Monday, December 7, 2015

9 FORMS OF WORSHIP नवधा भक्ति

9 FORMS OF WORSHIP नवधा भक्ति
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj 
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9 प्रकार की भक्ति ::
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
श्रवण (परीक्षित), कीर्तन (शुकदेव), स्मरण (प्रह्लाद), पादसेवन (लक्ष्मी), अर्चन (पृथुराजा), वंदन (अक्रूर), दास्य (हनुमान), सख्य (सुदामा, अर्जुन) और आत्मनिवेदन (बलि राजा) का द्वारा इनका पालन किया गया। 
श्रवण :: ईश्वर की लीला, कथा, महत्व, शक्ति, स्त्रोत इत्यादि को परम श्रद्धा सहित अतृप्त मन से निरंतर सुनना।
कीर्तन :: ईश्वर के गुण, चरित्र, नाम, पराक्रम आदि का आनंद एवं उत्साह के साथ कीर्तन करना।
स्मरण :: निरंतर अनन्य भाव से परमेश्वर का स्मरण करना, उनके महात्म्य और शक्ति का स्मरण कर उस पर मुग्ध होना। कंस भगवान् श्री कृष्ण का निरन्तर स्मरण शत्रु भाव से करता था और यही उसकी मुक्ति का कारण बना। 
पाद सेवन :: ईश्वर के चरणों का आश्रय लेना और उन्हीं को अपना सर्वस्य समझना।
अर्चन :: मन, वचन और कर्म द्वारा पवित्र सामग्री से ईश्वर के चरणों का पूजन करना।
वंदन :: भगवान की मूर्ति को अथवा भगवान के अंश रूप में व्याप्त भक्तजन, आचार्य, ब्राह्मण, गुरूजन, माता- पिता आदि को परम आदर सत्कार के साथ पवित्र भाव से नमस्कार करना या उनकी सेवा करना।
दास्य :: ईश्वर को स्वामी और अपने को दास समझकर परम श्रद्धा के साथ सेवा करना।
सख्य :: ईश्वर को ही अपना परम मित्र समझकर अपना सर्वस्व उसे समर्पण कर देना तथा सच्चे भाव से अपने पाप पुण्य का निवेदन करना। अर्जुन और सुदामा की भक्ति में सख्य भाव था। 
आत्म निवेदन :: अपने आपको भगवान के चरणों में सदा के लिए समर्पण कर देना और कुछ भी अपनी स्वतंत्र सत्ता न रखना। यह भक्ति की सबसे उत्तम अवस्था मानी गई।
प्रभु राम शबरी संवाद :: शबरी को उसकी योगाग्नि से हरिपद लीन होने से पहले प्रभु राम ने शबरी को नवधा भक्ति के अनमोल वचन दिए। प्रभु  सदैव भाव के भूखे हैं और अन्तर की प्रीति पर रीझते हैं ।
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं। 
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। 
पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम। 
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। 
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥
तीसरी भक्ति है, अभिमान रहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा। चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़ कर मेरे गुण समूहों का गान करें। 
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा; पंचम भजन सो बेद प्रकासा। 
छठ दम सील बिरति बहु करम; निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
मेरे (राम नाम) मंत्र का जाप और मुझ में दृढ़ विश्वास, यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना। 
सातवँ सम मोहि मय जग देखा; मोतें संत अधिक करि लेखा। 
आठवँ जथालाभ संतोषा; सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥
सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को सम भाव से मुझ में ओत प्रोत (राम मय) देखना और संतों को मुझ से भी अधिक करके मानना। 
आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना। 
नवम सरल सब सन छलहीना; मम भरोस हियँ हरष न दीना। 
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई; नारि पुरुष सचराचर कोई॥
नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपट रहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके पास एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो, उसका कल्याण हो जाता है। 
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें; सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें। 
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई; तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥
हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अत एव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है। 

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