Friday, November 13, 2015

SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (18.7) श्रीमद् भगवद्गीता सप्तमोSध्याय:

‎SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (18.7) श्रीमद् भगवद्गीता सप्तमोSध्याय:
श्रीभगवानुवाच :- मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥7-1॥
श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझ में आसक्त चित्त तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगे हुए तुम जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशय रहित जानोगे, उसको सुनो। 
मनुष्य को इस प्रकार का होना चाहिए कि उसका चित्त-मन पूरी तरह प्रभु के आधीन हो जाये। उसे सदैव परमात्मा का स्मरण बना रहे। उसकी शरीर, आराम, आदर-सत्कार, स्पर्श, रूप, रस, गंध, बड़ाई के प्रति आसक्ति-रूचि न रहे। उसकी नीयत सच्ची हो और वह परमात्मा को सब जगह, सब पदार्थों में महसूस करे। उसे केवल प्रभु का ही आश्रय, विश्वास, सहारा हो। वह भगवान् के साथ अपना अभिन्न सम्बन्ध माने। सिद्धि-असिद्धि में सम रहे, जप, ध्यान, कीर्तन, करता रहे और निरंतर प्रभु की लीलाओं का स्मरण-श्रवण-चिंतन करता रहे। उसका मन सश्य रहित, साकार-निराकार, सगुण-निर्गुण, अवतार-अवतारी और भगवान् के विभिन्न रूपों यथा शिव, गणेश, सूर्य, विष्णु आदि का ज्ञान  रखता हो। भगवान् श्री कृष्ण अर्जुन को उस तरह से समझाते हैं, जिस प्रकार वे समझ सकते हैं। भगवान् अर्जुन को अपना समग्र-वृहद रूप प्रदर्शित करते हैं।
Bhagwan Shri Krashn asked Arjun to listen to the procedure to understand-identified by one full of extreme love for HIM & who is practicing Yog, with his mind intent on HIM and finding refuge in HIM-the soul of every creature with characteristics-qualities, powers, amenities without doubts-confusion. 
One should be dedicated to the Almighty whole heartedly-completely. He should always remember the God. He should not be inclined to the beautification of his body, rest, honor, sensory pleasures etc. His devotion should not be questionable. He should feel the existence of the Almighty every where and in each and every particle. He should feel the shelter-asylum of the God only. He should consider his relationship with the Almighty perennial-continuous-for ever-permanent. He should be neutral to achievements and failures and continue with his prayers through meditation-recitation, listening-remembering him and events pertaining to him. He should be devoted to the different incarnations of the Almighty-Ultimate. He has to remember the various characteristics-qualities, form or formless features of him. He should never doubt the existence of the Almighty. The Almighty tried to explain the intricacies of Salvation with all possible methods to Arjun. He showed his Ultimate exposure-figure-features to him as well.
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥7-2॥
मैं तुम्हारे लिए इस विज्ञान सहित तत्व ज्ञान को सम्पूर्ण तया कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहेगा। 
पूर्वकाल में समग्र-समस्त ज्ञान परमेश्वर ने ब्रह्मा जी को दिया और वह एक से दूसरी पीढ़ी के माध्यम से मनुष्य तक पहुँचा। यहाँ वे स्वयं अर्जुन को योग का मूल तत्व ज्ञान-विज्ञानं स्वयं प्रदान कर रहे हैं, जिसको जानने के बाद जानने को कुछ शेष नहीं रहता। परमेश्वर सम्बन्धी ज्ञान अनंत है। उसमें भी वे केवल उन्हीं बातों की व्यख्या कर रहे हैं, जो प्रमुख-प्रधान हैं। किसी अन्य की अपेक्षा स्वयं प्रदत्त ज्ञान अधिक विश्वसनीय और प्रमाणिक है। क्योंकि सगुण ज्ञान का अंत नहीं है, उसे समझना मनुष्य की बुद्धि के बाहर है विशेषतः तब जबकि उसमें विज्ञान-विशेषता शामिल हो। केवल भगवान् शंकर ही ऐसे ज्ञानी हैं, जो कि इसे कुछ-कुछ समझ पाते हैं।जितना मनुष्य स्वयं को परमेश्वर के आधीन करके समझ पाता है, उसके उद्धार के लिए वही पर्याप्त है। 
I shall describe the gist-nectar-elixir-central idea-theme behind Ttvgyan of the comprehensive Yog, which will explain you every thing connected with this perishable world.
Every time evolution takes place the Almighty transfers the Veds and Ultimate knowledge and science to Brahma Ji, who in turn transfers it to the the living beings, from one generation to another.The difference here is that the gist of Ultimate secrets of Yog are explained to Arjun by the Almighty him self. So, there is no chance of ambiguity or misinterpretation. Arjun can ask questions him self and clear his doubts. His queries are to be corroborated by the Almighty him self. The knowledge is infinite-never ending. The God desired to give main points-gist-theme-central idea-nectar-elixir of it, to Arjun, which would be transferred to the humanity by Bhagwan Ved Vyas there after. Since it is said by the God him self, it is authentic-reliable. The real characteristics of knowledge are beyond the understanding of the humans due to limited intelligence-prudence-memory, especially when it has science added with it. Its only Bhagwan Shankar who could follow-understand a bit of it. When one goes under the shelter-asylum of the Almighty, he is able to grasp a bit of it, which sufficient to grant him Salvation.
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥7-3॥
हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति-सिद्धि-कल्याण के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों-सिद्ध-मुक्त पुरुषों में भी कोई एक मेरे परायण होकर, मुझ को तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है। 
मनुष्य मूल रूप से पशु के रूप में जन्म लेता है, मगर समाज-संगति माँ-बाप, उसे समाज के लिए उपयोगी बनाते हैं। उन करोणों लोगों में से शायद ही कोई होगा जो ऐशो-आराम की अपेक्षा मुक्ति-मोक्ष का प्रयास करता होगा। वह भी केवल प्रेरणा से ही संभव होता है। कुछ लोग पूर्वजन्म के संस्कारों के आधीन स्वतः भगवत-भक्ति में बह जाता है। भारत ही एक मात्र ऐसा देश है, जिसमें मनुष्य इस लोक की बजाय परलोक की चिंता करता है। भोग-संग्रह की प्रवृति मनुष्य में स्वाभाविक है। 84,00,000 योनियों से गुजर कर यह योनि परमात्म प्राप्ति के लिए ही है। तपस्या, योग, साधना, मनुष्य को भगवान् से जोड़ने के लिए हैं। भजन, प्रार्थना, प्राणियों पर दया-मदद भी मुक्ति मार्ग को प्रशस्त करती है। 
From amongest of the Yogis-ascetics having attained enlightenment, who make efforts to assimilate in the Almighty, its hardly one who is able to realize HIM-attains the gist of the Ultimate-Parmatmttv.
A man is born as an animal. He is turned into a human being by the society-parents, teachers, scholar-philosopher.Its very rare to find one who is contemplating to assimilate in the Almighty. Majority of the humans love to have comforts-luxuries-pleasure-passions. There are individuals who crave for Salvation due to the impact of their previous incarnations.India is the only country, where people make efforts to achieve Liberation. Hindus constitute the lot which care for the abodes, after this life. They visit holy places, conduct prayers, rituals, read scriptures-epics, attends religious congregation-conferences, meet holy souls and the liberated. Human body is obtained only after passing through 84,00,000 species.This human body is gift to one to move towards the Almighty. Tapasya, Yog, asceticism, meditation are some of the means to achieve the Ultimate. Social welfare extending help to the needy-poor-down trodden too help in this endeavor.
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥7-4॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥7-5॥
पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश ये पञ्चमहाभूत और मन, बुद्धि तथा अहंकार-इस प्रकार यह आठ प्रकार से विभाजित यह अपरा प्रकृति है, और हे महाबाहो! इस अपरा प्रकृति से भिन्न जीवरूप बनी हुई मेरी परा प्रकृति को जान, जिसके द्वारा यह जगत  धारण किया जाता है। 
परमात्मा की प्रकृति परमात्मा से अलग नहीं है। परमात्मा का अंश होने से जीव भी उससे अलग नहीं है। अपरा से सम्बन्ध होने के कारण ही मनुष्य को प्रकृति कहा गया है। अपरा प्रकृति निकृष्ट, जड़ और परिवर्तन शील है। परा प्रकृति श्रेष्ठ, चेतन और परिवर्तन रहित है।परा प्रकृति ने ही अपरा प्रकृति को धारण कर रखा है। 
Earth, water, fire, air, sky-ether are the basic ingredients, the mind-inner thoughts-ideas, intelligence-Buddhi & the egoism Ahankar-pride; constitutes the eight fold divisions of this impure nature of the infinite past-time immemorial that has elapsed and  in addition to these stands the pure nature of the Almighty which supports this world.
Nature created by the Almighty is not distinguished from the Almighty.The organism too is a component of the Almighty and hence he too is not distinguishable from him.Connection with the impure-contaminated makes the humans a component of the nature. The contaminated nature is inertial-stagnant-lethargic and subject to change. The Para-pure is excellent-Ultimate, is alive and free from change. The Para-pure component of nature has supported the Apara-impure as well. The Almighty explained to Arjun by calling him Maha Baho!that both components of nature were supported by him-i.e., the Para-pure component.
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय।अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥7-6॥
हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणियों के उत्पन्न होने में परा और अपरा-दोनों ही प्रकृतियों का संयोग है। सम्पूर्ण जगत के प्रभव-उद्भव और पराभव-प्रलय का कारण भी मैं ही हूँ। 
समस्त जीवधारी, दैवीय और मैथुनी सृष्टि, स्थावर-जंगम, पेड़-लता, पशु-पक्षी, देवता-दानव, मनुष्य-पशु सभी परमात्मा की परा और अपरा प्रकृति के संयोग से ही उत्पन्न होते हैं। इनमें जो जीव-जीवात्मा है, वो प्रभु का अंश ही है। स्वर्गलोक, मृत्युलोक-पृथ्वी और पाताललोक के समस्त प्राणी भी इसी संयोग से उत्पन्न होते हैं। इन्हें सत्ता, स्फूर्ति परमात्मा से प्राप्त होती है अतः वो ही उद्भव और प्रलय के कारण हैं। इन सबमें जड़ अंश तो परिवर्तनशील है परन्तु चेतन अपरिवर्तनशील और निर्विकार है। इन सबके कारण और कार्य स्वयं भगवान् हैं। 
The Almighty Shri Krashn told Arjun that it was he who was behind the evolution and devastation-dissolution. The Pure-Para & contaminated-Apara constituents intermingled to generate the universe. 
All types of life forms, whether divine or physical, have evolved from the Almighty by the composition of the two components of the nature. The stationery-static-inertial forms as well as demigods, demons, trees, animals are the result of the inter mixing of the two basic components of the Almighty. Out of these two the soul which energize the body, make it alive is the main component of the Almighty. The organisms-residents of heaven, earth and the Patal are created by the intermixing of the Para & the Apara components of the Almighty. He is the root cause behind evolution as well as -destruction-dissolution-devastation. Out of these two basic components, the inertial component is subject to change while the soul always remains intact. The soul which energize the organism is untainted-un smeared-unchanged. The Almighty is the reason-force, behind all these activities-actions.
मत्तः परतरं नान्य-त्किंचिदस्ति धनंजय।मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥7-7॥ 
हे धनंजय! इस जगत का मुझ से भिन्न दूसरा कोई किंचित मात्र भी कारण और कार्य नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ-मेरे में ही ओत-प्रोत है। 
जिस प्रकार माला में मोती गुँथे होते हैं, उसी प्रकार समस्त स्रष्टि परमात्मा से ओतप्रोत है। तात्पर्य यह कि इसका अगला और पिछला सिरा कौन सा है, यह जानना मनुष्य के लिए कठिन है। इस माला को गूँथने की इच्छा रखने वाला-कारण और गूँथने वाला कार्य एकमात्र परमेश्वर ही है। मणिरूप अपरा प्रकृति और धागे के रूप में परा प्रकृति, दोनों में ही परमेश्वर परिपूर्ण हैं। अपरा प्रकृति स्थावर जंगम, जलचर-नभचर, चौदह भुवन, चौरासी लाख योनि जैसे अनन्त रूपों और अनन्त समुदायों में विभक्त है। इन सबको बाँधकर रखने-संचालित करने वाली शक्ति स्वयं परा शक्ति परब्रह्म परमेश्वर भगवान् हैं। 
The almighty Shri Krashn revealed to Dhananjay that this world has no other cause or motive other than me. This world is closely knit like the (-woven as clusters of gems on a string) beads of a rosary in me. 
The manner in which the pearls-beads are linked together, the entire universe is channelized-held together by the Almighty, like the string of the rosary. One who desired to join-knit-connect the whole universe (-Super galaxies, stars, solar systems, nebulae, satellites, planets) is the Almighty him self. The jewels represents the Apra-Prakrti-tainted-contaminated nature and the thread-cord joining them is the Para-Pure uncontaminated nature and both have the Almighty him self linking them. The impure-Apara has all the creatures, whether divine or physical, all the 14 abodes and all the 84,00,000 species in addition to infinite numbers of other constituents divide into infinite categories. The force which channelize-operate them is the Almighty himself.
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥7-8॥  
हे कुन्तीनन्दन अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ। 
भगवान् नारायण जल में ही प्रकट हुए। अगर जल में प्यास बुझाने की ताकत न हो तो वह व्यर्थ है। भौतिक शरीर का दो तिहाई जल ही है। जल में तुष्टि उसका रस है। बगैर प्रकाश के सब कुछ अज्ञात है। पृथ्वी पर सूर्य और चन्द्र प्रकाश प्रदान करते हैं। सारा चराचर उनपर ही निर्भर है। बगैर आकाश के शब्द-ध्वनि उत्पन्न नहीं हो सकती। पुरुष में पौरुष-पुरुषत्व-कुछ करने के भावना न हो तो वो भी व्यर्थ है। तात्पर्य यह कि भौतिक इकाइयों का मूलतत्व जो प्राणी को प्राणवान बनाता है वो परमात्मतत्व ही है। ओंकार-प्रणव वह ध्वनि है जो उत्त्पत्ति के वक्त उत्पन्न हुई और यही ध्वनि वेदों का गूढ़ रहस्य और मूलाधार है। 
Hey Arjun, the might son of Kunti!I am the flavor-relish-extract of water, I am the light in the moon and the sun. I am the syllable Om in all the Veds, sound in the sky-ether, manhood-might-tendency to do-perform in men.
The Almighty-Narayan appeared in water & was called Naar & Narayan is derived from it.The water is essential component of all life forms. The extract of water-the nectar-elixir is the Almighty, which appeared from the ocean which was churned by demons and the demigods.Two third of the body of the living beings constitutes of water. Unless-until one drink water he remain dissatisfied. Light too is essential for various life forms. Light is obtained from the Sun and the Moon to support life. These two too are other forms of the the Almighty, as is described in the scriptures & epics. Nothing can be observed in the absence of light. The space between heavenly bodies is covered by space-ether. Air is essential for producing sound and vocal communication. Omkar-Om-Pranav is the initial sound which was generated-evolved with the creation of the universe & life. It constitutes the central idea-gist of the Veds. These along with the strength-manhood-desire to do-perform are due to the presence of the component of the Almighty in the humans. Basically, in short each and every particle, life forms are replica of the God.
पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ।जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥7-9॥
मैं पृथ्वी में पवित्र गन्ध हूँ  (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध 5 तन्मात्राऍ हैं) और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप मैं हूँ।
5 तन्मात्राएँ जिनसे पृथ्वी उत्त्पन्न हुई है उनमें से एक गंध है। अतः गंध के बिना पृथ्वी कुछ भी  नहीं है। पवित्र तन्मात्रा परमात्मा को प्रदर्शित करती है। अपवित्र गंध-दुर्गन्ध विकृति से उत्तपन्न होती है। अग्नि में तेज है जो उसमे व्याप्त है वही परमात्मा का रूप है। बगैर तेज के अग्नि अर्थहीन है। प्रत्येक प्राणी में जीवन दायिनी शक्ति प्राण स्वयं परमेश्वर ही हैं। बगैर प्राण के जीव निर्जीव है। द्वन्द सहिष्णुता को तप कहा जाता है। परमात्म की प्राप्ति के लिए कितनी ही बाधाएँ -कष्ट आयें उन्हें सहना निर्विकार रहना ही तप है। तप होने से ही साधक तपस्वी है। इसी तप भगवान् अपना रूप  कह रहे हैं। अगर साधक में तप तो वह तपस्वी नहीं है। सृष्टि की रचना में भगवान् ही कर्ता, कारण और कार्य हैं। परा और अपरा भी वही हैं। गंध-तन्मात्रा कारण और पृथ्वी उसका कार्य है। गंध-तन्मात्रा पवित्र की तरह शब्द, स्पर्श, रूप और रस-तन्मात्रा भी पवित्र हैं। 
I am the agreeable odor-smell-scent in the earth and the brilliance-capability to burn in the fire, the vitality in all beings and I am the austerity in the ascetics.
5 basic ingredients from which the earth has evolved are smell, touch, figure, extract-fluid and sound. In the absence of any one of these the earth looses its relevance. The property of having pious scent-smell is the God himself. Foul smell represents impurity-contamination. Fire has the brightness-aura-capacity to burn, which is the Almighty him self. Tej represents energy and capacity to reproduce as well. In the absence of ability to burn; fire is meaningless. The capability to survive-live-vitality is Pran which is the Almighty himself. The ascetic bears all troubles-tortures-difficulties over the strength of Tap-austerity which is the Almighty him self.In the absence of Tap the ascetic is an ordinary man. In this universe the Almighty is the doer, reason and the function himself. He is both Para (-pure) and Apara (-mixed, contaminated, impure) Shakti.
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्।बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥7-10॥
हे अर्जुन! तुम सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जानो। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ। 
समस्त प्राणियों का सनातन बीज कोष मैं ही हूँ। सारी सृष्टि मुझ से ही उत्त्पन्न होती और मुझ में ही  जाती है। मेरे बगैर प्राणी की स्वतंत्र सत्ता है ही नहीं। बीज और जीवात्मा दोनों ही शब्द परमात्मा  द्योतक हैं। कार्य और कारण स्वयं परमेश्वर ही हैं। प्राणियों में जो सर्व श्रेष्ठ है वही परमात्मा का द्योतक है। अगर कोई बुद्धिमान है तो उसमे बुद्धि परमात्मा की प्रतीक और बुद्धिमानों में सर्व श्रेष्ठ स्वयं परब्रह्म परमेश्वर स्वयं हैं। तेज दैवी सम्पत्ति का गुण है। तेज अनेकों अर्थों में आता है परन्तु यहाँ यह अलौकिक आभा-प्रकाश-चमक के लिए आया है।तेजस्वी पुरुषों में अलौकिक तेज़ उनके मुखमण्डल पर दिखाई देने लगता है। 
O Parth, you should know-recognize-identify me as the eternal seed of all that which has happened in the past. I am the intelligence of the intelligent and the brightest amongest the bright -having aura.
The Almighty is the eternal bank of each and every characteristics of those who were born and perished. A souls emerge from him and assimilate in him. No one is independent-capable of doing any thing without HIM. Seed and soul both represent the source-the God. HE is responsible for every act. One who is beyond limits-superb-excellent amongest the physical and divine creations is the Almighty HIM SELF. Intelligence is a reflection of the presence of the God in the organism. One who has the Ultimate intelligence-prudence-memory is the God him self, none else, other than him. Aura is divine and one who is having the Ultimate capabilities-tendencies has brightness over his face. 
[bright-rapid, तेज, द्रुत, वेगवान, dashing, तेज, उतावला, agile, फुर्तीला, चालाक, तेज, festinant, द्रुत, तेज, त्वरक, त्वरित्र, fluently, धाराप्रवाह, धड़ल्ले से, तेज, heady, प्रचंड, नशीला, तेज, उतावला, impetuous, क्रोधी, जोरदार, तेज, प्रचण्ड, mercurial, तेज, क्षणिक बुद्धि, उडनशील, acrimonious, कटु, तीखा, तीक्ष्ण, तेज, penetrating, तीक्ष्ण, चुभनेवाला, तेज, तीव्र, perk, फुर्तीला, तेज, चञ्चल, शोख, ढीठ, piercing, छेदने वाला, तेज, तीक्ष्ण, चुभने वाला, saucy, तेज, तीक्ष्ण, shrill, कर्णवेधी, महीन आवाज का, तेज, sun in splendor, शोभा, तेज, दीप्ति, प्रभा, tej, तेज, warm, गर्म, कुल, उष्ण, तेज, उग्र, mordant, तीखा, चुभनेवाला, तेज, तीव्र, uptake, तेज, समझदार, बुद्धिमान, splendor, वैभव, भव्यता, तेज, प्रताप, शान, चमक, luster, चमक, द्युति, आभा, आलोक, तेज, शोभा, glow, चमक, दीप्ति, तेज, ताव, उज्ज्वलता, लाली, magnificence, महिमा, शान, तेज, प्रताप, धूमधाम, समारोह, heat, गर्मी, ऊष्मा, ताप, गरमी, घाम, तेज, lustrum, तेज, द्युति, lustring, चमक, तेज, द्युति, mettle, उत्साह, प्रकृतितेज, soul, आत्मा, प्राण, जी, जीव, व्यक्ति, तेज, splendor, वैभव, भव्यता, तेज, प्रताप, शान, चमक, luster, चमक, द्युति, आभा, आलोक, तेज, शोभा, brisk, तेज, चालाक, फुर्तीला, चपल, स्फ़ुर्तीकारक]
बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥7-11॥
हे भरत श्रेष्ठ अर्जुन! बलवानों में काम और राग-आसक्ति से रहित बल मैं हूँ और प्राणियों में धर्म-शास्त्र के अनुकूल काम मैं हूँ। 
मनुष्यों में बल धर्म की मर्यादा के अनुकूल राग-आसक्ति-कामनाओं पर विजय और कार्य का सम्पादन है। बल प्राणी मात्र की रक्षा, सहायता के लिए है ना कि सताने-प्रताड़ित करने के लिए। धर्म शास्त्रों, इतिहास और पुराणों में  मनुष्य के कार्य, व्यवहार, आचरण की विस्तृत व्याख्या की गई है। जो बल आसुरी सम्पत्ति से युक्त है, वो निंदनीय-त्याज्य है। काम-संभोग सन्तानोत्पत्ति और वंश परम्परा कायम रखने का विधान है ना कि आनन्द-मौज-मस्ती-दुराचार का साधन। गर्भाधन उचित समय पर होना चाहिए ना कि वक्त-बेवक्त। शास्त्र-विरुद्ध आचरण कष्ट-दुःख परेशानी-रोग में परिणित हो जाता है। संसार से आसक्ति-लगाव नरक का द्वार  है। ब्रह्मचर्य-अनुशासन के ऊपर बहुत जोर-ध्यान दिया गया है। 
Hey Arjun, ablest amongest the descendants of Bharat!I am the strength-power-ability of the mighty-powerful, who is free from desires and attachment. Amongest all organism-creatures, I am passion-sensuality-sexuality favored by the scriptures-epics-Dharm. 
Might is meant for the service, protection, welfare of humanity and other creatures. The king has to perform this duty, since he is the representative of the God. Dharm is thoroughly discussed-described in the scriptures-epics, Veds, Purans and the history of mankind. Any one who possesses this ability-strength-might-valor is icon to God. The might associated with demonic tendencies is taboo, leading to distress, tortures, trouble, diseases and the hells. Passion-sensuality-sexuality is meant for obtaining descendants not for joy, recreation, enjoyment. Each and every activity pertaining to sexual behavior-intercourse is thoroughly explained-discussed in the scriptures. Proper guidelines are available at length for adopting the right path. One-the ignorant who acts against invariably open gates for hell. A lot of stress has been laid over celibacy and discipline life style in the scriptures.
 ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये।मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥7-12॥ 
जितने भी सात्विक, राजसिक और तामस भाव हैं, वे मुझ से ही होते हैं। परन्तु मैं उनमें और वे मुझ में नहीं हैं। 
सृष्टि की उत्तपत्ति, आश्रय, आधार, प्रकाशक स्वयं श्री भगवान् ही हैं। सात्विक, राजसिक और तामसिक भाव अर्थात गुण, पदार्थ और क्रिया उनसे ही उत्त्पन्न हुए हैं। अतः मनुष्य की दृष्टि परमात्मा की ओर होनी चाहिये न कि उसके गुणों की तरफ। गुण प्रकृति के साथ क्रिया करके अपना प्रभाव उत्तपन्न करते हैं। मनुष्य की प्रकृति इन गुणों के अनुरूप ही उसे परमात्मा के करीब अथवा दूर ले जाती है। परमात्मा अविनाशी हैं मगर प्राणी नाशवान। इस दृष्टि से परमात्मा उनमें नहीं हैं। बीज से वृक्ष, पत्ते, डालियाँ, जड़, फूल उत्त्पन्न होते हैं और बीज उनमें नहीं होता। इसी प्रकार परमात्मा बीज रूप में सात्विक, राजसिक और तामसिक गुण में उपस्थित हैं मगर उन भावों में परमात्मा ढूढ़ने से भी नहीं मिलेगा। जिस प्रकार बादल आकाश में उत्तपन्न होकर उसी में विलीन हो जाते हैं और बादल आकाश में रहते हैं मगर आकाश बादलों में नहीं है उसी प्रकार गुण परमात्मा से उत्तपन्न जरूर हुए हैं मगर परमात्मा उनमें नहीं है। अतः मुक्ति-मोक्ष चाहने वाला इन गुणों में न उलझकर अपनी दृष्टि परम ब्रह्म परमेश्वर परम पिता परमात्मा में रखे।
All characteristics viz Satvik, Rajsik and Tamsik evolve from the Almighty. But they are not present in him and he is not present in them.
Almighty has created the life. He nurtures and supports it. All qualities-characteristics-properties like Satvik, Rajsik and Tamsik evolve out of him. These characteristics interact with nature and shows off their impact over the various life forms-species-humans. Almighty is for ever, but the life forms are sure to perish. Whatever is perishable cannot be God. So, its one way traffic. The Almighty do not appear him self in these characteristics though they have evolved out of him. The clouds appear in the sky and disappear in it. Sky-ether is by itself not by virtue of clouds. The seed grows into tree, but leaves, branches and the flowers do not have seeds. One who wish to attain Salvation keep looking towards the Almighty not to his characteristics. The characteristics are various levels of purification which helps one in assimilation in the Ultimate. They are not the Almighty him self. 
त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्।मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥-7-13॥ 
इन तीनों गुण रूप (-सात्त्विक, राजस और तामस) भावों से मोहित होकर यह सारा संसार-प्राणि समुदाय इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता। 
ये तीनों गुण-सात्त्विक, राजसिक और तामसिक मनुष्य में अनेकानेक वृत्तियाँ उत्तपन्न करते हैं। मनुष्य इन वृत्तियों से तादात्म्य उत्तपन्न कर लेता है और मोहित होकर स्वयं को सात्त्विक, राजसिक और तामसिक मान लेता है।मगर यह मानने का प्रयास नहीं करता कि  वो परमात्मा का अंश है।  इस मोह-भ्रमवश वह स्वयं को शरीर-संसार तक सीमित करके ममता, अहंता, स्थापित कर लेता है। हकीकत यह है कि परमात्मा इन गुणों से सर्वथा रहित, असम्बद्ध, निर्लिप्त है। उसमें इन गुणों के परिवर्तन से कोई परिवर्तन नहीं होता। जो इस माया बंधन को काटकर इससे मुक्त हो जाता है, वो परमात्मा को प्राप्त कर सकता है। 
The entire universe is enchanted-deluded by these three basic-root Gun-qualities-characteristics unaware of the existence of the Almighty beyond them as distinct from them and immutable.
The three distinct characters-qualities generate various tendencies in the humans who adjust with them in various ways according to nature-motive-requirements. He limits himself to these three, the body and the world. He does not think beyond them about the creator-nurturer or the destroyer. He does not believe that he is a component of the God. He develops rapport with affections, desires, motives, gains, wealth etc. due to ignorance-delusion. He forgets-prefers to know that the Almighty is beyond these due to enchantment-cast of spell. The Almighty does not change-alter due to these three characters. One who cuts the bonds of affections-allurements of enchantment, enables-qualifies himself for Liberation.
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥7-14॥ 
क्योंकि मेरी यह अलौकिक-दैवी अद्भुत त्रिगुणमयी माया बड़ी दुस्तर-कठिन है। जो पुरुष केवल मेरी ही शरण में होते हैं और निरन्तर मुझको ही भजते हैं, वे इस माया का उल्लंघन कर जाते हैं; अर्थात्‌ संसार से तर जाते हैं। 
सात्विक, राजसिक और तामसिक गुण एक से बढ़कर एक दुस्तर और कठिन हैं। सारी सृष्टि इसी भ्रम जाल में फँसी हुई है बिरला-बिरला ही इसे भेद पाता है। वैसे ये इतनी कठिन भी नहीं है, अगर मनुष्य को परमात्मा का आलम्बन-सहारा हो। ममता, अहंता, कामनाओं से रहित साधक भगवान् की शरण प्राप्त कर लेते हैं और भव सागर सरलता से पार  कर जाते हैं। सरल हृदय, समर्पित परमेश्वर के भक्तों के लिए तो कुछ भी अभेद-कठिन  नहीं है। भगवान् में आस्था, निष्ठा, प्रेम, विश्वास और  प्रभु की शरण मनुष्य को माया से मुक्ति दिलाने में समर्थ हैं। 
The spell-enchantment-illusion of the Almighty consisting of the three basic characteristics is extremely difficult to cross-win. One who is under the asylum-shelter-protection of the God swims across it swiftly-easily and attains Salvation. 
The 3 characteristics of the Almighty are sufficient to confuse-deviate any one. The honest-pure hearted-devoted to him, has no trouble-difficulty to tide over-swim the vast ocean of cause & effect. Its too easy for the one, who sought asylum-shelter-protection under the God. The relinquished, detached or the one who has attained equanimity may find it swift-easy to achieve Liberation. Love, affection, faith, allegiance, devotion, belief in the Almighty is capable-sufficient to grant assimilation in the Ultimate.
न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः।माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥7-15॥ 
माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में महान पाप-नीच कर्म , दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मेरी शरण में नहीं आते। 
जैसे-जैसे कोई मनुष्य बुराई-अपराध के मार्ग पर बढ़ता है, उसका विवेक-ज्ञान सोचने-समझने की शक्ति लुप्त होती चली जाती है और वह पशु से भी निम्न स्तर "नराधम" को प्राप्त कर लेता है। ममता-लोभ-काम-लालच मनुष्य को बेहद ही निम्न स्तर पर पहुँचा देती है। सत्ता का लोभ-लालच मनुष्य को हत्यारा, आतंकवादी, बेईमान, स्वार्थी बना देता है। ऐसे लोगों के लिए धर्म एक मोहरा-औजार बनकर रह जाता है और अन्ततोगत्वा नष्ट हो जाता है। वर्तमान काल में समाज का एक बड़ा धड़ा धर्म-जिहाद के नाम पर हत्याएँ, लूट, डकैती, अपहरण, बलात्कार, स्त्रियों की खरीद-फरोख्त कर रहा है। इन लोगों का अपने तथा कथित धर्म से साथ नाश और नरक जाना निश्चित है। भटका हुआ व्यक्ति धीरे भगवान् से दूर होता चला जाता है। उसके ऊपर माया की काली छाया पड़ने के बाद धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। विगत काल के करोणों-करोणों राजा नर्क की यातना-यन्त्रणा भोग रहे हैं और आगे भी भोगते रहेंगे, क्योंकि उनकी बुद्धि पर न हटने वाला पर्दा पड़ चुका है। भारत में भी तथाकथित धर्म-निरपेक्ष शक्तियाँ शनै-शनै इसी मार्ग पर आगे बढ़ रही हैं। धर्म की राजनीति करने वालों का अन्जाम बुरा ही होगा। 
The deluded with the devilish-demonic character-habits-nature, whose prudence-learning-understanding have been masked by the cast of spell of enchantment-ignorance-illusion of the Almighty and who perform worst possible deeds-sins-vices-evils do not seek shelter under the Almighty. 
As and when a person follows the path of sin-crime-evil-wretchedness, he looses his prudence-intelligence-understanding, power to reason. He is unable to discriminate between right or wrong, fair or foul. His own desires reign supreme and he gradually attains a status much-much lower than an animal. Affections, greed, sex makes him murderer, terrorist, invader, rapist, women trafficker, deceit. The religion becomes a pawn-tool in the hands of such people. The religion which has such followers become irrelevant and collapse ultimately. The fate of these atheists is decided. They have to go the hells and suffer. They are slowly and gradually drifting away from the Almighty. Jihad is a term used by these misguide-misled people.The dark shadow of the Almighty has already cast-taken over-engulfed them. The history describes that billions & billions of kings are languishing in hells. India is passing through a phase, when a big chunk of people is exploiting the term secular for their selfish political motives. Others are not far behind they have patented religion in their name. Needless to forecast their future abode!
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥7-16॥
हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम-पवित्र कर्म करने वाले अर्थार्थी (-सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला), आर्त (-संकट निवारण के लिए भजने वाला), जिज्ञासु (-मेरे को यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला) और ज्ञानी अर्थात;  ऐसे चार प्रकार के मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात मेरी शरण ग्रहण करते हैं। 
सत्य वादी-पवित्र-शुद्ध-ईमानदार-उत्तम चरित्र वाले भक्त जो परमात्मा की शरण ग्रहण करते हैं की चार श्रेणियाँ हैं। मोक्ष मार्ग के अनुयायी मनुष्य यज्ञ-तप, दान-पुण्य, भजन-पूजन, तीर्थ यात्रा, श्रवण-स्वाध्याय : वेद-पुराण-इतिहास आदि नित्य प्रति करते रहते हैं। इसके लिए ह्रदय का शुद्ध-दोष-पाप रहित  होना अत्यावशक है।न्यायोचित स्त्रोत्र से धनोपार्जन वाले पवित्र विचार रखने वाले अपने वर्णाश्रम धर्म में आरूढ़ सज्जन-सरल ह्रदय व्यक्ति परमात्मा का आलम्बन स्वीकार करते हैं। निराश-आर्त-दीन-दुःखी-प्रेषण-संकट ग्रस्त व्यक्ति भी ऐसा ही करते हैं। परमात्मा के प्रेमी भक्त जो उन्हें जानना-समझना चाहते हैं वो शुद्ध ह्रदय-मनोवृति से भगवत सम्बन्धी मूल तत्व-तत्व ज्ञान के अभिलाषी होते हैं। जो ज्ञानी-तत्वज्ञ है वो तो स्वयं को परमात्मा के प्रेम से ओत-प्रोत होकर उसकी शरणागति ग्रहण करके मुक्ति का इन्तज़ार करते हैं। उनकी समस्त कामनाएँ-इच्छाएँ केवल परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर तक ही सीमित हो गई हैं। 
Hey Arjun-The best-ablest amongest the descendants of king Bharat! There are 4 categories of humans who takes shelter-protection-asylum under me, namely: (1). The pious-virtuous-righteous-honest, (2). distressed-facing difficulties-trouble, (3). anxious-curious-desirous who wish to know-identify me and (4). the enlightened-scholars-philosophers.
The pious-honest-truthful-righteous-virtuous humans, who seek asylum under the Almighty have been categorized into 4 groups. Those who visit virtuous places, take a dip in pious holy rivers, go for pilgrimage, visit temples, perform sacrifices, grants donations, adopts charity for the needy, read-listen, adopt-embrace asceticism-celibacy, read or listen to the scriptures-epics-holy books and stories pertaining to the God too qualifies for Salvation. Those who visit holy places must be pure at heart free from enmity-vices-greed etc. There are the people who are suffering from diseases-tortures-shortages-deficit-scarcity-troubles-difficulties, too come to the fore of the Almighty. In addition to these there are the intelligent people who wish to identify the gist-nectar-elixir of the Ultimate, too reach HIM. The enlightened wait till the impact of their fair & foul deeds is neutralized completely. Their desires-wishes-choices are restricted to the God only. They love HIM, pray HIM remember HIM and keep on doing their domestic-essential duties with dedication. What ever they have is offered for the social welfare-cause.
तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥7-17॥ 
उन चारों श्रेणियों के भक्तों में से जो भक्त मुझमें निरन्तर लगा हुआ, अनन्य भक्ति वाला ज्ञानी अर्थात प्रेमी भक्त है वही श्रेष्ठ है; क्योंकि ज्ञानी भक्त को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वो मुझे अत्यन्त प्रिय है। 
परमात्मा को निरन्तर भक्ति में लीन रहने वाला ज्ञानी अत्यंत प्रिय है। परमात्मा की दृष्टि में तत्वज्ञानी, विवेकी भक्त श्रेष्ठ है।वह लौकिक कार्य करते हुए भी किसी अन्य क्रिया में चित्त नहीं लगाता। क्योंकि सभी जीव परमात्मा के अंश हैं, वे सब उसे प्रिय हैं। उनमें से जो उसे निश्छल प्रेम करता है, वो स्वाभाविक रूप से परमात्मा को अत्यन्त प्रिय होगा ही।भक्त और भगवान् में द्वैत का भाव नहीं है। यह प्रेम अद्वैत की स्थिति है। उसका प्रेम अनन्तरस है। प्रेमी भक्त सर्वथा निष्काम है और लौकिक तथा पारलौकिक इच्छाओं से मुक्त है। 
Out of the four categories, the one who is steadfast-enlightened & solemnly devoted to me, knows my basic-abstract form-gist, who loves me, who keeps on remembering me throughout, is loved by me as well.
The Almighty prefers-loves the devotee who knows HIM as the basis of all creations, who is aware of his real character-identity. The enlightened knows Ttvgyan-gist of the God. He performs all activities of daily life-routine but do not develop rapport with them. He is solemnly inclined to the worship-love of the God. His devotion to God is unquestioned-fair-just-pure. Since all creatures are the creations of the Almighty he loves them all. But he reciprocates this to the one who too loves him too.This sort of bond-devotion eliminates the duality between the devotee and the creator. The love generated in the devotee is infinite and free from the boundaries of this abode and other abodes. There is no desire, only true love and nothing else.
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥7-18॥ 

पहले कहे गए सब-के-सब, चारों ही भक्त बड़े उदार-श्रेष्ठ भाव वाले हैं। परन्तु ज्ञानी-प्रेमी तो मेरा साक्षात्‌ स्वरूप ही है-ऐसा मेरा मत है; क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त मुझसे अभिन्न है और उससे श्रेष्ठ-उत्तम दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मुझमें ही दृढ़ता से स्थित है। 
भगवान् का वो ज्ञानी अन्यन्य प्रेमी भक्त जो केवल प्रेमवश-भावुक होकर उसकी आराधना करता है, वही उदार है। उसमें केवल एक कामना शेष है कि परमात्मा में लीन जाये। वो संसार सागर, भोग-विलास, कामना, मोह-माया का त्याग कर चुका है। उसमें किसी प्रकार के ममता शेष नहीं है और वो समता की प्राप्ति भी कर चुका है। उसमें अद्वैतभाव उत्पन्न हो चुका है। सर्वोत्तम गति वह मानी गई है जिसमें भक्त भक्ति के अतिरिक्त मोक्ष-मुक्ति की कामना भी नहीं करता। वह पूरी तरह परमात्मा के प्रति समर्पित है। यही भगवान् में लय होना है।
The devotees of the 4 types described-discussed earlier are very kind hearted & liberal, who excel in every field.  I believe that the enlightened who loves ME, is just like ME. He can not be differentiated from ME and there is no other way of relinquishment better than this, since the steadfast in mind, he resorts to ME alone as the unsurpassed goal.
The devotee who is enlightened-liberal and loves the Almighty is considered to be the Ultimate devotee. No desire-affection-affiliation-bonds are left in him. He has attained equanimity. The worldly temptations no more allure-attract him. He has reached that level where its not possible to distinguish between him and the others & the God either. He is not craving even for salvation-liberation or assimilation in the Almighty. He is fully devoted to the Almighty who has surrendered before HIM. Now there is no distinction between him & the Almighty.
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥7-19॥ 

बहुत जन्मों के अंत के जन्म में अर्थात मानव जन्म में सब कुछ वासुदेव:-परमात्मा ही हैं, यह जानकर जो तत्वदर्शी-ज्ञानी प्रभु की शरण में होता है-परमात्मा को भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। 
मनुष्य योनी 84,00,000 योनियों में से गुजरकर प्राप्त होती है। परमात्मा की शरण में आनेवाले की तो यह अन्तिम योनि-जन्म है। मनुष्य योनि देवताओं और दानवों के लिए भी दुर्लभ है। मनुष्य योनि में आकर भी प्राणी अपने पूर्वजन्म के संस्कारों के वश में अनेकानेक निंदनीय कर्म करता है और पुनः-पुनः नर्क, कीट, कृमि, पशु-पक्षी की योनि प्राप्त करता है। सौभाग्यवश यदि उसे साधु-संतों-महात्माओं की संगत, शास्त्र का ज्ञान-अध्ययन-स्वाध्याय-श्रवण का मौका मिलता है और वह स्वयं को परमात्मा के अनुकूल करने का प्रयास करता है तो वह शनै-शनै मुक्ति-मोक्ष मार्ग का अनुगामी हो जाता है। उसका विवेक, सात्विक विचार, परसेवा, धर्म-कर्म, वर्णश्र्म धर्म का पालन आदि कुछ ऐसे साधन हैं जो उसके पथ प्रदर्शक बन जाते हैं। केवल ज्ञान ही काफ़ी नहीं है। मनुष्य को दृढ़तापूर्वक बुराई को त्यागकर भलाई के मार्ग का अनुशरण करना पड़ता है। मन, वाणी, इन्द्रियाँ, विचार, दृष्टि शरणागति और परमात्मा से प्रेम ये कुछ ऐसे साधन हैं जो उसे वासुदेव से जोड़ने वाले हैं।
Its very hard-rare to find the saints-relinquished-great souls, who come under the shelter of the Almighty after the termination of further incarnations, having attained the gist-Parmatmttv-Ttvgyan, 
One attained the birth-incarnation as a human being only after passing through 84,00,000 species as insects, worms, animals, birds etc. Slowly and gradually he discarded the Tamsik & Rajsik characters and animal-demonic nature. He started efforts as a Yogi-ascetic, having realized the futility of birth & death. He tried to control-channelize his energies into the God without success, initially. But gradually he started experiencing the pull to the divine path. He remembered the God and HE too reciprocated. The drag-pull gained momentum and he started listening-reading the mythological stories of the epics, scriptures, Veds, Purans etc. He visited conferences, sermons, speeches pertaining to the eternal-divinity. Wherever he found himself incompetent he went to the asylum under the Almighty. During the course of his many-many life cycles as a human being, he had the opportunity to gain the company of saints, which guided-helped him further. His prudence, pious intelligence, Satvik nature-thoughts, too helped him. He understood that his firmness-determination for attaining salvation has to be intensified. Ideas, thoughts, speech, sense organs, vision and shelter under the Almighty became guiding principles to connect him with the God. Still he finds himself helpless since sensuality obstruct his pious-virtuous-righteous path. Let the God him grant him success.
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः।तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥7-20॥ 
उन-उन भोगों की कामनाओं द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे मनुष्य अपने स्वभाव-प्रकृति से प्रेरित-नियंत्रित होकर उस-उस अर्थात देवताओं के उन-उन नियमों को धारण करते हुए अन्य देवताओं के शरण हो जाते हैं।  
पन्द्रहवें श्लोक में उन व्यक्तियों का वर्णन था जो माया द्वारा प्रभावित हैं. यहाँ उन लोगों का संदर्भ है जो कि कामनाओं के वश में विभिन्न देवी-देवताओं की शरण में जाते हैं।  देवी-देवतागण एक सीमा से बँधें हैं।  विभिन्न कामनाएँ मनुष्य को अलग-अलग देवी-देवताओं की शरण में ले जाती हैं और पुनरागमन का अनवरत सिलसिला चलता रहता है। मनुष्य जन्म की प्राप्ति परमात्मा की प्राप्ति के लिए उद्यम करने को है न कि इच्छा पूर्ति के लिए। सुख-भोग-आराम तात्कालिक हैं चिरस्थाई नहीं। मनुष्य को अपने विवेक को जाग्रत करना चाहिए और आत्मशुद्धि-मुक्ति-भक्ति-मोक्ष का प्रयास निरंतर-सतत् रूप से करते रहना चाहिए। कामनाओं का त्याग और स्वभाव को परिवर्तित करके भगवत्भक्ति में लगाना ही ध्येय है।
Those humans whose wisdom has been swayed by various desires resort to worship-prayers of various deities-demigods for their fulfillment, follow the particular procedure for their worship and seek shelter under them, leading to unending chain of reincarnations.
Verse-Shlok 15 described the impact of illusion-cast of spell over the human being, which prevents them from Liberation. In this Shlok, the impact of desires and his own nature is discussed. One is bent upon the fulfillment of his various desires for comforts & passions. For this he seek asylum under various deities-demigods, (33,00,00,000 in number) one after another, which keep him struck -tied with the repeated chain of incarnations. He has forgotten that this birth as a human being, is to seek assimilation in the Almighty. He modify his nature, rejects allurements, concentrates his energies into the Almighty and seek shelter under him only and none other than him. One who utilizes his prudence-intelligence, corrects his trajectory attains Salvation.
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥7-21॥
जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता को श्रद्धापूर्वक  पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर-दृढ कर देता हूँ। 
समस्त प्राणी-देवी-देवतागण परमात्मा से ही प्रकट हुए हैं। देवी-देवताओं के कार्य का विभाजन उनकी प्रकृति के अनुरूप है। जो-जो देवी-देवता स्वयं परमात्मा का नित्य-प्रति भजन-स्मरण-ध्यान करते रहते हैं, उनका लय प्रभु में हो जाता है; अन्यथा वे स्वयं पृथ्वी पर लौट आते हैं। मानव स्वरूप में स्वयं भगवान् श्री कृष्ण ने 12 वर्षों तक घोर तपस्या की। भगवान् शिव तो युगों-युगों तक तपस्या में लीन हो जाते हैं। गौ लोकवासी भगवान् श्री कृष्ण ने तो 12,000 दिव्य युगों-युगांतरों तक घोर तपस्या की। भगवान् का स्वभाव बड़ा उदार है। जो माँगो वो मिलता है। भोग-कामना बन्धनकारी और मुक्ति-भक्ति-मोक्ष मार्ग में रुकावट-बेड़ी हैं। जब भी भक्त किसी देवी-देवता की उपासना करता है, तो वो परोक्षरूप में स्वयं भगवान् से अपनी कामना प्रकट करता है। जैसे भक्ति-श्रद्धा वैसा प्रसाद। जिसके प्रति आस्था की है, उसी के लोक में जाना होगा। अन्यानेक लोकों में जाकर फिर वापस लौटना पड़ता है; परन्तु परमात्मा में लीन होने के पश्चात ऐसा नहीं होता। प्राणी और प्रभु में एकरूपता हो जाती है। अगर माँगना ही है, तो वो माँगो जिसे प्राप्त करने के उपरान्त माँगने-लेने-प्राप्त करने को कुछ शेष न रहे। 
The Almighty strengthens the unflinching devotion of the devotee in the particular-specific deity-demigod, who is worshiped by him, under the influence of desires.
The Almighty is very kind & liberal and grants each and every desire. All deities-demigods are his inferior incarnations. One prays to them and gets support from them. The demigods-deities too return to earth after enjoying their tenure as lessor Gods. These lessor Gods too assimilate in the Almighty if they continue their endeavor of asceticism, prayers, devotion, dedication and do their job with full faith, might, valor. Bhagwan Shri Krashn too adopted to asceticism for full 12 years as a human being on earth. Bhagwan Shiv stabilize him self for many-many Yug-Yugantars for the sake of asceticism-meditation-remembering the Ultimate-the Almighty. Bhagwan Shri Krashn did ascetic practices for full 12000 divine Yug-Yugantars. One desires and get it, which is purely bond forming and tying-binding to unending incarnations. When a devotee go to some demigod-deity for the fulfillment of some specific desire-demand, he invariably come to that specific incarnation of the Almighty, who is handling that particular job. This is division of labor. One might be successful in reaching some specific abode like heaven of Indr, from where his return to earth is certain, since Indr too is not forever, his tenure too is fixed. Next Indr, at present demon king Bahu Bali king of Sutal Lok, will not not complete his tenure and move to asceticism-Tapsaya, in between. He will adopt asceticism just to assimilate in the Almighty having discharged his duties. If one has to ask something to the God, why not ask for the Ultimate Bliss. There is nothing beyond the God. Seek him not to return back to earth or some better abode.Please refer to DIVISION OF LABOR AMONGEST DEITIES-DEMIGODS DEITIES:देवगण देवताओं का कार्य विभाजन over HINDUISM (हिन्दुत्व:जीवन की उत्पत्ती ) CHAPTER-(2) :: EVOLUTION OF LIFE
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥7-22॥

उस (-मेरे द्वारा दृढ़ की हुई) श्रद्धा से युक्त होकर वह मनुष्य उस देवता की (-सकाम भाव से) उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है; परन्तु वह कामना-पूर्ति मेरे द्वारा ही विहित की हुई होती है।
कोई भी देवी या देवता अपने आप में परिपूर्ण-सक्षम नहीं हैं। सभी परमात्मा की शक्ति से कार्य करते हैं। सबका अपना कार्य क्षेत्र और दायरा है। जैसे पवन देव-वायु, वरुण देव-जल, भगवान् सूर्य देव-प्रकाश, चन्द्रदेव-औषधि, और माँ शक्ति-प्रकृति का संचालन करते हैं। गणपति विघ्नविनाशक हैं, भगवान् शिव संहारक, धर्म-यम-मृत्यु आदि का संचालन करते हैं। सबको अपने कार्यक्षेत्र में कुशलता-अनुशासन-अनुभव प्राप्त है। यह सिलसिला अनादिकाल से चला आ रहा है और यथावत जारी रहेगा। परमात्मा को छोड़कर अन्य सभी वस्तुएँ, प्राणी पैदा होते और मरते रहेंगे, जब तक कि उनका लय-मोक्ष न हो जाये। ये सभी देवी-देवता प्राणियों पर भगवत्कृपा करते रहते हैं, जो कि भगवान् के द्वारा ही उन्हें प्रदत्त है।
One performs prayers-worship of a particular deity with the faith strengthened-enhanced-empowered by the Almighty but the fact is that the desires of that devotee of the deity too is fulfilled by the Almighty him self. 
None of the deity-demigod-inferior God is capable of granting all that is asked by the humans. They themselves are dependent over the mercy of the Almighty and go to him for the solution-resolving their problems time and again. They have limited powers. Maa Bhagwati better half of the Almighty asked Pawan-deity of air, to move-lift a straw, which he could not. She then asked all the demigods-deities to move it. They all failed. Maa told them that they all were functioning with the strength-power-desire of the HER. Maa Bhagwati too is separated from the Almighty to create the universe as desired by the Almighty. She also obeys HIM. Pawan controls air, Varun controls water, Yam controls death, Bhagwan Shiv controls destruction, Ganesh Ji controls the obstructions, Sun controls light, Moon controls medicines while Brahma Ji controls evolution. This is delegation of powers. All the deities-demigods-lessor Gods are capable in discharging the duties given to them. But some times they do forget their limits and are punished by the God. Their ego is controlled-tuned time and again, as was done to Indr, while protecting the residents of Mathura and Gokul, when Indr went berserk and rained over this region for 7 days. Yam was restrained by Bhagwan Shiv when he was bent upon taking out the soul of Markandey. At the occasion of killing the three demons of Tripur, Bhagwan Shiv was handed over the entire power needed for the purpose. The creatures-organism will keep on taking birth and facing death till they finally merge in the Almighty. The deities just discharge their duty, within the parameters defined by the God.
अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥7-23॥ 

परन्तु उन तुच्छ-अल्प बुद्धि वाले मनुष्यों को उन देवताओं की आराधना का अन्तवाला-नष्ट होने वाला-अस्थाई फल ही मिलता है। देवताओं का पूजन करने वाले देवताओं को और मेरा पूजन करने वाले मुझे प्राप्त होते हैं। 
देवताओं का कार्यकाल सीमित और अस्थाई है। जो उनकी पूजा अर्चना करता है, वो उन्हीं को प्राप्त करता है। क्योंकि देवगण भी नाशवान हैं; अतः उनके द्वारा दिया गया फल-वरदान भी समाप्त होगा ही। हाँ अगर कोई व्यक्ति बगैर किसी कामना-इच्छा के देवी-देवताओं को परमात्मा से अभिन्न मानकर और उनका ही स्वरूप-प्रतिरूप समझकर उनकी पूजा-अर्चना-सेवा करता है, तो उसे अविनाशी फल- भगवत्प्राप्ति हो सकती है। फल की प्राप्ति भगवान् के विधान से और उसका नष्ट होना उसके साथ कामना का संगम है। जिस कार्य में विधि-विधान, नियम-उपनियम, कार्य-कलाप ज्यादा हों, शक्ति का व्यय ज्यादा हो, बन्धन अधिक हों, वो अल्प-हीन बुद्धिवालों का मार्ग है। परमात्मप्राप्ति का मार्ग सुगम, सरल है। मात्र भक्ति, धर्म की मर्यादा का पालन, प्राणी मात्र की निसंकोच मदद, अपने कार्य का निर्वाहन ही काफ़ी है। परमात्मा हर प्राणी को अपना मानते हैं। अतः निकृष्ट से निकृष्ट-घृणित मनुष्य भी परमात्मा की शरण ग्रहण करने पर उन्हें प्राप्त कर ही लेता है। 
Those with limited vision, who worship the deities-demigods-lesser gods gets the reward for praying them which is limited to a fixed life span and those who worship the Almighty obtain the reward which is everlasting.
The tenure and capabilities of the deities are limited-restricted. One who prays them is sure to get their abode or the reward he deserves. Deities themselves are bound to perish at a certain juncture of time. Similarly, the award granted by them is meant for a fixed period of time and bound to collapse. But if one is devoted to a certain deity as a component of the Almighty without any desire-reward, he might be able to swim across the vast ocean of virtues & the sins, birth & the death.The prayers of deities are typical, procedural, methodical and intricate. Slightest possible mistake ruins the efforts and may even lead to adverse results. The prayer-worship of the almighty is simple.Whole hearted devotion to him, asylum under him, serving the needy-weak-poor-deserving, commitment to own work-job is enough. One who care for the Dharm-Varnashram Dharm, is bound to be free from the never ending cycles of birth & death. One who committed himself to the God relinquishes himself even though he is the worst possible sinner. Ultimately, he too is a constituent of the God.
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः।परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥7-24॥ 

बुद्धिहीन पुरुष मेरे परम अविनाशी और सर्वश्रेष्ठ भाव को न जानते हुए अव्यक्त (-मन-इन्द्रियों से परे) मुझ (-सच्चिदानन्दघन परमात्मा) को मनुष्य की भाँति शरीर धारण करने वाला मानते हैं। 
निर्बुद्धि-अविवेकी-ज्ञान शून्य-श्रद्धाहीन मनुष्य, परमात्मा को भी एक सामान्य पैदा होने और मरने वाले व्यक्ति-प्राणी के रूप में देखता है। वह सर्वश्रेष्ठ, सोचने-समझने की सीमा से परे-ऊपर है। वह देश-काल-समय की सीमाओं-प्रभाव से ऊपर है। वह अविनाशी परब्रह्मपरमेश्वर सदा एकरूप, निर्मल, असम्बद्ध है। निर्बुद्धि आम-आदमी देवी-देवताओं को उससे ऊपर मानकर-समझकर उनकी पूजा-अर्चना करते हैं। अविनाशी परमेश्वर समस्त लोकों-ईश्वरों का ईश्वर, प्रकृति का नियामक-संचालक होकर भी बुद्धिहीन-अज्ञानी-शास्त्र ज्ञान रहित, की समझ से परे है। महाभूत :- आकाश, वायु, अग्नि-तेज़, जल तथा पृथ्वी; जो कि विकारी और विनाशी  हैं, स्थूल-साकार और सूक्ष्म-आणविक, दोनों  ही रूपों में हैं। इसी प्रकार परमात्मा साकार और निराकार, सगुण और निर्गुण, व्यक्त और अव्यक्त, लौकिक और अलौकिक-पारलौकिक दोनों ही रूपों-अवस्थाओं में है। 
The foolish-duffers-idiots-imprudent-ignorant consider-regard me as an ordinary-common human being, who takes birth and dies, without realizing that I am the Supreme God-Lord-Almighty-Ultimate-Eternal, who is free from the sequence of birth & death, beyond the reach of senses-thoughts, who is un-immutable-never ending. 
The foolish-duffers-idiots-imprudent-ignorant, illiterate, uneducated, unaware of the Shastr-epics-history; consider-regard the Almighty as an ordinary-common human being, who takes birth and dies.The Almighty is beyond the limits of mind-sense organs, thoughts-ideas of, even the most genius-super intelligent-intellectuals, philosophers, scholars. He is beyond the limits of place & time. He is always pure, content and unattached. The ignorant prays-worship the demigods-deities-lessor-gods considering them to be significant-important and prays them for the fulfillment of their unending desires. Imperishable Par Brahm Parmeshwar-the Almighty is above all abodes, He is the Lord of Lords-Gods. He evolved the nature and controls it, which is beyond the understanding of the ignorant, morons. The 5 basic causes-factors behind evolution, which is destructible-perishable are : Earth, Sky, Fire-tej-energy, Air and Water which are capable of acquiring two forms : the first physical with shape and size and the second nuclear-without definite shape & size. The Almighty is both with physical form and formless, with characters-characteristics-qualities & without them, defined & undefined, pertaining to this universe and other abodes simultaneously.
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः।मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥7-25॥ 

यह जो मूढ़ मनुष्य-समुदाय मुझे अज़ और अविनाशी को ठीक तरह नहीं जानता-मानता, उन सबके सामने अपनी योगमाया से अच्छी तरह छिपा हुआ मैं प्रत्यक्ष नहीं होता (-इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने-मरने वाला समझता है)।
परमात्मा अज़ और अविनाशी, जन्म-मृत्यु से परे है। वह प्रकट होने-अवतार और अन्तर्धान होने की लीला करते हैं। जो प्रभु को जन्मने और मरने वाला मानते हैं, वे मूढ़ हैं। मनुष्य द्वारा स्वयं को शरीर के साथ जोड़ने से उसकी दृष्टि पर आवरण-पर्दा पड़ जाता है। मालिक की योगमाया और मनुष्य की मूढ़ता के कारण संसार से जुड़ा हुआ व्यक्ति उसे अपने समान ही मान लेता है। भगवान् के शरणागत-आश्रित को भगवत बोध होता है क्योंकि भगवान् ने उसका अज्ञान और अपनी माया को उसपर कार्य करने से रोक रखा है। जो निकृष्ट उसे जानना और मानना ही नहीं चाहते, प्रभु उसके समक्ष प्रकट कैसे हों?!अवतारकाल में प्रभु लौकिक दिखने के बावज़ूद अलौकिक ही रहते हैं। भगवान् श्री कृष्ण ने धृतराष्ट्र के दरबार में अपना विशाल-अलौकिक रूप प्रकट भी किया तो दुर्योधन, कर्ण, शकुनि जैसे लोग उसे बाज़ीगरी ही समझते रहे। 
The unborn and imperishable Almighty has covered himself under the shroud-veil-cover (-आवरण, पर्दा) of illusion-Yog Maya (-hypnotic power, cast, spell) and does not manifest to all. 
The unborn and imperishable Almighty is beyond the impact of life & death. He just reveals him self through various incarnations and disappear, like the Sun which comes out of the clouds and disappear or the clouds which form for a few moments in the sky and disappear. Those who consider the God to take birth and die are ignorant-fools-morons. Their intelligence has been shrouded-covered by the illusion Yog Maya-hypnotic power of the God. Such people are always under the cast-spell of the God. One who believes himself to be merely a physical entity-body, is attached with the world-universe firmly and can not break the bonds formed by him in terms of relations, attachments, allurements. For him, the Almighty is one of his group mates. There are the few devoted to HIM, under HIS asylum, who understands the reality and become Liberated. One at the lowest level of knowledge, understanding, prudence never desire to seek HIS divine appearance. God reveals himself just like ordinary humans but in fact HE remain DIVINE in that situation as well. Bhagwan Shri Krashn revealed himself in the court of Dhrat Rashtr while showing his mighty-enormous shape & size, but the ignorant-egoistic like Duryodhan, Karn and Shakuni considered it to be an act of jugglery. Still they felt fear.
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन।भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥7-26॥

हे अर्जुन! जो प्राणी भूतकाल में हो चुके हैं तथा जो वर्तमान में हैं और जो भविष्य में होंगे, उन सब प्राणियों को मैं जानता हूँ; परन्तु मुझे भक्त के सिवाय कोई भी नहीं जानता। 
परमात्मा के लिए भूत, भविष्य और वर्तमान, तीनों ही वर्तमान के समान हैं, क्योंकि उसके सभी कुछ वर्तमान है। वह सभी प्राणियों, घटनाओं का दृष्टा है। उससे कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। उसे सभी कुछ याद है। जो मनुष्य उसे साधारण इन्सानों की तरह जन्म लेने वाला और मरने वाला मानते हैं, वो मूढ़ भला उसे कैसे जान-समझ सकते हैं। उसे केवल समर्पित-सच्चा भक्त ही जान सकता है। भगवान शिव कहते हैं कि वो भी परम-पिता परमेश्वर को कुछ-कुछ ही जानते हैं, पूरी तरह नहीं। परमात्मा सब कुछ जानकर भी मनुष्य को अवसर प्रदान करता है, ताकि वो सुधर जाये और उसकी शरण ग्रहण कर ले। यहाँ मुख्य बात यह है कि प्रभु के लिए भूतकाल या भविष्यकाल सदैव रहें, ऐसा भी नहीं है। अतः उसके लिए वर्तमानकाल भी नष्टप्राय-नश्वर है।अर्थात काल नहीं अपितु प्रभु ही वर्तमान हैं। 
Hey Arjun! I know all those organisms-creatures, who evolved in the past and those who are surviving presently, in addition to those, who will take birth in future, but no one except the devotee knows me.
For the Almighty division of time does not exist. For him every event takes place in the present. He visualizes each ant every event, organism. Nothing is hidden from him. He remembers everything. Those who considers him to be one who takes birth and dies, can never understand him. He can be known only by the devotees. Bhagwan Shiv says that he knows him  a bit but not completely. The God knows each and every activity of the humans, yet give them chance to improve, seek HIS shelter and attain Salvation.This Shlok describes a concept that the past as well future are perishable without leaving behind their marks. It means that time too is collapsible not the God.
इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत।सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥7-27॥

हे भरतवंश में उत्त्पन्न शत्रुतापन अर्जुन! इच्छा-राग और द्वेष से उत्तपन्न होने वाले द्वन्द-मोह से मोहित सम्पूर्ण प्राणी संसार में अनादिकाल से मूढ़ता को-जन्म मरण को प्राप्त हो रहे हैं।
इच्छाएँ और द्वेष मनुष्य के मस्तिष्क में ख़लल-द्वंद-मोह उत्त्पन्न करते हैं। कामनाओं की ये ऐसी दलदल हैं, जिसमें मनुष्य एक बार फंसा तो बाहर निकलना बड़ा मुश्किल है। पुनर्जन्म का मूलभूत कारण कभी खत्म न होने वाली इच्छाएँ हैं, जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती। इस दलदल से वही निकल पाता है, जिसने स्वयं को परमात्मा के आगे समर्पित कर दिया हो। डूबता को तिनके का सहारा बन जाता है, हरी स्मरण। प्रभु की शरण में जाते ही, मोह के बंधन कटने लगते हैं और मुक्ति-मोक्ष का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
Hey Arjun! The tormentor-harasser of the foes born in Bharat dynasty! Desires, attachments, allurements aided by enmity generate-create never ending chain of struggle-problems-tensions-troubles-tortures, affections & illusions in the creatures, which pushes them to imprudence-ignorance-congenital idiocy creating  web of repeated birth & deaths ever since the universe came into existence. Never ending desires create obstacles-disturbance in the thinking process of the humans. Prudence is lost and the individual starts sinking in the swamp of lust, sensuality, sexuality, possessions, wealth, comforts and distances him self from the God. This leads him to unending process of births & deaths, like the spider web. There is no end to desires, which can be reined through the worship, asylum under the God. One who is drowning seeks protection from the smallest possible source like a straw, then why not the Almighty him self. The moment one goes to HIM, his problems starts reducing slowly and gradually bit by bit. Never expect miracles. Sins of billions of births can not be cut over night. Have faith in HIM and the bonds of sins will be cut leading to Liberation-Salvation.
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥7-28॥
परन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्यों के पाप नष्ट हो गए हैं, वे द्वन्द मोह से रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं। परमात्मा ने मानव शरीर की रचना पुण्यकर्म करने के लिए की है न कि भोग-आसक्ति के लिए।
जन्म-जन्मान्तरों की भक्ति-आस्था मनुष्य के पाप की प्रवृति को शनै-शनै नष्ट करने लगती है। वह दृढ निश्चय करके पुण्यकर्मों में मन लगाता है। उसके मन के द्वन्द दूर हो जाते हैं और वह पूर्ण रूप से भगवान् के अधीन हो जाता है। सत्कार्य, वर्णाश्रम धर्म का पालन, भगवत्भक्ति बड़े सरल प्रतीत होने वाले उपाय हैं जो उसे भटकने नहीं देते-द्वन्द मुक्त रखते हैं। द्वन्दों का कोई अन्त नहीं है, समाधान अवश्य है। एक समाधान यह है कि अपना ध्यान केवल और केवल प्रभु की सेवा में लगाये और वो भी दृढ निश्चय के साथ। कोई कितना भी पापी क्यों न हो उसे गाहे-बगाहे अपने स्वरूप परमात्मा की सुध अवश्य ही आती है। अच्छी संगत, धर्म गोष्ठियों में आवागमन भी ऐसा अवसर प्रदान करते हैं, जब वह स्वयं को पाप से दूर कर सकता है। 
Those pious-virtuous-righteous human who have ended-lost all their sins, pray-worship me with firm determination free from all conflicts-allurements-tensions.Birth as a human being makes it clear that one has some pious deeds to his credit. 
Virtuous environment-company of religious nature can slowly but gradually push him towards his own self-the component of God-SOUL, sitting inside him and watching him.This leads to reduction of sins. He is confused because of multiple openings for prayers, faith, rituals, worship, asceticism, meditation, concentration in God, piousity, charity, social welfare, helping the needy-poor-down trodden. He is pulled by various faiths-sects-religious openings, which create conflicts. He has to become a recluse-saint-worker-social activist or else, is not clear to him?! Where should he go, for counselling-guidance?! He can continue with his daily routine along with completing his various duties as a household. He can recite the names of the God side by side while walking or discharging various duties, even bathing and shaving,. How so ever cruel, murderous, criminal one may be, one day or other he will surely remember the Almighty. He is an inseparable entity of the God. Ultimately he can become free from sins and adopt his line of action with firm determination towards the worship-devotion to God.
जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥7-29॥ 
वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्ति पाने के लिये जो मेरे मनुष्य मेरा आश्रय-शरण लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जान जाते हैं। 

परमात्म ज्ञान को समग्र रूप से जानना उसको ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत (-override, elemental spirit) और अधियज्ञ के रूप में जानना है। वृद्धावस्था और मृत्यु से मुक्ति पाने का अर्थ है उसके आने पर किसी प्रकार का कष्ट-भय-दुःख महसूस न करना। जीवन्मुक्त इनसे परेशान नहीं होते क्योंकि ये तो शरीर से बन्धन मुक्ति के साधन हैं। ब्रह्म को जानना उसके स्वरूप निर्गुण-सगुण, साकार-निराकार को जानना है, जो कि मन, बुद्धि और इन्द्रियों का विषय नहीं है,अपितु उसको अपरोक्षरुप से अनुभव करना है। परमात्मतत्व को ज्ञानचक्षु वाला ही जान-समझ सकता है। कर्म को समझना-जानना उसके मर्म को जानना है क्योंकि एक ही क्रिया विभिन्न परिस्थितियों में अलग-अलग अर्थ-फल रखती है। कर्म का भेद जानना भी भी मनुष्य के मुक्ति मार्ग को प्रशस्त करता है क्योंकि वह फिर उसी मार्ग को चुनता है जो भक्ति-मुक्ति दायक है। 
Those who make effort by seeking patronage-asylum under the Almighty to get rid of old age and death, acquaint them selves with the Brahm, complete mythology and the concept of Karm (-action, endeavor). 
Understanding of the gist of the Brahm-Almighty is like knowing him as a whole-one entity. He is the source of mythology-scriptures-history and whole knowledge. He is the spirit behind each & every activity, event, Yagy-sacrifice-rituals etc. Freedom from old age-agility and death is freedom from its fear, pain, sorrow, since its a means to get rid of the old tattered body. One who is detached never bother about it. Old age and death cut the bonds-ties-attachments with the world. Knowing the Almighty as one with a form or from less, with characteristics or without characteristics is not the factor related with mind-intelligence or senses. The eager identifies HIM with the help of his enlightenment-prudence. One can feel-experience HIM every moment with him after reaching this stage. Understanding Karm-deeds, endeavors, actions is a concept which allows one to find its different impact-effect-result-reward in different situations. Same deed shows opposite results depending upon the mentality-intention of the doer. The secret of the Karm opens vistas for the devotee to attain Bhakti-Salvation.
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥7-30॥ 
जो मनुष्य अधिभूत तथा अधिदैव के सहित और अधियज्ञ के सहित मुझे जानते है, वे मुझमें लगे चित्त वाले लोग अन्तकाल में भी मुझे ही जानते हैं अर्थात प्राप्त होते हैं। 
भगवान् श्री कृष्ण का विराट देखकर अर्जुन ने कहा के मैं आप में अधिभूत (अनन्त ब्रह्माण्ड), अधिदैव (-ब्रह्मा जी) और अधियज्ञ (-भगवान् श्री हरि विष्णु) सहित भगवान् शिव और समस्त देवताओं को देख रहा हूँ। अतः तत्वकी दृष्टि से भगवान् श्री कृष्ण ही समग्र भगवान् हैं। अधिभूत भौतिक सृष्टि जिसमें तमोगुण की प्रधानता है स्वतंत्र नहीं है। उसका क्षणमात्र का भी स्थायित्व नहीं है। अधिदैव हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी हैं जिनमें रजोगुण की प्रधानता है। अधियज्ञ भगवान् विष्णु हैं, जो अन्तर्यामी रूप में सब में व्याप्त हैं। जो व्यक्ति समता को प्राप्त हो चुके हैं और भगवान् में ही लगे हुए हैं वे संसार से उपरत होकर अन्तकाल में केवल परमात्मा को ही जानते हैं। वे किसी भी परिस्थिति में कदापि विचलित नहीं होते। 
Those who realize ME in the Adhibhut (-physical region, human conscious), in the Adhidaev (the divine region) and in the Adhi (-Super-Ultimate) Yagy (region of Sacrifice), realize ME even at the time of departure, steadfast in mind.

deviated -perturbed 
Arjun saw the Virat Roop-broad-wide exposure of Bhagwan Shri Krashn and said that he was visualizing the Adhibhut form-Ultimate from constituting of infinite number of universes-representing Tamo Gun, Adhidaev form constituting of the creator Brahma Ji-representing Rajo Gun and the Adhi Yagy form illustrating Bhagwan Vishnu, who is spreaded over all living beings invisibly. The Tamo Guni physical form is grossly unstable and is not free for performing independent activities. Brahma Ji illustrates Rajo Gun responsible for repeated reincarnations. Adhi Yagy Bhagwan Shri Hari Vishnu represents the nurturer who is present in each and every individual-organism-creacher-living being. One who is devoted to the Almighty bears all odds and assimilates in the Almighty having attained equanimity. He is always thinking of the Almighty and nothing else.
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥7॥ 
ॐ तत् सत् ! इस प्रकार ब्रह्मविद्या का योग करवाने वाले शास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता रूपी उपनिषत् में भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद रूपी ज्ञान विज्ञान योग नाम वाला सातवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ। 
Om the  Ultimate  is Truth! This completes the seventh chapter of Shri Mad Bhagwad Gita, an Upanishat to unify one with the Almighty. This seventh chapter depicts the conversation between Bhawan Shri Krashn and Arjun and is named as Knowledge and Science of Yog.








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