Monday, December 29, 2014

CURSE श्राप बद्दुआ

CURSE श्राप बद्दुआ
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By:: Pt. Santosh Bhardwaj  
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PhotoOne should not curse any one even if he is hurt-troubled-tortured. His earnings-credit in the form of prayers, rituals, asceticism, charity, goodness converts into curse and one moves to the starting point, like the game of snake and ladder. One has to either increase his tolerance level, or repel the person-guilty creating tensions-difficulties for him, without any logic-reason. There is no harm in seeking legal remedies. One has to increase his power-strength so that the opponents with designs upon him have to think twice before attacking him.
One may counter-repel, desist, fight, against the enemy and destroy-harm him but abstain from laying curse-wrath-revenge. What so ever may come forward-next one should always control anguish.
On a visit to insurance company one was suddenly told by  a person (-this man used to devote time for prayers) that he is Durwasa-an incarnation of Bhagwan Shiv: The lord who destroys the evil. Guru Nanak was an incarnation of Durwasa. Analysis of events over the past 15 years has confirmed that one must not curse.
Rishi Durwasa-one of the incarnations of Bhagwan Shiv, is well known for his habit of cursing. 
Gandhari cursed Bhawan Krashn that his entire family will be wiped off. Shri Krashn could reject it, but allowed it to happen since his decedents were becoming arrogant, uncontrollable,unmanageable and rowdy.
Kak Bhushundi and Nag Raj Kalia are still faces the wrath of the curse laid by them over each other.
Rishi Vashishth and Vishwamitr cursed each other, reborn as birds and they continued fighting each other even after becoming birds.
माता सीता को तोती का श्राप :- माता सीता को एक गर्भवती के श्राप ने भगवान श्री राम जी से उस वक्त दूर कर दिया जब वे गर्भवती थीें। धर्म मनुष्य को सच्चाई के मार्ग पर चलना सिखाता है। सनातन धर्म में दूसरों को पीड़ा पहुँचाने को पाप और परोपकार को पुण्य माना गया है। ईश्वर को भी अपनी गलती की सजा भोगनी पड़ती है। 
सीता मिथिला नरेश जनक की पुत्री थी। एक दिन उद्यान में खेलते हुए कन्या सीता को एक नर व मादा तोते का जोड़ा दिखाई पड़ा। वो दोनों आपस में बातें कर रहे थे। 
वो जोड़ा ये बात कर रहे थे कि भूमंडल में राम नाम का बड़ा प्रतापी राजा होगा जिसकी अत्यंत सुंदर पत्नी सीता होगी। उत्सुकता वश सीता अपने को रोक ना सकी और उनकी बातें सुनने लगी। 
उन्हें अपने ब्याह के बारे में सुन अच्छा लग रहा था। इसी उमंग में उन्होंने बातचीत में मग्न तोते के उस जोड़े को पकड़वा लिया। 
माता सीता उनसे अपने और श्रीराम के बारे में और भी बातें सुनना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने उस जोड़े से पूछा कि उन्हें राम और उसके विवाह के बारे में ये बातें कहाँ से पता चली। तोते ने कहा कि उन्होंने ये बात महर्षि वाल्मीकि के मुख से उनके आश्रम में शिष्यों को पढ़ाते वक्त सुनी। इस पर माता सीता ने कहा कि तुम जनक की जिस पुत्री के बारे में बात कर रहे हो वो मैं ही हूँ।  तुम्हारी बातें मुझे रोमांचित कर रही है इसलिए अब मैं तुम्हें तब छोड़ूँगी जब मेरा विवाह श्रीराम से हो जाएगा। तोते ने याचना करते हुए कहा कि हे देवी! हम पक्षी हैं जिन्हें घर में सुख नहीं मिल सकता है। हमारा काम ही आसमान में विचरण करना है। माता सीता ने नर तोते को आज़ाद कर दिया और कहा कि ठीक है तुम सुखपूर्वक विचरो, परन्तु तुम्हारी पत्नी को मैं तब छोड़ूँगी जब मुझे राम प्राप्त हो जाएँगे। 
Mythological Facts about Ravan Death नर तोते ने फिर गिड़गिड़ाते हुए कहा हे सीते मेरी यह पत्नी गर्भ से है; मैं इसका वियोग सह ना पाऊँगा। कन्या सीता ने फिर भी मादा तोते को नहीं छोड़ा। इस पर दुखी होकर मादा तोते ने सीता को श्राप दिया कि जैसे तू मेरी गर्भावस्था में मेरे पति से मुझे दूर कर रही है उसी प्रकार तुझे भी अपनी गर्भावस्था में अपने राम का वियोग सहना पड़ेगा। 
इतना कहते ही मादा तोते ने प्राण त्याग दिया। कुछ समय बाद उसके वियोग में व्यथित नर तोते ने भी अपने प्राण त्याग दिए।  सालो बाद इसी श्राप के कारण ही माता सीता को श्रीराम ने उनकी गर्भावस्था के दैरान ही वन में भेज दिया था। 
(1). युधिष्ठिर का स्त्री जाति को श्राप :: जब कुंती ने युधिष्ठिर को बताया कि कर्ण तुम्हारा बड़ा भाई था, तो पांडवों को बहुत दुख हुआ। तब युधिष्ठिर ने विधि-विधान पूर्वक कर्ण का भी अंतिम संस्कार किया। माता कुंती ने जब पांडवों को कर्ण के जन्म का रहस्य बताया तो शोक में आकर युधिष्ठिर ने संपूर्ण स्त्री जाति को श्राप दिया कि आज से कोई भी स्त्री गुप्त बात छिपा कर नहीं रख सकेगी।
(2). ऋषि किंदम का राजा पांडु को श्राप :: राजा पांडु शिकार खेलने वन में गए। वहाँ उन्होंने हिरण के जोड़े को मैथुन करते देखा और उन पर बाण चला दिया। वास्तव में वो हिरण व हिरणी ऋषि किंदम व उनकी पत्नी थी। तब ऋषि किंदम ने राजा पांडु को श्राप दिया कि जब भी आप किसी स्त्री से मिलन करेंगे। उसी समय आपकी मृत्यु हो जाएगी। इसी श्राप के चलते जब राजा पांडु अपनी पत्नी माद्री के साथ मिलन कर रहे थे, उसी समय उनकी मृत्यु हो गई।
(3). माण्डव्य ऋषि का यमराज को श्राप :: माण्डव्य ऋषि को राजा ने भूलवश  चोरी का दोषी मानकर सूली पर चढ़ाने की सजा दी। सूली पर कुछ दिनों तक चढ़े रहने के बाद भी जब उनके प्राण नहीं निकले, तो राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने ऋषि माण्डव्य से क्षमा मांगकर उन्हें छोड़ दिया। तब ऋषि यमराज के पास पहुँचे और उनसे पूछा कि मैंने अपने जीवन में ऐसा कौन सा अपराध किया था कि मुझे इस प्रकार झूठे आरोप की सजा मिली। तब यमराज ने बताया कि जब आप 4 वर्ष के थे, तब आपने एक फतींगे की पूंछ में सींक चुभाई थी, उसी के फलस्वरूप आपको यह कष्ट सहना पड़ा। तब ऋषि माण्डव्य ने यमराज से कहा कि 4 वर्ष की उम्र में किसी को भी धर्म-अधर्म का ज्ञान नहीं होता। तुमने छोटे अपराध का बड़ा दण्ड दिया है। इसलिए मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम्हें शुद्र योनि में एक दासी पुत्र के रूप में जन्म लेना पड़ेगा। ऋषि माण्डव्य के इसी श्राप के कारण धर्मराज ने महात्मा विदुर और युधिष्टर के रूप में जन्म लिया।
(4). कद्रू का अपने पुत्रों को श्राप :: ऋषि कश्यप की कद्रू व विनता नाम की दो पत्नियाँ थीं। कद्रू सर्पों की माता थी व विनता गरुड़ की। एक बार कद्रू व विनता ने एक सफेद रंग का घोड़ा देखा और शर्त लगाई। विनता ने कहा कि ये घोड़ा पूरी तरह सफेद है और कद्रू ने कहा कि घोड़ा तो सफेद हैं, लेकिन इसकी पूंछ काली है। कद्रू ने अपनी बात को सही साबित करने के लिए अपने सर्प पुत्रों से कहा कि तुम सभी सूक्ष्म रूप में जाकर घोड़े की पूंछ से चिपक जाओ, जिससे उसकी पूंछ काली दिखाई दे और मैं शर्त जीत जाऊं। कुछ सर्पों ने कद्रू की बात नहीं मानी। तब कद्रू ने अपने उन पुत्रों को श्राप दिया कि तुम सभी जनमजेय के सर्प यज्ञ में भस्म हो जाओगे, परन्तु नागमाता मनसा देवी के पुत्र आस्तीक ऋषि ने उन्हें बचा लिया। 
(5). उर्वशी का अर्जुन को श्राप :: महाभारत के युद्ध से पहले जब अर्जुन दिव्यास्त्र प्राप्त करने स्वर्ग गए, तो वहांँ उर्वशी नाम की अप्सरा उन पर मोहित हो गई। यह देख अर्जुन ने उन्हें अपनी माता के समान बताया। यह सुनकर क्रोधित उर्वशी ने अर्जुन को श्राप दिया कि तुम नपुंसक की भाँति बात कर रहे हो। इसलिए तुम नपुंसक हो जाओगे, तुम्हें स्त्रियों में नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। यह बात जब अर्जुन ने देवराज इंद्र को बताई तो उन्होंने कहा कि अज्ञातवास के दौरान यह श्राप तुम्हारी मदद करेगा और तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा।
(6). तुलसी का भगवान विष्णु को श्राप :: शंखचूड़-जलन्धर नाम का एक राक्षस था। उसकी पत्नी का नाम तुलसी था। तुलसी पतिव्रता थी, जिसके कारण देवता भी शंखचूड़ का वध करने में असमर्थ थे। देवताओं के उद्धार के लिए भगवान विष्णु ने शंखचूड़ का रूप लेकर तुलसी का शील भंग कर दिया। तब भगवान् शंकर ने शंखचूड़ का वध कर दिया। यह बात जब तुलसी को पता चली तो उसने भगवान्  विष्णु को पत्थर हो जाने का श्राप दिया। इसी श्राप के कारण भगवान्  विष्णु की पूजा शालीग्राम शिला के रूप में की जाती है।
(7). श्रृंगी ऋषि का परीक्षित को श्राप :: पाण्डवों के स्वर्गारोहण के बाद अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित ने शासन किया। उसके राज्य में सभी सुखी और संपन्न थे। एक बार राजा परीक्षित शिकार खेलते-खेलते बहुत दूर निकल गए। तब उन्हें वहाँ शमीक नाम के ऋषि दिखाई दिए, जो मौन अवस्था में थे। राजा परीक्षित ने उनसे बात करनी चाहिए, लेकिन ध्यान में होने के कारण ऋषि ने कोई जबाव नहीं दिया। परीक्षित ने क्रोधित होकर एक  मरा हुआ सांप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया। यह बात जब शमीक ऋषि के पुत्र श्रृंगी को पता चली तो उन्होंने श्राप दिया कि आज से सात दिन बात तक्षक नाग राजा परीक्षित को डंस लेगा, जिससे उनकी मृत्यु हो जाएगी।
(8). भगवान् परशुराम का कर्ण को श्राप ::  परशुराम जी भगवान् विष्णु के अंशावतार हैं। सूर्यपुत्र कर्ण उन्हीं का शिष्य था। कर्ण ने परशुराम जी को अपना परिचय एक ब्राह्मण के रूप में दिया था। एक बार जब परशुराम कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे, उसी समय कर्ण को एक भयंकर कीड़े ने काट लिया। गुरु की नींद में विघ्न न आए, ये सोचकर कर्ण दर्द सहते रहे, लेकिन उन्होंने परशुराम को नींद से नहीं उठाया। नींद से उठने पर जब परशुराम जी ने ये देखा तो वे समझ गए कि कर्ण ब्राह्मण नहीं बल्कि क्षत्रिय है। तब क्रोधित होकर भगवान् परशुराम ने कर्ण को श्राप दिया कि मेरी सिखाई हुई शस्त्र विद्या की जब तुम्हें सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तुम वह विद्या भूल जाओगे।
(9). गांधारी का श्रीकृष्ण को श्राप :: महाभारत के युद्ध के बाद जब भगवान् श्री कृष्ण गांधारी को सांत्वना देने पहुँचे तो अपने पुत्रों का विनाश देखकर गांधारी ने भगवान् श्री कृष्ण को श्राप दिया कि जिस प्रकार पांडव और कौरव आपसी फूट के कारण नष्ट हुए हैं, उसी प्रकार तुम्हारा कुल भी परस्पर लड़ाई करके नष्ट हो जायेगा।गांधारी के श्राप के कारण ही भगवान् श्री कृष्ण के परिवार का अंत हुआ। इस श्राप के कारण गान्धारी का तेज नष्ट हो गया जो उसने जीवन भर भगवान् शिव की आराधना करके पाया था। 
(10). महर्षि दुर्वासा का वसुओं को श्राप :: भीष्म पितामह पूर्व जन्म में अष्ट वसुओं में से एक थे। एक बार इन अष्ट वसुओं ने नंगे नहाते हुए महर्षि दुर्वासा ने देखा। महर्षि दुर्वासा को देखकर भी अष्ट वसुओं ने कपड़े नहीं पहने  तो उन्होंने अष्ट वसुओं को श्राप दिया कि तुम आठों वसुओं को मृत्यु लोक में मानव रूप में जन्म लेना होगा और आठवें वसु को राज, स्त्री आदि सुखों की प्राप्ति नहीं होगी। यही आठवें वसु भीष्म पितामह थे।
(11). ऋषियों का साम्ब को श्राप :: एक बार कण्व आदि ऋषि द्वारका गए। तब उन ऋषियों का परिहास करने के उद्देश्य से सारण आदि वीर भगवान् श्री कृष्ण के पुत्र साम्ब को स्त्री वेष में उनके पास ले गए और पूछा कि इस स्त्री के गर्भ से क्या उत्पन्न होगा। क्रोधित होकर ऋषियों ने श्राप दिया कि श्री कृष्ण का ये पुत्र वृष्णि और अंधकवंशी पुरुषों का नाश करने के लिए लोहे का एक भयंकर मूसल उत्पन्न करेगा, जिसके द्वारा समस्त यादव कुल का नाश हो जाएगा और ऐसा ही हुआ।  
(12). दक्ष का चंद्रमा को श्राप :: प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 पुत्रियों का विवाह चंद्रमा से करवाया था। उन सभी पत्नियों में रोहिणी नाम की पत्नी चंद्रमा को सबसे अधिक प्रिय थी। यह बात अन्य पत्नियों को अच्छी नहीं लगती थी। ये बात उन्होंने अपने पिता दक्ष को बताई तो वे बहुत क्रोधित हुए और चंद्रमा को सभी के प्रति समान भाव रखने को कहा, लेकिन चंद्रमा नहीं माने। तब क्रोधित होकर दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग होने का श्राप दिया। इसका  इलाज उन्होंने सोमनाथ का मन्दिर बनाकर भगवान् शिव की आराधना करके किया। 
(13). शुक्राचार्य का राजा ययाति को श्राप :: राजा ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ था। देवयानी ने राजकुमारी शर्मिष्ठा को अपनी दासी बना लिया था। एक बार जब ययाति और देवयानी बगीचे में घूम रहे थे, तब उसे पता चला कि शर्मिष्ठा के पुत्रों के पिता भी राजा ययाति ही हैं, तो वह क्रोधित होकर अपने पिता शुक्राचार्य के पास चली गई और उन्हें पूरी बात बता दी। तब दैत्य गुरु शुक्राचार्य ने ययाति को बूढ़े होने का श्राप दे दिया था।
(14). ब्राह्मण दंपत्ति का राजा दशरथ को श्राप :: एक बार जब राजा दशरथ शिकार करने वन में गए तो गलती से उन्होंने शब्द भेदी वाण श्रवण कुमार पर चला दिया जिससे ब्राह्मण पुत्र की मृत्यु हो गई। उस श्रवण कुमार के माता-पिता अंधे थे। जब उन्हें अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होंने राजा दशरथ को श्राप दिया कि जिस प्रकार हम पुत्र वियोग में अपने प्राणों का त्याग कर रहे हैं, उसी प्रकार तुम्हारी मृत्यु भी पुत्र वियोग के कारण ही होगी।
(15). नंदी का ब्राह्मण कुल को श्राप :: दक्ष यज्ञ में जब सभी ऋषिगण, देवता, प्रजापति, महात्मा आदि प्रयाग में एकत्रित हुए तब वहाँ दक्ष प्रजापति ने भगवान् शिव का तिरस्कार किया। यह देखकर बहुत से ऋषियों ने भी दक्ष का साथ दिया। तब नंदी ने श्राप दिया कि दुष्ट ब्राह्मण स्वर्ग को ही सबसे श्रेष्ठ मानेंगे तथा क्रोध, मोह, लोभ से युक्त हो निर्लज्ज ब्राह्मण बने रहेंगे। शूद्रों का यज्ञ करवाने वाले व दरिद्र होंगे।
(16). रावण के सर्वनाश के कारण 6 श्राप :- रावण बहुत ही पराक्रमी योद्धा, परमज्ञानी, महापण्डित, त्रिकाल दर्शी, दसों दिशाओं का ज्ञाता और वेदों का पारगामी परम विद्वान था  था। उसने अपने जीवन में अनेक युद्ध किए। रावण के अंत का कारण भगवान् श्री राम की शक्ति तो थी ही। साथ ही, उन लोगों का श्राप भी था, जिनका रावण ने कभी अहित किया था। रावण को अपने जीवनकाल में मुख्यतः 6 लोगों से श्राप मिला था। यही श्राप उसके सर्वनाश का कारण बने और उसके वंश का समूल नाश हो गया। देवताओं से युद्ध में उसकी पराजय हुई जिसमें महाराज दशरथ ने देवताओं का साथ दिया। वह बाली से हारा जिसने उसे अपनी काँख में तब तक दबाये रक्खा जब तक उसने सूर्य भगवान् की पूजा अर्चना की। रावण ने उससे दोस्ती कर ली।कैलाश पर्वत को जाकर हिलाया तो भगवान् शिव ने उसे पैर के नाख़ून से दबाये रक्खा तो उसने रावण स्त्रोत्र से उनकी आराधना की।  उसने अपने जीवन में  अनेकों युद्ध लड़े और जीते जो कि उसके अहंकार के कारण बने और बाद में उसका विनाश भी किया। 
रावण ब्राह्मण कुल में उत्पन्न, विद्वान होते हुए भी बेहद कामुक, पतित स्वभाव का और राक्षसी बुद्धि वाला था। उसपर उसकी माँ और नाना का पूरा प्रभाव था।अपनी दुष्प्रवृत्तियों के कारण उसे अनेकानेक श्राप प्राप्त हुए जो कि भगवान् श्री राम के साथ युद्ध में उस पर फली भूत हो गए। 
(16.1). राजा अनरण्य का रावण को श्राप :: सूर्य-इक्ष्वाकु-रघुवंश (भगवान राम के वंश में) में एक परम प्रतापी राजा हुए थे, जिनका नाम अनरण्य था। जब रावण विश्वविजय करने निकला तो राजा अनरण्य से उसका भयंकर युद्ध हुई। उस युद्ध में राजा अनरण्य की मृत्यु हो गई। मरने से पहले उन्होंने रावण को श्राप दिया कि मेरे ही वंश में उत्पन्न एक युवक तेरा नाश करेगा। इन्हीं के वंश में आगे जाकर भगवान् श्रीराम ने जन्म लिया और रावण का वध किया।
(16.2). रावण को नंदी का श्राप :: एक बार रावण भगवान शंकर से मिलने कैलाश गया। वहाँ उसने नंदी जी को देखकर उनके स्वरूप की हंँसी उड़ाई और उन्हें बंदर के समान मुख वाला कहा। तब नंदी जी ने रावण को श्राप दिया कि बंदरों के कारण ही तेरा सर्वनाश होगा।
(16.3). माया का रावण को श्राप :: रावण ने अपनी पत्नी की बड़ी बहन माया के साथ भी छल किया था। माया के पति वैजयंतपुर के शंभर राजा थे। एक दिन रावण शंभर के यहां गया। वहाँ रावण ने माया को अपनी बातों में फँसा लिया। इस बात का पता लगते ही शंभर ने रावण को बँदी बना लिया। उसी समय शंभर पर राजा दशरथ ने आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में शंभर की मृत्यु हो गई। जब माया सती होने लगी तो रावण ने उसे अपने साथ चलने को कहा। तब माया ने कहा कि तुमने वासना युक्त होकर मेरा सतित्व भंग करने का प्रयास किया। इसलिए मेरे पति की मृत्यु हो गई, अत: तुम्हारी मृत्यु भी इसी कारण होगी।
(16.4). तपस्विनी का रावण को श्राप :: एक बार रावण अपने पुष्पक विमान से कहीं जा रहा था। तभी उसे एक सुंदर स्त्री दिखाई दी, जो भगवान् विष्णु को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर रही थी। रावण ने उसके बाल पकड़े और अपने साथ चलने को कहा। उस तपस्विनी ने उसी क्षण अपनी देह त्याग दी और रावण को श्राप दिया कि एक स्त्री के कारण ही तेरी मृत्यु होगी।
उसके पश्चात ही रावण ने स्त्रियों के साथ जोर-जबरदस्ती बंद कर दी। उसने अपने जीवन काल में बलात्कार-जोर जबरदस्ती से अनेकों स्त्रियों से बलात्कार कर अनेकानेक कन्याओं को उत्पन्न किया। 
(16.5). नलकुबेर का रावण को श्राप :: विश्व विजय करने के लिए जब रावण स्वर्ग लोक पहुंचा तो उसे वहां रंभा नाम की अप्सरा दिखाई दी। अपनी वासना पूरी करने के लिए रावण ने उसे पकड़ लिया। तब उस अप्सरा ने कहा कि आप मुझे इस तरह से स्पर्श न करें, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के बेटे नलकुबेर के लिए आरक्षित हूँ। इसलिए मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूँ। लेकिन रावण ने उसकी बात नहीं मानी और रंभा से दुराचार किया। यह बात जब नलकुबेर को पता चली तो उसने रावण को श्राप दिया कि दिन के बाद रावण बिना किसी स्त्री की इच्छा के उसको स्पर्श करेगा तो उसका मस्तक सौ टुकड़ों में बँट जाएगा। 
(16.6). शूर्पणखा का रावण को श्राप :: रावण की बहन शूर्पणखा के पति का नाम विद्युतजिव्ह था। वो कालकेय नाम के राजा का सेनापति था। रावण जब विश्वयुद्ध पर निकला तो कालकेय से उसका युद्ध हुआ। उस युद्ध में रावण ने विद्युतजिव्ह का वध कर दिया। तब शूर्पणखा ने मन ही मन रावण को श्राप दिया कि मेरे ही कारण तेरा सर्वनाश होगा।
(17). भगवान् श्री कृष्ण का अश्वत्थामा को श्राप  :: महाभारत युद्ध के अंत समय में जब अश्वत्थामा ने धोखे से पाण्डव पुत्रों का वध कर दिया, तब पाण्डव भगवान् श्री कृष्ण के साथ अश्वत्थामा का पीछा करते हुए महर्षि वेदव्यास के आश्रम तक पहुँच गए। तब अश्वत्थामा ने पाण्डवों पर ब्रह्मास्त्र का वार किया। ये देख अर्जुन ने भी अपना ब्रह्मास्त्र छोड़ा। महर्षि व्यास ने दोनों अस्त्रों को टकराने से रोक लिया और अश्वत्थामा और अर्जुन से अपने-अपने ब्रह्मास्त्र वापस लेने को कहा। तब अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस ले लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने अपने अस्त्र की दिशा बदलकर अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ की ओर कर दी। यह देख भगवान् श्री कृष्ण ने परीक्षित की रक्षा कर दंड स्वरुप अश्वत्थामा के माथे पर लगी मणि निकालकर उन्हें तेजहीन कर दिया और 3,000  वर्षों तक माँथे से रक्त और पीब टपकते हुए पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया। अश्वत्थामा जी अब भी भटकते हुए, पूजा करते हुए लोगों को मिलते हैं मगर अब उनका घाव भर गया है परन्तु माँथे पर घाव का निशान बकाया है। 
(18). तुलसी का श्रीगणेश को श्राप :: माता भगवती राधा जी से श्रापित होने के बाद तुलसी ने पृथ्वी पर जन्म लिया। गंगा तट से गुजरते वक्त उसने गणेश जी को तपस्या करते हुए देखा और उन पर मोहित होकर शादी का प्रस्ताव रखा। गणेश जी ने तुलसी से विवाह करने से इंकार कर दिया। क्रोध वश तुलसी ने गणेश जी दो को विवाह करने का श्राप दे दिया और गणेश जी ने तुलसी को वृक्ष बनने का।
(19). देवर्षि नारद का भगवान् विष्णु को श्राप :: देवऋषि नारद भगवान् विष्णु की माया में फंसकर एक राजकुमारी पर मोहित हो गए। उस कन्या के स्वयंवर में वरमाला अपने गले में डलवाने के हेतु वे भगवान् विष्णु के पास उनका रूप माँगने गए तो उन्होंने नारद जी भले के लिये तथास्तु कह दिया। भगवान् विष्णु का एक रूप वानर भी है। उन्हें देखकर वह राजकुमारी उन पर हँस पड़ी। यह देखकर नारद मुनि बहुत क्रोधित हुए और उन्होंने भगवान् विष्णु को श्राप दिया कि जिस प्रकार तुमने मुझे स्त्री के लिए व्याकुल किया है। उसी प्रकार तुम भी स्त्री विरह का दु:ख भोगोगे। भगवान् विष्णु ने राम अवतार में नारद मुनि के इस श्राप को पूरा किया।
INDECISIVENESS  अंतर्द्वंद-दुविधा   
One often faces situations, when he is unable to decide what to do. He fails to take decisions, in spite of perfect mental health-balance.  This situation results  in  tensions-losses-troubles-
difficulties. Its better if one postpone the decision for the time being. Let the situation become favourable. Till then, review can be done. Weaknesses can be identified-sorted out-reconsidered-studied. One must not hesitate in consulting the wise man-experienced-mature people. Soul searching too helps a lot. Any thing evil-wicked-sin may be rejected summarily.
अनिर्णय-अंतर्द्वंद-द्विधा की स्थिति जीवन में अक्सर बहुत परेशानी-नुकसान-बर्बादी-दुःख-सरदर्द  का कारण बन जाती है। इसकी वजह से भी आँखों में आँसू आ जाते हैं।  

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