Friday, October 24, 2014

SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (II) श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय (II )

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय (II)
  CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By:: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj
ॐ गंगणपतये नमः 
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाव शिष्यते॥ 
गजानन भूतगणादिसेवितं कपिथ्यजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपपंकजम्॥ 

सांख्य-ज्ञान योग 
This treatise on Shri mad Bhagwat Geeta is different than the other popular version in one regard i.e., the commentary is made by a person, who is living in this  cosmic era and himself is experiencing the truth elaborated in it. He himself is interacting with the creations of the Almighty. The other attempts were made by those, who are sages-recluse-relinquished-the people of the other world. श्री मद्  भागवत गीता के इस भाष्य में अन्यानेक विद्वानों-साधु-संतों के भाष्य से यह अंतर है कि यह एक सांसारिक-कलयुगी व्यक्ति, जो कर्म-ज्ञान तथा भक्ति मार्ग का एक साथ अनुगामी है; द्वारा विश्लेषति है। यह अध्ययन कर्ता को 
कलयुग में गीता के प्रयोग का मार्ग दिखाने का प्रयास है। 
Bhagwan Shri  Krashn made efforts to clear the fuddled mind of Arjun using SANKHY (-GYAN YOG) SHASTR-DISCRIMINATIVE LOGIC. He describes to him that he is not killing anything, since the soul cannot be killed. It was within his capacity to command only his own actions-deeds-duties-endeavors; but the rewards-fruits-results-out come of his deeds were beyond his powers-limits.

अर्जुन की करुणा (-कायरता) के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद 
संजय उवाच: तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्‌। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥2-1॥
भावार्थ :  संजय बोले: वैसी-उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से पूर्ण तथा व्याकुल नेत्रों वाले शोक-विषाद युक्त, उन अर्जुन के प्रति भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा। 
भगवान को मधुसूदन एक विशिष्ट कारण-उद्देश्य से कहा गया है। जिस प्रकार उन्होंने मधु दैत्य का संहार  था उसी प्रकार दुर्योधन और उसी जैसे अन्य लोगों का सफाया भी होने जा रहा था। 
Sanjay said: Arjun's whose eyes were full of copious tears due to the pity-completely weakened-overpowered by compassion-worries, Bhagwan Shri Krashn-Madhu Sudan-the killer of Giant-Demon Madhu, said this to pacify-encourage him.
Here Bhagwan Shri Krashn is addressed as Madhu Sudan, since he eliminated the -demon-Rakshas-giant. The time was ripe to eliminate Duryodhan and the like in a similar manner.

श्रीभगवानुवाच: कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌। अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥2-2॥
भावार्थ :  भगवान श्री कृष्ण बोले:- हे अर्जुन! तुम्हें इस असमय-विषम अवसर पर यह मोह-कश्मकश-अन्तर्द्वन्द (-गन्दगी, अज्ञान, कल्मष, कायरता)  कहाँ से प्राप्त हुई; जिसका श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा अनुसरण नहीं किया जाता क्योंकि यह  न तो स्वर्ग को देने वाली है और न ही कीर्ति-यश को बढ़ाने वाली  ही है। 
अर्जुन इसलिये कहा गया, क्योंकि वे शुद्ध, निर्मल, स्वच्छ अन्तःकरण वाले हैं। तुम्हें मोह-कश्मकश-अन्तर्द्वन्द (-कायरता) शोभा नहीं देते।
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌:  भगवान ने आश्चर्य व्यक्त किया अर्जुन को चेताने-जगाने-होश में लाने के लिये। युद्ध के मैदान में उतरने के बाद ये बातें बेमानी-अर्थहीन-बेमतलब-व्यर्थ हो जाती हैं। जहां शूरवीरता-उत्साह होना चाहिये वहाँ ऐसी बातों का मतलब मैदान छोड़ना-पीठ दिखाना है जो कि एक क्षत्रिय के लिये अशोभनीय है। यह दोष अस्थाई है जो कि तुम्हारे भावों, वचनोँ और क्रियाओं में भी आ गया है; परन्तु यह रहने वाला नहीं है। 
अनार्यजुष्टम्: बुद्धिमान-प्रबुद्ध-आर्यों में जो विचार उत्पन्न होते है, वे भले के लिए ही होते हैं। श्रेष्ठ मनुष्य की प्रवृति और निवृति दोनों में ही कल्याण की भावना अन्तर्निहित होती है। परन्तु यहाँ ऐसा नहीं है। अतः युद्ध रूपी कल्याण-कर्म से उपरत होना तुम्हारे लिए, कदापि उचित नहीं है। 
स्वर्ग्यम: तुम्हारा यह व्यवहार स्वर्ग देने वाला भी नहीं है।
कीर्तिकरम्: इस प्रकार का बर्ताव अपयश देने वाला है। 
Bhagwan Shri Krashn said to Arjun: Oh! Arjun how did you acquire this conflict-imbalance-cowardice at this occasion, which will neither award you Heaven nor will it, lead to your praise-honor-respect. 
Bhagwan Shri Krashn expressed deep anguish-concern-wonder to awaken-enlighten Arjun. This type of behaviour is undesirable, once you are in the battle field. Conflict in the mind-concern for the opposite side-putting the bow and arrow aside-loosing heart, are not expected from a warrior. These are not the characterices of a Kshtriy. This type of action-behaviour will bring disrepute-bad name-blot-slur to him and will deprive him of the Heaven. This is equivalent to leaving the battle field, accepting defeat. This defect which has entered-occupied-pervaded your expressions, words and actions, is not going to stay-haunt you permanently.
ANARYJUSHTM: Thoughts which comes-arise in the minds of intelligent-noble  people emerge for welfare, which is certainly not the case here. One who desire welfare, has the tendency-inclination-intention to do some thing beneficial, even if it is abstinence-retirement-escape-discontinuation. He acts as per the situation. Therefore, to escape the war is certainly not beneficial-desirable to you. 
ASWARGAYM: This type of behaviour does not entitle you for heaven.
AKIRTIKRAM: This incident will defame you.
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥2-3॥
भावार्थ :  इसलिए हे प्रथा पुत्र अर्जुन! नपुंसकता को त्याग दे, क्योंकि यह तुम्हारे लिये उचित नहीं है।  हे परंतप! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।
पार्थ: भगवान ने पार्थ (-कुंती पुत्र) कहकर अर्जुन को याद दिलाया-चेताया कि युद्ध करना माँ की आज्ञा है।
क्लैब्यं मा स्म गमः : हिजड़े  के समान ब्यवहार करने की बात कहकर भगवान ने अर्जुन को उस समय की याद दिलाई, जब वे नपुंसक-बृहनला के रूप में राजा विराट के यहां एक नर्तक-नौकर (-क्लीव, गुलाम) के रूप में रह रहे थे। 
परन्तप: तुम परन्तप-तपे हुए, हर परिस्थिति से गुजरे हुए, तपस्वियों के समान, दूसरों का मार्ग दर्शन करने वाले हो। तुम्हें रणभूमि में देखकर शत्रुओं को सन्ताप (-डर, भय) लगता है। 
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ: अपने हृदय में उत्पन्न हुए निम्न कोटि के विचारों को त्याग दो, अन्यथा तुम स्वयं समाज और स्वयं अपनी निगाह में तुच्छ हो जाओगे। इस आवरण से बाहर निकलना तुम्हारे लिये नितान्त जरूरी और आसान है। धर्मात्मा-महान-त्यागी वो है, जिसे दूसरे ऐसा समझें-कहें। दुनियाँ तुम्हारे व्यवहार को कायरता का नाम देगी और तुम्हें भगोड़ा करार देगी। इसलिए उठो-खड़े हो जाओ और युद्ध रूपी अपने कर्तव्य-दायित्व का निर्वाह करो। [ भगवान का एक नाम रणछोड़ भी है]
Oh Arjun the son of Pratha! Reject this behaviour (-unlike a brave man) like the impotents, since this is not meant for you (-Arjun had to remain as an impotent for one year after the curse in the heaven). You are the most feared warrior! Reject this weakness of the heart and get ready for the war.
PARTH: Bhagwan reminded the promise Pandavs made to their mother to get back the empire and undo injustice, they had been subjected to, since childhood. 
KLAVYAM MA SM GMH: Bhagwan reminded Arjun of the period, he had to spent at Virat Nagar as a servant-employee in the grab of a dancer-essentially an impotent and the insult he had to beer with.
PRANTAP: You are an ascetic-one who had seen all sorts of adversities-situations-difficulties-rigors of life, capable of guiding showing the way to others. Once in the battle field, your enemies become afraid of you. They start shivering, beg for their lives and run away. Here also, the situation is exactly like that. Duryodhan and his commanders are afraid of you. If you leave the battle field your enemies will be happy.
CHHUDRAM HRADYDOURBALYAM TYKTVOTTISHTH: Control the weakness in your heart-reject the inferior thoughts-ideas, which have engulfed (-over powered) you temporarily; otherwise you will become pygmy-dwarf-dejected-inferior in your own eyes along with the society. Its essential for you to come out of the caucus-shell-trauma. One is great-ascetic-sage-renounced-detached, if others recognize him to be so. History will remember you as a coward and call you a fugitive-deserter. Therefore, get up and carry out your duties-responsibilities-promises-commitments.[Bhagwan Krashn is lovingly-fondly remembered as Ranchhod Ji. He did not desert the battle, but played a trick to destroy Kal Yawan]

अर्जुन उवाच: कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥2-4॥ 
भावार्थ : अर्जुन बोले-हे मधुसूदन! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य के विरुद्ध लड़ूँगा? क्योंकि हे शत्रु-दुष्ट हन्ता-अरिसूदन! ये दोनों ही पूजनीय हैं।
मधुसूदन और अरिसूदन: ये दोनों ही सम्बोधन व्यक्त करते हैं कि भगवान शत्रु-रिपु हन्ता हैं। भगवान का व्यक्तिगत शत्रु कोई नहीं है। वे पालनहार हैं और भक्तों की रक्षा के हेतु दैत्य, दांनव, राक्षस, आतताइयों का शमन करते हैं। परन्तु यहाँ दोनों ही गुरुजन हैं। वे श्रेष्ठ आचरण वाले, मुझ पर स्नेह रखने वाले, परम हितैषी हैं।  
कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च: आप जानते हैं कि मैं ना तो कायर हूँ और ना नपुंसक। मेरे सामने धर्म संकट है। जिन लोगों से रे या तू जैसा सम्बोधन भी मारने जैसा है, उन पर बाणों से आघात बहुत भारी पाप ही तो है।इसीलिए मैं मारने से डर रहा हूँ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हौ: ये दोनोँ ही आदरणीय  पूजनीय हैं। इनका मुझपर पूरा हक है। वे मेरे द्वारा सेवा-पूजा करने योग्य हैं।  वे मुझपर प्रहार कर सकते हैं परन्तु मैं उन पर नहीं। उनसे प्रतिद्वन्दिता  घोर पाप और अनर्थ है।
Arjun said :-O The killer of Madhu! How can I fight against Bhishm and Dron by shooting arrows at them?! O Ripusudan (-the killer of tyrants and the enemy)!  both of them are respected-honored -worshiped by me. 
MADHUSUDAN & RIPUSUDAN: Both these names are titles of God, since he is the killer of tyrants-demons-Giants. He is the nurturer. In fact Bhishm & Dron too were devoted to the Almighty Krashn. They were equally respected-regarded by Shri Krashn & Arjun. They had pious-virtuous-adorable character. They had extreme love and affection for Arjun. This was the reason behind hesitation.
KATHAM BHISHMASYMAHAM SANKHYE DRONAM CHH: You are aware that I am neither a coward nor impotent. Its religiosity which is obstructing me. Calling them by re! (-O!) or tu (-you) in an insulting manner, is just like their murder. If I strike them with arrows, it will lead me a great-unpardonable sin. It will censure me.
ISHUBHI PRTIYOTSYAMI PUJARHOU: Both of them are esteemed for me. They have ful authority over me. They deserve worship-prayers by me. They are free to hit me but I am not supposed to retaliate. Competition-argument-fight with them is a great sin and unfortunate.
गुरूनहत्वा हि महानुभावा-ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
 हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैवभुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌ ॥2-5॥
भावार्थ : इसलिए इन महानुभाव गुरुजनों को न मारकर मैं इस लोक में भिक्षा का अन्न  खाना भी श्रेष्ठ-कल्याणकारक समझता हूँ; क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा। 
वर्णाश्रम धर्म में क्षत्रिय के लिए भिक्षा का अन्न ग्रहण करना भी निन्ध-निषेध है। अतः अगर शत्रु पक्ष के लोगों को मारना पाप है, तो यह भी पाप है। अर्जुन इस पाप को छोटा-कम निन्दनीय मानते हैं। पाप का पक्षधर होने के कारण समस्त कौरव और उनका साथ देने वाले सभी गुरुजन बध्य हो गये। शत्रु पक्ष का साथ देने के कारण उनका वध अनिवार्य था और उनको मारने से पाप लगना भी निश्चित था।  अतः अर्जुन को उस पाप के निवारण का उपाय भी ढूँढना था। यह भी स्पष्ट है कि उनकी इच्छा के विरुद्ध उनको मारना भी संभव नहीं था और यह बात अर्जुन अच्छी तरह जानते थे। उन्होंने उस मार्ग को चुनना पसंद किया जिसमें कम पाप लगे या फिर कृष्ण उस पाप का निराकरण करें-जो उन्होंने कहा भी और किया भी। 
जो भी व्यक्ति वर्तमान जन्म के सुख भोगों को, अगले जन्मों के कष्टों-दुखों-दण्डों की अपेक्षा ज्यादा महत्व प्रदान करता है, उसका नाश  और नर्क निवास निश्चित है। 
Hence, I would prefer to beg alms instead of killing these enlightened-philosophers-teachers, since its not advisable to kill them and experience the luxuries-comforts-riches-pleasures painted-soaked in their blood.
Begging-accepting alms-donations-charity, except in adverse circumstances, by a Kshtriy is a taboo in the caste system-Varnashram Dharm. If killing the of respected-elders is a sin ; begging is also a sin. Arjun preferred the one, which is less painful in next births. All those who were with the Kauravs and  their advocacy, made them vulnerable to untimely-pre mature death. Its certain that killing of a Brahmn and Bhishm would have slurred-tainted Arjun. It was the quest of Arjun to find out and amicable way to avoid the sin associated with the deaths. He wanted to ensure that Bhagwan Krashn should find out ways and means to prevent-isolate-reduce-remove the sin. Bhagwan Shri Krashn promised and later implemented the protection of Pandavs, from sins, by telling Bhagwan Shiv that what ever had happened was his will and the Pandavs carried out, his directives only.
One who gives weightage to the comforts of the current birth by indulging in vices-wickedness-dishonesty-cheating etc., his posting in the hells is certain.

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो-यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम-स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥2-6॥
भावार्थ : हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना-इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हमको वे जीतेंगे। और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही हमारे आत्मीय धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे मुकाबले में खड़े हैं। 
अर्जुन को पूरी तरह स्पष्ट था कि उनके मष्तिष्क में कश्मकश है। उसका समाधान अति आवश्यक था।अंतर्द्वन्द  के साथ युद्ध के परिणाम विपरीत होने की सम्भावना बढ़ जाती है। युद्ध के सभी पक्षों क्रिया-प्रतिक्रिया को पूरी तरह समझना नितांत जरूरी है। युद्ध के पारंगत-अनुभवी-जानकर से सलाह-मशवरा भी अति आवश्यक होता है। उसके बाद ही संचालन व्यवस्था को निर्धारित किया जा सकता है। उस वक्त श्री कृष्ण से बड़ा युद्ध विशारद पृथ्वी पर नहीं था। 
अर्जुन को समय-समय पर दैविक विधान-हस्तक्षेप द्वारा चेताया-सावधान किया गया था कि वे अपने शक्तियों पर घमण्ड-अहंकार ना करें। हनुमान जी महाराज और भगवान शिव ने उन्हें इस बात का अहसास करा दिया था कि उनका स्वयं को अजेय समझना गलत है। भीष्म पितामह ने अपने गुरु परशुराम जी को युद्ध में पूरी तरह संतुष्ट किया था और देवताओं के कहने पर ही युद्ध विराम किया था। उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि द्रोण उनके गुरु ही नहीं, अपितु युद्ध विशारद भी हैं। उनकी शक्तियों को कम करके आंकना भी पूरी तरह गलत होता। अर्जुन को स्वर्ग से दैविक शक्तियाँ प्राप्त हुई थी और उनका प्रयोग वे विराट के युद्ध में कर भी चुके थे। वे ये भी जानते थे कि इन शक्तियों का असमय उपयोग दुरूपयोग होगा-जो कि उन्हें किसी भी कीमत पर नहीं करना था। कर्ण के कवच-कुण्डल और शक्ति का भी उन्हें और भगवान श्री कृष्ण को ज्ञान अवश्य होगा। ऐसे महार्थियोंके होते हुए युद्ध में विजयी हो जायें, ये भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता था। यदि युद्ध में हार होती तो जग हँसाई तो होती ही। उन्होंने स्वयं ही नारायणी सेना और भगवान श्री कृष्ण में से भगवान श्री कृष्ण को चुना था और उनको भगवान की शक्तियों का अहसास भी था। फिर भी अंतर्द्वन्द ?! जिसका समाधान जरूरी था। 
उन्हें यह स्पष्ट रूप से पता था कि जिन लोगों से उन्हें युद्ध की प्रेरणा-उत्साह प्राप्त होता है, वे प्रतिद्वंदी-प्रतिस्पर्धी नहीं रहेंगे। जीवन नीरस हो जायेगा। रुदन-क्रंदन और आंसू ही आंसू होंगे। खजाना खाली होगा। 
We are not sure whether to fight or not to fight, which of the two is beneficial to us. Its unclear whether we will win or loss and by killing-vanishing whom: the sons-relatives-friends of Dhratrashtr , we would not like to survive, are facing-standing before us.
Here, Arjun is very very clear about the conflict in his mind. He is revealing his inner self-consciousness. This is quite logical to weigh pros and cons of one's action-reactions and discuss them with the wise person-experts in the field and plan strategies carefully-cautiously. Shri Krashn was the greatest expert of war fare in those days. He eliminated thousands of demons-giants from his early childhood.
Arjun had been cautioned a number of times by divine intervention not to be proud of his powers, by Hanuman Ji and Bhagwan Shiv. He was aware that Bhishm could not be won by Bhagwan Parshuram. He was aware of the powers of Dronachary. He knew that he has been awarded with divine weapons and he utilized them successfully in the battle of Virat, which certainly made him superior to the opposite wing. With the presence of such stalwarts-mighty people victory was uncertain. People would have laughed over them. He himself made the choice between the Narayni Sena and Bhagwan Shri Krashn, which clearly shows that he was aware of the mystic powers of Bhagwan Shri Krashn. Yet the conflict-indecisiveness?!
He was aware of the fact that after the war, all those who used to inspire him (-competitors-rivals) will be no more and the life will become tasteless-boring. There would be tears and cries. Coffers would be empty, since whole money would have been wasted over the war fares.

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥2-7॥
भावार्थ: इसलिए कायरता रूप दोष से उपहत हुए स्वभाव वाला तथा धर्म के विषय में मोहित चित्त हुआ मैं आपसे पूछता हूँ कि जो साधन निश्चित कल्याणकारक हो, वह मेरे लिए कहिए क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ, इसलिए आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिए।
किंकर्तव्य विमूढ़ता की स्थिति बुद्धि के कुण्ठित होने का परिणाम है जिसके कारण अर्जुन स्थिति को समझने-बुझने में असमर्थ हो गए। अर्जुन को सम्बन्धियों से युद्ध और इसके दुष्परिणाम स्पष्ट थे। उन्हें क्षात्र धर्म का ज्ञान न हो ऐसा नहीं है। कुंती ने कहा था "जिस दिन के लिए क्षत्राणि  पुत्र उत्पन्न करती है, वो नक्त आ गया है"। 
धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म है। एक ही क्रिया दो परिस्थितियों में पाप या पुण्य फल दायक हो सकती है। उनका मोहित होना इसी दुविधा को व्यक्त करता है। इसी वजह से धर्मराज को एक साथ दो-दो रूपों में (युधिष्टर और विदुर) अवतार ग्रहण करके पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ा था। यही वो क्षण था-परिस्थिति थी, जिसमें उन्हें धर्म की बारीकियों को समझना था। 
शरणागत की रक्षा करना शरण देने वाली की जिम्मेवारी है। शिष्य को मार्ग दिखाना गुरु का कर्तव्य-दायित्व है। अर्जुन अपने कल्याण का मार्ग-साधन पूछ रहे हैं और भगवान श्री कृष्ण इसके लिए तत्पर हैं। कलयुग में मनुष्य का आचार-व्यवहार-चाल चलन-रख रखाव कैसा हो इसका उत्तर यहाँ मौजूद है। धर्म राज भी धर्म की बारीकी-गति को अच्छी तरह समझ सकेंगे यही सब देखकर यह संवाद अति महत्वपूर्ण  हो जाता है। 
I, who has been engulfed-over powered by the sentiments-confusion, is unable to understand the basics of religion-Dharm as a Kshtriy-warrior due to ignorance. I seek asylum under you as a disciple to know-find out the rightful action. Kindly brief me about the means which will be best suited to me under these circumstances.
This was the moment of gross uncertainty-confusion when Arjun's mind became blunt-blank blank and he became indecisive. He was aware of his duties-responsibilities as a Kshtriy-warrior. When Duryodhan refused to give even 5 villages and straightway said he will not give land equivalent to the tip of a needle to Pandavs, without war; Kunti said that the time had come for which the Kshtrani give birth to sons. 
Analysis of Dharm-religion is very typical-like razor edge. In one situation a deed is pious-virtuous and in other it is a sin-taboo leading to hells. His confusion-ignorance-suspense is justified. His desire to understand the fine lines between religiosity and vices is justifies. He surrenders before Bhagwan Krashn-seeks asylum-shelter-refuse under him shows his diligence-preparedness for duties. This is the moment due to which Dharm Raj-Yam Raj had to take birth in two incarnations at the same time as Yudhishtr and Vidur on earth, to under the fine lines between two interpretations of Dharm in two different situations. Its dynamic and not static.
This becomes the duty of one who has undertaken the responsibility to protect. Its the duty of the enlightened-philosopher to guide-show the way. Arjun is eager to find-trace the way to his welfare and the Almighty too is willing to do the desired. He is utilizing the opportunity to clear the doubts of Dharm Raj in deliberation-discharge of his duties. As a matter of fact the treatise is to make the humans clear of their responsibilities-ethics-virtues-duties in this cosmic era i.e., KAL YUG for their welfare.

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या-द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं-राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥2-8॥
भावार्थ: क्योंकि पृथ्वी पर निष्कण्टक-शत्रु रहित, धन-धान्य सम्पन्न राज्य और स्वर्ग में देवताओं का आधिपत्य  प्राप्त हो जाये तो भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो मेरी इन्द्रियों के सुखाने वाले शोक को दूर कर सके।
 जिन लोगों की मृत्यु की आशंका से इतना शोक हो रहा हो, उनकी मृत्यु के बाद कितना शोक होगा इसका अन्दाजा लगाना मुश्किल है। निष्कंटक राज्य प्राप्त होने या फिर स्वर्ग का स्वामित्व मिलने से शोक दूर नहीं हो सकता। स्वर्ग का राज्य भी निष्कंटक नहीं है और इंद्र पद भी एक निश्चित अवधि के लिए ही होता है। इन्द्र को भी अपने कार्यकाल में अनेकों बार इन सब परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। राक्षस भी देवताओं के भाई ही तो हैं। इन्द्र को बार-बार उनसे युद्ध करना पड़ता है। राक्षसों की मृत्यु पर देवतागण शोक नहीं करते, तो इंद्र पुत्र अर्जुन को विपक्ष से युद्ध करने और उनका संहार करने में शोक-दुःख क्यों-किसलिए-कैसा ?!
जब तक शोक रहता है मनुष्य सुख से नहीं जी सकता। पुराणों में स्पष्ट कहा गया है कि एक सीमा से अधिक शोक कभी ना तो रहता है और ना ही करना चाहिये। गम इन्सान को नष्ट कर देता है। सुख और दुःख तो भाग्य-प्रारब्ध निर्धारित करता है, जो कि पूर्व जन्मों के संचित कर्मों का फल मात्र है। अतः शोक न करके मनुष्य को अपनी चित्त वृतियों को भगवान के ध्यान में केन्द्रित करना चाहिये, और अर्जुन वही कर रहे हैं। 
Even if I get the empire, which is free from enemies, with coffers-treasury full of wealth-money and availability of the governance of heaven, I do not see-find-observe a remedy which can cure  the grief-sorrow-pain,  which is drying up-wilts my senses.  
The assumption-thought of the death of the relatives is producing so much pain-grief in Arjun. The real quantum of grief-sorrow-pain would be enormous-unimaginable after the war. Pain-grief can not be over come by attaining a trouble free state or the governance of heaven. Lordship of heaven too is not free from troubles-tensions-difficulties, since it is always open to invasion-acquisition-attacks by the demons-giants-unholy spirits. The post of Indr-King of Demi Gods, Deities, too is not permanent. After the fixed tenure Indr too has to go. He may be subjected to rigorous hells as a result of his vices-sins, which he has to commit to protect his empire and the demi gods. He is always open to curses by the mothers of the demons. He has to face wars against the demons repeatedly. Indr has to face grief innumerable times, during his tenure. Demons are cousins of demi gods-deities. When Indr too do not worry-annoy due to their death, why should his son Arjun do so?!
The Purans are very clear about grief. Its stated that the grief is proportional to the sentiments-gain-profit, attached with the deceased. It clearly says that one should not grieve  for too long. Grief kills a man, untimely. Pleasure-pain are the out come of destiny framed by the accumulated deeds of the humans, in their previous incarnations. One should concentrate in the Almighty, instead of grieving and that's what Arjun is doing..

संजय उवाच: एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥2-9॥
भावार्थ: संजय बोले-हे राजन्‌! निद्रा को जीतने वाले और  शत्रु का दमन करने वाले अर्जुन अंतर्यामी भगवान्‌ श्रीकृष्ण गोविंद से  स्पष्ट रूप से यह कहकर कि "मैं युद्ध नहीं करूँगा" चुप हो गए।               अर्जुन द्वारा कहे गये शब्द धृतराष्ट्र को तात्कालिक ख़ुशी दे सकते थे| अगर अर्जुन ही युद्ध नहीं करेंगे तो युद्ध टल जायेया और एकछत्र राज्य दुर्योधन को प्राप्त हो जायेगा|
 क्या अर्जुन ने ये वचन एक छोटे बच्चे के समान कहे थे जो कि अपने बड़े-बुजुर्गों से ऐसी चीजें मांग बैठता जिन्हें देना प्राय असंभव होता है ? बड़े भी उसको बहला-फुसलाकर बहका देते हैं| ऐसा कदापि नहीं था| अर्जुन ने स्पष्ट आश्वासन माँगा, ताकि उन्हें अगले जन्मों में हत्या का पाप न लगे|भगवान कृष्ण अंतर्यामी हैं और मोक्ष सहित सब कुछ देने में समर्थ हैं| यहाँ यह पूरी तरह स्पष्ट था कि युद्ध का संचालन प्रभु कर रहे थे, न कि धृष्टद्युम्न या युधिष्ठिर|  अर्जुन केवल उनकी इच्छा-आदेश का पालन कर रहे थे|यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अर्जुन के द्वारा युद्ध की अनिच्छा प्रकट करने में भी जन कल्याण हेतु उनकी मर्जी ही थी| 
Sanjay said: O the King! Arjun, who has won sleep and whom the enemy is afraid of, straight way told Bhagwan Shri Krashn Govind, who pervades every where, who knows every thing-even in the hearts of the creatures and capable of granting renunciation; that he will not fight-participate in the war.  
These words were sufficient to grant momentary pleasure-relief to Dhratrashtr. If Arjun is not willing to fight, there will be no war and the empire will finally rest with his son.
Did Arjun say so to Bhagwan Shri Krashn, just like a child speaks to his elders-parents, who fulfill all his desires for something impossible and the elders tackle him with some promise or just deviate his attention? No, certainly not. He wanted clarification and assurances pertaining to sins and their impact after the death in next incarnation. He knew that the Almighty is capable of granting Salvation-Liberation. It was a clear fact that it was the Almighty, who had to eliminate the tyrants-wretched-wicked and not him. Arjun had to just carry out his dictated-orders, only.

तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥2-10॥
भावार्थ : हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्रीकृष्ण महाराज दोनों सेनाओं के बीच में शोक-विषाद करते हुए अर्जुन को हँसते हुए से यह वचन बोले। 
O the king from Bhrat clan-Dhratrashtr! Shri Krashn  smiled-laughed and said these words to grieving Arjun (-to normalize him). 
पहले अर्जुन ने शरणागत-शिष्य होने की बात कही और फिर शस्त्र रख दिये, जिससे ह्रषिकेश-अन्तर्यामी भगवान श्री कृष्ण को हँसी आ गयी और वे वातावरण को सामान्य करने के लिये मुस्कुराने लगे। उन्होंने भक्त के शब्दों के बजाय भाव पर ध्यान दिया। 
The Almighty is aware of the reality. He assessed and diagnosed the grief-confusion-irritation-uncertainty-ambiguity  in the mind-thoughts of Arjun and smiled with deep mystery-concern to console him and to make the situation a bit mild.
श्री भगवानुवाच: अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे। 
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥2-11॥
भावार्थ: श्री भगवान बोले: तुम शोक-दुःख  न करने योग्य का शोक करते हो और विद्व्त्ता की बात करते हो ; परन्तु जिनके प्राण चले गए हैं, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए हैं, उनके लिए भी पण्डितजन-विद्वान शोक नहीं करते।
मनुष्य के शोक की मात्रा मरने वाले के साथ उसके सम्बन्ध-लगाव-स्वार्थ से जुडी होती है। ममता-प्रियता-आसक्ति-कामना से ही शोक, चिंता, भय, उद्वेग, संताप, हलचल जैसे दोष पैदा होते हैं। भेदभाव-पक्षपात का कारण भी यही है।
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं: इस संसार में सत् और असत्, शरीरी और शरीर मात्र दो चीजें हैं। शरीरी-आत्मा अविनाशी है और शरीर विनाशी है। आत्मा का कभी विनाश नहीं होता अतः शोक का कोई कारण नहीं है। शरीर न पहले था और न बाद में रहेगा, यह शुरू से पता है।जो आदि में नहीं था वो अन्त में भी नहीं रहने वाला।दुनिया में स्थाई कुछ भी नहीं है। जीवन-मरण, हानि-लाभ, सुख-दुःख, प्रारब्ध से निर्धारित होते हैं। 

Bhagwan Shri Krashn said that you grieve for those who have not departed-died, and still you talk like philosophers-enlightened-pundits; but the pundits-philosophers-enlightened do not grieve-sorrow for those who have departed and the others who have not departed. 
ASHOCHYANNVSHOCHSTVM:  The universe is composed of sat-virtues-righteousness-piousness (-real, true, right, good, worthy, divine, existent, ultimate) and asat-perishable (-non existent, unreal, unfounded, untrue, not good, unrighteous, ungodly, falsehood, wicked, devilish, monstrous) and soul and the body. Soul is imperishable while the body is bound to destroy. What is imperishable does not invite pain-sorrow. The body did not exist earlier and will not be existing, there after. What had not been there initially, will not be there ultimately. Nothing is for ever in this universe. Life-death, profit-loss, pleasure-pain are the outcome of destiny (-reward of deeds in earlier incarnations, earned deeds from birth till date and the deeds, which one is performing at present-this moment). [The reader may refer to Ashtawkr Geeta on this blog, in this context.]  
One often come across people who pose as if they are learned-educated-knowledgeable-aware of the teachings-content of scriptures-well read. But when it comes to applicability-understanding they prove a big zero. Mere learning-reading is not enough. One should gain essence-theme-extract-nectar-summary of the contents  before reaching conclusion-deciding and utilizing in their daily life, which should be reflected in their behaviour-dealings with others. 
Any deed-action-maneuver,  preformed with bad intentions to harm others, amounts to sin. Harming others whether intentional or without intention-chance-happening is sin. Dhratrashtr and his associates were deeply involved in the exploitation of Pandavs. They were sinners and deserved killing. 
Body is mortal. Soul is immortal.  Body is dead-static-inertial without soul. Soul occupies drivers seat in the body. Soul is for ever-imperishable.  Welfare is not possible, till one has the pride of having this human body. Soul is a component of the Ultimate-The Almighty. What dies is the body, not the soul. One as a soul has the experience of facing death innumerable-infinite number of times. It has experienced all sorts of comforts-griefs repeatedly. Therefore, is of no use grieving for any one whether living or going to die. 
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥2-12॥
भावार्थ: न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तू नहीं था अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।
मैंने जब ये कृष्णावतार नहीं लिया था तब भी मैं था और जब तक तुमने यह जन्म नहीं लिया था, तब भी तुम थे। ये राजा लोग-सगे-सम्बन्धी पहले भी थे और बाद में भी रहेंगे (-जब तक इनको मुक्ति-निर्वाण-मोक्ष नहीं मिलता) ।
समस्त ब्रह्माण्ड चर-अचर, एक अस्थाई अवस्था  गुजर रहे हैं। ये न पहले थे और न बाद में रहेंगे। कल्पान्त में-प्रलय की अवस्था में, सब कुछ नष्ट हो जाता है।  फिर से-पुनः निर्माण-सृष्टि होती  है; और ये सब ऐसे ही चलता रहेगा। सभी कुछ अस्थाई है। 
व्यास जी के समान साधक-महात्मा जिन्हें भगवान का पद प्राप्त है; वे भूत और भविष्य में झाँक सकते हैं। कभी-कभी सामान्य गण, भविष्यवक्ता भी भविष्य को देखने में समर्थ हो जाते हैं। किसी किसी को अपने अनेक पिछले जन्मों का ज्ञान और अनुभूति होती है।
Its not that either of us was not present in the past, these kings were not there and its not that we all will not be there yet again in future.
This universe-world is passing through a temporary phase. It was a non entity-non existent in the past, infinite years ago. It will not be there yet again, after dooms day-devastation. Its created and destroyed continuously. 
All these kings, you and me did no exist earlier, in this form and will not be existing there after. Those who achieve Salvation-liberation do not get rebirth. After the completion of Brahma's day every thing will be destroyed. Evolution will take place again and this will continue. Its only the Almighty-Par Brahm Parmeshwr, who will be there in all phases of time. He will take incarnations to remove-eliminate the evil-vices again and again.
Devotees like Ved Vyas, designated as Bhagwan-God can see-peep into past and future. There are the sages-seer, astrologers, who too can look into the future. There are the people who are born with intuition. Some people acquire this capability through Yog-asceticism-meditation-concentration etc. Some people are born with the memory of their previous births. How ever the Almighty is aware of what is happening and what is going to happen. 

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा। तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥2-13॥
भावार्थ: जैसे जीवात्मा की इस देह में बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति होती है, उस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता।
जीव के पैदा होने से लेकर मरने तक , शिशु-शैशवावस्था-किशोरावस्था, वयस्क, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था, अधेड़ावस्था और बुढ़ापा आते हैं। 40-50 साल की उम्र तक जोश-जवानी-ताकत बढ़ती रहती है और उसके बाद ढलाव शुरू हो जाता है। समय आने पर मृत्यु निश्चित है। कोई दवाई-जतन काम नहीं आती। बुढ़ापा शरीर को शिथिल और याददाश्त को कमजोर कर देता है। एक ऐसी भी स्थित आ जाती है जब मनुष्य भगवान से इस शरीर से मुक्ति-छुटकारे की प्रार्थना करने लगता है। अन्त समय पर यह जिसे याद करता है-जिसकी चाहत करता है वो उसे मिल जाता है।  जो व्यक्ति अन्त समय पर भगवान को स्मरण कर रहा होता है वो भव सागर से पार हो जाता है। उसे यम दूत यातना नहीं देते, अपितु उसे  दुर्लभ लोक मिलते है।यही प्रकृति का नियम है। उसे 84,00,000 लाख योनियों से गुजरने पर ही  देह उपलब्ध हुई थी। जो इस बात को जानता-बूझता-समझता है, वो धीर पुरुष मोहित नहीं होता। 
The stable-matured-patient is not confused-deluded-allured-over taken by ignorance by attainment of a new human body-incarnation just like the growth of human body from childhood through adulthood and then to the old age there after.
Human incarnation is very rare and all species including demigods-monsters-rakshas-yaksh etc. beg for it, since this is the only species in which deeds are possible.The humans face infancy, childhood, adulthood, middle age, old age-retirement, till they decease. Physical strength-vigor-enthusiasm-valor keep on increasing up to the age of 40-50 years-maturity. Once the time of death arrives no medicine or effort is able to protect him. However, there are cases when the death could not over power the victim, due to the divine intervention-protection. Old age makes the body weak-fragile-still-vulnerable to diseases. The memory loss takes place. Relatives-friends-servants start ignoring him. At this juncture one prays to God to relinquish him from the body. Its very rare that one wishes to be relinquished from repeated incarnations. This is the moment, which determines his next incarnations. His desire for a specific commodity-species will take the soul, to that body in next birth. This is the universal law. The soul has to pass through 84,00,000 Lakh incarnations before taking birth as a human being. The wise man always remember the Almighty, once he is aware that the last moment are approaching. This leads to Salvation-Liberation. One who remembers the God is not tortured by the messengers of Yum Raj. He is received with honors in the abodes-Lok of the Almighty.
Repentance-sorrow-grief is unjustified for the current-present moment. This is the reason that the memory of the incidents of the current birth fades with the death.    

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः। आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥2-14॥
भावार्थ: हे कुंतीपुत्र! सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति-विनाश (आने-जाने वाले) और अनित्य हैं, इसलिए हे भारत! उनको तू सहन कर।
भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को कुंती पुत्र कहकर यह याद दिलाया कि उनकी माता नाग कन्या हैं और नाग वैर को कभी भी नहीं भूलता, जब तक कि उसका शमन-निराकरण न हो जाये। और उनके ऊपर अपनी माँ का कुछ असर (-कर्ज भी शेष है) तो होना चाहिये। जब भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को भारत कहते हैं तो उन्हें उस महान सूर्य-इक्ष्वाकु-रघु वंश, जो अब कुरु वंश था की याद दिलाते हैं, जिसमें दशरथ जैसे योद्धा उत्पन्न हुए जिन्होंने देवासुर संग्राम में इंद्र की मदद की और भगवान राम हुए, जिन्होंने रावण जैसे आताताई का संहार किया। 
जिस प्रकार ऋतुएँ सर्दी-गर्मी आती जाती रहती हैं, उसी प्रकार सुख-दुःख, संयोग-वियोग, मिलना बिछुड़ना लगा रहता है। केवल परमात्मा ही चिर स्थाई है अन्य सभी वस्तुएं-जीव नाशवान हैं। इन्द्रिय सुख-भोग सुखानुभूति क्षणिक-सामयिक-अस्थाई हैं। उनकी प्राप्ति पूर्वनिर्धारित है। 
सभी कुछ ऐसे है जैसे कि माला में बँधा मनका। माला फिराते-फिराते, फिर पहले मनके पर आ जाते हैं। पृथ्वी पर सभी दृश्य-स्थान-समुद्र-भूमि-समाज, राजा-शासक, धर्म, नगर-शहर सभी कुछ तो परिवर्तनीय है। सुविधाएँ-सेवाएँ-स्वास्थ्य, सभी कुछ तो बदलता रहता है। मनुष्य को चाहिये कि  वो इन सभी परिस्थितियों से तालमेल बैठाए-सहन करे। आज जो यह परिस्थिति पैदा हुई है कि तुम्हें अपने बन्धु-बान्धवों से संघर्ष करना पड़ रहा है, ये भी तात्कालिक है।  इसलिए इसका डटकर मुकाबला कर। Oh the son of Kunti-Arjun! Winter-summers, pleasure-pain, sensualities-passions and association with comforts-luxuries are chance factors, which comes to the organism and goes, since their creation and destruction (-which are unstable; appear and vanish) is irregular-impermanent-unstable-temporary. Therefore O Bharat! You should bear-tolerate-adjust with them.
Bhagwan Shri Krashn addressed Arjun as the son of Kunti who was a Nag Kanya-serpent girl. The serpents are said to keep enmity in their mind and ultimately vanish-settle scores with the person who ill treated them. So, Arjun had to keep the tortures-tyranny-injustice by the Kauravs. When he says Bharat, it means Arjun was the descendant of the famous Ikshvaku-Sun-Raghu Vansh-dynasty-clan, which is known for its bravery and might.
When he talks of winter-summer, he wish to stress upon the conveniences and adversities which accompany organism, throughout his life. Its only the God who is for ever, all other commodities-living organism are bound to perish, are cyclic-periodic.
Sensualities-comforts are merely due to chance and are predisposed-inconsistent. 
They are cyclic in nature like the beeds of a rosary. Orientation of earth-places on it, society, countries, rulers, religions keep on changing with time. Amenities-facilities-services are subject to chance. Health facilities-health standards do change. Therefore, O Arjun; get ready to face them boldly-bravely-without hesitation, since these adversities are temporary and bound to be over soon.    

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥2-15॥
भावार्थ : क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन! दुःख-सुख को समान समझने वाले, जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह अमर हो जाता है मोक्ष के योग्य होता है।  
धीर-धैर्यवान को सुख और दुःख एक समान लगते हैं-ना सावन हरे ना भादौं सूखे। सुख और दुःख मानने से होते हैं। एक ही जैसी घटना किसी को प्रसन्न करती है, तो किसी को रुलाती है। दोनों में कोई भी स्थाई नहीं है। अनुकूल स्थिति आनन्द दायक है और प्रतिकूल कष्टदायक।
समवस्था-सम की स्थिति-अपने स्वरूप  होना स्थित होना ही सत्ता-सत्-सत्य है।  इस अवस्था में सभी प्रकार के बन्धन-कष्ट-परेशानियों-बुराइयों से मुक्ति है। जो इसमें लिप्त है उसका नर्क में पतन निश्चित है जबकि विपरीत परिस्थितियों से सम भाव से ऊपर उठने वाले का अमरत्व-मोक्ष तय है। 
Oh the Ultimate (-brightest, enlightened, excellent) amongest the humans, one-the stable (-calm, steadfast, resolute, bold, patient, persevering, lasting, self possessed, sedate, solemn, grave, deep) who has acquired-attained equanimity between the pleasure and pains, sensualities-sexuality-passions and association with the worldly objects-affairs, is not trouble by these qualifies for immortality (-and ultimately he is entitled for Salvation-assimilation in the Ultimate i.e., me). 
Self possessed weighs the pleasures and pain, unfavorable or opposite conditions with ease-normally without loosing control over his mind. He comes out of the difficult situation ultimately and moves ahead. There are people who do not find interest in the activities, which may be extremely pleasant for some. They remain neutral towards them. Equanimity with trouble & ease, happiness & distress,  pleasure & pain raises a person towards the ultimate. 
Stabilization in self is equanimity-state of equilibrium-creation of balance, truth-the ultimate.  This state is free from tensions-troubles-pains-disorders-defects. Experiencing-indulging in grief-sorrow may move the individual  (-soul) to hells, while rising over the situation will result in up gradation to immortality-assimilation.   

नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥2-16॥
भावार्थ: असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व तत्वज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है।  
नित्य तत्व सत् (-सत्य)-शरीरी-परमात्व वो है, जो पहले भी था और बाद में भी रहेगा। इसका ना तो आदि है और ना अन्त। यह तीनों काल: भूत-भविष्य-वर्तमान में एक समान भाव से उपस्थित है। सत् की ही सत्ता है। इसी सत् को ही परा प्रकृति, क्षेत्रज्ञ, अक्षर, अविनाशी और पुरुष नामों से विभूषित किया गया है। तत्वदर्शी-पण्डित-धीर सत्ता में स्वयं की स्थिति का अनुभव करता है-देखता है। सत् की सत्ता का समझना ही ज्ञान मार्ग है-यही सांख्य शास्त्र है। 
असत्-अपरा प्रकृति, क्षेत्र, प्रकृति और क्षर को दर्शाता है। यह माँ भगवती का रूप है जिससे विनाशी-नश्वर की उत्पत्ति हुई है। इसमें क्रिया, पदार्थ और परिवर्तन शामिल हैं। पदार्थ से शरीर, क्रिया से इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, द्योतक हैं।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः :- ये सोलह अक्षर वेद, पुराण, शास्त्र, का अभिप्राय स्पष्ट करते हैं। असत् और सत् प्रकृति और पुरुष, क्षर-अक्षर, शरीर और अशरीरी, अनित्य और नित्य, नश्वर और अनश्वर, आदि-आदि नामों से पुकारे-जाने जाते हैं। 
उभयोरपि दृष्ट: :-तत्वदर्शियों ने सत्-तत्व को उत्पन्न नहीं किया, अपितु अनुभव किया है। असत् का अभाव और सत् का भाव, इन दोनों के तत्व-निष्कर्ष को समझने वाला जीवन्मुक्त-तत्वज्ञ, एक तत्व को ही देखता है। इन दोनों का तत्व भी सत् ही है। अतः उस अध्यात्मिक महापुरुष की दृष्टि में एक सत् तत्व के आलावा, किसी अन्य की स्वतन्त्र सत्ता  नहीं रहती। 
The enlightened-learned-philosophers-scholars-Pundits-wise men are capable of understanding the basic-root cause-theme-nectar-extract of the distinction between SAT & ASAT. ASAT has no existence-permanence while the SAT has no limitation-scarcity-shortage. 
Always pervading-existing, SAT-Almighty-truth, existed before and thereafter. He is beyond the limits of time. He has no end or beginning. He is present in all the three forms-dimensions of time: Past, present and the future. SAT is called Pra (परा-divine, knowledge of the Supreme self, transcendence i.e., surpassing-excelling, go beyond or out side the experience, reason, belief, powers of description) Shakti-power, who knows the supreme soul-ultimate,  which do not vanish or destroy-diminish, never ending and the Purush-MALE. One who is a scholar-philosopher-learned-enlightened, identifies himself in him. Ability to acknowledge the understanding of the SAT is called Gyan Marg-Sankhy Marg. 
ASAT is mother nature-Maan Bhagwati-Adi Shakti-Apra Prakrti, better half of the Ultimate Almighty, restricted to place, time-moment, vanishing-diminishing-eliminating. This is the component of the God, which has created-generated the destructible. It includes the deeds-action-acts, matter and the change. The matter generated the body with actions, sensualities-organs, heart & brain-feelings-emotions, intelligence.
NASTO VIDYTE BHAVO NABHAVO VIDYTE SATH: These 16 letters explains the the meaning-contents-theme-essence of the Veds, Purans, Upnishads, scriptures-epics. ASAT & SAT Prakrati-nature & Purush-the divine-the God, sharir-body & the ashriri-Ultimate, perishable & imperishable, transient-impermanent-temporary-occasional & eternal-perpetual-constant-daily-always are the various-different names to call-remember them.UBHAYORAPI DRASHATH: Those who understand-recognize the essence-basics-root of sat-eternal have not created it, but they have realized it. One who understand-realize the absence of ASAT-transient & presence of eternal as single entity is relinquished-free from birth & rebirth. The extract these two too is SAT. In the eyes of the philosopher nothing except SAT, commands-organize-behaves-orients-exists independently.
The Almighty Krashn divided into two components namely Krashn & Radha in their ultimate abode Gau Lok. Radha is Prakrati & Krashn is Parmatma.
Chapters on Hinduism and Salvation of CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM on   may enlighten the visitor-pious reader.                       

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌ । विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥2-17॥
भावार्थ: अविनाशी-नाशरहित तो तू उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण जगत्‌-दृश्यवर्ग व्याप्त है। इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है। 
जो अविनाशी प्रभु-परमात्मा है वो देखा-महसूस नहीं किया जा सकता (-जब तक की वह स्वयं ऐसा न चाहे।यही सत् तत्व एक मूल पदार्थ के रूप में सर्वत्र व्याप्त है।   
जैसे ही किसी प्राणी का जन्म होता है उसका क्षय निश्चित हो जाता है। उसकी आयु नियत होती है। यदि अर्जुन ये सोचते हैं कि उनके न मारने से रिश्ते-नाते दार नहीं मरेंगे, तो ऐसा नहीं है; क्योंकि मृत्यु तो एक अटल सत्य है।  जो पैदा हुआ है वो मरेगा अवश्य।एक पैरावोला-वक्र है, जो शून्य से प्रारम्भ होकर शून्य पर ही समाप्त होता है। यह प्राणी की ऊर्जा-शारीरिक विकास को दर्शाता है जो की अंततोगत्वा जहाँ से शुरू होता है वहीं खत्म होता है।  
One who pervades the whole universe is imperishable-indestructible. None is capable of eliminating this imperishable. 
This imperishable can not be seen-observed-identified with the eyes-sense organs (-unless he himself desires so to grant boons to the devotee). It-the SAT constitutes the whole world as the raw material-basic component.
The moment an organism is born its destruction becomes essential-certain-fixed. If Arjun thinks that he will not fight and the relatives-teachers will be protected from death he is incorrect.They are bound to die. The parabola of the growth & dissipation of energy shows that initially the energy & growth were zero, they reached the peak and thereafter they started falling reaching zero.                                                                      
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः। अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥2-18॥
भावार्थ: इस अविनाशी-नाशरहित, अप्रमेय-जानने में न आने वाले-जिसे मापा न जा सके, नित्यस्वरूप जीवात्मा-शरीरी के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर। 
अनाशिन: :-किसी भी काल में, किसी  भी कारण से, कभी भी किञ्चित मात्र भी, जिसका परिवर्तन, क्षति या अभाव नहीं होता, वह अविनाशी (-शरीरी-परमात्मा का अंश) है। 
प्रमेयस्य: जिसका प्रमाण नहीं होता अर्थात जिसका होना स्वयं सिद्ध है, जो अंतःकरण और इन्द्रियों का विषय नहीं है। साधु-महात्मा, शास्त्र जिसको मानते हैं। 
नित्यस्य: यह सभी कालों में रहता है। निरन्तर रहने वाला है। 
हवा, आकाश, प्राण को देखा नहीं जा सकता तथापि यह माना जाता है कि वे हैं। इसे स्वयं सिद्ध कहते हैं। इसी प्रकार आत्मा है। जिस प्रकार पृथ्वी से ऊपर अंतहीन आकाश है, उसी प्रकार यह आत्मा है, जो कि परमात्व के रूप में प्रत्येक प्राणी में है। 
हे महान भारत वंशी अर्जुन! युद्ध कर। अन्याय का प्रतिकार कर। जिन्हें तुम अपने समक्ष देख रहे हो वे सब नाशवान हैं, जबकि इनके अन्दर उपस्थित आत्मा अविनाशी है। 
All the incarnations-embodiments of this perennial, immeasurable-beyond estimate (-beyond destruction), regularly existing-stable soul (-embodied self-Atma); are perishable-destructible, O! the descendant of great Bharat Vansh-clan you should fight the battle.
ANASHINH: Which can not be destroyed-eliminated even by a minutest fraction, lost or become rare-scarce, due to any reason, in any period-segment of time, is perpetual-never ending.
APRAMEYSY: Some thing which do not need proof-testimony-is a proof in itself, which is not a subject of the inner self or the sense organs. Philosophers-scholars-enlightened-scriptures,  have a belief-faith in it.
NITYSAY: Which is for ever-perpetual.
Air, sky and the life can not be seen. Its believed that they exist they show off. There existence is felt, when we breath or see the birds-aeroplane flying or the distant stars-galaxies are observed. The sky begins from the earth and is limitless-without boundaries-infinite. The soul is a fragment-component of the Almighty in the organism. Each fraction of empty space is sky, each soul is Almighty. The Almighty is all pervading. He is present in each and every organism, particle.
O! The descendant of great Bharat fight. All those, whom you see in front of you, are perishable; while the soul present in them is perpetual. 

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥2-19॥
भावार्थ: जो इस शरीरी-आत्मा को मारने वाला समझता है, तथा जो इसको मरा मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते कि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी द्वारा मारा जाता है।
शरीरी-आत्मा में स्वयं कुछ करने की सामर्थ-कर्तापन नहीं है। आत्मा से संयुक्त होकर ही शरीर कुछ कर सकता है। अतः आत्मा को कुछ भी करने के लिए शरीर की आवश्यकता पड़ती है। शरीर तभी तक कुछ कर सकता है, जब तक उसमें आत्मा है, अन्यथा नहीं। अर्थात यह न किसी क्रिया की कर्ता है और न ही किसी कर्म की।  यह निरपेक्ष-विकार हीन  है। 
जिसमें विकृति होती है, परिवर्तन होता है, गतिविधि होती है और जन्म लेता है, वही मर सकता है। और वह शरीर है, ना कि आत्मा। जो जन्म नहीं लेता, जो मरता नहीं है, उसके लिये शोक कैसा ?!
One  who thinks that the soul can kill and the other one who thinks that it is dead (or may be killed); both are ignorant, since the soul neither kill any one nor can it be killed by any one. 
The soul is unable to perform any activity of its own, in the absence of a material body. Soul's association with the body enables it to perform. Hence body is essential for any activity. The body can perform till it has the soul otherwise not. It's neither the doer nor the deed. Its untainted-defect less-absolute.
Something which has defect, undergoes change, perform or has some activity associated with it and takes birth can die. It's the body which perish not the soul. Why should something which do not take birth or die, be grieved upon?! 

न जायते म्रियते वा कदाचि-न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो-न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥2-20॥
भावार्थ: यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है, क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता 
शरीर 6 प्रकार के विकारों से संयुक्त है: उत्पन्न होना, बदलना, सत्तावान दिखना, बढ़ना, धटना और नष्ट होना।  शरीरी-आत्मा, इन 6 विकारों से मुक्त है।यह परमात्मा का अंश है। इसमें संयोग और वियोग नहीं होते। यह अविनाशी नित्य-तत्व, पैदा होकर फिर से उत्पन्न होने वाला नहीं है। यह स्वयं-सिद्ध व निर्विकार है। इस अविकारी का आदि और अन्त नहीं है। यह जन्म से रहित है। यह नित्य-निरन्तर-अपक्षय-शाश्वत (-एकरूप-एकरस)-पुराण (-अनादि) है। 
शरीर का नाश होने पर भी अविनाशी शरीरी का नाश नहीं होता। प्राणी, मनुष्य जन्म लेने से पूर्व 84,00,000 योनियों से गुजरता है, और अंसख्य जन्म लेता है। शरीरी के शरीर से संयुक्त होने पर चेतना का उदय होता है।
The soul neither take birth or dies. Its free from evolution and rebirth-regeneration, since it is unborn-permanent, perennial absolute-forever-perpetual. Its not killed, when the body vanishes. 
The organism is associated with 6 types of defects-activities: Birth-coming to existence, change, physical presence, growth, decay-recede and vanish-elimination-death. The soul is free from these defects. Its a component of the Almighty. Its free from association and dissociation. This imperishable-perennial-perpetual entity, is free from evolution and births. Its a proven self, free and untainted-unsmeared-unstained. This defect less entity does not take birth. This is always-continuous-un decaying-composed, absolute-always un changing-endless-since-ever.
The soul remains as such even after the destruction o the body. The organism passes through 84,00,000 incarnation in different lower species, before birth as a human being. Association of soul with the body, brings life to it.

वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌। कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥2-21॥
भावार्थ: हे पृथापुत्र अर्जुन! जो पुरुष इस शरीरी-आत्मा को नाश रहित-अविनाशी, नित्य, अजन्मा-जन्म रहित और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये है?
शरीरी-आत्मा नाश रहित-अविनाशी, नित्य, अजन्मा-जन्म रहित और अव्यय है, जिसे इस बात का अहसास-ज्ञान-समझ है, वो किसी को न तो स्वयं किसी को मारेगा और न ही मरवायेगा। वो हमेशां इस काम से बचेगा-झिझकेगा। वह दूसरे लोगों को भी इस कार्य से रोकेगा। 
आत्मा में कोई परिवर्तन-वृद्धि-अवनति-क्षय नहीं होता, क्योंकि यह दोष रहित है। 
इस बात पर जोर दिया गया है कि शास्त्र के विधान-निर्देशानुसार कार्य सम्पादन हो। किसको कब-कैसे-किसलिए-क्यों मारा जाना है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। मृत्युदण्ड का नियम-कानून-श्रुति का पालन अति आवश्यक है। आतताई, घुसपैठिया, अपहरणकर्ता, दुराचारी, आतंकवादी, हत्यारा-ये सभी बगैर किसी दुःख-शोक-दया के मारे जाने योग्य हैं। 
Hey Arjun-the son of Pratha! How can a human, who recognizes this soul as imperishable-perpetual-perennial, free from birth & death, un decaying-un waning-unspent, ever kill some one or get some one else killed?   
One who is aware that the soul is free from death-decay-change-birth-loss will not undertake, hesitate in killing some one or getting him killed. He will desist-discourage this practice. 
The soul does not under go change-growth-diminish-reorient. It is defect less.
The stress is over the following of the scriptures which elaborate when, why, whom, how one should be killed. There should be no grief over the death of some one, who deserve to be killed. The torturous, troublesome, invader, terrorist, abductor-rapist, intruder, tyrant, murderer, deserve to be killed without repentance-tension-guilt-hesitation-fear. 

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥2-22॥
भावार्थ: जैसे मनुष्य फटे-पुराने वस्त्रों को त्यागकर, दूसरे नए वस्त्रों को धारण-ग्रहण करता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्यागकर, दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है। 
मनुष्य को नये कपड़े पहनने का शौक होता है। ज्यादातर लोग फटने-पुराने होने-रंगहीन होने पर कपड़े बदल  देते हैं। ऐसे ही धीर पुरुष बगैर शोक करे, शरीर बदल लेते हैं।
पशु-पक्षी अन्य जीव कपड़े न तो पहनते हैं और न कपड़े बदलने का प्रश्न ही पैदा होता है। हाँ कुछ जीव अपनी ऊपरी त्वचा को अवश्य बदल लेते हैं। जीवात्मा उनमें भी मौजूद है। प्राणी को मनुष्य बनने से पहले इन असंख्य योनियों से गुजरना पड़ा था। फिर शोक-दुःख किसलिये ?आत्मा शरीर में तभी तक रहती है, जब तक कि उसका निर्धारित कार्य काल पूरा न हो जाये। 
मनुष्य को मरने से डर नहीं, अपितु इस बात का डर है कि उसकी इच्छाएं अपूर्ण रह गयीं या फिर मरने में बहुत कष्ट होगा। अगर अपनी मर्जी से मनुष्य मर सकता तो शायद संसार खाली हो गया होता।  जरा सा कष्ट आया और प्राणी ने संसार त्यागा। 
आत्मा अपने कर्मों की गति के अनुसार एक लोक से दूसरे लोक में गमन करती रहती है। मनुष्य अन्तिम क्षण-घड़ी में जो इच्छाएँ करता है, वो पूरी अवश्य होती हैं। 
The way a man rejects his torn-old cloths and accepts-change-wear new cloths, the soul too leave the old-retired-incapable-fatigued-fragile body and moves to the new body. 
Its a common human tendency to change old-torn cloths. No one worries for them. The stable one, too under goes the change of the soul from one incarnation to the other, without repentance-botheration-trouble-grief. 
Birds-animals-other creatures do not wear cloths. Nature has provided them with a protective fur-coat. However some organism do reject their exoskeleton-skin-epidermic. They too have soul. The organism had to pass through innumerable bodies which had to be deserted due to one reason or the other. Then, why should their be sorrow, at all? 
The soul stays in a specific body only till its assigned period is incomplete-not over. No one is afraid of death. The fear is due to the unfulfilled desires or the pain associated with the weak-fragile-diseased-torn body. If one could die of his own desire-will, the entire world would have become empty. Every body would have left the body as soon a little pain-difficulty would have arrived.
The soul moves from one body to another and from one world-universe-galaxy to another, depending upon the nature of his deeds and the desires associated with the inner self at the time of death.                                                                           

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥2-23॥
भावार्थ: इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, इसको आग-तेज नहीं जला सकती, इसको जल नहीं गला सकता और वायु नहीं सुखा सकता।
पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश महाभूत हैं। शस्त्र पृथ्वी से उत्पन्न हुए हैं। पृथ्वी, जल, तेज और वायु, आत्मा को किसी भी प्रकार से हानि नहीं पहुंचा सकते हैं। ये आकाश से ही उत्पन्न हुए हैं।आकाश क्रिया हीन है और इन सबको अवकाश-आश्रय प्रदान करता है। आकाश का कारण-आधार वह प्रकृति है जो कि आत्मा से विलग है। आत्मा-पुरुष से ही प्रकृति को सत्ता-स्फूर्ति मिलती है। अतः ये उसे विकृत नहीं कर सकते। आत्मा तक अस्त्र-शस्त्रों की पहुंच है ही नहीं। ये तो पूर्ण रूप से निर्विकार है। शरीर नष्ट होगा आत्मा नहीं। अतः अर्जुन की व्यथा व्यर्थ-आधारहीन-अकारण है।
This soul cannot be hurt by weapons-arms, fire can not burn it, water can not melt-decay-dissolve-emaciated-rot-loss-numb-vanish-fortify-wet it and wind can not  dry it.  
Earth, water, Tej-fire-energy, air and the sky are the basic-raw-ancient-initial components-materials. Weapons-arms are created from the earth. Earth, fire, air and water can not harm the soul, since they are created from the sky. Sky in it self-independently, is free from any activity. Sky provides them freedom-resting-idling place without being contaminated-smeared by them. The root-basic cause of sky is nature. The soul-Purush provides strength to nature. Therefore, nature can not destroy-vanish it. Arms-ammunition-weapons can not reach the soul.This is defect less-pure-un contaminated. Body will parish not the soul. So the grief-reasoning of Arjun is unfounded-baseless.

अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः॥2-24॥
भावार्थ: क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य-काटा नहीं जा सकता, यह आत्मा अदाह्य-जलाया नहीं जा सकता, अक्लेद्य-गीला नहीं किया जा सकता और निःसंदेह अशोष्य-सुखाया नहीं जा सकता है तथा यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी-सबमें परिपूर्ण, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन-अनादि है। 
आत्मा-शरीरी-देही (-देह-शरीर-physique-body)को किसी अस्त्र-शस्त्र-मन्त्र-वाणी-श्राप से काटा-छेद नहीं किया जा सकता। इसे अग्नि या किसी अन्य रीति से जलाया नहीं जा सकता। इसे चूसा-सोखा-गीला-घोला-मिलाया नहीं जा सकता। इसे किसी भी क्रिया द्वारा प्रभावित नहीं किया जा सकता। इसके ऊपर किसी काल का प्रभाव भी नहीं होता है। यह देही सम्पूर्ण व्यक्ति, वस्तु, शरीर आदि में एकरूप-एकसमान विराजमान है। यह स्वतः कहीं आने-जाने में समर्थ नहीं है। इसमें स्वतः कहीं आने-जाने की क्रिया नहीं होती। यह स्थिर स्वभाव वाला-कम्पन रहित-न हिलने डुलने वाला नहीं है। इसका आदि-अन्त नहीं है, यह सनातन है। 
आत्मा यह कारण है, जिससे शरीर में अनुभूति-अनुभव-चेतना होती है। 
Undoubtedly, this soul can not be cut, burnt, wet or dried, being perennial-absolute-perpetual, which is pervaded-present in each and every particle including all organism, stable-stationary, immobile and ancient-since ever
The soul can not be cut-penetrated by any weapon-ammunition-curse-words or rhymes. It can not be burnt-evaporated-dried by any means. It can not be sucked-wet-dissolved-mixed. It can not be affected by any process-action. It's free from the impact of time, in any dimension. Its uniformly present-spreaded over in the body. It can not move out of the body or into it, of its own-independently-freely. [As soon as the organism is dead, it acquires yet another body identical to the one it had in the previous body, which is immaterial.] Its free from movement-vibrations being inertial-stationary by nature. It has no origin or end, being free from birth-rebirth-incarnations. Its present ever since the inception of this universe-taking form by the Almighty.
This is the soul by virtue the body-physique feels, becomes conscious-aroused-awake-aware-alert. Without soul the body is a lump of mass.

अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥2-25॥
भावार्थ: यह आत्मा अव्यक्त-अप्रत्यक्ष है, यह आत्मा अचिन्त्य-चिन्तन का विषय नहीं है और यह आत्मा निर्विकार-विकार रहित कहा जाता है। इससे हे अर्जुन! इस आत्मा को उपर्युक्त प्रकार से जानकर शोक करना उचित नहीं है। 
आत्मा का स्थूल शरीर के समान  आँखों से दृष्टिगोचर होना सम्भव नहीं है (-इसके लिये दिव्य दृष्टि चाहिये)। मन और बुद्धि तो चिन्तन विचारों में आते हैं, परन्तु यह चिन्तन का विषय भी नहीं है। यह चेतना उत्पन्न करने वाली है। यह देही-विकार रहित कहा गया है, क्योंकि यह परिवर्तन रहित है। इसको निषेधमुख से 8 गुणों: अच्छेद्य, अक्लेद्य, अदाह्य, अशोष्य, अचल, अव्यक्त, अचिन्त्य और अविकार्य से युक्त माना गया है। और विधिमुख से: नित्य, सनातन, स्थाणु और सर्वगत माना गया है। इसके वास्तविक स्वरूप का वर्णन इसलिये भी सम्भव नहीं है क्योंकि यह वाणी का विषय नहीं है और स्वयं वाणी इससे प्रकट होती है। आत्मा को इस प्रकार जानकर किसी का भी किसी के लिये भी शोक व्यर्थ-उचित नहीं है।
This soul is invisible-unrevealed-which can not be seen (-like air, intelligence, desires, thoughts), beyond thoughts-imagination-image-perception & defect less-pure-untainted-unsmeared. Therefore, Hey Arjun! having understood-recognized-identified the soul in this manner, grief-condolence  is undesirable-useless-unjustified-unnecessary. 
 Its not possible to see-observe the soul like a physical entity. One might need divine sight. One may perceive-think-recognize-understand, intelligence and the feelings-sensualities-passions (-always subject to change-variable-negotiable). But this is defect less-pure-uncontaminated, since it is free from change. It has 8 characteristices through negativity: It  can not be cut-divided, wet, burnt, sucked, inertial-unmovable-stationary, unrevealed, beyond thought, untainted-unsmeared & 4 characteristices through positivity: Perennial-absolute-perpetual, stable-stationary, immobile and ancient-since ever, which is pervaded-present in each and every particle including all organism.  

 अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌। तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥2-26॥
भावार्थ: किन्तु यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला मानता हो, तो भी हे महाबाहो! तू इस प्रकार शोक करने योग्य नहीं है। 
जो पैदा होगा वही तो मरेगा और जो पैदा ही नहीं हुआ, वो मरेगा कैसे ? भगवान् श्री कृष्ण कहते है कि हे शक्ति शाली महाबाहु अर्जुन स्वयं को पहचानों। तुम्हारे जन्म का हेतु-उद्देश्य इस प्रकार शोक करना नहीं है। अर्जुन को जो शक्तियाँ स्वयं भगवान् शिव और इन्द्र ने प्रदान कीं उनका भी हेतु-कारण है। और जो स्वयं साक्षात गोलोकवासी श्री कृष्ण सारथि बने हैं, वह भी विचारणीय-भेद पूर्ण है। स्वयं अर्जुन कौन हैं; ये भी उनको समझना चाहिये-उनके जन्म का हेतु क्या है ? भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि "हे अर्जुन तुम्हारा जन्म शोक करने के लिए नहीं हुआ"। अर्जुन अवतारी पुरुष, स्वयं नर, इंद्र के अंश हैं। यह जानना-समझना भी अति आवश्यक है।
अगर इस आत्मा का स्वतन्त्र अस्तित्व है, तो वो कहाँ है, कैसी है, उसका आकर प्रकार केसा है? इसका वर्णन कहीं-किसी शास्त्र में नहीं मिलता। कुछ लोग भूत-प्रेत-पिशाच-ऊपरी हवा का जिक्र करते हैं; परन्तु वह भी माध्यम की तलाश में रहती हैं। 
Oh the great-mighty warrior! After listening to me, still if you believe that this soul gets birth and dies, you need not go under depression-sorrow-grief, since you are not meant-born for this. 
One who has born must die, this is what the nature is.  How will one die, if he has not taken birth? O mighty Arjun! Realize-recollect-remember, who you are? The purpose-reason behind your birth is not to indulge in meaningless grief! The powers-Astr-Shastr-ammunition provided to Arjun by the destroyer Shiv and Indr has a reason-logic behind them. The Almighty-the Lord of Lords Shri Krashn from his abode the Gau Lok him self is driving his chariot, too has a reason behind it. Who Arjun himself is to be understood and the purpose behind his birth too has to be understood, by Arjun? So, Bhagwan Krashn said,"You are not meant for grief." Arjun is an incarnation of the Almighty in the form of NAR and a component of Indr-the mighty king of deities-demigods.This is extremely important.
If this soul has an independent existence, where is it, how does it looks like, what are its features?! This description is not available in any of the scriptures. Some people correlate the soul with the ghosts, which too is dependent over the medium.

जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥2-27॥
भावार्थ: क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्मे हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है। इससे भी इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है।
जन्म-मृत्यु रूपी प्रवाह अनवरत-निरन्तर सतत है, जब तक कि मुक्ति न हो जाये-मोक्ष की प्राप्ति न हो। यह माला के मनकों की तरह है, जो कि घूम-फिर कर शुरू वाले पर आ जाता है। कभी-कभी जापक किसी कारण वश साधना को बीच में ही छोड़ देता है। 
जब परमात्मा यह कहते हैं कि "इस बिना उपाय वाले विषय में तू शोक करने योग्य नहीं है" उनका तात्पर्य यह है कि तुम कोई सामान्य-साधारण मनुष्य नहीं हो अपितु विशेष कार्य हेतु, इस धरा-पृथ्वी पर (-भार कम करने के लिये) मेरे साथ आये हो। 
According to this belief-hypothesis-theory, one who took birth will be dead and the one, who has died will take birth again. You are not meant for sorrow on this subject, which has no remedy-way out.
Birth and death are cyclic in nature, till one is not liberates-assimilate in the ultimate-obtain Salvation. This is a continuous process like the beads of a rosary, moved in the hands through fingers reaching the starting point, yet again. One may restart after reaching the first bead or may dismiss in between, as per his conditions-situation.
When Shri Krashn point out that, "You are not meant for sorrow" he simply mean-emphasize that Arjun is not an ordinary human being but an incarnation of the God like him who had appeared to reduce the burden of the earth, by eliminating Kshtriy-demons-giants-wicked-tyrants-evil and the like.
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥2-28॥
भावार्थ: हे अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले हैं, केवल बीच में ही प्रकट हैं, फिर ऐसी स्थिति में क्या शोक करना है?
शरीरी और शरीर का अन्तर बड़ा साफ है। शरीरी पहले भी था और बाद में भी रहेगा, परन्तु शरीर न जन्म से पहले था और न बाद में ही रहेगा। यह या तो जलाया जायेगा या फिर सड़ जायेगा। यह प्रस्तरीभूत भी हो सकता है।  इसका कोयला भी बन सकता है। परन्तु यह इस रूप में नहीं रहेगा, यह तय है।
पुनर्जन्म के प्रमाण हमें हर काल में मिलते हैं। ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं है, जिन्होंने अपनी अल्पावस्था में ही अपने पूर्व जन्म को प्रकट किया और उसे साबित भी करके दिखाया। ऐसे अनेकों लोग हैं, जिन्हें अपने अनेकों जन्मों की स्मृति है।  
मनोवैज्ञानिकों-वैज्ञानिकों ने ऐसी तरकीब का ईजाद  किया है जिससे मनुष्य को उसके पूर्व जन्म में ले जाया जा सकता है।  इसके लिए कुछ दवाओं का इस्तेमाल भी किया जाता है। सम्मोहन के द्वारा भी ऐसा किया जाना सम्भव है। 
What is the point-logic in sorrow-grief for all those creatures-organism, who were invisible before their birth and will not be visible again after their death ; since they appear in between as a temporary phase only.
The difference between the soul and the body-physique is remarkable. The existence of soul before and after the death is there, but the body neither existed prior to birth nor will it be there after the death. The body is either is burnt off, decayed or fossilized-turning into rocks or coal.
One gets proof of rebirth in each and every period-phase-cosmic zone, of time, irrespective of caste-creed-religion-region. Scientists are busy in finding logic-proof behind this. Probably they may get success. There are the people who narrated their entire life span of previous birth in early child hood. They were taken to far off-distant places to corroborate their stories and each and every word uttered by them, was found to be true. Still there are many people who have the memory of their various births-incarnations.
Regression is a technique developed by the psychologist-scientist, which can take an individual to his previous births for finding solution to his difficulties, although by administering some drug. There are the others, who are hypnotized to reveal their past successfully.
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥2-29॥
भावार्थ: कोई व्यक्ति इस आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखता-अनुभव है तो दूसरा कोई इसका आश्चर्य की भाँति वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसे आश्चर्य की भाँति सुनता है और कोई-कोई तो सुनकर भी इसको नहीं जान पाता। 
आत्मा एक आश्चर्य का विषय है, क्योंकि यह अन्य वस्तुओं की तरह देखने, सुनने, पढ़ने या जानने में नहीं आती। इसका ज्ञान लौकिक नहीं अपितु विलक्षण है। 
पश्यति का तात्पर्य है देखना और स्वयं के द्वारा जानना। आँखों से देखने में आने वाला जीव, दिखने वाली वस्तु और देख पाने की शक्ति का होना आवश्यक है। जब स्वयं के द्वारा जानने-अस्तित्व-समझने की बात आती है तो वह अपने द्वारा ही समझी-अनुभव की जाती है। शरीर को 3 प्रकार से माना जाता है: स्थूल, सूक्ष्म और कारण। स्थूल 5 ज्ञानेन्द्रियों, 5 कर्मेन्द्रियों और 5 प्राण के साथ मन और बुद्धि का विषय है। सूक्ष्म शरीर बुद्धि का विषय है और कारण शरीर प्रकृति और देही-आत्म स्वरूप प्रकृति से भी परे है। अतः स्वयं को जानने वाला कोई बिरला ही होता है, क्योंकि लोगों में इस बात की जिज्ञासा का अभाव है। 
वाणी स्वयं आत्मा पर निर्भर है अतः यह भी आत्मा को पूरी तरह  व्यक्त करने समझाने में असमर्थ है। इसलिये यह आश्चर्य का विषय भी है। जब कोई स्वयं ही इसके बारे में नहीं जानेगा, तो वह दूसरों को कैसे समझायेगा ?!
सामान्य व्यक्ति को खाने-पीने-जीने-काम-आराम-मौज मस्ती से ही फुर्सत नहीं है तो वो आत्मा को जानने की कोशिश क्या, क्यों, किसलिये और कैसे करेगा। उसे तो आत्मा की बात  से आश्चर्य ही होगा। 
Some experience-view it with surprise, other one describe-discuss about it with surprise, yet another one listens about it just as a surprise and there are the people who listens about it but fails to know about its existence.
Soul is a matter of surprise for some people, since it is beyond seeing-view-observation, hearing-listening, reading-learning or identifying-discovering. Its knowledge is not worldly. It's amazing-wonderful-surprising. Its beyond the common man's understanding.
PASHYATI means seeing and self identification. It needs the viewer, some object to be viewed and the power to see. Self identification-realization, involves the organism-human being-individual. The viewer's body may constitute of the physical entity having 5 sense organs, 5 work organs, 5 airs in addition to mun (-मन seat of perception & feelings, inclination, temperament, will, character, purpose i.e., what one calls mind-heart and soul) and intelligence. Generally one do not go beyond this, since its the limit for him-sufficient to know. The invisible-divine self is a subject-concept of the intelligence for understanding. The 3rd type of body is based on reason-logic-perception including nature. This soul is beyond the preview of nature. So, its very rare to find some one who has realized him self, due to lack of desire to do so. 
The speech-intelligence itself is dependent over the soul. So, it is incompetent to describe the nature of soul completely-thoroughly-properly, making it an entity for surprise. When someone himself is not clear about it, how can he explain it to others?!
The common man has no time to be curious about the soul or him self. He is busy with work -gossip-leisure-amusement-earning or other things. So, if one tells-talks about it, he will be surprised, may be curious.

देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥2-30॥
भावार्थ: हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! यह आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य (-जिसका वध नहीं किया जा सके) है। इस कारण सम्पूर्ण-किसी भी प्राणी के लिए तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।
यह स्पष्ट है कि शरीर नश्वर है और आत्मा अमर है। हिंसा का प्रतिपादन किसी भी धर्म शास्त्र में नहीं किया गया है। परन्तु युद्ध की स्थिति में यह अनिवार्य हो जाती है। यही क्षत्रिय धर्म है। इसी के लिये सेना-पुलिस-रक्षक नियुक्त किये जाते हैं। यह न्याय से भी जुड़ा है। अपनी, अपनी प्रजा की-परिवार की-समाज की रक्षा आवश्यक-अनिवार्य है। अन्याय का प्रतिकार अत्यावश्यक है। यही धर्म है। अगर धर्म निर्वाह में जान चली जाये या ले ली जाये तो पुण्य ही होगा पाप नहीं।  जान ही तो जाएगी आत्मा तो अजर-अमर है। 
This soul present in the body-physique is immortal-can not be killed. Therefore, O the great descendant of Bhrat Arjun! You not feel sorry-perturbed for any organism-specifically these who have gathered for the war.
Its absolutely clear that the soul is perennial-absolute-imperishable-perpetual, while the body will perish sooner or later. No scripture advocate violence-killings-murders. It becomes essential during a war-conflict-for maintaining law and order. This is religious obligation for being one, belonging to a marshal caste. Army-police-protectors-guards are appointed for this reason only. This is an essential feature of justice-law and order, as well. The king has to protect the nation, himself, the civilians-populace, society, individuals. If life is lost for serving the nation-residents, its virtuous not sin. Death for a just cause is pious-holy affair, unlike jihad by misguided power hungry tyrants-killers-terrorists-invaders-intruders, who must be repelled with might. Only the body will perish not the soul.
(क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने की आवश्यकता का निरूपण)
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥2-31॥
भावार्थ: तथा अपने क्षात्र धर्म को देखकर भी तुम्हें विचलित नहीं होना चाहिये, क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है। 
अर्जुन के रूप में नर का क्षत्रिय रूपी अवतार उनके धनुर्धारी रूप के अनुकूल है-वे तपस्या भी करते हैं तो, धनुष वाण के साथ। पशुपात्र हेतु भगवान् शिव की आराधना भी करते हैं तो, धनुष-वाण के साथ। स्वर्ग जाते हैं तो , अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करने हेतु। उनका शरीर दैविक और भौतिक का मेल है। अवतार काल के बाद वो एक सामान्य व्तक्ति के अनुरूप ही रह जायेगा। अतः उनका जो कर्तव्य-दायित्व एक क्षत्रिय के रूप में है, वो भी पूरा करना है। ऐसा नहीं है कि अर्जुन अपना क्षत्रिय रूपी कर्तव्य भूले हुए हैं; बस एक उलझन है जो सुलझ रही है और परमात्मा स्वयं भक्तों के उद्धार हेतु कर्तव्य का विश्लेषण कर रहे हैं। 
And the Almighty stressed that Arjun should not be deviated from his duties as a soldier-Kshtriy-the protector, since no other deed is as virtuous-beneficial as carrying out his own duty-responsibility.
Arjun is NAR-incarnation of the Almighty who perform meditation-ascetic practices along with bow & arrow. He did not hesitate in fighting with Prahlad-his one of the most dedicated devotee, as NAR. He worshipped Bhagwan Shiv for obtaining Pashupatr sitting with bow & arrow. He visited heaven to obtain divine weapons and ammunition. It was a preparation for the battle called MAHA BHARAT. His body was a combination of physical and divine forms. He would become an ordinary person after the expiry of incarnation period.He had to ful fill his obligations due to which he took this incarnation. The pause-hesitation was momentary. Such moments come in the life of each and every one. Bhagwan is describing how to come out of such tricky-disturbing moments. He is taking the opportunity for the welfare of mankind-in the present cosmic era called Kal Yug. One who understand this text, is sure of sailing smoothly through this difficult phase of time extending up to 4,80,000 years of which just 5014 years have passed.
Stout strong muscular body, physical strength. मजबूत शरीरबाहु बलसाहसपौरुष बहादुरीहिम्मत। 
Bears-carries, armors-weapons for the protection of community, poor, down trodden. शस्त्र धारण करनासमाज सेवा-रक्षा। 
Protection and safety of dependents. अपने पर निर्भर की रक्षा सहायता।  
Joins army-forces as carrier सेना-फौज-शस्त्र बल में शामिल होनायुद्ध करना। 
Punishment of out laws-criminals. अपराधियोंचोरउच्क्कोंबदमाशों,उठाई गीरों  को दंड देना। 
Donates liberally to Brahmns. ब्राह्मणों को खुले हाथ से दान देना। 
Studies Shashtr-scriptures. शास्त्रों का अध्ययन करना। 
Organize Yagy Hawan, Agnihotr, prayers, religious ceremonies. हवनअग्नि होत्रयज्ञप्रार्थना धार्मिक-सामाजिक कार्यों का आयोजन। 
Nourishment-nurture of saints-Holi people-Brahmns. ब्राह्मण,साधु पुरुषसंत महात्मा आदि का पालन पोषण करना। 

यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥2-32॥
भावार्थ: हे पार्थ! अपने-आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं। 
क्षत्रिय स्वभाववश युद्ध का आग्रह करता है। जो लोग जबरदस्ती दूसरे के ऊपर आक्रमण करते हैं वो पापी हैं और नरक के मार्ग पर हैं, जैसे दुर्योधन। उनकी बुराई और अधोगति होती है। अपने हक-न्याय-धर्म की खातिर युद्ध करने वाले के लिये मृत्यु के बाद स्वर्ग के द्वार खुले रहते हैं। और यहाँ स्वर्ग अपने आप ही अर्जुन का स्वागत कर रहा है। दुर्योधन के पक्ष के अधिकांश लोगों को नरक की प्राप्ति हुई थी। 
क्षत्रियो हि प्रजारक्षन् शस्त्रपाणिः पदण्डयन्। निर्जित्य परसैन्यादि क्षितिं धर्मेण पालयेत्॥ [पराशर स्मृति ] 
क्षत्रिय का धर्म है कि वो सभी क्लेशों से नागरिकों की रक्षा करे। इसके लिए शांति-व्यवस्था बनाये रखने हेतु हिंसा करनी पड़ेगी। उसे शत्रु को विजय कर धर्म पूर्वक संसार का पालन करना चाहिये।
अर्जुन के लिए तो युद्ध में जीतने पर धरती का राज्य और मृत्यु होने पर स्वर्ग निश्चित ही था।
The opportunity-chance of such a war is rare-God gift for the Kshatriy-the warrior; opening the gates of heavens, which is available only to the fortunate-selected few.
Kshtriy has the genes of war in his blood. His body-nature-fearlessness-virtuousness-piousness-integrity are unparalleled. Still Bhagwan Parshuram had to to relinquish the earth from their domain 21 times, since all are not alike. There are the sycophants-neuro like Duryodhan who do not let others live with peace. If you want to live with peace be prepared to repel such people. War is the only available option. When life is in dangers, others are not far behind. Those who thrust war upon others, have only one abode: the HELL. Those who fight for virtues-righteousness find the sanctions of demigods-deities, who wait for them in the heaven. Most of the people who sided with Duryodhan got hell. Arjun was lucky. Had he died, he would have obtained heaven other wise the opportunity of ruling the earth was open to him due to the success. He was only carrying out his duty of maintaining order-peace as a warrior and the violence in this purpose-process was but natural, which is not a sin.
Killing people in the name of jihad is misconception and misguiding-luring the youth by the interested quarters, who want their dominance in the circles of power. Bhagwan Shiv asked Vir Vikrma Dity not to invade-crush these people (-present Arab world), limited to a small segment of the world. Now they are bent upon extending their domain and the world has no option but to eliminate-vanish-crush them. This is the need of the hour-the true-real religion.

अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि। ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥2-33॥ 
भावार्थ: किन्तु यदि तू इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करेगा तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होगा 
अकीर्तिं चापि भूतानि। 
अथ शब्द का प्रयोग यह स्पष्ट करता है कि युद्ध करना क्षत्रिय का स्वभाव है और अर्जुन के लिए यह संभव नहीं होगा कि वह स्वयं को युद्ध से वंचित रख पायें। जब युधिष्टर युद्ध करने के लिये मैदान में उतरेंगे और उनकी सेना अर्जुन के बगैर कमजोर-असहाय-निर्बल हो जायेगी तब तो मजबूरी में उन्हें युद्ध में उतरना ही पड़ेगा।
स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल तक अर्जुन की शोहरत थी। उन्हें एक बेमिसाल, कुशल लड़ाके, बहादुर व्यक्ति के रूप में जाना जाता था। उन्हें दैविक अस्त्र-शस्त्र प्राप्त थे। उनकी परीक्षा स्वयं भगवान शिव, देवराज इन्द्र और हनुमान जी ने ली थी। भगवान् स्वयं हर वक्त-पल उनके साथ थे। उन्होंने भयंकर राजाओं-दरिंदों, दानवों, राक्षसों का सफाया किया था। युद्ध से युक्ति हीन कारण से हटने पर उनकी बहुत बदनामी ही नहीं होती, अपितु उनके चाहने वालों को निराशा भी होती। यह पाप भी होता और उन्हें नरक वास भी भोगना पड़ता। 
If you do not fight this battle you will fail to carry out your natural duties as a Kshtriy & your reputation as a brave-courageous warrior, leading to sin, since its your pious duty to protect the weak-fragile (-the army in your absence will be disheartened-discouraged-weak & fragile). 
The word ATH indicates that the Almighty stirred him up by saying that by virtue of your birth as a Kshtriy you will not be able to control yourself from fight. When Yudhistr will take the challenge and enter into the battle field-arena, you will be motivated to save-protect him. 
Arjun was a well known warrior in the three worlds-The Heaven, Earth and Patal. His courage and might was unparalleled. He was well protected & well equipped-armed with divine weapons-armors and ammunition. He was tested and appreciated by Bhagwan Shiv, Indr and Hanuman Ji. Almighty was always with him. He had defeated most feared-dreaded-notorious kings and demons-giants. With drawl from the battle on this plea would certainly hurt his reputation and the sentiments of his fans. This sin would have sent him to hell.
कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌। सम्भावितस्य चाकीर्ति-र्मरणादतिरिच्यते॥2-34॥
भावार्थ: तथा सब लोग-प्राणी बहुत काल तक रहने वाली तेरी अपकीर्ति का भी कथन-निन्दा करेंगे और वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्य के लिए मृत्यु से भी बढ़कर दु:खदाई है।
मनुष्य चला जाता है मगर उसकी याद रह जाती है। किसी की कुछ दिन के लिए और किसी की अनन्त काल-कल्प के लिये। उसके पाप-पुण्य भी उसके पीछे जन्म-जन्मांतरों तक पीछा नहीं छोड़ते। एक शूरवीर के  लिये कायरता-युद्ध से हटना बहुत बड़ा पाप है। इससे अपकीर्ति-अपयश-बदनामी होती सो अलग। इन घटनाओं को युगों-युगों तक याद किया जाता है। लोग आज तक राम-रावण को याद करते हैं।   
The people will remember your flight from the war for a long period of time and the smear-blot-censure-misconduct-cowardice, which will be more painful-torturous for a respected-honorable person like you, as compared to death. 
No one is indispensable. But people are known for their bravery-might-charity-deeds for a long period of time. Some leave permanent marks on the memories of the man kind. The scriptures are full of the descriptions of sinners and virtuous people. Their stories-actions-deeds are remembered from one generation to the next. When a brave-mighty warrior run away from the battle field he invite scorn-scolding-criticism-sin. The defame keeps going on with his name till the earth survives, like Ram-Ravan.

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः। येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥2-35॥
भावार्थ: और जिनकी दृष्टि में तू पहले बहुत सम्मानित होकर अब लघुता को प्राप्त होगा, वे महारथी लोग तुझे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे। 
यदि अर्जुन युद्ध को पाप समझते तो पहले ही एकान्त में भजन-पूजन करते। परन्तु वे तो युद्ध में प्रवृत थे। इस स्थिति में युद्ध से हटने का सीधा मतलब-तात्पर्य होगा, मारे जाने के भय से निवृत होना। संसार के सभी महारथी उन्हें महान योद्धा मानते थे। उन्होंने युद्ध में राक्षसों, देवताओं और गन्दर्भों को हराया था। भगवान ने कहा कि ऐसा करके तुम लघुता को प्राप्त करोगे। उनकी निगाह में तुम्हारी इज्जत कम हो जायेगी। कोई भी यह नहीं मानेगा कि तुमने दयावश युद्ध भूमि को छोड़ा है। भीष्म, द्रोण, कर्ण या फिर किसी और के मन में तुम लोगों के प्रति दया-ममता-सदभावना क्यों उत्पन्न नहीं हुई ?!
The mighty-great fighters-warriors-stall warts who considered you to be a great warrior (-had high opinion about you as a warrior) will think that you have left the battle field due to fear. 
If Arjun considered war to be a sin, he would have turned into a recluse and subjected himself to asceticism in a lonely-deserted place, instead of standing in the battle field. Sidelining at this juncture means that he had left the decisive war due to fear  of being killed. All recognised big-mighty fighters considered him to a great warrior. He had defeated the demons-giants-demigods and Gandarbhs. Bhagwan Shri Krashn said his prestige-position-reputation will be at stake. No one would ever believe that Arjun had left the war due to pity over the elders-relatives. Bhishm, Dron, Karn or any other warriors was not willing to leave the battle. Could not think like Arjun?! Why the feelings of pity-kindness evolve in their hearts like Arjun?!

अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः। निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌ ॥2-36॥
भावार्थ: तेरे वैरी लोग तेरे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुझे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दुःख की बात और क्या होगी ?
 तुम उन्हें शत्रु नहीं मानते, परन्तु वे तो तुम्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं (वे हर हाल में तुम्हें मारने की कोशिश करेंगे, बचपन से लेकर आज तक उन्होंने यही तो किया है)। वे तुम्हारी सामर्थ को जानते हुए भी तुम्हारे सामर्थ-शक्ति-बल की निंदा-बुराई-आलोचना करेंगे और स्वयं को तुमसे श्रेष्ठ बतायेंगे और तुम्हें हिजड़ा कहेंगे। वे कहेंगे कि तुम उनसे डर कर युद्ध से हट गए हो। तुम्हारा मजाक उड़ायेंगे सो अलग। तुम्हारा तिरस्कार तो वो करेंगे ही।  ना जाने और क्या-क्या कही-अनकही दुःख वाली बातें कही जाएँगी जिन्हें तुम बर्दाश्त नहीं कर पाओगे। उस परिस्थिति में तो युद्ध में उतरना पड़ेगा ही।
Your enemies will berate-criticize-doubt-blame-censure-scorn-abuse-defame-slander-blaspheme your capabilities and speak-utter intolerable words which will pinch-trouble-pain you.
You do not consider them to be your enemies but they consider you to be their first and foremost-sworn-worst enemy. Whether you fight or not, they will definitely try to kill you. This is what they have been doing from your child hood to till date. They know your capabilities well, still they will say all sorts of absurd things which you will not be able to tolerate. They will call you an impotent, afraid of their might and therefore you left the battle field. They will defame, discard, make fun, reject, censure-scold-reproach-scorn-disdain-abuse you. They will hurl all sorts of adverse propaganda-publicity against you, which you will not digest and return to the battle field. 

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥2-37॥
भावार्थ: या तो तू युद्ध में मारा जाकर स्वर्ग को प्राप्त होगा अथवा संग्राम में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगेगा। इस कारण हे अर्जुन! तू युद्ध के लिए निश्चय करके खड़ा हो जा। 
भगवान् श्री कृष्ण ने अर्जुन के प्रश्न का उत्तर दिया कि अपने कर्तव्य का पालन करने के कारण यदि युद्ध भूमि में मृत्यु हुई तो स्वर्ग मिलेगा और जितने पर तो राज्य मिलेगा ही मिलेगा। अर्थात दोनों ही स्थितियों में लाभ ही लाभ। 
Bhagwan Shri Krashn replied to the quarry-question asked by Arjun about the fate-result of the war. He said that you will go to the heaven if killed in it and rule the earth if you succeed. Either way you are the winner.Therefore, decide in favor of the war and stand up.
The assurance was clear and sound. Death in the battle field will take him to the heaven and success will award-ensure the rule over the earth. One who died while carrying out his virtuous-Vernashrm duties definitely get heaven.

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ। ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥2-38॥
भावार्थ: जय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुख को समान समझकर, उसके बाद युद्ध के लिए तैयार हो जा, इस प्रकार युद्ध करने से तू पाप को नहीं प्राप्त होगा। 
जब किसी व्यक्ति को युद्ध के लिए मजबूर किया जाता है तो यह पाप होता है और मजबूर करने वाला पापी। निर्दोष व्यक्ति की हत्या-लूट-उत्पात-हिंसा पाप है और यह सब करने वाला पापी है। जब कोई व्यक्ति अपनी सम्पत्ति-देश-परिवार-परिजनों की रक्षा के लिये हथियार उठाता है तो वह पाप नहीं होता। यह सब कुछ जब उसके ऊपर थोपा जाता है तो उसका प्रतिकार में पाप नहीं होता। जब लोभ-लालच-मज़ा लेने  के स्थान पर अपना वर्णाश्रम धर्म निबाहना हो तो पाप कैसा ?!हाँ युद्ध के लिए मजबूर किया गया है तो अपनी पूरी ताकत-योग्यता-लग्न-आत्मविश्वास के साथ लड़ो। जब तुम्हारा इस कार्य के प्रति लगाव  नहीं है, तो पाप कैसा और कहाँ ?!
If you engage in the war by weighing victory-defeat, profit-loss and pleasure-pain equally you will not be smeared-tainted by the sin.
Sin lies behind the desire for war with draconian motives. Those who force-compel-engage others in war un necessarily with ulterior motives are the sinners. You are merely protecting the assets-kingdom-your belongings. The war has been forced upon you. You are not a sinner. You are merely carrying your duties without lust-desire for victory, profit, pleasure. You need not worry about the out come. Do your best-fight it out with best of your ability. Deeds preformed without  attachment-desires relieves the doer of its adverse effects.

( कर्मयोग का विषय )
एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु। बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥2-39॥
भावार्थ: हे पार्थ! यह सम बुद्धि तेरे लिए पहले सांख्य-ज्ञान योग में कही गई और अब इसको कर्मयोग के विषय में सुन-जिस बुद्धि से युक्त हुआ तू कर्मों के बंधन को भली-भाँति त्याग देगा अर्थात सर्वथा नष्ट कर डालेगा।
देह-देही का ज्ञान विवेक शील प्राणी-मनुष्य में समता स्वतः स्पष्ट कर देता है। देह में राग-मोह-अनुराग रहने से ही विषमता उत्पन्न होती है। राग-द्वेष होने से ही पाप  लगता है। समबुद्धि होने से पाप नहीं लगता। पक्षपात-दुराग्रह नष्ट हो जाते हैं। समबुद्धि होने से कर्म बन्धन कारी नहीं होंगे। निस्वार्थ भाव से लोक मर्यादा कायम रखने के लिये-लोगों को उन्माद से हटाकर सन्मार्ग में लगाने से समता सरलता से प्राप्त हो जाती है। कर्मयोगी बन्धन से सुगमता पूर्वक मुक्त हो जाता है। 
शरीर और शरीरी के भेद को जानकर संसार से सम्बन्ध-विच्छेद करना सांख्य और कर्तव्य और अकर्तव्य को समझ कर त्याग और कर्तव्य का निर्वाह कर्म योग है। 31-37 श्लोक धर्म शास्त्र और 39-53 श्लोक मोक्ष शास्त्र की व्याख्या करते हैं। धर्म से लौकिक और परमार्थिक-दोनों तरह की उन्नति होती है। धर्म और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। कर्तव्य पालन से योग और योग साधना से तत्व ज्ञान स्वतः हो जाता है जो कि कर्म और ज्ञान योग का सत्व है।  
O Parth! The concept of equanimity (-balanced state of mind) was discussed in Sankhy-Gyan Yog, now learn-understand the same concept pertaining to Karm Yog. 
Knowledge-understanding of the body-physique & the soul, enlightens the prudent automatically. Attachment with the body-worldly affairs create differentiation. Attachments-bonds evolve sins. The moment one attain equanimity, he gets rid of sins. Equanimity abolishes favoritism-excessive stubbornness-misguided zeal. Equanimity breaks the bonds-illusion-ignorance-attachments-selfishness. Equanimity is attained easily-quickly if one make efforts to bring the misguided-frenzied to the righteous-virtuous-pious path-track , without motive-selfishness-personal gains. The Karm Yogi is detached-relinquished with ease.
The understanding of the difference of physique and the soul is Gyan-Sankhy Yog, while the understanding of duties-deeds and the undesirable acts-foul motives-deeds and rejecting the sinful and observing of the Dharm is Karm Yog. Shlok-Verses 31-37 explains the Dharm Shatr & 39-53 describes the Moksh Shastr-Salvation. Dharm promotes worldly and the Ultimate. Dharm and dutifulness are the two sides of the same coin. Completion of own duties-Vernashram Dharm, leads to Yog & the practice of Yog awards the gist-nectar-elixir-basic truth-theme-central idea automatically, which is the back bone of of Karm & Gyan Yog.

यनेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥2-40॥
भावार्थ: इस मनुष्य लोक-पृथ्वी पर कर्मयोग में इस समबुद्धि रूपी धर्म के आरम्भ का नाश नहीं होता तथा इसके अनुष्ठान का उल्टा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ा सा भी अनुष्ठान जन्म-मरण रूपी महान भय से रक्षा कर लेता है। 
मनुष्य योनि के सिवाय अन्य सभी योनियाँ भोग योनि हैं। क़ेवल और केवल इसी योनि में प्राणी मुक्ति-मोक्ष का संसाधन कर सकता है। अगर राग-द्वेष से छुटकारा मिल जाये तो भोग (-कष्ट, दुःख, यातना, नरक, हीन योनि में जन्म) की नौबत आयेगी ही नहीं। 
सकाम भाव से किये गये किसी भी अनुष्ठान में त्रुटि रहने पर इसके अपेक्षित परिणाम तो प्राप्त होते ही नहीं अपितु उल्टा असर भी हो जाता है। समबुद्धि का अनुष्ठान में लगने से उल्टा परिणाम नहीं होंगे अपितु फलेच्छा भी नहीं रहेगी। 
समबुद्धि का जीवन में आना  संकट को टाल सकता है। परोपकार, वर्णाश्रम धर्म और कर्तव्य का तत्परता, निष्काम भाव से पालन, समबुद्धि को पैदा करता है।  
The efforts made to acquire equanimity-a form of Dharm-religion neither go waste not it has contra effects, a little bit of effort in this direction protects the devotee from extreme fear-danger termed as untimely death.
All incarnations except the birth as humans are meant for consumption of the result-fruits-reward-punishment-grief-pleasure of the previous accumulated deeds controlled by destiny. Even divinity is not spared by the result of deeds. Demigods-deities too crave for rebirth as humans after the period of their incarnation as divinity is over. This is the only incarnation in which the organism-humans can prepare for detachment-relinquishment-Salvation. If illusion, attachments-bonds are cut and equanimity is observed, one will not have the chance of being punished.
An act-action-maneuver performed with motives-desires revert to opposite results if some procedural defect-mistake creeps into it. Slightest deviation yield painful-disastrous results. If one employs equanimity in his endeavors neither adverse outcome will be there nor desire for reward will be there. 
Equanimity is such a wonderful phenomenon that can postpone-abolish the greatest dangers, including untimely death. Helping others, devotion to Vernashram Dharm and active commitment-devotion to work, without the desire for reward evolve equanimity. 

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन। बहुशाका ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥2-41॥
भावार्थ: हे अर्जुन! इस सम बुद्धि-कर्मयोग में निश्चयात्मिक-व्यवसायात्मक बुद्धि एक ही होती है, जिनका एक निश्चय नहीं है ऐसे अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं। कर्मयोगी साधक का लक्ष्य परमात्मा से स्वरूप समता की प्राप्ति है। इसका साधन अन्तःकरण की समता है जिसमें राग बाधक है। इस राग को खत्म करने का साधन है: निश्यचयात्मक-व्यवसायात्मक बुद्धि जिसमें सांसारिक वस्तु, पदार्थ आदि की कामना का त्याग होता है। कर्म योग और भक्ति योग में पहले बुद्धि का एक निश्चय होता है और फिर स्वरूप का बोध होता है। ज्ञान योग में पहले स्वरूप का बोध होता है पीछे परिणाम स्वरूप बुद्धि स्वतः एक निश्चय वाली हो जाती है। ज्ञान योग में ज्ञान की प्रमुखता है। कर्म योग और भक्ति योग में निश्चय की प्रमुखता है। 
शास्त्र में अव्यवसायी उसे माना गया है जो किसी भी क्रिया को सकाम भाव से करता है। उसकी आसक्ति भोग-विलास और संग्रह में होती है। उसकी कामनाएं अंतहीन हैं कामना के जितने लक्ष्य उतने ही बुद्धि के विस्तार यानि अनन्त कामनाएँ अनन्त बुद्धियाँ।
Hey Arjun! The Karm Yogi has only unidirectional inclination-determination of mind i.e., equanimity. Such imprudent desirous people without determination, who are imbalanced-wavering, have infinite-unlimited-multiple goals.
 The target-goal-aim of the Karm Yogi is identify him self with the Ultimate i.e., assimilation in the Almighty. Equanimity with the organism is to see-identify the Almighty in each and every organism. The mechanism-method-procedure is simple. Attain equanimity of the inner self, which is obstructed by attachments-bonds-desires. These attachments can be eliminated-cut by taking firm-proper decisions. Firm determination-practicality leads to loss-lapse of desires for worldly possessions, leading to relinquishment-breaking of bonds-ties. Karm Yog and Bhakti Yog intend to make the intelligence unilaterally devoted to the God and there after, one realize the self-soul-inner self-the Almighty. Gyan Yog leads to realization-understanding-identification of the self leading to the framing of the intelligence unilaterally,i.e., directed-devoted to the God, only. Enlightenment is the basic-root factor behind Gyan Yog while the determination is the basic factor behind Karm Yog and Bhakti Yog. 
One who endeavors with desires-reward is termed as the person without firm determination, for the realization of the Almighty-God. He is inclined to worldly possessions-pleasures-comforts. His desires are unlimited-infinite. More one desires, more channels he opens for the brain to involve in worldly affairs, dragging him away from the God.  
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥2-42॥
कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌। क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥2-43॥
भावार्थ: हे प्रथानन्दन अर्जुन! जो भोगों-कामनाओं में ही तन्मय हो रहे हैं, और स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले हैं, वेदों में कहे सकाम कर्मों में प्रीति रखने वाले हैं और जो कहते हैं कि भोगों के सिवाय कुछ और है ही नहीं, वे अविवेकी मनुष्य इस प्रकार की पुष्पित-दिखावटी भाषा का प्रयोग करते हैं, जो कि जन्मरूपी फल को देने वाली है ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये बहुत सी क्रियाओं का वर्णन करने वाली है। उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती।  
कामना और भोग की इच्छा इतनी प्रबल होती है कि रागी-भोगी को इसके सिवाय अन्य कुछ नज़र ही नहीं आता। वह स्वयं को कामना से इतना जोड़ लेता है कि कामना उसका प्रतिरूप बन जाती है। उसके अन्तःकरण में जो परमात्मा का अंश है वो ढँक  जाता है और कामना जो कि प्रकृति का अंश है, प्रबल हो जाता है। सकाम कर्म जिनकी व्याख्या वेदों में की गई है, वे परमात्मा, भगवत्प्रेम, तत्वज्ञान, मुक्ति से उसे विमुख करते हैं। 
जिस व्यक्ति में सत्-असत्,  नित्य-अनित्य, अविनाशी-विनाशी, का ज्ञान-विवेक नहीं है वह वेदों के उस अंश (-वाणी) को जिसमें संसार और भोगों का वर्णन है, को अपना लेते हैं। उसके आगे उससे उन्हें कोई सरोकार नहीं। आधी-अधूरी-अधकचरी बात उसी तरह है, जैसे कोई फल को छोड़कर पत्तों और फूलों-पुष्पों (-पुष्प मंडित वाणी) को हो ग्राह्य समझे। पेड़ की जड़, तना, डाली-टहनी, कोंपल, पत्ते, फूल सभी आवश्यक हैं। परन्तु फल तो अभीष्ट है।  वेदों का सार मनुष्य को-आत्मा को परमात्मा से मिलाना है न कि भोग-मोह-कामना-पुनर्जन्म में भटकाना।                                                                            
Hey Prathnandan Arjun!  Those who are lured-busy with the comforts-enjoyment, consider the heaven to be the ultimate-best-excellent, have faith in the words of Ved meant for Sakam Karm-the deeds with motive-goal-target-rewards, these imprudent-fools-ignorant use camouflaged-touching-fantastic-twisted language to elaborate-glorifies the comforts-pleasures-luxuries-enjoyment & various deeds-actions-activities-ventures-endeavors-projects, resulting in rebirth-reincarnations. These people lack determination to attain the ultimate.
The desires and comforts are so strong for the ignorant-imprudent that he finds nothing else in this world.He attach him self so much with desires that the desires become his identity-synonym. The segment of the Almighty in him present in the firm of soul is clouded-covered. The desires which are the component of nature takes him over. Veds describe the deeds associated with result-reward-gains-allurements, which deviate him away from the Almighty, salvation, gist of Veds, love-affection of the eternal, for clear understanding not for deviating him. 
The person-imprudent-ignorant-fool-idiot, who is unable to distinguish between virtues & vices, regular-forever & temporary, Ultimate-perishable  adopts-accepts that part-portion-description of Veds which discusses  the comfort-luxuries pleasures of this universe (-icon-similar to heaven)  and discard the remaining sections which elaborate the eternal-ultimate truth. One should not be lured by the incomplete-irrelevant talks. The tree is extremely useful to the humans. All its components are used for various purposes. Instead of restricting one to the leaves and flowers, he should seek the fruits.  

       भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌। व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥2-44॥ 
पुष्पित वाणी से जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात भोगों की तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्यों की परमात्मा में एक निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती। 
ऐसे व्यक्ति स्वर्ग के सुखों को ज्यादा महत्व देते हैं जिन्हें अत्यधिक ख़ुशी-आनन्द प्रदायक माना जाता है। अप्सराएँ-सम्भोग, नाचना-गाना, मौज-मस्ती, बड़े-बड़े सुन्दर सरोवर-बाग-बगीचे और अमृत उन्हें वहाँ खींचता है।
सुख शब्द, स्पर्श, रूप-सौन्दर्य, रस और गन्ध से जुड़ा है।  साथ में नाम, बड़ाई और आराम भी है। धन, सम्पत्ति, बँगला, गाड़ी (-लगातार बड़ी होती हुई), मनुष्य में आसक्ति, खिंचाव-जुड़ाव उत्पन्न करते हैं। आसक्ति महत्वबुद्धि-आसुरी प्रवृति की द्योतक है। उनके लिये सांसारिक-शरीरिक शुख ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। 
इससे भी विचित्र बात ये है कि वे इन सभी भोगों को मानवीय शरीर के माध्यम से प्राप्त करना चाहते हैं। वे ये भूल जाते हैं कि मानव जन्म का मूल कारण मुक्ति-मोक्ष प्राप्त करना है भटकना नहीं। आशाओं-इच्छाओं-तृष्णाओं का अन्त कभी नहीं होता, उनकी पूर्ति-संतुष्टि कभी नहीं होती। एक पूरी हुई; दूसरी शुरू। ये एक शृंखला की तरह है। 
Those whose inner self is dragged by the camouflaged language towards the comforts-pleasures-enjoyments-sensualities-passions-sexuality are enchanted by these, due to lack determination self discipline.
Such people give more importance weightage to the  the heavens due to the extreme pleasure for enjoyment, Apsras for sex-dance & music, beautiful gardens and the elixir, which is present there. 
Pleasure is associated with pleasing words, soothing touch, beauty, extracts for drinking-juices-wine-elixir-nectar and smells-fragrances, physical rest-pleasures, honor and name-fame-glory. Worldly pleasures are obtained through wealth, property, vehicles-Always increasing in size & comforts etc. They generate attraction-attachment-bonding, which is purely demonic tendency. For them physical comforts are more important. What is unique is that they want to experience the comforts of heaven through this material body! The real cause behind the availability of birth as a human being is to pray for assimilation in God and not to venture for any thing else. The main thing behind the desires is, failure to achieve saturation-satisfaction. More you obtain more you crave for. They are never ending and have a chain formation.

त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन। निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥2-45॥
भावार्थ: हे अर्जुन! वेद तीनों गुणों के कार्य का ही प्रतिपादन करने वाले हैं, इसलिए उन तीनों से रहित हो जा, राग-द्वेषादि द्वंदों से रहित हो जा, निरन्तर नित्य वस्तु परमात्मा में स्थित हो जा, योग क्षेम (-अप्राप्य वस्तु  की प्राप्ति और रक्षा, समान्य बोलचाल में योगक्षेम का अर्थ है:आप कुशल से तो हैं ना ?) की कामना भी मत कर और परमात्म परायण हो जा।
वेदों में वर्णित प्रकृति के तीनों गुण भौतिक सकाम क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का प्रतिपादन करते हैं जो कि कर्मफल-बन्धन के कारण हैं। इनके द्वारा कोई भी सामान्य व्यक्ति इन्द्रिय तृप्ति से उठकर आध्यात्मिक स्तर तक पहुंच सकता है। इसलिए, हे अर्जुन! तू तीनों गुणों का त्याग करके संसार-भौतिक स्तर से ऊँचा उठ-निर्द्वंद हो जा। राग द्वेष ही मनुष्य के वास्विक शत्रु हैं। अतः इन्हें छोड़ना ही श्रेयकर है। निर्द्वंद होने पर मूढ़ता स्वतः नष्ट हो जायेगी। एक वस्तु-व्यक्ति में राग से दूसरे में द्वेष संभव है, अतः परमात्मा में ध्यान लगाओ ताकि न राग रहे न द्वन्द। जो व्यक्ति परमात्मा के परायण है, उसकी चिन्ता स्वयं भगवान् करते हैं। 
जड़-चेतन, सत्-असत्, नित्य-अनित्य, नश्वर-अनश्वर, योग-क्षेम भी भेद-द्वन्द पैदा करते हैं। द्वन्द भगवान् से दूर ले जाता है। हकीकत यह है कि सत्-असत्, अमृत-विष (-मृत्यु) भी भगवान् के रूप हैं। 
Hey Arjun! The Vedas describes-supports-elaborates  the functions of the three characteristics, therefore you should get rid of-isolate  yourself from them, detach from the attachments-allurements & controversies-disputes-contradictions, do not desire to protect the attained (-wealth, property) and come under my fore-asylum-shelter.Veds have described three characteristics of the nature, which are binding. They are responsible for all physical deeds-happenings and the reactions occurring simultaneously. They are the root cause behind all ties-bonds-attachments-allurements-desires-wishes. They are meant for sensual satisfaction and uplifting to eternal-spirituality. One who has attained every thing and do not find any thing left to be attained, inclines to the Almighty automatically. Having tasted-enjoyed every thing, he ultimately feels-realizes that they are purely unnecessary-useless entities-evils. Arjun has been asked to reject these three and rise above worldly affairs. Attachments and enmity  are the real enemies of the humans. Its beneficial to discard them.  Once you get rid of tensions, imprudence will be lost automatically. Attachment with one person or commodity create enmity with the other. Therefore, concentrate-confine in the Almighty, so that attachments and enmity do not evolve-generate-trouble you. One who is devoted to the Almighty, he is protected by him. 
Living-non living, virtuous-vice, regular-forever-perishable, connection with the God-materialism too can create differentiation. Differentiations drags one away from the Almighty. In reality virtues-vices, nectar-poison (-death) are the creations of God.

यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥2-46॥
भावार्थ: सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर छोटे गड्ढों से भरे जल में मनुष्य का जितना प्रयोजन रहता है (-अर्थात कुछ भी प्रयोजन नहीं रहता), वेदों और शास्त्रों को तत्व से समझने वाले ब्रह्म ज्ञानी का वेदों में उतना ही प्रयोजन रह जाता है (-अर्थात कुछ भी प्रयोजन शेष नहीं रहता)। 
यह बिलकुल उसी प्रकार है जैसे कोई बच्चा पहली कक्षा से उन्नति करता हुआ स्नातक, स्नातकोत्तर, पीएचडी या फिर डी लिट की  उपाधि प्राप्त कर ले। 
गुरु के आश्रम में प्रवेश से लेकर चरम ज्ञान-वेद की प्राप्ति तो वहीं हो जाएगी; परन्तु ब्रह्म-ज्ञान के हेतु अथक साधना-तप-योगाभ्यास  होता है। वह भी गुरु कृपा से सुगम हो जाता है। उपनिषद, ब्राह्मण, पुराण, वेद, तीर्थ, भजन, पूजन, व्रत, उपवास, ध्यान, समाधि भूमिका बनाते हैं और भगवान् के दर्शन से लेकर उनमें विलय की अवस्था तत्पश्चात प्राप्त होती है। 
अनन्त ब्रह्माण्डों में अनन्त किस्म के भोग हैं। परमात्म तत्व की प्राप्ति के बाद कुछ हेतु शेष नहीं रहता। राग-द्वेष-द्वन्द सब मिट जाते हैं। प्राणी को निर्योगक्षेम (-कोई वस्तु प्राप्त हो गई और उसकी रक्षा होती रहे), की स्थिति की प्राप्ति हो जाती है। 
The devotee-Brahm Gyani-philosopher-enlightened-scholar-learned, who has attained the supreme knowledge-the gist of Brahm, is left with no concern for the Veds, like the attainment of a big reservoir makes a man discard a ditch-pond. 
This is comparable to rising in an upward direction. Initially one acquire a lower qualification and then reach the ultimate ladder. The child gets admitted in nursery or KG-kindergarten and then progresses up to the higher levels gradually, like Ph.D. or D.Lit. and even further. 
Education begins with entry into the Ashram of the Guru. The Brahmchari-disciple goes higher and higher in learning. He studies various arts-sciences-astrology etc.constituting of 64 disciplines. He acquires the knowledge of Upnishads, Purans, Brahmns, Shruti, Veds etc. in an ascending order of learning. Thereafter, its up to the learner to go beyond and adopt various methods-ways for attaining the God, like Karm, Sankhy or Bhakti Yog through asceticism, meditation etc. It becomes easy with the blessings of the enlightened Guru-the teacher. The surge continues, till the devotee is able to seek the blessings-boons of the Almighty or assimilation in him. For further elaboration please log on to:
प्राचीन भारतीय शिक्षा  

There are infinite number of Universes with infinite comforts-pleasures worldly tensions. Once the Moksh-Liberation-Salvation is there, all troubles-tensions are over. Now the devotee is under the protection of the Almighty.

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥2-47॥ 
भावार्थ: कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तू कर्मों के फल का हेतु भी मत बन और तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो। 
केवल मनुष्य योनि ही कर्म योनि है। अगर मुक्ति चाहिए तो सेवा से युक्त नवीन कर्म किये जाने चाहिये। यह जन्म स्वयं के उद्धार के लिए है ना कि व्यर्थ करने के लिये। स्वयं का उद्धार सेवा भावना से किये गये पुण्य कार्यों से होगा। अगर कर्म केवल अपने हित के लिए किया गया तो यह बन्धन कारी होगा। एक वक्त में केवल एक कर्म ही करना है।
प्रारब्ध ने हमारे लिये इस जन्म में कुछ कार्य नियत कर रखे हैं और पुरुषार्थ-नये करने की स्वतंत्रता, भी प्रदान की है। बढ़ती उम्र के साथ बीते वक्त में जो कुछ भी किया गया, उसका संयोजन भी साथ-साथ चल रहा है। तात्कालिक कर्म, संचित कर्म और प्रारब्ध ये तीनों मिलकर आगे का मार्ग नियत करते हैं। प्रभु ने कहा है, "कर्म करो, फल की चिंता मत करो, वो तो कर्म के अनुरूप स्वतः मिल जाना है"। जाने-अनजाने किया गया कोई भी शुभ कर्म, किसी आने वाली बड़ी मुसीबत से बचाने के लिए सम्मुख आ खड़ा होता है। 
You have the right to perform-do work, but devoid of rewards (-perhaps as you desire, of your choice, except when you perform meditation and asceticism for millions of years to appease the divine powers-the divinity and have your desired boons-wished fulfilled). You should not become the means-tool for performing deeds-actions (-of course you have to perform the Vihit and Nihit Karm, essential-necessary duties) without inclination for non performance.
It's only the incarnation as a human being, which permits new ventures-deals-endeavors. Its the individual who will decide the course, which he has to choose-adopt, the one which takes him to heaven, the other meant for the hells and the Ultimate, where the Almighty is waiting for his beloved soul to welcome-immerse in himself. Where Parmanand-extreme pleasure presides. Where there is no worry. When you act like a helping hand, giver, protector, savoir you unconsciously worked for attaining heaven followed by Salvation, ultimately. If you programmed for your self interests discarding others, you are bound for rebirth.  Slightest deviation towards harming others is bound to open the flood gates to hells for you. Neutrality, atheism do matter a lot, depending upon the circumstances and the action taken by you.
The destiny was framed by the Vidhata much-much before this birth. Still he was kind enough to provide you with the multiple opportunities to purify. Till this moment you had acted in different ways depending upon the circumstances. All these performances of this life span are summed for your credit. What you are doing at moment is equally important. You may be rewarded by the sum total of your deeds till this moment. It may be that you are protected from a great disaster due to some pious deeds, which you performed un knowingly.
If you have understood this  and willing to surrender before the Almighty, you have achieved what others will no be able to, in infinite incarnations.

योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय। सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥2-48॥ 
भावार्थ: हे धनंजय! तू आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समान बुद्धिवाला होकर योग में स्थित होकर, कर्तव्य कर्मों को कर, क्योंकि समत्व (-जो कुछ भी कर्म किया जाए, उसके पूर्ण होने और न होने में तथा उसके फल में सम भाव रहने का नाम समत्व-equanimity है) ही योग कहलाता है। 
किसी भी कर्म, कर्म के फल, किसी भी देश, काल, घटना, परिस्थिति, अंतःकरण, बहिःकरण आदि प्राकृत वस्तु में आसक्ति न होने पर ही मनुष्य निर्लिप्तता पूर्वक कर्म कर सकता है। आसक्ति के त्याग से सिद्धि और असिद्धि में समता हो जायेगी। कर्म योगी तो केवल कर्तव्य-कर्म पे ध्यान देता है।  ध्यान रूपी समता से साध्य रूपी समता स्वतः आ जाती है। सिद्धि-असिद्धि में सम होने के बाद उस समता में निरन्तर अटल रहना ही योगस्थ होना है।  साधन रूपी समता अन्तःकरण की होती और साध्य रूपी समता परमात्मस्वरूप होती है। सिद्धि-असिद्धि, अनुकूल-प्रतिकूल आदि की समता अर्थात अन्तःकरण में राग द्वेष का न होना साधन स्वरूप समता है। समता का एक तात्पर्य ये भी है कि "मनुष्य हर प्राणी में परमात्मा की छवि देखे, ऊँच-नीच को ना माने, स्वयं व अन्य में अंतर ना समझे"
Hey Dhananjay! You reject-bereft the attachment and attain equanimity in accomplishment-success and failure, establish-stabilize in Yog and perform your duties, since equanimity is Yog (-assimilation in the Almighty).
One can perform unsmeared-un anointed-uncontaminated-detached, when he is not attached to any deed, reward of deeds, any country, any period of time, any incident-happening, adverse or favorable conditions, inner self or his exterior self and the characteristices related to nature. Relinquishment of  attachment will provide equanimity with success and failure.  The Karm Yogi has to concentrate over the duties-how best can he perform? Equanimity of meditation-concentration provides the equanimity of the ultimate-goal-aim-target: the Ultimate, God. Having achieved equanimity with success & failure and to remain firm with this is Yog. Equanimity of  ways & means  is related to the inner self-the individual, while the equanimity of the goal-target-aim pertains to the Almighty.  Equanimity of achievement-success or failure,  favorable-against stands for loss of Rag-dwesh: Attachment-enmity pertaining to means. Equanimity has a more broader meaning: "One should see-find-observe the image of-God in each and every organism-individual, big-small, highly place and the scratch".  

दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥2-49॥ 
भावार्थ: इस समत्वरूप बुद्धियोग से, सकाम कर्म अत्यन्त ही निम्न श्रेणी का है। इसलिए हे धनंजय! तू समबुद्धि में ही रक्षा का उपाय ढूँढ अर्थात्‌ बुद्धियोग का ही आश्रय ग्रहण कर, क्योंकि फल के हेतु बनने वाले, अत्यन्त दीन हैं। 
कर्म भी उत्पन्न और नष्ट होते हैं। उनका भी संयोग और वियोग होता है। योग समता स्थाई है और इसमें कोई विकृति नहीं आती। समता के अभाव में जीव मात्र कर्म ही करता रहेगा और परिणाम स्वरूप जन्म-मृत्यु, पुनर्जन्म, संयोग-वियोग, सुख-दुःख झेलता ही रहेगा। अतः कर्मों में समता ही श्रेष्ठ है; जिसके अभाव में शरीर में अहंता-ममता हो जायेगी, जो कि पशु बुद्धि है। 
जिस प्रकार प्रकाश और अँधेरा एक साथ नहीं रह सकते, उसी प्रकार बुद्धि योग और सकाम कर्म, कभी तुल्य-समकक्ष नहीं हो सकते। बुद्धि योग परमात्मा की प्राप्ति कराने वाला है। 
कर्मयोग को 3 शब्दों से निरूपित किया गया है: बुद्धि, योग और बुद्धि योग। कर्मयोग में योग की प्रधानता है, बुद्धि की नहीं। वैसे इन तीनों का अर्थ एक ही है। कर्मयोग में व्यसायात्मिका बुद्धि की प्रधानता होने से इसे बुद्धि कहा गया है। विवेक पूर्ण त्याग की प्रधानता होने से यह बुद्धियोग हो जाता है।
ध्यान योग में मन की और कर्मयोग में बुद्धि की प्रधानता है। समाधि की अवस्था प्राप्त होने तक समाधि और व्युत्थान की दो अवस्थाएं रहती हैं। बुद्धि का नियंत्रण विवेक से होता है। विवेक का असत् भाग दूसरों की   सेवा में लगा देने से, त्याग सरल और शीघ्र हो। 
मन का निरोध निरन्तर नहीं होता तथा समय-समय पर और एकांत में होता है। बुद्धि का एक निश्चय निरन्तर लगातार होता है।
Oh Arjun! Skam Karm (-deeds performed to seek awards, gains, gratification) are considered to be extremely low as compared to equanimity (-desire-motive less action laced with wisdom, prudence, enlightenment, devotions, without attachment). Hey Dananjay! You should seek remedy-asylum in equanimity, since one who perform for the sake of gains, become pitiable-miserable.
The cycle of Karm-deeds-work is never ending. The deeds begin and complete; leading to yet another cycle-chain-sequence of deeds-endeavors. Yog is forever-imperishable. Its not contaminated. In the absence of equanimity, the human will keep performing leading to unending cycle of birth & death, incarnation after incarnation. As a result of which, he will experience pains and pleasures, meeting & departing as a long non terminating chain-sequence. It leads to the conclusion that equanimity is Ultimate, in the absence of which the human grows attachment-pride, over the body, which is animal nature.
The way light & darkness can not stay together, equanimity & deeds laced with the desire for favorable outcome can not be treated at par. Equanimity-Buddhi Yog results in Salvation-assimilation in God-Liberation.
Karm Yog has been described with the help of 3 words: Buddhi (-intelligence, mind, brain), Yog (-asceticism, chastity, meditation-concentration-consciousness pertaining to Almighty) & Buddhi Yog (-alignment of intelligence with the Almighty). Karm Yog is mainly aligned with endeavor-earning livelihood, so it is termed as commercial-industrious intelligence. Use of this intelligence through prudent relinquishment turns it to Buddhi Yog. 
Dhyan Yog has the superiority of Man (-mind & heart, mood) & Karm Yog has the significance-importance of intelligence.  Attainment of staunch meditation has two components (I) Meditation & (II) Growth.  The growth is associated-possessed by worldly progress. Meditation helps in deployment of prudence towards the Almighty helping the Yogi to relinquish and divert the offensive components thinking to the service of man kind.
The mind can not be controlled regularly. It can be controlled at intervals-occasions-from time to time, in solitude. The firmness of intelligence is a continuous process, which may deviate one from meditation.

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥2-50॥ 
भावार्थ: समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है (-उनसे मुक्त हो जाता है) इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, क्योंकि कर्मों में योग ही कुशलता है (-कर्मबंध से छूटने का उपाय है)। 
विवेक युक्त बुद्धि समता प्रदान करती है और जो समता से युक्त है वो निर्लिप्त है, वह पुण्य और पाप से युक्त नहीं है। योग लीन व्यक्ति, मन  को काबू  में करके समाधि की अवस्था को प्राप्त करता है। योग एक मात्र कुशल-सर्व श्रेष्ठ कर्म है।  
One who is blessed with equanimity, relinquish virtues & sins in this abode (-world, earth; until either of the two is there, one will continue getting rebirth). Therefore, you should devote yourself to equanimity, since its only the Yog which is perfect amongest all deeds.
The intelligence laced-aided with prudence,  awards equanimity. One who is associated with equanimity is detached-relinquished-under the protection of God, since he has offered all his deeds to the Almighty. He is not tainted-smeared by sins & he has already offered his virtuous-pious-righteous acts to the God. The Yogi attains the staunch meditation by controlling brain, which keeps on moving-roaming hither & thither. This is reason, why Yog has been termed as the only-best-excellent deed.

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥2-51॥
भावार्थ: क्योंकि समता युक्त बुद्धिमान साधक कर्मजन्य फल का अर्थात संसार मात्र का त्याग करके जन्म रूप बन्धन से मुक्त होकर निर्विकार पद को प्राप्त हो जाता है।
जो समता से युक्त हैं वे ही वास्तव में मनीषी-बुद्धिमान हैं। जो अकुशल कर्मों से द्वेष नहीं करता और कुशल कर्मों में राग नहीं रखता वो मेधावी-बुद्धिमान है। 
कर्म कर्मफल में परिवर्तित जरूर होगा। उसके फल का त्याग कोई कर ही नहीं सकता। निष्काम भाव से किये गए कर्म का फल होगा तो जरूर, मगर बंधन कारी नहीः होगा। अतः कर्म जन्य फल के त्याग का अर्थ हुआ: कर्मजन्य फल की इच्छा, कामना, ममता, वासना का त्याग। यह हर कोई कर सकता है; यदि चाहे तो। समता से युक्त होते ही राग-द्वेष,  कामना, वासना, ममता जैसे दोष ना तो होंगे और ना ही पुनर्जन्म का कारण-हेतु ही होगा।
आमय यानि रोग-विकार और अनामय माने निर्विकार। सत्वगुण अनामय है, साथ ही अपना स्वरूप-परमात्म तत्व गुणातीत; जिसको पाकर फिर किसी को जन्म मरण से नहीं गुजरना पड़ता। जिससे मनुष्य कर्मयोग मुक्ति, कल्याण, निवृति और परमात्मतत्व की प्राप्ति करता है। 
The learned-prudent-intelligent devotee blessed with equanimity rejects the fruits-results-outcomes of the deeds  i.e., relinquishing the world-freedom from birth & rebirth, and achieves the ultimate uncontaminated Supreme self-The Almighty.  
One who is equipped with equanimity is a thinker-thoughtful-prudent-intelligent person. Being so, he has no grudge with the unskilled deeds and has no attachment with the skilled-able deeds.    
A deed-venture-effort is bound to turn into result-outcome. An action has reaction and cause has effect, like the two side s of the same coin. One can not skip it. However the deed which is performed without desire-motive-prejudice will not be binding upon the performer. So, freedom from the result of the deed means: Rejection of further desires, affections-bonds-ties, lust-sensualities-sexuality-passions. Equanimity leads to freedom from attachments, desires, lust-sex-passions and affectations  resulting in freedom from rebirth.      
AMY means disease-defect & anamy means defect less. Satv (-Piousity, virtuousness) Gun is anamy-free from defects-diseases and own self is like the Almighty-beyond the scope of characteristics. One who attains own self, becomes free from the cycle of birth and death. Karm Yog provides an opportunity to freedom, welfare, detachment and the God, ultimately.   

              यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥2-52॥
भावार्थ: जिस काल में तेरी बुद्धि मोह रूपी दलदल को भली भाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आने वाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जाएगा। 
शरीर, नातेदार-रिश्तेदार-सम्बन्धी, धन-सम्पत्ति, सुविधाएँ, अहंता, ममता, मोह के कारक और दलदल के समान हैं। प्रतिकूल-अनुकूल परिस्थितियाँ, पदार्थ, वस्तु, घटनाक्रम, पारिवारिक विषमताएँ, पक्षपात, मात्सर्य आदि को  कलिल कहा गया है। इस मोहरूपी व्यवधान से मुक्त होने के लिये विवेक और दूसरों की सेवा-सुख पहुंचाने, का सहारा लेना चाहिये। विवेक भोग की इच्छा को नियन्त्रित करता है और साधक को विचलित नहीं होने देता। इसीलिए भगवान साँख्य योग को कर्मयोग की अपेक्षा सुगम और शीघ्र फलदाई-सिद्धि देने वाला बताते हैं। मनुष्य ने जिन भोगों को अनुभव किया है, वे श्रुतस्य और जिनके बारे में सुना है वे श्रोतव्यस्य (-स्वर्गलोक, ब्रह्म लोक आदि) के तहत आते हैं। मनुष्य यदि विवेक का सहारा लेकर विचार करेगा तो मोह-ममता, भोगेच्छा स्वतः नष्ट हो जायेगी और वह वैराग्य ग्रहण कर लेगा। 
बन्धन-जाल दो प्रकार के हैं: संसारी और शास्त्रीय। द्वैत-अद्वैत, मत-मतान्तर के झगड़े में पड़ने के बजाय साधक का ध्यान केवल और केवल परमात्मा में होना चाहिये। शास्त्र को लेकर विवाद व्यर्थ है क्योंकि भगवान श्री कृष्ण ने उद्धव से कहा की हर व्यक्ति शास्त्र की व्याख्या अपने अनुरूप करता है। 
The moment your wisdom crosses the confusion-illusion barriers and the desire for comforts of next abode,  you will be freed from the allurements of this abode, which are like the marsh from which its really difficult to come out, without external help i.e., prudence-relinquishment-detachment.
Human body, relatives-friends, wealth, facilities-comforts, are the means of attachment, affection, illusion just like mirage. Adverse-favorable conditions-circumstances, material objects, happenings, family disputes-troubles-tensions, are like the marshy land which don't let the individual come out of them, easily. Prudence and helping others are the means, which help in cutting the bonds of ignorance-illusion-mirage. That's the reason why the Almighty considers Enlightenment-Gyan Yog-Sankhy Yog to be easier and quick means to Salvation as compared to Karm Yog. One has experienced the luxuries-comforts of this world and has heard of the comforts of the Heavens and the Brahm Lok. If one start analyzing with the help of prudence-intelligence he will be able to attain relinquishment-detachment quickly and desires-attachments-allurements-ignorance-illusion-mirage will be lost automatically. 
Bonds are of two types: Worldly and the ones related to the explanation of scriptures. Bhagwan Shri Krashn told his cousin brother Udhav Ji that the analysis-description-explanation of scriptures is motivated and each and every one has his own meaning pertaining to them. One should not be struck with the un necessary debate and concentrate over the Almighty only.  

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला। समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥2-53॥‍
भावार्थ: जिस काल में शास्त्रीय वचनों से विचलित तेरी बुद्धि निश्चल हो जायेगी और परमात्मा में अचल हो जायेगी, उस काल में तू योग को प्राप्त होगा। (-भाँति-भाँति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तेरी बुद्धि जब परमात्मा में अचल और स्थिर ठहर जाएगी, तब तू योग को प्राप्त हो जाएगा अर्थात तेरा परमात्मा से नित्य संयोग-विलय हो जाएगा) 
संसार में धर्म के नाम पर पाखण्ड व्याप्त है और शास्त्र की अलग-अलग व्याख्या प्रचलित हैं। आपसी मतभेद-पद्धति पर टकराव है, जो कि किसी भी जिज्ञासु को गुमराह करने की लिए पर्याप्त है। शैव और वैष्णव का विवाद, कर्म, ज्ञान और भक्ति योग की श्रेष्ठता का विवाद, कौन ज्यादा विद्वान है या श्रेष्ठ है, इसका विवाद अन्तहीन हैं। इससे बाहर आने का रास्ता है:विवेक पूर्वक अपना कर्म करो और परमात्मा में ध्यान-मन लगाओ। परमात्मा में मन-ध्यान लगते ही शेष सब छूट जायेगा। उसका आश्रय ग्रहण करने के बाद सभी कुछ वही देखता है। बुद्धि स्थिर होने पर योग होता है।  कर्म योग, ज्ञान-सांख्य योग से अभेद और भक्ति योग से अभिन्नता होती है। मार्ग भले ही कोई भी हो साध्य-उद्देश्य केवल एक ही हो, परमात्मा की प्राप्ति।
The moment your wisdom-brain-mind is fixed-stabilized in the Almighty, discarding the endless-useless discussions-debates of the scriptures, you will assimilate in him (-you will attain perennial Yog-Sayujy Mukti).
Hipocracy-dissimulation prevails in the society in the name of religion-Dharm. Impostors-thugs rules the thoughts of the devotees. All sorts of mindless-foolish dictates are heard every now and then. People start worshiping impostors and get confused. Differences between the fraudulent create clashes. People get divided. One follows the Shaev Mat while the other start following the Vaeshnav Sampraday. One says the Karm Yog is best and the other claims the superiority of Gyan Yog. Then there is the third front which pretends for Bhakti Yog. The obvious reason behind this all is insufficient knowledge, lack of understanding and above all absence of devotion to God. Only pretension-no devotion. You want to achieve the Almighty: Do your duty with devotion-dedication-perfection, utilizing the prudence, while setting your eyes over the Ultimate the God. If you are meditating, roaming-wandering as a recluse-sage, performing sacrifices or devoted to asceticism, set your eyes to only him, none else. Forget rest and you will certainly achieve assimilation in God.
You only need to stablize-train your brain-mind into him. Both Karm Yog and Gyan Yog remove the distinction-differentiation. Bhakti Yog removes the duality of identity. Whatever path you choose, your goal should be the God. 

गीता महत्व<<*>>श्रीमद्‍भगवद्‍गीता<<*>>अथ द्वितीयोऽध्यायः सांख्ययोग

( स्थिरबुद्धि पुरुष के लक्षण और उसकी महिमा)
अर्जुन उवाच:
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥2-54॥
भावार्थ:  अर्जुन ने प्रश्न किया-हे केशव! समाधि में स्थित परमात्मा को प्राप्त हुए स्थिर बुद्धि पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?
समाधिस्थस्य: उस व्यक्ति के लिये आया है जो कि परमात्मा को प्राप्त कर चुका है।ज्ञान योगी को प्राय: साधन अवस्था में ही  उपरति हो जाती है। सिद्ध अवस्था में वह कर्मों से उपराम हो जाता है। भक्तियोगी साधक की भी साधन अवस्था में जप, ध्यान, सत्संग, स्वाध्याय आदि भगवत्सम्बन्धी कर्म करने में रूचि होती है। सिद्ध अवस्था में भगवत्सम्बन्धी कर्म विशेषता से होते हैं। ज्ञान योगी और भक्ति योगी की साधन और सिद्ध अवस्था में अन्तर आ जाता है। पर कर्म योगी की साधन और सिद्ध अवस्था में अन्तर  नहीं आता। उसका दोनों अवस्थाओं में कर्म करने का प्रवाह ज्यों का त्यों चलता रहता है। स्थितप्रज्ञस्य: ऐसा साधक-सिद्ध पुरुष eजो कभी विचलित नहीं होता-जिसकी  बुद्धि-प्रज्ञा स्थिर है। 
Arjun questioned: Hey Keshav! What are the characteristics of the person in the state of staunch meditation, with stable mind (-Sthit Pragy-steady wisdom)? How does the person with steady wisdom behave: speak (-talk and converse), sit and move-walk?
Smadhist-stanch meditation, is the term used for one who has attained the Ultimate. The Sankhy Yogi is detached in early stages and matures-attain equanimity with the Karm.  The Bhakti Yogi takes interest in recitation of prayers, meditation, religious conglomerations-discourses, self studies, and the deeds pertaing to the Almighty. He perform the deeds with perfection in a state of accomplishment. Differences creeps into the two stages preparation stage where he utilizes various methods-procedures and the state of accomplishment of the Gyan Yogi & the Bhakti Yogi. No differentiation occur between the two stages i.e., preparedness and the accomplishment. His flow of deeds continues as such. Sthiprigysyh-the Sadhak-desirous-performer-devotee-accomplished who never feel disturbed. His intellect-prudence is stable.
प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌। आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥2-55॥
भावार्थ: श्री भगवान्‌ ने कहा-हे अर्जुन! जिस काल में साधक मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं का भली भाँति त्याग देता है और अपने-आप से अपने-आप में सन्तुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ-बुद्धि कहा जाता है। 
संतुष्टि की अवस्था में  लिये भक्तियोग में भगवान के सिवाय कुछ शेष नहीं है। सिद्धावस्था में वह सभी प्रणियों से द्वेषरहित हो जाता है। ज्ञानयोग में वह स्वयं को गुणों से सर्वथा असंबद्ध और निर्लिप्त देखता है। सिद्धावस्था में वह सम्पूर्ण गुणों से अतीत हो जाता है। कर्मयोग में वह कामना का त्याग करता है और सिद्धावस्था में सम्पूर्ण कामनाओं का त्याग कर देता है। 
कामना मन में आती-जाती रहती है इसका स्थाई अंग नहीं है, परन्तु हम उसे अपनी मान लेते हैं। इनके त्याग से ही संतुष्टि का आ जाता है। मनुष्य चाहे तो बल पूर्वक इन्हें छोड़ सकता है। इस स्थिति में वो स्थिरबुद्धि  है। कर्मयोगी सिद्धावस्था में जो कर्म करता है वे उसे दूसरों के लिए आदर्श बना देते हैं। वह कर्म करते हुए भी निर्लिप्त रहता है और निर्लिप्त होते हुए भी कर्म करता है। संमता की प्राप्ति के लिये बुद्धि की स्थिरता बहुत जरूरी है। मन को परमात्मा में एक निश्चय के साथ स्थिर करने वाले को उसकी प्राप्ति हो जाती है। 
The Almighty addressed to Arjun! The period during which the practitioner rejects all his desires-motives and remain content-satisfied within himself, with himself, he is called recognized as stable-stabilized.
When the devotee is satisfied-content during the course of Bhakti Yog, he has nothing except the God. In a state of accomplishment, he becomes free from prejudices-envy; from all organism. Practice of Gyan Yog-enlightenment detaches him from all characteristics-qualities. Accomplishment, makes him free from all characteristics. He becomes free from all desires-motives in Karm Yog and in a state of accomplishment, he overcome-losses all desires-needs-requirements.
Desires are not a permanent feature of the brain. They keep on pouring, changing and eliminating. They may be satisfied or remain as such. Due to this nature, they a do not belong to the brain-mentality. Their rejection brings satisfaction. One can keep them away, forcefully. One who controls them-rejects them-conquer them; attains a stable state of mind. The Karm Yogi performs during the state of accomplishment as well, which makes him an ideal for others. He perform and remain detached and alternatively, he detaches and keep performing. Equanimity is essential for stability of mind. One who has only one aim-the Almighty, achieves his goal.

दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥2-56॥
भावार्थ: दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग-दुःख नहीं होता और सुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में स्पृहा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोध से सर्वथा नष्ट हो गए हैं, ऐसा मनन शील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है।
अर्जुन का प्रश्न क्रियाओं की प्रधानताओं को लेकर था। भगवान ने क्रिया में भावना को प्रधान बताया, क्योंकि भाव बदलने से क्रिया बदल जाती है। कर्म योगी में उद्वेग इसलिए नहीं होता, क्योंकि वह आसक्ति, ममता, कामना, कर्मफल, निन्दा, मान-अपमान, बाधा-प्रतिकूलता के प्रति समान भाव-दृष्टि रखता है। उसे सुखों, आदर-सम्मान, प्रशंसा, अनुकूलता से कोई फर्क नहीं पड़ता। राग-द्वेष भय और क्रोध के कारण हैं। काम-वासना-आसक्ति आशा-लोभ-तृष्णा भी राग के स्वरूप ही हैं। भगवान ने स्थिरबुद्धि को मुनि कहा हैं क्योंकि यहां वाणी संयम-मौन की प्रधानता है। वह मननशील है क्योंकि विचार करके ही बोलता है अन्यथा नहीं। 
The thoughtful, who is free from worries-never disturbed on receiving pains and never delighted by the pleasures having lost attachment, fear and anger is a stable minded. 
Arjun's query was with respect to the importance of deeds-works-performances. Almighty clarified that the idea-thought behind an endeavor is important. The feeling behind an activity modifies the result as a sin of virtue. The Karm Yogi remains un perturbed due to the lack of attachment, affections-bonds-ties, output-result, defame, criticism,  honor, insult, difficult circumstances, preferences, since he has attained equanimity-stability of intelligence-mind. He is equally neutral towards favorable situations, fame, appreciation, comforts. Attachments, fear and anger-fury-anguish do not create tensions-worries for him. Sensuality-sexuality-lust-passions, allurements, hope, greed-thirst-desires are different forms of a attachments. The Almighty considers a stable person to be Silent: Muni-one who speaks only when essential and only after weighing the pros & cons of his statements. He analysis the situation prudently before uttering any thing.

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌। नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2-57॥
भावार्थ: सर्वत्र आसक्ति रहित हुआ, जो मनुष्य किसी शुभ या अशुभ वस्तु को प्राप्त होकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है।
जो व्यक्ति समाज में रहकर, अपने दयित्वों को पूरा करते अथवा ना पूरा के पाते हुए भी निर्लिप्त-असंबद्ध-अविचलित है, वो स्थिर बुद्धि है। उसे मान-अपमान, राग-द्वेष, स्नेह-घृणा-ईर्ष्या परेशान नहीं करते वो स्थिर बुद्धि है। जो धन सम्पत्ति, सुख-दुःख, विपदा में एकसार है वो स्थिर बुद्धि है। उसे किसी चीज की चाहत भी नहीं है। उसके ऊपर अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं करतीं वो स्थिर बुद्धि है। साधना हुई या नहीं हो पाई उसके लिए चिंता का विषय नहीं है। अच्छाई-बुराई, भला बुरा उसके लिए महत्वहीन हैं। वह विवेकशील है। उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित, एकरस, एकरूप है। वह परमात्मा में अचल-अटल है।  
One who is detached from all places-events-goods-pleasures-pains, bonds-ties, allurements, do not feel pleasure, pain or envy by receiving-attaining any auspicious or inauspicious good has a stable mind-intelligence.
One who stays in the society-family, fails or succeed in carry out his responsibilities, is undisturbed-perturbed-detached, has a stable-balanced mind. He remains as such with or without love-affections-relationships, in honor or abuse-dishonor-insult or attachments-hate-envy, is balanced headed. He who is unilateral-neutral with wealth-property, pleasure-pain, adverse situations-hardships-troubles-tensions-tortures, is a stable person. He does not desire for any thing. He has been able to meditate or not, could pray to God or not, are not the matter of worry-consideration-anxiety-thought-reflection-concern-apprehension. Such things-events are insignificant for him. Holiness or sinfulness are not the matters of disruption for him. He is a thoughtful-prudent person. His brain is mature-tuned-unilateral-unidirectional-dedicated to the Almighty. He is undifferentiated fro the Ultimate-eternal. He has attained equanimity.

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वश:। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2-58॥ 
भावार्थ: और कछुवा सब ओर से अपने अंगों को जैसे समेट लेता है, वैसे ही जिस समय यह कर्मयोगी इन्द्रियों के विषयों से इन्द्रियों को सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। 
कर्म योगी तो तुलना कछुए से की गई है क्योंकि जब वह चलता है उसे 6 अंग दृष्टिगोचर होते है-4 पैर, मुँह और पूँछ। इसी प्रकार जब कर्म योगी स्वयं को इन्द्रियों की क्रियाओं से खींच लेता है तो 5 इन्द्रियाँ और छटा मन  को वश में कर लेता है। इसका तातपर्य यह है कि मनुष्य को कछुए के समान इन्द्रियों और मन का सदुपयोग भगवान के ध्यान-समाधि-भजन-मनन-स्वाध्याय हेतु करना चाहिये।  
इन्द्रियों के विषयों से हटने पर योगी स्वतःसिद्ध परमात्म तत्व का अनुभव करता है, जो कि काल की सीमाओं से परे है। 
The brain-intelligence-wisdom of the Karm Yogi becomes stable when he pulls his senses from the worldly comforts-passions-sensualities, like a turtle. 
When the turtle moves his 4 legs, head and the tail are visible. The action of the Karm Yogi is compared to the turtle, since the Yogi controls his senses 5 in number and the mun-mood-desires, numbering 6. This implies that the Karm Yogi-devotee should perform-utilize his senses, organs and the mun-mood-desires for the sake of meditation, recitation of verses dedicated to the God-self study-learning-understanding of scriptures-literature-philosophy. When the devotee successfully deviate his energies from the sensualities, he realizes the presence of the Almighty in his surroundings. This feeling of this nearness is beyond the limits of time.

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥2-59॥ 
भावार्थ: निरहारी-इन्द्रियों द्वारा विषयों से हटाने वाले मनुष्य के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु रस निवृत नहीं होता। परन्तु परमात्म तत्व के अनुभव होने से इस स्थितप्रज्ञ मनुष्य का रस (-चस्का, शौक) भी निवृत हो जाता है-उसकी संसार में रस बुद्धि नहीं रहती। 
निराहार व्रत-उपवास, भोजन की अनुपलब्धि, बीमारी, अजीर्ण जैसे कारणों से होता है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान आदि के द्वारा इन्द्रियों को विषयों-भोजन आदि से हटा लेना आसान है; परन्तु उसकी इच्छा-लालसा-रस-रूचि का त्याग करना आसान नहीं है। नश्वर रस जड़ता, अभाव, शोक, रोग, भय, उद्वेग आदि विकार उत्पन्न करते हैं। जब तक लालसा बनी रहेगी तब तक रसबुद्धि की निवृति नहीं होगी। स्थिरप्रज्ञ-तीव्र वैरागी-विचारशील परमात्मतत्व का अनुभव कर लेता है और उसकी बुद्धि स्वतः भ्रमजाल से मुक्त हो जाती है। निष्काम भाव के आते ही राग, कामना, सुखेच्छा से मनुष्य मुक्त हो जाता है। कर्मयोग में सेवा-कर्म रस, ज्ञान योग में  अनुभव का रस और भक्ति योग में भक्ति प्रेम-रस प्राप्त होते हैं। 
One who is fasting has pulled the sensualities from the worldly affairs but his interest-taste-unsatisfied desires remain as such. Once he has realized the gist of the Ultimate, all his needs are rectified-satisfied-contentment is achieved.
One may be hungry due to fasting, non availability of food, illness-indigestion etc. Its easy to channelize-divert the desire for food but its not so easy to forget the taste-need-desire-happiness-satisfaction received by consuming-relishing food. These faculties create defects like dullness-idiocy, scarcity, sorrow-pain, fear, anxiety. The desire for food-taste-greed will remain till satisfaction-contentment, does not arise. One-the stabilized-relinquished-prudent, who has realized the gist of the Ultimate; find his brain-intelligence free from such illusions. Equanimity-lack of desires-expectations  releases him from attachments-ties-bonds, desire for comforts-pleasures-achievements etc. Karm Yog grants the taste-happiness from service of the down trodden-devotees, Gyan Yog awards the happiness by virtue of enlightenment-experiences, and the Bhakti Yog fills the devotee with the extreme-Ultimate pleasure-Permanand. 

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥2-60॥ 
भावार्थ: हे अर्जुन! आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इन्द्रियाँ यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलात्‌ हर लेती हैं। 
प्रमथनशील-उत्तेजित होने वाली-चंचल स्वभाव की इन्द्रियाँ ऐसे पुरुष के मन को भी बलात हर लेती हैं(-चस्का, शौक लग जाता है) जो कि प्रयत्नशील, साधक, हर काम को विवेकपूर्वक करने वाला, आसक्ति व फलेच्छा से दूर, दूसरों का हित करने-सुख पहुंचने वाला, कल्याण करनेवाला, स्वयं कर्तव्य-अकर्तव्य, सार-असार का ज्ञाता, कौन-कौन से कर्म करने चाहिये और उनका परिणाम जानने वाला विद्वान है। जब  तक उसके बुद्धि सर्वथा परमात्मतत्व में प्रतिष्ठित नहीं होती तब तक बुद्धि में संसार की सत्ता बनी रहती है और विषय सम्बन्धी सुखों के संस्कार बने रहते हैं। इन्द्रियाँ ऐसे विवेकशील-बुद्धिमान को भी बेबस-विचलित कर देती हैं। 
Hey Kauntay-Arjun! Failure to control-restrain the sense organs, leads to overpowering of the enlightened-intelligent person by the sensualities-attachments-allurements, as they exercise tumultuous pull over him.The sense organs are prone to excitement, be it a person who make efforts to control them, a devotee, one who is prudent, detached and away from the desire of the reward of industry, ready to help others, providing  comfort-solace-welfare to others-the needy-down trodden, blessed with the understanding of do's and nots, aware of the gist and futility of the world, which deeds have to performed and which are to be rejected and the result-out come of them. Till his intelligence is fully devoted-immersed in the Almighty, there is every possibility-likelihood of his being lured by the sensualities leading to repeated births and rebirths.Sense organs are capable of distracting even the most prudent-intelligent-learned-philosopher-self controlled person.

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2-61॥
भावार्थ: इसलिए कर्मयोगी साधक को चाहिए कि वह उन सम्पूर्ण इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे, क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती हैं, उसी की बुद्धि स्थिर हो जाती है।
जातक इन्द्रियों को वश में करके समर्पण की भावना से भगवान का स्मरण कर ताकि उसे अभिमान-गरूर न हो। गरूर उन्नति में बाधक है। यह भगवत्कृपा ही है जो कि साधक-जातक को किसी भी प्रकार से विचलित नहीं होने देती। भगवत परायण ही भगवत्कृपा का अधिकारी होता है। उसमें मैंपन-अहंकार का नाश होना जरूरी है। यहाँ एक बात स्पष्ट है कि इन्द्रियों में रस प्रवृति-भाव का नष्ट होना स्थिर प्रज्ञता प्रदान करता है। इन्द्रियों का विषयों से और मन का रस से सम्बन्ध नष्ट हो गया साधक स्थिरप्रज्ञ हो ही जायेगा। भक्ति, वैराग्य, ज्ञान, चिंतन, मनन स्वतः स्थिरप्रज्ञता प्रदान कर देते हैं। 
The Karm Yogi Sadhak-practitioner-devotee should control the sense organs, stablize his thoughts, ideas & mood and start meditations-asceticism, concentrate-dedicate in the Almighty to have a stable mind.
Individual-devotee has to control his sense organs and concentrate-devote himself to the Almighty to eliminate the pride-ego, which is a prime factor which obstruct the attainment of stability of the brain-mind-intelligence. The primary factor which help him is attaining stability-perfection is the mercy-kindness-love of God.One who is dedicated to God and seek asylum-shelter under him is entitled for the love of God. The feeling of me-mine-myself-id-ego-super ego, must vanish-eliminate. Loss of taste for the sensualities-passions-desires is essential for stability. Detachment of sense organs from the world and interest in sensualities simultaneously, makes the individual stationary-inertial-strongly attached to the God. Bhakti-dedication, detachment, prudence, thinking-analyzing, knowledge  are essential to award him with unilateral-unidirectional mind peeping-seeking God.

ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते। संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥2-62॥
क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥2-63॥
भावार्थ: विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अत्यन्त मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है, स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि अर्थात ज्ञानशक्ति का नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है। 
परमात्म चिंतन के अभाव मनुष्य विषयों का चिंतन करने लगता है। विषयों का चिंतन उसे राग, आसक्ति, प्रियता, वासना, सुख-आराम, घर-संसार में उलझा देता है। यह स्वभाविक है कि सांसारिक वस्तुओं का चिंत्तन लालसा-कामना पैदा करेगा। अब अगर कामना पूर्ति होती रहे तो लोभ-लालच पैदा हो जायेगा, भूख बढ़ती ही जायेगी।  इन सब में अगर कोई कमी रह गई तो क्रोध होगा ही होगा। मनुष्य में वर्ण, गुण, अच्छाई, योग्यता, आश्रम, धन-सम्पत्ति, सत्ता, आदर, सम्मान की इच्छा की लोभ-लालच की उत्पत्ति करती है और अभिमान-अहं भी पैदा करते है। इनकी पूर्ति न होने पर भी क्रोध उत्पन्न होता है। 
क्रोध से सम्मोहन और मूढ़ता-पशुवृति उत्पन्न होती है। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह-ममता सम्मोहन के कारण हैं। विवेक के अभाव में काम  के वशीभूत व्यक्ति जघन्य पाप कर बैठता है। क्रोधावस्था में वह किसी का भी अपमान-तिरस्कार कर देता है। लोभ-लालच सत्य-असत्य, धर्म-अधर्म, सही-गलत को नहीं देखता। ममता समभाव को नष्ट कर पक्षपात उत्पन्न कर देती है। क्रोध से उत्पन्न हुई मुढ़ावस्था में सोचने समझने की शक्ति-याददाश्त-विवेक नष्ट हो जाता है। यही वह अवस्था है जब व्यक्ति अपने पतन को प्राप्त होता है। जो प्रभु-भक्ति परायण है उसको यह सब कुछ सहना-देखना नहीं पड़ता।
कामना रजोगुणी व सम्मोह तमोगुणी वृति है। क्रोध इन दोनों के बीच की वृति है। बात कोई भी हो यदि क्रोध आया तो उसके पीछे राग अवश्य होना चाहिये।  
One who thinks of the worldly comforts-passions-sensualities, develop a taste attachment for them creating desires. Hindrances-distraction in their attainment causes anger-fury, resulting in loss of understanding-thinking-rationality & developing stupidity-illusion, generating confusion-mix up in the memory-bewilderment, leading to loss of intelligence-knowledge-enlightenment-learning. Loss of intelligence-wisdom degrades a person leading to his down fall. 
In the absence of devotion to God, one start thinking of worldly comforts-passions-sensualities-sexuality-attainments-goal targets-ambitions. It indulges him into the desires for a variety of achievements-attainments-over expectations. Till one continues getting success his greed will continue growing, leading to loss of contentment-satisfaction. Any obstacle-hindrance will result in anger-fury-distraction. Man expect praise for his high caste, position-status, achievements, respect-honor, which too grows greed for such things-titles. Its results in ego as well. Failure to get appreciation-praise-flattery annoy him. The pessimism-disappointment-lack of hope results in anger. 
Anger-fury generate stupidity-foolishness-idiocy-irrationality-loss of wisdom-animal instincts. There is a loss of prudence-capability to judge-analyze-think-meditate and one becomes victim of his desires-ventures-ambitions. He is prone to commit any crime-sin. He fail to realize his folly. He is prone to insult-quarrel , disdain-disrespect-censure-reproach-scolding any one. Greed make him blind to the truth-reality & falsehood, right-wrong, virtues-sin. This is the state, when he sure to face down fall. How ever, one who is devoted to God, remain free from all such troubles-tensions.
Desires lead one to repeated cycles of birth and rebirth as a human being. Illusion-allurements will make him obtain punishment as a resident of hells and on being released from them, he will take birth in low species like insects-animals. Anger will make him vibrate-swing between the two. He will have to take birth as a human being and animal as well.

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌। आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥2-64॥
प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥2-65॥
भावार्थ: परंन्तु अपने अधीन किए हुए अन्तःकरण वाला कर्मयोगी साधक अपने वश में की हुई, राग-द्वेष से रहित अपने वश में की हुई इन्द्रियों द्वारा विषयों सेवन करता हुआ, अन्तःकरण की निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। अन्तःकरण की निर्मलता प्राप्त होने पर साधक के सम्पूर्ण दुखों का नाश हो जाता है और ऐसे साधक की बुद्धि निःसंदेह बहुत जल्दी परमात्मा में स्थिर हो जाती है। 
विषयों के चिन्तन करने मात्र से पतन-बुद्धि का नाश हो जाता है, क्योंकि उसमें राग-लिप्सा-चस्का-शौक है और आसक्ति रहित विषयों के सेवन से उत्थान होता है। राजा जनक अनासक्त थे, राजकाज करते थे, परन्तु उनका जीवन एक सन्यासी-जीवन्मुक्त के समान था। 
साधक-कर्मयोगी का अन्तःकरण वश में रहना चाहिये। इन्द्रियों से विषयों का  ग्रहण करना राग पूर्वक न हो व विषयों का त्याग  द्वेष पूर्वक न  हो।  इससे अन्तःकरण की प्रसन्नता-स्वच्छता प्राप्त होगी। यह मानसिक तप है जो  कि   शारीरिक और मानसिक तप से ऊँचा है। चित्त की प्रसन्नता प्राप्त होने से राग-द्वेष-दुःख का नाश होता है। खिन्नता का नाश होने से सुख की  लिप्सा भी नहीं रहेगी। प्रसन्नता मनुष्य को बहुत जल्दी परमात्मा में स्थिर कर देती है। 
The Karm Yogi-practitioner who has controlled his inner self free from attachments-envy-hatred with the senses under his control, attains the purity of his inner self. Attainment of the purity of the inner self leads to loss of all pains-grief of the practitioner and his brain becomes stable-concentrated in the Almighty.
Thinking-desires for worldly pleasures-comforts leads to down fall-loss of talent-intelligence, since aided by attachment-extreme greed-vanity and to be detached while experiencing the pleasures-pains will raise the person-one from this world-Lok-abode. King Janak was detached. He ruled the state as a common man without enjoying the facilities available to him like a saint.
The inner self own self of the Karm Yogi-practitioner should be under his control.The utilization-acceptance of facilities should be t habit formation-detachment. Rejection should not be due to bias-hatred-non acceptance-envy. This will provide the practitioner pleasure-happiness of the inner-own self paying way in liberation which is far more superior to the physical and mental asceticism-meditation.When one experience pleasure all his evils are lost-displeasure is lost-happiness prevails and he qualifies for Permanand the Ultimate pleasure, nothing is there beyond this.

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना। न चाभावयतः शान्तिर-शान्तस्य कुतः सुखम्‌॥2-66॥
भावार्थ: जिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं (-योग रहित हैं) की निश्चयात्मिका-व्यवसात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त पुरुष में निष्काम भाव अथवा कर्तव्य-परायणता का भाव नहीं होता, निष्कामभाव न होने से उसको शांति नहीं मिलती. फिर शांति रहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है ?
विवेक पूर्वक इन्द्री संयम-कर्मयोग के बगैर कामना नष्ट नहीं होती और बुद्धि स्थिर नहीं होती। मेरे को केवल परमात्म प्राप्ति ही करनी है, ऐसी निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती। उसमें कर्तव्य का पालन, फल की इच्छा, कामना, आसक्ति, आदि के त्याग की भावना भी नहीं होगी। जिसका कारण है, अपना ध्येय स्थिर न होना। अपने वर्णाश्रम धर्म कर्तव्य के पालन में दृढ़ता न रहने ही अशांति पैदा होती है। और जो अशांत है वो सुखी हो ही नहीं सकता। 
One who's sense organs are not under control, lacks assertiveness-single mindedness-firmness of intellect; is devoid of  contemplation-selflessness or commitment to duty  and the possessor fails to achieve peace, which in turn fail to provide happiness-pleasure to him.
Karm Yog involves the control of the sense organs prudently, which is essential for the loss of desires. Such possessors lack the determination to attain Salvation-the Ultimate-Liberation-Assimilation in the Almighty. They do not possess the feeling-determination for carrying out duties-Vernashram Dharm, rejection of the desire for reward, attachment. The main reason behind this is the lack of  firm determination-decision pertaining to goal-the Almighty. Failure to carryout own Vernashram Dharm-duties  create displeasure. One who is disturbed can never be happy. 

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते। तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥2-67॥
भावार्थ: क्योंकि अपने-अपने विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों से संयुक्त होकर मन बुद्धि को वैसे ही हर लेता है, कि जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु।
मनुष्य जब भी कार्य-कलापों में व्यस्त होता है उसकी इन्द्रियाँ स्वछन्द धोड़े की तरह अपने अनुकूल वस्तु-पदार्थ को तलाशती रहती हैं। उनके मिलने पर वे उसी में रम जाती हैं-सुख प्राप्त करती हैं। एक अकेला विषय ही मन को भटकाने के लिए काफी है। अब कर्तव्य परायणता का स्थान भोग बुद्धि ले लेती है। भोग बुद्धि मनुष्य की निश्चयात्मक बुद्धि जो भगवान् के श्री चरणों में लगनी चाहिए थी वह भोग-विलास में लग जाती है। जिस नौका में खेवनहार-नाविक, इंजन नहीं होते उसके भटकने-हवा की दिशा में बहने-चलने में देर नहीं लगती। वह उलटी दिशा में भी चली जाती है या लगातार इधर-उधर डोलती-डगमगाती रहती है। अगर वायु का वेग प्रबल हो तो नौका के डूबने में भी समय नहीं लगता।
इन्द्रियों से मन और मन से बुद्धि बलवान है। अगर बुद्धि शुद्द है परमात्मा में तल्लीन है तो उसे न तो मन और ना ही इन्द्रियाँ भटका सकती हैं।  
Sense organs have the tendency to roam  freely in all possible directions in search of the objects which can quench their thirst-satisfy them-temporarily. The sense organs when associate them selves with the mind, it takes over the intelligence (-prudence) captures-shadowed-taken over-seizes it, just like the air which takes control over the boat in water.
As and when, one begins with work, his sense organs start moving freely like a horse without reins. The senses looks for the related objects of their choice. Success in it create bonds-ties-attachments with them. The man start rejoicing-taking interest in them, forgetting the goal for which he took the birth as a human being. His attention is diverted. He is a confused person now. He was to seek asylum-shelter under the God. He has lost the way. He has become one playing the snake and ladder game. He is comparable to the boat which is present in the open sea, away from the shore, without the navigator, sailors, magnetic compass, and the engines have of-course failed. The wind gains speed. Now the fate of the boat is uncertain. It may lead in an opposite direction or sink in a whirl. It may not be able to reach the shore, at all.
The intelligence (-prudence, judicious thinking) is mightier than the mood-will and the will-mood-mind is stronger than the sense organs. One who's brain is concentrated in the Almighty is sure to succeed, sail in the ocean of life.

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्-तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥2-68॥
भावार्थ: इसलिए हे महाबाहो! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के विषयों में सब प्रकार से वश में की हुई हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है। 
जिसका मन और इन्द्रियाँ संसार के आकर्षण से मुक्त हैं, उसकी बुद्धि स्थिर-निर्णयात्मक-वश में है। संसार में व्यवहार-विचरण करते हुए अथवा एकांत में चिन्तन करते हुए, जो विषयों-भोगों में प्रवृत्त नहीं होता, उसका मन इन्द्रियों के संगम के साथ भी उसे डिगा नहीं सकता। विषयों में आसक्ति-राग-खिंचाव का नष्ट होना इन्द्रियों के वश में होने का द्योतक है। साधक जब दृढ़ता से निश्चय कर लेता है कि मेरा लक्ष्य केवल परमात्मा की प्राप्ति है, भोग-विषय-संग्रह-राग-द्वेष-आसक्ति नहीं हैं; तो उसका अपने ध्येय-आराध्य-परमात्मा को प्राप्त करना तय है, क्योंकि उसकी बुद्धि निश्चित-दृढ़-स्थिर है।  
One who's mind-mood-will and the sensualities are free from the attractions-allurements of the worldly pleasures-subjects-objects, is wise-prudent with stable-steady wisdom. His mind do not deviate-tremble, while dealing with the various components of the world or when he is in isolation-solitude, his MUN-mind-mood can not deviate him. Loss of attraction towards the worldly comforts-subjects indicate his command-control over the senses. When the devotee-practitioner-ascetic determines that his aim-goal-target-ambition is to attain Salvation-the Almighty, the worldly objects can not distract him, any more. At this juncture his attainment of the Ultimate is sure-confirmed, since he has acquired control over his wishes-desires-will-mood and has stabilized in the God.

या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी। यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥2-69॥
भावार्थआत्म-विषयक जो बुद्धि सम्पूर्ण प्राणियों के लिए रात्रि के समान (-परमात्मा से विमुखताहैउसमें संयमी (आत्म-विषयक बुद्धिमें जितेन्द्रिय पुरुष जागता है और जिसमें सब प्राणी जागते हैं (-भोग और संग्रह में लगे रहते हैंवह तत्व को जानने वाला (-अनात्म-विषयक बुद्धिउस मुनि की दृष्टि में रात है। 
जिनकी इन्द्रियाँ और मन काबू में नहीं है, जो आसक्त हैं,  वे परमात्मा से विमुख-सोये हुए व्यक्ति के समान हैं। परमात्मा, तत्व ज्ञान, दुखों की प्राप्ति और संताप-जलन किस लिए है ? कर्मों का फल क्या होगा ? आदि की ओर न देखना ही सोना है। जो मनुष्य केवल खाने कमाने संग्रह-भोग, ऐशो-आराम में लगा है, वह पशु-पक्षी के समान हैं; क्योकि इनमें विवेक-चिंतन शक्ति नहीं होती। विवेक के जाग्रत होने से मनुष्य अपना और समाज का कल्याण कर सकता है, परन्तु वह इसका दुरूपयोग करता है। 
परमात्मा से लगाव दिन और विमुखता रात्रि के समान है। परमात्मतत्व को अपने स्वरूप में देखना, यथार्थ रूप से जानना, संयम से रहना, भोग और आसक्ति से दूर रहना-जागना है। अपने में मस्त, परमात्म तत्व से विमुख क्षण-भंगुर  संसार में आदर-सत्कार, मान सम्मान, लाभ-लोभ से ग्रस्त न्याय-अन्याय, किसी भी तरीके से धन बटोरने वाला, सोये हुए जैसा है। इन्द्रियों और अंतःकरण के द्वारा संसार के दिखने पर भी मननशील संयमी मनुष्य की निश्चयात्मक बुद्धि यही अटल सत्य मानती है कि संसार केवल भ्रम-मायाजाल-प्रतीतिमात्र-मृग मरीचिका है। 
The wise, keep awake while one who is distant-away from the Almighty is sleeping: busy with the collection of wealth-pleasures-comforts-enjoyment, which are comparable to night. One-the stoic, who has controlled his senses and knows the gist-nectar-elixir-basics of the God considers these worldly objects-subjects as night. 
One who's senses are not under control-disciplined, who is attached-bonded-tied with the worldly objects-subjects, is like the one who is away-distant from the God, as if he is sleeping. He is not interested in finding out the reasons behind the existence, gist-nectar-elixir-basics pertaining to God, worries-sorrows-pains-troubles-tensions-tortures. One who is busy accumulating wealth, enjoyment luxuries, believe-practice "eat-drink and be marry" is comparable to the birds and animals, since these species lack thinking-wisdom-prudence. Once the prudence-wisdom-positive wishful thinking comes to the man, he can do good for the society and the self. But in general the humans misuse this faculty. Attachment-love for the God constitutes the day and  distancing from him is night for the humans.
To identify oneself with the God and to remain disciplined-ascetic-with chastity, aloof-away from worldly subjects-objects-pleasures-comforts and rejection of attachments constitutes awakening. One who is busy with himself, devoid of the presence-existence of the Almighty, eager for honors-respect-appreciation and ready to accumulate wealth through fare and foul means, is nothing but one who is sleeping like an animal. One who has self control-firm will-determination, blessed with prudence-wisdom reasoning-thinking will consider this world-universe to be mirage-illusion-non entity-fake.  

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं-समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वेस शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥2-70॥
भावार्थ: जैसे सब नदियों का जल सभी ओर से जल से परिपूर्ण, समुद्र में आकर मिलता है परन्तु समुद्र फिर भी अपने मर्यादा-अचल प्रतिष्ठा-स्थिति बनाये रखता है, ऐसे ही सम्पूर्ण भोग पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्तपन्न किये बिना ही प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परम शान्ति को प्राप्त होता है भोगों की कामना वाला नहीं।
नदियों का बहाव कम-ज्यादा होने पर भी समुद्र अपने मर्यादा को नहीं तोड़ता-शांत रहता है। उसी प्रकार एक संयमी-निष्काम-निर्लिप्त-जीवमुक्त-जितेन्द्रिय मनुष्य भोग-विलास-आमोद-प्रमोद के अवसर प्राप्त होने पर भी उनमें अभिरुचि नहीं रखता। सुख-दुःख-कष्ट उसमें विकार उत्त्पन्न नहीं करते। स्थिर प्रज्ञ मनुष्य चेतन-नित्य-असीम-सत्य-अनन्त-परमात्म तत्व में स्थित है। संसारी भोग जड़, अनित्य, असत्, सीमित और नश्वर हैं। उसके अन्तःकरण में सांसारिक भोग पहुंचते ही नहीं। वे मनुष्य जिनमें कामना, इच्छाएँ हैं उन्हें कुछ भी कितनी ही बड़ी मात्रा में मिल जाये उनकी संतुष्टि होगी ही नहीं। वे हमेशां कुछ न कुछ पाने को लालायित रहेंगे ही। 
One, who has attained control over his sense organs, remains unperturbed-steady-calm-content-cool like the vast ocean, ful of water in each direction, on being merged with all rivers, having received all comforts-pleasures-enjoyments, without being contaminated-corrupted,  attains Ultimate-Eternal peace, not the one who is greedy of desires-sensualities-sexuality-passions.
The ocean does not breach its boundaries-limits due to the continuous-unlimited-irregular flow of water from the rivers through out the year. A stable-content person  does not find any interest in luxuries-comforts-pleasures-enjoyments. Pains-sorrow-tortures-tensions do not disturb-over come him. He is devoted to the Almighty-the eternal-ultimate, having realized the gist-nectar-elixir of it. Worldly subjects-objects do not penetrate his calm-quite-stability. Those who have ever increasing desires can never be content-satisfied with what ever they have. They always long for more. ye dil mange more-ये दिल माँगे मोर-the heart desire more unlimited quantum of every comfort-luxury-sensuality-passions.They will never be satisfied.

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः  शान्तिमधिगच्छति॥2-71
भावार्थ: जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं का त्याग करके, स्पृहा रहित, ममता रहित और अहंकार रहित  होकर आचरण करता है, वह शांति को प्राप्त होता है। 
अप्राप्त वस्तु की इच्छा कामना है और इसके त्याग के बाद शरीर निर्वाह के लिये  कहीं भी कोई भी जो आवश्यक वस्तु दिखती है, उसको स्पृहा कहते हैं। वह निर्वाह की वस्तुओं का सेवन करता है, पथ्य-कुपथ्य का ध्यान भी रखता है। स्थितप्रज्ञ व्यक्ति कामनाओं और स्पृहा का त्याग कर देता है। शरीर रहे या न रहे इसकी उसे कोई परवाह नहीं है। अर्थात वह निःस्पृहः हो गया। कामना-ममता का त्याग संसार से उसका सम्बन्ध-विच्छेद कर देता है।  उसे शरीर में मैं-पन, अहंकार  नहीं रहता। इससे उसे संतुष्टि-शान्ति का अनुभव होता है। समर्पण की भावना को लेकर जो ये सब कुछ त्याग देता है, वह परमशान्ति-परमात्म तत्व को प्राप्त कर लेता है। परमशान्ति में ही परमानन्द है। 
One who rejects-relinquish all desires, does not crave for any thing, is unattached and without pride-ego; attains peace.
Desire means longing for the goods which are not available to one. The  stable  reject all desires and the barest possible essential goods for survival. Its not that he do not use them. In fact he does not care for the survival of the body. By rejecting affections and desires, he has broken ties with the world. He is free from ego-pride, feeling of being mighty. This leads him to solace-peace-tranquility-satisfaction, which is the goal behind this human incarnation. This is in fact the Permanand-the Ultimate pleasure, one longs for. Having attained this nothing is left to be acquired-achieved-attained.

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥2-72॥
हे प्रथा नंदन अर्जुन! यह  ब्राह्मी स्थिति है जिसको पाकर  कभी भी कोई मोहित-भ्रमित नहीं हो सकता। इस स्थिति को यदि कोई अंतकाल में भी प्राप्त कर ले तो, निर्वाण-परमशान्ति-परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। 
मनुष्य की मोह-ममता, कामना, लालसा, विकार, अहंकार-घमण्ड मिट जाने से वह स्वयं-आत्मलीन-पर  ब्रह्म में स्थित-लीन हो जाता है। वह सम बुद्धि होकर संसार से अपना सम्बन्ध तोड़ लेता है। उसका अपना कोई व्यक्तित्व-पहचान नहीं रहती। उसे सत् असत् का ज्ञान हो जाता है। वह भगवान् के शरणागत हो जाता है।उसके कर्मफल पाप-पुण्य संतुलित-नष्ट हो जाते हैं। वह प्रत्येक प्राणी में परमात्मा को देखने लगता है। 
O Parth! Attainment of Brahm is the Ultimate state-stage, having achieved which, one would never be confused-lured (-there is no further delusion) by the worldly objects-pleasures-passions-sensualities. Even if one reaches this stage at the end of his life, he too attain the Ultimate-Moksh-Salvation. 
One gets assimilated-absorbed in the Ultimate-the Almighty-The Par Brahm Parmeshwar, when his illusion-attachments-desires-defects-ego-pride-evils-vices sensualities-passions are lost. He is stabilized in himself-the God. He attains equanimity with him self, God & the organisms-creatures-living beings, living & non living, sins and virtues, life and death.He has realized himself. He has lost his identity.He knows the truth and virtuality. He is under the protection-shelter-asylum of the God. His sins and virtues have either attained equilibrium or neutralized or summarily lost.

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगो नाम द्वितीयोऽध्यायः॥2॥
ॐ, तत्,सत्! इस प्रकार ब्रह्मविद्या का योग करवाने वाले शास्त्र, श्रीमद्भगवद्गीता रूपी उपनिषतद्  में भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन के संवाद रूपी सांख्य योग नाम वाला दूसरा अध्याय सम्पूर्ण हुआ। 
Om, Tat,  Sat! This is how the dialogue-conversation between Bhagwan Shri Krashn and Arjun, which enlightened the devotee (-Arjun) with the Brahm Vidya-The Ultimate Knowledge-reality-truth, through the Second Chapter of Srimad Bhagwad Gita-an Upanishad to unify one with the Almighty.


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