Thursday, February 5, 2015

WISDOM सुविचार

WISDOM  सुविचार 
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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स्वर्ग में आनन्द ही आनन्द है, मगर कर्म, मुक्ति-मोक्ष नहीं है, गीता में ज्ञान लेकिन असत्य नहीं है,  दुनिया में सुख, शान्ति, मुक्ति, भक्ति, मोक्ष-परमानन्द भी है, अगर संतोष है। 
राजा भोज  कालीदास संवाद :: 
(1)- दुनिया में भगवान की सर्वश्रेष्ठ रचना :- माँ, 
(2). सर्वश्रेष्ठ फूल :- कपास का फूल,  
(3), सर्वश्र॓ष्ठ सुगंध :- अपने वतन की मिट्टी की,
(4).  सर्वश्र॓ष्ठ मिठास :- वाणी की, 
(5).  सर्वश्रेष्ठ दूध :- माँ  का, 
(6). सबसे से काला :-  कलंक, 
(7).  सबसे भारी :- पाप, 
(8). सबसे सस्ता :- सलाह, 
(9). सबसे महंगा :- सहयोग, 
(10). सबसे कडवा :-सत्य।  
अँगुलियाँ प्रतीक हैं :- (1). कनिष्ठिका (बुध पर्वत) जल तत्व,  (2). अनामिका (सूर्य पर्वत) पृथ्वी तत्व, (3).मध्यमा (शनि पर्वत) आकाश तत्व, (4). तर्जनी (वृहस्पति पर्वत) वायु तत्व और (5). अंगुष्ठ (शुक्र पर्वत) अग्नि तत्व। 
5 जगह हँसना करोड़ों पाप के बराबर है :- श्मशान में, अर्थी के पीछे, शोक में, मन्दिर में
और कथा में बगैर प्रसंग।
स्वधर्म-कर्तव्य, वर्णाश्रम धर्म का पालन, देश भक्ति-देश प्रेम मोक्ष दायक है।  

🚩परिपक्वता :: मनुष्य दूसरों को बदलने का प्रयास करना बंद कर दे और स्वयं को बदलने पर ध्यान केन्द्रित करे। दूसरे जैसे हैं, वैसा ही स्वीकार करें। मनुष्य यह समझे कि प्रत्येक व्यक्ति उसकी सोच अनुसार सही है। व्यक्ति जाने दो का सिद्धांत अनुसरण करे। इंसान रिश्तों से लेने की उम्मीदों को अलग कर दें और केवल देने की सोच रखे। मानव यह समझ ले कि वह जो भी करता है, वह उसकी स्वयं की शांति के लिए है। जब संसार को यह सिद्ध करना बंद कर दें कि स्वयं कितने अधिक बुद्धिमान हैं। दूसरों से उनकी अनावश्यक स्वीकृति लेना बंद कर दे। दूसरों से अपनी-ख़ुद तुलना करना बंद कर दे। स्वयं में शांति का अनुभव करे। जरूरतों और इच्छाओं-चाहतों के बीच का अंतर करने में सक्षम हो जाए और अपनी चाहतो को छोड़ने को तैयार हो जाये। अपनी ख़ुशी को सांसारिक वस्तुओं से जोड़ना बंद कर दे। [आदि शंकराचार्य] 
जीवन में सफलता, सम्पन्नता और अवस्था अपनी तरफ खींचती है।
देव, मनुष्य और असुर-प्रजापति के इन तीन पुत्रों ने पिता प्रजापति के यहाँ ब्रह्मचर्य वास किया। इसके पश्चात प्रजापति ने उन्हैं उपदेश दिया :: हे देवताओ! इन्द्रियों का दमन करो, संग्रह प्रधान मनुष्यो! भोग सामग्री का दान करो, क्रोध-हिंसा प्रधान असुरो! जीवों पर दया करो। 
कुत्ता, गाय शेर या अन्य कोई भी पशु हो, पेट भरने का बाद तुरन्त खाना छोड़ देता है। शेर का पेट भरा हो किसी को कोई नुकसान नहीं पहुँचाता, मगर इन्सान ऐसा प्राणी है, जिसे सब्र-शांति, संतोष, संतुष्टि नहीं है। रिश्वत खाता है बेहिसाब, घोटाले करता है, बेरोक-टोक, किसके लिए करता है, उसे स्वयं पता नहीं। उसका कमाया कौन खायेगा, वह स्वयं नहीं जानता!   
WISDOM :: Its not enough to attain the knowledge-gist of the Almighty-Brahm. One has to control his emotions-passions (sexuality, sensuality, vulgar-evil-viceful thoughts) firmly. The mind deviated in all possible directions which needs firm handling with strong determination. For this one has to concentrate the mind (thought, ideas) in the God. The tide of lust-lasciviousness, is sufficient to sway one at the smallest possible opportunity-chance. So, avoid flirtations.मन का आवेग-आवेश मनुष्य को किसी भी क्षण भटका-भरमा सकता है। विश्वामित्र जैसे ब्रह्मज्ञानी भी इसके शिकार हो गए। सौवीर जैसे महान तपस्वी की जल समाधि मछलियों की सामूहिक क्रीड़ाओं को देखकर भंग हो गई। 
निर्धनता :: यह एक ऐसा अभिश्राप है, जो केवल काहिल, जाहिल, किंकर्तव्य विमूढ़, दूसरों को देखकर जलने वालों को ही सताता है। कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। जब तक अपनी योग्यता के अनुरूप काम नहीं मिलता, तब तक जो भी काम मिले, उसे करो। जो मिलता है, उसका सदुपयोग करो और कुछ बचत भी करो। अपने भाग्य निर्माता खुद बनो। अपनी औकात-सामर्थ-ताकत से बढ़कर, दिखावे के लिए कुछ भी मत करो। भगवान् को कभी दोष मत दो। उसने तुम्हें बुद्धि, हाथ-पैर और सामर्थ्य प्रदान की है। देखना यह है कि तुम उसका इस्तेमाल कैसे करते हो। दुःखी मत हो। इससे हासिल नहीं होने वाला। 
Poverty is a self imposed, inflicted curse. Be strong-bold enough and work hard. Never consider any task inferior or insulting. Whatever you do, do it with full dedication, to your satisfaction & the satisfaction of the employer. Shun laziness. Be active. Avoid begging till you have strength, power, mental ability and capability to do work. Never seek other's help till you can survive without it. Try to help others, but do not expect them to reciprocate. Determine and the poverty is gone. Remember the God, have faith in him and proceed, success will be yours.
धन (5). :: ऐसी चीज खरीदो जो मजबूत, टिकाऊ हो लम्बे समय तक चल सके। मकान, वाहन, अन्य सुख-सुविधाएँ जुटाओ, मगर उनके  गुलाम मत बनो। उनका इस्तेमाल करो,  मगर निर्लिप्त रहकर। किसी  आगे उनका गुणगान मत करो। अपनी समृद्धि का बखान मत करो, हाय लग जायेगी। King Janak is known as relinquished. He had each and every comfort but he was never dependent, involved in them. He is known as Videh. 
धन (4). :: धन का सदुपयोग करो। ये तुम्हारे साथ नहीं जायेगा। माँ-बाप, औलाद, गुरुजनों, समाजसेवा में अपने हाथ से लगाओ। गरीबों की सेवा, जरूरतमंदों की मदद करो; मगर सोच समझकर !
धन (3). :: मेहनत ईमानदारी से कमाया तुम्हारा एक रुपया बेईमान, धोखेबाज, जालसाज, अपराधी के एक लाख से ज्यादा मायने रखता है। 
धन (2). :: अगर धन है तो समाज तुम्हारी कद्र करेगा, अन्यथा नहीं। 
धन (1). :: पूजा-पाठ, तीर्थ, दान-पुण्य, पढ़ाई-लिखाई, घर-मकान, परिवार, पालन-पोषण सभी के लिये धन चाहिये। मेहनत ईमानदारी से कमाया हुआ धन दूसरों के कहने-सुनने से व्यर्थ मत करो। धन के लालची, भ्रष्ट, धोखेबाज धन को मोह-ममता, बन्धन का कारण कहेंगे, क्योंकि वे तुम्हारा धन हड़पना चाहते हैं। ऐसे लोग भाई, बहन, नाते-रिश्तेदार, भगवाधारी, उपदेशक के रूप में तुम्हें बर्गलायेंगे। उन्हें पहचानों और उनसे बचकर अपना रास्ता बनाओ।
कर्ज :: यह एक ऐसा मर्ज है जो इन्सान को नकारा, काहिल बनाता है। यह इस जन्म में तो दुःख देगा ही अगले जन्म-जन्मांतरों में भी पीछा नहीं छोड़ेगा। जब तक चुक नहीं जायेगा, बोझ धोने वाले पशु बनकर पैदा होना होगा। बैंकों, उधार देने वालों के जाल से बचो। कर्ज अपनी सामर्थ्य को तोलकर ही लो ताकि चुकाने में दिक्क्त न हो। एक उधार के चलते दूसरे उधार की मत सोचो। कर्ज लेकर खाने और मारने वाले की कोई इज्जत नहीं होती। 
मितव्ययता (किफ़ायत) :: कृपणता और कँजूसी कभी मत करो; मगर जो भी खर्च करो वह सोच विचार के, वक्त, उत्सव, जरूरत के अनुरूप हो, न कि दिखावे, शौक, फैशन के लिये। फिजूल खर्ची से बचो। जो भी खरीदारी करनी है वो एक साथ कर लो, जिससे बार-बार बाज़ार न जाना पड़े। जरूरत की चीजों को संभालकर, संग्रह करो ताकि वक्त  आये। दान-धर्म भी करो तो सीमा में रहकर। उधार की नौबत न आये इसका ख्याल रखो। कर्ज को मर्ज समझो। 
☝यदि शान्ति से जीना चाहते हो तो युद्ध के लिये तैयार रहो, साहसी बनो, दुःसाहसी नहीं। सफ़ाई चाहते हो तो गन्दगी दूर करते रहो। अच्छी संगति में बुरे लोगों से दूर रहो। 
🐒क्रोध (गुस्सा, रोष fury, rage) का आना स्वाभाविक यदि दुर्व्यवहार, अत्याचार, अनादर, तिरस्कार किया जाये। कई बार दूसरे लोग गुस्सा दिलाने के लियेही उकसाते भड़काते हैं। ऐसी परिस्थिति में मनुष्य को संयम बनाये रखना चाहिये। गुस्सा आ भी जाये तो उसे पीना आना चाहिये। साँप ने साधु की सलाह पर काटना क्या छोड़ा हर कोई उसे पत्थर मारने लगा। काटो भले ही नहीं फुफकारते तो रहो। बगैर सोचे-समझे कोई कदम मत उठाओ। मूर्ख अज्ञानी, उदण्ड, नासमझ बार-बार गुस्सा दिलायेगा। उससे दूर रहना ही उचित है। वैसे तो ऐसे लोग मार खाकर, पिटकर ही सुधरते हैं। 
🎻Solitude is essential for prayers, eating and for progeny. Its possible at home as well. Discard discussions, talks, arguments, shouting with every one. Never rebuke the children while eating. एकांत भजन, भक्ति, चिन्तन-मनन, एकाग्रता में सहायक है। 
Loneliness haunts those who have nothing to do. Keep busy in some activity. Listen to music, watch TV, films, read books-newspaper-magazines, go for outing-walk. There are infinite activities in which one can involve him self. The best way is devote to God and loneliness will turn into bliss.
🐓Sleepless is curable. Keep working through out the day. Involve yourself in social welfare or do something productive. While in bed start reciting some Shlok-Sanskrat verse dedicated to the God i.e., Mantr. Gradually the mind will calm down and will reach the state of rest i.e., sleep.
शिक्षा का अर्थ खाली लिखना-पढ़ना या जोड़-घटा नहीं है। मनुष्य को शिक्षा, समाज के लिये उपयोगी और एक जिम्मेदार नागरिक बनती। स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य व्यक्ति को नौकरी या व्यवसाय के लिये तैयार करना है। शिक्षा मनुष्य में सूझ-बूझ, सही-गलत की पहचान, विचार क्षमता, उचित आचार-विचार, धर्म का पालन, सेवा सिखाती है।  
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🌷 वह प्राणी बहुत भाग्यशाली है, जिसका जन्म मनुष्य योनि में, भारत में, गंगा-यमुना के बीच के क्षेत्र-कर्म भूमि में, कुलीन-सस्कारी-वैदिक ब्राह्मण परिवार में हुआ है। जिसने चारों आश्रमों :- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास के दायित्व का निर्वाह; निहित और विहित कर्म करते हुए, भगवत्भक्ति के साथ पूरा किया है और अंत में उसकी अस्थियों का विसर्जन हर की पौड़ी पर, उसके पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र के द्वारा पूरे विधी-विधान, सम्मान के साथ किया गया है। उसका श्राद्ध भी पूरे विधि-विधान, श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ सम्पन्न हुआ है। 
🌷 कृपणता, कंजूसी किये बगैर औलाद की उचित आवश्यकताएँ पूरी करो। वक्त जरूरत के लिये धन का संचय अवश्य करो, भले ही औलाद आज्ञाकारी, विनम्र हो। ना जाने कब, किस वक्त उसे आड़े वक्त में, पैसे की जरूरत पद जाये। अगर वह कोई नया काम करना चाहता है, उपक्रम लगाना चाहता है, तो पूरी तरह जाँच-पड़ताल करके, अच्छा-बुरा विचार करके उसकी मदद करो। पूत कपूत है तो धन संचय की जरूरत और भी ज्यादा हो जाती है। अपने साथ-साथ उसका भी ख्याल जो रखना है। 
🐪हिन्दु विदेश में जाकर भी अपने संस्कार नहीं भूला। अपनी सभ्यता, संस्कृति को भी साथ ले गया है। पूजा-पाठ, नित्य कर्म, धर्म-कर्म, तीज-त्यौहार भी उसके साथ हैं। उसने मन्दिरों का निर्माण भी किया है। नित्य देव उपासना भी होती है, भजन-कीर्तन भी होता है। अलग-अलग प्रदेशों, बोलियों वाले लोग एक स्थान पर एकत्रित हो जाते हैं और आनन्द लेते हैं। Please refer to :: HINDU PHILOSOPHY (9) हिन्दु दर्शन शास्त्र :- RITES-SANSKAR IN HINDUISM सनातन धर्म में संस्कार bhartiyshiksha.blogspot.com  
🐄माता-पिता से जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे जो कुछ सीखा था, उसमें से ईमानदारी, कर्तव्य-परायणता-कर्मठता-निष्ठा, त्याग-बलिदानऔर सत्य के अलावा सभी कुछ त्याग दिया है। 
एक ही माँ बाप के बच्चे अलगअलग रास्तों पर आगे बढ़ते हैं। घर का वातावरण तो सब के लिए वही है। घर के बाहर का वातावरण भी प्रभाव डालता है। संगति भी अपना असर दिखती है। रास्ते का निर्धारण स्वयं की मनोवृति करती है। 
एक ही गुरु से एक साथ शिक्षा ग्रहण की परन्तु एक अफसर बन गया और दूसरा भटक रहा है। यह ग्रहण करने वाले की मनोवृति पर निर्भर है कि वह क्या, कितना, कैसे किससे ग्रहण करता है। श्रद्धा, लगन और आत्मविश्वास शिष्य को आगे बढ़ते हैं। गुरु केवल मार्ग दर्शक है बढ़ना आपको है। [27.09.2017]
GENERATION GAP :: Grand father & father took birth, when India was not free. One was born in free India and studied in a government school. Progeny went to private school. New avenues-vistas are open for the next generation. New technology, inventions, innovations, researches, developments are taking place and still one do not feel out dated-discarded-obsolete.
🐎लक्ष्य :: जीवन में क्या बनना है, सोच-समझकर, बुजुर्गों से सलाह-मशवरा करके निर्धारित करो। खुद भी सोचो विचार करों। पहले इंजीनियर बनना चाहते थे, अब मैनेजर। पहले IIT से डिग्री ली अब MBA कर रहे हो। तुम्हारा उद्देश्य कम से कम मेहनत में, अधिक से अधिक धन कमाना ही तो है। देश, समाज, माता-पिता की सेवा को स्थान उसमें कहाँ है?! IAS इसलिये बनना चाहते हो, क्योकि उसमें पैसा और पावर दोनों ही हैं, भले हो मिनिस्टर के आगे कुत्ते की तरह दम हिलनी पड़े। विदेश इसलिये जा रहे हो क्योकि घर पर तुम्हारे लायक कोई काम नहीं है। इसी उधेड़-बुन में 60 साल की उम्र आ जायेगी और रिटायर हो जाओगे, तब क्या होगा! ना औलाद साथ होगी, न स्वास्थ्य, न अपना देश, न अपने लोग और ना ही पावर!
💎धन :: मेहनत, ईमानदारी, न्याय पूर्वक धन कमाया भले ही कम हो; पूजा-पाठ के लिये जरूरी है। दान-धर्म में भी यही आवश्यक है।सुख-शाँति, यश भी इसी से मिलते हैं। बच्चों के लालन-पालन में इसका सदुपयोग करने से औलाद अच्छी और लायक बनती है। इसी धन के प्रभाव से लोक और परलोक दोनों सुधरते हैं।  
🐦धर्म :: अपने कर्तव्य-दायित्व का निर्वाह। बच्चों का अपनी हैसियत के अनुरूप लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा, अच्छे संस्कार, अच्छी संगति देना, बुरी संगत से बचाना, उचित मार्ग दर्शन  प्रदान करना, पैरों पर खड़ा करना, अच्छे-बुरे की समझ प्रदान करना-समझाना-आगाह करना। सही बात पर प्रोत्साहित करना। दूसरों के सामने कभी प्रताड़ित नहीं करना। उनकी ढाल बनकर रक्षा करना। अपने माता-पिता, दादा-दादी की समुचित देखभाल-तीमारदारी, जरूरतों को पूरा करना, उनकी भावनाओं की कदर करना, शिक्षाओं का अनुसरण करना और मार्ग दर्शन का सम्मान करना। उनसे कभी कुछ अपेक्षा न करना और अपने बुढ़ापे के लिये पर्याप्त धन-सम्पत्ति सुरक्षित रखना ताकि औलाद के आगे हाथ न पसारना पड़े। 
🐔वस्त्र :: वस्त्र शरीर की सुरक्षा के लिये होते हैं। अनेकों किस्म की बीमारियों से, मात्र ठीक तरह से कपड़े पहनकर, आराम से बचा जा सकता है। पुरुष की अपेक्षा-तुलना में स्त्री का शरीर कोमल, नाजुक और कम प्रतिरोधशील होता है। जरा सी धूप लगने से ही कुम्हला जाता है, काला पड जाता है। बुरी नज़र से बचना है तो ठीक तरीके से शालीनता पूर्वक वस्त्राभूषण धारण करो। 
वचन (2) :: लोक तथा वेदों में तीन प्रकार के वचन उपलब्ध होते हैं, एक तो वह वचन हैं जो तत्काल सुनने में बड़ा ही प्रिय लगता हैं, परन्तु पीछे वह बड़ा ही असत्य तथा अहितकारी होता हैं। दूसरा वह हैं जो आरंभ में बुरा लगता हैं, परन्तु परिणाम में वह सुख-प्रदायी होता हैं। तीसरा वचन, सुनते ही अमृत के समान लगता हैं और सभी कालों में सुख देने वाला होता हैं, सत्य ही उसका सार होता हैं। ऐसा वचन सर्वाधिक श्रेष्ठ तथा सभी के लिए अभीष्ट है। 
🔥साधु :: तुम्हारे आस-पास, नाते-रिश्ते में, यार-दोस्तों में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो कभी अपने आपको, अपने असली रुप, स्वभाव को व्यक्त नहीं करते। गर्म-मिज़ाजी, कम बोलना जैसे आवरण में स्वयं को छुपाये रहते हैं। वे तुम्हारी सभी कमियों को जानते-बुझते हुए भी यह प्रकट नहीं करते कि उन्हें यह सब मालूम है और तुम इसी भ्रम को पाले रहो। 
सुपात्र :: जो अनायास प्रशंसा करे याचक, भांड, चटुकार हो सकता है। उसकी बातों में आने से सिवाय नुकसान, भ्रम और अपने बारे में मिथ्याभिमान के कुछ नहीं होगा। जो व्यक्ति बगैर किसी कारण के झूँठी बुराई करता है, वह हितैषी नहीं हो सकता। उसकी छाया भी अपने घर परिवार पर मत पड़ने दो। जो तुम्हारे सामने दूसरों की बुराई-आलोचना करता है, वो पीठ पीछे तुम्हें भी नहीं बख्शता होगा। अकारण आलोचना करना वाला मूढ़, अज्ञानी ही है; ऐसे आदमी से जितना दूर रहा जाये रहो। जो अपनी गलतियों के बारे में आगाह करे; वो शुभ चिन्तक ही हो सकता है। उधार उसे दो जो लौटने की क्षमता रखता हो, भरोसे के लायक हो और वापस करने की इच्छा रखता हो। सहायता-उपकार उसका करो, जो उसका मूल्य जानता हो। दान उसे दो जो उसका गलत कार्यों में उपयोग न करे। जो व्यक्ति नुक्सान पहुँचा सकता है; उससे दूर ही रहो। सीख-शिक्षा उसे दो जिसे वो अच्छी लगे। मूढ़ या जो व्यक्ति अज्ञानी है; उसे समझाने-बुझाने का प्रयास कभी मत करो। 
👌न्याय :: न्याय धर्म का एक अति आवश्यक अंग है। यह मनुष्य को जीने में मदद करता है। मनुष्य को स्वयं सभी के साथ इन्साफ करना चाहिये तभी स्वयं को न्याय का अधिकार मिलेगा। कलियुग में अधर्म और अन्याय का चोली दामन का साथ है। कोर्ट-कचहरी-अदालत में न्याय इतना महँगा है कि अन्याय लगता है। लड़ते-लड़ते उम्र निकल जायेगी और अगली दो पीढ़ियों तक न्याय का इन्तजार करना पड़ेगा। न्यायाधीश की कुर्सी पर जो बैठा है, सम्भव है, उसने ये पद अन्याय करते हुए दूसरे का हक मार कर लिया हो। एक ही विषय पर तीन जजों के निर्णय पूरी तरह अलग अलग हो सकते हैं। वकील लूट-खसोट करेगा; सो अलग। 
👋ज्ञान :: हिन्दी मनुष्य अ-से अनपढ़ से शुरू करके ज्ञ-से ज्ञानी बनाती है। हिन्दी विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा संस्कृत का जनमानस द्वारा ग्राह्य रूप है। 
🔱वर्तमान :: मनुष्य को वर्तमान में ही जीना चाहिये। भविष्य के सुधार के लिये  विगत-बीते हुए जीवन की कमियों-गलतियों और उपलब्धियों का विश्लेषण करें। बीते हुए समय-काल पर हर वक्त रोना, दिवंगतों के लिये हर वक्त आँसू बहाना, शास्त्र के प्रतिकूल है। भविष्य की योजना चिन्तन-मनन बुजर्गों, बड़े-बूढ़ों, अनुभवी व्यक्तियों और विशेषज्ञों से सलाह-मशवरा करके तैयार करें। जोश में होश बनाये रखें।  जल्दबाजी में कोई निर्णय ने लें। हर कदम सोच-समझकर, नाप-तोलकर उठायें।
भोजन :: लहसुन, प्याज, गाज़र और खुम्बी की प्रकृति तमोगुणी है। लहसुन और प्याज मुँह  में बदबू करते हैं। लहसुन से गैस में बदबू आती है। लहसुन केवल ठंड में, जब तापमान 11 अंश से नीचे आये, प्याज जब भयंकर गर्मी पड़े-लू चले तब,  केवल दवाई के तौर पर सेवन करनी चाहियें। गाजर जातक में वासना का प्रवह बढ़ाकर, प्रजनन शक्ति-पौरुष को कम करती है। इससे शुक्राणुओं और अंडाणुओं की मात्रा में कमी आती है। गाजर के बीज गर्भपात में काम आते हैं। खुम्बी मृत पशुओं और वनस्पति के ऊपर पैदा होने के कारण अखाद्य है। ये चारों ही आलस और आराम तलबी उत्पन्न करते हैं। 
🛀एकान्त :: भोजन-भजन, चिन्तन-मनन, योग-भक्ति, यौन सम्बन्ध एकान्त में ही फलते हैं। भोजन तसल्ली से करो। श्लोक-मंत्रों का जापआहिस्ता-धीरे कम आवाज में करो, चिन्तन-मनन ध्यान लगाकर प्रभु को स्मरण करते हुए करो। सतत-निरन्तर प्रयास-अभ्यास करो, एक न एक दिन सफलता जरूर मिलेगी। 
🛁DESIRES इच्छाएँ, काम-वासनाएँ :: इच्छाओं को कोई नहीं है। एक इच्छा पूरी हुई तो दूसरी तैयार है। मनुष्य की प्रत्येक इच्छा इस जन्म या अगले किसी न किसी जन्म में पूरी अवश्य होगी, यह निश्चित है। जब तक यह सिलसिला जारी रहेगा तब तक मुक्ति-मोक्ष असंभव है। 
औलाद का लालन-पालन :: माता-पिता को चाहिये कि सभी बच्चों के साथ एक समान-संयत व्यवहार करें। एक पर पूरा बोझ-उत्तरदायित्व और दूसरे पर लाड़-प्यार की बौछार ने करें। भाइयों और बहनों की देखभाल के साथ-साथ अपने स्वयं के बच्चों के भविष्य की चिंता भी करें। कहीं ऐसा न हो कि बहन-भाई को तो सब कुछ मिल जाये और खुद के बच्चे उनके टुकड़ों पर पलें। 
🐋SATISFACTION संतोष :: जीवन में खूब कमाया और अपनी उचित जरूरतें, इच्छाएँ भी पूरी कीं। एक आध ऐसी इच्छा भी है जो पूरी नहीं हुई। मगर इससे क्या फर्क पड़ता है। देहावसान तक पर्याप्त धन-साधन-पेंशन है। तो परेशानी कैसी, किसलिए, किसके लिये! औलाद खा कमा रही है। धीरे धीरे मन को परमात्मा के प्रेम-भक्ति में लगाया और प्रार्थना की कि वो भटके नहीं। इसके अलावा और किसी चीज की चाहत नहीं।
Contentment satisfaction in life is essential for each and everyone. More you desire more you get and moves away from the Almighty. Keep the necessities in limits. Too much-plenty of everything is bad. 
🖕COMMITMENT-PROMISE वचन (1) :: It carries no moral values-ethics attached with it, if made under pressure-threat-duress. One is not a sinner if he discards it. Lal Bahadur Shastri was murdered at Tashkent, since the Russians were aware that he will not abide by the treaty signed by him there. Secondly, they wanted to install a puppet government of Nehru family which could wag its tail before them. Had Shastri been alive Lahore would have been with India and Pakistan would have stopped singing Rag Kashmir. 
केवल वही वचन निभाओ जिससे किसी का भला हो। जिस वचन से किसी बेकसूर का अहित हो, उसे कभी मत निबाहो। कोई पाप नहीं लगेगा।
सदुपयोग :: अगर घर अपना है और उसमें स्टोर-भंडारन की सुविधा है तो छोटी से छोटी चीज भी, कभी भी काम आ सकती है, बशर्ते वह अनुपयोगी न हो। जो क्स्तुऐं पूर्ण रुप से अनुपयुक्त-अनुपयोगी हैं, उन्हें घर से निकाल देना ही ठीक है। अगर घर में कीलें, पेंच औजार हैं तो वक्त-वेवक्त बाजार नहीं भागना पड़ेगा। छोटे-मोटे काम, मरम्मत खुद ही की जा सकती है। स्विच, नल का वाल्व, गैस की नॉब बदलना भी आना चाहिये। जहाँ मजदूर-लेबर नहीं मिलती; मिलती है तो उसकी मजदूरी अपनी तन्खा के बराबर है, तो वहाँ तो साफ़ सफाई भी खुद ही करनी पड़ेगी। 
परिवार :: परिवार अमरीका जैसी जगहों में भी पाये जाते हैं, जहाँ पर बड़ों को इज्जत और सम्मान भी मिलता है। उनकी औलाद हजार किलोमीटर की यात्रा करके उनके पास शुक्रवार को पहुँच ही जाती है और पूरे हफ़्ते की जरूरतों की व्यवस्था कर सोमवार को फिर से काम पर लग जाती है। बड़े-बूढ़ों को मान-सम्मान दोगे, उनका ख्याल रखोगे तो तुम्हारे बच्चे भी इस प्रक्रिया को जारी रखेंगे। आखिर एक दिन तम्हें भी उसी श्रेणी में आना है।तुम्हारे बच्चे यह सब देखेंगे तो वे भी इस प्रक्रिया को जारी रखेंगे। दिवंगतों की याद बनाये रखने को पुत्र-पुत्री उनकी इस्तेमाल की गई वस्तुओं को प्यार से सहेजकर रखते हैं। जहाँ सुमति है, वहाँ सुख ही सुख है। जहाँ कुमति है, वहाँ विध्न ही विध्न हैं।
सफलता का शिखर :: मेहनत और ईमानदारी से कमाया गया धन भी चिरस्थाई नहीं होता। जो जितनी मेहनत और ईमानदारी से सफलता के शिखर पर पहुँचता है, वो अपना स्थान बनाये रखता है। जैसे-जैसे व्यक्ति तरक्की करता है, वैसे-वैसे उसके दुश्मनों, आलोचकों, छिद्रान्वेषण करने वालों की तादात दिनों-दिन बढ़ती जाती है। उसे अपना स्थान बनाये रखने के लिये और भी जायदा मेहनत करनी पड़ती है। जरा सी असावधानी उसके करे-धरे पर पानी फेर देती है। जो व्यक्ति जितना ऊपर जाता है वो उतना ही नीचे भी गिरता है, यदि उसने यह ऊँचाई धोखाधड़ी, बेईमानी से हासिल की है। 
DYNAMICS :: One got his degree in soft ware with specialisation in IT. He did not prefer for regular certifications-up gradation of skills in the fast changing world and is not getting desired appraisal, increase in salary. A girl who did not join service immediately after passing her MCA, could not get a suitable job, since the technology had changed in just 2 years.
Earlier one found PCO almost every where and now, none.
Money transfers, payments are made through debit-credit cards or CBS.
Internet is spreading its wings at a super fast pace.
Kodak, HMT, Bajaj scooter, Nokia, Ambassador car, Murphy radio are forgotten, 
TV-PREACHERS :: Its not appreciable to be idealistic in Kali Yug-present cosmic era-epoch. Be pragmatic, realistic but not materialistic. Values, virtues, honesty must be retained. Always pray to the God to protect from the sins. Progress, but not at the cost of morals and own culture. Be aware of TV-Babas, impostors and the fraudulent politicians & businessmen wearing saffron.
गुणवत्ता :: आपके उत्पाद की गुणवत्ता के साथ-साथ उसकी मशहूरी भी है तो उसकी नकल भी जरूर होगी जो कि आपके नाम को खराब करेगी। इसलिए जागरूक रहो, उत्पाद में निरंतर सुधार करो, उससे अगली श्रेणी की प्रक्रिया को जारी रखो, ग्राहक के मिजाज को पहचानो, समय देखकर नया सुधरा हुआ उत्पाद बाजार में उतारो।  नकलचियों से सावधान रहो और उन पर नजर रखने के साथ नकेल भी कसते रहो। फिर भी कोई रास्ता रोके तो डटकर उसका मुकाबला करो। फतह तुम्हारी ही होगी। कीमत हमेशां जायज लो। सरकार को कर पूरा चुकाओ। संचय केवल उतना करो जितने से गुजारा आराम से चलता रहे। भरा-भरी अफरा-तफरी मत करो। इतना जरूर जोड़ो कि मरते वक्त तक किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े, कर्ज न लेना पड़े। जो धन बचे उससे क्रिया कर्म और सस्कार आराम से हो जाये। 
आदर्श :: आदर्शों से पेट नहीं भरता। झूँठे-खोखले आदर्श परिवार का लालन-पालन करने में रस्ते में आते हैं। यह ठीक है कि झूंठ नहीं बोलना, चोरी, हेरा-फेरी, चुगली, नहीं करनी। 
आलोचना :: आलोचनाअच्छी बात है जब तक किसी को व्यर्थ दुःख नहीं पहुँचता। बगैर मतलब किसी की गलती मत निकालो, बुराई मत करो, आलोचना से बचो।
बातचीत :: सीधी, साफ़, स्पष्ट बात बोलने-करने वाले को, लोग कम ही पसंद करते हैं। कड़वी दवाई से हर कोई बचता है, मगर वो लेनी ही पड़ती है। अपनी प्रशंसा हर कोई पसंद करता है, भले ही वो झूठी हो। चमचागीरी, चापलूसी अपना काम निकलवाने को की जाती है और पीठ पीछे इसे उल्लू बनाना कहते हैं। कड़वा सत्य किसी को पसन्द नहीं है। 
अपमान :: घोर अपमान होने पर भी जो लौटकर जबाब न दे, वो (1). बहुत निर्बल-कमजोर, (2).  साधु-संत, महात्मा अन्यथा (3). कूटनीतिज्ञ ही होगा; जो समय-अवसर आने पर अपमान करने वाले को सबक जरूर सिखायेगा-बदला लेगा। सकता है कि कठोर दण्ड ही दे दे। अतः स्वप्न में भी किसी का अपमान मत करो। 
शांत स्वभाव व्यक्ति :: जो शांत रहता है, कम बोलता है, निरपेक्ष है, उस धैर्यशाली को कमजोर समझने की भूल कभी मत करना। हो सकता है, वो कई गुना शक्तिशाली, सामर्थ्यवान, बलशाली, सक्षम हो। 
दुआ :: ईश्वर मुझे भौतिक-आद्यात्मिक, शरीरिक-मानसिक और काम वासनाओं से मुक्ति प्रदान करके अपने श्री चरणों में अन्यन्य प्रेम और भक्ति प्रदान कर। 
प्रण करो कि कभी प्रण-प्रतिज्ञा, वायदा नहीं करोगे। अगर धर्म, घर-परिवार, समाज, देश, निर्दोष के हित में प्रण भंग करना पड़े, कसम तोड़नी पड़े तो बेझिझक तोड़ोगे। 
गलती हर किसी से हो जाती है। समझदार आदमी अपनी गलती समझकर उसे सुधारने में देर नहीं करता। कोई दूसरों को संभलते देखकर संभल जाता है। कोई ठोकर खाकर संभलता है। जिसके भाग्य में दुःख लिखा है वो ठोकर खाकर भी नहीं संभलता। समझाने-बुझाने से  संभलता। 
मानव जन्म अनमोल है। केवल मानव योनि ही ऐसी है जिसमे जन्म लेने को देवता भी तरसते हैं क्योंकि इसमें ही कर्म, परमात्मा की भक्ति-प्रेम संभव है। अन्य सभी योनियाँ कर्म फल के भोग हेतु हैं। देवता मौज-मस्ती, भोग-विलास, राग-रंग में मस्त रहते हैं। राक्षस अत्याचार-दुराचार में लिप्त रहते हैं। तामसिक प्रवृति के व्यक्ति आलस्य, दूषित खान पान में समय नष्ट करते हैं। राजसिक प्रवृति के व्यक्ति अहंकार-मद के शिकार हो जाते हैं। सात्विक प्रवृत्ति का जातक दूसरों की मदद, देखभाल, सहायता करता हुआ अपने धर्म का निर्वाह करता है। दूसरों को देता है लेने की इच्छा नहीं करता है। 
JOINT FAMILY :: Yesterday, one had conversation with a visitor who has one of his colleagues working with him at the age of 73. He him self is 62. His son too, was working with him. The 73 year old has his father and mother with him, who are 95 and 90 years old respectively. His children and grand children are all living together happily. The man though working, has independent business as well. People generally quote that Americans and Australians do not hold their old parents with them. There are instances where the Australians are getting old age pensions and living independently. But it can not be generalised. Good people live at places other than India as well. And there is no dearth of bad people in India. 
🍇अच्छे-भले लोग जहाँ कहीं भी जायेंगे, अच्छे संस्कार लेकर जायेंगे। उनके आने से सुख-शाँति आयेगी। धर्म का प्रवाह होगा। वातावरण सुधरेगा। 
🍒औलाद परदेश में है। उनके बच्चे भी हैं। उनकी दादा-दादी, नाना-नानी से अच्छी देखभाल और कौन कर सकता है?! मगर यदि उन्हें अपने साथ रखना-बुलाना है, तो उनकी जरूरतों को ख्याल भी रखना। उनके मान-सम्मान का ध्यान भी रखना। उनके अहम को ठेस न पहुँचे, यह तुम्हें ही देखना है। उनके लिये वक्त भी निकालना। 
🌻किसी का वक़्त कटता नहीं, किसी के पास वक़्त होता नहीं। वक़्त दिखाई नहीं देता, पर बहुत कुछ दिखा देता है। अपनापन तो हर कोई दिखाता है, पर अपना कौन है, ये वक़्त दिखाता है।अगर यह सीख-समझ लिया है, तो आगे ख्याल रखना। 
💐आपसे सभी व्यक्ति तभी प्रसन्न रह सकते हैं, जब आप उनकी कमियों को न बतायें, नजरंदाज करें उनसे समझौता बनाकर रखेँ। यदि आप सबसे खुश हैं तो ये निश्चित है कि आपने लोगों की बहुत सी ग़लतियों-अपराधों को नजरंदाज किया है। ध्यान रखो कि प्रसन्न करने के चक्कर में तुम्हारा शोषण न हो जाये। बुद्धि, विवेक, सावधानी, सूझबूझ इसीलिये होती है। 
🌺कोई भी व्यक्ति आपके पास तीन कारणों से आता है :: भाव से, अभाव से और प्रभाव से। यदि भाव से आया है तो उसे प्रेम दो,अभाव में आया है और आपकी सामर्थ्य है और वह व्यक्ति मदद के लायक है तो मदद करो और यदि प्रभाव में आया है तो प्रसन्न हो जाओ कि परमात्मा ने आपको इतनी क्षमता दी है, मगर इस बात का गरूर कभी मत करना। इतना ख्याल जरूर करना कि वह तुम्हारा इस्तेमाल, शोषण न कर रहा हो।
पर उपदेश कुशल बहुतेरे। सुनो सबकी करो मन की, सोच-समझकर, अनुभवी लोगों की सलाह लेकर।  
🌷 *सुप्रभात*आपका दिन शुभ एवं मंगलमय हो* 🌷 
MENDING DESTINY प्रारब्ध शुद्धि :: वर्तमान जन्म में मनुष्य को प्रारब्ध, संचित व वर्तमान कर्मों का मिला-जुला फल प्राप्त होता है। तात्पर्य यह कि, यदि मनुष्य चाहे तो, अपने भविष्य को स्वयं निर्धारित कर सकता है। आवश्कता है, केवल द्रढ़ इच्छा शक्ति की। सात्विक-सत कर्म पूर्व जन्मों के, तामसिक व राजसिक कर्मों को शुद्ध कर सकते हैं। राजा बाहु बलि व मार्कंडेय जी इसके उदहारण हैं।  
One can script the deeds of his present birth, through firm determination-faith-purity-asceticism. This birth observes the outcome of destiny, accumulated deeds and the current deeds of present birth. One can easily modify-manipulate the destiny, through devotion to the Almighty-Allah-God. Righteous-virtuous-pious deeds can cleanse the dirt of previous births.
Mighty demon king Bahu Bali (son of Virochan and grandson of Prahlad Ji) and saint-Rishi Markandey Ji are the examples of it. 
FAITH आस्था :: Religiosity and Atheism (a belief that there is no God) are two phenomenon, which act in opposite directions, never to meet. India is a country where, majority of populations constitute of  the followers of Hinduism-The Sanatan Dharm, ancient way of life.  It's a very very liberal community-which has been adopting-modifying it self to  changed circumstances-situations during the last 1,000 years.  Initially internal disturbances, followed by invasion by Muslims and the Britishers. Some of whom were barbaric traitors. This community survived the onslaught and perpetuated as usual and will continue to do so, due to the inbuilt flexibility and moderation.
With the changing world Hindus too have opened up. There was a time when voyage across the ocean was considered to be a taboo. Purification rites were performed to rejoin the main community. Currently there is willingness to move abroad very frequently for tour, job, business and  even to settle there. Each and every one aspire to find out what is happening there-legally and illegally.
The children open their eyes in an environment, where the parents prefer to teach English to the kid in stead of their native language. They become happy when the child recites a nursery rhyme and they proudly make him recite it in front of the friends-visitors. They them selves teach Mummy-Papa, Ta-Ta, Bye-Bye, good morning , good evening, names of fruits, animals , vegetables, objects all around are taught in English, not in vernacular or Hindi. No one is willing to send his child to a Municipality-local body or a government school. Even the Jhuggi-hut, dwellers are seen sending their ward to public schools due to their new found love and craze for English. भाषा का सम्बन्ध पेट से है, न कि धर्म या सभ्यता से। 
The school stresses over the coverage of syllabus-curriculum. There is no place for religion, manners, character, morals, aesthetics in the schools-curriculum, except the ones  which are run by minorities. They too stress over the impracticable tenets of religion not moral education. See the public school girls, having short skirts portraying their love for nudity and the college-university girls, fighting tooth and nail over dress code. There is a steep rise in crime against women, due to vulgarity and undue freedom.
There has been a trend that the poor and the neorich-middle class, follow-copy-imitate what the rich, highly placed officials, businessmen, ministers, film stars are doing. जैसा राजा वैसी प्रजा। The current situation belongs to the youngsters-below 35, who constitute 65% of population, who do not know of their linkage-lineage-caste-Vern, what to talk of religion. They intermingle with one another freely. The present  day governments are bent upon reminding them of their ancestors, for vote bank politics. 
India-Pakistan-Bangla Desh-Indonesia are inhibited by 58 crore converts from Hinduism. These people were lured, enticed-threatened and forced to convert on the edge of sword. They have not forgotten their roots, lineage, caste, Vern and the original-ancestral religion. Hinduism did not open up, when these people deserted for their desire to eat meat, polygamy,  respect-status.  Till today they have not been able to gain respect-status and are treated as aliens. Change of religion does not mean that one has lost faith in the God.
Hindu is not compelled to visit shrines-temples-holy places-holy rivers. He is not under compulsion to donate-charity or to organise Hawan-Yagy-Agnihotr,  unlike others, where dictates are issued every week-fortnight. He attends  all rituals-ceremonies willingly. There is no compulsion either. How ever, it's expected fro him, that  he will become fresh, take a bath, wear washed/new cloths, as and when he has an inclination-desire-mood to visit the temple.  Whether he takes flowers, fruits, sweets, money, cloths for offering or not, is immaterial. His visit to shrines-temples is not that important as the performance of his responsibilities-duties toward work and parents, honestly and regularly is sufficient, to merge him with the Ultimate-Almighty. To be religious, it's not essential to visit shrines.
There are the people who visit temples-shrine for criminal activities like theft, robbery, heist, murders.  By any yard stick they are not religious. They are sinners-in-virtuous people.  Tourists-visitors-masons-carpenters-builders-sculptures-architects-designers-art lovers visit religious places-temples for one or the other region. They too can not be considered to be religious .
Responses-answers to questionnaires-opinionnaires, analysis of sample surveys-data, can not be trusted, unless their motive-objective-desires-aims behind them are clear. Just to say that Atheism is on the rise in India or any where else in the world is unwarranted and a sinful act.
फ़र्ज, मर्ज और कर्ज को मत भूलो ::  जिन्होंने पैदा किया और जिन्हें पैदा करोगे उनके प्रति तुम्हारा फ़र्ज है। माँ-बाप, बूढ़े हो रहे हैं।उनकी देखभाल जरुरी है। बच्चे बड़े हो रहे हैं, उनका पालन पोषण भी जरुरी है। अगर तुम अपने माँ बाप की परवाह नहीं करते तो कैसे उम्मीद करते हो की तुम्हारे बच्चे तुम्हारी परवाह करेंगे। तम्हें अपनी घरवाली की ख़ुशी चाहिये-माँ बाप की नहीं। यह एक मर्ज है; इसे बढ़ने मत दो। अगर बीमारी का इलाज वक्त रहते नहीं किया, तो वह एक दिन जान ले लेगी। तुम्हारे ऊपर माँ बाप का कर्ज है, अगर यह नहीं चुकाया तो, अगले जन्म में बोझ ढ़ोने बल पशु बनोगे। 
Responsibilities are a part of life. They have to be discharged happily. One has responsibilities pertaining to the family, society and the Nation.  Do not consider/let them become, burden.
A stitch in time saves two. Smallest sign of illness-disease needs immediate care-attention.
Loans should be taken only when they are a must and are, with in your capacity to repay. If your current income from all sources, is insufficient go for addition earnings, through part time jobs. Let your spouse take some job. Cut your expanses. Do not opt for credit card-easy money. Make savings for difficult times. Its not difficult. make only those purchases which are essential. In most of the cases loans leads to a miserable life. Rest is up to you.
Always earn money through righteous, virtuous and honest means.
Self Introspection :: Who am I? Minutest-smallest component-unit-cell-molecule of the Almighty, like the droplet in ocean.
What for am I born? Under go the unspent/left over results-outcomes-rewards-punishments-fruits of  innumerable previous births i.e, destiny.
Where have I come from? Its not possible to ascertain, since I had innumerable births before.
What is my identity? No specific indication-information- hunch. It keeps on changing according to the shape-size-species of the present birth. Still there are some sign of Satvik Yog.
What is the goal-target-aim-ambition in my life? To be virtuous-righteous-pious-devotion to God and ultimately attainment of Salvation-PERMANAND.
What am I, up to ? Wish to perform righteous deeds/jobs/functions to improve my destiny, which are Satvik in nature.
What is my duty ? Nothing specific is visible, yet I have adopted myself to this blog writing for the welfare of the devotees of the Ultimate.
What are my deeds in previous birth? A mixture of righteous and evil. It appears that more of it Virtuous-Satvik-Pious.
What is my destiny-based upon innumerable deeds in  innumerable previous lives-births? For some more births I will/may have to be a human being. If the Satvik Karm persists, I may find my path to Salvation-ultimate freedom, ultimately.
What are accumulated deeds in present-current birth: Good/bad, virtuous/evil..? More of Satvik, less of evil.
What will be the impact of my current deeds in present or future rebirths ? It will certainly improve my Karm. In fact its improving.
What are the things which angers/perturbs/disturbs me ? There are people all around, who were/are bend upon moving ahead of others-me, at all costs-most of them, evil. I was reduced to sadness due to the guilt of others-may be destiny. In fact it disheartened me, at times. Still, I prefer to continue with my mission. May be that the success comes, at last by the blessings-goodwill like minded people.
Why do I get perturbed? When pressed too hard-teased-disturbed-tortured by some one, unnecessarily-without visible fault-mistake-guilt-misdeed.
What gives me relief-relaxation peace-solace-tranquillity-pleasure-enjoyment-happiness ? Recitation-reading-listening-prayers-remembering-recollecting the :- Almighty-God-Allah-Khuda-Rab-Ultimate-Permanand.
What makes me unrealistic in life ? High dreams-the goals-desires, which can not be achieved, through legal-genuine-honest-pious-righteous-genuine means.
Why did  I took birth? To under go the fruits-rewards-punishments of innumerable previous births.
What is the reason behind my birth ? It seems that the Almighty wants me to improve the deeds in present birth to Satvik-virtuous-righteous-pious, realize follies of this births and under go/experiences penances with own will and determination.
What will I become after my death? I wish to be a Brahmn in some dignified-virtuous family. There is an understanding that one become what he desires.
Why should I be honest-generous-pious-righteous-virtuous? To get rid of the sins/misdeeds/evils of the past births.
Why should I donate money ? When one donates money earned through pious/righteous/honest means, his quantum of evils-sins-misdeeds is  reduced, to some extent automatically. 
Why do I believe in charity-generosity-donations ? It gives me happiness-pleasure-satisfaction-mental peace.
Am I, doing some thing for the sake of others-society-religion-nation-poor-helpless? If, not Why not ? Yes, if I am correct. My endeavour is free from the desire of rewards/fruits/gains. Charity-charity and charity and the welfare-betterment-progress of mankind towards the Ultimate.
What is the reason behind pain-grief-sorrow in my life ? Own sins-mistakes-blunders, others prejudice/envy/discomfort.
Why should I think of others ? What makes me selfish ? We all are alike. If I do some thing for the one who appears to be different, actually I am doing my own welfare, only.
Why did I take birth in India ? I took birth in the plains between the Holi rivers Ganga and Yamuna which is considered to be the only place on earth where a  pious deed converts into Satvik Yog  leading to heavens and sins changes to Tamsik deeds leading to Hells, automatically.
Why did I travel abroad ? Destiny wished me to realize that I had been there only to bear the fruits-rewards of my previous deeds. Places looked familiar.
What is my connection with the country, I visited ? Present connection: My son was posted there. Previous connection: It appears that I had been there earlier, in one of my previous births. I could recognize a few structures which were not seen by me in this birth.
What were the things/buildings/structures, which I recognized without having visited it before, before ? A few buildings, railway track, a river side, banana go-down.
Why do I loiter in old destructed forts in the dreams ? Might be presence of previous memory.
Why do I see railway trains very frequently in the dreams-running without tracks ? Might be that I had some connection with trains in previous births. There is certainly no connection in this birth, except travelling.
Why do I miss these trains, during the dreams ? Missing trains tell me that I am not able to realize my goal/targets/ambitions/success in life.
Why I find me with the serpents in early childhood, in dreams ? In fact they represent deities and my fear reveals my sins.
Why did the cobras frequented me in dreams ? When ever this happened I found that my opponents were trying to corner me.
Why my feet gets submerged in water-water bodies during the dreams ? Still not clear. Might be it represent confusion/botheration/tensions.
How do I swim in water in dreams, without learning it ? It might be that the God is giving me strength to swim over the tides/difficulties/troubles/difficult period-phase.
Why am I writing all these things ? Intuition-insight-God's desire-my interest-social welfare-humanity-better coordination of human beings.
Why do I read/study/learn so much ? My interest-Gods desires-destiny-impact of previous births.
What makes success slip out of my hands ? Impact of previous births-planetary configuration.
What is preventing me from attaining my goal in life ? Bad luck-time.
Am I virtuous-pious-honest-exercise self restraint ? To some extent, I feel.
Am I doing something for others/society/religion/poor/helpless/down trodden/nation ? Too little.
Do I possess virtues-ethics-moral-culture-values ? Yes.
What makes me courageous-bold-enthusiastic-self sufficient-independent ? My mother's impact-courage, inheritance.
PROPHESY-FORECAST-PREDICTION :: The religion which flourishes on the strength of terrorism, Jihad, conversions (whether forcible or through other means) is bound to perish-doom. Those who favor such activities are going o be doomed. The government-nation which is incapable of controlling-curtailing-nailing-preventing the terrorists, Naxalites, Marxists is bound to be doomed.
शास्त्रों में लिखा है कि जो जैसा करता है वैसा भरता है। नये नये धर्म  उदय हो रहे हैं और अस्त हो जाते हैं।आदि धर्म सनातन धर्म रह जाता है और रह जाता है केवल उसका नाम और उसके भक्त। आज के प्रचलित धर्मों को देखो और उनकी उम्र को देखो मात्र 400 से 2,100 वर्ष।  न वे पहले थे और न बाद में रहेंगे क्योँकि उनमें सहनशीलता का अभाव है। न जाने कितने सम्प्रदाय नित्य पैदा होते हैं और चले जाते हैं क्योंकि उनमें मैं है। उनमें राजनीति है, जनमानस का उत्थान नहीं। वे मानव को मानव से दूर करते हैं जोड़ते नहीं हैं। संसार को टुकड़ों में बाँटते हैं। नफरत की इमारत पर इबादत का मुलम्मा नहीं चढ़ सकता। प्यार जोड़ता है और नफरत तोड़ती है। 
Those who involve in indiscriminate killing-torture-harm-eliminate-murder-kill innocent persons, directly or indirectly; harm the faith-religion, which create hate-distaste-repulsion in the minds-souls of its followers, leading to their alienation from it. These people find suitable place in endless Hells and after release from them will take birth as insects.
न वो जानते हैं और न जानना चाहते हैं कि वो पहले-पिछले जन्म में क्या थे, कौन थे, क्या करते थे और ऐसा क्या किया, जिससे वो ये सब कर रहे हैं। और जानकर करेंगे भी क्या, क्योकि उन की आँखों पर पट्टी पड़ी है, उन्हें यही सब तो सिखाया जाता है। 
Remember him wholeheartedly  दद्चित्त होकर उसे याद करो :: Its not essential to recite Shloks, rhymes, verses, Mantr, prayers or to perform Yagy, Hawan, Agnihotr to remember the God, since they are just the means, not the goal. One just have to think of him, quietly-with pure-clear mind-intentions wholeheartedly, to experience his presence. In fact he is always with us, listen and respond. 
भगवत भजन के लिए श्लोक, यज्ञ, हवन, अग्निहोत्र, प्रार्थना, पूजा, कविता या पंडित की जरुरत नहीं है,ये साधन हैं, साध्य नहीं । दद्चित्त होकर उसे याद करो, वह तो पास ही है। सच्चे मन से याद  करने पर वह तुरंत सुनता है।INSPIRATION प्रेरणा :: Normally inspiration lies within, but there are others as well, who do motivate one for doing something memorable-excellent-something, which others could not do. Parents, teachers, mentors, friends, books, life stories of the successful people,  religious people, leaders, they all are the source of motivation-encouragement.
One rarely knows what is he up to-what he has to do-what is his goal in life-what is he meant for.
Aspiration, ambitions are not bad, use of unfair means is bad-sin.
The intelligent -prudent listen to their inner self-soul.
The sole aim of life is to become unattached-free, self realisation, devotion to the Almighty, purity-piousness-righteousness, attainment of self-Salvation-liberation, assimilation in God-the Ultimate.
सामान्यतया मनुष्य में प्रेरणा स्वत: उत्पन्न होती है। फिर भी ऐसे बहुतसे व्यक्ति होते हैं, जिनके द्वारा प्रोत्साहन पाकर मनुष्य कुछ ऐसा कर जाता है, जिसको पीढ़ी दर पीढ़ी याद रखा जाता है।अध्यापक, पथ प्रदर्शक, दोस्त, अविभावक, पुस्तकें, सफल लोगों की जीवनियाँ, धर्म गुरु, नेता आदि ऐसे अनेक लोग हैं, जो उत्साह बढ़ाते हैं, समर्थन देते हैं।
महत्वाकांक्षी होना बुरा नहीं है, महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए गलत तरीके का इस्तेमाल बुरा है, पाप है। 
शायद ही किसी को मालूम हो कि वह क्या करने को पैदा हुआ है-उसके जीवन का मकसद क्या है? बुद्धिमान लोग सोच समझ कर ही अपना मार्ग चुनते हैं, और अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनते हैं। 
जीवन का उद्देश्य है :- खुद को पहचानना, मुक्ति, भक्ति, सद्बुद्धि,आत्म शुद्धि, सद्गति, परमात्मा की प्राप्ति।   
मात्र-(माँ) देवो-भव, पितृ-देवो-भव, गुरुर-देवो-भव :: Find the God in the mother-the first teacher, father-the second teacher and the educator. Seek their blessings, if you wish to be a successful person. Serve them whole heartily to pave way to liberation.
Running after religious people-leaders-temples-holy places-holy rivers, will not pay off, if you fail to serve-look after-feed-respect-regard-honor your parents.
माँ बाप व गुरु में भगवान को देखो। उनका आशीवाद ग्रहण करो। पूरी श्रद्धा व भक्ति से उनकी सेवा करो। वो ही मोक्ष मार्ग के द्वार हैं। अगर तुम उनकी सेवा से कतराते-बचते हो, तो तीर्थ, मंदिर, धर्म गुरुओं, पवित्र नदियों में स्नान व्यर्थ है; तपस्या, भक्ति, पूजा, पाठ, सब व्यर्थ दिखावा है। 
REPAYMENT भुगतान :: Pay for the services, debts, purchases or anything bartered. Failure to repay, leads to rebirth as load-weight  carrying animals, such as: donkey, horse, oxen, yak, elephant, camel, pony-etc.
कर्ज, खरीदारी,सेवा,या बदले में ली गई किसी भी वस्तु का भुगतान करे बगैर मरने वाला, अगले जन्म में गधा, खच्चर, टट्टू ,घोड़ा ,हाथी, ऊँट, याक, बैल आदि-वजन ढ़ोने वाला पशु, बनता है।
NEIGHBOUR पड़ोसी :: One should maintain cordial-harmonious relations with the neighbours. One has to tolerate to some extent  One may become neutral-unconcerned about the neighbour. But at occasions one may lose his cool, when teased-disturbed-tortured-provoked unnecessarily. Its better avoid conflict, since he is the only one, who will come to help you, in an hour of need. Relatives may not come to rescue you. Act against only when the things move out of control. Show your might. Still opt for compromise, if possible.
Some times it so happens that the next door neighbour might be a dreaded criminal. Its not possible to check his antecedents.Its better remain aloof and never try to befriend such people, since they may put you in deep trouble anguish. Apartment-flat culture is growing at an unprecedented pace, leading to all sorts to troubles. Therefore its better not to be too close-intimate with anyone, unless you are very sure about him.
पड़ोसी  के साथ अच्छे सम्बन्ध रखने चाहिये। जहाँ तक संभव हो, उसे बर्दाश्त करना ही चाहिये। ऐसा भी संभव है कि आप पड़ोसी के साथ कोई सम्बन्ध ही न रखें। संभव है कि सताने,तंग करने,परेशान करने, दुखी करने, भड़काने पर आपको गुस्सा आ जाये। जहाँ तक संभव हो टकराव को दूर ही रखें, क्योंकि वक्त पर पड़ोसी ही काम आयेगा।  रिश्तेदार हो सकता है कि जरुरत के समय न आ पायें। हाँ, अगर बर्दास्त के बाहर हो जाये तो, अपनी ताकत दिख दो। फिर भी समझौते का रास्ता खुला रखो-गुन्जाइश रहने दो। 
कई बार ऐसा होता है कि आपका  पड़ोसी दुर्दान्त अपराधी हो। ये संभव नहीं है कि जल्दी से आप किसी के बारे में जान कारी हांसिल कर पाएँ। अत : बेह्तर है कि उचित दूरी बनी रहे। कहीं ऐसा न हो कि वो आपको मुसीबत में डाल  दे। समस्या पे समस्या उत्पन्न होती चली जाये। अच्छा यही होगा कि दूरी भली।
Determination-insistence निश्चय-जिद्द :: Determination is key to success. Unless one takes a decision, he can not proceed forward.Decisions may be reviewed as per need of the situation and circumstances. One has to find whether the direction chosen by him is correct or not. Negative thinking, is always harmful. One should analyse the pros and cons of his plans-ideas-thoughts, in advance. Positive thinking is always beneficial.Firm decision in right-righteous direction, opens up new avenues-vistas of elevation. Rigidity-stiffness is always harmful as compared to flexibility.One should be able to restrain himself. Too much flexibility is also dangerous. One should give it a thought before to decide what he has to do. He should not jump to conclusions-decisions.There should always be scope to modify change-retract if faults are observed at some stage. Nothing should be done in a hurry-haste makes waste. Stubbornness-obstinacy-persistence-dogmatic attitude, should always be avoided.Enable yourself like the wires-cords of musical instruments, which produce sweet-adorable-melodious-rhythmic- sound-notes.It's good-advisable to  consult the elders-knowledgeable people. One should not tie his legs by taking vows.
किसी भी काम  की सफलता के लिये निश्चय-निर्णय  करना आवश्यक है। निश्चय करने से पहले यह भी देखना जरुरी है कि हमारे सोच की दिशा क्या है। विपरीत या उल्टा सोचने से कार्य में बाधा आयेगी। सकारात्मक सोच उन्नति के लिए परमावश्यक है। सही दिशा में दृढ निश्चय उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है, नए रास्ते  खोलता है। जरुरत से ज्यादा सख्ती या लचीलापन घातक है,  जहाँ तक संभव हो जिद्द से बचना।
स्वयं को वीणा के ऐसे तारों की तरह बनाओ जिनसे मधुर स्वर निकलता हो। 
Vow प्रतिज्ञा (वचन-प्रण-कसम-वादा) :: One should always avoid  a vow, since it may not be possible to stick-fulfill it, in the interest of all-public. Even if you have had a vow forgive it, if it helps others, without harming you. Its not a sin. Just to maintain the vow, one may commit one crime after another against the humanity. One takes vows in a fit of rage-anger-frenzy-excitement-enthusiasm. Always remembers the God at such a junction, he will direct you.
प्रतिज्ञा करने से हमेशा बचना चाहिये। कभी कभी ऐसा भी हो जाता है कि प्रतिज्ञा समाज के हित में नहीं होती, बल्कि यह व्यक्ति को स्वयं नुकसान पहुंचाती है। प्रतिज्ञा का पालन नहीं करना कोई ऐसा पाप नहीं है जिसका प्रायश्चित नहीं हो सकता। प्रतिज्ञा अक्सर जोश-गुस्से-आवेश-क्रोध  में आकर की जाती है। उसको पूरा करने हेतु मनुष्य एक के बाद दूसरा पाप करता चला जाता है। ऐसा अवसर आए तो परमात्मा को अवश्य याद करना, वही सही राह दिखायेगा।          
Vows broken for the sack of the community-social welfare-humanity-mankind are virtuous-pious-righteous, not sin.
Commitments made by King Dashrath, the father of Raja Ram, to Kaekai led to the exile of Bhagwan Ram an incarnation of Lord Vishnu (incarnation of the Almighty himself), under a pre planned strategy to eliminate demons-giants-Rakshash-Rawan from the earth.
Vows made by Devwrat (Bhishm Pitamah), to solemnise the marriage of his father King Shantnu (a lesser incarnation of God) with Saty Wati resulted in the Maha Bharat.
Vow taken by the Almighty Shri Krishan, (complete incarnation), not to raise weapons against any one, by broken deliberately, to maintain the honor of his Devotee-Bhishm Pitamah.
One should do everything possible to support the humanity, including rejections  of vows.
Vow by Kautily (Vishnu Gupt, Chanky) resulted in the elimination of Nand dynasty and beginning of Maury Vansh.
पवित्र सामाजिक कार्यों हेतु कसम के तोड़ने से पाप नहीं लगता।
राजा दशरथ द्वारा कैकयी को दिये वचन निभाने के लिये ही, भगवान राम को वनवास भोगना पड़ा। यह सब एक पूर्वनियोजित योजना के तहत, संभव हुआ। राक्षसों, दानवों, दैत्यों को मारने के लिये ही यह रामावतार हुआ। 
भीष्म पितामह -देवव्रत, ने अपने पिता राजा शान्तनु का विवाह सत्यवती से कराने के लिए, जो वचन दिया-प्रतिज्ञा की, उसे पूरा करने के कारण ही वो महा भारत का युद्ध नहीं रोक पाए।  
परन्तु, भगवान श्री कृष्ण ने अपने भक्त-भीष्म पितामह  की इज्जत रखने हेतु अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी।
मनुष्य को मानवता की रक्षा हेतु अपनी कसम-वचन-मर्यादा-वादा तोडना पड़े, तो कोई पाप नहीं लगता-लगे तो भी प्रायश्चित हो जायेगा। 
कौटिल्य (विष्णु गुप्त, चाणक्य) की प्रतिज्ञा के कारण  ही नन्द वंश का नाश हुआ व मौर्य वंश का प्रादुर्भाव हुआ। 
हठ :: बाल हठ, त्रिया हठ  और राज हठ  ये तीनों ही इंसान को मजबूर करते हैं। 
बाल हठ प्यार, वात्सल्य, स्नेह से जुड़ा है। भगवान कृष्ण चंदा मांगते थे, यशोदा मैया से। 
त्रिया हठ वासना का प्रतीक है। कैकई के हठ ने भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास दिला  दिया। 
राज हठ सनक का प्रतीक है। तुग़लक ने राजधानी बदलने के आदेश दिये और सभी को दिल्ली छोड़ने को कहा। सिकंदर ने  दुनिया फ़तह करने की सोची और उससे पहले ही मर गया। अब चीन एशिया में एक राजनैतिक शक्ति के रूप में खुद को स्थापित करना चाहता है। 
तीनों ही स्थितियों में मनुष्य बात मानने को मजबूर हो जाता है। 
Lie-झूंठ :: A lie for the sake of humanity-welfare of mankind-to save an innocent person from ruin-disaster-torture-imprisonment-misery-cruelty is better than a plain truth.
एक ऐसा झूंठ जो किसी निर्दोष की रक्षा करता हो वह एक सत्य से उत्तम है।
गायत्री-मंत्र Gayatri Mantr :: ब्रह्म यज्ञ: संध्योपासना-ब्रह्मा जी के छोड़े गए शरीरों से संध्या की उत्पत्ति हुई। संध्या, रात व दिन का संयोग है।  मनुष्य को प्रात: व शाम को भगवान का ध्यान, स्तुति व उपासना करनी चाहिये।
One may adopt morning and evening prayers, as a part of his  daily routine, since they helps  in attaining divinity. 
गायत्री मंत्र :: ओउम्  भुर्भुव: स्व:। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।।
हे प्राण-स्वरुप, दुःख-विनाशक और आनन्द स्वरुप परमात्मा हम सब, तुम जगत को उत्पन्न करने वाले, वरण-धारण करने वाले, दिव्य गुणों से युक्त परमेश्वर का ध्यान करें-अपनी आत्मा में धारण करें, ताकि हमारी बुद्धि उत्तम-सत्कारों में  कार्यों में लग सके।
One ought to concentrate his mind-energies in the Almighty, who created us all, who nurtures us all, who is the one-who should be present in our souls, all time-at all moments, who is possessor of divine characters-qualities-capabilities, to direct-channelise our mind-intelligence-energies into pious-righteous-virtuous deeds.
CRAZE :: There is no limit to our desires. Wild desires makes one run after worldly possessions. He keeps on accumulating, even if the goods are useless for him. His fancy makes him interested in luxuries, wealth, possessions. Fancy/rare/collection items lure one to have them. 
One should use/utilise the money for helping others, within his capacity, instead of wasting it. Help the needy and down trodden. You will not carry these worldly possessions to next birth and they are of no use to you in the current birth. What goes with you are the blessings of those who were helped-consoled-treated by you. This provides you pleasure-amusement-joy. Monetary help reaching the hands of terrorists-separatists-criminals will certainly put you in hell.
People collect various goods of historical importance like paintings, stamps. They are willing to pay high prices for them. Antiques are smuggled from India. Goods of historical importance are often traced to show rooms abroad.
Indians are crazy about cricket. Bangalies are crazy about foot ball.
Indian women have craze for jewellery, ornaments, gold, dresses.
Americans have craze for artefacts; WW-II goods-objects-articles, old rare goods. They add  value to old goods, to recover hefty gains later.There are the people, who collect and preserve goods of their taste and are willing to pay any price for them.
Craze for more and more money and power entices one to corruption, crime, evil. There is no end to human desires. There is limit beyond which one can not consume. However, one may waste resources in the name of consumption. Let us put our resources to proper utilisation, human welfare, peace, harmony, universal brotherhood. 
One should opt for satisfaction-Santosh. He is free for progress-attainment through virtuous-pious-righteous means.
Silence मौन :: कम बोलना अच्छी आदत है। चुप रहना, व्यर्थ की बातचीत-बकबास-वाद विवाद से अच्छा है। इससे ऊर्जा की बचत होती है और ध्यान केन्द्रित रहता है। एकांत-वन-गुफा  में रहना, घर-गृहस्थी में रहकर कम बोलने से-न बोलने से आसान है। इसके लिए अभ्यास की आवश्यकता है। विवाद में फँसने से अच्छा  है, बात को हँसकर टाल देना-तूल न देना-माँफी मांग लेना। जिन लोगों को हर वक्त बकर-बकर करने की आदत होती है, उनसे दूर ही रहना चाहिये । एक चुप सौ को हराता है। 
इसका अर्थ यह नहीं है कि जरुरत के वक्त भी मौन रहो। आवश्यकता पड़ने पर अपनी बात पूरे जोर-शोर-दबाब से कहो।
Silence is Golden. It does not detach one from the living world. It brings peace, solitude, equanimity with it. It transcends  a person to the eternal. One goes beyond or outside the range of human experience-reason-belief-power of description. Silence can be used as a tool for eloquence-skillful use of language, to persuade or to appeal to the feelings, fluent speaking.  
Powerful-strong pulses of brain waves start pushing through the space and are received by the devotee-seeker bringing about a  complete change-metamorphosis in the thoughts  pattern-ideas, granting him devotion-prudence-enlightenment. Piousness of thoughts enchant the ascetics all around-all over. Holy person generate-transmit, harmony-peace-solace-tranquillity-calm-quietness to the recipients. A stage is reached, where body consciousness, along with thoughts, pertaining to others, pervading the mind, disappear automatically, leaving behind the  worshipper, enchanted with the Supreme. 
Ego अहंकार-घमंड :: Id (man's unconscious instincts and impulses), Ego (individual's perception or experience of himself, self esteem, self centred or self seeking act, capacity to think-boasting self) and Super Ego are the words meant to describe man's pride. Ego leads to such acts which harm-punish-torture innocent people and bring out tears in their eyes.
The moment one suffers from the feeling of I-MY-ME-MINE or that he is great, he sows the seeds of his destruction/down fall.
Egoist is generally side lined in the society.
घमंड, अभिमान, स्वाभिमान, अहंकार, आत्म श्लाघा मनुष्य को निम्नतम स्तर तक पहुँचाने वाले हैं।  कहते हैं "घमंडी का सर नीचा होता है"। 
मैं बहुत बड़ा हूँ। मैं बहुत/सबसे अधिक अमीर-धनवान, शक्तिशाली, बल शाली, दानवीर, योद्धा, बुद्धिमान, समझदार, ताकतवर, विद्वान, विनम्र, धर्मिक आदि आदि हूँ।
मनुष्य में मैं का आना उसके विनाश का द्योतक/सूचक है। विनाश काले विपरीत बुद्धि-मैं पन  आ ही जाता है। फलों से लदे वृक्ष की डालियाँ खुद झुक जाती हैं। बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंथी/पंछी को छाया नहीं फल लगे अति दूर। 
हिरन्यकश्यप, हिरनाक्ष, रावण, शिशुपाल, कंस, जरासन्ध, दुर्योधन जैसे घमंडियों का नाश हो गया औरों की तो बात ही क्या है।
 Its good to have self esteem/respect.
आत्म  सम्मान, देश/औलाद पे गर्व अच्छी बात है।  Its good to be proud over our country/children or any one who has done something extraordinary for the sake of his country/world/humanity.
घमंडियों के अत्याचारों से आँखों में आंसू आ ही जाए हैं, जिनसे घमंडी का सर्वनाश भी हो जाता है। 
TEARS आँसू :: They come out invariably. There may be pleasure or pain, happiness or sorrow, they just appear. There are moments, when one can't stop them. Some thing-dust-straw when fall, in the eyes brings out tears. Pollution/infection may cause tears.
Extreme pleasure and happiness is witnessed by one in his life time and again. Un expected gains, success, meeting the lost/separated ones after a long period of time rolls out tears. One can't stop/check weeping.
Having lost the dear ones, sorrow, unexpected heavy losses, do roll our tears in agony. Guilt over come/realized, penances also turn into tears.
Tyranny, obstinacy, cruelty, torture, harassment, undue punishment meted out to innocent bring out tears in their eyes.
But when the tears roll out, while remembering the Almighty, they fill the vacuum, one has experiencing all over his life.
Those who bring out tears in the eyes of innocent people, automatically get cursed and sow the seeds of their own down fall-destruction-turmoil.
हँसाना सीखो-हंसो और हंसाओ। खुश रहो और दूसरों को भी खुश रहने दो। 
CURSE शाप-बद्दुआ :: One should not curse any one even if he is hurt/troubled/tortured. His earnings-credit in the form of prayers, rituals, asceticism, charity, goodness converts into curse and one moves to the starting point, like the game of snake and ladder. One has to either increase his tolerance level, or repel the person/guilty creating tensions-difficulties for him, without any logic-reason. There is no harm in seeking legal remedies. One has to increase his power/strength so that the opponents with designs upon him have to think twice before attacking him.
One may counter-repel, desist, fight, against the enemy and destroy/harm him but abstain from laying curse-wrath-revenge. What so ever may come forward/next one should always control anguish.
On a visit to insurance company one was suddenly told by  a person (this man used to devote time for prayers) that he is Durwasa-an incarnation of Bhagwan Shiv: The lord who destroys the evil. Guru Nanak was a n incarnation of Durwasa. Analysis of events over the past 15 years has confirmed that one must not curse.
Rishi Durwasa-one of the incarnations of Bhagwan Shiv, is well known for his habit of cursing. 
Gandhari cursed Bhawan Krishan that his entire family will be wiped off. Shri Krishan could reject it, but allowed it to happen since his decedents were becoming arrogant, uncontrollable,unmanageable and rowdy.
Kak Bhushundi and Nag Raj Kalia are still faces the wrath of the curse laid by them over each other.
Rishi Vashishth and Vishwamitr cursed each other, reborn as birds and they continued fighting each other even after becoming birds.
श्राप, बद्दुआ, नजर, हाय, कोसा-काटि का असर-प्रभाव एक ही जैसा होता है। जब भी किसी को श्राप दिया जाता है, वैसे ही देने वाले के पुण्य कर्म क्षीण हो जाते हैं और श्राप तो अपना असर दिखाता ही है। अतः मनुष्य को जहाँ तक संभव हो, इनसे बचना ही चाहिये। 
माता सीता को तोती का श्राप :- माता सीता को एक गर्भवती के श्राप ने भगवान श्री राम जी से उस वक्त दूर कर दिया जब वे गर्भवती थीें। धर्म मनुष्य को सच्चाई के मार्ग पर चलना सिखाता है। सनातन धर्म में दूसरों को पीड़ा पहुँचाने को पाप और परोपकार को पुण्य माना गया है। ईश्वर को भी अपनी गलती की सजा भोगनी पड़ती है। 
सीता मिथिला नरेश जनक की पुत्री थी। एक दिन उद्यान में खेलते हुए कन्या सीता को एक नर व मादा तोते का जोड़ा दिखाई पड़ा। वो दोनों आपस में बातें कर रहे थे। 
वो जोड़ा ये बात कर रहे थे कि भूमंडल में राम नाम का बड़ा प्रतापी राजा होगा जिसकी अत्यंत सुंदर पत्नी सीता होगी। उत्सुकता वश सीता अपने को रोक ना सकी और उनकी बातें सुनने लगी। 
उन्हें अपने ब्याह के बारे में सुन अच्छा लग रहा था। इसी उमंग में उन्होंने बातचीत में मग्न तोते के उस जोड़े को पकड़वा लिया। 
माता सीता उनसे अपने और श्रीराम के बारे में और भी बातें सुनना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने उस जोड़े से पूछा कि उन्हें राम और उसके विवाह के बारे में ये बातें कहाँ से पता चली। तोते ने कहा कि उन्होंने ये बात महर्षि वाल्मीकि के मुख से उनके आश्रम में शिष्यों को पढ़ाते वक्त सुनी। इस पर माता सीता ने कहा कि तुम जनक की जिस पुत्री के बारे में बात कर रहे हो वो मैं ही हूँ।  तुम्हारी बातें मुझे रोमांचित कर रही है इसलिए अब मैं तुम्हें तब छोड़ूँगी जब मेरा विवाह श्रीराम से हो जाएगा। तोते ने याचना करते हुए कहा कि हे देवी! हम पक्षी हैं जिन्हें घर में सुख नहीं मिल सकता है। हमारा काम ही आसमान में विचरण करना है। माता सीता ने नर तोते को आज़ाद कर दिया और कहा कि ठीक है तुम सुखपूर्वक विचरो, परन्तु तुम्हारी पत्नी को मैं तब छोड़ूँगी जब मुझे राम प्राप्त हो जाएँगे। 
नर तोते ने फिर गिड़गिड़ाते हुए कहा हे सीते मेरी यह पत्नी गर्भ से है; मैं इसका वियोग सह ना पाऊँगा। कन्या सीता ने फिर भी मादा तोते को नहीं छोड़ा। इस पर दुखी होकर मादा तोते ने सीता को श्राप दिया कि जैसे तू मेरी गर्भावस्था में मेरे पति से मुझे दूर कर रही है उसी प्रकार तुझे भी अपनी गर्भावस्था में अपने राम का वियोग सहना पड़ेगा। 
इतना कहते ही मादा तोते ने प्राण त्याग दिया। कुछ समय बाद उसके वियोग में व्यथित नर तोते ने भी अपने प्राण त्याग दिए।  सालो बाद इसी श्राप के कारण ही माता सीता को श्रीराम ने उनकी गर्भावस्था के दैरान ही वन में भेज दिया था। 
(1). युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप :: जब कुंती ने युधिष्ठिर को बताया कि कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था, तो पांडवों को बहुत दुख हुआ। तब युधिष्ठिर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का भी अंतिम संस्कार किया। माता कुंती ने जब पांडवों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताया तो शोक में आकर युधिष्ठिर ने संपूर्ण स्त्री जाति को श्राप दिया कि आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपा कर नहीं रख सकेगी।
(2). ऋषि किंदम का राजा पांडु को श्राप :: राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए। वहाँ उन्होंने हिरण के जोड़े को मैथुन करते देखा और उन पर बाण चला दिया। वास्तव में वो हिरण व हिरणी ऋषि किंदम व उनकी पत्नी थी। तब ऋषि किंदम ने राजा पांडु को श्राप दिया कि जब भी आप किसी स्त्री से मिलन करेंगे। उसी समय आपकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के चलते जब राजा पांडु अपनी पत्नी माद्री के साथ मिलन कर रहे थे, उसी समय उनकी मृत्यु हो गई।
(3). माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप :: माण्डव्य ऋषि को राजा ने भूलवश  चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया। तब ऋषि यमराज के पास पहुँचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप 4 वर्ष के थे, तब आपने एक फतींगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा। तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि 4 वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण धर्मराज ने महात्मा विदुर और युधिष्टर के रूप में जन्म लिया।
(4). कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप :: ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियाँ थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूंछ काली है। कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूंछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमजेय के सर्प यज्ञ में भस्म हो जाओगे, परन्तु नागमाता मनसा देवी के पुत्र आस्तीक ऋषि ने उन्हें बचा लिया। 
(5). उर्वशी का अर्जुन को श्राप :: महाभारत के युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए, तो वहांँ उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। यह देख अर्जुन ने उन्हें अपनी माता के समान बताया। यह सुनकर क्रोधित उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया कि तुम नपुंसक की भाँति बात कर रहे हो। इसलिए तुम नपुंसक हो जाओगे, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। यह बात जब अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो उन्होंने कहा कि अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा।
(6). तुलसी का भगवान विष्णु को श्राप :: शंखचूड़-जलन्धर नाम का एक राक्षस था। उसकी पत्नी का नाम तुलसी था। तुलसी पतिव्रता थी, जिसके कारण देवता भी शंखचूड़ का वध करने में असमर्थ थे। देवताओं के उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी का शील भंग कर दिया। तब भगवान् शंकर ने शंखचूड़ का वध कर दिया। यह बात जब तुलसी को पता चली तो उसने भगवान्  विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दिया। इसी श्राप के कारण भगवान्  विष्णु की पूजा शालीग्राम शिला के रूप में की जाती है।
(7). श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप :: पाण्डवों के स्वर्गारोहण के बाद अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने शासन किया। उसके राज्य में सभी सुखी और संपन्न थे। एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए। तब उन्हें वहाँ शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए, जो मौन अवस्था में थे। राजा परीक्षित ने उनसे बात करनी चाहिए, लेकिन ध्यान में होने के कारण ऋषि ने कोई जबाव नहीं दिया। परीक्षित ने क्रोधित होकर एक  मरा हुआ सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। यह बात जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने श्राप दिया कि आज से सात दिन बात तक्षक नाग राजा परीक्षित को डंस लेगा, जिससे उनकी मृत्यु हो जाएगी।
(8). भगवान् परशुराम का कर्ण को श्राप ::  परशुराम जी भगवान् विष्णु के अंशावतार हैं। सूर्यपुत्र कर्ण उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम जी को अपना परिचय एक ब्राह्मण के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे, उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए, ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया। नींद से उठने पर जब परशुराम जी ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण ब्राह्मण नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर भगवान् परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे।
(9). गांधारी का श्रीकृष्ण को श्राप :: महाभारत के युद्ध के बाद जब भगवान् श्री कृष्ण गांधारी को सांत्वना देने पहुँचे तो अपने पुत्रों का विनाश देखकर गांधारी ने भगवान् श्री कृष्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार पांडव और कौरव आपसी फूट के कारण नष्ट हुए हैं, उसी प्रकार तुम्हारा कुल भी परस्पर लड़ाई करके नष्ट हो जायेगा।गांधारी के श्राप के कारण ही भगवान् श्री कृष्ण के परिवार का अंत हुआ। इस श्राप के कारण गान्धारी का तेज नष्ट हो गया जो उसने जीवन भर भगवान् शिव की आराधना करके पाया था। 
(10). महर्षि दुर्वासा का वसुओं को श्राप :: भीष्म पितामह पूर्व जन्म में अष्ट वसुओं में से एक थे। एक बार इन अष्ट वसुओं ने नंगे नहाते हुए महर्षि दुर्वासा ने देखा। महर्षि दुर्वासा को देखकर भी अष्ट वसुओं ने कपड़े नहीं पहने  तो उन्होंने अष्ट वसुओं को श्राप दिया कि तुम आठों वसुओं को मृत्यु लोक में मानव रूप में जन्म लेना होगा और आठवें वसु को राज, स्त्री आदि सुखों की प्राप्ति नहीं होगी। यही आठवें वसु भीष्म पितामह थे।
(11). ऋषियों का साम्ब को श्राप :: एक बार कण्व आदि ऋषि द्वारका गए। तब उन ऋषियों का परिहास करने के उद्देश्य से सारण आदि वीर भगवान् श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब को स्त्री वेष में उनके पास ले गए और पूछा कि इस स्त्री के गर्भ से क्या उत्पन्न होगा। क्रोधित होकर ऋषियों ने श्राप दिया कि श्री कृष्ण का ये पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए लोहे का एक भयंकर मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा समस्त यादव कुल का नाश हो जाएगा और ऐसा ही हुआ।  
(12). दक्ष का चंद्रमा को श्राप :: प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से करवाया था। उन सभी पत्नियों में रोहिणी नाम की पत्नी चंद्रमा को सबसे अधिक प्रिय थी। यह बात अन्य पत्नियों को अच्छी नहीं लगती थी। ये बात उन्होंने अपने पिता दक्ष को बताई तो वे बहुत क्रोधित हुए और चंद्रमा को सभी के प्रति समान भाव रखने को कहा, लेकिन चंद्रमा नहीं माने। तब क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया। इसका  इलाज उन्होंने सोमनाथ का मन्दिर बनाकर भगवान् शिव की आराधना करके किया। 
(13). शुक्राचार्य का राजा ययाति को श्राप :: राजा ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ था। देवयानी ने राजकुमारी शर्मिष्ठा को अपनी दासी बना लिया था। एक बार जब ययाति और देवयानी बगीचे में घूम रहे थे, तब उसे पता चला कि शर्मिष्ठा के पुत्रों के पिता भी राजा ययाति ही हैं, तो वह क्रोधित होकर अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली गई और उन्हें पूरी बात बता दी। तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने ययाति को बूढ़े होने का श्राप दे दिया था।
(14). ब्राह्मण दंपत्ति का राजा दशरथ को श्राप :: एक बार जब राजा दशरथ शिकार करने वन में गए तो गलती से उन्होंने शब्द भेदी वाण श्रवण कुमार पर चला दिया जिससे ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु हो गई। उस श्रवण कुमार के माता-पिता अंधे थे। जब उन्हें अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया कि जिस प्रकार हम पुत्र वियोग में अपने प्राणों का त्याग कर रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग के कारण ही होगी।
(15). नंदी का ब्राह्मण कुल को श्राप :: दक्ष यज्ञ में जब सभी ऋषिगण, देवता, प्रजापति, महात्मा आदि प्रयाग में एकत्रित हुए तब वहाँ दक्ष प्रजापति ने भगवान् शिव का तिरस्कार किया। यह देखकर बहुत से ऋषियों ने भी दक्ष का साथ दिया। तब नंदी ने श्राप दिया कि दुष्ट ब्राह्मण स्वर्ग को ही सबसे श्रेष्ठ मानेंगे तथा क्रोध, मोह, लोभ से युक्त हो निर्लज्ज ब्राह्मण बने रहेंगे। शूद्रों का यज्ञ करवाने वाले व दरिद्र होंगे।
(16). रावण के सर्वनाश के कारण 6 श्राप :- रावण बहुत ही पराक्रमी योद्धा, परमज्ञानी, महापण्डित, त्रिकाल दर्शी, दसों दिशाओं का ज्ञाता और वेदों का पारगामी परम विद्वान था  था। उसने अपने जीवन में अनेक युद्ध किए। रावण के अंत का कारण भगवान् श्री राम की शक्ति तो थी ही। साथ ही, उन लोगों का श्राप भी था, जिनका रावण ने कभी अहित किया था। रावण को अपने जीवनकाल में मुख्यतः 6 लोगों से श्राप मिला था। यही श्राप उसके सर्वनाश का कारण बने और उसके वंश का समूल नाश हो गया। देवताओं से युद्ध में उसकी पराजय हुई जिसमें महाराज दशरथ ने देवताओं का साथ दिया। वह बाली से हारा जिसने उसे अपनी काँख में तब तक दबाये रक्खा जब तक उसने सूर्य भगवान् की पूजा अर्चना की। रावण ने उससे दोस्ती कर ली।कैलाश पर्वत को जाकर हिलाया तो भगवान् शिव ने उसे पैर के नाख़ून से दबाये रक्खा तो उसने रावण स्त्रोत्र से उनकी आराधना की।  उसने अपने जीवन में  अनेकों युद्ध लड़े और जीते जो कि उसके अहंकार के कारण बने और बाद में उसका विनाश भी किया।
रावण ब्राह्मण कुल में उत्पन्न, विद्वान होते हुए भी बेहद कामुक, पतित स्वभाव का और राक्षसी बुद्धि वाला था। उसपर उसकी माँ और नाना का पूरा प्रभाव था।अपनी दुष्प्रवृत्तियों के कारण उसे अनेकानेक श्राप प्राप्त हुए जो कि भगवान् श्री राम के साथ युद्ध में उस पर फली भूत हो गए। 
(16.1). राजा अनरण्य का रावण को श्राप :: सूर्य-इक्ष्वाकु-रघुवंश (भगवान राम के वंश में) में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुई। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई। मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरा नाश करेगा। इन्हीं के वंश में आगे जाकर भगवान् श्रीराम ने जन्म लिया और रावण का वध किया।
(16.2). रावण को नंदी का श्राप :: एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहाँ उसने नंदी जी को देखकर उनके स्वरूप की हंँसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदी जी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।
(16.3). माया का रावण को श्राप :: रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहाँ रावण ने माया को अपनी बातों में फँसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बँदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासना युक्त होकर मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया। इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।
(16.4). तपस्विनी का रावण को श्राप :: एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था। तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, जो भगवान् विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी।
उसके पश्चात ही रावण ने स्त्रियों के साथ जोर-जबरदस्ती बंद कर दी। उसने अपने जीवन काल में बलात्कार-जोर जबरदस्ती से अनेकों स्त्रियों से बलात्कार कर अनेकानेक कन्याओं को उत्पन्न किया।
(16.5). नलकुबेर का रावण को श्राप :: विश्व विजय करने के लिए जब रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो उसे वहां रंभा नाम की अप्सरा दिखाई दी। अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह से स्पर्श न करें, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के लिए आरक्षित हूँ। इसलिए मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूँ। लेकिन रावण ने उसकी बात नहीं मानी और रंभा से दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि दिन के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसको स्पर्श करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बँट जाएगा। 
(16.6). शूर्पणखा का रावण को श्राप :: रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।
(17). भगवान् श्री कृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप  :: महाभारत युद्ध के अंत समय में जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया, तब पाण्डव भगवान् श्री कृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम तक पहुँच गए। तब अश्वत्थामा ने पाण्डवों पर ब्रह्मास्त्र का वार किया। ये देख अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। महर्षि व्यास ने दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा और अर्जुन से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने अपने अस्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी। यह देख भगवान् श्री कृष्ण ने परीक्षित की रक्षा कर दंड स्वरुप अश्वत्थामा के माथे पर लगी मणि निकालकर उन्हें तेजहीन कर दिया और 3,000  वर्षों तक माँथे से रक्त और पीब टपकते हुए पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया। अश्वत्थामा जी अब भी भटकते हुए, पूजा करते हुए लोगों को मिलते हैं मगर अब उनका घाव भर गया है परन्तु माँथे पर घाव का निशान बकाया है। 
(18). तुलसी का श्रीगणेश को श्राप :: माता भगवती राधा जी से श्रापित होने के बाद तुलसी ने पृथ्वी पर जन्म लिया। गंगा तट से गुजरते वक्त उसने गणेश जी को तपस्या करते हुए देखा और उन पर मोहित होकर शादी का प्रस्ताव रखा। गणेश जी ने तुलसी से विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोध वश तुलसी ने गणेश जी दो को विवाह करने का श्राप दे दिया और गणेश जी ने तुलसी को वृक्ष बनने का।

(19). देवर्षि नारद का भगवान् विष्णु को श्राप :: देवऋषि नारद भगवान् विष्णु की माया में फंसकर एक राजकुमारी पर मोहित हो गए। उस कन्या के स्वयंवर में वरमाला अपने गले में डलवाने के हेतु वे भगवान् विष्णु के पास उनका रूप माँगने गए तो उन्होंने नारद जी भले के लिये तथास्तु कह दिया। भगवान् विष्णु का एक रूप वानर भी है। उन्हें देखकर वह राजकुमारी उन पर हँस पड़ी। यह देखकर नारद मुनि बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने भगवान् विष्णु को श्राप दिया कि जिस प्रकार तुमने मुझे स्त्री के लिए व्याकुल किया है। उसी प्रकार तुम भी स्त्री विरह का दु:ख भोगोगे। भगवान् विष्णु ने राम अवतार में नारद मुनि के इस श्राप को पूरा किया।
BLESSINGS आशीर्वाद :: When some one in distrust-turmoil, is helped by you, blessing may be showered upon you. Old people/elders in need of help and care too, bless those who extend helping hand. The blessing which comes out of the inner self/soul shows mesmerising impact over the one who obtained the blessings. Blessings are capable of changing-improving the destiny of those, who help others.
People are found/observed vising shrines/priests/enlightened to seek their blessings. Such blessings are merely of ritualistic nature. They rarely impact the destiny of any one.
Help one who in need, not the one, who has plenty of every thing. 
Gandhari refused to bless her son Duryodhan, with success before Maha Bharat because he had acquired the Empire of Pandavs through treachery, cheating, cunningness, fraud, crookedness and was not willing to return it without war with the misconception that he was more powerful than Pandavs.
Pindaris use to visit the temple of Maan Kali before departing to loot/kill travellers for seeking her blessings. They all were killed by the British. Those who bless sinner/criminals/anti socials acquire their sins over them and suffer along with them.
Will you bless a person, who has come to seek your blessings? No, never. But Bhishm Pitamah did this by blessing Arjun with success.
BLISS-परमानंद :: Bliss is the ultimate happiness. There is nothing beyond this. It comes to the devotee automatically, when he finds equanimity in all the creations of God, life and death as well. He understands that all religions leads to the same Ultimate. This is the state when all the sins and virtuous deeds are over. Nothing is left to undergo/bear, be it the reward or punishment. There is no desire, no pain or pleasure. Eternal devotion fills his soul.
SALVATION-मोक्ष :: Its the ultimate state of bliss, when the soul merges with the God-Almighty-Allah-Khuda-Rab, like the drop let of water which merges with the ocean and becomes ocean.
LOVE-AFFECTION प्रेम-प्यार :: Love brings joy, not sadness. Love shows understanding and provokes no arguments. Love provides security and makes no demands. Love grants freedom and knows no jealousy.
There is a big difference between love and infatuation. Flirtation is quite common these days. Infatuation and flirtation are guided by sensuality-sexuality-passions-lust towards opposite sex. Though its natural, yet family environment-moral-ethics-virtues-piousity-righteousness is a great factor associated with it. Loose morals often lead one to the opposite sex, unnatural acts, vulgarity.
Love do not need words. One who is performing all responsibilities-duties pertaining to his family, children, parents, elders, relatives need not repeat that he loves them. Its observed that one has to say, "I love you", to his children and wife to pacify them-to press that he has great love for them. But words are words. Real love do not need any expression, provided one do understand the meaning of love. Mutual love is essential. One sided affair never work-materialise. Love need understanding-patience-faith.
प्रेम-प्यार-स्नेह मिलते जुलते शब्द हैं। फिर भी इनका प्रयोग भिन्न-भिन्न परिस्थितियों  में भिन्न-भिन्न तरह से होता है। प्यार भावनात्मक होता है। प्यार की अभिव्यक्ति आवश्यक है। प्यार की अनुभूति अक्सर स्वतः हो जाती है। भगवान से प्यार परमानन्द प्रदान करता है। प्राणी मात्र से प्यार करना सीखो। 
You love your children that is why you try to discipline-control them. You try to save time and devote it their well being. If you neglect-avoid-discard them, there are chances that there is no love in your heart for them. You may love children but its not essential that they too love-reciprocate you. Don't mind; do your duty towards them. Your parents cared for you; you care of them. In fact, its a mutual bond, which is established slowly but gradually. Don't be too harsh with them. Explain the situation, which will put them in danger if they do not listen to you.
प्रेमी लड़की के ऊपर तेजाब नहीं फेंकता, उसे ब्लैक मेल नहीं करता, उसे प्रताड़ित नहीं करता, उसे बदनाम नहीं करता, उसे दुःख नहीं पहुँचाता। प्यार के नाम पे अक्सर लोग धोका देते है, गुमराह करते है, शोषण करते हैं।प्यार जोड़ता है, तोड़ता नहीं है। प्यार की भाषा तो पशु-पक्षी-दरिन्दे भी समझते हैं। मनुष्य तो उन से ऊपर है। अगर वो यह नहीं समझता, तो वो इन से भी बड़ा दरिंदा है। 
कहते हैं प्यार अँधा होता है। यह जन्म-जन्मांतर का बंधन है। प्यार उम्र, जाति, धर्म, लिंग, देश, सीमा आदि को नहीं देखता। परन्तु भगवान ने मनुष्य को सोचने-समझने की शक्ति दी है। मनुष्य को बुद्धि का प्रयोग अवश्य ही करना चाहिये, ताकि बाद में उम्र भर पछताना ना पड़े। 
कोई देश से प्यार करता है तो कोई धन से। आजकल ऐसा लगता है जैसे कि लोगों का देश के प्रति प्यार खत्म ही हो गया है। जिसे देखो पैसे के पीछे पागल हो रहा है।  
LOVE-प्यार-स्नेह :: keeps the members of a family-society-group, tied-bound-attached together. It's a feeling-recognition of responsibility-discharging of duties-liabilities. Perhaps this generation wants the expression of love in the form-terms of words-fulfillment  of their unreasonable/unjustified demands-acceding to emotional blackmail. The youngster always talks of generation gap, without understanding that old-young and so young are all living during the same phase of time.
Families in which both husband and wife are working, are busy through out the day and even at nights.They find it extremely difficult to devote time to the children. A wide gap starts creeping into their relations. Children are left in the company-at the mercy of servants, with low moral character-ethics-sense-knowledge-etiquette. There are the children who have to spend their child hood in boarding-hostels. Where is the possibility of a bond formation between the son  and the father? Where are the emotions? Just ful filling needs-desires-demands-necessities-needs-requirements, meeting the teachers-warden-principal at the time of complaint and saying sorry and  later rebuking the child for their insult. In fact the parents avoid meeting the teachers unless until compelled to do so.  How can one expect the sentiments to grow! 
Having grown, the boy become closer to his wife and starts dancing to her tunes-to save his marriage. The involvement of sex-sensuality-passions-possessions-physical needs-pleasure-enjoyment play the game. The parents who did not bother to devote time to him, should not expect him to take their care, in old age.  It's a two way process.
Love and get loved-be loved. Love is eternal. Love is divine.
Since early childhood one saw films showing love affairs-love romance, which was not seen in real life. This type of learning is really very harmful for the immature mind. The type of dance-singing in parks, stage, parties could not be seen in real life. As a matter of fact real and reel life are poles apart. Love needs sacrifice, devotion, care which is not observed these days.
प्यार आचार-व्यवहार, हाव-भाव, चाल-चलन, आँखों में  दिखता है। 
क्या आप अपने माँ-बाप से प्यार करते हैं? यदि हाँ तो क्या आपने :- 
1. उनसे नमस्ते की/उनका हाल-चाल पूछा/उन्हें खाना खिलाया/उन्हें दवाई दी/डॉक्टर को दिखाया/उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति की ?
2. क्या वो किसी संस्था के सहारे जीवन बिताने को मजबूर हैं ?
3. क्या आप उनसे पैसे लेते-छींनते रहते हैं ?क्या कभी आपने अपनी कमाई उन्हें सौंपी ?
4. क्या आपने उन्हें उनके मकान से बेघर कर दिया है ? 
5. क्या आप उनकी इच्छाओं का सम्मान करते हैं-उनकी आज्ञा का पालन करते हैं ?
6. कहीं आप जाने-अनजाने उन्हें दुःख-दर्द-पीड़ा-कष्ट तो नहीं पहुँचा रहे हैं ?
7. क्या आप उनके दुःख-दर्द में शरीक-शामिल होते है ?
8. क्या आप उनके प्रति अपने कर्त्तव्य-दायित्व-जिम्मेवारी का निर्वाह कर रहे हैं ?
9. आपको उनसे मिले कितना वक्त गुजर गया है ?
10. क्या आप कभी अपने माता-पिता को घुमाने-खरीदारी-पिक्चर दिखाने के लिये लेकर गये हैं ?
BAROMETER OF YOUR LOVE TOWARDS PARENTS :: 
क्या आपके माता-पिता आपके बचपन में उपरोक्त बातें आपके साथ करते थे?
क्या उन्होंने कभी आपको अकेला-नौकरों के सहारे छोड़ा था ?
क्या उन्होंने आपको गीले में सोने दिया, आपके कपड़े नहीं बदले, आपको नहलाया नहीं, आपको स्कूल नहीं भेजा, पढ़ाया-लिखाया नहीं ?
क्या उन्होंने आपको कभी भूखे सोने दिया ?
क्या वे आपके स्कूल में आपकी उन्नति के बारे में जानने नहीं गये या टीचरों के बुलाने पर नहीं गये ?
क्या उन्होंने गलती करने पर आपसे भूल सुधारने को नहीं कहा-डांटा-फटकारा नहीं-पीटा नहीं ?
आप रोये तो उन्होंने आपको चुप नहीं कराया ?  
KARM :: Approaching God As one sows,so shall he reap.जैसा बोओगे वैसा काटोगे। This is theme-ideology behind Karm-deeds.
There are three paths to Salvation-renunciation-liberation-assimilation in the Almighty-the creator, the preserver-nurturer and the destroyer.
Karm Marg :: It is the easiest, simplest and is basis of the other two.One should do one's duty with devotion-virtuously-piously-righteously, with dedication and remembering the God in his mind-heart.
Gyan-Sankhy Marg :: This is the path, through which the devotee approaches the Ultimate truth through knowledge-enlightenment-prudence.
Bhakti Marg :: This is the path meant for those who do not indulge or isolate themselves from the world around them, even after living in it and continue with prayers-sacrifices-Haven-Agnihotr-meditation-asceticism and the like.
प्रार्थना-Prayer हे प्रभु! मुझ में तेरे प्रति श्रद्धा, भक्ति, विश्वास, आस्था,  निष्ठा,  प्रेम और ज्ञान की ज्योति सदैव जाग्रत-कायम रहे।  समस्त प्राणियों के प्रति करुणा मय प्रेम हो। 
तुम्हारी कृपा  से  मेरे शरीर, आत्मा, बुद्धि-विवेक, मन, प्राण, चेतना, ध्यान, चित्त में, तुम्हारा, देवी देवताओं, परमात्मा, माँ भगवती, परम पिता परब्रह्म परमेश्वर भगवान सदाशिव का नित्य निवास-स्थाई निवास हो।
O God! Kindly bless me with faith, devotion, trust-confidence-reliance-belief, belief-inclination-regard-respect, reverence-devotion-faith-allegiance-devout-fulfilment of all religious duties, love-affection, and knowledge-enlightenment along with compassion-pity-mercy-tenderness towards all creatures for ever. My body, soul, intelligence-mind-brain, prudence, mood-mind and heart, vital breath, consciousness-recollection-intelligence of mind, attention of mind-contemplation-meditation-memory, reflection-thought-understanding of mind should become permanent abode of the Almighty, Mother Bhagwati, Par Brahm Parmeshwar  Bhagwan Sada Shiv.
हे प्रभु! मुझे व मेरे स्वजनों को मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद्बुद्धि, सद भावना, सदगति  प्रदान कर। तेरी कृपा से हमारी  समस्त शुद्ध सात्विक  इच्छाएं, मनोकामनाएँ, मनोरथ सिद्ध  हो जायं।  हमें तुम्हारी अविचल, निश्छल, अनन्य, अनुपम, दिव्य, परम, अनन्त, अद्वितीय, नित्य, निर्मल  भक्ति की प्राप्ति हो।
O ! Almighty kindly bless me, my relatives and fellow people with detachment-liberation-salvation, devotion, purity of body-mind-heart and soul, prudence-enlightenment-purity of thoughts, good-feelings-thoughts-will,  and peaceful transformation to next birth.
हे परमात्मा-दयानिधान! कृपा करके मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति एवं  परमानंद प्रदान कर !
Almighty kindly bless me with religiosity, finances, sensuality (ability to perform righteous sex for family life/household duties, which considered as the best ashram), salvation, detachment (from vices-defects-sins-wickedness), devotion and Ultimate bliss-happiness.
तेरी  छत्र छाया, मुझ पर, मेरे परिवार पर, सदा बनी रहे। हमें मुक्ति, भक्ति, आत्मशुद्धि, सद्बुद्धि सद्भावना, अनंत सुख-अक्षय सुख-परम सुख, परमानन्द की प्राप्ति हो।
Let the asylum-protection-shelter under you, be always available-bestowed upon me, my family-household members and fellow people.
हे परमात्मा ! हे भगवान ! कृप्या मुझे समस्त शारीरिक मानसिक दोषों, विकारों, विषय, वासनाओं, व्याधि-बीमारी-रोगों-तनावों  से मुक्त कर। 
O! God kindly protect me from vices-defects-wickedness.
One should not smear, stained, sullied, engross, discredited, attached, sullied to the following and get rid of them, as early as possible:
1.काम-Sexuality- sex blindness, lust, sensuality, passions, wanton, amorous, 2.क्रोध- Anger,  3.मद- Intoxication, pride, arrogance, conceit, vanity, 4. लोभ-Greed, eager, covet, 5. मोह-Allurement,  6. ईर्षा-Envy, 7. आलस्य-Laziness, 8. मान-Pride, vanity,  9.अपमान-Insult, disrespect, disgrace, contempt, curse, reproach 10.भय-Fear, 11. निद्रा-Sleep, 12. थकान-Tiredness, 13.शोक-Grief, condolence, mourning,  14.संताप- Anguish, suffering, grief, remorse, 15. दुःख-Sorrow, pain, sadness, grief, distress 16.कष्ट-  Trouble, difficulty, wretchedness,  17.पाप-Sin, devil, satanic, wicked, vicious, corrupt, villain, wretch, enemy 18.मत्सरी-Envious, jealous, hostility,  19.प्रमाद-Intoxication, frenzy 20.निंदा-Blame, censure, scorn, abuse, defamation, slander, criticism, blasphemy, scolding, reproach, scorn, 21.त्रष्णा-Thirst desires, longing 22. अहंकार-दंभ-दर्प-Egotism, pride, arrogance, 23.भोग-Pleasure, gratification, suffering, enjoyment,  24. कुमती-Imprudence, 25. विलास-Sensuous pleasure,  luxurious life, flirting, 26. दंभ- Pretence-hypocrisy, deceit, boasting,  ostentation, 26.निराशा-Despair, disappointment, hopelessness, 27. द्वेष-Hatred, aversion, enmity, spite, 28.अपशब्द-Abuses, 29. असत्य-Falsehood-lies-fake-incorrect, 30. अधर्म- irreligious unrighteousness-immorality-wickedness-sins-crime-guilt-impiety 31. कुटेवों-Bad habits 32. कुविचार Ku Vichar-bad ideas- negative thoughts 33.कुसंगति Ku Sangti-bad company etc.
Wish to help the poor? Ascertain-be sure, that the money goes in right hands. One who is receiving help, does not waste it, or spent it on vices. Donations made for terrorist activities puts the donor in undefined hells for thousands and thousands of years.
There are two religions poor and the rich, have nots and haves, ruled and the ruler, down trodden and the wealthy. One who cares for the deprived class is closer to the Almighty.
The Almighty generated the female component called nature, out of himself, retaining the male component within himself. All organism-creatures-living beings, have both of these components in the form of a body and the soul. The soul acts as the driver.The soul is present-pervades, all over the body. It indicates towards equanimity among all.
Spare few minutes for prayers, whatever may your religion be, he-the God, is one and the same. You are a component of the Almighty-You remember him, he too remember you. You obtain divine protection as soon you dedicate yourself to the virtuous, righteous, deeds. Your dedication to work is surely going to help in an hour of need.
Always remember the God, before you start working. Remember, it's he who nourishes us all. He is present in all of us.
उपकार का बदला Help without seeking return :: अहसान को हमेशां याद रखो। वक्त आने पर, उपकार करने वाले की सहायता अवश्य करो।एक दूसरे की मदद करने का कोई भी मौका, हाथ से मत जाने दो, कभी यह अपेक्षा मत करो कि कोई लौट कर तुम्हारी मदद करेगा-बदले की इच्छा मत रखो। स्वयं को कभी निर्बल मत समझो। यह परमात्मा की कृपा है कि उसने तुमें दूसरों की मदद करने लायक समझा-बनाया। परमात्मा किस रूप में मिल जाये, ये हमें नहीं मालूम। अत: उस व्यक्ति में भगवान को देखो, जिसकी सहायता तुम कर रहो हो।
Always remember the person, who has helped you.When ever opportunity comes, let him be repaid, without being asked. One should never miss a chance-opportunity to help others-person in need. Never expect a person to return-to come back to help you. If he comes back to help you, in an hour of need, never reject the help, as well. Never consider yourself to be weak-incapable.Its the grace of God that He selected you, for forwarding help to the needy-downtrodden-poor. Thank him for this opportunity. One does not know,when, where and which form-shape He will come to you. Always consider the the one, who has been helped by you is a form-representative of the Almighty.
Realities of Life जीवन का सत्य :: Your father did a lot-sacrificed for his parents, brothers, sisters and even their children.You are sorry-full of aggression for the ones, who are helped by your father, but they turned their back, when you needed their support, help and consolation. They did not come forward- extended helping hands, when you were suffering and needed their help.
Have faith in God, try to become worthy son of a worthy father. You are blessed with capabilities and strength. Obstruction comes and go-just to teach-acquaint you of the realities of life . Learn to smile. One day or the other, you will be able to tide over all the difficulties.
Don't expect others to help or assist you, unless  until there is a motive. 
RETIREMENT :: One is going to retire from active service. He will get some money in the form of provident fund, pensionery benefits, depending upon the length of service and salary. He had been saving for the lean period as well. He did his bit to discharge all his responsibilities. Being wise enough, he built a house for him self and the family-dependants. He did all that which is essential for a household-family dweller.
He may or may not have enjoyed comforts but being young, he was able to face all challenges, illness, poverty, troubles, tensions, difficulties in life. He did not run away from his responsibilities. Now its going to face a phase in his life, when he is old, weak-fragile, in need of help-attention from the children.
The present day climate aided by desires-greed-motives-ambitions, drives  his children away from home. There are the children who never grew up to need of the hour or achieve success. They may remain dependent over him. At occasions greed and desires make the children-relatives, to snatch every thing from him and turn him out of his house, leading to begging-asylums-old age homes at the mercy of the government, charity organisations. There is not even a single  day when one do not learn-hear-read the torturous experiences-nightmares-horrifying stories of the old and fragile parents. Those who were grown up with a lot of affection-attention-care turn into vultures-parasites, never recognising the fact they too are going to face the same agony from the hands of their children.
There are cases where the old and retired people avail reverse mortgage of their property-which too is not advisable at this stage. One must have sufficient money to face any crisis-eventuality. He must write a will as well, in such a way that in the event of his death, his wife has not to depend over the children for money at least, forget care-nurture-help. The children should not be able to sell the property, till his wife is surviving. However he should ensure that all his savings-money-property goes to the children uniformly-none of the children should be able to acquire-pocket it, alone.
Hindus considers this as the third phase of life called as VAN PRASTH, followed by SANYAS. With the advent of KALIYUG the fourth cosmic era, in which its really very very difficult to follow the code of conduct, which is mainly meant for the sacred Brahmns.
It is extremely difficult to kill time. Though there are many activities in which one can engage himself. Its very common to find one glued to TV-INTERNET, but how long!?
One should get up normally and go for a morning walk before taking mild physical exercise-YOG. Meals should be reduced. Tea-coffee should be within the permissible limits. One may find interest in scriptures-epics-stories. One finds people idealing away their time playing cards or gossip. Some people gather together and try to help each other listening to others difficulties and suggesting ways and means to come out of trouble-difficulty. Their tensions-loneliness is reduced considerably. One should completely stop intake of meat products-wine-smoking etc. as a precautionary measure. Outings-travel may also help a lot as far as possible, if health permits. If possible, skip night meals-dinner.
Try to remain tension free as far as possible. Go for medical check up as and when need arises. Still regular medical check up, is helpful. Devote more and more time to prayers-rituals-helping others. Be pious-honest-truthful-free from passions-sensualities-sexuality.
Don't worry-चिंता मत करो: A lot of effort-labour was done to earn money through honest means to bring up children. Their requirements-needs were met, just for asking. They have grown up and married. They may pass through the same cycle of earning. One wants them to take care of him, which turns futile. At the time of retirement  a lot of money was received through pensionery benefits. Children want him to give the money to them. Parents can be sent to old age homes, against their wish-will. Money should be held, so that one does not look to the children, in an hour of need. One day or the other, they will desert parents to become independent, to do things as per their own and will desire, just by ignoring-side lining parents. There is nothing to worry, since this is bound to happen.There is no point in grieving. Adjust lifestyle-yourself to live without them. If one expects the children to realize their mistake, it will prove to be futile-nightmare. Have courage and devote yourself to the God and those who needs your services. A lot is left to be done.
बहुत ईमानदारी और मेहनत से धन कमाकर बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, पाला-पोसा, बड़ा किया।सोचा था कि बड़े होकर सेवा करेंगे। उनकी हर जरुरत पूरी की। वे अब बड़े हो गए हैं। उनकी शादी हो गई है। अब वे भी कमाने खाने के चक्र में लग जायेंगे। व्यक्ति चाहता है कि  वे उसकी देखभाल करें। परन्तु ऐसा अक्सर होता नहीं है। वो तो इस फ़िराक में थे कि रिटायरमेंट का पैसा भी उन्हें मिल जाये। पैसा ऐंठने का कोई भी मौंका वो गँवाना नहीं चाहते। वो तो माँ बाप को उनकी इच्छा के विरुद्ध,  उन्हें ओल्ड ऐज होम भी भेज सकतें हैं।ऐसे अवसर के आने से पहले ही सावधान रहना चाहिए-ऐसे वक्त के लिए धन सुरक्षित रखना चाहिये। एक न एक दिन वो माँ बाप को छोड़ ही जायेंगे। फिर परेशानी-कुंठा-चिंता-दुःख  किस लिए। वो खुद अपने हिसाब से चलना चाहतें हैं। अपने आप को ऐसे ढालो कि  उनकी जरूरत ही महसूस न होने पाए। अभ्याससे ऐसा संभव है। अगर ऐसा सोचते हो कि बच्चे अपनी भूल-गलती सुधारेंगे तो इंतजार में बैठे रहो,कुछ होने वाला नहीं है।हिम्मत करो, अभी बहुत  कुछ करना बाकि है। ध्यान भगवान में लगा कर उठ खड़े हो। अभी बहुत कुछ  है, करने को।  
Deeds accompany us-पुन्य पाप साथ चलेंगे: The earth witnessed the mighty Kings-people, wealthy, ascetics, donors, enlightened, dreaded dacoits-murderers, none of them survived. They all went along with the auspicious-pious-virtuous-righteous deeds, sins.
There is no reason, why one should indulge in lies, deceiving, cheating, forgery, theft, dacoities,  terrorism, rape, murder, frauds, sinful acts which only sends the doer to unspecified hells for millions-millions of years and to take birth as insects, in repeated births after rebirths.
एक से बड़ा एक दानी, महात्मा, ज्ञानी, विद्वान्, महापुरुष, धनी, शक्तिशाली, वैभव शाली, अत्याचारी, दुराचारी, पाखंडी, चक्रवर्ती सम्राट, चोर, हत्यारा, डाकू, लुटेरा, आया और चला गया; साथ गया तो, केवल उसका पाप या पुण्य। पापी को तो अनेक नरकों को भुगतना ही पड़ेगा और उसके बाद जन्म जन्मान्तरों तक कीड़ा बनना पड़ेगा।कर्मफल: बुद्धिमान लोग स्वर्गलोक में दिव्य शरीर  द्वारा जो शुभ कर्म करते हैं, वे उसी शरीर  से उन कर्मों के फल का उपभोग करते हैं; क्योंकि देव-योनि में कर्म तुरंत फल दायक हो जाते हैं। मानव योनि में मृत्यु के पश्चात्-जन्मान्तर में कर्मफल भोगना पड़ता है।माँ भगवती के 108 नामों के जप से अन्यान्य बहुत से देवता, दैत्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों ने भी मनों-वांछित सिद्धियाँ प्राप्त की हैं। इसका  निरंतर-लगातार अभ्यास, जप-पाठ करने पर शोक और दुर्गति का प्रवेश नहीं होता।
The enlightened-intelligent people-being, who perform virtuous-righteous-pious deeds in divine body, are awarded-obtain, the rewards-results-fruits, of their deeds in the divine bodies immediately. It's in the human embodiment that the outcome-result-impact, is observed only after death, in the next repeated births and rebirths.
By the recitation of the 108 names of the mother nature-Maa Bhagwati many-many Deities, Monsters, Giants, Brahmn, Kshatriy, Vaishy,and Shudr were able to get rid of the harmful impacts of grief-pain, sorrow, turmoil, disasters.
यदि परमात्मा की भक्ति पाने की इक्छा है  तो कमल के समान जियो, सर्वव्यापी को हर वक्त याद रखो, साधना में शांति पूर्वक- द्रढ़ता  से  लगे रहो, संसार से कोई लगाव न रखो, फल की इच्छा मत रखो, निडरता पूर्वक अपनी साधना में लगे रहो। भगवान तुम्हारा भला करेगा। हरी ओम तत  सत। 
Do not be afraid of Pleasure-Pain, face them दुःख से-डरो मत, इसका  सामना-करो। दुःख-से-मुक्ति, सुखी बनाती है। सुख दुःख जीवन के क्रम हैं।
Freedom from pains-sorrow-grief-tensions-troubles make one happy.
सुख-दुःख-एक-ही-सिक्के-के-दो-पहलू-हैं। Pleasure and pain are the two sides of the same coin.
सुख-के-बाद-दुःख-और-दुःख-के-बाद-सुख-आता-है। They are cyclic in nature.
कामना Desire: ॐ गंगणपतये  नम:  Om Ganganpatye namh.  हे गणपति बाबा जी महाराज।  हे गजानन,  लम्बोदर,  विनायक, विघ्न हर्ता, विघ्नेश्वेर, माता गौरी भगवान शिव के पुत्र, रिद्धि- सिद्धि के स्वामी,  भगवान कार्तिकेय के भाई व नंदिश्वेर के सहचर!
O Ganpati-O Gajanan, Lamboder, Vinayak, Vighnhurta, Vighneshwer, the worthy son of mother Gauri and Bhagwan Shiv, the husband-master of Riddhi-Siddhi and the mighty brother of Bhagwan Kartikay and colleague of Nandishwer  ; kindly bless me that my Physique-body, Mun-mood-mind  & heart, Atma-soul, Buddhi-intelligence-mind-brain, Chitt-reflections-thought-understanding of mind, Dhyan-meditation-contemplation-memory-attention of mind, Chetna-consciousness-recollection-intelligence of mind & brain, house-home-family-household members, becomes the permanent abode of Devi-Devta-deities, Param Pita Per Brahm Permashwer Bhagwan Sada Shiv.
मेरे शरीर, मन, आत्मा, प्राण, बुद्धि, विवेक, चित्त, ध्यान, चेतना, घर- मकान- परिवार, में तुम्हारा देवी- देवताओं, परम पिता-पर ब्रह्म परमेश्वर भगवान सदाशिव का, नित्य निवास हो, स्थाई निवास हो।
Let me assimilate in Param Pita Per Brahm Permashwer Bhagwan Sada Shiv for ever, with your kindness and blessings.
तुम्हारी कृपा से मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर भगवान सदाशिव में सदा सर्वदा-सदैव के लिए, लीन और एकाकार हो जाऊँ।                                                       

ILLUSION ALLUREMENT मोह-माया (Allurement-delusion-ignorance) ::  One will not be able to qualify for assimilation in God-liberation, till he over powers this faculty.It keeps one struck-attached with the world. One has affection-attachments for the children-relations-property-wealth etc. Indifference-neglect is useful. Which can not be cut easily. One can seek guidance-help from the enlightened-Guru.
भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण किया राक्षसों को छलने के लिये। 
कंस ने जैसे ही वासुदेव जी के आठवें बच्चे जो कि एक कन्या से बदला गया था, को शिला  पर पटकने के लिये उठाया वह छिटक कर आसमान में चली गई और अष्ट भुजा देवी में बदल गई और उन्होंने कंस को बताया कि उसको मारने वाला पैदा हो चुका है। वे भगवान श्री कृष्ण की माया ही थीं। 
विश्व कर्म ने पाण्डवों के लिये माया भवन की रचना की, जिसमें द्रौपदी ने दुर्योधन को अन्धे का अँधा कहा। वो ना भी कहतीं, तो भी महा भारत तो होना ही था। 
धृष्ट्रराष्ट्र ना केवल आँखों से, बल्कि मोह में भी अँधा था। 
भगवान श्री कृष्ण ने इस संसार को माया जाल कहा है। 
मोक्ष की  कामना भी एक माया का ही अंग तो है 
माया से मुक्ति के लिए दसों इन्द्रियों  का शमन करना आवश्यक है। भक्ति पूर्वक, ज्ञान का सहारा लेकर कर्म करने से मुक्ति-मोक्ष की स्वतः प्राप्ति हो जाती है अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता। वर्णाश्रम धर्म गृहस्थाश्रम मुक्ति का सहज साधन हैं। 
The whole world is illusory by nature. Which is there, which was not there and will not be there is illusionary. Illusion keeps the soul tied with the repeated cycles of births and rebirths, till one detaches himself off, with the allurements-attractions-bonds with the world.
INDECISIVENESS  अंतर्द्वंद-द्विधा :: One often faces situations, when he is unable to decide what to do. He fails to take decisions, in spite of perfect mental health-balance.  This situation results  in  tensions-losses-troubles-
difficulties. Its better if one postpone the decision for the time being. Let the situation become favorable. Till then, review can be done. Weaknesses can be identified-sorted out-reconsidered-studied. One must not hesitate in consulting the wise man-experienced-mature people. Soul searching too helps a lot. Any thing evil-wicked-sin may be rejected summarily.
अनिर्णय-अंतर्द्वंद-द्विधा की स्थिति जीवन में अक्सर बहुत परेशानी-नुकसान-बर्बादी-दुःख-सरदर्द  का कारण बन जाती है। इसकी वजह से भी आँखों में आँसू आ जाते हैं। 

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