Friday, March 29, 2013

ULTIMATE KNOWLEDGE ब्रह्म ज्ञान-परमात्म तत्व ALMIGHTY-THE GOD (2) GIST-EXTRACT

 ULTIMATE KNOWLEDGE
 ब्रह्म ज्ञान-परमात्म तत्व
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj

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ॐ गं गणपतये नम:।
अक्षरं परमं ब्रह्म ज्योतीरूपं सनातनम्।
गुणातीतं निराकारं स्वेच्छामयमनन्तजम्॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।
[श्रीमद्भगवद्गीता 2.47]
Please refer to :: SHRIMAD BHAGWAD GEETA (14) श्रीमद्भगवद्गीता :: गुणत्रय विभाग योग santoshkipathshala.blogspot.com
ENLIGHTENMENT ज्ञान :: Intelligence, memory, learning-education, understanding, cleverness, prudence, psychology, analysis, ability, skill, thinking, meditation, application, followed by practice (अभ्यास), Gyan-knowledge, utilisation constitute the mental make up liberation-assimilation in the Ultimate.
Human intelligence makes him survive the onslaught of various ups-downs, rise-falls, worries, bows, sorrows, pains. He makes endeavours to find a way out out of the difficult-intricate situations successfully.
Memory supports the intelligence by interweaving the possible solutions available in the past and the current knowledge-solutions for finding out possible new solutions-way out. Ancient India saw the utilisation of memory to the extreme. All knowledge, arts, sciences were stored in the memory by the students to utilise in future, at an appropriate situation-opportunity.
Understanding of the content-text is essential while rote memory may be useless. Understanding comes through analysis, comparing, contradictions, assumptions, hypotheses and its testing simultaneously. Application of the learning successfully, builds confidence. Repeated application and fault finding, paves way for improvement, skill and ability. One begins synthesising the new situations-ventures. It creates interest leading to appreciation and further advancement. One is blessed with farsightedness. Human element needs cleverness and prudence and use of psychology simultaneously. How ever the direction should be positive, helping others, social service. The devotee attains Gyan-enlightenment leading to Salvation.
Knowledge is for the sake of livelihood-earning, sustaining-supporting the family-household, family members, poor, downtrodden, needy, welfare of the society, seeking job, development of the country as well as coordination amongest the members of society, at all levels :- Village-Country, State, Nation, World. Learning broadens the thinking, opens up the mind, modifies, corrects, refines the behaviour, etiquette, interaction, dealings. Enlightenment connects one with the Ultimate, God, Almighty and leads to Liberation, Salvation, Devotion.
One who is blessed with wisdom-the quality of being wise, prudence, belief in the thoughts of the ancestors, ancient scriptures, epics; is thoughtful, analytic, balanced headed, speaks only when necessary and to the point. He avoids undue arguments-conflicts, confrontations. His sense of logic is developed. He controls his wishes, desires, will-needs.
सब भूतों में एक परमात्मा का ज्ञान सात्विक, भेद ज्ञान राजस और अतात्विक ज्ञान तामस है।
ज्ञान एक ऐसी चीज है, इसे जितना ग्रहण करो उतना ही कम है। ज्ञान कभी से भी मिले उसे ग्रहण करने में पीछे नहीं हटना चाहते है। इसी ज्ञान से बुद्धि, नई दिशा मिलती है। ज्ञान है तो कोई भी चीज कठिन नहीं रह जाती है। अगर कोई बुरा व्यक्ति ज्ञान को अच्छा समझ उसे अपने चरित्र में धारण कर ले, तो उसकी पूरी जिंदगी बदल जाएगी। ज्ञान सिर्फ सुनने तक ही सीमित नहीं है, उसे अपने आचार-विचार, व्यवहार व जीवन में उतारने पर ही अपने लक्ष्य को आसानी से पा सकते हैं। इसलिए यह कभी भी मिले इसे बिना संकोच धारण कर लेना चाहिए।
ज्ञान के प्रकार :: मिथ्या ज्ञान, संशय ज्ञान, शाब्दिक ज्ञान और तत्त्व ज्ञान।
(1). मिथ्या ज्ञान :: असत्य-झूठा ज्ञान अर्थात वस्तु कुछ और है और व्यक्ति उसको जानता-समझता कुछ और है। रस्सी को साँप समझ लेना, असत्य है। हानिकारक कर्म धूम्रपान, नशा आदि को लाभ दायक कर्म मान लेना। सुख दायक उत्तम कर्म यज्ञ सेवा दान आदि को दुख दायक व्यर्थ कर्म मान लेना। यह सब मिथ्या ज्ञान है।
(2). संशय ज्ञान :: जब व्यक्ति के मन में दो तीन चार या अधिक विचार हों, परन्तु वह कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हो, कि इन विचारों में से सही विचार कौन सा है? इस स्थिति को संशय-अनिर्णय की अवस्था कहते हैं।
लोगों को संशय रहता है, पता नहीं ईश्वर है या नहीं? अगला जन्म होगा या नहीं? कर्मों का फल ठीक-ठीक न्याय से मिलेगा या नहीं? सभी कर्मों का फल इसी जन्म में मिलेगा या नहीं इत्यादि। इन विषयों में जब कोई निर्णय नहीं हो पाता, तो उसे संशय ज्ञान कहते हैं।
(3). शाब्दिक ज्ञान :: शास्त्रों की बातें पढ़ सुनकर शब्दों से तो व्यक्ति किसी वस्तु को अथवा किसी व्यवहार को ठीक-ठीक जान लेता है। परन्तु आचरण वैसा नहीं कर पाता। इस प्रकार के ज्ञान को शाब्दिक ज्ञान कहते हैं। झूठ नहीं बोलना चाहिए, छल-कपट नहीं करना चाहिए, यह ज्ञान लगभग सभी को है, फिर भी अधिकांश लोग झूठ बोलते हैं, छल-कपट करते हैं। उस जानी हुई बात का आचरण नहीं कर पाते। इस प्रकार का जो ज्ञान है, वह शाब्दिक ज्ञान है।
शब्दार्थ भावार्थ में अन्तर होता है क्योंकि शब्द के अनेक अर्थ होते हैं और अलग-अलग परिस्थिति में उनका मतलब अलग होना स्वाभाविक है।
(4). तत्त्व ज्ञान :: इसे वास्तविक ज्ञान, यथार्थ ज्ञान भी कहते हैं। शास्त्रों से जो ठीक-ठीक जाना, शाब्दिक ज्ञान प्राप्त किया, उसका आचरण भी वैसा ही शास्त्रानुकूल करना चाहिये यथा वर्णाश्रम धर्म। वर्जित कर्म, तामसिक कर्मों से सदा दूर ही रहना चाहिये। ईश्वरीय-ब्रह्म ज्ञान ही तत्त्व ज्ञान हैं।
चारों प्रकार के ज्ञानों में सबसे उत्तम तत्त्व ज्ञान है। यही वास्तविक ज्ञान है। इसी से मनुष्य का कल्याण होता है, इसके बिना नहीं।
ईश्वर में रुचि होना, संसार से राग द्वेष कम होते जाना और वैराग्य प्राप्त होना, भोगों में आसक्ति कम होते जाना, पक्षपात रहित न्याय पूर्वक आचरण करना, किसी पर अन्याय नहीं करना, झूठ छल कपट चोरी बेईमानी धोखाधड़ी आदि बुराइयों से दूर रहना। सेवा परोपकार, दान, दया, नम्रता, सभ्यता आदि उत्तम गुणों को धारण कर के आनन्दित रहना, मन की शान्ति प्राप्त होना, निर्भयता प्राप्त होना आदि इसके लक्षण हैं।
जीवन में तत्व-परम् ज्ञान को प्राप्त करें। मन की शान्ति को प्राप्त करें। आनन्द पूर्वक जीयें। ईश्वर के आदेश का पालन करें और सब दुखों से छूट कर, मोक्ष में पूर्ण आनन्द-परमानन्द प्राप्त करें।
GYAN-KNOWLEDGE :: Lack of vanity, pride, arrogance, absence of pretence hypocrisy, deceit, boastfulness, ostentation, non violence, forgiveness, simplicity, service of the Guru, elders, parents, internal-external purity, piousness, stability of the innerself absence of pride-too high opinion about oneself,  not to think of, recollect-remember birth, death, ageing-fragility, diseases continuously-again and again, absence of attachment-affection for son, wife and house-home, to maintain-strike a balance between like and dislikes (not to be overcome-overwhelmed by), undisturbed-firm faith in the God, practice-nature of living in isolated-pious places, absence of eagerness-attachment to the company of wicked people-sinners having worldly attachments, stability-faith in philosophy, scriptures, epics, Ved-Shashtr and continuous thinking, meditation, realisation of the Almighty is considered to be Gyan, enlightenment, true knowledge and rest is not knowledge.
ज्ञानी ::
निषेवते प्रशस्तानी निन्दितानी न सेवते।
अनास्तिकः श्रद्धान एतत् पण्डितलक्षणम्॥[विदुर नीति 1]
जो अच्छे कर्म करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो ईश्वर में भरोसा रखता है और श्रद्धालु है, उसके ये सद्गुण पंडित होने के लक्षण हैं।
Pious, auspicious, righteous deeds, distancing from evil-wicked deeds, faith & devotion to the Almighty are the characterises (traits, qualities) of a Pandit (learned, enlightened, scholar, philosopher, wise).
न ह्रश्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते।
गंगो ह्रद इवाक्षोभ्यो य: स पंडित उच्यते॥[विदुर नीति 2]
जो व्यक्ति मान-सम्मान पाकर अहंकार नहीं करता और न अपमान ही से पीड़ित होता है। जो जलाशय की भाँति सदैव क्षोभ रहित और शान्त रहता है, वही ज्ञानी है।
One who is not filled pride-ego and do not feel dejection, is quite like the waters in a reservoir is enlightened-learned.
अर्थम् महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा।
विचरत्यसमुन्नद्धो य: स पंडित उच्यते॥[विदुर नीति 4]
जो व्यक्ति अत्यधिक धन, विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर भी नहीं इठलाता, वह पण्डित कहलाता है।
The person who is free from ego in spite of attaining large quantity of wealth, education and comforts-luxury; is a Pandit (learned, enlightened, philosopher).
क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
यमर्थान् नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥[विदुर नीति 21]
जो व्यक्ति क्रोध, अहंकार, दुष्कर्म, अति-उत्साह, स्वार्थ, उद्दंडता इत्यादि दुर्गुणों की और आकर्षित नहीं होते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।
उत्साह :: जोश, उमंग, राग, धुन, सरगर्मी, याद दिलाने की क्रिया, बढ़ावा, उकसावा; excitement, enthusiasm, zeal, prompting.
उद्दंडता :: क्रूरता, नृशंसता, अति पाप, अति दुष्टता पूर्ण व्यवहार, हेकड़ी, गर्व; indecency, arrogance, tactlessness, atrocity.
One who is not attracted-affected by anger, ego-pride, evils-wickedness, extreme enthusiasm, selfishness, arrogance etc. is the truly enlightened-learned (prudent, intelligent) person.
यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे।
कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥[विदुर नीति 22]
जिस व्यक्ति के कार्य पूरा हो जाने के बाद उसका कार्य, व्यवहार, गोपनीयता और विचार को दूसरे लोग जानते है, वही व्यक्ति बुद्धिमान है।
One is intelligent whose targets-endeavours, behaviour-manner of accomplishing the job, confidentiality and the methods-procedures are disclosed only after attaining his goal.
One should never disclose his plans, programmes, prior to giving them a shape, implementing them successfully. There is always a danger of stealing his research work by the others, like the Chinese & Russians spying everything in America.
The enemy is always active following each and every step of his opponents-rivals, enemies; like Pakistan & China which are bent upon-eager to  destroy India through foul means.
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः। 
समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥[विदुर नीति 23]
जो व्यक्ति सरदी-गरमी, अमीरी-गरीबी, प्रेम-धृणा इत्यादि विषय परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होता और तटस्थ भाव से अपना राज धर्म निभाता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
One who is not perturbed-disturbed by hot-cold whether (favourable or adverse situations-conditions), love & hate, poverty or riches and keep on performing-discharging his duties neutrally is enlightened-real scholar.
क्षिप्रं विजानाति चिरं शृणोति विज्ञाय चार्थ भते न कामात्।
नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य॥[विदुर नीति 24]
जो व्यक्ति शीघ्र संकेत मात्र से जान लेता है, दूसरे की बात चिरकाल तक सुनता है, और अर्थ की कामना से उनका सेवन नहीं करता, यही पण्डित का मुख्य चिन्ह हैं।The enlightened-Pandit quickly understand a thing, keep on listening to others without reacting to it and do not wish to utilise such things for the sake of earning money. It is a characteristics, quality, trait of a Pandit-scholar.
बुद्विमान व्यक्ति किसी भी विषय को बहुत जल्दी समझ जाते हैं, पर वे धीरज-आराम से सब कुछ सुनते है किसी भी काम को अपना कर्तव्य समझ कर करते है। अपनी मनोकामना के लिए नहीं और व्यर्थ में किसी के बारे में बात नहीं करते है।
The Pandit-knowledgeable, informed people understand any subject quickly, but patiently listen to it for a long time, do any work as a duty, not as a wish, and do not talk about anyone in vain.
ज्ञानी लोग किसी भी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, लेकिन उसे धैर्यपूर्वक देर तक सुनते रहते हैं । किसी भी कार्य को कर्तव्य समझकर करते है, कामना समझकर नहीं और व्यर्थ किसी के विषय में बात नहीं करते ।
आत्मज्ञानं समारम्भः तितिक्षा धर्मनित्यता।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥[विदुर नीति 25]
जो अपने योग्यता से भली-भाँति परिचित हो और उसी के अनुसार कल्याणकारी कार्य करता हो, जिसमें दुःख सहने की शक्ति हो, जो विपरीत स्थिति में भी धर्म-पथ से विमुख नहीं होता, ऐसा व्यक्ति ही सच्चा ज्ञानी कहलाता है।
One who is well versed with his ability-calibre and performs as per it for social welfare, has the capability-capacity to bear pain and keep on performing his duties in adverse situations as well is the real Pandit (learned, scholar).
यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते। 
न किञ्चिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥[विदुर नीति 26]
विवेकशील और बुद्धिमान व्यक्ति सदैव यह चेष्ठा करते हैं कि वे यथा शक्ति कार्य करें और वे वैसा करते भी हैं तथा किसी वस्तु को तुच्छ समझकर उसकी उपेक्षा नहीं करते, वे ही सच्चे ज्ञानी हैं।
The prudent (wise, intelligent) always try to work at their level best and never discard-reject any thing by considering as inferior, being a Pandit-scholar (expert in their field).
नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्। 
आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः॥[विदुर नीति 27]
जो व्यक्ति दुर्लभ-विशिष्ट वस्तु को पाने की इच्छा नहीं रखते, नाशवान वस्तु के विषय में शोक नहीं करते तथा विपत्ति आ पड़ने पर घबराते नहीं हैं, डटकर उसका सामना करते हैं, वही ज्ञानी हैं।
One who do not desire-wish to obtain any special-rare object, do not grieve for the perishable goods, face the trouble (difficulties, calamity-disaster, tortures), do not panic & face them firmly is an enlightened person.
असम्यगुपयुक्तं हि ज्ञानं सुकुशलैरपि।
उपलभ्यं चाविदितं विदितं चाननुष्ठितम्॥[विदुर नीति 31]
वह ज्ञान निर्रथक है, जिससे कर्तव्य का कोई बोध न हो और वह कर्तव्य भी बेकार है, जिसकी कोई सार्थकता न हों।
That knowledge is useless which do not guide-caution a person about his duties and devotion to that job is no use-worthless which do not serve any purpose.
निश्चित्वा यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः।
अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥[विदुर नीति 40]
जो व्यक्ति किसी भी कार्य-व्यवहार को निश्चयपूर्वक आरम्भ करता है, उसे बीच में नहीं रोकता, समय को बरबाद नहीं करता तथा अपने मन को नियंत्रण में रखता है, वही ज्ञानी है।
One is a learned-expert (skilled, prudent) if he begins with a job with firm determination and continues with it without waiting time, keeps his innerself under control, is enlightened.
Every project has to be planned carefully prior to its execution. Finances have to be kept under strict control & vigil. Every effort should be made to keep the endeavours closely guarded secret prior to their approval & implementation.
न संरम्भेणारभते त्रिवर्गमाकारितः शंसति तत्त्वमेव।
न मित्रार्थरोचयते विवादं नापुजितः कुप्यति चाप्यमूढः॥[विदुर नीति 56]
जो जल्द बाजी में धर्म, अर्थ तथा काम का प्रारम्भ नहीं करता, पूछने पर सत्य ही उद् घाटित (बोलता) करता है, मित्र के कहने पर विवाद से बचता है, अनादर होने पर भी दुःखी नहीं होता। वही सच्चा ज्ञान वान व्यक्ति है।
One who do not initiate the Dharm, Arth *earnings) and Kam (sexual life) in a hurry, on being asked reveals the truth, avoids argumentation on being provoked by the friend, do not worry on being insulted; is a truly learned person (Gyani-enlightened).
गन्धेन गावः पश्यन्ति वेदैः पश्यन्ति ब्राह्मणाः।
चारैः पश्यन्ति राजानश्चक्षुर्भ्यामितरे जनाः॥[विदुर नीति 63]
गायें गँध से देखती हैं, ज्ञानी लोग वेदों से, राजा गुप्तचरों से तथा जन सामान्य नेत्रों से देखते है।
The cows recognises a person-object by the smell, enlightened identifies one through the knowledge of Veds, king with the help of detectives and the common citizens-masses recognise with their eyes.
पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मन्त्रिबान्धवाः।
पतयो बान्धवाः स्त्रीणां ब्राह्मणा वेदबान्धवाः॥[विदुर नीति 65]
पशुओं के रक्षक बादल होते है, राजा के रक्षक उसके मंत्री, पत्नियों के रक्षक उनके पति तथा वेदों के रक्षक ब्राह्मण (ज्ञानी पुरुष) होते हैं।
The clouds are the defenders-protectors of the animals (including humans), the ministers protect the king, husbands protect the women-wives and the Brahmns protects the Veds.
सुखं च दुःखं च भवाभवौ च लाभालाभौ मरणं जीवितं च।
पर्यायशः सर्वमेते स्पृशन्ति तस्माद् धीरो न हृष्येत्र शोचेत्॥[विदुर नीति 79]
सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मृत्यु, उत्पति-विनाश; ये सब स्वाभविक कर्म समय-समय पर सबको प्राप्त होते रहते हैं। ज्ञानी पुरुष को इनके बारे में सोचकर शोक नहीं करना चाहिए। ये सब शाश्वत कर्म हैं।
Pain-pleasure, profit-loss, birth-death, evolution-dissolution are the  effects of nature and every one gets them at one or the other occasion. The enlightened, wise should not worry about them, since they are eternal.
Destiny controls thing events as a result-outcome of the deeds committed-performed by one in his earlier births, till that age and the current moment situation. A hones-virtuous deed can eliminate the curse of earlier times in one go.
बुद्धयो भयं प्रणुदति तपसा विन्दते महत्।
गुरुशुश्रूषया ज्ञानं शान्तिं योगेन विन्दति॥[विदुर नीति 81]
ज्ञान द्वारा मनुष्य का डर दूर होता है, तप द्वारा उसे ऊँचा पद मिलता है, गुरु की सेवा द्वारा विद्या प्राप्त होती है तथा योग द्वारा शान्ति प्राप्त होती है।
Enlightenment removes fear, asceticism grants higher status (abodes, Moksh) service of the Guru grants learning-enlightenment and Yog grants peace, solace, tranquillity.
ब्राह्मणं ब्राह्मणो वेद भर्ता वेद स्त्रियं तथा।
अमात्यं नृपतिर्वेद राजा राजानमेव च॥[विदुर नीति 86]
समतुल्य लोग ही एक दूसरे को ठीक प्रकार से जान समझ पाते हैं, जैसे ज्ञानी को ज्ञानी, पति को पत्नी, मंत्री को राजा तथा राजा को प्रजा। अतः अपनी बराबरी वाले के साथ ही सम्बंध रखना चाहिए।
Only the people at par-equivalent to each other are able to make harmonious relations just like the learned with the enlightened (Brahmn with the Brahmn), husband with wife, minister with the king and the king with the populace.
Hence marital relations survive when both husband & wife have mental level and their families have equal status.
नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम्।
क्षेत्रज्ञाधिषि्ठतं विद्वान् यो वेद स पर: कवि:॥[विदुर नीति 100]
जो विद्वान् नवद्वार वाले, तीन स्थुणा वाले, पाँच साक्षियों वाले क्षेत्रज्ञ जीवात्मा से अधिष्ठित धारण किये गए शरीर रूपी गृह को अच्छे प्रकार जानता है, वह श्रेष्ठ ज्ञानी अर्थात् ब्रह्मवित् है।
स्थूणा :: थूनी, खम्बा, पेड़ का ठूँठ, लोहे का पुतला, निहाई।
One is enlightened-Brahm Vid (like the Brahm-creator) who identifies-recognises the human body having 9 doors, 3 supports, 5 witnesses possessed by the soul.
बुद्धया भयं प्रणुदति तपसा विन्दते महत्।
गुरुशुश्रूषया ज्ञानं शान्तिं योगेन विन्दति॥[विदुर नीति 107]
बुद्धि से भय को दूर करता है, तप से महत ब्रह्म एवं योग्य गुरु को प्राप्त होता है, गुरु की सेवा से ज्ञान प्राप्त होता है और योग से शान्ति को प्राप्त करता है।
Intelligence-prudence removes fear, ascetic practices grant attainment of the Brahm and a deserving Guru who's service grants enlightenment. Yog leads to peace, solace & tranquillity.
Please refer to :: HINDU PHILOSOPHY (8) हिंदु दर्शन :: KARM, GYAN & BHAKTI YOG कर्म, ज्ञान, भक्ति योग santoshkipathshala.blogspot.com
एकाकी निस्पृहः शान्तः चिंतासूयादिवर्जितः।
बाल्यभावेन यो भाति ब्रह्मज्ञानी स उच्यते॥
अकेला, कामना रहित, शान्त, चिन्ता रहित, ईर्ष्या रहित और बालक की तरह जो शोभता है, वह ब्रह्म ज्ञानी कहलाता है।[गुरु गीता-स्कन्द पुराण 2.36]
One who remains alone-in solitude, free from desires, quite-peaceful, free from worries, envy just like a child is Brahmn Gyani-one who knows the Gist (elixir, nectar) of the God.
ज्ञान प्राप्ति के 8 अन्तरङ्ग साधन :: 
(1). विवेक :: सत्-असत्, उचित-अनुचित, हानि-लाभ, हित-अहित को सोच-समझकर निर्णय लेना।
(2). वैराग्य :: सत्-असत् को अलग-अलग जानकर उसका त्याग करके संसार से विमुख होना।
(3). शमादि षट्सम्पत्ति :: (3.1). मन को इन्द्रियों से हटाना शम है। (3.2). इन्द्रियों को विषयों से हटाना दम है। (3.3). ईश्वर, शास्त्र पर पूज्य भाव से पूर्वक प्रत्यक्ष से भी अधिक विश्वास करना श्रद्धा है। (3.4). वृतियों को संसार से हटाना उपरति है। (3.5). सर्दी-गर्मी आदि द्वंदों को सहना उनकी उपेक्षा करना तितिक्षा है। (3.6). अन्तःकरण में शंकाओं को न रखना समाधान है।
(4). मुमुक्षता :: संसार से छूटने की इच्छा मुमुक्षता है। मुमुक्षता जाग्रत होने के बाद साधक पदार्थों और कर्मों का स्वरूप से त्यागकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाकर उसके निवास पर शास्त्रों को सुनकर तात्पर्य का निर्णय करना और उसे धारण करना श्रवण है।
(5). श्रवण :: श्रवण से संशय दूर होता है।
(6). मनन :: इससे प्रमेयगत संशय दूर होता है।
(7). निदिध्यासन :: संसार की सत्ता को मानना और परमात्मा-तत्व को न मानना विपरीत भावना कहलाती है। विपरीत भावना को हटाना निदिध्यासन है।
(8). तत्व पदार्थ संशोधन :: प्राकृत पदार्थ-मात्र से सम्बन्ध-विच्छेद होना, केवल  चिन्मय-तत्व का शेष रहना, तत्व पदार्थ संशोधन है और यही तत्व साक्षात्कार है।
इन सब साधनों का तात्पर्य है असाधन अर्थात असत् से सम्बन्ध का त्याग। त्याज्य वस्तु अपने लिए नहीं होती, परन्तु त्याग का परिणाम अपने लिए होता है।
ज्ञानी-ENLIGHTENED :: अभिमान शून्यता, दंभ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अंत:करण की स्थिरता, मन, इन्द्रिय एवं शरीर का निग्रह, विषय भोगों में आस्तिकता का अभाव, अहंकार का न होना, जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग आदि में दुःख रूप दोष का बारम्बार विचार करना,  पुत्र, स्त्री और गृह आदि में अनासक्ति और ममता का अभाव, प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही समान चित्त रहना (हर्ष, शोक के वशीभूत न होना) परमेश्वर की अनन्य भाव से अविचलित भक्ति का होना, पवित्र एवं एकांत स्थान में रहने का स्वभाव, विषयी मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का अभाव, अध्यात्म-ज्ञान में स्थित तथा तत्व-ज्ञान स्वरुप परमेश्वर का निरंतर चिंतन-दर्शन; यह सब ज्ञान है व इसके विपरीत अज्ञान।
परमात्मा को कुछ लोग सूक्ष्म बुद्धि द्वारा-ध्यान के द्वारा अपने अन्त:करण में देखते हैं। अन्य लोग साँख्य योग द्वारा व कुछ लोग कर्म योग द्वारा देखते हैं। साधारण मनुष्य स्वयं कुछ न जानते हुए भी दूसरे ज्ञानी पुरुषों से सुनकर-सीख कर  ही उपासना करते हैं। ये सत्संग करने वाले लोग भी उपासना माध्यम से संसार सागर को निश्चित ही पार कर जाते हैं।
Pious, virtuous, righteous characters-Satv Gun generates enlightenment, greed creates-Rajo Gun and imprudence, ignorance, delusion generate Temo Gun. One who has understood-realised that the characters intermingle, interact, mix amongest themselves acquire stability-do not get disturbed. One who do not distinguish-differentiate between honour-dishonour (insult), friend and foe, has attained equanimity, has shelved the pride of having done something and becomes above board the characteristics.
सत्व गुण से ज्ञान, रजो गुण से लोभ तथा तमो गुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं। गुणों में गुण ही बरतते हैं-ऐसा समझ कर जो स्थिर रहता है, वह अपनी स्थिति से विचलित नहीं होता, जो मान-अपमान में मित्र-शत्रु पक्ष में भी समान भाव रखता है, जिसने कर्तव्य के अभिमान को त्याग दिया है; वह निर्गुण-गुणातीत कहलाता है।
ENLIGHTENMENT ज्ञान-विद्या :: जिससे षड्विध ऐश्वर्य युक्त परम देवता साक्षात भगवान् हृषिकेश का ज्ञान होता है, वही विद्या है। वेद, शास्त्र, इतिहास, पुराण का अध्ययन, बोध, कर्तव्य-अकर्तव्य की समझ विद्या है। विज्ञान-यज्ञ के विधि-विधान, अवसर, अनुष्ठान का उचित-समयानुसार प्रयोग, विद्या है।
सच्ची विद्या वही है, जिससे परमात्मा और आत्मा का भेद मिट जाता है।
The real learning is one which clears the difference between the soul and the Almighty.
विद्या के अन्तर्गत ज्ञान तथा विज्ञान दोनों का समावेश होता है। ज्ञान के द्वारा मनुष्य जीवन के उद्देश्यों, परम लक्ष्य का निर्धारण करता है तथा उसी के अनुसार अपनी क्रियाओं तथा वृत्तियों का निर्धारण करता है। ऋग्वेद में विद्या को ऐश्वर्यशाली होने का कारण माना गया है। दर्शन, धर्म तथा कला के अर्थों में विद्या का प्रयोग होता है। दर्शन में विद्या का अर्थ तत्त्वज्ञान से सम्बन्ध रखने वाली विद्या है। धर्म के अनुसार विद्या का अर्थ त्रयी (तीन वेद), धर्मशास्त्र तथा सामाजिक शास्त्र है। पौराणिक तथा तान्त्रिक धर्म में विद्या का प्रयोग महादेवी दुर्गा अथवा शक्ति के मन्त्र अर्थ में होता है। कला के अर्थ में विद्या का प्रयोग कलाओं तथा शिल्पों के अर्थ में किया जाता है।
चार विद्यायें ::
(1). आन्वीक्षकी (तर्क अथवा दर्शन), (2). त्रयी (तीन वेद), (3). वार्ता (आधुनिक अर्थशास्त्र) और (4). दण्डनीति (राजनीति)।[कौटिल्य]
मनुस्मृति में तीन विद्याओं का उल्लेख है।
विद्या के चौदह स्थान :: पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, षङ्ग सहित चारों वेद। पाप-पुण्य एवं काम मोक्ष की बातें त्रयी के अन्तर्गत आते हैं।[याज्ञवल्क्य] 
64 विद्याएँ :- तर्कशास्त्र, साङ्ख्य, योग, लोकायत (नास्तिक दर्शन) आन्वीक्षिकी के अन्तर्गत आते हैं।[वात्सायन]
वार्ता का तात्पर्य उस शास्त्र से है, जिसके अध्ययन से लोक व्यवहार का ज्ञान प्राप्त होता है। सूदखोरी, खेती व्यापार तथा गौ पालन को व्यापार कहते हैं। इस वार्ताशास्त्र का भलीभाँति ज्ञान रखने वाले को जीविका सम्बन्धी भय कभी नहीं होता है। दण्डनीति से सुःशासन-दुःशासन का ज्ञान होता है। विद्या की रक्षा के उपाय बताते हुए मनु कहते हैं :- ‘विद्या ब्राह्मण के पास आकर बोली,  ‘‘मैं तुम्हारी सम्पत्ति हूँ, इसलिए मेरी रक्षा करो। मुझे असूया करने वाले व्यक्ति को प्रदान नहीं करना, जिससे मैं वीर्यशालिनी बन सकूँ"।
विद्या का उपदेश उस स्थान नहीं करना चाहिए जिस स्थान पर धर्म तथा अर्थ न हो अथवा उस प्रकार की समर्पित सेवा न हो, क्योंकि ऐसे स्थान पर उपदेश देना बंजर भूमि में रोपे बीज के समान कभी फलवती नहीं होती है। पवित्र, संयमी, ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले, आलस्य रहित ब्राह्मण को वेद रक्षा के लिए विद्या का उपदेश देना चाहिए।
विद्या द्वारा जो धन मनुष्य प्राप्त करता है, वह उसी का होता है; किन्तु जो मनुष्य अनपढ़ होते हुए भी धन संचित करते हैं, उस धन में सभी बराबर के हिस्सेदार होते हैं।[मनुस्मृति]
जिस पुरुष के आचरण में विद्या तथा तपस्या दोनों होते हैं, वही श्रेष्ठ पात्र होता है। सभी वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं; किन्तु श्रेष्ठ ब्राह्मण वही है जिसे अध्यात्मतत्व का ज्ञान है। वेद विद्या का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति देवयोनि में जन्म पाता है।[ याज्ञवल्क्य]
विद्या सर्वश्रेष्ठ धन है, क्योंकि विद्या विनय प्रदान करती, विनय से सुपात्रता, सुपात्रता से धन, धन से धर्म तथा धर्म से सुख की प्राप्ति होती है। विद्या के द्वारा ही इहलोक तथा परलोक दोनों में सुन्दर गति प्राप्त होती है। विद्या व्यक्तिगत आचार के साथ-साथ वैश्विक आचार का भी एक महत्त्वपूर्ण अंग है।
विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्। 
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति, धनाद् धर्मः ततः सुखम्॥
Intelligence, memory, learning-education, understanding, cleverness, prudence, psychology, analysis, ability, skill, thinking, meditation, application, followed by practice (अभ्यास), Gyan-knowledge, utilisation constitute the mental make up liberation-assimilation in the Ultimate.
Human intelligence makes him survive the onslaught of various ups-downs, rise-falls, worries, bows, sorrows, pains. He makes endeavours to find a way out out of the difficult-intricate situations successfully.
Memory supports the intelligence by interweaving the possible solutions available in the past and the current knowledge-solutions for finding out possible new solutions-way out. Ancient India saw the utilisation of memory to  the extreme. All knowledge, arts, sciences were stored in the memory by the students to utilise in future, at an appropriate situation-opportunity.
Understanding of the content-text is essential while rote memory may be useless. Understanding comes through analysis, comparing, contradictions, assumptions, hypotheses and its testing simultaneously. Application of the learning successfully, builds confidence. Repeated application and fault finding, paves way for improvement, skill and ability. One begins synthesising the new situations-ventures. It creates interest leading to appreciation and further advancement. One is blessed with farsightedness. Human element needs cleverness and prudence and use of psychology simultaneously. However, the direction should be positive, helping others, social service. The devotee attains Gyan-enlightenment leading to Salvation.
Knowledge is for the sake of livelihood-earning, sustaining-supporting the family-household, family members, poor, downtrodden, needy, welfare of the society, seeking job, development of the country as well as coordination amongest the members of society, at all levels :- Village-Country, State, Nation, World. Learning broadens the thinking, opens up the mind, modifies, corrects, refines the behaviour, etiquette, interaction, dealings. Enlightenment connects one with the Ultimate, God, Almighty and leads to Liberation, Salvation, Devotion.
One who is blessed with wisdom-the quality of being wise, prudence, belief in the thoughts of the ancestors, ancient scriptures, epics; is thoughtful, analytic, balanced headed, speaks only when necessary and to the point. He avoids undue arguments-conflicts, confrontations. His sense of logic is developed. He controls his wishes, desires, will-needs.
ज्ञान-साँख्य योग GYAN-SANKHY YOG :: Bhagwan Shri Krashn described Gyan Yog to Uddhav Ji, his cousin brother and a disciple of Guru Vrahaspati, as was enunciated by Bhishm Pitamah to Yudhister on his deathbed, made of Arjun’s arrows.
Gyan Yog is full of enlightenment, renunciation (Vaeragy), Science (Vigyan), Faith (Shraddha) and devotion (Bhakti).The characteristics produced by the nature are interacting within the nature itself. All actions, activities are taking place in the organs. It has 28 components (elements, divisions), namely :- Sense organs (Gyan, knowledge) Ear-hearing, Skin-touch, Eye-see, Tongue-taste, Nose-smell (5), Work organs (Karm-Karmandry) i.e., Anus-excretion, Pennies-urination, reproduction, Hand-work, Legs (walking, movement), Mouth-speech (5), Man has all the characteristics of  sense and work organs, mind and heart together leads to decide, what one should to do or not to do (1), Prakrati (Nature, Purush, doer) (1), Mahatatv-significance, importance, ultimate (1), Ahankar (Id, ego, super ego, I, My, Me, pride) (1), Punchtanmatra (Jal, Vayu, Aakash, Prathvi, Tej) (5) Vaeragy (renunciation, rejection), Vigyan (research, discovery, innovation), Shraddha (faith), Bhakti (devotion), Mahabhoot (5), Gun (characteristics) (3), which are observed in all activities beginning from Brahma Ji to a straw. Gun is inspired to create life, only then it produces.
Combination of the following 3 defects at the micro (minute, small) level, results in the creation, production, invention of the world, universe.
ADHYATMIC :: Pertaining to the Supreme Spirit, Spiritual-knowledge of the identity of soul with the Supreme Spirit.
ADHIDAEVIK :: Divine thoughts-expectations-anxiousness.
ADHIBHOUTIK :: Material, physical thoughts, expectations, anxiousness pertaining to world, universe.
PROKSH परोक्ष :: Amongest them one is PROKSH (परोक्ष, the invisible, not evident, hidden, implied, indirect, absent) Gyan, which visualises the gist of God as the one being followed-imitated, is seen in totality.
APROKSH  अपरोक्ष  (visible, evident, Science, discovery, research, innovation, modification, advancement, progress, alteration, up gradation) :: Gyan is one which visualises Brahma as the sole reason and not the gist, it used to follow by unitary components, to turns into definite Science.[Excerpt from Shrimad Bhagwat]
Please refer to :: SHRI MAD BHAGWAD GEETA (2) श्रीमद्भगवद्गीता :: साँख्य योग santoshkipathshala.blogspot.com
METHODOLOGY-Procedure, strategy to attain Gyan (Vigyan, Knowledge associated with Science) :: One should think-analyse of the the position-creation-assimilation of the three components-Satv, Rajas, Tamas along with their constituents-components, repeatedly; evolution, origination, growth of the developments starting from nature up to the formation of body. The way the body and other objects assimilate back in nature-should be thought of, till the mind obtain peace-quiet.
One who has evolved-grown, alienated, detached is eligible for Salvation.
One who grasps the teachings-preaching of his mentor (Versatile Guru-teacher) and establishes in his inner self (through investigation-analyses-understanding) and  deserts the fickle ideas thoughts (moving, shaking, trembling, active, unsteady, restless, inconsistent, giddy, flirtatious, playful, naughty, transient, ephemeral, volatile) which were generated in the mind (Man), in the body-which is not soul.
The element (creator) which was present in the beginning and at the time of destruction (termination, Praly, doomsday), is present in between, as well. The same is believed (admitted, purported, apparent) to be followed-imitated in destruction (at the time of destruction, hindrance, difficulty, obstruction, to check, to thwart), by difference of actions, acts, functions, remains as foot print, proof, witness or abode (resting place, residence, site, place). This truth-fact is ultimate knowledge i.e., Salvation.
Specificity of Ved (learning, revelation, audible, perceptible to ear), visible (perceptible, clear, direct, explicit, immediate, real, actual), fame (dominant among great men in history) and inference (notion, opinion, estimation, guess, conjecture), are judged, weighted, considered as four important-vital proofs-evidences.  On being subjected to these criterion, the visible-observed, destructive, defective, does not prove to be reality-truth. Therefore, the prudent eliminate (depart, move away, detach, isolate), from this varied, vivid, illusionary, imaginary, like sound, word, voice, toils (tricks deceit) of the world.
The prudent judges the Yagy and like perishable deeds resulting in award of heavens, till the abode of Brahma-all comforts (luxuries, passions, pleasures, gratifications) results in his downfall (inauspicious, disastrous, evil, misfortune, calamity, ill omens).
Karm Yog is easier as compared to Gyan Yog and it can be exercised easily even by those whose mental faculties-abilities are not well developed, whose intelligence level-understanding is low. Who are not able to concentrate-meditate and are fickle minded. Karm-work  is the vehicle, means and depends upon the performer-the devotee. Karm Yog is thousands times laudable (excellent, praised, commended, best, righteous), as compared to Gyan Yog, because Gyan Yog has arisen-manifested from Karm Yog-which is the Ultimate, one should achieve. Gyan Yog is non-existent, meaning less without Karm Yog. Therefore, a person exercising, practicing, involved in Karm Yog achieves the imperishable status-Moksh.
Those who have discarded, rejected, enunciated, the Karm and its outcome: reward, punishment, are qualified-authorised for Gyan Yog. Complete rejection of the belief, ego, pride of having done something, is Gyan Yog. The enlightenment-calibre which provides the capability to analyse-introspect, the basic elements-components is Gyan Yog. Gyan Yogi detaches himself from the world to be stable in his inner self.
Gyan-Sankhy Yog utilises knowledge, understanding, prudence, intelligence, consciousness and practice to achieve the Almighty. It’s initiated with :- I have nothing. I don’t need anything. I have nothing to do for me. It requires detachment on the part of the doer. Thought behind Sankhy can be grasped by understanding it in depth through conscience, prudence and meditation. Ego (pride, glory) is major hurdle in it’s path. This egotism is the product of senses controlled by intelligence-mind and  Karm (work organs).
The smaller components of senses, which depend over the body are called Tanmatra. Tanmatra is created by the association of body. Due to this reason the creature is called bodied. When the Man is inspired to create life, only then it produces.
The living being was neither present in the beginning nor  at the termination- It just appears in between, middle only to vanish. Asat did not exist either in the beginning or at the end and therefore, it will not be present, exist between too.
Birth, life, growth, change, occurrence and destruction are the 6 defects pertaining to existence-being-natural state, character, quality, disposition-temperament. One has nothing to do with them. These defects are not embedded in him-do not pertain to him, since they in themselves are unreal, untrue, non-existent, unfounded, unrighteous, unholy, wicked or monstrous.
Nature is a balanced state of three characteristics called Satv, Rajas and Tamas. This in itself is called major characteristic-Pradhan means head, Boss).This is unrevealed or masked. It creates and destroys the creatures and a disturbance in nature creates the three Gods Brahma, Vishnu and Mahesh-though one revealed in three forms.
Deformity in the consistent predominance of nature creates-generate, significance-greatness-importance, which portraits it as great which generate egotism (arrogance, pride) or self-respect in nature.
Procedure and various steps involved in Gyan Yog ::
Contemplation, meditation, realisation of self.
Self-realisation, awareness, consciousness of self, knowing-identifying self to be the ultimate beneficiary.
Formal, repeated practices-concentration-devotion to work which pleases the Almighty, working for the sack of God only.
All sacrifices and austerities are devoted-offered to the supreme lord of all plants and demigods, benefactor and well-wisher of all living entities, attains peace from the pangs of material miseries.
Path to devotion is best and easiest, no one is free from sins on earth and only surrendering to the Almighty is easiest way.
Destroys-vanishes ego-detaches with the word to stabilise in inner self.
Surrender self to the Almighty.
Control lust-sensuality-passions and heart.
Renounce the fruits of action (Karm).
Discernment, practices with concentration are better than mechanical rituals or prayers.
Absorption in God to live with him is even better than concentration renunciation and brings instant peace to the spirit.
I have nothing to do. I don’t need anything. I have nothing to do for me.
To know through prudence, faith, belief.
अहम्-अहंकार का त्याग करने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
हानि-लाभ, सुख-दुःख, में समान भाव रखने वाला, भय से मुक्त परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
काम, क्रोध, मद, लोभ-लालच-स्वार्थ-मोह को त्यागने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो तीर्थ यात्रा, धर्म अनुष्ठान, यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ, स्वाध्याय करता है, वह परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो परोपकार, समाज सेवा करता है, वो परमात्म तत्व का हक़दार है।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य उस चेतन को जानना है जो पूर्ण है और जिसका आदि अंत नहीं हैं, जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। जो जड़ भी है और चेतन भी हैं। जो शरीर रहित भी है और शरीर सहित भी है। जिसका रूप है और नहीं भी है।
आत्मा का परमात्मा में लीन होना ही मुक्ति, भक्ति, मोक्ष है।
जिसने स्वयं में स्थित उस आत्मा रूपी परमात्मा को जान लिया है; वह बन्धन मुक्त, ज्ञानी, समदर्शी, ब्रह्म में लीन है, समता प्राप्त जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
स्वः धर्म, वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाला, कर्म-कर्तव्य, दायित्व से मुँह न मोड़ने वाला ब्रह्म मार्ग का अनुयायी है।
प्राणियों पर दया भाव रखने वाला, परोपकारी परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
मन, इन्द्रियों, वाणी, इच्छाओं पर काबू करने वाला मोक्ष का अधिकारी है।
त्यागी, वैरागी, संतुष्ट-संतोषी, आत्म संयमी, आत्म दर्शी है।
उसे सुख दुःख, जन्म-मृत्यु, हानि-लाभ, समस्त प्राणियों के प्रति समता प्राप्त है।
वह निर्लिप्त-सत्यनिष्ठ है।
उसने परमात्मा की शरण ग्रहण कर ली है।
वो निर्द्वन्द है।
वो सेवा निष्ठ-समाजसेवी, परमार्थी है।
जो माता-पिता-गुरु-जन, वृद्ध, दीन-हीन, प्रताड़ित की मदद-सेवा-सहायता करता है वो परमात्म तत्व का अनुरागी है।
जो अन्याय, दुराचार, अनाचार, अत्याचार से दूर से और इनका मुकाबला करता है, वह धर्मनिष्ठ है।
तत्वज्ञान अथवा अज्ञान का नाश एक बार ही होता है और सदा के लिए होता है। तत्वज्ञान की आवृति नहीं होती। ज्ञान की स्वतंत्र सतत है ही नहीं। बोध का अनादर-तिरस्कार करने से असत् को ग्रहण किया जाता है। असत् को महत्व देने से विवेक जाता है। बोध एक बार ही होगा और सदा के लिए होगा। तत्वज्ञान होने पर मोह नहीं होगा। जगत जीव के अन्तर्गत और जीव परमात्मा के अंतर्गत है। साधक पहले जगत को अपने में देखता है, फिर स्वयं में परमात्मा को देखता है। आत्मज्ञान ज्ञान और परमात्मज्ञान विज्ञान है। आत्मज्ञान में निज आनन्द है और परमात्मज्ञान में परमानन्द है। लौकिक निष्ठा से कर्मयोग तथा ज्ञान योग से आत्मज्ञान होता है और अलौकिक निष्ठा से भक्तियोग जिससे परमात्मज्ञान का अनुभव होता है।
आत्म ज्ञान से मुक्ति तो होती है परन्तु अहंम्-अहंकार रह जाता है। आत्म ज्ञान से अहंकार भी मिटाया जा सकता है।
मनुष्य को सदा उस परमेश्वर का, जिसके चरण-कमल निरन्तर भजने योग्य हैं, के गुणों का आश्रय लेने वाली भक्ति के द्वारा, सब प्रकार से :- मन, वाणीं और शरीर से; भजन करना चाहिये। उनको समर्पित भक्ति योग तुरंत ही संसार से वैराग्य और ब्रह्म साक्षात्कार रूप ज्ञान की प्राप्ति करा देता है। सभी विषय भगवद् रूप होने के कारण समान हैं। अतः जब इन्द्रियों की वृत्तियों के द्वारा भी भगवद्भक्त का चित्त उनमें प्रिय-अप्रिय रूप विषमता का अनुभव नहीं करता-सर्वत्र भगवान् का ही दर्शन करता है-उसी समय वह सङ्ग रहित, सबमें समान रूप से स्थित, त्याग और ग्रहण करने योग्य, दोष और गुणों से रहित, अपनी महिमा में आरूढ़ अपने आत्मा का ब्रह्म रूप से साक्षात्कार करता है। वही ज्ञान स्वरूप है, वही परब्रह्म है, वही परमात्मा है, वही ईश्वर है, वही पुरुष है; वही एक भगवान् स्वयं जीव, शरीर, विषय, इन्द्रियों आदि अनेक रूपों में प्रतीत होता है।
सम्पूर्ण संसार में आसक्ति का अभाव हो जाना-बस यही  योगियों के सब योग साधन का एक मात्र अभीष्ट फल है। ब्रह्म एक है, ज्ञान स्वरूप और निर्गुण है, तो भी वह बाह्य वृतियों वाली इन्द्रियों के द्वारा भ्रान्ति वश शब्दादि, धर्मों वाले विभिन्न-पदार्थों के रूप में भास रहा है। जिस प्रकार एक ही परब्रह्म महत्त्व, वैकारिक, राजस और तामस-तीन प्रकार का अहंकार, पञ्च महाभूत एवं ग्यारह इन्द्रिय रूप बन गया और फिर वही स्वयं प्रकाश इनके संयोग से जीव कहलाया, उसी प्रकार उस जीव का शरीर रूप यह ब्रह्माण्ड भी वस्तुतः ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्म से ही इसकी उत्पत्ति हुई है। किन्तु इसे ब्रह्म रूप में वही देख सकता है, जो श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य तथा निरन्तर योगाभ्यास के द्वारा एकाग्र चित्त और असंग बुद्धि हो गया है।
इस ज्ञान के माध्यम से प्रकृति और पुरुष के यथार्थ स्वरूप का बोध हो जाता है। निर्गुण ब्रह्म विषयक ज्ञान योग और परमेश्वर के प्रति भक्ति योग का फल एक ही है। उसे ही भगवान कहते हैं।
जिस प्रकार रूप, रस एवं गंध आदि अनेक गुणों का आश्रय भूत एक ही पदार्थ भिन्न-भिन्न इन्द्रियों द्वारा विभिन्न रूप से अनुभूत होता है, वैसे ही शास्त्र के विभिन्न मार्गों द्वारा एक ही भगवान् की अनेक प्रकार से अनुभूति होती है। नाना प्रकार के कर्म कलाप यज्ञ, दान, तप, वेदाध्ययन-मीमांसा, मन और इन्द्रियों के संयम, कर्मों के त्याग, विविध अङ्गों वाले योग, भक्ति योग, निवृति और प्रकृति रूप सकाम और निष्काम दोनों प्रकार के धर्म, आत्मतत्व के ज्ञान और दृढ़ वैराग्य-इन सभी साधनों से सगुण-निर्गुणरूप स्वयं प्रकाश भगवान् को ही प्राप्त किया जाता है।
जो सात्विक, राजसिक, तामस और निर्गुण भेद से चार प्रकार के भक्ति योग का और जो प्राणियों के जन्मादि विकारों का हेतु है तथा जिसकी गति जानी नहीं जाती, उस काल के स्वरूप को परमात्मा ने उपरोक्त पदों में स्वयं स्पष्ट किया है।
अविद्या जनित कर्म के कारण जीव की अनेकों गतियाँ होती हैं; उनमें जाने पर वह अपने स्वरूप को नहीं पहचान सकता।
उपरोक्त ज्ञान दुष्ट, दुर्विनीत, घमण्डी, दुराचारी और धर्मध्वजी-दम्भी पुरुषों को नहीं सुनाना-समझाना-पढ़ाना चाहिए। विषय लोलुप, गृहासक्त, अभक्त, श्रद्धाहीन, परमात्मा के भक्तों से द्वेष रखने वाला भी इस उपदेश से दूर रखना चाहिये।
जो  श्रद्धालु भक्त, विनयी, दूसरों के प्रति दोषदृष्टि न रखने वाला, सब प्राणियों से मित्रता रखने वाला, गुरु सेवा में तत्पर, बाह्य विषयों अनासक्त, शांत चित्त, मत्सर शून्य और पवित्र चित्त हो तथा परमात्मा को अपना प्रियतम मानने वाला हो, उसे इसका उपदेश अवश्य किया जाये। परमात्मा में मन-ध्यान-चित्त लगाकर श्रद्धापूर्वक जो भी व्यक्ति, इसका एक बार भी श्रवण या कथन करेगा, वह परमात्मा के परम पद को प्राप्त होगा।[श्रीमद्भागवत 3.32.22-42]
तत्ववेत्ता ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित अखण्ड अद्वितीय सच्चिदानन्द स्वरूप ज्ञान को ही तत्व कहते हैं। उसी को कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा और कोई भगवान् के नाम से पुकारते हैं।[श्रीमद्भागवत 2.1.11]
ब्रह्म तत्व ज्ञान का अधिकारी :: अहम्-अहंकार का त्याग करने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
हानि-लाभ, सुख-दुःख, में समान भाव रखने वाला, भय से मुक्त परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
काम, क्रोध, मद, लोभ-लालच-स्वार्थ-मोह को त्यागने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो तीर्थ यात्रा, धर्म अनुष्ठान, यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ, स्वाध्याय करता है, वह परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो परोपकार, समाज सेवा करता है, वो परमात्म तत्व का हक़दार है।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य उस चेतन को जानना है जो पूर्ण है और जिसका आदि अंत नहीं हैं, जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। जो जड़ भी है और चेतन भी हैं। जो शरीर रहित भी है और शरीर सहित भी है। जिसका रूप है और नहीं भी है।
आत्मा का परमात्मा में लीन होना ही मुक्ति, भक्ति, मोक्ष है।
जिसने स्वयं में स्थित उस आत्मा रूपी परमात्मा को जान लिया है; वह बन्धन मुक्त, ज्ञानी, समदर्शी, ब्रह्म में लीन है, समता प्राप्त जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
स्वः धर्म, वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाला, कर्म-कर्तव्य, दायित्व से मुँह न मोड़ने वाला ब्रह्म मार्ग का अनुयायी है।
प्राणियों पर दया भाव रखने वाला, परोपकारी परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
मन, इन्द्रियों, वाणी, इच्छाओं पर काबू करने वाला मोक्ष का अधिकारी है।
वह त्यागी, वैरागी, संतुष्ट-संतोषी, आत्म संयमी, आत्म दर्शी है।
उसे सुख दुःख, जन्म-मृत्यु, हानि-लाभ, समस्त प्राणियों के प्रति समता प्राप्त है। वह निर्लिप्त-सत्यनिष्ठ है। उसने परमात्मा की शरण ग्रहण कर ली है। वो निर्द्वन्द है। वो सेवा निष्ठ-समाजसेवी, परमार्थी है।
जो माता-पिता-गुरु-जन, वृद्ध, दीन-हीन, प्रताड़ित की मदद-सेवा-सहायता करता है, वो परमात्म तत्व का अनुरागी है।
जो अन्याय, दुराचार, अनाचार, अत्याचार से दूर से और इनका मुकाबला करता है, वह धर्मनिष्ठ है।
तत्व ज्ञान अथवा अज्ञान का नाश एक बार ही होता है और सदा के लिए होता है। तत्व ज्ञान की आवृति नहीं होती। ज्ञान की स्वतंत्र सतत है ही नहीं। बोध का अनादर-तिरस्कार करने से असत् को ग्रहण किया जाता है। असत् को महत्व देने से विवेक जाता है। बोध एक बार ही होगा और सदा के लिए होगा। तत्वज्ञान होने पर मोह नहीं होगा। जगत जीव के अन्तर्गत और जीव परमात्मा के अंतर्गत है। साधक पहले जगत को अपने में देखता है, फिर स्वयं में परमात्मा को देखता है। आत्मज्ञान ज्ञान और परमात्म ज्ञान विज्ञान है। आत्मज्ञान में निज आनन्द है और परमात्म ज्ञान में परमानन्द है। लौकिक निष्ठा से कर्मयोग तथा ज्ञान योग से आत्मज्ञान होता है और अलौकिक निष्ठा से भक्तियोग जिससे परमात्म ज्ञान का अनुभव होता है।
आत्म ज्ञान से मुक्ति तो होती है परन्तु अहंम्-अहंकार रह जाता है। आत्म ज्ञान से अहंकार भी मिटाया जा सकता है।
मनुष्य को सदा उस परमेश्वर का, जिसके चरण-कमल निरन्तर भजने योग्य हैं, के गुणों का आश्रय लेने वाली भक्ति के द्वारा, सब प्रकार से: मन, वाणीं और शरीर से; भजन करना चाहिये। उनको समर्पित भक्ति योग तुरंत ही संसार से वैराग्य और ब्रह्म साक्षात्कार रूप ज्ञान की प्राप्ति करा देता है। सभी विषय भगवद् रूप होने के कारण समान हैं। अतः जब इन्द्रियों की वृत्तियों के द्वारा भी भगवद्भक्त का चित्त उनमें प्रिय-अप्रिय रूप विषमता का अनुभव नहीं करता-सर्वत्र भगवान् का ही दर्शन करता है-उसी समय वह सङ्ग रहित, सबमें समान रूप से स्थित, त्याग और ग्रहण करने योग्य, दोष और गुणों से रहित, अपनी महिमा में आरूढ़ अपने आत्मा का ब्रह्म रूप से साक्षात्कार करता है। वही ज्ञान स्वरूप है, वही परब्रह्म है, वही परमात्मा है, वही ईश्वर है, वही पुरुष है; वही एक भगवान् स्वयं जीव, शरीर, विषय, इन्द्रियों आदि अनेक रूपों में प्रतीत होता है।
सम्पूर्ण संसार में आसक्ति का अभाव हो जाना, बस यही योगियों के सब योग साधन का एक मात्र अभीष्ट फल है। ब्रह्म एक है, ज्ञान स्वरूप और निर्गुण है, तो भी वह बाह्य वृतियों वाली इन्द्रियों के द्वारा भ्रान्ति वश शब्दादि, धर्मों वाले विभिन्न-पदार्थों के रूप में भास रहा है। जिस प्रकार एक ही परब्रह्म महत्त्व, वैकारिक, राजस और तामस, तीन प्रकार का अहंकार, पञ्च महाभूत एवं ग्यारह इन्द्रिय रूप बन गया और फिर वही स्वयं प्रकाश इनके संयोग से जीव कहलाया, उसी प्रकार उस जीव का शरीर रूप यह ब्रह्माण्ड भी वस्तुतः ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्म से ही इसकी उत्पत्ति हुई है। इसे ब्रह्म रूप में वही देख सकता है, जो श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य तथा निरन्तर योगाभ्यास के द्वारा एकाग्र चित्त और असंग बुद्धि हो गया है।
इस ज्ञान के माध्यम से प्रकृति और पुरुष के यथार्थ स्वरूप का बोध हो जाता है। निर्गुण ब्रह्म विषयक ज्ञान योग और परमेश्वर के प्रति भक्ति योग का फल एक ही है।
तत्व वेत्ता ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित अखण्ड अद्वितीय सच्चिदानन्द स्वरूप ज्ञान को ही तत्व कहते हैं। उसी को कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा और कोई भगवान्, परमेश्वर, परब्रह्म के नाम से पुकारते हैं।[श्रीमद्भागवत 2.1.11]
जिस प्रकार रूप, रस एवं गंध आदि अनेक गुणों का आश्रय भूत एक ही पदार्थ भिन्न-भिन्न इन्द्रियों द्वारा विभिन्न रूप से अनुभूत होता है, वैसे ही शास्त्र के विभिन्न मार्गों द्वारा एक ही भगवान् की अनेक प्रकार से अनुभूति होती है। नाना प्रकार के कर्म कलाप यज्ञ, दान, तप, वेदाध्ययन-मीमांसा, मन और इन्द्रियों के संयम, कर्मों के त्याग, विविध अङ्गों वाले योग, भक्ति योग, निवृति और प्रकृति रूप सकाम और निष्काम दोनों प्रकार के धर्म, आत्मतत्व के ज्ञान और दृढ़ वैराग्य-इन सभी साधनों से सगुण-निर्गुणरूप स्वयं प्रकाश भगवान् को ही प्राप्त किया जाता है।
जो सात्विक, राजसिक, तामस और निर्गुण भेद से चार प्रकार के भक्ति योग का और जो प्राणियों के जन्मादि विकारों का हेतु है तथा जिसकी गति जानी नहीं जाती, उस काल के स्वरूप को परमात्मा ने उपरोक्त पदों में स्वयं स्पष्ट किया है।
अविद्या जनित कर्म के कारण जीव की अनेकों गतियाँ होती हैं; उनमें जाने पर वह अपने स्वरूप को नहीं पहचान सकता।
उपरोक्त ज्ञान दुष्ट, दुर्विनीत, घमण्डी, दुराचारी और धर्मध्वजी-दम्भी पुरुषों को नहीं सुनाना-समझाना-पढ़ाना चाहिए। विषय लोलुप, गृहासक्त, अभक्त, श्रद्धाहीन, परमात्मा के भक्तों से द्वेष रखने वाला भी इस उपदेश से दूर रखना चाहिये।
जो श्रद्धालु भक्त, विनयी, दूसरों के प्रति दोषदृष्टि न रखने वाला, सब प्राणियों से मित्रता रखने वाला, गुरु सेवा में तत्पर, बाह्य विषयों अनासक्त, शांत चित्त, मत्सर शून्य और पवित्र चित्त हो तथा परमात्मा को अपना प्रियतम मानने वाला हो, उसे इसका उपदेश अवश्य किया जाये। परमात्मा में मन-ध्यान-चित्त लगाकर श्रद्धापूर्वक जो भी व्यक्ति, इसका एक बार भी श्रवण या कथन करेगा, वह परमात्मा के परम पद को प्राप्त होगा।[श्रीमद्भागवत 3.32.22-42]
ब्रह्म रहस्य-प्रज्ञानं :: कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद (शुकरहस्योपनिषद) में भगवान् वेद व्यास जी के आग्रह पर, भगवान् शिव ने उनके पुत्र शुकदेव जी को चार महावाक्यों का उपदेश "ब्रह्म रहस्य" के रूप में दिया :-
(1). ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म :- प्रकट ज्ञान ब्रह्म है। वह ज्ञान-स्वरूप ब्रह्म जानने योग्य है और ज्ञान गम्यता से परे भी है। वह विशुद्ध-रूप, बुद्धि-रूप, मुक्त-रूप और अविनाशी रूप है। वही सत्य, ज्ञान और सच्चिदानन्द-स्वरूप ध्यान करने योग्य है। उस महा तेजस्वी देव का ध्यान करके ही मोक्ष को प्राप्त हो सकता है।
वह परमात्मा सभी प्राणियों में जीव-रूप में विद्यमान है। वह सर्वत्र अखण्ड विग्रह-रूप है। वह जीव के चित और अहंकार पर सदैव नियन्त्रण करने वाला है। जिसके द्वारा प्राणी देखता, सुनता, सूँघता, बोलता और स्वाद-अस्वाद का अनुभव करता है, वह प्रज्ञान है। वह सभी में समाया हुआ है; वही ‘ब्रह्म’ है।
(2). ॐ अहं ब्रह्माऽस्मि :- मैं ब्रह्म हूँ। यहाँ ‘अस्मि’ शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है। जब जीव परमात्मा का अनुभव कर लेता है, तब वह उसी का रूप हो जाता है। दोनों के मध्य का द्वैत भाव नष्ट हो जाता है। उसी समय वह ‘अहं ब्रह्मास्मि’ कह उठता है।
(3). ॐ तत्त्वमसि :- वह ब्रह्म तुम्हीं हो। सृष्टि के जन्म से पूर्व, द्वैत के अस्तित्त्व से रहित, नाम और रूप से रहित, एक मात्र सत्य-स्वरूप, अद्वितीय ‘ब्रह्म’ ही था। वही ब्रह्म आज भी विद्यमान है। उसी ब्रह्म को ‘तत्त्वमसि’ कहा गया है।
वह शरीर और इन्द्रियों में रहते हुए भी, उनसे परे है। आत्मा में उसका अंश मात्र है। उसी से उसका अनुभव होता है, किन्तु वह अंश परमात्मा नहीं है। वह उससे दूर है। वह सम्पूर्ण जगत में प्रतिभासित होते हुए भी उससे दूर है।
(4). ॐ अयमात्मा ब्रह्म :- यह आत्मा ब्रह्म है। उस स्वप्रकाशित परोक्ष (प्रत्यक्ष शरीर से परे) तत्त्व को ‘अयं’ पद के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। अहंकार से लेकर शरीर तक को जीवित रखने वाली अप्रत्यक्ष शक्ति ही ‘आत्मा’ है। वह आत्मा ही परब्रह्म के रूप में समस्त प्राणियों में विद्यमान है। सम्पूर्ण चर-अचर जगत में तत्त्व-रूप में वह संव्याप्त है। वही ब्रह्म है। वही आत्मतत्त्व के रूप में स्वयं प्रकाशित ‘आत्मतत्त्व’ है।
अन्त में भगवान् शिव शुकदेव से कहते हैं :- "हे शुकदेव! इस सच्चिदानन्द-स्वरूप ‘ब्रह्म’ को, जो तप और ध्यान द्वारा प्राप्त करता है, वह जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है।" भगवान शिव के उपदेश को सुनकर मुनि शुकदेव सम्पूर्ण जगत के स्वरूप परमेश्वर में तन्मय होकर विरक्त हो गये। उन्होंने भगवान् को प्रणाम किया और सम्पूर्ण प्ररिग्रह का त्याग करके तपोवन की ओर चले गये।
साधन पंचकम् :- 
मोक्ष प्राप्ति हेतु ब्रह्म (तत्व) ज्ञान उपलब्धि के सरल उपाय। This is how one can gain Brahm Gyan leading to Moksh.
वेदो नित्यमधीयताम्, तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां,
तेनेशस्य विधीयतामपचितिकाम्ये मतिस्त्यज्यताम्।
पापौघः परिधूयतां भवसुखे दोषोsनुसंधीयतां,
आत्मेच्छा व्यवसीयतां निज गृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम्॥1॥
वेदों का नियमित अध्ययन करें, उनमें कहे गए कर्मों का पालन करें, उस परम प्रभु के नियमों का पालन करें, व्यर्थ के कर्मों में बुद्धि को न लगायें। समग्र पापों को जला दें, इस संसार के सुखों में छिपे हुए दुखों को देखें, आत्म-ज्ञान के लिए प्रयत्नशील रहें, अपने घर की आसक्ति को शीघ्र त्याग दें।
Learn the Veds regularly, follow their tenets, follow the regulations of the God (perform your duties) and do not waste energy (never learn undesirable things) in useless jobs. Get rid of the sins, recognise the hidden pains, sorrow, troubles, intricacies in this universe (& detach from them), prepare your self for enlightenment rejecting the attachment for your home (the Soul should be ready to desert the body without attachment).
संगः सत्सु विधीयतां भगवतो भक्ति: दृढाऽऽधीयतां, शान्त्यादिः परिचीयतां दृढतरं कर्माशु संत्यज्यताम्। सद्विद्वानुपसृप्यतां प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां, ब्रह्मैकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम्॥2॥
सज्जनों का साथ करें, प्रभु में भक्ति को दृढ़ करें, शाँति आदि गुणों का सेवन करें, कठोर कर्मों का परित्याग करें, सत्य को जानने वाले विद्वानों की शरण लें, प्रतिदिन उनकी चरण पादुकाओं की पूजा करें, ब्रह्म के एक अक्षर वाले नाम ॐ के अर्थ पर विचार करें, उपनिषदों के महावाक्यों को सुनें।
Enjoy the company of pious people (learned, enlightened, scholars, Pandits, Philosophers, Sages, Saints), be devoted to the Almighty with firm determination, reject tough tasks (murdering, crime, torturing others, sacrifices), prefer silence, solitude, isolation, shelter-protection under the Almighty-i.e., never speak unnecessarily or utter painful words, look to those who have identified the truth, take part in the sermons, discourses, speeches, preaching by the enlightened, meditate-concentrate in Om ॐ and listen (understand, practice, analyse) the dictates-guidelines of Upnishads.
वाक्यार्थश्च विचार्यतां श्रुतिशिरःपक्षः समाश्रीयतां, दुस्तर्कात् सुविरम्यतां श्रुतिमतस्तर्कोऽनुसंधीयताम्। ब्रम्हास्मीति विभाव्यतामहरहर्गर्वः परित्यज्यताम्, देहेऽहंमति रुझ्यतां बुधजनैर्वादः परित्यज्यताम्॥3॥
वाक्यों के अर्थ पर विचार करें, श्रुति के प्रधान पक्ष का अनुसरण करें, कुतर्कों से दूर रहें, श्रुति पक्ष के तर्कों का विश्लेषण करें, मैं ब्रह्म हूँ ऐसा विचार करते हुए "मैं रुपी अभिमान" का त्याग करें, "मैं शरीर हूँ", इस भाव का त्याग करें, बुद्धिमानों से वाद-विवाद न करें।
Always concentrate over the theme, central idea, roots, gist (nectar, ambrosia) of the enlightenment, avoid unnecessary arguments-logic, contradictions, reject ego-pride by concentrating in the Almighty present in the inner self, never identify yourself with the body, never argue with the intelligent-prudent.
क्षुद्व्याधिश्च चिकित्स्यतां प्रतिदिनं भिक्षौषधं भुज्यतां, स्वाद्वन्नं न तु याच्यतां विधिवशात् प्राप्तेन संतुष्यताम्। शीतोष्णादि विषह्यतां न तु वृथा वाक्यं समुच्चार्यतां, औदासीन्यमभीप्स्यतां जनकृपानैष्ठुर्यमुत्सृज्यताम्॥4॥
भूख को रोग समझते हुए प्रतिदिन भिक्षा रूपी औषधि का सेवन करें, स्वाद के लिए अन्न की याचना न करें, भाग्यवश जो भी प्राप्त हो उसमें ही संतुष्ट रहें। सर्दी-गर्मी आदि विषमताओं को सहन करें, व्यर्थ वाक्य न बोलें, निरपेक्षता की इच्छा करें, लोगों की कृपा और निष्ठुरता से दूर रहें।
Consider hunger as an ailment, survive over the minimum possible food essential to live-subsistence using it as a medicine only, never eat for taste-too much, whatever is available use it-be satisfied with it, try to be neutral-absolute, equanimous, tolerate the perils of summer, winter, rain; never speak-utter useless words, avoid pity-kindness or cruelty of others.
एकान्ते सुखमास्यतां परतरे चेतः समाधीयतां, पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यतां जगदिदं तद्वाधितं दृश्यताम्। प्राक्कर्म प्रविलाप्यतां चितिबलान्नाप्युत्तरैः श्लिश्यतां, प्रारब्धं त्विह भुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थीयताम्॥5॥
एकांत के सुख का सेवन करें, परब्रह्म में चित्त को लगायें, परब्रह्म की खोज करें, इस विश्व को उससे व्याप्त देखें, पूर्व कर्मों का नाश करें, मानसिक बल से भविष्य में आने वाले कर्मों का आलिंगन करें, प्रारब्ध का यहाँ ही भोग करके परब्रह्म में स्थित हो जाएँ।
Prefer isolation, solitude, peaceful environment, concentrate in the Almighty, analyse the Brahm, see how HE pervades the universe, try to vanish the previous accumulated deeds, tolerate-bear the future endeavours (suffering or comforts without attachment or peril) bear the destiny and merge with the absolute-The Ultimate-The Almighty while in this world.
ज्ञेय तत्व अनादी है और परब्रह्म के नाम से जाना जाता है। इसे प्राप्त कर मनुष्य अमृत स्वरुप परमात्मा को प्राप्त होता है। उसे न सत् कहा जाता न असत्, (वह इन दोनों से विलक्षण-अलग है)। उसके सब ओर हाथ-पैर, सब ओर नेत्र, सिर और मुँख हैं तथा सब ओर कान हैं। वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। सब इन्द्रियों से रहित होकर भी वह सब इन्द्रियों को जानने वाला है। सबका धारण-भरण-पोषण करके भी आसक्ति रहित है। गुणों का भोक्ता होकर भी निर्गुण है। वह परमात्मा सब प्राणियों के बाहर और भीतर विद्यमान है। चर-अचर सब उसी के स्वरूप हैं। सूक्ष्म होने के कारण वह अविज्ञेय है। वही निकट है-वही दूर है। यद्यपि वह विभाग रहित है (आकाश की भांति अखंड रूप से सर्वत्र परिपूर्ण है), तथापि भूतों में विभक्त प्रथक्-प्रथक् स्थित हुआ सा प्रतीत होता है। उसे विष्णु रूप से सब प्राणियों का पोषक, रूद्र रूप से सबका संहारक और ब्रह्मा रूप से सबको उत्पन्न करने वाला जानना चाहिये। वह सूर्य आदि ज्योतियों की भी ज्योति (प्रकाशक) है। उसकी स्थिति अज्ञानमय अंधकार से भी परे है। वह परमात्मा ज्ञान स्वरुप जानने के योग्य व
तत्व ज्ञान से प्राप्त होने वाला और सबके ह्रदय में स्थित है।
परमात्मा को कुछ लोग सूक्ष्म बुद्धि द्वारा-ध्यान के द्वारा अपने अन्त:करण में देखते हैं। अन्य लोग साँख्य योग द्वारा व कुछ लोग कर्म योग द्वारा देखते हैं। साधारण मनुष्य स्वयं कुछ न जानते हुए भी दूसरे ज्ञानी पुरुषों से सुनकर ही उपासना करते हैं। ये सत्संग करने वाले लोग भी उपासना माध्यम से संसार सागर को निश्चित ही पार कर जाते हैं।
सत्व गुण से ज्ञान, रजो गुण से लोभ तथा तमो गुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं। गुणों में गुण ही बरतते हैं; ऐसा समझ कर जो स्थिर रहता है, वह अपनी स्थिति से विचलित नहीं होता। जो मान-अपमान, मित्र-शत्रु पक्ष में भी समान भाव रखता है, जिसने कर्तव्य के अभिमान को त्याग दिया है; वह निर्गुण-गुणातीत कहलाता है।
जिसकी जड़ उपर की ओर (परमात्मा) हैं व शाखा नीचे की ओर (ब्रह्मा जी) है, उस संसार रूपी अश्र्वत्थ वृक्ष को अनादी प्रवाह रूप से अविनाशी कहते हैं। वेद उसके पत्ते हैं, जो उस वृक्ष को मूल सहित यतार्थ रूप से जानता है, वही वेद के तात्पर्य को जानने वाला है।
The tree of enlightenment, whose roots are in an upward direction (The Almighty) and the branches are in the downward direction (the Brahm), in imperishable. Ved constitute its leaves-spread. One who knows-identifies this tree, in its real form, is the one who has understood the gist, nectar, elixir, theme of Ved.
जीव और ईश्वर में भेद ::
 जीव और ईश्वर में व्यावहारिक दृष्टि से भेद है। जीवन बद्ध है, ईश्वर नित्य मुक्त है। मुक्त होने पर भी जीव को नित्यमुक्त नहीं कहा जा सकता। नित्यमुक्त होने के कारण ही ईश्वर श्रुति का जनक या आदिगुरु कहा जाता है।
ईश्वर को मायोपहित कहा गया है, क्योंकि माया विक्षेप प्रधान होने के कारण और ईश्वर के अधीन होने के कारण ईश्वर के ज्ञान का आवरण नहीं करती। परन्तु जीव को अज्ञानोपहित कहा गया है, क्योंकि अज्ञान द्वारा जीव का स्वरूप ढँक जाता है।
इसी से कभी-कभी माया और अविद्या में भेद किया जाता है। माया ईश्वर की उपाधि है-सत्व प्रधान है, विक्षेप प्रधान है और अविद्या जीव की उपाधि है, तमस्-प्रधान है और उसमें आवरण विक्षेप होता है।
परमात्म तत्व :: अहम्-अहंकार का त्याग करने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
हानि-लाभ, सुख-दुःख, में समान भाव रखने वाला, भय से मुक्त परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
काम, क्रोध, मद, लोभ-लालच-स्वार्थ-मोह को त्यागने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो तीर्थ यात्रा, धर्म अनुष्ठान, यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ, स्वाध्याय करता है, वह परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो परोपकार, समाज सेवा करता है, वो परमात्म तत्व का हक़दार है।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य उस चेतन को जानना है जो पूर्ण है और जिसका आदि अंत नहीं हैं, जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। जो जड़ भी है और चेतन भी हैं। जो शरीर रहित भी है और शरीर सहित भी है। जिसका रूप है और नहीं भी है।
आत्मा का परमात्मा में लीन होना ही मुक्ति, भक्ति, मोक्ष है।
जिसने स्वयं में स्थित उस आत्मा रूपी परमात्मा को जान लिया है; वह बन्धन मुक्त, ज्ञानी, समदर्शी, ब्रह्म में लीन है, समता प्राप्त जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
स्वः धर्म, वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाला, कर्म-कर्तव्य, दायित्व से मुँह न मोड़ने वाला ब्रह्म मार्ग का अनुयायी है।
प्राणियों पर दया भाव रखने वाला, परोपकारी परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
मन, इन्द्रियों, वाणी, इच्छाओं पर काबू करने वाला मोक्ष का अधिकारी है।
त्यागी, वैरागी, संतुष्ट-संतोषी, आत्म संयमी, आत्म दर्शी है।
उसे सुख दुःख, जन्म-मृत्यु, हानि-लाभ, समस्त प्राणियों के प्रति समता प्राप्त है।
वह निर्लिप्त-सत्यनिष्ठ है।
उसने परमात्मा की शरण ग्रहण कर ली है।
वो निर्द्वन्द है।
वो सेवा निष्ठ-समाजसेवी, परमार्थी है।
जो माता-पिता-गुरु-जन, वृद्ध, दीन-हीन, प्रताड़ित की मदद-सेवा-सहायता करता है वो परमात्म तत्व का अनुरागी है।
जो अन्याय, दुराचार, अनाचार, अत्याचार से दूर से और इनका मुकाबला करता है, वह धर्मनिष्ठ है।
तत्वज्ञान अथवा अज्ञान का नाश एक बार ही होता है और सदा के लिए होता है। तत्वज्ञान की आवृति नहीं होती। ज्ञान की स्वतंत्र सतत है ही नहीं। बोध का अनादर-तिरस्कार करने से असत् को ग्रहण किया जाता है। असत् को महत्व देने से विवेक जाता है। बोध एक बार ही होगा और सदा के लिए होगा। तत्वज्ञान होने पर मोह नहीं होगा। जगत जीव के अन्तर्गत और जीव परमात्मा के अंतर्गत है। साधक पहले जगत को अपने में देखता है, फिर स्वयं में परमात्मा को देखता है। आत्मज्ञान ज्ञान और परमात्मज्ञान विज्ञान है। आत्मज्ञान में निज आनन्द है और परमात्मज्ञान में परमानन्द है। लौकिक निष्ठा से कर्मयोग तथा ज्ञान योग से आत्मज्ञान होता है और अलौकिक निष्ठा से भक्तियोग जिससे परमात्मज्ञान का अनुभव होता है।
आत्म ज्ञान से मुक्ति तो होती है परन्तु अहंम्-अहंकार रह जाता है। आत्म ज्ञान से अहंकार भी मिटाया जा सकता है।
One who is relinquished, content-satisfied, sees the Almighty in himself, exerts control over himself, his desires is entitled for Liberation.
Sole aim of the incarnation as a human being is to realise, find-understand that conscious, which is complete, has no end-is infinite, which is free from birth and the death. It is static-inertial and conscious as well. It is with the body-shape and size and otherwise as well. It has infinite shapes, figures, forms, faces, features.
Assimilation of the soul in the Almighty is Liberation-Salvation, Moksh, like a drop of water which falls in the ocean becomes ocean, a dust particle which falls over the earth from the space-sky becomes earth.
One who has identified-recognized the Almighty present in him self in the form of soul is detached-relinquished. He is free from bonds, ties, illusion, attachments, affections, affliction. He is enlightened having attained equanimity, assimilated-absorbed in the Ultimate.
One (The relinquished, Soul) is free from the clutches-ties of birth and death.
One is not perturbed by the loss-gain, pleasure-pain. He weighs them equally. He is free from fear and deserve association with the God.
One who follows his duties religiously, follows the Varnashram Dharm, keep on performing his duties, responsibilities, liabilities; is a follower of the Brahm-the Ultimate.
One (beneficent, philanthropist, altruist) who takes pity over the living beings is entitled for the blessings of the Almighty.
One has control over his senses, sense organs, sensuality, is entitled for Salvation.
One who is relinquished, content-satisfied, sees the Almighty in himself, exerts control over himself, his desires & is entitled for Liberation.
BRAHM :: The basic element-component exists since the very beginning and is known as Brahm. One attains HIM-merges with HIM: the Almighty-Ultimate Par Brahm Parmeshwar. HE is neither Sat or Asat (HE is different-distinguished from these two). HE has mouth, head, eyes, ears, hand, legs pervading all over, in all directions. Everything is contained in HIM. HE is stable with all these. HE does not possess sense organs, still HE recognises them all. HE is unattached even though, HE HIMSELF takes care of each and every organism, creature, living being. HE is the creator of all characteristics, traits, qualities, factors, properties and still is free from specific characters. HE is present in the creature both internally as well as externally. Variables or fixed, are all HIS incarnations-Avtars. Being microscopic HE is undistinguished. HE is close to one, yet maintains distance as well. HE is complete like the sky every where. HE appears to be different, due to different incarnations, during the past. In the form of Vishnu HE cares, maintains, nurtures us all, in the form of Rudr-Shiv HE is the destroyer and as Brahma HE is the one who created all. HE lights the stars like the Sun. HE exists away from the darkness of imprudence-ignorance. HE is reached-achieved through enlightenment, philosophy, learning, devotion.
ब्रह्म ::
 जिसे पारमार्थिक कहा जाता है, जिसका कभी भी ज्ञान नहीं होता, जो नित्य है, जिसका ज्ञान होने से जगत का बोध हो जाता है और मुक्ति प्राप्त हो जाती है; वही ब्रह्म है।
जीव वास्तव में ब्रह्म ही है, दूसरा कुछ नहीं, शरीर धारण के कारण वह भिन्न प्रतीत होता है।
शरीर के तीन प्रकार :: स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर। अनादि प्रवाह के अधीन होकर कर्मफल को भोगने के लिए शरीर धारण करना पड़ता है।
कर्म अविद्या के कारण होते हैं। अत: शरीर धारण अविद्या के ही कारण है। इसे ही बंधन कहते हैं। अविद्या के कारण कर्तृत्वाभिमान और भोक्तृत्वाभिमान पैदा होता है, जो आत्मा में स्वभावत: नहीं होता।
जब कर्तृत्वाभिमान और भोक्तृत्वाभिमान से युक्त होता है, तब आत्मा जीव कहलाता है। मुक्त होने पर जीव ब्रह्म से एकारता प्राप्त करता है या उसका अनुभव करता है।
आत्मा और ब्रह्म की एकता अथवा अभिन्नत्व :: ‘तत्वमसी’ (तुम वही हो)। इसी कारण से ज्ञान होने पर ‘सोऽहमस्मि’ (मैं वही हूँ) का अनुभव होता है। जाग्रत अवस्था में स्थूल शरीर, स्वप्न में सूक्ष्म शरीर और सुषुप्ति में कारण शरीर रहता है।[उपनिषद]
सुषुप्ति में चेतना भी रहती है, परन्तु विषयों का ज्ञान न होने के कारण जान पड़ता है कि सुषुप्ति में चेतना नहीं रहती। यदि सुषुप्ति में चेतना न होती तो जागने पर मनुष्य कैसे कहता कि "सुख पूर्वक सोया"?
वहाँ चेतना साक्षीरूप या शुद्ध चैतन्य रूप है। परन्तु सुषुप्ति में अज्ञान रहता है। इसी से शुद्ध चेतना के रहते हुए भी सुषुप्ति मुक्ति से भिन्न है। मुक्ति की अवस्था में अज्ञान का नाश हो जाता है। शुद्ध चैतन्य रूप होने के कारण ही आत्मा एक है और ब्रह्मस्वरूप है।
चेतना का विभाजन नहीं हो सकता है। जीवात्मा अनेक हैं, परन्तु आत्मा एक है, यह दिखाने के लिए उपमाओं का प्रयोग होता है। जैसे आकाश एक है, परन्तु सीमित होने के कारण घट या घटाकाश अनेक दिखाई पड़ता है, अथवा सूर्य एक है, किन्तु उसकी परछाई अनेक स्थलों में दिखाई पड़ने से वह अनेक दिखाई पड़ता है, इसी प्रकार यद्यपि आत्मा एक है, फिर भी माया या अविद्या के कारण अनेक दिखाई पड़ता है।
ब्रह्म ज्ञान :: सच्चिदानन्द स्वरूप श्री कृष्ण सनातन हैं। वे सारे जगत के कारण रूप प्रधान और पुरुष के भी नियामक परमेश्वर हैं। इस जगत के आधार, निर्माता और निर्माण सामग्री तथा स्वामी वे ही हैं। उनकी क्रीड़ा के हेतु  ही जगत का निर्माण हुआ है। यह जिस समय, जिस रूप में जो कुछ रहता है-होता है, वह ये परमेश्वर ही हैं। इस जगत में प्रकृति-रूप से भोग्य और पुरुष रूप से भोक्ता तथा दोनों से परे दोनों के नियामक साक्षात भगवान् भी ये ही हैं। इन्द्रियातीत! जन्म, अस्तित्व आदि भाव विकारों से रहित परमात्मा ने ही इस चित्र-विचित्र जगत का निर्माण किया है। और इसमें इन्होंने ही आत्मा रूप से प्रवेश भी किया है। वे ही प्राण-क्रिया शक्ति और जीव-ज्ञान शक्ति के रूप में इसका पालन पोषण कर रहे हैं। क्रिया शक्ति प्रधान प्राण आदि में जो जगत की वस्तुओं की सृष्टि करने की सामर्थ्य है, वह उन वस्तुओं की नहीं; अपितु इनकी सामर्थ्य ही है। क्योंकि वे परमात्मा के समान चेतन नहीं अपितु अचेतन हैं; स्वतंत्र नहीं परतंत्र हैं। उन चेष्टाशील प्राण आदि में केवल चेष्टा मात्र होती है, शक्ति नहीं। शक्ति तो प्रभु की ही है। चन्द्रमा की कांति, अग्नि का तेज, सूर्य की प्रभा, नक्षत्र और विद्युत आदि की स्फुरण रूप से सत्ता, पर्वतों की स्थिरता, पृथ्वी की साधारण शक्ति रूप वृत्ति और गंध रूप गुण-ये सब प्रभु ही हैं। जल में तृप्त करने, जीवन देने और शुद्ध करने की जो शक्तियाँ हैं, वे परमात्मा के स्वरूप ही हैं। जल और उसका रस भी वही हैं। इन्द्रिय शक्ति, अन्तःकरण की शक्ति, शरीर की शक्ति, उसका हिलना-डुलना, चलना-फिरना-ये सब वायु की शक्तियाँ उन्हीं की हैं। दिशाएं और उनके आकाश भी वही हैं। आकाश और उसका आश्रय भूत स्फोट-शब्द तन्मात्रा या परा वाणी, नाद-पश्यन्ति, ओंकार-मध्यमा तथा वर्ण (अक्षर) एवं पदार्थों का अलग-अलग निर्देश करने वाले पद, रूप, वैखरी वाणी भी वे ही हैं।  इन्द्रियाँ और उनकी विषय प्रकाशिनी शक्ति और अधिष्ठातृ-देवता, वे ही हैं। बुद्धि की निश्चयात्मिका शक्ति और जीव की विशुद्ध स्मृति भी वे ही हैं। भूतों में उनका कारण तामस अहँकार, इन्द्रियों में उनका कारण तैजस अहँकार और इन्द्रियों के अधिष्ठातृ-देवताओं में उनका कारण सात्विक अहँकार तथा जीवों के आवागमन का कारण माया भी वे ही हैं। जैसे मिट्टी आदि वस्तुओं के विकार घड़ा, वृक्ष आदि में मिट्टी निरन्तर वर्तमान है और वास्तव में वे कारण-मृतिका रूप ही हैं-उसी प्रकार जितने भी विनाशवान पदार्थ हैं, उनमें कारण रूप से अविनाशी तत्व परमात्मा ही हैं। वास्तव में वे उनके ही रूप हैं। सत्व, रज और तम-ये तीनों गुण और उनकी वृत्तियाँ, परिमाण, महत्तत्त्वादि परब्रह्म परमात्मा में वे ही माया द्वारा कल्पित हैं। जितने भी जन्म, अस्ति, वृद्धि, परिणाम आदि भाव-विकार हैं, वे प्रभु से सर्वथा अलग नहीं हैं। जब इनमें प्रभु की कल्पना कर ली जाती है, तब वे ही इन विकारों के अनुगत जान पड़ते हैं। कल्पना की निवृति हो जाने पर निर्विकल्प परमार्थ स्वरूप वे ही रह जाते हैं। यह जगत सत्व, रज और तम-इन तीनों गुणों का प्रवाह हैं; देह, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण, सुख, दुःख और राग-लोभादि उन्हीं के कार्य हैं। इनमें जो अज्ञानी परमात्मा का सर्वात्मा सूक्ष्म स्वरूप नहीं जानते, वे अपने देहाभिमानरूप ज्ञान के कारण ही कर्मों के फंदे में फंसकर बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटकते हैं। मनुष्य को प्रारब्ध के अनुसार इन्द्रियादि के सामर्थ्य से युक्त अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है। किन्तु माया वश वह असावधान हो जाता है और स्वार्थ-परमार्थ से ही असावधान होकर सारी उम्र बिता देता है। मनुष्य को शरीर के सम्बन्धी, अहंता एवं  ममता रूप स्नेह के फंदे से प्रभु ने ही बाँध रखा है। वे अजन्मा हैं, फिर भी अपने बनाई हुई मर्यादा की रक्षा करने के लिए वे अवतार ग्रहण करते हैं। वे अनन्त और एकरस सत्ता हैं।[श्रीमद्भागवत 85.3.20]
ज्ञान :: ज्ञान एक ऐसी चीज है, इसे जितना ग्रहण करो उतना ही कम है। ज्ञान कभी से भी मिले उसे ग्रहण करने में पीछे नहीं हटना चाहते है। इसी ज्ञान से बुद्धि, नई दिशा मिलती है। ज्ञान है तो कोई भी चीज कठिन नहीं रह जाती है। अगर कोई बुरा व्यक्ति ज्ञान को अच्छा समझ उसे अपने चरित्र में धारण कर ले, तो उसकी पूरी जिंदगी बदल जाएगी। ज्ञान सिर्फ सुनने तक ही सीमित नहीं है, उसे अपने आचार-विचार, व्यवहार व जीवन में उतारने पर ही अपने लक्ष्य को आसानी से पा सकते हैं। इसलिए यह कभी भी मिले इसे बिना संकोच धारण कर लेना चाहिए।
सब भूतों में एक परमात्मा का ज्ञान सात्विक, भेद ज्ञान राजस और अतात्विक ज्ञान तामस है।
ज्ञानी :: अभिमान शून्यता, दंभ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अंत:करण की स्थिरता, मन, इन्द्रिय एवं शरीर का निग्रह, विषय भोगों में आस्तिकता का अभाव, अहंकार का न होना, जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग आदि में दुःख रूप दोष का बारम्बार विचार करना, पुत्र, स्त्री और गृह आदि में अनासक्ति और ममता का अभाव, प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही समान चित्त रहना (हर्ष, शोक के वशीभूत न होना) परमेश्वर की अनन्य भाव से अविचलित भक्ति का होना, पवित्र एवं एकांत स्थान में रहने का स्वभाव, विषयी मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का अभाव, अध्यात्म-ज्ञान में स्थित तथा तत्व-ज्ञान स्वरुप परमेश्वर का निरंतर चिंतन-दर्शन; यह सब ज्ञान है व इसके विपरीत अज्ञान।
परमात्मा को कुछ लोग सूक्ष्म बुद्धि द्वारा-ध्यान के द्वारा अपने अन्त:करण में देखते हैं। अन्य लोग साँख्य योग द्वारा व कुछ लोग कर्म योग द्वारा देखते हैं। साधारण मनुष्य स्वयं कुछ न जानते हुए भी दूसरे ज्ञानी पुरुषों से सुनकर ही उपासना करते हैं। ये सत्संग करने वाले लोग भी उपासना माध्यम से संसार सागर को निश्चित ही पार कर जाते हैं।
परमात्म तत्व :: अहम्-अहंकार का त्याग करने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
हानि-लाभ, सुख-दुःख, में समान भाव रखने वाला, भय से मुक्त परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
काम, क्रोध, मद, लोभ-लालच-स्वार्थ-मोह को त्यागने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो तीर्थ यात्रा, धर्म अनुष्ठान, यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ, स्वाध्याय करता है, वह परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो परोपकार, समाज सेवा करता है, वो परमात्म तत्व का हक़दार है।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य उस चेतन को जानना है जो पूर्ण है और जिसका आदि अंत नहीं हैं, जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। जो जड़ भी है और चेतन भी हैं। जो शरीर रहित भी है और शरीर सहित भी है। जिसका रूप है और नहीं भी है।
आत्मा का परमात्मा में लीन होना ही मुक्ति, भक्ति, मोक्ष है।
जिसने स्वयं में स्थित उस आत्मा रूपी परमात्मा को जान लिया है; वह बन्धन मुक्त, ज्ञानी, समदर्शी, ब्रह्म में लीन है, समता प्राप्त जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
स्वः धर्म, वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाला, कर्म-कर्तव्य, दायित्व से मुँह न मोड़ने वाला ब्रह्म मार्ग का अनुयायी है।
प्राणियों पर दया भाव रखने वाला, परोपकारी परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
मन, इन्द्रियों, वाणी, इच्छाओं पर काबू करने वाला मोक्ष का अधिकारी है।
त्यागी, वैरागी, संतुष्ट-संतोषी, आत्म संयमी, आत्म दर्शी है।
उसे सुख दुःख, जन्म-मृत्यु, हानि-लाभ, समस्त प्राणियों के प्रति समता प्राप्त है।
वह निर्लिप्त-सत्यनिष्ठ है।
उसने परमात्मा की शरण ग्रहण कर ली है।
वो निर्द्वन्द है।
वो सेवा निष्ठ-समाजसेवी, परमार्थी है।
जो माता-पिता-गुरु-जन, वृद्ध, दीन-हीन, प्रताड़ित की मदद-सेवा-सहायता करता है वो परमात्म तत्व का अनुरागी है।
जो अन्याय, दुराचार, अनाचार, अत्याचार से दूर से और इनका मुकाबला करता है, वह धर्मनिष्ठ है।
तत्वज्ञान अथवा अज्ञान का नाश एक बार ही होता है और सदा के लिए होता है। तत्वज्ञान की आवृति नहीं होती। ज्ञान स्वतंत्र सतत है। बोध का अनादर-तिरस्कार करने से असत् को ग्रहण किया जाता है। असत् को महत्व देने से विवेक जाता है। बोध एक बार और सदा के लिए होगा। तत्वज्ञान होने पर मोह नहीं होगा। जगत जीव के अन्तर्गत और जीव परमात्मा के अंतर्गत है। साधक पहले जगत को अपने में देखता है, फिर स्वयं में परमात्मा को देखता है। आत्मज्ञान ज्ञान और परमात्म ज्ञान विज्ञान है। आत्मज्ञान में निज आनन्द है और परमात्म ज्ञान में परमानन्द है। लौकिक निष्ठा से कर्मयोग तथा ज्ञान योग से आत्म ज्ञान होता है और अलौकिक निष्ठा से भक्ति योग जिससे परमात्म ज्ञान का अनुभव होता है।
आत्म ज्ञान से मुक्ति तो होती है परन्तु अहंम्-अहंकार रह जाता है। आत्म ज्ञान से अहंकार भी मिटाया जा सकता है।
ब्रह्म :: जिसे पारमार्थिक कहा जाता है, जिसका कभी भी पूर्ण ज्ञान नहीं होता, जो नित्य है, जिसका ज्ञान होने से जगत का बोध हो जाता है और मुक्ति प्राप्त हो जाती है; वही ब्रह्म है।
परब्रह्म :: ज्ञेय तत्व अनादी है और परब्रह्म के नाम से जाना जाता है। इसे प्राप्त कर मनुष्य अमृत स्वरुप परमात्मा को प्राप्त होता है। उसे न सत् कहा जाता न असत्, (वह इन दोनों से विलक्षण-अलग है)। उसके सब ओर हाथ-पैर, सब ओर नेत्र, सिर और मुँख हैं तथा सब ओर कान हैं। वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। सब इन्द्रियों से रहित होकर भी वह सब इन्द्रियों को जानने वाला है। सबका धारण-भरण-पोषण करके भी आसक्ति रहित है। गुणों का भोक्ता होकर भी निर्गुण है। वह परमात्मा सब प्राणियों के बाहर और भीतर विद्यमान है। चर-अचर सब उसी के स्वरूप हैं। सूक्ष्म होने के कारण वह अविज्ञेय है। वही निकट है-वही दूर है। यद्यपि वह विभाग रहित है (आकाश की भांति अखंड रूप से सर्वत्र परिपूर्ण है), तथापि भूतों में विभक्त प्रथक-प्रथक स्थित हुआ सा प्रतीत होता है। उसे विष्णु रूप से सब प्राणियों का पोषक, रूद्र रूप से सबका संहारक और ब्रह्मा रूप से सबको उत्पन्न करने वाला जानना चाहिये। वह सूर्य आदि ज्योतियों की भी ज्योति (प्रकाशक) है। उसकी स्थिति अज्ञानमय अंधकार से भी परे है। वह परमात्मा ज्ञान स्वरुप जानने के योग्य व तत्व ज्ञान से प्राप्त होने वाला और सबके ह्रदय में स्थित है।
सत्व गुण से ज्ञान, रजो गुण से लोभ तथा तमो गुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं। गुणों में गुण ही बरतते हैं; ऐसा समझ कर जो स्थिर रहता है, वह अपनी स्थिति से विचलित नहीं होता। जो मान-अपमान, मित्र-शत्रु पक्ष में भी समान भाव रखता है, जिसने कर्तव्य के अभिमान को त्याग दिया है; वह निर्गुण-गुणातीत कहलाता है।
जिसकी जड़ उपर की ओर (परमात्मा) हैं व शाखा नीचे की ओर (ब्रह्मा जी) है, उस संसार रूपी अश्र्वत्थ वृक्ष को अनादी प्रवाह रूप से अविनाशी कहते हैं। वेद उसके पत्ते हैं, जो उस वृक्ष को मूल सहित यतार्थ रूप से जानता है, वही वेद के तात्पर्य को जानने वाला है।
ब्रह्म तत्व ज्ञान का अधिकारी :: अहम्-अहंकार का त्याग करने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
हानि-लाभ, सुख-दुःख, में समान भाव रखने वाला, भय से मुक्त परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
काम, क्रोध, मद, लोभ-लालच-स्वार्थ-मोह को त्यागने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो तीर्थ यात्रा, धर्म अनुष्ठान, यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ, स्वाध्याय करता है, वह परमात्म तत्व का अधिकारी है।
जो परोपकार, समाज सेवा करता है, वो परमात्म तत्व का हक़दार है।
मनुष्य जीवन का उद्देश्य उस चेतन को जानना है जो पूर्ण है और जिसका आदि अंत नहीं हैं, जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। जो जड़ भी है और चेतन भी हैं। जो शरीर रहित भी है और शरीर सहित भी है। जिसका रूप है और नहीं भी है।
आत्मा का परमात्मा में लीन होना ही मुक्ति, भक्ति, मोक्ष है।
जिसने स्वयं में स्थित उस आत्मा रूपी परमात्मा को जान लिया है; वह बन्धन मुक्त, ज्ञानी, समदर्शी, ब्रह्म में लीन है, समता प्राप्त जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
स्वः धर्म, वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाला, कर्म-कर्तव्य, दायित्व से मुँह न मोड़ने वाला ब्रह्म मार्ग का अनुयायी है।
प्राणियों पर दया भाव रखने वाला, परोपकारी परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
मन, इन्द्रियों, वाणी, इच्छाओं पर काबू करने वाला मोक्ष का अधिकारी है।
वह त्यागी, वैरागी, संतुष्ट-संतोषी, आत्म संयमी, आत्म दर्शी है।
उसे सुख दुःख, जन्म-मृत्यु, हानि-लाभ, समस्त प्राणियों के प्रति समता प्राप्त है। वह निर्लिप्त-सत्यनिष्ठ है। उसने परमात्मा की शरण ग्रहण कर ली है। वो निर्द्वन्द है। वो सेवा निष्ठ-समाजसेवी, परमार्थी है।
जो माता-पिता-गुरु-जन, वृद्ध, दीन-हीन, प्रताड़ित की मदद-सेवा-सहायता करता है, वो परमात्म तत्व का अनुरागी है।
जो अन्याय, दुराचार, अनाचार, अत्याचार से दूर से और इनका मुकाबला करता है, वह धर्मनिष्ठ है।
तत्व ज्ञान अथवा अज्ञान का नाश एक बार ही होता है और सदा के लिए होता है। तत्व ज्ञान की आवृति नहीं होती। ज्ञान की स्वतंत्र सतत है ही नहीं। बोध का अनादर-तिरस्कार करने से असत् को ग्रहण किया जाता है। असत् को महत्व देने से विवेक जाता है। बोध एक बार ही होगा और सदा के लिए होगा। तत्वज्ञान होने पर मोह नहीं होगा। जगत जीव के अन्तर्गत और जीव परमात्मा के अंतर्गत है। साधक पहले जगत को अपने में देखता है, फिर स्वयं में परमात्मा को देखता है। आत्मज्ञान ज्ञान और परमात्म ज्ञान विज्ञान है। आत्मज्ञान में निज आनन्द है और परमात्म ज्ञान में परमानन्द है। लौकिक निष्ठा से कर्मयोग तथा ज्ञान योग से आत्मज्ञान होता है और अलौकिक निष्ठा से भक्तियोग जिससे परमात्म ज्ञान का अनुभव होता है।
आत्म ज्ञान से मुक्ति तो होती है परन्तु अहंम्-अहंकार रह जाता है। आत्म ज्ञान से अहंकार भी मिटाया जा सकता है।
मनुष्य को सदा उस परमेश्वर का, जिसके चरण-कमल निरन्तर भजने योग्य हैं, के गुणों का आश्रय लेने वाली भक्ति के द्वारा, सब प्रकार से: मन, वाणीं और शरीर से; भजन करना चाहिये। उनको समर्पित भक्ति योग तुरंत ही संसार से वैराग्य और ब्रह्म साक्षात्कार रूप ज्ञान की प्राप्ति करा देता है। सभी विषय भगवद् रूप होने के कारण समान हैं। अतः जब इन्द्रियों की वृत्तियों के द्वारा भी भगवद्भक्त का चित्त उनमें प्रिय-अप्रिय रूप विषमता का अनुभव नहीं करता-सर्वत्र भगवान् का ही दर्शन करता है-उसी समय वह सङ्ग रहित, सबमें समान रूप से स्थित, त्याग और ग्रहण करने योग्य, दोष और गुणों से रहित, अपनी महिमा में आरूढ़ अपने आत्मा का ब्रह्म रूप से साक्षात्कार करता है। वही ज्ञान स्वरूप है, वही परब्रह्म है, वही परमात्मा है, वही ईश्वर है, वही पुरुष है; वही एक भगवान् स्वयं जीव, शरीर, विषय, इन्द्रियों आदि अनेक रूपों में प्रतीत होता है।
सम्पूर्ण संसार में आसक्ति का अभाव हो जाना, बस यही योगियों के सब योग साधन का एक मात्र अभीष्ट फल है। ब्रह्म एक है, ज्ञान स्वरूप और निर्गुण है, तो भी वह बाह्य वृतियों वाली इन्द्रियों के द्वारा भ्रान्ति वश शब्दादि, धर्मों वाले विभिन्न-पदार्थों के रूप में भास रहा है। जिस प्रकार एक ही परब्रह्म महत्त्व, वैकारिक, राजस और तामस, तीन प्रकार का अहंकार, पञ्च महाभूत एवं ग्यारह इन्द्रिय रूप बन गया और फिर वही स्वयं प्रकाश इनके संयोग से जीव कहलाया, उसी प्रकार उस जीव का शरीर रूप यह ब्रह्माण्ड भी वस्तुतः ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्म से ही इसकी उत्पत्ति हुई है। इसे ब्रह्म रूप में वही देख सकता है, जो श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य तथा निरन्तर योगाभ्यास के द्वारा एकाग्र चित्त और असंग बुद्धि हो गया है।
इस ज्ञान के माध्यम से प्रकृति और पुरुष के यथार्थ स्वरूप का बोध हो जाता है। निर्गुण ब्रह्म विषयक ज्ञान योग और परमेश्वर के प्रति भक्ति योग का फल एक ही है।
तत्व वेत्ता ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित अखण्ड अद्वितीय सच्चिदानन्द स्वरूप ज्ञान को ही तत्व कहते हैं। उसी को कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा और कोई भगवान्, परमेश्वर, परब्रह्म के नाम से पुकारते हैं।[श्रीमद्भागवत 2.1.11]
ब्रह्म ज्ञान :: सच्चिदानन्द स्वरूप श्री कृष्ण सनातन हैं। वे सारे जगत के कारण रूप प्रधान और पुरुष के भी नियामक परमेश्वर हैं। इस जगत के आधार, निर्माता और निर्माण सामग्री तथा स्वामी वे ही हैं। उनकी क्रीड़ा के हेतु ही जगत का निर्माण हुआ है। यह जिस समय, जिस रूप में जो कुछ रहता है-होता है, वह ये परमेश्वर ही हैं। इस जगत में प्रकृति-रूप से भोग्य और पुरुष रूप से भोक्ता तथा दोनों से परे दोनों के नियामक साक्षात भगवान् भी ये ही हैं। इन्द्रियातीत! जन्म, अस्तित्व आदि भाव विकारों से रहित परमात्मा ने ही इस चित्र-विचित्र जगत का निर्माण किया है। और इसमें इन्होंने ही आत्मा रूप से प्रवेश भी किया है। वे ही प्राण-क्रिया शक्ति और जीव-ज्ञान शक्ति के रूप में इसका पालन पोषण कर रहे हैं। क्रिया शक्ति प्रधान प्राण आदि में जो जगत की वस्तुओं की सृष्टि करने की सामर्थ्य है, वह उन वस्तुओं की नहीं; अपितु इनकी सामर्थ्य ही है। क्योंकि वे परमात्मा के समान चेतन नहीं अपितु अचेतन हैं; स्वतंत्र नहीं परतंत्र हैं। उन चेष्टाशील प्राण आदि में केवल चेष्टा मात्र होती है, शक्ति नहीं। शक्ति तो प्रभु की ही है। चन्द्रमा की कांति, अग्नि का तेज, सूर्य की प्रभा, नक्षत्र और विद्युत आदि की स्फुरण रूप से सत्ता, पर्वतों की स्थिरता, पृथ्वी की साधारण शक्ति रूप वृत्ति और गंध रूप गुण-ये सब प्रभु ही हैं। जल में तृप्त करने, जीवन देने और शुद्ध करने की जो शक्तियाँ हैं, वे परमात्मा के स्वरूप ही हैं। जल और उसका रस भी वही हैं। इन्द्रिय शक्ति, अन्तःकरण की शक्ति, शरीर की शक्ति, उसका हिलना-डुलना, चलना-फिरना-ये सब वायु की शक्तियाँ उन्हीं की हैं। दिशाएं और उनके आकाश भी वही हैं। आकाश और उसका आश्रय भूत स्फोट-शब्द तन्मात्रा या परा वाणी, नाद-पश्यन्ति, ओंकार-मध्यमा तथा वर्ण (अक्षर) एवं पदार्थों का अलग-अलग निर्देश करने वाले पद, रूप, वैखरी वाणी भी वे ही हैं। इन्द्रियाँ और उनकी विषय प्रकाशिनी शक्ति और अधिष्ठातृ-देवता, वे ही हैं। बुद्धि की निश्चयात्मिका शक्ति और जीव की विशुद्ध स्मृति भी वे ही हैं। भूतों में उनका कारण तामस अहँकार, इन्द्रियों में उनका कारण तैजस अहँकार और इन्द्रियों के अधिष्ठातृ-देवताओं में उनका कारण सात्विक अहँकार तथा जीवों के आवागमन का कारण माया भी वे ही हैं। जैसे मिट्टी आदि वस्तुओं के विकार घड़ा, वृक्ष आदि में मिट्टी निरन्तर वर्तमान है और वास्तव में वे कारण-मृतिका रूप ही हैं-उसी प्रकार जितने भी विनाशवान पदार्थ हैं, उनमें कारण रूप से अविनाशी तत्व परमात्मा ही हैं। वास्तव में वे उनके ही रूप हैं। सत्व, रज और तम-ये तीनों गुण और उनकी वृत्तियाँ, परिमाण, महत्तत्त्वादि परब्रह्म परमात्मा में वे ही माया द्वारा कल्पित हैं। जितने भी जन्म, अस्ति, वृद्धि, परिणाम आदि भाव-विकार हैं, वे प्रभु से सर्वथा अलग नहीं हैं। जब इनमें प्रभु की कल्पना कर ली जाती है, तब वे ही इन विकारों के अनुगत जान पड़ते हैं। कल्पना की निवृति हो जाने पर निर्विकल्प परमार्थ स्वरूप वे ही रह जाते हैं। यह जगत सत्व, रज और तम-इन तीनों गुणों का प्रवाह हैं; देह, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण, सुख, दुःख और राग-लोभादि उन्हीं के कार्य हैं। इनमें जो अज्ञानी परमात्मा का सर्वात्मा सूक्ष्म स्वरूप नहीं जानते, वे अपने देहाभिमानरूप ज्ञान के कारण ही कर्मों के फंदे में फंसकर बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटकते हैं। मनुष्य को प्रारब्ध के अनुसार इन्द्रियादि के सामर्थ्य से युक्त अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है। किन्तु माया वश वह असावधान हो जाता है और स्वार्थ-परमार्थ से ही असावधान होकर सारी उम्र बिता देता है। मनुष्य को शरीर के सम्बन्धी, अहंता एवं ममता रूप स्नेह के फंदे से प्रभु ने ही बाँध रखा है। वे अजन्मा हैं, फिर भी अपने बनाई हुई मर्यादा की रक्षा करने के लिए वे अवतार ग्रहण करते हैं। वे अनन्त और एकरस सत्ता हैं।[श्रीमद्भागवत 85.3.20]
ULTIMATE KNOWLEDGE  ब्रह्म ज्ञान-परमात्म तत्व ALMIGHTY-THE GOD (2) GIST-EXTRACT
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ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥
जिससे अर्पण किया जाये (स्त्रुक्, स्त्रुवा) वे पात्र ब्रह्म है, यज्ञ में अर्पित हव्य पदार्थ (तिल, जौ, घी, आदि) द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रूपी कर्ता द्वारा ब्रह्म रूपी अग्नि में आहुति रूपी क्रिया भी ब्रह्म है, ऐसे यज्ञ को करने वाले जिस मनुष्य की ब्रह्म में ही कर्म-समाधि हो गई है, उसके द्वारा प्राप्त करने योग्य फल भी ब्रह्म ही है।श्रीमद् भगवद्गीता 4.24]  
Offerings-sacrifices, pots (instruments, implements) in a Yagy (Hawan, Agnihotr, sacred scarifies in holy fire) are Brahm, materials sacrificed in Agnihotr-sacrificial fire constitute Brahm, one who is making sacrifice-oblation in the fire, sacrifice and the sacrificial fire too, is Brahm and one who has attained Karm Samadhi in the Brahm, output, result-rewards obtained out of this Hawan-sacrifice by the performer too constitute Brahm-the Ultimate.
यज्ञ में अग्नि रूप हुई आहुति मुख्य है। सभी साधन साध्य रूप होने पर यज्ञ बनते हैं। यज्ञ में परमात्म तत्व वास्तविकता है। यज्ञ कर्ता के सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं। अर्पण की क्रिया, पदार्थ, आहुति देने वाला, अग्नि और आहुति देने की क्रिया ब्रह्म ही हैं। कर्ता को ब्रह्म में ही कर्म समाधि अनुभव होती है अर्थात उसकी सभी कर्मों में ब्रह्म बुद्धि होती है। उसके सम्पूर्ण कर्म ब्रह्म रूप हो जाते हैं। उसे फल के रूप में भी ब्रह्म की ही उपलब्धि होती है। उसकी दृष्टि में सिवाय ब्रह्म के अन्य किसी की भी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। 
Sacrificial fire is the main component of the Yagy (Hawan, Agnihotr). Sacrifices offered, turn into eternal fire. All means pertaining to Yagy Karm turn into (Assimilate into the Ultimate, Eternal, the Almighty). All actions of the devotee-performer turn into non actions, leading him to freedom from birth and death i.e., Moksh. 
All functions (offerings, oblations, materials, performer, sacrificial fire) and the processes too turn into Brahm. The doer finds Brahm Samadhi in his actions-process. He receives the out put of the Yagy in the form of Brahm, it self. He do not find any thing independent, other than the Brahm.
यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥
हे पाण्डव अर्जुन! जिस तत्वज्ञान-परमात्व का अनुभव कर-जान कर, तुम फिर कभी इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे। जिस तत्व ज्ञान द्वारा तुम सम्पूर्ण प्राणियों-भूतों को निःशेष भाव से पहले अपने में और फिर मुझ सच्चिदानंद घन परमात्मा में देखोगे।[श्रीमद् भगवद्गीता 4.35] 
O Pandav Arjun! One will not be deluded by experiencing the gist of that Ultimate knowledge, enlightenment. He can first see-perceive all beings in himself and then in the Almighty.
महापुरुष, ज्ञानी सामान्य जनों, जिज्ञासुओं को तत्वज्ञान-परमात्व  का उपदेश देते हैं, जिसे सुनने मात्र से वास्तविक बोध अर्थात स्वरूप का यथार्थ अनुभव नहीं होता, क्योंकि वास्तविक बोध करण, निरपेक्ष है। वह मन-वाणी आदि से परे है। वास्तविकता को बोध तो स्वयं के द्वारा स्वयं को ही होता है। यह उस स्थिति में होता है जब मनुष्य अपने विवेक द्वारा जड़-चेतन के भेद को महत्व देता है। विवेक ही वास्तविकता का बोध करता है और जड़ता से सम्बन्ध कराता है। इससे अविवेक दूर होता है और मोह नहीं होता।
तत्वज्ञान के प्रकाश में मनुष्य ऐसा अनुभव करता है कि उसकी सत्ता सर्वत्र परिपूर्ण है और सत्ता के अन्तर्गत अनन्त ब्रह्माण्ड है। वह सम्पूर्ण प्राणियों को अपने में ही देखता है। परमात्म तत्व के साथ स्वयं की एकरूपता का अनुभव करता है। एक ब्रह्म ही शेष रहता है और द्रष्टा, दृश्य और दर्शन नहीं रहते। वह सबको परमात्मा में पाता है।
सत्ता केवल परमात्म तत्व की है जिसमें न तो संसार है और न शरीर। प्रकृति से सम्बन्ध होने के कारण संसार और शरीर दोनों ही सीमित हैं। परन्तु परमात्म तत्व सीमित नहीं है। अतः संसार, शरीरों को न देखकर एक परमात्म तत्व को देखना ही यथार्थ दृष्टि है।
The learned-enlightened preach (explain, elaborate, describe, discuss) the gist of the Ultimate, which do not lead to the understanding, realisation of the real self just by listening. The realisation of the Ultimate, Absolute is beyond the scope, away from the limits of the senses. It is far off the inner self (psyche, gestures, mood, mind & heart) and the speech. The comprehension (perception of reality, Ultimate) is attained by one-the seeker, himself. It comes, when one discriminate-distinguish the inertial-static and the awake-absolute; through his prudence (intelligence, reasoning, logic). Prudence helps one perceiving the reality-knowledge of the Absolute-the Almighty. It helps in breaking the bonds with the static (vegetative state, apathy, inertness, idiocy, stupidity, senselessness). It removes the imprudence but illusion (attachment, delusion, ignorance) remains.
Enlightenment makes one experience his influence every where, including infinite universes. He has become one with them. He perceives-finds himself, in all the living beings-mortals. He identifies himself with the Almighty-Par Brahm Parmeshwar. He unifies himself with the gist of the Ultimate. Only the Brahm remains and the viewer, visible and physical presence-view are lost. He finds-observes everything-everyone in the Ultimate-The Almighty.
Sovereignty of the God remains, which do not include the world or the perishable body. Due to its relation with the nature, both the universe and the body are restricted. The influence of the Ultimate is not restricted. So, the visualisation of the Ultimate, his impact-influence is clear, pure, objective viewership.
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। 
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥
हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति, सिद्धि, अपने कल्याण के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों, सिद्ध, मुक्त पुरुषों में भी कोई एक मेरे परायण होकर, मुझ को तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.3] 
Out of thousands of humans, one of them tries to attain ME, devotion to ME,  own welfare. And out of these-from amongest the Yogis-ascetics having attained enlightenment, who make efforts to assimilate in the Almighty, its hardly one who is able to realise HIM, attains the gist of the Ultimate-Parmatmttv.
मनुष्य मूल रूप से पशु के रूप में जन्म लेता है, मगर समाज-संगति, माँ-बाप, उसे समाज के लिए उपयोगी बनाते हैं। उन करोणों लोगों में से शायद ही कोई होगा जो ऐशो-आराम की अपेक्षा मुक्ति-मोक्ष का प्रयास करता होगा। वह भी केवल प्रेरणा से ही सम्भव होता है। कुछ लोग पूर्वजन्म के संस्कारों के आधीन स्वतः भगवत-भक्ति में बह जाते हैं। भारत ही एक मात्र ऐसा देश है, जिसमें मनुष्य इस लोक की बजाय परलोक की चिंता करता है। भोग-विलास संग्रह की प्रवृति मनुष्य में स्वाभाविक है। 84,00,000 योनियों से गुजर कर यह योनि परमात्म प्राप्ति के लिए ही है। तपस्या, योग, साधना, मनुष्य को भगवान् से जोड़ने के लिए हैं। भजन, प्रार्थना, प्राणियों पर दया-मदद भी मुक्ति मार्ग को प्रशस्त करती है। 
A man is born as an animal. He is turned into a human being by the society-parents, teachers, scholar-philosopher. Its very rare to find one who is contemplating to assimilate in the Almighty. Majority of the humans love to have comforts-luxuries-pleasure-passions. There are individuals who crave for Salvation due to the impact of their previous incarnations. India is the only country, where people make efforts to achieve Liberation. Hindus constitute the lot which care for the abodes, after this life. They visit holy places, conduct prayers, rituals, read scriptures-epics, attends religious congregation-conferences, meet holy souls and the liberated. Human body is obtained only after passing through 84,00,000 species. This human body is gift to one to move towards the Almighty. Tapasya-ascetics, Yog, meditation are some of the means to achieve the Ultimate. Social welfare extending help to the needy-poor-down trodden too help in this endeavour.
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। 
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। 
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार-इस प्रकार यह आठ प्रकार से विभाजित यह अपरा प्रकृति है और हे महाबाहो! इस अपरा प्रकृति से भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी परा प्रकृति को जान, जिसके द्वारा यह जगत  धारण किया जाता है।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.4-5]
Earth, water, fire, air, sky (space, ether) are the basic ingredients, the mind (inner self, psyche, thoughts, ideas, gestures, intelligence, Buddhi) & the egoism (Ahankar, pride, arrogance); constitutes the eight fold divisions of this impure nature of the infinite past-time immemorial that has elapsed and in addition to these stands the pure nature of the Almighty which supports this world.
परमात्मा की प्रकृति परमात्मा से अलग नहीं है। परमात्मा का अंश होने से जीव भी उससे अलग नहीं है। अपरा से सम्बन्ध होने के कारण ही मनुष्य को प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृति निकृष्ट, जड़ और परिवर्तन शील है। परा प्रकृति श्रेष्ठ, चेतन और परिवर्तन रहित है। परा प्रकृति ने ही अपरा प्रकृति को धारण कर रखा है। 
Nature created by the Almighty is not distinguished from the Almighty. The organism too is a component of the Almighty and hence he too is not distinguishable from HIM. Connection with the impure-contaminated makes the humans a component of the nature. The contaminated nature is inertial (stagnant, lethargic) and subject to change. The Para-pure is excellent-Ultimate, is alive and free from change. The Para-pure component of nature has supported the Apara-impure as well. The Almighty explained to Arjun by calling him Maha Baho! that both components of nature were supported by HIM i.e., the Para-pure and the impure as well component.
इदं शरीरं कौन्तेयएतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। 
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों के उत्पन्न होने में परा और अपरा-दोनों ही प्रकृतियों का संयोग है। सम्पूर्ण जगत के प्रभव-उद्भव और पराभव-प्रलय का कारण भी मैं ही हूँ।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.6] 
The Almighty Shri Krashn told Arjun that it was HE who was behind evolution and devastation-dissolution. The Pure-Para & contaminated-Apara constituents intermingled to generate the universe.
समस्त जीवधारी, दैवीय और मैथुनी सृष्टि, स्थावर-जंगम, पेड़-लता, पशु-पक्षी, देवता-दानव, मनुष्य-पशु सभी परमात्मा की परा और अपरा प्रकृति के संयोग से ही उत्पन्न होते हैं। इनमें जो जीव-जीवात्मा है, वो प्रभु का अंश ही है। स्वर्गलोक, मृत्युलोक-पृथ्वी और पाताल लोक के समस्त प्राणी भी इसी संयोग से उत्पन्न होते हैं। इन्हें सत्ता, स्फूर्ति परमात्मा से प्राप्त होती है अतः वो ही उद्भव और प्रलय के कारण हैं। इन सबमें जड़ अंश तो परिवर्तन शील है, परन्तु चेतन (आत्मा, परमात्मा का अंश) अपरिवर्तन शील और निर्विकार है। इन सबके कारण और कार्य स्वयं भगवान् हैं। 
All types of life forms, whether divine or physical, have evolved from the Almighty by the composition of the two components of the nature. The stationery (static, inertial-fixed) forms as well as demigods, demons, trees, animals are the result of the inter mixing of the two basic components of the Almighty (Pure & Impure). Out of these two the soul which energise the body, make it alive, is the main component of the Almighty. The organisms-residents of heaven, earth and the Patal-nether world  are created by the intermixing of the Para & the Apara components of the Almighty. HE is the root cause behind evolution as well as destruction (dissolution, devastation). Out of these two basic components, the inertial component is subject to change, while the soul always remains intact. The soul which energise the organism is untainted (unsmeared, unchanged). The Almighty is the reason-force, behind all these activities-actions.
मत्तः परतरं नान्य-त्किंचिदस्ति धनंजय। 
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥
हे धनंजय! इस जगत का मुझ से भिन्न दूसरा कोई किंचित मात्र भी कारण और कार्य नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझ में गुँथा हुआ, मेरे में ही ओत-प्रोत है।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.7] 
The Almighty Shri Krashn revealed to Dhananjay-Arjun that the universe-world has no other cause or motive other than HIM. This world is closely knit like the (woven as clusters of gems on a string) beads of a rosary in HIM.
जिस प्रकार माला में मोती गुँथे होते हैं, उसी प्रकार समस्त स्रष्टि परमात्मा से ओत-प्रोत है। तात्पर्य यह कि इसका अगला और पिछला सिरा कौन सा है, यह जानना मनुष्य के लिए कठिन है। इस माला को गूँथने की इच्छा रखने वाला-कारण और गूँथने वाला कार्य एक मात्र परमेश्वर ही है। मणिरूप अपरा प्रकृति और धागे के रूप में परा प्रकृति, दोनों में ही परमेश्वर परिपूर्ण हैं। अपरा प्रकृति स्थावर जंगम, जलचर-नभचर, चौदह भुवन, चौरासी लाख योनि जैसे अनन्त रूपों और अनन्त समुदायों में विभक्त है। इन सबको बाँधकर रखने, संचालित करने वाली शक्ति स्वयं परा शक्ति परब्रह्म परमेश्वर भगवान् हैं। 
The manner in which the pearls (Gems, beads) are linked together, the entire universe is channelized-held together by the Almighty, like the string of the rosary. One who desired to join, knit, connect the whole universe (Super galaxies, stars, solar systems, nebulae, satellites, planets) is the Almighty HIMSELF. The jewels represents the Apra Prakrti (tainted-contaminated nature) and the thread-cord joining them is the Para (Pure, uncontaminated) nature and both have the Almighty HIMSELF linking them. The impure-Apara has all the creatures, whether divine or physical, all the 14 abodes and all the 84,00,000 species in addition to infinite numbers of other constituents divided into infinite categories. The force which channelize-operate them is the Almighty HIMSELF.
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥
हे कुन्तीनन्दन अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.8]  
Hey Arjun, the mighty son of Kunti! I am the flavour (relish, extract) of water, I am light (aura, brilliance) in the Moon and the Sun. I am the syllable Om (primordial sound) in all the Veds, sound in the sky-ether, manhood (might, tendency) to do-perform in humans.
भगवान् नारायण जल में ही प्रकट हुए। अगर जल में प्यास बुझाने की ताकत न हो तो वह व्यर्थ है। भौतिक शरीर का दो तिहाई जल ही है। जल में तुष्टि उसका रस है। बगैर प्रकाश के सब कुछ अज्ञात है। पृथ्वी पर सूर्य और चन्द्र प्रकाश प्रदान करते हैं। सारा चराचर उन पर ही निर्भर है। बगैर आकाश के (और उसमें माध्यम-हवा) शब्द-ध्वनि उत्पन्न नहीं हो सकती। पुरुष में पौरुष-पुरुषत्व, कुछ करने की ताकत-भावना न हो तो वो भी व्यर्थ है। तात्पर्य यह कि भौतिक इकाइयों का मूल तत्व जो प्राणी को प्राणवान बनाता है, वो परमात्म तत्व ही है। ओंकार-प्रणव वह ध्वनि है जो ब्रह्माण्ड में जीवन की उत्पत्ति के वक्त उत्पन्न हुई और यही ध्वनि वेदों का गूढ़ रहस्य और मूलाधार है। 
The Almighty-Narayan appeared in water & was called Naar & Narayan is derived from it. The water is essential component of all life forms. The extract of water, the nectar, elixir is the Almighty, which appeared from the ocean which was churned by demons and the demigods. Two third of the body of the living beings constitutes of water. Unless-until one drink water, he remain dissatisfied. Light too is essential for various life forms. Light is obtained from the Sun and the Moon to support life. These two, too are other forms of the Almighty, as is described in the scriptures & epics. Nothing can be observed in the absence of light. The space between heavenly bodies is covered by space-ether. Air is essential for producing sound and vocal communication. Omkar (Om, Pranav) is the initial sound which was generated-evolved with the creation of the universe & life. It constitutes the central idea-gist of the Veds. These along with the strength (manhood, desire to do-perform) are due to the presence of the component of the Almighty in the humans. Basically, in short each and every particle, life forms are replica of the God.
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। 
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥
मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध 5 तन्मात्राऍ हैं) और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप मैं हूँ।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.9]  
I am the agreeable odour (pleasant-decent smell, scent) in the earth and the brilliance-capability to burn in the fire, the vitality in all beings and I am the austerity in the ascetics. 
5 तन्मात्राएँ जिनसे पृथ्वी उत्त्पन्न हुई है उनमें से एक गंध है। अतः गंध के बिना पृथ्वी कुछ भी  नहीं है। पवित्र तन्मात्रा परमात्मा को प्रदर्शित करती है। अपवित्र गंध-दुर्गन्ध विकृति से उत्पन्न होती है। अग्नि में तेज है जो उसमें व्याप्त है, वही परमात्मा का रूप है। बगैर तेज के अग्नि अर्थहीन है। प्रत्येक प्राणी में जीवन दायिनी शक्ति प्राण स्वयं परमेश्वर ही हैं। बगैर प्राण के जीव निर्जीव है। द्वन्द सहिष्णुता को तप कहा जाता है। परमात्म की प्राप्ति के लिए कितनी ही बाधाएँ-कष्ट आयें, उन्हें सहना निर्विकार रहना ही तप है। तप होने से ही साधक तपस्वी है। इसी तप को भगवान् अपना रूप  कह रहे हैं। अगर साधक में तप न हो तो वह तपस्वी नहीं है। सृष्टि की रचना में भगवान् ही कर्ता, कारण और कार्य हैं। परा और अपरा भी वही हैं। गंध, तन्मात्रा, कारण और पृथ्वी उसका कार्य है। गंध-तन्मात्रा पवित्र की तरह शब्द, स्पर्श, रूप और रस-तन्मात्रा भी पवित्र हैं। 
5 basic ingredients from which the earth has evolved are smell, touch, figure, extract-fluid and sound. In the absence of any one of these the earth looses its relevance-significance. The property of having pious scent-smell is the God HIMSELF. Foul smell represents impurity-contamination. Fire has the brightness, aura, capacity to burn, which is the Almighty HIMSELF. Tej represents energy and capacity to reproduce as well. In the absence of ability to burn, fire is meaningless. The capability to survive, live, vitality is Pran which is the Almighty HIMSELF. The ascetic bears all troubles, tortures, difficulties over the strength of Tap-austerity which is the Almighty HIMSELF. In the absence of Tap-austerities, the ascetic is an ordinary man. In this universe the Almighty is the doer, reason and the function himself. HE is both Para (pure) and Apara (mixed, contaminated, impure) Shakti.
तन्मात्रा :: शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गन्धों को पंच तन्मात्राएँ कहते हैं; 5 basic ingredients from which the earth has evolved are smell, touch, figure, extract-fluid and sound.
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्। 
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्॥
हे अर्जुन! तुम सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझ को ही जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.10]  
O Parth, you should know (recognise, identify) ME as the eternal seed of all that which has happened in the past. I AM the intelligence of the intelligent and the brightest amongest the bright-having aura.
समस्त प्राणियों का सनातन बीज कोष मैं ही हूँ। सारी सृष्टि मुझ से ही उत्पन्न  होती और मुझ में ही समा जाती है। मेरे बगैर प्राणी की स्वतंत्र सत्ता है ही नहीं। बीज और जीवात्मा दोनों ही शब्द परमात्मा द्योतक हैं। कार्य और कारण स्वयं परमेश्वर ही हैं। प्राणियों में जो सर्वश्रेष्ठ है, वही परमात्मा का द्योतक है। अगर कोई बुद्धिमान है तो उसमें बुद्धि परमात्मा की प्रतीक और बुद्धिमानों में सर्व श्रेष्ठ परब्रह्म परमेश्वर स्वयं हैं। तेज दैवी सम्पत्ति का गुण है। तेज अनेकों अर्थों में आता है, परन्तु यहाँ यह अलौकिक आभा, प्रकाश, चमक के लिए आया है। तेजस्वी पुरुषों में अलौकिक तेज़ उनके मुख मण्डल पर दिखाई देने लगता है। 
The Almighty is the eternal bank of each and every characteristics of those who were born and perished. A souls emerge from HIM and assimilate in HIM. No one is independent-capable of doing any thing without HIM. Seed and soul both represent the source-the God. HE is responsible for every act. One who is beyond limits (is superb & excellent) amongest the physical and divine creations is the Almighty HIMSELF. Intelligence is a reflection of the presence of the God in the organism. One who has the Ultimate intelligence, prudence & memory is the God HIMSELF, none else, other than HIM. Aura is divine and one who has the Ultimate capabilities-tendencies has brightness over his face.
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्। 
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥
हे भरत श्रेष्ठ अर्जुन! बलवानों में काम और राग-आसक्ति से रहित बल, मैं हूँ और प्राणियों में धर्म-शास्त्र के अनुकूल काम मैं हूँ।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.11]   
Hey Arjun, ablest amongest the descendants of Bharat! I am the strength (power, ability of the mighty-powerful), who is free from desires and attachment. Amongest all organism, creatures, I am passion, sensuality, sexuality favoured by the scriptures, epics, Dharm-religiosity.
मनुष्यों में बल धर्म की मर्यादा के अनुकूल राग, आसक्ति, कामनाओं पर विजय और कार्य का सम्पादन है। बल प्राणी मात्र की रक्षा, सहायता के लिए है ना कि सताने-प्रताड़ित करने के लिए। धर्म शास्त्रों, इतिहास और पुराणों में  मनुष्य के कार्य, व्यवहार, आचरण की विस्तृत व्याख्या की गई है। जो बल आसुरी सम्पत्ति से युक्त है, वो निंदनीय-त्याज्य है। काम-संभोग सन्तानोत्पत्ति और वंश परम्परा कायम रखने का विधान है ना कि आनन्द, मौज-मस्ती, दुराचार का साधन। गर्भाधन उचित समय पर होना चाहिए ना कि वक्त-बेवक्त। शास्त्र-विरुद्ध आचरण कष्ट-दुःख, परेशानी-रोग में परिणित हो जाता है। संसार से आसक्ति-लगाव नरक का द्वार  है। धर्म शास्त्र में ब्रह्मचर्य-अनुशासन के ऊपर बहुत जोर-ध्यान दिया गया है। 
Might is meant for the service, protection, welfare of humanity and other creatures. The king has to perform this duty, since he is the representative of the God. Dharm is thoroughly discussed-described in the scriptures-epics, Veds, Purans and the history of mankind. Any one who possesses this ability, strength, might, valour is icon to God. The might associated with demonic tendencies is taboo, leading to distress, tortures, trouble, diseases and the hells. Passion, sensuality, sexuality is meant for obtaining descendants not for joy, recreation, enjoyment. One should not be lascivious. Each and every activity pertaining to sexual behaviour-intercourse is thoroughly explained-discussed in the scriptures. 
Please refer to (1). SEX EDUCATION (1) काम-शिक्षा  bhartiyshiksha.blogspot.com
(2). SEX EDUCATION (2) काम-शिक्षा :: VATSAYAYAN'S KAM SUTR वात्सायन का कामसूत्र bhartiyshiksha.blogspot.com 
(3). SEX EDUCATION (3) काम-शिक्षा :: KAM SUTR   कामसूत्र (AN ANCIENT INDIAN TREATISE ON VIRTUOUS LIVING & SEX) bhartiyshiksha.blogspot.com 
(4). SEX EDUCATION (4) काम-शिक्षा :: KOK SHASTR-RATI RAHASAY  कोक शास्त्र-रति रहस्य bhartiyshiksha.blogspot.com 
Proper guidelines are available at length for adopting the right path. One-the ignorant who acts against invariably open gates for hell. A lot of stress has been laid over celibacy and discipline-life style in the scriptures.
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये। 
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥
जितने भी सात्विक, राजसिक और तामस भाव हैं, वे मुझ से ही होते हैं। परन्तु मैं उनमें और वे मुझ में नहीं हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.12]  
All characteristics viz. Satvik, Rajsik and Tamsik evolve from the Almighty. But they are not present in HIM and HE is not present in them.
सृष्टि की उत्पत्ति, आश्रय, आधार, प्रकाशक स्वयं श्री भगवान् ही हैं। सात्विक, राजसिक और तामसिक भाव अर्थात गुण, पदार्थ और क्रिया उनसे ही उत्पन्न हुए हैं। अतः मनुष्य की दृष्टि परमात्मा की ओर होनी चाहिये, न कि उनके गुणों की तरफ। गुण प्रकृति के साथ क्रिया करके अपना प्रभाव उत्पन्न करते हैं। मनुष्य की प्रकृति इन गुणों के अनुरूप ही उसे परमात्मा के करीब अथवा दूर ले जाती है। परमात्मा अविनाशी हैं, मगर प्राणी नाशवान। इस दृष्टि से परमात्मा उनमें नहीं हैं। बीज से वृक्ष, पत्ते, डालियाँ, जड़, फूल उत्पन्न होते हैं और बीज उनमें नहीं होता। इसी प्रकार परमात्मा बीज रूप में सात्विक, राजसिक और तामसिक गुण में उपस्थित हैं, मगर उन भावों में परमात्मा ढूढ़ने से भी नहीं मिलेगा। जिस प्रकार बादल आकाश में उत्पन्न होकर उसी में विलीन हो जाते हैं और बादल आकाश में रहते हैं, मगर आकाश बादलों में नहीं है; उसी प्रकार गुण परमात्मा से उत्पन्न जरूर हुए हैं, मगर परमात्मा उनमें नहीं है। अतः मुक्ति-मोक्ष चाहने वाला व्यक्ति इन गुणों में न उलझकर, अपनी दृष्टि परब्रह्म परमेश्वर, परमपिता परमात्मा में रखे।
Almighty has created the life. HE nurtures and supports it. All qualities, characteristics, properties like Satvik, Rajsik and Tamsik evolve out of him. These characteristics interact with nature and shows off their impact over the various life forms, species & humans. Almighty is for ever, but the life forms are sure to perish. Whatever is perishable cannot be God. So, its one way traffic. The Almighty do not appear HIMSELF in these characteristics though, they have evolved out of HIM. The clouds appear in the sky and disappear in it. Sky-ether is by itself not by virtue of clouds. The seed grows in the tree, but leaves, branches and the flowers do not have seeds. One who wish to attain Salvation, keep looking towards the Almighty; not to HIS characteristics. The characteristics are various levels of purification which helps one in assimilation in the Ultimate. They are not the Almighty HIMSELF.
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्। 
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्॥
इन तीनों गुण रूप (सात्त्विक, राजस और तामस) भावों से मोहित होकर यह सारा संसार-प्राणि समुदाय इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता।
[श्रीमद्भगवद्गीता 7.13]  
The entire universe is mesmerised (enchanted, deluded) by these three basic-root Gun (qualities, traits, characteristics) unaware of the existence of the Almighty beyond them as distinct from them and immutable.
ये तीनों गुण :- सात्त्विक, राजसिक और तामसिक, मनुष्य में अनेकानेक वृत्तियाँ उत्पन्न करते हैं। मनुष्य इन वृत्तियों से तादात्म्य पैदा कर लेता है और मोहित होकर स्वयं को सात्त्विक, राजसिक और तामसिक मान लेता है। मगर यह मानने का प्रयास नहीं करता कि वो परमात्मा का अंश है। इस मोह-भ्रमवश वह स्वयं को शरीर-संसार तक सीमित करके ममता, अहंता, स्थापित कर लेता है। हकीकत यह है कि परमात्मा इन गुणों से सर्वथा रहित, असम्बद्ध, निर्लिप्त है। उसमें इन गुणों के परिवर्तन से कोई परिवर्तन नहीं होता। जो इस माया बंधन को काटकर इससे मुक्त हो जाता है, वो परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। 
The three distinct characters-qualities generate various tendencies in the humans who adjust with them in various ways according to nature, motive, requirements. He limits himself to these three, the body and the world. He does not think beyond them about the creator, nurturer or the destroyer (Brahma, Vishnu & Mahesh). He does not believe that he is a component of the God. He develops rapport with affections, desires, motives, gains, wealth etc. due to ignorance-delusion. He forgets-prefers to know that the Almighty is beyond these due to enchantment-cast of spell. The Almighty does not change-alter due to these three characters. One who cuts the bonds of affections-allurements of enchantment, enables-qualifies himself for Liberation.
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। 
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥7.14॥ 
क्योंकि मेरी यह अलौकिक-दैवी अद्भुत त्रिगुणमयी माया बड़ी दुस्तर-कठिन है। जो पुरुष केवल मेरी ही शरण में होते हैं और निरन्तर मुझको ही भजते हैं, वे इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात्‌ संसार से तर जाते हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.14]   
The spell (enchantment, illusion) of the Almighty consisting of the three basic characteristics is extremely difficult to cross-win. One who is under the asylum (shelter, protection) of the God swims across it swiftly-easily and attains Salvation. 
सात्विक, राजसिक और तामसिक गुण एक से बढ़कर एक, दुस्तर और कठिन हैं। सारी सृष्टि इसी भ्रम जाल में फँसी हुई है और बिरला-बिरला ही इसे भेद पाता है। वैसे ये इतनी कठिन भी नहीं है, अगर मनुष्य को परमात्मा का आलम्बन-सहारा हो। ममता, अहंता, कामनाओं से रहित साधक भगवान् की शरण प्राप्त कर लेते हैं और भव-सागर सरलता से पार  कर जाते हैं। सरल हृदय, समर्पित परमेश्वर के भक्तों के लिए तो कुछ भी अभेद-कठिन नहीं है। भगवान् में आस्था, निष्ठा, प्रेम, विश्वास और  प्रभु की शरण मनुष्य को माया से मुक्ति दिलाने में समर्थ हैं। 
The 3 characteristics of the Almighty are sufficient to confuse-deviate anyone. The honest-pure hearted-devoted to HIM, has no trouble-difficulty to tide over-swim the vast ocean of cause & effect. Its too easy for one, who sought asylum, shelter, protection under the God. The relinquished, detached or the one who has attained equanimity may find it swift-easy to achieve Liberation. Love, affection, faith, allegiance, devotion, belief in the Almighty is capable-sufficient to grant assimilation in the Ultimate.
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। 
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥
माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुरी स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में महान पाप-नीच कर्म, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मेरी शरण में नहीं आते।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.15] 
The deluded with the devilish-demonic tendencies, (character, inclination, habits, nature), whose prudence (wisdom, learning, understanding) have been masked by the cast of spell of enchantment (ignorance, illusion) of the Almighty and who perform worst possible deeds, sins, vices, evils do not seek shelter under the Almighty. 
जैसे-जैसे कोई मनुष्य बुराई-अपराध के मार्ग पर बढ़ता है, उसका विवेक-ज्ञान, सोचने-समझने की शक्ति लुप्त होती चली जाती है और वह पशु से भी निम्न स्तर "नराधम" को प्राप्त कर लेता है। ममता, लोभ, काम, लालच मनुष्य को बेहद ही निम्न स्तर पर पहुँचा देती है। सत्ता का लोभ-लालच मनुष्य को हत्यारा, आतंकवादी, बेईमान, स्वार्थी बना देता है। ऐसे लोगों के लिए धर्म एक मोहरा-औजार बनकर रह जाता है और अन्ततोगत्वा नष्ट हो जाता है। बचते ये लोग भी नहीं हैं और मृत्यु के बाद नर्क, हीन योनियों में पड़ते हैं। वर्तमान काल में समाज का एक बड़ा धड़ा धर्म-जिहाद के नाम पर हत्याएँ, लूट, डकैती, अपहरण, बलात्कार, स्त्रियों की खरीद-फरोख्त कर रहा है। इन लोगों का अपने तथा कथित धर्म से साथ नाश और नरक जाना निश्चित है। भटका हुआ व्यक्ति धीरे-धीरे भगवान् से दूर होता चला जाता है। उसके ऊपर माया की काली छाया पड़ने के बाद धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। विगत काल के करोणों-करोणों राजा नर्क की यातना-यन्त्रणा भोग रहे हैं और आगे भी भोगते रहेंगे, क्योंकि उनकी बुद्धि पर न हटने वाला पर्दा पड़ चुका है। भारत में भी तथाकथित धर्म-निरपेक्ष शक्तियाँ शनै-शनै इसी मार्ग पर आगे बढ़ रही हैं। धर्म की राजनीति करने वालों का अन्जाम बुरा ही होगा। 
As and when a person follows the path of sin, crime, evil, wretchedness, he looses his prudence, intelligence, understanding, power to reason. He is unable to discriminate between right or wrong, fair or foul. His own desires reign supreme and he gradually attains a status much-much lower than an animal. Affections, greed, sex makes him murderer, terrorist, invader, rapist, women trafficker, deceit, fraudster. The religion becomes a pawn-tool in the hands of such people. The religion which has such followers become irrelevant and collapse ultimately like Islam. The fate of these atheists is decided. They have to go the hells and suffer. They are slowly and gradually drifting away from the Almighty. Jihad is a term used by these misguide-misled people. The dark shadow of the Almighty has already cast-taken over, engulfed them. The history describes that billions & billions of kings are languishing in hells. India is passing through a phase, when a big chunk of people is exploiting the term secular for their selfish political motives. Others are not far behind they have patented religion in their name. Needless to forecast their future abode!
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। 
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥7.16॥
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम-पवित्र कर्म करने वाले अर्थार्थी (सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला), आर्त (संकट निवारण के लिए भजने वाला), जिज्ञासु (मुझे यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला) और ज्ञानी अर्थात;  ऐसे चार प्रकार के मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात मेरी शरण ग्रहण करते हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.16]  
Hey Arjun, the best, ablest amongest the descendants of king Bharat! There are 4 categories of humans who takes shelter (protection, asylum) under me, namely :- (1). The pious (virtuous, righteous, honest), (2). distressed-facing difficulties, trouble, (3). anxious (curious, desirous) who wish to know-identify me and (4). the enlightened (scholars, philosophers).
सत्य वादी (पवित्र, शुद्ध, ईमानदार, उत्तम चरित्र) वाले भक्त जो परमात्मा की शरण ग्रहण करते हैं, की चार श्रेणियाँ हैं। मोक्ष मार्ग के अनुयायी मनुष्य यज्ञ-तप, दान-पुण्य, भजन-पूजन, तीर्थ यात्रा, श्रवण-स्वाध्याय :- वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवत गीता, इतिहास आदि नित्य प्रति करते रहते हैं। इसके लिए ह्रदय का शुद्ध (दोष, पाप) रहित  होना अत्यावशक है। न्यायोचित स्त्रोत्र से धनोपार्जन वाले पवित्र विचार रखने वाले अपने वर्णाश्रम धर्म में आरूढ़ सज्जन-सरल ह्रदय व्यक्ति परमात्मा का आलम्बन स्वीकार करते हैं। निराश (आर्त, दीन-दुःखी, प्रेषण, संकट ग्रस्त) व्यक्ति भी ऐसा ही करते हैं। परमात्मा के प्रेमी भक्त जो उन्हें जानना-समझना चाहते हैं, वो शुद्ध ह्रदय-मनोवृति से भगवत सम्बन्धी मूल तत्व-तत्व ज्ञान के अभिलाषी होते हैं। जो ज्ञानी-तत्वज्ञ हैं, वो तो स्वयं को परमात्मा के प्रेम से ओत-प्रोत होकर उसकी शरणागति ग्रहण करके मुक्ति का इन्तज़ार करते हैं। उनकी समस्त कामनाएँ-इच्छाएँ केवल परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर तक ही सीमित हो गई हैं। 
The pious (honest, truthful, righteous, virtuous) humans, who seek asylum under the Almighty have been categorised into 4 groups. Those who visit virtuous places, take a dip in pious holy rivers, go for pilgrimage, visit temples, perform sacrifices, grants donations, adopts charity for the needy, read-listen, adopt (embrace asceticism-celibacy), read or listen to the scriptures, epics, holy books and stories pertaining to the God too qualifies for Salvation. Those who visit holy places must be pure at heart free from enmity, vices, greed etc. There are the people who are suffering from diseases, tortures, shortages, deficit, scarcity, troubles, difficulties, too come to the fore of the Almighty. In addition to these there are the intelligent people who wish to identify the gist (nectar, theme, central idea, elixir) of the Ultimate, too reach HIM. The enlightened wait till the impact of their fair & foul deeds is neutralised completely. Their desires, wishes, choices are restricted to the God only. They love HIM, pray HIM remember HIM and keep on doing their domestic-essential duties with dedication. Whatever they have is offered for the social welfare-cause.
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। 
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥
उन चारों श्रेणियों के भक्तों में से जो भक्त मुझ में निरन्तर लगा हुआ, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी अर्थात प्रेमी भक्त है वही श्रेष्ठ है; क्योंकि ज्ञानी भक्त को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वो मुझे अत्यन्त प्रिय है।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.17] 
Out of the four categories, the one who is steadfast-enlightened & solemnly devoted to ME, knows MY basic (abstract form, gist), who loves ME, who keeps on remembering ME throughout, is loved by ME as well. 
परमात्मा की निरन्तर भक्ति में लीन रहने वाला ज्ञानी परमात्मा को अत्यन्त प्रिय है। परमात्मा की दृष्टि में तत्वज्ञानी, विवेकी भक्त श्रेष्ठ है। वह लौकिक कार्य करते हुए भी किसी अन्य क्रिया में चित्त नहीं लगाता। क्योंकि सभी जीव परमात्मा के अंश हैं, वे सब उसे प्रिय हैं। उनमें से जो उसे निश्छल प्रेम करता है, वह स्वाभाविक रूप से परमात्मा को अत्यन्त प्रिय होगा ही। भक्त और भगवान् में द्वैत का भाव नहीं है। यह प्रेम अद्वैत की स्थिति है। उसका प्रेम अनन्तरस है। प्रेमी भक्त सर्वथा निष्काम है और लौकिक तथा पारलौकिक इच्छाओं से मुक्त है। 
The Almighty prefers-loves the devotee who knows HIM as the basis (root) of all creations, who is aware of his real character-identity. The enlightened knows Tatv-Gyan, gist of the God. He performs all activities of daily life-routine but do not develop rapport with them. He is solemnly inclined to the worship-love of the God. His devotion to God is unquestioned, fair, just, pure-Pious. Since, all creatures are the creations of the Almighty, HE loves them all. But HE reciprocates this to the one who too loves HIM. This sort of bond-devotion eliminates the duality between the devotee and the creator. The love generated in the devotee is infinite and free from the boundaries of this abode and other abodes. There is no desire, only true love and nothing else.
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्। 
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्॥
पहले कहे गए सबके सब, चारों ही भक्त बड़े उदार-श्रेष्ठ भाव वाले हैं। परन्तु ज्ञानी प्रेमी तो मेरा साक्षात्‌ स्वरूप ही है, ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धि वाला ज्ञानी भक्त मुझसे अभिन्न है और उससे श्रेष्ठ-उत्तम दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मुझमें ही दृढ़ता से स्थित है।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.18]  
The devotees of the 4 types described-discussed earlier are very kind hearted & liberal, who excel in every field. I believe that the enlightened who loves ME, is just like ME. He can not be differentiated from ME and there is no other way of relinquishment better than this, since the steadfast in mind, he resorts to ME alone as the unsurpassed goal.
भगवान् का वो ज्ञानी अन्यन्य प्रेमी भक्त जो केवल प्रेमवश-भावुक होकर उसकी आराधना करता है, वही उदार है। उसमें केवल एक कामना शेष है कि परमात्मा में लीन हो जाये। वो संसार सागर, भोग-विलास, कामना, मोह-माया का त्याग कर चुका है। उसमें किसी प्रकार की मोह-ममता शेष नहीं है और वो समता की प्राप्ति भी कर चुका है। उसमें अद्वैतभाव उत्पन्न हो चुका है। सर्वोत्तम गति वह मानी गई है, जिसमें भक्त भक्ति के अतिरिक्त मोक्ष-मुक्ति की कामना भी नहीं करता। वह पूरी तरह परमात्मा के प्रति समर्पित है। यही भगवान् में लय होना है।
The devotee who is enlightened-liberal and loves the Almighty is considered to be the Ultimate devotee. No desire, affection, allurements, affiliation, ties, bonds are left in him. He has attained equanimity. The worldly temptations no more allure-attract him. He has reached that level where its not possible to distinguish between him and the others & the God either. He is not craving even for salvation-Liberation or Assimilation in the Almighty. He is fully devoted to the Almighty who has surrendered before HIM. Now there is no distinction between him & the Almighty.
The Ultimate movement of the devotee is that stage where he do not crave even for Salvation. He is completely devoted & immersed in the God.
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। 
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥7.19॥ 
बहुत जन्मों के अंत के जन्म में अर्थात मानव जन्म में सब कुछ वासुदेव-परमात्मा ही हैं, यह जानकर जो तत्वदर्शी-ज्ञानी प्रभु की शरण में होता है, परमात्मा को भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।
[श्रीमद्भगवद्गीता 7.19]  
Its very hard-rare to find the saints, relinquished, great souls, who come under the shelter of the Almighty after the termination of further incarnations, having attained the gist-Parmatm Tatv, Tatv Gyan,
मनुष्य योनी 84,00,000 योनियों में से गुजरकर प्राप्त होती है। परमात्मा की शरण में आने वाले की तो यह अन्तिम योनि, जन्म है। मनुष्य योनि देवताओं और दानवों के लिए भी दुर्लभ है। मनुष्य योनि में आकर भी प्राणी अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के वश में, अनेकानेक निंदनीय कर्म करता है और पुनः-पुनः नर्क, कीट, कृमि, पशु-पक्षी की योनि प्राप्त करता है। सौभाग्यवश यदि उसे साधु-संतों, महात्माओं की संगत, शास्त्र का ज्ञान, अध्ययन-स्वाध्याय, श्रवण का मौका मिलता है और वह स्वयं को परमात्मा के अनुकूल करने का प्रयास करता है, तो वह शनै-शनै मुक्ति-मोक्ष मार्ग का अनुगामी हो जाता है। उसका विवेक, सात्विक विचार, परसेवा, धर्म-कर्म, वर्णाश्रम धर्म का पालन आदि कुछ ऐसे साधन हैं, जो उसके पथ प्रदर्शक बन जाते हैं। केवल ज्ञान ही काफ़ी नहीं है। मनुष्य को दृढ़तापूर्वक बुराई को त्यागकर भलाई के मार्ग का अनुशरण करना पड़ता है। मन, वाणी, इन्द्रियाँ, विचार, दृष्टि शरणागति और परमात्मा से प्रेम ये कुछ ऐसे साधन हैं, जो उसे वासुदेव से जोड़ने वाले हैं।
One attained the birth-incarnation as a human being only after passing through 84,00,000 species as insects, worms, animals, birds etc. Slowly and gradually, he discarded the Tamsik & Rajsik characters and animal-demonic nature. He started efforts as a Yogi-ascetic, having realised the futility of birth & death. He tried to control-channelize his energies into the God without success; initially. But gradually he starts-begins experiencing the pull to the divine path. He remembered the God and HE too reciprocated. The drag-pull gained momentum and he started listening-reading the scriptures, mythological stories of the epics, scriptures, Veds, Purans etc. He visited conferences, sermons, speeches pertaining to the eternal-divinity. Wherever, he found himself incompetent, he went to the asylum under the Almighty. During the course of his many-many life cycles as a human being, he had the opportunity to gain the company of saints, which guided-helped him further. His prudence, pious intelligence, Satvik nature-thoughts, too helped him. He understood that his firmness-determination for attaining salvation has to be intensified. Ideas, thoughts, speech, sense organs, vision and shelter under the Almighty became guiding principles to connect him with the God. Still, he finds himself helpless since sensuality obstruct his pious, virtuous, righteous path. Let the God him grant him success.
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। 
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥7.20॥ 
उन-उन भोगों की कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे मनुष्य अपने स्वभाव-प्रकृति से प्रेरित-नियंत्रित होकर उस-उस अर्थात देवताओं के उन-उन नियमों को धारण करते हुए, अन्य देवताओं के शरण हो जाते हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.20]   
Those humans whose wisdom has been swayed by various desires resort to worship-prayers of various deities-demigods for their fulfilment and follow the specific-particular procedure for their worship and seek shelter under them, leading to unending chain of reincarnations.
पन्द्रहवें श्लोक में उन व्यक्तियों का वर्णन था जो माया द्वारा प्रभावित हैं। यहाँ उन लोगों का संदर्भ है जो कि कामनाओं के वश में विभिन्न देवी-देवताओं की शरण में जाते हैं। देवी-देवतागण एक सीमा से बँधें हैं। विभिन्न कामनाएँ मनुष्य को अलग-अलग देवी-देवताओं की शरण में ले जाती हैं और पुनरागमन का अनवरत सिलसिला चलता रहता है। मनुष्य जन्म की प्राप्ति परमात्मा की प्राप्ति के लिए उद्यम करने को है, न कि इच्छा पूर्ति के लिए। सुख, भोग, आराम तात्कालिक हैं, चिरस्थाई नहीं। मनुष्य को अपने विवेक को जाग्रत करना चाहिए और आत्मशुद्धि, मुक्ति, भक्ति, मोक्ष का प्रयास निरंतर-सतत् रूप से करते रहना चाहिए। कामनाओं का त्याग और स्वभाव को परिवर्तित करके भगवत्भक्ति में लगाना ही ध्येय है।
Impact of illusion, cast of spell over the human being, which prevents him from Liberation. One is bent upon the fulfilment of his various desires for comforts & passions. For this, he seek asylum under various deities-demigods, (33,00,00,000 in number) one after another, which keep him struck-tied with the repeated chain of incarnations. He has forgotten that this birth as a human being, is to seek assimilation in the Almighty. He modify his nature, rejects allurements, concentrates his energies into the Almighty and seek shelter under him only and none other than him. One who utilises his prudence-intelligence, corrects his trajectory attains Salvation.
There are people who resort to witchcraft and prayers related to demons, spirits and snakes etc. for the fulfilment of their desires. The impact of such practices is evident. 
The ignorant worship humans, follow them and get struck by reincarnations.
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। 
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्॥
जो-जो सकाम भक्त, जिस-जिस देवता को श्रद्धापूर्वक  पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर-दृढ़ कर देता हूँ।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.21]  
The Almighty strengthens the unflinching devotion of the devotee in the particular, specific deity, demigod, who is worshipped by him, under the influence of desires.
समस्त प्राणी, देवी, देवतागण परमात्मा से ही प्रकट हुए हैं। देवी-देवताओं के कार्य का विभाजन उनकी प्रकृति के अनुरूप है। जो-जो, देवी-देवता स्वयं परमात्मा का नित्य-प्रति भजन, स्मरण, ध्यान करते रहते हैं, उनका लय प्रभु में हो जाता है; अन्यथा वे स्वयं पृथ्वी पर लौट आते हैं। मानव स्वरूप में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने 12 वर्षों तक घोर तपस्या की। भगवान् शिव तो युगों-युगों तक तपस्या में लीन हो जाते हैं। गौ लोकवासी भगवान् श्री कृष्ण ने तो 12,000 दिव्य युगों-युगांतरों तक घोर तपस्या की। भगवान् का स्वभाव बड़ा उदार है। जो माँगो वो मिलता है। भोग-कामना बन्धनकारी और मुक्ति, भक्ति, मोक्ष मार्ग में रुकावट-बेड़ी हैं। जब भी भक्त किसी देवी-देवता की उपासना करता है, तो वो परोक्षरूप में स्वयं भगवान् से अपनी कामना प्रकट करता है। जैसे भक्ति-श्रद्धा वैसा प्रसाद। जिसके प्रति आस्था की है, उसी के लोक में जाना होगा। अन्यानेक लोकों में जाकर, फिर वापस लौटना पड़ता है; परन्तु परमात्मा में लीन होने के पश्चात ऐसा नहीं होता। प्राणी और प्रभु में एकरूपता हो जाती है। अगर माँगना ही है, तो वो माँगो जिसे प्राप्त करने के उपरान्त माँगने, लेने, प्राप्त करने को कुछ शेष न रहे। 
The Almighty is very kind & liberal and grants each and every desire. All deities-demigods are his inferior incarnations. One prays to them and gets support from them. The demigods-deities too return to earth, after enjoying their tenure as lessor Gods. These lessor Gods too assimilate in the Almighty if they continue their endeavour of asceticism, prayers, devotion, dedication and do their job with full faith, might, valour. Bhagwan Shri Krashn too adopted to asceticism for full 12 years as a human being on earth. Bhagwan Shiv stabilise him self for many-many Yug-Yugantars for the sake of asceticism, meditation, remembering the Ultimate-the Almighty. Bhagwan Shri Krashn did ascetic practices for full 12,000 divine Yug-Yugantars to achieve this status. One desires and get it, which is purely bond forming and tying-binding to unending incarnations (misery). When a devotee go to some demigod-deity for the fulfilment of some specific desire-demand, he invariably come to that specific incarnation of the Almighty, who is handling that particular job. This is division of labour. One might be successful in reaching some specific abode like heaven of Indr, from where his return to earth is certain, since Indr too is not forever, his tenure too is fixed. Next Indr, at present demon king Bahu Bali king of Sutal Lok, will not not complete his tenure and move to asceticism-Tapasya, in between. He will adopt asceticism just to assimilate in the Almighty having discharged his duties. If one has to ask something to the God, why not ask for the Ultimate Bliss. There is nothing beyond the God. Seek not to return back to earth or some better abode.
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। 
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्॥
उस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई) श्रद्धा से युक्त होकर वह मनुष्य उस देवता की (सकाम भाव से) उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है; परन्तु वह कामना-पूर्ति मेरे द्वारा ही विहित की हुई होती है।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.22]  
One performs prayers-worship of a particular deity with the faith strengthened, enhanced, empowered by the Almighty but the fact is that the desires of that devotee of the deity too is fulfilled by the Almighty HIMSELF. 
कोई भी देवी या देवता अपने आप में परिपूर्ण-सक्षम नहीं हैं। सभी परमात्मा की शक्ति से कार्य करते हैं। सबका अपना कार्य क्षेत्र और दायरा है। जैसे पवन देव-वायु, वरुण देव-जल, भगवान् सूर्य देव-प्रकाश, चन्द्रदेव-औषधि और माँ शक्ति-प्रकृति का संचालन करते हैं। गणपति विघ्नविनाशक हैं, भगवान् शिव संहारक, धर्म-यम मृत्यु आदि का संचालन करते हैं। सबको अपने कार्यक्षेत्र में कुशलता, अनुशासन, अनुभव प्राप्त है। यह सिलसिला अनादिकाल से चला आ रहा है और यथावत जारी रहेगा। परमात्मा को छोड़कर अन्य सभी वस्तुएँ, प्राणी पैदा होते और मरते रहेंगे, जब तक कि उनका लय-मोक्ष न हो जाये। ये सभी देवी-देवता प्राणियों पर भगवत्कृपा करते रहते हैं, जो कि भगवान् के द्वारा ही उन्हें प्रदत्त है।
None of the deity, demigod, inferior-lessor God is capable of granting all that is asked by the humans. They themselves are dependent over the mercy of the Almighty and go to HIM for the solution-resolving of their problems time and again. They have limited powers. Maa Bhagwati better half of the Almighty asked Pawan-deity of air, to move-lift a straw, which he could not. She then asked all the demigods-deities to move it. They all failed. Maa told them that they all were functioning with HER strength, power, desire. Maa Bhagwati too is separated from the Almighty to create the universe as desired by the Almighty. She also obeys HIM. Pawan controls air, Varun controls water, Yam controls death, Bhagwan Shiv controls destruction, Ganesh Ji controls the obstructions, Sun controls light, Moon controls medicines while Brahma Ji controls evolution. This is delegation of powers-decentralisation of powers, division of labour. All the deities, demigods, lessor Gods are capable in discharging the duties given to them. But some times they do forget their limits and are punished by the God. Their ego is controlled-tuned time and again, as was done to Indr, while protecting the residents of Mathura and Gokul, when Indr went berserk and rained over this region for 7 days. Yam was restrained by Bhagwan Shiv, when he was bent upon taking out the soul of Markandey. At the occasion of killing the three demons of Tripur, Bhagwan Shiv was handed over the entire power needed for the purpose. The creatures-organism will keep on taking birth and facing death till they finally merge in the Almighty. The deities just discharge their duty, within the parameters defined by the God.
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्। 
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥7.23॥ 
परन्तु उन तुच्छ-अल्प बुद्धि वाले मनुष्यों को उन देवताओं की आराधना का अन्तवाला, (नष्ट होने वाला, अस्थाई) फल ही मिलता है। देवताओं का पूजन करने वाले देवताओं को और मेरा पूजन करने वाले मुझे प्राप्त होते हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.23]   
Those with limited vision-ignorant, who worship the deities (demigods, lesser gods, deities) gets the reward for praying them which is limited to a fixed life span and those who worship the Almighty obtain the reward which is everlasting.
देवताओं का कार्यकाल सीमित और अस्थाई है। जो उनकी पूजा अर्चना करता है, वो उन्हीं को प्राप्त करता है, क्योंकि देवगण भी नाशवान हैं; अतः उनके द्वारा दिया गया फल-वरदान भी समाप्त होगा ही। हाँ अगर कोई व्यक्ति बगैर किसी कामना-इच्छा के देवी-देवताओं को परमात्मा से अभिन्न मानकर और उनका ही स्वरूप-प्रतिरूप समझकर उनकी पूजा, अर्चना, सेवा करता है, तो उसे अविनाशी फल-भगवत्प्राप्ति हो सकती है। फल की प्राप्ति भगवान् के विधान से और उसका नष्ट होना उसके साथ कामना का संगम है। जिस कार्य में विधि-विधान, नियम-उपनियम, कार्य-कलाप ज्यादा हों, शक्ति का व्यय ज्यादा हो, बन्धन अधिक हों, वो अल्प-हीन बुद्धिवालों का मार्ग है। परमात्म प्राप्ति का मार्ग सुगम, सरल है। परमात्म प्राप्ति हेतु मात्र भक्ति, धर्म की मर्यादा का पालन, प्राणी मात्र की (जो उसके योग्य हो, अधिकारी हो) निसंकोच मदद, अपने कार्य का निर्वाहन ही काफ़ी है। परमात्मा हर प्राणी को अपना मानते हैं। अतः निकृष्ट से निकृष्ट-घृणित मनुष्य भी परमात्मा की शरण ग्रहण करने पर उन्हें प्राप्त कर ही लेता है। 
The tenure and capabilities of the deities are limited-restricted. One who prays them is sure to get their abode or the reward, he deserves. Deities themselves are bound to perish at a certain juncture of time. Similarly, the award granted by them is meant for a fixed period of time and bound to collapse. But, if one is devoted to a certain deity as a component of the Almighty without any desire-reward, he might be able to swim across the vast ocean of virtues & the sins, birth & the death. The prayers of deities are typical, procedural, methodical and intricate. Slightest possible error-mistake ruins the efforts and may even lead to adverse results. The prayer-worship of the Almighty is simple. 
Whole hearted devotion to HIM, asylum under HIM, serving the deserving needy, weak, poor, commitment to own work-job is enough. One who care for the Dharm-Varnashram Dharm, is bound to be free from the never ending cycles of birth & death. One who committed himself to the God, relinquishes himself, even though he is the worst possible sinner. Ultimately, he too is a constituent of the God.
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। 
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्॥
बुद्धिहीन पुरुष मेरे परम अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ भाव को न जानते हुए अव्यक्त (मन-इन्द्रियों से परे) मुझ (सच्चिदानन्द घन परमात्मा) को मनुष्य की भाँति शरीर धारण करने वाला मानते हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.24]   
The foolish, ignorant, morons, duffers, idiots, imprudent consider-regard ME as an ordinary-common human being, who takes birth and dies, without realising that I AM the Supreme God-Lord, Almighty (Ultimate, Eternal), who is free from the sequence of birth & death, beyond the reach of senses-thoughts, who is immutable-never ending.
निर्बुद्धि, अविवेकी, ज्ञान शून्य, श्रद्धाहीन मनुष्य, परमात्मा को भी एक सामान्य पैदा होने और मरने वाले व्यक्ति-प्राणी के रूप में देखता है। वह सर्वश्रेष्ठ, सोचने-समझने की सीमा से परे-ऊपर है। वह देश, काल, समय की सीमाओं-प्रभाव से ऊपर है। वह अविनाशी पर ब्रह्म परमेश्वर सदा एक रूप, निर्मल, असम्बद्ध है। निर्बुद्धि आम-आदमी देवी-देवताओं को उससे ऊपर मानकर-समझकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। अविनाशी परमेश्वर समस्त लोकों-ईश्वरों का ईश्वर, प्रकृति का नियामक-संचालक होकर भी बुद्धिहीन, अज्ञानी, शास्त्र ज्ञान रहित, की समझ से परे है। महाभूत :- आकाश, वायु, अग्नि-तेज़, जल तथा पृथ्वी; विकारी और विनाशी  हैं तथा स्थूल-साकार और सूक्ष्म-आणविक, दोनों  ही रूपों में हैं। इसी प्रकार परमात्मा साकार और निराकार, सगुण और निर्गुण, व्यक्त और अव्यक्त, लौकिक और अलौकिक-पारलौकिक दोनों ही रूपों-अवस्थाओं में है। 
The foolish, duffers, idiots, imprudent, ignorant, illiterate, uneducated, unaware of the Shastr-scriptures (epics, history); consider-regard the Almighty as an ordinary-common human being, who takes birth and dies. The Almighty is beyond the limits of mind-sense organs, thoughts-ideas of, even the most genius (super intelligent, intellectuals, philosophers, scholars). HE is beyond the limits of place & time. HE is always pure, content and unattached. The ignorant prays-worship the demigods (deities, lessor Gods) considering them to be significant-important and prays them for the fulfilment of their unending desires. Imperishable Par Brahm Parmeshwar-the Almighty is above all abodes, HE is the Lord of Lords-Gods. HE evolved the nature (infinite universes, cosmoses, galaxies) and controls it, which is beyond the understanding of the ignorant, morons. The 5 basic causes-factors behind evolution (which is destructible-perishable) are :- Earth, Sky, Fire-Tej-energy, Air and Water; which are capable of acquiring two forms, the first physical with shape and size and the second nuclear-without definite shape & size. The Almighty is both with physical form and formless, with characters (characteristics, traits, qualities) & without them, defined & undefined, pertaining to this universe and other abodes simultaneously.
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। 
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्॥
यह जो मूढ़ मनुष्य-समुदाय मुझे अज़ और अविनाशी को ठीक तरह नहीं जानता-मानता, उन सबके सामने अपनी योग माया से अच्छी तरह छिपा हुआ मैं प्रत्यक्ष नहीं होता (इसलिए यह अज्ञानी जन समुदाय मुझ जन्म रहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने-मरने वाला समझता है)।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.25]   
The unborn and imperishable Almighty has covered HIMSELF under the shroud (veil, cover, आवरण, पर्दा) of illusion-Yog Maya (hypnotic power, cast, spell) and does not manifest to all. 
परमात्मा अज़ और अविनाशी, जन्म-मृत्यु से परे हैं। वे प्रकट होने-अवतार और अन्तर्धान होने की लीला करते हैं। जो प्रभु को जन्मने और मरने वाला मानते हैं, वे मूढ़ हैं। मनुष्य द्वारा स्वयं को शरीर के साथ जोड़ने से उसकी दृष्टि पर आवरण-पर्दा पड़ जाता है। मालिक की योग माया और मनुष्य की मूढ़ता के कारण संसार से जुड़ा हुआ व्यक्ति उन्हें अपने समान ही मान लेता है। भगवान् के शरणागत-आश्रित को भगवत बोध होता है, क्योंकि भगवान् ने उसका अज्ञान और अपनी माया को उस पर कार्य करने से रोक रखा है। जो निकृष्ट उसे जानना और मानना ही नहीं चाहते, प्रभु उसके समक्ष प्रकट कैसे हों?! अवतारकाल में प्रभु लौकिक दिखने के बावज़ूद अलौकिक ही रहते हैं। भगवान् श्री कृष्ण ने धृतराष्ट्र के दरबार में अपना विशाल-अलौकिक रूप प्रकट भी किया तो दुर्योधन, कर्ण, शकुनि जैसे लोग उसे बाज़ीगरी ही समझते रहे। परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन करने के बाद भी वहाँ उपस्थित अन्य लोगों को भी मोक्ष की प्राप्ति नहीं हुई, क्योंकि सभी कर्म बन्धन से बँधे थे। 
The unborn and imperishable Almighty is beyond the impact of life & death. HE just reveals HIMSELF through various incarnations and disappear, like the Sun which comes out of the clouds and disappear or the clouds which form for a few moments in the sky and disappear. Those who consider the God to take birth and die are ignorant (fools, morons, lacks understanding, imprudent). Their intelligence has been shrouded-covered by the illusion Yog Maya-hypnotic power of the God. Such people are always under the cast-spell of the God. One who believes HIM to be merely a physical entity-body, is attached with the world-universe firmly and can not break the spell-bonds formed by him in terms of relations, attachments, allurements. For him, the Almighty is one of his group mates. There are the few devoted to HIM, under HIS asylum, who understands the reality and become Liberated. One at the lowest level of knowledge, understanding, prudence never desire to seek HIS divine appearance. God reveals  HIMSELF just like ordinary humans but in fact HE remain DIVINE in that situation as well. Bhagwan Shri Krashn revealed HIMSELF in the court of Dhratrashtr while showing HIS gigantic (mighty, enormous) shape & size, but the ignorant-egoistic like Duryodhan, Karn and Shakuni considered it to be an act of jugglery. Still they felt fear. Those who were present in the court could not get Salvation since all of them were tied to their destiny, fate-impact of their deeds in previous incarnations.
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। 
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥
हे अर्जुन! जो प्राणी भूतकाल में हो चुके हैं तथा जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, उन सब प्राणियों को मैं जानता हूँ; परन्तु मुझे भक्त के सिवाय कोई भी नहीं जानता।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.26]    
Hey Arjun! I know all those organisms-creatures, who evolved in the past and those who are surviving presently, in addition to those, who will take birth in future, but no one except the devotee knows ME.
परमात्मा के लिए भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों ही वर्तमान के समान हैं, क्योंकि उसके लिये सभी कुछ वर्तमान है। वे सभी प्राणियों, घटनाओं के दृष्टा हैं। उनसे कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। उन्हें सभी कुछ याद है। जो मनुष्य उन्हें साधारण इन्सानों की तरह जन्म लेने वाला और मरने वाला मानते हैं, वो मूढ़ भला उन्हें कैसे जान-समझ सकते हैं। उन्हें केवल समर्पित-सच्चा भक्त ही जान सकता है। भगवान् शिव कहते हैं कि वो भी परम-पिता परमेश्वर को कुछ-कुछ ही जानते हैं, पूरी तरह नहीं। परमात्मा सब कुछ जानकर भी मनुष्य को अवसर प्रदान करता है, ताकि वो सुधर जाये और उसकी शरण ग्रहण कर ले। यहाँ मुख्य बात यह है कि प्रभु के लिए भूतकाल या भविष्यकाल सदैव रहें, ऐसा भी नहीं है। अतः उनके लिए वर्तमान काल भी नष्टप्राय-नश्वर है अर्थात काल नहीं, अपितु प्रभु ही वर्तमान हैं। 
For the Almighty division of time does not exist. [HE reveals HIMSELF as KAL (TIME-DEATH) in the form of Sada Shiv] For HIM every event takes place in the present. HE visualises each and every event, organism. Nothing is hidden from HIM. HE remembers everything. Those who considers HIM to be one who takes birth and dies, can never understand HIM. HE can be known only by the devotees. Bhagwan Shiv says that he knows him  a bit but not completely. The God knows each and every activity of the humans, yet give them chance to improve, seek HIS shelter and attain Salvation. This Shlok describes a concept that the past as well future are perishable without leaving behind their impact-marks. It means that time too is collapsible not the God.
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। 
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥
हे भरतवंश में उत्पन्न शत्रुतापन अर्जुन! इच्छा-राग और द्वेष से उत्पन्न होने वाले द्वन्द-मोह से मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसार में अनादिकाल से मूढ़ता को, जन्म-मरण को प्राप्त हो रहे हैं।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.27] 
Hey Arjun! The tormentor-harasser of the foes born in Bharat dynasty! Desires, attachments, allurements aided by enmity generate-create, never ending chain of struggle (problems, tensions, troubles, tortures), affections & illusions in the creatures, which pushes them to imprudence, ignorance, congenital idiocy creating  a web of repeated birth & deaths ever since the universe came into existence.
इच्छाएँ और द्वेष मनुष्य के मस्तिष्क में ख़लल (खराबी, द्वंद-मोह) उत्पन्न करते हैं। कामनाओं की ये ऐसी दलदल हैं, जिसमें मनुष्य एक बार फँसा तो बाहर निकलना बड़ा मुश्किल है। पुनर्जन्म का मूलभूत कारण कभी खत्म न होने वाली इच्छाएँ हैं, जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। इस दलदल से वही निकल पाता है, जिसने स्वयं को परमात्मा के आगे समर्पित कर दिया हो। डूबते को तिनके का सहारा बन जाता है, हरी स्मरण! प्रभु की शरण में जाते ही, मोह के बंधन कटने लगते हैं और मुक्ति-मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
Never ending desires create obstacles-disturbance in the thinking process of the humans. Prudence is lost and the individual starts sinking in the swamp of lust, sensuality, sexuality, possessions, wealth, comforts and distances himself from the God. This leads him to unending process of births & deaths, like the spider's web. There is no end to desires, which can be reined through the worship, asylum under the God. One, who is drowning seeks protection from the smallest possible source like a straw, then why not the Almighty HIMSELF! The moment one goes to HIM, his problems starts reducing slowly and gradually, bit by bit. Never expect miracles. Sins of billions of births can not be cut over night. Have faith in HIM and the bonds of sins will be cut leading to Liberation-Salvation, slowly, gradually but certainly.
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। 
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥
परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्यों के पाप नष्ट हो गए हैं, वे द्वन्द मोह से रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं। 
परमात्मा ने मानव शरीर की रचना पुण्यकर्म करने के लिए की है न कि भोग-आसक्ति के लिए।[श्रीमद्भगवद्गीता 7.28]
Those pious, virtuous, righteous humans who have ended-lost all their sins, pray-worship ME with firm determination, free themselves from all conflicts, allurements, tensions, troubles. Birth as a human being makes it clear that one has some pious deeds to his credit. 
जन्म-जन्मान्तरों की भक्ति-आस्था मनुष्य के पाप की प्रवृति को शनै-शनै नष्ट करने लगती है। वह दृढ निश्चय करके पुण्य कर्मों में मन लगाता है। उसके मन के द्वन्द दूर हो जाते हैं और वह पूर्ण रूप से भगवान् के अधीन हो जाता है। सत्कार्य, वर्णाश्रम धर्म का पालन, भगवत्भक्ति बड़े सरल प्रतीत होने वाले उपाय हैं, जो उसे भटकने नहीं देते, द्वन्द मुक्त रखते हैं। द्वन्दों का कोई अन्त नहीं है, समाधान अवश्य है। एक समाधान यह है कि अपना ध्यान केवल और केवल प्रभु की सेवा में (समाज सेवा, दीन-हीन, दुखियों की मदद), लगाये और वो भी दृढ निश्चय के साथ। कोई कितना भी बड़ा पापी क्यों न हो, उसे गाहे-बगाहे अपने स्वरूप परमात्मा की सुध अवश्य ही आती है। अच्छी संगत, धर्म गोष्ठियों में आवागमन भी ऐसा अवसर प्रदान करते हैं, जब वह स्वयं को पाप से दूर कर सकता है। 
Virtuous environment-company of religious nature can slowly but gradually push him towards his own self-the component of God-SOUL, sitting inside him and watching him. This leads to reduction of sins. He is confused because of multiple openings for prayers, faith, rituals, worship, asceticism, meditation, concentration in God, piousity, charity, social welfare, helping the needy (poor, down trodden, have not). He is pulled by various faiths, sects, religious openings, which create conflicts. He has to become a recluse, saint, worker, social activist or else, is not clear to him?! Where should he go, for counselling-guidance?! He can continue with his daily routine along with completing his various duties as a household. He can recite the names of the God side by side while walking or discharging various duties, even bathing and shaving,. How so ever cruel, murderous, criminal one may be, one day or other, he will surely remember the Almighty. He is an inseparable entity of the God. Ultimately he can become free from sins and adopt his line of action with firm determination towards the worship-devotion to God.
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। 
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्॥7.29॥ 
वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्ति पाने के लिये जो मेरे मनुष्य मेरा आश्रय-शरण लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जान जाते हैं।[श्रीमद्भगवद्गता 7.29] 
Those who make effort by seeking patronage-asylum under the Almighty to get rid of old age and death, acquaint them selves with the Brahm, complete mythology and the concept of Karm (action, endeavour).
परमात्म ज्ञान को समग्र रूप से जानना उसको ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत (override, elemental spirit) और अधियज्ञ के रूप में जानना है। वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्ति पाने का अर्थ है, उसके आने पर किसी प्रकार का कष्ट, भय, दुःख महसूस न करना। जीवन्मुक्त इनसे परेशान नहीं होते, क्योंकि ये तो शरीर से बन्धन मुक्ति के साधन हैं। ब्रह्म को जानना उसके स्वरूप निर्गुण-सगुण, साकार-निराकार को जानना है, जो कि मन, बुद्धि और इन्द्रियों का विषय नहीं है,अपितु उसको अपरोक्ष रुप से अनुभव करना है। परमात्म तत्व को ज्ञान चक्षु वाला ही जान-समझ सकता है। कर्म को समझना-जानना उसके मर्म को जानना है, क्योंकि एक ही क्रिया विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग अर्थ-फल रखती है। कर्म का भेद जानना भी भी मनुष्य के मुक्ति मार्ग को प्रशस्त करता है, क्योंकि वह फिर उसी मार्ग को चुनता है, जो भक्ति-मुक्ति दायक है। 
Understanding of the gist of the Brahm-Almighty is like knowing HIM as a whole-one entity. HE is the source of mythology, scriptures, history and whole knowledge. HE is the spirit behind each & every activity, event, Yagy, sacrifice, rituals etc. Freedom from old age-agility and death is freedom from its fear, pain, sorrow, since its a means to get rid of the old tattered body. One who is detached, never bother about it. Old age and death cut the bonds, ties, attachments with the world. Knowing the Almighty as one with a form or from less, with characteristics or without characteristics is not the factor related with mind-intelligence or senses. The eager identifies HIM with the help of his enlightenment-prudence. One can feel-experience HIM every moment with HIM after reaching this stage. Understanding Karm-deeds, endeavours, actions is a concept which allows one to find its different impact, (effect, result, reward) in different situations. Same deed shows opposite results depending upon the mentality-intention of the doer. The secret of the Karm opens vistas for the devotee to attain Bhakti & Salvation.
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। 
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥7.30॥ 
जो मनुष्य अधिभूत तथा अधिदैव के सहित और अधियज्ञ के सहित मुझे जानते है, वे मुझ में लगे चित्त वाले लोग अन्तकाल में भी मुझे ही जानते हैं अर्थात प्राप्त होते हैं।[श्रीमद्भगवद्गता 7.30] 
Those who realise ME in the Adhibhut (physical region, human conscious), in the Adhidaev (the divine region) and in the Adhi (Super-Ultimate) Yagy (region of Sacrifice), realise ME even at the time of departure, steadfast in mind.
भगवान् श्री कृष्ण का विराट देखकर अर्जुन ने कहा कि मैं आप में अधिभूत (अनन्त ब्रह्माण्ड), अधिदैव (ब्रह्मा जी) और अधियज्ञ (भगवान् श्री हरि विष्णु) सहित भगवान् शिव और समस्त देवताओं को देख रहा हूँ। अतः तत्व की दृष्टि से भगवान् श्री कृष्ण ही समग्र भगवान् हैं। अधिभूत भौतिक सृष्टि जिसमें तमोगुण की प्रधानता है, स्वतंत्र नहीं है। उसका क्षण मात्र का भी स्थायित्व नहीं है। अधिदैव हिरण्य गर्भ ब्रह्मा जी हैं, जिनमें रजोगुण की प्रधानता है। अधियज्ञ भगवान् विष्णु हैं, जो अन्तर्यामी रूप में सब में व्याप्त हैं। जो व्यक्ति समता को प्राप्त हो चुके हैं और भगवान् में ही लगे हुए हैं वे संसार से उपरत होकर अन्तकाल में केवल परमात्मा को ही जानते हैं। वे किसी भी परिस्थिति में कदापि विचलित नहीं होते।
Arjun saw the Virat Roop, Vast (broad, wide) exposure of Bhagwan Shri Krashn and said that he was visualising the Adhibhut form-Ultimate from constituting of infinite number of universes-representing Tamo Gun, Adhidaev form constituting of the creator Brahma Ji-representing Rajo Gun and the Adhi Yagy form illustrating Bhagwan Vishnu, who is spreaded over all living beings invisibly. The Tamo Guni physical form is grossly unstable and is not free for performing independent activities. Brahma Ji illustrates Rajo Gun responsible for repeated reincarnations. Adhi Yagy Bhagwan Shri Hari Vishnu represents the nurturer who is present in each and every individual, organism, creature, living being. One who is devoted to the Almighty bears all odds and assimilates in the Almighty having attained equanimity. He is always thinking of the Almighty and nothing else.
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम्‌।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः॥8.24॥
जिस मार्ग में ज्योतिर्मय-प्रकाश स्वरूप अग्नि का अधिपति देवता, दिन का अधिपति देवता, शुक्ल पक्ष का अधिपति देवता और उत्तरायण के छः महीनों का अधिपति देवता है, उस मार्ग में शरीर छोड़कर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर (पहले ब्रह्मलोक को प्राप्त होकर) पीछे ब्रह्मा जी के साथ ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।[श्रीमद् भगवद्गीता 8.24]
The Yogi who still has some fractional, remaining desires, motives, is taken sequentially, through the paths followed by the deity, demigod of fire, Agni, the deity of the day, the deity of bright lunar fortnight and thereafter by the deity of the Uttrayan-the six months period, during which the Sun moves from South to North; to the creator Brahma Ji & they too assimilate in the Almighty with Brahma Ji.
इस पृथ्वी पर शुक्ल मार्ग में सबसे पहले अग्नि देवता का अधिकार रहता है। अग्नि रात्रि में प्रकाश करती है, दिन में नहीं क्योंकि अग्नि का प्रकाश दिन के प्रकाश की अपेक्षा सीमित है, कम दूर तक जाता है। शुक्ल पक्ष 15 दिनों का होता है जो कि पितरों की एक रात है। यह प्रकाश आकाश में अधिक दूर तक जाता है। जब सूर्य भगवान् उत्तर की तरफ चलते हैं, तब यह उत्तरायण कहलाता है और यह 6 महीनों का समय देवताओं का एक दिन है। इसका प्रकाश और अधिक दूर तक फैला हुआ है। जो शुक्ल मार्ग की बहुलता वाले मार्ग में जाने वाले हैं, वे सबसे पहले अग्नि देवता के अधिकार में, फिर दिन के देवता के अधिकार में और शुक्ल पक्ष के देवता को प्राप्त होते हैं। शुक्ल पक्ष के देवता उसे उत्तरायण के अधिपति के सुपुर्द कर देते हैं औए वे उसे आगे ब्रह्म लोक के अधिकारी देवता के समर्पित कर देते हैं। इस प्रकार जीव क्रमश: ब्रह्म लोक में पहुँच जाता है और ब्रह्मा जी की आयु पर्यन्त वहाँ रहकर महाप्रलय में ब्रह्मा जी के साथ ही मुक्त हो जाता है तथा सच्चिदानंदघन परमात्मा को प्राप्त हो जाता है।
ब्रह्मविद :: परमात्मा परोक्ष रूप से जानने वालों के लिए है अपरोक्ष रुप रूप से जानने वालों के लिए नहीं, जिन्हें यहीं पर सद्योमुक्ति या जीवन्मुक्ति बगैर ब्रह्मलोक जाये ही प्राप्त हो जाती है।
The period of bright moon light is under the control of the deity of fire Agni Dev. Fire does not produce as much light as is produced by the Sun. Sun light extends farther than the light produced by fire. Bright lunar fortnight constitutes of 15 days, which is the period dominated by the Pitr Gan (the Manes, ancestors). The light extends farther. It is followed by the period of 6 months, when the Sun turns north called Uttrayan in northern hemisphere. The sequence is such that the soul of the relinquished is passed on to the next in the hierarchy to be handed over to the creator Brahma Ji, where it stays and enjoys till the Ultimate devastation takes place and it merges with the Almighty-the Ultimate being, not to return back.
There is yet another version which explains this verse in the form of the phases of Moon. As the organism grows in virtues his status is enhanced from 1 to 16, which is the phase of the Ultimate being-the Almighty. Those with less virtues to their credit and still possess left over rewards of the virtuous, righteous, pious deeds; are promoted to the Brahm Lok in stead of being relinquished straight way to the Almighty by granting him Salvation.
अपरोक्ष क्रम में :: (1). अग्नि: :- बुद्धि सतोगुणी हो जाती है दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव विकसित होने लगता है, (2). ज्योति: :- ज्योति के समान आत्म साक्षात्कार की प्रबल इच्छा बनी रहती है। दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव ज्योति के समान गहरा होता जाता है और (3). अहः :- दृष्टा एवं साक्षी स्वभाव दिन के प्रकाश की तरह स्थित हो जाता है। इस प्रकृम में 16 कलाएँ :– 15 कला शुक्ल पक्ष + 01 एवं उत्तरायण कला = 16 हैं। (3.1). बुद्धि का निश्चयात्मक हो जाना, (3.2). अनेक जन्मों की सुधि आने लगती है, (3.3). चित्त वृत्ति नष्ट हो जाती है, (3.4). अहंकार नष्ट हो जाता है, (3.5). संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं। स्वयं के स्वरुप का बोध होने लगता है, (3.6). आकाश तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। कहा हुआ प्रत्येक शब्द सत्य होता है, (3.7). वायु तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। स्पर्श मात्र से रोग मुक्त कर देता है, (3.8). अग्नि तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। दृष्टि मात्र से कल्याण करने की शक्ति आ जाती है, (3.9). जल तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। जल स्थान दे देता है। नदी, समुद्र आदि कोई बाधा नहीं रहती, (3.10). पृथ्वी तत्व में पूर्ण नियंत्रण हो जाता है। हर समय देह से सुगंध आने लगती है, नींद, भूख प्यास नहीं लगती, (3.11). जन्म, मृत्यु, स्थिति अपने अधीन हो जाती है, (3.12). समस्त भूतों से एक रूपता हो जाती है और सब पर नियंत्रण हो जाता है। जड़ चेतन इच्छानुसार कार्य करते हैं, (3.13). समय पर नियंत्रण हो जाता है। देह वृद्धि रुक जाती है अथवा अपनी इच्छा से होती है, (3.14). सर्व व्यापी हो जाता है। एक साथ अनेक रूपों में प्रकट हो सकता है। पूर्णता अनुभव होती है। योगी-विमुक्त लोक कल्याण के लिए संकल्प धारण कर सकता है, (3.15). कारण का भी कारण हो जाता है। यह अव्यक्त अवस्था है, (3.16). उत्तरायण कला :- अपनी इच्छा अनुसार समस्त दिव्यता के साथ अवतार रूप में जन्म लेता है जैसे राम, कृष्ण। यहाँ उत्तरायण के प्रकाश की तरह उसकी दिव्यता फैलती है। सोलहवीं कला पहले और पन्द्रहवीं को बाद में स्थान दिया है। इससे निर्गुण सगुण स्थिति भी सुस्पष्ट हो जाती है। सोलह कला युक्त पुरुष में व्यक्त अव्यक्त की सभी कलाएँ होती हैं। यही दिव्यता है।[वेदों के समान ही विभिन्न विद्वानों ने गीता की व्याख्या भी अलग-अलग की है। परन्तु मूल तत्व सब जगह एक ही रहता है]
सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन। 
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्॥
हे अर्जुन! सम्पूर्ण सृष्टियों के आदि, मध्य तथा अंत में मैं ही हूँ। विद्याओं में अध्यात्म विद्या-ब्रह्म विद्या और परस्पर शास्त्रार्थ करने वालों का (तत्व निर्णय के लिए जाने वाला) वाद मैं हूँ।[श्रीमद् भगवद्गीता 10.32]
The Almighty took the opportunity to establish that HE was the force behind all creations-evolution, at their beginning, middle and the end. HE was present at all points of time. HE constituted the Ultimate knowledge & the gist (nectar, theme, central idea, elixir) of it. HE was behind all opinions-sects and those who debated the gist of the Ultimate, their knowledge and arguments-logic pertaining to supreme self.
जितने भी सर्ग, उपसर्ग, सृष्टि के आदि मध्य और अन्त हैं, उन सभी में परमात्मा मौजूद रहते हैं। इस सम्बन्ध को जानने पर, मनुष्यों को हर वक्त, हर घड़ी भगवान् का स्मरण करना चाहिए। संसार का अभाव करके, निर्गुण परमात्मा का जानना, अध्यात्म विद्या है। इसमें निर्गुण स्वरूप की प्रभु सत्ता है। यह मनुष्य के लिए कल्याणकारी है। इसकी प्राप्ति के बाद मनुष्य को कुछ भी जानने-पढ़ने के लिए शेष नहीं रहता। परमात्मा से सम्बन्धित वाद-विवाद, शास्त्रार्थ, विचार-विमर्श परमात्मा के सच्चे स्वरूप को जानने के लिए है। इसमें व्यर्थ की तकरार के लिए कोई स्थान नहीं है। किसी भी राय को वाद का नाम दिया गया है। इसमें निष्कर्ष की सम्भावना नगण्य है। अतः यह भी भगवान् की विभूति है। आत्मज्ञान, अध्यात्म विद्या अथवा ब्रह्म विद्या परमात्मा की विभूति इसीलिए हैं। यह सबसे सरल, सुगम और प्रत्यक्ष अनुभव का विषय है। यह समझने की बात है कि "संसार में नित्य, अनवरत परिवर्तन हो रहा रहा है, फिर भी शरीरी-आत्मा वही है और केवल शरीर बदल रहा है"। 
Various phases of cosmic era, their beginning, middle and the termination-dooms day (annihilation) see the God. One who knows, understands this, always keep remembering the Almighty. Elimination of the Universe and efforts to know the Almighty constitutes the "Atm Vidya", self realisation. The God is present at all points of time & HE is behind all creations, destruction, nurture with HIS might. This is Almighty's characteristics-traits, quality, factor less image. One who has identifies this, is willing to do his own welfare through righteous, virtuous, honest, pious means. Nothing is left to be acquired after this possession. That makes it, God's Ultimate form of spiritual knowledge. One might come to some conclusion about the God's real identity by debating (discussions, analysis) with others in an effort to seek their opinion. This opinion too becomes God's supreme form through the process of elimination-analysis & synthesis. However, no one can come to last & final opinion-conclusion, since the Almighty has infinite variants. One realises that HE is still the same in spite of the changing world, HIS physical-chronological age. The soul remains same but the body which bears it, has undergone tremendous change. This makes it supreme knowledge-realisation; a form of the Ultimate-Almighty.
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। 
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥
भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा :- हे कुन्तीपुत्र अर्जुन! यह-रुप से कहे जाने वाले शरीर को क्षेत्र-इस नाम से कहते हैं और इस क्षेत्र को जो जानता है, उसको  ज्ञानी लोग क्षेत्रज्ञ-इस नाम से कहते हैं।[श्रीमद् भगवद्गीता 13.1] 
Bhagwan Shri Krashn addressed Arjun as Kunti Putr & said :- This physical-human body represents the miniature universe called the Kshetr (region, field) or creation. One who knows the creation is called the Kshetragy (creator or Spirit) by the enlightened-scholars.
मनुष्य भौतिक-सांसारिक प्राणियों यथा वस्तु, पशु, पक्षी, मेरा, मैं आदि नामों से जानता-पुकारता है। उसके 3 प्रकार के शरीर :- स्थूल, सूक्ष्म और कारण भी इसी प्रकार पहचाने जाते हैं।
स्थूल शरीर :: अन्नमयकोश पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश से बना है, जो माता-पिता के रज-वीर्य से बने हैं। 5 ज्ञानेन्द्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 प्राण, मन और बुद्धि से यह सूक्ष्म शरीर-प्राणमयकोश  बनता है। मन की प्रधानता से यह मनोमयकोश तथा बुद्धि की प्रधानता से यह विज्ञानमय कोश कहलाता है।
कारण शरीर :: मनुष्य को बुद्धि तक का ज्ञान होता है और इससे आगे का ज्ञान नहीं होता। अतः यह अज्ञान सम्पूर्ण शरीरों का कारण होने के कारण, कारण शरीर कहलाता है। इस कारण शरीर को स्वभाव, आदत और प्रकृति भी कहा जाता है। इसी को आनन्दमयकोश भी कह देते हैं। जाग्रत अवस्था में स्थूल शरीर की प्रधानता होती है और उसमें सूक्ष्म और कारण शरीर भी साथ रहता है। सुषुप्ति अवस्था कारण शरीर की होती है। सुषुप्ति अवस्था में दुःख का अनुभव नहीं होता; अतः इसे आनंदमय कोष कहते हैं।
सूक्ष्म शरीर :: मृत्यु के पश्चात् अभौतिक प्राप्त शरीर।
ये तीनों प्रकार के शरीर क्षेत्र इसलिए कहलाते हैं; क्योंकि इनका प्रतिक्षण नाश होता रहता है। शरीर खेत के समान है, जिसमें बीज बोने से फ़सल पैदा होती है, उसी प्रकार कर्मों के संस्कार फ़ल के रुप में प्रकट होते हैं। जीवात्मा इस शरीर को अपना मानता है, यद्यपि वह है परमात्मा का अंश। जिन्हें क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का का बोध हो चुका है, वे तत्वज्ञ इस जीवात्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
The humans recognise himself with the physical, material, worldly entities like matter-material objects, animals, birds, mine, my, I etc. The body has three different forms Physical-macro, micro-minutest and the causative leading to yet another birth.
The physical body is composed of 5 basic-root components :- Earth, Water, Air, Energy and the Sky. Its the result of the combination of the sperms and ovum of the parents. The body gets a soul with 5 sense organs, 5 work or functional organs, 5 kinds of airs, the mind (brain with heart, psyche, gestures) and the intelligence. The micro body is called the store house of soul. The significance of mind (brain & heart) makes it the store of mental capabilities-potentials and the superiority of the intelligence, makes it the store of scientific intellect. The human being is aware of what is known through intelligence. Mind is the limit. One is not aware of what is next?! The lack of further knowledge causes the next births. This is called as nature, self or habit. When one is awake, the material body is supreme which is associated by the logic-reason body and the micro body. Under the influence of unconscious state one do not feel-experience pain. This is the state of pleasure.  These three kinds of bodies (space where the soul can be found) are called fields-Kshetr, since they undergo destruction every moment, like sowing and cutting of crops.
MICRO BODY :: Its that state of soul which is called spirit and takes the soul to Dharm Raj to enter a new body, physical entity, incarnation. The body is like the field where the crops grow in the form of deeds, resulting in some sort of output leading to further births. The organism-human being considers this body as his own and identifies himself with it which in fact an organ-component of the God. One who has realized the gist of physique and the occupier is called the enlightened.
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। 
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥
हे भरत वंशोद्भव अर्जुन! तू सम्पूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही समझ और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही मेरे मत में ज्ञान है।[श्रीमद् भगवद्गीता 13.2] 
Bhagwan Shri Krashn addressed Arjun as Bharat and asked him to consider HIM as soul-Kshetragy in all the bodies-Kshetr & stressed that the knowledge of both the soul-Kshetragy and Kshetr-bodies; is transcendental knowledge-enlightenment in HIS opinion.
सम्पूर्ण क्षेत्रों (शरीरों) में मैं (अहंभाव) क्षेत्र है और हूँ मैंपन का ज्ञाता क्षेत्रज्ञ है अर्थात सम्पूर्ण क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ वही हैं। किसी विषय का ज्ञान ज्ञेय है। उसे बाह्य करण कान और नाक आदि तथा अन्तःकरण मन, बुद्धि आदि से जाना जाता है। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार में अहंकार सबसे सूक्ष्म है, जिसे जानने वाला प्रकाश रुप क्षेत्रज्ञ परमात्मा स्वरुप है। परमात्मा का कहना है कि जिस प्रकार मनुष्य अपने को शरीर में मानता है और शरीर को अपना मानता है, उसी प्रकार वह स्वयं को परमात्मा में जाने और माने, क्योंकि उसने  शरीर के साथ जो एकता मान रखी है, उसे छोड़ने को परमात्मा के साथ एकता माननी जरूरी है। शरीर की एकता संसार से है और क्षेत्रज्ञ-जीव की स्वाभाविक एकता परमात्मा से होते हुए भी जीव अपनी एकता शरीर से कर लेता है। प्रभु का यही आदेश है कि क्षेत्रज्ञ की एकता उनके साथ ही माननी चाहिये। हकीकत में क्षेत्रज्ञ के रुप में स्वयं ब्रह्म-परमात्मा ही मनुष्य-प्राणी में विद्यमान हैं। क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का यही ज्ञान यथार्थ ज्ञान है। अनेक विद्याओं, भाषाओँ, लिपियों, कलाओं, तीनों लोकों और चौदह भुवनों का ज्ञान संसार से सम्बन्ध जोड़ने-भटकाने  वाला होने के कारण, अज्ञान की श्रेणी में आता है।
The ego (I, my, me, mine, pride, arrogance) is present in all the bodies-Kshetr and the one who is aware of this defect is the Kshetragy, (Atma, Soul-a component of Brahm-The Almighty). In fact the Brahm is present in all the bodies as Kshetragy-the soul, a component of the God. The desired-deemed knowledge of any subject is obtained through external means like eyes and ears etc., while it is obtained through the internal faculties like mind (brain & heart) & intelligence, simultaneously. Ego is a component of the mind and intelligence & is deeply seated-rooted at micro level in the human beings. The God says that the manner in which the human being identifies himself with the body, due to ego, in the same manner, he should recognise-attach himself with the God. He should identify himself with the God & not with the body-universe. He has to desert oneness with the body to assimilate in the Almighty-Brahm. He should attach-align himself with the God-the Kshetragy. In fact the God HIMSELF is present in the creature-organism-humans etc. This understanding is enlightenment. Learning of various languages, arts, three abodes, 14 heavenly abodes is useless, since it repels the organism away from the God.
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्। 
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु॥
वह क्षेत्र जो है और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिससे जो पैदा हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो है और जिस प्रभाव वाला है, वह सब संक्षेप में मुझसे सुन।[श्रीमद् भगवद्गीता 13.3] 
The Almighty asked Arjun to listen to the characteristic of the Kshetr-creations, its defects and the origin of the produces and the creator-the Kshetragy his effects, impacts, powers in brief.
परमात्मा श्री कृष्ण ने अर्जुन को उस क्षेत्र का स्वरूप, स्वभाव, प्रकृति तथा वह जिससे वह पैदा हुआ है, उस क्षेत्रज्ञ का वर्णन उसका स्वरूप, प्रभाव आदि सब प्रकार का वर्णन संक्षेप में सुनने  कहा।
The Almighty desired to narrate in brief the creation (universe & the human body) with its configuration, nature, form and Who has produced it with its configuration, effects-characteristic.
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्। 
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥
यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों के द्वारा बहुत विस्तार से कहा गया है तथा वेदों की ऋचाओं द्वारा बहुत प्रकार से विभाग पूर्वक कहा गया है और युक्ति-युक्त एवं निश्चित किये हुए ब्रह्म सूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है।[श्रीमद् भगवद्गीता 13.4]
The sages, seers, ancient scholars, authors have separately described the gist of creation and the creator (Soul & the Almighty) in various ways-forms in great detail, in the Vedic hymns and also in very logical, conclusive and convincing verses of Brahm Sutr (formulae discussing step by step in very-very precise manner) & other other scriptures.
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का यह ज्ञान-भेद सबसे भगवान् विष्णु ने ब्रह्मा जी को और फिर वैदिक मन्त्रों के द्रष्टा अन्यानेक ऋषियों-मुनियों के द्वारा अपने-अपने शास्त्र-स्मृतियों सहित वेदों (ऋक्, यजुः, साम और अथर्व) की संहिता और ब्राह्मणों के भागों के मन्त्रों के अन्तर्गत सम्पूर्ण उपनिषद्, शास्त्रों, स्मृतियों पुराणों और ग्रन्थों में जड़-चेतन, सत्-असत्, शरीर-शरीरी, देह-देही, नित्य-अनित्य आदि शब्दों में बहुत विस्तार और बेहद युक्ति-युक्त तरीके से समझाया है।
Bhagwan Vishnu first passed on the knowledge of the difference of Kshetr-the creation & Kshetragy-the creator to Brahma Ji, who in turn transferred in depth knowledge to the sages, seers, virtuous scholars, philosophers through the treatises, verses, hymns of the 4 Veds (Rik, Yajur, Sam and Atharv), Brahmans (scriptures sub dividing and elaborating the intricate details step by step in order to make the meaning, absolutely clear; in the form of formulae-various permutations & combinations), Upnishads, Purans memories-Smratis and various other sub titles from time to time, explaining the intricacies of living & non living, pious-virtuous & vices, body & soul, embodied & without body, existent & non existent in very logical and orderly sequences.
महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। 
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥
मूल प्रकृति और समष्टि बुद्धि (महत्तत्व), समष्टि अहंकार, पाँच महाभूत और दस इन्द्रियाँ, एक मन तथा पाँचों इन्द्रियों के पाँच विषय-यही 24 तत्वों वाला क्षेत्र है।[श्रीमद् भगवद्गीता 13.5]
The Kshetr (human body) constitutes of nature and macro intelligence, ego (I, my, me, mine; Id, ego, super ego) five basic elements, ten organs, mind, five sense objects; in total 24 elements.
अव्यक्त मूल प्रकृति है। समष्टि बुद्धि से अहंकार उत्पन्न होता है। पञ्च महाभूत का कारण होने से यह प्रकृति है और विकृति भी है। 5 महाभूत पृथ्वी, जल, तेज़, वायु और आकाश हैं। दस इन्द्रियों में 5 ज्ञानेन्द्रियाँ श्रोत्र (कान), त्वचा (खाल-स्पर्श), नेत्र (आँखें), रसना (जीभ) और घ्राण (नाक) हैं। 5 कर्मेन्द्रियाँ वाक् (बोलना), पाणि, पाद (पैर), उपस्थ और पायु हैं। अपञ्चिकृत महाभूतों से पैदा होने के कारण और स्वयं किसी का भी कारण ने होने से मन केवल विकृति ही है। शब्द, स्पर्श, रुप, रस और गन्ध 5 ज्ञानेन्द्रियों के 5 विषय हैं।
The human body constitutes of 24 basic elements-components which are obtained from nature along with intelligence, ego, 5 basic physical components earth, water, air, energy and the sky. There are 10 organs constituting of 5 sense organs including ears, skin, eyes, tongue and nose with 5 functional organs i.e., organs of work speech-tongue, hands, feet, reproduction organs and the organs of excretion. The mind (will, gestures, desires, mood, thoughts, imagination etc.) represent defects. Sound, speech, beauty (shape, figure), extracts-juices and scent are the 5 motives of sense organs.
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः। 
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्॥
इच्छा, द्वेष, सुःख-दुःख, संघात (stroke, heap, striking, impact, striking down, a group, a heavy blow, collection, quantity, mass, blow, multitude), चेतना (प्राण शक्ति) और घृति; इन विकारों सहित यह क्षेत्र संक्षेप से कहा गया है।[श्रीमद् भगवद्गीता 13.6] 
This entire body (field, Kshetr, creation) has been briefly described with its transformations as the one constituting of desire, envy-hatred, pleasure, pain, the physical body, consciousness and resolve.
इच्छा मूल विकार है। समस्त पाप, दोष और दुःख इच्छाओं से ही पैदा होते हैं। कामना और अभिमान में बाधा उत्पन्न होने पर क्रोध पैदा होता है, जो कि द्वेष, डाह (जलन-ईर्ष्या) का सूक्ष्म रुप है। अनुकूल परिस्थितियाँ मन में सुःख पैदा करती हैं। प्रतिकूल, मन-इच्छा के विपरीत परिस्थितियाँ दुःखदाई होती हैं। 24 तत्वों से बने शरीर समूह को हानि-कष्ट पहुँचने को संघात कहा गया है। शरीर का उत्पन्न होकर सत्ता रूप में दिखना और उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होते रहना भी विकार है। प्राण शक्ति (dynamia, elan vital, life force) को चेतना कहा गया है जो कि परिवर्तनशील है,क्योंकि यह निरन्तर नष्ट-घटती रहती है। प्राणमय शरीर को चेतन और निष्प्राण को अचेतन माना गया है। धैर्य-धारणा शक्ति (patience, resolve, endurance, fortitude, courage, boldness) को घृति कहा गया है। धैर्य का कम ज्यादा होना भी विकार है। इसी प्रकार समष्टि और व्यष्टि शरीर के एकता लिये हुए, विकार हैं। शरीर के साथ तादात्म्य होने पर जो ये विकार होते हैं, उनको ज्ञान के द्वारा मिटाया जा सकता है।
The desire-wants constitute the main defect with the human beings. All sins-defects are the outcome of desires-longing. Obstacles-obstructions in the fulfilment of desires generate-create anger (ego, pride), which gives rise to envy-feeling of revenge, reciprocate-strike back. Favourable conditions generate pleasure while anti-opposite conditions generate pain. The group of 24 entities called body-Kshetr (heap, group, collection, quantity, mass, multitude) is harmed due to strike (blow, stroke, impact). Creation & appearance of the body is a defect in itself. The dynamia, elan vital, life force is called consciousness which too is slowing down-receding every moment, thus a defect. The body with soul is called conscious, (alive, living) and the one without soul is called unconscious (non living, dead). The capability to bear-tolerate is patience, which too is diminishing or increasing, making it a defect. The micro or macro status of the body which are generated with the development of rapport with the body, are defects in themselves, which can be controlled (reduced, minimised) by making use of knowledge-enlightenment. 
ELAN VITAL :: जीवन शक्ति, जीवन प्रवाह; vitality, vital-force
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥
अपने में श्रेष्ठता का भाव न होना, दिखावटीपन न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, स्थिरता और मन का वश में होना।[श्रीमद् भगवद्गीता 13.7]
One ought to have qualities like humility, modesty, nonviolence, forgiveness, simplicity-honesty, service of elders-Guru, internal & external purity of thought, (in word and deed) steadfastness, self restraint-control in him.
मनुष्य में किसी भी प्रकार से बड़प्पन-श्रेष्ठता का भाव-अहंकार नहीं होना चाहिये। साधक में अहम् भाव कम होने से वह चिन्मयता (pervaded or permeated by pure consciousness) की ओर तेज़ी से बढ़ेगा। मनुष्य के द्वारा अपने से श्रेष्ठ पुरुषों, तत्वज्ञों, अपने से बड़ों की संगत-दूसरों की विशेषता का सम्मान करने से, मान (गरूर, घमण्ड, अहंकार)-श्रेष्ठता का भाव उत्पन्न नहीं होगा। ज्ञान मार्ग में भय का अभाव होने से तत्वज्ञानी सभी जगह प्रभु को ही देखता है। मानीपन का अभाव स्वतः हो जाता है। वह शरीर से एकता नहीं मानता। परमात्मा को सभी जगह देखने से उसमें अभय हो जाता है। दम्भ बनावटी पन-दिखावटी पन की निशानी और दुर्गुण है। इससे साधक में स्थिलता आ जाती है। मनुष्य में किसी भी प्रकार की हिंसा (अपने द्वारा, किसी अन्य से करवाकर या अनुमोदित-समर्थन करके) नहीं होनी चाहिये। साधक को सबके हित सुख, सेवा में ही अपना भला देखना चाहिए। साधक में क्षमा, सामर्थ होते हुए भी दण्ड न देने, बदले की भावना नहीं होनी चाहिये तथा उसमें सहनशीलता होनी चाहिये। मनुष्य में अकड़-ऐंठ, न होना, कपट, ईर्ष्या, द्वेष, छल, व्यंग, निंदा, चुगली न करना, अपमानजनक शब्द न बोलना सरलता की निशानी हैं। अपने से बड़े, ज्ञानी, विद्वान, बुजुर्ग आदि के प्रति सेवा, आदर-सत्कार, समर्पण का भाव होना चाहिये। शिष्य का कर्तव्य है गुरु की सेवा और गुरु का कर्तव्य है, शिष्य का कल्याण। मनुष्य में अन्तःकरण और वाह्य दोनों प्रकार की शुद्धि होनी ज़रूरी है। भगवान् के प्रति दृढ़ विश्वास, विचलित न होना, भोगों और संग्रह के प्रति अनासक्ति, शास्त्र व संतों के वचनों के प्रति विश्वास, होने से साधक में स्थिरता आ जायेगी। राग-द्वेष को छोड़ना मन को काबू-वश में करना आत्म-निग्रह है।
One who is dedicated to the Almighty should be free from ego-pride of any kind. Absence-discarding of ego (I, my, mine, me) helps him moving towards pure, pervaded, permeated consciousness. Company of the enlightened, scholars, philosophers, saints, elders, Guru will eliminate the feeling of being big, greater than others (greater, inferior etc are relative terms). Being enlightened or having attained the gist of the God, will make him see the God, everywhere in each and everyone. He does not recognise himself with the body, discarding attachment with the world. Having witnessed Almighty everywhere, will make him fearless-bold. Showing off-demonstrative behavior is a bad habit-omen, which makes the practitioner still, static, inertial, lethargic, retarding his movement towards the Ultimate. He should discard violence and forgive the guilty in spite of being capable of punishing him. He should not support violence of any nature. He should be devoted to the service of the mankind, poor, needy. He should be tolerant. He should not indulge in vices or abusing or insulting others, in any way-means. He should not be deceptive, envious and abstain from backbiting or making fun of others. He should serve the elders, saints, enlightened, scholars, philosophers and they should reciprocate him through well wishes-blessings. His internal and external faculties should be pure. He should have firm faith in the God-eternity. He should discard comforts, collection of goods and commodities. He would gain confidence through these means leading to steadfastness, self restraint-control in him. He should discard enmity with others. He will be able to control-stabilise himself.
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहंकार एव च। 
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्॥
साधक का इन्द्रियों के विषयों में वैराग्य होना, अहंकार का न होना और जन्म, मृत्यु वृद्धावस्था तथा व्याधियों में दुःखरूप दोषों को बार-बार देखना चाहिये।[श्रीमद् भगवद्गीता 13.8]
The practitioner should evolve aversion towards sense objects, absence of ego, constant reflection on pain and suffering inherent in birth, old age, disease and death.
साधक को जीवन-निर्वाह के लिये विषयों का सेवन करते हुए भी उनके प्रति राग, आसक्ति या लगाव नहीं होना चाहिये। विवेक का सहारा लेकर अहंकार-अभिमान, दम्भ का त्याग कर देना चाहिये। मनुष्य जब जन्म-मृत्यु, वृद्धावस्था और बार-बार होने वाली व्याधि-बीमारियों के बारे में विचार करता है, तो उसका उत्पत्ति-विनाशशील पदार्थों में राग कम हो जाता है और वो भोगों से वैराग्य की ओर मुड़ जाता है। शरीर आदि जड़ पदार्थों के प्रति उसका मोह भंग हो जाता है। नाशवान-नश्वर वस्तुओं में सुख की खोज ही दुःख-परेशानी का कारण है।
The devotee-practitioner should continue to utilise the commodities, faculties meant for survival without attaching-devoting himself to them. Whosoever has born, has to go one day or the other. Attachment and pride due to the availability of perishable-mortal goods, titles is the cause of pain. Prudence helps one in detaching with the ego. He should consider (see, find) the cause of pain in birth, death, old age & illness-disease in comforts, consumption and attachment with the material-perishable world. The human body is material-perishable. Desire to trace pleasure in it and the worldly objects causes pain-sorrow.
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु। 
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु॥[श्रीमद् भगवद्गीता 13.9]
आसक्ति रहित होना, पुत्र, स्त्री, घर आदि में एकात्मता (घनिष्ठ) सम्बन्ध) न होना और अनुकूलता-प्रतिकूलता प्राप्ति में चित्त का नित्य सम रहना।
One should perform his Varnashram duties as a house hold carefully, with devotion-perfection, neutrally without attachment, involvement-fondness (avoidance of close affinity, which becomes an obstacle in Liberation) with son, wife, home & to maintain unfailing equanimity towards attainment of the desirable and the undesirable.
संसार और उसके प्राणियों, परिवार, घटनाक्रम, परिस्थिति के प्रति आसक्ति मुक्ति में बाधक है, क्योंकि मनुष्य इनमें सुख देखता है, जो कि संयोग से प्राप्त होता है, जबकि वास्तविक सुख संयोग से वियोग है। उसे अपने वर्णाश्रम धर्म-कर्तव्यों का  पालन निष्ठा और ईमानदारी के साथ, बगैर लिप्त हुए करना चाहिये। वह सुख-दुख, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों के प्रति सम भाव रखे। मन को शान्त-विकारहीन रखे। इससे ऊँचा उठकर परमात्म तत्व में ध्यान लगाने से साधक  का चित्त इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में स्वतः सम रहेगा।
Involvement in the worldly activities, family, incidents-events, occasions, favourable or difficult situations, make it difficult for the practitioner to attain Liberation-assimilation in the Almighty. One finds pleasure-bliss in family, son, wife, home etc., which is bound to come by virtue of destiny. One should perform his Varnashram duties with dedication-honestly without being involved. He should be neutral-isolated to pleasure & pain, keep the cool of mind and maintain equanimity with the desirable and undesirable. He should rise above the physical-material world & meditate in the God, which will keep him free from indulgence in material world.
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी। 
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥[श्रीमद् भगवद्गीता 13.10]
मुझ में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति का होना, एकान्त स्थान में रहने  का स्वभाव होना और जन समुदाय में प्रीति का न होना।
The Almighty explained that one should have and unswerving, undivided faith, devotion in HIM through single-minded contemplation, habit of living in remote (isolated, solitude, away from the public-hustle & bustle i.e., distaste for social-public gatherings, gossips) to concentrate-meditate in HIM.
परमात्मा ने बताया कि देहाभिमान, तत्व ज्ञान और भक्ति में बाधक है। अनन्य योग अर्थात केवल प्रभु की शरण के द्वारा मनुष्य सरलता से देहाभिमान से मुक्त हो सकता है। साधक तत्व ज्ञान से भक्ति की प्राप्ति कर सकता है। कर्म, ज्ञान और भक्ति तीनों हो मार्ग परमात्मा की प्राप्ति में सहायक हैं। ज्ञान योग में भाव और विवेक दोनों ही सहयोगी क्रियाएँ हैं। एकान्त-निर्जन में मनुष्य का ध्यान नहीं बँटता और स्वाभाविक रुप से साधना सम्पन्न हो जाती है।
The ego of being an entity, something, obstruct in realising the gist (nectar, elixir) of enlightenment and devotion. One can free himself from this defect of ego of having the human incarnation, by taking shelter under the God. Gist of enlightenment helps in undivided-single minded contemplation-devotion. Three routes Karm Yog, Gyan Yog and the Bhakti Yog to Ultimate are helpful in realising the God. Gyan Yog has temperament, essence, gesture and prudence which helps in the realisation of God. Solitude helps one in concentrating in the Almighty.
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्। 
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥[श्रीमद् भगवद्गीता 13.11]
अध्यात्म ज्ञान में नित्य-निरन्तर रहना, तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को सब जगह देखना, ये (पूर्वोक्त बीस साधन समुदाय) तो ज्ञान है और जो इसके विपरीत है, वह अज्ञान है, ऐसा कहा गया है।
It has been said the 20 postulates of enlightenment explained in earlier 10 verses constitute the core of knowledge i.e., the Ttvgyan-the gist of the Almighty and the rest is ignorance & one should be steadfastness in acquiring the knowledge of Spirit-Soul and seeing the omnipresent Supreme Being everywhere.
इसके पहले के 10 श्लोकों में 20 साधन कहे गए हैं, जो साधक की मुक्ति में सहायक हैं और जिनके अतिरिक्त शेष सब अज्ञान है। वे परमात्म तत्व को स्पष्ट करते हैं। साधक हर वक्त परमात्मा का चिन्तन करें और समझे कि यह संसार नित्य-निरन्तर नहीं है और निस्सार है, जबकि परमात्मा नित्य निरन्तर है और उसके सिवाय किसी अन्य की कोई सत्ता नहीं है। मनुष्य तत्वज्ञ महापुरुषों से तत्वज्ञान और दर्शन सम्बन्धी मार्ग दर्शन ग्रहण करे। उसका लक्ष्य केवल मात्र परमात्मा हो और कुछ नहीं। साधक बुद्धि-विवेक का सहारा लेकर दुर्गुणों का त्याग करे और समता, वैराग्य को ग्रहण करे। क्षेत्र-शरीर और क्षेत्रज्ञ-आत्मा (परमात्मा) को अलग-अलग समझे और उसके अनुरुप व्यवहार करते हुए देहाभिमान से मुक्त हो जाये।
The practitioner should understand the message given in earlier 10 verses in the form of 20 ideals-guide lines and try to understand the gist of the Almighty through meditation-concentration and ultimately penetration. These 20 postulates constitute the core of knowledge-enlightenment and the rest is mere ignorance. He should realise that the world is non entity. It is perishable. Its advantageous to the devotee in the form of the place which can be used for the achievement of the God. Its a means, not the goal. Except the God everything is perishable, meaning less, nonexistent in due course of time. He should seek guidance from the saints, sages, priests, philosophers, scholars, epics, scriptures and think of the reality behind creation, its purpose-motive which is nothing except preparation of the devotee to assimilate in the God. His sole goal is Almighty and nothing else. He should know the creation as body and the creator as the God and decide his course in future.
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥[श्रीमद् भगवद्गीता 13.12]
जो ज्ञेय (पूर्वोक्त ज्ञान से जानने योग्य) है, उस (परमात्म-तत्व) को मैं अच्छी तरह कहूँगा, जिसको जानकर (मनुष्य) अमरता का अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्व) अनादि वाला (और) परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है (और) न असत् (non existent, unfounded, illusory, untruth, falsehood, unreal) ही (कहा जा सकता है)।
Bhagwan Shri Krashn asserted that he would fully describe the Parmatm-Tatv (the gist of the Ultimate knowledge, ought to be known) object of knowledge, by knowing which one experiences immortality. The immortal-imperishable is Par Brahm-Supreme Being, who can not be called either existent-eternal or nonexistent-temporal.
भगवान् श्री कृष्ण ने कहा कि वे उस ज्ञेय-जानने योग्य परमात्म-तत्व को स्पष्ट करेंगे, जिसकी प्राप्ति के लिये मानव शरीर प्राप्त हुआ है। परमात्म-तत्व को जानने के बाद मनुष्य अमरता का अनुभव करता है। उस आदि अन्त रहित, परमात्मा से ही संसार उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है। वह आदि, मध्य और अन्त में यथावत रहता है। उस परमात्मा को ही परम ब्रह्म कहा गया है। उसके सिवाय अन्य कोई दूसरा व्यापक (comprehensive, pervasive), निर्विकार (immutable, invariable, unchanged, without defect), सदा रहने वाला तत्व नहीं है। उसे न सत् और न ही असत् कहा जा सकता है, क्योंकि वह बुद्धि का विषय नहीं है। वह ज्ञेय तत्व मन, वाणी और बुद्धि से सर्वथा अतीत है। उसका शब्दों में वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है।
Bhagwan Shri Krashn told Arjun that HE would make clear the concept (gist) of the Ultimate knowledge to him, for achieving which human incarnation is obtained. Having recognised the Parmatm Tatv (the gist, nectar, elixir of the Almighty) the practitioner-devotee experiences immortality. The universe takes birth in that endless-perennial (चिरस्थायी, forever) Almighty and vanishes in HIM. HE remains as such in the beginning, middle and at the end. That God is called-termed as Par Brahm. Nothing other than HIM is comprehensive, defect less and for ever. HE is neither existent-eternal nor nonexistent-temporal, since HE is beyond the limits of brain-intellect. HE is the only one who ought to be known; is beyond imagination, thought, intelligence and speech. Its not possible to describe HIM in words.
यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम्। 
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥
हे भरतवंशी अर्जुन! इस प्रकार जो मोह रहित मनुष्य मुझे पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ सब प्रकार से मेरा ही भजन करता है।[श्रीमद्भगवद्गीता 15.19] 
The Almighty addressed Arjun as Bharat Vanshi-born in Bharat Clan and said that the enlightened (prudent, wise) who recognised HIM as the Ultimate, worshipped HIM only, wholeheartedly through all possible means.
परमात्मा का सनातन अंश जो जीवात्मा परमात्मा के तत्व को जान-समझ गया, उसका कल्याण स्वतः हो जाता है। वह और सभी गतिविधियों को सुचारु रुप से चलाते हुए अपने कर्तव्य का निर्वाह करता है। वह परमात्मा को पुरुषोत्तम के रुप में जानकर अपनी शक्ति-ऊर्जा का प्रयोग भगवत्भक्ति में करता है और अपने संसाधनों, इन्द्रियों को अविचलित हुए भगवत भजन में लगा देता है। उसकी दृष्टि में सिवाय भगवान् के कुछ अन्य है ही नहीं।
The Soul is eternal and a component of the God. One who has understood this, channelise his energies for the worship of the God. He has grasped the gist of the Ultimate. He performs all his activities in accordance with the scriptures (Ved, Puran Upnishad, Geeta, Ramayan, Maha Bharat etc.) and fulfil all his worldly responsibilities-duties to his best. He utilises all his resources for the betterment of the society and elevation of the poor-down trodden. He utilises his spare time in religious activities like pilgrimage, reading-listening to epics, Veds, Purans, Hari Katha, singing God's names, recitation of prayers devoted to the God. He perform charity and donate according to his capability only for the sake of the deserving one. He treats all beings at par. He is equanimous. He finds God in each and every one. In this way he prays to the God through all possible means known to him.
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ। 
एतद्‌बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥
हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान तथा कृतकृत्य हो जाता है।[श्रीमद्भगवद्गीता 15.20]  
The Almighty called Arjun Bharat Vanshi & sinless and said that HE had transferred-narrated the most secret-confidential and intricate, transcendental & Absolute knowledge to him for the benefit of the masses. One who learns, follows, practices, adopts this knowledge in life, accomplishes his duties, becomes enlightened and paves the pay for his relinquishment and assimilation in HIM.
भगवान् ने अर्जुन को निष्पाप कहा, क्योंकि उनके अन्दर अपने विरोधियों के लिए भी द्वेष, क्रोध, रोष आदि नहीं थे। उनकी दृष्टि दोष रहित थी। ज्ञान कभी भी अयोग्य, कुपात्र, दोषदृष्टि युक्त व्यक्ति के लिए नहीं होता, इस कारण से ही अत्यंत गोपनीय कहा गया है। वर्तमान काल में ढोंगी, पाखण्डी, आडम्बर करने वाले भी अपने आप को ज्ञानी साधु-महात्मा के रुप में प्रस्तुत करते हैं और सामान्यजन उनके झाँसे में आ जाते हैं। केवल सुनने, पढ़ने से ही कल्याण सम्भब नहीं है। आचरण में शुद्धि, चिंतन-मनन और भक्ति भी नितान्त जरूरी है। इसका अर्थ केवल तभी समझ में आता है, जब मनुष्य की बुद्धि शुद्ध, चेतन और विवेक पूर्ण हो। किसी के प्रति रोष, घृणा, दुराव आदि के भाव ना हों।
The God addressed Arjun as sinless, since only the sinless is qualified to understand and apply this most confidential-secret and intricate knowledge in real life. This knowledge is for the masses who wish to relinquish. The Almighty selected Arjun as the right person bearing all the desired qualities. HE took incarnation in the form of Mahrishi Ved Vyas as well, in advance, to prepare ground for transfer of knowledge, to the common masses, who deserved and desired emancipation & for the benefit of the humanity during Kali Yug. This is a very crucial period in which impostors, cunning, hypocrites, fraudulent people deceive the public behaving as the messenger of the God. This has been happening for the last 2,000 years. Public is misled, misguided and cheated. Hundreds of new faiths are emerging  every day. Its not all; politicians are using religion-faith as tool to attain-achieve power. One finds people wearing saffron robs in the corridors of power and even eyeing ministerial berths. Ashrams, Math (मठ), Monasteries, hermitages crop up to lure the people and collect immense wealth & power successfully. One who listen, read meditate Geeta, sooner or later become pure (righteous, virtuous, pious). One should follow & practice this treatise in life.
अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। 
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की अत्यन्त शुद्धि, ज्ञान के लिये योग में दृढ़ स्थिति और सात्विक दान, इन्द्रियों का दमन, यज्ञ, स्वाध्याय, कर्तव्य के पालन लिए कष्ट सहना और शरीर, मन तथा वाणी की सरलता उन्हें प्राप्त करने के लिये आवश्यक है।[श्रीमद्भगवद्गीता 16.1]
Bhagwan Shri Krashn said that one who recognises HIM as the Ultimate, should be fearless, has extreme purity of innerself-psyche, extreme devotion in Yog for the sake of attaining knowledge, donation of goods acquired through pure-pious means & honesty, restraint over senses, performance of Yagy-ritualistic holy sacrifices in fire, self study of scriptures, bearing of pain-turmoil for conducting own duties, responsibilities and purity of body, mind & speech.
परमात्मा को पुरुषोत्तम जानकर अनन्य भक्ति भाव से ध्यान-पूजन करने वाले के मन में भाव, आचरण  प्रभाव सहित दैवी सम्पत्ति का प्राकट्य होता है। जिस मनुष्य का मन-हृदय साफ-शुद्ध होता है, वह भयहीन-निर्भय होता है। उसके अन्तःकरण, आचरण और व्यवहार में अत्यन्त शुद्धि जरुरी है। वह पाप कर्म, दुष्टता से मुक्त है। उसने परमात्म तत्व, ज्ञान प्राप्ति के लिए योग धारण किया है और उसमें उसकी दृढ़ स्थिति है। उसे समता की प्राप्ति हो गई है। वह शास्त्रोचित माध्यम से अर्जित धन का उपयोग दान, लोक कल्याण के लिए करता है। उसका अपनी इन्द्रियों, मन, भावनाओं और इच्छाओं पर पूरा अंकुश-नियंत्रण है। वह यज्ञ, हवन, अग्निहोत्र, पूजा-पाठ, भजन-कीर्तन, भागवत कथाओं का अध्ययन-श्रवण जैसी शास्त्र सम्मत क्रियाएँ करता है। अपने ईष्ट-परमात्मा की प्राप्ति हेतु वह स्वाध्याय करता है, जिसमें वेद, पुराण, भागवत, रामायण, महाभारत, इतिहास आदि शामिल हैं। वह अपने शास्त्र सम्मत कर्तव्य-दायित्व का निर्वाह, धूप-ताप, विध्न-बाधा, कष्ट सहकर भी बगैर दुःखी-परेशान हुए प्रसन्नता पूर्वक करता है। इससे उसमें जो आत्मबल-तपोबल उत्पन्न हुआ है, उसका उपयोग वो श्राप-बद्दुआ, दूसरे को हानि पहुँचाने में कभी नहीं करता। उसका व्यवहार शुद्ध और छल-कपट, बनावट से रहित है। उसका शरीर, मन, वचन और अन्तःकरण शुद्ध-सरल हैं।
The Almighty elaborated the divine developments-modifications in the innerself-psyche of the devotee, who recognises HIM as the Ultimate, superior to the Kshar-perishable and Akshar-imperishable beings. The devotee becomes fearless, since his mind & heart are pure, unbiased, uncontaminated, unsmeared. His behaviour is soothing, calm and polite. He is always tolerant. He is free from sins, anger, enmity, ego etc. He practices Yog for the sake of the achievement of the gist (nectar, extract, elixir) of the God. He is firmly busy with his endeavour, goal, target of Liberation. He has become equanimous. He earns through pious, pure, honest means and utilises the money for donations-charity, social welfare, welfare of the poor-needy, one in trouble-distress. He is always generous-liberal to the one in need-distress. He is always willing to help anyone in trouble physically, financially. He has firmly controlled his emotions, passions, feelings, thoughts, ideas and directed them into the Almighty only. He performs rituals, Yagy, Hawan, Holy sacrifices in fire, prayers, recitation of God's glory, listens to sermons-stories pertaining to the God, visits holy places with only one motive that is happiness of the God. He reads, listens Bhagwat, Veds, Ramayan, Maha Bharat, Purans and other stories connected with social welfare. He performs all his duties assigned by the scriptures without feeling worried or disheartened. The strength-power and energy acquired by him through these means is not wasted by him in abusing, cursing or repressing anyone. His behaviour is free from artificiality. He is non deceptive. His body, mind and speech are always pure-pious. His innerself-psyche is pure.
सात्विक ज्ञान ::  
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते। 
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥[श्रीमद् भगवद्गीता 18.20]
जिस ज्ञान से मनुष्य-साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियों में (पृथक-पृथक सब भूतों में) एक अविनाशी परमात्म भाव को विभाग रहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तुम सात्त्विक ज्ञान समझो।
जो कुछ भी दृश्य है, वह परमात्मा का प्रतीक-स्वरूप ही है। इनमें से किसी की भी स्वतंत्र सत्ता नहीं है। यह सब कुछ हर पल हर घड़ी परिवर्तित हो रहा है। अज्ञान वश मनुष्य स्वयं को उनसे जोड़ लेता है, परन्तु समझ आने पर अविनाशी परमात्मा की उनमें सत्ता को मान लेता है। अलग-अलग वस्तु, व्यक्ति, ज्ञान, व्यवहार के होते हुए भी वह निर्विकार-अविनाशी तत्व को पहचान लेता है, जब उसके अन्तः करण में राग-द्वेष, मोह-ममता शेष नहीं रहते। यह ज्ञान सात्विक ज्ञान है।
जैसे साधारण मनुष्य अपने शरीर में स्वयं को व्याप्त मानता है; उसी प्रकार साधक परमात्मा को इस संसार में व्याप्त मानता है। जैसे शरीर और संसार एक हैं, उसी प्रकार स्वयं और परमात्मा भी एक हैं।
साधक की दृष्टि में प्राणियों की सत्ता के भी रहने के कारण यह ज्ञान सात्विक ज्ञान-विवेक कहलाता है। अगर उसकी दृष्टि में प्राणियों की सत्ता न रहे, तो यह गुणातीत तत्वज्ञान-ब्रह्म की प्राप्ति है।
The Gyan (knowledge-understanding, prudence) through which the devotee perceives the undifferentiated Ultimate-the Almighty, God in the differentiated living organisms and the world is Satvik.
Neither living nor nonliving has independent status. Everything is changing continuously. Imprudence makes the individual perceive his identity. Enlightenment directs the devotee that it’s only the Almighty who, is never changing and directs each and everyone. The enlightened is able to identify the one, who is defect less, pure-pious; since his innerself has become free from attachments and prejudices. This enlightenment associated with detachment, leads to realisation of the Almighty.
Satvik Gyan illustrates the differentiated, destructible, transforming goods and in itself is pure, pious and defect less. The way, an individual considers himself to be pervasive in the body, the devotee considers the God to be pervasive in the universe. The way the body and the world are one, in the same way the individual and the God are one. Significance given to the living ones by the devotee, is the Satvik Gyan (Enlightenment, Prudence). If he gives significance only to the God, he has realised the Tatv or Param Gyan or to say he has realised the Brahm.
The Karm performed by losing the attachments and desire becomes Satvik. Satvik Tyag detaches both, the Karm and Karmfal, from the performer.
Satvik Karms performed secretly, carefully, readily along with set procedures, leads to detachment.
राजसिक ज्ञान ::
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्। 
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥[श्रीमद् भगवद्गीता 18.21]
किन्तु जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्रणियों में (भूतों में) भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तुम राजस ज्ञान समझो।
राग मनुष्य में आसक्ति, प्रियता, द्वेष आदि पैदा करता है। राजस स्वभाव वाला व्यक्ति मनुष्य, देवता, राक्षस, यक्ष, कीट-पतंग, वृक्ष-लता, चर-अचर प्रणियों की आकृति, स्वभाव, नाम, रूप, गुण आदि के अन्तर से एक ही अविनाशी परमात्मा को अलग-अलग समझता है। मनुष्य अलग-अलग शरीरों में अन्तःकरण, स्वभाव, इन्द्रियों, प्राण आदि के सम्बन्ध से प्राणियों को अलग-अलग मानता है। राजस ज्ञान में जड़-चेतन का विवेक नहीं होता। क्रिया और पदार्थ दोनों को सत्ता देकर उनसे राग पूर्वक सम्बन्ध जोड़ने से सब कुछ अलग-अलग दिखता है।
The knowledge due to which an individual feel differently (observe, see, find, visualise, perceive) differentiate in all creatures, various entities of distinct kinds) towards different organism is Rajsik.
The Almighty (Permatma, God) exists in each and every organism as Atma (Soul). The organism is recognised by its shape, size, figure, name, nature, configuration, characteristics, nomenclature etc., by the individual. Significance to matter, actions and Pran-life, along with attachments, which develop attraction, repulsion, affection, prejudices etc., leads to discrimination among the organism. Perception of the same Almighty in different organism, differently on the basis of configuration and behavior is Rajsik. The knowledge which makes the individual perceive different organism, in his innerself differently, on the basis of nature or organs (work organs, sense organs) is Rajsik. Rajsik Knowledge does not discriminate between the living and the non living (immovable) for lack of prudence.
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। 
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥[श्रीमद् भगवद्गीता 18.46]
जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके, मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
जिस परमात्मा से संसार पैदा हुआ है और संचालित है, जो सबका उत्पादक आधार और प्रकाशक है जो सबमें परपूर्ण है अर्थात जो अनन्त ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति से पहले भी था, उनके रहते हुए भी जो रहता है और जो उनके लीन  होने के बाद भी रहेगा, तथा जो अनन्त ब्रह्माण्डों में व्याप्त है, उसी परमात्मा का अपने-अपने स्वभावज-वर्णोचित स्वभाविक कर्मों के द्वारा पूजन करना चाहिए।
लौकिक और पारलौकिक कर्मो के द्वारा परमात्मा का पूजन तो करना चाहिए, परन्तु उनके करणों-उपकरणों में ममता नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि उनमें ममता होते ही वे वस्तुएँ अपवित्र हो जाती हैं। सिद्धि को प्राप्त करने का अर्थ है कि मनुष्य अपने कर्मों से परमात्मा की पूजा करने से प्रकृति से असंबद्ध होकर स्वतः अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। उसका प्रभु में स्वतः अनन्य प्रेम जाग्रत हो जाता है। अब उसको पाने-हासिल करने के लिए कुछ भी शेष नहीं है। किसी भी जाति, सम्प्रदाय (हिन्दु, बौद्ध, ईसाई, पारसी, यहूदी, मुसलमान), वर्ग से व्यक्ति क्यों न हो वह परमात्मा के पूजन का अधिकारी है। भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन के इस संवाद-श्री मद् भागवत गीता का जो अध्ययन करेगा उसके द्वारा परमात्मा ज्ञान से पूजित होंगे। कर्मयोगी और ज्ञान योगी अन्त में एक हो जाते हैं क्योंकि दोनों में जड़ता का त्याग किया गया है। इसी प्रकार भक्ति मार्ग भी जड़ता को मिटाता है।
Accomplishment is attained by an individual by worshiping the Almighty, from whom all the universes, organisms have evolved and by whom all the universes are pervaded, through his natural, instinctive, prescribed, Varnashram related deeds.
One should pray to the Almighty from whom the entire Universe has evolved, who operates the world, who is the creator, producer, founder and illuminator, administrator, organiser who alone is complete amongest all; who was present before creation of infinite universes and who will remain after assimilation of infinite universes in HIM and WHO is pervaded in infinite universes, is worshipped automatically if the individual performs HIS natural-prescribed-Varnashram duties. Performance of the prescribed-Varnashram duties assigned to the individual, itself is worship of the God.
Both Karm Yog and Gyan Yog merge into one single stream by eliminating immovability-inertness through service and worship enabling detachment, resulting in immersion in Supreme Power.
तामसिक ज्ञान :: 
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्-कार्ये सक्तमहैतुकम्। 
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्॥[श्रीमद्भागवत गीता 18.22]
परन्तु जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के तरह-सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक-वास्तविक ज्ञान अर्थ से रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।
तामस उत्पन्न होने वाले और नष्ट होने वाले पाञ्च भौतिक शरीर को ही अपना स्वरूप मानता है। ये मान्यता मूढ़ता के कारण ही होती है। उसकी मान्यता युक्ति, प्रमाण और शास्त्र प्रमाण के विरुद्ध होती है। वह और उसका शरीर अलग-अलग हैं, वह इस वास्तविक ज्ञान-विवेक से वंचित है। उसकी बुद्धि तुच्छता की प्राप्ति करने वाली है, इसलिए इसको ज्ञान कहने में भगवान संकोच करते हैं। इसमें आसुरी गुण का प्रभाव होने से अज्ञान कहा गया है और पशु बुद्धि माना गया है।
The knowledge, which lets the individual completely involved in material body (clings to one single effect as if it were all), identified in actions and which is insignificant in the absence of logical real knowledge is Tamsik.
Tamsik individuals are completely obsessed with the human body. The imprudent can’t see beyond this due to relations, possessions, affections etc. and consider himself to be supreme or better than others. His opinions are biased, against logic and evidence, presented by Shastr (scriptures). He does not recognise the difference between his innerself and the physical, material, perishable structure (body). His thoughts and actions are extremely narrow and dogmatic.
Tamsik knowledge is not recognised as knowledge by the Ultimate, Supreme, God. The thoughts of such individuals are animal thoughts, evil and demonic.
भगवान् विष्णु ने भगवती माँ लक्ष्मी से कहा :: मैं योगनिद्रा में तत्व का अनुसरण करने वाली अंतर्दृष्टि से अपने ही माहेश्वर तेज का साक्षात्कार करता हूँ। यह वही तेज है, जिसका योगी पुरुष कुशाग्र बुद्धि द्वारा अपने अन्तःकरण में दर्शन करते हैं। जिससे मीमांसक विद्वान वेदों का सार तत्व निश्चित करते हैं। वह माहेश्वर तेज एक अजर, प्रकाश स्वरूप, आत्मरूप, रोग-शोक रहित, अखण्ड, आनन्द का पुंज, निष्पन्द (निरीह) तथा द्वैत रहित है। इस जगत का जीवन उसी के अधीन है। मैं उसी का अनुभव करता हूँ और तुम्हें नींद लेता हुआ प्रतीत हो रहा हूँ।
आत्मा का स्वरूप द्वैत औए अद्वैत से पृथक, भाव और  मुक्त तथा आदि और अन्त से रहित है। शुद्ध ज्ञान के प्रकाश से उपलब्ध होने वाला तथा परमानन्द स्वरुप होने के कारण एक मात्र सुन्दर है। यही मेरा ईश्वरीय  रूप है। गीता उसका बोध-उनके स्वरूप, जो स्वयं परमानन्दमय और मन और वाणी से बाहर है, कराती है।[पद्म पुराण]
आत्मा के 12 लक्षण :: आत्मा का स्वरूप द्वैत और अद्वैत से पृथक, भाव और मुक्त तथा आदि और अन्त से रहित है। शुद्ध ज्ञान के प्रकाश से उपलब्ध होने वाला तथा परमानन्द स्वरुप होने के कारण एक मात्र सुन्दर है। यही ईश्वरीय रूप है। गीता उसका बोध-उनके स्वरूप, जो स्वयं परमानन्दमय और मन और वाणी से बाहर है, कराती है।[पद्म पुराण]
आत्मा नित्य, अविनाशी, शुद्ध, एक, क्षेत्रज्ञ, आश्रय, निर्विकार, स्वयं प्रकाश, सबका कारण, व्यापक, असङ्ग तथा आवरण रहित है।[श्रीमद्भागवत 7.7.19]
मनुष्य के भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरण से उनका साक्षी आत्मा अलग है। जीव कहलाने वाले उस आत्मा से भी ब्रह्म भिन्न है और प्रकृति से उसके संचालक पुरुषोत्तम भिन्न हैं।[श्रीमद्भागवत 3.28.41]
देव मनुष्यादि शरीरों में रहनेवाला एक ही आत्मा अपने आश्रयों के गुण-भेद के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार का भासता-प्रतीत होता है।[श्रीमद्भागवत 3.28.43]
यह मनुष्य योनिज्ञान-विज्ञान का मूल स्त्रोत है। जो इसे पाकर भी अपने आत्मरूप परमात्मा को नहीं जान लेता, उसे कहीं भी, किसी भी योनि में शांति नहीं मिल सकती।[श्रीमद्भागवत 6.16.58]
आत्मा का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति-इन तीनों अवस्थाओं तथा इनके अभिमानों से विलक्षण है॥[श्रीमद्भागवत 6.16.61]
आत्मा तो एक ही है परन्तु वह अपने ही गुणों की सृष्टि कर लेता है और गुणों के द्वारा बनाये गए पञ्च भूतों में एक होने पर भी अनेक, स्वयं प्रकाश होने पर भी दृश्य, अपना स्वरूप होने पर भी अपने से भिन्न, नित्य होने पर भी अनित्य और निर्गुण होने पर भी सगुण के रूप में प्रतीत होता है।[श्रीमद्भागवत 10.85.24]
आत्मा परमात्मा का ही अंग है। आत्मा पूर्वजन्म की स्मृति और संस्कारों से संयुक्त रहती है जब तक कि पुण्य-पाप शेष हैं। मन आत्मा का अभिन्न अंग है। मन में जब तक इच्छाएँ शेष हैं, आत्मा जीव रूप में जन्म लेती रहेगी। माता के गर्भ में आते ही उसे पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है और प्राणी अत्यन्त कष्ट के साथ, उनको स्मरण करता रहता है। जन्म के तुरन्त पश्चात् अधिकांश प्राणियों की स्मृति विलुप्त हो जाती है। नारद, जड़ भरत जैसे महापुरुष पूर्व जन्म की स्मृति से संयुक्त होकर प्रकट हुए।
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः।
असंगो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव॥
आत्मा साक्षी, सर्वव्यापी, पूर्ण, एक मुक्त, चेतन, अक्रिय, असंग, इच्छा रहित एवं शांत है। भ्रम वश ही ये सांसारिक प्रतीत होती है।[अष्टावक्र गीता 1.12]
One who is the visionary, himself visualise, watches, witnesses everything-event, all pervading, complete and free, conscious, aware (alert, vigilant, rational), inert, dissociated, desire less and quite-peaceful. It’s only due to illusion that it all appears worldly.
The soul is not involved in any activity of the possessor. It just visualises the actions of the doer but carries with it the impact of sins and virtues along with it in next incarnations; just like the air which carries smoke, moisture, heat-cold, gases, pollutants with it.
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥
क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य-काटा नहीं जा सकता, यह आत्मा अदाह्य-जलाया नहीं जा सकता, अक्लेद्य-गीला नहीं किया जा सकता और निःसंदेह अशोष्य-सुखाया नहीं जा सकता है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी-सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन-अनादि है।[श्रीमद् भगवद्गीता 2.24]
Undoubtedly, this soul can not be cut, burnt, wet-soaked or dried, being perennial (absolute, perpetual, for ever, since ever), which is pervaded-present in each and every particle including all organism, stable-stationary, immobile and ancient-since ever.
आत्मा (शरीरी, देही, soul) को किसी अस्त्र-शस्त्र, मन्त्र, वाणी, श्राप से काटा-छेदा नहीं किया जा सकता। इसे अग्नि या किसी अन्य रीति से जलाया नहीं जा सकता। इसे चूसा, सोखा, गीला, घोला, मिलाया नहीं जा सकता। इसे किसी भी क्रिया द्वारा प्रभावित नहीं किया जा सकता। इसके ऊपर किसी काल का प्रभाव भी नहीं होता है। यह देही सम्पूर्ण व्यक्ति, वस्तु, शरीर आदि में एकरूप-एकसमान विराजमान है। यह स्वतः कहीं आने-जाने में समर्थ नहीं है। इसमें स्वतः कहीं आने-जाने की क्रिया नहीं होती। यह स्थिर स्वभाव वाला, कम्पन रहित, न हिलने डुलने वाला नहीं है। इसका आदि-अन्त नहीं है, यह सनातन है।
आत्मा वह कारण है, जिससे शरीर में अनुभूति-अनुभव-चेतना होती है।
The soul can not be cut-penetrated by any weapon, ammunition, curse, words or rhymes. It can not be burnt, evaporated, dried by any means. It can not be soaked, sucked, wet, dissolved, mixed. It can not be affected by any process-action. It's free from the impact of time, in any dimension. Its uniformly present-spreaded over in the body. It can not move out of the body or into it, of its own, independently, freely. (As soon as the organism is dead, it acquires yet another body identical to the one it had in the previous body, which is immaterial.) Its free from movement, vibrations being inertial, stationary by nature. It has no origin or end, being free from birth, rebirth, incarnations. Its present, ever since the inception of this universe. Its a component of the Almighty.
This is the soul by virtue which the body-physique feels, becomes conscious-aroused-awake-aware-alert. Without soul the body is a lump of mass.
However, its believed that the Yogis can leave the body, roam as per his wish and re-enter the body. Some Yogis (souls) acquires bodies of the people who were able bodied and died at young age without any disease by drowning etc.
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥
आत्मा अव्यक्त-अप्रत्यक्ष है। यह अचिन्त्य-चिन्तन का विषय नहीं है और यह निर्विकार-विकार रहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर शोक करना उचित नहीं है।[श्रीमद् भगवद्गीता 2.25]
The soul is invisible (unrevealed, which can not be seen like air, intelligence, desires, thoughts), beyond thoughts (imagination, image, perception & defect less, pure, untainted, unsmeared). Therefore, Hey Arjun! having understood (recognized, identified) the soul in this manner, grief-condolence is undesirable (useless, unjustified, unnecessary).
आत्मा का स्थूल शरीर के समान आँखों से दृष्टिगोचर होना सम्भव नहीं है (इसके लिये दिव्य दृष्टि चाहिये)। मन और बुद्धि तो चिन्तन विचारों में आते हैं, परन्तु यह चिन्तन का विषय भी नहीं है। यह चेतना उत्पन्न करने वाली है। यह देही-विकार रहित कहा गया है, क्योंकि यह परिवर्तन रहित है।
Its not possible to see-observe the soul like a physical entity. One might need divine sight. One may perceive, think, recognize, understand, intelligence and the feelings, sensuality, passions (always subject to change, variable, negotiable). But this is defect less, pure, uncontaminated, since it is free from change.
आत्मा निषेध मुख से 8 गुणों अच्छेद्य, अक्लेद्य, अदाह्य, अशोष्य, अचल, अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य से युक्त है।
The Soul has 8 characteristics through negativity or contradiction :: It can not be cut-divided, wet, burnt, sucked, inertial (unmovable, stationary), unrevealed, beyond thought, untainted-unsmeared.
आत्मा विधिमुख से :- नित्य, सनातन, स्थाणु और सर्वगत है। इसके वास्तविक स्वरूप का वर्णन इसलिये भी सम्भव नहीं है, क्योंकि यह वाणी का विषय नहीं है और स्वयं वाणी इससे प्रकट होती है।
The Soul has 4 characteristics through positivity-reasoning :: Perennial, absolute, perpetual, stable, stationary, immobile and ancient-since ever, which is pervaded-present in each and every particle including all organism.
आठ गुणों से युक्त आत्मा को जानने का फल ::
य आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोSपिपास: सत्यकामः सत्यसङ्कल्प: सोSन्वेष्टव्य: स विजिज्ञासितव्यः स सर्वांश्च लोकानाप्नोति स सर्वांश्च कामान्यस्तमात्मानमनुविद्य विजानातीति ह प्रजापतिरुवाच।
जो आत्मा पापरहित, जरा (बुढ़ापा) रहित, मृत्युरहित, शोकरहित, भूख से रहित, प्यास से रहित, सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प (इन स्वभावगत आठ गुणों से युक्त) है, उसे खोजना चाहिये, उसे जानना चाहिये। जो उसको खोजकर जान लेता है, वह सब लोकों और समस्त कामनाओं को प्राप्त होता है।[प्रजापति छान्दोग्य. 8.7.1]
Untainted (free from sins), ageless (does not grow old), imperishable (does not die), free from sorrow (pains, displeasure), free from hunger, free from thirst, truthful-determined to be true in resolve; are the 8 characteristics possessed by the Soul which should be identified (searched, traced) by one within himself. One who identifies it, attain all abodes i.e., Ultimate abode-Salvation (Moksh) and all his desires are fulfilled.



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संतोष महादेव-धर्म विद्या सिद्ध व्यास पीठ (बी ब्लाक, सैक्टर 19, नौयडा)
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