Sunday, October 26, 2014

APHORISM :: SUBHASHITANI (2) सुभाषितानि :: अन्तःकरण प्रबोधः

APHORISM :: SUBHASHITANI (2) 
सुभाषितानि :: अन्तःकरण प्रबोधः
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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एक एव सुहृद्धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः। शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यद्धि  गच्छति॥मनु स्मृति 8.17॥
एक धर्म ही ऐसा मित्र है जो मरने पर भी साथ जाता है  और अन्य पदार्थ शरीर के साथ नष्ट हो जाते हैं। 
The ethics (Dharm, virtues, righteousness, piousity) is the only friend which accompany the soul even after death in next incarnation and  all other materials are lost-parish with the body.
पादोऽधर्मस्य कर्तारं पादः साक्षिणमृच्छति। पादः सभासदः सर्वान्पादो राजानमृच्छतिमनु स्मृति 8.18॥
अधर्म का चौथा भाग अधर्म करने वाले को, चौथा भाग साक्षी को, चौथा भाग सभासदों को और चौथा भाग राजा को प्राप्त होता है। 
Each of the doer of the crime-sin, the witness in favour of the doer, the judges-council members-jury who pass judgement in favour of the guilty and the king get one fourth of the guilt.
In this manner the king in whose empire injustice prevails is sure to achieve hells.
राजा भवत्यनेनास्तु मुच्यन्ते च सभासदः। एनो गच्छति कर्तारं निन्दाऽर्हो यत्र निन्द्यते॥मनु स्मृति 8.19॥
 जिस सभा में निंदनीय व्यक्ति की निंदा होती है, वहाँ राजा पापभागी नहीं होता और सभासद भी पाप से मुक्त होते हैं, किन्तु पाप करने वाले को ही पाप का फल भोगना होता है। 
The court-council-jury which punishes, condemn-reproach the guilty (the perpetrator of the crime) remain free from the sin-guilt, along with the king.
समर्पणादहं पूर्वमुत्तमः किं सदा स्थितः। का ममाधमता भाव्या पश्चात्तापो यतो  भवेत्॥
प्रभु को समर्पण से पहले क्या मैं सदा अच्छी स्थिति में था ? फिर अपनी अधमता का क्या विचार करना, जिससे पश्चात्ताप हो। 
सत्यसंकल्पतो विष्णु-र्नान्यथा तु करिष्यति। आज्ञैव कार्या सततं स्वामिद्रोहोऽन्यथा भवेत्॥
सत्य संकल्प श्रीविष्णु निश्चय ही कुछ गलत नहीं करेंगे, अतः निरंतर उनकी आज्ञा का पालन ही कर्त्तव्य है, उनके विपरीत कुछ करना उनसे द्रोह करना होगा।
सेवकस्य तु धर्मोऽयं स्वामी स्वस्य करिष्यति। आज्ञा पूर्व तु या जाता गंगासागरसंगमे॥
सेवक का यही निश्चित धर्म है, शेष स्वामी स्वयं करेंगे। गंगा और सागर के संगम पर पूर्व में जो आज्ञा हुई थी।
यापि पश्चान्मधुवने न कृतं तद्द्वयं मया। देहदेशपरित्यागः तृतीयो लोकगोचरः॥
और जो आज्ञा बाद में मधुवन में भी हुई थी और मेरे द्वारा जिन दोनों का पालन नहीं हुआ था, वे थीं :- शरीर, स्थान और दिखाई देने वाले इस संसार का त्याग।
 पश्चात्तापः कथं तत्र सेवकोऽहं न चान्यथा। लौकिकप्रभुवत्कृष्णो न द्रष्टव्यः कदाचन॥
इसमें पश्चात्ताप क्या करना, मैं तो केवल उनका सेवक ही हूँ। भगवान् श्री कृष्ण को कभी भी सांसारिक व्यक्ति के तौर पर नहीं देखना चाहिए।
तथा देहे न कर्तव्यं वरस्तुष्यति नान्यथा। लोकवच्चेत्स्थितिर्मे स्यात्किं स्यादिति विचारय॥
उसी प्रकार इस शरीर के साथ नहीं करना चाहिए अन्यथा प्रभु प्रसन्न नहीं होंगे। यह विचार करो कि यदि इस लौकिक दृष्टि से मुझे परखा जाए तो मेरी स्थिति क्या होगी।
अशक्ये हरिरेवास्ति मोहं मा गाः कथंचन। इति श्रीकृष्णस्यदासस्य वल्लभस्य हितं वचः।
चित्तं प्रति यदाकर्ण्य भक्तो निश्चिन्ततां व्रजेत्॥nnnnnnnnnnnnnnnn
मुश्किल स्थितियों में केवल श्रीहरि ही मेरे हैं और मुझे किसी प्रकार मोह न हो। श्रीकृष्ण के दास वल्लभ के इन हितकारी वचनों को मन में धारण कर भक्त को निश्चिन्त होकर रहना चाहिए।
वेदो नित्यमधीयताम्, तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां, तेनेशस्य विधीयताम-पचितिकाम्ये मतिस्त्यज्यताम्।
पापौघः परिधूयतां भवसुखे दोषोsनुसंधीयतां, आत्मेच्छा व्यवसीयतां निज गृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम्॥
वेदों का नियमित अध्ययन करें, उनमें निर्देशित (कहे गए) कर्मों का पालन करें, उस परम प्रभु के विधानों (नियमों)  का पालन करें, व्यर्थ के कर्मों में बुद्धि को न लगायें। समग्र पापों  को जला दें, इस संसार के सुखों में छिपे हुए दुखों को देखें, आत्म-ज्ञान के लिए प्रयत्नशील रहें, अपने घर की आसक्ति को शीघ्र त्याग दें।
संगः सत्सु विधीयतां भगवतो भक्ति: दृढाऽऽधीयतां, शान्त्यादिः परिचीयतां दृढतरं कर्माशु संत्यज्यताम्। 
सद्विद्वानुपसृप्यतां प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां, ब्रह्मैकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम्॥
सज्जनों का साथ करें, प्रभु में भक्ति को दृढ़ करें, शांति आदि गुणों का सेवन करें, कठोर कर्मों का परित्याग करें, सत्य को जानने वाले विद्वानों की शरण लें, प्रतिदिन उनकी चरण पादुकाओं की पूजा करें, ब्रह्म के एक अक्षर वाले नाम ॐ के अर्थ पर विचार करें और उपनिषदों के महावाक्यों को सुनें।
 क्षुद्व्याधिश्च चिकित्स्यतां प्रतिदिनं भिक्षौषधं भुज्यतां, स्वाद्वन्नं न तु याच्यतां विधिवशात् प्राप्तेन संतुष्यताम्। 
शीतोष्णादि विषह्यतां न तु वृथा वाक्यं समुच्चार्यतां औदासीन्यमभीप्स्यतां जनकृपानैष्ठुर्यमुत्सृज्यताम्॥
भूख को रोग समझते हुए प्रतिदिन भिक्षा रूपी औषधि का सेवन करें, स्वाद के लिए अन्न की याचना न करें, भाग्यवश जो भी प्राप्त हो उसमें ही संतुष्ट रहें। सर्दी-गर्मी आदि विषमताओं को सहन करें, व्यर्थ वाक्य न बोलें, निरपेक्षता की इच्छा करें, लोगों की कृपा और निष्ठुरता से दूर रहें।
चेतोदर्पणमार्जनं भव महादावाग्नि निर्वापणम् श्रेयः कैरवचन्द्रिकावितरणं विद्यावधू जीवनम्।
आनंदाम्बुधिवर्धनं प्रतिपदं पूर्णामृतास्वादनम् सर्वात्मस्नपनं परं विजयते श्रीकृष्ण संकीर्तनम्॥
चित्त रूपी दर्पण को स्वच्छ करने वाले, भव रूपी महान अग्नि को शांत करने वाले, चन्द्र किरणों के समान श्रेष्ठ, विद्या रूपी वधु के जीवन स्वरुप, आनंद सागर में वृद्धि करने वाले, प्रत्येक शब्द में पूर्ण अमृत के समान सरस, सभी को पवित्र करने वाले भगवान् श्री कृष्ण का नाम का कीर्तन करें।
नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृश मिहाजनि नानुरागः॥
हे प्रभु! आपने अपने अनेक नामों में अपनी शक्ति भर दी है, जिनका किसी समय भी स्मरण किया जा सकता है। हे भगवन्! आपकी इतनी कृपा है, परन्तु मेरा इतना दुर्भाग्य है कि मुझे उन नामों से प्रेम ही नहीं है।
तृणादपि सुनीचेन तरोरपि सहिष्णुना। अमानिना मानदेन कीर्तनीयः सदा हरिः॥
स्वयं को तृण से भी छोटा समझते हुए, वृक्ष जैसे सहिष्णु (सहनशील; tolerant) रहते हुए, कोई अभिमान न करते हुए और दूसरों का सम्मान करते हुए सदा भगवान् श्री हरि विष्णु का भजन करना चाहिए।
One should consider himself to be insignificant as compared to a piece of straw, become tolerant like the tree, without nursing pride-ego, respect-care for others and pray-worship the Almighty (Bhagwan Shri Hari Vishnu).

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