Tuesday, December 30, 2014

ANGER क्रोध

ANGER क्रोध
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISMBy :: Pt. Santosh Bhardwaj
dharmvidya.wordpress.com  hindutv.wordpress.com  santoshhastrekhashastr.wordpress.com   bhagwatkathamrat.wordpress.com jagatgurusantosh.wordpress.com  santoshkipathshala.blogspot.com     santoshsuvichar.blogspot.com    santoshkathasagar.blogspot.com   bhartiyshiksha.blogspot.com santoshhindukosh.blogspot.com
One must control anger, not to repent later. Any act done in a fit of anger, may put one  in trouble for the whole life. Life is spoiled. Always avoid such situations. Its better if one avoids anger. Anger is not bad if it is meant for the improvement-betterment of the depraved-corrupt-sinner-our children-society-self-others.
क्रोध एक ऐसी प्रवृती है, जो लगभग हर मनुष्य में किसी न किसी रूप और सीमा में अवश्य होती है। गुस्सा क्यों आता है ? सभी जानते हैं और दूसरों को उपदेश देते हैं कि भाई गुस्सा मत करो और खुद गुस्सा करते हैं। पर उपदेश कुशल बहुतेरे। बिना विचारे जो करे सो पीछे पछताए काज बिगारे आपनों जग में होत हँसाय।गुस्सा आये तो उस जगह से हट जाओ। मुँह बंद कर लो। इसे पी जाओ। तकरार-विवाद-झगड़ा-बबाल मत करो।  उस बात-परिस्थिति-व्यक्ति-घटना का विचार करो, जिसने गुस्सा-रोष दिलाया। विवेचना करो और देखो कि इससे कैसे बचा जा सकता है। क्रोध में मनुष्य हत्या जैसे जघन्य अपराध कर बैठता है और फिर पछताता है। निरपराध को क्रोध में आकर कभी दंड मत दो।  जब हमारे अहम को ठेस लगती है, अकारण अपमान होता है, हमारी बात नहीं मानी जाती, डाँटा-फटकारा-धमकाया जाता है, हमारी सम्पत्ति-अधिकार से वंचित किया जाता है, धोखा दिया जाता है, तो स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती ही है। वो समझदार है जो मौंके की नजाकत को समझकर खून का घूंठ पी जाता है और बदले की भावना को मन में पनपने ही नहीं देता। डर, चिंता, दुःख, ईर्षा, असफलता, आक्रोश, अफसोस, विफलता, शर्म, अपराध बोध-भावना, शक्तिहीनता, घृणा, परिस्थिति, अनुकूलता का अभाव आदि गुस्से के कारण है। संतोष, धर्म, भाईचारा, समझदारी, संतुष्टि, लगाव, गुस्से को कम-काबु करते हैं। अक्सर होता ये है कि गुस्सा करनेवाला अपना ही खून जलाता है-नुकसान करता है। सर्प, ब्राह्मण में गुस्सा नाक तक भरा होता है। सोते शेर, साँप और ब्राह्मण को कभी मत जगाओ-छेड़ो।
मनुष्य को कभी खुद पर, तो कभी नियति पर, तो कभी दूसरों पर गुस्सा आता है।
क्रोध में कभी आँखों से अंगारे तो कभी अश्रु ढलने लगते हैं।
भगवान्  शिव को क्रोध आता है तो उनकी तीसरी आँख खुलती है और कामदेव भस्म हो जाते हैं और समस्त
श्रष्टि डगमगाने लगती है।
दुर्वासा शिव के अवतार हैं और वो क्रोधित होने पर श्राप देने में कतई देर नहीं करते।
आदमी औलाद पर गुस्सा करता है, तो उसमें प्यार-सुधार-उन्नति की भावना ही होती है।
अत्याचारी, पापी, अपराधी, नीच पर गुस्से में घृणा, घिन, नफ़रत ज्यादा होती है।
रोष में साम्य की स्थिति नष्ट हो जाती है।
भगवान श्री कृष्ण (नारायण) ने अपने प्रतिरूप अर्जुन (नर) पर क्रोध व दया वश, भीष्म पितामह पर प्रहार हेतु रथ का पहिया उठा लिया था, यद्पि युद्ध से पहले उन्होंने हथियार न उठाने की बात कही थी। इससे उन्होंने संदेश दिया कि अवसर-आवश्यकता के अनुरूप मनुष्य को अपने निर्णय-प्रण-प्रतिज्ञा-निश्चय में फेर-बदल कर लेना चाहिये। प्रतिज्ञा मनुष्य के लिये है न कि मनुष्य प्रतिज्ञा के लिये। ये शिक्षा भीष्म के लिए थी। अर्जुन को चेताया  कि शत्रु पक्ष में खड़ा होने पर कोई भी बध्य हो जाता है। उस पर दया-ममता-इज्जत-प्यार कैसा !? अर्जुन को शिक्षा थी कि हथियार उठाओ और अचूक वार करो।
Photoनरसिंह भगवान ने प्रह्लाद पर दया दृष्टि रखते हुए हिरण्य कश्यप को अपनी जाँघों पर लिटा लिया और क्रोध करते हुए उसके पेट को चीर दिया। समस्त ब्रह्माण्ड निस्तब्ध हो गया और भगवान शिव ने बड़ी मुश्किल से उनके क्रोध को शांत किया।
नन्द के द्वारा किये गये अपमान से चाणक्य क्रोधित हो गये और नन्द वंश का सर्व नाश कर दिया।
हिरण्य कश्यप प्रह्लाद से क्रोधित हो गया और उसने अपने पुत्र को मरवाने का हर सम्भव प्रयास किया।
भगवान राम समुद्र से रुष्ट हो गये और उन्होंने अपने धनुष पर ब्रह्मास्त्र का संसाधन किया। समुद्र के माफी मांगने पर, उन्होंने वो वाण उस क्षेत्र पर छोड़ा जहाँ दस्यु, दुराचारी, पापी लोगों का निवास था (-वर्त्तमान थार-सहारा मरुस्थल)।
लक्ष्मण ने क्रुद्ध होकर सूर्पनखा के नाक-कान काट लिये, तो उसने क्रोध में आकर रावण से दुहाई दी। रावण सीता जी को उठा कर ले गया और नतीजतन वो मारा गया।
कपिल मुनि बाल्य काल में ही सन्यास लेकर तपस्या करने लगे। उनपर कपिला नामक चिड़िया ने बीट कर दी तो, उन्होंने क्रुद्ध होकर उसे देखा और वो तुरन्त भस्म हो गई।ज्ञान प्राप्त होने पर उन्होंने विवाह किया और संतान उत्पत्ति के बाद पुनः तपस्या आरम्भ की। 10,000 सगर पुत्र यज्ञ का घोड़ा ढूँढ़ते हुए उनके आश्रम में आये और उनका अपमान किया। कपिल मुनि ने क्रोधित होकर उन सब को भस्म कर दिया।
अश्वथामा ने क्रोध में पाण्डवों के वंशनाश का प्रयास किया और उनके सभी पुत्रों का वधकर दिया, उसने अभिमन्यु पुत्र के ऊपर गर्भ में ब्रह्मास्त्र चलाया नतीजतन उसके मांथे से मणि निकाल ली गई, और वो शापित हो गया।3,000 साल तक रक्त-पीप के स्त्राव के साथ पृथ्वी पर भटकने के लिए।
क्रोध :: Anger, fury, rage, resentment, wrath. 






No comments:

Post a Comment