Saturday, December 6, 2014

RELIGION-DHARM धर्म

RELIGION-DHARM धर्म
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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DHARM :: Everything prescribed by the epics-scripters, leading to Sadgati (improvement of Perlok-next birth-incarnation, abode) by undertaking chastity, ascetic, righteous, auspicious, pious acts-austerities  and rejecting inauspicious acts. Whole hearted efforts, expenses made; devotion of body, mind and soul, physique, ability, status, rights, capabilities for the welfare of others (mankind, society, world), leading to the welfare of the doer is Dharm.
शास्त्रों में बताया गया विधान जो कि कर्म परलोक में सद्गति प्रदान करता है, वह धर्म है। माँ-बाप, बड़े-बूढ़े, दूसरों की सेवा करना-सुख पहुँचाना, अपने तन, मन, धन सामर्थ, योग्यता, पद, अधिकार, आदि को समाज सेवा में उपयोग करना धर्म है। कुँआ, तालाब, बाबड़ी, धर्मशाला, शिक्षण संस्थान,अस्पताल, प्याऊ-सदावर्त, निष्काम भाव सेवा, आवश्यकतानुसार उदारता पूर्वक खर्च करना और बिना लोभ, लाभ, लिप्सा, लालच, स्पृहा के इन कार्यों को करना आदि धर्म हैं। वर्णाश्रम धर्म और कर्तव्य का पालन धर्म है।
ADHARM :: Use of position-status for inauspicious acts, selfishness, teasing, paining others, cruelty, torture, terrorism, vices, wickedness, snatching others belongings, murder etc. is Adharm. It creates bonds, ties and hurdles for the doer. Scriptures have prescribed-described the various acts an individual should do, depending upon Varn, Ashram, Country, social decorum, convention, dignity and the situation.
धर्म में कुधर्म, अधर्म, और परधर्म का समिश्रण होता है। दूसरे के अनिष्ट का भाव, कूटनीति आदि, धर्म में कुधर्म हैं। यज्ञ में पशुबलि देना आदि धर्म में अधर्म है। जो अपने लिए निषिद्ध है, ऐसा दूसरे वर्ण, आश्रम आदि का धर्म, धर्म में पर धर्म है। कुधर्म, अधर्म और परधर्म से कल्याण नहीं होता। कल्याण उस धर्म से होता है, जिसमें अपने स्वार्थ तथा अभिमान का त्याग एवं दूसरे का वर्तमान और भविष्य में हित शामिल है। [श्रीमद् भगवद्गीता (3.35)] 
अपने-अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार मनुष्य जो भी धर्म का अनुष्ठान करते हैं, उसकी सिद्धि इसी में है कि भगवान् प्रसन्न हों। इसलिये एकाग्र मन से भक्तवत्सल भगवान् का ही निरन्तर श्रवण, कीर्तन, ध्यान और आराधना करते रहना चाहिये। [श्रीमद्भागवत 1.2.13-14]
धर्म के 30 लक्षण :: सत्य, दया, तपस्या, शौच, तितिक्षा, उचित-अनुचित का विचार-ज्ञान, मन का संयम, इन्द्रियों का संयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, संतोष, समदर्शी महात्माओं की सेवा, धीरे-धीरे सांसारिक भोगों की चेष्टा से निवृति, मनुष्य के अभिमान पूर्ण प्रयत्नों का फल उल्टा ही होता है-यह विचार धारण करना, मौन, आत्मचिंतन, प्राणियों को अन्न आदि का यथायोग विभाजन-वितरण, उनमें और विशेष करके मनुष्यों में अपने आत्मा तथा इष्टदेव का भाव, संतों के परम आश्रय भगवान् श्री कृष्ण के नाम-गुण-लीला आदि का श्रवण, कीर्तन, स्मरण, उनकी सेवा, पूजा और नमस्कार; उनके प्रति दास्य, सख्यसाथी-प्रेमी, और आत्म समर्पण। ये तीस प्रकार का आचरण, सभी मनुष्यों का परम धर्म है। इसके पालन से सर्वात्मा भगवान् प्रसन्न होते हैं। यह उपदेश प्रह्लाद जी ने अपने बाल्य काल में अपने सहपाठियों को दिया। उन्होंने यह सब नारद जी के मुँख से अपनी माँ को कहते सुना जब वे गर्भ में थे [श्रीमद्भागवत 11.7.8-12]
धर्म वह है जो मनुष्य को आदर्श जीवन जीने की कला और मार्ग बताता है। केवल पूजा-पाठ या कर्मकांड ही धर्म नहीं है। धर्म मानव जीवन को एक दिशा देता है। विभिन्न पंथों, मतों और संप्रदायों द्वारा जो नियम, मनुष्य को अच्छे जीवन यापन,  प्रेम, करूणा, अहिंसा, क्षमा और अपनत्व का भाव उत्पन्न करते हों वही धर्म हैं। 
धारणाद्धर्ममित्याहुः धर्मो धारयते प्रजाः। यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥
धर्म शब्द संस्कृत की 'धृ' धातु से बना है, जिसका तात्पर्य है धारण करना, आलंबन देना, पालन करना। धारण करने योग्य आचरण धर्म है। सही और गलत की पहचान कराकर प्राणि मात्र को सद मार्ग पर चलने के लिए अग्रसर करे, वह धर्म है। जो मनुष्य के जीवन में अनुशासन लाये वह धर्म है। आदर्श अनुशासन वह है, जिसमें व्यक्ति की विचार धारा और जीवन शैली सकारात्मक हो जाती है। जब तक किसी भी व्यक्ति की सोच सकारात्मक नहीं होगी, धर्म उसे प्राप्त नहीं हो सकता है। धर्म ही मनुष्य की शक्ति है, धर्म ही मनुष्य का सच्चा शिक्षक है। धर्म के बिना मनुष्य अधूरा है, अपूर्ण है।
"धार्यते इति धर्म:" अर्थात जो धारण किया जाये वह धर्म है। लोक परलोक के सुखों की सिद्धि के हेतु सार्वजानिक पवित्र गुणों और कर्मों का धारण व सेवन करना धर्म है। यह मानव जीवन को उच्च व पवित्र बनाने वाली, ज्ञानानुकुल, मर्यादा युक्त पद्यति है। सदाचार युक्त जीवन ही धर्म है। धर्म ईश्वर में दृढ आस्था, विश्वास का प्रतीक है। इसका आधार ईश्वरीय सृष्टि नियम है। यह मनुष्य को पुरुषार्थी बनाकर मोक्ष प्राप्ति की शिक्षा देता है।
मनुस्मृति के अनुसार धर्म के 10 लक्षण हैं ::
धृतिः :- क्षमा दमोस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
अर्थात :- धैर्य, क्षमा, संयम, अस्तेय, पवित्रता, इन्द्रिय निग्रह, धी या बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना, ये धर्म के दस लक्षण हैं।
धैर्य :- धन संपत्ति, यश एवं वैभव आदि का नाश होने पर धीरज बनाए रखना तथा कोई कष्ट, कठिनाई या रूकावट आने पर निराश न होना।
क्षमा :- दूसरो के दुर्व्यवहार और अपराध को लेना तथा आक्रोश न करते हुए बदले की भावना न रखना ही क्षमा है।
दम :- मन की स्वच्छंदता को रोकना। बुराइयों के वातावरण में तथा कुसंगति में भी अपने आप को पवित्र बनाए रखना एवं मन को मनमानी करने से रोकना ही दम है।
अस्तेय, अपरिग्रह :- किसी अन्य की वस्तु या अमानत को पाने की चाह न रखना। अन्याय से किसी के धन, संपत्ति और अधिकार का हरण न करना ही अस्तेय है।
पवित्रता (शौच) :- शरीर को बाहर और भीतर से पूर्णत: पवित्र रखना, आहार और विहार में पूरी शुद्धता एवं पवित्रता का ध्यान रखना।
इन्द्रिय निग्रह :- पांचों इंद्रियों को सांसारिक विषय वासनाओं एवं सुख-भोगों में डूबने, प्रवृत्त होने या आसक्त होने से रोकना ही इंद्रिय निगह है।
धी :- भलीभांति समझना। शास्त्रों के गूढ़-गंभीर अर्थ को समझना आत्मनिष्ठ बुद्धि को प्राप्त करना। प्रतिपक्ष के संशय को दूर करना।
विद्या :- आत्मा-परमात्मा विषयक ज्ञान, जीवन के रहस्य और उद्देश्य को समझना। जीवन जीने की सच्ची कला ही विद्या है।
सत्य :- मन, कर्म, वचन से पूर्णत: सत्य का आचरण करना। अवास्तविक, परिवर्तित एवं बदले हुए रूप में किसी, बात, घटना या प्रसंग का वर्णन करना या बोलना ही सत्याचरण है।
आक्रोश :- दुर्व्यवहार एवं दुराचार के लिए किसी को माफ करने पर भी यदि उसका व्यवहार न बदले तब भी क्रोध न करना। अपनी इच्छा और योजना में बाधा पहुँचाने वाले पर भी क्रोध न करना। हर स्थिति में क्रोध का शमन करने का हर संभव प्रयास करना।
धर्म का स्वरुप :: धर्म अनुभूति का विषय है। यह मुख की बात मतवाद अथवा युक्तिमूलक कल्पना मात्र नहीं है। आत्मा की ब्रह्मस्वरूपता को जान लेना, तद्रुप हो जाना-उसका साक्षात्कार करना, यही धर्म है। यह केवल सुनने या मान लेने की चीज नहीं है। समस्त मन-प्राण का विश्वास की वस्तु के साथ एक हो जाना-यही धर्म है।[स्वामी विवेकानंद]
वेदों एवं शास्त्रों के मुताबिक धर्म में उत्तम आचरण के निश्चित और व्यवहारिक नियम है :-
आ प्रा रजांसि दिव्यानि पार्थिवा श्लोकं देव: कृणुते स्वाय धर्मणे। [ऋग्वेद 4.5.3.3]
धर्मणा मित्रावरुणा विपश्चिता व्रता रक्षेते असुरस्य मायया। [ऋग्वेद 5.63.7]
यहाँ पर 'धर्म' का अर्थ निश्चित नियम (व्यवस्था या सिद्धान्त) या आचार नियम है। 
अभयं सत्वसशुद्धिज्ञार्नयोगव्यवस्थिति:। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाधायायस्तप आर्जवम्॥ 
अहिंसा सत्यमक्रोधत्याग: शांतिर पैशुनम्। दया भूतष्य लोलुप्तवं मार्दवं ह्रीरचापलम्॥ 
तेज: क्षमा धृति: शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ [गीता 16.1-3]
भय रहित मन की निर्मलता, दृढ मानसिकता, स्वार्थ रहित दान, इन्द्रियों पर नियंत्रण, देवता और गुरुजनों की पूजा, यश जैसे उत्तम कार्य, वेद शास्त्रों का अभ्यास, भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्ट सहना, व्यक्तित्व, मन, वाणी तथा शरीर से किसी को कष्ट न देना, सच्ची और प्रिय वाणी, किसी भी स्थिति में क्रोध न करना, अभिमान का त्याग, मन पर नियंत्रण, निंदा न करना, सबके प्रति दया, कोमलता, समाज और शास्त्रों के अनुरूप आचरण, तेज, क्षमा, धैर्य, पवित्रता, शत्रुभाव नही रखना; यह सब धर्म सम्मत गुण व्यक्तित्व को देवता बना देते है। 
सर्वत्र विहितो धर्म: स्वग्र्य: सत्यफलं तप:। 
बहुद्वारस्य धर्मस्य नेहास्ति विफला क्रिया॥ [महाभारत शांतिपर्व 174. 2]
धर्म अदृश्य फल देने वाला होता है। धर्म मय आचरण का फल तत्काल दिखाई नहीं देता अपितु, समय आने पर उसका प्रभाव सामने आता है। सत्य को जानने (तप) का फल, मरण के पूर्व (ज्ञान रूप में) मिलता है। धर्म आचरण करते हुए कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ता है किन्तु ये कठिनाइयां ज्ञान और समझ को बढाती है। धर्म के कई द्वार हैं। जिनसे वह अपनी अभिव्यक्ति करता है। धर्म मय आचरण करने पर धर्म का स्वरुप समझ में आने लगता है, तब मनुष्य कर्मो को ध्यान से देखते है और अधर्म से बचते हैं। धर्म की कोई भी क्रिया विफल नही होती, धर्म का कोई भी अनुष्ठान व्यर्थ नही जाता। अतः मनुष्य को सदैव धर्म का आचरण करना चाहिए।
भगवान् श्री राम धर्म की जीवंत प्रतिमा हैं। [वाल्मिकी रामायण 3.37.13] 
श्री राम कभी धर्म को नहीं छोड़ते और धर्म उनसे कभी अलग नहीं होता है। [युद्ध कांड 28. 19] 
संसार में धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है। धर्म में ही सत्य की प्रतिष्ठा है। धर्म का पालन करने वाले को माता-पिता, ब्राह्मण एवं गुरु के वचनों का पालन अवश्य करना चाहिए।[भगवान् श्री राम]
यस्मिस्तु सर्वे स्वरसंनिविष्टा धर्मो, यतः स्यात् तदुपक्रमेत। 
द्रेष्यो भवत्यर्थपरो हि लोके, कामात्मता खल्वपि न प्रशस्ता॥[बाल्मीकि रामायण 2. 21. 58]
जिस कर्म में धर्म आदि पुरुषार्थों का समावेश नहीं, उसको नहीं करना चाहिए। जिससे धर्म की सिद्धि होती हो वहीं कार्य करें। जो केवल धन कमाने के लिए कार्य करता है, वह संसार में सबके द्वेष का पात्र बन जाता है। यानि उससे, उसके अपने ही जलने लगते हैं। धर्म विरूद्ध कार्य करना घोर निंदनीय है। माता सीता भी धर्म के पालन का ही आवश्यक मानती हैं। 
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम्। 
धर्मेण लभते सर्व धर्मसारमिदं जगत्॥ [बाल्मीकि रामायण 3. 9. 30]
धर्म से अर्थ प्राप्त होता है और धर्म से ही सुख मिलता है और धर्म से ही मनुष्य सर्वस्व प्राप्त कर लेता है। इस संसार में धर्म ही सार है। माता सीता ने यह उस समय कहा जब भगवान् श्री राम वन में मुनिवेश धारण करने के बावजूद शस्त्र साथ में रखना चाहते थे। बाल्मीकि रामायण में माता सीता के माध्यम से पुत्री धर्म, पत्नी धर्म और माता धर्म मुखरित हुआ है। अतः सीता भारतीय नारी का आदर्श स्वरुप है।
धर्म ईश्वर प्रदत होता है व्यक्ति विशेष द्वारा चलाया हुआ नहीं क्योंकि व्यक्ति विशेष द्वारा चलाया हुआ मत (विचार) होता है अर्थात उस व्यक्ति को जो सही लगा वो उसने लोगों के समक्ष प्रस्तुत किया और श्रद्धा पूर्वक अथवा बल पूर्वक अपना विचार (मत) स्वीकार करवाया।
केवल हिंदु धर्म ही ईश्वरीय धर्म है। यह समग्र मानव जाति के लिए है और सभी के लिये समान हैं। सूर्य का प्रकाश, जल, प्रकृति प्रदत खाद्य पदार्थ आदि ईश्वर कृत है और सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं। उसी प्रकार धर्म (धारण करने योग्य) भी सभी मनुष्यों के लिए समान है। 
वेदों में यह कहा गया है :-
"वसुधैव कुटुम्बकम्" 
सारी धरती को अपना घर समझो; consider the whole earth to be a home.
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःखभाग् भवेत्॥
सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें, और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पडे।
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तवयः मानो धर्मो हतोवाधीत्॥ (मनु स्मृति)
धर्म उसका नाश करता है जो धर्म का नाश करता है। धर्म उसका रक्षण करता है जो उसके रक्षणार्थ प्रयास करता है। अतः धर्म का नाश नहीं करना चाहिए। धर्म का नाश करने वालेका नाश, अवश्यंभावी है।

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