Monday, August 3, 2015

गुर्वष्टकम्गुर्वष्टकम् श्री गुरु स्तोत्र :: गुरु अष्टक


गुर्वष्टकम्गुर्वष्टकम् श्री गुरु स्तोत्र :: गुरु अष्टक 

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Bhardwaj  
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शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं, यशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम्। मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥1॥ 
यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्तिचारों दिशाओं में विस्तरित हो, मेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरु के श्री चरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ?
कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वं, गृहो बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्।मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥2॥ 
सुन्दरी पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र, घर एवं स्वजन आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हों, किंतु गुरु के श्री चरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इस प्रारब्ध-सुख से क्या लाभ?
षड़ंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या, कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति। मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥3॥ 
वेद एवं षटवेदांगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उनका मन यदि गुरु केश्री चरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?
विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः, सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः।मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्4॥ 
जिन्हें विदेशों में समादर मिलता हो, अपने देश में जिनका नित्य जय-जयकार से स्वागत किया जाता हो और जो सदाचार पालन में भी अनन्य स्थान रखता हो, यदि उनका भी मन गुरु के श्री चरणों के प्रति आसक्त न हो तो सदगुणों से क्या लाभ?
क्षमामण्डले भूपभूपलबृब्दैः, सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्। मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥5॥ 
जिन महानुभाव के चरण कमल पृथ्वी मण्डल के राजा-महाराजाओं से नित्य पूजित रहा करते हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्री चरणों के प्रति आसक्त न हो तो इस सदभाग्य से क्या लाभ?
यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्,जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्।मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥6॥ 
दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति दिगदिगांतरों में व्याप्त हो, अति उदार गुरु की सहज कृपादृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख-एश्वर्य हस्तगत हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणोंमें आसक्तभाव न रखता हो तो इन सारे एशवर्यों से क्या लाभ?
न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ, न कन्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम्।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे, ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥7॥ 
जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, स्त्री-सुख और धनोभोग से कभी विचलित न हुआ हो, फिर भी गुरु के श्री चरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो मन की इस अटलता से क्या लाभ?
अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये, न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये।मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥8॥ 
जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में, अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भण्डार में आसक्त न हो, पर गुरु केश्रीचरणों में भी वह मन आसक्त न हो पाये तो इन सारीअनासक्त्तियों का क्या लाभ?
गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेही, यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही।लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञं,गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्॥9॥ 
जो यति, राजा, ब्रह्मचारी एवं गृहस्थ इस गुरु अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरु के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशाली शरीरधारी अपने इच्छितार्थ एवंब्रह्मपद इन दोनों को संप्राप्त कर लेता है यह निश्चित है। 
श्रीमद आद्य शंकराचार्यविरचितम्

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