Thursday, August 6, 2015

FORMS OF PRAYER पूजा-अर्चना-प्रार्थना की विधियाँ

FORMS OF PRAYER पूजा-अर्चना-प्रार्थना की विधियाँ 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By:: Pt. Santosh Bhardwaj  
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अग्नि में आहुति-हवन-भोग आदि के कर्म में यज्ञ भी मात्र पांच तरह के होते हैं:- (1).ब्रह्मयज्ञ, (2). देवयज्ञ, (3). पितृयज्ञ, (4). वैश्वदेव यज्ञ, (5). अतिथि यज्ञ।इनकी प्रकृति का निर्धारण आवश्यकताओं के अनुरूप है। 
12 FORMS OF YAGY 12 प्रकार के यज्ञ :: निस्वार्थ भाव से दूसरों के हित-भले के लिए किये गए कर्तव्य-कर्म करने का नाम ही यज्ञ है। यज्ञ से सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं। मनुष्य बंधन मुक्त हो जाता है। कुल बारह प्रकार के यज्ञ कर्म हैं। 
(1). ब्रह्म यज्ञ :- प्रत्येक कर्म में कर्ता, करण, क्रिया, पदार्थ आदि सब को ब्रह्म रूप से अनुभव करना। 
(2). भगवदर्पण रूप यज्ञ :- सम्पूर्ण क्रियाओं और पदार्थों को केवल भगवान् का और भगवान् के लिए ही मानना।
(3). अभिन्नता रूप यज्ञ :- असत् से सर्वथा विमुख होकर परमात्मा में विलीन हो जाना। परमात्मा से अलग अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। 
(4). संयम रूप यज्ञ :- एकान्तकाल में अपनी इन्द्रियों को विषयों से मुक्त रखना-प्रवृत न होने देना। 
(5). विषय हवन रूप यज्ञ :- व्यवहार काल में इन्द्रियों से संयोग होने पर भी उनमें राग द्वेष पैदा न होने देना। 
(6). समाधिरूप यज्ञ :- मन बुद्धि सहित सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणों की क्रियाओं को रोककर ज्ञान से प्रकाशित समाधि में स्थित हो जाना।
(7). द्रव्य यज्ञ :- सम्पूर्ण पदार्थों को निःस्वार्थ भाव से दूसरों की सेवा में लगा देना। 
(8). तपो यज्ञ :- अपने कर्तव्य के पालन में आने वाली कठिनाइयों को प्रसन्नता पूर्वक सह लेना। 
(9). योग यज्ञ-कार्य की सिद्धि :- असिद्धि में तथा फल की प्राप्ति-अप्राप्ति में सम रहना। 
(10). स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ :- दूसरों के हित के लिए सत्-शास्त्रों का पठन-पाठन, नाम-जप आदि करना। 
(11). प्राणायम रूप यज्ञ :- पूरक, कुम्भक और रेचक पूर्वक प्रणायाम करना। 
(12). स्तम्भ वृत्ति प्राणायाम रूप यज्ञ :- नियमित आहार करते हुए प्राण और अपान को अपने-अपने स्थानों पर रोक देना। 
मनुष्य की समस्त क्रियाएँ यज्ञ रूप ही होनी चाहिए; अर्थात स्वयं के लिए कुछ भी नहीं करना। जब मनुष्य केवल दूसरों के हित के लिए सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्म  करता है तो परिणति कर्तव्य कर्म रूप यज्ञ  में स्वतः हो जाती है। 
होम,यज्ञ या हवन आदि में यज्ञ कुण्ड की आकृति :: यज्ञ-अग्निहोत्र, हवन के लिए अग्निकुण्ड-यज्ञ कुंड की आवश्यकता पड़ती है। यज्ञ विधि के अनुरूप ही यज्ञ कुण्ड का निर्माण किया जाता है। यज्ञ के प्रयोजन के अनुरूप मुख्यत: आठ प्रकार के यज्ञ कुण्ड प्रयोग में लए जाते हैं। 
(1). योनी कुंड :– योग्य पुत्र प्राप्ति हेतु।
(2). अर्ध चंद्राकार कुंड :– परिवार मे सुख शांति हेतु । पर पति-पत्नी दोनों को एक साथ आहुति चाहिये।
(3. त्रिकोण कुंड  :– शत्रुओं पर पूर्ण विजय हेतु।

(4). वृत्त कुंड  :- जन कल्याण और देश मे शांति हेतु।
(5). सम अष्टास्त्र कुंड :– रोग निवारण हेतु।
(6). सम षडास्त्र कुंड  :– शत्रुओ मे लड़ाई झगड़े करवाने हेतु।
(7). चतुष् कोणा स्त्र कुंड  :– सर्व कार्य की सिद्धि हेतु।
(8). पदम कुंड  :– तीव्रतम प्रयोग और मारण प्रयोगों से बचने हेतु।
सामान्य पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन के लिए चतुर्वर्ग के आकार के इस कुंड का ही प्रयोग करना चाहिये।

मन्दिर-देव प्रतिमा और ध्यान साधना : मूर्ति और मन्दिर भगवान् के प्रतीक हैं। ईश्वर सर्वव्यापी है और इस प्रकार मूर्ति में भी है। यह मनुष्य को ध्यान लगाने में मदद करते हैं। मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा-आराधना मनुष्य को शक्ति से जोड़ देती है। मन्दिर का निर्माण पूर्णतया वास्तु शास्त्र के अनुरूप हो तो वह परमात्मा के शरीर का प्रतीक बन जाता है। गर्भ गृह-सर, गोपुरा-मुख्य द्वार चरण, शुकनासी-नाक, अंतराला-निकलने की जगह गर्दन, प्राकरा :- ऊँची दीवारें इन्हें शरीर के हाथ और ह्रदय या दिल में ईश्वर की मूर्ति  है। इसी प्रकार मानव शरीर भी ईश्वर का प्रतिरूप ही है। 
NAMING STATUES-IDOLS: They are broadly classified into five categories: Swayam-Vyakt, Dev, Arsh or Siddh, Pauranik and Manush. The difference is based on who installed the deity in a given temple. The images installed by divinities like Brahm, Indr etc. are known as Devsthal. Images installed by great sages are known as Arshsthal and by Siddh are known as Siddhsthal. Images installed in the ancient days and are mentioned in the epics are known as Pauraniksthal. Images installed by the devout human beings are known as Manushsthal.
OFFERINGS OF A TEMPLE (मंदिर का चढ़ावा)  :: भक्त और भगवान् के बीच की कड़ी मन्दिर, धर्म स्थल, तीर्थ स्थल हैं। भारत में करोणों की तादाद में श्रद्धालुगण अपनी भक्ति भावना का इज़हार प्रतिदिन नियमानुसार करते हैं। इसके लिए उन्हें मन्दिर मिले या ना मिले, वो अपनी श्रद्धा के सुमन-फूल मन-वचन-क्रम-श्रद्धा-कर्म-कर्तव्य-सेवा के माध्यम से प्रभु को अर्पित कर ही देते हैं।अक्सर लोग मंदिरों में धन, सोना-चाँदी-जेवर, कीमती बहुमूल्य वस्तुएँ चढ़ा कर अपनी आरजू पूरी करने की अरदास करते हैं।  कुछ लोग फल-फूल-मेवा-मिठाई अर्पित करते हैं। भारत में ऐसे हजारों मन्दिर हैं जहाँ दैनिक चढ़ावा करोणों में चढ़ता है। 
*इस चढ़ावे की बन्दर बाँट, ट्रस्टी, पुजारियों, कर्मचारियों में हो जाती है। अक्सर झगड़ा होने पर हत्या, मुकदमे होते रहते हैं। मन्दिरों में चढ़ावे की बन्दर बाँट तिमाही, छमाही, चौथाई, माहवारी, देहाड़ी  आदि आधारों पर होती आई है। 
*अपनी मनोकामना पूरी करवाने को लोग-बाग जो चढ़ावा चढ़ाते हैं, वो हारी-बीमारी, दुःख-दर्द, परेशानी-कष्ट, भूत-प्रेत से मुक्ति, संतान प्राप्ति, नौकरी, आकाँक्षा-इच्छा पूर्ति हेतु ही ज्यादातर होती हैं। मुक्ति-मोक्ष-धर्म की चाहत वाले भी उनमें शामिल होते हैं।
*जो चढ़ावा धर्म-ईमान की कमाई का होता है, वही सार्थक होता है, शेष व्यर्थ। 
*चढ़ावे की कमाई खाने वालों के वारिसों को तरक्की करते शायद ही कभी देखा जाता है। बगैर कमाए खाना अवनति, निम्न लोकों में जाने का रास्ता है। शास्त्रों में वेतन लेकर पूजा करने वाले को अगले जन्म में चाण्डाल, हीन-निम्न योनियों में जाने वाला बताया जाता है। 
*यवन, मुसलमान, अँग्रेजों का वंश नाश हो गया, जो कि मन्दिरों में लूट-पाट के जिम्मेवार थे। उनका राजपाठ, ठाठ-बाट, दौलत-धन-शौहरत सब नष्ट हो गया। अहमद शाह अब्दाली, मोहम्मद गौरी, एलेक्स जेण्डर (-Alexander) आदि आदि सभी नर्कगामी हुए। बाबर, औरंगज़ेब भी उसी गति को प्राप्त हुए। 
*जो ब्राह्मण दान में प्राप्त हुए धन का सदुपयोग अपने और दूसरों की भलाई, हित रक्षा-चिन्तन में करता है उसका और उसके कुल का नाश कभी होता। अपितु वह निरंतर फलता-फूलता रहता है।सामर्थवान को कभी भी अनुग्रह-दान-बख्शीश नहीं लेनी चाहिये। 
* प्रसाद को कभी भी अकेले, बिना बाँटे नहीं खाना चाहिए। प्रसाद चावल के दाने के बराबर भी पर्याप्त होता है। प्रसाद देने में कभी हाथ नहीं रोकना चाहिए। प्रसाद देने में भेद-भाव-अन्तर-फ़र्क नहीं होना चाहिए।  
*दीन-दुःखी-गरीब-बीमार, बेआसरा, साधु-महात्मा-फकीर-ब्राह्मण-ज़रूरतमन्द को देने में कभी संकोच नहीं करना चाहिए। 
*घर आये मेहमान की समुचित खातिरदारी निसंकोच करनी चाहिए। अतिथि सत्कार में कोई कोर कसर बाकि नहीं रहनी चाहिए। हाँ पात्र-कुपात्र का ध्यान रखना जरूरी है। 

5 FORMS OF PRAYER  5 प्रकार की पूजा
पूजा पाँच प्रकार की बताई गई हैं :: (1). अभिगमन: देवता के स्थान को झाड़ बुहार के साफ रखना, उसे लीपना-रंग-रोगन-सफेदी करना, पहले चढ़े निर्माल्य को हटाना। यह सार्ष्टि नामक मुक्ति प्रदान करता है। 
Photo(2). उपादान : पूजा के लिए चन्दन, गंध, पुष्प आदि पूजा-सामग्री का संग्रह का नाम उपादान है।  यह सामीप्य नामक मुक्ति प्रदान  करता है। 
(3). योग : अपने इष्टदेव के साथ अपनी आत्मभावना करना कि  वे  मुझ से भिन्न नहीं हैं; वे मेरी ही आत्मा हैं। यह सालोक्य  नामक मुक्ति प्रदान  करता है।
(4). स्वाध्याय : इष्टदेव के मंत्र का अर्थानुसन्धान पूर्वक जप करना। सूक्त और स्त्रोत्र, वेदान्त शास्त्र आदि का पाठ,  गुण, नाम, लीला, भगवान् का कीर्तन तथा भगवत्त तत्व आदि का प्रतिपादन करने वाले शास्त्रों का अभ्यास भी स्वाध्याय कहलाता है। यह सायुज्य नामक मुक्ति प्रदान  करता है।
(5). इज्या : उपचारों द्वारा अपने आराध्य देव का यथार्थ विधि से पूजा करना। यह सारूप्य नामक मुक्ति प्रदान  करता है।
भगवान् सदाशिव की पूजा-उपासना में एक रहस्य की बात है यह कि जहां एक ओर रत्नों से परिनिर्मित लिंगों की पूजा में अपार समारोह के साथ राजोपचार आदि विधियों से विशाल वैभव का प्रयोग होता है, वहीं सरलता की दृष्टि से, केवल जल, अक्षत, बिल्वपत्र ओर मिखावाद्य [-मुख से बम-बम की ध्वनी] से भी परिपूर्णता मानी जाती है और सदाशिव की कृपा उपलब्ध हो जाती है। इसीलिये वे आशुतोष और उदार शिरोमणि कहे हैं। पंचकोशी साधना
गायत्री के पाँच मुख-पाँच दिव्य कोश :- अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश।पंचकोशी साधना ध्यान गायत्री की उच्च स्तरीय साधना है। पंचमुखी गायत्री प्रतिमा में पाँच मुख मानवीय चेतना के पाँच आवरण हैं। इनके उतरते चलने पर आत्मा का असली रूप प्रकट होता है। इन्हें पाँच कोश या पाँच खजाने भी कह सकते हैं। मनुष्य की अन्तःचेतना में एक से एक बढ़ी-चढ़ी विभूतियाँ प्रसुप्त अविज्ञात स्थिति में छिपी पड़ी हैं। इनके जागने पर मानवीय सत्ता देवोपम स्तर पर फुँक्ग जाती है। और जगमगाती हुई दृष्टिगोचर होती है।
पंचकोश ध्यान धारणा के निर्देश में पाँच प्राण तत्त्व :
पाँच प्राण  :– चेतना में विभिन्न प्रकार की उमंगें उत्पन्न करने का कार्य प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान नामक पञ्च पर्ण करते हैं। 
पाँच तत्त्व  :– अग्नि, जल, वायु , आकाश और पृथ्वी यह पाँच तत्त्व काया, दृश्यमान पदार्थों और अदृश्य प्रवाहों का संचालन करते हैं। समर्थ चेतना इन्हें प्रभावित करती है।
पाँच देव  :– भवानी, गणेश, ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन्हें क्रमशः बलिष्ठता, बुद्धिमता, उपार्जन शक्ति, अभिवर्धन, पराक्रम एवं परिवर्तन की प्रखरता कह सकते हैं। यही पाँच शक्तियाँ आत्मसत्ता में भी विद्यमान हैं और इस छोटे ब्रह्माण्ड को सुखी समुन्नत बनाने का उत्तरदायित्व सम्भालती हैं।
आत्म सत्ता के पाँच कलेवरों के रूप में पंचकोश को बहुत अधिक महत्त्व दिया जाता है।
(1). अन्नमय कोश :- प्रत्यक्ष शरीर, जीवन शरीर। अन्नमयकोश ऐसे पदार्थों का बना है जो आँखों से देखा और हाथों से छुआ जा सकता है। अन्नमयकोश के दो भाग किये जा सकते हैं। एक प्रत्यक्ष अर्थात् स्थूल, दूसरा परोक्ष अर्थात् सूक्ष्म, दोनों को मिलाकर ही एक पूर्ण काया बनती है।
पंचकोश की ध्यान धारणा में जिस अन्नमयकोश का ऊहापोह किया गया है, वह सूक्ष्म है, उसे जीवन शरीर कहना
अधिक उपयुक्त होगा। अध्यात्म शास्त्र में इसी जीवन शरीर को प्रधान माना गया है और अन्नमयकोश के नाम से इसी की चर्चा की गई है।
योगी लोगों का आहार-विहार बहुत बार ऐसा देखा जाता है जिसे शरीर शास्त्र की दृष्टि से हानिकारक कहा जा सकता है फिर भी वे निरोगी और दीर्घजीवी देखे जाते हैं, इसका कारण उनके जीवन शरीर का परिपुष्ट होना ही है। अन्नमय कोश की साधना जीवन शरीर को जाग्रत्, परिपुष्ट, प्रखर एवं परिष्कृत रखने की विधि व्यवस्था है।
जीवन-शरीर का मध्य केन्द्र नाभि है। जीवन शरीर को जीवित रखने वाली ऊष्मा और रक्त की गर्मी जो सच्चार का कारण है और रोगों से लड़ती है, उत्साह स्फूर्ति प्रदान करती है, यही ओजस् है।
ध्यान धारणा :- ध्यान धारणा में श्रद्धा और सङ्कल्प के साथ साधक ऐसी भावना-कल्पना  करे कि साक्षात् सविता देव-भगवान् सूर्य नाभि चक्र में अग्नि के माध्यम से सारे शरीर में प्रवेश कर रहे हैं। जीवन शरीर में ओजस् का उभार और व्यक्तित्व में नव जीवन का सच्चार हो रहा है। पहले की अपेक्षा सक्रियता बढ़ गई है, उदासी दूर हुई है और उत्साह एवं स्फूर्त में उभार आया है।
(2).  प्राणमय कोश :- जीवनी शक्ति। जीवित मनुष्य में आँका जाने वाला विद्युत् प्रवाह, तेजोवलय एवं शरीर के अन्दर एवं बाह्य क्षेत्र में फैली हुई जैव विद्युत् की परिधि को प्राणमय कोश कहते हैं। शारीरिक स्फूर्ति और मानसिक उत्साह की विशेषता प्राण विद्युत् के स्तर और अनुपात पर निर्भर रहती है।
चेहरे पर चमक, आँखों में तेज, मन में उमंग, स्वभाव में साहस एवं प्रवृत्तियों में पराक्रम इसी विद्युत्प्रवाह का उपयुक्त मात्रा में होना है। इसे ही प्रतिभा अथवा तेजस् कहते हैं। शरीर के इर्दगिर्द फैला हुआविद्युत् प्रकाश तेजोवलय कहलाता है। यही प्राण विश्वप्राण के रूप में समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। इसे पात्रता के अनुरूप जितना अभीष्ट है, प्राप्त कर सकते हैं।
ध्यान धारणा :- सविता शक्ति मूलाधार चक्र के माध्यम से प्राणमय कोश में प्रवेश और संव्याप्त हो रही है। सविता की विद्युत् शक्ति काया में संव्याप्त बिजली के साथ मिलकर उसकी क्षमता असंख्य गुना बढ़ा देती है।साधक ध्यान करे कि उसके  कण-कण में, नस-नस में, रोम-रोम में सविता से अवतरित विशिष्ट शक्ति का प्रवाह गतिशील हो रहा है। आत्मसत्ता प्राण विद्युत् से ओत-प्रोत एवं आलोकित हो रही है। यह दिव्य विद्युत् प्रतिभा बनकर व्यक्तित्व को प्रभावशाली बना रही है, पराक्रम और साहस का जागरण हो रहा है।
(3). मनोमय कोश :- विचार बुद्धि, विवेकशीलता। मनोमय कोश पूरी विचारसत्ता का क्षेत्र है। इसमें चेतन, अचेतन एवं उच्च चेतन की तीनों ही परतों का समावेश है। इसमें मन, बुद्धि और चित्त तीनों का संगम है।
मन कल्पना करता है। बुद्धि विवेचना करती और निर्णय पर पहुँचाती है। चित्त में अभ्यास के आधार पर वे आदतें बनती हैं, जिन्हें संस्कार भी कहा जाता है। इन तीनों का मिला हुआ स्वरूप मनोमय कोश है।
मनोमय कोश का प्रवेश द्वार आज्ञाचक्र (भू्र मध्य) है। आज्ञाचक्र जिसे तृतीय नेत्र अथवा दूरदर्शिता कह सकते हैं, इसका जागरण एवं उन्मीलन करना मनोमय कोश की ध्यान धारणा का उद्देश्य है। आज्ञाचक्र की संगति शरीर शास्त्री पिट्यूटरी एवं पीनियल ग्रन्थियों के साथ करते हैं।
ध्यान धारणा :-  व्यक्ति को चेतना में उच्चस्तरीय प्रखरता उत्पन्न करने के लिए बह्मचेतना के समावेश की आवश्यकता पड़ती है। ब्रह्मसत्ता की उसी की विनिर्मित प्रतीक-प्रतिमा सूर्य है। उसकी सचेतन स्थिति सविता है, भावना करें कि सविता का प्रकाश आज्ञाचक्र, मस्तिष्क क्षेत्र से सम्पूर्ण शरीर मेंव्याप्त,मनोमय कोश में फैल रहा है।
आत्मसत्ता का समूचा चिन्तन, क्षेत्र, मनोमय कोश सविता की ज्योति एवं ऊर्जा से भर गया है। आत्मसत्ता की स्थिति ज्योति पुञ्ज एवं ज्योति पिण्ड बनने जैसी हो रही है। दृश्य में ज्योति का स्वरूप भावानुभूति में प्रज्ञा बन जाता है।
सविता के मनोमय कोश में प्रवेश करने का अर्थ है-चेतना का प्रज्ञावान् बनना, ऋतम्भरा से-भूमा से आलोकित एवं ओतप्रोत होना। इस स्थिति को विवेक एवं सन्तुलन का जागरण भी कह सकते हैं।
इन्हीं भावनाओं को मान्यता रूप में परिणत करना, श्रद्धा, निष्ठा एवं आस्था की तरह अन्य क्षेत्र में प्रतिष्ठापित करना-यही है सविता शक्ति का मनोमय कोश में अवतरण। भावना करें कि प्रज्ञा-विवेक, सन्तुलन की चमक मस्तिष्क के हर कण में प्रविष्ट हो रही है, संकल्पों में दृढ़ता आ रही है।
(4).  विज्ञानमय कोश :- भाव प्रवाह। विज्ञानमय कोश चेतन की तरह है जिसे अतीन्द्रिय- क्षमता एवं भाव संवेदना के रूप में जाना जाता है। विज्ञानमय और आनन्दमय कोश का सम्बन्ध सूक्ष्म जगत् से ब्रह्मचेतना से है।
सहानुभूति की संवेदना, सहृदयता और सज्जनता का सम्बन्ध हृदय से है। यही हृदय एवं भाव संस्थान अध्यात्म शास्त्र में विज्ञानमय कोश कहलाता है। परिष्कृत हृदय- चक्र में उत्पन्न चुम्बकत्व ही दैवी तत्त्वों को सूक्ष्म जगत् से आकर्षित करता और आत्मसत्ता में भर लेने की प्रक्रियाएँ सम्पन्न करता है।
श्रद्धा जितनी परिपक्व होगी-दिव्य लोक से अनुपम वरदान खिंचते चले आएँगे। अतीन्द्रिय क्षमता, दिव्य दृष्टि, सूक्ष्म जगत् से अपने प्रभाव-पराक्रम पुरुषार्थ द्वारा अवतरित होता है।
ध्यान धारणा :- विज्ञानमय कोश में सविता प्रकाश का प्रवेश ‘दीप्ति’ के रूप में माना गया है। दीप्ति प्रकाश की वह दिव्य धारा है, जिसमें प्रेरणा एवं आगे बढ़ने की शक्ति भी भरी रहती है, ऐसी क्षमता को वर्चस् कहते हैं। यह प्रेरणा से ऊँची चीज है।
प्रेरणा से दिशा प्रोत्साहन देने जैसा भाव टपकता है, किन्तु वर्चस् में वह चमक है जो धकेलने, घसीटने, फेंकने, उछालने की भी सामर्थ्य रखती है। नस-नस में रोम-रोम में दीप्ति का सच्चार, दीप्ति का प्रभाव, दिव्य भाव संवेदनाओं और अतीन्द्रिय ज्ञान के रूप में होता है।
दीप्ति की प्रेरणा से सद्भावनाओं का अभिवर्धन होता है और सहृदयता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ उभर कर आती हैं, ऐसी आस्था अन्तःकरण में सुदृढ़ अवस्था में होनी चाहिए। स्वयं को असीम सत्ता में व्याप्त फैला हुआ अनुभव करें। सहृदयता, श्रद्धा, दिव्य ज्ञान का विकास और स्नेह करुणा जैसी संवेदनाओं से रोमांच का शरीर में बोध हो रहा है।
(5). आनन्दमय कोश :- आनन्दमय कोश चेतना का वह स्तर है, जिनमें उसे अपने वास्तविक स्वरूप की अनुभूति होती रहती है। आत्मबोध के दो पक्ष हैं- (5.1). अपनी ब्राह्मी चेतना, बह्म सत्ता का भान होने से आत्मसत्ता में संव्याप्त परमात्मा का दर्शन होता है। (5.2). संसार के प्राणियों और पदार्थों के साथ अपने वास्तविक सम्बन्धों का तत्त्वज्ञान भी हो जाता है। इस कोश के परिष्कृत होने पर एक आनन्द भरी मस्ती छाई रहती है।
ईश्वर इच्छा मानकर प्रखरकर्त्तव्य- परायण; किन्तु नितान्त वैरागी की तरह काम करते हैं। स्थितप्रज्ञ की स्थिति आ जाती है। आनन्दमय कोश की ध्यान धारणा से व्यक्तित्व में ऐसे परिवर्तन आरम्भ होते हैं, जिसके सहारे क्रमिक गति से बढ़ते हुए धरती पर रहने वाले देवता के रूप में आदर्श जीवनयापन कर सकने का सौभाग्य मिलता है।
ध्यान धारणा  :- धारणा में सविता का सहस्रार मार्ग से प्रवेश करके समस्त कोश सत्ता पर छा जाने, ओत-प्रोत होने का ध्यान किया जाता है। यदि सङ्कल्प में श्रद्धा, विश्वास की प्रखरता हो, तो सहस्रार का चुम्बकत्व सविता शक्ति को प्रचुर परिमाण में आकर्षित करने और धारण करने में सफल हो जाता है।
इसकी अनुभूति कान्ति रूप में होती है। कान्ति सामान्यतः सौन्दर्य मिश्रित प्रकाश को कहते हैं और किसी आकर्षक एवं प्रभावशाली चेहरे को कान्तिवान् कहते हैं, पर यहाँ शरीर की नहीं आत्मा की कान्ति का प्रसङ्ग है।
इसलिए वह तृप्ति, तुष्टि एवं शान्ति के रूप में देखी जाती है। तृप्ति अर्थात् सन्तोष। तुष्टि अर्थात् प्रसन्नता। शान्ति अर्थात् उद्वेग रहित, सुस्थिर मनःस्थिति। यह तीनों वरदान, तीनों शरीरों में काम करने वाली चेतना के सुसंस्कृत उत्कृष्ट चिन्तन का परिचय देते हैं। स्थूल शरीर सन्तुष्ट, तृप्त। सूक्ष्म शरीर प्रसन्न, तुष्ट।
कारण शरीर शान्त समाहित। इस स्थिति में सहज मुसकान बनी रहती है, हलकी-सी मस्ती छायी रहती है।
सविता शक्ति के पंचकोश में प्रवेश करने और छा जाने की अनुभूति ऐसी गहरी और भावमय होनी चाहिए, जैसे प्रसन्नता की स्थिति में मन उल्लास से उभरता है या धूप में बैठने से शरीर गर्म होता है
A terracotta sculpture of Panchamukha Sri HanumanFIVE WAYS-METHODS-PROCEDURES TO OFFER PRAYER :: Naman, Smaran, Keertan, Yachnam (-याचना)  and Arpan (-अर्पण, समर्पण). The five faces of Hanuman Ji Maha Raj depict these five forms. Shri Hanuman always used to Naman, Smaran and Keertan of Bhagwan Shri Ram. He surrendered (-Arpan, Samarpan) to his Master Shri Ram. He also begged (-Yachnam) Shri Ram to bless him the undivided love.

SYMBOLISM OF BHAGWAN SHIV
TRIDENT: 
THREE POWERS :: KNOWLEDGE-ENLIGHTENMENT, DESIRE, IMPLEMENTATION.
DRUM: REPRESENTS VED, SCRIPTURES, THE ULTIMATE GURU.
SERPENTS : EGO, PRIDE.
FACE : RIVER GANGA (-गँगा) FLOWING OVER SPIRITUAL WISDOM, LEANING, ENLIGHTENMENT.
MOON : MASTER OF TIME-KAAL & IMMORTAL HIMSELF.
THIRD EYE : DESTROYER OF EVIL, IGNORANCE, VISION.
RUDRAKSH  : PURITY, ROSARY IN RIGHT HAND-CONCENTRATION.
TIGER SKIN: FEARLESSNESS.
FIVE WAYS-METHODS-PROCEDURES TO OFFER PRAYER: Naman, Smaran, Keertan, Yachnam (-याचना)  and Arpan (-अर्पण, समर्पण). The five faces of Hanuman Ji Maha Raj depict these five forms. Shri Hanuman always used to Naman, Smaran and Keertan of Bhagwan Shri Ram. He surrendered (-Arpan, Samarpan) to his Master Shri Ram. He also begged (-Yachnam) Shri Ram to bless him the undivided love. 
SYMBOLISM OF BHAGWAN SHIV
TRIDENT-THREE POWERS :: KNOWLEDGE-ENLIGHTENMENT, DESIRE, IMPLEMENTATION.
DRUM : REPRESENTS VED, SCRIPTURES, THE ULTIMATE GURU.
SERPENTS : EGO, PRIDE.
FACE : RIVER GANGA (-गँगा) FLOWING OVER SPIRITUAL WISDOM, LEANING, ENLIGHTENMENT.
MOON : MASTER OF TIME-KAAL & IMMORTAL HIMSELF.
THIRD EYE : DESTROYER OF EVIL, IGNORANCE, VISION.
RUDRAKSH : PURITY, ROSARY IN RIGHT HAND-CONCENTRATION.
TIGER SKIN : FEARLESSNESS.
Prayer  to the deities, God, saints or the holy places-temples can be performed in five different ways. One can clean, sweep, broom the holy place-shrine, statues and change the deity's clothing. Offering of sandal wood paste, Kum-Kum and other items utilized for prayers, do include prayer. Thinking-identifying of the deities-Almighty considering him to be none other than one self, is also a pure form of prayer. Recitation of verses, prayers is a virtuous-pious-righteous form of worship. Performing various acts like sacrifices-Hawan-Agnihotr-igniting essence sticks-dhoop-visiting holy places-pilgrimage-bathing in holy rivers ponds-sacred ocean, offerings made for the sake of the poor-down trodden, pity on all living beings, donation for social cause, too is a part and partial of prayers. Any of these performed with purity of heart-dedication-concentration under the asylum of the God grants Salvation.
SHIV LING ABHISHEK
MILK: BLESSING PURITY,
YOGURT: PROSPERITY,
HONEY: SWEET WORDS-SPEECH,
GHEE: VICTORY,
SUGAR: HAPPINESS,
WATER: PURITY.
राहु केतु आवरण पूजा
ॐ राहवे नमः।ॐ केतवे नमः। ॐ भौमाय नमः।ॐ बुधाय नमः।
ॐ गुरवे नमः।ॐ शुक्राय नमः।ॐ शनैश्चराय नमः।
ॐ वरुणसुतेभ्योनमः। ॐ सूर्यसुतेभ्यो नमः।ॐ अग्निपुत्रेभ्यो नमः।
ॐ कुबेरपुत्रेभ्यो नमः।ॐ वायुपुत्रेभ्यो नमः।ॐ कटुरसाय नमः।
ॐ आम्लरसाय नमः।ॐ क्षाररसाय नमः।ॐ कषायरसाय नमः।ॐ स्वादुरसाय नमः।
ॐ षष्ठिसहस्रमन्दे हारुणी राक्षसेभ्यो नमः।ॐ मेषादिद्वादशराशिभ्यो नमः।
ॐ अश्विन्यादिसप्तविंशतिनक्षत्रेभ्यो नमः।ॐ विष्कुम्भादिसप्तविंशतियोगेभ्यो नमः।
ॐ बबादि करणेभ्यो नमः।ॐ सप्तद्वीपेभ्यो नमः।ॐ ऋग्वेदादिचतुर्वेदेभ्यो नमः।
ॐ भूरादिसप्तलोकेभ्यो नमः।ॐ सप्तसागरेभ्यो नमः।ॐ ध्रुवाय नमः।
ॐ सप्तर्षिभ्यो नमः।ॐ एकोनपञ्चाशन्मरुद्भ्यो नमः।ॐ षडृतुभ्यो नमः।ॐ द्वादशमासेभ्यो नमः।
ॐ द्वयनाभ्यां नमः।ॐ पञ्चदशतिथिभ्यो नमः।ॐ षष्ठिसंवत्सरेभ्यो नमः।ॐ सुपर्णेभ्यो नमः।
ॐ नागेभ्यो नमः।ॐ यक्षेभ्यो नमः।ॐ गन्धर्वेभ्यो नमः।ॐ विद्याधरेभ्यो नमः।ॐ अप्सरेभ्यो नमः।
ॐ अक्षोभ्यो नमः।ॐ ब्रह्मणे नमः।ॐ विष्णवे नमः।ॐ रुद्राय नमः।ॐ सत्वाय नमः।ॐ रजसे नमः।
ॐ तमसे नमः।ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः।ॐ वज्राय नमः।ॐ शक्तये नमः।ॐ दण्डाय नमः।
ॐ खड्गाय नमः।ॐ पाशाय नमः।ॐ अङ्कुशाय नमः।ॐ गदायै नमः।ॐ त्रिशूलाय नमः।ॐ पद्माय नमः।
ॐ चक्राय नमः।ॐ ऐरावताय नमः।ॐ पुण्डरीकाय नमः।ॐ वामनाय नमः।ॐ कुमुदाय नमः।
ॐ अञ्जनाय नमः।ॐ पुष्पदन्ताय नमः।ॐ सार्वभौमाय नमः।ॐ दामिन्यै नमः।ॐ छायायै नमः।
ॐ अभीष्टसिद्धिं मे देही।ॐ समस्तावरणार्चनदेवेभ्यो नमः।ॐ राहुकेतुभ्यां नमः। 
इस को जपने से महानता प्राप्त होती है और साधक के घर में आठों सिद्धियाँ वर्तमान रहती हैं। यह जप मच्छ शंकराचार्य विरचित है। 
पूजा अर्चना :- ईश्वर से जुड़ने के लिए सबसे सरल माध्यम है पूजा। पूजा के लिए कर्मकांड आवश्यक नहीं है। भगवान् का नाम कभी भी, कहीं भी लिया जा सकता है। रामायण, महा भारत, गीता, पुराण, उपनिषद का पढ़ना भी पूजा है। भगवान् की कथा-चरित्र को सुनना भी पूजा ही है। मन्दिर में जाना जरूरी नहीं है। इसके लिये धन की आवश्यकता भी नहीं है-नहाने-धोने-शुद्धि की भी आवश्यकता नहीं है। पूजा से मनुष्य में मन पर काबु, अनुशासन, परिश्रम, धर्य और दूरदर्शिता जैसे गुणों का विकास हो जाता है।सूर्य को अर्ध्य दिया जाना, तुलसी को प्रतिदिन जल चढ़ाना, गाय को गोग्रास देना, माता-पिता, वृद्धजन तथा दिवंगत पितृजनों को प्रतिदिन प्रणाम करना, मन्दिर में जाने का नाम पूजा नहीं बल्कि एक नियम-क्रम है। सच्चे-सरल शुद्ध ह्रदय से नाम लेना-स्मरण करना ही पर्याप्त है।  हाँ यदि धन है, समय है, नियत है तो कर्मकाण्ड-विधि, का पालन अवश्य करिये। पूजा-पाठ के लिये दुःख-दर्द, परेशानी आने का इन्तज़ार करना जरूरी नहीं है। तीर्थ यात्रा, पवित्र नदियों, सरोवरों में स्नान भी पूजा है।  अगर मन सच्चा है तो पूजा फल अवश्य देगी। निस्वार्थ पूजा, भक्ति भाव का महत्व तो बहुत ही ज्यादा है। मनुष्य किसी भी वर्ण, कुल-गोत्र, क्षेत्र, देश, लोक में जन्म हो सच्चे मन से पूजा अवश्य करे। 
संध्या वंदन :- संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधिकाल में ही संध्या वंदन की जाती है। वैसे संधि 5 वक्त (-समय) की होती है, लेकिन प्रात:काल और संध्‍याकाल- उक्त 2 समय की संधि प्रमुख है अर्थात सूर्य उदय और अस्त के समय।
इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।
वेदज्ञ और ईश्‍वर परायण लोग इस समय प्रार्थना करते हैं। ज्ञानीजन इस समय ध्‍यान करते हैं। भक्तजन कीर्तन करते हैं। पुराणिक लोग देवमूर्ति के समक्ष इस समय पूजा या आरती करते हैं।
संध्योपासना के 4 प्रकार हैं :- (1). प्रार्थना, (2). ध्यान, (3). कीर्तन और (4). पूजा-आरती। व्यक्ति की जिसमें जैसी श्रद्धा है, वह वैसा करता है।संध्या वंदन सभी मनुष्यों का धर्म-कर्तव्य है। सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है। [आचार भूषण-89]
वेद, पुराण, रामायण, महाभारत, गीता और अन्य धर्मग्रंथों में संध्या वंदन की महिमा और महत्व का वर्णन किया गया है। संध्या वंदन प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का माध्यम है। कृतज्ञता से सकारात्मकता का विकास होता है। सकारात्मकता से मनोकामना की पूर्ति होती है और सभी तरह के रोग तथा शोक मिट जाते हैं।
संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधिकाल में ही संध्या वंदन की जाती है। संधि 5 वक्त (-समय) की होती है, प्रात:काल और संध्‍याकाल-उक्त दो समय की संधि प्रमुख हैं, अर्थात सूर्य उदय और अस्त के समय। वेदों के अनुसार इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना मौन रहकर की जाती है। उक्त काल में भोजन, नींद, यात्रा, वार्तालाप और समागम आदि वर्जित हैं। इसमें पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। यही वेद नियम है। यही सनातन सत्य है। संध्या वंदन के नियम है। संध्‍या वंदन में प्रार्थना ही सर्वश्रेष्ठ मानी गई है।
वेदज्ञ और ईश्‍वर परायण लोग इस समय प्रार्थना करते हैं। ज्ञानीजन इस समय ध्‍यान करते हैं। भक्तजन कीर्तन करते हैं। पुराणिक लोग देवमूर्ति के समक्ष इस समय पूजा या आरती करते हैं। 
संध्योपासना के चार प्रकार  :: 
(1). प्रार्थना :- संध्या वंदन में सर्वश्रेष्ठ है प्रार्थना। प्रार्थना को वैदिक ऋषिगण स्तुति या वंदना कहते थे। प्रार्थना को उपासना और आराधना भी कह सकते हैं। इसमें निराकार ईश्वर के प्रति कृतज्ञता और समर्पण का भाव व्यक्त किया जाता है। इसमें भजन या कीर्तन नहीं किया जाता। इसमें पूजा या आरती भी नहीं की जाती। प्रार्थना के प्रकार :-
(1.1). आत्मनिवेदन, (1.2). नामस्मरण, (1.3). वंदन और (1.4). संस्कृत भाषा में समूह गान।
प्रार्थना के फायदे : प्रार्थना में मन से जो भी मांगा जाता है वह फलित होता है। ईश्वर प्रार्थना को ‘संध्या वंदन’ भी कहते हैं। संध्या वंदन ही प्रार्थना है। यह आरती, जप, पूजा या पाठ, तंत्र, मंत्र आदि क्रियाकांड से भिन्न और सर्वश्रेष्ठ है।
प्रार्थना से मन स्थिर और शांत रहता है। इससे क्रोध पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इससे स्मरण शक्ति और चेहरे की चमक बढ़ जाती है। प्रतिदिन इसी तरह 15-20 मिनट प्रार्थना करने से व्यक्ति अपने आराध्य से जुड़ने लगता है और धीरे-धीरे उसके सारे संकट समाप्त होने लगते हैं। प्रार्थना से मन में सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है तथा शरीर निरोगी बनता है।
प्रार्थना का असर बहुत जल्द होता है। समूह में की गई प्रार्थना तो और शीघ्र फलित होती है। सभी तरह की आराधना में श्रेष्ठ है प्रार्थना। प्रार्थना करने के भी नियम है। वेदज्ञ प्रार्थना ही करते हैं। वे‍दों की ऋचाएँ प्रकृति और ईश्वर के प्रति गहरी प्रार्थनाएँ ही तो है। ऋषि जानते थे प्रार्थना का रहस्य।प्रार्थना क्यों और कब…
प्रार्थना :- नवधा भक्ति में से एक है प्रार्थना। प्रार्थना को उपासना, आराधना, वंदना, अर्चना भी कह सकते हैं। इसमें निराकार ईश्वर या देवताओं के प्रति कृतज्ञता और समर्पण का भाव व्यक्त किया जाता है। इसमें भजन या कीर्तन नहीं किया जाता। इसमें पूजा या आरती भी नहीं की जाती। प्रार्थना का असर बहुत जल्द होता है। समूह में की गई प्रार्थना तो और शीघ्र फलित होती है। सभी तरह की आराधना में श्रेष्ठ है प्रार्थना। वे‍दों की ऋचाएं प्रकृति और ईश्वर के प्रति गहरी प्रार्थनाएं ही तो हैं। ऋषि जानते थे प्रार्थना का रहस्य।
प्रार्थना का प्रचलन सभी धर्मों में है, लेकिन प्रार्थना करने के तरीके अलग-अलग हैं। तरीके कैसे भी हों जरूरी है प्रार्थना करना। प्रार्थना योग भी अपने आप में एक अलग ही योग है, लेकिन कुछ लोग इसे योग के तप और ईश्वर प्राणिधान का हिस्सा मानते हैं। प्रार्थना को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त करने की एक क्रिया भी माना जाता है।
प्रार्थना विधि :- ईश्वर, भगवान, देवी-देवता या प्रकृति के समक्ष प्रार्थना करने से मन और तन को शांति मिलती है। मंदिर, घर या किसी एकांत स्थान पर खड़े होकर या फिर ध्यान मुद्रा में बैठकर दोनों हाथों को नमस्कार मुद्रा में ले आएं। अब मन-मस्तिष्क को एकदम शांत और शरीर को पूर्णत: शिथिल कर लें और आंखें बद कर अपना संपूर्ण ध्यान अपने ईष्ट पर लगाएं। 15 मिनट तक एकदम शांत इसी मुद्रा में रहें तथा सांस की क्रिया सामान्य कर दें।
(2). ध्यान :- ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। ध्यान का मूलत: अर्थ है जागरूकता। होश। साक्ष‍ी भाव। ध्यान का अर्थ ध्यान देना, हर उस बात पर जो हमारे जीवन से जुड़ी है। शरीर पर, मन पर और आसपास जो भी घटित हो रहा है उस पर। विचारों के क्रिया-कलापों पर और भावों पर। इस ध्यान देने के जारा से प्रयास से ही हम अमृत की ओर एक-एक कदम बढ़ा सकते हैं। ध्यान को ज्ञानियों ने सर्वश्रेष्ठ माना है। ध्यान से मनोकामनाओं की पूर्ति होती है और ध्यान से मोक्ष का द्वार खुलता है।‘भीतर से जाग जाना ध्यान है। सदा निर्विचार की दशा में रहना ही ध्यान है।’ हमारे ऋषि-मुनियों ने पूजा, आरती, यज्ञ और प्रार्थना आदि में सबसे ऊपर रखा है ध्यान को। ध्यान से सभी प्रकार के कष्ट मिट जाते हैं और ध्यान के माध्यम से ही मोक्ष मिलता है।
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम॥3-2॥ [योगसूत्र]
जहाँ चित्त को लगाया जाए उसी में वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। धारणा का अर्थ चित्त को एक जगह लाना या ठहराना है, लेकिन ध्यान का अर्थ है जहां भी चित्त ठहरा हुआ है, उसमें वृत्ति का एकतार चलना ध्यान है। उसमें जाग्रत रहना ध्यान है। ध्यान अर्थात परमात्मा का स्मरण, उसमें मन-चित्त को केंद्रित-एकाग्र करना।
क्रिया नहीं है ध्यान :- बहुत से लोग क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल करते हैं- जैसे सुदर्शन क्रिया, भावातीत ध्यान और सहज योग ध्यान। दूसरी ओर विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है।
बहुत से संत, गुरु या महात्मा ध्यान की तरह-तरह की क्रांतिकारी विधियां बताते हैं, लेकिन वे यह नहीं बताते हैं कि विधि और ध्यान में फर्क है। क्रिया और ध्यान में फर्क है। क्रिया तो साधन है साध्य नहीं। क्रिया तो औजार है। क्रिया तो झाड़ू की तरह है।
आंख बंद करके बैठ जाना भी ध्यान नहीं है। किसी मूर्ति का स्मरण करना भी ध्यान नहीं है। माला जपना भी ध्यान नहीं है। अक्सर यह कहा जाता है कि पांच मिनट के लिए ईश्वर का ध्यान करो- यह भी ध्यान नहीं, स्मरण है। ध्यान है क्रियाओं से मुक्ति। विचारों से मुक्ति।
(3). कीर्तन :- ईश्वर, भगवान या गुरु के प्रति स्वयं के समर्पण या भक्ति के भाव को व्यक्त करने का एक शांति और संगीतमय तरीका है कीर्तन। इसे ही भजन कहते हैं। भजन करने से शांति मिलती है। भजन करने के भी नियम है। गीतों की तर्ज पर निर्मित भजन, भजन नहीं होते। शास्त्रीय संगीत अनुसार किए गए भजन ही भजन होते हैं। सामवेद में शास्त्रीय सं‍गीत का उल्लेख मिलता है।
कीर्तन या भजन कब और क्यों…
नवधा भक्ति में से एक है कीर्तन।
मंदिर में कीर्तन सामूहिक रूप से किसी विशेष अवसर पर ही किया जाता है। कीर्तन के प्रवर्तक देवर्षि नारद हैं। कीर्तन के माध्यम से ही प्रह्लाद, अजामिल आदि ने परम पद प्राप्त किया था। मीराबाई, नरसी मेहता, तुकाराम आदि संत भी इसी परंपरा के अनुयायी थे।
कीर्तन के दो प्रकार हैं :- देशज और शास्त्रीय। देशज अर्थात लोक संगीत परंपरा से उपजा कीर्तन जिसे ‘हीड़’ भी कहा जाता है। शास्त्रीय अर्थात जिसमें रागों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। संतों के दोहे और भजनकारों के पदों को भजन में गाया जाता है।
(4). पूजा-आरती :- पूजा करने के पुराणिकों ने अनेकों तरीके विकसित किए है। पूजा किसी देवता या देवी की मूर्ति के समक्ष की जाती है जिसमें गुड़ और घी की धूप दी जाती है, फिर हल्दी, कंकू, धूम, दीप और अगरबत्ती से पूजा करके उक्त देवता की आरती उतारी जाती है। अत: पूजा-आरती के ‍भी नियम है।पूजा कब और क्यों…
पूजा-आरती : पूजा को नित्यकर्म में शामिल किया गया है। पूजा करने के पुराणिकों ने अनेक मनमाने तरीके विकसित किए हैं। पूजा किसी देवता या देवी की मूर्ति के समक्ष की जाती है जिसमें गुड़ और घी की धूप दी जाती है, फिर हल्दी, कंकू, धूप, दीप और अगरबत्ती से पूजा करके उक्त देवता की आरती उतारी जाती है। पूजा में सभी देवों की स्तुति की जाती है। अत: पूजा-आरती के ‍भी नियम हैं। नियम से की गई पूजा के लाभ मिलते हैं।
12 बजे के पूर्व पूजा और आरती समाप्त हो जाना चाहिए। दिन के 12 से 4 बजे के बीच पूजा या आरती नहीं की जाती है। रात्रि के सभी कर्म वेदों द्वारा निषेध माने गए हैं, जो लोग रात्रि को पूजा या यज्ञ करते हैं उनके उद्देश्य अलग रहते हैं। पूजा और यज्ञ का सात्विक रूप ही मान्य है।
पूजा से वातावरण शुद्ध होता है और आध्यात्मिक माहौल का निर्माण होता है जिसके चलते मन और मस्तिष्क को शांति मिलती है। पूजा संस्कृत मंत्रों के उच्चारण के साथ की जाती है। पूजा समाप्ति के बाद आरती की जाती है। यज्ञ करते वक्त यज्ञ की पूजा की जाती है और उसके अलग नियम होते हैं। पूजा करने से देवता लोग प्रसन्न होते हैं। पूजा से रोग और शोक मिटते हैं और व्यक्ति को मुक्ति मिलती है।
पूजा के 5 प्रकार ::
(1). अभिगमन :- देवालय अथवा मंदिर की सफाई करना, निर्माल्य (पूर्व में भगवान को अर्पित (चढ़ाई) की गई वस्तुएं हटाना)। ये सब कर्म ‘अभिगमन’ के अंतर्गत आते हैं।
(2). उपादान :- गंध, पुष्प, तुलसी दल, दीपक, वस्त्र-आभूषण इत्यादि पूजा सामग्री का संग्रह करना ‘उपादान’ कहलाता है।
(3). योग :- ईष्टदेव की आत्मरूप से भावना करना ‘योग’ है।
(4). स्वाध्याय :- मंत्रार्थ का अनुसंधान करते हुए जप करना, सूक्त-स्तोत्र आदि का पाठ करना, गुण-नाम आदि का कीर्तन करना, ये सब स्वाध्याय हैं।
(5). इज्या :- उपचारों के द्वारा अपने आराध्य देव की पूजा करना ‘इज्या’ के अंतर्गत आती है

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