Wednesday, January 13, 2016

MEAT EATING माँसाहार

MEAT EATING माँसाहार
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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दैवी प्रकृति के व्यक्ति में भय का अभाव, अन्तःकरण की स्वच्छता, तत्व ज्ञान के लिये निरन्तर ध्यान योग में स्थिति, दान, इन्द्रिय संयम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप, सरलता, अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, चुगली न करना, समस्त प्राणियों पर दया, अलोलुपता, मृदुता, लज्जा, अचञ्चलता, तेज, क्षमा, घृति, शौच, वैरभाव का न होना, अभिमान शून्यता आदि सद्गुण होते हैं। 
आसुरी प्रकृति के व्यक्ति दैवी प्रकृति के व्यक्तियों से सर्वथा भिन्न-विपरीत होते हैं। उनमें अकर्मण्यता, विवेकहीनता, अनिर्णय और अशौच प्रमुखता से पाए जाते हैं। सदाचार, सत्य का पूर्ण अभाव रहता है। "जगत की उत्पत्ति दैवीय-ईश्वरीय है", यह वे नहीं मानते। वे काम-वासना को ही जगत का हेतु समझते हैं। अल्पबुद्धि और क्रूरकर्मी होते हैं। उनकी इच्छाएँ-कल्पनाएँ ऐसी होती हैं, जिनका पूरा होना सर्वथा असंभव है। उनमें दम्भ, मान, मोह, मद की प्रधानता होती है। आशा, तृष्णा, संचय उनकी सामान्य प्रवृत्ति है। शत्रुता, बदले की भावना बनी रहती है। अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझते हैं। यज्ञ, दान, सिद्धियों की प्राप्ति दूसरों पर अधिकार और शासन तथा स्वर्ग-सुखभोग की प्राप्ति के हेतु करते हैं। अनाचार, परनिंदा, क्रोध, दर्प, दंभ अहंकार और ईश्वर से द्वेष और स्वयं को ईश्वर मानना, उनका स्वाभाविक अवगुण है। माँस, मद्य-मदिरा, अश्लीलता, मैथुन में उनकी प्रवृत्ति बानी रहती है। उनकी मनोवृत्ति (mentality), प्रवृत्ति (tendency, inclination) प्रकृति (nature) हिंसक होती है।  
असुर का अर्थ है प्राण का पोषण करने वाला। जो अपने सुख के लिये दूसरों की हिंसा करे, वह असुर है। 
आसुरी प्रवृत्ति के व्यक्ति पढ़-लिखकर विद्वान होने पर भी देहासक्ति और देहाभिमान नहीं छोड़ पाते और शब्दों का अपने हेतु अनुपयुक्त प्रयोग करते हैं।  
किसी भी शब्द के अनेक अर्थ हो सकते हैं जिनको स्थिति के अनुरूप प्रयुक्त किया जाता है। अज्ञानी, अल्पज्ञानी, अक्सर शब्दों का गलत प्रयोग करते हैं या फिर उनका गलत अर्थ निकलते है।  संस्कृत भाषा के अन्यानेक समानार्थक शब्द विश्व की लगभग सभी भाषाओँ में मिलते है और भारत की लगभग हर भाषा में इनके अपभ्रंश मौजूद हैं। 
हिंसा का अर्थ भी इसी प्रकार गलत लगाया जाता है। किसी को दण्ड देने के लिये की गई हिंसा, हिंसा नहीं है। दस्युओं, हत्यारों, आतातियों, आतंकवादियों, आक्रमणकारियों, पापियों को मृत्युदण्ड तो कदापि हिंसा नहीं है। जबरदस्ती युद्ध थोपने पर आक्रमणकारियों को मारना हिंसा में नहीं आता। आखेट, भोजन के लिये पशुवध निंदनीय घोर हिंसा है। 
"मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तSभ्य सूयका:" 
वेद में कहीं भी गाय, घोड़े या नरबलि का विधान नहीं है। किसी भी यज्ञ में पशु के रक्त-माँस से सन्तुष्ट करने की कल्पना तो पूरी तरह से बीभस्त है। यह ईश्वर द्रोह है। परमेश्वर जगत के श्रष्टि कर्ता और पालनहार हैं, उनकी संतुष्टि माँस-मदिरा से कदापि नहीं की जा सकती। 
"मांसानां खादनं तद्वन्निशाचर समीरितम्"     
मद्य-माँस की प्रथा पूरी तरह असुरों, पाशविक, पैशाचिक प्रवृत्ति वालों की कृति है। 
प्राचीन काल से मनुष्य यज्ञ-यागादि में केवल अन्न का ही प्रयोग करते थे। [महाभारत अनुशासन पर्व]
Please refer to :: SHRIMAD BHAGWAD GEETA (16) श्रीमद् भगवद्गीता *अथ षोडशोऽध्यायः* santoshkipathshala.blogspot.com  for in depth learning.
क्रव्यादमग्निं प्रहिणोमि दूरं यमराज्ञो गच्छतु रिप्रवाहः। 
इहैवायमितरो जातवेदा देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्॥ [ऋग्वेद 7.6.21.9] 
अर्थात मैं माँस खाने वाली या जलाने वाली अग्नि को दूर हटाता हूँ, यह पाप का भर ढ़ोने वाली है; अतः यमराज के घर जाये। इससे अलग जो सर्वज्ञ पवित्र अग्निदेव हैं, उनको यहाँ स्थापित करता हूँ। वे हविष्य को देवताओं तक पहुँचायें, क्योंकि वे सब देवताओं को जानने वाले हैं। 
Veds are Almighty's words meant to control the humans from unwanted-undesirable actions-behaviour. Nothing has been said in them, which may pursue-direct one to violence, sensuality, sexuality. Veds prevent one from sin and guide-moves him to austerity, piousness, righteousness, honesty, truthfulness. 
Yagy simply means non violence, worship-prayers to God, holy sacrifices in fire, donations, and making one civilised-cultured. Cow is prayed by the descendents of demigods till today. 
Before beginning a Yagy some of it is kept out considering as the portion which engulf the insects, contaminated goods, untouchables. This is meant for the demigod of death Yam Raj.
ANIMAL HUMAN SACRIFICE पशु अथवा मानव बलि ::
मा नस्तनये नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिष:। [ऋग्वेद 1.114.8]
हमारे पुत्रों, पशुओं गायों और घोड़ों को हिंसाजनित मृत्यु से बचावें। 
Protect our sons, animals-cattle, cows, horses from violent death i.e, killing.
Hinduism does not advocate human or animal sacrifice of any kind-nature.
Quotes from Veds :: 
पशुन् पाहि, गां मा हिंसी:, अजां मा हिंसी:, अविं मा हिंसी:। इमं मा हिंसीर्द्विपादं पशुम्, मा हिंसिरेकशफं पशुम्, मा हिस्यात् सर्वा भूतानि 
पशुओं को न मारो। गाय को न मारो। बकरी को न मारो। भेड़ को न मारो। इन दो पैर वाले पशुओं को न मारो। एक खुर वाले (घोड़े-गधे) आदि पशुओं को न मारो। किसी भी प्राणी हिंसा न करो। 
Do not kill animals. Do not kill cow. Do not kill goat. Do not kill sheep. Do not kill these animals with two legs-humans. Do not kill animals (horse, pony,  & donkey) with two hoops. Do not kill any animal. Veds prohibit the killing of insects as well.
इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम्। 
त्वष्टु: प्रजानां प्रथमं जानिन्नमग्ने मा हिश्सी परमे व्योम॥ [यजु.13.50]
उन जैसे बालों वाले बकरी, ऊँट आदि चौपायों और पक्षियों आदि दो पगों वालों को मत मार।
Do not kill those animals which yield wool like sheep-goat, Yalk, camel. Do not kill four legged animals. Do not kill birds. Do not kill two legged.  
न कि देवा इनीमसि न क्या योपयामसि। मन्त्रश्रुत्यं चरामसि॥ [सामवेद 2.7]
देवों! हम हिंसा नहीं करते और न ही ऐसा अनुष्ठान करते हैं, वेद मंत्र के आदेशानुसार आचरण करते हैं।
O demigods-deities! We do not resort to violence and do not make ritualistic ceremonies involving these killings. We act in accordance with the Veds-scriptures.
यः पौरुषेयेण क्रविषा समंक्ते यो अश्व्येन पशुना यातुधानः। 
यो अध्न्याया भरति क्षीरमग्ने तेषां शीर्षाणि हरसापि वृश्च॥[ऋग्वेद]  
जो राक्षस मनुष्य, घोड़े और गाय खाता हो तथा गाय के दूध को चुरा लेता उसका मस्तक काट डालो। 
The Rig Ved orders the cutting of the head of the demon-monster (humans) who eats humans, cows, horses and steal the milk of the cows. 
"अजेन यष्टव्यम्"   [महाभारत] 
अज के तीन अर्थ हैं :- परमात्मा, अन्न-जिसकी उत्पत्ति के समय का ज्ञान नहीं है और बकरी।
सात्विक प्रवृत्ति वाले ऋषिगण इसका अर्थ निकलते हैं कि अन्न से यज्ञ करना चाहिये। परन्तु राक्षसी प्रवृत्ति वाले हैवान इसका मतलब माँस खाने से निकलते हैं। 
The interpretation by the virtuous is, "make use of food grains for holy sacrifices in fire, donations". One with demonic tendency says, "eat meat". 
संस्कृत में "शब्दा कामधेनवः" का अर्थ है, अनन्त अर्थ। अतः किस अर्थ को कहाँ  है यह तो विद्वान ही निश्चित कर सकता है। 
There are numerous words in Sanskrat (in Hindi & English as well) which have numerous meanings. Its only the learned who would use the appropriate-correct meaning not the ignorant. 
एक व्यक्ति यात्रा पर जाने के लिये सैन्धव लाने को कहता है तो सवारी के लिये घोड़ा लाना है न कि खाने के लिये नमक। 
If some one ask to bring Saendhav he asks for horse to ride not salt to eat.
औषधि-दवा बनाने के लिये "प्रस्थं कुमारिकामांसम्" चाहिये तो सेर भर घीकुमारी, घीकुआँरका या घृतकुमारी की बात की जाती है ना कि कुमारी कन्या के एक सेर माँस-गोस्त की। 
If one needs one ser (nearly one kilogram) of "Ghrat Kumari" an Ayur Vedic medicine-herb, he do not asks for the flesh-meat of an unmarried-virgin girl.
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यज्ञ में पशु बाँधने की बात आती है। यहाँ पशु का अर्थ शतपथ ब्राह्मण से स्पष्ट होता है। 
प्रश्न :: "कतमः प्रजापतिः"?  प्रजापति अर्थात पशुओं का पालन करने वाला कौन है?
उत्तर :- "पशुरिति" अर्थात पशु ही प्रजापालक है। अर्थात जो शक्तियाँ या पदार्थ प्रजा का पालन-पोषण करने वाले हैं, उन्हें ही पशु कहा गया है। इसीलिये यज्ञों में विभिन्न प्रकार के पशुओं की चर्चा की गई है। 
"नृणा व्रीहिमय: पशुः" अर्थात मनुष्यों के यज्ञ में अन्नमय पशु का उपयोग होता आया है। 
"यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा:" अर्थात देवताओं ने यज्ञ से ही यज्ञ किया था। उनका यज्ञमय पशु था। 
"अग्निः पशुरासीत्तं देवा अलभन्त" अर्थात अग्नि ही पशु था, उसी को देवता प्राप्त हुए। 
"अग्निः पशुरासीत्तेनायजन्त। वायुः पशुरासीत्तेनायजन्त। सूर्यः पशुरासीत्तेनायजन्त"। [यास्काचार्य-निरुक्त] अर्थात  अग्नि, वायु और सूर्य को भी पशु कहा गया है।
"अबधनन् पुरुषं  पशुम्" यहाँ पशु को ही पुरुष कहा गया है।  
"सप्तास्यासन् परिधय स्त्रि:सप्त समिधः कृता:" अर्थात (1). शरीरगत सात धातु ही सात परिधि हैं और पाँच ज्ञानेन्द्रिय, दस प्राण और एक मन; ये इक्कीस समिधाएँ है। इनको लेकर ही आत्मा रूपी पुरुष से देवताओं ने शरीर यज्ञ किया। इस सबके सहयोग से ही मानव-शरीर की सम्यक्  सृष्टि हुई। (2). संगीत में सात स्वर ही सात परिधि और इक्कीस मूर्छनाएँ ही समिधाएँ हैं। नाद ही यहाँ पशु है। 
These illustrations are sufficient to prove that one has to select appropriate meaning, while interpreting. In all these Shloks the word Pashu is used which literally mean animal. But in real sense it meant (1). nurturer, (2). food grain, (3). humans, (4). fire, air and the Sun.
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The religion which orders-doctrine against violence, sacrifice of animals-humans is against meat eating. However, it enforces punishment in the form of death and cutting of limbs of the guilty, murderers, invaders, terrorist by the state police, forces, law. It ask for punishment-killing of those who kill humans in the name of Jihad.
सती प्रथा :: Hinduism do not advocate woman self immolation with the dead body of her husband. Some instances are there which are purely voluntary. Mata Sati immolated her in Yogic-divine fire and her husband Bhagwan Shiv is still present.
Hinduism is against self immolation, burning, selling of women. It gives highest honour to the women in the society.
***Eating meat invites various communicable diseases carried by the animals & birds. There is not even a single year when millions of people do not die, due to this single reason. Bird flue & meningitis are the most common-dreaded diseases. The stomach of animals like cow, pig are infested with worms as a primary host. This is one of the reasons that religion describe it as a taboo-sin to protect the innocent people. High blood pressure, sugar, anaemia, heart attack too are caused by eating of flesh, meat, eggs, fish etc. There are the people who advocate non cruelty against animals and yet eat meat-eggs. Hindu scriptures preach sacrifice which is restricted to sweets, grains, herbs, oils, ghee, scents, fruits. Meat & non vegetarian products are taboo.
नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित्। 
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्॥मनुस्मृति 5.48

जीवों की हिंसा बिना किये माँस उत्पन्न नहीं हो सकता। पशुओं का वध स्वर्ग प्राप्तयर्थ नहीं होता, इसलिये माँस खाना छोड़ देना चाहिये।  
Meat can not be obtained without killing animals. Its detrimental to the attainment of heavenly bliss. Hence one must not eat meat.
This is very clear verdict of the Veds. More than 45% of Britishers have stopped eating meat during the last 20 years after learning the scientific evidence of its harmful effects.  comes to meningitis-a brain disease humans from the cow. Several viral diseases & flue originate in birds. Primary host of Tape worms are pigs and cow. Most of the birds eat insects which transmit harmful microbes, germs, viruses, bacteria, fungus etc.  in the body of eaters.
समुत्पत्तिं च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम्। 
प्रसमीक्ष्य निवर्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात्॥मनुस्मृति 5.49
माँस के उत्पत्ति का और जीवों के वध-बन्धन को अच्छी तरह सोच समझकर, सब प्रकार के माँस भक्षण को त्याग देना चाहिये। 
One must reject eating of all sorts of meat by realising-understanding the origin of meat and bonding due to the killing of animals for meat.
The wise would quickly understand the implications of eating meat. It leads to acquisition of several incurable diseases leading to death and bonding of the soul for several reincarnations as inferior organisms.
न भक्षयति यो मांसं विधिं हित्वा पिशाचवत्। 
न लोके प्रियतां याति व्याधिभिश्च न पीड्यते॥मनुस्मृति 5.50
जो विधि को छोड़कर पिशाच की तरह माँस नहीं खाता वह संसार में सबका प्यारा होता है और रोग से पीड़ित नहीं होता। 
One who do not eat like a ghoul and follow the verdict given above becomes  a person revered-liked by all and do not fall ill.
पिशाच :: शवभोजी, प्रेत, भूत, हौवा, दुष्टआत्मा; ghoul, boggard, boggle, eidolon, gnome-a two legged creature which survives on meat comparable to Dracula, giants or demons.
अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी। संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातकाः॥मनुस्मृति 5.51
मारने की आज्ञा देने वाला, उसके खण्ड-खण्ड करने वाला, मारने वाला, बेचने और मोल लेने वाला, पकाने वाला, परोसने वाला और खाने वाला-ये आठों ही घातक-गुनहगार हैं। 
All the 8 categories of people i.e., who orders killing-slaughter, who cut-chop it into pieces, the butcher-killer, seller, buyer, cook, who serves the meat and one who eats meat, are guilty.
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः। आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिहमनुस्मृति 6.49
सदा आत्मा के ही चिन्तन में लगा रहे। विषयों की इच्छा रहित, निरामिष होकर, एक देहमात्र की सहायता से मोक्ष का अभिलाषी होकर संसार में विचरे। 
One should be busy in the meditation of the soul (the Ultimate), never crave for comforts, become pure vegetarian and make use of the body for the sake of Salvation only.
अग्ने यं यज्ञमध्वरं विश्वत: परिभूरसि। स इद्देवेषु गच्छति॥ऋग्वेद संहिता 1.1.4॥[अग्नि सूक्त]
हे अग्निदेव। आप सबका रक्षण करने मे समर्थ है। आप जिस अध्वर (हिंसा रहित यज्ञ) को सभी ओर से आवृत किये रहते हैं, वही यज्ञ देवताओं तक पहुँचता है।  
Hey Agni Dev! You are capable of protecting everyone. You keep on surrounding the Hawan Kund-sacrificial free from violence (Animal sacrifice, meat) pot from all sides. These offerings reach the demigods-deities through you.
This verse clearly states that the Yagy, Hawan, Agni Hotr does not allow animal sacrifice, eating of meat.
Rig Ved prohibits sacrifice of animals, birds, humans.[ऋगवेद 5.51.12] It asks the ruler to extradite-expel the meat eaters from the kingdom.[ऋगवेद 8.101.15]
Atharv Ved desires the protection of animals.[अथर्ववेद 19.48.5]. It asks for the punishment to the violent.[अथर्ववेद 8.3.16]
Yajur Ved forbade killing of any organism and teaches non violence. [यजुर्वेद 12.32, 16.3]
Bhagwan Ram was a pure vegetarian.[सुंदर कांड स्कन्द 36 श्लोक 41]
Meat, fish, eggs are not meant for humans. The formation of the teeth of humans clearly shows that they are different from cannibals-canine animals. The length of cannibals intestine is 20 feet as compared to that of herbivorous and humans. the length of the intestine is just 14 feet. Animals roam 40 to 120 kilometres in a day, consume red meat; while humans eat cooked meat and do not walk at all. Animals and humans both suffer from common disease. Animals are carriers of diseases, worms, germs, virus, bacteria, fungus, protozoan’s etc. They are found to spread brain fever, flue, plague chicken pox etc. Eating Beef or Pork invite infestation by parasites-worms.
श्मशान के धुएं का सेवन :- श्मशान में शवों का दाह संस्कार किया जाता है। शरीर के मृत होते ही उस पर अनेक प्रकार के बैक्टीरिया व वायरसों का संक्रमण हो जाता है। ऐसे न जाने कितने शवों को प्रतिदिन श्मशान लाकर जलाया जाता है। जब इन शवों का दाह संस्कार किया जाता है, तब कुछ बैक्टीरिया-वायरस तो शव के साथ ही नष्ट हो जाते हैं और कुछ वायुमंडल में धुँए के साथ फैल जाते हैं। जब कोई व्यक्ति उस धुँए के संपर्क में आता है, तो ये बैक्टीरिया-वायरस उसके शरीर से चिपक जाते हैं और विभिन्न प्रकार के रोग फैलाते हैं। इन रोगों से मनुष्य की आयु कम हो सकती है।
One must avoid the smoke coming out of the funeral pyre, since the dead body had numerous germs, virus, bacteria, microbes which rise in the air and affect his health. Water from the wells near the grave yards must be avoided since germs, viruses penetrate the earth with rainy water.
शुष्क माँस का सेवन :- शुष्क यानी सूखे हुए माँस का सेवन करने से भी मनुष्यों की आयु कम होती है। सूखे माँस से यहाँ तात्पर्य है बासी या कुछ दिन पुराना माँस। जब माँस कुछ दिन पुराना हो जाता है तो वह सूख जाता है और उस पर कई प्रकार के खतरनाक बैक्टीरिया व वायरसों का संक्रमण हो जाता है। जब कोई व्यक्ति यह माँस खाता है तो माँस के साथ बैक्टीरिया तथा वायरस भी उसके पेट में चले जाते हैं और कई प्रकार के रोग उत्पन्न करते हैं। ये रोग मनुष्य की आयु कम करते हैं।
Only raw meat is fresh. Meat kept for some hours becomes stale and numerous germs, virus, fungus, microbes, algae are sure to contaminate it. Meat start decaying as soon as an animal is butchered. packed, tinned-canned, frozen, Smoked or dry meat too has numerous infectants. 
For further knowledge please refer to :: SATI SYSTEM & WIDOW REMARRIAGE सती प्रथा और विधवा विवाह over bhartiyshiksha.blogspot.com
Contd. 








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