Sunday, October 26, 2014

HINDUISM (हिन्दुत्व) CHAPTER (18) :: SIGNIFICANCE OF GEETA गीता का माहात्म्य

HINDUISM (हिन्दुत्व) CHAPTER (18)
SIGNIFICANCE OF GEETA गीता  का माहात्म्य 
(पद्म पुराण)
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By:: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj  
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Photoमाता पार्वती ने भगवान् शिव से गीता  का माहात्म्य पूछा तो, उन्होंने भगवान् विष्णु और माँ लक्ष्मी के वार्तालाप को उन्हें सुनाया। 
Bhagwan Shiv the destroyer and a component of the Par Brahm Parmeshwar Bhagwan Vishnu was requested by the Jagat Janni (-one who has given birth to the creatures-organism-living beings in this world-universe) Maan Bhagwati Parwati to reveal the secret-significance of Shri Mad Bhagwat Geeta. Bhagwan Shiv narrated the conversation between Bhagwan Vishnu and Maan Laxmi depicting the significance-importance of this treatise. One who read, listen, narrate, follows-practice this holy treatise is freed from the clutches of reincarnations and attains the Ultimate.
भगवान विष्णु ने भगवती माँ लक्ष्मी से कहा: मैं योगनिद्रा में तत्व का अनुसरण करने वाली अंतर्दृष्टि से अपने ही माहेश्वर तेज का साक्षात्कार करता हूँ। ये वही  तेज है जिसका योगी पुरुष, कुशाग्र बुद्धि द्वारा अपने अन्तःकरण में दर्शन करते हैं। जिससे मीमांसक विद्वान वेदों का सार तत्व निश्चित करते हैं। वह माहेश्वर तेज एक अजर, प्रकाश स्वरूप, आत्मरूप, रोग-शोक रहित, अखण्ड, आनन्द का पुंज, निष्पन्द (-निरीह) तथा द्वैत रहित है। इस जगत का जीवन उसी के आधीन है। मैं उसी का अनुभव करता हूँ और तुम्हें नींद लेता हुआ प्रतीत हो रहा हूँ। 
Bhagwan Vishnu was laying over the bed formed by Bhagwan Shesh Nag and Maan Laxmi was pressing his feet. She thought that the Almighty is sleeping. She tried to find out-confirm, if he was really sleeping. Bhagwan understood her motive and said that he was not sleeping but looking-visualizing his Aura in the form of Maheshwar-Bhagwan Shiv. He described him as the one which is worshiped-visualized by the Yogis-ascetics, enlightened-prudent-people with sharp intelligence in their inner self. He is the one who is considered to be the sole authority over the gist-theme-central idea of the Veds. The Aura of Maheshwar is like an uninterrupted-infinite-endless beam of light, in the form of Almighty-Supreme Soul, free from diseases-grief-pains-sorrow, unique-one, bliss-Ultimate pleasure, without palpitation-silent-quite and without duality.
आत्मा का स्वरूप द्वैत और अद्वैत से पृथक, भाव और  मुक्त तथा आदि और अन्त से रहित है।  शुद्ध ज्ञान के प्रकाश से उपलब्ध होने वाला तथा परमानन्द स्वरुप होने के कारण एक मात्र सुन्दर है। यही मेरा ईश्वरीय  रूप है।
The soul is free-different from duality & individuality, feelings, bonds-free and without termination-end less-all pervading. One can see-observe-visualize-identify this bliss-Ultimate pleasure-Parmanand, with enlightenment. This is my exposure-revelation as the God.
माता लक्ष्मी ने प्रश्न किया कि आपका स्वरूप स्वयं परमानन्दमय और मन और वाणी से बाहर है तो गीता उस का बोध कैसे करती है?
Deity-Mother Laxmi inquired-queried further, If your image-portrait-real self is beyond  the mind-mood-intelligence-will and the words-voice-speech, then how does Geeta visualize it?"
परमात्मा भगवान् विष्णु ने उत्तर दिया कि पहले 5 अध्याय मेरा मुख, अगले 10 अध्याय मेरी भुजाएँ, अगला एक अध्याय उदर तथा अंतिम 2 अध्याय मेरे चरण हैं।इस तरह 18 अध्यायों को मेरी वाङ्मयी मूर्ति ही  जानना चाहिये। यह ज्ञान मात्र से महान पातकों का नाश करने वाली है। 
The Almighty revealed that the first five chapters constituted his mouth, next 10 chapters formed his arms, the next portion constituted the stomach and the last 2 chapters were his feet.
पहला अध्याय: यह साधक का अन्तःकरण शुद्ध करता है। विद्व्ता का अभिमान नहीं रहता। भवसागर पार करने में कोई कठिनाई नहीं होती। सुशर्मा नामक ब्राह्मण, वेश्या और एक तोते का अन्तःकरण  शुद्ध हो गया।
It clears the inner self of the devotee-practitioner. He becomes free from ego-pride. He sails easily in this vast ocean of life-incarnation as a human being. The Brahmn named as Susharma along with a prostitute and parrot was able to have a clear heart-mind and soul, leading to Salvation ultimately.
दूसरा अध्याय: साधक को आत्म ज्ञान हो जाता है। सुकर्मा नामक ब्राह्मण को अतिथि ने दूसरा अध्याय शीला खंड पर लिखकर कर दिया और उनके देखते-देखते अंतर्ध्यान हो गये। 
तीसरा अध्याय: भूत-प्रेत योनि में नहीं जाना पड़ता। साधक घोर नरक में पड़े अपने बंधुओं-रिश्तेदारों को मुक्त करा कर उनके साथ बैकुण्ठ लोक में स्थान प्राप्त करता है।कौशिक वंश में उत्तपन्न जड़ नाम के ब्राह्मण को उसके पुत्र ने प्रेत योनि से मुक्त कराया। 
चौथा अध्याय: साधक के सत् प्रयास से पापी और शाप ग्रस्त व्यक्तियों की वृक्ष योनि से मुक्ति हो जाती है।भारत नाम के योगनिष्ठ महात्मा ने श्रापग्रस्त अप्सराओं को बेर के वृक्ष-वृक्ष योनि से अनायास ही मुक्त करा दिया। वे ब्राह्मण कन्या बनीं। 
पाँचवाँ अध्याय: पक्षी योनि से मुक्ति।  पिगल नामक ब्राह्मण और उसकी पत्नी की गिद्ध और तोति की योनि से मुक्ति। वे दोनों पूर्व जन्म का बदला लेते हुए उत्तम, ब्रह्म ज्ञानी, एकांत सेवी, ममता रहित, शांत, विरक्त और किसी से द्वेष न रखने वाले महात्मा, जिनका प्रतिदिन गीता के पाँचवें अध्याय का जप करना नियम था, ने शुद्ध चित्त होकर  शरीर का त्याग किया था, की खोपड़ी में गिर गए। 
छटा अध्याय: इसके सुनने-अध्ययन करने वालों की मुक्ति करतलगत हो जाती है।ऐसा मनुष्य भगवान् विष्णु के स्वरूप हो जाता है। रैक्व ऋषि पूर्ण काम हो गए। उन्हें किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं थी। उनकी तेजोराशि देताओं के लिये भी दु:सह हो गई।
सातवाँ अध्याय: प्रेत सर्प योनि से मुक्ति, मोक्ष की प्राप्ति, श्रवण मात्र से सभी पापों से मुक्ति। पाटलिपुत्र के शंकुकर्ण नामक ब्राह्मण ने वैश्य  वृति बहुत धन कमाया, मगर कभी पितरों का तर्पण और देवताओं की पूजा आदि नहीं की। मरकर वह प्रेत सर्प योनि में पड़ा और अपने ही घर के सामने दवाये गये धन की रखवाली करने लगा। उसके पुत्रों को स्वप्न में घर के सामने दबा धन दिखा तो उन्होंने उसे निकालने की कोशिश की। उनको वह सर्प दिखा तो उन्होंने उसे अपने बारे में बताया। सर्प ने उनसे कहा कि "गीता के अमृतमय सप्तम अध्याय को छोड़कर मुझे मुक्त करने में तीर्थ, दान, तप और यज्ञ भी सर्वतः समर्थ नहीं हैं"। 
आठवाँ अध्याय: आत्यन्तिक सुख-मोक्ष और भगवद्धाम की प्राप्ति और वंशजों की नरकों से मुक्ति। दक्षिण में आमर्दकपुर में भावशर्मा नामक ब्राह्मण ने वेश्या को पत्नी बनाकर रखा, मांस खाया, मदिरा का सेवन किया, साधुओं का धन चुराया, परायी स्त्री के साथ व्यभिचार किया, शिकार खेला और मरकर ताड़ का वृक्ष बना। उसकी छाया में दो ब्रह्मराक्षस आकर बैठे जो कि पर्व जन्म में वेद-वेदांग, सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ का ज्ञाता विशेषज्ञ और सदाचारी, तत्वों को जानने वाले कुशीबल नामक ब्राह्मण और उसकी पत्नी थे। उन्होंने लोभवश बड़े-बड़े दान तो लिए, परंन्तु स्वयं दान नहीं किया। पत्नी ने पति से इस  मुक्ति हेतु प्रश्न किया "किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम " अर्थात पुरुषोत्तम वह ब्रह्म क्या है और कर्म कौन-सा है ?यह वाक्य गीता के आठवें अध्याय का आधा श्लोक है जिससे ताड़ के वृक्ष के साथ-साथ उन दोनों की मुक्ति भी हो गई। 
वृक्ष योनि-ताड़ वृक्ष से मुक्ति पाकर भावशर्मा ने काशी पुरी में जाकर इस आधे श्लोक के साथ में कठोर तपस्या की। 
नौवाँ अध्याय: पशु योनि, श्राप से मुक्ति, परमगति की प्राप्ति। नर्मदा के तट पर माहिष्मती नगरी में वेद-वेदांगों के ज्ञाता माधव नामक ब्राह्मण ने बलि के हेतु बकरा मँगवाया तो उसने बताया कि वो भी पूर्व जन्म में वेद-विद्या प्रवीण, भगवती का भक्त था और बलि के बकरे की माँ के शॉप के कारण अब बकरा बना था। उसने कुरुक्षेत्र के चन्द्र शर्मा का जिक्र किया जो कि गीता के नवमें अध्याय का पाठ करते थे और भयंकर पाप और निंदा रूपी चाण्डालों से इसी कारण मुक्त हुए थे। बकरा मुक्त कर दिया गया और ब्राह्मण ने परमगति पाई। 
दसवां अध्याय: ब्रह्मा जी के हंस का काले रंग और पक्षी योनि से मुक्ति के उपरांत ब्राह्मण कुल में जन्म, भगवान् विष्णु का शंख-चक्र गदा के साथ, उसे निरन्तर दर्शन और भगवान शिव का उसके पीछे-पीछे उसका हाथ पकड़ कर चलना।  इस जन्म में शराबी, ब्रह्म हत्यारों की उसकी दृष्टि पड़ने मात्र से ही मुक्ति।कमलिनी (-उसे पूर्व ब्राह्मणी, मैना और अप्सरा थी) की लता योनि से मुक्ति, 60,000 भंवरों को स्वर्ग की प्राप्ति।  इस अध्याय के श्रवण मात्र से सब आश्रमों का फल प्राप्त होना। 
ग्यारहवां अध्याय: मेघंकर नगर में श्रेष्ठ ब्राह्मण को ब्रह्म ज्ञान की प्राप्ति। श्राप से उद्धार। मरे हुओं का पुनः जीवित होना, चतुर्भुज रूप और देवत्व-विष्णु धाम की प्राप्ति।  इसके श्रवण मात्र से महान पातकों का नाश हो जाता है।
बारहवाँ अध्याय: दक्षिण दिशा में कोहलापुर पराशक्ति माँ लक्ष्मी की प्रधान पीठ है। सम्पूर्ण देवता उसका सेवन करते हैं। वहाँ करोणों तीर्थ और शिवलिंग हैं। रूद्र गया भी वहीं है। माँ लक्ष्मी के आदेश पर दरवाजे पर स्थित सिद्ध समाधि नामक ब्राह्मण से राजकुमार ने बताया कि उसके पिता का अंत हो गया है और उसके यज्ञ का घोडा भी चोरी हो गया है। सिद्ध समाधि ने इंद्र से घोडा वापस दिलवाया और राजा को भी जीवित किया। यज्ञ पूरा हुआ। ब्राह्मण को यह अलौकिक शक्ति गीता के बारहवें अध्याय के प्रतिदिन आलस्य रहित जप से प्राप्त हुई और सब को सद्गति-मोक्ष प्राप्त हुआ। 
तेरहवाँ अध्याय: दक्षिण दिशा में तुंगभद्रा  नदी के किनारे हरिहर पर में साक्षात भगवान् श्री हरी विराजमान हैं। ब्राह्मण हरिदीक्षित की दुराचारा, कामोन्मत्त, व्याभिचारिणी, कुलटा  पत्नी जो कि करोणों  कल्पों तक संयमनीपुरी में नरकों में रही, सौ मन्वन्तरों तक रौरव नरक में रही, उसके बाद दहनानन नरक में गिराई गई, फिर चण्डालिनी बनकर इस लोक में उत्तपन्न हुई तथा कोढ़ और राजयक्ष्मा से पीड़ित हुई, नेत्र पीड़ा से ग्रस्त हुई और अंत में अपने निवास स्थान को गई जहाँ भगवान्  शिव के अन्तःपुर की स्वामिनी जम्भका देवी विराजमान हैं। वहाँ वासुदेव  नामक ब्राह्मण के मुँख से, जो कि गीता के  तेरहवें अध्याय का पाठ करता था, को सुनकर दिव्यदेह धारण कर स्वर्ग चली गई। 
चौदहवाँ अध्याय: सिंहल द्वीप में विक्रम बेताल नामक राजा की कुतिया और उसके द्वारा पीछा किया गया खरगोश वत्स मुनि के आश्रम में दिव्य  देह धारण कर स्वर्ग चले गए। मुनि गीता के चौदहवें अध्याय का पाठ किया करते थे। खरगोश पूर्व  जन्म में महाराष्ट्र में प्रत्युदक नगर में रहने वाला कपटी मनुष्यों में अग्रगण्य ब्राह्मण था और कुतिया उसकी पत्नी विलोभना थी जो कि स्वेच्छा चारिणी थी। ब्राह्मण ने क्रोध में  मार डाला था। 
पंद्रहवाँ अध्याय: गौड़ देश में कृपाण-नरसिंह नामक राजा जिसकी तलवार की धार से देवता भी परास्त हो जाते थे, के सेनापति ने राजा और राजकुमारों को मारकर स्वयं राजा बनना चाहा। वह पापात्मा इस विचार के आने के कुछ ही दिन बाद हैजे से मर गया और फिर अश्व बनकर पैदा हुआ। वह गुणों में उच्चैः श्रवा के समान था। एक वैश्य उसे खरीदकर राजा के पास ले आया उसे मुँहमाँगी कीमत पर  बेच दिया।  एक दिन राजा उस अश्व पर सवार होकर जंगल में गया और प्यास से व्याकुल होकर जल की खोज करने लगा। उसी समय एक पत्ता उड़कर उसकर पास आया।  राजा ने उसे पर लिखे हुए को पढ़ा तो घोड़ा तुरन्त गिरकर स्वर्ग चला गया। राजा ने वहाँ पर एक आश्रम देखा जिसमें विष्णु शर्मा नामक त्रिकाल दर्शी मन्त्रवेत्ता एवं महापुरुषों में श्रेष्ठ एक ब्राह्मण विराजमान थे। उन्होंने राजा को बताया कि घोड़ा कोई और नहीं अपितु उनका ही सेनापति था जो कि उन्हें और राजकुमारों को मारकर स्वयं राजा बनना चाहता था, परन्तु इसी पाप की वजह से धोड़ा बनकर पैदा हुआ और पत्ते पर लिखे गीता के पंद्रहवें अध्याय के आधे श्लोक को सुनने मात्र से मुक्त होकर स्वर्ग को चला गया। राजा ने घर वापस आकर राज्य सिंहासन अपने पुत्र सिंहबल को दिया और स्वयं गीता के पंद्रहवें अध्याय के जप से शुद्ध होकर विशुद्ध चित्त होकर मोक्ष को प्राप्त हुआ। 
सोलहवाँ अध्याय: गुजरात के सौराष्ट्र नामक नगर में राजा खड्गबाहु के यहाँ एक मदमस्त हाथी था। उसके उत्पात से सभी त्रस्त थे। एक ब्राह्मण गीता के सोलहवें अध्याय का पाठ करते हुए उसके मद को छूते हुए निकले तो राजा ने उनसे इस अलौकिक कार्य के पीछे शक्ति को जानना चाहा। ब्राह्मण ने उन्हें गीता के सोलहवें अध्याय का महातम्य बतलाया तो, राजा ने राज कुमार को राज्य सिंहासन पर अभिषिक्त किया और स्वयं गीता के सोलहवें अध्याय का पाठ करते हुए परमगति को प्राप्त हुए। 
सत्रहवां अध्याय: राजा खड्गबाहु के दुःशासन नामक नौकर था। वह अपनी खोटी बुद्धि के प्रभाव से  राजकुमारों के साथ धन की बाजी लगाकर मदमस्त हाथी पर चढ़ा, परन्तु हाथी द्वारा उसे क्रोध में ऊपर फैंक  दिया गया। वह मरकर हाथी बना और सिंहल  द्वीप में मालव नरेश के यहां बेच दिया गया। वह हाथी ज्वरग्रस्त हुआ तो राजा स्वयं वहाँ आया।राजा को देखते ही उसने सारा दर्द भूलकर संसार को आश्चर्य में डालने वाली वाणी में कहा "सम्पूर्ण शास्त्रों को जानने वाले राजा राजनीति के विपुल भंडार, शत्रु मर्दन करने वाले, भगवान् विष्णु के परम आराधक, मुझे औषधि से लोई लाभ नहीं होगा। जप और दान से भी कुछ लाभ नहीं होने वाला। कृपया आप गीता  के सत्रहवें अध्याय का पाठ करने वाले किसी संस्कारी ब्राह्मण को बुलवाकर उत्तम अभिमन्त्रित जल को मेरे ऊपर डलवाएँ।" ऐसा ही किया गया। तुरन्त गज योनि को त्यागकर, दुःशासन दिव्य विमान पर आरूढ़ हो गया। राजा के पूछने पर उसने अपना पूर्व वृतान्त बताया तो राजा भी गीता  सत्रहवें अध्याय का जप करने लगे और उसके थोड़े ही समय बाद उनकी भी मुक्ति हो गई। 
अठारहवाँ अध्याय: चिन्मय आनंद की धारा बहाने वाला गीता का अठारहवाँ अध्याय माहात्म्य में वेदों से भी उत्तम है। यह सम्पूर्ण शास्त्रों का निचोड़ और प्राणी को सन्सार के यातना जाल से मुक्त करने वाला है। सिद्ध पुरूषों के लिए यह परम रहस्य की वस्तु है। यह अविद्या का  समूल नाश करने वाला है। यह भगवान् विष्णु की चेतना और परमपद है। यह विवेक का मूल, काम क्रोध और मद को नष्ट करने वाला है।  यह इन्द्रादि देवताओं तथा सनक-सनंदन आदि महायोगियों का आश्रय है। इसके पाठ मात्र से यमदूत लौट जाते हैं। इससे बढ़कर अन्य कोई रहस्य-उपदेश नहीं है जो संतप्त प्राणियों के त्रिविध ताप को हरता हो। इसके अध्ययन से बड़े-बड़े पातक नष्ट हो जाते हैं। इसके निरन्तर पाठ  मात्र से एक नवीन इन्द्र इन्द्रासन पर विराजमान हो गया।  भगवान् विष्णु ने पूछने पर इंद्र को गीता के अठारहवें अध्याय की महिमा बताई तो वे गोदावरी के तट पर कालिका ग्राम गए और भगवान् कालेश्वर के श्री चरणों में एक परम धर्मात्मा ब्राह्मण से  गीता के अठारहवें अध्याय का अध्ययन किया और भगवान् विष्णु का सायुज्य प्राप्त किया तथा बैकुण्ठ लोक चले गए। इसके श्रवण मात्र से ही प्राणी समस्त पापों से निजात पा लेता है। 
जो भी व्यक्ति इसका श्रद्धा पूर्वक श्रवण करता है वह समस्त यज्ञों का फल प्राप्त कर भगवान् श्री विष्णु धाम में भगवान् विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है। 












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