Saturday, July 5, 2014

FIDELITY OF WOMAN पतिव्रता स्त्री-सतीत्व

FIDELITY OF WOMAN पतिव्रत सतीत्व 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj 

The current era is Kali Yug which started roughly 5,000 years ago. In the contemporary world presence of women is noticed-seen in almost all walks of life-fields. It makes easier for the male to poach, lure, seduce, entice, be fool, misguide them; being sentimental.
The girls are sent to coeducational institutions where they interact with with boys and male teachers.The parents do not have enough time to devote to them.There is no scope for moral education in the school syllabus-curriculum.
The impact of mobile, TV, films, internet is tremendous, beyond limits.
The parents encourage the girls to participate in such activities where the guide, coach, teachers all are male.
In this scenario if some one thinks that the woman-wife will follow his dictates, he commits a grave mistake-blunder.Those who flirt with numerous girls, spoil them, should be aware that their spouse might have had sex relations with several male just like him. He should never forget that his own mother, sister too are women.
Now, its up to the girl-woman her self; whether she wish to be virtuous, pious, pure, righteous or just a whore, sinner, wretched, viceful. However, she needs protection at all stages of life and the prudent, rational parents-guardians & the husband perform their duty religiously, faithfully with devotion.
The girls have become independent. They have their won aspirations, ambitions, needs, ideas-thoughts. They do not listen to reason, any one. Any one who wish to guide them, alert them, caution them; is their dreaded enemy-foe.
The sex manics are to eager to pounce upon the imprudent-too bold, girls-women just like the beasts and vultures. As a result of which thousands & thousands of girls find their abode over the brothels, dance bars.

"मातृ देवो भव; पितृ देवो भव"
माता और पिता देव-ईश्वर के समान हैं। 
The parents are like the God-divinity, since they have given birth to one and he can now worship the Almighty and achieve Salvation, the sole purpose of human life.
पितुरप्यधिका माता गर्भधारणपोषणात्। अतो हि त्रिषु लोकेषु नास्ति मातृसमो गुरुः॥
गर्भ को धारण करने और पालन-पोषण करने के कारण माता का स्थान पिता से भी बढकर है। इसलिए तीनों लोकों में माता के समान कोई गुरु नहीं अर्थात् माता परमगुरु है। 
The position-status of mother is supreme in the three abodes-The Heaven,  The Earth and The Nether world, since she has given birth, kept one in her womb and nourished him. She is the first Guru-teacher.
नास्ति गङ्गासमं तीर्थं नास्ति विष्णुसमः प्रभुः। नास्ति शम्भुसमः पूज्यो नास्ति मातृसमो गुरुः॥ 
गंगाजी के समान कोई तीर्थ नहीं, विष्णु के समान प्रभु नहीं और शिव के समान कोई पूज्य नहीं और माता के समान कोई गुरु नहीं। 
There is no pilgrimage comparable to Maa Ganga, no deity comparable to Bhagwan Shri Hari Vishnu, none is as revered as Bhagwan Shiv and no Guru is as capable as the mother.
नास्ति चैकादशीतुल्यं व्रतं त्रैलोक्यविश्रुतम्। तपो नाशनात् तुल्यं नास्ति मातृसमो गुरुः॥
एकादशी के समान त्रिलोक में प्रसिद्ध कोई व्रत नहीं, अनशन से बढकर कोई तप नहीं और माता के समान गुरु नहीं। 
No penance, fasting-keeping hungry voluntarily, as compared to Ekadashi-the eleventh day of a lunar month, no asceticism is comparable to prolonged fasting and no teacher is more significant than the mother.
नास्ति भार्यासमं मित्रं नास्ति पुत्रसमः प्रियः। नास्ति भगिनीसमा मान्या नास्ति मातृसमो गुरुः॥
पत्नी के समान कोई मित्र नहीं, पुत्र के समान कोई प्रिय नहीं, बहन के समान कोई माननीय नहीं और माता के समान गुरु नही। 
No friend is comparable to the wife, none is as dear as the son, no one is revered as the sister and there is no guide better than the mother.
न जामातृसमं   पात्रं न दानं कन्यया समम्। न भ्रातृसदृशो बन्धुः न च मातृसमो गुरुः॥
दामाद के समान कोई दान का पात्र नहीं, कन्यादान के समान कोई दान नहीं, भाई के जैसा कोई बन्धु नहीं और माता जैसा गुरु नहीं। 
No one is as worthy as the son in law to receive gifts-donation, no donation is supreme to donating the daughter to the son in law, there is no relative comparable to the brother and no instructor is better-sincere than the mother.
देशो गङ्गान्तिकः श्रेष्ठो दलेषु तुलसीदलम्। वर्णेषु ब्राह्मणः श्रेष्ठो गुरुर्माता गुरुष्वपि॥
गँगा के किनारे का प्रदेश अत्यन्त श्रेष्ठ होता है, पत्रों में तुलसीपत्र, वर्णों में ब्राह्मण और माता तो गुरुओं की भी गुरु है। 
The region around Maa Ganga is most pious, specially between the two holi-pious river Maa Ganga & Yamuna, no leaf is as pious as Tulsi-Basil, no Varn-caste is superior to-better than the Brahmn and the mother is the Guru-teacher of the teachers.
The triveni sangam i.e, Allahabad is even more pious. The person born in  Brahmn family and subjected all 40 rites and is taught Veds, scriptures, learns them, uses them in life.
पुरुषः पुत्ररूपेण भार्यामाश्रित्य जायते। पूर्वभावाश्रया माता तेन सैव गुरुः परः॥
पत्नी का आश्रय लेकर पुरुष ही पुत्र रूप में उत्पन्न होता है, इस दृष्टि से अपने पूर्वज पिता का भी आश्रय माता होती है और इसीलिए वह परमगुरु है।
The mother is the Ultimate Guru since the male is born out of the mother.
मातरं पितरं चोभौ दृष्ट्वा पुत्रस्तु धर्मवित्। प्रणम्य मातरं पश्चात्प्र णमेत् पितरं  गुरुम्॥
धर्म को जानने वाला पुत्र माता-पिता को साथ देखकर पहले माता को प्रणाम करे, फिर पिता और गुरु को। 
The son who is virtuous should bow before the mother first followed by the father and the teacher,
माता धरित्री जननी दयार्द्रहृदया शिवा। देवी त्रिभुवनश्रेष्ठा निर्दोषा सर्वदुःखहा॥
आराधनीया परमा दया शान्तिः क्षमा धृतिः। स्वाहा स्वधा च गौरी च पद्मा च विजया जया॥
दुःखहन्त्रीति नामानि मातुरेवैकविंशतिम्। शृणुयाच्छ्रावयेन्मर्त्यः सर्वदुःखाद् विमुच्यते॥
माता, धरित्री, जननी, दयार्द्रहृदया, शिवा, देवी, त्रिभुवनश्रेष्ठा, निर्दोषा, सभी दुःखों का नाश करने वाली, आराधनीया, परमा, दया, शान्ति, क्षमा, धृति, स्वाहा, स्वधा, गौरी, पद्मा, विजया, जया और दुःखहन्त्री; ये माता के इक्कीस नाम हैं। इन्हें सुनने-सुनाने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है। 
The mother bears the child, she holds him, she him birth, she is full of kindness, she is like Maa Parwati, she is the deity, she is superior to any one in the three abodes, she is free from all defects-vices, she destroys all pains-sorrow. She is most revered, she is Ultimate, she is pity-kindness, she is peace-solace-tranquillity, she is pardon, she is firmness-determination, she is sacrifice, she is sacred holy wood-offering in fire, she is of fair colour-complexion-goodness-virtues, she is Padma-Lotus featured, she is victory, she gives victory, she eliminates pains. These are the 21 characterises-traits, names, qualities of mother nature-Maa Bhagwati. One who recites them, listens to them, worship her, prays to her becomes free from sins.
This is a teaching of the Veds.
दुःखैर्महद्भिः दूनोऽपि दृष्ट्वा मातरमीश्वरीम्। यमानन्दं लभेन्मर्त्यः स किं वाचोपपद्यते॥
बड़े बड़े दुःखों से पीडित होने पर भी भगवती माता को देखकर मनुष्य जो आनन्द प्राप्त करता है, उसे वाणी द्वारा नहीं कहा जा सकता। 
The vision-face to face interaction with Maa Bhagwati give Bliss, Ultimate pleasure making one free from pains, rigours, tortures which is beyond the power of speech-words.
इति ते  कथितं  विप्र मातृस्तोत्रं महागुणम्। पराशरमुखात् पूर्वम्अ श्रौषं मातृसंस्तवम्॥
हे ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने तुमसे महान् गुण वाले मातृस्तोत्र को कहा, इसे मैंने अपने पिता पराशर के मुख से पहले सुना था। 
Hey Brahmns! I have narrated this "Mother Worship" to you as was heard by me, from my father Mahrishi Parashar.
सेवित्वा पितरौ कश्चित्व्या धः परमधर्मवित्। लेभे सर्वज्ञतां या तु साध्यते  न तपस्विभिः॥
अपने माता पिता की सेवा करके ही किसी परम धर्मज्ञ व्याध ने उस सर्वज्ञता को पा लिया था, जो बडे बडे तपस्वी भी नहीं पाते। 
A righteous hunter-nomad in the jungle attained the Ultimate status, just by serving his parents, which is difficult to the most virtuous as well.
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन भक्तिः कार्या तु मातरि। पितर्यपीति चोक्तं वै पित्रा शक्तिसुतेन मे॥
इसलिए सब प्रयत्न करके माता और पिता की भक्ति करनी चाहिए, मेरे पिता शक्ति पुत्र पराशर जी ने भी मुझ से यही कहा था। [वेदव्यास]
"One must make all out efforts to serve his parents"; this is what was narrated to me by my father Maharishi the son of Shakti. [Bhagwan Ved Vyas]
These postulates are applicable to those mothers who care for their progeny, give them time, nourishes them, guides them, give them good moral-virtuous education, teaches them cultural values-ethics, austerities, piousness, righteousness, honesty. The mother who care for her in laws and respects her husband is comparable to Maa Bhagwati.
VIRTUOUS WOMEN IN VEDS वेदों में स्त्री की प्रशंसा :: वेद नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्रदान करते हैं। वेदों में स्त्रियों की शिक्षा-दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का जो सुन्दर वर्णन पाया जाता है, वैसा संसार के अन्य किसी धर्मग्रंथ में नहीं है| वेद उन्हें घर की सम्राज्ञी कहते हैं और देश की शासक, पृथ्वी की सम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते हैं।
वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय है। वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख-समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली, देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा-जो सबको जगाती है इत्यादि अनेक आदर सूचक नाम दिए गए हैं।
वेदों में स्त्रियों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है। उसे सदा विजयिनी कहा गया है और उन के हर काम में सहयोग और प्रोत्साहन की बात कही गई है। वैदिक काल में नारी अध्यन-अध्यापन से लेकर रणक्षेत्र में भी जाती थी। जैसे कैकयी महाराज दशरथ के साथ युद्ध में गई थी और सत्यभामा भगवान् श्री कृष्ण के साथ गरुड़ जी पर सवार होकर स्वर्ग में देवराज के साथ युद्ध में शामिल हुईं। कन्या को अपना पति स्वयं चुनने का अधिकार देकर वेद पुरुष से एक कदम आगे ही रखते हैं।
अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं जैसे अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति-दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि।
सभी स्त्रियों को एक समान आँका नहीं जा सकता। 
अरण्यानी :- संन्यास आश्रम को प्राप्त [ऋग्वेद 10.146.1]; One who attains sage hood.
उरुधारा :-  ज्ञान एवं सुशिक्षा को धारण करने वाली [यजुर्वेद 8.42]; One who achieves enlightenment and right form of education-learning.
प्रतारणी :- जीवन की पतवार [अथर्ववेद 14.2.26]; One who helps in crossing the ocean of life.
प्रतीची :- निश्चित ज्ञान वाली [अथर्ववेद 7.46.3]; One who possess absolute knowledge.
मही :- अति पूजनीय [यजुर्वेद 8.43]; One who is revered,honourable, pious, righteous, virtuous, honest.
सुभद्रिका :-  उत्तम कल्याण वाली [यजुर्वेद 23.18]; One who grants excellent welfare.
शिवा :- कल्याण कारिणी [अथर्ववेद 19.40.3]; One is inclined to welfare.
सुमंगली :- मंगल आचरण करने वाली [(अथर्ववेद 14.2.26]; One who performs virtuous deeds.
सुशेवा :- कल्याण प्रदा [(अथर्ववेद 14.2.26]; One who grants welfare.
स्तोमपृष्ठ  :- स्वाध्याय शीला [यजुर्वेद 15.3]; One who is devoted to self learning.

यजुर्वेद 20.9 :: स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है।
यजुर्वेद 17.45 :: स्त्रियों की भी सेना हो। स्त्रियों को युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें।
यजुर्वेद 10.26 :: शासकों की स्त्रियाँ अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें। जैसे राजा, लोगों का न्याय करते हैं वैसे ही रानी भी न्याय करने वाली हों।
अथर्ववेद 11.5.18 :: ब्रह्मचर्य सूक्त के इस मंत्र में कन्याओं के लिए भी ब्रह्मचर्य और विद्या ग्रहण करने के बाद ही विवाह करने के लिए कहा गया है। यह सूक्त लड़कों के समान ही कन्याओं की शिक्षा को भी विशेष महत्त्व देता है। कन्याएं ब्रह्मचर्य के सेवन से पूर्ण विदुषी और युवती होकर ही विवाह करें।
अथर्ववेद 14.1.6 :: माता-पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धीमत्ता और विद्याबल का उपहार दें। वे उसे ज्ञान का दहेज़ दें। जब कन्याएं बाहरी उपकरणों को छोड़ कर, भीतरी विद्या बल से चैतन्य स्वभाव और पदार्थों को दिव्य दृष्टि से देखने वाली और आकाश और भूमि से सुवर्ण आदि प्राप्त करने-कराने वाली हो तब सुयोग्य पति से विवाह करे।
अथर्ववेद 14.1.20 :: हे पत्नी ! हमें ज्ञान का उपदेश कर।
वधू अपनी विद्वत्ता और शुभ गुणों से पति के घर में सब को प्रसन्न कर दे।
अथर्ववेद 7.46.3 :: पति को संपत्ति कमाने के तरीके बता। संतानों को पालने वाली, निश्चित ज्ञान वाली, सह्त्रों स्तुति वाली और चारों ओर प्रभाव डालने वाली स्त्री, तुम ऐश्वर्य पाती हो। हे सुयोग्य पति की पत्नी, अपने पति को संपत्ति के लिए आगे बढ़ाओ।
अथर्ववेद 7.47.1 :: हे स्त्री ! तुम सभी कर्मों को जानती हो। हे स्त्री ! तुम हमें ऐश्वर्य और समृद्धि दो।
अथर्ववेद 7.47.2 :: तुम सब कुछ जानने वाली हमें धन – धान्य से समर्थ कर दो। हे स्त्री ! तुम हमारे धन और समृद्धि को बढ़ाओ।
अथर्ववेद 7.48.2 :: तुम हमें बुद्धि से धन दो। विदुषी, सम्माननीय, विचारशील, प्रसन्नचित्त पत्नी संपत्ति की रक्षा और वृद्धि करती है और घर में सुख़ लाती है।
अथर्ववेद 14.1.64 :: हे स्त्री ! तुम हमारे घर की प्रत्येक दिशा में ब्रह्म अर्थात् वैदिक ज्ञान का प्रयोग करो। हे वधू! विद्वानों के घर में पहुँच कर कल्याणकारिणी और सुखदायिनी होकर तुम विराजमान हो।
अथर्ववेद 2.36.5 :: हे वधू! तुम ऐश्वर्य की नौका पर चढ़ो और अपने पति को जो कि तुमने स्वयं पसंद किया है, संसार सागर के पार पहुंचा दो। हे वधू ! ऐश्वर्य कि अटूट नाव पर चढ़ और अपने पति को सफ़लता के तट पर ले चल।
अथर्ववेद 1.14.3 :: हे वर! यह वधू तुम्हारे कुल की रक्षा करने वाली है। हे वर! यह कन्या तुम्हारे कुल की रक्षा करने वाली है। यह बहुत काल तक तुम्हारे घर में निवास करे और बुद्धिमत्ता के बीज बोये।
अथर्ववेद 2.36.3 :: यह वधू पति के घर जा कर रानी बने और वहां प्रकाशित हो।
अथर्ववेद 11.1.17 :: ये स्त्रियाँ शुद्ध, पवित्र और यज्ञीय ( यज्ञ समान पूजनीय ) हैं, ये प्रजा, पशु और अन्न देतीं हैं।यह स्त्रियाँ शुद्ध स्वभाव वाली, पवित्र आचरण वाली, पूजनीय, सेवा योग्य, शुभ चरित्र वाली और विद्वत्तापूर्ण हैं। यह समाज को प्रजा, पशु और सुख़ पहुँचाती हैं।
अथर्ववेद 12.1.25 :: हे मातृभूमि ! कन्याओं में जो तेज होता है, वह हमें दो। स्त्रियों में जो सेवनीय ऐश्वर्य और कांति है, हे भूमि ! उस के साथ हमें भी मिला।
अथर्ववेद 12.2.31 :: स्त्रियाँ कभी दुख से रोयें नहीं, इन्हें निरोग रखा जाए और रत्न, आभूषण इत्यादि पहनने को दिए जाएं।
अथर्ववेद 14.1.20 :: हे वधू! तुम पति के घर में जा कर गृहपत्नी और सब को वश में रखने वाली बनों।
अथर्ववेद 14.1.50 :: हे पत्नी! अपने सौभाग्य के लिए मैं तेरा हाथ पकड़ता हूँ।
अथर्ववेद 14 2.26 :: हे वधू! तुम कल्याण करने वाली हो और घरों को उद्देश्य तक पहुंचाने वाली हो।
अथर्ववेद 14.2.71 :: हे पत्नी! मैं ज्ञानवान हूँ तू भी ज्ञानवती है, मैं सामवेद हूँ तो तू ऋग्वेद है।
अथर्ववेद 14.2.74 :: यह वधू विराट अर्थात् चमकने वाली है, इस ने सब को जीत लिया है। यह वधू बड़े ऐश्वर्य वाली और पुरुषार्थिनी हो।
अथर्ववेद 7.38.4 और 12.3.52 :: सभा और समिति में जा कर स्त्रियां भाग लें और अपने विचार प्रकट करें।
ऋग्वेद 10.85.7 :: माता-पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धिमत्ता और विद्याबल उपहार में दें। माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी कन्या को दहेज़ भी दें तो वह ज्ञान का दहेज़ हो।
ऋग्वेद 3.31.1 :: पुत्रों की ही भांति पुत्री भी अपने पिता की संपत्ति में समान रूप से उत्तराधिकारी है।
ऋग्वेद 10.1.59 :: एक गृहपत्नी प्रात : काल उठते ही अपने उद्गार कहती है।  
यह सूर्य उदय हुआ है, इस के साथ ही मेरा सौभाग्य भी ऊँचा चढ़ निकला है। मैं अपने घर और समाज की ध्वजा हूँ, उसकी मस्तक हूँ। मैं भारी व्यख्यात्री हूँ। मेरे पुत्र शत्रु विजयी हैं। मेरी पुत्री संसार में चमकती है। मैं स्वयं दुश्मनों को जीतने वाली हूँ। मेरे पति का असीम यश है। मैंने वह त्याग किया है, जिससे देवराज इन्द्र विजय पताका फहराते हैं। मुझे भी विजय मिली है।  मैंने अपने शत्रु नि:शेष कर दिए हैं।
वह सूर्य ऊपर आ गया है और मेरा सौभाग्य भी ऊँचा हो गया है। मैं जानती हूँ, अपने प्रतिस्पर्धियों को जीतकर मैंने पति के प्रेम को फ़िर से पा लिया है।
मैं प्रतीक हूँ, मैं शिर हूँ, मैं सबसे प्रमुख हूँ और अब मैं कहती हूँ कि मेरी इच्छा के अनुसार ही मेरा पति आचरण करे। प्रतिस्पर्धी मेरा कोई नहीं है।
मेरे पुत्र मेरे शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं, मेरी पुत्री रानी है, मैं विजयशील हूँ। मेरे और मेरे पति के प्रेम की व्यापक प्रसिद्धि है।
ओ प्रबुद्ध! मैंने उस अर्ध्य को अर्पण किया है, जो सबसे अधिक उदाहरणीय है और इस तरह मैं सबसे अधिक प्रसिद्ध और सामर्थ्यवान हो गई हूँ। मैंने स्वयं को अपने प्रतिस्पर्धियों से मुक्त कर लिया है।
मैं प्रतिस्पर्धियों से मुक्त हो कर, अब प्रतिस्पर्धियों की विध्वंसक हूँ और विजेता हूँ। मैंने दूसरों का वैभव ऐसे हर लिया है जैसे की वह न टिक पाने वाले कमजोर बाँध हों। मैंने मेरे प्रतिस्पर्धियों पर विजय प्राप्त कर ली है। जिससे मैं इस नायक और उस की प्रजा पर यथेष्ट शासन चला सकती हूँ।
इस मंत्र की ऋषिका और देवता दोनों ही शची हैं। शची इन्द्राणी है, शची स्वयं में राज्य की सम्राज्ञी है (जैसे कि कोई महिला प्रधानमंत्री या राष्ट्राध्यक्ष हो)। उस के पुत्र-पुत्री भी राज्य के लिए समर्पित हैं।
ऋग्वेद 1.164.41 :: ऐसे निर्मल मन वाली स्त्री जिसका मन एक पारदर्शी स्फटिक जैसे परिशुद्ध जल की तरह हो वह एक वेद, दो वेद या चार वेद, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद, अर्थवेद इत्यादि के साथ ही छ : वेदांगों, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद को प्राप्त करे और इस वैविध्यपूर्ण ज्ञान को अन्यों को भी दे।
हे स्त्री पुरुषों! जो एक वेद का अभ्यास करने वाली वा दो वेद जिसने अभ्यास किए वा चार वेदों की पढ़ने वाली वा चार वेद और चार उपवेदों की शिक्षा से युक्त वा चार वेद, चार उपवेद और व्याकरण आदि शिक्षा युक्त, अतिशय कर के विद्याओं में प्रसिद्ध होती और असंख्यात अक्षरों वाली होती हुई सब से उत्तम, आकाश के समान व्याप्त निश्चल परमात्मा के निमित्त प्रयत्न करती है और गौ स्वर्ण युक्त विदुषी स्त्रियों को शब्द कराती अर्थात् जल के समान निर्मल वचनों को छांटती अर्थात् अविद्यादी दोषों को अलग करती हुई वह संसार के लिए अत्यंत सुख करने वाली होती है।
ऋग्वेद 10.85.46 :: स्त्री को परिवार और पत्नी की महत्वपूर्ण भूमिका में चित्रित किया गया है। इसी तरह, वेद स्त्री की सामाजिक, प्रशासकीय और राष्ट्र की सम्राज्ञी के रूप का वर्णन भी करते हैं।
ऋग्वेद के कई सूक्त उषा का देवता के रूप में वर्णन करते हैं और इस उषा को एक आदर्श स्त्री के रूप में माना गया है। (1). स्त्रियाँ वीर हों, (2). स्त्रियाँ सुविज्ञ हों, (3). स्त्रियाँ यशस्वी हों, (4). स्त्रियाँ रथ पर सवारी करें, (5). स्त्रियाँ विदुषी हों, (6). स्त्रियाँ संपदा शाली और धनाढ्य हों, (7). स्त्रियाँ बुद्धिमती और ज्ञानवती हों और (8). स्त्रियाँ परिवार-समाज की रक्षक हों और सेना में जाएं।  
अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादनमेव च। गुरुपत्न्या न कार्याणि केशानां च प्रसाधनम्॥मनुस्मृति 2.211॥
गुरु की स्त्री के उबटन लगाना, स्नान कराना, देह दबाना और बाल बाँधना जैसे कार्य नहीं करने चाहियें। 
The disciple should not help in anointing-scrubbing, bathing, tying hair, pressing-comforting the body of his teacher's wife.
उबटन :: तेल+हल्दी+चन्दन का मिश्रण, अभिषेक तैल, महावर (एक प्रकार का लाल रंग जो ऐड़ियों, तलवों, पैरों में लगाया जाता है), शरीर की दुर्गन्ध को दूर करने हेतु बाह्य प्रयोग के लिए एक सुगंन्धित पाउडरbody scrub, rouge, chrism, empasma.  
गुरुपत्नी तु युवतिर्नाभिवाध्येह पादयो:। पूर्णविंशतिर्षेन गुणदोष ौ विजानता॥मनुस्मृति 2.212॥
गुण-दोष को जनाने वाला पूरे 20 वर्ष की उम्र वाले शिष्य को युवा गुरु पत्नी का पैर छूकर प्रणाम नहीं करना चाहिये। 
The disciple who is aware of what is right, what is wrong and has acquired the age of 20 years, should not honour-greet by touching the feet of his teacher's young wife.
स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम्। अतोSअर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपच्श्रितः॥मनुस्मृति 2.213॥
पुरुषों को दूषित करना स्त्रियों का स्वाभाव है, इसलिये विवेकी पुरुष युवती स्त्रियों के विषय में कभी प्रमाद नहीं करते। 
Its a part of the nature of women to befoul, debauch-seduce men. Therefore the prudent-wise men never believe-intoxicated by the young female-women.
The women may not be solely responsible for this. There are men who are equally guilty and even more guilty.
अविद्वान्समलं लोके विद्वान्समपि वा पुनः। प्रमदा ह्य ुत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम्मनुस्मृति 2.214॥
इस संसार में जो काम-क्रोध के वशीभूत हैं, चाहे मूर्ख हों या विद्वान् उनकी युवती स्त्री कुमार्ग में ले जाने में समर्थ होती है। 
Those who are under the influence of sex-passions or anger are easily misled by their young wives on a wrong path-vicious track, whether they are idiots or learned.
Women are able to lead astray any one. Only one who has control over him self, can survive the onslaught. Sages like Vishwamitr could not resist the temptation. Bhagwan Shiv too was distracted by Mohini, incarnation of Bhagwan Shri Hari Vishnu. Heaven is a place full of lust-passions and those who are led-inspired by sensuality-sexuality.
मात्रा सवस्त्रा दुहित्रावा न विविकत्तासनो। 
भवेत्  बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वान्समपि कर्षति॥मनुस्मृति 2.215॥
माता, बहन या बेटी के साथ एक आसन पर न बैठे, क्योंकि बलवान इन्द्रियों का समूह विद्वान् को भी अपनी तरफ खींच लेता है। 
One should not sit over the common seat (especially in a lonely place) with one's mother, sister or daughter; for the senses are very powerful and distract even a learned man. 
एष शौचविधिः कृत्स्नो द्रव्यशुद्धिस्तथैव च।  उक्तो वः सर्ववर्णानां स्त्रीणां धर्मान्निबोधतमनुस्मृति 5.146
यह सब वर्णों के अशौच की व्यवस्था और द्रव्य शुद्धि की विधि आप लोगों से कही। अब स्त्रियों के धर्म सुनिये। The procedure, rules, methods for the purification of all castes and the materials have been described. Now, listen to the duties-Dharm of the women.
बालया वा युवत्या वा वृद्धया वाऽपि योषिता। 
न स्वातन्त्र्येण कर्तव्यं किंचित्कार्यं गृहेष्वपिमनुस्मृति 5.147
बालिका हो या युवती या वृद्धा स्त्री को स्वतन्त्रता पूर्वक घर का कोई काम नहीं करना चाहिये। 
Whether she is an adolescent, grownup or old, the female should not accept any responsibility of her own, in the family-house.
बाल्ये पितुर्वशे तिष्ठेत्पाणिग्राहस्य यौवने।पुत्राणां भर्तरि प्रेते न भजेत्स्त्री स्वतन्त्रताम्मनुस्मृति 5.148
स्त्री बाल्यकाल में पिता, यौवनावस्था में पति के और पति के परलोक सिधारने पर पुत्रों के अधीन होकर रहे। कभी स्वतंत्र होकर न रहे। 
The woman should remain under the protection-shelter of the father in childhood, under the husband in her youth and after the death of the husband she should seek protection under the sons.
The uncivilised, indecent, criminal mind, treat women as a commodity for use as a sex object and therefore, she is always vulnerable to the poachers, who mislead, misguide, lure her to indecent jobs, acts, obscenity. They call it the freedom of women. They incite her to be bold and remain independent. The result is obvious, so many rape cases, abductions, murders, sale of women for prostitution, trafficking etc. etc. Though the time is changing fast, values are changing the mentality remains the same.
पित्रा भर्त्रा सुतैर्वापि नेच्छेद्विरहमात्मनः। एषां हि विरहेण स्त्री गर्ह्ये कुर्यादुभे कुलेमनुस्मृति 5.149
पिता, पति या पुत्र से अलग रहने की इच्छा न करे; क्योंकि इनसे अलग रहने वाली स्त्री दोनों कुलों (पिता और पति) को निन्दित करती है। 
The woman who deserts her father, husband or the sons, bring slur-bad name to her father and the husband's family-clan.
Such women do not deserve any respect in the society. Every one lucks at her with greed and contempt.
सदाप्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्ये च दक्षया। सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तहस्तयामनुस्मृति 5.150
 स्त्री को सदा प्रसन्न रहकर दक्षता से साथ घर के कामों को संभालना चाहिये। नित्य व्यवहार में आने वाली सामग्रियों (आभूषण, बर्तन इत्यादि) को साफ़ रखना चाहिये और जहाँ तक हो सके कम खर्च करना चाहिये। 
The woman should look after family chores with expertise & efficiency, happily. She should maintain the domestic goods in good running-working and try to curtail the expenditure as far as possible.
Since ancient times, the women have been looking after the family. They were not over ambitious or expecting too much beyond limits. In today's context, the desires and expectations have gone up too high, many fold. The husband looks for an earning hand and staple-extra income. They want all comfort-amenities-luxuries. The wife joins late night parties, remains away from her husband for months, abroad or at distant place. Divorce, separation, living without marriage, having multiple sex partners; is the order of the day for some. There is no question of virtues, morals or ethics.
यस्मै दद्यात्पिता त्वेनां भ्राता वाऽनुमते पितुः। तं शुश्रूषेत जीवन्तं संस्थितं च न लङ्घयेत्मनुस्मृति 5.151
पिता या पिता की आज्ञा से भाई जिस पुरुष का हाथ थमा दे, जीवित अवस्था में शुद्ध हृदय से उसकी सेवा करे और उसके मरने पर धर्म का उलंघन न करे। 
She should serve the person to whom she has been married to, by the father or the brother over the directions of the father, as long as the husband is alive and thereafter she should live a virtuous, religious, pious life.
The woman should live her sons, discards advances by the other people and maintain her dignity, after the death of her husband. She should not remarry.
मङ्गलार्थं स्वस्त्ययनं यज्ञश्चासां प्रजापतेः। प्रयुज्यते विवाहेषु प्रदानं स्वाम्यकारणम्मनुस्मृति 5.152
विवाह में इन दोनों पति-पत्नियों के लिये स्वस्त्ययन और प्रजापति के उद्देश्य से जो हवन किया जाता है, वह उनके कल्याण निमित्तक कर्म है। परन्तु वाग्दान के अनन्तर स्त्री पर स्वामी का अधिकार हो जाता है। 
The rites-rituals performed at the occasion with Hawan-sacrifices in holi fire are meant for the satisfaction of the deities, demigods & the creator Brahma Ji and are meant for the benefit-auspicious marriage  of the couple. After the ceremony is over the woman is wedded to the husband.
The couple constitutes of two equally responsible-important person. The male looks after the affairs of the family out side the home and the female takes controls of the family affairs. More responsibility is shared by the husband, therefore he is the leader. The family grows with mutual respect, faith and cooperation.
अनृतावृतुकाले च मन्त्रसंस्कारकृत्पतिः। सुखस्य नित्यं दातेह परलोके च योषितःमनुस्मृति 5.153
मन्त्र-संस्कार द्वारा प्राप्त पति ऋतुकाल में और अनृतुकाल में स्त्री को यहाँ नित्य सुख देता है और परलोक में भी सुख देने वाला होता है। 
The husband obtained by the wife with the recitation of rites, rituals, sacred text; gives pleasure-comfort to the wife during mating season and thereafter as well, in this world and the next abode-birth simultaneously.
The knot is tied for many more births. The couple might be husband and wife earlier as well in previous births. The harmony, bond, ties, cordial relations established between them perpetuate for more incarnations till they attain Salvation due to their sacred, pious, virtuous, righteous behaviour, relations.
विशीलः कामवृत्तो वा गुणैर्वा परिवर्जितः। उपचर्यः स्त्रिया साध्व्या सततं देववत्पतिःमनुस्मृति 5.154
यदि पति अनाचारी हो परस्त्री में अनुरक्त हो या विद्यादि गुणों से रहित तो भी साध्वी स्त्री को देवता की तरह अपने पति की सेवा करनी चाहिये। 
The pious-holi woman should not deviate from her righteous duties even if the husband is a wretched person attached to some other woman and is devoid of virtues, education; like a deity.
नास्ति स्त्रीणां पृथग्यज्ञो न व्रतं नाप्युपोषणम्। पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गे महीयतेमनुस्मृति 5.155
स्त्रियों के लिये न अलग यज्ञ है, न व्रत है और न उपवास है।  पति  की सेवा से ही वह स्वर्ग लोक में पूजित होती है।The scriptures have not specified any separate Hawan-Yagy-Agnihotr-sacrifices, fasts or vows. Serving the husband grants her every thing and she is given a respectable place in the heaven, after her death.
Its sufficient for her to carry out family responsibilities with happiness, devotion and love to attain highest position in the three worlds i.e., heaven earth and the netherworld.
पाणिग्राहस्य साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा। 
पतिलोकमभीप्सन्ती नाचरेत्किंचिदप्रियम्मनुस्मृति 5.156
 स्वर्गलोक पाने की इच्छा वाली सुशीला स्त्री अपने जीवित या दिवंगत पति के लिये कुछ भी अप्रिय न करे। 
The virtuous woman who long-desire for heaven should not do any thing disliked by her living or deceased husband.
कामं तु क्षपयेद्देहं पुष्पमूलफलैः शुभैः। न तु नामापि गृह्णीयात्पत्यौ प्रेते परस्य तुमनुस्मृति 5.157
पति के स्वर्गवास के बाद स्त्री पवित्र फल-फूल और कंद-मूल खाकर देह को क्षीण करे, परन्तु पर पुरुष का कभी नाम न ले (कल्पना, विचार ने करे)। 
The woman may eat fruits, flowers, rhizomes, roots or tumours, till she survive and reduce her weight (if good, regular food is not available, unfortunately) instead of looking for some other person after the death of her husband. It would keep her mentally, physically and spiritually fit and fine.
She should maintain her fidelity-purity-chastity, modesty and honour.
आसीतामरणात्क्षान्ता नियता ब्रह्मचारिणी। यो धर्म एकपत्नीनां काङ्क्षन्ती तमनुत्तमम्5.158
विधवा स्त्री पतिव्रता के उत्तम धर्मों का पालन करती हुई मरते दम तक श्रमायुक्त और नियम पूर्वक ब्रह्मचारिणी होकर रहे। 
The widow should follow the tenants described in the scriptures for virtuous living for her, aided with regular routine work-deeds-responsibilities, forgiveness and chastity till death.
अनेकानि सहस्राणि कुमारब्रह्मचारिणाम्। दिवं गतानि विप्राणामकृत्वा कुलसंततिम्5.159
हजारों अविवाहित ब्रह्मचारी ब्राह्मण वंश वृद्धि के लिये पुत्र का उत्पादन न करके भी स्वर्गलोक को गए हैं। Thousands of unmarried Brahmn following chastity have gone to Heaven without having a son.
So, the widow can also attain heaven just by following virtuous-pious routine, without remarrying or having a son.
मृते भर्तरि साध्वी स्त्री ब्रह्मचर्ये व्यवस्थिता। स्वर्गं गच्छत्यपुत्रापि यथा ते ब्रह्मचारिणः5.160
जो पतिव्रता स्त्री पति के मरने के बाद ब्रह्मचर्य में स्थिर रहती है, वह पुत्रहीना होने पर भी ब्रह्मचारी पुरुषों की भांति स्वर्गलोक को जाती है। 
The woman who has been devoted to her husband and observes chastity even after his death reaches the heaven, like the chaste males in spite of being issue less or delivering a son. 
अपत्यलोभाद्या तु स्त्री भर्तारमतिवर्तते। सेह निन्दामवाप्नोति परलोकाच्च हीयते5.161
स्त्री सन्तान के लोभ में पति का अतिक्रमण करती है (अर्थात परपुरुष से व्यभिचार करती है), इस लोक में तो उसकी निंदा होती ही है और वह परलोक से भी भ्रष्ट होती है। 
The woman who makes illicit relation with other person for want of a son by discarding her husband, invite slur in this world and spoils her next births as well.
नान्योत्पन्ना प्रजास्तीह न चाप्यन्यपरिग्रहे।  न द्वितीयश्च साध्वीनां क्वचिद्भर्तोपदिश्यते5.162
अन्य पुरुष से उत्पन्न वह पुत्र-सन्तान शास्त्र सम्मत नहीं है और दूसरे की स्त्री में उत्पादित संतान भी उत्पादक की नहीं होती। पतिव्रता स्त्रियों को दूसरे पति का उपदेश कहीं नहीं दिया गया। 
The child born out of illicit relations is not favoured by the scriptures or the learned and the producer-father of that child can not claim to be its progenitor. No where in scriptures such a relation of having second husband is favoured-prescribed-suggested.
During the current phase some woman enter into illicit relations with other males to avoid the torture of her in laws, where she is sure that her husband is incompetent-important. Dhratrashtr, Pandu and Vidur got birth through method through Bhagwan Ved Vyas. Pandu had 5 sons from demigods. Karn was also born out of such relations only. At one stage Vashishth had to enter into such relations in the clan called Ikshvaku Vansh. Now a days women contact sperm banks for progeny, tough its s sin. This tradition is called NIYOG PRATHA.
Both Kunti & Draupadi were called Chir Kumari-always virgin-pure. 
The virtuous woman is neither motivated-derived by sex nor by the lust. She just follow the dictates of her husband & is not a sinner.
Neither Vashishth nor Bhagwan Ved Vyas had sexual desires, inclination, motivation or attachment for the women. 
पतिं हित्वाऽपकृष्टं स्वमुत्कृष्टं या निषेवते। निन्द्यैव सा भवेल्लोके परपूर्वेति चोच्यते5.163 
जो स्त्री अपने गुणहीन पति को छोड़कर किसी अन्य श्रेष्ठ पुरुष को स्वीकार करती है, वह समाज में निंदनीय है। लोग उसे व्याभिचारिणी कहकर निन्दा करते है। 
The woman who discard-rejects her inferior husband for a better substitute-an excellent person, is condemned as a whore-prostitute or a woman of bad character. She do not get respect in the society.
In today's context such women are ministers, first lady of an advanced country, chief ministers of states and even prime ministers. The impact of western countries has cast its shadow over India. One found several girls who entered into sexual alliance with several person prior to marriage.
The current life style has turned a large population of male into infertile youth and still they marry. The results are obvious.
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोकेप्राप्नोति निन्द्यताम्। शृगालयोनिं प्राप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते5.164
पर पुरुष के साथ व्यभिचार करने से स्त्री संसार में निन्दित समझी जाती है और मरने के बाद शृगाल (गीदड़ी) होती है तथा कुष्ठादि रोगों से पीड़ित होती है। 
The woman who is involved in sex with the other man is disgraced in the world and become a jackal in next birth and suffers from diseases like leprosy in the current birth. 
She may have venereal-sexually transmitted diseases, AIDS, HIV etc.There is no one to look after her in old age and she gets a painful death.
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयुता। सा भर्तृलोकमाप्नोति सद्भिः साध्वीति चोच्यते5.165
जो मन वचन और क्रिया से पति के विरुद्ध आचरण नहीं करती, वह पतिलोक को जाती है और इस लोक में अच्छे लोग पतिव्रता कहकर प्रसंशा करते हैं। 
The virtuous woman who do act against her husband through deeds, desire, psyche-inner self, meets her husband in next birth as well and the society praises her as one who is devoted to her husband.
अनेन नारीवृत्तेन मनोवाग्देहसंयुता। इहाग्र्यां कीर्तिमाप्नोति पतिलोकं परत्र च5.166
इस नारी धर्म के अनुसार जो स्त्री तन, मन, वचन से पति की सेवा करती है, वह इस लोक में सुयश पाती है और मरने के बाद स्वर्ग सुख भोगति है। 
The virtuous woman who serves her husband with body, mind and pleasing words following the duties-Dharm of women described in scriptures gets honour-respect in this society and gets the comforts of heaven in next birth or gets heaven.
भार्या पुत्रश्च दासश्च प्रेष्यो भ्रात्रा च सोदरः। 
प्राप्तापराधास्ताड्याः स्यू रज्ज्वा वेणुदलेन वामनुस्मृति8.299॥
पत्नी, पुत्र, नौकर-दास, शिष्य और सगे भाई, ये लोग यदि कोई अपराध करें तो रस्सी या बाँस की पतली छड़ी से ताड़ना देनी चाहिये।
The wife, son, slave, pupil and  the real brother shall be beaten-thrashed with a fine rope or or a fine bamboo stick.
It becomes essential to punish when they become disobedient or argumentative. their conduct-character shall also be observed carefully and they deserve to be punished if they do not correct themselves.
Tulsidas too has said, "ढोल, गँवार, शूद्र, पशु और नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी" 

Its essential to keep them under control. Here Shudr stands for servants, paid workers, slaves. Achary Chanky to supported this.
REASONS BEHIND LOYALTY OF WOMAN TO HER HUSBAND :: Three reason are there for a woman to be devoted-honest-loyal-dedication to her husband:
(1). Detachment-distaste for the other person, 
(2). Love and affection for the husband and
(3). Capability-capacity-strength-power to protect herself.
One can keep his wife under control through four means :: (1). Excellent woman :- By means of incantation, understanding, good will, love and affection.
(2). Middle order-ranking, medium, ordinary woman :: Through gifts, fulfilment of needs-desires-essentials.
(3). Lower status, order, inferior, base, mean woman :: By bribing, threat, differentiation and punishment and
(4). Lower status, order, inferior, base, mean, wretched woman :: Through guile.
One should reconcile with the inferior woman (make her happy, please) through gifts, love and flattery-praise, after punishment-reproach.
GUILE :: छल, माया, धोखा, कपट, मक्कारी, धूर्तता, फरेब; deceit, stealth, deception, subterfuge, fraud, illusion, hallucination, reverie, delusion, phantasm, cheat, bluff, spoof, ambitiousness, baloney, cabal, chicane, shiftiness, canniness, deceptiveness, astuteness, craftiness, slimness, foxiness, seduction, trickery,  artifice.  
A characterless woman who acts against her husband is like the venom-poison. She deserve to be divorced-separated-rejected-doomed.
A woman born in a noble-respected-honourable family, blessed with values, ethics, virtues, piousity, righteousness, must be honoured, loved, admired, praised.
Extreme poverty, extreme beauty, company of wicked person, free-independent-bold nature, volatile nature, betrays husband, uses  alcohol-narcotics, eats banned-improper-harmful food (meat, fish, onion garlic etc),  likes-visits social gatherings (against the desire of her family, husband, parents, in laws) alone, shirks work,  avoids sex with her husband, involves-does black magic, bewitch, enchantment, seductive, alluring acts; nun-beggar, whore-prostitute, woman who seduce-attracts other women-girls to prostitution, flirts-liaison with other male, wet nurse-mid wife, acrobat (dancer, actor, film star, mischievous, naughty, playful, roguish), loves the company of bad (rough, wicked, undignified woman), visits celebrations-functions-religious places (shrines, temples, holy places) beyond limit against the desires of her husband-family or intermixes with saints, religious, social, public personalities,  separates (desert, ditches, be fools, dodges, cheats her husband), mixes, enjoys, likes the company of male, extremely cruel, portrays to be extremely diligent-though in fact not so, dare devil, envious, cunning and miser, under the control-impression of other woman etc., are the acts-deeds which leads to the down fall, destruction, spoiling of a woman. One should distance himself from such wretched women. One who is under the control of such a woman is incapable, incompetent. A person of this attitude-inclination always invite criticism, defame,-bad name.
The  pious, ethical, virtuous, respected, honourable woman constitute the better half of a man and one must not  act against her. Without the association of wife all religious ceremonies-acts, rites, donations-charity become fruitless-ineffective.
स्त्री के पतिव्रता होने के तीन कारण  :: (1). पर पुरुष से विरक्ति, (2). पति प्रीति व (3). अपनी रक्षा की सामर्थ। उत्तम स्त्री साम से, माध्यम स्त्री दान और भेद से तथा अधम स्त्री को भेद व दंड नीति से वश में रखा जा सकता है (मनुस्मृति 8.299)। अधम स्त्री को दंड के उपरांत साम-दान आदि से प्रसन्न कर लेना चाहिये। भर्ता-पति का अहित करने वाली, व्यभिचारणी स्त्री काल कूट विष के समान होती है, उसका परित्याग करना ही श्रेयकर है। उत्तम कुल में उत्पन्न पतिव्रता, पति का हित चाहने वाली स्त्री का सदा ही आदर-सत्कार  करना चाहिये। 
दरिद्रता, अति-रूपवान, असत-जनों से संग, स्वतंत्र, पेयादी (मदिरा, नशा) करने वाली, अभक्ष्य-भक्षण करने वाली, कथा-गोष्ठी पसंद वाली, काम से बचने वाली, जादू-टोना करने वाली, भिक्षुणी, कुट्टनी, दाई, नटी, दुष्ट स्त्रियों का संग करने वाली, उद्यान (यात्रा, निमन्त्रण, अत्यधिक तीर्थ यात्रा या देवता के दर्शन करने-घूमने वाली), पति से वियोग वाली, कठोर व्यवहार करने वाली, अन्य पुरुषों से अत्यधिक वार्तालाप करने वाली, अति क्रूर, अति सौम्य, अति निडर, ईर्षालु तथा कृपण, अन्य स्त्री के वशी भूत आदि-स्त्री के दोष व उसके विनाश के कारण-हेतु बनते हैं। ऐसी स्त्री के अधीन होना पुरुष की अयोग्यता ही है। ऐसा पुरुष निंदा का पात्र बनता है। 
नारी पुरुष का आधा शरीर है। अत: सदैव उसका आदर करने चाहिए और उसके प्रतिकूल नहीं जाना चाहिये क्योंकि उसके बिना धर्म-क्रियाएँ सफल नहीं होतीं। पति की सम्यक आराधना करने से उसे प्रेम की प्राप्ति होती है। आराधना करने योग्य पति की चित्त व्रती जानकर उसके अनुकूल चलना चाहिए। यही स्त्री का मुख्य धर्म है। पुत्र और स्वर्ग का सुख भी प्राप्त होता है। स्त्री के लिए पति सेवा एक उत्तम धर्म है। कलयुग में मात्र पति सेवा से ही पत्नी को मोक्ष प्राप्त हो सकता है। स्त्री का पति पर शासन अनर्थ कारी-दुःख दायक है। पति के जीवित रहते, व बाद में पुत्र के हितकारी  निर्देश उसे सब धर्मों की प्राप्ति करा देते हैं। 
हास-परिहास करने वाली, पति के मित्र-देवर-पर पुरुष के साथ एकांत में रमण करने वाली, स्वछंद, मुक्त-उन्मुक्त,  गंदे-भद्दे-फूअड़  इशारे-मजाक करने वालों  के संग रखने वाली, निर्भीक स्त्री अपना शील खो बैठती है (शायद इसी लिए वह यह सब करती हो)। 
दुष्ट, अनुचित आग्रह, वार्तालाप, हास्य युक्त संकेत करने वालों से स्त्री को सर्वथा दूर रहना चाहिये। 
घर के द्वार पर बैठने-खड़े होने वाली स्त्री से संपर्क नहीं रखना चाहिए। जान बुझ कर पुरुषों के बीच से निकलने वाली, ऊँचे स्वर में बोलने वाली, हँसी-मजाक करने वाली, दृष्टि-वाणी-शरीर से चपलता प्रदर्शित करने वाली, खंखालने  वाली, सीत्कारी भरने वाली, दुष्टा-भिक्षुकी-तांत्रिक-मान्त्रिक, उनके मंडलों में निवास करने वाली स्त्री त्याज्य हैं। 
उत्तम स्त्री मन, क्रम, वचन से पति को देवता समझती है। देवता, पितृ, अभ्यागतों, बुजुर्गों, बच्चों  के भोजन आदि का पूरा ख्याल रखती है। साथ ही साथ वह सेवकों को संतुष्ट रखती है। दुष्ट, अवज्ञाकारी, अशिष्ट, अकर्मण्य सेवकों को घर-काम से अलग कर देती है। पूजा-पाठ, आराधना, ब्राह्मण सेवा आदि में तत्पर रहती है। सब को खिलाकर ही खाती है। अनावश्यक कभी घर से बाहर कदम नहीं रखती। 
जिस औरत का पति परदेस गया हो, उसे खेल कूद, शृंगार, हंसी मजाक नहीं करना चाहिए, सामाजिक उत्सवोँ में भाग नहीं लेना चाहिये और पराये घर नहीं जाना चाहिए।[याज्ञवल्क्य स्मृति]
A woman should abide by the wishes of her husband instead of others, since he is more concerned about her as compared to them. Wife should not dominate her husband. Those women who dominate the husband give birth to female child.  Husband may seek her opinion/consult  her, time and again, pertaining to vital matters. Her thoughts/suggestions should be regarded/kept in the mind by the husband. She must not interfere with the day to day working of her husband. She should not allow unknown-known, person to stay at her home, in the absence of her husband under any circumstances. Earlier there used to be two sections of the house Ghar (-घर)-meant for women and children and Gher (-घेर, enclosure) meant for the male, animals, agriculture equipment in addition to guests.
Husband and wife are like the two tyres/wheels of a bike. There is a woman behind the success of a man, its rightly said, time and again. Both, the husband and wife should regard-respect-honor the sentiments of each other.
The woman who's husband has gone abroad-away from home should not take part in games, desist from make up, should not participate in social-cultural activities, should not cut jokes or mix up with other males.[Yagyvalky Smrati]
स्त्री को पतिव्रता, आज्ञाकारिणी होना चाहिये। उसे पर पुरुष से किसी प्रकार का अनावश्यक व्यवहार-सम्पर्क नहीं करना चाहिए। उसने और पति  ने एक-दूसरे का साथ निभाने का वचन दिया है। उसे अपने पति को अपने आधीन रखने का प्रयास कदापि नहीं करना चाहिए। जो स्त्रियाँ अपने पति पर किसी भी कारण से भारी पड़ती है, वे सामान्यतया लड़कियों को जन्म देती हैं। कामरूप, पहाड़ी प्रदेश में घर-परिवार की मुखिया आम तौर पर औरत ही होती है।  पहाड़ पर पाँचली प्रथा प्रचलित है। ऐसा भी देखा गया है की उन स्त्री के एक साथ दस-दस लोगों से संबन्ध होते हैं।  इसका कारण उन पुरुषों में वीर्य की कमी-कमजोरी का होना बताया गया है। वे लोग जमीन जायदाद ना बटे इसके लिए भी यह मार्ग अपनाते हैं।  कुछ जगहों पर लड़कियों की सीमित संख्या भी कारण बन जाती है। हरियाणा में भ्रूण हत्या इसका कारण है। पुरुष को चाहिए कि अहम मसलों पर वह अपनी पत्नी की सलाह ले ले। अन्यथा स्त्री लिए उचित है कि वह उसके काम-काज में अनावश्यक दखलंदाजी ना करे। उसे उचित है कि पर पुरुष को घर में प्रवेश ना करने दे और ना ही उससे हंसी-मजाक-ठठ्ठा करे। पहले समय में घर और घेर इसी कारण से अलग-अलग बनाये जाते थे। स्त्री और पुरुष साइकल के दो टायर जैसे होते हैं; एक के बगैर दूसरा अनुपयोगी-अनुपुक्त हो जाता है। प्रत्येक पुरुष की सफलता के पीछे एक स्त्री का हाथ होना स्वीकार किया जाता रहा है। स्त्री और पुरुष दोनों ही को चाहिए कि वे एक दूसरे के सम्मान-आदर-भावनाओं का ख्याल रखें। 
विवाहित पुरुष के लिए अन्य नारी ऐसे है जैसे जहर। कहा गया है कि पर नारी पुरुष के लिए नरक का द्वार है। 
विदर्भ नरेश सत्यकेतु की पुत्री का विवाह मथुरा नरेश उग्रसेन के साथ हुआ था। सत्य केतु अपनी पुत्री को बहुत चाहते थे।  उन्होंने उसे बुलवा लिया। पद्मावती पिता के घर आकर  पुन: बालिकाओं की तरह व्यवहार करते हुए लाज-शर्म, संकोच खो बैठी। उसे कुबेर के गोभिल नामक सेवक ने विमान से जाते हुए देखा और उसने राजा उग्रसेन का रूप धारण करके उसके साथ सहवास किया।जिसके उपरांत पद्मावती ने उसे लिंग पर उग्रसेन के चिन्ह न होने से पहचान लिया। पद्मावती ने स्वयम को सती व धर्म  परायण बताया, तो दैत्य गोविल ने पतिव्रत के बारे में निम्न लक्षणों का वर्णन किया:-
(1). पतियों का निरंतर चिन्तन ही सतियों के ज्ञान का तत्व है। 
(2). जो स्त्री प्रति दिन मन, वाणी और क्रिया द्वारा अपने स्वामी की सेवा करती है, पति के संतुष्ट रहने पर स्वयं भी संतोष का अनुभव करती है, पति के क्रोधी होने पर भी उसका त्याग नहीं करती, उसके दोषों की ओर ध्यान नहीं देती उसके मारने-प्रताड़ित करने पर भी प्रसन्न रहती है और स्वामी के सब कामों में आगे रहती है वही नारी पतिव्रता कही गयी है।
(3). यदि स्त्री इस लोक में अपने कल्याण करना चाहती है तो वह पतित, रोगी, अंगहीन, कोढ़ी, सब धर्मों से रहित पापी पति का भी परित्याग न करे। 
(4). जो स्त्री  स्वामी को छोड़कर जाती है और अन्य-अन्य कार्यों में  मन लगाती है, वह संसार में सब धर्मों से बहिष्क्रत  व्याभिचारणी समझी जाती है। 
(5). जो स्त्री  पति की अनुपस्थिति में लोलुप्तावश ग्राम्य भोग तथा श्रंगार का सेवन करती है, उसे मनुष्य कुलटा कहते हैं। 
पद्मावती ने कंस (-नाजायज सन्तान) को जन्म दिया, जिसका संहार करने के लिये भगवान् श्री कृष्ण ने अवतार ग्रहण किया और पृथ्वी का बोझ उतारा। स्त्रियों के लक्षण :: स्त्रियों को मुख्यतः निम्न पांंच वर्गों में बाटा गया है :- (1). शंखिनी (Shankhini) :- शंखिनी स्वभाव की स्त्रियां अन्य स्त्रियों से थोड़ी लंबी होती हैं। इनमें से कुछ मोटी और कुछ दुर्बल होती हैं। इनकी नाक मोटी, आंखें अस्थिर और आवाज गंभीर होती है। ये हमेशा अप्रसन्न ही दिखाई देती हैं और बिना कारण ही क्रोध किया करती हैं।ये पति से रूठी रहती हैं, पति की बात मानना इन्हें गुलामी की तरह लगता है। इनका मन सदैव भोग-विलास में डूबा रहता है। इनमें दया भाव भी नहीं होता। इसलिए ये परिवार में रहते हुए भी उनसे अलग ही रहती हैं। ऐसी स्त्रियां संसार में अधिक होती हैं।ऐसी लड़कियां चुगली करने वाली यानी इधर की बात उधर करने वाली होती हैं। ये अधिक बोलती हैं। इसलिए लोग इनके सामने कम ही बोलते हैं। इनकी आयु लंबी होती हैं। इनके सामने ही दोनों कुल (पिता व पति) नष्ट हो जाते हैं। अंत समय में बहुत दु:ख भोगती हैं। ये उस समय मरने की बारंबार इच्छा करती हैं, लेकिन इनकी मृत्यु नहीं होती।
(2). चित्रिणी(Chitrini) :- चित्रिणी स्त्रियां पतिव्रता, स्वजनों पर स्नेह करने वाली होती हैं। ये हर कार्य बड़ी ही शीघ्रता से करती हैं। इनमें भोग की इच्छा कम होती है। श्रृंगार आदि में इनका मन अधिक लगता है। इनसे अधिक मेहनत वाला काम नहीं होता, परंतु ये बुद्धिमान और विदुषी होती हैं।गाना-बजाना और चित्रकला इन्हें विशेष प्रिय होता है। ये तीर्थ, व्रत और साधु-संतों की सेवा करने वाली होती हैं। ये दिखने में बहुत ही सुंदर होती हैं।इनका मस्तक गोलाकार, अंग कोमल और आंखें चंचल होती हैं। इनका स्वर कोयल के समान होता है। बाल काले होते हैं। इस जाति की लड़कियां बहुत कम होती हैं। यदि इनका जन्म गरीब परिवार में भी हो तो ये अपने भविष्य में पटरानी के समान सुख भोगती हैं।अधिक संतान होने पर भी इनकी लगभग तीन संतान ही जीवित रहती हैं, उनमें से एक को राजयोग होता है। इस जाति की लड़कियों की आयु लगभग 48 वर्ष होती है।
(3). हस्तिनी (Hastini) :- इस जाति की लड़कियों का स्वभाव बदलता रहता है। इनमें भोग-विलास की इच्छा अधिक होती है। ये हंसमुख स्वभाव की होती हैं और भोजन अधिक करती हैं। इनका शरीर थोड़ा मोटा होता है। ये प्राय: आलसी होती हैं।इनके गाल, नाक, कान और व मस्तक का रंग गोरा होता है। इन्हें क्रोध अधिक आता है। कभी-कभी इनका स्वभाव बहुत क्रूर हो जाता है। इनके पैरों की उंगलियां टेढ़ी-मेढ़ी होती हैं। इनकी संतानों में लड़के अधिक होते हैं। ये बिना रोग के ही रोगी बनी रहती हैं। इनका पति सुंदर और गुणवान होता है।अपने झगड़ालू स्वभाव के कारण ये परिवार को क्लेश पहुंचाती हैं। इनके पति इनसे दु:खी होते हैं। धार्मिक कार्यों के प्रति इनकी आस्था नहीं होती। इन्हें स्वादिष्ट भोजन पसंद होता है। इनकी परम आयु 73 वर्ष होती है। विवाह के 4, 8, 12 अथवा 16वें वर्ष में इनके पति का भाग्योदय होता है। इनके कई गर्भ खंडित हो जाते हैं। इन्हें अपने जीवन में अनेक कष्ट झेलने पड़ते हैं, लेकिन इसका कारण भी ये स्वयं ही होती हैं। इनके दुष्ट स्वभाव के कारण ही परिवार में भी इनकी पूछ-परख नहीं होती।
(4). पुंश्चली (Punshchali) :- पुंश्चली स्वभाव की लड़कियों के मस्तक का चमकीला बिंदु भी मलीन दिखाई देता है। इस स्वभाव वाली महिलाएं अपने परिवार के लिए दु:ख का कारण बनती हैं।इनमें लज्जा नहीं होती और ये अपने हाव-भाव से कटाक्ष करने वाली होती हैं। इनके हाथ में नव रेखाएं होती हैं जो सिद्ध (पुण्य, पद्म), स्वस्तिक आदि उत्तम रेखाओं से रहित होती हैं। इनका मन अपने पति की अपेक्षा पर पुरुषों में अधिक लगता है। इसलिए कोई इनका मान-सम्मान नहीं करता। सभी इनकी अपेक्षा करते हैं।
पुंश्चली स्त्रियों में युवावस्था के लक्षण 12 वर्ष की आयु में ही दिखाई देने लगते हैं। इनकी आंखें बड़ी और हाथ-पैर छोटे होते हैं। स्वर तीखा होता है।यदि ये किसी से सामान्य रूप से बात भी करती हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे ये विवाद कर रही हैं। इनकी भाग्य रेखा व पुण्य रेखा छिन्न-भिन्न रहती है। इनके हाथ में दो शंख रेखाएँ व नाक पर तिल होता है।
(5). पद्मिनी (Padmini) :- समुद्र शास्त्र के अनुसार पद्मिनी स्त्रियां सुशील, धर्म में विश्वास रखने वाली, माता-पिता की सेवा करने वाली व अति सुंदर होती हैं। इनके शरीर से कमल के समान सुगंध आती है। यह लंबे कद व कोमल बालों वाली होती हैं। इसकी बोली मधुर होती है। पहली नजर में ही ये सभी को आकर्षित कर लेती हैं। इनकी आंखें सामान्य से थोड़ी बड़ी होती हैं। ये अपने पति के प्रति समर्पित रहती हैं। इनके नाक, कान और हाथ की उंगलियां छोटी होती हैं। इसकी गर्दन शंख के समान रहती है व इनके मुख पर सदा प्रसन्नता दिखाई देती है।पद्मिनी स्त्रियां प्रत्येक बड़े पुरुष को पिता के समान, अपनी उम्र के पुरुषों को भाई तथा छोटों को पुत्र के समान समझती हैं।यह देवता, गंधर्व, मनुष्य सबका मन मोह लेने में सक्षम होती हैं। यह सौभाग्यवती, अल्प संतान वाली, पतिव्रताओं में श्रेष्ठ, योग्य संतान उत्तपन्न करने वाली तथा आश्रितों का पालन करने वाली होती हैं।इन्हें लाल वस्त्र अधिक प्रिय होते हैं। इस जाति की लड़कियां बहुत कम होती हैं। जिनसे इनका विवाह होता है, वह पुरुष भी भाग्यशाली होता है।
पुराणों का कथन :: दिति की बात सुनकर कश्यप जी मन ही मन पछताने लगे और मन ही मन कहने लगे :- स्त्रियों का चरित्र कौन नहीं जानता। इनका मुँह तो ऐसा है, जैसे शरद ऋतु का खिला हुआ कमल। बातें सुनने में ऐसी मीठी होती हैं, मानों अमृत घोल रखा हो।  परन्तु हृदय, वह तो इतना तीखा होता है मानों छुरे की धार। [श्रीमद्भागवत 6-18-41]
इसमें संदेह नहीं कि स्त्रियाँ लालसाओं की कठपुतली होती हैं। सच पूछो तो वे किसी से प्यार नहीं करतीं। स्वार्थवश वे अपने पति, पुत्र और भाई तक को मार डालती हैं या मरवा डालती हैं।  [श्रीमद्भागवत 6-18-42]
उर्वशी ने पुरुरवा से कहा:  स्त्रियों की किसी के साथ मित्रता नहीं होती। उनका और भेड़िये का हृदय एक जैसा होता है। [श्रीमद्भागवत 9-14-36]
स्त्रियाँ निर्दय होती हैं। क्रूरता उनमें स्वाभाविक होती है।  तनिक सी बात पर चिढ़ जाती हैं और अपने सुख के लिए बड़े-बड़े साहस के काम के बैठती हैं। थोड़े से स्वार्थ के लिये विश्वास दिलाकर अपने पति, भाई तक को मार डालती हैं। [श्रीमद्भागवत 9-14-37]
इनके हृदय में सौहार्द तो है ही नहीं। भोले भाले लोगों को झूँठ-मूँठ का विश्वास दिलाकर फाँस लेती हैं। नये-नये पुरुष की चाहत-चाट से कुलटा और स्वेच्छाचारिणी बन जाती हैं। [श्रीमद्भागवत 9-14-38]  
***यह उपरोक्त वृतान्त दूषित चरित्र की स्त्रियों पर सटीक बैठता है। 
स्त्रियों के धर्म: पति  की सेवा करना, उसके अनुकूल रहना, उसके सम्बन्धियों को प्रसन्न रखना और सर्वदा पति के नियमों की रक्षा करना, पति को ही ईश्वर मानने वाली पतिव्रता स्त्रियों के धर्म हैं। [श्रीमद्भागवत 7-12-25] 
साध्वी स्त्री को चाहिए कि घर की देखभाल-उचित व्यवस्था, साफ-सफाई के साथ-साथ स्वयं को भी मनोहर वस्त्राभूषणों से अलंकृत रखे।  [श्रीमद्भागवत 7-12-26] 
अपने पति देव की छोटी बड़ी इच्छाओं को समय के अनुसार पूर्ण करे। विनय, इन्द्रिय संयम, सत्य एवं प्रिय वचनों से प्रेम पूर्वक पतिदेव की सेवा करे। [श्रीमद्भागवत 7-12-27] 
जो कुछ भी मिल जाये उसी में सन्तुष्ट रहे। किसी भी वस्तु के लिये ललचावे नहीं।  सभी कार्यों में चतुर एवं धर्मज्ञ हो। सत्य और प्रिय बोले। अपने कर्तव्य में सावधान रहे। पतिव्रता और प्रेम से परिपूर्ण होकर, यदि पति पतित नहीं हो तो, उसके साथ सहवास करे। [श्रीमद्भागवत 7-12-28] 
*जो लक्ष्मी के समान पतिपरायण होकर अपने पति की साक्षात् भगवान् स्वरूप समझकर सेवा करती है, उसके पति वैकुण्ठ लोक में भगवत्सारुप्य को प्राप्त होते हैं और वह लक्ष्मी के समान उनके साथ आनन्दित होती है। [श्रीमद्भागवत 7-12-29 ] 
*भगवान् विष्णु मोहिनी रूप धारण करके राक्षसों के समक्ष प्र्क्ता हुए तो वे तुरन्त मोहित हो गए। उन्होंने मोहिनी से अमृत बाँटने का आग्रह किया तो उन्होंने राक्षसों से कहा : विवेकी पुरुष स्वेच्छारिणी स्त्रियों का कभी विश्वास  करते [श्री मद्भागवत पुराण 8-9-9]
कुत्ते और व्यभिचारिणी स्त्रियों की मित्रता स्थाई होती। वे दोनों ही सदा नए-नए शिकार ढूँढ़ते रहतें हैं। [श्री मद्भागवत पुराण 8-9-10]
CHARACTERISTICS OF WOMEN FOR MARRIAGE विवाह हेतु स्त्री के लक्षण :: उत्तम: शरीर से उत्तम श्रेणी की स्त्री वो है, जिसके सम्पूर्ण अंग मनोहर हों, जो मतवाले गजराज की भाँति चलती हो, जिसके उरु और जघन (-नितम्ब) भारी हों। नेत्र उन्मत्त पारावत के समान मदभरे हों, केश सुन्दर नीलवर्ण के, शरीर पतला और अंग लोमरहित हों, देखने पर मन को मोहने वाली हो, जिसके दोनों पैर समतल भूमि का पूरी तरह स्पर्श करते हों, दोनों स्तन परस्पर सटे हों, नाभि दक्षिणा वर्त हो, योनि पीपल के पत्ते के आकार वाली हो, दोनों गुल्फ भीतर छिपे हों-माँसल होने के कारण वे उभरे हुए न दिखाई देते हों, नाभि अँगूठे के बराबर हो तथा पेट लम्बा या लटकता हुआ न हो।जो लोलुप न हो, कटु वचन न बोलती हो-वह नारी देवताओं से पूजित शुभ लक्षणा मानी जाती है। जिसके कपोल मधूक पुष्पों के समान गोरे हों, वो नारी शुभ है। सुन्दर आकृति के साथ शुभ-सुन्दर गुण-लक्षण भी होने चाहिये 
जिसके प्राण पति में  बसते हों तथा जो पति को प्रिय हो, वो नारी लक्षणों से रहित होकर भी शुभ लक्षण सम्पन्न कही गयी है 
निकृष्ट: रोमावलियों से रुक्ष शरीर वाली रमणी स्त्री अच्छी नहीं मानी जाती। जिसका नाम नदी, वृक्ष, देवियों और नक्षत्रों के नाम पर रखा गया हो तथा जिसे कलह प्रिय हो वो अच्छे नही होती। जिसके शरीर पर नस नाड़ियाँ दिखाई देती हों और जिसके अँग अधिक रोमावलियों से ढके हों, वो स्त्री शुभ नहीं है। जिसकी कुटी-भौंहें परस्पर सट गयीं हों, वह नारी भी अच्छी श्रेणी में नहीं गिनी जाती। जिसके पैर की कनिष्टिका अँगुली धरती का स्पर्श न करे, वह नारी मृत्युरूपा ही है।  [अग्नि पुराण ]
The woman should continuously think of her husbands welfare-progress-benefit. This process constitute enlightenment.
Only those women are considered  Fidel-loyal, who are devoted to their husband only. One who think of her husband only and her heart palpitate for him only. She find bliss in his service. She discard all defects-vices in him. 
She will never separate/divorce/ditch him, under any circumstances. One who is desirous of her own welfare in this world would never reject-discard him, even if he is a wretched/wicked/sinner/unholy/villain/ diseased person.
The woman who takes interest in other things except her husband is considered to be characterless/adulterous/specif./dissolute.
The woman who resort to enjoyment, makeup, mix up-interact-entertain others-especially male, in the absence of her husband is termed as desirous-eager-covetous. 
शादी-विवाह  MARRIAGE:: Marriages are made in the heaven and broken on the earth.
It’s an institution, which brings two families together. It’s not just a relationship, it’s far beyond leading to interactions, mixing, interacting and helping each other in an hour of crises-need.
One has to be extremely cautious-careful, before making a commitment. Both sides should satisfy-acquaint themselves thoroughly, regarding the background and family status of each other. They should en quire about the family religion, caste, original place to which they belong-native place, family income, assets-financial position, reputation-educational qualification-job, business etc. etc. Efforts should be made to en quire about the temperament-moods-modalities-lifestyle and behavior as well. Family’s health status-genetic diseases, current health status should be considered-analysed. Marriages among equals last long.
So called love is merely guided-influenced by physical attractions, infatuations, sensuality, flirtations, lust, sex desire, passions, etc. One should understand the meaning of love and must be able to differentiate between love and all these and other related factors, otherwise the love story may terminate in court, since quarrels begins soon after the marriage, over tit bots due to ego, finances, family interference, irrational behavior by either of the two partners etc.
Marriages need thorough understanding, tolerance, compromise, adjustment, compatibility, rationality, frankness, humour  politeness, expression etc. There may be occasions, when the spouse has to hide the weaknesses of the counterpart and protect-shield, as well. They have to stand together, merging their identity into one. Difference of opinion may be there, due to difference in education, environment, liking and disliking, tastes, upbringing etc., but there is always a scope for compromise. Issues can be resolved, amicably through negotiations, dialogue, discussions, talking and mediation. One should always weigh pros and cons of the contentious issues and better avoid them as far as possible. Open hearted talks, never let any confusion to crop between the two. Quick conclusions pertaining to contentious issues must be avoided. It’s not essential to agree with everything said, by the spouse, but diplomacy and tact are meant to resolve-defuse the situation. Assent may be given to the proposals which are unlikely to cause harm to the family or to put it in danger, or it may harm at a later stage.
Couple should adjust to the traditions, rituals and practices of the other side. A blatant no, must be avoided. In laws and other members must be respected, depending upon their age and position in the family-hierarchy. The girl has joined the other family, thus her position becomes crucial. She should wait and watch before making any move. She should be extra careful pertaining to the obligations. It’s she who has to shoulder the burden the traditions-social cultural-religious responsibilities, one day or the other. Initially, it may appear to be difficult, but slowly, gradually and surely, she will win the hearts of the in laws. Ultimately, she is the one who will pass on, all such faculties to the next generation.
The in laws are duty bound to provide all sorts of help to accommodate her in the new environment. They should take extra  care of  her needs.They should not expose the other members of the family to her, otherwise, they may have self invited trouble, in future. They should not interfere with the day today working-interactions of the couple. It's good not to criticize the bride for everything or to make attempts to degrade her.Her dignity should be maintained, side by side.
It's most sincerely and honestly advised that marriages should take place among the equals- people of same status, belonging to the same caste-religion-region, following identical traditions, compatibility of both the bride and  the groom should also be tested-examined-identified-ascertained.
Avoid marriage in such families in which:
1.cultural aesthetics-ethics, morals, values are missing,
2. male child is not born,
3. scriptures are not honoured-virtue, piousity, righteousness is absent,
4. both male and female members have long hairs all over the body,
5.medical history shows presence of piles (बबासीर-अर्श), tuberculosis (तपेदिक), indigestion (-मन्दाग्नि), white patches (-सफ़ेद दाग), leprosy (-कुष्ठ ), epilepsy (-मिर्गी), HIV, genetic diseases (-वंशानुगत बीमारियाँ ).

 हिन्दु शादी-विवाह पद्धति :: वर्तमान काल  में हिन्दु मैरिज एक्ट के लागु होने के बाद से ही शादी के तौर तरीके बदलने शुरू हो गये थे। प्राचीन मान्यताओं के अनुसार शादी विवाह के लिये नाई व ब्राह्मण वर की तलाश करते थे और दोनों परिवारों के मध्य सम्बन्ध स्थापित करने में अहम् भूमिका का निर्वाह करते थे। लड़के-लड़की का चुनाव घर के बड़े-बूढ़ों के द्वारा किया जाता था और अक्सर दूल्हा-दुल्हन एक दूसरे को पहले  देख-जान नहीं पाते थे।
समय का चक्कर  चलते हुए कलयुग  दस्तक दे चुका है। लड़कियाँ अब पढ़-लिख रही हैं-नौकरी कर रही हैं।पश्चिमी सभ्यता अपना प्रभाव स्थापित कर चुकी है। लड़कियाँ अब स्वाबलंबी-स्वतंत्र-स्वछन्द-उच्चंखल-आत्म निर्भर-जागरूक होती जा रही हैं। जाति-बिरादरी-धर्म-देश-पद्धति-सामाजिक-प्रांतीयता-परम्पराओं के  बंधन अब टूटते जा रहे हैं। 
हिन्दु धर्म में भी अब विवाह अनेक विकल्पों और समझौतों का विषय बनता  जा रहा है। लड़के  और लड़कियां एक-दूसरे को काम-वासना से पीड़ित होकर पसंद करते हैं और स्वेच्छा पूर्वक शादी से पहले ही शारीरिक सम्बंध स्थापित कर लेते हैं, ये शादी पहले तो होती ही नहीं, अगर होती भी है तो टूट जाती है-जिनकी परिणति संबन्ध-विच्छेद या तलाक में होती है।  पारंपरिक हिन्दु  विवाह पद्धति में विकल्पों के लिए कोई स्थान नहीं  था। यह दो परिवारों के बीच होनेवाला एक ऐसा संबंध था, जिसे लड़के और लड़की को स्वीकार करना होता था। इसके साथ  ही उनका बचपना समाप्त माना जाता था और वे वयस्क समझे जाते थे। हिन्दु धर्म में तलाक के लिये कोई स्थान नहीं था। परन्तु यह भी सत्य है कि कई-कई शादियों के रहते वधु-पत्नियाँ बहुत बुरी जिदगी बिताने को मजबूर होती थीं, जिसका कोई निराकरण-समाधान मरते दम तक नहीं था। पुरानी मान्यतायें-रीति-रिवाज-सामाजिक ढांचा, आज से अलग था। ज्यादातर परिवार बड़े और संयुक्त होते थे। सामान्तया पुरुष प्रधान परिवार में स्त्री आत्म निर्भर-स्वतंत्र नहीं थी। कुछ परिवारों में उन्हें आश्रित भी माना जाता था। इसके साथ यह भी सत्य है कि स्त्री का सम्मान भी सर्वोपरि था। उसे पिता-भाई-पति-पुत्र-स्वसुर का सहयोग-प्यार-इज्जत-संरक्षण   सदैव प्राप्त थे। 
पूर्व काल में शाषक वर्ग में कन्या वर का चुनाव स्वयं-स्वयंबर द्वारा करती थी। 
हर प्रान्त-जाति-वर्ग के वैवाहिक संस्कार-तौर तरीके-पद्धति में कुछ न कुछ अंतर-विविधताएँ थीं।  मगर मूल भावना एक ही होती थी। परंपरागत पद्धति में विवाह का आयोजन चातुर्मास अथवा वर्षाकाल की समाप्ति के बाद होता है। इसकी शुरुआत तुलसी विवाह से होती है जिसमें विष्णुरूपी गन्ने  का विवाह लक्ष्मीरूपी तुलसी के पौधे के साथ किया जाता है। सगाई नौ दुर्गे-नौ रात्रि से ही शुरू हो जाती हैं। देव उठनी एकादशी-देवठान के तुरन्त बाद,  विवाह के रीति-रिवाज़ शुरू हो जाते हैं और देव सोने तक  तक जारी रहते हैं। असूझ विवाह भड़रिया नौमी के दिन सम्पन्न हो जाते हैं। वैदिक मंत्रोच्चार, भाँवर-फेरे, यज्ञ-हवन, कन्या दान, दहेज, वेदी, बारात-बाराती, भोज सभी जगह-पद्धितियों में थे। सामान्यतया विवाह रात्रि में भोर बेला-प्रात: काल में सम्पन्न होते हैं और उसके तुरंत बाद विदा की रस्म पूरी कर ली जाती हैं। 
आजकल अख़बार, नैट, व्यक्तिगत सम्बन्ध, जान-पहचान, परिचय यहाँ तक कि दलालों का सहारा भी  लिया जा रहा है। कुछ लोग बिचौलिये की भूमिका अदा करते हैं और हर तरह की बातचीत को आगे बढ़ाने-सँभालने-तय करने-सम्पादित करने में बगैर कुछ लिए, पूरा सहयोग करते हैं। वे इसे एक सामाजिक-धार्मिक-अवैतनिक कार्य के रूप  में पूरी लग्न-निष्ठा-ईमानदारी-समर्पण की भावना के साथ तो करते ही हैं और साथ साथ अपनी ओर से दान दहेज भी समर्पित करते हैं। आजकल कुछ सामाजिक संस्थाएँ बहुत बड़े पैमाने पर विवाहों का आयोजन करती हैं,  और लाखों रूपये खर्च करती हैं। 
लड़के और लड़की को एक साथ मिलने-जुलने, बातचीत करने, घूमने-फिरने, जानने-समझने  का पूरा अवसर-मौका प्रदान किया जाता है। उनकी स्वीकृति के तदुपरान्त अँगूठी-गोद भराई, की रस्म अदा  की  जाती है। सगाई के लिए उचित-शुभ मुहूर्त निकाला जाता है और घर-परिवार-मित्रादि-परिजनों  की उपस्थिति में पंडित जी के द्वारा सभी रस्मों को पूरा कराया जाता है। इस अवसर पर संगीत, नृत्य, गाना-बजाना, लाइटिंग, खाने-पीने  आदि का आयोजन भी होता है। पारिवारिक संगीत की रस्म में वधु के परिवार की महिलायें रात  के समय नाच-गान करती  हैं। 
विवाह की रस्में हल्दी-उबटन और मैंहंदी से शुरू होती हैं। इसमें वर और वधु को विवाह के लिए तैयार कर, आकर्षक रूप दिया जाता है। हल्दी और चन्दन दोनों ही एंटिसेप्टिक का कार्य करते हैं।  हल्दी व चन्दन आदि का लेप लगाकर स्नान कराया जाता  हैं। घर की  स्त्रियाँ पैरौं में महावर (-लाल रंग) लगाती हैं। पूरे घर में रंगाई-पुताई किया जाता है। 
वर और वधु को तैयार होकर अपने पितरों-पुरखों का आह्वान करते हैं। विवाहोपरांत लड़की  का  गोत्र बदल जाता है। शादी से पहले वर पक्ष को वधु पक्ष से पीली चिट्ठी-निमंत्रण पत्रिका भेजी जाती है, जिसमें लग्न-महुर्त का विवरण होता है।
वर पक्ष बारात लेकर वधु के घर जाता है। आजकल ज्यादातर शादियाँ घर से अलग कहीँ सामुदायिक भवन, टैंट, मॉल, गार्डन, फार्म हाउस आदि में सम्पन्न होती हैं। दूल्हा घोड़ी पर सवार होता है। उसका चेहरा सेहरे से ढंका होता है। इसे चढ़त कहा जाता है। पूरी धूम-धाम, बैंड-बाजे, ढोल-ताशे-नगाड़े, आतिश बाजी के साथ बारौठी होती है। नाच-गाना, पीना-पिलाना, मौज-मस्ती एक आम बात है।  कुछ बाराती जरूरत से ज्यादा हुडदंगी होते हैं।  घर पर द्वार-चार, नेग-पूजा-आरती की  जाती है।  यह क्रिया  वधु पक्ष की महिलाएं लड़की की  माँ के साथ मिलकर करती हैं। कुछ लोग इसी जगह दान भेंट आदि की  रस्म करते हैं। आजकल इसी वक्त वर-माला की  कार्यवाही भी  पूरी कर लेते हैं।  कुछ लोग दान-भेंट आदि की  रस्म जनवासे में करते हैं। लड़की का भाई अपने जीजा को पान-मिठाई अर्पित करता है।
बारात खाने-पीने में लग जाती है। मेहमान नवाज़ी और यथोचित स्वागत पर विशेष ध्यान दिया जाता है। खान पान के बाद बाराती शगुन-भेंट-नेग या उपहार आदि अर्पित कर,  घर के लोगों से विदा लेते हैं। 
भोर की बेला में पण्डित जी वैदिक मन्त्रों के जाप से समस्त विधि-विधान सम्पन्न करते हैं। पंडित जी  यज्ञ वेदी में अग्नि  प्रज्वलित कर समस्त देवताओं का आहवाह्न करते हैं। सप्त-फेरे मंत्रोपचार-मंगल ध्वनि, रस्म रिवाज को प्रारम्भ करते हैं और सूर्योदय से पूर्व सभी संस्कार पूरे कर, विदाई की  रस्म अदा कर दी जाती हैं। आजकल गौने का रिवाज खत्म हो गया है, इसलिए पट्टा-फेर करा दिया जाता है। पिता कन्यादान करता है और वर उसे स्वीकार कर पूरी जिन्दगी हर-हाल में साथ निभाने का वायदा करता है। 
आठ प्रकार के विवाह  8 KINDS OF MARRIAGES :: 
Brahm :: A boy from good respectable family with good manners-nature, is invited by the parents at their place and the girl is given-donated to him (-with her consent), along with gifts and useful commodities. 
Dev :: Auspicious ceremonies, rituals,Yagy, ceremonies are performed and the priest is honoured. 
Arsh :: The bride groom offers two or three pairs of cows-bulls-oxen-bullocks for religious purposes, to the girls parents.
Prajapaty ::  You should live together as husband and wife and rituals are observed to donate the girl to the  bridegroom.
Asur :: Parents as well the girl is offered money to marry willingly with the bridegroom. 
Gandharv :: The boy and girl indulge in sexual acts without any witness, as per their own will, without the consent of parents.  
Rakshash-demons :The crying girl is abducted and raped.  
Paeshach :: The sleeping, drugged or insane girl is abducted-worst in nature.
ब्राह्म विवाह :: अच्छे शील-स्वभाव वाले उत्तम कुल के वर को स्वयं बुलाकर उसे अलंकृत और पूजित कर कन्या देना।
दैव विवाह :: यज्ञ में सम्यक् प्रकार से कर्म करते हुए ऋत्विज को अलंकृत कर कन्या देना। 
आर्ष विवाह :: वर से एक या दो जोड़े गाय-बैल धर्मार्थ लेकर विधि पूर्वक कन्या देना।
प्राजापत्य विवाह :: तुम दोनों एक साथ गृहस्थ -धर्म का पालन करो, यह कह कर पूजन करके कन्यादान करना।
आसुर विवाह :: कन्या के पिता आदि व कन्या को भी यथा शक्ति धन आदि देकर स्वछंदतापूर्वक कन्या को गृहण  करना।
गान्धर्व विवाह :: कन्या व वर की इच्छा से हुआ विवाह -किसी साक्षी या मन्त्रों के बगैर।
राक्षस विवाह :: रोती-पीटती कन्या का अपहरण करके लाना।
पैशाच विवाह :: सोई हुई, मद से मस्त मतवाली (-नशा कराकर), जो कन्या पागल हो गई है उसे गुप्त रूप से उठा कर लाना, अधम कोटि का विवाह है।
HOUSE HOLD-DOMESTIC LIFE गृहस्थाश्रम धर्म-जीवन :: गृहस्थाश्रम  में प्रवेश करने वाला व्यक्ति, यथाविधि विद्या अध्ययन करके, सत्कर्मों द्वारा धन का उपार्जन करने के उपरांत ही, सुंदर लक्षणों से युक्त कन्या से शास्त्रोक्त विवाह करे। घर में भूख से तरसते बच्चे, पत्नी, माँ-बाप, चिथड़ों में लिपटे परिवार के सदस्यों को देखना किसे अच्छा लगता है ? अगर ग्रह्स्वामी का दिल इससे भी विचलित नहीं होता तो वह वज्र के सामान कठोर है और उसका जीवन   व्यर्थ है। धन के बगैर गृहस्थ जीवन बेमानी है। धन, स्त्री व संतान, त्रिवर्ग:- धर्म, अर्थ और काम में सहायक हैं। स्त्री विहीन पुरुष के सभी धर्म कार्य असफल ही रहतें हैं। विवाह व परामर्श, हमेंशा समान कुल(शील, धन और विद्या)में ही उचित है। इसी में प्रेम-स्नेह-मित्रता रहती है। धनवान व्यक्ति को विद्या, कुल, शील आदि गुणों से युक्त माना जाता है। शास्त्र, शिल्प, कला या कोई भी कैसा भी कर्म-उद्यम क्यों न हो, धन से ही संभव है। धन से ही पुन्य अर्जित होते हैं। धन व पुन्य एक दूसरे के कारक-पूरक हैं। 
OUTCOME-RESULT OF INFIDELITY दुराचार का परिणाम  :: गीता के तेरहवें अध्याय का फल : दक्षिण दिशा में तुंगभद्रा  नदी के किनारे हरिहर पर में साक्षात भगवान् श्री हरी विराजमान हैं। ब्राह्मण हरिदीक्षित की दुराचारा, कामोन्मत्त, व्याभिचारिणी, कुलटा  पत्नी जो कि करोणों  कल्पों तक संयमनीपुरी में नरकों में रही, सौ मन्वन्तरों तक रौरव नरक में रही, उसके बाद दहनानन नरक में गिराई गई, फिर चण्डालिनी बनकर इस लोक में उत्तपन्न हुई तथा कोढ़ और राजयक्ष्मा से पीड़ित हुई, नेत्र पीड़ा से ग्रस्त हुई और अंत में अपने निवास स्थान को गई जहाँ भगवान्  शिव के अन्तःपुर की स्वामिनी जम्भका देवी विराजमान हैं। वहाँ वासुदेव  नामक ब्राह्मण के मुँख से, जो कि गीता के  तेरहवें अध्याय का पाठ करता था, को सुनकर दिव्यदेह धारण कर स्वर्ग चली गई। 

MATA SATI माँ-माता सती :: Mata-Maan Sati, Dakshayani दाक्षायणी is revered as Aadi Devi, who performed Tapsya, Penances, Chastity for thousands of years to have Bhagwan Shiv as her husband. She took incarnation as a daughter of Daksh Prajapti. Daksh Prajapati and his wife took birth from the toes of Bhagwan Brahma Ji-the creator. She is worshiped as the deity-goddess of marital felicity and longevity. She is Aadi Maan Para Shakti-Durga, She immolated herself when she suffered humiliation & insult from her father, with the help of divine sacred fire, which dwelt in her with the Yog Shakti sucking the soul to the Ultimate through Yog. She reappeared as Maan Parwati to remarry Bhagwan Shiv. Dakshayani was the first consort of Bhagwan Shiv-the destroyer, the second being Parvati-the reincarnation of Sati herself.
Both these incarnation were essential to protect the demigods-deities from demons-Rakshas. Maan Sati and Maan Parvati successively played the role of bringing Bhagwan to the fold of house hold from asceticism, resulting in the birth of Bhagwan Kartikaey and Shri Ganesh. 
Sati in due course of time, emerged as a practice in which a woman immolated herself over the funeral pyre of her husband. 
Bhagwan Brahma appeared with five mouths. The fifth mouth of Bhagwan Brahma in his arrogance uttered such words which were not liked by Bhagwan Mahesh_Shiv. He did not stop in spite warnings. Bhagwan Shiv was left with no alternative but to chop it off. He was named as a Kapalik after this incident. Daksh unaware of his status as the third form of the Almighty insulted him. He did not appreciate Bhagwan Shiv for his behaviour and presence in cremation grounds. Again, he was not aware of the fact that Bhagwan Shiv himself was Yagy Purush and no Yagy-sacrifice would be complete unless un till granted by him. Daksh was warned by Bhagwan Brahma Ji in advance, of the consequences. Bhagwan Vishnu too was not happy with the rudeness of Daksh. Daksh was unhappy with Bhagwan Shiv because he did not pay him respect by standing in the conference called by him. His ego-arrogance was boundless. He considered him self to be supreme. 
Daksh once organized a grand Yagy to which all the demigods and deities were invited, with the exception of Sati and Shiv. desirous of visiting her parents, relatives and childhood friends, Sati sought to rationalise this omission. She reasoned within herself that her parents had neglected to make a formal invitation to them only because, as family, such formality was unnecessary; certainly, she needed no invitation to visit her own mother and would go anyway. Bhagwan Shiv sought to dissuade her, but she was resolved upon going. Bhawan Shiv then provided her with escorts of his Ganas along with Bhagwan Nandi and bid her provoke no incident.
Sati was received coldly by her father. They were soon in the midst of a heated argument about the virtues (-and alleged lack thereof) of Bhagwan Shiv. Every passing moment made it clearer to Sati that her father was entirely incapable of appreciating the many excellent qualities of her husband. The realisation then came to Sati that this abuse was being heaped on Bhagwan Shiv only because he had wed her; she was the cause of this dishonour to her husband. She was consumed by rage against her father and loathing for his mentality. Calling up a prayer that she may, in a future birth, be born the daughter of a father whom she could respect, Sati invoked her Yogic powers or Yogic Agni which was attained by her due to severe devotion or puja done by her and immolated herself.
Shiv sensed this catastrophe and his rage was incomparable. He loved Sati more than any one and would never love after her. So, he created Vir Bhadr and Bhadr Kali, or collectively Manbhadr, two ferocious creatures who wreaked havoc and mayhem on the scene of the horrific incident. Nearly all those present were indiscriminately felled overnight. Daksh himself was decapitated.
Bhagwan Shiv was shocked. He was full of sorrow and grief. This resulted in carrying of Maan Sati's body over his head and shoulder. He could not come out of the trauma. He performed the fearsome and awe-inspiring Tandav dance with Sati's charred body over his shoulders. The demigods, deities and Brahma Ji  called upon the Almighty Bhagwan Vishnu to restore Shiv to normalcy and calm. Bhagwan Vishnu used his Sudarshan Chakr to dismember Sati's lifeless body, following which Shiv regained his equanimity. 
Sati's body was thus dismembered into 52 pieces which fell on earth at various places. Several different listings of these 52 holy places, known as Shakti Peeths, are available; some of these places have become major centres of pilgrimage as they are held by the Goddess-oriented Shakt sect to be particularly holy. Besides 52 main Shakti Peeths, some small Peeths like Bindu Dham came into existence which are due to Sati's fallen blood drops.
After the night of horror, Shiv, the all-forgiving, restored all those who were slain to life and granted them his blessings. Even the abusive and culpable Daksh was restored both to life and to kingship. His severed head was substituted for that of a goat. Having learned his lesson, Daksh spent his remaining years as a devotee of Bhagwan Shiv.
During Treta Yug, Bhagwan Shiv went to Rishi August along with Maan Sati. The sage narrated the story of Ram to the divine couple. Shiv wanted to see Ram, but Sati was in the dark that Shri Ram was a manifestation of God. Shiv got a glimpse of Ram and was over whelmed with love. Sati saw Shiv thrilled with love and became doubtful as to why Shiv was enchanted by a mere human being. Although, Sati did not say anything, Shiv being omniscient came to know of everything. Shiv asked her to verify if she had a doubt in her mind. Maan Sati assumed the form of Mata Sita and approached Bhagwan Ram. However, Shri Ram recognised her at once. He first introduced himself and then asked her about the absence of Bhawan Shiv there. Why was she roaming there  in the forest alone? She could not give a proper reply and returned to Shiv in fear. She became sad and regretted doubting Shiv. When Ram realised that Sati was sad, he revealed some of his power to divert her mind. On the way Sati saw Ram along with his brother Lakshman and Sita walking in front of her. She then turned and found them at the back. Wherever she looked, she found Ram and various deities and all creation in him.In awe, she closed her eyes and when she again opened her eyes, everything vanished. She then returned to Shiv. Bhagwan Shiv could not tolerate this and rejected her at once. This incident along with absence of Nav Grah Pooja resulted in the immolation of Maan Sati in Daksh Praja Pati's Yagy.
Dakshayani was reborn as Parvati, daughter of Himavat, king of the mountains and his wife, the Devi Maena. This time, she was born the daughter of a father whom she could respect, a father who appreciated Shiv ardently. Naturally, Parvati sought and received Shiv as her husband. 


Sr. No.
Part of the body fallen
Name of Shakti
Trincomalee (Sri lanka)
Shankari devi
Kanchi (Tamil nadu)
Back part
Kamakshi Devi
Praddyumnam (West Bengal)
Stomach part
Sri Srunkhala devi
Mysore (Karnataka)
Chamundeshwari devi
Alampur (Andhra Pradesh)
Upper teeth
Jogulamba devi
Srisailam (Andhra Pradesh)
Neck part
Bhramaramba devi
Kolhapur (Maharastra)
Mahalakshmi devi
Nanded (Maharastra)
Right hand
Eka Veerika devi
Ujjain (Madhya Pradesh)
Upper lip
Mahakali devi
Pithapuram (Andhra Pradesh)
Left hand
Puruhutika devi
Cuttack (Orissa)
Girija devi
Draksharamam (Andhra Pradesh)
Left cheek
Manikyamba devi
Guwahati (Assam)
Kamarupa devi
Prayaga (Uttar Pradesh)
Madhaveswari devi
Jwala (Himachal Pradesh)
Head part
Vaishnavi devi
Gaya (Bihar)
Breast part
Sarvamangala devi
Varanasi (Uttar Pradesh)
Vishalakshi devi
Dantewada (Chattisgarh)
Danteswari devi
Right hand
Saraswathi devi

Lankayam Shankari devi, Kamakshi Kanchika pure;
Pradyumne Shrinkhala devi, Chamunda Krouncha pattane.
Goddess Shankari in Sri lanka, Kamakshi in Kanchipuram,
Goddess Shrinkhala in Pradyumna and Chamunda in Mysore
Alampure Jogulamba, Sri shaile Bhramarambika;
Kolha pure Maha lakshmi, Mahurye Ekaveerika.

Goddess Jogulamba in Alampur, Goddess Brhamarabika in Sri Shailam,
Goddess Maha Lakshmi in Kolhapur and Goddess Eka veera in Mahur
Ujjainyam Maha kali, Peethikayam Puruhutika;
Odhyane Girija devi, Manikya Daksha vatike.

Goddess Maha Kali in Ujjain Purhuthika in Peethika,
Goddess Girija in Odhyana and goddess Manikya in the house of Daksh,
Hari kshetre Kama rupi, Prayage Madhaveshwari;
Jwalayam Vishnavi devi, Gaya Mangalya gourika.

Goddess Kama rupi in the temple of Vishnu, Goddess Madhevaswari in Allahabad,
The flame giving Goddess in Jwala muki and Mangala Gouri in Gaya.
Varanasyam Vishalakshi, Kashmire tu Saraswati;
Ashtadasha Shakti peethani, Yoginamapi durlabham.

Goddess Visalakshi in Varanasi, Goddess Saraswathi in Kashmir,
Are the 18 houses of Shakti, which are rare even to demigods.
Sayamkale pathennityam, Sarva shatri vinashanam;
Sarva roga haram divyam, Sarva sampatkaram shubham.

When Chanted every evening, all the enemies would get destroyed
all the diseases would vanish, and prosperity would be showered.

S. NO.              
KAMAKHYA                UMANAND
 LEFT THIGH                                    

SHRI SHAIL            
TEETH (LOWER JAW)                    
LEFT ANKLE        

Daant (Teeth) 

These names of Bhairavs exists in Tantr-Chudamani. All the Shakti-Peeths have secondary deity as Bhairav, besides the primary deity-Shakti. While having a darshan of Shakti-Peeth, a devotee should also have a darshan of Bhairav also, keeping in mind Shiv’s Shakti.
(1). HINGUL :: Hingul (-Hinglaj) Devi’s mind or brain fell here and the idols are Devi as Kothari (-Durga) and Shiv as Bhim Lochan (-Terrible eyed or the third eye). The location is towards 125 km from Karachi, Pakistan.
(2). SHARKRARSharkarare or Karavipur. Devi’s three eyes fell here and the idols are Devi as Mahishmardini (Durga the destroyer of Mahishashur) and Shiv as Krodhish (-the one who can be angry). It is near Karachi in Pakistan, by rail the nearest station is Parkai.
(3). SUGANDH: Sugandh Devi’s nose fell here and idols are Devi as Sunanad (Pleasing) and Shiva as Traimbak (-Rudr). In the state of Bengal near Barishal in Shivahri Karpur village Devi’s temple is located and Shiva’s temple is in a village called Ponabalia, nearest railway station is Jhalkati.
(4). JWALAMUKHI:  Jwalamukhi, Kangra, Devi’s tongue fell here and the idols are Devi as Ambika (Mother) and Shiva as Unmatta (Furious). This is located near Pathankot, H.P., Jwalamukhi Road.
(5). On Bhairabha mountain near Avanti Devi’s upper lips fell here and idols are Devi as Avanti (Modest) and Shiv as Lambakarna (Long eared one). It is located near Ujjain.
(6). Attahas (laughter) Devi’s lower lips fell here and the idols are Devi as Fullara (Blooming) and Shiva as Bhairabhvishesya (Lord of the universe). The place is in Bengal near Birbhum. Image of Devi and the Shiva temple is next to the Devi temple. It is a major pilgrimage and tourist attraction.
(7). In Prabhas Devi’s stomach fell here and the idols are Devi as Chandrabhaga (Throne of the moon) and Shiva as Bakratunda (the one with the bent staff). This is near Mumbai where a launch goes to Bharoal which is near Prabhas.
(8). In Yanasthana Devi’s chin fell here and the idols are Devi as Bhramari (female Bumble bee or attendant of Durga) and Shiva as Vikrakatakkha (one with the crooked eyes or look). Other names are Devi as Chibuka (the one with the chin) and Shiva as Sarvasiddhish (the one who can provide all desires).
(9). Godavari (river) Devi’s left cheek fell here and the idols are Viswamatuka (mother of the world) and Shiva as Dandapani (the one who holds a staff).
(10). Inside Gandaki (river) Devi’s right cheek fell here and the idols are Devi as Gandakichandi (the one who overcomes obstacles or Gandi) and Shiva as Chakrapani (Holder of the discus). Famous pilgrimage.
(11). Suchidesha Devi’s upper teeth fell here and the idols are Devi as Narayani (the wife of Narayan) and Shiva as Sanghar. Panchasagar - Devi’s lower teeth fell here and the idols are Devi as Barahi and Shiva as Maharudra (the angry one).
(12).In Bhavanipur or Karota (river) Devi’s left seat or her clothing fell here and idols are Devi as Aparna (the one who ate nothing, not even leaves) and Shiva as Bhairabha (Destroyer of fear). The King of Nator and his grandson the Maharajah Ramakrishna used to meditate here. The seat, the yognakunda and five skulls are still here. In the month of Baisakha according to the Bengali calendar, there is a large fete or Mela here to celebrate Ramanavami or Deepanbita.
(13). In Shriparvata or Shri mountain Devi’s right seat fell here and the idols are Devi as Shri Sunadari (beautiful) and Shiva as Sundaranand (the handsome one).
(14). Karnat Devi’s two ears fell here and the idols are Devi as Jai Durga (the victoriuos Durga) and Shiva as Avirooka.
(15). Vrindavana Devi’s hair fell here and idols are Devi as Uma (Devi) and Shiva as Bhootesh (or provider of all desires). Playgorund of Lord Krishna and the gopis.
(16). Kirit Devi’s crown or headdress fell here and idols are Devi as Vimala (Pure) and Shiva as Sangbarta. Take the train to Ajimganj. The temples are on the shore of the ganges near Batnagar. (in Bangladesh )
(17). Shrihatta Devi’s nape of the neck fell here and the idols are Devi as Mahalakshmi (the goddess of prosperity and wife of Mahavishnu) and Shiva as Sarvananda (the one who makes everyone happy). Devi’s temple is Near Shrihatta town and Shiva’s temple is near Jainpur. Shivaratri and Ashokashtami are celebrated with a Mela (carnival). Take train from Calcutta to Goalanda and steamer to Kechuaganj. Then either take a boat or walk about five miles (6 koshas).
(18). Nalhati Devi’s vocal pipe fell here and the idols are Devi as Kalika (Durga) and Shiva as Yogesh. By train from Howrah station.
(19). Kashmir Devi’s neck fell here and the idols are Devi as Mahamaya (the great Illusion) and Shiva as Trisandhyasvar. The famous pilgrimage is Amarnath. There is a Shiva linga of glacial ice which expands and contracts with the seasons.
(20). Ratnabali Devi’s right shoulder fell here and the idols are Devi as Kumari (Durga) and Shiva as Bhairabha (Remover of fear).
(21). Mithila Devi’s left shoulder fell here and the idols are Devi as Mahadevi (Devi) and Shiva as Mahodara (the big belied one). This is near Janakpur station.
(22). In Chattagram (also called Chattal) Devi’s right arm fell here and the idols are Devi as Bhavani (Devi) and Shiva as Chandrashekhar (the one who has the moon as the crown). It is said that Mahadeva has himself pronounced that he will visit Chandrashekhar mountain regularly during Kali yuga. This is near Sitakunda station. This is in Bangladesh.
(23). In Manav Kschetra (Field) Devi’s right hand or palm fell her and the idols are Devi as Dakhchayani (Durga) and Shiva as Amar (Immortal). Take train from Howrah station to Guskar station and then a few miles to Kogram. Mahadeva is considered Siddhidayaka or provider of all wishes.
(24).In Ujjaini Devi’s elbows fell here and the idols are Devi as Mangalchandi (Durga) and Shiva as Kapilambar (one who wears the brown clothes). Shiva is siddhidayaka.
(25). Manibandha Devi’s middle of the palms fell here and the idols are Devi as Gayatri (Saraswati) and Shiva as Sarvananda (the one who makes everyone happy).
(26). Prayag (three rivers meet here) Devi’s ten fingers fell here and the idols are Devi as Lalita (beautiful). Another name is Alopi and Shiva as Bhava. Near Tribeni ghat there is Banitirtha ghat (Quay for boats). Allahabad is the train station.
(27). Bahula Devi’s left arm fell here and the idols are Devi as Bahula (Abundant) and Shiva as Bhiruk (who is also Sarvasiddhadayaka). Arrive at Katoa rail station and then go to Ketugram which is a pilgrimage.
(28). Jalandhar Devi’s right breast fell here and the idols are Devi as Tripurmalini (Durga) and Shiva as Bhisan (Gruesome). Jwalamukhi is the nearby Tirtha and train goes from Delhi to Jalandhar.
(29). Ramgiri (or Chitrakoot mountain) Devi’s left breast fell here (another opinion is that her Nala or Jaghanasti fell here) and the idols are Devi as Shibani (the wife of Shiva) and Shiva as Chanda. Near Bilaspur station and a walk of 2 miles.
(30). Vaidyanath Devi’s heart fell here and the idols are Devi as Jaidurga (Victorious Durga) and Shiva as Vaidyanath. It is in Bihar. Joshidi is the train station.
(31). Utkal, Orissa, Devi’s navel fell here and the idols are Devi as Vimala (the pure one) and Shiva as Jagannath (the ruler of the world). This is near the Jagannath temple of Puri in the state of Orissa.
(32). Kanchidesh Devi’s skeleton fell here and the idols are Devi as Devagarbha and Shiva as Ruru. Bolpur station to Kopar river banks. There is a well for worship.
(33). Kalmadhava Devi’s right hips fell here and the idols are Devi as Kali (another form of Durga) and Shiva as Asitananda. By praying to the Devi profusely pilgirms can obtain their desired objective.
(34). Sone (near Sone river) Devi’s left hips fell here and the idols are Devi as Narmada and Shiva as Vadrasen.
(35). Kamakhya (or Kamroop) Devi’s yoni fell here and the idols are Devi as Kamakhya (personification of love) and Shiva as Umananda. This is near Gauhati in the state of Assam on the banks of the Brahmaputra (the son of Brahma) river. The temple is on top of the Nilachal Hill. This is a famous pilgrimage for women seeking fertility or love. The temple is supposedly built by Kamdev, the god of love. The Umananda temple is nearby in an islet on the river. It has many pet monkeys.
(36). Nepal Devi’s two knees fell here and the idols are Devi as Mahashira and Shiva as Kapali.
(37). Jayanti Devi’s left thigh fell here and the idols are Devi as Jayanti and Shiva as Kramadiswar. In Bengal near Sri Hatta.
(38). Magadha Devi’s right thigh fell here and the idols are Devi as Sarvanandari and Shiva as Bomkesha. Inside Shrihatta at Jayantipargana near the base of the Kahshia mountain Devi’s legs are placed here. Srihatta to Kanairghat by boat and then walk 2 miles. In West Bengal.
(39) Tripura Devi’s right foot fell here and the idols are Devi as Tripurasundari and Shiva as Tripuresh. Devi is grantor of all wishes or Sarvavishta pradyani.
(40). Khirgram Devi’s right toe fell here and the idols are Devi as Yogadaya and Shiva as Khirakantha. Take Eastern Indian Railway to Bardwhan station. Take Bardhwan Katoa Rail to Nigam station. Nigam station to Khirgram (village) is 2 miles. A mela (fete) is held during Baisakha Sankranti.
(41). Kalighat (Kolkotta) Devi’s four small toes from her right foot fell here and the idols are Devi as Kali and Shiva as Nakulish or Nakuleswar. Famous pilgrimage located in Kolkotta in the state of West Bengal. Kali is a dark complexioned form of Shakti who has taste for blood and death. She rules over the cremation sites and is worshipped by devotees on a dark and moon less night. She is a popular deity of Bengal. kali is the female version of Kala or end of time.
(42). Kurukchetra (or fields belonging to the Kuru family where the battle of the Mahbharata was fought between the Kurus and Pandus) Devi’s right ankle fell here and the idols are Devi as Savitri or Sthanu and Shiva as Aswanath.
(43). Bakreswar Devi’s mind or the center of the brows fell here and the idols are Devi as Mahishamardini (the slayer of Mahishasur or Durga) and Shiva as Bakranath. Near Ahmedpur station. There are seven hot springs and also the Paphara (remover of sins) river. The Mahamuni Ashtabakra found enlightenment here. On Shivaratri (night) there is a grand Mela (fete) here.
(44). Jessore Devi’s centre of the hands fell here and the idols are Jashoreswari and Shiva as Chanda (Moon or the one who holds the moon).
(45). Nandipur Devi’s necklace fell here and the idols are Devi as Nandini and Shiva as Nandikishore.
(46). Varanasi (Benaras) Devi’s earrings (Kundal) fell here and the idols are Devi as VishwaLakschmi (The provider of wealth to all) and Shiva as Kala (Time or the end of time). Famous pilgrimage in UP and one of the oldest cities in the world. The Puranas say that this city exists even after the Pralaya.
(47). Kanashram or Kalikashram Devi’s back fell here and the idols are Devi as Sharvani and Shiva as Nimisha.
(48). Lanka Her feet bells (Nupur) fell here and the idols are Devi as Indrakschi and Shiva as Rakchaseswara. Indrakschi was created and worshipped by Indra in person.
(49). Virat Devi’s small toes of the feet fell here and idols are Devi as Ambika and Shiva as Amrita (nectar of immortality).
(50). Bivasa Devi’s left ankle fell here and the idols are Devi as Bhimarupa and Shiva as Sarvananda.
(51). Trisnota Devi’s left feet fell here and the idols are Devi as Vramari (Bumblebee) and Shiva as Iswar (God). On the banks of Tista river in Shalbari village in Jalpaiguri district in West Bengal.
(52). The Danteshwari (-Kuldevi of Baster State), Dantewada Baster 80 km's from Jagdalpur Chhattisgarh.
ऋषि अत्रि पत्नी महासती अनसूया :: अत्रि ऋषि पत्नी सती महा अनसूया ब्रह्मवादिनी की पति भक्ति अनुकरणीय है। नारदजी ने अपने स्वभाव के अनुरूप माँ लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती के पास पहुंचकर उन्हें ऋषि अत्रि की पत्नी अनसूया के असाधारण पातिव्रत्य के बारे में बताया तो ही तीनों देवियों के मन में महासती अनसूया के प्रति ईर्ष्या का भाव उत्पन्न हुआ। तीनों देवियों ने सती अनसूया के पातिव्रत्य को खंडित के लिए अपने पतियों को उसके पास भेजा। विशेष आग्रह पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने सती अनसूया के सतित्व और ब्रह्मशक्ति की परख करने की सोची। जब अत्रि ऋषि आश्रम से कही बाहर गए थे, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश यतियों का भेष धारण करके अत्रि ऋषि के आश्रम में पहुंचे और भिक्षा मांगने लगे। 
अतिथि-सत्कार की परंपरा के चलते सती अनसूया ने त्रिमूर्तियों का उचित रूप से स्वागत करके उन्हें खाने के लिए निमंत्रित किया। लेकिन यतियों के भेष में त्रिमूर्तियों ने एक स्वर में कहा कि जब वे निवस्त्र-नग्न होकर भोजन परोसोगी, तभी वे उसे  ग्रहण करेंगे। अनसूया ने जैसी हरि इच्छा; यह कहते हुए यतियों पर जल छिड़कर तीनों को तीन प्यारे शिशुओं के रूप में बदल दिया। तब अनसूया के हृदय में मातृत्व भाव उमड़ पड़ा। फिर शिशुओं को दूध-भात खिलाया और तीनों को गोद में सुलाया तो तीनों गहरी नींद में सो गए।
अनसूया माता ने तीनों को झूले में सुलाकर कहा-तीनों लोकों पर शासन करने वाले त्रिमूर्ति मेरे शिशु बन गए, मेरे भाग्य को क्या कहा जाए। फिर वह मधुर कंठ से लोरी गाने लगी। उसी समय नन्दीश्वर, गरुड़ जी, भगवान् ब्रह्मा जी के वाहन राजहंस आश्रम में पधारे। तत्काल नारद जी, माता लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती भी आ पहुँची। नारद जी ने विनयपूर्वक महा सती अनसूया से कहा कि तीनों देवियां अपने-अपने पतियों को ढूँढ़ते हुए वहाँ पधारी हैं।उन्होंने त्रिदेव को तीनों माताओं को वापस करने को कहा। अनसूया ने तीनों देवियों को प्रणाम करके कहा कि तीनों माताऍ,  झूलों में सोने वाले शिशुओं में से पहचान कर  अपने-अपने पति को ले जा सकती हैं।
लेकिन जब तीनों देवियों ने तीनों शिशुओं को देखा तो एक समान लगने वाले तीनों शिशु गहरी निद्रा में सो रहे थे। इस पर लक्ष्मी, सरस्वती और पार्वती भ्रमित होने लगीं। नारद ने उनकी स्थिति जानकर उनसे पूछा कि क्या वे अपने पतियों को पहचान नहीं पा रहीं थीं? उन्होंने जल्दी से अपने-अपने पति को गोद में उठा लेने का आग्रह किया। 
देवियों ने जल्दी में एक-एक शिशु को उठा लिया। वे शिशु एक साथ त्रिमूर्तियों के रूप में खड़े हो गए। तब उन्हें मालूम हुआ कि सरस्वती ने शिवजी को, लक्ष्मी ने ब्रह्मा को और पार्वती ने विष्णु को उठा लिया है। तीनों देवियां शर्मिंदा होकर दूर जा खड़ी हो गईं। उसी समय अत्रि महर्षि आश्रम लौट आए। उन्होंने त्रिमूर्तियों और त्रिदेवियों को एक साथ अपने आश्रम में पाकर उनका स्वगत किया। त्रिमूर्तियों और त्रिदेवियों ने उनसे वरदान मांगने को कहा तो उन्होंने दम्पत्ति को उनके जैसे गुणों के अनुरूप पुत्र प्रदान करने का आग्रह किया। इस अनुरोध को स्वीकार कर ब्रह्मा जी चन्द्र, भगवान् विष्णु  दत्तात्रेय और महेश ने दुर्वासा के रूप में माँ अनुसूया का मातृत्व स्वीकार किया।
(1). HINDU MARRIAGE हिन्दु विवाह पद्धति 
(2). SATI SYSTEM & WIDOW REMARRIAGE सती प्रथा और विधवा विवाह
(3). FIDELITY OF WOMAN पतिव्रता स्त्री-सतीत्व

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