Thursday, July 17, 2014

HINDUISM (हिंदुत्व) CHAPTER (18.4) SHRI MAD BHAGWAD GEETA श्रीमद् भगवद्गीता

HINDUISM (हिंदुत्व) CHAPTER (18.4) GEETA गीता चतुर्थ अध्याय
  ENLIGHTENMENT DEEDS RENUNCIATION YOG  गीता : ज्ञान कर्म संन्यास योग
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By:: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj  
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श्रीभगवानुवाच :: इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥4-1॥
भगवान् श्री कृष्ण करते है: मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, फिर सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा। 
सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु ये सभी गृहस्थ थे। उन्होंने अपने गृहस्थ धर्म का पालन कर्मयोग के साथ निभाया और परमसिद्धि प्राप्त की। भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन ने भी गृहस्थ धर्म का निर्वाह किया। कर्मयोग का वर्णन पुराणों में मिलता है। मनुष्य के जन्म से लकर देहावसान तक शरीर कर्म करता रहता है। शरीरी परमात्मा का अंश-आत्मा है। जब तक शरीर में आत्मा का निवास है उसमें परमात्मा का निवास भी है। जिस प्रकार सूर्य भगवान् निरन्तर-लगातार निष्काम, निर्मम और अनासक्त रहकर कर्म करते हैं उसी प्रकार मनुष्य को भी परमार्थ हेतु स्वयं को समर्पित कर देना चाहिये। सूर्य से ही यह जगत है। वे समस्त लोकों को प्रकाशित करते हैं। यद्यपि सूर्य और नर दोनों ही भगवान् के अंश है तथापि लोकसंग्रह हेतु उन्हें भी उपदेश की आवश्यकता थी। कर्मयोगी परिस्थिति के अनुरूप कार्य प्रतिपादन करता है। कर्मयोग पराश्रित नहीं है। गृहस्थाश्रम की सीढ़ी पर चल करके ही मनुष्य सन्यास तक पहुंचता है। 
Bhagwan Shri Krashn said: Initially I narrated-disclosed this imperishable Yog to Sun; then Sun described  it to his son Manu and Manu in turn explained this to his son Ikshvaku.
Bhagwan Sury, his son Manu and grand son Ikshvaku were house holds. They led the family life by completing every day functions-routine. They followed the path of Karm Yog: Renunciation through performance of their duties. Bhagwan Shri Krashn and Arjun too led  family life. Karm Yog is described at length in Purans. Right from his birth to death the human body keep functioning. Its the abode of Soul which is a component of the Almighty. Bhagwan Sury perform his duty un tiredly-continuously-relentlessly. He perform to keep the entire universe alive-working-functioning, without attachment  with the motive of service. This universe survives due to the Sun. Sury-Sun and Nar-Arjun both are the incarnations of the Supreme Soul. They had to be advised for the purpose of transference the essential knowledge for the sake of survival of the humans. Karm can be performed in any condition-environment-situation. It does not dependent over any other support. Karm is essential for the survival of the human being and family life is an integral part of it. Having followed the family way successfully one moves to the path of relinquishment.
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः। स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥4-2॥ 
हे परन्तप! इस प्रकार परम्परा से प्राप्त इस कर्मयोग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु बहुत काल बीतने के बाद वह योग इस मनुष्यलोक-पृथ्वी से लुप्त हो गया। 
भगवान् सूर्य, मनु और इक्ष्वाकु आदि राजाओं ने कर्मयोग को जानकर न केवल स्वयं बल्कि प्रजा से भी उसपर आचरण करवाया। राजऋषियों द्वारा पालित इस कर्मयोग में कुछ विशिष्टता थी, जो अब ढँक चुकी है लुप्त प्रायः है। प्रत्येक राजा-मुखिया के लिए इसे जानना लाभप्रद था। पूर्वकालीन राजाओं की विशेषता थी कि भोग-विलास में लिप्त न होकर प्रजा पालक थे। वे खजाने को व्यक्तिगत सम्पत्ति न मानकर प्रजा की धरोहर और स्वयं को प्रजा का सेवक समझते थे। यह सत्य है वे अपना निर्वाह खर्च भी न्यूनतम रखते थे। प्रजा से कर तो लेते थे मगर उससे कई गुना बढ़ाकर उसकी देखभाल में व्यय करते थे। राजा जनक को इसी लिए जितेन्द्रिय और विदेह कहा गया है। भरत जी ने भगवान् राम की अनुपस्थिति में चटाई पर सोकर कुटिया में वक्त बिताया। क्योकि परमात्मा नित्य हैं, अतः कर्मयोग, ज्ञान योग और भक्ति योग भी नित्य हैं अतः यह स्पष्ट है राज योग ढँक गया लुप्त नहीं हुआ। यह निश्चित है वे ग्रन्थ जिनमें यह सब ज्ञान था वे अब उपलब्ध नहीं हैं। कर्म तो अभी भी हो रहे हैं मगर उनमें योग का अभाव है। आज का मनुष्य अत्यधिक स्वार्थी, लोभी, लालची भोगी और लिप्त हो गया है अतः निस्वार्थ सेवा कहाँ से हो? कलयुग में स्पष्ट कहा गया है कि वर्तमान मौन वंशी राजाओं के बाद जिसके पास धन-दौलत-बल होगा व्ही राजा के समान ताकतवर व्यवहार वाला होगा। धर्म और आचरण के सर्वथा अभाव होगा। 
O Arjun, the tormentor of foes! The branch of karm Yog which enunciated Raj Yog-the Yog practiced by the emperors-kings has been masked-disappeared. This Yog thus passed around the generations by the sage like Kings, has been lost due to time gap through the   chain of succession, which is broken now. 
The Sury clan not only adopted the Karm Yog but made the public follow it.The Karm Yog adopted-followed by the kings was slightly different, which is not visible these days. It was of immense help for the rulers-emperors. The king lived a simple life away from luxuries-comforts like sages. They never considered the treasury to be their own-personal wealth. They behaved as the care takers of the kingdom. Though the public was taxed, but the money spent on welfare was enormous-much greater, than the revenue collected through taxes from the public.There are the examples of Maryada Purushottom Ram, Raja Janak, Bharat Ji and Raja Bharat-Shakuntala's son who ruled the earth for 27,000 years. Bhagwan ram ruled the earth for 13,000 years, before leaving for his abode-Vaikunth Lok. All these and many more kings, lived a saintly life of a sage-recluse. 
The Almighty is always present  and so are the Karm Yog, Gyan Yog and Bhakti Yog. They are for ever. When one discuss the disappearance of Raj Yog, it just means that it has been masked-forgotten-willfully discarded-lost. Had it not been so Parshuram would not have eliminated the earth of the Kshtriy 21 times! The scriptures which contained this knowledge are either lost or have been edited so that they do not fall into inappropriate hands. The rulers in the current era are exceedingly greedy, corrupt, disloyal to the public and the country. There is no question of self less service. Each and every one, wants to become multi billionaire through fraudulent-corrupt, wretched, means. Democracy will survive for next 300 years only and there after any one who has resources-money-might will rule. Religion and virtues will take back seat. And its obvious the hells are waiting for them.
स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥4-3॥ 
क्योंकि तुम मेरे भक्त और प्रिय सखा हो, इसलिये वही पुरातन योग आज मैंने तुमसे कहा है, क्योंकि यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है। 
अर्जुन का नर रूप में नारायण-श्री कृष्ण के साथ चिरकाल का साथ था। वे वर्तमान में भक्त और सखा दोनों ही हैं। उपदेश के लिए अर्जुन का शिष्य बनना आवश्यक था। अर्जुन का भगवान् के प्रति अटूट लगाव-विश्वास था, इसीलिए उन्होंने नारायणी सेना के स्थान पर स्वयं भगवान् श्री कृष्ण को चुना। अनादिकाल से ही कर्म योग मनुष्यों को बंधन मुक्त करता आ रहा है। यहाँ पर इस बात का स्पष्ट कथन है कि यह घटनाक्रम इससे पहले भी हो चुका है। कर्म योग का पालन गृहस्थ को करना ही चाहिए। परन्तु यह मनुष्य को किस प्रकार मुक्ति-सायुज्य प्रदान करता है, वह तो रहस्य ही है और गोपनीय भी है। क्योंकि जो कर्म मनुष्य को बाँधने वाले हैं, वही कर्म मुक्तिदाता कैसे बन जाते हैं ? कर्म और उसका फल, अंत होने वाले हैं, परन्तु उनका सङ्ग भीतर रह जाता है और फिर यही जन्म-मृत्यु का कारण बनता है। जब कामना-अहंकारवश-मोहवश इनका सम्बन्ध स्वयं (-मैं, मेरा, अपनापन) से जुड़ता है, जिससे विवेक ढँक-आच्छादित हो जाता है और मनुष्य अपने कर्तव्य का निर्धारण सही तरीके से  नहीं पाता। कर्म संसार के लिए होता है, योग अपने लिए। योग का अनुभव तब होता है  जब कर्मों का प्रवाह पूर्ण रूप से संसार की ओर हो। कर्मयोगी को नियत कर्म का त्याग किसी भी अवस्था में नहीं करना चाहिये। निश्चयात्मक बुद्धि पारमार्थिक उद्देश्य-परसेवा में प्रवर्त करती है और कल्याण हो जाता है।
I have described-discussed-narrated the  ancient Supreme-Ultimate secret-mysterious-mythological-mystic Yog to you, since you are my friend and devotee. 
Arjun as Rishi Nar & Bhagwan Shri Krashn as Rishi Narayan have never ending relation-perpetual relation. Arjun is devotee & friend as well. His queries could be satisfied only after been a disciple, under the patronage and asylum of the Almighty Krashn. Ajun had deep love affection and admiration for Shri Krashn, due to which he preferred him, discarding his Narayni Sena-the mightiest army. The Karm Yog is so potent that it has been helping the devotees under the shelter of the God in breaking their bonds-clutches-ties with the world-nature and establishing rapport with the Ultimate. What has been said by the God here is sufficient to conclude that all these events have already taken place in earlier times-Kalp and now they are just repeating themselves like the beads of the garland-rosary, which just come to one having completed 108 beads. Karm Yog is meant for the household-the person having a family. What is confidential about it is its capability to grant assimilation in God, since the Karm in it self is tying-bonding. Then how it helps in breaking bonds. Though neither so simple, nor too intricate, it spells that one should adopt himself for the social cause-service-welfare-charity of others. Selfless service is the key to Moksh-Salvation. Performances and their reward-result both vanish but their impact remains leading to repeated cycles of birth and death, when the ego (-I, my, me, mine)-pride-illusion-desires over power his intelligence-prudence. His intelligence is shadowed-masked. He fails to take proper decisions. The performances are meant to help the world and the Yog that results, is for the devotee.  The practitioner should do his prescribed duties regularly without fail, punctually. Firmness-decisiveness always helps him in the welfare of the humanity leading to his Salvation-Moksh.

अर्जुन उवाच :: अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः। कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥4-4॥
अर्जुन बोले: आपका जन्म तो अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है, तब मैं इस बात को कैसे समझूँ कि आप ने ही (-कल्प के) पूर्व में सूर्य से यह योग कहा था?
यह प्रश्न सिद्ध करता है कि मानव योनि में अर्जुन इस बात से अनभिज्ञ हैं कि वे साक्षात भगवान् कृष्ण से बातचीत कर रहे हैं। एक देवता के रूप में सूर्य का जन्म कल्प के प्रारम्भ में हुआ और उन्हीं से इक्ष्वाकु-सूर्य-रघु वंश चले। अंततोगत्वा वही वंश चन्द्र-कुरु-भरत वंश में तब्दील हो गया। सूर्य देव स्वयं भगवान के अवतार-अंश हैं, इस बात से भी अर्जुन अनभिज्ञ प्रतीत होते हैं। और अर्जुन को यह तो कदापि ज्ञात नहीं है कि उनका प्रबल-प्रमुख शत्रु स्वयं भगवान् सूर्य का पुत्र कर्ण है। उनकी शंका स्वभाविक ही है। इस दुराहे पर लाकर प्रभु ने रहस्यों से पर्दा उठाना शुरू किया है जो कि हर व्यक्ति के उत्थान के लिये मार्गदर्शक-पथप्रदर्शक है। 
Arjun questioned: You are born recently, while the age of Sun is infinite years-beyond memory, much before the initial Kalp, prior to the birth of Brahma Ji, then how did you teach him this lesson?
Though an incarnation of the Almighty him self as Nar-Rishi, Arjun is under the cast of ignorance & illusion MAYA of Bhagwan Shri Krashn. He is un aware of the fact he is facing the Almighty him self. Therefore, his question to say that his age is few years & he is talking of preaching Bhawan Sury-Sun who took birth with the evolution of life on earth, in the initial Kalp-Brahma's day. [For details of time period, please refer to Hinduism Chapter I, of these blogs] The mighty Ikshvaku clan-dynasty originated from him, which was named as Raghu Vansh. This Raghu Vansh then renamed as Chandr Vansh-Kuru Vansh. Arjun is not aware of the fact that Sury Bhawan-Sun him self is an incarnation like him. Further, he is ignorant that his worst enemy Karn is the son of Sun. This is but natural to ask this question . The cross roads created the opportunity to explain the secrets of the universe to Arjun which where passed on to the devotees-religious people, in due course of time. The effort is still on.
श्रीभगवानुवाच :: बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥4-5॥
श्री भगवान बोले: हे परंतप अर्जुन! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं।  तुम उन सबको नहीं जानते, पर मैं जानता हूँ। 
अर्जुन को जन्म के रहस्य को जानने की जिज्ञासा है। उन्होंने अर्जुन को व्यक्त किया कि उनके और अर्जुन के अनेकों जन्म हो चुके हैं; परन्तु उनके अर्जुन के जन्मों में अंतर है। भगवान् (-श्री कृष्ण) और उनका अंश जीवात्मा (-अर्जुन) दोनों ही अनादि और नित्य हैं।  ऐसे कुछ लोग जिनको अपने कुछ पूवजन्मों का ज्ञान होता है जातिस्मर-युञ्जान योगी कहलाते हैं। भगवान् युक्तयोगी कहलाते हैं-जो कि सर्वव्यापी-असर्वज्ञानी हैं। वे स्वतः सिद्ध, नित्य योगी हैं। उनमे अपने  जीवों के सभी जन्मों का ज्ञान समाहित है। मनुष्य के अंतःकरण में नाशवान पदार्थों का आकर्षण, महत्व आदि पर्वजन्मों के ज्ञान को ढँक देता है। ममता, आसक्ति, सुखभोग,, आराम, संग्रह परिग्रह कहलाता है इनका त्याग अपरिग्रह है। अपरिग्रह की दृढ़ता होने पर पूर्वजन्मों का आभास होता है। संसार चक्र में जो कि परिवर्तन शील और असत् है में क्रिया और पदार्थों का अभाव होना निश्चित है। अभाव से कामना पूर्ति में विध्न पड़ता है  और इससे मनुष्य में उलझन-बेचैनी उत्पन्न होती है जिससे  तो क्या वर्तमान का ही ख्याल नहीं रहता।
The Almighty explained:  Hey Arjun, the tormentor of foes! Both of us had many incarnations in the past. while you have lost the memory of them, unaware of them.
Arjun is curious about his previous births-incarnations. He is Jeev-Nar-Jeevatma, while the Krashn   him self is Almighty. He said that there was a lot of difference between the incarnations of him and Arjun. While Almighty Krashn's incarnation is divine, Arjun's birth is governed by normal process of life and death. In spite of this, appearance of both the Almighty-The Supreme Soul and Arjun-a fragment of the Almighty God are imperishable and normal-routine-regular process. There are the people who are born with the memory of a few-some previous births, due the adoption of Yog in any of their previous incarnations. The Almighty is aware of each and every happening of the universe and has a memory of it, as well. Due the desire for comforts, satisfaction of ego-passions, importance is being given to the perishable objects and various endeavors which leads to the loss of previous memory. One who relinquish, rejects, forbade desires, maintains his previous memory. One who indulged in sins-vices-dishonesty, in the previous births, finds it really very difficult-painful-disturbing in present birth. All activities in this universe are cyclic in nature and repeats themselves like the turning beads of a rosary. There is absence of goodness-purity-piousness, which creates unfulfilled desires, scarcity leading to confusion-disturbance-irritation-anxiety and ultimately loss of memory in the present birth what to talk of previous births.
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥4-6॥ 
अजन्मा, अविनाशी और सभी प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी मैं, अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योग माया से प्रकट होता हूँ। 
साधारण मनुष्यों की तरह न तो भगवान् का जन्म होता है और न ही मरण। वे अपनी इच्छा शक्ति के द्वारा प्रकट होते हैं और अन्तर्धान हो जाते हैं। प्रकट होना और अंतर्धान होना दोनों ही परमात्मा की अलौकिक लीलाएँ हैं। मनुष्य पहले और पीछे-बाद में भी अव्यक्त है, मगर परमात्मा पहले और बाद में व्यक्त है, वह सदा-सर्वदा रहता है। सूर्य उदय और अस्त होता हुआ दीखता है, मगर वह तो वैसे का वैसा ही रहता है। प्राणी कर्मों के अधीन होकर जन्म लेते हैं, मगर परमात्मा स्वाधीन हैं। प्राणी का सुख और दुःख जन्म और कर्मों के अधीन है। भगवान इन दोनों से मुक्त हैं। भगवान् केवल 15 वर्ष की आयु तक बढ़ने की लीला करते है, परन्तु उसके बाद उम्र कितनी  ही क्यों न हो, वे दाढ़ी-मूंछों से रहित यथावत बने रहते हैं। उनकी लीलाएँ वयस-उम्र की मोहताज नहीं हैं। वे सत्त्व, रज और तम इन तीनो गुणों से रहित सुद्ध चित्त हैं। इन गुणों से अलग उनकी शुद्ध प्रकृति को पराशक्ति, संघिनी-शक्ति, आल्हादिनी शक्ति, संवित् शक्ति, चिन्मय शक्ति, कृपाशक्ति कहते है तथा राधा और सीता भी इसी शक्ति के नाम हैं। प्रकृति भगवान् की शक्ति है। भगवान् शक्ति के संयोग से समस्त लीलाएँ करते हैं। फिर भी मनुष्य-प्राणी की तरह वे उसके अधीन नहीं हैं। 
Though, unborn, imperishable and the Master-God of all beings, yet I appear-take birth by controlling My Nature through the power of (-inexpressible) Maya.
The Almighty does not appear-take birth or die-parish like the creatures-organisms-humans. He evolve by virtue of his won will. To evolve and to disappear are his divine features-characters-qualities. The human beings appear only in between-they were not present earlier and will not be present thereafter. The Sun rise and Sun set takes place every day, but Sun remains as such. The human beings take birth due to destiny as a result of their deeds in earlier births but the Almighty is free from destiny-birth-death. His physiques grows-develops till the age of 15 years only and thereafter it remains the same. His activities are independent of age. Beard and mustaches do not grow over his face. He is free from the three basis features of humans, Trigun Shakti: Sattv, Raj and Tam. Other than than these his power-Maya-pure nature is recognised as Para Shakti, Sanghini Shakti, Alhadini Shakti, Sanvit Shakti, Chinmay Shakti, Krapa Shakti. Radha and Sita are the other names imparted to it. The Almighty plays-rejoice-enjoys with the nature. He is not dominated-suppressed-governed by the nature like the human beings.
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥4-7॥ 
हे भरत वंशी अर्जुन! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने आपको साकार रूप से प्रकट करता हूँ। 
धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि का तात्पर्य है भगवद् प्रेमी, धर्मात्मा, सदाचारी, निरपराध और निर्बल मनुष्यों पर नास्तिक, पापी, दुराचारी और ताकतवर दुष्ट प्रवृति के लोगों का अत्याचार बढ़ जाना। इसी वक्त परमात्मा साकार रूप ग्रहण करके अवतार लेते हैं। सुख पाने की इच्छा मनुष्य से निकृष्ट कार्य-पाप कर्म करवाती है। उसकी आसक्ति बढ़ती जाती है। कलियुग में तो धर्म का एक ही चरण शेष रह जायेगा और पाप बढ़ता जायेगा। कलियुग में प्रमुख रूप से कलियुग का असर रहता है और गौण रूप में अन्य युग भी विराजमान रहते हैं। कर्म में सकाम भाव की अभिवृद्धि होती है। कलियुग की विशेषता यह है कि इसमें मात्र हरिनाम जपने, कृष्ण लीलाओं का स्मरण-बखान करने-सुनने से ही मुक्ति मार्ग प्रशस्त हो जाता है। 
Hey Arjun-the descendant of Bharat! Whenever there is a decay-downfall of Dharm-religion and growth of injustice-toxicity, then I manifest Myself (take a form).
The timing of the incarnation of the Almighty is very important. He reveals-appears, when the masses start facing tortures-troubles-tensions-from the mighty-wicked-cruel-vicious-terrorists-sinners-ignorant-barbarians-atheists-Hippocrates-governments etc. Desire to have comforts-wealth-passions forces one to indulge in sins. His attachment enhances with the satisfaction each desire. Kali Yug is left with only one characteristic-quality of Dharm, i.e., TRUTH. Other Yug Saty, Treta and Dwapr coexist but with negligible presence-strength. People indulge in prayers-worship with the motive of acquisition of more and more of every thing. The specialty of Kali Yug lies in its power to grant Salvation just by the recitation of the names of Gods with devotion-purity of heart-dedication to the service of mankind-truth.
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥4-8॥
साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की भली भाँति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ। 
साधु-संत-महात्मा लोग ही धर्म की रक्षा करते है और अधर्म का नाश करते हैं। उनकी रक्षा करने के लिए भगवान् को समय-समय पर अवतार लेना पड़ता है। जिनका एकमात्र उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति है, वे साधु-संत कहलाते हैं। साधु हमेशा सबके कल्याण की सोचता है। वो कामनाओं पर विजय प्राप्त करता है, जो कि उसे प्रभु के करीब ले जाता है।  यों तो सभी युगों में  दुष्ट, दुराचारी पाये जाते हैं तथापि कलियुग में उनका विशेष प्रभाव रहता है। आसक्ति, राग-द्वेष, कामना अधर्म का लक्षण है। छल, कपट, बेईमानी, झूंठ, दुर्गुण, दुराचार आदि अधर्मियों की पहचान हैं। अक्सर ऐसा होता है कि अत्याचार-अनाचार बढ़ने पर कोई न कोई व्यक्ति इनसे जूझने वाला निकल ही आता है और वह दैविक गुणों-शक्तियों से सम्पन्न होता है। धर्म का सर्वथा नाश कभी नहीं होता; केवल ह्रास होता है और इसको रोकने वाला निश्चय ही परमात्मा का एक महत्वपूर्ण अंग-अंश होता है। ऐसे व्यक्तियों पर आवेश में दैविक शक्तियाँ दुष्टों का नाश, रोक-थाम करने को प्रकट होती हैं। अर्जुन दैविक पुरुष तभी तक तक थे जब तक कि उनमें दैविक शक्तियों का संचार हो रहा था। 
The Almighty appear in various cosmic era-ages to establish the Dharm-religion, protection of sages-holy people-enlightened-virtuous and eliminated the sinners-wicked-wretched-evils. 
The holy souls-sages protect the religion through their service to man kind, prayers, purity, piousity, asceticism. These people do need shelter-asylum-patronage under the God. They are the devotes of the Almighty and so the God himself take care of them. Great souls always think of the social welfare-benefit. They attain control over their desires-needs-requirements-wish. Their needs are bare possible-minimum. This tendency moves them closer to the God. Though wicked people are found in each and every cosmic era-period-age, yet their numbers swell during Kaliyug-the current cosmic era lasting 4,80,000 years of which only 5151 have passed, till now. Attachment, enmity, greed, dishonesty, vulgarity, cheating, passions, frauds etc. are the signs through which one can identify the irreligious-unholy spirits. One or the other person who is religious, devoted to the God spring up to fight the vicious. Divine faculties erupt in him momentarily and protect the sufferers. The super natural powers evaporate-fade away soon thereafter. Its not surprising. Arjun lost his divine powers when he was escorting the queens and Yadavs from Dwarka to Hastinapur. Bhawan Shri Krashn too demonstrated his divine powers-divinity in an hour of need, otherwise, he too behave like a common man.
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म  नैति मामेति सोऽर्जुन॥4-9॥
हे अर्जुन! मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार जो मनुष्य मेरे जन्म और कर्म को तत्त्व-दृढ़ता से जान लेता है, वह शरीर त्याग कर फिर जन्म नहीं लेता, अपितु मुझे ही प्राप्त होता है। 
परमात्मा अजन्मा और अविनाशी हैं। उनका अवतार-अवतरण और लीलाएँ दैविक घटनाक्रम हैं। वे मनुष्य के बीच में रहकर उनके समान व्यवहार-आचार-विचारों का प्रदर्शन तभी तक करते हैं जब तक कि उनके दैविक रूप को प्रदर्शित करने की आवश्यकता न हो। उनके विग्रह पाप-पुण्य से रहित, नित्य, अलौकिक, विकार रहित, परम दिव्य और प्रकट होने वाले होते हैं। प्राणियों के हित में परमात्मा प्रकृति को अपने अधीन रखकर अपने दिव्य रूप में दैविक शक्तियों सहित प्रकट होते हैं। यही वह तत्व है जो कि साधक को दृढ़तापूर्वक सुनिश्चित करना है। उनमें फलेच्छा, कर्तापन, अभिमान का अभाव है। यह सब जानने और समझने वाला इस संसार सागर से देहमुक्त होने के बाद पुनर्जन्म प्राप्त नहीं करता यदि उसकी कामनाएं, आसक्ति, राग-द्वेष,  बंधन, टूट गए हैं।
The Almighty told Arjun that his birth and deeds were divine. One who recognize-learns this fact, with firmness-certainty is devoid of rebirth since he merges in him.
Almighty is unborn, all pervading and imperishable. His incarnations and performances are divine. He intermixes-interact-perform like ordinary people. He reveals only when its essential. His incarnations are free from sins or impact-result of virtues. He lands over the earth with the motive of removing sins, by controlling the nature. He is free from the desire of result-outcome-reward-impact, ego-pride. One who has understood this gist and converts him self into a desire less, unattached, enmity free, un bonded entity become free from the clutches-cycle of birth and death.
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः। बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥4-10॥
राग, भय और क्रोध से सर्वथा रहित, मुझ में तल्लीन, मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए बहुत से भक्त मेरे स्वरूप को प्राप्त हो चुके हैं। 
जो परमात्मा से विमुख है वो राग, ममता, कामना, लोभ, क्रोध के शिकार हो जाता है। नाशवान पदार्थों से लगाव अन्यानेक दोषों को जन्म देता है। जिसका ध्यान साधना में लग गया और वो परमात्मा मे तल्लीन हो गया उसके समस्त आकर्षण दूर हो जाते हैं। जो कोई भी भगवान् के जन्म और कर्म की दिव्यता को तथव सहित जान लेता है उसे भगवत् प्रेम हो जाता है।  भगवान् के शरण ग्रहण करते ही वह स्वयं भगवन्मय हो जाता है। उसे परमात्मा का आश्रय प्राप्त हो जाता है और उसके दुःख-परेशानियाँ स्वतः ही मिट जाते हैं। ज्ञान योग मनुष्य को संसार चक्र से विमुखकर परमात्मा से जोड़ता है। जब तक आदमी जीयेगा तब तक तो उसे कर्म करना ही है। ज्ञान उसे नाशवान वस्तुओं से चित्त हटाकर भगवान् की ओर मोड़ देता है। यही ज्ञान भगवत्प्राप्ति के हेतु तपस्या का रूप ले लेता है। 
Many of my devotees who were  detached, fearless devoid of anger, penetrated-concentrated in me under my patronage-asylum-shelter purified by asceticism in the form of enlightenment-learning  have attained my form-assimilated in me.
One who is away from the God (-devoid of prayers, asceticism, religion, meditation, piousity, charity, honesty, social service) is attacked by desires, motives, affections, allurements, anger, greed etc. Attachment with the perishable goods gives birth to several defects-distractions. Devotion to Almighty relieves him of all attractions. Seeking asylum-shelter-patronage under the Almighty leads to understanding of the divine nature of the God's birth & actions and it results in the love towards him. His troubles-tensions are reduced-relieved. He himself becomes identical to the God in shape (-with four hands,chaturbhuj). Enlightenment leads to transfer-channelization of energies towards the God. He is dragged-moved to the God. This devotion-enlightenment takes the shape of asceticism for attainment of Salvation. 
ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥4-11॥ 
हे प्रथानन्दन अर्जुन! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, उनको मैं उसी प्रकार शरण देता हूँ; क्योंकि  सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। 
भगवान् भक्त को उसी भाव से शरण-आश्रय प्रदान करते हैं, जिससे वो चाहता है-भक्ति करता है। भक्त-साधक स्वयं भगवान् का अंश है, अतः परमात्मा को उसकी फ़िक्र-चिंता हर वक्त लगी रहती है। जैसा राजा वैसी प्रजा, यह कथन यहाँ अनुकूल है; क्योंकि भगवान् ने अपनी लीलाओं में जिस प्रकार का आचरण-चरित्र प्रकट किया वही मानव मात्र के लिये अनुकरणीय हो जाता है, बशर्ते वो उन धटनाओं-चरित्रों को समझ सके। राम का मर्यादा पुरुषोत्तम रूप, कृष्ण का एक राजनयिक-कूटनीतिज्ञ-महान योद्धा-मित्र-संरक्षक-भाई  आदि सभी रूप वंदनीय-अनुकरणीय हैं। अवतार का एक प्रयोजन यह भी है, क्योंकि धर्म स्थापना में यह सहायक-उपयोगी है। परमात्मा ने राधा-कृष्ण के श्रेष्ठ-आदर्श प्रेम का परिचय भी दिया है। कृष्णावतार पूर्णावतार है और कृष्ण अवतारी अर्थात परमात्मा स्वयं पृथ्वी पर उतर आये। जब मनुष्य का प्रेम-सम्बन्ध उनसे हो जाता है तो उसे किसी चीज की आवश्यकता नहीं रहती।
Hey Arjun, the son of Pratha! I grant shelter-asylum-protection to my devotees through the way-manner-means, which they prefer-wish me to act, since all humans-devotees follow My path in every way.
The manner-method-way-means of devotion-prayer-worship are important, as they decide the type of help-patronage-protection-shelter-asylum deserved by the seeker. The devotee himself is a component-organ of the Almighty. This is the reason the Almighty rush to help him in and hour of need. The God is always thinking for the betterment of his creations. The common masses-general public always follow the deeds-action of those who are superior to them, especially the emperors [During Kali Yug public copy the film stars, dirty politicians, the wealthy]. As and when the God descend over the earth, he acts in such a manner which is ideal-useful-essential for the humans. One should be extremely careful in analyzing the actions of God. There are the people who generally mis interpret the Godly actions. Ram was an ideal king and husband. Krashn was not just an incarnation but descending of the Almighty him self with his power over the earth. He performed as a friend, guide, philosopher, mighty soldier, shrewd politicians, diplomate. The act was for establishing the power of Dharm-religion. He married 16,109 women-queens and was present with each one of them, all the time-which is an impossible act for a man-ordinary person. During MAHA RAS, he was with each and every one of the millions of Gopies-various forms-fragments of MAAN Bhagwati Radha, playing-rejoicing awarding the reward of their worship in thousands-thousands  of births. Here Supremacy of love is established-one of the forms of devotions like Karm Yog, Gyan Yog and Bhakti Yog.
काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥4-12॥
इस मनुष्य लोक में कर्मों से उत्पन्न सिद्धि जल्दी मिल जाती है; इसलिये कर्मों की सिद्धि-फल चाहने वाले मनुष्य देवताओं की उपासना-पूजा करते हैं। 
पृथ्वी लोक में मनुष्य को नवीन कर्म करने का अधिकार मिला हुआ है। सिवाय मनुष्य योनि के अन्य किसी भी अन्य योनि में और सिवाय पृथ्वी के किसी अन्य किसी भी लोक में कर्म सम्भव नहीं हैं। कर्मों की सिद्धि प्रयत्न-प्रयास, आराधना, पूजा-अर्चना, तपस्या, ध्यान समाधि जैसे साधनों से मिलती है। सांसारिक पदार्थ और पारमार्थिक प्रयास यथा सेवा दो अलग-अलग रास्ते है। सांसारिक उपलब्धियाँ आसक्ति, कामना, ममता राग-द्वेष उसे प्रकृति से जोड़ते हैं, जबकि जप-तप  उसे पारमार्थिक मार्ग-मुक्ति की ओर अग्रसर करते हैं। अपने लिए किया गया कोई भी कर्म बंधन कारक है। कर्म जन्य सिद्धि चाह्ने से ही कर्मों में मलिनता उत्पन्न हो जाती है। पदार्थों की इच्छा पूर्ति तो महज प्रारब्ध के अनुरूप शीघ्र ही मिल सकती है मगर मोक्ष-मुक्ति कर्मयोग-सेवा-सहायता-पारमार्थिक कर्मों-अपने से अन्य-भिन्न व्यक्तियों के हेतु, ज्ञानयोग, भक्तियोग आदि के सहारे ही संभव है। 
Those who wish-desire for success in this world through actions; worship various demigods-deities, because by doing this they soon get the reward-success in their actions-endeavors.
Its only over the earth that the humans-unlike other creatures have the right to perform deeds-new ventures-make efforts. The reward-fruit of the deeds is available through efforts, prayers, asceticism, meditation, etc. One can choose either of the two directions: one leads to satisfaction of own desires and the other is meant for the service of the mankind-social welfare. The ventures which make the human crave for self joins-connects him with the nature, leading to repeated cycles of birth and death. Prayers, asceticism, charity etc. paves the way for assimilation in the Ultimate, which is eternal.This ensures that he is freed from the clutches of pain-sorrow-grief-tortures. There are the means like Karmyog, Gyanyog & Bhaktiyog which paves the way for Salvation.
चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥4-13॥ 
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥4-14॥
चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र) को उनके गुण और कर्मों के विभाग पूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है। उस सृष्टि-रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी को तुम अकर्ता ही जानो। मुझे कर्मों के फल की कामना नहीं है, इसलिए कर्म मुझे लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो तत्त्व से मुझे जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बँधता। 
इस चराचर में समस्त प्रणियों का उद्भव उनके प्रारब्ध-पूर्वजन्मों के कर्मों के अनुसार सत्व, रज और तम गुणों के अनुरूप होता है।पृथ्वी पर मनुष्यों सहित समस्त जीवधारी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जाती के गुणों से अविभूत हैं। पशु, पक्षी, सर्प, वृक्ष आदि अपने गुणों के अनुसार उपरोक्त चारों गुणों के अनुरूप वर्णों में बँटे हुए हैं। इतना ही नहीं देवता दानव आदि भी अपने पूर्व जन्म और प्रारब्ध के अनुरूप ही हैं। समस्त प्राणियों का कर्तव्य है कि अपने कर्तव्य कर्मों का नियम-धर्म के अनुरूप पालन करें। यह पूजा का एक रूप ही है। इन सब की उत्पत्ति करने का-कर्तापन का अभिमान-स्पृहा भगवान् को नहीं है। इस सब में परमात्मा का कुछ भी व्यय नहीं रहता अर्थात पूर्ववत ही रहता है क्योकि सभी प्राणियों में उसका अंश उपस्थित है। शरीर प्रकृति का अंश है और प्रकृति में ही विलय हो जायेगा। इन्द्रियां, मन, बुद्धि इस शरीर के अंग-अंश हैं और नष्ट प्रायः हैं यद्यपि उनका परिमाण भी यथावत रहता है। धन-सम्पत्ति, नाते-रिश्तेदार इस शरीर से सम्बन्ध रखते हैं और कर्म, कर्तव्य और कर्मफल के हेतु हैं। जो भी मनुष्य कर्म करते हुए भी कर्मफल की इच्छा से मुक्त है वो दिव्यगुण सम्पन्न हो जाता है। भगवान्  भी अपने किये गए कर्तव्य-कर्म से असम्बद्ध हैं। मनुष्य का ध्यान जब तक कामनाओं-वासनाओं-ममता, आसक्ति, फलेच्छा में रहेगा वह तब तक वह संसार सागर में गोते खाता-डूबता-उतराता रहेगा। इस सबसे  दूर हटने से वह मलिनता से मुक्त होकर दिव्य आचरण वाला हो जायेगा। जो कुछ उसे मिला है वही उसे निष्काम भाव से परहित-परमार्थ में अर्पण कर देना है। 
कर्म में कर्तव्याभिमान शामिल है, जिसमे कर्तव्याभिमान ना हो को फलदायक भी ना हो वह क्रिया है और जो फलेच्छा से रहित कर्तव्याभिमान से मुक्त दिव्य है वो लीला है। सांसारिक मनुष्यों द्वारा कर्म होता है, मुक्त पुरुषों द्वारा क्रिया होती तथा भगवान् के द्वारा लीला होती है। 
The Almighty who is imperishable, all pervading,  creator of this universe has created the four castes along with their characteristics and functions. In spite of being the creator he remains un attached with this action, detached like a non performer. He is not inclined to the reward-fruit-result-outcome of his actions. So those actions involve-absorb him. 
Each and every organism is tied with his destiny, which is the outcome of deeds in previous births depending upon the three basic characteristics: Satv, Raj and Tam. The Almighty created four basic-fundamental groups-species-Varn-castes on the basis of the actions-performances-functions-duties in this universe. Animal, birds, snakes-reptiles-trees and all other categories are divided over this tenet. Various other divine species like demons-demigods-deities-rakshas, yaksh, Gandarbh too evolved through this basis fundamental rule of nature. What is common in them is the soul-a component of the Almighty him self. Its the responsibility of each and every organism to act according to the functions allotted to him. Deviation from them bring impurity resulting in cycles of birth and death. Carrying out of these functions as per the Varnashram Dharm is a form of prayer. The body will vanish after a certain pre decided period of time.The sense organs will help the individual in discharging-performances according to the sanctioned duties, depending upon the individuals desires-motives-qualities. The wealth-accumulations will help him in redeeming his status as a divine entity, if it is utilized for the sake of helping the ones, in need. Relatives-wealth are concerned with the body and are the means of action, duties and the desire for the reward. One's concern-clamor  for the desires-motives-wants will keep him struck with the world and he will continue drowning and rising, up and down in the ocean of births and rebirths. The moment he isolate himself from desires-motives-lust-wishes he qualifies for the divinity and freedom from births and deaths. Its his pious-revered duty to invest his belongings for the service of humanity.
The Almighty is free from the ego of having done it and so should an individual be. Nothing is lost in the creations by the God and similar is the story when an individual perform for the sake, service of mankind-society-others selflessly-relentlessly-free from motives.
Karm-action by an individual is associated with ego, action free from ego is pure if it is not turning into output, while the Karm which is free from the desire of reward and ego is divine.
Humans perform deeds, the detached make pure actions, while actions of the Almighty are divine.
एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥4-15॥ 
पहले भी मोक्ष की इच्छा वाले मनुष्यों ने इस प्रकार जानकर ही कर्म किए हैं, इसलिए तुम भी पूर्वजों जैसे ही सदा से किए जाने वाले कर्मों को ही करो। 
अर्जुन मुमुक्षु थे और अपने कल्याण चाहते थे।  जनक, विवस्वान, मनु, इक्ष्वाकु आदि भी मुमुक्षु थे। मुमुक्षयों ने भी कर्म योग का तत्व जान कर कर्म किये हैं। अतः मनुष्य को निष्काम भाव से कर्म-कर्तव्य करने चाहिये। कर्म करते हुए योग में स्थित होना चाहिये और योग में स्थित होते हुए भी कर्म करना चाहिये। कर्म करना-प्रवृति और कर्म न करना-निवृति, दोनों ही मानव प्रवृति-प्रकृति के अंग हैं। दोनों से ऊपर उठना योग है। पूर्ण निवृति मनुष्य के लिये संभव नहीं है। संसार से सम्बन्ध विच्छेद करने के लिये यदि निस्वार्थ भाव से कोई कर्म किया जायेगा तो वह बंधन करी नहीं होगा। मुमुक्षुओं ने कर्तव्याभिमान और फलेच्छा का त्याग करके कर्म किये हैं जो बंधन कारी नहीं है।
There had been people in the past who performed without the desires-motives-incentives for attaining Salvation-Assimilation in the Almighty-Liberation. Therefore one should also work on the lines-foot prints of the ancestors.
Arjun was desirous of release from the cycles of birth and death. Prior to him various mighty kings like Janak, Vivisman, Ikshvaku and Manu attained Liberation by realizing the gist-extract-theme of Karm-performance. Whatever has to be done, it should be without the desire-clamor of fruit-favorable result-outcome. One should establish himself in Yog while performing work and vice versa. To do work and not to do work both are human tendencies. To rise above both of these is Yog. Complete freedom from the non performance is impossible for the humans. The deed undertaken for the benefit of the masses-society will not be binding. There should be no selfishness in one's motives and he will be free from the repeated cycles of birth and death. Those who are desirous of Salvation are free from the pride-ego of having done-achieved-performed some thing, without expecting a return.
People with a will to be liberated had performed like this, in the past (-with success). So you should also perform the same type-pattern of actions as were done by the ancestors.
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः। तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥4-16॥
कर्म क्या है और अकर्म क्या है? इसका निर्णय करने में बुद्धिमान भी मोहित हो जाते हैं। इसलिए मैं तुमसे वह कर्म-तत्व कहूँगा जिसे जानकर तुम अशुभ (-कर्म- संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे। 
भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि केवल शरीर ही नहीं अपितु मन, वाणी के द्वारा होने वाली क्रियाएँ (-विचार) भी कर्म हैं। कर्म का भाव जैसा होगा वैसा ही स्वरूप वह ले लेगा जायेगा: सात्विक, राजसिक अथवा तामसिक, यद्यपि देखने में वे  एक से ही लगते हैं। उपासना-साधना सात्विक है, परन्तु यदि उसे कामना पूर्ति के लिए इस्तेमाल किया जाये तो वही राजसिक तथा किसी के नाश के लिए किया जाये तो तामसिक हो जाती है। प्रवृति अथवा निवृति मार्ग दोनों ही मुक्ति के साधन बन जाते हैं। वही कर्म-अकर्म हो जाता है, यदि कर्ता में फलेच्छा-आसक्ति-राग-द्वेष-ममता नहीं है, निर्लिप्तता है। इस बात को समझना कि ये दोनों ही मुक्ति के मार्ग हैं, कर्म-तत्व को जानना है। कर्म जीव को बाँधता है और अकर्म (-पारमार्थिक) मुक्ति दाता है। सात्विक त्याग में कर्म करना भी अकर्म है। कर्म और अकर्म की विभाजन रेखा इतनी बारीक-महीन है कि शास्त्रों का ज्ञाता, अच्छे से अच्छा अनुभवी और तत्वज्ञ-विद्वान भी मोहित हो जाता है। कर्मयोग और त्याग में  विवेक की प्रधानता से ये पारमार्थिक ही जाते हैं। कर्म तत्व के इस रहस्य को समझने के बाद मनुष्य भव सागर के पार उतर जाता है।
One-the wise-enlightened too, get deluded in understanding the nature of action (-work, function, endeavor, deed) and inaction?this. Therefore, the Almighty decided to explain-elaborate the gist of action which liberates one  from the inauspicious (bondage from actions).
Bhagwan Shri Krashn explained to Arjun that its not only the body which perform, but the brain-thoughts-ideas and speech too work. It is the motive-idea-concept behind actions, which makes them Satvik-pure,  Rajsik-contaminated with desires of comfort and Tamsik-stained-slurred by the desire of harming some one. The prayers too turn to Satvik, Rajsik or Tamsik according to the thinking of the individual. Intentional or otherwise,  both type of deeds turn into zero, leading one to freedom from reincarnations, if there is no desire, attachment, allurement, enmity. Both of these are modes of Liberation if intentions are pure for the sake of improving the society-helping others. The line drawn between Karm-work and no work is so fine that, it often confuses the most intelligent-enlightened-wise knowing the gist-understanding of scriptures-Varnashram Dharm. Karmyog and renunciation associated with prudence becomes devotional for the society as a whole. The purity of theme-gist-central idea behind the thoughts is sufficient to sail through the ocean, called living world.
कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥4-17॥ 
कर्म का तत्व-स्वरूप भी जानना चाहिए और विकर्म का तत्व-स्वरूप भी जानना चाहिए तथा अकर्म का तत्व-स्वरूप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्मों की गति गहन-छिपी हुई-कठिन है। 
अन्तःकरण के भाव से कर्म के तीन भेद हैं। कर्म, अकर्म और विकर्म। सकामभाव से की गई कोई भी क्रिया कर्म बन जाती है। फलेच्छा, ममता, आसक्ति से रहित परमार्थ कर्म अकर्म बन जाता है। विहित कर्म यदि अहित की भावना अथवा दुःख पहुँचाने के भाव-इच्छा से किया गया तो वह भी विकर्म-पाप बन जायेगा तथा शास्त्र निषिद्ध कर्म तो विकर्म है ही। निर्लिप्त रहते हुए कर्म करना ही अकर्म के तत्व को जानना है।कामना से कर्म होते हैं और कामना बढ़ जाने से विकर्म। समतापूर्वक किया गया विकर्म भी अकर्म बन जाता है। विकर्म के तत्व को जानना है, उसका और कामना का स्वरूप से त्याग करना।कर्म की गति को कर्तव्याभिमान और फलेच्छा-सुखेच्छा के रहते जानना-समझना बेहद कठिन-क्लिष्ठ-मुश्किल है।
One should understand-realize the essence-gist of pious-righteous actions, vices-wretched-immoral actions-sins and inaction because the effects-results-outcome of actions is hidden-deep.
Deeds-actions can be divided into three categories according to their impact over the inner self-thinking of the individual. (I) Basic: (i) Vested-latent-contained-entrusted & (ii) Ordained, prescribed-proper-determined-fit, (II) Deeds undone-inaction (-having no impact over the doer) & (III) Vices-sins-wretched-immoral acts. Any result oriented action performance is deed. Actions made-done without desire-motive turn into deed undone-not performed.Ordained, prescribed-proper-determined-fit performed with the desire-motive of harming others turn into sins. Any deed against the scriptures too is sin. Understanding of the fact that performances without involvement-attachment, is knowing the gist of deeds.Performances associated with equanimity, turn into deeds undone, how so ever intricate-horrific may they be. Understanding the gist of deeds undone and their summary rejection is essential. Its extremely difficult-intricate to know the orientation of the outcome-result of deeds due to the association of ego-pride and desire-motive for comforts-luxuries.
कर्मण्यकर्म यः पश्येद-कर्मणि च कर्म यः। स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥4-18॥ 
जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी सभी कर्मों को करने वाला है। 
जब तक प्रकृति के साथ सम्बन्ध है, कर्म करना अथवा न करना दोनों ही कर्म हैं। कोई भी कर्म करते हुए अथवा न करते हुए उससे निर्लिप्त रहना, यानि कि प्रवृति अथवा निवृति न रखना, मनुष्य को बन्धन मुक्त रखता है। यह योगी का लक्षण है। निर्लिप्तता स्वयं के लिये और कर्म संसार-प्रकृति के लिये हैं, परधर्म हैं।परिवर्तन शील प्रकृति और निवृति का आरम्भ और अंत होता है, मगर परम निवृत तत्व-अपने स्वरूप का अन्त नहीं होता।जो बुद्धिमान है, वह इस कर्म तत्व को समझ लेता है, अर्थात उसने सब कुछ जान लिया। फल की इच्छा न रखने से राग उत्पन्न नहीं होता और परमार्थ-हित करने से साधक वीतराग हो जाता है और सब कर्म अकर्म हो जाते हैं। कर्मयोगी सिद्धि और असिद्धि में सम रहता है। वह फलेच्छा, ममता और आसक्ति का त्याग करके केवल दूसरों के लिये कर्तव्य-कर्म करता है। करना, जानना और पाना शेष न रहने से वह कर्मयोगी अशुभ संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। 
One who sees-finds-perceives-observes inaction in action and action in inaction, he is wise-enlightened among humans. He is a Yogi-established and is the doer-performer of all actions; nothing remains to be done by him.
By the time one has relation with the nature, whether he does any thing or not, he is continuously doing-working-functioning. Whether one does any thing or not his indifference-detachment-dissociation keeps him free from bonds-ties. Neither he intends to do nor desires to detach to remain aloof. This is the characteristics of a Yogi. Detachment is for himself and performance are for the nature i.e., for others. The nature and intentions-tendencies to detach have a beginning and end, but the own self-inner self-soul has no end. The intelligent-prudent, grasp the gist-extract-theme of this concept. Understanding of this concept means that he has understood every thing.Loss of desire to have the reward of deeds creates detachment and he start functioning in the interest of others-society which relinquishes him and he weighs the work and no work equally. He, the Karm Yogi has acquired equanimity in achievements and failures-no success. He rejects the desires for reward, affections, attachments, allurements and performs for the service-as a duty, for the sake of others, in need. The Karm Yogi has nothing to do, know or receive and this makes him free from the inauspicious bonds-clutches-ties in this  world-universe.
यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥4-19॥
जिसके सम्पूर्ण कर्मों के आरंभ कामना और संकल्प से रहित होते हैं और जिसके सभी कर्म ज्ञान रूपी अग्नि द्वारा जल चुके हैं, उसको ज्ञानी लोग भी पंडित-बुद्धिमान कहते हैं। 
किसी कार्य को करने का निश्चय करना-निर्णय करना संकल्प होता है। अच्छा-बुरा, हानिकारक-लाभप्रद है अथवा नहीं यह देखना, तथा नुकसान करने वाला हो तो अन्य मार्ग-पथ का चुनाव करना विकल्प तलाशना है। जब विकल्प हट जाये तब कामना रह जाती है। कर्मयोगी में संकल्प और विकल्प दोनों ही मिट जाते हैं। उसके सामने जो मार्ग है, उसमें कामना नहीं होती परन्तु कर्म होता है। उसके द्वारा हर काम सुचारु रूप से सांगोपांग और तत्परता पूर्वक किया जाता है। उसके कार्य शास्त्र सम्मत होते हैं। उनसे किसी का अहित नहीं होता। उनमे संकल्प और कामना का अभाव रहता है। यह समझ लेना कि कर्म का सम्बन्ध शरीर के साथ है स्वरूप-शरीरी के साथ नहीं, ज्ञान है। शरीर और कर्म दोनों ही नाशवान हैं। कर्मयोगी कर्मयोनि मानवशरीर में रहकर भी इसमें लिप्त नहीं होता।  कर्मों में  होना बुद्धिमान के लिए सम्भव है। 
One, the beginning of whose actions is with out desires & determination-commitments  and whose deeds have been eliminated-vanished-burnt by the fire of wisdom-enlightenment is recognised as a Pundit-philosopher-learned-scholar by the enlightened. 
The decision to start some job-project-work is determination. One may opt for alternatives only after finding gains or losses, associated with what he wants to do. Failure to find alternatives, leaves behind longing-unsatisfied desires. The Karm Yogi has no choices-alternatives and motives. The path adopted by him is free from desires-longings, with the pure-pious-virtuous-righteous performances. All his deeds are perfect, associated with readiness-willingness, done-performed, smoothly-dedicatedly. His functions have the permission of the Shastr-scriptures-Philosophy. He never intends to harm anyone. Understanding of the fact that deeds are associated with the body & not with the soul is acquisition of learning-knowledge. Body as well as deeds are perishable. Karm Yogi utilize the human body-incarnation for achieving the Ultimate without being attached-biased to it. One who has understood-grasped this gist, is praised by the enlightened as learned-intelligent-prudent.
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥4-20॥ 
जो व्यक्ति कर्म और फल की आसक्ति का त्याग करके आश्रय से रहित और स्वयं में  सदा तृप्त-नित्य संतुष्ट है, वह कर्मों में लगा हुआ होकर भी वास्तव में कुछ भी नहीं करता। 
कर्म करते हुए कर्ता का यह भाव कि शरीरादि कर्म-सामग्री मेरी है, मैं कर्म करता हूँ, कर्म मेरा औए मेरे लिए है तथा इसका मुझे यह-अमुक फल मिलेगा, तब वह कर्मफल का हेतु बन जाता है। अगर इनमें किञ्चित मात्र भी आसक्ति नहीं है तो वो कर्मफल का हेतु नहीं बनता। देश, काल, वस्तु, व्यक्ति, परिस्थिति आदि का किञ्चित मात्र भी आश्रय न लेना निराश्रय है। उसे स्वतः सिद्ध नित्यतृप्ति का अनुभव हो जाता है। उसके सम्पूर्ण कर्म केवल संसार के हित में होते हैं। सांगोपांग रीति से सब कर्म करते हुए भी वह वास्तव में किञ्चित मात्र कोई कर्म नहीं करता क्योंकि सर्वथा निर्लिप्त के साथ कर्म का स्पर्श ही नहीं होता उसके सभी कर्म अकर्म  हो जाते हैं। अतः वह कर्मफल से बँधता ही नहीं। 
One who has given up-rejected-relinquished attachment for the actions and their fruits, is always content with him self and is independent, though engaged in actions, is a not a doer-performer, in essence-reality.
The thinking-inclination of the doer that this body, material to perform are mine, the deeds are mine, I will be rewarded in this or that manner, become the motive for performance-more & more repeated performances. If one is not inclined-attached-interested in the result oriented deeds,  he remains aloof-unstained-slurred-tainted from the outcome-result of the deeds. Not to seek dependence over country-place, period-era-time, object-material, individuals, situations makes one independent. He starts realizing contemplation-satisfaction. All his deeds-motives are directed towards the  well being of the masses-society. This is the state when he does every thing strictly according to the dictates of scriptures-shastr but the deeds & their out come become null and void, since he is detached-relinquished-content. He remains untied-un bonded-free with the deeds and their out come.
निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥4-21॥ 
जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरह से वश में किया हुआ है, जिसने सब प्रकार के संग्रह का परित्याग कर दिया है ऐसा इच्छा रहित कर्म योगी-मनुष्य केवल शरीर-निर्वाह संबंधी कर्म करता हुआ भी पाप को प्राप्त नहीं होता। 
कर्मयोगी आशा और इच्छा से मुक्त है अतः उसका शरीर, इन्द्रियां और अन्तःकरण स्वतः वश में हो जाते हैं। सन्यास की अवस्था में कर्मयोगी सब प्रकार के भोग-संग्रह का परित्याग कर चुका है। गृहस्थ तो वह भोग की दृष्टि से किसी चीज का संग्रह नहीः करता अपितु संसार की सेवा के दृष्टिकोण से रखता है। उसमें कामना, आशा, स्पृहा, वासना नहीं रहते। निवृति परायण कर्मयोगी केवल शरीर-निर्वाह के लायक न्यूनतम  कर्म ही करता है। क्योंकि उसका कर्म करने अथवा न करने से अपना किञ्चित मात्र भी सम्बन्ध नहीं है, इसलिए वह जन्म-मरण तथा पाप से भी मुक्त है। उसमें आलस्य-प्रमाद भी नहीं हैं। उसके शरीर, इन्द्रियां संयत हैं। 
One who has controlled his body and the inner self (-soul, heart & mind), who has rejected-relinquished the collection-storage-accumulation-possessions of every thing, a desires free person-Karm Yogi is not tainted-slurred, while doing-discharging all his duties pertaining to the sustenance of the body.
Karm yogi is free from desires-motivation. His physique, sense organs and the inner self (-soul, heart & mind) are disciplined-under control. As a hermit-wanderer-recluse, he has relinquished-rejected the tendency to accumulate-collect-store goods for comforts-utilization. As a household-family member, he possess these commodities for the benefit-utilization of others-as a component social responsibilities. He is free from desires-wants, hope, sensuality-sexuality-passions. One who has the tendency to Liberate, stocks-piles only that much goods as are needed for sustenance-subsistence. Since, he has no relation with deeds-performances or non performances, he is free from sins & birth or death. He is free from laziness & intoxication. His physique and sense organs are balanced. Mentally, he is sound-perfect.
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥4-22॥
अपने आप जो कुछ मिल जाये उससे वह संतुष्ट रहता है, जो ईर्ष्या से रहित, द्वंद्वों (-हर्ष, शोक आदि) से रहित तथा सिद्धि और असिद्धि में सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता। 
कर्मयोगी निष्काम भाव से सभी कर्तव्य-कर्म करता हुआ, फल प्राप्ति की इच्छा से रहित-कर्म के अनुकूल या प्रतिकूल, लाभ या हानि, मान अपमान, स्तुति-निन्दा से अपने अन्तःकरण में दोष उत्पन्न नहीं देता। उसके लिए समस्त चराचर के प्राणी एक समान हैं। उसे किसी से भी ईर्ष्या-ग्लानि-द्वेष नहीं है। उसका मन-मस्तिष्क अन्तर्द्वन्दों, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, से मुक्त है। वह द्वैत और अद्वैत, निर्गुण या निराकार  के झगड़े-झंझट से दूर है। सिद्धि-असिद्धि में उसका सम भाव है। वह तो कर्म करते हुए भी नहीं बँधता-फिर अकर्म और कर्म न करने से तो कैसे बँधेगा !? वह तो पूर्ण रूप से निर्लिप्त है। उसे समता की प्राप्ति हो चुकी है। 
One is satisfied-content with whatever comes his way through destiny-stroke of luck-fate-automatically-without efforts, is beyond enmity-envy &  disputes, has attained equanimity towards success and failure,  is not bound by the deeds-actions while doing-discharging them.
Karm Yogi does every thing without attachment with it, without the desire of reward-positive out come of it. He does not bother weather the proceeds are gain or loss, praise or slur, insult or honor, prayer or blasphemy. For him the entire world is one. All its creatures-organisms are similar-identical having the component-soul of the Almighty, in them. His mind-mood-heart-soul are never perturbed-disturbed, by pain or pleasure, enmity or friendship. He do not care for the duality of the Almighty. He has same attitude-equanimity, towards success and failure. He is un bonded-free, while working-performing deeds and therefore, he can not be tied-tainted-slurred, when he is not performing. He has attained equanimity.
गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥4-23॥
जिसकी आसक्ति सर्वथा नष्ट हो गई है, जो मुक्त हो गया है, जिसकी बुद्धि स्वरूप के ज्ञान में स्थित है, इस प्रकार केवल यज्ञ के लिये कर्म करने वाले मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं। 
मनुष्य का घटनाक्रम, क्रियाओं, पदार्थ, परिस्थितियों, व्यक्तियों से जो सम्बन्ध-हृदय से लगाव है वही जन्म-मरण का हेतु है। मनुष्य असंग होते हुए भी शरीर, इन्द्रियों, बुद्धि, पदार्थ, परिस्थिति आदि से सम्बन्ध मानकर सुख की चाहत से उनसे आबद्ध हो जाता है। कर्मयोगी इनको अपने लिये नहीं मानता अपितु संसार की ही मानकर संसार को ही अर्पित कर देता है। उसमें अहम नष्ट हो जाता है। वह ममता, आसक्ति, कामना के प्रवाह से मुक्त हो जाता है। उसकी बुद्धि में स्वरूप का ज्ञान नित्य-निरन्तर जाग्रत रहता है।  क्रिया और पदार्थ जड़ हैं, इनका स्वरूप से किञ्चित मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। ये प्रकाश्य और स्वरूप प्रकाशक-चेतन-असंग है। निस्वार्थ रूप से दूसरों की सेवा यज्ञ है। क्योंकि यज्ञ के लिये कर्म करने से सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं। अतः कर्मयोगी के सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं। मनुष्य के जीवन का महत्व इसलिए है कि वो मोक्ष के लिये यज्ञ रूपी सतत् प्रयास जारी रखे। 
One whose attachments have destroyed, who is free-liberated-without bonds-ties, whose intelligence is stable in enlightenment (-memory of the Almighty) and he does work for the sake of Yagy-sacrifices (-performs only for the sake of social benefit) only; all his Karm-deeds, which connects him with the unending cycle of birth and death are lost.He is set to get Salvation-Liberation, Assimilation in the Almighty. This is the Ultimate goal of human incarnation which connects him to eternity.
Attachment of the human being with the situation, events, actions, material objects and the other organisms, results in unending cycle of infinite incarnations leading to 84,00,000 species. He keeps on rotating in one or the other of them. Man is mortal but the soul is for ever. The inner self though independent yet it gets attached with the desire for comforts with actions, commodities, body, sense organs, intelligence, situations etc. The Karm Yogi, do not consider all these for him self. He is busy with the benefit of society, masses, down trodden. His ego-pride have been lost. He has offered-provide, all his belongings for the service of man kind-public, who needs them. He no more suffers from desires, attachments-allurements-bonds. His intelligence always keep him alert about the real self (-soul-the component of the God) with in him.
He has realized that actions and material objects are inertial-static in nature. The real self has no permanent connection with them.The real self shows the static nature of material objects-body and actions.Selfless service is Yagy-ascetic practice-prayer. Since, he has been busy through out his life performing for others, all his deeds have been lost. He is detached-free. He has successfully utilized the opportunity for his Liberation-Assimilation in the Almighty-Salvation.
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥4-24॥ 
अर्पण अर्थात जिससे अर्पण किया जाये (-स्त्रुक्, स्त्रुवा) वे पात्र ब्रह्म है, यज्ञ में अर्पित हव्य पदार्थ (-तिल, जौ, घी, आदि)-द्रव्य भी ब्रह्म है, तथा ब्रह्म रूपी कर्ता द्वारा ब्रह्म रूपी अग्नि में आहुति रूपी क्रिया भी ब्रह्म है, ऐसे यज्ञ को करने वाले जिस मनुष्य की ब्रह्म में ही कर्म-समाधि हो गई है, उसके द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही है। 
यज्ञ में अग्नि रूप हुई आहुति मुख्य है। सभी साधन साध्य रूप होने पर यज्ञ बनते हैं। यज्ञ में परमात्मतत्व करना वास्तविकता है। यज्ञ कर्ता के सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं। अर्पणकी क्रिया, पदार्थ, आहुति देने वाला, अग्नि और आहुति देने की क्रिया ब्रह्म ही हैं। कर्ता को ब्रह्म में ही कर्म समाधि अनुभव होती है अर्थात उसकी सभी कर्मों में ब्रह्मबुद्धि होती है। उसके सम्पूर्ण कर्म ब्रह्म रूप हो जाते हैं। उसे फल के रूप में भी ब्रह्म की ही उपलब्धि होती है। उसकी दृष्टि में सिवाय ब्रह्म के अन्य किसी की भी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। 
Offerings-sacrifices, pots-instruments in a Yagy-Hawan-Agnihotr are Brahm, materials sacrificed in Agnihotr-sacrificial fire constitute Brahm, one who is making sacrifice-oblation  in the fire, sacrifice and the sacrificial fire too, is Brahm and one who  has attained Karm Samadhi in the Brahm, out put result-rewards obtained out of this Hawan-sacrifice by the performer too constitute Brahm.
Sacrificial fire is the main component of the Yagy-Hawan-Agnihotr. Sacrifices offered, turn into eternal fire. All means pertaining to Yagy Karm turn into-assimilate into the Ultimate-eternal. All actions of the devotee-performer turn into in actions, leading him to freedom from birth and death. All functions-offerings-oblations, materials, performer, sacrificial fire and the processes too turn into Brahm. The doer finds Brahm Samadhi in his actions-process. He receives the out put of the Yagy in the form of Brahm, it self. He do not find any thing independent, other than the Brahm.
दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते। ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥4-25॥ 
अन्य योगी-मनुष्य-साधक दैव (-भगवदर्पण रूप) यज्ञ का ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगी लोग ब्रह्म रूपी अग्नि में विचार रूप  (-अभेद दर्शन के द्वारा आत्म रूपी) यज्ञ द्वारा ही जीवात्मा रूप यज्ञ का हवन करते हैं।
ब्रह्म स्वरूप दर्शन करने वाले साधक से भिन्न-अन्य यज्ञार्थ कर्म करने वाले निष्काम साधक भी हैं। भगवान् देवों के भी देव अर्थात दैव हैं। सम्पूर्ण क्रियाओं तथा पदार्थों को भगवान् का और उनके लिये ही मानना तथा उनको ही अर्पण कर देना दैव यज्ञ है। किसी भी क्रिया और पदार्थ में किञ्चित मात्र भी आसक्ति, ममता और कामना न रखकर उन्हें सर्वथा भगवान् का ही मानना दैव यज्ञ का भली भाँति अनुष्ठान करना है। चेतन का जड़ से तादात्म्य होने के कारण ही उसे जीवात्मा कहते हैं। विवेक-विचार रूप से जड़ से सर्वथा विमुख होकर परमात्मा में लीन हो जाने को यज्ञ कहा गया है। 
Other Yogis-practitioners worship the Almighty in the form of Yagy-Hawan-Agnihotr-holy-sacred sacrifices and other yet another Yogi find the Almighty in the form of Brahm shaped sacred fire, through their thoughts-meditation as the portrait of Jeevatma-soul shaped Yagy.
There are practitioners other than the one, who visualize the Almighty in the form of sacred fire-Yagy-Agnihotr-Hawan, they perform-carry out deeds pertaining to Yagy with out having any motive-desire-wish. Bhagwan-Almighty is the God of demigods-deities, also. Offering-sacrificing of all actions, material objects to him and consideration of every thing & action belonging to him, is the Ultimate Yagy-prayer-sacrifice. Consideration of all actions & material objects with out slightest possible attachment, desire, affection  and surrendering them to the Almighty is the real performance of Yagy. Connection of the awake with the inertial-static is called the JEEVATMA-creature-organism (-here human beings). Separation of the practitioner from the inertial-static form of life-creations, through prudence and thinking-meditation  and assimilation in the Almighty is Yagy.
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥4-26॥
अन्य योगी श्रोत्र आदि सभी इन्द्रियों का संयम रूपी अग्नियों में हवन करते हैं और दूसरे योगी शब्दादि सभी विषयों का इन्द्रिय रूपी अग्नियों में हवन करते हैं। 
अग्नि वह कारक है जो कुछ भी जलाकर भस्म-नष्ट करता है। शब्दादि सभी विषयों की इन्द्रिय रूपी अग्नि में और इन्द्रियों की संयम रूपी अग्नि में आहुति से यज्ञ किया गया है। एकान्त काल में इन्द्रियाँ और उनके विषयों का संयम किया जाता है। संयम की अवस्था तभी उत्पन्न होती है जब साधक इन्द्रियों, मन, बुद्धि तथा अहम् में राग-आसक्ति से सर्वथा विरक्त हो जाये। विवेक-विचार, दृढ़ निश्चय, जप-तप-ध्यान-चिन्तन-मनन, से इन्द्रिय संयम, राग-द्वेष से मुक्ति व्यवहार काल और एकान्तकाल दोनों ही अवस्थाओं में एक समान स्थिति बनाये रखना है। 
Other Yogis offer senses  like speech into the sacrificial fire in the form of sense organs, while the sense organs like ears are offered  into the sacrificial fire in the form of control-firm determination to carry out Yagy-Hawan-Agni Hotr. 
Fire is means to eliminate any thing. 
Senses like talking-speaking-speech are sacrificed in the fire in the form of sense organs, through control-restraint-command. The sense organs are sacrificed into the fire constituting of control-restraint. The senses and their sensualities are managed-controlled while one is alone-during solitude. Equilibrium-equanimity is evolved when prudence-thinking, prayers-recitation-meditation-analyzing, firm determination generate-occur-evolve into practitioner, to control sense organs, relinquishing attachment-allurements-enmity in solitude as well in society.
सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥4-27॥ 
अन्य योगी लोग सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणों की सभी क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म-संयम योग-समाधि योग रूप  अग्नि में हवन किया करते हैं। 
समाधि भी यज्ञ स्वरूप है। योगी समस्त इन्द्रियों को मन-बुद्धि सहित समाधि अवस्था में ले जाकर उन्हें शांत और निश्छल-निश्चेष्ट कर लेता है। इस अवस्था में प्राणों की क्रियाओं का हवन भी हो जाता है, अर्थात वे रुक जाती हैं। हठयोग में, समाधी की अवस्था में, कुम्भक क्रिया का अभ्यास प्राणों को घंटों-दिनों तक रोक कर, आयु बढ़ाता है। समाधि काल में मन को एकाग्र करने पर प्राणों की गति स्वतः रुक जाती है। समाधि और निद्रा दोनों ही अवस्थाओं में कारण शरीर से सम्बन्ध बना रहता है और सच्चिदानंद परमात्मा ही सर्वत्र परिपूर्ण है, ऐसा ज्ञान जाग्रत रहता है। निद्रा काल समाधि से भिन्न है क्योंकि इसमें प्राणों की गति कायम रहती है। चित्तवृति निरोध रूप अर्थात समाधि रूप यज्ञ करने वाले योगी जन इन्द्रियों और प्राणों की क्रियाओं का समाधि रूप अग्नि में हवन  किया करते हैं। मन-बुद्धि की चञ्चलता को त्याग कर सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणों की क्रियाओं को रोककर समाधि में स्थित होकर सच्चिदानन्द परमात्मा में स्थित हो जाते हैं।   
There are the other Yogis who sacrifice all the actions of their senses and the Pran (-vital airs) in the fire kindled by the knowledge of the Yog of self-restraint.
Staunch meditation is also a form of Yagy (-sacrifice, burning). Yogi directs-channelizing his sensualities along with mind and intelligence, into staunch meditation and silences them. In this process the life sustaining forces are also sacrificed. They come to a halt. During Hat Yog and staunch meditation, the practitioner controls his breath initially from minutes to hours and hours, which boost his longevity. There are Yogis who's chronological age is in thousands of years. During the period of Samadhi, the brain is thoroughly immersed-concentrated-directed-channelized into the Almighty. Though the heart beat stops, yet brain remain conscious, keeping him alive. The practitioner is absorbed completely into the sensation of the presence of the Almighty, all around him. He experiences bliss-Parmanand. This state is different to that of sleep, in which the flow of air vital continues. Controlling the activities of the brain, which roams around in all directions i.e., the state of Samadhi, the Yogi diverts the actions-activities of the mind & intelligence into sacrificial fire, in the form of Samadhi. This is state, when the devotee is stabilized-established in the Almighty.
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे।स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥4-28॥ 
दूसरे कितने ही प्रयत्नशील साधक तीक्ष्ण व्रत और द्रव्यमय यज्ञ करने वाले हैं और कितने ही तपोमय यज्ञ करने वाले हैं और दूसरे कितने ही योग यज्ञ करने वाले हैं तथा कितने ही स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ करने वाले हैं।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय (-चोरी का अभाव), ब्रह्मचर्य, और अपरिग्रह (-भोग बुद्धि से संग्रह का अभाव) पाँच यम हैं जिन्हें महाव्रत कहा जाता है। उपरोक्त वर्णित चारों यज्ञों में व्रत अर्थात नियमों को दृढ़ता पूर्वक पालन करना चाहिये। कुआँ, तालाब, धर्मशाला, मंदिर, स्कूल आदि लोकहित के साधन करना, अभावग्रस्त लोगों में अन्न, जल, औषधि, वस्त्र, पुस्तक, धन, निस्वार्थ भाव से अपना सभी कुछ लोक हित में समर्पण कर देना, दान देना  आदि  द्रव्यमय यज्ञ है। व्रत, उपवास, मौन, तपोमय यज्ञ हैं।  कठिन से कठिन परिस्थिति में भी अपना कर्म बिना विचलित हुए प्रसन्नता पूर्वक अपना कर्तव्य पालन करना तपस्या है और अति शीघ्र सिद्धि देने वाली होती है। अन्तःकरण की समता अर्थात कार्य-अभीष्ट की सिद्धि-असिद्धि, फल की प्राप्ति-अप्राप्ति, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति, निंदा-स्तुति, आदर-निरादर, मान अपमान, राग-द्वेष, हर्ष-शोक, सुख-दुःख, अन्तःकरण की हलचल व्यग्रता में एक समान रहना योगयज्ञ है। गीता, रामायण, महाभारत, पुराण, भागवत, इतिहास, वेद-उपनिषद् का वर्णाश्रम धर्म के अनुसार पठन-पाठन, श्रवण, अध्ययन, चिंतन, मनन, विचार ज्ञान रूपी यज्ञ हैं। 
There are various practitioners who perform staunch sacrifices through wealth, asceticism-austerity and Yog. Then there are others who diligently undertake acquisition of the knowledge of epics, Ved, History, scriptures, think over them, understand them apply in their day today life. 
Non violence, truth, not to steal, chastity and avoidance of the storage-accumulation of goods for comforts are 5 divine rules in life, which are considered to be extreme penances. Four Yagy have been described, which needs great determination, care, austerity for performing them according to Varnashram Dharm. Establishment of schools, opening of inns for the rest of travelers, digging of ponds, wells, roads, tree plantation by the side of roads, garden for public use are pious acts equivalent to sacrifice-Yagy. Distribution of free books, medicines, water, food grain, money, donations, charity and offering personal belongings for the service of poor-needy is a form of Yagy. Fasting, silence, keeping up vows to do some thing for the sake of public service-welfare too are Yagy. To fulfill commitment in adverse circumstances and to perform own duty without being disturbed is staunch meditation-asceticism. Maintaining equanimity between success-failure, favorable or adverse conditions, abuse-respect, respect-insult, attachment-enmity, happiness-sorrow and balancing the disturbances-distractions of mind and heart constitute Yagy. Performance of all kinds of Yog do involve-constitute Yagy-holy sacrifice. Reading, listening, understanding and utilizing the gist of scriptures, history, Veds, Puran, Geeta, Bhagwat, Ramayan, Maha Bharat, Upnishads is also a form of asceticism-Yagy-Holy sacrifice.
अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे। प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥4-29॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥4-30॥
योगी अपान वायु में प्राण वायु का हवन (-पूरक करके) करते हैं और अन्य कितने ही प्राण वायु में अपान वायु का हवन (-रेचन-साँस बाहर निकालना) करते हैं। कुछ अन्य प्राणायाम परायण योगी प्राण और अपान की गति को रोककर (-कुम्भक क्रिया के द्वारा) हवन करते हैं। योगी नियमित-सन्तुलित आहार द्वारा प्राणों का प्राणों में ही हवन करते हैं। ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश करने वाले और यज्ञों को जानने वाले हैं। 
प्राण का स्थान ऊपर-ह्रदय स्थल तथा अपान का स्थान गुदा (-anus) नीचे है। श्र्वास को बाहर निकलते समय सांस-वायु की गति ऊपर की ओर और भीतर ले जाते वक्त नीचे की ओर होती है। 
योगी पहले श्र्वास को बाईं नासिका-नथुने-चन्द्र नाड़ी के द्वारा भीतर खींचते हैं। वह वायु ह्रदय में उपस्थित प्राण वायु को साथ लेकर नाभि से होती हुई स्वतः अपान में लीन हो जाती-मिल जाती है। यह पूरक क्रिया है।
तत्पश्चात योगी-अभ्यासकर्ता प्राणवायु और अपान वायु दोनों की गति रोक देते हैं, जिसे कुम्भक कहते हैं अर्थात न तो साँस बाहर आती न ही अन्दर जाती है। इसके बाद वे अन्दर की वायु को दाँये नथुने-सूर्य नाड़ी से निष्कासित करते हैं। इस प्रक्रिया में प्राणवायु अपान वायु को साथ लेकर बाहर निकलती है, जिसे प्राण वायु में अपान वायु का हवन कहा गया है। यही रेचक क्रिया है। 4 भगवन्नाम से पूरक, 16 भगवन्नाम से कुम्भक और 8 भगवन्नाम से रेचक क्रिया की जाती है। 
इस क्रिया को विपरीत अवस्था में पहले सूर्य नाड़ी से पूरक, फिर कुम्भक और तदोपरान्त चन्द्रनाड़ी से रेचक क्रिया की जाती है। इस प्रकार बार-बार पूरक-कुम्भक तथा रेचक प्राणायाम रूपी यज्ञ है और सभी पापों को नष्ट कर देते हैं ( यही क्रिया बीमारियों को दूर करने के लिए की जाती है)। 
नियमित आहार-विहार, सन्तुलित-नियमित भोजन करने वाले साधक ही प्राणों का प्राणों में हवन-विलय कर सकते हैं। बहुत अधिक, बेहद कम या बिलकुल भोजन ने करने वाला यह प्राणायाम नहीं कर सकता। प्राण का प्राण में हवन का तात्पर्य है प्राण और अपान को अपने-अपने स्थान पर रोक देना। यही स्तम्भवृत्ति प्राणायाम है। इन प्रक्रियाओं से मन शान्त-निर्मल-आवेगहीन हो जाता है और भगवत प्राप्ति में सहायक हो जाता है। 
इस प्रकार के यज्ञ करते रहने से सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते है और अविनाशी परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है। सम्पूर्ण यज्ञ केवल कर्मों से सम्बन्ध-विच्छेद करने के लिए ही हैं। यह जानने-समझने वाला ही यज्ञवित् अर्थात यज्ञ के तत्व को जानने वाला-तत्वज्ञ है। कुछ लोग लोक-परलोक-स्वर्गादि के भोग प्राप्त करने के लिए यज्ञ करते हैं। वे तत्वज्ञानी नहीं हैं। विनाशी वस्तुओं की कामना बन्धनकारी है-जिसे मुक्ति-भक्ति-मोक्ष की प्राप्ति कदापि नहीं होती। 
निष्काम भाव से किया गया छोटे से छोटा कर्म भी परमात्मा की प्राप्ति करने वाला हो जाता है। 
Yogis-ascetics mixes the fresh air-Pran-breath with the Apan (-rejected breath, impure air-stale air present in the lungs moving to the heart there after) offer Pran in Apan. This is Poorak-intake-inhaling. This is combustion-burning of the sins i.e., germs-virus-bacteria present in the body, called hawan here. When the Apan-waste-rejected air is mixed with Pran-fresh breath-air, it is Rechak-exhaling. The third process involves stagnating both Pran and Apan Vayu-Holding, thereby stopping the flow of both fresh and stale air in the lungs-heart and the entire body. This process of exchange of gases is vital for good health leading to relief from diseases-tensions-defects. In fact pap-sins appear in the form of diseases.
Pran acquires the upper segment of the body the heart, while the Apan is seated below at the anus. When the air is rejected into the atmosphere the breath is directed upwards and during the intake it is directed in the downward direction.
The Yogi-practitioner first sucks the air into the lungs through the left nostril-Chandr Nadi, by blocking the right one, with the thumb for 4 seconds. At this stage the puff of the air mixes up in the lungs through the bronchus-extremely fine air sacks. This is inhaling-intake.
Thereafter the Yogi will hold the air in this state for 16 seconds.  Flow of air into the lungs will stop during this cycle. This is followed by exhaling through the right nostril-Sury Nadi for 8 seconds. One may silently keep on reciting the names of the Almighty for 4-16-8 times respectively.
This process is reversed with exchange of gases from the right nostril to the left nostril i.e., from Sury Nadi to Chandr Nadi. 
Only those who intake balanced diet are capable of mixing the Pran Vayu with the Apan Vayu. Those who very little or no food, do find it difficult to preform this practice. Assimilation of Pran with Apan is Yagy-Hawan-burning of sins-diseases. This leads to clarity of mind & thought. One becomes peaceful-quite-un agitated-restful-blissful, leading to assimilation in the Ultimate-the Almighty. 
Continuity of this practice  is a form of Yagy leading to freedom from sins-evil ideas-thoughts-wretchedness-vices, helping in Liberation of the soul. One who understands that the motive-cause of holy practices-rituals is detachment from the deeds, is the real performer-Yogi-ascetic. Those who undertake big celebrations-rituals-Yagy-Agnihotr-Hawan for attaining the heaven-empire-high posts-name-fame etc. are not the ones, who understand the gist of the religion-Dharm. The detached-un bonded-free from ties, avails Liberation-Devotion and Salvation. Smallest deed for the welfare of others, without any motive-desire, too helps one, in attaining the Parmatma-Parmanand.
12 FORMS OF YAGY 12 प्रकार के यज्ञ - निस्वार्थ भाव से दूसरों के हित-भले के लिए किये गए कर्तव्य-कर्म करने का नाम ही यज्ञ है। यज्ञ से सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं। मनुष्य बंधन मुक्त हो जाता है। कुल बारह प्रकार के यज्ञ कर्म हैं। 
(1). ब्रह्म यज्ञ-प्रत्येक कर्म में कर्ता, करण, क्रिया, पदार्थ आदि सब को ब्रह्म रूप से अनुभव करना। 
(2). भगवदर्पण रूप यज्ञ-सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थों को केवल भगवान् का और भगवान् के लिए ही मानना।
(3). अभिन्नता रूप यज्ञ-असत् से सर्वथा विमुख होकर परमात्मा में विलीन हो जाना। परमात्मा से अलग अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। 
(4). संयम रूप यज्ञ-एकान्तकाल में अपनी इन्द्रियों को विषयों से मुक्त रखना-प्रवृत न होने देना। 
(5). विषय हवन रूप यज्ञ-व्यवहार काल में इन्द्रियों से संयोग होने पर भी उनमें राग द्वेष पैदा न होने देना। 
(6). समाधिरूप यज्ञ-मन बुद्धि सहित सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणों की क्रियाओं को रोककर ज्ञान से प्रकाशित समाधि में स्थित हो जाना। 
(7). द्रव्य यज्ञ-सम्पूर्ण पदार्थों को निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा में लगा देना। 
(8). तपो यज्ञ-अपने कर्तव्य के पालन में आने वाली कठिनाइयों को प्रसन्नता पूर्वक सह लेना। 
(9). योग यज्ञ-कार्य की सिद्धि-असिद्धि में तथा फल की प्राप्ति-अप्राप्ति में सम रहना। 
(10). स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ-दूसरों के हित के लिए सत्-शास्त्रों का पठन-पाठन, नाम-जप आदि करना। 
(11). प्राणायम रूप यज्ञ-पूरक, कुम्भक और रेचक पूर्वक प्रणायाम करना। 
(12). स्तम्भ वृत्ति प्राणायाम रूप यज्ञ-नियमित आहार करते हुए प्राण और अपान को अपने-अपने स्थानों पर रोक देना। 
मनुष्य की समस्त क्रियाएँ यज्ञ रूप ही होनी चाहिए; अर्थात स्वयं के लिए कुछ भी नहीं करना। जब मनुष्य केवल दूसरों के हित के लिए सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म  करता है तो परिणति कर्तव्य कर्म रूप यज्ञ  में स्वतः हो जाती है। 
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥4-31॥ 
हे कुरु वाशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगी सनातन पर ब्रह्म परमेश्वर को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वाले मनुष्य के लिए तो यह पृथ्वी भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है?
यज्ञ करना-निष्काम भाव से दूसरों की सेवा करना मनुष्य को समता प्रदान करता है जो कि यज्ञशिष्ट अमृत के समान सुख देने वाला है। अमृत ग्रहण करना अर्थात अमरता (-immortality) या परब्रह्म में लीन होना जिससे बड़ा सुख कोई नहीं है। अपने स्वरूप आत्मा से मनुष्य अमर है ही परन्तु मरणशील वस्तुओं के संग के कारण उसे मृत्यु का अनुभव होता है। उन वस्तुओं को संसार के हित  में लगाने-उपयोग करने से उनसे असंग हो जाता है।कर्म को कर्तव्य की भावना से करने पर वही कर्म यज्ञ में परिवर्तित हो जाता है। यज्ञ का अर्थ है देना, लेना नहीं; अर्थात बन्धनों :-मान-अपमान, लोभ-मोह, लाभ-हानि, जीवन-मरण से मुक्ति। 
O best among Kurus! Those who enjoy-utilize, the left over-remnant of the Yagy's-sacrifice's Elixir attain the Eternal Brahmn-Ultimate-the Almighty. For those who do not perform-conduct Yagy, even this world is not pleasant, what to talk of the next abode.
Performing a Yagy, serving others, without motive-return-expectations, gives equanimity to the doer, which is equitable to the pleasure-satisfaction-enjoyment received by drinking elixir-nectar-Amrat-ambrosia-the food of the Gods, demigods & the deities. One who taste Amrat attains freedom from reincarnation-life & death and attains immortality, which is ultimate pleasure-bliss. One is immortal by his own stature-soul, which is a component of the Almighty. His association with the perishable, makes him undergo-experience death. The moment he utilize these goods for the sake-welfare of others, he is detached-freed from bonds-ties-clutches of life & death-reincarnations. He becomes neutral to fame, losses, gains, insult, pleasure-pain, sorrow, desires, motives.
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥4-32॥ 
इस प्रकार और भी अनेक प्रकार के यज्ञ, वेद की वाणीं में विस्तार से कहे गए हैं। उन सब यज्ञों को तुम (मन, इन्द्रिय और शरीर की) क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जान कर अनुष्ठान द्वारा यज्ञ करने से कर्म-बंधन से मुक्त हो जाओगे। 
वेदों में अनेक प्रकार के यज्ञों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है जो कि मनुष्यों द्वारा अपनी प्रकृति-निष्ठां-प्रवृत्ति के अनुसार किये जाते हैं और उनकी क्रियाएँ और साधन भी अलग-अलग होते हैं। सकाम यज्ञ-अनुष्ठान मनुष्य को बंधनों में बाँधने वाले होते हैं। यहाँ तो केवल निष्काम कर्म-यज्ञ परमात्म प्राप्ति हेतु श्रवण, मनन, निदिध्यासन, प्राणायाम, समाधि आदि अनुष्ठानों का वर्णन है। यज्ञ वेद से उत्पन्न हुए हैं। सर्वव्यापी परमात्मा-परमेश्वर यज्ञों में प्रतिष्ठित हैं। सभी यज्ञ कर्म के द्वारा सम्पन्न होते हैं, अर्थात वाणी, शरीर, मन के संकल्प द्वारा। अपना कल्याण चाहने वाला मनुष्य युद्ध रूपी कर्म से उसे पाप जन्य मानकर जब त्याग करता है तो वह भी एक कर्म ही है। कल्याण कर्म से नहीं, अपितु कर्म और उसके फल की आसक्ति से सम्बन्ध-विच्छेद करने से होता है। युद्ध तो स्वधर्म है (मनुष्य को समाज में हर वक्त हर घड़ी कुछ न कुछ संधर्ष करना ही पड़ता है-जिससे मुँह मोड़ना उचित नहीं है)। कर्म फल में स्पृहा-लगाव अनुचित है। कर्म करते हुए भी उनसे निर्लिप्त रहना चाहिए। फल की इच्छा का त्याग करके केवल लोकार्थ कर्म करके मनुष्य बन्धन मुक्त हो जाता है।  
There are many more forms of Yagy-sacrifices, described in the Veds. One should acquaint him self with them and attain Salvation-Liberation-Assimilation in the Ultimate-the Almighty.
Veds have described many types-forms of Yagy-Sacrifices in detail. One perform these practices according to his interest-taste-way of living-nature-manner-occasions. The methods and procedures are also different. The Yagy which are performed with desire-motive leads to formation of ties with the living world, which continues thereafter in many-many incarnations, deluding the soul of Salvation. All Yagy are performed through means-deeds and involve the body-action, mind, speech and determination-decision. Rejection of war-struggle, by considering it to be a sin, too is a deed. Welfare is done by rejecting the award-fruit-result-outcome of the deeds. One should not be attached to the gains of the deeds. If one has to survive, he has to struggle all the time from which he can not escape. He should do-perform for the welfare of the society-others, without the desire-motive to get some credit-honors for it. Keep on performing virtuous-righteous-pious deeds without the desire of some personal gain with neutrality-impartiality-honestly and the ties-bonds are cut automatically, leading to relinquishment.
श्रेयान्द्रव्यमयाद्य-ज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥4-33॥
हे परंतप (-Tormentor)अर्जुन! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है (क्योंकि) सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान (-तत्वज्ञान) में समाप्त-लीन  हो जाते हैं। 
ज्ञानार्जन में द्रव्य-धन-वस्तु और कर्म की आवश्यकता हो भी सकती है और नहीं भी। यध्यपि सभी यज्ञ द्रव्यमय हैं तथापि ज्ञान यज्ञ बगैर द्रव्य के भी हो जाता है यदि श्रवणकर्ता-मुमक्षु-जिज्ञासु-साधक बुद्धि, विवेक, विचार, ध्यान समाधि भक्ति का आश्रय लेता है। वो कर्म करता तो है मगर अन्य व्यक्तियों की सेवा-श्रुयूआ हेतु और उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है। अन्तःकरण के तीन दोष हैं: मल-मन के संचित पाप, विक्षेप-चित्त की चंचलता  और आवरण-अज्ञान। संसार की सेवा  मल और विक्षेप जनित दोष नष्ट हो जाते हैं। ज्ञान प्राप्ति आवरण जनित दोषों को मिटाने हेतु गुरु की सेवा में प्रस्तुत होता है। इस अवस्था में वह कर्म और पदार्थ से ऊँचा उठ जाता है। एक चिन्मय तत्व ही उसका लक्ष्य होता है। यही सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थों का तत्वज्ञान में विलीन होना है। 
O Arjun-the Tormentor (One who inflict physical pain or mental anguish, harassment, annoyance, torture), of the foes! Yagy-scrifices performed with the enlightenment-learning-understanding-skills, are superior to those made with the money-valuables-physical objects, since the Karm-deeds and the valuables dissolve in eternal Knowledge.
One may or may not require money and action in order to acquire knowledge. Though all Yagy involve money, yet acquisition of knowledge may not essentially need money-material goods. The learner-inquisitive-devotee-practitioner can perform Gyan Yagy by utilizing intelligence-memory-prudence-thinking-analysis-meditation-Samadhi (-concentrating all energy and the thoughts in the Almighty and penetrating-peeping into the unknown, secret, undiscovered, masked)-Bhakti (-devotion, shelter-asylum-protection under the God), without money-material goods. All his maneuvers-efforts should be diverted to the service of the mankind-others. When he channelize his energies-efforts for serving others, his inner self is purified-cleansed. The inner self is contaminated by vices, evil, sins, bad thought-ideas etc., imprudence fickleness, instability, flirtatious tendency and the cover of darkness, lack of knowledge. Adoption to the services of mankind-downtrodden-weak-poor-needy removes all these defects, when he bows to the Guru and seek direction-the path of enlightenment. The blessing, guidance of the Guru elevate him from the physical-material world and the deeds. He is left with only one motive-choice-the gist of knowledge. This is the state which helps him in the elimination of deeds and the money.
ज्ञान प्राप्ति : ज्ञान प्राप्ति के 8 अन्तरङ्ग साधन हैं। 
(1). विवेक : सत्-असत्, उचित-अनुचित, हानि-लाभ, हित-अहित को सोच-समझकर निर्णय लेना। 
(2). वैराग्य : सत्-असत् को अलग-अलग जानकर उसका त्याग करके संसार से विमुख होना। 
(3). शमादि षट्सम्पत्ति : (3-i) मन को इन्द्रियों से हटाना शम है। (3-ii) इन्द्रियों को विषयों से हटाना दम है। (3-iii) ईश्वर, शास्त्र पर पूज्य भाव से पूर्वक प्रत्यक्ष से भी अधिक विश्वास करना श्रद्धा है। (3-iv) वृतियों को संसार से हटाना उपरति है। (3-v) सर्दी-गर्मी आदि द्वंदों को सहना उनकी उपेक्षा करना तितिक्षा है।(3-vi) अन्तःकरण में शंकाओं को न रखना समाधान है।  
(4) मुमुक्षता : संसार से छूटने की इच्छा मुमुक्षता है। मुमुक्षता जाग्रत होने के बाद साधक पदार्थों और कर्मों का स्वरूप से त्यागकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाकर उसके निवास पर शास्त्रों को सुनकर तात्पर्य का निर्णय करना और उसे धारण करना श्रवण है। 
(5). श्रवण : श्रवण से संशय दूर होता है। 
(6). मनन : इससे प्रमेयगत संशय दूर होता है। 
(7). निदिध्यासन : संसार की सत्ता को मानना और परमात्मा-तत्व को न मानना विपरीत भावना कहलाती है। विपरीत भावना को हटाना निदिध्यासन है। 
(8). तत्व पदार्थ संशोधन : प्राकृत पदार्थ-मात्र से सम्बन्ध-विच्छेद होना, केवल  चिन्मय-तत्व का शेष रहना, तत्व पदार्थ संशोधन है और यही तत्व साक्षात्कार है। 
इन सब साधनों का तातपर्य है असाधन अर्थात असत् से सम्बन्ध का त्याग। त्याज्य वस्तु अपने लिए नहीं होती परन्तु त्याग का परिणाम अपने लिए होता है। 
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥4-34॥ 
उस ज्ञान को तुम तत्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषों  के पास जाकर समझो। उनको साष्टांग दण्डवत प्रणाम करने से, उनकी सेवा करने से और सरलता पूर्वक प्रश्न करने से वे तत्वदर्शी-अनुभवी-शास्त्रज्ञ तुम्हें उस तत्वज्ञान का उपदेश करेंगे। 
भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा कि यदि उन्हें शंका हो तो वे अपनी जिज्ञासा का समाधान किसी भी तत्वज्ञानी-ब्रह्मनिष्ठ-श्रोत्रिय से भी कर सकते हैं। गुरु की शरण में जाकर मनुष्य को अति विनीत भाव से सेवा द्वारा उनका अनुग्रह प्राप्त करना है, उन्हें प्रसन्न करना है। गुरु ऐसा हो जिसे परमात्म तत्व का अनुभव, वेदों-शास्त्र का पर्याप्त ज्ञान भी हो। संत-महापुरुषों से ज्ञान प्राप्ति हेतु उनकी प्रणाली-सिद्धांतों को दृढ़ता पूर्वक पालन करते हुए ही हो सकता है। गुरु से प्रश्न जिज्ञासु भाव से सरलता पूर्वक-विनम्रता के साथ किया जाना चाहिए, अपनी विद्व्ता दिखाने अथवा उनकी परीक्षा के लिए नहीं। 
अन्तःकरण की शुद्धि के अनुसार ज्ञान के अधिकारी उत्तम, मध्यम अथवा कनिष्ठ हो सकते हैं।  उत्तम केवल श्रवण मात्र से, मध्यम श्रवण, मनन और निदिध्यासन करने से और कनिष्ठ को शंका निवारण करने से होता है। शंका निवारण हेतु युक्ति, वेद, शास्त्र, तर्क आदि का सहारा लेना पड़ता है। इसके लिए को तत्वदर्शी के साथ-साथ ज्ञानी होना भी अनिवार्य है। गुरु को दंडवत प्रणाम, सेवा-आदर-सत्कार, की भूख या अपेक्षा नहीं होती। ये तो साधक-शिष्य में स्वाभाविक तौर से होने ही चाहिए। विनम्रता-विनयशीलता ज्ञान ग्रहण करने की चाहत-लालसा-भूख शिष्य में होनी ही चाहिए। ज्ञान उसके मन-मस्तिष्क को आन्दोलित करता है-झिझोड़ता है। परिपक्व बनाता है। संसार से सम्बन्ध विच्छेद करता है। इससे शिष्य को स्वतःसिद्ध स्वरूप का ज्ञान हो जाता है। 
महापुरुष ज्ञान का उपदेश तो देेंगे पर साधक-शिष्य को बोध हो ही जाये ऐसा जरूरी नहीं है। ज्ञान तो श्रद्धा-निष्ठां-आस्था-विश्वास से ही आयेगा। प्रणाम, सेवा, प्रश्न आदि तो कपट आडंबर छल-दिखावा भी हो सकते हैं। 
One may go to the enlightened-scholar-philosopher-realized, to understand the gist of Gyan-deep knowledge. He should prostrate before him, serve him, ask him questions with simple-open heart to seek answers to the Ultimate Truth.
Bhawan Shri Krashn advised Arjun to clear his doubts-curiosities by attending to some scholar-philosopher-enlightened-Guru. He had to polite and bow-prostrate before the Guru to seek his blessings. The disciple-student has to please him, through his service-etiquette-behaviour-discipline-endeavors. He should prove that he is capable and is eager to learn. The Guru must have attained the gist of the Ultimate and should have thorough-deep knowledge & understanding of the Ved, scriptures and logic. The truth seeker has to abide by the rules-regulations-directives of the Guru. He has to be honest-simple-clear-polite-open hearted, while seeking answers to his queries. His intentions should not be to show his ability-intelligence-knowledge. His questions should not be there-intended, to test the ability of the teacher or to displease him.
Ability to accept-grasp-attain, depends upon the purity of the inner self of the receptor. The truth seeker may be best, average or below normal, depending upon his capabilities. One who is excellent is able to grasp just by listening to the text. The average learner has to listen-think-analyse and practice the contents, while the  third category which constitutes of the lower level disciples, have to be directed-guided-instructed with the help of examples from the Veds, scriptures, epics, logic, examples-quotations-elaboration etc., including instances from the daily life. It needs-require the teacher to be the bearer of the gist of the knowledge of the Ultimate, but also well versed-equipped with the scriptures-logic life process and enlightened.  The teacher does not need any respect-honor-felicitation from the disciple-inquisitive. Politeness, devotion, respect should be the in born qualities of the seeker of the knowledge. He should have in born tendencies-desire to seek the true-Ultimate knowledge. The enlightenment will agitate his body, mind and soul to maturity. It will break his bonds-ties-connections with the perishable world. This will lead him to self realization-understanding of the self and the Ultimate.
The scholars-Guru-philosopher-enlightened will preach, but its not essential to awake the disciple. Knowledge of the truth-Ultimate-enlightenment will come through faith-dedication-belief-devotion-practice. Wishing, bowing, prostrating, service, politeness questioning may be deceptive, aimed to extract just by be fooling.
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥4-35॥ 
हे पाण्डव।अर्जुन! जिस तत्वज्ञान-परमात्व का अनुभव कर-जानकर फिर तुम इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे। जिस तत्व ज्ञान द्वारा तुम सम्पूर्ण प्राणियों-भूतों को निःशेष भाव से पहले अपने में और फिर मुझ सच्चिदानंद घन परमात्मा में देखोगे। 
महापुरुष-ज्ञानी व्यक्ति को तत्वज्ञान-परमात्व  का उपदेश देते हैं, जिसे सुनने मात्र से वास्तविक बोध अर्थात स्वरूप का यथार्थ अनुभव नहीं होता क्योंकि वास्तविक बोध करण (-confirmation-implement-making) निरपेक्ष (Neutral-Impartial-Not having regard-Unconcerned) है। वह मन-वाणी आदि से परे है। वास्तिविकता को बोध तो स्वयं के द्वारा स्वयं को ही होता है। यह उस स्थिति में होता है जब कि मनुष्य अपने विवेक द्वारा जड़-चेतन के भेद को महत्व देता है। विवेक ही वास्तविकता का बोध करता है और जड़ता से सम्बन्ध कराता है। इससे अविवेक दूर होता है और मोह नहीं होता। 
तत्वज्ञान के प्रकाश में मनुष्य ऐसा अनुभव करता है कि उसकी सत्ता सर्वत्र परिपूर्ण है और सत्ता के अन्तर्गत अनन्त ब्रह्माण्ड है। वह सम्पूर्ण प्राणियों को अपने में ही देखता है। परमात्म तत्व के साथ स्वयं की एकरूपता का अनुभव करता है। एक ब्रह्म ही शेष रहता है और द्रष्टा, दृश्य और दर्शन नहीं रहते। वह सबको परमात्मा में पाता है। 
सत्ता केवल परमात्म तत्व की है जिसमें न तो संसार है और न शरीर। प्रकृति से सम्बन्ध होने के कारण संसार और शरीर दोनों ही सीमित हैं। परन्तु परमात्म तत्व सीमित नहीं है। अतः संसार, शरीरों को न देखकर एक परमात्म तत्व को देखना ही यथार्थ दृष्टि है।  
O Pandav Arjun! One will not be deluded by experiencing the gist of that Ultimate knowledge-enlightenment. He can first see-perceive all beings in him Self and then in the Almighty.
The learned-enlightened preach-explain-elaborate the gist of the Ultimate, which do not lead to the understanding-realization of the the real self just by listening. The realization of the Ultimate-absolute is beyond the scope-away from the limits of the senses. It is far off the inner self-mind & heart and the speech. The comprehension-perception of reality-Ultimate is attained by one-the seeker, him self. It comes, when one discriminate-distinguish the inertial-static and the awake-absolute; through his prudence-intelligence-reasoning. Prudence helps one perceiving the reality-knowledge of the absolute-the Almighty. It helps in breaking the bonds with the static (-vegetative state, apathy, inertness, idiocy, stupidity, senselessness).It removes the imprudence but illusion-attachment-delusion-ignorance remains.
Enlightenment makes one experience his influence every where, including infinite universes. He has become one with them. He perceives-finds him self, in all the living beings-mortals. He identifies him self with the Almighty-Par Brahm Parmeshwar. He unifies him self with the gist of the Ultimate. Only the Brahm remains and the viewer, visible and physical presence-view are lost. He finds-observes every thing-every one in the Ultimate-The Almighty.
Sovereignty of the God remains, which do not include the world or the perishable body. Due to its relation with the nature, both the universe and the body are restricted. The influence of the Ultimate is not restricted. So, the visualization of the Ultimate, his impact-influence is clear-pure-objective viewership.
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥4-36॥
यदि तुम अन्य सभी पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी इस ज्ञान रूपी नाव द्वारा निःसंदेह पाप-समुद्र को पार कर लोगे। 
तत्वज्ञान वह साधन जिसके सहारे अत्यधिक पाप करने वाला भी पापमुक्त हो जाता है। तत्वज्ञान को जानने वाला इस जन्म में अन्य पाप नहीं करता अपितु पूवसंचित पापों से भी मुक्त होने का प्रयास करने लगता है। जहाँ प्रकाश है वहाँ अन्धकार खत्म। 
Even if one is most sinful among all the sinners, he shall cross the ocean of sins with the enlightenment-the gist of the Ultimate.
Knowledge of the Ultimate keeps one off the sins in the present birth and he start with the maneuvers, which help him in cutting the sins of the past. As the light eliminates darkness, the enlightenment eliminates imprudence. It generates devotion under the shelter of the Almighty.
यथैधांसि समिद्धोऽग्नि-र्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥4-37॥ 
हे अर्जुन! जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि ईंधनों-ज्वलनशील पदार्थों-लकड़ियों को जला देती है, उसी प्रकार ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों सर्वथा-पूर्णतः को जला देती है। 
ज्ञानरूपी नौका द्वारा मनुष्य पाप रूपी समुद्र-भवसागर को पार कर लेता है। मनुष्य तो तर गया मगर पाप रूपी समुन्द्र शेष रह गया अतः पुनः स्पष्ट किया गया कि ज्ञानरूपी अग्नि किसी भी ज्वलनशील पदार्थ (कर्म-कर्मफल) को शेष नहीं छोड़ती। किसी भी प्रकार का कर्म:संचित, प्रारब्ध, अथवा वर्तमान-क्रियमाण नष्ट हो जाता है और साधक का मुक्ति-मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। क्रियाएँ शरीर से होती हैं जो कि प्रकृति के आधीन है और मनुष्य उन्हें अज्ञानवश अपना-शरीरी का मान लेता है। तत्वज्ञान होने पर कर्तव्याभिमान नहीं रहता। समस्त कर्म अपने फल सहित अकर्म हो जाते हैं। प्रारब्ध कर्म घटना-अंश, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति शरीर के रहने तक रहती है परन्तु ज्ञानी पर उनका कोई प्रभाव-असर नहीं पड़ता। वह उनसे सुखी-दुखी नहीं होता। 
Hey Arjun! As fire burns combustible substances-wood etc., similarly the fire of wisdom-enlightenment burns all the actions including their impact.
It had been stated that the one boarding the boat of enlightenment, crosses over the ocean of sins, but the ocean of  sins still remains. It is further clarified that the fire called enlightenment engulf every combustible substance and no more sins or their residual-impact remains. Fire is capable of burning the ocean as well, since water too breaks up to burn. Three types of deeds: accumulated, present and the destiny, all get lost in addition to their impact. The deeds are performed by the body, which is a component of the nature, but the soul residing in the body is a component of the Almighty. One considers the deeds-nature to be belonging to him by mistake-ignorance-illusion. With the enlightenment this paradox of ego-pride that one is the doer, goes away and he is left without the impact of either the deeds or their impact-result-outcome. Till the body remains, he keep on experiencing the impact of destiny neutrally-impartially-unconcerned-un perturbed. He does not bother him self due to them and considered the pleasure-pain alike.
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥4-38॥ 
इस संसार (मनुष्य लोक) में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह दूसरा कुछ भी साधन नहीं है। उस ज्ञान को (कर्म) योग द्वारा सिद्ध (शुद्धान्तःकरण) हुआ मनुष्य, कुछ समय पश्चात् अपने आप में ही पा लेता है। 
यह मनुष्य लोक ही है जहाँ कर्म करने और अन्य लोकों को प्राप्त करने का अधिकार है। इस संसार की स्वतंत्र सत्ता मानने और उससे सुख प्राप्त करने की इच्छा ही समस्त दोष, पाप उत्पन्न करती है। तत्वज्ञान होने संसार की स्वतंत्र सत्ता ही नहीं रहती जिससे पापों का सर्वथा नाश और महान पवित्रता आ जाती है। 
पापों का नाश करने में समस्त तीर्थ, जप, तप, दान, व्रत, उपवास, ध्यान, प्राणायाम आदि से भी ज्यादा सक्षम तत्वज्ञान है। सभी साधन और तत्वज्ञान साध्य है।जिसका कर्मयोग (-कर्म और फल में आसक्ति से ही योग का अनुभव नहीं होता। कर्मयोग :-अपना कुछ भी न मानकर समस्त क्रियाएँ संसार के लिए करना) सिद्ध हो गया; वह योगरूढ़ है जो कि कर्मयोग की अंतिम  है जो कि तत्वज्ञान प्रदान करती है जिससे संसार से सम्बन्ध सर्वथा विच्छेद हो जाता है। कर्मयोग ही वो साधन है जिससे तत्वज्ञान और परमात्म तत्व (-जिससे समस्त वस्तुओं का ज्ञान होता है वही परमात्मतत्व है) प्राप्त हो जाता है।  कर्मयोगी को किसी गुरु, ग्रन्थ, किसी अन्य स्थान अथवा साधन की आवश्यकता नहीं है।  कर्तव्य-कर्मों का निर्वाह करते हुए, उसे स्वतः ही तत्वज्ञान की प्राप्ति हो जाएगी।
परमात्मा सभी जगह विराजमान होने से स्वयं में भी है। संसार से तादात्म्य, ममता, मोह, कामना और जड़ :-मन-बुद्धि आदि से सम्बन्ध मिट जाने से स्वतः ही सुख का अनुभव होने लगता है जो परम् सिद्धि-मोक्ष दायक है।
There is no other means, in this world as holy-pious-purifying as this enlightenment-learning-Knowledge. This Knowledge is attained by one, who purify-cleanse his mind by Yog and finds it in himself automatically after some time.
One who has achieved Karmyog is riding over the saddle of Karmyog; which is the last stage of achieving-granting Ttvgyan. Attachment-desire of Karm and its yield is the root cause, which prevents experiencing Yog. Working for the welfare of the society-others without attachment-motive-desire of yield, is Karm Yog. Karm Yog is that means which helps in attaining Ttvgyan-Parmatmttv. A Karm Yogi do not need any book-scripture-epics, Guru-guide, specific location-shelter under the God or other means-help. One achieves Ttvgyan automatically, when he resort to his duties-performances. Ttvgyan-enlightenment-gist of the Ultimate is more capable in the elimination-termination of sins, as compared to rituals-asceticism, fasting, donations-charity, pilgrimage-bathing in holy rivers, Pranayam, meditation. All these are means and Ttvgyan is the Ultimate goal.
The Almighty is Omani present and so he is present within the devotee-practitioner. When one is detached, cuts off bonds-connections of affections, attachments, desires and the static-inertial body, he starts experiencing happiness-bliss leading to the assimilation in the Almighty.
श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम-चिरेणाधिगच्छति॥4-39॥ 
जो जितेन्द्रिय (-इन्द्रिय संयम करने वाला) तथा साधन परायण, निरंतर प्रयत्न करने वाला श्रद्धावान् ज्ञान को प्राप्त होता है और तत्काल परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है। 
मनुष्य स्वयं को भ्रान्ति-गलतफहमी के कारण  जितेन्द्रिय समझ लेता है। अगर इन्द्रियां पूर्णतः वश में हैं और वह साधन में तत्परता से लगा है, तो अंततोगत्वा जितेन्द्रिय (-stoic, continent) हो भी सकता है। 
परमात्मा, शास्त्र, महापुरुषों-ज्ञानियों, धर्म में श्रद्धा-भक्ति-विश्वास निष्ठा-प्रेम है तो है तो वह श्रद्धालु भी है। परमात्मतत्व का अनुभव-ज्ञान भले ही न हो परन्तु उसमें विश्वास अवश्य हो। परमात्मा मनुष्य से कभी दूर नहीं है यदि वो ऐसा समझता है। उसे स्वयं में मान लेना श्रद्धा है। और यही श्रद्धा परमात्मतत्व का ज्ञान प्रदान करती है। इन्द्रियां संयत नहीं हैं साधन में तत्परता नहीं है तो भी यह श्रद्धा में कमी की ओर इंगित-इशारा करता है। गुरु में श्रद्धा ज्ञान प्राप्ति हेतु अत्यावश्यक है। गुरु ज्ञानप्राप्ति में सहायक साधन भी है। अन्तःकरण और इन्द्रियाँ इस संसार को अपना मानने का भ्रम पैदा करती हैं। श्रद्धा-विश्वास-विवेक मनुष्य को भ्रम मुक्त करते हैं। 
One who has attained perfect control over his senses and makes efforts-endeavors continuously, ultimately attains enlightenment and attains the Ultimate-Supreme peace. 
One misconceives that he has attained full control over his senses. It depends upon his efforts-endeavors that he ultimately becomes a stoic-continent.
One may not be having the knowledge of the Ultimate but he should possess the faith in him. He is a devotee-faithful if he has faith in the Almighty, scriptures-Veds, Epics, the enlightened-philosophers-Guru. The Almighty is never away from the devotee if he has faith-belief. Faith is to believe that the Almighty resides within us. This faith grants awareness of the gist of the God. Senses are not under control & the means are not utilised whole heartedly, which shows lack of faith. Faith in the Guru too is essential to achieve the goal-destination the Ultimate. The inner self-mind and the senses mistakes by considering this perishable world to be own. This illusion attaches him with the world but the faith in the Guru and the prudence breaks this mirage. 
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥4-40॥
विवेकहीन, श्रद्धारहित और  संशययुक्त (परमार्थ से भ्रष्ट) मनुष्य  का पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मक मनुष्य के लिए न तो यह लोक हितकारक है और न परलोक हितकारक है और उसे न ही कोई सुख है। 
विवेकहीन, अश्रद्धालु, संशयात्मक बुद्धि-अनिश्चयता से ग्रस्त व्यक्ति, पारमार्थिक मार्ग से भटक जाता है और उसका पतन निश्चित है। वह शिक्षा रहित-विहीन दूसरे व्यक्ति की बात को महत्व नहीं देता। उसकी शंकाओं का समाधान नहीं होता और इस वजह से उसकी उन्नति भी नहीं होती। शंकाएं अधूरे-अधकचरे ज्ञान-अज्ञान की द्योतक हैं। जिज्ञासा संशय का समाधान करने में सहायक है। जिज्ञासु सत्य-परमात्मतत्व की खोज करता है और विद्वानों-संतजन-महात्माओं की संगत से भगवत्कृपा प्राप्त कर लेता है। बुद्धि, विवेक, स्वाध्याय श्रद्धा उत्पन्न करते हैं और संशय का निवारण  हैं। 
One who is imprudent-indiscriminate, is devoid of reverence-faith and the confused one with lot of doubts, delink him self from the service of the mankind and he gets diverged from the eternal path. He is devoid of pleasure in this birth and the next births after death. He deludes peace every where.
The imprudent-indiscriminate having doubts in his mind does not give credence-importance to helping others-social service-welfare. His down fall is certain. He lacks education-knowledge and he does not listen to the advice of the learned-scholars. Doubts shows incomplete knowledge, misunderstanding in hm, Curiosity-search-discovery of truth, gist of the Ultimate attends discourses, reads the scriptures, exchange of thoughts-ideas with the knowledgeable, enlightened. The company of the scholars, philosophers, Pundits shows him the way and he obtains, attains the mercy-blessings of the Almighty. Intelligence, prudence, self study develops faith-reverence and disposes confusion-doubts.
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।छित्त्वैनं संशयं योगमा-तिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥4-42॥ 
इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! हृदय में स्थित, अपने इस अज्ञान जनित संशय का, ज्ञान रूपी तलवार द्वारा छेदन करके कर्म योग (समता) में स्थित हो कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ। 
जिस व्यक्ति ने समता द्वारा समस्त कर्मों से सम्बन्ध विच्छेद कर लिया है और ज्ञान द्वारा समस्त संशयों को नष्ट कर दिया है उस आत्मपरायण (self seeking) कर्मयोगी को कर्म नहीं बाँधते। वह जन्म-मरण से मुक्त हो जाता है। सब संशय अज्ञान, कर्मों और योग के तत्व को न समझ पाने से ही उत्पन्न होते हैं। क्रियाओं और पदार्थों को अपने लिए मानना  ही अज्ञान है। अज्ञान तभी तक रहता है जब तक कि अन्तःकरण में संशय मौजूद हैं। क्रियाएँ और पदार्थ विनाशी हैं जबकि स्वरूप अविनाशी है। जब तक मनुष्य कर्मों से निर्लिप्त रहेगा, राग-द्वेष नहीं पालेगा वह मुक्ति की ओर बढ़ेगा, क्योंकि उसने समता को प्राप्त कर लिया है। अपने स्वरूप में समता स्वयं सिद्ध है। कर्म और फल अनेक भले ही हों, स्वरूप एक ही है। 
O Bharat! One should eliminate-destroy the confusion-doubt, which has been residing in his heart due to ignorance with the sword of enlightenment-Knowledge. He should be established in Karm Yog-equanimity and be ready for the war (-day today interactions in today's world-situations).
The Karm Yogi, who is self seeking (-established in the eternal existence of God, absolutely unconcerned about the supply of wants and the preservation of what has been already attained and self-controlled), has detached-isolated him self from the impact of deeds-actions-maneuvers through equanimity and clarified all doubts-confusions,  is not bound by the outcome-result of the deeds. He is freed from the clutches of birth-death-further incarnations. All doubts-confusions are generated due to lack of understanding of the gist of Yog-equanimity and ignorance. The wrong perception of considering the actions and material-objects for him self, is ignorance-misconception-mis understanding. Ignorance remains till the confusion rests in the mind. All actions and goods are perishable, while the inner self-soul is for ever-imperishable. One will march towards Liberation, till he is not bound by the attachments-enmity, since he has attained equanimity. Equanimity comes automatically, once the devotee establishes in him self. Karm-deeds and their rewards-fruits-outcome may be many, but the inner self is one and unique.
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे 
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्यायः॥4॥ 
ॐ तत् सत् ! इस प्रकार ब्रह्मविद्या का योग करवाने वाले शास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता रूपी उपनिषत् में श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद रूपी ज्ञान कर्मसंन्यास योग नाम वाला चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण हुआ। 
Om That is Truth! This completes the fourth chapter of Shri Mad Bhagwad Gita, an Upanishad to unify one with the Almighty. Fourth chapter which depicts the conversation between Bhagwan Shri Krashn and Arjun and is named as Yog pertaining to enlightenment- Knowledge and Renunciation from Action-deed.



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