Monday, December 29, 2014

EGO-PRIDE घमण्ड-अभिमान-गर्व

EGO-PRIDE घमण्ड-अभिमान-गर्व 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By:: Pt. Santosh Bhardwaj  
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PhotoId (-man's unconscious instincts and impulses), Ego (-individual's perception or experience of himself, self esteem, self centered or self seeking act, capacity to think-boasting self) and Super Ego are the words meant to describe man's pride. Ego leads to such acts which harm-punish-torture innocent people and bring out tears in their eyes.
  • The moment one suffers from the feeling of I-MY-ME-MINE or that he is great, he sows the seeds of his destruction-down fall.
  • Egoist is generally side lined in the society.
  • घमंड, अभिमान, स्वाभिमान, अहंकार, आत्म श्लाघा मनुष्य को निम्नतम स्तर तक पहुँचाने वाले हैं।  कहते हैं "घमंडी का सर नीचा होता है"। 
  • मैं बहुत बड़ा हूँ। मैं बहुत-सबसे अधिक अमीर-धनवान, शक्तिशाली, बल शाली, दानवीर, योद्धा, बुद्धिमान, समझदार, ताकतवर, विद्वान, विनम्र, धर्मिक आदि आदि हूँ।
  • मनुष्य में मैं का आना उसके विनाश का द्योतक-सूचक है। विनाश काले विपरीत बुद्धि-मैं पन  आ ही जाता है। फलों से लदे वृक्ष की डालियाँ खुद झुक जाती हैं। बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंथी-पंछी को छाया नहीं फल लगे अति दूर। 
  • हिरन्यकश्यप, हिरण्याक्ष, रावण, कुम्भकर्ण, शिशुपाल, दृष्टदन्त्र, कंस, जरासन्ध, दुर्योधन जैसे घमंडियों का नाश हो गया, औरों की तो बात ही क्या है?!
  • वो MLA, MP, Minister क्या बना उसका माथा घूम जाता है। पैर धरती पर नहीं पड़ते। अपने को बड़ा और अन्य लोगों से अलग समझने लगता है। जिन लोगों ने उसे चुनाव जिताया उन्हें तुच्छ और स्वयं को भगवान मन बैठता है। उसके लड़के-लड़कियाँ किसी से भी कुछ भी कहने का अधिकार मान हैं।  वे समझने लगते हैं कि देश के नियम और कानून उनके लिये नहीं हैं। वैसे तो आजकल संसद, विधान सभाओं में अपराधी और अपराधी प्रवृति के लोगों का ही बोल-बाला है। कोई गरीब आदमी चुनाव लड़ने और जीतने की हिमाकत कर ही कैसे सकता है?! उनको मालूम है कि उनके खिलाफ़ मुकदद्मों का फैसला होने में ही उम्र निकल जायेगी। फिर डर किस बात का ? जिन लोगों ने कानून बनाया था उन लोगों ने अपने फ़ैसने पर बचने का रास्ता तो पहले से ही निकल लिया था। 
आत्म  सम्मान, देश-औलाद पे गर्व अच्छी बात है।  Its good to be proud over our country-children or any one who has done something extraordinary for the sake of his country-world-humanity.
घमंडियों-आतातियों-अत्याचारियों-व्यभिचारियों  के अत्याचारों से सताये गये व्यक्ति की आँखों में आंसू आ ही जाए हैं, जिनसे उनका सर्वनाश-सत्यानाश हो जाता है। 
(I) सत्य भामा, गरुड़ जी और सुदर्शन चक्र: श्रीकृष्ण द्वारका में रानी सत्यभामा के साथ सिंहासन पर विराजमान थे, निकट ही गरुड़ और सुदर्शन चक्र भी बैठे हुए थे। तीनों के चेहरे पर दिव्य तेज झलक रहा था। बातों ही बातों में रानी सत्यभामा ने श्रीकृष्ण से पूछा कि हे प्रभु, आपने त्रेता युग में राम के रूप में अवतार लिया था, सीता आपकी पत्नी थीं। क्या वे मुझसे भी ज्यादा सुंदर थीं? द्वारकाधीश समझ गए कि सत्यभामा को अपने रूप का अभिमान हो गया है। तभी गरुड़ ने कहा कि भगवान क्या दुनिया में मुझसे भी ज्यादा तेज गति से कोई उड़ सकता है। इधर सुदर्शन चक्र से भी रहा नहीं गया और वह भी कह उठे कि भगवान, मैंने बड़े-बड़े युद्धों में आपको विजय श्री दिलवाई है। क्या संसार में मुझसे भी शक्तिशाली कोई है?
भगवान मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे। वे जान रहे थे कि उनके इन तीनों भक्तों को अहंकार हो गया है और इनका अहंकार नष्ट होने का समय आ गया है। ऐसा सोचकर उन्होंने गरुड़ से कहा कि हे गरुड़! तुम हनुमान के पास जाओ और कहना कि भगवान राम, माता सीता के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। गरुड़ भगवान की आज्ञा लेकर हनुमान को लाने चले गए। इधर श्रीकृष्ण ने सत्यभामा से कहा कि देवी आप सीता के रूप में तैयार हो जाएं और स्वयं द्वारकाधीश ने राम का रूप धारण कर लिया। मधुसूदन ने सुदर्शन चक्र को आज्ञा देते हुए कहा कि तुम महल के प्रवेश द्वार पर पहरा दो और ध्यान रहे कि मेरी आज्ञा के बिना महल में कोई प्रवेश न करे।
भगवान की आज्ञा पाकर चक्र महल के प्रवेश द्वार पर तैनात हो गए। गरुड़ ने हनुमान के पास पहुंच कर कहा कि हे वानरश्रेष्ठ! भगवान राम माता सीता के साथ द्वारका में आपसे मिलने के लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। आप मेरे साथ चलें। मैं आपको अपनी पीठ पर बैठाकर शीघ्र ही वहां ले जाऊंगा। हनुमान ने विनयपूर्वक गरुड़ से कहा, आप चलिए, मैं आता हूं। गरुड़ ने सोचा, पता नहीं यह बूढ़ा वानर कब पहुंचेगा। खैर मैं भगवान के पास चलता हूं। यह सोचकर गरुड़ शीघ्रता से द्वारका की ओर उड़े। पर यह क्या, महल में पहुंचकर गरुड़ देखते हैं कि हनुमान तो उनसे पहले ही महल में प्रभु के सामने बैठे हैं। गरुड़ का सिर लज्जा से झुक गया। तभी श्रीराम ने हनुमान से कहा कि पवन पुत्र तुम बिना आज्ञा के महल में कैसे प्रवेश कर गए? क्या तुम्हें किसी ने प्रवेश द्वार पर रोका नहीं? हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए सिर झुका कर अपने मुंह से सुदर्शन चक्र को निकाल कर प्रभु के सामने रख दिया। हनुमान ने कहा कि प्रभु आपसे मिलने से मुझे इस चक्र ने रोका था, इसलिए इसे मुंह में रख मैं आपसे मिलने आ गया। मुझे क्षमा करें। भगवान मंद-मंद मुस्कुराने लगे। हनुमान ने हाथ जोड़ते हुए श्रीराम से प्रश्न किया हे प्रभु! आज आपने माता सीता के स्थान पर किस दासी को इतना सम्मान दे दिया कि वह आपके साथ सिंहासन पर विराजमान है।
अब रानी सत्यभामा के अहंकार भंग होने की बारी थी। उन्हें सुंदरता का अहंकार था, जो पल भर में चूर हो गया था। रानी सत्यभामा, सुदर्शन चक्र व गरुड़ तीनों का गर्व चूर-चूर हो गया था। वे भगवान की लीला समझ रहे थे। तीनों की आंख से आंसू बहने लगे और वे भगवान के चरणों में झुक गए। अद्भुत लीला है प्रभु की। अपने भक्तों के अंहकार को अपने भक्त द्वारा ही दूर किया।
(II) अर्जुन और हनुमान मिलन: अर्जुन को अपनी तीरंदाजी पर घमण्ड हो गया। भगवान् श्री कृष्ण अपने भक्तों को घमण्ड से सुरक्षित रखते हैं। ऐसे में एक दिन अर्जुन नदी के किनारे अभ्यास हेतु पहुँचे तो उन्हें एक छोटा बन्दर मिला। वह नदी पार करना चाहता था। अर्जुन को दया आ गई। उन्होंने नदी पर अपने बाणों से पुल का निर्माण कर दिया और बन्दर से उस पार जाने को कहा। जैसे ही बन्दर ने पुल पर पैर रखा, पुल टुकड़े-टुकड़े हो गया। अर्जुन भौंचक्के रह गये। उन्हें अपने आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने  विचार किया तो पाया कि बन्दर कोई साधारण जीव नहीं है। उन्होंने पूरी श्रद्धा-भक्ति भाव से प्रार्थना की बन्दर ने स्वयं को प्रकट किया। वे हनुमान जी थे, जो कि भगवान् श्री कृष्ण की इच्छा से अर्जुन से मिलने आये थे। उन्होंने अर्जुन से वरदान माँगने को कहा तो अर्जुन ने उनसे युद्ध में साथ रहने और रक्षा करने की प्रार्थना की। महा भारत युद्ध में हनुमान जी अर्जुन के रथ पर उनकी ध्वजा में बने रहे। जैसे ही उन्होंने पताका और रथ को छोड़ा; रथ पल भर में भस्म हो गया। 
(III) सहस्त्रबाहु अर्जुन और रावण: हैहय वंशी अर्जुन भगवान् नारायण के अवतार दत्तात्रेय जी को प्रसन्न कर उनसे एक सहस्त्र भुजाएं और युद्ध में किसी से भी न हारने का वरदान प्राप्त कर लिया। नर्मदा में स्नान करते वक़्त मदोन्मत्त सहस्त्रबाहु ने नर्मदा की धारा को रोक दिया तो वह उलटी बहने लगी। वहीं दशानन रावण का शिविर लगा हुआ था। उसने सहस्त्रबाहु अर्जुन से दुर्वचन कहे। सहस्त्रबाहु ने उसे खेल-खेल में पकड़ लिया और अपनी राजधानी महिष्मती में ले जाकर बन्दर के समान कैद कर लिया। बाद में पुलस्त्य जी के कहने पर उसे छोड़ा। 
(IV) बाली और रावण: रावण को अपनी शक्ति पर बहुत अभिमान था। देवताओं को जीतकर उसने उल्टा लटका दिया। वो बाली के पास जा पहुँचा। बाली उस वक्त अपने पिता सूर्य भगवान् की पूजा अर्चना कर रहा था। छेड़-छाड़ करने पर बाली ने रावण को पकड़ कर अपनी बाईं काँख (-left arm pit) में दबा लिया और किष्किन्धा की ओर उड़ चला। रावण को अपनी शक्ति का पता चल गया। उसने मांफ़ी माँगी और बाली से दोस्ती कर ली। 
(V) हनुमान जी और रावण: हनुमान जी बचपन में बहुत शैतान थे। उन्होंने रावण को तपस्या करते देखा तो उत्सुकतावश उससे छेड़-छाड़ की। उनकी शक्ति से रावण डर गया। जब हनुमान जी ने लंका में आग लगाई तो रावण हनुमान जी को पहचान नहीं पाया। 
(VI) हनुमान जी और भीम सेन: एक दिव्य कमल बहता हुआ पांडवों के पास पहुँचा तो उसकी सुगन्ध से द्रौपदी बहुत प्रसन्न हुई और उसने भीम से वैसे ही और कमल लाने को कहा। भीम सेन खोजते-खोजते कदली वन जा पहुँचे। वहाँ उन्हें एक बूढ़ा बन्दर मिला, जिसने भीम का मार्ग अवरुद्ध कर दिया। भीम ने उनसे रास्ता देने को कहा तो वानर ने कहा की वे बहुत बूढ़े और अशक्त हैं अतः भीम उनकी पूँछ हटाकर निकल जायें। भीम ने बहुत प्रयास किया पर असफल रहे। उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ पर बहुत घमण्ड था। उनका घमण्ड टूट गया। उन्होंने शरणागत होकर वानर का परिचय माँगा तो हनुमान जी प्रकट हो गए। उन्होंने बताया कि वे पवन पुत्र हैं और भीम उनके छोटे भाई हैं। 

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