Thursday, February 4, 2016

SOMRAS-THE EXTRACT OF SOMVALLI सोमवल्ली-लता और सोमवृक्ष

इयं सोमकला नाम वल्ली परमदुर्लभा। अनया बद्ध सूतेन्द्रो लक्षवेधी प्रजायते ॥  [रसेन्द्र चूड़ामणि 6-(6-9)]
जिसके पन्द्रह पत्ते होते हैं, जिसकी आकृति सर्प की तरह होती है, जहाँ से पत्ते निकलते हैं-वे गाँठें लाल होती हैं, ऐसी वह पूर्णिमा के दिन लाई हुई पँचांग (-मूल, डंडी, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवल्ली पारद को बद्ध कर देती है। पूर्णिमा के दिन लाया हुआ पँचांग (-मूल, छाल, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवृक्ष भी पारद को बाँधना, पारद की भस्म बनाना आदि कार्य कर देता है। परन्तु सोमवल्ली और सोमवृक्ष-इन दोनों में सोमवल्ली अधिक गुण वाली है। इस सोमवल्ली का कृष्णपक्ष में प्रतिदिन एक-एक पत्ता झड़ जाता है और शुक्लपक्ष में पुनः प्रतिदिन एक-एक पत्ता निकल आता है। इस तरह लता बढ़ती रहती है।पूर्णिमा के दिन इस इस लता का कन्द निकाला जाय तो वह बहुत श्रेष्ठ होता है। धतूरे के सहित इस कन्द में बँधा हुआ पारद देह को लोहे की तरह दृढ़ बना देता है और इससे बँधा हुआ पारद लक्षभेदी हो जाता है अर्थात एक गुणा बद्ध पारद लाख गुणा लोहे को सोना बना देता है। यह सोम नाम की लता अत्यन्त दुर्लभ है। 
देवताओं के द्वारा पीया जाने वाला अद्भुत पेय इससे से तैयार किया जाता है।  इसको मदिरा-शराब कहना सर्वथा मतिभ्रम है। 

KALP-ONE DAY OF THE CREATOR BRAHMA JI कल्प :: भगवान् ब्रह्मा जी का एक दिन

भगवान् ब्रह्मा जी के एक दिन को एक कल्प कहा गया है। 
(1). नील वराह कल्प  :- पाद्मकल्प के अंत के बाद महाप्रलय हुई। सूर्य के भीषण ताप के चलते धरती के सभी वन-जंगल ‍आदि सूख गए। समुद्र का जल भी जल गया। ज्वालामुखी फूट पड़े। सघन ताप के कारण सूखा हुआ जल वाष्प बनकर आकाश में मेघों के रूप में स्थिर होता गया।
अंत में न रुकने वाली जलप्रलय का सिलसिला शुरू हुआ। चक्रवात उठने लगे और देखते ही देखते समस्त धरती जल में डूब गई। यह देख भगवान् ब्रह्मा जी को चिंता होने लगी, तब उन्होंने जल में निवास करने वाले भगवान् श्री हरी विष्णु का स्मरण किया और फिर भगवान् विष्णु ने नील वराह रूप में प्रकट होकर इस धरती के कुछ हिस्से को जल से मुक्त किया। नील वराह देव ने अपनी पत्नी नयनादेवी के साथ अपनी संपूर्ण वराही सेना को प्रकट किया और धरती को जल से बचाने के लिए तीक्ष्ण दरातों, पाद प्रहारों, फावड़ों और कुदालियों और गैतियों द्वारा धरती को समतल किया।इसके लिए उन्होंने पर्वतों का छेदन तथा गर्तों के पूरण हेतु मृत्तिका के टीलों को जल में डालकर भूमि को बड़े श्रम के साथ समतल करने का प्रयास किया। यह एक प्रकार का यज्ञ ही था, इसलिए भगवान् नील वराह को भगवान् यज्ञ वराह भी कहा गया। नील वराह के इस कार्य को आकाश के सभी देवदूत देख रहे थे। प्रलयकाल का जल उतर जाने के बाद भगवान् के प्रयत्नों से अनेक सुगंधित वन और पुष्कर-पुष्करिणी सरोवर निर्मित हुए, वृक्ष, लताएं उग आईं और धरती पर फिर से हरियाली छा गई। संभवत: इसी काल में मधु और कैटभ का वध किया गया था।
(2). आदि वराह कल्प  :- नील वराह कल्प के बाद आदि वराह कल्प शुरू हुआ। इस कल्प में भगवान् विष्णु ने आदि वराह नाम से अवतार लिया। यह वह काल था जबकि दिति और कश्यप के दो भयानक असुर पुत्र हिरण्यकश्यप और हिरण्याक्ष का आतंक था। दोनों को ही ब्रह्माजी से वरदान मिला हुआ था।
हिरण्याक्ष का वध :- ब्रह्मा से युद्ध में अजेय और अमरता का वर मिलने के कारण उसका धरती पर आतंक हो चला था। हिरण्याक्ष भगवान् वराह रूपी विष्णु के पीछे लग गया था और वह उनके धरती निर्माण के कार्य की खिल्ली उड़ाकर उनको युद्ध के लिए ललकारता था। वराह भगवान् ने  जब रसातल से बाहर निकलकर धरती को समुद्र के ऊपर स्थापित कर दिया, तब उनका ध्यान हिरण्याक्ष पर गया।
आदि वराह के साथ भी महाप्रबल वराह सेना थी। अंतत: हिरण्याक्ष का अंत हुआ। 
हिरण्यकश्यप का वध :- इस काल में भगवान् वराह ने नृसिंह का अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध कर दिया था। हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रहलाद भगवान् विष्णु का परम भक्त था, जो हिरण्यकश्यप को पसंद नहीं था तो उसने प्रहलाद को मारने के लिए कई उपाय किए। लेकिन भगवान्  विष्णु ने अपने भक्त को बचाने के लिए अंत में नृसिंह का अवतार लिया।
हिरण्यकश्यप को ब्रह्मा जी से अमरता का वर मिला था। उसने ब्रह्मा जी से वर मांगा था कि मुझे कोई मनुष्य, दानव, असुर, किन्नर, पशु, पक्षी और जलचर जंतु नहीं मार सके और न में दिन में मरूं, न रात में, न पाताल में, न धरती पर और न आकाश में। भगवान् ब्रह्मा ने कहा :- तथास्थु।
(3). श्वेत वराह कल्प :- वैवस्वत मनु के 10 पुत्र थे। इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यंत, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध पुत्र थे। वैवस्वत मनु के 10 पुत्र और इला नाम की कन्या थी। वैवस्वत मनु को ही पृथ्वी का प्रथम राजा कहा जाता है। इला का विवाह बुध के साथ हुआ जिससे उसे पुरूरवा नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। यही पुरूरवा प्रख्यात ऐल या चंद्र वंश का संस्थापक था।
वैवस्वत मनु के काल के प्रमुख ऋषि :- वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, भारद्वाज, मार्कंडेय, अगस्त्य आदि।
वैवस्वत मनु की शासन व्यवस्था में देवों में 5 तरह के विभाजन थे :- देव, दानव, यक्ष, किन्नर और गंधर्व। 
प्रमुख प्रजातियाँ :: देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, भल्ल, वसु, अप्सराएं, रुद्र, मरुदगण, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है।
पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति ::  प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीनकाल में 7 द्वीपों में बांटा गया था : जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है।
जम्बू द्वीप के 9 खंड थे :- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, भारत, हरिवर्ष, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय। 
देवताओं के गुरु बृहस्पति और दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य थे।
तब ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षि, काण्डर्षि, श्रुतर्षि और राजर्षि ये ऋषियों की 7 श्रेणियां होती थीं। 
 यह वैवस्वत मनु का काल था जबकि वशिष्ठ, विश्वामित्र, अत्रि, कण्व, भारद्वाज, मार्कंडेय, अगस्त्य आदि ऋषिगण हुआ करते थे।
वराह काल में नील वराह अवतार से लेकर आदि वराह, श्वेत वराह, नृसिंह अवतार, वामन अवतार और कच्छप अवतार हुए । 
इस काल में सनकादि, इंद्रादि, नर-नारायण हुए, वासुकि-तक्षक, हाहा-हूहू, मेनका-रम्भा, मरुदगण, हिरण्याक्ष-हिरण्यकश्यप हुए, दिति-अदिति पुत्र, रथकृत-ओज, हेति-प्रहेति हुए, मधु-कैटभ हुए, भस्मासुर, त्रिपुरासुर हुए, ब्रह्मा के 10 पुत्रों का कुल चला, राजा बाली हुए।
बाली के बाद कच्छप अवतार हुआ और अंत में स्वायंभुव मनु हुए। स्वायंभुव मनु के बाद स्वरोचिष, औत्तमी, तामस मनु, रैवत और चाक्षुष मनु हुए और अंत में जल प्रलय के बाद नए युग की शुरुआत हुई। जल प्रलय के दौरान सातवें मनु वैवस्वत मनु हुए।
इन्द्र-बलि (समुद्र मंथन) :- वामन अवतार के बाद कच्छप अवतार हुआ जिसे कूर्म अवतार भी कहा गया। कूर्म अवतार में भगवान विष्णु ने क्षीरसागर के समुद्र मंथन के समय मंदार पर्वत को अपने कवच पर संभाला था। इस प्रकार भगवान विष्णु, मंदार पर्वत और वासुकि नामक सर्प की सहायता से देवों एवं असुरों ने समुद्र मंथन करके 14 रत्नों की प्राप्ति की। इस समय भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप भी धारण किया था। इसके बाद जल प्रलय की घटना घटी।
मत्स्य अवतार- सातवें मनु वैवस्वत मनु :- स्वायंभुव मनु के कुल में मत्स्य पुराण में उल्ले‍ख है कि द्रविड़ देश के राजर्षि सत्यव्रत एक दिन कृतमाला नदी में जल से तर्पण कर रहे थे। उस समय उनकी अंजुलि में एक छोटी-सी मछली आ गई। सत्यव्रत ने मछली को नदी में डाल दिया तो मछली बोल पड़ी। उसने कहा कि इस जल में बड़े जीव-जंतु मुझे खा जाएंगे। यह सुनकर राजा ने मछली को फिर जल से निकाल लिया और अपने कमंडल में रख लिया और महल ले आए।
रातभर में वह मछली बढ़ गई, तब राजा ने उसे बड़े मटके में डाल दिया। मटके में भी वह बढ़ गई तो उसे तालाब में डाल दिया। अंत में सत्यव्रत ने जान लिया कि यह कोई मामूली मछली नहीं, जरूर इसमें कुछ बात है, तब उन्होंने उसे ले जाकर समुद्र में डाल दिया। समुद्र में डालते समय मछली ने कहा कि समुद्र में मगर रहते हैं आप वहां मत छोड़िए, लेकिन राजा ने हाथ जोड़कर कहा कि आप मुझे कोई मामूली मछली नहीं जान पड़ती है, आपका आकार तो अप्रत्याशित तेजी से बढ़ रहा है बताएं कि आप कौन हैं?
तब मछली रूप में भगवान् विष्णु ने प्रकट होकर कहा कि आज से 7वें दिन प्रलय (-अधिक वर्षा से) के कारण पृथ्वी समुद्र में डूब जाएगी, तब मेरी प्रेरणा से तुम एक बहुत बड़ी नौका बनाओ और जब प्रलय शुरू हो तो तुम सप्त ऋषियों और कुछ मनुष्यों सहित सभी एक जोड़े प्राणियों को लेकर उस नौका में बैठ जाना तथा सभी अनाज उसी में रख लेना। अन्य छोटे-बड़े बीज भी रख लेना। नाव पर बैठकर लहराते महासागर में विचरण करना।
प्रचंड आंधी के कारण नौका डगमगा जाएगी। तब मैं इसी रूप में आ जाऊंगा, तब वासुकि नाग द्वारा उस नाव को मेरे सींग में बांध लेना। जब तक ब्रह्मा की रात रहेगी, मैं नाव समुद्र में खींचता रहूंगा। उस समय जो तुम प्रश्न करोगे, मैं उत्तर दूंगा। इतना कह मछली गायब हो गई।
राजा तपस्या करने लगे। मछली का बताया हुआ समय आ गया। वर्षा होने लगी। समुद्र उमड़ने लगा। तभी राजा ऋषियों, अन्न, बीजों को लेकर नौका में बैठ गए और फिर भगवानरूपी वही मछली दिखाई दी। उसके सींग में नाव बांध दी गई और मछली से पृथ्वी और जीवों को बचाने की स्तुति करने लगे। मछलीरूपी विष्णु ने उसे आत्मतत्व का उपदेश दिया। मछलीरूपी विष्णु ने अंत में नौका को हिमालय की चोटी से बांध दिया। उस चोटी को आज नौकाबंध कहते हैं। 6 माह तक वर्षा हुई और नाव में ही बैठे-बैठे जल प्रलय का अंत हो गया।
यही सत्यव्रत वर्तमान में महाकल्प में विवस्वान (-सूर्य) के पुत्र श्राद्धदेव के नाम से विख्यात हुए, वही वैवस्वत मनु के नाम से भी जाने गए।
पूर्व में यह धरती जल प्रलय के कारण जल से ढंक गई थी। कैलाश, गोरी-शंकर की चोटी तक पानी चढ़ गया था।  संपूर्ण धरती ही जलमग्न हो गई थी, लेकिन ओंकारेश्वर स्थित मार्कंडेय ऋषि का आश्रम जल से अछूता रहा। इसके अलावा तिब्बत, मंगोलिया के कई ऊंचे पठार भी जल से अछूते रहे।
कई माह तक वैवस्वत मनु (-इन्हें श्राद्धदेव भी कहा जाता है) द्वारा नाव में ही गुजारने के बाद उनकी नाव गौरी-शंकर शिखर से होते हुए नीचे उतरी। गौरी-शंकर जिसे एवरेस्ट की चोटी कहा जाता है, दुनिया में इससे ऊंचा, बर्फ से ढंका हुआ और ठोस पहाड़ दूसरा नहीं है।
वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे :- (1). इल, (2). इक्ष्वाकु, (3). कुशनाम, (4). अरिष्ट, (5). धृष्ट, (6). नरिष्यन्त, (7). करुष, (8). महाबली, (9). शर्याति और (10). पृषध। राजा इक्ष्वाकु के कुल में जैन और हिन्दू धर्म के महान तीर्थंकर, भगवान, राजा, साधु महात्मा और सृजनकारों का जन्म हुआ है।
स्वायम्भुव मनु ही आदि मनु और प्रजापति कहे गए हैं। उनके दो पुत्र हुए, प्रियव्रत और उत्तानपाद। राजा उत्तानपाद के पुत्र परम धर्मात्मा ध्रुव हुए, जिन्होंने भक्ति भाव से भगवान् विष्णु की आराधना करके अविनाशी पद को प्राप्त किया।
राजर्षि प्रियव्रत के दस पुत्र हुए, जिनमें से तीन तो संन्यास ग्रहण करके घर से निकल गए और परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो गए। शेष सात द्वीपों में उन्होंने अपने सात पुत्रों को प्रतिष्ठित किया। राजा प्रियव्रत के ज्येष्ठ पुत्र आग्नीघ्र जम्बू द्वीप के अधिपति हुए।
उनके नौ पुत्र जम्बू द्वीप के नौ खण्डों के स्वामी माने गए हैं, जिनके नाम उन्हीं के नामों के अनुसार इलावृतवर्ष, भद्राश्ववर्ष, केतुमालवर्ष, कुरुवर्ष, हिरण्यमयवर्ष, रम्यकवर्ष, हरीवर्ष, किंपुरुष वर्ष और हिमालय से लेकर समुद्र के भू-भाग को नाभि खंड (भारतवर्ष) कहते हैं।
नाभि और कुरु ये दोनों वर्ष धनुष की आकृति वाले बताए गए हैं। नाभि के पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभ से ‘भरत’ का जन्म हुआ; जिनके आधार पर इस देश को भारतवर्ष भी कहते हैं।
ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र, शिव आदि पदों पर अलग-अलग कल्पों में अलग देवता विराजमान होते हैं।
मत्स्य पुराण में 30 कल्पों की चर्चा है :- श्‍वेत, नीललोहित, वामदेव, रथनतारा, रौरव, देवा, वृत, कंद्रप, साध्य, ईशान, तमाह, सारस्वत, उडान, गरूढ़, कुर्म, नरसिंह, समान, आग्नेय, सोम, मानव, तत्पुमन, वैकुंठ, लक्ष्मी, अघोर, वराह, वैराज, गौरी, महेश्वर, पितृ।
महत कल्प :- इस काल के बाद प्रलय हुई थी तो सभी कुछ नष्ट हो गया। इस कल्प में विचित्र-विचित्र और महत् (-अंधकार से उत्पन्न) वाले प्राणी और मनुष्य होते थे। जो अंधकार में भी देखने में सक्षम थे। 
हिरण्य गर्भ कल्प :- इस काल में धरती का रंग पीला था इसीलिए इसे हिरण्य कहते हैं। हिरण्य के 2 अर्थ होते हैं- एक जल और दूसरा स्वर्ण। हालांकि धतूरे को भी हिरण्य कहा जाता है। माना जाता है कि तब स्वर्ण के भंडार बिखरे पड़े थे। इस काल में हिरण्यगर्भ ब्रह्मा, हिरण्यगर्भ, हिरण्यवर्णा लक्ष्मी, देवता, हिरप्यानी रैडी (अरंडी), वृक्ष वनस्पति एवं हिरण ही सर्वोपयोगी पशु थे। सभी एकरंगी पशु और पक्षी थे।
ब्रह्मकल्प :- इस कल्प में मनुष्य जाति सिर्फ ब्रह्म (ईश्‍वर) की ही उपासक थी। क्रम विकास के तहत प्राणियों में विचित्रताओं और सुंदरताओं का जन्म हो चुका था। जम्बूद्वीप में इस काल में ब्रह्मर्षि देश, ब्रह्मावर्त, ब्रह्मलोक, ब्रह्मपुर, रामपुर, रामगंगा केंद्र आदि नाम से स्थल हुआ करते थे। यहां की प्रजाएं परब्रह्म और ब्रह्मवाद की ही उपासना करती थी। इस काल का ऐतिहासिक विवरण हमें ब्रह्मपुराण, ब्रह्माण्डपुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।
पद्मकल्प :- पुराणों के अनुसार इस कल्प में 16 समुद्र थे। यह कल्प नागवंशियों का था। धरती पर जल की अधिकता थी और नाग प्रजातियों की संख्या भी अधिक थी। कोल, कमठ, बानर (बंजारे) व किरात जातियां थीं और कमल पत्र पुष्पों का बहुविध प्रयोग होता था। सिंहल द्वीप (-श्रीलंका) की नारियां पद्मिनी प्रजाएं थीं। तब के श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति आज के श्रीलंका जैसी नहीं थी। इस कल्प का विवरण हमें पद्म पुराण में विस्तार से मिल सकता है।
वराहकल्प :- वर्तमान में वराह कल्प चल रहा है। इस कल्प में भगवान् विष्णु ने वराह रूप में 3 अवतार लिए :- पहला नील वराह, दूसरा आदि वराह और तीसरा श्वेत वराह। इसी कल्प में विष्णु के 24 अवतार हुए और इसी कल्प में वैवस्वत मनु का वंश चल रहा है। इसी कल्प में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश ने नई सृष्टि की थी। वर्तमान में हम इसी कल्प के इतिहास की बात कर रहे हैं। वराह पुराण में इसका विवरण मिलता है।
अब तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत मनु, चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वंतर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अंतरदशा चल रही है। 

Tuesday, February 2, 2016

CONCH & THE IMPACT OF MELODIOUS SOUND PRODUCED BY IT शंख और शंख ध्वनि

CONCH & THE IMPACT OF MELODIOUS SOUND PRODUCED BY IT 
शंख और शंख ध्वनि
शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है, जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है। इसको अन्य नामों से भी पुकारा जाता है  यथा :: शंख, समुद्रज, कंबु, सुनाद, पावनध्वनि, कंबु, कंबोज, अब्ज, त्रिरेख, जलज, अर्णोभव, महानाद, मुखर, दीर्घनाद, बहुनाद, हरिप्रिय, सुरचर, जलोद्भव, विष्णुप्रिय, धवल, स्त्रीविभूषण, पांचजन्य, अर्णवभव आदि।शंख ध्वनि घर में सुलह शान्ति प्रदायक है। 
शंखस्तुविमल: श्रेष्ठश्चन्द्रकांतिसमप्रभ: अशुद्धोगुणदोषैवशुद्धस्तु सुगुणप्रद:॥ 
निर्मल व चन्द्रमा की कांति के समानवाला शंख श्रेष्ठ होता है जबकि अशुद्ध अर्थात् मग्न शंख गुणदायक नहीं होता। गुणोंवाला शंख ही प्रयोग में लाना चाहिए। क्षीरसागर में शयन करने वाले सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के एक हाथ में शंख अत्यधिक पावन माना जाता है। इसका प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष रूप से किया जाता है।
नादब्रह्म :: शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख की ध्वनि को ॐ की ध्वनि के समकक्ष माना गया है। शंखनाद से आपके आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है। जहाँ शंख ध्वनि होती है वहाँ देवी-देवताओं का वास होता है और व्याधियों से मुक्ति प्राप्त होती है। भूत-प्रेत और राक्षस  भाग जाते हैं। यह वास्तुदोष दूर करने के साथ-साथ आरोग्य वृद्धि, आयुष्य प्राप्ति, लक्ष्मी प्राप्ति, पुत्र प्राप्ति, पितृ-दोष शांति, विवाह आदि की रुकावट भी दूर दूर करता है। 
भगवान्  शिव को छोड़कर सभी देवताओं पर शंख से जल अर्पित किया जा सकता है।भगवान्  शिव ने शंखचूड़ नामक दैत्य का वध किया था, अत: शंख का जल भगवान् शिव को निषेध है। योग में शंख प्रक्षालन और शंख मुद्रा होती हैं।  आयुर्वेद में शंख पुष्पी और शंख भस्म का प्रयोग किया जाता है। प्राचीनकाल में शंख लिपि भी हुआ करती थी। 
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृत: करे।नमित: सर्वदेवैश्य पाञ्चजन्य नमो स्तुते।।
शंख का प्रयोग प्राय: पूजा-पाठ में किया जाता है। अत: पूजारंभ में शंखमुद्रा से शंख की प्रार्थना की जाती है। शंख को हिन्दू धर्म में महत्वपूर्ण और पवित्र माना गया माना गया है। 
शंख मुख्यतः 3 प्रकार के होते हैं :: दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख अथवा वामावर्ती, दक्षिणावर्ती तथा गणेश शंख। अन्य प्रकार :- लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरूड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख, गोमुखी शंख, पांचजन्य शंख, अन्नपूर्णा शंख, मोती शंख, हीरा शंख, शेर शंख आदि प्रकार के होते हैं।  
द्विधासदक्षिणावर्तिर्वामावत्तिर्स्तुभेदत: दक्षिणावर्तशंकरवस्तु पुण्ययोगादवाप्यते यद्गृहे तिष्ठति सोवै लक्ष्म्याभाजनं भवेत्। 
दक्षिणावर्ती शंख पुण्य के ही योग से प्राप्त होता है। यह शंख जिस घर में रहता है, वहां लक्ष्मी की वृद्धि होती है। इसका प्रयोग अर्घ्य आदि देने के लिए विशेषत: होता है। ये दो प्रकार के होते हैं नर और मादा। जिसकी परत मोटी हो और भारी हो वह नर और जिसकी परत पतली हो और हल्का हो, वह मादा शंख होता है। इसकी स्थापना यज्ञोपवीत पर करनी चाहिए। शंख का पूजन केसर युक्त चंदन से करें। प्रतिदिन नित्य क्रिया से निवृत्त होकर शंख की धूप-दीप-नैवेद्य-पुष्प से पूजा करें और तुलसी दल चढ़ाएं।
वामवर्ती शंख का पेट बाईं ओर खुला होता है। इसके बजाने के लिए एक छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं।
प्रथम प्रहर में पूजन करने से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है। द्वितीय प्रहर में पूजन करने से धन-सम्पत्ति में वृद्धि होती है। तृतीय प्रहर में पूजन करने से यश व कीर्ति में वृद्धि होती है। चतुर्थ प्रहर में पूजन करने से संतान प्राप्ति होती है। प्रतिदिन पूजन के बाद 108 बार या श्रद्धा के अनुसार मंत्र का जप करें।
भगवान् श्री कृष्ण के शंख का नाम पाञ्चजन्य था जिसको उन्होंने पांचजन्य नामक समुद्र में स्थित राक्षस को मर कर प्राप्त किया था।  उस राक्षस ने उनके गुरु संदीपन के पुत्र का वध किया था। भगवान् ने उनके मरे हुए पुत्र को धर्मराज से पुनः प्राप्त करके वापस किया था। 
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:। पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:॥ (महाभारत)
अर्जुन के पास देवदत्त, युधिष्ठिर के पास अनंतविजय, भीष्म के पास पोंड्रिक, नकुल के पास सुघोष, सहदेव के पास मणिपुष्पक था। सभी के शंखों का महत्व और शक्ति अलग-अलग थी। कई देवी देवतागण शंख को अस्त्र रूप में धारण किए हुए हैं। महाभारत में युद्धारंभ की घोषणा और उत्साहवर्धन हेतु शंख नाद किया गया था।
अथर्ववेद के अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है :- शंखेन हत्वा रक्षांसि। भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है। यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला व्यक्ति अपिक्षित है।
धन प्राप्ति में सहायक शंख ::  शंख समुद्र मंथन के समय प्राप्त चौदह अनमोल रत्नों में से एक है। लक्ष्मी के साथ उत्पन्न होने के कारण इसे लक्ष्मी भ्राता भी कहा जाता है। यही कारण है कि जिस घर में शंख होता है, वहाँ लक्ष्मी का वास होता है। 
शंख पूजन का लाभ ::  शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है।  तीर्थाटन से जो लाभ मिलता है, वही लाभ शंख के दर्शन और पूजन से मिलता है। 
शंख से शिवलिंग, कृष्ण या लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं। [ब्रह्मवैवर्त पुराण]
शंखनाद से सकारात्मक ऊर्जा का सर्जन होता है जिससे आत्मबल में वृद्धि होती है। शंख में प्राकृतिक कैल्शियम, गंधक और फास्फोरस की भरपूर मात्रा होती है। प्रतिदिन शंख फूंकने वाले को गले और फेफड़ों के रोग नहीं होते।
शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंख वादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है। गोरक्षा संहिता, विश्वामित्र संहिता, पुलस्त्य संहिता आदि ग्रंथों में दक्षिणावर्ती शंख को आयुर्वद्धक और समृद्धि दायक कहा गया है।
पेट में दर्द रहता हो, आंतों में सूजन हो अल्सर या घाव हो तो दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है। कालसर्प योग में भी यह रामबाण का काम करता है।
शंख से वास्तु दोष का निदान :: शंख से वास्तु दोष भी मिटाया जा सकता है। शंख को किसी भी दिन लाकर पूजा स्थान पर पवित्र करके रख लें और प्रतिदिन शुभ मुहूर्त में इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए तो घर में वास्तु दोष का प्रभाव कम हो जाता है। शंख में गाय का दूध रखकर इसका छिड़काव घर में किया जाए तो इससे भी सकारात्मक उर्जा का संचार होता है।
विश्व का सबसे बड़ा शंख केरल राज्य के गुरुवयूर के श्रीकृष्ण मंदिर में सुशोभित है, जिसकी लंबाई लगभग आधा मीटर है तथा वजन दो किलोग्राम है।
गणेश शंख :: इस शंख की आकृति भगवान श्रीगणेश की तरह ही होती है। यह शंख दरिद्रता नाशक और धन प्राप्ति का कारक है।
अन्नपूर्णा शंख :: इसका उपयोग घर में सुख-शान्ति और श्री समृद्धि के लिए अत्यन्त उपयोगी है। गृहस्थ जीवन यापन करने वालों को प्रतिदिन इसके दर्शन करने चाहिए।
कामधेनु शंख ::  इसका उपयोग तर्क शक्ति को और प्रबल करने के लिए किया जाता है। इस शंख की पूजा-अर्चना करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
मोती शंख ::  इस शंख का उपयोग घर में सुख और शांति के लिए किया जाता है। मोती शंख हृदय रोग नाशक भी है। मोती शंख की स्थापना पूजा घर में सफेद कपड़े पर करें और प्रतिदिन पूजन करें, लाभ मिलेगा। यदि मोती शंख को कारखाने में स्था‍पित किया जाए तो कारखाने में तेजी से आर्थिक उन्नति होती है। यदि व्यापार में घाटा हो रहा है, दुकान से आय नहीं हो रही हो तो एक मोती शंख दुकान के गल्ले में रखा जाए तो इससे व्यापार में वृद्धि होती है। यदि मोती शंख को मंत्र सिद्ध व प्राण-प्रतिष्ठा पूजा कर स्थापित किया जाए तो उसमें जल भरकर लक्ष्मी के चित्र के साथ रखा जाए तो लक्ष्मी प्रसन्न होती है और आर्थिक उन्नति होती है। मोती शंख को घर में स्थापित कर रोज "ॐ श्री महालक्ष्मै नम:" 11 बार बोलकर 1-1 चावल का दाना शंख में भरते रहें। इस प्रकार 11 दिन तक प्रयोग करें। यह प्रयोग करने से आर्थिक तंगी समाप्त हो जाती है।
ऐरावत शंख ::  इसका उपयोग मनचाही साधना सिद्ध को पूर्ण करने के लिए, शरीर की सही बनावट देने तथा रूप रंग को और निखारने के लिए किया जाता है। प्रतिदिन इस शंख में जल डाल कर उसे ग्रहण करना चाहिए। शंख में जल प्रतिदिन 24-28 घण्टे तक रहे और फिर उस जल को ग्रहण करें, तो चेहरा कांतिमय होने लगता है।
विष्णु शंख ::  इस शंख का उपयोग लगातार प्रगति के लिए और असाध्य रोगों में शिथिलता के लिए किया जाता है। इसे घर में रखने भर से घर रोगमुक्त हो जाता है।
पौण्ड्र शंख :: इसका उपयोग मनोबल बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग विद्यार्थियों के लिए उत्तम है। इसे विद्यार्थियों को अध्ययन कक्ष में पूर्व की ओर रखना चाहिए।
मणि पुष्पक शंख :: इसकी पूजा-अर्चना से यश कीर्ति, मान-सम्मान प्राप्त होता है। उच्च पद की प्राप्ति के लिए भी इसका पूजन उत्तम है।
देवदत्त शंख ::  इसका उपयोग दुर्भाग्य नाशक माना गया है। इस शंख का उपयोग न्याय क्षेत्र में विजय दिलवाता है। इस शंख को शक्ति का प्रतीक माना गया है। न्यायिक क्षेत्र से जुड़े लोग इसकी पूजा कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
दक्षिणावर्ती शंख ::  इस शंख को दक्षिणावर्ती इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जहां सभी शंखों का पेट बाईं ओर खुलता है वहीं इसका पेट विपरीत दाईं और खुलता है। इस शंख को देव स्वरूप माना गया है। दक्षिणावर्ती शंख के पूजन से खुशहाली आती है और लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ सम्पत्ति भी बढ़ती है। इस शंख की उपस्थिति ही कई रोगों का नाश कर देती है। दक्षिणावर्ती शंख पेट के रोग में भी बहुत लाभदायक है। विशेष कार्य में जाने से पहले दक्षिणावर्ती शंख के दर्शन करने भर से उस काम के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।

Wednesday, January 13, 2016

‎SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (IX) श्रीमद् भगवद्गीता अथ नवमोऽध्यायः

HINDUISM (हिन्दुत्व) CHAPTER (18-IX)
‎SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (IX) श्रीमद् भगवद्गीता अथ नवमोऽध्यायः
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj  
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श्रीभगवानुवाच :: इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥9-1॥
यह अत्यन्त गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान दोष दृष्टि रहित तेरे लिये तो मैं फिर अच्छी तरह से कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ से अर्थात जन्म-मरण रूप संसार से मुक्त हो जायेगा। 
भगवान् जिस ज्ञान का वर्णन अर्जुन के सामने करने जा रहे थे, वह गुह्यतम है। वह कठिन-क्लिष्ठ भी है और साधारण व्यक्ति अविवेकी को समझ में नहीं आने वाला भी है। यह तत्वज्ञान ज्ञान उसी के लिए है जिसकी दृष्टि दोषरहित-शुद्ध है। ऐसा व्यक्ति जो घोरतम अपराध करके भी प्रभु के की शरण में आ जाता है उसका उद्धार हो ही जाता है। इसमें किसी धर्म, जाति, वर्ण का बन्धन नहीं है। इस जगत के प्राण-कारण-कर्ता परमात्मा ही हैं अन्य कोई नहीं। कर्मयोग (-निष्काम भाव) गुह्य, ज्ञानयोग-आत्मज्ञान गुह्यतर और भक्तियोग गुह्यतम है। ब्रह्म  लोक तक सभी लोक जो पुनरावृति से ग्रस्त हैं अशुभ हैं। जो व्यक्ति उच्च लोकों में जाकर मौज-मस्ती-भोग-आराम में संलग्न रहता आहें उसकी अधोगति निश्चित है। परन्तु जो दिव्यात्मा ब्रह्म लोक पर्यन्त भक्ति योग का अनुसरण करता है जो जन्म-मृत्यु के जंजाल से निश्चित ही मुक्ति पा जाता है।  देखने, समझने-सोचने की बात यह है की भगवान् ब्रह्मा, विष्णु और महेश-शिव भी निरन्तर योग-ध्यान-मनन-चिन्तन-आराधना में लीन रहते हैं। 
Bhagwan Krashn asked Arjun that he would narrate the most confidential (-which should not be shared with-revealed to non deserving, faithless-who do not disbelieve, ignorant, egoistic, imprudent, unwilling to listen-hear) science-the most profound secret transcendental knowledge, together with transcendental experience, which will free the devotee from the miseries of worldly existence i.e., from the clutches of life and death-reincarnations, attaining the Ultimate pleasure-bliss.
The secret which the Almighty was disclosing to Arjun is really intricate and difficult to understand for those who have no faith. The imprudent, egoist can never understand it. One who is worst sinner, too is granted asylum by the Almighty, if he repents and conducts purificatory processes described in the scriptures with dedication. The gist-nectar-elixir of Parmatmttv is meant for one who is capable-ready to accept, follow & adopt in life. There is no boundation of sex-caste-creed-more-religion-country. Karmyog is difficult-intricate, Gyanyog is more typical-difficult-complex to understand  and Bhaktiyog is extremely difficult to understand, follow, adopt and exercise. But nothing is difficult for the determined-firm devotee. Highest abode available to the devotee is Brahm Lok. But this too is considered non virtuous for those who just have fun and frolic in their minds. Still the pious-virtuous-righteous-faithful, who adopts asceticism even after reaching these abodes is sure to cross over these boundaries and reach the Ultimate abode, where there is Bliss-Ultimate pleasure. It grants freedom from repeated reincarnations. One understands that the Trinity of Bhagwan Brahma, Vishnu and Shiv too leads ascetic life and adopts prayers, meditation, Yog etc. continuously.
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्।प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥9-2॥
भगवान् श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को समझाया गया यह ज्ञान-विज्ञान-समग्र विद्याओं का राजा है, अर्थात सर्व श्रेष्ठ है। यह अति गोपनीय (-नास्तिक और अयोग्य व्यक्ति के समक्ष प्रकट न करने के लिए), पवित्र, श्रेष्ठतम है। इसका फल प्रत्यक्ष, अविनाशी, धर्ममय और प्राप्त-ग्रहण करने में बेहद सरल-आसान है। 
Image result for IMAGES OF ASCETIC BHAGWAN SHRI KRISHNAयह विज्ञान सहित ज्ञान सम्पूर्ण विद्याओं का शिरोमणि है। इसको जानने, समझने, दृढ़ निश्चय के साथ अभ्यास करने के बाद और कुछ जानने के लिए शेष नहीं बचता। भगवान् का साकार-सगुण (-मूर्ति, चित्र, लिंग, मन्दिर के सामने-प्रतीकात्मक) आदि  रूप इस ज्ञान-विज्ञान को ग्रहण करने में विशेष रूप से सहायक है। हकीकत में परमात्मा और परमात्मतत्व बेहद रहस्य पूर्ण है। इसको जानना-समझना असंभव है। जितना भी मनुष्य जान सकता है, उसके कल्याण-मोक्ष के लिए वही पर्याप्त है। यह पारस मणि के सदृश्य है, जिसके सम्पर्क में आकर लोहा भी सोना बन जाता है; क्योंकि घोरतम पापी, दुष्ट, दुरात्मा, अपराधी, दुराचारी भी इसको पाकर परम शान्ति प्राप्त करके नेक, पवित्र, भक्तिमय हो जाता है। शैतान से साधु बनना, इसका तुरन्त दिखने वाला असर-प्रमाण है। जो व्यक्ति इसको ग्रहण करके अपना रवैया-रास्ता बदल लेते हैं और समाजसेवा-धर्म परोपकार, निष्काम भक्ति का मार्ग अनुसरण करते हैं, वे भवसागर को पार करने में सफल हो जाते हैं। जो व्यक्ति इसको समझकर अपने वर्णाश्रम धर्म का सावधानी से पालन करने लगते हैं, उनका उद्धार तो निश्चित है। यह ज्ञान अविनाशी और तुरन्त-उत्तम फल प्रदायक है। इस ज्ञान का प्रत्यक्ष फल भक्ति है, जो अव्ययी है। यह ज्ञान ऐसा है जिसे करने में अतिरिक्त मेहनत नहीं करनी पड़ती, क्योंकि यह बेहद सरल है। यह परम पवित्र है, क्योंकि भगवान्  के नाम का स्मरण, रूप, लीला, गान, धाम, नाम, कीर्तन, जप, ध्यान, ज्ञान आदि सभी कुछ तुरन्त दुःख  नाशक और सुख का कर्ता है। 
This text revealed by Bhagwan Shri Krashn to Arjun is sacred, secret-confidential and requires restraint before revealing it to atheists-non deserving. Its pious-righteous-virtuous excellent and easy to grasp. It grants visible, un perishable pure rewards leading to Liberation in the God. It easy to attain, follow, practice and perpetuate. 
Image result for IMAGES OF ASCETIC BHAGWAN SHRI KRISHNAThis knowledge is SUPREME-at the apex of all knowledge. One who is able to acquire this need knowledge, not achieve any other knowledge (-anything else). The knowledge of Almighty and his prayers in front of statues, pictures, temples etc. is just symbolic, since it helps in concentration of mind and energy. It simplifies the intricate route to assimilation in God. The revealed form of the God helps one in achieving the Ultimate quite easily. In reality its impossible to know-identify the God in to-to. Still what a human gets-achieves-understands, is enough for him to cross over the vast ocean of pains-troubles-difficulties-distress-diseases etc. One can easily attain Salvation, if he adopts the path of devotion forgiving desires. This is just like the Paras Mani-stone-Midas touch which can turn iron into gold. Most dreaded criminals can easily change their paths-habits and reform them selves, just by coming under the shelter-umbrella-protection of the Almighty. One who is following his duties assigned by the scriptures too gets relinquished easily. This most sacred knowledge is imperishable. It grants immediate relief, in some cases. One need not take pains, make special efforts to do it. This is purest of pure, pious, virtuous, righteous which makes one pure, just by coming in touch with it. Mere association with the saints, enlightened can change the life of the most notorious-furious sinners. One who is remembering-reciting HIS names, undertakings pilgrimage, vising holy places, reads-hears-learns the stories pertaining to HIM, meditates-concentrates his mind in HIM, try-make efforts to know more about HIM is sure to relieve him self of chain of birth and death. 
अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥9-3॥ 
हे परन्तप ! इस धर्म की महिमा पर श्रद्धा न रखने वाले मनुष्य मुझे प्राप्त न होकर मृत्यु रूप संसार के मार्ग में लौटते रहते हैं-पुनर्जन्म लेते हैं। 
अश्रद्धावान वो है जो कि भगवान् के बताये गए मार्ग का अनुसरण नहीं करता। उसका स्वधर्म है आत्मा की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करना। परन्तु वह परधर्म अर्थात प्रकति के अधीन होकर घर-कुटुम्ब, शरीर, धन संचय, वैभव, को प्रधानता देता है। ऐसे मनुष्य अन्यानेक योनियों में कर्मों के अनुसार भ्रमण करता रहता है। 84,00,000 योनियों में उसको साँप-सीढ़ी का ऐसा खेल कहना पड़ता है जो उसे कभी भी आखिरी पड़ाव पर पहुँचने नहीं देता। वह स्वर्ग-नर्क भी जाता है।  देवता और हीन प्राणी-कृमी भी बनता है। ऐसे लोगों के सामने ज्ञान-विज्ञान की बातें ऐसी हैं जैसे अंधे के आगे रोवे अपने नैना खोवे। 
Bhagwan Shri Krashn declared that one has no faith in the text discussed by HIM can not be liberated and has to keep moving in uninterrupted incarnations. 
Atheist is one does not believe or follow the path described Bhagwan Shri Krashn HIMSELF. The human has his own Dharm-duties-path prescribed as an independent entity-the soul. a component of the Almighty. In fact the human does not care for his own duties and keep on hovering over the welfare of his family, riches, facilities, comforts, body etc. which would keep on strengthening the bonds with the perishable world resulting in repeated births & deaths. He moves to heavens as demigods and the hateful wriggling worms on earth. He frequently visit the hells for his sins. He travels through 84,00,000 species. Its like the game of snake and ladder, with the difference that one can reach 100 in the game, but in real life cycles the atheist never come out of the web. This text is not meant for the Mellechchh and the Yawan (-मल्लेच्छ-मुसलमान और यवन-ईसाई). The Vyas-one who is telling the story of demigods-deities, Almighty should refrain from such people until-unless they them selves come forward with devotion-faith, to listen & understand the gist of the scriptures, epics, Veds, Purans, Upnishads etc. One should never criticize their faith-religion as it may harm them by bouncing back.
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥9-4॥ 
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्।भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥9-5॥
यह  पूरा-समग्र संसार मेरे निराकर रूप से व्याप्त है। सम्पूर्ण प्राणी मुझ में स्थित हैं, परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ तथा वे प्राणी भी मुझ में स्थित नहीं हैं। मेरे इस ईश्वर सम्बन्धी योग-सामर्थ को देख। सम्पूर्ण प्राणियों को उत्त्पन्न करने वाला और प्राणियों का धारण, भरण-पोषण करने वाला मेरा स्वरूप उन प्राणियों में स्थित नहीं है।
मन, बुद्धि, इन्द्रियों से जिसका भान-आभास होता है, वो परमात्मा का व्यक्त रूप है और अव्यक्त रूप इनके परे मनुष्य की क्षमता से बाहर है।साकार-निराकर,सगुण-निर्गुण का भेद मनुष्य के मन का वहम् मात्र है और मानवी संवेदनाओं-बुद्धि द्वारा जनित है, अन्यथा वह अविनाशी परमात्मा तो एक और केवल एक ही है।  ये भेद मानवी सम्प्रदायों के बनाये-घड़े हुए हैं और अवास्तविक है। जीव परमात्मा का अंश होने से उसके समान अभेद (-जिसमें भेद-अंतर का अभाव है)। यहाँ समझने की बात यह है कि पानी की बूँद समुद्र में समा जाती है, समुद्र बूँद में नहीं समा सकता। समस्त प्राणी परमात्मा से ही प्रकट-उत्पन्न हुए हैं-अर्थात उसमें स्थित हैं। मगर परमात्मा प्राणी में नहीं समा सकता। प्राणी नाशवान है। अगर परमात्मा उसमें स्थित है तो प्राणी के नाश होने से परमात्मा भी नष्ट होगा, यानि परमात्मा प्राणी में नहीं है, क्योंकि वो कभी नष्ट नहीं होता। परमात्मा का अंश शरीरी-आत्मा मनुष्य-प्राणी में है जरूर, मगर पानी की एक बूँद के समान। परमात्मा की सत्ता से ही प्राणी की सत्ता है। पहले कहा गया कि सम्पूर्ण प्राणी मेरे में स्थित हैं और अब कहा कि वे मेरे में स्थित नहीं हैं। प्राणी निर्विकार-अविनाशी नहीं है, जबकि प्रभु हैं। परमात्मा-प्रभु की उत्पत्ति विनाश नहीं होता, जबकि प्राणी-प्रकृति का होता है। परमात्मा है तो संसार है। अर्थात परमात्मा के रहने से संसार है, संसार से परमात्मा नहीं। संसार की स्वतंत्र सत्ता नहीं है। परमात्मा इस जगत से निर्लिप्त हैं, अर्थात उनमें संसार होते हुए भी नहीं है। परमात्मा एक होते हुए भी अनेक रूपों में दृष्टिगोचर होता है।  यह मनुष्य को जान लेना चाहिए। परमात्मा से सभी उत्त्पन्न हुए हैं, वही कर्ता, पालनहार और वह प्राणियों में स्थित, आश्रित भी नहीं है।  वह अहंता, ममता से रहित है। उत्पत्ति, संहार, स्थिति परमात्मा की लीला मात्र हैं।  
Entire universe is pervaded by the Almighty and is just an expansion-extension  of HIM. All beings are present in HIM but reciprocal-vice a versa-opposite-inverse does not exist. (One is not capable of holding HIM.). Again the beings-creatures-organisms also do not exist in HIM (-in their physical-material forms). View-see-watch-observe HIS capability of holding the entire universe. HIS figure-configuration which created, nurtured them, supported them, does not exist in them. Its purely a one way traffic.
One might know only that exposure-configuration of the God through the brain, intelligence and his organs, which is revealed-exposed-adopted by HIM, from time to time, which is again not the same. Its different in different incarnations. The un revealed configuration is beyond the capability of demigods-deities & the humans. The variation-difference of formless with form, with characteristics or without characteristics is man made, depending upon the faith he follows. These distinction are man made and un real-virtual-false. The organism is like the Almighty in the sense that he is a component of HIM, as a soul. A drop of water will be held by the ocean but the drop of water is incapable of holding the ocean. A dust particle become earth on falling over it, but it can not hold the earth. Similarly the soul can rest in the Almighty but its incompetent to hold the God. The organism, nature is perishable. If the God becomes a component of it HE too becomes perishable, which is not so. The God remains but nature: earth, solar systems, galaxies keep on perishing. The component of the God: soul is present in the creature but just like the drop of water in ocean. The organism exists due to the Almighty, who is for ever. Two things are said simultaneously: the organism is present in the God and now it is said that organism is not present in HIM. HE being the creator the organism belongs to HIM, but he is so large, mighty, capable that the organism can not hold HIM. The organism is sure to perish but the Almighty will remain for ever. The God is neither created nor destroyed while the organism is created and destroyed as well, simultaneously. The world-universe are due to the God and the God is not due to the worlds or the universes-galaxies. The Galaxies-universe-solar systems-earth-planets are not independent. If the God is there they might be there. They do not exist without the God. The God is fully detached with the world. The existence of the matter is due to HIM. HE do not exist due to the presence of matter. The God is one yet, HE is capable of appearing in various shapes-formations-incarnations at the same moment-time, at different places. The humans should realize this. Every one is born-evolved out of HIM. He does the job of creation-nurture-maintenance without distinction-favor-affection. He is neutral. He does not discriminate between HIS creations. HE is free from affections-allurements. Evolution, destruction-devastation or presence-showing off as incarnations are HIS acts only.
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥9-6॥ 
जैसे सब जगह विचरने वाली महान वायु नित्य ही आकाश में स्थित रहती है, ऐसे ही सभी प्राणी मुझ में ही स्थित रहते हैं। 
वायु आकाश का अंग है और हर वक्त विभिन्न गतियों से चलती रहती है। वायु आकाश से अलग हो ही नहीं सकती। इसी प्रकार चौदह भुवनों में घूमने वाले सभी प्राणी परमात्मा में स्थित हैं। वे परमात्मा को छोड़कर कहीं नहीं जा सकते। वे भले ही स्वयं को प्रकृति या कार्य का अंग मान लें, रहेंगे परमात्मा के ही। प्रकृति भी तो परमात्मा से ही प्रकट हुई है। कार्य तभी है, जब कारण है। प्राणी संसार में तो भ्रमण करता ही है मृत्यु के पश्चात भी उसकी आत्मा कर्मों के अनुरूप 14 लोकों में प्रत्यागमन करती रहती है अर्थात आत्मा के गमन की एक सीमा है। फिर भी यह माना जा सकता है कि आत्मा का गमन इस ब्रह्माण्ड से अन्यंत्र भी संभव है, क्योंकि अन्य ब्रह्माण्ड भी तो परमात्मा के अंतर्गत ही तो हैं। सृष्टि हो या प्रलय प्राणी तो सदैव-सर्वदा परमात्मा का, उसके आधीन रहेगा ही। 
One should consider every thing to be present in the Almighty similar to the manner in which the air moves-roams in the sky as its content eternally.
Air is a component of the sky and it keeps on flowing-moving from one place to another with different speeds, air currents, forming various layers in the sky. At one point its hot and at some other point-moment its cold. Still the total quantum remains the same. This is eternal. The manner air remains with the sky, all organism-creatures-beings remain with the Almighty, being his own replica, though minutest, like an atom (-minutest particle of matter which can remain freely in nature). Universe is composed of 14 abodes spreaded over different locations relative to the earth at their center as a component of solar system; 7 abodes over it and 7 abodes below it. Then there are many-many universes spreaded galaxies, super galaxies. It indicate to a specific area in which the soul can move or can be sent. In fact it may be assigned any other universe-galaxy depending upon its modified behavior, till it is finally ready-prepared to merge with the God for ever, ultimately, not to be separated again.
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥9-7॥
हे कुन्तीनन्दन ! कल्पों का क्षय होने पर-महा प्रलय के समय, सभी प्राणी मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं और कल्पों के आदि में महासर्ग के समय, मैं पुनः उनकी रचना करता हूँ। 
समस्त प्राणी-जीवधारी परमात्मा के अंग ही हैं, परन्तु उनके द्वारा प्रकृति के साथ सम्बन्ध स्थापित कर लिए जाने के कारण वे बार-बार मरते और जन्म लेते हैं। ब्रह्मा जी की 2 परार्ध की-100 दिव्य वर्षों के आयु पूरी होने पर महाप्रलय होता है वे सभी अपने कर्म-गुणों-प्रकृति-प्रवृतियों के साथ परमात्मा में ही लीन-विलय हो जाते हैं। महासर्ग-सृष्टि की पुनः रचना होने पर वे पुनः अपने इन कर्म-गुणों-प्रकृति-प्रवृतियों के साथ जन्म लेते हैं। प्राणियों के शेष कर्मफल उन्हें पुनर्जन्म देते हैं। सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति, विलय-प्रलय तीनों ही समग्र परमात्मा से होते हैं। संसार की अपनी कोई स्थिति है ही नहीं। यह तो मात्र प्रवाह है जो निरन्तर-लगातार चलता ही रहता है। 
O-Hey Arjun! All living beings-organism-creatures, merge into My primary-basic configuration at the end of the cycle of Kalps-Brahma's day (-just over 311 trillion solar years) and I create them again at the beginning of the next cycle. [Please consult the chapter I on Hinduism of santoshkipathshala.blogspot.com]
All living beings are the components-organs of the Almighty, who identifies themselves with the nature instead of recognizing their true identity, leading to unbroken cycle of births and deaths. Life of Brahma Ji extends up to 2 Parardh i.e., 100 divine years. As soon as this period is over vast-ultimate devastation takes place and entire universe merges with the Almighty. The creatures possess their gained-earned-accumulated impact of deeds, characteristics, unfulfilled desires etc. when they merge with the Ultimate to be born again at the time of evolution. They all reappear to undergo the impact of their balance of deeds: fair or foul, sins or virtues, worries or pleasure. Creation, stabilization-perpetuation and destruction-devastation occur continuously. Those who attained Salvation will not take birth again.
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ॥9-8॥ 
प्रकृति के वश में होने से परतंत्र हुए इस सम्पूर्ण प्राणी समुदाय की कल्पों के आदि-प्रारम्भ में मैं अपनी प्रकृति को वश में करके बार-बार रचना करता हूँ। 
प्राणी मर कर अपने सूक्ष्म शरीर के पश्चात कारण शरीर में जाता है, जिसे व्यष्टि (-micro) कहा जाता है। व्यष्टि से समष्टि (-macro) बनती है। महासर्ग का समय आने पर जीवों को उनके कर्मफलों के अनुरूप पुनः उत्त्पन्न करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस प्रक्रिया के अनुरूप सात्विक, राजस और तामस गुण  उत्त्पन्न होते हैं और स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल लोकों की रचना होती है और सृष्टि के अनुरूप जीव अलग-अलग योनियों में अपने गुणों और संस्कारों के साथ अपने-अपने निर्धारित लोक को प्राप्त कर लेता है। प्रकृति परमात्मा की ही एक अनिवर्चनीय, अलौकिक, विलक्षण शक्ति है। इस प्रकृति पर भगवान् का आधिपत्य है जबकि मनुष्य कर्मों और उनके फलों को अपना मानकर उनका गुलाम-सेवक बन जाता है। मनुष्य की इनमें लिप्तता है जबकि परमात्मा की इनमें लिप्तता नहीं है। उत्तपत्ति केवल उन्हीं जीवों की होती है जो मैं, मेरा के कारण प्रकृति के आधीन-वश में हो जाते हैं। प्रकृति परमात्मा का अभिन्न अंग है परन्तु उसके कार्य अलग हैं। जो प्रकृति से जुड़ा वो परतंत्र है और जन्म लेता ही रहेगा। पराप्रकृति अर्थात स्वयं सर्वथा स्वतंत्र है। 
The Almighty create the entire multitude of living beings-organisms, who are under the control of nature, again and again by controlling HIS nature with its assistance. Nature is inseparable from the God but under his firm control.
The creature dies to attain micro body leading to yet another-further body, which is reason-resultant oriented, putting the soul into next body-incarnation. At the commencement of ultimate devastation all reason-resultant bodies-souls are merged with the macro-the ultimate to get yet another birth again, at the commencement of next evolution. At the occasion of evolution the organisms are put into different-various modes-species according to their previous accumulated deeds, which are Satvik, Rajsik or Tamsik. The organism may acquire a place in heaven, earth or the Patal-Neanderthal world. The Almighty has absolute control over the nature, while the organism becomes its slave due to his ego-I, My, Mine, Me, attachments, desires, allurements etc. and is subjected to rebirth due to his previous nature. He is under the control of his destiny, decided by the creator at the time of his birth. His birth as human being grants him an opportunity to skip-escape and attain permanent settlement in the God's abode. One who utilize this opportunity is Liberated.
न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥9-9॥ 
हे धनञ्जय ! उन सृष्टि-रचना आदि कर्मों में अनासक्त और उदासीन और की तरह रहते हुए, मुझे वे कर्म नहीं बाँधते। 
परमात्मा की सृष्टि रचना और नाश के प्रति उदासीनता है। वे प्राणियों-संसार के उत्तपन्न अथवा नष्ट होने से प्रसन्न या दुखी नहीं होते क्योंकि उनकी दृष्टि में संसार की कोई स्वतंत्र सत्ता है ही नहीं। परमात्मा के प्राणियों के कर्मों से कोई सम्बन्ध लेना-देना नहीं है। उनको फलेच्छा भी नहीं है। 
The Almighty is indifferent-neutral and unattached to the act of creation-evolution and these acts do not bind HIM.
The indifference of the Almighty is with the deeds of the organism-living being, who perform with the desire of reward-yield of their effort-performance. Creation & devastation of the living beings are routine-cyclic processes. The God does not bind HIMSELF with any of the deeds-acts taking place during this act.
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्। हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥9-10॥ 
प्रकृति मेरी अध्यक्षता में चराचर सहित सम्पूर्ण जगत की रचना करती है। हे कुन्ती नन्दन ! इसी हेतु-कारण जगत का विविध प्रकार से परिवर्तन होता है। 
आदि माता भगवती-प्रकृति, भगवान् के वाम अंग से उत्त्पन्न हुई हैं और उनके अंतर्गत रहकर ही समस्त चराचर की रचना करती हैं। माँ भगवती को भगवान् की शक्ति और माया आदि नामों से विभूषित किया गया है। माँ राधा, माँ सरस्वती, माँ लक्ष्मी, माँ गंगा, माता पार्वती आदि-आदि उन्हीं के विविध रूप हैं। प्राणियों को उत्त्पन्न करने का कार्य प्रकृति का नहीं है, क्योंकि वह जड़ है-भौतिक है। पदार्थ का बनना-बिगड़ना, नवीन रूप में आना, आकाश गंगाएँ, तारे, नक्षत्र, ग्रह, सौर मण्डल, चन्द्र आदि उन्हीं के रूप हैं। मानव-प्राणी, विविध प्रकार के जीवों के शरीर उन्हीं से बने हैं। परन्तु जीव जीवात्मा-परमात्मा के अंश के बगैर निर्जीव-मृत है। निर्जीव में जीवात्मा की उपस्थिति में शक्ति-स्फूर्ति-सामर्थ विधाता के द्ववारा उसके कर्मों के अनुरूप ही उत्त्पन्न होती है। प्रकृति के दोनों स्वरूप परा और अपरा, भगवान् के शक्ति के आधीन रहकर ही कार्य करते हैं। 
The nature creates the entire universe under my patronage-supervision & guidance and undergoes infinite number of changes-permutations & combinations, hey Arjun!
Maa Bhagwati evolved from the left half of the Almighty. She is the main benefactor of the God's creations and carries out the duty of the formation of material-physical world like galaxies, solar systems, planets, stars, constellations, nebulae, moons etc. All these bodies are non-living lifeless, unless until, soul-a fragment of the Almighty occupies them as divine or normal entity like humans. The duty of creation is not imparted to the nature. Its the Vidhata-Brahma Ji, who carries out the function of evolution. Maa Bhagwati has various names, incarnations, forms like Maa Radha Ji, Mata Laxmi, Mata Saraswati, Maa Parwati, Maa Ganga etc. The organism in material state is produced by the nature and maintained, when it occupies a soul. The energy, strength, power to do work, move is granted by the Almighty himself, as per deeds of the organism, according to his destiny. The drivers seat is occupied by the soul. Para & Apara both forms of nature are organs, complementary of the God. New forms, bodies are given by the nature to the soul, before his birth and are always perishable.
अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥9-11॥
मूर्ख लोग, मेरे सम्पूर्ण प्रणियों के महान ईश्वर रूप श्रेष्ठ भाव को न जानते हुए, मुझे मनुष्य शरीर के आश्रित मानकर अर्थात साधारण मनुष्य मानकर, मेरी अवज्ञा (-तिरस्कार) करते हैं। 
जिसने सबको पैदा किया है, पालन करता है, सबका मालिक है, उसे पहचानना सामान्य व्यक्ति के लिये बेहद कठिन है। मूर्खों से तो यह अपेक्षा कतई भी नहीं करनी चाहिए। परमात्मा को स्वरूप से जानना कठिन ही नहीं अपितु असंभव है। भगवान् शिव, जिनसे समस्त ज्ञान का प्रादुर्भाव होता है, वे भी कहते हैं कि मैं उन्हें कुछ-कुछ ही जान पाता हूँ। मनुष्य साधारणतया उसी व्यक्ति को भगवान् मान लेता है, जो विलक्षण और परम शक्तिशाली है। भगवान् के अवतारों के विषय में भी मनुष्य तभी जान सकता है, जब उसे बताया जाये, उसे निश्चय हो जाये कि हाँ ये स्वयं गौलोक वासी भगवान् ही हैं, अन्यथा वो उनकी अवज्ञा करेगा ही। वैसे तो परमात्मा की माया से सारा विश्व आच्छादित-ढँका हुआ है। अवसर आया तो उन्होंने अर्जुन को माध्यम बनाकर स्वयं को व्यक्त ही नहीं किया अपितु लोक कल्याण के लिए मार्ग दर्शन भी किया। ऐसा नहीं है कि लोग उन्हें पहचान ही नहीं पाये। भीष्म, व्यास जी, लोमेश, गर्गाचार्य आदि अनेक ऐसे व्यक्ति थे जो उन्हें पहचान और अर्द्ध अर्पित करके क्रत-क्रत, धन्य हो गए। भगवान् श्री कृष्ण पूर्णावतार थे और मनुष्य शरीर में भी अपनी समस्त शक्तियों से लैस थे। 
The ignorant (-along with duffers, idiots, morons) are unable to recognize-identify the Almighty and do not care-reject-discard-despise HIM, when he takes incarnation as a human being, without knowing-understanding HIS transcendental nature.
Its really impossible for a common man to recognize-identify the Almighty in the grab of a common man. He has created all living and non living. Bhagwan Shiv from whom all knowledge evolve says he too can not identify the Almighty beyond a certain limit. The masses accept any one as God who possesses majestic-super natural powers. As one with form, he is Krashn with HIS abode in Gau Lok. The masses discard even the God if he does not reveal HIMSELF. The almighty keeps his enchantment control the entire living world. People like Ved Vyas, Bhishm Pitamah, Lomesh Ji, Markandeys Ji, Gargachary were aware of HIS presence over the earth. many more aware of identity came to pay obeisances to HIM. The Almighty revealed to bless the living beings and guide them the virtuous path. As a human being too he was a complete incarnation with all HIS might.
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥9-12॥
जो व्यक्ति आसुरी, राक्षसी और मोहिनी प्रकृति का ही आश्रय लेते हैं, ऐसे अविवेकी मनुष्यों की सब आशाएँ व्यर्थ होती हैं, सब शुभ कर्म व्यर्थ होते हैं और सब ज्ञान व्यर्थ होते हैं अर्थात उनकी आशाएँ, कर्म और ज्ञान-समझ, सत् फल देने वाले नहीं होते। 
आसुरी-दुष्ट प्रवृति वाले व्यक्ति स्वर्ग-सुख की प्राप्ति, कामनाओं की पूर्ति के हेतु उद्यम करते हैं। वे भगवान् से विमुख होते हैं। उनका सत् कर्मों से कोई भी लगाव नहीं होता। वे यदि ऐसा सोचें कि उन्हें परमात्मा की प्राप्ति हो जाएगी तो, यह मृगतृष्णा-छलावा-स्वयं को धोका देना ही है। उनके द्वारा किये गए यज्ञ, दान, सकाम कर्म उन्हें भले ही उच्च लोकों तक ले जाएँ, मगर वहाँ से उन्हें नीचे गिरना ही पड़ता है। वे जन्म-मरण के शृंखला से बँधे  ही रहते हैं। केवल शास्त्रोक्त सत्-सात्विक कर्म ही आत्मा को परमात्मा में लीन करते हैं। निष्काम-सत् कर्म जो प्रभु को अर्पित कर दिया गया हो, वो निष्फल नहीं होता। विभिन्न प्रकार की विद्याएँ, ज्ञान अविष्कार  ऐसे लोगों को परमात्म प्राप्ति करवा ही नहीं सकते। वैसे देखा जाये तो ये लोग खुद ही मोक्ष के इच्छुक नहीं होते। खाना-पीना, मौज-मस्ती, यही उनका ध्येय-मंतव्य होता है, जो उन्हें पतन-अधोगति प्रदान करते हैं। उन्हें इस बात का भी ज्ञान नहीं है कि मोक्ष क्या है, किसलिए है, इसका प्रयोजन क्या है, किस प्रकार मिलता है ? उन्हें सार-निस्सार, मुक्ति-बन्धन से कोई सरोकार नहीं है। अपने स्वार्थ की सिद्धि के लिए ऐसे लोग झूँठ, कपट, बेईमानी, कुकर्म-दुष्कर्म, हत्या या अन्य कुछ भी करने को तत्पर रहते हैं। उनका स्वभाव आसुरी, राक्षसी, मोहिनी प्रवृति-प्रकति वाला है। उनको बारम्बार नर्कों की यातना भोगने के बाद कृमि-कीट-पतंगे, पशु-पक्षी, सरीसृप आदि योनियों से गुजरना पड़ता है और जब कभी भी मनुष्य योनि को प्राप्त होते है, वे पुनः उन्हीं निकृष्ट कर्मों में लिप्त हो जाते हैं।
 Those imprudent people, who have demonic tendencies-nature are not successful in their endeavors pertaining to virtuous deeds.Their deeds do not result in auspicious outcomes.
Those with demonic nature, always make efforts for attaining heaven, comforts, luxuries. They perform Yagy, Hawan, asceticism, donations-charity only for achieving the heavens-the higher abodes. They may get them, but will revert back to earth, to undergo the rigorous process of birth and death. One with malicious-criminal nature deceives himself by involving him self in charity, helping others to show off and make the people talk about their their religious nature. The ill gotten money will yield hell only in return and nothing else. The pious, virtuous, righteous, prescribed deeds only leads one to the fold of the Almighty. In fact people with cruel-wicked nature themselves are not interested in attaining Salvation, since they they do not understand bliss-extreme pleasure, Liberation, Assimilation in the God. The result-outcome of their sins-wickedness-cruelty is hell. Having relieved from there, they get birth as insects, worms, birds, animals, reptiles, trees and plants etc. Still they get opportunity to improve them selves by having birth as humans. But their animal nature prevails. They indulge in such activities again which sent them to the place which is fit for them i.e., the hell.
महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥9-13॥ 
परन्तु हे प्रथा नन्दन ! दैवी प्रकृति के आश्रित अनन्य मन वाले महात्मा लोग मुझे सम्पूर्ण प्राणियों का आदि और अविनाशी समझकर मेरा भजन करते हैं। 
आसुरी, राक्षसी और मोहिनी स्वभाव वालों के विपरीत महात्मा लोग परमात्मा का भजन करते हैं। उनमें सत्, सदाचार होने के कारण वे भगवत्स्वरूप हैं। भगवत्स्वरूप और स्वभाव को ही यहाँ उनकी दैवी प्रकृति कहा गया है। दैवी प्रकृति भौतिक प्रकृति से भिन्न है। दैवी सम्पत्ति के समस्त गुणों पर मनुष्य का पूरा अधिकार है और वो इनका आश्रय लेकर परमात्मा की शरण ग्रहण कर सकता है। दैविक गुण मनुष्य के द्वारा उपार्जित नहीं किये जाते अपितु भगवान् के द्वारा ही प्रदान किये गए हैं। इनके द्वारा मनुष्य में नम्रता, सरलता, निराभिमानता आ जाती है। भगवान् अविनाशी, अनन्त, निर्विकार सर्वोपरि है और आदि-अन्त में भी रहता है। जिसने यह जान लिया और वो दृढ़ता से इसमें लग गया उसका ध्यान लौकिक अथवा पारलौकिक भोगों में नहीं लगता। वह भगवत भजन-कीर्तन-उपासना-ध्यान में ही संलग्न रहता है। भगवान् मेरे हैं और मैं उनका हूँ; इस धारणा के साथ अन्यन्य चित्त जो साधना करता है, वह बन्धन मुक्त हो जाता है। उसके द्वारा अपने आपको भगवान् के श्री चरणों में अर्पित करके अनन्य मन से जो कुछ भी शारीरिक, व्यावहारिक, लौकिक, वैदिक, पारमार्थिक कार्य किया जाता है वह सब प्रभु की प्रसन्नता के लिए ही होता है।
But, hey Arjun! the great souls-ascetics-devotees-saints, dependent over the nature, who possess divine qualities worship-pray-recite MY prayers-Bhajans-names fondly, considering ME as immutable, creator and origin of all living beings-life. 
The behavior of great souls-saints-ascetics, who remember-pray the Almighty is opposite to the demonic tendencies-nature. They are like the God due to the presence of virtuousness-righteousness-piousness-the Sat-holiness in them. Their nature makes them divine. Here the divine and material nature-tendencies are different. Their physical body is possessed with divine qualities. Divine qualities-characteristics are not earned by the humans, but they are granted by the Almighty and are already present in the human being a component of the God. These qualities grant politeness, simplicity, lack of ego-proud, to the holy persons. The Almighty is since ever, for ever uncontaminated-pure and Supreme Lord. One who has learnt this and follows it with firmness-determination is not deviated by the material or divine comforts. He remains devoted-dedicated to the God and believes that he is for the God and the God too is for him. He is set free from all material bonds-ties-connections leading to Salvation. Whatever is done by him Vaedic, physical, practical-behavioral, earthly or divine for the benefit-service of others, by devoting himself to the Almighty is meant for pleasing the God.
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥9-14॥ 
नित्य-निरन्तर मुझ में लगे हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर लगनपूर्वक साधना में लगे हुए और प्रेम पूर्वक कीर्तन करते हुए तथा मुझे नमस्कार करते हुए मेरी उपासना करते हैं। 
जब मनुष्य यह जान लेता है कि मैं परमात्मा का हूँ और वो मेरे हैं तो, उसका स्वाभाविक रूप से उनसे लगाव हो जाता है। जिस प्रकार कोई अपने प्रिय-बिछड़े हुए को याद करता है, उसी प्रकार मनुष्य भगवान् को याद करने लगता है। हर वक्त भोग-विलास, संग्रह सम्भव नहीं है। प्रेमी-भक्त परमात्मा के भजन-कीर्तन में लग जाता है तो उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं रहती। यह सब कुछ अपने गृहस्थ जीवन का पालन करते हुए भी संभव है। सोते-जागते या जब भी समय मिले, मनुष्य यदि परमात्मा को स्मरण करता है वो अपने सच्चे स्वरूप को ही याद करता है। अपने धर्म-कर्तव्य का पालन दृढ़ता पूर्वक-लगन से करने, परमात्मा के स्मरण करने से मनुष्य की वृत्तियाँ उसी की ओर केंद्रित रहती हैं और उसका मार्ग सुगम हो जाता है। नहाते-धोते, चलते-फिरते, गाड़ी चलाते, खाना बनाते-खाते या कुछ अन्य क्रियाएँ करते हुए भी भगवान् के गीत-भजन गाने में कोई परेशानी-कठिनाई नहीं होती। ऐसा करना बेहद सरल है और बगैर परिश्रम के स्वतः हो जाता है। जिसने इस मार्ग का अनुसरण किया, उसका उद्धार हो गया। मुक्ति-भक्ति-आत्म शुद्धि-मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो गया। 
One with firm resolve worship the Almighty with strong will-firm determination & with ever-steadfast devotion keep on singing HIS glories-songs-prayers, striving to attain HIM and prostrating before HIM with devotion. 
When one learns that he belongs to the Almighty and HE too belongs to him, his natural inclination takes place in HIM, like the love and affection for parents, children, friends, relatives etc. Its not possible for one to be busy with sensuality, sex-pleasure-comforts, earning, compiling wealth, at all times. He needs break as well. The manner in which one remembers those who have separated from him or shifted else where, he start longing for the God as well. This love for the God strengthens in due course of time and one makes firm resolve-determination and consistency appears in his practice. He becomes habitual of remembering the God when ever & where ever he gets time. Activities like bathing, walking, moving, driving, eating do not need extra efforts to sing songs-prayers pertaining to the God. A house hold, one with a family can easily do this. One has to do his duties religiously with honesty and the way to the Almighty is clear. He becomes free, devoted, pure and the Salvation is not at all a difficult task for him.
ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥9-15॥ 
दूसरे-अन्य साधक ज्ञान यज्ञ के द्वारा एकीभाव से-अभेद भाव से, मेरा पूजन करते हुए मेरी उपासना करते हैं और उनके आलावा भी अन्यानेक साधक अपने को मुझ से पृथक मानकर, चारों तरफ मुख वाले मेरे विराटरूप अर्थात संसार को मेरा विराटरूप मानकर सेव्य-सेवक भाव से मेरी अनेक प्रकार से उपासना करते हैं।
सांसारिक मनुष्यों की पूजन विधियाँ देश, काल, समाज, धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाज़ के अनुरूप अलग-अलग होती हैं। नास्तिकों को छोड़कर अन्य सभी, उन्हीं की पूजा अपनी समझ-बुद्धि के अनुरूप करते हैं। उनका ज्ञान, रूचि, श्रद्धा, योग्यता, विश्वास, मानसिक स्तर अलग-अलग हो सकता है। ज्ञानयोगी बुद्धि-विवेक का प्रयोग करके और असत् का त्याग करके सर्वत्र व्यापक परमात्मतत्व को और अपने अपने वास्तविक स्वरूप को एक मानते हुए उसके निर्गुण-निराकर स्वरूप की पूजा-आराधना-सेवा करते हैं। परमात्मा की तरफ नित्य-निरन्तर दृष्टि रखना ही एकीभाव से उपासना है। वे अपने अन्दर उपस्थित परमात्म तत्व का आदर करते हैं और यही पूजा है। कर्मयोगी स्वयं को स्वयं को भगवान् का सेवक-दास-अभिन्न अंग, समझकर और इस संसार को प्रभु का विराटरूप मानकर, अपने शरीर, इन्द्रियों, मन, बुद्धि आदि को प्राणियों की अथक भाव से सेवा-में लगा देते हैं । सबका भला कैसे हो, उनका दुःख दूर कैसे हो, सबको सुख कैसे मिले; यही उनका उद्देश्य रहता है। वे अपने तन, मन और धन से जनता जनार्दन की सेवा में लगे रहते  हैं। जिससे उन्हें भगवत्कृपा की उपलब्धि हो जाती है। 
Other than these, many more devotees pray HIM through enlightenment-acquisition of knowledge-reading, understanding Veds, Purans, scriptures, history pertaining to the Almighty, without considering them selves to be different from HIM. In addition to them there are the devotees who pray the God by considering HIM present in all directions-facing the 4 directions i.e., HIS wide exposure-Virat Roop (-finding HIM present in each & every particle, place) like a servant-slave. 
Different people in different countries, places follow-adopt, different modes of prayers. It depends upon the society, period and prevailing practices as well. The atheist is not covered  under this description. Almost every one resort to one or the other mode of worship of the Almighty. It depends upon their intelligence-prudence, understanding, interest, faith, religiosity and detachment from the sin-wrong doing. They consider them selves to be one of the forms of the God. The enlightened-Sankhy Yogi-Gyan Yogi resort to reading, writing, listening to the characters of the God, history pertaining to HIM. Veds, scriptures, Purans too guide him and pave his way, shape his future destiny. They pray to the God, who is formless-without characteristics. Looking to the Almighty while doing any thing-kind of work, is prayer with the concept of oneness with HIM. They respect the God present in their inner self, which is also a form of worship. The Karm Yogi considers the God to be present in each and every particle, in all directions and at all places, alike. They worship the wide exposure of the Almighty and resort to the service of the mankind. Helping the poor, needy, downtrodden is their sole motto in life. They are eager to help and remove the worries-sorrow-pains of the needy. Their own self, wealth, physique are meant for social welfare. This entitles them for the mercy & love of the God.
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् ॥9-16॥
पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥9-17॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥9-18॥
क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषध मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं हूँ। जानने योग्य पवित्र ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। इस सम्पूर्ण जगत का पिता, धाता, माता, पितामह, गति, भर्ता, प्रभु, साक्षी, निवास, आश्रय, सुहृद्, उत्तपत्ति, प्रलय, स्थान, निधान-भण्डार तथा अविनाशी बीज भी मैं ही हूँ। 
मनुष्य यह दृढ़ता से मान ले कि कार्य-कारण रूप से स्थूल-सूक्ष्म रूप से जो कुछ भी देखने, सुनने, समझने और मानने में आता है, वह सब केवल भगवान् ही है। वैदिक रीति से किया गया विधि-विधान कर्म, क्रतु कहलाता है और स्वयं परमेश्वर हैं। स्मार्त-पौराणिक रीति से किया गया कर्म यज्ञ भी वही हैं। पित्तरों के लिए अन्न अर्पण किया गया स्वधा भी वे ही हैं।  जिन मन्त्रों से क्रतु, यज्ञ और स्वधा किये जाते हैं, वो मन्त्र भी स्वयं भगवान् नारायण ही हैं। जिस मन्त्र से ये तीनों कर्म सम्पन्न किये गए, वे भी भगवान् के स्वरूप हैं। इन तीनों कार्यों के हेतु शाकल्य-वनस्पतियाँ, जड़ी-बूटियाँ, तिल, जौ, छुहारा, आदि औषध भी स्वयं भगवान् नारायण हैं। अग्नि में होम किये गए घी, हवन करने की क्रिया और स्वयं अग्नि भी परमात्मा ही हैं।
वेदों की विधि को  ठीक-ठीक जानना वेध कहलाता है। कामना पूर्ती अथवा निवृति के लिए किये गए वैदिक कर्म, शास्त्रीय क्रतु आदि अनुष्ठान, विधि विधान सांगोपांग होंना अनिवार्य है। यह क्रिया वेध है और ईश्वर का स्वरूप ही है। यज्ञ, दान, तप जो निष्काम मनुष्य को पवित्र करते हैं, वह पवित्रता भगवत्स्वरूप है। क्रतु, यज्ञ आदि के अनुष्ठान के प्रारम्भ में जो ॐ का उच्चारण किया जाता है, उससे ही ऋचाएँ अभीष्ट फल देती हैं।  वैदिकों के लिए प्रणव-ॐ, का उच्चारण प्रमुख है। अतः प्रणव भी भगवान् का एक रूप है। क्रतु, यज्ञ आदि विधि-विधान को बताने वाले ग्रन्थ ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हैं।  इनमें नियताक्षर वाले मन्त्रों की ऋचाएँ हैं, जिनको ऋग्वेद कहते हैं। जिसमें स्वर सहित गाने वाले मन्त्र हैं, वे सामवेद और अनियताक्षर वाले मन्त्र यजुर्वेद हैं। ये सभी वेद भगवत्स्वरूप हैं।
क्योंकि जड़-चेतन, स्थावर-जङ्गम आदि संसार, परमात्मा से ही उत्त्पन्न होते हैं और उनकी रक्षा-पालन पोषण भी वही करते हैं; अतः  वे पिता हैं। समस्त विधानों को बनाने वाले वो ही हैं; उसको धारण करने वाले भी वो ही हैं अतः धाता-विधाता भी वो स्वयं ही हैं। प्राणी को उसके कर्मों के अनुरूप विभिन्न योनियों में भेजने वाले और उन योनियों के अनुरूप शरीरों में पैदा करने वाले भी वे स्वयं हैं, अतः वो माता भी हैं। ब्रह्मा जी की उत्त्पत्ति भी उनसे हुई है, इसलिए वे ब्रह्मा जी के पिता और प्रजा के पितामह हैं। प्राणियों का गतिस्वरूप, भर्ता मालिक प्रभु भी स्वयं परमात्मा ही है। सभी घटनाओं को जानने वाले होने से वे सबके साक्षी भी हैं। परमात्मा का अंश होने से समस्त सृष्टि के प्राणी नित्य-निरन्तर उसमें स्थित हैं, अतः वो निवास भी हैं और क्योंकि वे प्राणी उसकी शरण में हैं, अतः वो शरण या श्रणावत्सल-शरणावत्सल हैं। सम्पूर्ण प्राणी समुदाय और संसार उन्हीें में विलीन होता है, इसलिए वो प्रभव और प्रलय भी हैं; अर्थात निमित्त-कारण और उपादनकारण भी हैं। महाप्रलय होने पर प्रकृति सहित सारा संसार उनमें ही निवास करता है, इसलिए वे ही संसार के स्थान हैं। संसार चाहे सर्ग-अवस्था में हो, चाहे प्रलय अवस्था में, प्रकृति, संसार, जीव तथा जो कुछ देखने-सुनने मे आता है, वो सब कुछ उनसे ही होता है। अतः वे ही निधान (-रखने या स्थापित करने की क्रिया या भाव, स्थापन, सुरक्षित रखना, वह पात्र या स्थान जिसमें कुछ स्थापित या स्थित हो, आधार, आश्रय, भंडार, निधि) परमात्मा में बीज की उत्तपत्ति और व्यय-नष्ट होने का गुण न होने के कारण वो अव्यय बीज हैं। अतः भगवान् सनातन बीज भी हैं। 
The Almighty HIMSELF the doer-performer, ritual, sacrifice, offering, Shlok-Mantr-poetic verse or normal text-prose, herb, Ghee-clarified butter, the fire, and the oblation (-यज्ञ, बलि, आहुति, holocaust, immolation, नैवेद्य, हव्य, बलिदान, offering, यज्ञ, sacrifice, क़ुरबानी).  
HE supports the universe, HE is the father, the mother and the grandfather; the object of knowledge, the sacred syllable OM-Pranav and the Veds, the goal, the Lord-master, the witness, the abode, the refuge-shelter, the friend, the origin, the dissolution, the foundation, the substratum (-बुनियाद, foundation, underlay, basis, substructure, ground, basis, base, foundation, footing, backbone, नीचे का तल-आधार, आश्रय, shelter, resort, refuge, concealment, asylum, अध:स्तर, आधार, नींव, basis and the immutable seed.
One should decide-determine that the reason, benefactor,  micro-macro, minutest to largest, every thing which is heard, understood, said, believed is all God-HIS form-incarnation. All the procedure, methods, systems described in Veds are the versions-forms of the God. The food grain-offerings, donations etc. made for the sake of the ancestors are for the God & by the God. The rhyme-verse used-sung to perform Yagy, the Yagy and the offering in the form of wood, various ingredients of the sacrificial fire are the various forms of God. The verse-Shlok itself a form of the God, along with the prose. Various herbs, food articles, the Ghee-clarified butter, Til-oil seed, too are the forms of the Almighty called Narayan.
Vedh is a term to know-understand the Veds properly in their true form. To get the desire fruit-result of the ritualistic deeds its essential to know-understand the proper procedure-methods-systems. The procedure-practice is Vedh and a form of the God. Yagy-sacrifices in holy fire, donations-charity thereafter and the ascetic practices, which are for the undesired results meant for the social benefit-welfare are meant to purify the doer and are the concepts-images of the God. Om is the root word used as a prefix before uttering-singing the verses described in the Veds, which leads to desired outcome of the verses-Shloks-Richas. For the utterances-speaking singing, the Ved Mantr OM is the main initial syllable. Therefore, OM is a form of the God. Rig Ved, Sam Ved and the Yajur Ved  are the holy books describing the basis concept, texts, procedures and so they are the form of God. The Richas, Mantr, Shloks describing the text-prose, having fixed number of syllables form the Rig Ved. The Veds Sam Ved & Yajur Ved, which are sung with rhythm having syllables which are not fixed are the forms of God. Veds are the embodiment of the God. 
Since, everything static-inertial-immovable, movable-dynamic, living-non living, have originated from the Almighty, therefore, he is the father. HE is the one who has settled-described-created all systems-procedure-methods, He is the Creator. HE the one who send the souls to different-various species and make them take birth, is the mother as well. The Creator Brahma too got birth from HIM, therefore is the grandfather too.  HE is the one who has granted speed-dynamics to the living beings, nurturer and therefore HE is the master-Lord. HE is the one who see everything-events, so HE is witness as well. Being a component of the Almighty the organism-living being-creature, HE-the Almighty is the abode of them all, since they are under HIS shelter-asylum-protection. Since HE is the one who grant protection to all HE is called the protector. At the time of destruction, entire population-living world assimilate-dissolve in HIM, so, HE is destroyer. After Ultimate destruction the entire world rests in HIM, therefore HE is the abode of the universe along with there seeds-souls. Whatever is heard or said, whether its the beginning of the destruction is a form of HIM and therefore HE is called NIDHAN-destroyer (-store house of properties, characters, qualities). The Almighty is for ever, since ever and therefore, is the Ultimate seed which is not destroyed and keeps all characters-qualities intact.
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥9-19॥ 
हे अर्जुन! संसार के हित के लिए मैं ही सूर्य रूप से तपता हूँ, मैं ही जल को ग्रहण करता हूँ औ फिर उस जल को बरसा देता हूँ। और तो क्या कहूँ अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
शरीर सूर्य से ही निरोग होता है। पृथ्वी पर गंदगी-मल को सुखकर विषाणुओं-जीवाणुओं को नष्ट करने का कार्य भगवान् सूर्य करते हैं और इस प्रक्रिया में जो जल वाष्प बनकर उड़ता है उसी को वर्षा के रूपमे लौटा देते हैं। इस जल का कुछ भाग वे स्वयं ऊर्जा दायक विकिरण-पदार्थ के रूप में ग्रहण कर लेते हैं। इस प्रकार पृथ्वी पर मौजूद जहर को काफी मात्रा में वे कम कर देते हैं। इस प्रक्रिया में जल का शोधन और स्वभाविक मिठास लौट आती है। प्राणियों को लंबे समय तक जीवित रखने का कार्य अमृत करता है। भगवान् स्वयं ही अमृत का रूप ग्रहण करते हैं तथा समय पूरा होने पर धर्मराज-यमराज के रूप में मृत्यु भी बन जाते हैं। सत् और असत् (-Contamination-impurity, adulterated; Not existent, Unfounded, Illusory, Untruth, falsehood, Unreal, Untrue) भी वे स्वयं ही हैं। 
Almighty told Arjun that HE shines in the form of Sun for the welfare of the universe and accepts the water, which evaporates and then return it, in the form of rain. HE added further that it was HE, who acted as elixir-nectar-Amrat granting immortality and death along with virtues-eternal Absolute and wickedness-temporal. The Supreme Being acquires the desired form as and when required for the nurture-nourishment of the universe-various abodes & infinite universes.
Sun as a deity, is a form of the Almighty. He is often called Sury Narayan. He evaporates the water present in various impurities, poisons and checks the growth of germs, bacteria and viruses for human welfare. Poisonous materials have water in them. Sun sucks water in the form of vapors to regulate temperature and nourish-nurture the living beings. Weather formation, seasons are created by the Sun. The speed of planets too is governed by the Sun. Variation in the speed of Venus brings rains over earth and variation in the speed of Mercury brings tornadoes, typhoons, high speed winds associated with water. In fact Sun is at the heart of life in the universe. Most of the water is returned to the earth in the form of rain and a bit of it reaches the Sun in form of ingredients to keep him alive. This process cleanse the water and provide it natural sweetness. The Almighty himself acts as elixir-nectar-Amrat (-Ambrosia-Greek & Roman Mythology, the food of the demigods, thought to confer immortality.) to provide long life and good health. He becomes death to relieve one of his sins and put him another species. He HIMSELF is virtue-piousity-righteousness and contamination-wickedness simultaneously. Whatever activity happen of earth or else where, is due to HIM only.
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥9-20॥ 
तीनों वेदों में कहे हुए सकाम कर्म-अनुष्ठान को करने वाले और सोमरस को पीने वाले जो पाप रहित मनुष्य यज्ञों के द्वारा, इंद्र रूप से मेरा पूजन करके स्वर्ग प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं, वे पुण्यों के फलस्वरूप पवित्र इन्द्रलोक को प्राप्त करके, वहाँ स्वर्ग के देवताओं के दिव्य भोगों को भोगते हैं। 
ऋक्, साम और यजुः :- 3 वेदों में सकाम कर्मों का और उनके फलों का वर्णन है। पृथ्वी के निवासी यहाँ के भोगों की अपेक्षा स्वर्ग के भोगों का लालच करने लगते हैं और इसी कारणवश यज्ञों का अनुष्ठान करने में लग जाते हैं। इन अनुष्ठाओं का फल नाशवान है। सोमलता-सोमवल्ली नामक लता के रस को ऐसे लोग वैदिक मन्त्रों से अभिमंत्रित करके पीते हैं। जिसका पान करने से उसको पीने वाले मनुष्यों के स्वर्ग के प्रतिबन्धक पाप नष्ट हो जाते हैं। इन्द्र स्वर्ग के राजा हैं और देवता भी हैं। वे भगवान् के प्रतीक हैं। स्वर्ग प्राप्ति हेतु इन्द्र का पूजन किया जाता है। इंद्र की स्तुति-याचना को ही प्रार्थना कहा गया है। स्वर्ग के भोग दिव्य भोग हैं। और पृथ्वी की अपेक्षा विलक्षण हैं। इन भोगों की पूर्ति के उपरान्त मनुष्य फिर से पृथ्वी पर लौट आता है।
इयं सोमकला नाम वल्ली परमदुर्लभा। अनया बद्ध सूतेन्द्रो लक्षवेधी प्रजायते ॥  [रसेन्द्र चूड़ामणि 6-(6-9)]
जिसके पन्द्रह पत्ते होते हैं, जिसकी आकृति सर्प की तरह होती है, जहाँ से पत्ते निकलते हैं-वे गाँठें लाल होती हैं, ऐसी वह पूर्णिमा के दिन लाई हुई पँचांग (-मूल, डंडी, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवल्ली पारद को बद्ध कर देती है। पूर्णिमा के दिन लाया हुआ पँचांग (-मूल, छाल, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवृक्ष भी पारद को बाँधना, पारद की भस्म बनाना आदि कार्य कर देता है। परन्तु सोमवल्ली और सोमवृक्ष-इन दोनों में सोमवल्ली अधिक गुण वाली है। इस सोमवल्ली का कृष्णपक्ष में प्रतिदिन एक-एक पत्ता झड़ जाता है और शुक्लपक्ष में पुनः प्रतिदिन एक-एक पत्ता निकल आता है। इस तरह लता बढ़ती रहती है।पूर्णिमा के दिन इस इस लता का कन्द निकाला जाय तो वह बहुत श्रेष्ठ होता है। धतूरे के सहित इस कन्द में बँधा हुआ पारद देह को लोहे की तरह दृढ़ बना देता है और इससे बँधा हुआ पारद लक्षभेदी हो जाता है अर्थात एक गुणा बद्ध पारद लाख गुणा लोहे को सोना बना देता है। यह सोम नाम की लता अत्यन्त दुर्लभ है।  
Those sinless humans, who perform the deeds with motive as directed in the 3 Veds and drink the Somras-extract of vital herbs, worship the Almighty in the form of Indr-the King of demigods-Heaven, attain the heaven on the strength of the meritorious-virtues-piousity and enjoy the divine-celestial pleasures. 
Rick, Sam & Yuj Ved have described the procedure-methodology for attaining the heaven after death. Those who wish, even more pleasures, perform Yagy-Agnihotr-prayers to attain heaven. They pray to the God in the form of Indr-the king of heaven. They drink the extract of Som-a creeper which eliminates their sins which are obstruction in the path-journey to heaven. They enjoy there till the period of their stay is not over, in the heaven. Once the reward-outcome of the virtuous deeds performed with the motive is over, they are back to earth. The pleasure in heaven are better as compared to earth. there is s misconception about Somras. Some people regard it as wine-alcoholic beverage, which is untrue. In fact it a nourishing extract which provide health, vigor and vitality. Some people believe that the root of that creeper contain these qualities.
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥9-21॥
वे मनुष्य उस विशाल स्वर्गलोक के भोगों को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आ जाते हैं। इस प्रकार तीनों वेदों में बताये हुए सकाम धर्म का आश्रय लिए हुए भोगों की कामना करने वाला मनुष्य आवागमन को प्राप्त होता है।
स्वर्गलोक विशाल भी हैं और उसमें रहने वालों की आयु भी लम्बी है। उसमें भोगों की बहुतायक है। स्वर्ग की चाहत में मनुष्य भगवान् का आश्रय ग्रहण नहीं करता; अपितु 3 वेदों में कहे गए कर्मों को करता है। उसके पुण्य कर्म तो क्षीण होने ही हैं और तदोपरांत पृथ्वी पर वापसी भी सुनिश्चित है। इस प्रकार जन्म-मरण, पुनर्जन्म का बन्धन चलता ही रहता है। जो त्रयोधर्म का आश्रय लेता है, उसे देवताओं की याचना करनी पड़ती है। परन्तु जो पर ब्रह्म परमेश्वर का आश्रय लेता है उसे अपने योगक्षेम के लिए मन में चिंता, संकल्प अथवा याचना नहीं करनी पड़ती। 
Those humans return to the mortal world-earth after enjoying the heavenly pleasures upon exhaustion of the fruits of their Karm-deeds, performed with the motive of attaining the heaven-higher abodes. Thus following the injunctions of the 3 Veds, persons working for the fruit of their actions take repeated birth and death. 
The heaven is broad and the longevity its inhabitants is long. It has wide variety and plenty of comforts, pleasure, enjoyment. The only trouble is that one looses the memory of the Almighty and his prayers. The desire for the heaven forced him to follow the dictates-deeds-procedures-methodology explained in the Veds. One should never forget that any mistake leads to hell instead of heaven. However, the reward-fruits of the prayers with desires are always for the limited period. More you spend, sooner you become poor and there is no means of earning-credit-virtues in the heaven. One plus point here is that one will get birth in honorable-prestigious-virtuous family. The methods described in the Veds asks the humans to beg before the demigods-deities. One who is under the asylum-shelter-protection of the Almighty has no worries, since its the Almighty, who is taking care of him. One has no reason to beg to the God. His Bhakti grants everything automatically.
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥9-22॥ 

जो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी भली-भाँति उपासना करते है, मुझमें निरन्तर लगे रहते हुए उन भक्तों का योगक्षेम-अप्राप्त की प्राप्ति और प्राप्त की रक्षा, मैं वहन करता हूँ। 
जो व्यक्ति-भक्त दृढ़ता से यह मान लेता है कि जो कुछ भी हो रहा है देखने-सुनने-समझने में आ रहा है वह सबका सब भगवान् का ही स्वरूप है उसकी महत्वबुद्धि फिर भगवान् के सिवाय कहीं भी नहीं होती। वे भगवान् में ही लगे रहने के कारण अनन्य (-Anany, Unique, Close, Being only one: single, Whole, Inalienable, Identical) हैं। उनके साधन और साध्य सभी कुछ भगवान् ही हैं। इसलिए वे अनन्य होकर भगवान् का ध्यान चिंतन करते हैं। वे संसार से विमुख हो गए हैं। भगवान् द्वारा भक्त को अप्राप्त वस्तु की प्राप्ति करा देना योग और उसकी रक्षा करना क्षेम है। अगर भक्त का हित वस्तु को नष्ट करने में है तो भगवान् उसे नष्ट भी कर सकते हैं। अतः भक्त हर परिस्थिति में प्रसन्न रहता है। वह मानता है कि परमात्मा जो करता है उसके भले के लिए ही करता है और वही सही है। योग प्राणी का भगवान् से सम्बन्ध स्थापित करता है और क्षेम जीव का कल्याण है। जीव के कल्याण हेतु जो कुछ भी आवश्यक है, वह प्रभु स्वयं ही करते हैं। 
देवताओं की पूजा व्यक्ति अपने काम-वासना की पूर्ति के लिए करता है जिसमें स्वार्थ और लेन-देन की प्रवृति है जबकि भगवान् की उपासना करने वाला स्वयं को भगवान् का मानकर करता है जिसमें हानि-लाभ का प्रश्न नहीं है बल्कि एक परिवार के सदस्य का भाव है और इसमें सभी कुछ उसका है। 
The Almighty retreats-affirms that he takes care of  both spiritual and material welfare of those ever-steadfast devotees, who regularly adore-worship HIM thoroughly-properly, with single-minded contemplation.
When one determines that whatever is happening is due to the Almighty and its a form of HIM, he cling to HIM only. Since he is devoted to the God only, he is unique-inalienable. Therefore, he worship without deviating his mind else where.  He is detached from the world-family-society. To make the desired available to the devotee by the God; is Yog, in addition to assimilation in HIM. The Almighty protects the devotee, since he has come to HIS fore. If the Almighty finds that acquisition-availability of some thing is against the benefit of the devotee HE destroys it well. this is the reason that the devotee is happy in all conditions. He believes that whatever is being done by the Almighty is for his welfare. Yog connects the God with the devotee-organism and his welfare is the responsibility of the God. In fact what ever is needed for the welfare of the devotee, is being done by the God HIM self automatically. 
Prayer-worship of the deities-demigods is done with the motive of gaining entry into the heaven which is like :give and take" like a "labor-worker" who earn his wages. When one is devoted to the Almighty the feeling of oneness comes, making him a component of the God-a member of the family, where motive of profit or loss goes off and the Almighty takes up the responsibility of the devotee as one of HIS own. 
येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥9-23॥ 
हे कुन्ती नन्दन ! जो भी भक्त-मनुष्य, श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओं का पूजन करते हैं, वे भी मेरा ही पूजन करते हैं, मगर अविधि पूर्वक अर्थात देवताओं को मुझसे अलग मानकर। 
जब मनुष्य अन्यानेक देवताओं की पूजा करता है तो वह उन्हें परमात्मा से बड़ा मानकर ही ऐसा करता है। उसको यह समझ में नहीं आया कि जो कुछ भी है, वह परमात्मा ही है; अन्य कुछ नहीं। हक़ीकत में तो वे देवता भी तो उसी मालिक का अंग हैं, मगर उनकी भगवान् से अलग स्वतंत्र सत्ता नहीं है। यह अविधि कहा गया है, क्योंकि उन देवताओं को परमात्मा से अलग मान कर ऐसा किया गया है। यदि मनुष्य उपास्य देवता में निष्काम-भगवत्भव से आराधना करता है, तो वो भगवान् की आराधना ही कर रहा है। 
Hey the son of Kunti! The devotees who worship other deities-demigods, in fact worship the Almighty but the method-manner-procedure is inappropriate-improper, since they consider them to be different-superior to the God. 
When a person worship a deity-demigod, with the concept that the deity is superior to the God, he is mistaken-improper-inappropriate. In fact the deity-demigod too are incarnations of the Almighty like the humans, but of a much lower degree-intensity-strength. How can one expect the lower-inferior demigods to fulfill one's wish! To get the desired wish granted, the needy has to worship the deity-demigod as an incarnation of the God. The demigods power-capacity-caliber, have no existence in the absence of Almighty's sanction. This is grossly improper-inappropriate-absurd. However, if a deity is prayed without motive-desire with the understanding that he is just like the God, then its the worship of the God.
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥9-24॥ 
क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ; परन्तु ये मुझे तत्व से नहीं जानते, इसी से उनका पतन होता है। 
जब मनुष्य स्वयं को भोगों का भोक्ता और संग्रहों का स्वामी मानने लगता है तो वह परमात्मा से सर्वथा विमुख हो जाता है। इस प्रकार वह उसपर आश्रित हो जाता है जो अंततोगत्वा उसके पतन का कारण बनता है। जब जीवात्मा को यह ज्ञान हो जाता है कि समस्त भोगों और ऐश्वर्यों के दाता स्वयं भगवान् हैं, तो वह अपना ध्यान उनमें लगाकर पतन से बच जाता है। व्रत, यज्ञ, दान, तप, तीर्थ, आदि शुभकर्म और वर्णाश्रम धर्म का पालन आदि जितने भी कर्म हैं, उनका फल परमात्मा ही हैं। समस्त शुभ कर्मों का विधान भी उनका ही बनाया हुआ है, ताकि मनुष्य कर्म और फल से निर्लिप्त रहें। वो ही सम्पूर्ण जगत, पदार्थ, व्यक्ति, घटना, परिस्थिति, क्रिया और प्राणियों के मन, शरीर, बुद्धि, इन्द्रियों के स्वामी भी हैं। सत्, असत्, जड़, चेतन भी वही हैं। इनसे ही भोग, ऐश्वर्य बने हैं। अतः मनुष्य को स्वयं को उनका अधिपति मानना और उनपर निर्भर होना भी गलत है।जो उनपर निर्भर हो गया वो उनका दास-गुलाम हो गया और फिर उसका पतन निश्चित है।
One who do not know that the Almighty is both giver & taker and those who do not know-understand this-the true transcendental nature of the God, are sure to fall into the trap of birth & death.
When a person considers himself to be the owner and user-master of the God's creations, he becomes detached from the Almighty. His dependence over them-commodities, user goods-items, keeps on increasing, which ultimately results in his fall. One who is aware of the fact that all that around him is God's creation, by HIM, for HIM, he devotes himself to the God and is saves from downfall. Every activity like fasting, pilgrimage, asceticism, donations-charity, Varnashram Dharm are HIS creations meant to guide the humans, the way to Salvation. Its HE who framed-devised the pious activities and their output, so that the humans remain aloof-content with them. The Almighty is behind the creation of universe, matter, person, activity, event, human mind-intelligence, organs, body, piousness and other nocturnal-nefarious activities, living as well non living. The matter and the living being forms the comforts-luxuries. The man considers himself to be master of them and is doomed. Dependence over them results in his downfall i.e., repeated birth & death.
यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥9-25॥ 

सकाम भाव से देवताओं का पूजन करने वाले शरीर छोड़कर देवताओं को प्राप्त होते हैं। पितरों का पूजन करनेवाले पितरों को प्राप्त होते हैं। भूत-प्रेतों का पूजन करने वाले भूत प्रेतों को प्राप्त होते हैं। परन्तु मेरा पूजन करने वाले मुझे ही प्राप्त होते हैं। 
देवताओं के पूजन का श्रेष्ठतम परिणाम है, उनके लोकों में पहुँचना। जो व्यक्ति देवताओं की पूजा उन्हें भगवान् का स्वरूप मानकर विधि-विधान से, बगैर किसी इच्छा-चाहत के करते हैं, वे भी भगवान् की आराधना ही करते हैं। सकाम भाव से पित्तरों, भूत-प्रेतों की पूजा करने वाला उन्हीं के लोकों में पहुँच जाता है, अर्थात उसका मुक्ति मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। अनन्य भाव से निष्काम पूजा-आराधना करने वाला भक्त भगवान् को ही प्राप्त होता है।  
Those who worship deities-demigods with desires, meet the demigods-deities after their death, in their abodes. Those who pray-worship their ancestors, who have passed away meet them in theirs abodes. Similarly, those who worship the spectral-ghosts-phantoms go the the abodes of ghosts-the dead. But those who worship the Almighty, go the Ultimate abode from where no one returns.
The maximum benefit of praying the deities-demigods is reaching their abodes to enjoy the comforts available there, like a tenant, from where return is emmitent-certain-confirmed-sure. However, those who worship the demigods-deities as incarnations of the God without any motive-desire, worship the Almighty. Those who pray the ghosts-phantoms and the deceased ancestors reach their abodes. The Salvation of such people is blocked. One who pray-worship the Almighty without any motive-desire is certain to reach the ultimate abodes from where return does not take place, unless-until the Almighty do come to the earth and want them to associate HIM, in HIS task of purification.