Friday, November 14, 2014

APHORISM-SUBHASHITANI सुभाषितानि

APHORISM :: SUBHASHITANI सुभाषितानि
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By :: Pt. Santosh  Bhardwaj
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महाजनस्य संसर्गः, कस्य नोन्नतिकारकः। पद्मपत्रस्थितं तोयम्, धत्ते मुक्ताफलश्रियम्॥1॥ 
जिस प्रकार कमल के पत्ते पर पड़ी हुई पानी की बूँद मोती शोभा प्राप्त कर लेती है; उसी प्रकार महापुरुषों का सामीप्य प्रत्येक मनुष्य के लिए  लाभदायक  होता है।  
The manner in which a drop of water shines like a pearl over a leaflet of Lotus petal-leaf-flower, in a similar-identical way the humans shine-gain aura-brightness when they come in contact with the enlightened-sages.Photo 
पातितोऽपि कराघातै-रुत्पतत्येव कन्दुकः।प्रायेण साधुवृत्तानाम-स्थायिन्यो विपत्तयः॥2॥
जिस प्रकार हाथ से पटकी हुई गेंद भी भूमि पर गिरने के बाद ऊपर की ओर उठती है, प्रकार सज्जनों का बुरा समय अधिकतर थोड़े समय के लिए ही होता है। 
The manner in which a ball thrown over the ground bounces back, the misfortune of the virtuous is momentary-short lived.
न चोराहार्यम् न च राजहार्यम्, न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि। 
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं, विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥3॥  
एक मात्र विद्या ही ऐसा धन है; जिसे चोर चुरा नहीं सकता, राजा हर नहीं सकता, भाई बँटवारा नहीं कर सकते, जो भार हीन है और जो नित्य खर्च करने-बाँटने पर भी बढ़ता है। 
Enlightenment-learning-knowledge is the only wealth which neither be stolen by thieves, nor can it be snatched by the kings. Being weightless, it cannot be divided among the brothers. This is the only wealth which grows by spending-distributing. 
सा विद्या या विमुक्तये ॥4॥   
ज्ञान वह है जो मनुष्य को मुक्ति प्रदान करे। 
That, which liberates the human being from the vicious cycle of birth and rebirth is education, learning, knowledge, enlightenment!
उद्यमेनैव हि सिध्यन्ति, कार्याणि न मनोरथै। न हि सुप्तस्य सिंहस्य, प्रविशन्ति मृगाः ॥5॥ 
प्रयत्न करने से ही कार्य पूर्ण होते हैं, केवल इच्छा करने से नहीं, सोते हुए शेर के मुख में मृग स्वयं प्रवेश नहीं करते हैं।One can not achieve success unless-until he make efforts-endeavours for it. Just by desiring  nothing  can  be  obtained-achieved.  
The deer-stage will not enter the mouth of  sleeping lion as food, by him self.
गुरु शुश्रूषया विद्या पुष्कलेन् धनेन वा। अथवा विद्यया विद्या चतुर्थो न उपलभ्यते॥6 
ज्ञान-विद्या गुरु की सेवा से, पर्याप्त धन देने से अथवा विद्या के आदान-प्रदान परस्पर विचार-विमर्श से प्राप्त होती है। इसके अतिरिक्त विद्या प्राप्त करने का चौथा तरीका नहीं है।   
One can acquire knowledge, learning-enlightenment through the teacher-Guru-guide, paying-giving sufficient money or through discussion-debate-seeking clarifications from the philosophers-scholars-eminent sages-Rishis.  Other than these a fourth possibility does not occur. 
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियं। प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्मः सनातनः॥7  
मनुष्य को सदा सत्य बोलना चाहिए, प्रिय-मीठे वचन बोलने चाहिए, प्रिय-मीठा तो बोलें परन्तु अप्रिय सत्य न बोलें तथा प्रिय असत्य भी न बोलें। यह सनातन रीति है। 
One should speak the truth, speak delighting-sweet-pleasant words, speak sweet-melodious words but restrain-avoid from speaking bitter-unpleasant truth and never speak sweet untrue-false-incorrect words. This is eternal practice.
विद्वत्वं च नृपत्वं च न एव तुल्ये कदाचन्। स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते॥8
विद्वता और राज्य अतुलनीय (-इन दोनों की एक दूसरे से तुलना नहीं की जा सकती) हैं, राजा को तो अपने राज्य-देश में ही सम्मान मिलता है पर विद्वान का सर्वत्र सम्मान होता है। 
Enlightenment-learning-knowledge and kingdom-empire can never be compared. A king is honoured-respected in his own land-country-state, whereas the intellectual-scholar-philosopher  is respected everywhere. 
मूर्खस्य पञ्च चिन्हानि गर्वो दुर्वचनं तथा। क्रोधश्च दृढवादश्च परवाक्येष्वनादरः॥9
मूर्खों के पाँच लक्षण हैं: गर्व, अपशब्द, क्रोध, हठ और दूसरों की बातों-विचारों का अनादर।   
Idiots-fools five characteristics-signs: Pride-ego, abusive language, anger, stubbornness- argumentation-useless discussion-debate and disrespect for other's opinion-ideas-thoughts.
अष्टौ गुणा पुरुषं दीपयंति प्रज्ञा सुशीलत्वदमौ श्रुतं च। पराक्रमश्चबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥10॥
पुरुष की 8 गुणों से शोभा-महत्ता होती है: बुद्धि, सुन्दर चरित्र, आत्म-नियंत्रण, शास्त्र-अध्ययन, साहस, मितभाषिता, यथाशक्ति दान और कृतज्ञता।    
8 characteristics-qualities adorn a man: Intellect, good character, self-control, study of scriptures, valour, little talking-control of tongue-words-language, charity-donations as per capability and gratitude. 
क्षमा बलमशक्तानाम् शक्तानाम् भूषणम् क्षमा। क्षमा वशीकृते लोके  क्षमयाः किम् न सिद्ध्यति॥11॥ 
क्षमा निर्बलों का बल है, क्षमा बलवानों का आभूषण है, क्षमा ने इस विश्व को वश में किया हुआ है, क्षमा से कौन सा कार्य सिद्ध नहीं हो सकता है?! 
Forgiveness is the strength-power of weak-down trodden. Forgiveness adorns the mighty-powerful-strong. Forgiveness has controlled-mesmerised the whole world. What cannot be achieved by forgiveness!?
न ही कश्चित् विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति। अतः श्वः करणीयानि कुर्यादद्यैव बुद्धिमान्॥12॥ 
कल क्या होगा यह कोई नहीं जानता, इसलिए कल के करने योग्य कार्य को आज कर लेने वाला ही बुद्धिमान है।काल करे सो आज कर आज करे सो अब, पल में परलो होएगी  फेर करेगो कब ? 
None is certain-assured about the future-what is going to happen tomorrow? Therefore its advisable to perform it now that one is planning to postpone for tomorrow. 
आयुषः क्षण एकोऽपि सर्वरत्नैर्न न लभ्यते। नीयते स वृथा येन प्रमादः सुमहानहो ॥13॥ 
मनुष्य की आयु-जन्म निश्चित और शुभ कर्म करने के लिये है। अपना सर्वस्व न्यौछावर करके भी इसे बढ़ाया नहीं जा सकता।अतः इसको व्यर्थ-नष्ट नहीं करना चाहिए। 
Human incarnation and the longevity is limited-restricted. It can not be enhanced-increased even after sacrificing every thing-belongings. 
One must not waste even a single moment of it. It should be utilized for the attainment of Salvation-assimilation in God-the Ultimate, liberation.
चिता चिंता समाप्रोक्ता बिंदुमात्रं विशेषता। सजीवं दहते चिंता निर्जीवं दहते चिता॥14॥ 
चिंता-फ़िक्र चिता समान है। चिता तो मरे हुए व्यक्ति को, केवल एक बार ही जलाती है; परन्तु चिंता  व्यक्ति को बार-बार जलाती है। 
The funeral pyre burns the dead body only ones. But worries keep him burning through out the life. 
क्षणशः कणशश्चैव विद्यामर्थं च साधयेत् । क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम्॥15॥ 
मनुष्य को निरन्तर-लगातार विद्या प्राप्ति-ग्रहण करने के लिए और धन के लिए थोड़ा-थोड़ा प्रयत्न करना चाहिए। समय नष्ट करने पर विद्या और संसाधनों के नष्ट होने पर धन प्राप्त नहीं हो सकता है।   
Knowledge-learning-enlightenment should be gained through continued-regular-rigorous efforts. Money should be earned-gained by utilising each and every rightful-virtuous-honest-pious resource. One who waste time can not attain knowledge. If he wastes his resources, he can accumulate wealth.
अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥16
 भगवान् श्री राम ने  लक्ष्मण जी से कहा कि सोने की लंका भी उन्हें अच्छी नहीं लगती है। अपनी माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी बढ़ कर हैं। 
Bhawan Shri Ram told Laxman that he did not like Lanka-Ceylon made up of gold. It  did not appeal to him. He preferred his mother and mother land-native land, to the heavens, being superior-greater than them.
नारिकेलसमाकारा दृश्यन्तेऽपि हि सज्जनाः। अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः॥17
सज्जन व्यक्ति नारियल के समान होते हैं, अन्य तो बदरी फल-बेर के समान केवल बाहर से ही अच्छे लगते हैं। 
The nobles-diligent-pious are like coconuts, tough from outside and soft inside. Others are like jujube fruit, beautiful only outside. 
नाभिषेको न संस्कारः सिंहस्य क्रियते वने। विक्रमार्जितसत्वस्य  स्वयमेव मृगेन्द्रता॥18
सिंह को वन के राजा कोई नियुक्त-अभिषेक या संस्कार  नहीं करता। वह अपने पराक्रम के बल पर वह स्वयं पशुओं का राजा बन जाता है।  
Lion becomes the king of jungle-forest through his own strength-power-might. 
गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् । वर्तमानेन  कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥19
बीते हुए समय का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य के लिए परेशान नहीं होना चाहिए, बुद्धिमान तो वर्तमान में ही विचरते-कार्य करते हैं। बीती ताहि बिसार दे आगे की सुध ले। 
One should not mourn-sorrow-grieve  over the past and should not worry about the future. The wise-intelligent-prudent always operate in present.
यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पंडितान् उपाश्रयति।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनी दलं इव विस्तारिता बुद्धिः॥20 
जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है, बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है जैसे कि सूर्य किरणों से कमल की पंखुड़ियाँ। 
One who reads, writes, sees-observes, inquires, lives in the company of learned-enlightened-philosophers-scholars, his intellect expands like the lotus petals which expands due to the rays of sun. 
उदये सविता रक्तो रक्त:श्चास्तमये तथा। सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥21॥ 
उदय होते समय सूर्य लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल होता है। महापुरुष सुख और दुःख में समान रहते हैं। समता मोक्ष दायक है।  
The Sun looks red while rising and setting. Great men too remain alike in both the good and bad times. One who is devoted to the Almighty, acquires equanimity in comfort and grief.
विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धनं मति:। परलोके धनं धर्म: शीलं सर्वत्र वै धनम्॥22॥ 
विदेश में विद्या धन है, संकट में बुद्धि धन है, परलोक में धर्म धन है और शील सर्वत्र ही धन है। 
Knowledge is pays abroad-in a foreign land. Intelligence brings out the individual from all troubles-tensions.(It's like wealth in tough times). Piousness-Righteousness-Virtuousness-honesty-truth pays in the next birth-incarnation(It's wealth in other world-abode). Verily, Good moral character-chastity protects on every where.(It's wealth everywhere and at all the times!)
दर्शने स्पर्शणे वापि श्रवणे भाषणेऽपि वा। यत्र द्रवत्यन्तरङ्गं स स्नेह इति कथ्यते॥23॥ 
यदि किसी को देखने से या स्पर्श करने से, सुनने से या बात करने से हृदय द्रवित हो तो इसे स्नेह कहा जाता है। 
If seeing, touching, hearing, speaking-talking with somebody, touches heart, it's affection.
प्रदोषे दीपकश्चंद्र: प्रभाते दीपको रवि:। त्रैलोक्ये दीपको धर्म: सुपुत्र: कुलदीपक:॥24॥ 
शाम को चन्द्रमा प्रकाशित करता है, दिन को सूर्य प्रकाशित करता है, तीनों लोकों को धर्म प्रकाशित करता है और सुपुत्र पूरे कुल को प्रकाशित करता है।  
Moon illuminates the night. Sun illuminates during the day. Dharm (-Righteousness) illuminates all the three abodes-worlds (-Heaven, Earth & the Patal) and a capable-virtuous son illuminates-glows all ancestors. 
नास्ति विद्या समं चक्षु नास्ति सत्य समं तप:। नास्ति राग समं दुखं नास्ति त्याग समं सुखं॥25॥ 
विद्या के समान आँख नहीं है, सत्य के समान तपस्या नहीं है, आसक्ति के समान दुःख नहीं है और त्याग के समान सुख नहीं है। 
Knowledge-enlightenment is the greatest eye-vision. Truth is the highest penance-asceticism. Attachment is the biggest pain-grief-sorrow. Renunciation is Ultimate pleasure-Parmanand.
उत्साहो बलवानार्य नास्त्युत्साहात्परं बलम्। सोत्साहस्य च लोकेषु न किंचिदपि दुर्लभम्॥26॥ 
उत्साह-धैर्य-साहस श्रेष्ठ पुरुषों का बल है, इससे बढ़कर और कोई बल नहीं है। उत्साहित व्यक्ति के लिए इस लोक में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।  
Enthusiasm-courage powers the great-mighty-noble men. Nothing is difficult-impossible for an enthusiastic, in this world.
व्यायामात् लभते स्वास्थ्यं दीर्घायुष्यं बलं सुखं। आरोग्यं परमं भाग्यं स्वास्थ्यं सर्वार्थसाधनम्॥27॥ 
व्यायाम से स्वास्थ्य, लम्बी आयु, बल और सुख की प्राप्ति होती है। निरोगी होना परम भाग्य है और स्वास्थ्य से अन्य सभी कार्य सिद्ध होते हैं। एक स्वास्थ्य लाख नियामत। 
Physical exercise-Yog results in good health, long life, strength and happiness. Good health is the greatest blessing.  Health is means of everything.
पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनं। कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद् धनं॥28॥ 
पुस्तक में लिखी हुई विद्या, दूसरे के हाथ में गया हुआ धन, जरुरत पड़ने पर  काम नहीं आते हैं। 
The knowledge which is contained in the book and the money handed over to others are seldom useful. One should learn by heart, understand it, find its applicability & usefulness. 
अतितॄष्णा न कर्तव्या तॄष्णां नैव परित्यजेत्। शनै: शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम्॥29॥ 
 मनुष्य इच्छाओं का दास है। उसे इच्छाएं नहीं करनी चाहिए, परन्तु इच्छाओं का सर्वथा त्याग भी नहीं करना चाहिए। अपने कमाये हुए धन का सोच समझकर सदुपयोग करना चाहिये।  
One is a slave of the desires, therefore he should avoid nursing high-too difficult-impossible desires. He should not be over ambitious. He should maintain reasonable desires to maintain-sustain life. The money earned by him through righteous-virtuous-honest means should be spent thoughtfully over a period of time.
क्रोधो वैवस्वतो राजा तॄष्णा वैतरणी नदी। विद्या कामदुघा धेनु: सन्तोषो नन्दनं वनम्॥30॥ 
क्रोध यमराज के समान है और तृष्णा नरक की वैतरणी नदी के समान। विद्या सभी इच्छाओं को पूरी करने वाली कामधेनु है और संतोष स्वर्ग का नंदन वन है।  
Anger-vengeance is like Yam-Dharm Raj, the deity of Death. Greed is like turbulent Vaetarni river of hell. Knowledge is Kam Dhenu-the divine cow who fulfills all wishes-desires and Santosh-satisfaction-contentment is the heaven's Nandan Van (-paradise-park-orchard). 
लोभमूलानि पापानि संकटानि तथैव च। लोभात्प्रवर्तते वैरं अतिलोभात्विनश्यति ॥31॥ 
लोभ पाप और सभी संकटों का मूल कारण है, शत्रुता में वृद्धि करता है और अधिक लोभ करने वाला विनाश को प्राप्त होता है।  
Greed is the root cause of all sins and troubles. Greed gives rise to enmity and excess greed leads to disaster.
धॄति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥32॥
 धर्म के दस लक्षण हैं: धैर्य, क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना॥  
Dharm has ten characteristics: Patience, forgiveness, self-control, not to steal, purity, control of senses-sensuality-passions-sexuality, intelligence-enlightenment, knowledge-Gyan, truth, lack of anger.
अभिवादनशीलस्य नित्यं वॄद्धोपसेविन:। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ॥33॥
अभिवादनशील-विनम्र और प्रतिदिन अनुभवी-बुजुर्गों की सेवा करने वाले में चार गुणों का विकास होता है: आयु, विद्या, यश और बल।  
One who is polite and serves experienced mature-people regularly, gains four qualities: Age, knowledge, fame and power. 
विद्या मित्रं प्रवासेषु  भार्या मित्रं गॄहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मॄतस्य च॥34॥
घर से दूर निवास-प्रवास में विद्या, घर में पत्नी, रोग में औषधि और मृतक का मित्र धर्म होता है। 
Education-learning-training-skill is friend abroad-away from home, wife is a friend at home, drug-medicine is a friend in illness and Dharm (-righteousness, virtuousness, piousity) is the friend after death.
ॐ असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मॄत्योर्मा अमॄतं गमय॥35॥
हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य, अन्धकार से प्रकाश और मृत्यु से अमरता-मोक्ष की ओर ले चलो। 
O the Almighty-God! Kindly take me from the untruth-falsehood to truth,  darkness to light and death to immortality-Salvation-Assimilation in God-The ultimate-Liberation-Eternity.
यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्। एवं पुरूषकारेण विना दैवं न सिध्यति॥36॥
जिस प्रकार एक पहिये वाले रथ की गति संभव नहीं है, उसी प्रकार पुरुषार्थ-उद्यम के बिना केवल भाग्य से कार्य सिद्ध नहीं होते हैं। 
The way-manner in which a chariot cannot run with only one wheel, luck too cannot complete a task without efforts-endeavors.
कुसुमस्तबकस्येव द्वयीवृत्तिर्मनस्विनः। मूर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा॥37॥
फूलों की तरह मनस्वियों-महापुरुषों की दो ही गतियाँ होती हैं; वे या तो समस्त विश्व के सिर पर शोभित होते हैं या वन में अकेले मुरझा जाते हैं। 
The great man either glow-shine-lead the society or pray to the God in his asylum in remote dense forests-caves as ascetic, like the flower which either bloom-spread its smell-incense or detach from the plant after drying. 
मन्दोऽप्यमन्दतामेति संसर्गेण विपश्चितः। पङ्कच्छिदः फलस्येव निकषेणाविलं पयः॥38॥  
बुद्धिमानों की संगति में मंद बुद्धि व्यक्ति भी ज्ञान प्राप्त कर लेता है, जैसे रीठे के फल से गन्दा पानी भी स्वच्छ हो जाता है। 
The dull-idiot-moron-duffer, acquires learning in the company of intelligent-brilliant-learned-enlightened-philosophers-scholars; the way the soap nut berry-Sapindus detergens berry cleanse the dirty cloths-turbid water. 
नरत्वं दुर्लभं लोके विद्या तत्र सुदुर्लभा। शीलं च दुर्लभं तत्र विनयस्तत्र सुदुर्लभःपृथ्वी॥39॥  
मनुष्य जन्म का मिलना दुर्लभ है, विद्या युक्त मनुष्य मिलना और दुर्लभ है, उनमें भी चरित्रवान मनुष्य मिलना दुर्लभ है और उनमें भी विनयी मनुष्य मिलना और दुर्लभ है।  
Incarnation as a human being is extremely rare, since its available only after passing through 84,00,000 species. Attainment of education-enlightenment-knowledge, too is extremely rare; since very few individuals find interest in it.  One blessed with good character is rare amongest the learned-philosophers-scholars, as well. One is humble with these faculties-qualities; too is extremely rare phenomenon.
अकिञ्चनस्य दान्तस्य शान्तस्य समचेतसः। मया सन्तुष्तमानसः सर्वाः सुखमया दिशाः॥40॥ 
कुछ इच्छा न रखने वाले, समभाव-समता से युक्त, नियंत्रित, शांत, समान चित्त वाले, मन से संतुष्ट मनुष्य के लिए सभी अवस्थाएँ सुखमय हैं।  
One who has no desire-attachment-allurements, with equanimity, self controlled-disciplined, peaceful-balanced headed-prudent, content, cool temperament, all stages of life are pleasant-comfortable.
आचारः परमो धर्म आचारः परमं तपः। आचारः परमं ज्ञानम् आचरात् किं न साध्यते॥41॥ 
सदाचार परम धर्म, सबसे बड़ा तप, सबसे बड़ा ज्ञान और वह साधन जिससे परमात्मा की प्राप्ति की जा सकती है। [सदाचरण से क्या प्राप्त नहीं किया जा सकता ?] 
Virtuous-righteous-pious conduct is the core of religion. It is the supreme penance, asceticism & absolute knowledge. One can attain the Almighty-Salvation, Assimilation in God, Liberation just by practicing this. [What can't be achieved through right conduct?]
सुखं हि दुःखान्यनुभूय शोभतेघनान्धकारेष्विव दीपदर्शनम्। 
सुखात्तु यो याति नरो दरिद्रतां धृतः शरीरेण मृतः स जीवति॥42॥ 
दुःख का अनुभव करने के बाद ही सुख का आनन्द उसी प्रकार आता है जैसे कि घने अँधेरे से निकलने के बाद दीपक-प्रकाश-रोशनी अच्छी लगती है। सुख भोगने उपरान्त दारिद्र का दुःख जीवित मनुष्य को मृतक के समान कर देता। 
One enjoys the pleasures-comforts after going through miseries-tortures-sorrow-pain-grief-regression like the person, who has seen light after coming out of darkness. One who under goes pains after enjoying luxuries becomes like a dead man. 
क्रोधो मूलमनर्थानां क्रोधः संसारबन्धनम्। धर्मक्षयकरः क्रोधः तस्मात् क्रोधं विवर्जयेत्॥॥43॥ 
मनुष्य को क्रोध का त्याग कर देना चाहिए क्योंकि वह समस्त विपत्तियों-आपदाओं की जड़, संसार बंधन का कारण, धर्म का नाश करने वाला है। 
One should give up-control-over power anger, since it is the root cause behind; all tensions-difficulties-troubles-misfortunes-main reason for bondage and it reduces-lowers righteousness-piousity-virtuousness-honesty.
आकाशात्पतितं तोयं यथा गच्छति सागरम्। सर्वदेवनमस्कारः केशवं प्रतिगच्छति ॥44॥
जिस प्रकार आकाश से गिरा हुआ पानी जैसे समुद्र में जाता है, उसी प्रकार किसी भी देवी-देवता को किया गया नमस्कार-पूजा-अर्चना  परमात्मा श्री हरि (-श्री कृष्ण) को जाता है।  
Just as all the rain drops falling from the sky goes into ocean ultimately, the prayers-salutations offered to the demigods-deities reaches the Almighty Sri Hari (-Sri Krishna).
मनसा चिन्तितंकार्यं वचसा न प्रकाशयेत्। अन्यलक्षितकार्यस्य यत: सिद्धिर्न जायते॥ ॥45॥ 
मन से सोचे हुए कार्य-सँकल्प को किसी के भी समक्ष उजागर न करें क्योंकि जिस कार्य पर किसी नज़र लग जाती है, वह फिर पूरा नहीं होता।   
Never disclose the plans-future programs to others. Success is deprived due to the ill will-negative thinking of others. 
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥46॥ 
सभी सुखी हों, सभी रोगरहित हों, सबका कल्याण हो और कोई भी दुःखी न हो। 
Let everyone be happy, free from diseases-illness. Let everyone prosper and none should become  sad. 
अष्टादशपुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ॥47॥
 अट्ठारह पुराणों में श्री व्यास के दो वचन (-प्रमुख) हैं: परोपकार से पुण्य होता है और पर पीड़ा से पाप। 
There are two main sayings of Bhagwan Ved Vyas in the eighteen  titles of Puran: Helping others is a virtue and hurting others is sin.
अन्नदानं परं दानं विद्यादानमतः परम्। अन्नेन क्षणिका तृप्ति-र्यावज्जीवं च विद्यया॥48॥ 
अन्न दान परम दान है, परन्तु विद्या दान उससे भी बड़ा है, क्योंकि अन्न से क्षण भर की तृप्ति होती है मगर विद्या से आजीवन।  
Donation of food is the greatest charity, but educating one which is even greater because food provides the contentment for the time being and knowledge-learning-education for whole life.
केयूरा न विभूषयन्ति पुरुषं हारा न चन्द्रोज्ज्वलाःन स्नानं न विलोपनं न कुसुमं नालङ्कृता मूर्धजाः।
वाण्येका समलङ्करोति पुरुषं या संस्कृता र्धायतेक्षीयन्ते खलु भूषणानि सततं वाग्भूषणं भूषणम्॥ ॥49॥ 
बाजुबंद पुरुष को शोभित नहीं करते और न ही चन्द्रमा के समान उज्ज्वल हार, न स्नान, न चन्दन, न फूल और न सजे हुए केश ही शोभा बढ़ाते हैं। सुसंस्कृत धारण की हुई वाणी ही मनुष्य की शोभा बढ़ाती है। साधारण आभूषण तो नष्ट हो जाते हैं, परन्तु मीठे वचन-वाणी हमेशां याद रहते हैं; क्योकि वे तो सनातन आभूषण हैं।  
Neither bracelets adorn a man, nor do necklaces which shine like the moon. Neither a bath, nor an ointment, nor flowers and nor decorated hair adorn him. It is well mannered-polite-soft spoken words-cultured speech alone, which properly embellishes a man. All other ornaments lose their glitter, only the jewel of sweet voice-words-speech is ever lasting.
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। व्यसनेन तु मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥50॥  
बुद्धिमान व्यक्ति का समय काव्य और शास्त्र से आनंद प्राप्त करने में व्यतीत होता है, जबकि मूर्खों का समय व्यसन, नींद और कलह में व्यतीत होता है।  
The wise utilize his time in enjoying poetry and scriptures, whereas fools waste it in vices, bad habits, sleep and quarrel.
दानेन तुल्यं सुहृदास्ति नान्यो लोभाच्च नान्योऽस्ति रिपुः पृथिव्याम्। 
विभूषणं शीलसमं  चान्यत् सन्तोषतुल्यं धनमस्ति नान्यत् 51 
इस पृथ्वी पर दान के समान अन्य कोई सुहृद नहीं है और  लोभ के समान कोई शत्रु नहीं है, शील के समान कोई आभूषण नहीं है और संतोष के समान कोई धन नहीं है। 
One who is born over this earth-in this world-universe, will not find a friend better than charity-donation, a dreaded enemy dangerous than greed, no ornament-jewels better than the good moral character and wealth-possessions-property better than the contentment-satisfaction.
न धैर्येण विना लक्ष्मी-र्न शौर्येण विना जयः।न ज्ञानेन विना मोक्षो न दानेन विना यशः॥52॥ 
मनुष्य को धैर्य के बिना धन, वीरता के बिना विजय, ज्ञान के बिना मोक्ष और दान के बिना यश प्राप्त नहीं होता।
One can not attain-achieve wealth without patience, victory without courage, Salvation-Liberation without knowledge-enlightenment and fame without charity. 
नरस्याभरणं रूपं रूपस्याभरणं गुणः।गुणस्याभरणं ज्ञानं ज्ञानस्याभरणं क्षमा॥53॥ 
मनुष्य का आभूषण रूप (-सत्यवादी, दयालु, धर्मात्मा, विद्वान, ज्ञानी, तपस्वी, धर्मज्ञ,मानवतावादी आदि), रूप का आभूषण गुण, गुणों का आभूषण ज्ञान और ज्ञान का आभूषण क्षमा है।  
Ornament-decoration-identification of a man is due to his qualities, abilities, strength, piousity, ascetic, learning, social worker, warrior, philosopher, scholar, virtues, forgiveness, etc. 
न हि ज्ञानसमं लोके पवित्रं चान्यसाधनं।विज्ञानं सर्वलोकानामु-त्कर्षाय स्मृतं खलु॥54॥ 
इस लोक में ज्ञान-शिक्षा के समान पवित्र दूसरा कोई साधन(-धन) नहीं है, शास्त्रों में विज्ञान को समस्त लोकों की प्रगति के लिए निश्चित किया गया है। 
Nothing is more sacred than the wealth of knowledge-education-learning in this world. The scriptures announce that science is basic (-a component of education) considered for the progress of this world.
नमन्ति फलिता वृक्षा नमन्ति च बुधा जनाः।शुष्ककाष्ठानि मूर्खाश्च भिद्यन्ते न नमन्ति च॥55॥ 
फलों से लड़ने पर वृक्षों की शाखाएँ झुक जाती हैं और इसी प्रकार बुद्धिमान लोग विनम्र हो जाते हैं। परन्तु सूखी लकड़ी और मूर्ख काटने-प्रताड़ित करने पर भी नहीं झुकते।  
The twigs-branches of trees laden with fruits bends, similarly the wise-educated-learned become polite-humble, while the dry woods and idiots-fools-morons-feeble minded remain stiff-impolite-imprudent-senseless.
निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु लक्ष्मीः स्थिरा भवतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥56॥ 
नीति में निपुण मनुष्य, चाहे निंदा करें या प्रशंसा, लक्ष्मी आयें या इच्छानुसार चली जायें, तुरन्त ही मृत्यु हो जाए या युगों के बाद हो; वे धैर्य पूर्वक न्याय के मार्ग से अपने कदम नहीं हटाते। 
One who is perfect-trained-skilled-a men of patience, in politic-policy-ethics-prudence-morality-virtues-sagacious-wisdom, do not care for the insult-defame-slur-blasphemy or praise, acquisition or loss of wealth, instantaneous death or longevity of infinite cosmic era never divert-deviate from the path of justice.
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥57॥ 
जिस प्रकार नदियाँ अपना पानी स्वयं नहीं पीती, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, बादल अपने बरसाए पानी द्वारा उगाया हुआ अनाज स्वयं नहीं खाते उसी प्रकार सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है। 
The way-manner in which the rivers don't utilize-consume their water, trees don't eat their fruits, clouds don't eat the crops grown by using their water for irrigation, the nobles-great souls utilize their lives only for helping others.
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति॥ ॥58॥ 
निम्न श्रेणी के पुरुष विघ्नों के भय से किसी नये कार्य का आरंभ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के पुरुष कार्य तो आरंभ कर देते हैं पर विघ्नों से विचलित होकर उसे बीच में ही छोड़ देते हैं, परन्तु उत्तम श्रेणी के पुरुष बार-बार विघ्न आने पर भी प्रारंभ किये गये कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं छोड़ते हैं। 
A man of Low level-category do not start any work due to fear of obstacles. One who is mediocre begins-start a work but leave it, in between due to the fear of disturbances. The great men, never leave a job unfinished once its started, whatever may be the problems.
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने किं दरिद्रताप्रिय॥59॥ 
 मीठा-मधुर-प्रियबोलने से सभी प्रसन्न होते हैं इसलिए प्रिय ही बोलना चाहिए क्योकि प्रिय वचन बोलने से दरिद्रता कम हो सकती है-घट सकती है। ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय औरन कू सीतल करे आपहुं सीतल होए। 
Speaking pleasant words makes everybody content-happy. One should utter pleasant-meaningful words. 
मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणं चिन्तासमं नास्ति शरीरशोषणं।
मित्रं विना नास्ति शरीर तोषणं विद्यां विना नास्ति शरीरभूषणं॥60॥ 
नियमित-संतुलित-संयमित जीवन के समान शरीर का पोषण करने वाला दूसरा नहीं है, चिंता के समान शरीर को सुखाने वाला दूसरा नहीं है, मित्र के समान शरीर को आनंद देने वाला दूसरा नहीं है और विद्या के समान शरीर का दूसरा कोई आभूषण नहीं है।  
There is nothing which nourishes the human body better than regular-balanced-controlled life style. Anxieties-worries-troubles-tensions checks longevity. There can not be a commodity which provides-soothes the body better than having a good friend-associate-companion.  There can not be a better ornament for body comparable to the education-learning.
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥॥61॥ 
जिन परमपिता परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से गूंगे बोलने लगते हैं, लंगड़े पहाड़ों को पार कर लेते हैं, उन परम आनंद स्वरुप श्रीमाधव की मैं वंदना करता हूँ॥
I pray-worship-bow in front of the Almighty-Shri Krashn, the supreme bliss-Parmanand, by whose grace of whom dumb start talking, and the lame men climb mountains. 
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति॥ ॥58॥ 
निम्न श्रेणी के पुरुष विघ्नों के भय से किसी नये कार्य का आरंभ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के पुरुष कार्य तो आरंभ कर देते हैं पर विघ्नों से विचलित होकर उसे बीच में ही छोड़ देते हैं, परन्तु उत्तम श्रेणी के पुरुष बार-बार विघ्न आने पर भी प्रारंभ किये गये कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं छोड़ते हैं। 
A man of Low level-category do not start any work due to fear of obstacles. One who is mediocre begins-start a work but leave it, in between due to the fear of disturbances. The great men, never leave a job unfinished once its started, whatever may be the problems.
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने किं दरिद्रताप्रिय॥59॥ 
 मीठा-मधुर-प्रियबोलने से सभी प्रसन्न होते हैं इसलिए प्रिय ही बोलना चाहिए क्योकि प्रिय वचन बोलने से दरिद्रता कम हो सकती है-घट सकती है। ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय औरन कू सीतल करे आपहुं सीतल होए। 
Speaking pleasant words makes everybody content-happy. One should utter pleasant-meaningful words. 
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति॥ ॥58॥ 
निम्न श्रेणी के पुरुष विघ्नों के भय से किसी नये कार्य का आरंभ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के पुरुष कार्य तो आरंभ कर देते हैं पर विघ्नों से विचलित होकर उसे बीच में ही छोड़ देते हैं, परन्तु उत्तम श्रेणी के पुरुष बार-बार विघ्न आने पर भी प्रारंभ किये गये कार्य को पूर्ण किये बिना नहीं छोड़ते हैं। 
A man of Low level-category do not start any work due to fear of obstacles. One who is mediocre begins-start a work but leave it, in between due to the fear of disturbances. The great men, never leave a job unfinished once its started, whatever may be the problems.
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः। तस्मात् तदेव वक्तव्यं वचने किं दरिद्रताप्रिय॥59॥ 
 मीठा-मधुर-प्रियबोलने से सभी प्रसन्न होते हैं इसलिए प्रिय ही बोलना चाहिए क्योकि प्रिय वचन बोलने से दरिद्रता कम हो सकती है-घट सकती है। ऐसी वाणी बोलिये मन का आपा खोय औरन कू सीतल करे आपहुं सीतल होए। 
Speaking pleasant words makes everybody content-happy. One should utter pleasant-meaningful words. 
मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणं चिन्तासमं नास्ति शरीरशोषणं।
मित्रं विना नास्ति शरीर तोषणं विद्यां विना नास्ति शरीरभूषणं॥60॥ 
नियमित-संतुलित-संयमित जीवन के समान शरीर का पोषण करने वाला दूसरा नहीं है, चिंता के समान शरीर को सुखाने वाला दूसरा नहीं है, मित्र के समान शरीर को आनंद देने वाला दूसरा नहीं है और विद्या के समान शरीर का दूसरा कोई आभूषण नहीं है।  
There is nothing which nourishes the human body better than regular-balanced-controlled life style. Anxieties-worries-troubles-tensions checks longevity. There can not be a commodity which provides-soothes the body better than having a good friend-associate-companion.  There can not be a better ornament for body comparable to the education-learning.
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिम् ।यत्कृपा तमहं वन्दे परमानन्दमाधवम् ॥॥61॥ 
जिन परमपिता परब्रह्म परमेश्वर की कृपा से गूंगे बोलने लगते हैं, लंगड़े पहाड़ों को पार कर लेते हैं, उन परम आनंद स्वरुप श्रीमाधव की मैं वंदना करता हूँ। 
I pray-worship-bow in front of the Almighty-Shri Krashn, the supreme bliss-Parmanand, by whose grace dumb start talking and the lame climb mountains. 
मृगा मृगैः संगमुपव्रजन्ति गावश्च गोभिस्तुरगास्तुरंगैः।मूर्खाश्च मूर्खैः सुधयः सुधीभिः समानशीलव्यसनेषु सख्यं॥ ॥62॥ 
मृग मृगों के साथ, गाय गायों के साथ, घोड़े घोड़ों के साथ, मूर्ख मूर्खों के साथ और बुद्धिमान बुद्धिमानों के साथ रहते हैं; समान आचरण और आदतों वालों में ही मित्रता होती है।  
Animals of the same species interact amongest them selves like deer interact with deer, cows mixes with cows, horses intermingle with horses, fools stay with fools and wise men rejoice with wise. Friendship amongest the people with similar-identical characteristics-habits-qualities is natural.
सन्तोषामृततृप्तानां यत्सुखं शान्तचेतसाम्। कुतस्तद्धनलुब्धानां एतश्चेतश्च धावताम्॥॥63॥ 
संतोष रूपी अमृत से तृप्त शांत मन वालों व्यक्तियों को प्राप्त होने वाला अनन्त सुख उन लोभियों को कैसे मिल सकता है, जो धन के पीछे अचेत होकर भागते फिरते हैं।  
विद्या विवादाय धनं मदाय खलस्य शक्तिः परपीडनाय।
साधोस्तु सर्वं विपरीतमेतद् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥॥64॥  
दुष्ट व्यक्ति विद्या का उपयोग विवाद के लिए (-जैसे वकील), धन अहंकार के लिए और शक्ति दूसरों को कष्ट देने के लिए करते हैं। इसके विपरीत सज्जन व्यक्ति विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए और शक्ति दूसरों की रक्षा के लिए करते है।   
A rogue utilizes his education-knowledge for debate (-quarrel, injustice), money for pride and power for oppressing others; whereas a noble utilizes his education-knowledge for enlightenment, money for charity-donations and power for securing-helping-serving others.
सत्यानुसारिणी लक्ष्मीः कीर्तिस्त्यागानुसारिणी।अभ्याससारिणी विद्या बुद्धिः कर्मानुसारिणी॥65॥ 
लक्ष्मी सत्य का अनुसरण करती हैं, कीर्ति त्याग का अनुसरण करती है, विद्या अभ्यास का अनुसरण करती है और बुद्धि कर्म का अनुसरण करती है।  
Money follows truth, fame follows renunciation, knowledge follows practice and mind follows actions.  
सज्जनस्य हृदयं नवनीतं यद्वदन्ति कवयस्तदलीकं।अन्यदेहविलसत्परितापात् सज्जनो द्रवति नो नवनीतम्॥ ॥66॥ 
कविगण सज्जनों के हृदय को जो नवनीत (-मक्खन) के समान बताते हैं, वह भी असत्य ही है। दूसरे के शरीर में उत्पन्न ताप (-दुःख) से सज्जन तो पिघल जाते हैं, पर मक्खन नहीं पिघलता। 
The poets say that the heart of noble men is as soft as butter but this seems to be incorrect. As nobles softens by the pain in others but not butter. 
सप्तैतानि न पूर्यन्ते पूर्यमाणान्यनेकशः।स्वामी पयोधिरुदरं कृपणोऽग्निर्यमो गृहम्॥ ॥67॥ 
ये सात कभी पूरे नहीं होते और पूरे करने पर बढकर अनेक हो जाते हैं: मालिक, समुद्र, पेट, कंजूस, अग्नि, मृत्यु और घर।  
These seven are never complete and while trying to complete, they grow multiple times: Employer, Sea, Stomach, Miser, Fire, Death and Construction of House.
विवेक: सह संपत्या विनयो विद्यया सह।प्रभुत्वं प्रश्रयोपेतं चिन्हमेतन्महात्मनाम्॥ ॥68॥ 
संपत्ति के साथ विवेक, विद्या के साथ विनय और शक्ति के साथ दूसरों की सुरक्षा, ये महापुरुषों के लक्षण हैं।  
Prudence associated with wealth, humility with knowledge and sheltering others when power-strength comes are the characters-qualities of noble-great men.
एकवर्णं यथा दुग्धं भिन्नवर्णासु धेनुषु।तथैव धर्मवैचित्र्यं तत्त्वमेकं परं स्मॄतम्॥ ॥69॥ 
जिस प्रकार अनेक रंगों की गायें एक रंग का ही (-श्वेत) दूध देती हैं, उसी प्रकार विभिन्न धर्मों में एक ही परम तत्त्व का उपदेश दिया गया है।  
As cows of different colours produces milk  of one color (-white), similarly all religions-sects preach the oneness of Almighty-God-the Ultimate.
षड् दोषा: पुरूषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता॥ ॥70॥ 


सम्पन्न होने की इच्छा वाले मनुष्य को इन छः बुरी आदतों को त्याग देना चाहिए: अधिक नींद, जड़ता, भय, क्रोध, आलस्य और कार्यों को टालने की प्रवृत्ति। 
One who wish to become rich-prosper, should discard these 6 bad habits: extra sleep, letharginess, fear, anger, laziness and procrastination.
ये केचिद् दु:खिता लोके सर्वे ते स्वसुखेच्छया। ये केचित् सुखिता लोके सर्वे तेऽन्यसुखेच्छया॥ 71॥
इस संसार में जो कोई भी दुखी हैं, वे अपने सुख की इच्छा से ही दुखी हैं और इस संसार में जो कोई भी सुखी हैं वे दूसरों के सुख की इच्छा से ही सुखी हैं।   
One who is in unhappy in this world, is due to his desire for own happiness. One who is happy in this world, is due to his desire for the happiness of others.
षड् गुणा: पुरुषेणेह त्यक्तव्या न कदाचन। सत्यं दानम् अनालस्यम् अनसूया क्षमा धॄति:॥72॥
इस छःगुणों को व्यक्ति को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए: सत्य, दान, तत्परता, दूसरों में दोष न देखने की प्रवृत्ति, क्षमा और धैर्य।
One should never give up these six qualities: Truth, Charity, Promptness, not finding faults in others, Forgiveness and Patience.
न तु अहं कामये राज्यं न स्वर्गं न अपुनर्भवम्।कामये दु:खतप्तानां प्राणिनाम् आर्तिनाशनम्॥73॥
न मैं राज्य की इच्छा रखता हूँ, न स्वर्ग या मोक्ष की ही, मेरी तो यही अभिलाषा है कि दुःख से पीड़ित सभी प्राणियों के दुःख का नाश हो जाये
I do not desire kingdom heaven or Liberation. I wish that all the suffering living beings be relieved from their pain.
अस्थिरं जीवितं लोके अस्थिरे धनयौवने।अस्थिरा: पुत्रदाराश्र्च धर्मकीर्तिद्वयं स्थिरम्॥74॥
इस जगत में जीवन सदा नहीं रहने वाला है, धन और यौवन भी सदा न रहने वाले हैं,  पुत्र और स्त्री भी सदा न रहने वाले हैं। केवल धर्म और कीर्ति ही सदा रहने वाले हैं। 
Life in this world is ephemeral, wealth and youthfulness are also ephemeral, association with son and wife is also ephemeral. Only Righteousness and Fame-goodwill will remain for ever.
शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे। साधवो न हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने॥75॥
सभी पर्वतों में मणियाँ नहीं होतीं, सभी हाथियों के मस्तक में मोती नहीं होते, साधु पुरुष सभी स्थानों में नहीं मिलते और चन्दन सभी वनों में नहीं पाया जाता। 
Every mountain does not have gems, every elephant does not possess pearl on its forehead. Saints-sages-recluse-ascetics are not found everywhere. They seldom appear in human habitations. Every forest does not have sandal trees.
विरला जानन्ति गुणान् विरला: कुर्वन्ति निर्धने स्नेहम्।
विरला: परकार्यरता: परदु:खेनापि दु:खिता विरला:॥76॥
कोई कोई ही दूसरों के गुणों को जानते हैं, कोई कोई ही गरीबों से स्नेह रखते हैं, कोई कोई दूसरों की सहायता करते हैं और कोई कोई ही दूसरों के दुःख से दुखी होते हैं। 
Those people are extremely rare who appreciate the qualities of others, compassionate towards poor or help others, or who feel sad over the miseries of others.  
यदा न कुरूते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्।समदॄष्टेस्तदा पुंस: सर्वा: सुखमया दिश:॥77॥
यदि कोई मनुष्य किसी भी जीव के प्रति अकल्याणकारी  भावना नहीं रखता, तब उस समदृष्टि के लिए सभी दिशाएं सुख देने वाली हो जाती हैं। 
One with equanimity, who do not wish inauspicious-bad for anyone, every thing becomes pleasant for him. He qualifies for Salvation-Liberation-Assimilation in the Almighty.
अमॄतं चैव मॄत्युश्च द्वयं देहप्रतिष्ठितम्।मोहादापद्यते मॄत्यु: सत्येनापद्यतेऽमॄतम्॥78॥ 
अमरता और मॄत्यु दोनों ही मानव शरीर में निवास करती हैं। मोह से पुनर्जन्म-मॄत्यु प्राप्त होती है और सत्य से मोक्ष-अमरत्व। 
Immortality and Death both pervades the human body. Repeated births and death are caused by delusion and Immortality-Salvation are resulted by truth.
अक्षरद्वयम् अभ्यस्तं नास्ति नास्ति इति यत् पुरा। तद् इदं देहि देहि इति विपरीतम् उपस्थितम्॥79॥
जो मनुष्य किसी गरीब द्वारा कुछ माँगने पर समर्थ होने पर भी इन्कार करता है वह भविष्य में स्वयं भी मांगने की स्थिति को प्राप्त होता है। 
One who refuses to grant alms to the needy-poor-down trodden, comes to begging-pathetic condition in future. 
मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्॥80॥ 
महापुरुषों के मन, वचन और कर्म में समानता पाई जाती है। परन्तु दुष्ट व्यक्ति सोचते कुछ और हैं, बोलते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं।  
Great men act alike through mind, speech and conduct. But the wicked think something else, speak something else and do something else.
क्रोध: सुदुर्जय: शत्रु: लोभो व्याधिरनन्तक:।सर्वभूतहित: साधु: असाधुर्निदय: स्मॄत:॥81॥ 
क्रोध को मनुष्य का जीतने में कठिन शत्रु कहा गया है, लोभ कभी न ख़त्म होने वाला रोग कहा गया है। साधु पुरुष वह है जो दूसरों के कल्याण में लगा हुआ है और असाधु वह है जो दया से रहित है। 
Anger is said to be the most difficult enemy to conquer and greed is said to be the endless disease. A saint is one who seeks welfare of all others and a wicked is one who has no compassion for others.
नारिकेलसमाकारा दृश्यन्तेऽपि हि सज्जनाः।अन्ये बदरिकाकारा बहिरेव मनोहराः॥82॥ 
सज्जन व्यक्ति नारियल के समान होते हैं, बाहर से सख्त और अन्दर से नम्र, मगर अन्य तो बदरी फल के समान केवल बाहर से ही अच्छे लगते हैं। 
The nobles are like coconuts, tough outside but soft inside. Others are like jujube fruit, beautiful only outside.
गते शोको न कर्तव्यो भविष्यं नैव चिन्तयेत् । वर्तमानेन  कालेन वर्तयन्ति विचक्षणाः॥83॥ 
बीते हुए समय का शोक नहीं करना चाहिए और भविष्य के लिए परेशान नहीं होना चाहिए, बुद्धिमान तो वर्तमान में ही कार्य करते हैं।  
One should not mourn over the past and should not remain worried-grieved about the future. The wise operate-negotiate in present.
यः पठति लिखति पश्यति परिपृच्छति पंडितान् उपाश्रयति।
तस्य दिवाकरकिरणैः नलिनीदलं इव विस्तारिता बुद्धिः॥84॥ 
जो पढ़ता है, लिखता है, देखता है, प्रश्न पूछता है, बुद्धिमानों का आश्रय लेता है, उसकी बुद्धि उसी प्रकार बढ़ती है जैसे कि सूर्य किरणों से कमल की पंखुड़ियाँ।   
One who reads, writes, sees, inquires, lives in the company of learned, his intellect grows-expands as the lotus petals expands due to the rays of sun.
विदेशेषु धनं विद्या व्यसनेषु धनं मति:।परलोके धनं धर्म:शीलं सर्वत्र वै धनम्॥85॥  
विदेश में विद्या धन है, संकट में बुद्धि धन है, परलोक में धर्म धन है और शील सर्वत्र ही धन है। 
Knowledge is wealth in abroad. Intelligence is wealth in tough times. Righteousness is wealth in other abodes, after rebirth. Verily, Good Character is wealth everywhere and at all the times!
दर्शने स्पर्शणे वापि श्रवणे भाषणेऽपि वा।यत्र द्रवत्यन्तरङ्गं स स्नेह इति कथ्यते॥86॥ 
यदि किसी को देखने से या स्पर्श करने से, सुनने से या बात करने से हृदय द्रवित हो तो इसे स्नेह कहा जाता है।
If seeing, soothing, touching somebody; hearing or speaking with somebody, touches one's heart,  it is called affection.
प्रदोषे दीपकश्चंद्र: प्रभाते दीपको रवि:। त्रैलोक्ये दीपको धर्म: सुपुत्र: कुलदीपक: ॥87॥ 
शाम को चन्द्रमा प्रकाशित करता है, दिन को सूर्य प्रकाशित करता है, तीनों लोकों को धर्म प्रकाशित करता है और सुपुत्र पूरे कुल को प्रकाशित करता है। 
Moon illumines the evening. Sun illumines the morning. Dharm (-Righteousness, virtuousness, piousity) illumines all the three worlds and a capable son illumines all ancestors.
नास्ति विद्या समं चक्षु नास्ति सत्य समं तप:। नास्ति राग समं दुखं नास्ति त्याग समं सुखं॥88॥
विद्या के समान आँख नहीं है, सत्य के समान तपस्या नहीं है, आसक्ति के समान दुःख नहीं है और त्याग के समान सुख नहीं है। 
Knowledge-learning-enlightenment is the greatest eye-vision. Truth is the highest asceticism-chastity-penance. Attachment is the biggest pain-bondage. Renunciation is the highest happiness-Parmanand-Bliss.
धॄति: क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह:। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥89॥ 
धर्म के दस लक्षण हैं: धैर्य, क्षमा, आत्म-नियंत्रण, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रिय-संयम, बुद्धि, विद्या, सत्य और क्रोध न करना। 
Dharm has ten characteristics: Patience, forgiveness, self-control, non-stealing/theft/loot, purity, control of senses, intelligence, knowledge, truth, non-anger.
अभिवादनशीलस्य नित्यं वॄद्धोपसेविन:। चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥90॥ 
विनय शील व्यक्ति द्वारा वृद्ध, बुजुर्ग और अनुभव शील व्यक्तियों की सेवा करने से चार गुणों का विकास होता है: आयु, विद्या, यश और बल। 
One who is polite,serves experienced, matured, old, elders regularly, gains four qualities: Age, knowledge, fame and power.
विद्या मित्रं प्रवासेषु भार्या मित्रं गॄहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं धर्मो मित्रं मॄतस्य च॥91॥ 
प्रवास (-घर से दूर निवास) में विद्या मित्र होती है, घर में पत्नी मित्र होती है, रोग में औषधि मित्र होती है और मृतक का मित्र धर्म होता है। 
Knowledge is friend in the journey, wife is the friend at home, drug is friend in illness and Dharm (righteousness) is the friend after death.
सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः। पार्थो वत्सः सुधीर्भोक्ता दुग्धं गीतामृतं महत्॥92॥ 
The Upanishads are the cows milked by Gopal, the son of Nand and Arjun is the calf. Wise and pure men drink the milk, the supreme, immortal nectar of the Gita.
नाहं वसामि वैकुंठे योगिनांहृदये न च। मद्भक्ता यत्र गायंति यत्र तिष्ठामि नारद ॥93॥ 
हे नारद! मैं न तो बैकुंठ में ही रहता हूँ और न योगियों के हृदय में ही रहता हूँ। मैं तो वहीं रहता हूँ, जहाँ प्रेमाकुल होकर मेरे भक्त मेरे नाम का कीर्तन किया करते हैं।
रज्जुसर्पवदात्मानम् जीवो ज्ञात्वा भयंवहेत्। नाहं जीवः र्रात्मेतत ज्ञातश्चेन्ननभपयो भवेत् ॥94॥ 
Having mistaken oneself as a (-vulnerable mortal) individual, one gets overwhelmed with fear. It is like mistaking a rope for a snake; however, when one realises one's true.
सत्यपि भेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम्। सामुद्रो हि तरंगः क्वचन समुद्रो न तारंगः॥95॥ 
हे नाथ ! आपका और मेरा भेदभाव चला गया है, फिर भी मैं आपका हूँ, परन्तु आप मेरे नहीं है ! जिस प्रकार तरंगें समुंद्र की हैं,  ना कि समंदर तरंगों का।
मूर्खोSपि मूर्खं दृष्ट्वा च चन्दनादतिशीतलः। यदि पश्यति विद्वांसं मन्यते पितृघातकंम्॥
एक मूर्ख व्यक्ति यदि अपने ही समान किसी अन्य  मूर्ख व्यक्ति को देखता  है तो उसे  चन्दन का लेप करने के समान शीतलता का अनुभव होता है, परन्तु यदि उस का सामना किसी विद्वान् व्यक्ति से होता है तो वह ऐसा अनुभव या व्यवहार करता जैसे है कि मानो वह किसी  ऐसे नीच व्यक्ति से मिल रहा है जिसने अपने पिता का वध किया हो। 
When a foolish-ignorant-idiot person meets another foolish person, he feels coolness like having sandalwood paste over his body. However, when he meets a scholar or a learned person, he thinks as if he is meeting with  a lowly person who has committed the sin of patricide.
अहिंसा परमो धर्मः धर्महिंसा तथैव चः। 
अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है और धर्म के लिए हिंसा करना उससे भी श्रेष्ठ है। मनुष्य को अत्याचारी, बलात्कारी, लुटेरों, हत्यारों, घर-सम्पत्ति-जमीन-धन पर कब्जा करने वालों, घुसपैंठियों, जिहादियों, देश द्रोहियों, दरिन्दों, आतंकवादियों  का वध करने में कभी हिचकना नहीं चाहिए। 
भवन्ति नम्रास्तरवः फलोद्गमैः नवाम्बुभिर्भूरिविलम्बिनो घनाः।
अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभाव एवैषः परोपकारिणाम्॥
फल आने पर वृक्ष नीचे झूकते हैं, नये जल से भरे बादल नीचे झूकते हैं, समृद्धि के कारण सज्जन अनुद्धत होते है, परोपकारि व्यक्तिओ का ऐसा स्वभाव होता हैं।
On bearing fruits, trees bend (i.e., become humble), with recently gathered water, clouds hang very low, wealthy good men maintain non-arrogant nature; this is the nature of benevolent persons.
रथस्यैकं चक्रं भुजगयमिताः सप्ततुरगाः निरालंबो मार्गश्चरणविकलो सारथिरपि। 
रविर्यात्यंतं प्रतिदिनमपारस्य नभसः क्रियासिद्धिः सत्त्वे भवति महतां नोपकरणे
सात घोड़ों के रथ का एक ही चक्र, साँप की लगाम, निरालंब मार्ग, अपंग सारथि तथापि सूरज रोज अपार आकाश के अंत की ओर जाता है, महान पुरूषों के लिए क्रिया की सफलता आंतरिक सत्व पर आधारित है बाह्य साधनों पर नहीं ।
Everyday the Sun travels to the end of endless sky in a single wheeled chariot having seven horses controlled by serpents on an unsupported road with a charioteer having disabled foot. The actions of great people are accomplished by their inner strength, not by the means of doing it.
आमंत्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम्। अयोग्य: पुरूषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभ:
ऐसा कोई अक्षर नही जिनसे मंत्र नही बनता हो। ऐसी कोई वनस्पति नही जिससे औषध न बनती हो। कोई मनुष्य अयोग्य नही है, उसे कार्य मे लगाने वाला (योजक) ही दुर्लभ है।
There is no letter-alphabet which do not form a word, there is no vegetation which do not yield a medicine and there is no human being who has not not been awarded one or the other quality. The only thing unavailable is the person who can make use of them.
        द्वौ अम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दॄढां शिलाम्। धनवन्तम् अदातारम् दरिद्रं च अतपस्विनम्॥
जो धनवान होकर भी दान नहीं करता और जो दरिद होकर भी मेहनत नहीं करता, इन दोनों को गले में बडा सा पत्थर बाँध कर  पानी में डूबा देना चाहिए।
One who does not donate in-spite of being rich and the other who does not work hard in-spite of being poor; should be drowned in deep water with heavy stones tied to their neck.
सन्दिग्धे परलोकेऽपि, कर्तव्यः पुण्यसञ्चयः। नास्ति चेन्नास्ति नो हानिः, अस्ति चेन्नास्तिको हतः[श्लोकवार्तिक]
परलोक में संशय हो तो भी पुण्य का सञ्चय करते चलो। अगर परलोक नहीं है तो आस्तिक का कोई नुकसान नहीं है। कहीं परलोक सत्य हुआ तो नास्तिक मारा जाएगा। 
Keep on enhancing virtuousness, righteousness, honesty, piousity even if you have no faith in life after death. If there is no life after death, the devotee is not at a loss but the atheist will suffer.
रमन्ताँ पुण्या लक्ष्मीर्या: पापीस्ता अनीनशम्।[अथर्ववेद 7.115.4]
पुण्य की कमाई मेरे घर की शोभा बढाये, पाप की कमाई को मैने नष्ट कर दिया है।
Let the pious, honest earnings should flourish me. I have destroyed the illicit wealth, money.
विश्वं पुष्टं ग्रामे अस्मिन्ननातुरम्।[ऋग्वेद 1.114.1, यजुर्वेद 16.48]
इस ग्राम में सब नीरोग और हृष्ट-पुष्ट हो।Every one in this village-locality, country should be healthy and well built.
पिबन्ति नद्यः स्वयमेव नाम्भः स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः। 
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहाः परोपकाराय सतां विभूतयः॥
नदियाँ अपना पानी स्वयं नहीं पीतीं, वृक्ष अपने फल स्वयं नहीं खाते, बादल अपने बरसाए पानी द्वारा उगाया हुआ अनाज स्वयं नहीं खाते। सत्पुरुषों का जीवन परोपकार के लिए ही होता है।

The way the rivers do not consume there own water, the trees do not eat their own fruits, clouds do not eat the grain, which grow when they rain, like wise the descent person spend their life for the welfare of the society.

राम नाम रटते रहो, जब लगि घट में प्रान। कबहूं तो दीनदयाल के, भनक परेगी कान॥
तेरे भाएँ जो करो, भलो बुरो संसार। नारायण तू बैठि कै अपनी भवन बुहार॥
राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंत काल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट॥
मूर्खोSपि मूर्खं दृष्ट्वा च चन्दनादतिशीतलः। यदि पश्यति विद्वांसं मन्यते पितृघातकंम्॥

क्वचित् सर्पोऽपि मित्रत्वमियात् नैव खलः क्वचित्। न शोषशायिनोऽप्यस्य वशे दुर्योधनः हरेः॥
कभी सर्प भी मित्र बन सकता है, किन्तु दुष्ट कभी मित्र नहीं बनाया जा सकता। शेषनाग पर शयन करनेवाले हरि का भी दुर्योधन मित्र न बना !
One might befriend a snake-serpent, but its not possible to be friendly with wicked-vicious. Duryodhan could not become a friend of Bhagwan Shri Hari Vishnu who sleeps over Bhagwan Shesh Nag.
अग्निना सिच्यमानोऽपि वृक्षो वृद्धिं न चाप्नुयात्।तथा सत्यं विना धर्मः पुष्टिं नायाति कर्हिचित्॥
आग से सींचा गए पेड़ कभी बड़े नहीं होते, जैसे सत्य के बिना धर्म की कभी स्थापना नहीं होती।
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते। विश्वसिति मूढचेता नराधमः॥
बिना बुलाए स्थानों पर जाना, बिना पूछे बहुत बोलना, विश्वास नहीं करने लायक व्यक्ति-चीजों पर विश्वास करना; ये सभी मूर्ख और बुरे लोगों के लक्षण हैं।
अलसस्य कुतो विद्या, अविद्यस्य कुतो धनम्। अधनस्य कुतो मित्रम्, अमित्रस्य कुतः सुखम्॥
आलसी को विद्या कहाँ अनपढ़-मूर्ख को धन कहाँ निर्धन को मित्र कहाँ और अमित्र को सुख कहाँ।
अयं निजः परो वेति गणना लघु चेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
यह मेरा है,यह उसका है; ऐसी सोच संकुचित चित्त वोले व्यक्तियों की होती है; इसके विपरीत उदारचरित वाले लोगों के लिए तो यह सम्पूर्ण धरती ही एक परिवार जैसी होती है।
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्। परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम्॥
महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं :- (1). पपरोपकार करना पुण्य होता है और (2). पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
मनुष्यों के शरीर में रहने वाला आलस्य ही उनका सबसे बड़ा शत्रु होता है। परिश्रम जैसा दूसरा कोई अन्य मित्र नहीं होता क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुखी नहीं होता।
बलवानप्यशक्तोऽसौ धनवानपि निर्धन।श्रुतवानपि मूर्खोऽसौ यो धर्मविमुखो जनः॥
जो व्यक्ति धर्म ( कर्तव्य ) से विमुख होता है वह ( व्यक्ति ) बलवान् हो कर भी असमर्थ, धनवान् हो कर भी निर्धन तथा ज्ञानी हो कर भी मूर्ख होता है।
यथा चित्तं तथा वाचो यथा वाचस्तथा क्रियाः। चित्ते वाचि क्रियायांच साधुनामेक्रूपता॥
अच्छे लोगों के मन में जो बात होती है, वे वही वो बोलते हैं और ऐसे लोग जो बोलते हैं, वही करते हैं. सज्जन पुरुषों के मन, वचन और कर्म में एकरूपता होती है।
यथा ह्येकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत्। एवं परुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति॥
जैसे एक पहिये से रथ नहीं चल सकता है उसी प्रकार बिना पुरुषार्थ के भाग्य सिद्ध नहीं हो सकता है।
येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
 ते मर्त्यलोके भुविभारभूता मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥
जिन लोगों के पास न तो विद्या है, न तप, न दान, न शील, न गुण और न धर्म. वे लोग इस पृथ्वी पर भार हैं और मनुष्य के रूप में जानवर की तरह से घूमते रहते हैं।
यस्तु सञ्चरते देशान् सेवते यस्तु पण्डितान्। तस्य विस्तारिता बुद्धिस्तैलबिन्दुरिवाम्भसि॥
वह व्यक्ति जो विभिन्न देशों में घूमता है और विद्वानों की सेवा करता है. उस व्यक्ति की बुद्धि का विस्तार उसी तरह होता है, जैसे तेल का बून्द पानी में गिरने के बाद फैल जाता है।
स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा। सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम्॥
किसी भी व्यक्ति का मूल स्वभाव कभी नहीं बदलता है. चाहे आप उसे कितनी भी सलाह दे दो. ठीक उसी तरह जैसे पानी तभी गर्म होता है, जब उसे उबाला जाता है. लेकिन कुछ देर के बाद वह फिर ठंडा हो जाता है।
षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता। निद्रा तद्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता॥
छः अवगुण व्यक्ति के पतन का कारण बनते हैं :- नींद, तन्द्रा, डर, गुस्सा, आलस्य और काम को टालने की आदत।
त्यजन्ति मित्राणि धनैर्विहीनं पुत्राश्च दाराश्च सहृज्जनाश्च। 
तमर्थवन्तं पुनराश्रयन्ति अर्थो हि लोके मनुष्यस्य बन्धुः॥
मित्र, बच्चे, पत्नी और सभी सगे-सम्बन्धी उस व्यक्ति को छोड़ देते हैं जिस व्यक्ति के पास धन नहीं होता है वही सभी लोग उसी व्यक्ति के पास वापस आ जाते हैं, जब वह व्यक्ति धनवान हो जाता है. धन हीं इस संसार में व्यक्ति का मित्र होता है।
द्वौ अम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम्। धनवन्तम् अदातारम् दरिद्रं च अतपस्विनम्॥
दो प्रकार के लोग होते हैं, जिनके गले में पत्थर बांधकर उन्हें समुद्र में फेंक देना चाहिए. पहला, वह व्यक्ति जो अमीर होते हुए दान न करता हो. दूसरा, वह व्यक्ति जो गरीब होते हुए कठिन परिश्रम नहीं करता हो।
परो अपि हितवान् बन्धुः बन्धुः अपि अहितः परः। अहितः देहजः व्याधिः हितम् आरण्यं औषधम्॥
कोई अपरिचित व्यक्ति भी अगर मनुष्य की मदद करे, तो उसे परिवार के सदस्य की तरह महत्व देना चाहिए और अगर परिवार का कोई अपना सदस्य भी नुकसान पहुंचाए, तो उसे महत्व देना बंद कर देना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे शरीर के किसी अंग में कोई बीमारी हो जाए, तो वह हमें तकलीफ पहुँचाने लगती है, जबकि जंगल में उगी हुई औषधी  लाभकारी होती है।
श्रोत्रं श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कंकणेन। 
विभाति कायः करुणापराणां; परोपकारैर्न तु चन्दनेन॥
अर्थात् :कानों की शोभा कुण्डलों से नहीं अपितु ज्ञान की बातें सुनने से होती है | हाथ दान करने से सुशोभित होते हैं न कि कंकणों से दयालु / सज्जन व्यक्तियों का शरीर चन्दन से नहीं बल्कि दूसरों का हित करने से शोभा पाता है।
जाड्यं धियो हरति सिंचति वाचि सत्यं, मानोन्नतिं दिशति पापमपाकरोति।
चेतः प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्तिं,सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्॥
अच्छे मित्रों का साथ बुद्धि की जड़ता को हर लेता हैवाणी में सत्य का संचार करता है, मान और उन्नति को बढ़ाता है और पाप से मुक्त करता है। चित्त को प्रसन्न करता है और मनुष्य की कीर्ति को सभी दिशाओं में फैलाता है। सत्संगतिः मनुष्य का कुछ भी भला नहीं करती।
चन्दनं शीतलं लोके,चन्दनादपि चन्द्रमाः। चन्द्रचन्दनयोर्मध्ये शीतला साधुसंगतिः॥
संसार में चन्दन को शीतल माना जाता है लेकिन चन्द्रमा चन्दन से भी शीतल होता है अच्छे मित्रों का साथ चन्द्र और चन्दन दोनों की तुलना में अधिक शीतलता देने वाला होता है। 
पुस्तकस्था तु या विद्या,परहस्तगतं च धनम्।कार्यकाले समुत्तपन्ने न सा विद्या न तद् धनम्॥
 पुस्तक में रखी विद्या तथा दूसरे के हाथ में गया धन; ये दोनों ही ज़रूरत के समय मनुष्य के किसी भी काम नहीं आते। 
विद्या मित्रं प्रवासेषु,भार्या मित्रं गृहेषु च। व्याधितस्यौषधं मित्रं, धर्मो मित्रं मृतस्य च॥
ज्ञान यात्रा में,पत्नी घर में, औषध रोगी का तथा धर्म मृतक का सबसे बड़ा मित्र होता है। 
सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव संपदः॥
अचानक आवेश में आ कर बिना सोचे समझे, कोई कार्य नहीं करना चाहिए क्योंकि विवेक शून्यता सबसे बड़ी विपत्तियों का घर होती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति सोच समझकर कार्य करता है; गुणों से आकृष्ट होने वाली माँ लक्ष्मी स्वयं ही उसका चुनाव कर लेती है।
अर्जुन उवाच ::
चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥
अर्जुन ने श्री हरि से पूछा :- हे श्री कृष्ण ! यह मन चंचल और प्रमथन स्वभाव का तथा बलवान् और दृढ़ है; उसका निग्रह-वश में करना, मैं वायु के समान अति दुष्कर मानता हूँ।
श्री भगवानुवाच ::
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्येते॥
श्री भगवान् बोले :- हे महाबाहो ! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है लेकिन हे कुंतीपुत्र ! उसे अभ्यास और वैराग्य से वश में किया जा सकता है।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
कोई भी काम कड़ी मेहनत से ही पूरा होता है सिर्फ सोचने भर से नहीं।कभी भी सोते हुए शेर के मुंह में हिरण खुद नहीं आ जाता।
दयाहीनं निष्फलं स्यान्नास्ति धर्मस्तु तत्र हि। एते वेदा अवेदाः स्यु र्दया यत्र न विद्यते॥
बिना दया के किये गए काम का कोई फल नहीं मिलता, ऐसे काम में धर्म नहीं होता।जहाँ दया नही होती वहां वेद भी अवेद बन जाते हैं।
विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम्। पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम्॥
विद्या यानि ज्ञान हमें विनम्रता प्रादान करता है, विनम्रता से योग्यता आती है और योग्यता से हमें धन प्राप्त होता है जिससे हम धर्म के कार्य करते हैं और हमे सुख सुख मिलता है। 
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः। न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा॥
जो माता-पिता अपने बच्चों को नहीं पढ़ाते वे शत्रु के सामान हैं।  बुद्धिमानों की सभा में अनपढ़ व्यक्ति कभी सम्मान नहीं पाता, वहां वह हंसों के बीच बगुले के समान होता है। 
सुखार्थिनः कुतोविद्या नास्ति विद्यार्थिनः सुखम्। सुखार्थी वा त्यजेद् विद्यां विद्यार्थी वा त्यजेत् सुखम्॥
सुख चाहने वाले यानि मेहनत से जी चुराने वालों को विद्या कहाँ मिल सकती है और विद्यार्थी को सुख यानि आराम नहीं मिल सकता| सुख की चाहत रखने वाले को विद्या का और विद्या पाने वाले को सुख का त्याग कर देना चाहिए। 
गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥
गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात परमब्रह्म हैं; ऐसे गुरु का मैं नमन करता हूँ।
राम नाम रटते रहो, जब लगि घट में प्रान। कबहूं तो दीनदयाल के, भनक परेगी कान॥
तेरे भाएँ जो करो, भलो बुरो संसार। नारायण तू बैठि कै अपनी भवन बुहार॥
राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट। अंत काल पछताएगा जब प्राण जाएंगे छूट॥


(2.1). आत्मार्थं जीवलोकेऽस्मिन् को न जीवति मानव:। परं परोपकारार्थं यो जीवति स जीवति॥[सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-परोपकारप्रशंसा 78.6]
तात्पर्यम् :: प्रपञ्चे विद्यमाना: सर्वे अपि मनुष्या: स्वहितं, स्वसुखं च सम्पादयन्ति। अत: आत्मन: निमित्तं सर्व: अपि जन: जीवति एव। परन्तु ये जना: अन्येषां हितम्, अन्येषां सुखं च कामयमाना: तदर्थं जीवन्ति, तेषां जीवनमेव सार्थकं जीवनम् ! धन्यं जीवनम् ! परोपकाररहितं जीवनं तु निरर्थकमेव।
(2.2). षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्याः भूतिमिच्छता।निद्रा तन्द्रा भयं क्रोधः आलस्यं दीर्घसूत्रता॥
[उद्योगपर्व 33.78]
तात्पर्यम् :: जीवने औन्नत्यं प्राप्तुं यः इच्छति तेन एते षड् दोषाः परित्यक्तव्याः – निद्रा, तन्द्रा (श्रान्तता), भीतिः, कोपः, आलस्यं, दिर्घसूत्रता (करणीयस्य कार्यस्य अग्रे सारणम्) च। एते दुर्गुणाः यदि स्युः तर्हि तादृशः निरन्तं प्रयासं कर्तुं न अर्हति। परिश्रमेण विना फलप्राप्तिः नैव शक्यम्।
(2.3). पिबन्ति नद्य: स्वयमेव नाम्भ: स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षा:।
नादन्ति सस्यं खलु वारिवाहा: परोपकाराय सतां विभूतय:॥
[सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-सज्जनप्रशंसा 51.170]
तात्पर्यम् :: नदीषु जलं भवति । परन्तु नद्य: स्वयमेव तत् जलं कदापि न पिबन्ति। वृक्षेषु फलानि भवन्ति। ते वृक्षा: अपि स्वयमेव तानि फलानि कदापि न खादन्ति। जलवर्षणेन सस्यानि यथा सम्यक् प्रवृद्धानि भवेयु: तथा कुर्वन्ति मेघा:। परन्तु ते स्वेन वर्धितानि सस्यानि स्वयमेव न खादन्ति। एवमेव सज्जना: स्वसमीपे विद्यमानानां सम्पत्तीनाम् उपयोगं स्वयं न कुर्वन्ति। अपि तु परोपकारार्थमेव तासां विनियोगं कुर्वन्ति।
(2.4). व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम्।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भः लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम्॥ [वैराग्यशतकम् 38]
तात्पर्यम् :: वार्धक्यं व्याघ्री इव मनुष्यं भाययन्ती अस्ति। रोगाः शत्रवः इव शरीरं घातयन्तः सन्ति। भग्नात् घटात् जलं यथा स्रवति तथा अस्माकम् आयुः परिस्रवन्ती अस्ति। तथापि जनाः अन्यान् अपकुर्वन्ति । वयम् अशाश्वताः इति न अवगच्छन्ति एव इत्येतत् विचित्रमेव।
 (2.5). सुजनो न याति विकृतिं परहितनिरतो विनाशकालेऽपि ।
छेदेऽपि चन्दनतरु: सुरभयति मुखं कुठारस्य॥ [सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-सज्जनप्रशंसा 49.110]
तात्पर्यम् :: लोके तावत् मनुष्यस्य एष: स्वभाव: यत् यदा स: स्वयं कष्टम् अनुभवति, आपद्ग्रस्तो वा भवति, तदा स: कुपित: भवेत्, दु:खितो वा भवेत्। किन्तु सत्पुरुषाणां स्वभाव: न तादृश: । ते सर्वदा परोपकारे एव निरता: सन्त: स्वस्य नाशसमये अपि कमपि विकारं न प्राप्नुवन्ति। तत्कथमिति कवि: एकेन उदाहरणेन दर्शयति।
यथा चन्दनवृक्ष: छेदनसमये अपि सहजगुणं सुगन्धं न जहाति, अपि च छेदनार्थम् उपयुक्तं कुठारमपि सुगन्धयुक्तं करोति, तथैव सज्जना: नाशसमये अपि परोपकारबुद्धिं न परित्यजन्ति।
(2.6). अकाले कृत्यमारब्धं कर्तुर्नार्थाय कल्पते।तदेव काले आरब्धं महतेऽर्थाय कल्पते॥
[शान्तिपर्व 138.95]
तात्पर्यम् :: कार्यकरणात् पूर्वं विवेकी मनुष्यः परिस्थितिम् अवलोकयेत्। असमये आरब्धं कार्यं कर्तुः लाभदायकं न भवेत्। किन्तु तदेव कार्यं यदि समीचीने समये क्रियेत तर्हि तत् नितराम् उपयुक्तकरं स्यात्।
(2.7). साहित्यसङ्गीतकलाविहीन: साक्षात्पशु: पुच्छविषाणहीन:। तृणं न खादन्नपि जीवमान: तद्भागधेयं परमं पशूनाम्॥ [सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-कुपण्डितनिन्दा 41.30]
तात्पर्यम् :: गद्यात्मकं पद्यात्मकं च काव्यं, विचारप्रधानं शास्त्रं च साहित्यशब्देन विवक्षितम्। साहित्येन ज्ञानम् अभिवर्धते, सङ्गीतेन, शिल्पेन (कलया) च आत्मसन्तोष: भवति। एषु त्रिषु एकस्य वा ज्ञानं मानवस्य आवश्यकम्। एकस्मिन् अपि विषये यस्य उत्साह: न भवति स: पशु: एव । पशो: पुच्छं शृङ्गे च भवन्ति, एतस्य मनुष्यस्य तु तानि न सन्ति इत्येव भेद:। अपरोऽपि भेद: अस्ति यत् एष: तृणं न खादति, पशव: तु खादन्ति। किन्तु एतत् पशूनां परमं भाग्यमेव । अन्यथा पशूनां तृणम् एव दुर्लभं स्यात् !
(2.8). अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा यश्चरते मुनिः। तस्यापि सर्वभूतेभ्यो नाभयं विद्यते क्वचित्॥
[विष्णुपुराणम् 3.9.31]
तात्पर्यम् :: मुनिः सर्वदा सर्वेषां विषये उत्तमम् एव चिन्तयन् अभयप्रदानं कुर्वन् सञ्चरति। तस्य अन्यस्मात् कस्मात् अपि भयं न भवति। यत् भावयति तत् भवति । वयम् अन्येषां विषये यथा भावयामः यथा व्ययहरामः तथैव ते अपि अस्माकं विषये भावयन्ति व्यवहरन्ति च।
(2.9). गङ्गा पापं शशी तापं दैन्यं कल्पतरुस्तथा ।पापं तापं च दैन्यं च घ्नन्ति सन्तो महाशया: ॥[सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-सज्जनप्रशंसा 47.6]
तात्पर्यम् :: गङ्गानद्यां य: स्नानं करोति तस्य पापपरिहार: भवति । गङ्गा तस्य पापं नाशयति। तथैव चन्द्र: अस्माकं तापं परिहृत्य शैत्यम् उत्पादयति। एवमेव कल्पवृक्ष: अस्माभि: याचितान् सर्वान् अभिलाषान् पूरयति। एतत् जगति प्रसिद्धमेव। किन्तु गङ्गाया:, चन्द्रस्य, कल्पवृक्षस्य च एकस्मिन् एव विषये सामर्थ्यम् अस्ति। सज्जना: महापुरुषा: तु न तथा । तेषां सहवासेन अस्माकं पापं, ताप:, दैन्यं-सर्वमपि परिहृतं भवति । तादृशं सामर्थ्यं तेषु अस्ति।
(2.10). केवलं ग्रहनक्षत्रं न करोति शुभाशुभम्। सर्वमात्मकृतं कर्म लोकवादो ग्रहा इति॥ 
[अनुशासनपर्व 145.2]
तात्पर्यम् :: जीवने कष्टानि दुःखानि यदा आपतन्ति तदा बहवः वदन्ति–ग्रहगतिः समीचीना नास्ति इति। किन्तु केवलं ग्रहनक्षात्रादीनां कारणतः अस्माकं जीवने सुखदुःखादयः न भवन्ति। अस्माभिः कृतानां कर्मणां कारणतः एव शुभाशुभफलं प्राप्यते। ग्रहगतिकारणतः इदं जातम् इत्येतत् जनानां वचनमात्रम्।
(2.11). भीमं वनं भवति तस्य पुरं प्रधानं सर्वो जन: सुजनतामुपयाति तस्य। कृत्स्ना च भूर्भवति सन्निधिरत्नपूर्णा यस्यास्ति पूर्वसुकृतं विपुलं नरस्य॥ [सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-दैवाख्यानम् 96.74]
तात्पर्यम् :: य: मनुष्य: पूर्वस्मिन् जन्मनि अनेकानि सुकृतानि (पुण्यकर्माणि) कृतवान् स: अस्मिन् जन्मनि सर्वत्र सुखम् एव प्राप्नोति। नास्ति अत्र संशय:। तादृश: पुण्यवान् घोरं वनं प्रविशति चेदपि तद्वनं पत्तनमिव सर्वसौलभ्यदायकं भवति। अपि च ये ये तं पश्यन्ति ते सर्वे अपि तस्य विषये मृदु व्यवहरन्ति। किं बहुना, समग्रा भूमि: एव तस्य विषये सम्पद्युक्ता रत्नयुक्ता च भवति।
(2.12). अधमा धनमिच्छन्ति धनमानौ तु मध्यमा:। उत्तमा मानमिच्छन्ति मानो हि महतां धनम्॥ [चाणक्यनीतिदर्पणम् 8.1]
तात्पर्यम् :: अनुत्तमा: जना: जीवने धनमात्रम् इच्छन्ति। धनसम्पादनम् एव तेषां जीवनस्य लक्ष्यं भवति। एतादृशं जीवनं कदापि श्लाघ्यं न भवति। मध्यमजना: धनं मानं च इच्छन्ति। धनेन सह मानम् अपि एते इच्छन्ति इत्यत: एतेषां जीवनं निन्द्यं न भवति चेदपि अतिप्रशस्तं तु न। महापुरुषा: सदापि मानम् एव इच्छन्ति। ते धनं तृणसमानं भावयन्ति। मानम् एव धनं भावयन्ति। मानधनानाम् एतेषां जीवनम् एव उत्कृष्टम्।
(2.13). यथा धेनुसहस्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्। तथा पुराकृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति ॥ [सुभाषितरत्नभाण्डागारम्- दैवाख्यानम् 95.12]
तात्पर्यम् :: सहस्राधिका: धेनव: सन्ति चेत् अपि वत्स: तासु धेनुषु स्वमातु: एव समीपं गत्वा तामेव अनुसरति। तथा एव अस्माभि: पूर्वजन्मनि कृतानि कर्माणि अस्मान् अनुसरन्ति एव।
(2.14). यत्कर्म कुर्वतोऽस्य स्यात्परितोषोऽन्तरात्मनः। तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीतं तु वर्जयेत् 
[मनुस्मृतिः 4.161]
तात्पर्यम् :: जनाः विभिन्नानि कार्याणि कुर्वन्ति । कीदृशानि कार्याणि कर्तव्यानि कीदृशानि न कर्तव्यानि इत्येतत् सर्वदा मनुष्यान् बाधते । यस्य कार्यस्य करणेन अन्तरात्मा तुष्यति तच्च कार्यम् अवश्यं करणीयम् । आनन्देन कर्तव्यं च । तस्य विरुद्धं कार्यं तन्नाम यस्य कार्यस्य करणेन अन्तरात्मनः सन्तोषः न भवति तत् कार्यं न करणीयम् ।
(2.15). मनसि वचसि काये पुण्यपीयूषपूर्णा: त्रिभुवनमुपकारश्रेणिभि: प्रीणयन्त:।परगुणपरमाणून् पर्वतीकृत्य नित्यं निजहृदि विकसन्त: सन्ति सन्त: कियन्त:॥ 
[सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-सज्जनप्रशंसा 53.221]
तात्पर्यम् :: सज्जनानां स्वभावं वर्णयति कविः। सत्पुरुषाणां वचांसि मनांसि शरीराणि च अमृतेन पूर्णानि भवन्ति। तादृशेन अमृतपूर्णेन वचनेन, चेतसा, शरीरेण च ते सज्जनाः उपकारसहस्रेण लोके स्थितानां सर्वेषां जीविनामपि हितम् आचरन्ति। अपि च अन्येषु स्थिताः गुणाः अल्पाः चेदपि तान् एव बहु मत्वा, मनसि सन्तोषम् अनुभवन्ति। किन्तु एतादृशाः जनाः जगति कियन्तः सन्ति ?
(2.16). यदचेतनोऽपि पादै: स्पृष्ट: प्रज्वलति सवितुरिनकान्त:। तत्तेजस्वी पुरुष: परकृतनिकृतिं कथं सहते॥ [नीतिशतकम् 35]
तात्पर्यम् :: लोके सामान्य: पुरुष: अपि अन्यै: कृतं स्वस्य अपमानं न सहते। स्वाभिमानी पुरुष: अन्यै: कृतम् अपमानं न सहते इति तु न वक्तव्यम्। तस्य उदाहरणम् अपि कविना दत्तं यत् सूर्यकान्तमणि: यदा सूर्यकिरणै: स्पर्शं प्राप्नोति तदा झटिति प्रज्वलति। अचेतने मणौ एव एतादृश: स्वभाव: दृश्यते। सचेतनानां विषये तु वक्तव्यमेव नास्ति।
(2.17). पादपानां भयं वातात् पद्मानां शिशिराद् भयम्। पर्वतानां भयं वज्रात् साधूनां दुर्जनाद्भयम्॥[सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-सामान्यनीतिः 168.414]
तात्पर्यम् :: दृढमूला: अपि वृक्षा: वेगयुक्तस्य वायो: कारणत: पतनं प्राप्तुम् अर्हन्ति। अत: वृक्षाणां वायुत: भयम् (अपाय:) अस्ति। यदि हिमपात: भवति तर्हि कमलं नष्टं भविष्यति। शिशिरऋतौ हिमपात: भवति खलु ? अत: कमलानि शिशिरऋतुत: भीतानि भवन्ति। पूर्वं पर्वतानां पक्षा: आसन् इति, इन्द्र: तान् पक्षान् कर्तितवान् इति च कथा श्रूयते। अत: वज्रायुधत: पर्वतानां भीति:। सज्जना: यद्यपि यस्य कस्यापि अहितं न आचरन्ति, तथापि परपीडनस्वभावयुक्ता: दुष्टा: विना कारणम् अपि सज्जनान् पीडयितुम् अर्हन्ति। अत: सज्जना: दुष्टजनेभ्य: भीता: भवन्ति । एवं लोके एकैकस्यापि एकैकविधं भयं भवति एव।
(2.18). यो यस्य चित्ते वसति न सदूरे कदाचन । खे सूर्य कमलं भूमौ दृष्ट्वेदं स्फुटति प्रियाः॥
[गर्गसंहिता माधुर्यखण्डः 1.11]
तात्पर्यम् :: यः यस्य हृदये निवसति सः कदापि तस्मात् दूरे न तिष्ठति। यद्यपि सूर्यः आकाशे अस्ति कमलं तु भूमौ निवसति तथापि सूर्यस्य दर्शनमात्रेण कमलं विकसितं भवति (सूर्यस्य सान्निध्यम् अनुभवति )।
(2.19). दूरीकरोति दुरितं विमलीकरोति चेतश्चिरन्तनमघं चुलुकीकरोति भूतेषु किञ्च करुणां बहुलीकरोति सत्सङ्गति: कथय किं न करोति पुंसाम्।
[सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-सत्सङ्गतिप्रशंसा 91.30]
तात्पर्यम् :: लोके सर्वेषां जनानां स्नेहिता: भवन्ति एव । तेषु स्नेहितेषु सज्जनानां संख्या तु न्यूना एव । यत: स्वार्थपरा: एव अधिका: सन्ति लोके । तथापि अस्माभि: सज्जनानां सहवास: एव करणीय: इति वदन् सुभाषितकार: तत्र कारणमपि वदति - सज्जनानां सहवासेन पुरुषाणां मनसि स्थिता: दुष्टा: विचारा: दूरं गच्छन्ति । मन: शुद्धं भवति । पुरा कृतं पापमपि भस्म भवति । अपि च प्राणिनां विषये दया अधिका भवति । अत: सज्जनानां स्नेह: मनुष्याणां किं वा न करोति ? अर्थात् सर्वविधानि मङ्गलानि अपि जनयति।
(2.20). रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥
[हितोपदेशः 39]
तात्पर्यम् :: रूपेण यौवनेन च युक्ताः उत्तमकुले सञ्चाताः अपि जनाः विद्याविहीनाः यदि भवेयुः तर्हि ते गन्धरहितानि किंशुकपुष्पाणि इव न शोभन्ते । विद्या एव वस्तुतः व्यक्तेः शोभां वर्धयति । विद्याविहीनाः पुरुषाः तु सुगन्धविहीनानि पुष्पाणि इव आकर्षणरहितानि भवन्ति।
(2.21). व्याधितस्यार्थहीनस्य देशान्तरगतस्य च। नरस्य शोकदग्धस्य सुहृद्दर्शनमौषधम्॥
[सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-सुमित्रप्रशंसा 92.10]
तात्पर्यम् :: प्राय: लोके सर्वेषाम् अपि स्नेहिता: भवन्ति एव । बान्धवा: बहव: स्यु: नाम, तथापि मित्राणि सन्ति चेत् एव तस्य नरस्य जीवनं सुखि जीवनम्। यत: यस्य मित्राणि भवन्ति तस्य जीवने सर्वविधसौख्यम् अपि भवति। मनुष्यस्य कष्टसमये मित्रं सान्त्वनवचनै:, अन्येन प्रकारेण वा साहाय्यम् आचरति। तत्रापि रुग्णावस्थायां, दारिद्र्यदशायां, देशान्तरनिवासप्रसङ्गे, दु:खावस्थायां च यदि मित्राणां दर्शनं भवति तर्हि तत् औषधमिव सर्वमपि कष्टं दु:खं च परिहरति।
(2.22). मरणं प्रकृति: शरीरिणां विकृतिर्जीवितमुच्यते बुधै:। क्षणमप्यवतिष्ठते श्वसन् यदि जन्तुर्ननु लाभवानसौ॥ [कालिदासस्य रघुवंशम् 8.87]
तात्पर्यम् :: सर्वेषां प्राणिनां मरणं स्वभावसिद्धम्। तत् परिहर्तुं केनापि न शक्यते। जातस्य मरणं निश्चितम् एव। किन्तु जीवनं न निश्चितम्। तत् आकस्मिकं, न तु स्वभावसिद्धम्। अद्यैव जीवनं समाप्तं स्यात्, अथवा श्व:। जीवितस्य पुरुषस्य मरणं भवत्येव। किन्तु मृतस्य पुन: जीवितं भविष्यति इत्यत्र न निश्चय:। अत: क्षणकालमपि जीव: यदि देहे तिष्ठति तर्हि तदेव प्राणिनां महालाभ:। किञ्च, मरणेऽपि शोक: न कार्य:। यत: मरणं प्राणिनां स्वाभाविकम्। यावज्जीवं सन्तोषेण जीवेत्। यत: दुर्लभं जीवनम् अस्माभि: प्राप्तम् अस्ति।
(2.23). अनेकशास्त्रं बहु वेदितव्यम् अल्पश्च कालो बहवश्च विघ्ना:।
यत्सारभूतं तदुपासितव्यं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥
[सुभाषितरत्नभाण्डागारम् - सामान्यनीतिः 180.878]
तात्पर्यम् :: जातेन मनुष्येण बहूनां शास्त्राणां विषये यावत् शक्यते तावत् अध्येतव्यम्। तद्विषये विलम्ब: न करणीय:। यत: काल: बहु अल्प:। अपि च सत्कार्याणां विघ्ना: अपि बहव: भवन्ति। यथा केनचित् कविना उक्तं- ‘क्षणश: विद्यां साधयेत्’ इति, तथैव कृत्वा शास्त्राध्ययनसमये अपि सारभूतम्, अतिप्रधानम् एव विषयं ज्ञातुम् अधिक: प्रयत्न: करणीय:। जलेन मिश्रितं क्षीरम् एकस्मिन् पात्रे अस्ति चेदपि हंस: यथा क्षीरमेव स्वीकरोति, तथा अध्ययनसमये अनुपयुक्त: अप्रधान: वा भाग: परित्यक्तव्य:।
(2.24). कामान् दुग्घे विप्रकर्षत्यलक्ष्मीं कीर्तिं सूते दुष्कृतं या हिनस्ति।
तां चाप्येतां मातरं मङ्गलानां धेनुं धीरा: सूनृतां वाचमाहु:॥
[सुभाषितरत्नभाण्डागारम्-वाग्वर्णनम् 88.12]
तात्पर्यम् :: लोके सर्वै: सज्जनानां सहवासं प्राप्तुं यत्न: करणीय:। तेषां सम्पर्केण अस्माकम् अनेके उपकारा: भवन्ति। सर्वेषां मङ्गलानां जननी इव स्थिता एषा सतां वाणी कामधेनु: इव अस्माकं सर्वा: इच्छा: पूरयति। अनिष्टात् अस्मान् दूरीकरोति। अत: एव पण्डिता: सज्जनानां वाचं कामधेनुं वदन्ति।
(2.25). स्वभावो नोपदेशेन शक्यते कर्तुमन्यथा। सुतप्तमपि पानीयं पुनर्गच्छति शीतताम्॥
[पञ्चतन्त्रम् 1.112]
तात्पर्यम् :: अन्येषु जनेषु परिवर्तनम् आनेतुम् ये इच्छन्ति ते सपदि उपदेशम् आरभन्ते। किन्तु उपदेशमात्रेण कस्यापि स्वभावस्य परिवर्तनं कर्तुं न शक्यते। स्वभावस्य परिवर्तनं तथा सुकरं न। यतः समीचीनतया उष्णीकृतमपि पानीयं स्वस्य स्वभावानुगुणं पुनः शीततां प्राप्नोति।
(2.26). सम्पत्सु महतां चित्तम् भवेत्युत्पलकोमलम्।आपत्सु च महाशैलशिलासङ्घातकर्कशम्॥
[नीतिशतकम् 66]
तात्पर्यम् :: सामान्यजनाः सौख्यकाले आनन्देन अत्युत्सुकाः भवन्ति। कष्टकाले निरुत्साहिनः सन्तः असहायकताम् अनुभवन्ति। किन्तु महापुरुषाः न तथा । सम्पत्तेः प्राप्तौ तेषां मनः कमलवत् कोमलं भवति। आपत्तौ ते किञ्चिदपि विचलिताः न भवन्ति। महापर्वतस्य शिला इव नितरां दृढं तिष्ठन्ति।
(2.27). सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। वृणुते हि विमृष्यकारिणम् गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः॥ [किरातार्जुनीयम् 2.30]
तात्पर्यम् :: जीवने सर्वदा अपि विचिन्त्य एव सर्वे व्ययहाराः कर्तव्याः । कोपि जनः अविचिन्त्य हठात् किमपि कार्यं न कुर्यात् । यदि तथा क्रियेत तर्हि तादृशम् अविवेकिनं महत्यः आपदः आवृण्वन्ति । किन्तु यः सम्यक् विचार्य पदं स्थापयति सः उत्तमफलानि एव प्राप्नोति । तस्य गुणैः आकृष्टा सम्पत्तिः स्वयमेव धावन्ती तत्समीपम् आगच्छति।
(2.28). सर्पाः पिबन्ति पवनं न च दुर्बलास्ते शुष्कैस्तृणैर्वनगजा बलिनो भवन्ति ।
कन्दैः फलैर्मुनिवरा गमयन्ति कालं सन्तोष एव पुरुषस्य परं निधानम्॥ [पञ्चतन्त्रम् 2.156]
तात्पर्यम् :: सामान्यतः जनाः चिन्तयन्ति यत् जगति दृश्यमानानि वस्तूनि एव लक्ष्यसिद्धौ प्रमुखं पात्रं वहन्ति इति। किन्तु तत् न सत्यम् इति एतैः उदाहरणैः ज्ञायते-सर्पाः वायोः सेवनमात्रेण जीवन्ति चेदपि ते न दुर्बलाः। शुष्कानि तृणानि खादन् गजः अरण्ये अत्यन्तं बलवान् भवति। कन्दमूलानि खादन्तः एव ऋषयः सर्वेषां मार्गदर्शकः सन्तः तिष्ठन्ति । अतः सन्तोषः एव पुरुषस्य परमं धनम् अस्ति न तु अन्यद् किमपि।
(2.29). सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः।सत्येन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥[चाणक्यनीतिदर्पणम् 5.19]
तात्पर्यम् :: इयं भूमिः सत्येन एव धृता अस्ति। सूर्यः सत्येन एव तपति। वायुः स॒ञ्चरति सत्यस्य आधारेण एव। जगति विद्यमानं सर्वमपि सत्ये एव प्रतिष्ठितम् अस्ति। सत्यमेव सर्वस्य आधारभूतं, शक्तिमूलं च। अतः अस्माभिः सत्यम् उपासितव्यम्।
(2.30). वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं दुकुलैः सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः।
स तु भवति दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोर्थवान् को दरिद्रः॥
[वैराग्यशतकम् 53]
तात्पर्यम् :: कश्चन संन्यासी राजानम् उद्दिश्य वदति–"आश्रमे वसन्तः वयं वल्कलवस्त्रैः एव सन्तुष्टाः स्मः। भवान् कौशेयवस्त्राणि धरन् सन्तोषम् अनुभवति। भवतः मम च सन्तोषः समानः एव। तत्र न कोपि भेदः। यस्य तृष्णा अधिका अस्ति सः एव दरिद्रः। मनः यदि तृप्तं स्यात् तर्हि कः धनिकः ? कः दरिद्रः "?

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