Monday, February 29, 2016

THE SACRED THREAD जनेऊ-यज्ञोपवीत

CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj
Upper castes in Hindus, especially Brahmns, used to wear the sacred thread around the loin. This is generally made of white colored cotton thread. Kshatriy and Vaishy may wear threads made out of hempen and wool respectively. 
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Image result for images of brahmins wearing Janeu over the earImage result for images of brahmins wearing Janeu over the earIt has three to seven strands.  It suggests the development of a male, from a young boy to a man. It is believed that a boy cannot be surmised as Dwij (-twice born, second birth, initially one is born as an animal and education makes him a socially useful person) until he wears the Janeu. It represents initiation into education for Brahmns as well. Besides the Brahmns, Janeu thread is also worn by the Kshatriy-marshal community and Vaishy-trading-business community. The type of Janeu is different for different caste groups or sects of people of the Indian subcontinent. A celibate (-pure) bachelor is supposed to wear only one thread, a married man should wear two scared threads and if the married man has a child then he wears three threads. The three strands of the thread symbolizes three debts of man: (1). The debt of one's teacher, (2). The debt of one's parents and ancestors and (3). The debt of the scholars, which one ought to repay during his life span.  
During the current age it may not be possible to find even a devout (-भक्त, धर्मनिष्ठ, धार्मिक, सच्चा, सरल, दिल-हृदय से समर्पित, devotee, Godly, votary, pious, devout, religious, virtuous, holy, righteous, sacred, devout, truthful, real, genuine, faithful, sincere, devout, simple, easy, effortless, straightforward, ingenious, devout, heartwarming, heartfelt, warmhearted, devout, soulful, hearty, heartfelt, warm, unpretentious, cordial), Brahmn wearing this, since it needs highest possible standards of purity and piousity. Brahmns are finding it very-very difficult to earn livelihood. They no more earn sufficient money in the form of donations, Dakshina-fees, gifts to survive. They are poverty stricken and the present regime is busy crushing them.
One is Brahm Gandh (-गंध) Janeu (with 5 knots or 3 knots), which is meant for Brahmns and the other is Vishnu Gandh Janeu (with one knot), meant for other classes. In case a Brahmn desires to become scholarly in the Veds, he must wear Janeu at 5 years of age. If a Kshatriy desires to gain strength, he should wear Janeu at 6 and if a Vaishy desires for success, he must wear the Janeu at 8 years of age. 
JANEU CEREMONY :: Brahmns celebrate the development of a boy through Upnayan Sanskar (-sacred thread ceremony). The ceremony is generally observed between the ages of seven and fourteen. In case the ceremony could not take place due to any reason all through this age period, then it is required to be done before the marriage. The purpose of thread ceremony is to prepare a young man to share the responsibilities of elders. The thread is worn by the man in the company of a group chant of Gayatri Mantr. The thread is twisted in upward direction to make certain that Satv Gun (Truthfulness, Virtuousness, Righteousness, piousity, honesty) prevails. The ceremony also suggests that the wearer of Janeu can participate in the family rituals, from now on wards. 
SIGNIFICANCE OF 3 STRANDS OF JANEU :: Brahmns use Janeu thread with three strands. These three strands of Janeu represents the (1). Trinity of Brahma, Vishnu and Mahesh, (2).  Maha Saraswati, Maha Lakshmi and Maha Kali, (3). The 3 divisions of time into past, present and future, (4). The three qualities (i). Satv, (ii). Rajas and (iii). Tamas, (5).  Three states of mind, wakefulness, dream and deep sleep, (6). Three dimensions of Heaven (-Swarg), Earth (-Mratyu Lok) and Nether Regions (-Patal Lok) and (7). Ida, Pingla and Shushmna Nadi, through which the Kundlini (-coiled, hidden) energy reveals in Pran and realization.
PROCESS OF WEARING JANEU :: Its sanctity is regarded to get disturbed if it is not worn properly.  (1). To attend or perform any auspicious ceremony, one should wear Janeu hanging from the left shoulder: Upviti, (2). For attending or performing inauspicious event, one should wear Janeu hanging from the right shoulder: Prachanviti, (3). In case the person wears Janeu round the neck like a garland, then, he is called as Niviti, (4). While going for daily ablutions or doing impure tasks, the holy thread must be raised and its upper part ought to be put behind ear and (5). Both male and female can wear Janeu, yet a female should wear it around the neck and (6). Following a birth or death in the family, Janeu should be removed and again a new thread ought to be worn after 15 days of event.
One must replace the old or broken thread with a new thread, at some auspicious occasion or periodically.
SIGNIFICANCE OF UPNAYAN SANSKAR :: The strands of the thread also stand for purity of thoughts, words and deeds of the wearer. Through the ceremony of Upnayan, the boy is introduced to the concept of Brahmn and thus becomes qualified to lead the life of a Brahm Chari as per the guidelines of the Manu Smrati. Wearing the sacred thread is extremely significant & auspicious as it marks the beginning of education for the child.
यज्ञोपवीत (जनेऊ) एक संस्कार है। इसके बाद ही द्विज बालक को यज्ञ तथा स्वाध्याय करने का अधिकार प्राप्त होता है। यज्ञोपवीत धारण करने के मूल में एक वैज्ञानिक पृष्ठभूमि भी है। शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो कि दाएं कंधे से लेकर कटि प्रदेश तक स्थित होती है और विद्युत प्रवाह की तरह कार्य करती है। यह नैसर्गिक रेखा अति सूक्ष्म नस है। इसका स्वरूप लाजवंती वनस्पति की तरह होता है। यदि यह नस संकोचित अवस्था में हो तो मनुष्य काम-क्रोधादि विकारों की सीमा नहीं लांघ पाता।यदि उसकी प्राकृतिक नस का संकोच होने के कारण उसमें निहित विकार कम हो जाए तो कोई आश्यर्च नहीं है। 
यज्ञोपवीत (यज्ञ+उपवीत) एक संस्कृत शब्द है। द्विज-उच्च वर्णों में, उपनयन एक ऐसा संस्कार है, जिसमें ब्रह्मचारी को जनेऊ पहनाकर  विद्यारंभ कराया जाता है। मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं। कच्चे सूत से बना यह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है। यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया यह बन्धन उपवीत, यज्ञसूत्र या जनेऊ कहलाता है। 
यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है। इसमें सात (5 या 3) ग्रंथियाँ लगायी जाती हैं। ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है। तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है। तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं।
यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र यह है ::
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ 
जनेऊ को यदि विधि विधान से धारण किया जाये तो अनेकों अनजान बाधाओं और रोगों से रक्षा हो सकती है। मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व जनेऊ को कानों पर कस कर लपेटना पड़ता है। इससे कान के पीछे की दो नसें जिनका संबंध पेट की आंतों से है, आंतों पर दबाव डालकर उनको पूरा खोल देती हैं; जिससे मल विसर्जन आसानी से होता है तथा कान के पास ही एक नस से ही मल-मूत्र विसर्जन के समय कुछ द्रव्य विसर्जित होता है। जनेऊ उसके वेग को रोक देती है, जिससे कब्ज, अम्लता, पेट रोग, मूत्रन्द्रीय रोग, रक्तचाप, हृदय रोगों सहित अन्य संक्रामक रोग नहीं होते। जनेऊ को धर्म से जोड़ दिया गया है, जबकि इसका प्रयोग पूर्ण तय वैज्ञानिक और तथ्यों पर आधारित है।
जनेऊ पहनने से आदमी को लकवे से सुरक्षा मिल जाती है, क्योंकि आदमी को बताया गया है कि जनेऊ धारण करने वाले को लघुशंका करते समय दाँत पर दाँत बैठा कर रहना चाहिए, अन्यथा अधर्म होता है। दाँत पर दाँत बैठा कर रहने से आदमी को लकवा नहीं मारता।  दाँये कान को इतना महत्व देने का वैज्ञानिक कारण यह है कि इस कान की नस, गुप्तेंद्रिय और अंडकोष का आपस में अभिन्न संबंध है। मूत्रोत्सर्ग के समय सूक्ष्म वीर्य स्त्राव होने की संभावना रहती है।
दायें कान को ब्रह्म सूत्र में लपेटने पर शुक्र नाश से बचाव होता है। यदि बार-बार स्वप्नदोष होता हो तो दाँया कान ब्रह्म सूत्र से बांधकर सोने से रोग दूर हो जाता है। बिस्तर में पेशाब करने वाले लडकों को दायें कान में धागा बांधने से यह प्रवृत्ति रूक जाती है। किसी भी उच्छृंखल जानवर का दाँया कान पकडने से वह उसी क्षण नरम हो जाता है। जनेऊ पहनने वाला नियमों में बँधा होता है। वह मल विसर्जन के पश्चात अपनी जनेऊ उतार नहीं सकता। जब तक वह हाथ पैर धोकर कुल्ला न कर ले। अत: वह अच्छी तरह से अपनी सफाई करके ही जनेऊ कान से उतारता है। यह सफाई उसे दांत, मुंह, पेट, कृमि, जिवाणुओं के रोगों से बचाती है। जनेऊ का सबसे ज्यादा लाभ हृदय रोगियों को होता है। अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है। बिना यज्ञोपवीत धारण किये अन्न जल ग्रहण नहीं किया जाता। यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है –
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्। आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ 
आदमी को दो जनेऊ धारण कराया जाता है, एक पुरुष को बताता है कि उसे दो लोगों का भार या ज़िम्मेदारी वहन करना है, एक पत्नी पक्ष का और दूसरा अपने पक्ष का अर्थात् पति पक्ष का।
अब एक एक जनेऊ में 9-9 धागे होते हैं, जो कि व्यक्ति को बताते हैं कि उस पर पत्नी और पत्नी पक्ष के 9-9 ग्रहों का भार ये ऋण है उसे वहन करना है। अब इन 9-9 धांगों के अंदर से 1-1 धागे निकालकर देंखें तो इसमें 27-27 धागे होते हैं। अर्थात् मनुष्य को  पत्नी और पति पक्ष के 27-27 नक्षत्रों का भी भार या ऋण वहन करना है| अब अगर अंक विद्या के आधार पर देंखे तो 27+9=36 होता है, जिसको एकल अंक बनाने पर 36=3+6=9 आता है, जो एक पूर्ण अंक है।
अब अगर इस 9 में दो जनेऊ की संख्या अर्थात 2 और जोड़ दें तो 9+2=11 होगा जो बताता है कि मनुष्य का  जीवन अकेले अकेले दो लोगों अर्थात् पति और पत्नी ( 1 और 1 ) के मिलने से बना है। 1+1=2 होता है जो अंक विद्या के अनुसार चंद्रमा का अंक है और चंद्रमा मनुष्य को शीतलता प्रदान करता है। जब मनुष्य अपने दोनो पक्षों का ऋण वहन कर लेते हैं तो उसे असीम शांति की प्राप्ति हो जाती है।
अंडवृद्धि के सात कारण हैं। मूत्रज अंडवृद्धि उनमें से एक है। दायां कान सूत्रवेष्टित होने पर मूत्रज अंडवृद्धि का प्रतिकार होता है। इन सभी कारणों से मूत्र तथा पुरीषोत्सर्ग करते समय दाएं कान पर जनेऊ रखने की शास्त्रीय आज्ञा है। पूरे विधि विधान से धारण किया जनेऊ हर तरह की नकारात्मक शक्तियों (भूत-प्रेत आदि) और ग्रहों के दुष्प्रभावो से भी निश्चित रक्षा करता है। 

Saturday, February 27, 2016


10 MAHA VIDYA | दस महा विधा 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj

Devi Adi Para Shakti, the creator and protector of all worlds and the Supreme Gods the 'Trinities', has given darshan to the gods including the Trinities in ten forms at different times and in different moods suited to the occasion. The manifestation of the ten forms is known as Das Maha Vidya.


Once during their numerous love games, things got out of hand between Bhagwan Shiv and Maa Parvati. What had started in jest turned into a serious matter with an incensed Bhagwan Shiv threatening to walk away from Maa Parvati. Coaxing or cajoling by Parvati could not persuade HIM. Left with no choice, Maa Parvati multiplied herself into ten different forms for each of the ten directions. Thus however hard Bhagwan Shiv tried to escape from his beloved Maa Parvati, he would find her standing as a guardian, guarding all escape routes, in all the 10 directions.
अघोरपंथ में विभिन्न प्रकार की सिद्धियों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें ज्ञान और शक्ति प्राप्त करने के लिए हासिल किया जाता है। प्रमुख रूप से 10 सिद्धियों को जाना गया है, जिनमें से 4 को काली कुल और छ: को श्रीकुल में रखा गया है।
काली कुल की 4 साधनायें हैं और श्री कुल की 6 साधनायें हैं। महाविद्या साधना करने के लिए किसी व्यक्ति का ब्रह्मण होना अनिवार्य नहीं है। महाविद्या की साधना कोई भी व्यक्ति कर सकता है। इसमें जाति, वर्ग, लिंग आदि का कोई भेद नहीं है और सभी प्रकार के बन्धन से मुक्त है। सभी महाविद्या में भैरव की उपासना भी कर लेनी चाहिए। क्योंकि ये महाविद्याए हैं; अतः इनकी क्रिया जटिल है। इनकी साधना शुरु करने से साधक-भक्त को पंच शुद्धियाँ :: स्थान शुद्धि, देह शुद्धि, द्रव्य शुद्धि, देव शुद्धि और मंत्र शुद्धि; कर लेनी चाहिए।यह क्रिया यदि किसी समर्थ, योग्य, अनुभवी साधक-गुरु के संरक्षण में तो ज्यादा अच्छा होगा। 
दस महाविद्या रहस्य जय इन्दर मलिक तंत्र साधकों के लिए महत्वपूर्ण विभिन्न शक्ति-रूपों का क्या स्वरूप है और उनकी साधना से क्या-क्या तात्कालिक लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं, उसका संक्षिप्त परिचय पायेंगे आप इस लेख में। आगमशास्त्र में अविद्या, विद्या एवं महाविद्या इन तीन शब्दों का वर्णन है। जो सांसारिक कार्यों में हमारी सहायता करती हैं उसे ‘अविद्या’ कहते हैं। जो मुक्ति का मार्ग बताती हैं उसे ‘विद्या’ कहते हैं। और जो भोग और मोक्ष दोनो देती है उसे महाविद्या कहते हैं। दस महा विद्या इस प्रकार है। इन महाविद्याओं के प्रकट होने की कथा महाभागवत देवी पुराण में वर्णित है। 
(1). साधक स्वयं की देह को शुद्ध  करने के लिये मंत्रो के द्वारा स्नान करता है।
(2). पूजन स्थान का शोधन भी करना चाहिए है।
(3). देह का शोधन करने हेतु आसन पर आसीन होकर प्राणायाम तथा भूत शुद्धि की क्रिया से अपने शरीर का शोधन करना चाहिए।
(4). ईष्ट देवता की शरीर में प्रतिष्ठा कर नाना प्रकार के न्यास इत्यादि कर अपने शरीर को देव-भाव से अभिभूत कर अपने ईष्ट देवता का अन्तर्यजन करता है। शास्त्रों में  इसलिए कहा गया है : ‘देवम् भूत्वा देवम् यजेत’ अर्थात् देवता बनकर ही देवता की पूजा की जा सकती है।
(5). ईष्ट देवता बहिर्याग पूजन का मतलब यह है कि अन्दर तो देवता स्थापित है ही परंतु उसको बाहर लाकर बाहर भी पूजा की जाती है। जैसे यंत्र आदि में स्थापित देवता की पूजा की जाती है। 
ईष्ट देवता का आह्वान कर मंत्र द्वारा संस्कार करना चाहिए। इसके पश्चात पंचोपचार, षोडषोपचार अथवा चौसठ उपचारों के द्वारा महाविद्या यंत्र में स्थित देवताओं का पूजन कर, उसमें स्थापित देवता की ही अनुमति प्राप्त कर पूजन करना चाहिए। फिर अंतिम समय में तर्पण करके, हवन वेदी को देवता मानकर अग्नि रूप में पूजन कर विभिन्न प्रकार के बल्कि द्रव्यों को भेंट कर उसे पूर्ण रूप से संतुष्ट  चाहिए। इसके बाद देवता की आरती कर पुष्पांजलि प्रदान करता है। इसके कवच-सहस्रनामं स्त्रोत्र आदि का पाठ करके स्वयं को देवता के चरणों में आत्मसमर्पित करता है। पश्चात देवता के विसर्जन की भावना कर देवता को स्वयं के हृदयकमल में प्रतिष्ठित कर लेता है और शेष सामग्रियों को किसी जल मे प्रवाहित कर देना चाहिए।

Dus Mahavidya Devi

Each of the Devi's manifested forms made Bhagwan Shiv realize essential truths, made him aware of the eternal nature of their mutual love and most significantly established for always that she was his strength-might. They are inseparable thus Bhagwan Shiv is called Ardh Narishwar (-अर्धनारीश्वर). This event enlightened Bhagwan Shiv more and he did not feel belittled by this awareness, only spiritually awakened. Befittingly thus they are referred to as the Great Goddess's of Wisdom, known in Sanskrat as the Maha Vidya. Indeed in the process of spiritual learning the Goddess is the muse who guides and inspires one. She is the high priestess who unfolds the inner truths.

10 MAHA VIDYA KAVACH | दस महा विधा कवच :: This is the shield from evil forces which are always willing to harm the individual. This Ten Maha Vidya Stotr (-lyrics, verse, rhyme-poetic composition). This Kavach-shield is very important due to its efficacy. One who recite this verse everyday with due procedure-methodology is granted protection from evils. Maa Bhagwati Parwati through her 10 forms-incarnation-divisions bless one with joy, happiness and totality.

श्री महा विधा कवच :: 

विनियोग :: ॐ अस्य श्रीमहा-विधा-कवचस्य श्रीसदा-शिव ॠषि:, उष्णिक छन्द:, श्रीमहा-विधा देवता, सर्व सिद्धी-प्राप्त्यर्थे पाठे विनियोग:।

ॠष्यादी न्यास ::  

श्रीसदा-शिव-ॠषये नम: शिरसी, उष्णिक-छन्दसे नम: मुखे, श्रीमहा-विधा-देवतायै नम: ह्रीदी, सर्व-सिद्धी-प्राप्त्यार्थे पाठे विनियोगाय नम: सर्वाङ्गे।

मानस-पूजन :: 

ॐ पृथ्वी-तत्त्वात्मकं गन्धं श्रीमहा-विधा-प्रीत्यर्थे समर्पयामी नम:। ॐ हं आकाश-तत्त्वात्मकं पुष्पं श्रीमहा-विधा-प्रीत्यर्थे समर्पयामी नम:। ॐ यं वायु-तत्त्वात्मकं धुपं श्रीमहा-विधा-प्रीत्यर्थे घ्रापयामी नम:। ॐ रं अग्नी-तत्त्वात्मकं दीपं श्रीमहा-विधा-प्रित्यर्थे दर्शयामी नम:। 

ॐ वं जल-तत्त्वात्मकं नैवेधं श्रीमहा-विधा-प्रीत्यर्थे निवेदयामी नम:। ॐ सं सर्व-तत्त्वात्मकं ताम्बुलं श्रीमहा-विधा-प्रित्यर्थे निवेदयामी नम:।

श्रीमहा विधा कवच

ॐ प्राच्यां रक्षतु मे तारा, काम-रुप-निवासिनी। आग्नेयां षोडशी पातु, याम्यां धुमावती स्वयम॥1॥ 

नैर्ॠत्यां भैरवी पातु, वारुण्यां भुवनेश्वरी। वायव्यां सततं पातु, छिन्नमस्ता महेश्वरी॥2॥ 

कौबेर्यां पातु मे देवी, श्रीविधा बगला-मुखी। ऐशान्यां पातु मे नित्यं महा-त्रिपुर-सुन्दरी॥3॥ 

उर्ध्वं रक्षतु मे विधा, मातङ्गी पिठ-वासिनी। सर्वत: पातु मे नित्यं, कामाख्या कालिका स्वयम॥4॥

ब्रह्म-रुपा-महा-विधा, सर्व-विधा-मयी स्वयम। शिर्षे रक्षतु मे दुर्गा, भालं श्रीभव-गेहिनी॥5॥

त्रिपुरा भ्रु-युगे पातु, शर्वाणी पातु नासिकाम। चक्षुषी चण्डिका पातु, श्रीत्रे निल-सरस्वती॥6॥

मुखं सौम्य-मुखी पातु, ग्रिवां रक्षतु पार्वती। जिह्वां रक्षतु मे देवी, जिह्वा-ललन-भीषणा॥7॥ 

वाग्-देवी वदनं पातु वक्ष: पातु महेश्वरी। बाहु महा-भुजा पातु, करांगुली: सुरेश्वरी॥8॥ 

पृष्‍ठत: पातु भिमास्या, कट्यां देवी दिगम्बरी। उदरं पातु मे नित्यं, महा-विधा महोदरी॥9॥ 

उग्र-तारा महा-देवी, जंघोरु परी-रक्षतु। गूदं मुष्कं च मेढुं च, नाभीं च सुर-सुन्दरी॥10॥ 

पदांगुली: सदा पातु, भवानी त्रिदशेश्वरी। रक्तं-मांसास्थी-मज्जादिन, पातु देवी शवासना॥11॥ 

महा-भयेषु घोरेषु, महा-भय-निवारीणी। पातु देवी महा-माया, कामाख्या-पिठ-वासिनी॥12॥ 

भस्माचल-गता दिव्य-सिंहासन-कृताश्रया। पातु श्रीकालिका-देवी, सर्वोत्पातेषु सर्वदा॥13॥ 

रक्षा-हिनं तु यत स्थानं, कवचेनापी वर्जितम। तत्-सर्व सर्वदा पातु, सर्व-रक्षण-कारीणी॥14॥ 

Bhagwati Kali is the Krashn Murti. Tara Devi is the blue form, Bagala is the tortoise incarnation, Dhumavati is the boar, Chhinnmasta is Nar Singh, Bhuvneshwari is Vaman, Matangi is the Ram form, Tripur is Jamdagni, Bhaervi is Bal Bhadr, Maha Lakshmi is Buddh, and Durga is the Kalki form.  

The worship prescribed as an astrological remedy for the 9 planets and the Lagn ::  Kali for Saturn, Tara for Jupiter, Maha Tri Pur Sundri (or Shodshi-Shri Vidya) for Mercury, Bhuvneshwari for Moon, Chhinnmasta for Rahu, Bhaervi for Lagn, Dhum Vati for Ketu, Bagala Mukhi for Mars, Matangi for Sun and Kamala for Venus.

(1). KALI (काली) :: दस महाविद्याओं में यह प्रथम है। कलियुग में इनकी पूजा अर्चना से शीघ्र फल मिलता है।  देवी कालिका की काले हकीक की माला से 9,11,21 बार जाप करना चाहिए। कालिका की आराधना असाध्य बीमारी से मुक्ति, दुष्ट आत्माओं या क्रूर ग्रहों से बचाव के लिए की जाती है। इसके अलावा अकाल मृत्यु से बचाव और वाक सिद्धि प्राप्त करने के लिए काली की आराधना की जाती है। षटकर्म तो हर महाविद्या की देवी कर सकती है। षट कर्म मे मारण मोहन वशीकरण सम्मोहन उच्चाटन विदष्ण आदि आते है। परन्तु बुरे कार्य का अंजाम बुरा ही होता है। बुरे कार्य का परिणाम या तो समाज देता है या प्रकृति या प्रारब्ध या कानून देता ही है। इसलिए अपनी शक्ति से शुभ कार्य करने चाहिए।

मंत्र :: ॐ क्रीं क्रीं क्रीं दक्षिणे कालिके क्रीं क्रीं क्रीं स्वाहाः। 

Maa Bhagwati Kali is the Krashn Murti-dark image of the Maa Parwati. Maha Vidya-Ultimate knowledge, are worshiped to attain all sorts of power. This is concentration-meditation-Sadhana when the devotee worship one of the incarnations of Maa Bhagwati. This is a mode to please the deity and seek her blessings. Yantr and Mantr are considered very effective mediums-tools, through which worshipers can reach the target and fulfill their motive-desire.

Kali is the first of the Das Maha Vidya. She is eternal beyond the limits of time. She takes away the Tamas-negative energy-darkness and fills one with the light of Wisdom, that is why, she is the embodiment of Gyan Shakti-enlightenment. She resides in the cremation grounds, where all creation dissolves. Mata Sati took the form of Kali. This form was fierce-fearful, her hair untied and loose, her body the color of a dark cloud. She had deep set eyes and eyebrows shaped like curved swords. She stood on a corpse, wore a garland of skulls and earrings made from the bones of corpses. She had four hands. On one hand, she had a skull and over the other she had a curved sword, with blood dripping on it. Other two hands had the Mudra-formation granting fearlessness & the other giving blessings. She roared and the ten directions were filled with that ferocious sound. 

The exploits of this Goddess Kali are outlined in the Chandi Path. Maa-Goddess killed the demons called Chand and Mund (-चंड और मुंड)  and also drank the blood of Rakt Beej (-रक्त बीज़, seed, millions of demons who originated from the drops of blood). She is known as Kaushiki (-कौशिकी), She who came from within and is the Slayer of Shumbh and Nishumbh (-शुम्भ, निशुम्भ)

BEEJ MANTR :: (1). ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी कालिके स्वाहा। 

(2). ॐ क्रीं कालिकायै नमः। Om Kreem Kalikayae Namah. 

(3).नमः ऐं ऐं क्रोम क्रोम फट् स्वाहा काली कालिके हूँ। Namah Aim Aim Krom Krom Phat Swaha Kali Kalike Hoom.

(4). क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं हूँ हूँ दक्षिणे  कालिके क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं हूँ हूँ स्वाहा। Kreem Kreem Kreem Hreem Hreem Hoom Hoom Dakshine  Kalike Kreem Kreem Hreem Hreem Hoom Hoom Swaha.

GAYATRI MANTR :: ॐ महा काल्यै च विद्महे श्मशान वासिन्यै च धीमहि तन्नो काली प्रचोदयात्। 

MAA TARA (तारा) :: जिसे श्मशान तारा के नाम से भी जाना जाता है, की सिद्धि जिसे प्राप्त हो जाती है, वह व्यक्ति माँ तारा की गोद में एक बच्चे की तरह रहता है। जिसे श्मशान तारा की कृपा प्राप्त हो जाती है, उसका जीवन खुशियों से भर जाता है, श्मशान तारा की सिद्धि प्राप्त करने वाले व्यक्ति को वाक सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है।इसके अलावा श्मशान तारा की कृपा से उसे तीव्र बुद्धि और रचनात्मकता भी हासिल होती है। श्मशान तारा सिद्धि प्राप्त करने वाला व्यक्ति अपने शत्रुओं को जड़ से खत्म कर सकता है। श्मशान तारा की आराधना करने के लिए मूंगा, स्फटिक या काले हकीक की माला का प्रयोग करना चाहिए। 

सर्वदा मोक्ष देने वाली और तारने वाली को तारा का नाम दिया गया है। सबसे पहले महर्षि वशिष्ठ ने माँ तारा की पूजा की थी। आर्थिक उन्नति और बाधाओं के निवारण हेतु मां तारा महाविद्या का महत्वपूर्ण स्थान है। इसकी सिद्धि से साधक की आय के नित्य नये साधन बनते हैं। जीवन ऐश्वर्यशाली बनता है। इस की पूजा गुरुवार से आरंभ करनी चाहिये। इससे शत्रुनाश, वाणी दोष निवारण और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

मंत्र :: ॐ ह्रीं स्त्रीं हुं फट।

She is the second of the Das  Maha Vidya or Goddess of Great Wisdom, is a form of Durga. Tantric manifestations of Durga or Maha Devi, Kali or Parvati. Tara is perceived at core as the absolute, unquenchable hunger that propels all life.  With the churning of the ocean the poison-Halahal (-हलाहल) came up and Bhagwan Shiv engulfed it for the welfare of the universe, saving the world from destruction, resulting in him being unconscious. His throat turned blue and he earned the epithet Neel Kanth (-नील कंठ). Maha Devi Durga appeared as Maa Tara and took Bhagwan Shiv in her lap. She suckled him, the milk from her breasts counteracting the poison and he recovered. 

Bhagwan Shiv had stopped her from rampaging by becoming an infant. Seeing the child, Kali's maternal instinct came to the fore and when she was feeding him with her breast milk, Bhagwan Shiv sucked her rage out, while sucking the milk. Bhagwan Shiv assumed the form of an infant in front of Maa Bhagwati Kali. Tara is a form of Durga. She is the one who created 1st Seed from which the entire universe took birth in the form of Bhagwan Narayan. 

.Maa Tara comes next to Kali & closely resembles her in appearance. Tara too displays gentle (-graceful, सौम्य Saumya) or fierce (-उग्र Ugra) aspects. 

Tara the blue goddess is a guide and a protector and helps to tide over the stormy sea of troubles and turmoil of life (Sansar-Tarini,भव सागर तारिणी). She is Tarini, deliverer or savior, one who saves guides and transports to salvation. Tara is the deity of accomplishments and is often propitiated by business persons for success.

Tara is associated with the speaking prowess. And, some texts equate Tara to Saraswati the goddess of learning-enlightenment and call her Neel (blue) Saraswati seated on a lotus. As she is the goddess of speech, she is related to breathe that manifests sound. Breath is the primal sound of life. Breath in which the sound originates is the carrier (transporter-Tarini) of knowledge conveyed through the sound of speech. Tara is the un-manifest speech that resides in breath and consciousness.

She is benevolent, compassionate, gentle and spirited young woman, eager to help and to protect,   Tara as Maha Vidya is a rather fearsome goddess striking terror. She is also moody and harmful. But at times, Tara-Maha Vidya can also be benevolent and compassionate.

Tara is described as seated in the pratyalidha Asan on the chest of a corpse stretched on a white lotus; she is supreme and laughing horribly; holding cleaver, blue lotus, dagger and bowl; uttering the Mantr Hum. She is of deep blue color; her hair is braided with serpents, she is the Ugr-furious-ferocious Tara. Her tongue is always moving. Her forehead is decorated with ornaments made of bones. She bestows magical powers. A noticeable feature of Tara’s iconography is the halo of light (-आभा, अलौकिक तेज) that surrounds her head. And, rising above her head is the ten headed serpent Akshobhay (the unperturbed or unshakable) symbolizing her Yogic powers.

Between Kali and Tara there are some similarities as also some differences. Tara’s physical appearance resembles that of Kali. Like Kali, she has three bright red eyes; has four hands holding sword or head chopper, a scissors, a severed head and a lotus; wears the garland of skulls; is richly is bejeweled and has snakes for ornaments; dances on a corpse. Both Kali and Tara are strongly associated with death and dissolution; both stand upon inert male figure. And, both are associated with Bhagwan Shiv. Brahad Dharm Puran mentions Maa Tara as representing time, just as does Kali. Whereas Kali is the power of time (Kaal-death) that inexorably causes all created things to perish, Tara is associated with fire and particularly the fires of the cremation ground.

There are also differences in the depiction of the two goddesses. Tara's complexion is blue whereas Kali's can be black or deep blue. Tara holds a bowl made from a scull in one hand, a pair of scissors in another, a blue lotus in the third hand and an axe in the fourth. The scissors and sword in the hands of Tara are tools to remove the ego, the sense of mistaken identity that defines, limits, and binds. They are not weapons of death and destruction.  Tara is draped in tiger skin around her waist and is not naked unlike Kali who symbolizes absolute freedom. Unlike Kali, whose hair flows loose and wild, Tara’s hair of tawny color is carefully bunched into a topknot (Jata). Whereas Kali’s hair represents absolute freedom from constraint, Tara’s is a symbol of Yogic asceticism and restraint. Kali represents the highest form of wisdom or liberating knowledge and Tara is related to the discipline of Yogic practices.

Pratyalidhapade Ghore Mundalamala Pasovite

Kharve Lambodari Bhime Ughratara Namostu Te

Om Hreem Shreem Hum Phat

(2). BAGLA MUKHI DEVI (बगला मुखी देवी) :: हर  प्रकार की समस्या का समाधान और किसी भी परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए बगलामुखी साधना की जाती है। सरकारी नौकरी प्राप्त करने के लिए, शत्रुओं का विनाश करने और कोर्ट कचहरी के मसलों में विजय होने के लिए बगलामुखी साधना की जाती है। हल्दी की माला से 8,16 या 21 बार बगलामुखी साधना की जाती है। वाक शक्ति से तुरंत परिपूर्ण करने वाली, अपने साधक को खाने कि लिए दोडने वाली, शत्रुनाश, विवाद में विजय, हर प्रकार की प्रतियोगिता परीक्षा में सफलता के लिए, सरकारी कृपा के लिए माँ बगलामुखी की साधना की जाती है। 

शत्रु बाधा को पूर्णतः समाप्त करने के लिये बहुत महत्वपूर्ण साधना है। इस विद्या के द्वारा दैवी प्रकोप की शांति, धन-धान्य प्राप्ति, भोग और मोक्ष दोनों की सिद्धि होती है। इसके तीन प्रमुख उपासक ब्रह्मा, विष्णु व भगवान परशुराम रहे हैं। परशुराम जी ने यह विद्या द्रोणाचार्य जी को दी थी और देवराज इंद्र के वज्र को इसी बगला विद्या के द्वारा निष्प्रभावी कर दिया था। युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण के परामर्श पर कौरवों पर विजय प्राप्त करने के लिये बगलामुखी देवी की ही आराधना की थी। 

माँ बगलामुखी के प्रसिद्ध शक्ति पीठ निम्न स्थानों पर हैं। दतिया :: यहाँ माँ बगलामुखी का ऐतिहासिक मंदिर है। यह पीतांबरा शक्ति पीठ के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि आचार्य द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा अमर होने के कारण आज भी इस मंदिर में पूजा-अर्चना करने आते हैं। वाराणसी : यहाँ भी मां बगलामुखी का शक्तिपीठ है। वनखंड़ी : यह शक्ति पीठ जिला कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) में है। कोटला : यहाँ  भी माँ  बगलामुखी का शक्ति पीठ है। यह पठानकोट से 5 किलोमीटर दूर कांगड़ा मार्ग पर है। इस मंदिर की स्थापना 1810 में हुई थी। गंगरेट : यह भी हिमाचल प्रदेश के जिला ऊना में है। हर वर्ष यहां बहुत भारी मेला लगता है। इसके अतिरिक्त मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र (मुंबई) में भी इनके प्रसिद्ध उपासना स्थल हैं। इस विद्या का उपयोग केवल तभी किया जाना चाहिए जब कोई रास्ता ना बचा हो। इस विद्या को ब्रह्मास्त्र भी कहा जाता है और यह भगवान विष्णु की संहारक शक्ति है।

मंत्र :: ॐ ह्लीं बगलामुखी देव्यै ह्लीं ॐ नम:। 

Bagla is the Goddess who stops all motion at the appropriate time, silences the mouths and words of all evil beings, and controls their tongues. May that Goddess bless one with stillness when it is appropriate! (2-i). Bagla is the second Maha Vidya. Once the creation was in turmoil and being destroyed in many places (-like the present scenario in the world). Brahma became worried about His creation and wondered what the outcome of this turmoil would be. He then meditated to bring peace to the universe. Not succeeding, He then performed severe Tapasya (-तपस्या)  to obtain the blessings of Tripurambika the Mother of the Three Worlds. Pleased with His austerities, She appeared before Him as Maa Bagla in a yellow form and gave him a boon. Bagla grants all kinds of perfection to devotees who pray to Her. 

(2-ii). Once an Asur-demon-giant named Ruru, the son of Durgam, performed severe penance to win the favor of Bhagwan Brahma. Since, Ruru was already very powerful, the demigods became very apprehensive of what might happen, if he obtained a boon from Brahma Ji. So, they did Aradhna (-propitiation) to yellow water (-yellow intuitively means peace). Pleased with their Tapasya, the Divine Mother appeared as Bagla. 

Most powerful divine spirit of the Das Maha Vidya is the Shri Bagala Mukhi Devi, worshiped by Bhagwan Maha Dev, an embodiment of Tamas. Like for the other demigods, deities and goddesses the Vedic Shastr Vidhi or Agam Shastr Vidhi are not to be adopted in consecrating and worshiping Bagla Mukhi Devi. In the worship and other related rituals, strict adherence is essential. Even a slightest deviation will result in severe punishment to the priest due to Devi's anger. Among the ten divine forms, known as Das Maha Vidya of Devi Para Shakti, Matangi, Bhuvneshwari, Tripur Sundri, Maha Lakshmi, these four forms are in the Satv Gun, Maha Kali, Tara, Bhaervi, Chhinn Mast are in Rajas Gun and Dhoom Vati is in Tamas Gun. But Bagala Mukhi Devi is the embodiment of all the three qualities-Satv, Rajas and Tamas. Hence the omnipotent Bagala Mukhi Devi can be either be made angry easily and pleased easily.

Bagla Mukhi Devi smashes the devotee's misconceptions and delusions (or the devotee's enemies) with her cudgel. She is also known as Pitambar Maa (-पीताम्बर माँ) in North India. Bagla Mukhi is derived from Bagla (-बगुला मुखी, distortion of the original Sanskrit root Vagla-वगला and Mukh-मुख , meaning bridle and face, respectively. Thus, the name means one whose face has the power to capture or control. She thus represents the hypnotic power of the Goddess. Another interpretation translates her name as crane faced.

Performing the Bagala Mukhi Navakshari Mantr Yagy (-नवाक्षरी मन्त्र यज्ञ) and doing Sarv Rog Saman, (-सर्व रोग समान) Mantr hom-Hawan-Agnihotr (-होम, हवन, अग्निहोत्र, यज्ञ) on the Sukl Saptmi  (-शुक्ल सप्तमी) day will enable one to get rid of Pitr Shrap-Dosh (-पितृ श्राप-दोष, defect, deformity), the sins of the previous birth and Rahu Dosh and the devotee will be hale and healthy.

On the full moon day in the night in the Bagala Mukhi Maha Mantr Yagy, doing the Praman hom (-प्रमाण होम) with Bhagy Sukt (-भाग्य सूक्त) and Mangal Sukt (-मंगल सूक्त) Mantr will drive away the ill effects of the marriage and will provide Shubh Mangly Sidhhi (-शुभ मांगल्य सिद्धि, विवाह के संदर्भ में), Santan Sidhhi (-सन्तान सिद्धि, progeny, children), good married life, wealth, employment, promotion and higher education and will fulfill all your requirements.

ॐ क्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं स्तम्भं जिह्वां कीलय कीलय बुद्धिं नाशय ह्रीं ॐ स्वाहा। 

The cause of manifestation, existence merging into perfection in the casual body. Who stops Motion at the Appropriate time, silence the mouths and words of all evil beings, control their tongues, control, destroy intellect (or give them intelligence). Maya, Om, I am one with the God.

ॐ बगलमुख्यै विद्महे द्विभुजायै धीमहि।  तन्नो देवी प्रचोदयात्॥ 

Om! We meditate upon her, who stops Motion at the Appropriate time, contemplate her with two arms, may that goddess grant us increase.

ABHICHAR DOSH SHANTI MANTR अभिचार दोष शान्ति  मन्त्र (-To remove Black Magic काले जादु, दुष्ट शक्तियों के नाश के लिए) :: 

ॐ बगलामुखी मम सर्व शत्रु परायुक्त सर्व दुष्टग्रह बधान क्षिप्रम यधस्थानेय उच्चाटयो उच्चाटयो हम फट स्वाहा:। 

Om Hreem Bagla Mukhi Mam Sarv Satruprayukt Sarvdushtgrah Badham Kshiprm Yadhsthaney Uchchatyo Uchchatyo Hum Phat Swaha:.

SHODSHI (त्रिपुरसुंदरी, षोडशी) :: शक्ति की सब से मनोहर सिद्ध देवी है। इन के ललिता, राज-राजेश्वरी महात्रिपुर सुंदरी आदि अनेक नाम हैं। षोडशी साधना को राजराजेश्वरी इस लिये भी कहा जाता है क्योंकि यह अपनी कृपा से साधारण व्यक्ति को भी राजा बनाने में समर्थ हैं। इनमें षोडश कलायें पूर्ण रूप से विकसित हैं। इसलिये इनका नाम माँ षोडशी हैं। इनकी उपासना श्री यंत्र के रूप में की जाती है। यह अपने उपासक को भक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करती है। बुध इनका अधिष्ठातृ ग्रह है।

संसार का कोई भी कार्य संपन्न करने के लिए त्रिपुर सुंदरी की आराधना की जानी चाहिए। जिस कार्य को करने में देवता भी सफल नहीं हो पाते, उसे त्रिपुर सुंदरी संपन्न करती है। त्रिपुर सुंदरी के अलावा इस संसार में ऐसी कोई भी साधना नहीं है जो भोग और मोक्ष एक साथ प्रदान करे। त्रिपुर सुंदरी साधना करने के लिए रुद्राक्ष की माला से दस बार जाप किया जाना चाहिए। यह भोग और मोक्ष दोनो ही साथ-साथ प्रदान करती है। इस मंत्र के जाप के लिए रुद्राक्ष की माला का इस्तेमाल किया जा सकता है। कम से कम दस माला जप करें। 

सोलह का महत्व :: (1). सोलह वर्षीय कन्या-युवती-स्त्री और (2). हिन्दुओं में कृत्य जो किसी के मरने के दसवें या ग्यारहवें दिन होता है। 

16 वस्तुओं का वर्ग या समूह :: ईक्षण, प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मंत्र, कर्म और नाम।]

मंत्र :: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर सुंदरीयै नमः।

श्री यन्त्रThe worship of Devi in Shri Chakr is regarded as the highest form of the Devi worship. Originally Bhagwan Shiv granted 64 Chakr and their Mantr and Tantr to the world, to attain-accomplish spiritual and material desires. He evolved the Shri Chakr and the highly coveted and the most powerful Shodshakshari Mantr, which is the equivalent of all the other 64 put together. Shri Yantr is called Yantr-Raj or King of the Yantr, Shri Vidya Tantr is called Tantr-Raj and the Shodshi Mantr is called Mantr-Raj.

Shodshi worship is the only one which grants the Sadhak both Iham and Param, i.e., Material and spiritual-Ultimate benefits.

The Shri Vidya or Shodshi Vidya was 1st taught in Saty Yug by Bhagwan Haygreev to Agasty and his wife Lopamudra. This is as per the Vaedic-Achar (-वैदिक आचार) or Vaedic tradition (-वैदिक परम्परा). During Treta Yug it was given to Bhagwan Parshu Ram by Dattatrey Ji who was the combined incarnation of Brahma, Vishnu and Maheshwar and considered the greatest incarnation. Parshu Ram Ji gave it to his disciples and it is called Parshu Ram Kalp Sukt. This is as per the Kaulav-Achar or Kaulav tradition. Vaeshnav-Achar Shri Vidya also exists.

This is one of the manifestations of Maa Bhagwati-the Adi Shakti. When Parvati discarded Her form as Kali and assumed the form of Gauri. Still Bhagwan jokingly addressed her Kali. Parvati became angry and moved into hiding. Bhagwan Shiv started missing her and began to search. Still he could not locate her. He was dismayed when Narad Ji reached there to pay obeisance to Bhagwan Shiv & Maa Parwati. Bhagwan Shiv narrated the whole sequence to Narad Ji. Narad Ji easily found her meditating at Sumeru Parwat. He reached there and said that Adi Dev was going to marry another woman so that she could feel jealous-envy and rush to Kailash. The trick worked and Maa reached Kailash and looked at Bhagwan shiv's chest where she found another woman, a young girl of 16 years forgetting that it was she who's image was being reflected from the heart of Bhagwan Maha Dev. She could not hide her anxiety and questioned Bhagwan Shiv about that Shodshi (16 years old girl) Kanya. Bhagwan Shiv was relaxed to find her and said that it was her own reflection, since no other woman could find a place in Bhagwan Shiv's heart. Bhagwan Shiv turned this instance into a Maha Vidya. He said that she would manifest 16 forms of excellence! So, she unites the sixteen syllables of Shiv and Shakti, the Supreme Goddess of all Desires.  This is the age when a girl has her beauty at her peak.

She who is most beautiful in all the three worlds known as Shodshi, the girl of sixteen, is usually listed as the third Maha Vidya following Kali and Tara. Tri Pur Sundri is one of the Adi (primary) Maha Vidya. She was a well known Tantric deity even before she was grouped with the Maha Vidya. The goddess is depicted in three forms: Tri Pur Bala (the young virgin; Tri Pur Sundri (the Ultimate beauty) and Tri Pur Bhaervi (-the terrible). Tri Pur Bhaervi is emphasized in the Maha Vidya cult. While, her other two aspects are central to the Shri Vidya tradition rooted in the worship of Shri Chakr. In Shri Vidya, Tri Pur Sundri is celebrated as Lalita, Raj Rajeshwari, Kameshwari and Maha Tri Pur Sundri the most magnificent transcendental beauty without a comparison in three worlds, the conqueror of three levels of existence. Each of these forms emphasizes a particular quality or function. In Shri Vidya, the Goddess is worshiped in her benign (-Saumy, सौम्य) and beautiful (-Soundary, सौन्दर्य) aspects, following the Shri Kul (family of Shri) tradition (-Sampraday, सम्प्रदाय). Shri Vidya is still flourishing, particularly in South India.

Shodshi of sixteen years is at a delightful stage of a woman’s life. Her nature is to play, to seek new experiences and to charm others to her. Her innocence attracts all towards her. The other explanations mention: She is called Shodshi because the Mantr of her Vidya is composed of sixteen seed syllables (Beejakshar: ka e i la hreem; ha sa ka ha la hreem; sa ka la hreem; and shreem). Another explanation sates that the number sixteen is also associated with sixteen her individualized aspects, Kal or sixteen phases of moon (-Shodash kala). And, therefore this Vidya is also known as Chandr-kala-Vidya, the wisdom of the lunar digits. The Beejakshars are invoked as forms of the Mother goddess. But, in the Maha Vidya cult, Shodshi is also seen as the embodiment of sixteen modification of desire.

Tri Pur Sundri, three is her  dominant number. Her name is taken to mean: “she who is beautiful in the three worlds” or “she whose beauty transcends the three worlds”. She is Tri Vidha Shakti: Bala, Sundri and Bhaervi. The three cities (Tri-Pur) symbolize body, mind and consciousness. The triangle is the main motif of Tri Pur Sundri carrying various symbolism: three fold process of creation, preservation and destruction; the three syllables of her Mantr; three Guns (-characteristics, qualities, traits, factors) and three colors; three states of awareness   etc.

It is explained that Maha Vidya as a group belong to the Kali Kul (family of Kali) as Kali is the most prominent Maha Vidya. Kali Kul (Vansh, family) generally is opposed to the conservative Brahmanical tradition, which ‘denies the experience of the Goddess’. Kali Kul is aligned to Shakt mode of worship. Further, some aspects and dispositions of Kali, the Adi Maha Vidya, are shared by all the other Maha Vidya. For these reasons, Tri Pur Sundri, though she basically belongs to Shri Kul, as Maha Vidya (Tri Pur Bhaervi), displays traces of aggression (Ugra, उग्र) and horror (Ghor, घोर). The Maha Vidya Tri Pur Sundri (Bhaervi, भैरवी) is described as timeless youth, beautiful but frowning rather angrily. The Maha Vidya text Shodshi-Tantr-Shastr describes her, at places, as ‘frightening, wild and perhaps dangerous’. The most unusual depiction of Tri Pur Sundri appears in the Vamkeshwar-Tantr where she is smeared with ashes, wears tiger skin, ties her hair in a knot over the top of her head as a Jata-hair locks, carries a skull and holds a snake, a trident and a drum. She has a large bull as her vehicle.

Tri Pur Sundri as Maha Vidya combines in herself the determination of Kali, the knowledge of Tara and her own beauty and grace. Following the core ideology of the Maha Vidya, Tri Pur Sundri, like Kali and Tara, she exercises her domination over the male. She sits over the chest of Adi Dev Bhagwan Shiv, while the four major demigods support her throne as its legs.

Though Tri Pur Sundri is an Adi (-primordial) Maha Vidya, she is not regarded as representing the highest state or absolute of reality (as Kali does). But, she represents a relative state of consciousness characterized by “I am this” (aham, idam, अहम्, इदम्). She is related to Yog and heightened awareness-consciousness)

Tri Pur Sundri is glowing like rising sun spreading delights of joy, compassion and knowledge. She is depicted as a beautiful young girl of sixteen, of red and golden complexion, having four arms holding a noose, a goad, a sugarcane bow and five flower arrows. She is richly adorned with ornaments. She is sometimes shown seated on a lotus emerging out of the navel of Bhagwan Shiv, who is reclining below her. At other times she is seated on the chest of reclining Shiv or sitting on the lap of Bhagwan Shiv-Kameshwar. They are on a pedestal supported by the Tri Murti-Tri Dev :: Brahma, Vishnu & Mahesh. An aura of royalty distinguishes her demeanor and her attributes.

The weapons (-Ayudh आयुध, Astr & Shastr अस्त्र-शस्त्र), she holds: The noose symbolizes attachment-indicates the captivating power of beauty, the goad signifies repulsion-the ability to dissociate from attachments, the sugarcane bow is like the mind-enlightenment and the arrows are the five sense objects. Bhagwan Shiv represents dormant consciousness the Sada Shiv Tatv (the ever auspicious but inert principle of consciousness)  and Tri Pur Sundri is Maa Shakti. 

Om Aim Hreem Shreem Shri Lalita Tri Pur Sundri Padukam Poojyami Namah.

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्री ललिता त्रिपुरसुन्दरी पादुकम् पूज्यामि नमः। 

MAHA SHODSHI MANTR  (महाषोडशी मन्त्र) :: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौः 

CHHINNMASTA (छिन्नमस्ता) :: छिन्नमस्ता दशमहाविद्याओं में षष्ठी महाविद्या हैं। इनका दूसरा नाम ‘प्रचण्ड चण्डिका’ भी हैं। हिरण्यकश्यपु और वैरोचन का मनोरथ पूर्ण करने वाली होने से वज्रवैरोचनीया भी कहलाती हैें। योगियों के लिए इनकी साधना सर्वश्रेष्ठ है। जो साधक कुण्डलिनी जागरण करना चाहते हैं उन्हें यह साधना गुरू मार्गदर्शन में अवश्य करनी चाहिए।

माँ छिन्नमस्ता का स्वरूप गोपनीय है। इनका सर कटा हुआ है। इनके बंध से रक्त की तीन धारायें निकल रही है। जिस में से दो धारायें उनकी सहस्तरीयां और एक धारा स्वयं देवी पान कर रही है। चतुर्थ, संध्या काल में छिन्नमस्ता की उपासना से साधक को सरस्वती की सिद्धि हो जाती है। राहु इस महाविद्या का अधिष्ठाता ग्रह है। देवी छिन्नमस्ता बहुत ही जल्द शत्रुओं का विनाश कर सकती हैं। इसके अलावा अवाक सिद्धि, रोजगार में अचूक सफलता, नौकरी में पदोन्नति और विवाद में सफलता भी हासिल होती है। यह कुंडिली जागरण में सहायक है। अलावा पति या पत्नी को अपने वश में रखने के लिए भी देवी छिन्नमस्ता की आराधना की जाती है। छिन्नमस्ता देवी की आराधना रुद्राक्ष, हकीक की माला से या स्फटीक की माला से 11 या 20 बार मंत्र जाप करना चाहिए।   

मंत्र :: श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वज्र वैरोचनीयै हूं हूं फट स्वाहा:। 
Chhinnmasta Temple at Bishnu 
Pur, Bankur, West Bengal.

This is the sixth Maha Vidya. This manifestation is associated with the concept of self-sacrifice as well as the awakening of the Kundlini-spiritual energy. She is considered both as a symbol of self-control on sexual desire as well as an embodiment of sexual energy, depending upon interpretation. She symbolizes both aspects of Devi: a life-giver and a life-taker. Her legends emphasize her sacrifice-sometimes with a maternal element, her sexual dominance and her self-destructive fury.

Once Maa Parvati went with Her friends Dakini and Varnini to take a bath in the Mandakini river. she was feeling very happy and a lot of love was welling up inside Her. Her complexion darkened and the feeling of love completely took over. Her friends on the other hand were hungry and asked Maa Parvati to give them some food. She asked  them to wait for a while and started walking. After a short while, Her friends once again appealed to Her, telling Her that She was the Mother of the Universe and they were Her off springs and requested to be fed quickly. Parvati replied that they should wait until they reached home. Her friends could not wait any longer and demanded that their hunger be satisfied immediately. The compassionate Parvati laughed and with her finger nail cut Her own head. Immediately the blood spurted in three directions. Her two friends drank the blood from two of the directions and the Goddess herself drank the blood from the third direction. Since, she cut Her own head, she is known as Chhinnmasta. Chhinnmasta shines like a lightning bolt from the Sun. She demonstrates the rare courage needed to make the highest conceivable sacrifice.The image of Chhinnmasta is a composite one, conveying reality as an amalgamation of sex, death, creation, destruction and regeneration. It is stunning representation of the fact that life, sex and death are an intrinsic part of the grand unified scheme that makes up the manifested universe. 

Chhinnmastika is a symbol of the perception of secrecy. She stands on the seat of white lotus. In her navel Yoni Chakr are situated. The directions itself are her apparel. Her two companions symbolizes the two qualities of Tamas (-dark, demonic) and Rajas (-humanly). She is alive even though her head is severed from her body. Her severed head is symbolic of introverted nature of accomplishment. The Chhinnmastika or Chhinnmasta Mantr should be chanted for 1,25,000 for the accomplishment of any desire. She is worshiped to obtain a son, remove poverty, gain wisdom, destroy the enemy or the seek poetic powers.

Before starting the Jap the Yantr must be worshiped.

MANTRA :: (1). ॐ श्रीं ह्रीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचनीये श्रीं ह्रीं ह्रीं फट् स्वाहा। 

(2). ॐ श्रीं  क्लीं ह्रीं ऐं वज्र वैरोचनीये हूँ हूँ फट् स्वाहा। Om Shreem Hreem Kleem Aim Vajr Vaerochniyae  Hoom Hoom Fat Swaha.

(3). ओम विरोचिन्यै विद्महे छिन्नमस्तायै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात। 

BHUVNESHWARI (भुवनेश्वरी) ::  सुख में वृद्धि करने और किसी विशेष मनोकामना की पूर्ति करने के लिए भुवनेश्वरी माँ की साधना करनी चाहिए। भुवनेश्वरी माँ को प्रसन्न करना बेहद आसान है, वह अपने भक्त से बहुत ही जल्द प्रसन्न हो जाती हैं। भुवनेश्वरी माँ  की आराधना करने के लिए स्फटिक की माला से कम से कम 11 या 21 बार जाप करना चाहिए।महाविद्याओं में भुवनेश्वरी महाविद्या को आद्या शक्ति कहा गया है। माँ भुवनेश्वरी का स्वरूप सौम्य और अंग कांतिमय है। माँ भुवनेश्वरी की साधना से मुख्य रूप से वशीकरण, वाक सिद्धि, सुख, लाभ एवं शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है। पृथ्वी पर जितने भी जीव हैं सब को इनकी कृपा से अन्न प्राप्त होता है। इसलिये इनके हाथ में शाक और फल-फूल के कारण इन्हें माँ ‘शाकंभरी’ नाम से भी जाना जाता है। चंद्रमा इनका अधिष्ठातृ ग्रह है। यह साधना हर प्रकार के सुख मे वृद्धि करने वाली है। देवी भुवनेश्वरी की खास बात यह है कि यह बहुत ही कम समय मे प्रसन्न हो जाती है परंतु एक बार रुठ गई तो मनाना भी थोडा मुश्किल ही होता है। देवी माँ से कभी भी झुठे वचन नहीं कहने चाहिए। 

मन्त्र :: ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नमः।

It is the fourth of the ten Maha Vidya goddesses and an aspect of Devi or Durga as elements of the physical cosmos, in giving shape to the creation of the World. She is an incarnation of Goddess Shakti known as Adi Shakti i.e one of the earliest forms of Shakti. She rules or commands the whole universe, possessing controlling influence of turning situations according to her desire. The word Bhuvneshwari is a compound of the words Bhuvan-cosmos-universe; Ishwari, meaning "Goddess of the worlds" where the worlds are the Tri-Bhuvan or three abodes-regions of Bhoo (earth), Bhuvah (-sky, atmosphere) and Svaḥ (-heavens). Maa Parvati is Sagun Roop (-the from with characteristics, embodiment) of Goddess Bhuvneswari. Her consort is Bhagwan Shiv. 

She is red in color, seated on a lotus flower. Her body is resplendent and shining with jewels. She holds a noose (-Pash) and a curved sword (-Ankush) in two of her hands and the other two assume the Mudras of blessing and freedom from fear. 

Bhuvneshwari-the mother nature, is inseparable from the Creator of the World as the supreme goddesses who creates power of love, space, gives freedom and breaks one free from attachment and sufferings making him believe that true love has no form. She is creator and protector and fulfills all the wishes of her Sadhaks-worshipers. Bhuvneshwari Tantr Sadhna-practice evokes 64 Yogini. The aspirant Sadhak, having perfected this Sadhna is bestowed with 64 divine virtues or the 64 Yogini from Maa Bhuvneshwari which helps to succeed in every venture the Sadhak-practitioner. This Sadhana can be started on first Monday of any Hindu calendar month.

BENEFITS OF BHUWANESHWARI SADHNA-TANTR :: A Tantr Sadhak of Das Maha Vidya desires beauty, good fortune, immovable property, house and vehicle. The aspirant Sadhak, having perfected this Sadhna get all Asht Siddhis. This Sadhna evokes innumerable advantages for all round financial prosperity and stability, blesses with life long fixed assets and real estates. The results are realized instantly after the accomplishment of the Sadhna.

PROCEDURE-METHODOLOGY :: Its better has some one to guide-Guru, who has perfected the art of worship. Rigorous chanting of Mantr with purity, correct pronunciation, rhythm, intensity etc. Maa's image, statue-idol or a Yantr may suffice. One may start with 108 Beej Mantr and then may proceed to 1008 and eventually 5,00,000. Stanch meditation is essential. The practitioner should make up his mind that he would not discard the worship in between.

The devotee is protected from (1). Planetary conjunction leading to poverty, (2). Obstacles of all types, (3). Social, financial and physical instance of misfortune, (4). Loss of confidence and memory, (5). Insensitivity, (6). Emotional immaturity, (7). Irresponsibility etc.

ASTROLOGICAL SIGNIFICANCE :: One is required to perform prayers devoted to Maa Bhagwati-Bhuvneshwari to over come the defects-dosh arising out of the Malefic Moon, (-both Maha Dasha or Antar Dasha), from the suffering and agony. Nir-Buddhi-idiocy-lack of intelligence & mental illness. One may preform Vam Tantr Das Maha Vidya Tantrik Bhuvneshwari puja. this is useful in awakening of Kundlini as well.

MAYA-ILLUSION :: Thus, Bhuvneshwari symbolizes the dynamic power of God which manifests itself in a multitude of visible and impermanent forms. All these manifestations are unreal because of their inconstancy and impermanence. She creates, casts a spell since she controls the living beings. One who is attached to this perishable world keeps on moving from one incarnation to yet another. 

BEEJ MANTR (बीज मंत्र) :: ॐ ह्रीं भुवनेश्वर्यै नमः। 

GAYATRI MANTR (गायत्री मंत्र) :: ॐ नारायण्यै विद्महे भुवनेश्वर्यै धीमहि। तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

त्रिपुर भैरवी :: किसी भी प्रकार के तांत्रिक समाधान के लिए त्रिपुर भैरवी साधना की जाती है। यह साधना प्रेत आत्माओं के लिए काफी खतरनाक है। इसके अलावा ऐसे व्यक्ति जो आकर्षक जीवन साथी की ख्वाहिश रखते हैं उनके लिए यह साधना फायदेमंद है। किसी भी बुरे तांत्रिक प्रभाव से मुक्ति और शीघ्र विवाह के लिए भी इस सिद्धि को प्राप्त किया जाता है। 

आगम ग्रंथों के अनुसार त्रिपुर भैरवी एकाक्षर रूप है। शत्रु संहार एवं तीव्र तंत्र बाधा निवारण के लिये भगवती त्रिपुर भैरवी महाविद्या साधना बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है। इससे साधक के सौंदर्य में निखार आ जाता है। इस का रंग लाल है और यह लाल रंग के वस्त्र पहनती हैं। गले में मुंडमाला है तथा कमलासन पर विराजमान है। त्रिपुर भैरवी का मुख्य लाभ बहुत कठोर साधना से मिलता है। इनकी साधना तुरंत प्रभावी है। जिस किसी तांत्रिक समस्या का समाधान नही हो रहा है, यह देवी उस समस्या का यह जड से विनाश करती है। इस देवी का मंत्र जप आप मूंगे की माला से से कर सकते है और कम से कम पंद्रह माला मंत्र जप करनी चाहिए।
मंत्र :: ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा:। 
धूमावती :: बुरी नजर और दरिद्रता से मुक्ति, तंत्र-मंत्र, जादू-टोने, भूत-प्रेत के डर से मुक्ति पाने के लिए धूमावती माँ की सिद्धि प्राप्त की जाती है। धूमावती देवी, जीवन की हर मुश्किल का समाधान करती है। धूमावती माँ की आराधना करने के लिए मोती या काले हकीक की माला से कम से कम नौ बार जाप करना चाहिए। धूमावती का कोई स्वामी नहीं है। इसकी उपासना से विपत्ति नाश, रोग निवारण व युद्ध में विजय प्राप्त होती है। हर प्रकार की द्ररिद्रता के नाश के लिए, तंत्र-मंत्र के लिए, जादू-टोना, बुरी नजर और भूत-प्रेत आदि समस्त भयों से मुक्ति के लिए, सभी रोगो के लिए, अभय प्रप्ति के लिए, साधना मे रक्षा के लिए, जीवन मे आने वाले हर प्रकार के दुखों को प्रदान करने वाली देवी है इसे अलक्ष्मी भी कहा जाता है। मंत्र- ॐ धूं धूं धूमावती देव्यै स्वाहा:। 

(9). मातंगी :: घर-गृहस्थी के मामलों में आने वाली बाधाओं से मुक्ति पाने के लिए मातंगी आराधना की जाती है। पुत्र प्राप्ति, विवाह में आने वाली परेशानियों के समाधान के लिए मातंगी माँ की आराधना की जाती है। मातंगी माँ की सिद्धि प्राप्त करने के बाद स्त्री सहयोग जल्दी और आसानी से मिलने लगता है। इसकी साधना से विवाह, सुखी, गृहस्थ जीवन, आकर्षक और ओजपूर्ण वाणी तथा गुणवान पति या पत्नी की तत्पश्चात संतान की प्राप्ति होती है। इनकी साधना वाम मार्गी साधकों में अधिक प्रचलित है। इनकी कृपा से स्त्रियों का सहयोग सहज ही मिलने लगता है। चाहे वो स्त्री किसी भी वर्ग की स्त्री क्यों ना हो। इसके लिए स्फटिक की कम से कम बारह माला मंत्र जप करना चहिए।

मंत्र :: ॐ ह्रीं ऐं भगवती मतंगेश्वरी श्रीं स्वाहा:। 

(10). कमला :: अखंड धन-दौलत की स्वामिनी देवी कमला की आराधना करने के बाद ही इन्द्र ने अब तक स्वर्ग का शासन संभालकर रखा हुआ है। संसार की सारी खूबसूरती देवी कमला की ही कृपा मानी जाती है। इनकी आराधना करने के लिए कमलगट्टे की माला से कम से कम दस या इक्कीस बार जाप किया जाना चाहिए। माँ  कमला कमल के आसन पर विराजमान रहती है। श्वेत रंग के चार हाथी अपनी सूँड़ों में जल भरे कलश लेकर इन्हें स्नान कराते हैं। शक्ति के इस विशिष्ट रूप की साधना से दरिद्रता का नाश होता है और आय के स्रोत बढ़ते हैं। जीवन ‘सुखमय होता है। यह दुर्गा का सर्व सौभाग्य रूप है। जहाँ कमला है वहाँ विष्णु है। शुक्र इनका अधिष्ठातृ ग्रह है। यह देवी धूमावती की ठीक विपरीत है। जब देवी कमला की कृपा नहीं होगी तब देवी धूमावती तो जमी रहेगी। इसलिए दीपावली पर भी इनका पुजन किया जाता है। इस संसार में  जितनी भी सुन्दर लडकीयाँ है, सुन्दर वस्तु, पुष्प आदि हैं यह सब इनका ही तो सौन्दर्य है। हर प्रकार की साधना में रिद्धि सिद्धि दिलाने वाली, अखंड धन धान्य प्राप्ति, ऋण का नाश और महालक्ष्मी जी की कृपा के लिए कमल पर विराजमान देवी की साधना करें। 
मंत्र :: ॐ हसौ: जगत प्रसुत्तयै स्वाहा:।