figure-shape and size, extract-juices, smells is the excellence of Shiv. He is the producer-creator of universe, with 5 components which were, which are, which will be there are :- Earth, Water, Tej (energy, light), Space, Air. Micro-Macro, all components-sections of universe have been created from the nondescript Parmatma-Almighty Shiv. Its, Aling-nondescript due to the Maya-illusory Power  of God and constitute  of 7, 8 or 9 shapes-figures of Ling Tatv (Components-Elements). Bhagwan Shiv is capable of moving freely, in 14 universes as per his will.
MANAS PUTR :: Manas Putr (Brain child, always remain naked and appear-seen as kids) Sanak, Sanandan, Sanatan and Sanat Kumar; Dev Rishi Narad evolved from the from the fore head of Bahama Ji. They were capable of moving freely in all abodes, including earth. Devs, Humans too evolved from there.
THIGH :: From the thigh of Brahma Ji evolved Yaksh, Asurs (Rakshash-Demons, Danav-Giants), after acquisition of new body followed by Gandharv and Apsra by acquiring another glowing body.
Next bodies to be acquired by Brahma Ji were :-
(1.1). TEJOMAI (full of Aura-energy, glittering, illuminated) :: It Sandhey Gan and Pitre Gan. 
(1.2). TIRO DHAN :: It yielded Siddh, Vidya Dhar, Pritibimb (reflection), Kinners (important), Kim Purush (important).
ANGER (Tandra) :: It produced ghosts (Bhoot, Pishach) and spirits.
HAIRS :: They produced-evolved the servants.
HEART :: Krat-Kraty were produced-evolved through Indriy Sanyam (self control, Control of senses, Asceticism, Enlightenment, Yog, Trans meditation, Salvation).
MANU & SHATRUPA :: Brahma Ji evolved Manu from his right half and Shatrupa from his left half.
DAKSH PRAJAPATI :: Daksh Praja Pati evolved from the right leg toe of Brahma Ji & his wife Prasuti evolved from the left toe of the creator.
चन्द्र देव, काम देव और भगवान् श्री कृष्ण और रुक्मणि जी के पुत्र प्रद्युम्न जी, ये तीनों ही ब्रह्मा जी के स्वरूप-अवतार हैं।
BRAHMA'S DAY "KALP" ULTIMATE UNIT OF TIME :: भगवान् ब्रह्मा जी के एक दिन को एक कल्प कहा गया है। 
(1). नील वराह कल्प :- पाद्मकल्प के अंत के बाद महाप्रलय हुई। सूर्य के भीषण ताप के चलते धरती के सभी वन-जंगल ‍आदि सूख गए। समुद्र का जल भी जल गया। ज्वालामुखी फूट पड़े। सघन ताप के कारण सूखा हुआ जल वाष्प बनकर आकाश में मेघों के रूप में स्थिर होता गया।
अंत में न रुकने वाली जलप्रलय का सिलसिला शुरू हुआ। चक्रवात उठने लगे और देखते ही देखते समस्त धरती जल में डूब गई। यह देख भगवान् ब्रह्मा जी को चिंता होने लगी, तब उन्होंने जल में निवास करने वाले भगवान् श्री हरी विष्णु का स्मरण किया और फिर भगवान् विष्णु ने नील वराह रूप में प्रकट होकर इस धरती के कुछ हिस्से को जल से मुक्त किया। नील वराह देव ने अपनी पत्नी नयनादेवी के साथ अपनी संपूर्ण वराही सेना को प्रकट किया और धरती को जल से बचाने के लिए तीक्ष्ण दरातों, पाद प्रहारों, फावड़ों और कुदालियों और गैतियों द्वारा धरती को समतल किया।इसके लिए उन्होंने पर्वतों का छेदन तथा गर्तों के पूरण हेतु मृत्तिका के टीलों को जल में डालकर भूमि को बड़े श्रम के साथ समतल करने का प्रयास किया। यह एक प्रकार का यज्ञ ही था, इसलिए भगवान् नील वराह को भगवान् यज्ञ वराह भी कहा गया। नील वराह के इस कार्य को आकाश के सभी देवदूत देख रहे थे। प्रलयकाल का जल उतर जाने के बाद भगवान् के प्रयत्नों से अनेक सुगंधित वन और पुष्कर-पुष्करिणी सरोवर निर्मित हुए, वृक्ष, लताएं उग आईं और धरती पर फिर से हरियाली छा गई। संभवत: इसी काल में मधु और कैटभ का वध किया गया था। 
(2). आदि वराह कल्प :- नील वराह कल्प के बाद आदि वराह कल्प शुरू हुआ। इस कल्प में भगवान् विष्णु ने आदि वराह नाम से अवतार लिया। यह वह काल था जबकि दिति और कश्यप के दो भयानक असुर पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष का आतंक था। दोनों को ही ब्रह्माजी से वरदान मिला हुआ था। 
हिरण्याक्ष का वध :- ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान् वराह रूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान् ने जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया। 
आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ। 
हिरण्यकश्यप का वध :- इस काल में भगवान् वराह ने नृसिंह का अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया था। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान् विष्णु का परम भक्त था, जो हिरण्यकश्यप को पसंद नहीं था तो उसने प्रहलाद को मारने के लिए कई उपाय किए। लेकिन भगवान् विष्णु ने अपने भक्त को बचाने के लिए अंत में नृसिंह का अवतार लिया। 
हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा जी से अमरता का वर मिला था। उसने ब्रह्मा जी से वर मांगा था कि मुझे कोई मनुष्य, दानव, असुर, किन्नर, पशु, पक्षी और जलचर जंतु नहीं मार सके और न में दिन में मरूं, न रात में, न पाताल में, न धरती पर और न आकाश में। भगवान् ब्रह्मा ने कहा :- तथास्थु। 
(3). श्वेत वराह कल्प :- वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। वैवस्वत मनु के 10 पुत्र और इला नाम की कन्या थी। वैवस्वत मनु को ही पृथ्वी का प्रथम राजा कहा जाता है। इला का विवाह बुध के साथ हुआ जिससे उसे पुरूरवा नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। यही पुरूरवा प्रख्यात ऐल या चंद्र वंश का संस्थापक था। 
वैवस्वत मनु के काल के प्रमुख ऋषि :- वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, भारद्वाज, मार्कंडेय, अगस्त्य आदि। 
वैवस्वत मनु की शासन व्यवस्था में देवों में 5 तरह के विभाजन थे :- देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व। 
प्रमुख प्रजातियाँ :: देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, भल्ल, वसु, अप्सराएं, रुद्र, मरुदगण, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है। 
पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति :: प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीनकाल में 7 द्वीपों में बांटा गया था : जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। 
जम्बू द्वीप के 9 खंड थे :- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। 
देवताओं के गुरु बृहस्पति और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य थे। 
तब ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि ये ऋषियों की 7 श्रेणियां होती थीं। 
यह वैवस्वत मनु का काल था जबकि वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, भारद्वाज, मार्कंडेय, अगस्त्य आदि ऋषिगण हुआ करते थे। 
वराह काल में नील वराह अवतार से लेकर आदि वराह, श्वेत वराह, नृसिंह अवतार, वामन अवतार और कच्छप अवतार हुए । 
इस काल में सनकादि, इंद्रादि, नर-नारायण हुए, वासुकि-तक्षक, हाहा-हूहू, मेनका-रम्भा, मरुदगण, हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यप हुए, दिति-अदिति पुत्र, रथकृत-ओज, हेति-प्रहेति हुए, मधु-कैटभ हुए, भस्मासुर, त्रिपुरासुर हुए, ब्रह्मा के 10 पुत्रों का कुल चला, राजा बाली हुए। 
बाली के बाद कच्छप अवतार हुआ और अंत में स्वायंभुव मनु हुए। स्वायंभुव मनु के बाद स्वरोचिष, औत्तमी, तामस मनु, रैवत और चाक्षुष मनु हुए और अंत में जल प्रलय के बाद नए युग की शुरुआत हुई। जल प्रलय के दौरान सातवें मनु वैवस्वत मनु हुए। 
इन्द्र-बलि (समुद्र मंथन) :- वामन अवतार के बाद कच्छप अवतार हुआ जिसे कूर्म अवतार भी कहा गया। कूर्म अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्र मंथन के समय मंदार पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदार पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एवं असुरों ने समुद्र मंथन करके 14 रत्नों की प्राप्ति की। इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था। इसके बाद जल प्रलय की घटना घटी। 
मत्स्य अवतार-सातवें मनु वैवस्वत मनु :: स्वायंभुव मनु के कुल में मत्स्य पुराण में उल्ले‍ख है कि द्रविड़ देश के राजर्षि सत्यव्रत एक दिन कृतमाला नदी में जल से तर्पण कर रहे थे। उस समय उनकी अंजुलि में एक छोटी-सी मछली आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी में डाल दिया तो मछली बोल पड़ी। उसने कहा कि इस जल में बड़े जीव-जंतु मुझे खा जाएंगे। यह सुनकर राजा ने मछली को फिर जल से निकाल लिया और अपने कमंडल में रख लिया और महल ले आए। 
रात भर में वह मछली बढ़ गई, तब राजा ने उसे बड़े मटके में डाल दिया। मटके में भी वह बढ़ गई तो उसे तालाब में डाल दिया। अंत में सत्यव्रत ने जान लिया कि यह कोई मामूली मछली नहीं, जरूर इसमें कुछ बात है, तब उन्होंने उसे ले जाकर समुद्र में डाल दिया। समुद्र में डालते समय मछली ने कहा कि समुद्र में मगर रहते हैं आप वहां मत छोड़िए, लेकिन राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि आप मुझे कोई मामूली मछली नहीं जान पड़ती है, आपका आकार तो अप्रत्याशित तेजी से बढ़ रहा है बताएं कि आप कौन हैं? 
तब मछली रूप में भगवान् विष्णु ने प्रकट होकर कहा कि आज से 7वें दिन प्रलय (अधिक वर्षा से) के कारण पृथ्वी समुद्र में डूब जाएगी, तब मेरी प्रेरणा से तुम एक बहुत बड़ी नौका बनाओ और जब प्रलय शुरू हो तो तुम सप्त ऋषियों और कुछ मनुष्यों सहित सभी एक जोड़े प्राणियों को लेकर उस नौका में बैठ जाना तथा सभी अनाज उसी में रख लेना। अन्य छोटे-बड़े बीज भी रख लेना। नाव पर बैठकर लहराते महासागर में विचरण करना। 
प्रचंड आंधी के कारण नौका डगमगा जाएगी। तब मैं इसी रूप में आ जाऊंगा, तब वासुकि नाग द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बांध लेना। जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी, मैं नाव समुद्र में खींचता रहूंगा। उस समय जो तुम प्रश्न करोगे, मैं उत्तर दूंगा। इतना कह मछली गायब हो गई। 
राजा तपस्या करने लगे। मछली का बताया हुआ समय आ गया। वर्षा होने लगी। समुद्र उमड़ने लगा। तभी राजा ऋषियों, अन्न, बीजों को लेकर नौका में बैठ गए और फिर भगवानरूपी वही मछली दिखाई दी। उसके सींग में नाव बांध दी गई और मछली से पृथ्वी और जीवों को बचाने की स्तुति करने लगे। मछलीरूपी विष्णु ने उसे आत्मतत्व का उपदेश दिया। मछलीरूपी विष्णु ने अंत में नौका को हिमालय की चोटी से बांध दिया। उस चोटी को आज नौकाबंध कहते हैं। 6 माह तक वर्षा हुई और नाव में ही बैठे-बैठे जल प्रलय का अंत हो गया। 
यही सत्यव्रत वर्तमान में महाकल्प में विवस्वान (सूर्य) के पुत्र श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुए, वही वैवस्वत मनु के नाम से भी जाने गए। 
पूर्व में यह धरती जल प्रलय के कारण जल से ढंक गई थी। कैलाश, गोरी-शंकर की चोटी तक पानी चढ़ गया था। संपूर्ण धरती ही जलमग्न हो गई थी, लेकिन ओंकारेश्वर स्थित मार्कंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता रहा। इसके अलावा तिब्बत, मंगोलिया के कई ऊंचे पठार भी जल से अछूते रहे। 
कई माह तक वैवस्वत मनु (इन्हें श्राद्धदेव भी कहा जाता है) द्वारा नाव में ही गुजारने के बाद उनकी नाव गौरी-शंकर शिखर से होते हुए नीचे उतरी। गौरी-शंकर जिसे एवरेस्ट की चोटी कहा जाता है, दुनिया में इससे ऊंचा, बर्फ से ढंका हुआ और ठोस पहाड़ दूसरा नहीं है। 
वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे :- (1). इल, (2). इक्ष्वाकु, (3). कुशनाम, (4). अरिष्ट, (5). धृष्ट, (6). नरिष्यन्त, (7). करुष, (8). महाबली, (9). शर्याति और (10). पृषध। राजा इक्ष्वाकु के कुल में जैन और हिन्दू धर्म के महान तीर्थंकर, भगवान, राजा, साधु महात्मा और सृजनकारों का जन्म हुआ है। 
स्वायम्भुव मनु ही आदि मनु और प्रजापति कहे गए हैं। उनके दो पुत्र हुए, प्रियव्रत और उत्तानपाद। राजा उत्तानपाद के पुत्र परम धर्मात्मा ध्रुव हुए, जिन्होंने भक्ति भाव से भगवान् विष्णु की आराधना करके अविनाशी पद को प्राप्त किया। 
राजर्षि प्रियव्रत के दस पुत्र हुए, जिनमें से तीन तो संन्यास ग्रहण करके घर से निकल गए और परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो गए। शेष सात द्वीपों में उन्होंने अपने सात पुत्रों को प्रतिष्ठित किया। राजा प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र आग्नीघ्र जम्बू द्वीप के अधिपति हुए। 
उनके नौ पुत्र जम्बू द्वीप के नौ खण्डों के स्वामी माने गए हैं, जिनके नाम उन्हीं के नामों के अनुसार इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, केतुमालवर्ष, कुरुवर्ष, हिरण्यमयवर्ष, रम्यकवर्ष, हरीवर्ष, किंपुरुष वर्ष और हिमालय से लेकर समुद्र के भू-भाग को नाभि खंड (भारतवर्ष) कहते हैं। 
नाभि और कुरु ये दोनों वर्ष धनुष की आकृति वाले बताए गए हैं। नाभि के पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभ से ‘भरत’ का जन्म हुआ; जिनके आधार पर इस देश को भारतवर्ष भी कहते हैं। 
ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, शिव आदि पदों पर अलग-अलग कल्पों में अलग देवता विराजमान होते हैं।
मत्स्य पुराण में 30 कल्पों की चर्चा है :- श्‍वेत, नीललोहित, वामदेव, रथनतारा, रौरव, देवा, वृत, कंद्रप, साध्य, ईशान, तमाह, सारस्वत, उडान, गरूढ़, कुर्म, नरसिंह, समान, आग्नेय, सोम, मानव, तत्पुमन, वैकुंठ, लक्ष्मी, अघोर, वराह, वैराज, गौरी, महेश्वर, पितृ। 
महत कल्प :- इस काल के बाद प्रलय हुई थी तो सभी कुछ नष्ट हो गया। इस कल्प में विचित्र-विचित्र और महत् (-अंधकार से उत्पन्न) वाले प्राणी और मनुष्य होते थे। जो अंधकार में भी देखने में सक्षम थे। 
हिरण्य गर्भ कल्प :- इस काल में धरती का रंग पीला था इसीलिए इसे हिरण्य कहते हैं। हिरण्य के 2 अर्थ होते हैं- एक जल और दूसरा स्वर्ण। हालांकि धतूरे को भी हिरण्य कहा जाता है। माना जाता है कि तब स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे। इस काल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ, हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, देवता, हिरप्यानी रैडी (अरंडी), वृक्ष वनस्पति एवं हिरण ही सर्वोपयोगी पशु थे। सभी एकरंगी पशु और पक्षी थे। 
ब्रह्मकल्प :- इस कल्प में मनुष्य जाति सिर्फ ब्रह्म (ईश्‍वर) की ही उपासक थी। क्रम विकास के तहत प्राणियों में विचित्रताओं और सुंदरताओं का जन्म हो चुका था। जम्बूद्वीप में इस काल में ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, रामपुर, रामगंगा केंद्र आदि नाम से स्थल हुआ करते थे। यहां की प्रजाएं परब्रह्म और ब्रह्मवाद की ही उपासना करती थी। इस काल का ऐतिहासिक विवरण हमें ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। 
पद्मकल्प :- पुराणों के अनुसार इस कल्प में 16 समुद्र थे। यह कल्प नागवंशियों का था। धरती पर जल की अधिकता थी और नाग प्रजातियों की संख्या भी अधिक थी। कोल, कमठ, बानर (बंजारे) व किरात जातियां थीं और कमल पत्र पुष्पों का बहुविध प्रयोग होता था। सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की नारियां पद्मिनी प्रजाएं थीं। तब के श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति आज के श्रीलंका जैसी नहीं थी। इस कल्प का विवरण हमें पद्म पुराण में विस्तार से मिल सकता है।
वराहकल्प :- वर्तमान में वराह कल्प चल रहा है। इस कल्प में भगवान् विष्णु ने वराह रूप में 3 अवतार लिए :- पहला नील वराह, दूसरा आदि वराह और तीसरा श्वेत वराह। इसी कल्प में विष्णु के 24 अवतार हुए और इसी कल्प में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है। इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की थी। वर्तमान में हम इसी कल्प के इतिहास की बात कर रहे हैं। वराह पुराण में इसका विवरण मिलता है। 
अब तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वंतर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतरदशा चल रही है।
Please refer to :: DIVINE-VEDIC CALENDAR santoshkipathshala.blogspot.com hindutv.wordpress.com

BRAHMA JI TEMPLE PUSHKAR जगत्-पिता ब्रह्मा जी का मन्दिर पुष्कर :: Jagat Pita Brahma Mandir-temple is situated at Pushkar in Rajasthan, India. This is located near the sacred lake known as Pushkar. This is the first, one of the rarest & most prominent temple dedicated to Bhagwan Prajapati Brahma. The present temple was constructed over the old site in the 14th century around 2000 years ago. It has been built with marble and stone stabs. It has a distinct red pinnacle-Shikhar and a Hans-swan motif. The temple sanctum sanctorum holds the image of Brahma Ji and Maa Gayatri. The temple is governed by the Sanyasi-ascetic sect, priesthood. On Kartik Poornima, a festival dedicated to Brahma Ji is held when large number of devotees throng Pushkar.

MOTIF :: मूल भाव, विशेष लक्षण, प्रधान विचार-चेष्टा, रूपांकन, अभिप्राय, कथानक रूढ़ि, वस्तु; Intent, Intention, studiedly, article, chose, contents, Entity, luggage.

THRONG :: भीड़, मेला, जमघट, भीड़-भाड़, जमाव, भीड़ लगना, कंधे से कंधे भिड़ता रहना; crowd, multitude, mob, horde,  concourse, fair, skit, festival, scrum, rally, swarm, posse, boodle, dilemma, milling, jamming, huddle, hustle, shoal, legion, congestion, setting, coagulation, backlog, concourse, rabble, hang around, cluster, herd.

Brahma Temple at PushkarBrahma Ji saw the demon Vajr Nabh (Vajr Nash) trying to kill his creations-public. He immediately slew the demon with his weapon-Brahmastr, in the form of a lotus-flower. In this process, the lotus petals fell on the ground at three places, creating three lakes: the Pushkar Lake or Jyeshth Pushkar (senior-greatest or first Pushkar), the Madhy Pushkar (middle Pushkar) Lake and Kanishth Pushkar (Junior-lowest or youngest Pushkar) lake. When Brahma Ji came down to the earth, he named this place, where the Pushp-flower petals  had fallen from his hands-Kar as Pushkar.[Padma Puran]

Pushkar means blue lotus flower. The demigods released a swan with a lotus in its beak and let it fall on earth where Brahma Ji would perform a grand Yagy. The place where the lotus fell was called Pushkar. Pushkar is derived from the word Push Karni, which means-lake. 

Brahma Ji decided to perform a Yagy (holy sacrifices in fire) at the main Pushkar Lake. To perform his Yagy peacefully without being attacked by the demons, he created the hills around Pushkar named Ratn Giri in the south, Neel Giri in the north, Sanchoor in the west and Sury Giri in the east and positioned demigods there to protect the Yagy. However, while performing the Yagy, his wife Maa Savitri (or Saraswati in some versions) could not be present at the designated time to perform the essential part of the Yagy as she was waiting for Maa Lakshmi, Parvati and Indrani. So, Brahma Ji married Gurjar girl, Gayatri and completed the Yagy with her sitting beside him, holding the Amrat Kalash (Pot containing the elixir-nectar) on her head and giving Ahuti-offering, in the sacrificial holy fire.

When Savitri finally arrived at the venue, she found Gayatri sitting next to Brahma Ji which was her rightful place. Agitated, she cursed Brahma Ji that he would be never worshipped, but later reduced the curse permitting his worship in Pushkar. Savitri also cursed Indr to be defeated easily in battles and Bhagwan Shri Hari Vishnu to suffer the separation from his wife as a human, the fire-deity Agni who was offered the Yagy  to be all-devouring and the priests performing the Yagy  to be poor. Endowed by the powers of Yagy, Gayatri diluted Savitri's curse, blessing Pushkar to be the king of pilgrimages, Indr would always retain his heaven, Bhagwan Vishnu would be born as the human incarnation Ram and finally unite with Mata Sita and the priests would become scholars and be venerated. Thus, the Pushkar temple is regarded as the only temple solely dedicated to Brahma Ji. Savitri, thereafter, moved into the Ratn Giri hill and became a part of it, by emerging as a spring known as the Savitri Jharna-stream & a temple in her honour exists there. There are still priests from the Gurjar community in Pushkar temple, known as Bhopas.

There are 500 temples, 80 are large and the rest are small. Of these many are old that were destroyed or desecrated by Muslim depredations during Mughal emperor Aurangzeb's rule (1658–1707) but were re-built subsequently. Of these the most important is the Brahma temple. The temple is described to have been built by sage Vishw Mitr after Brahma's Yagy. Brahma himself chose the location for his temple. The 8th century Adi Shankrachary renovated this temple, while the current medieval structure dates to Maha Raja Jawat Raj of Ratlam, who made additions and repairs, retaining the original temple design.

The temple, which is set on high plinth, is approached through a number of marble steps leading to an entrance gate archway, decorated with pillared canopies. The entry from the gate leads to a pillared outdoor hall-Mandap and then the sanctum sanctorum-Garbh Grah. The temple is built with stone slabs and blocks, joined together with molten lead. The red Shikhar-spire of the temple, has the symbol of a Hans-Swan-Goose, the mount of Bhagwan Brahma; as the distinct features of the temple. The Shikhar is about 700 feet (210 m) in height. The Hans-motif decorates the main entry gate. Marble flooring in black and white checks and walls inside the temple have been inlaid with hundreds of silver coins by devotees, with their names inscribed over them, as mark of offering to Bhagwan Brahma-the creator. There is a silver turtle in the Mandap, which is displayed on the floor of the temple facing the Garbh Grah, built in marble. The marble flooring has been replaced from time to time. The left depicts the front façade and the right has the idol of Brahma Ji inside the temple.

Bhagwan Brahma's central icon-Murti-idol made of marble was deified (देवत्वारोपण, देवता-सदृश) in the Garbh Grah in 718 AD by Adi Shankrachary. The icon depicts Brahma Ji, seated in a crossed leg position in the aspect of creation of the universe-the Vishw Karma. The central image is called the Chau Murti-four-faced idol. It is of life size idol with four hands, four faces, each oriented in a cardinal direction. The four arms hold the Aksh Mala-rosary, the Pustak-book), the Kurk-Kush grass and the Kamandlu-water pot). Brahma Ji is riding on his mount-vehicle, the Hans. The four symbols held by Brahma Ji in his arms: the rosary, Kamandlu, book and the sacrificial implement Kush grass represent time, the causal waters from which the universe emerged, knowledge and the system of sacrifices to be adopted for sustenance of various life-forms in the universe. Gayatri's image is also present, along with Brahma's Ji in centre to his left. Maa Savitri-Saraswati sits to the right of Brahma Ji, along with other deities. Images of the peacock the vehicle of Maa Saraswati, also decorate the temple walls. Images of the Nurturer-preserver Bhagwan Vishnu, life-sized Dwar Palas-gate keepers and a gilded Garud (eagle-man, Vehicle-mount of Bhagwan Vishnu are also present in the temple.

The pilgrims take ceremonial sacred bath in Pushkar Lake with Savitri temple in the background and then visit the Brahma Ji temple to worship him and his wife Gayatri.

The temple is open for worship between 6:30 AM and 8:30 PM during winter and 6:00 AM to 9:00 PM during summer, with an interval in afternoon between 1:30 PM to 3:00 PM when the temple is closed. Three Artis are held in the temple: Sandhya Arti in the evening about 40 minutes after Sunset, Ratri Shayan Arti (night-sleep Arti) about 5 hours past Sunset and Mangal Arti in the morning, about 2 hours before Sunrise.

The priests at the Brahma Ji temple refer to a strictly followed religious practice. House holders-married men are not allowed to enter the sanctum sanctorum to worship the deity. Only ascetics-sages-Sanyasis can perform the Puja to the deity. Hence, all offerings by pilgrims are given, from the outer hall of the temple, through a priest who is also a Sanyasi. The priests of the temple, in Pushkar, belong to the Parashar Gotr-lineage.

Mata Savitri and Gayatri also have separate temples erected for them in Pushkar, on hills at opposite ends of the lake. Savitri temple located on the top of Ratn Giri hill, behind Brahma Ji's temple, overlooks the Pushkar Lake and the sand dunes on its western side. It is reached by one hour's trek over a series of steps on the hill. The temple made of marble, houses a statue of Maa Savitri. The Gayatri temple-Pap Mochini temple is accessible by a 30-minute climb from a track behind Marwar bus stand.

The Atpateshwar temple, which is situated in a cave next to the Brahma temple, is dedicated to Bhagwan Shiv. This temple was built by Brahma Ji after he found that Bhagwan Shiv attended the Yagy performed by him in the garb of a Tantric-mendicant holding a skull. When Bhagwan Shiv was accosted for this appearance, he was piqued and filled the entire area of the Yagy site with skulls. Agitated Brahma Ji then meditated to find the reason for such a situation. Soon, he realised that the mendicant was none other than Bhagwan Shiv. Realising his folly, Brahma Ji requested Bhagwan Shiv to attend the Yagy. Bhagwan Shiv attended the Yagy holding the skull and Brahma Ji in appreciation erected a temple in honour of Bhagwan Shiv as Atpateshwar, next to his own temple. The Shiv Ling in this temple is large and is encircled by a snake made of copper. Shiv Ratri festival is a special occasion to visit this temple. Bhagwan Shiv is Yagyeshwar (यज्ञेश्वर) and no Yagy is complete without his presence-worship. 

Tirth Raj Pushkar (पुष्कर) is one of the oldest existing cities of India-world. Pushkar lake has 52 Ghats where pilgrims descend into the lake to bathe, in the sacred waters. It is a town in the Ajmer district in Rajasthan, India. It is situated 14 km (8.7 mi) northwest of Ajmer at an average elevation of 510 m (1,670 ft) and is one of the five sacred Dhams-pilgrimage sites. The pond at the Katas Raj temple near Choa Saedan Shah in Chakwal District of Pakistan has a theological association with Bhagwan Shiv. It was formed by the tears of Bhagwan Shiv which he shed after the death of Mata Sati. When Mata Sati died, Bhagwan Shiv cried so much and for so long, that his tears created two holy ponds-one at Pushkar in Ajmer in India and the other at Kataksh (कटाक्ष, raining eyes). Katas is a short form of KatakshPushkar is also famous for its annual Camel Fair held in November.

The nearest airport from Pushkar is Sanganer Airport at Jaipur at distance of 146 km (91 miles). Jaipur is well connected with all the major cities in India.

Pushkar is connected with Ajmer by Pushkar road which goes through Aravali range. The mountain portion road which separate Pushkar from Ajmer City is locally known as Pushkar Ghati. Pushkar is 11 km (6.8 mi) from Ajmer. 

BRAHMAN (ब्राह्मण)  is a Varn-Upper most-apex caste in Hinduism specialising in theory as priests, preservers and transmitters of sacred literature across generations. A Brahmn represents Brahma Ji and Bhagwan Shri Hari Vishnu says that a Brahmn is his mouth through which the demigods eat the offerings by the devotees.

Brahman Granth, (ब्राह्मणग्रंथ) are one of the four ancient layers of texts within the Veds. They are primarily a digest incorporating myths, legends, the explanation of Vedic rituals and in some cases philosophy. They are embedded within each of the four Veds and form a part of the Shruti.

Brahma Ji originated from the lotus emerging from the navel of Bhagwan Shri Hari Vishnu at the moment when time and universe were born.  Brahma Ji was drowsy, errs and was temporarily incompetent as he appeared in the universe. He became aware of his confusion and drowsiness, meditated as an ascetic, then realised Bhagwan Shri Hari Vishnu in his heart. He saw the beginning and end of universe and then his creative powers were revived. Brahma Ji, thereafter combined Prakrati (nature, matter) and Purush (spirit, soul) to create a dazzling variety of living creatures and tempest of causal nexus. All his creations were divine. Kashyap Ji in turn created creatures through sexual inter course. [Bhagwat Puran]

Maa Parvati, incarnation of Maa Bhagwati is called the mother of the universe and she is credited with creating Brahma Ji, demigods and the three worlds. She is the one, who combined the three Tri Gun :- Sattv, Rajas and Tamas, into nature-Prakrati to create the empirically observed world. [Skand Puran]

Brahma Ji possesses Rajas Gun (quality of passion, activity, neither good nor bad and sometimes either, action, individualising, driven, dynamic), which is compensated by Maa Saraswati who has Sattv (quality of balance, harmony, goodness, purity, holistic, constructive, creative, positive, peaceful, virtuous). Maa Saraswati, is considered to be the embodiment of Bhagwan Brahma's power, the instrument of creation and the energy that drives his actions.

Bhagwan Brahma is traditionally depicted with four heads-mouths and four arms. Each face of his points to a cardinal direction. His hands hold no weapons, rather symbols of knowledge and creation. In one hand he holds the sacred texts of Ved, in second he holds Mala (rosary beads) symbolising time, in third he holds a ladle symbolising means to feed sacrificial fire and in fourth a Kamandal-utensil with water symbolising the means where all creation emanates from. His four mouths are credited with creating the four Veds. He is often depicted with a white beard, implying his sage-like experience. He sits on lotus, dressed in white (or red, pink), with his vehicle-Vahan a Hans, a swan or goose, nearby.

Brahma statue should be golden in colour. The statue should have four faces and four arms, have Jata-locks, Mukut-crown, Mandit-fixed (matted hair of an ascetic). Two of his hands should be in refuge granting and gift giving Mudra-posture. He should be shown with Kundik (water pot), Aksh Mala (rosary), a small and a large Sruk-Sruv (ladles used in Yagy ceremonies). The different proportions of the Murti-statue-idol, describes the ornaments and suggests that the idol wear Chir (bark strip) as lower garment and either be alone or be accompanied with goddesses Maa Saraswati on his right and Savitri on his left.[Chapter 51 of Manasar-Shilp Shastr]

DIADEM मुकुट :: ताज, किरीट; crown,  front-let, corona.

TEMPLES DEDICATED TO BRAHMA JI :: 

Very few temples are primarily dedicated to Brahma Ji and his worship in India. One of the few and the most prominent Hindu temple for Brahma Ji is the Brahma Temple, Pushkar. Other temples include a temple in Asotra village in Balotra Taluka of Rajasthan's Barmer district, which is known as Kheteshwar Brahm Dham Tirth.

Temples featuring Brahma Ji also exist in Tirunavaya, the Padm Nabh Swamy Temple, the Thripaya Trimurti Temple and Mitr Nath Puram Trimurti Temple in Kerala. 

In Tamil Nadu, Brahma temples exist in the temple town of Kumbakonam, in Kodumudi and within the Brahmapureeswarar Temple in Tiruchirappalli.

There is a temple dedicated to Brahma Ji in the temple town of Shri Kala Hasti near Tirupati, Andhra Pradesh. 

A seven feet height of Chatur Mukh (Four mouths) Brahma temple at Bangalore, Karnataka. In the coastal state of Goa, a shrine belonging to the 5th century, in the small and remote village of Carambolim in the Sattari Taluka in the northeast region of the state is found.

Famous Murti of Brahma Ji exists at Mangal Wedha, 52 km from the Shola Pur district of Maharashtr and in Sopar near Mumbai. There is a 12th-century temple dedicated to him in Khed Brahma, Gujarat.

Brahma Temple at Khokhan, in Kullu District, Himachal Pradesh.

Brahma Temple at Asotra, District Barmer, Rajasthan.

Brahma Temple at Oachira in Kollam district, Kerala.

Brahma temple at village aleo shrishty narayan, in Kullu, Himachal Pradesh.

Brahma Temple at Annamputhur village Shri Nidhishwar in Tindivanam,Tamil Nadu.

Thirunavaya, Thiruvallam, Kerala.

Brahma Temple at Royakotta road in Hosur, Tamil Nadu.

Uttamar Kovil in Shri Rangam, Tamil Nadu.

Kumbakonam, Thanjavur District, Tamil Nadu.

Khed Brahma, Gujarat.

The Brahma Temple near Pan Ji in the village of Brahma-Carambolim in the Satari Taluka, Goa.

Brahm Purishwarar temple in Tirupattur, near Trichy, Tamil Nadu.

Brahm Kuti Temple at Brahmavart (Bithoor), Kanpur (Uttar Pradesh).

Brahma Temple at village Chhinch, Tehsil Bagidoa, District Banswara, Rajasthan.

Chatur Mukh Brahm temple in Chebrolu, Andhra Pradesh

As Part of Trimurti at Thripaya Trimurti Temple in Irinjalakuda, Thrissur in Kerala, India

As Part of Trimurti at Mithrananth Puram Trimurti Temple in Thiruvanantha Puram in Kerala, India.

The largest and most famous shrine to Brahma Ji is situated in Cambodia's Angkor Wat. One of the three largest temples in the 9th century Prambanan temples complex in Yogyakarta, central Java (Indonesia) is dedicated to Bhagwan Brahma, the other two to Bhagwan Shiv (largest of three) and Vishnu respectively. The temple dedicated to Brahma Ji is on southern side of Bhagwan Shiv temple.

A statue of Brahma Ji is present at the Erawan Shrine in Bangkok and continues to be revered in modern times. The golden dome of the Government House of Thailand also contains a statue of Phra Phrom (Thai representation of Brahma). An early 18th century painting at Wat Yai Suwannaram in Phetchaburi city of Thailand shows Brahma.

Other temples of Brahma include Bithoor in Uttar Pradesh, India; Khed Brahma in Gujarat, India; village Asotra near Balotra city of Barmer district in Rajasthan; Uttamar Kovil (one of the Divy Desham) near Shri Rangam, Tamil Nadu; Carambolim near Valpoi in Goa, Mother Temple of Besakih in Bali, Indonesia; and Prambanan in Yogyakarta, Indonesia. The country name of Burma-Myanmar is derived from Brahma and  is referred to as Brahm-Desh.

Brahma Ji is a deity in Chinese folk religion and there are numerous temples devoted to the Bhagwan Brahma in China and Taiwan. Brahma is known in Chinese as Simians-hen (四面神, "Four-Faced God"), Ts-hangs pa in Tibetan and Bonten in Japanese.

I spent 4 years in Ajmer at Regional College of Education (Now, Regional Institute of Education) to seek my graduation degrees in Science and Education. During that period the opportunity to visit Brahma Ji temple came thrice. 1st visit was as a volunteer of Vishw Hindu Parishad with my Hindi teacher Mr. Saxena, 2nd with my father and the 3rd with my teacher Dr. S.N. Panda.

 
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