Thursday, February 4, 2016

SOMRAS-THE EXTRACT OF SOMVALLI सोमवल्ली-लता और सोमवृक्ष

SOMRAS-THE EXTRACT OF SOMVALLI 
सोमवल्ली-लता और सोमवृक्ष
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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इयं सोमकला नाम वल्ली परमदुर्लभा। अनया बद्ध सूतेन्द्रो लक्षवेधी प्रजायते॥[रसेन्द्र चूड़ामणि 6.6-9]
जिसके पन्द्रह पत्ते होते हैं, जिसकी आकृति सर्प की तरह होती है, जहाँ से पत्ते निकलते हैं-वे गाँठें लाल होती हैं, ऐसी वह पूर्णिमा के दिन लाई हुई पँचांग (मूल, डंडी, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवल्ली पारद को बद्ध कर देती है। पूर्णिमा के दिन लाया हुआ पँचांग (मूल, छाल, पत्ते, फूल और फल) से युक्त सोमवृक्ष भी पारद को बाँधना, पारद की भस्म बनाना आदि कार्य कर देता है। परन्तु सोमवल्ली और सोमवृक्ष-इन दोनों में सोमवल्ली अधिक गुण वाली है। इस सोमवल्ली का कृष्णपक्ष में प्रतिदिन एक-एक पत्ता झड़ जाता है और शुक्लपक्ष में पुनः प्रतिदिन एक-एक पत्ता निकल आता है। इस तरह लता बढ़ती रहती है। पूर्णिमा के दिन इस इस लता का कन्द निकाला जाय तो वह बहुत श्रेष्ठ होता है। धतूरे के सहित इस कन्द में बँधा हुआ पारद देह को लोहे की तरह दृढ़ बना देता है और इससे बँधा हुआ पारद लक्षभेदी हो जाता है अर्थात एक गुणा बद्ध पारद लाख गुणा लोहे को सोना बना देता है। यह सोम नाम की लता अत्यन्त दुर्लभ है। 
देवताओं के द्वारा पीया जाने वाला अद्भुत पेय इससे से तैयार किया जाता है।  इसको मदिरा-शराब कहना सर्वथा मतिभ्रम है। 
Those sinless humans, who perform the deeds with motive as directed in the 3 Veds and drink the Som Ras-extract of vital herbs, worship the Almighty in the form of Indr-the King of demigods-Heaven, attain the heaven on the strength of the meritorious-virtues-piousity and enjoy the divine-celestial pleasures. 
Rick, Sam & Yuj Ved have described the procedure-methodology for attaining the heaven after death. Those who wish, even more pleasures, perform Yagy-Agnihotr-prayers to attain heaven. They pray to the God in the form of Indr-the king of heaven. They drink the extract of Som-a creeper which eliminates their sins which are obstruction in the path-journey to heaven. They enjoy there till the period of their stay is not over, in the heaven. Once the reward-outcome of the virtuous deeds performed with the motive is over, they are back to earth. The pleasure in heaven are better as compared to earth. there is s misconception about Som Ras. Some people regard it as wine-alcoholic beverage, which is untrue. In fact it a nourishing extract which provide health, vigour and vitality. Some people believe that the root of that creeper contain these qualities.
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥श्रीमद् भगवद्गीता 9.20॥ 
तीनों वेदों में कहे हुए सकाम कर्म-अनुष्ठान को करने वाले और सोम रस को पीने वाले जो पाप रहित मनुष्य यज्ञों के द्वारा, इंद्र रूप से मेरा पूजन करके स्वर्ग प्राप्ति की प्रार्थना करते हैं, वे पुण्यों के फलस्वरूप पवित्र इन्द्रलोक को प्राप्त करके, वहाँ स्वर्ग के देवताओं के दिव्य भोगों को भोगते हैं। 
Those humans return to the mortal world-earth after enjoying the heavenly pleasures upon exhaustion of the fruits of their Karm-deeds, performed with the motive of attaining the heaven-higher abodes. Thus following the injunctions of the 3 Veds, persons working for the fruit of their actions take repeated birth and death.
ऋक्, साम और यजुः :- 3 वेदों में सकाम कर्मों का और उनके फलों का वर्णन है। पृथ्वी के निवासी यहाँ के भोगों की अपेक्षा स्वर्ग के भोगों का लालच करने लगते हैं और इसी कारणवश यज्ञों का अनुष्ठान करने में लग जाते हैं। इन अनुष्ठाओं का फल नाशवान है। सोमलता-सोमवल्ली नामक लता के रस को ऐसे लोग वैदिक मन्त्रों से अभिमंत्रित करके पीते हैं। जिसका पान करने से उसको पीने वाले मनुष्यों के स्वर्ग के प्रतिबन्धक पाप नष्ट हो जाते हैं। इन्द्र स्वर्ग के राजा हैं और देवता भी हैं। वे भगवान् के प्रतीक हैं। स्वर्ग प्राप्ति हेतु इन्द्र का पूजन किया जाता है। इंद्र की स्तुति-याचना को ही प्रार्थना कहा गया है। स्वर्ग के भोग दिव्य भोग हैं। और पृथ्वी की अपेक्षा विलक्षण हैं। इन भोगों की पूर्ति के उपरान्त मनुष्य फिर से पृथ्वी पर लौट आता है।
सोम एक वनस्पति है जो कि मुंजवान पर्वत पर पैदा होती है। इसका रस अत्यधिक शक्तिशाली एवं स्फूर्तिदायक है। सोम रस इन्द्र और देवताओं का प्रिय पेय पदार्थ है। सोम रस का पान करके ही उन्होंने वृत्र का वध किया था। सोम रस देवताओं को अमरत्व प्रदान करता है। सोम का वास्तविक निवास स्थान स्वर्ग ही है। इसको श्येन पक्षी के द्वारा पृथ्वी पर औषधि के रूप में लाया गया। ऋग्वेद में सोम को त्रिषधस्थ, विश्वजित्, अमरउद्दीपक, अघशंस, स्वर्वित्, पवमान आदि नाम दिये गये हैं। [ऋग्वेद]
सोम लता का रस पीले रंग का था, जिसे देवता और ऋषि पीते थे। इसे पत्थर से कुचल कर रस निकालते थे और वह रस किसी ऊनी कपड़े में छान लेते थे। यह रस यज्ञ में देवताओं को चढ़ाया जाता था और अग्नि में इसकी आहुति भी दी जाती थी। इसमें दूध या मधु भी मिलाया जाता था।  
इसका उत्पत्ति स्थान मुंजवान पर्वत है; इसी लिये इसे मौजवत् भी कहते थे। श्येन पक्षी, इसे स्वर्ग से देवराज इंद्र से पृथ्वी पर लाये। [ऋक् संहिता]
ऋग्वेद में सोम की शक्ति और गुणों की बड़ी स्तुति है। यह यज्ञ की आत्मा और अमृत कहा गया है। देवताओं को यह परम प्रिय है। यह बहुत अधिक बलवर्धक, उत्साहवर्धक, पाचक और अनेक रोगों का नाशक है। यह अमृत के समान बहुत ही दिव्य पेय है जिसके पान से हृदय से सब प्रकार के पापों का नाश तथा सत्य और धर्म भाव की अभिवृद्धि होती है। यह सब लताओं का पति और राजा है। वैद्यक में सोम लता की गणना दिव्योषधियों में है। यह परम रसायन है। इसके पंद्रह पत्ते होते हैं, जो शुक्ल पक्ष में, प्रतिपदा से लेकर पूर्णिमा तक, एक-एक करके उत्पन्न होते हैं और फिर कृष्ण पक्ष में, प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक, पंद्रह दिनों में एक-एक करके वे सब पत्ते गिर जाते हैं। इस प्रकार अमावस्या को यह लता पत्रहीन हो जाती है।
इसके अन्य नाम :- सोमवल्ली, सोमा, क्षीरी, द्विजप्रिया, शणा, यश-श्रेष्ठा, धनुलता, सोमाह्नी, गुल्मवल्ली, यज्ञवल्ली, सोम-क्षीरा और यज्ञाह्मा।
एक अन्य सोम लता दक्षिण की सूखी पथरीली जमीन में होती है। इसका क्षुप झाड़दार और गाँठदार तथा पत्रहीन होता है। इसकी शाखा राजहंस के पर के समान मोटी और हरी होती है और दो गाँठों के बीच की शाखा 4 से 6 इंच तक लंबी होती है। इसके फूल ललाई लिए बहुत हलके रंग के होते हैं और फलियाँ 4-5 इंच लंबी और तिहाई इंच गोल होती हैं। इसके बीज चपटे और 1/4 से 1/6 इंच तक लंबे होते हैं।

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