Monday, December 7, 2015

नवधा भक्ति


नवधा भक्ति 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh  Bhardwaj  
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शबरी को उसकी योगाग्नि से हरिपद लीन होने से पहले प्रभु राम ने शबरी को नवधाभक्ति के अनमोल वचन दिए। प्रभु  सदैव भाव के भूखे हैं और अन्तर की प्रीति पर रीझते हैं ।
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं। प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। 
पहली भक्ति है संतों का सत्संग। 
दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम। 
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥
तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा। 
चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें। 
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा; पंचम भजन सो बेद प्रकासा। छठ दम सील बिरति बहु करम; निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
मेरे (-राम नाम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है।
छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (-अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (-आचरण) में लगे रहना। 
सातवँ सम मोहि मय जग देखा; मोतें संत अधिक करि लेखा। आठवँ जथालाभ संतोषा; सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥
सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (-राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। 
आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना। 
नवम सरल सब सन छलहीना; मम भरोस हियँ हरष न दीना। नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई; नारि पुरुष सचराचर कोई॥
नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो। 
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें; सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें। जोगि बृंद दुरलभ गति जोई; तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥
हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है। 

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