Thursday, August 14, 2014

SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (I) श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय (I)

श्रीमद् भगवद्गीता अध्याय (I)
SHRI MAD BHAGWAD GEETA CHAPTER (I)
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By:: Pt. Santosh Kumar Bhardwaj  
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ॐ गंगणपतये नमः 
ॐ पूर्णमद: पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवाव शिष्यते॥ 
गजानन भूतगणादिसेवितं कपिथ्यजम्बूफलचारुभक्षणम्।
उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपपंकजम्॥ 
This treatise on Shri Mad Bhagwat Geeta is different than the other popular version in one regard i.e., the commentary is made by a person, who is living in this  cosmic era and himself is experiencing the truth elaborated in it. He himself is interacting with the creations of the Almighty. The other attempts were made by those, who are sages-recluse-relinquished-the people of the other world. श्री मद्  भागवत गीता के इस भाष्य में अन्यानेक विद्वानों-साधु-संतों के भाष्य से यह अंतर है कि यह एक सांसारिक-कलयुगी व्यक्ति, जो कर्म-ज्ञान तथा भक्ति मार्ग का एक साथ अनुगामी है; द्वारा विश्लेषति है। यह अध्ययन कर्ता को कलयुग में गीता के प्रयोग का मार्ग दिखाने का प्रयास है। 
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महा भारत का युद्ध पाण्डवों द्वारा अन्तिम उपाय के रूप में लड़ा गया। दुर्योधन के मन में युद्ध की प्रबल इच्छा थी और पाण्डवों के सामने मजबूरी और माँ कुन्ती के आदेश का पालन। यह युद्ध धर्म और अधर्म के बीच लड़ा गया। सभी ने युद्ध के भयावह परिणामों से कौरवों को आगाह किया। श्री कृष्ण द्वैपायन-भगवान वेद व्यास जी, ने भी अंतिम प्रयास हेतु धृतराष्ट्र से मुलाकात की और उसे समझाया।दया-ममतावश उन्होंने उसे दिव्य  दृष्टि प्रदान करने की इच्छा व्यक्त की, ताकि वो स्वयं युद्ध की विभीषिका को देख सके। धृतराष्ट्र ने आग्रह किया कि वे दिव्य दृष्टि संजय को प्रदान करें।  भगवान वेद व्यास ने, भगवान श्री कृष्ण के आदेश पर गीता को संवाद के रूप में प्रकट किया और इसको गणेश जी ने लिपिबद्ध किया। भगवान वेद व्यास जब तक, अगले श्लोक की रचना करते, तब तक गणेश जी पहले श्लोक का अर्थ समझकर उसे लिख देते थे। 
NAR-NARAYAN नर नारायण 
ब्रह्मा जी के ह्रदय से  देहधारी धर्म उत्पन्न हुए, जिनका विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री मूर्ति से हुआ। उनके चार पुत्र थे: हरी, कृष्ण, नर और नारायण। नर और नारायण, बद्रीनाथ (-कुरुक्षेत्र का भाग) में तपस्या करने लगे। वे दोनों भगवान विष्णु के अंशावतार हैं। नर ही अर्जुन और नारायण स्वयं श्री कृष्ण के रूप में प्रकट हुए। विशाल रूप प्रकट करते समय उनमें वैकुण्ठ निवासी भगवान विष्णु और गौलोक निवासी भगवान  श्री कृष्ण का समावेश हो गया। अतः उन्हें परमात्मा का पूर्णावतार माना जाता है। 
Dharm emerged from the heart of Brahma Ji. He was married to the daughter Murti of Daksh Prajapati.  He had 4 sons namely Hari, Krashn, Nar and Narayan. Nar and Narayan are the incarnations of Bhagwan Shri Vishnu, residing in the abode called Vaekunth Lok. They moved to Badri Nath a region under Kurukshetr for rigorous ascetics and profound meditation. Arjun got his birth from a fraction of Nar, while  Narayan got the incarnation as Krashn. Bhagwan Shri Krashn illustrated-showed his large form to Arjun, in the battle field, where Bhagwan Shri Krashn from Gau Lok, Bhagwan Vishnu from Vaekunth Lok assimilated in him and presented the complete form to Arjun-who himself was an integral component of the divinity-eternity.
DHRAT RASHTR धृतराष्ट्र: Its the guilt which makes a man worry about the outcome of his vices-vicious-wicked deeds. He often return to the seen of the crime committed by him or try to keep him informed of the developments thereafter. He would try to acquaint himself of the results of his malicious designs. Dhrastrashtr was not an exception. He was blind since birth. He was uneducated, stubborn, extremely selfish, self centered and criminal minded crooked person. 
It was the luck which provided him the guardianship of Pandu's sons to him. Instead of working as a caretaker he considered himself to be the emperor and did his best to eliminate Pandavs. He made all efforts, so that his son Duryodhan become crown price and take the reins of the empire, built by Pandu. He wanted to keep Pandavs off the administration by hook or crook. 
His example is cited to prove that a person with physical-mental deficiency is born with crooked ness. He can go to any extreme to gain importance-recognition-prominence-authority. He makes efforts to seek-draw the attention of other people. Soul searching comes but when its too late.

धृतराष्ट्र उवाच: धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः। मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥1-1॥
भावार्थ:  धृतराष्ट्र ने पूछा-हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया? 
धर्मक्षेत्रे: धृतराष्ट्र ने इस संवाद में पहला शब्द धर्मक्षेत्र कहा। क्षेत्र का अर्थ है स्थान-भूमि। कुरुक्षेत्र एक आदि देव तीर्थ है। भगवान शिव ने इसी क्षेत्र-कनखल में प्रजापति दक्ष का यज्ञ ध्वस्त किया था। यहीं भगवान वामन ने राजा बाहुबली से तीनों लोकों का राज्य लेकर, देवराज इन्द्र को प्रदान किया था। यहीं स्थाणु तीर्थ और शक्ति स्थल है। भगवती माँ सरस्वती यहीं से प्रवाह करती हैं। यहीं भगवान शिव ने राजा वेन को उसके पूर्वजन्म के पापों से मुक्ति प्रदान की। अतः इस भूमि का चयन धर्म के निर्वाह हेतु ही किया गया था। 
कुरुक्षेत्रे: पूर्व कल्प-काल में हुए राजा कुरु ने इस 400 योजन भूमि को समतल करवाया था।यह भूमि पहले पहाड़ों से युक्त थी। वर्तमान काल में यहाँ वर्तमान चतुर्युगी में, राजा कुरु का शासन था, जो कि सूर्य वंश-इक्ष्वाकु वंश की शाखा ही थी।
समवेता युयुत्सवः: युद्ध की इच्छा लेकर इकट्ठे हुए क्षत्रियों का समुदाय अपने स्वभाव के अनुरूप युद्ध के माध्यम से ही अंतिम निर्णय करने को उत्सुक था। यह माना जाता है कि धर्म युद्ध (वर्तमान में आतंकवादियों के जिहाद को धर्म युद्ध नहीं कहा जा सकता। ये तो उनका सत्ता हथियाने का औजार मात्र है।) में प्राण देने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। यहाँ कुन्ती अपनी पुत्र वधु के अपमान और अन्याय का प्रतिकार चाहती थीं, कुन्ती के बाल खुले थे, दुर्योधन बगैर युद्ध के सुई की नौंक के बराबर भी भूमि देना नहीं चाहता था। कर्ण स्वयं को अर्जुन से श्रेष्ठ साबित करने और दुर्योधन के उपकार का प्रतिकार करना चाहता था। युधिष्टर धर्म के निर्वाह हेतु युद्ध में प्रवर्त हुए।
मामकाः पाण्डवाश्चैव:  धृतराष्ट्र ने कभी भी पांडवों को अपना नहीं माना। वो स्वयं असमर्थ था; फिर भी नीति के विरुद्ध स्वयं को राज्य का अधिकारी मानता था और अपने बाद अपने पुत्र दुर्योधन को। पाण्डु बड़े ही महान सेनापति और राजा थे। उनके पुत्र देवताओं के अंश से उत्पन्न हुए थे। युधिष्टर स्वयं धर्म के अवतार थे।धृतराष्ट्र भीम से सदा ही रुष्ट रहता था; क्योंकि वे हर दृष्टि से दुर्योधन से श्रेष्ठ थे। राज्य की इच्छा से ही उसने पांडवोँ को अनीति से बार-बार मरवाने और राज्य से वंचित रखने के प्रयास किये। 
किमकुर्वत संजय: इस युद्ध में किस-किस ने क्या-क्या प्रयास किया सफलता हासिल की ?
O! Sanjay, describe the events-deliberations-occurrences and happenings between  my sons and the Pandavs, who have gathered at holy place (-Dharm Kshetr) are eager-desirous to fight-settle scores, at the battle field of Kurukshetr-(-place belonging to the Kurus). Dhratrashtr was inquisitive-eager to find out the outcome-result of the battle. He enquired from Sajay-his minister, the outcome-developments-happenings in the battle field of Kurukshetr-the Dharm Kshetr, where his sons and the mighty sons of his younger brother Pandu had assembled, to settle the fate of the empire of Hastinapur and Indraprasth.
Dharm Kshetr: In wider sense, it stands for land and the vagina. Its an ancient religious-holy place. Bhagwan Shiv destroyed the Yagy of Daksh Prajapati at Kankhal of this region, when he insulted him and his wife Maan Sati-Daksh's daughter. It was only here that Bhagwan Vishnu took away the empire of three Loks-abodes of Heaven, Earth and Patal from the mighty demon-Rakshas king Bahu Bali, as Vaman Avtar-incarnation and returned them to Dev Raj Indr. Sthanu Tirth, Shakti Sthal, are located here. Holy river Maan Bhagwati Saraswati flows through this region. Bhagwan Shiv removed the sins of wicked king Ven of his sins-of his previous birth, due to the efforts of his son. Selection of this place is justified due to these reasons.
KURUKSHETR कुरुक्षेत्र: In one of the previous Kalp-Brahma's day, a mighty King called Kuru leveled this mountainous-hilly terrain, in to plane field, measuring 400 Yojan. The current hierarchy is connected to Ikshawaku-Sury-Raghu dynasty, in which Bhagwan Ram took incarnation. No other place on earth was sufficient to held the battle, at this massive scale. This is the region, where three battles of Panipat have occurred. This is the region through which Kal Yavan & Alexander invaded India and the Muslims too entered India, through this region, only. 
Daksh Prajapati evolved from the toe of the right leg and his wife got her birth from  the left toe of Brahma Ji. They had 60 daughters. 13 of these were married to the sage Kashyap who too had emerged from Brahma Ji. These were divine creations. Brahma Ji entrusted the job of creating life through sexual intercourse to Kashyap. Kashyap moved to Kurukshetr and established his Ashram here and started ascetic-profound meditation at Himaly Parwat-Kashmir. Kashmir got its name from Kashyap. He created all life forms through his wives. He had some more wives, other than Daksh's daughters. These life forms include Demigods-Devgan, Daity-giants, Rakshas-demons, Yaksh, Gandharv, Kinner, Humans etc. In all 12 creations got birth which moved over 2 legs. These life forms moved to various abodes in the galaxies. This is the reason this region is called Kshetr (-vagina, क्षेत्र-योनि). 
प्राचीन काल में महा प्रलय के बाद सभी जगह जल ही जल था। सभी चर-अचर नष्ट हो गया। तब उसी जल में प्रजाओं के बीज स्वरूप एक अण्ड उत्पन्न  हुआ। कुरुक्षेत्र में स्थाणु तीर्थ-स्थाणुवट-संनिहित नाम का सरोवर ही वो स्थान है, जहाँ वो स्वर्ण अण्ड उत्पन्न  हुआ और भगवान श्री नारायण प्रकट हुए। उन्हीं से ब्रह्मा जी और ब्रह्मा जी से महेश उत्पन्न हुए।  महेश को ही आदि देव कहा जाता है। 
परमात्मा ब्रह्म की उत्पत्ति: आप्-जल को ही नार एवं परमात्मा को तनु कहते हैं। परमात्मा ने जल में शयन करने के बाद जगत को अपने में लीन जान उन नारायण ने अण्ड को तोड़ दिया, जिससे ॐ ओम शब्द की उत्पत्ति हुई। इसके बाद पहले भूः दूसरी बार में र्भूव और फिर तीसरे स्थान पर स्वः ध्वनि की उत्पत्ति हुई।इन तीनों का नाम मिलकर भूर्भूव:स्वः हुआ।  
उस सविता देवता-सूर्य का जो तेज (-आदित्य-आदि में उत्पन्न  हुआ, which took birth initially) अण्ड के तोड़ने से उत्पन्न हुआ उसने जल को सुखा दिया। तेज से जल को सोखे जाने पर  शेष जल कलल आकृति में बदल गया।  कलल से बुदबुद हुआ और उसके बाद यह कठोर हो गया और भूतों को धारण करनेवाली धरणी-धरती-पृथ्वी बन गया।  जिस स्थान पर यह अण्ड स्थित था, वहीं संनिहित-सांनिहत्य नाम का सरोवर है।
सरस्वती नदी के उत्तर की ओर पृथुदक नामक तीर्थ के पास ब्रह्म योनि तीर्थ है, जहाँ पृथुदक में स्थित होकर अव्यक्त जन्मा ब्रह्मा जी, चारों वर्णों की सृष्टि के लिये आत्म ज्ञान में लीन हुए थे।  सृष्टि के विषय में चिंतन करने पर उनके मुख से ब्राह्मण, भुजाओं से क्षत्रिय, दोनों उरुओं से वैश्य और पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। [श्री वामन पुराण] 
इस लोक और परलोक में दो पैरोँ पर चलने वाली 12 प्रजातियाँ: 
(1). देवता, (2). दैत्य, (3). सिद्ध, (4). गन्धर्व, (5). विद्याधर, (6). किम्पुरुष , (7). पितृ , (8). ऋषि, (9). मानव, (10): गुह्य, (11). राक्षस, और (12). पिशाच [श्री वामन पुराण] 
Mamka Pandavashch: What has happened in the battle between my and Pandu's sons?He himself was blind and incapable and still nurtured the desire to rule the big empire. Pandu was a great warrior and capable mighty king. He had given a new identity to Hastina Pur. His sons were the incarnations of demigods and capable-mighty people, while Duryodhan was a rogue-cheat. Dhratrashtr considered him, as the heir of that great empire built by Pandu. Dhratrashtr considered Bheem to be a rival of Duryodhan being superior to him in each and every sense-respect, possessing the strength of 10,000 elephants. Dhratrashtr silently watched, even conspired with Duryodhan in his wicked plans-designs to eliminate Pandavs, for the sake of kingdom.
Kimkurwat Sanjay: Dhratrashtr wanted to find out the deliberations in the battle field. He was aware that he was on the wrong-wicked side-turf, against dharm-duties as a guardian-ruler-elder-caretaker.

संजय उवाच: दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं  दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥1-2॥
भावार्थ:  संजय बोले-राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।   
दुर्योधनस्तदा: जब दोनों सेनाएँ  युद्ध के लिये आमने सामने खड़ी थीं, उस वक्त तदा शब्द दुर्योधन के द्वारा की गई कार्यवाही को जानना है। 
तु पाण्डवानीकं व्यूढं: दुर्योधन ने दोनों सेनाओं की व्यूह रचना को देखा।  उसकी सेना का आकार पाण्डवों की सेना से बहुत बड़ा था। फिर भी उसको यह मालूम था की वो अधर्मी है। भीष्म तो वचन बद्ध थे ही।अर्जुन उसकी सेना को पहले भी बुरी तरह मात दे चुका था। वो आश्वस्त होना चाहता था।सेनाओं और सेना नायकों को राजा के सामने आने पर आश्वासन मिलता है। 
राजा दुर्योधन: धृतराष्ट्र अँधा था।  दुर्योधन युवराज था। राज्य का सारा कार्य वही देखता था। युद्ध में भी कमान-बागडोर उसी के हाथ में थी। 
आचार्यमुपसंगम्य: दुर्योधन आचार्य द्रोण से जाकर मिला।उसका सेनापति भीष्म की अपेक्षा द्रोण से जाकर मिलना, यह जाहिर करता है कि उसके मन में द्रोण के प्रति शंका थी। द्रोण का अर्जुन से लगाव जग जाहिर था।सेनापति भीष्म ने व्यूह रचना की थी और उसपर द्रोण की राय भी जरूरी थी (-second opinion)। यहाँ उसकी कूटनीति और चतुराई दिखती है। 
वचनमब्रवीत्‌: दुर्योधन ने नीतिसंगत गम्भीर बातें कहीं जो कि आचार्य को पाण्डवों के विरुद्ध भड़काने वाली थीं।
Sanjay replied: Having observed the configuration-alignment of the army of  the Pandavs in the battle field, king  Duryodhan  approached Dronachary-his teacher and said. 
DURYODHANSTDA: Dhratrashtr wanted to find out the positions-alignments-arrangements-settlements made by the two armies. Whether the accomplishment made by his armies were superior to that of the Pandavs or not?
TU PANDWANIKM VYUDHAM: Duryodhan viewed-watched the alignments of the two armies. The size of his army was enormous-very-very large, as compared the army of the Pandavs, which was insignificant. He had the support of the Narayni Sena of Bhagwan Shri Krashn. He had no faith-respect-regard for the rules and regulations. His sole motto was to defeat-eliminate the Pandavs by hook or crook. He was a wretched person. His armies were defeated by Arjun earlier. Bhishm was bound by his own oath-bow to protect the throne of Hastina Pur. He wanted to be convinced-satisfied about his strength-power-might. The armies-soilders-captains are reassured when they find the king standing along with them in the battle field. 
RAJA DURYODHAN: Duryodhan was crown prince. He was undeclared king. He had been regulating the empire, since his father was blind-incapable-incompetent. He himself was the supreme commander of the army.
ACHARYMUPSANGMY: Duryodhan went to seek blessings of his Guru-teacher and a courtier, since he wanted to be sure that Dronachary will continue to support him, since he liked Arjun more as compared to rest of the flock. In fact he wanted to be re-assured-convinced by Dronachary. He wanted to find out whether the arrangements made by Bhishm were appropriate-sufficient or not. Second opinion was necessitated by the desire of winnings Pandavs. The fact is that he was a cunning-treacherous and diplomatic in his behaviour at this juncture. 
VACHNMBRVEET: Duryodhan uttered-discussed policy matters against the Pandavs in order to provoke-incite Dronachary.
पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌। व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥1-3॥
भावार्थ :  हे आचार्य! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डु पुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए। 
आचार्य: यद्यपि यह एक सामान्य सम्बोधन है फिर भी दुर्योधन का आशय स्पष्ट है। वह भेद-भाव की नीति का प्रयोग कर रहा है। आचार्य ने कौरवों, पाण्डवों के साथ-साथ धृष्टद्युम्न को भी अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान प्रदान किया  था। उसका तात्पर्य आचार्य को भड़काना-उकसाना-क्रोधित करने से था।
तव शिष्येण धीमता: वो कह रहा है कि क्या इस लिये ही उसने आपसे ज्ञान प्राप्त किया था कि वो आपके ही विरुद्ध शस्त्र उठाये? और आपने यह जानते हुए भी कि उसका जन्म आपका वध करने के लिए ही हुआ है उसे ज्ञान प्रदान किया। 
द्रुपदपुत्रेण: द्रुपद की याद दिलाना और आचार्य को उकसाना एक ही बात है क्योंकि आचार्य द्रुपद द्वारा किये गए अपमान को कभी भुला नहीं पाये। यही एकमात्र कारण था जिसकी वजह उन्हें दुर्योधन जैसे व्यक्ति को पढ़ाने के लिये मजबूर होना पड़ा और बाद में उसका पार्षद भी बनना पड़ा और इस वक्त सेना का एक अंग। 
पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्‌ पश्य: यद्यपि पांडवों की सेना दुर्योधन की सेना से 4 अक्षोणिनी कम थी फिर भी उसका उत्साह कौरवों से कहीं अधिक था। कौरव सेना में मतैक्य नहीं था। पांडवों की सेना इस प्रकार सज्जित थी कि उसका आकर बड़ा दिखाई दे। अब वो  भड़काने की बात करता है और कहता है कि पांडवों को धृष्ट द्युम्न को आपके विरुद्ध सेना का सेनापति नहीं बनाना चाहिये था। उसका आशय था कि धृष्ट द्युम्न जैसे मोहरे को पीटना आपके लिये कोई बड़ी बात नहीं यदि आप उत्साह पूर्वक मन लगा कर युद्ध करें। 
एतां पश्य: हम लोग पाण्डवों की सेना को किस तरह विजय कर सकते हैं, इसका निर्णय आपको शीघ्र करना है।
[एक अध्यापक अपने शिष्य की अच्छाई और बुराई को अच्छी तरह समझता है। यहाँ तो द्रोणाचार्य थे जो कि स्वयं देव गुरु वृहस्पति के अवतार थे]
He respect fully requested his teacher Dronachary to observe-view the mighty army of Pandavs arranged by his intelligent disciple (-student) Dhrastdyumn-son of Drupad in circular files.
ACHARY: Its a common-usual address to the teacher. But here Duryodhan used it as a sugar coated pill. He suspected Dronachary of his soft corner for the Pandavs-specially Arjun. He intended to create anguish in his mind. Dronachary educated Kauravs, Pandavs and Dhrashtdyumn with equal attention, with out discrimination and vigor. 
TV SHISHYEN DHIMTA: He wished to irritate Dronachary by saying that if Dhrastdyumn had  received education from him, to stand in front of him in the war. He reminded him that Dhrastdyumn got his birth just to kill him and still he taught him.
DRUPADPUTREN: Dronachary could not swallow his insult by Drupad-his school mate. This was the sole reason, he agreed to impart education to Kauravs. He became Dhratrashtr's minister and now a commander in the army, ready for the war.
PANDUPUTRANAMACHRY MAHTIM CHMUM PASHY: The army of Pandavs was smaller to that of the Kauravs by 4 battalions. Still their moral was much higher than that of the army of the Kauravs. Kauravs army had internal differences. The Pandavs army was arranged in such a manner that it gave the look of a mighty-very large army. Duryodhan wanted  to grew anger in Dronachary by suggesting that the Pandavs were educated by him and still they did not care for him, when they appointed Dhrastdyumn as the supreme commander, who took birth just to eliminate him. He stressed that it was easy for him to beat-defeat Dhrastdyumn easily, if he fought with full devotion and strength.
ETAM PASHY: Duryodhan stressed that Dronachary had to take a quick decision to win the Pandavs army.
DRONACHARY द्रोणाचार्य: Dronachary was the teacher of Duryodhan and knew exactly what he was saying. He was aware that Duryodhan was a wicked person and Dharm was not on his side. Internally he was never in favor of Duryodhan, but for the sake of his son. He maintained his cool. He was an incarnation of Dev guru Vrahspati. He believed in clearing-paying off, the debt of the salt he had, from the Kauravs. नमक का कर्ज चुकाना]Ashwasthama is an incarnation of Bhagwan Shiv. He was a staunch supporter-friend-fan and a king under Duryodhan. He was a great warrior-archer and courageous person. He used Brahmastr to kill Abhimanu's son Parikshit when he was in the womb. Dron did not give the knowledge of this weapon to Ashwasthama, since he did not consider him worthy of it. He learnt it  secretly when the lesson was being imparted to Arjun. He killed the 5 sons of Draupadi after the war, when they were asleep. In fact Bhagwan Shiv asked Ashwasthama to kill all of them. But Bhagwan Krashn protected the 5 Pandavs by keeping them with him. Ashwasthama was willing to perform any act for Duryodhan. The jewel (-mani मणि) was removed from his forehead as a punishment for the cold blooded murders. He was spared from being killed, being a Brahmn and AZR (-अज़र)-AMAR (-अमर)-IMPERISHABLE. Duryodhan did his best to brain wash-provoke Dron by poisoning his brain.
द्रोणवध के लिये युधिष्टर से यह कहलवाया गया "अश्वस्थामा मृत्यो नर हो वा कुंजरो"। अश्वस्थामा मृत्यो के कथन के साथ ही तेज शंख ध्वनि की गई। आचार्य द्रोण ने हथियार रख दिये। वे "नर हो वा कुंजरो" को सुन नहीं पाये और द्रष्टद्युम्न ने उन्हें मर डाला। (नर-मनुष्य, कुञ्जर-हाथी)। 
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥1-4॥ 
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌। पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः॥1-5॥ 
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌। सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥1-6॥ 
भावार्थ:  इस सेना में बड़े-बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर युयुधान-सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र-ये सभी महारथी हैं। 
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि: ये सभी वीर बड़े-बड़े ऐसे धनुषों से युक्त हैं, जिनकी प्रत्यञ्चा-डोरी चढ़ाने में ही बहुत जोर-ताकत लगती है। बल में भीम के समान और पराक्रम, अस्त्र-शस्त्र की कला में ये अर्जुन के समान हैं।
युयुधान: युयुधान (-सात्यकि) ने अस्त्र-शस्त्र की विद्या अर्जुन से सीखी थी। अतः नारायणी सेना का यह नायक भगवान श्री कृष्ण के द्वारा सेना दुर्योधन को दिए जाने पर भी, दिल से अर्जुन के पक्ष में ही रहा। युयुधान अपने गुरु अर्जुन के साथ है, परन्तु आपसे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का वरदान पाकर भी अर्जुन आपके विरुद्ध खड़ा है। युयुधान की मृत्यु युद्ध समाप्त होने के बाद यादवों के आपसी वाद-विवाद में हुई। 
विराटश्च: विराट के यहाँ पाण्डवों ने तेरहवें वर्ष गुप्त वास का समय बिताया था। कीचक की मौत का  पता लगने पर दुर्योधन को मालूम हो गया कि पाण्डव विराट में हैं।  उन्हें सामने लाने के लिए उसने विराट के गौधन को अपहरण करने का प्रयास किया। परन्तु तब तक गुप्तवास का समय  समाप्त हो चुका था। अर्जुन ने दुर्योधन की सारी सेना को बेहोश कर द्रोण और भीष्म के ऊपरी-अंग वस्त्र उतार लिए थे। दुर्योधन ने इसे उनके अपमान के रूप में दिखाने का प्रयास किया। मारा नहीं, इसका कोई वर्णन-जिक्र नहीं किया और विराट को एक अपराधी के रूप में प्रस्तुत किया। विराट अपने पुत्रों:-उत्तर, श्वेत शंख और  सहित मारे गए थे।
द्रुपदश्च महारथः द्रुपद से पहले विराट का नाम इसलिए लिया गया ताकि द्रोण चालाकी भाँप ना पायें। राजा द्रुपद के द्वारा किये गये अपमान ने ही द्रोण को हस्तिनापुर  दरवाजे पर लाकर खड़ा कर दिया था। द्रुपद इस युद्ध में द्रोण के हाथों मारे गए।
धृष्टकेतु: धृष्टकेतु शिशुपाल का पुत्र था जो कि भगवान श्री कृष्ण के हाथों सुदर्शन चक्र से मारा गया। धृष्टकेतु को गुरु द्रोण ने मारा। शिशुपाल दुर्योधन का मित्र था और अब दुर्योधन ने धृष्टकेतु को  मूर्ख बताया क्योंकि वह कृष्ण के पक्ष में खड़ा था।
चेकितानः यादव सेना तो दुर्योधन की ओर से लड़ने को तैयार थी, परन्तु चेकितान श्री कृष्ण के साथ ही रहा। यह दुर्योधन के हाथों मारा गया। 
काशिराजश्च वीर्यवान्‌: काशिराज एक महान योद्धा थे। वे शूरवीर और महारथी थे। दुर्योधन ने गुरु द्रोण से उनसे सावधान रहने को कहा। काशिराज युद्ध में मारे गये।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च: पुरूजीत और कुन्तिभोज पाण्डवों के मामा थे। उनका दुर्योधन के साथ स्नेह था, परन्तु वो लड़े उसी के विरुद्ध। दोनों द्रोण के हाथों मारे गये। दुर्योधन ने कहा कि वो तो हमारे भी मामा  हैं, फिर पाण्डवों की ओर ही से क्यों लड़ हैं? 
शैब्यश्च नरपुङवः शैव्य युधिष्टर के श्वसुर थे। वे एक श्रेष्ठ व्यक्ति और बहुत बलवान थे। दुर्योधन दिखाना चाहता था कि वे भी सम्बन्धी हैं परन्तु पाण्डवोँ के पक्ष में खड़े थे।
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌: युधामन्यु और उत्तमौजा पंचालदेश के बड़े बलवान और वीर  
योद्धा थे। उन्हें अर्जुन के रथ के पहियों की रक्षा  नियुक्त किया गया था। दुर्योधन इन दोनों को भी  नज़र में लाना चाहता था। अश्वस्थामा ने इन दोनों को भी सोते हुए में मारा था। 
सौभद्र: श्री कृष्ण की बहन सुभद्रा का पुत्र अभिमन्यु, चन्द्र देव के पुत्र का अवतार था। उसे चक्रव्यूह भेदना आता था। दुर्योधन ने आचार्य को चेताया कि वे उसे भी उतनी ही गम्भीरता से लें एक बच्चे की तरह नहीं। अभिमन्यु को जयद्रथ आदि ने युद्धनीति के विरुद्ध घेर कर मारा। उसकी मृत्यु दुशासन के बेटे द्वारा सर पर गदा मरने से हुई। 
द्रौपदेयाश्च: द्रौपदी के 5 पुत्र प्रतिविंध्य, सुतसोम, श्रुतकर्मा, शतानीक और श्रुतसेन थे जिन्हें वो इसलिए मरवाना चाहता था, क्योंकि द्रौपदी ने भरी सभा में उसका मजाक बनाया था।अश्वस्थामा ने इन पाँचोँ को युद्ध समाप्ति के बाद सोते हुए में मारा था। 
सर्व एव महारथाः ये सभी शास्त्र और शास्त्र में प्रवीण और महारथी हैं, और अकेले ही दस हजार योद्धाओं के संचालन करने में समर्थ हैं।
Pandav's army constitutes of great-mighty warriors  yielding big-large bows like Yuyudhan (-Satyaki-cousin of Krashn), Virat (-the king of Virat) and Drupad (-Draupdi's father), comparable to(-as great as) Bheem and Arjun in archery and warfares. They include great heroes like Dhrasht Ketu (-son of Shishupal), Chekitan (-a warrior from Vrashni clan & the king of Kashi) and  Puru Jit  Kunti Bhoj (-Kunti's brother) and the great king Shaiby (-the father in law of Yudhishtr); well known-renowned warriors Yudhamanyu & strong-stout-powerful  great warrior Uttamouja -the 2 Panchal warriors, Subhadra's (-Bhagwan Shri Krashn & Bal Ram's sister) son Abhimanyu (-incarnation of Moon's son) and  Darupadi's 5 sons-all great warriors.
ATR SHURA MHESHVASA BHIMARJUNSMA YUDHI: All these brave warriors had such large bows which could be threaded only with might-great power-strength.They were at par in strength and bravery with Bheem having the strength of 10,000 elephants and comparable to Arjun in the use-knowledge of weapons (-missiles, rockets, guns) which could be activated by using rhymes-Shloks-verses.
YUYUDHAN: Yuyudhan (-Satyiki) learnt archery and Astr Vidya (-weapons guided by rhymes-verses-orally/mentally. Computer is too inferior to be compared to this technique. Its in an infant stage.) from Arjun. He was the commander of the Narayni Sena capable of eliminating any one, under Bhagwan Shri Krashn. Satyiki remained with Arjun even though his army was handed over to Duryodhan. Duryodhan complained to Dron that Satyiki was with his teacher but Arjun was standing in front of him, in spite of having the blessings to be the greatest archer in the world. Yuyudhan died in the clashes between the Yadavs, after the war.
VIRATSHCHAH: Pandavs spent the 13th year of their exile under cover-in disguise, in the palaces of King Virat. His brother in law Keechak-commander in chief of the army was killed when he tried to entice-seduce Draupdi, by Bheem. Arjun had returned from Heaven-Indr Lok, after acquiring divine weapons. Keechak could not be killed, by none other than Bheem. Duryodhan sensed Pandavs presence in Virat and invaded it and tried to take the cows forcefully. At this juncture 13 years elapsed by the 4 calenders prevailing at that time. Arjun in the disguise of a kinner-gay-impotent, put the entire army of the Kauravs to sleep, defeating Karn miserably but leaving them alive-unharmed. He took off the upper garments of Bhishm Pitamh and Dron, for making dolls by the princess, who later got married to Abhimanyu-his son. Virat was killed in the war along with his 3 sons: Uttr, Shwet and Shankh. Duryodhan tried to provoke Dron reminding that incident and quoting it as an insult. Dron did not react but under stood the gimmick quickly.
DRUPADSHCH MAHARATHAH: Duryodhan was trying to be clever and did not name Drupad before Virat just to conceal his bad intentions. Drupad a school mate,  insulted Dron when he went to his court, considering him a friend for financial help. This incident drove Dron to the Kauravs, when Bhishm saw Dron picking up ball from the well by using reed arrows. Both of them were educated by Bhagwan Shri Parsuram Ji. Drupad lost his life at the hands of Dronachary in the war.
DHRASHTKETU: Dhrashtketu was Shishupal's son who was killed by Bhagwan Shri Krashn with his Sudarshan Chakr. Dhrashtketu was later killed by Dronachary. Shishupal was friendly with Duryodhan. Duryodhan called him a fool as he was in the army of the one who had killed his father.
CHEKISTAN: Yadav army-Narayani Sena, was ready to fight from the side of Duryodhan, but he remained with Bhagwan Shri Krashn. He was killed by Duryodhan.
KASHIRAJASHCH VIRYWAN: The king of Kashi (-Varanasi, Banaras) was a great warrior. He was brave and controlled 10,000 archers [-Maha Rathi-who's chariot leads 10,000 archers], simultaneously. He too died in the war.
PURUJITKUNTIBHOJSHCH: Purujit and Kuntibhoj were maternal uncles of Pandavs. They loved Duryodhan, but fought from the side of Pandavs. They were killed by Dron. Duryodhan said that they were his uncles as well. Then, why did they sided with Pandavs?SHAVSHCH NRPUNGVAH: Shavy was the father in law of Yudhishtr. He was a noble and mighty person-warrior. Duryodhan portrayed that Shavy was related to him as well, but was siding with Pandavs.
YUDHAMANYUSHCH VIKRANT UTTMOUJASHCH VIRYWAN: Yudhamanyu and Uttmouja were great-mighty warriors of Panchal (-now Punjab). They were appointed to take care of-protect, Arjun's chariot's wheels. Duryodhan pointed them out to be the ones to be eliminated at the earliest. They were killed while sleeping with Pandavs sons, by Ashwasthama.
SOUBHADR: Abhimanyu-son of Bhagwan Shri Krashn's sister Subhdra, was an incarnation of the son of Chandr Dev. He knew how to demolish-penetrate Chkr Vyuh (-cyclic formation-arrangements of battalions and columns of the army). He knew how to enter but unaware of the method to come out of it. He was killed by hatching a conspiracy by 7 stalwarts of the Kauravs army, under Jaidrath, by Dushasan's son by striking the mac over his head against settled practice of law. Later Bhagwan shri Krashn allowed Pandavs to use practices and principles unaccepted-recognised as war fare. Duryodhan was aware of his might and warning Dron against him.
DRAUPDEYASHCH: Draupdadi's 5 sons Prativindhy, Sutsom, Shrutkarma, Shtaneek and Shrutsen were killed by Ashwasthama while asleep. Duryodhan wanted to kill them to tease Draupadi, who had insulted him in the open court by calling him: Blind-the son of blind.अंधे का अँधा! 
SARV EV MAHARATHA: All these warriors are great-mighty-brave and seasoned and capable of guiding-heading 10,000 archers alone, at the same time, simultaneously.
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम:| नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥ 1-7॥ 
भावार्थ:  हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान हैं, उनको आप समझ लीजिए। आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनको बतलाता हूँ। 
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम:   हे द्विज श्रेष्ठ! हमारी में उनकी सेना से अधिक योग्यता-विशिष्टता वाले सेनापति-महारथी हैं।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते: मेरी सेना में भी जो विशिष्ट व्यक्ति, सेनापति, सेनानायक, महारथी हैं, उनसे तो आप परिचित हैं ही। वो कहना चाहता था कि पाण्डवोँ की तुलना में कौरव किसी भी तरह कमजोर नहीं थे। फिर भी नीति के अनुसार शत्रु को किसी भी तरह कमजोर नहीं समझना चाहिये। यहाँ यह भी प्रतीत होता है कि वो मन ही मन पांडवोँ से भयभीत था क्योंकि धर्म उसके पक्ष में नहीं था। पांडवोँ के साथ भगवान श्री कृष्ण थे। हर अत्याचारी-दुराचारी जनता है कि वह गलत कर रहा है। 
O!The great Brahmn! Let me name-elaborate-describe the chiefs-commanders in my army-on our side.
ASMAKAM TU VISHISHTHA YE TANNIBODH DWIJOTTM: O! The great Brahmn philosopher-enlightened-Guru, our army has more senior-experienced-mature-seasoned commanders as compared to the army of the Pandavs.
NAYKA MM SAINYSY SNGYARTHAM TANBRVIMI TE: He was trying to press that his army not weak as compared to the Pandavs. He said that the Guru knew all  the mighty-brave-acknowledged-recognised warriors in his army. Still  he was afraid of the Pandavs. He wanted assurance-reconciliation-assurance-encouragement-backup from the Guru. Every sinner-wicked know it for certain that he is on the wrong path. He is sure to be doomed.
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः। अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥1-8॥
भावार्थ :  आप-द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्राम विजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा।
भवान्भीष्मश्च: आप आचार्य द्रोण और भीष्म पितामह,  सेना में सबसे विशिष्ठ और महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। इस पूरे संसार में आपके समकक्ष तीसरा कोई भी व्यक्ति नहीं है। अगर आप अपनी पूरी शक्ति-ताकत लगा कर युद्ध करें तो देवता, राक्षस, यक्ष और मनुष्य आदि में कोई भी ऐसा नहीं है, जो आपके सामने ठहर सके। उसको इस बात का भान-ज्ञान था कि दोनों ही उसके आचार-व्यवहार से खुश नहीं थे, बल्कि मजबूरी में उसका साथ दे रहे थे। पूरा संसार इस बात से विगत था कि भीष्म आबाल ब्रह्मचारी थे और उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान था। आचार्य की हत्या धृष्टद्युम्न ने तब की, जब उन्होंने शस्त्र त्याग दिये और भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण होने पर, माता गँगा के आदेशानुसार प्राण त्यागे।                                     
कर्णश्च : कर्ण शूरवीर है और पांडव सेना को विजय करने को अकेला ही काफी है। उसके सामने अर्जुन कुछ भी नहीं। सूर्य पुत्र कर्ण जन्म से ही कवच और कुण्डल लेकर पैदा हुआ था, जिनके रहते उसको मारना सम्भव नहीं था।  परन्तु उसे भगवान परशुराम का श्राप भी था कि जिस वक्त उसे अस्त्र-शस्त्रों की आवश्यकता सबसे अधिक होगी वो उसके काम नहीं आयेंगे।उसका वध अर्जुन द्वारा हुआ।       
कृपश्च समितिञ्जयः कृपाचार्य चिरंजीवी हैं और हमारे परम हितैषी हैं। वे पराक्रमी और अजेय हैं। दुर्योधन को कर्ण पर इन तीनों से ज्यादा विश्वास था।
अश्वत्थामा:  चिरंजीवी हैं और बहुत ही शूरवीर हैं। उन्होंने अस्त्र-शस्त्र विद्या आपसे सीखी है। यद्यपि द्रोणाचार्य अपने पुत्र को अपने प्राणों से ज्यादा प्यार करते थे; तथापि उन्होंने उसे शिष्य के तौर पर अर्जुन से श्रेष्ठ नहीं पाया। ब्रह्मास्त्र का ज्ञान देते समय उन्होंने कहा कि किसी  परिस्थिति में इसे मनुष्यों पर नहीं छोड़ना।अश्वत्थामाने उसका चलाना तो सीख गया, परन्तु उसे लौटाना उसके लिए संभव नहीं था क्योंकि वो ब्रह्मचर्य-सात्विक प्रवृति का पालन नहीं कर पाता था। उसने उस अस्त्र को अभिमन्यु की पत्नी के गर्भ पर छोड़ दिया। गर्भ की रक्षा भगवान श्री कृष्ण ने की और अश्वत्थामा की मस्तक मणि निकाल ली गई। 
विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च: आप यह न समझें कि केवल पाण्डव ही धर्मात्मा हैं।  हमारी सेना में भी मेरा भाई विकर्ण बड़ा धर्मात्मा और शूरवीर है। हमारे प्रपितामह शान्तनु के भाई बाहील्क के पौत्र तथा सोमदत्त के पुत्र भूरिश्र्वा भी बड़े धर्मात्मा हैं। इन्होने भी बहुत बड़ी-बड़ी दक्षिणाओं वाले अनेक यज्ञ किये हैं। ये बड़े शूरवीर और महारथी हैं। दुर्योधन का भाव यह था कि उसकी सेना में दो चिरंजीवी वव  एक ऐसा व्यक्ति-भीष्म था जिसे उसकी इच्छा के बगैर मारा नहीं जा सकता था।
Duryodhan continued describing the main warriors: You-Achary Dron, Bheeshm, Karn, Krapachary-who is a winner of wars (-brother in law of Dron, maternal uncle of Ashwasthama and one who would not die like Ashwasthama), Ashwasthama, Vikarn-Duryodhan's brother and Bhurishrwa the son of Somdutt, are the main stalwarts-leaders. Though a great warrior, he did not mention his name.
BHAWANBHISHMSHCH: Both you and Bheeshm are the most important and significant person, who do not have a parallel in the whole world. If either of you fight with full force-strength deities, demons-Rakshas, Yaksh or the humans can not face-stand before you. You are famous-known all over the world. Bheeshm was an ascetic (-chastity), since childhood, with the boon-blessing to have death at his own will.
Dron was killed by Dhrashtdyumn  and Bheeshm left the human body when Sun turned to northern hemisphere-auspicious death.  
KARNASHCH: Karn is brave and sufficient to win the army of Pandavs. Arjun carries no weight against him.He-the son of Sun was born with Kavach(-divine Armour) and Kundal  (-rings) it was not possible to kill him, till these two were on his body. He had the curse of Bhagwan Shri Parsuram that the weapons and the art of war-training, he obtained from Bhagwan Parsuram, will desert him, when he will need them the most. He was killed by Arjun. He donated the Kavach and Kundals when Indr begged them as Brahmn, though he was warned in advance by his father the Sun God. He promised to Kunti-his mother that she would have 5 sons, whatever the result of war. He was the greatest donor of his time.
KRAPASHCH SMITINJY: Krapachary could not be killed (-immortal) like Ashwatthama being beyond the limits of death. He described him as a great warrior and one who could not be defeated. Duryodhan relied more on Karn as compared to him.
Here a point needs elaboration that Dronachary, his brother in law Krapachary and son Ashwasthama could not not go against his will.He could influence Bheeshm as well. Therefore Duryodhan took the option of pleasing Dronachary through flattery.
ASHWATTHAMA: Ashwatthama is immortal and a great warrior. He has learnt the art of war and weaponry from you. Though Dron loved Ashwatthama more than his own life yet, he did not recognize him as virtuous learner-disciple as compared to Arjun. He impart the knowledge of using Brahmastr to both of them, but cautioned them not to use it over the humans under any circumstances. He directed them to use restraint, even when it had to be used over any other species, due to its destructive powers. Ashwatthama was not righteous. He did not follow the Vern Dharm meant for the Brahmns. He targeted Arjun with the desire to kill him and Arjun projected it just to hold Brahmastr launched by Ashwatthama. At this juncture Vyas Ji and Narad Ji came in between the two Brahmastr. Arjun recalled his Brahmastr but Ashwatthama failed to do it and redirected it to the womb of Abhimanuy's wife. Bhagwan Shri Krashn saved the unborn child. A jewel in the forehead of Ashwatthama was taken away from him and he was set free to roam over the earth.
VIKRANSHSHCH SOUMDATTISTTHAEV CH: Don't think that only the Pandavs have virtuous-righteous-pious people in their army, there is no dearth of virtuous people in our army. My brother Vikarn is a great warrior and religious illustrious person. The grandson of the brother of our great grandfather Shantnu's brother Bahilk and the son of Bhurishrwa is also a very pious and religious person. He has  organised many Yagy-holy fire sacrifices with huge donations. He is a great warrior too.
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः। नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥1-9॥
भावार्थ:  इनके अतिरिक्त और भी बहुत से शूरवीर हैं जिन्होंने मेरे लिए जीवन की इच्छा-आशा का भी त्याग कर दिया है  और जो अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित और सब-के-सब युद्ध कला में अत्यंत निपुण हैं। 
अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः: अभी तक मैने जिन लोगों के नाम लिए हैं उनके अलावा बाहील्क, शल्य, भगदत्त, जयद्रथ, जैसे बहुत से शूरवीर महारथी हैं जो मेरे लिए अपने जीवन का उत्कर्ष करने के लिए यहाँ आये हुए हैं। वे भले ही मर जाएँ परन्तु युद्ध भूमि से हटेंगे नहीं। 
 नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ये सभी लोग हाथ में पकड़ कर तलवार, गदा, त्रिशूल, आदि नाना प्रकार के हथियार-शस्त्र के उपयोग में सिद्धहस्त हैं। फैंक कर प्रहार करने वाले बाण, तोमर, शक्ति, आदि अस्त्रों में भी निपुण हैं। ये युद्ध की  विधा से वाकिफ हैं।
Other than these there are many more  warriors , who are prepared-willing to sacrifice, their lives for my sake and they are well armed and experts in war. 
ANYE CH BHVH SHURA MADRTHE TYKTJIVITAH: Other than these, who have been named by me, there are the warriors who are well equipped-trained-experienced and willing to sacrifice their lives for me like Bahilk, Shaly, Bhagdatt and Jaidruth.
NANA SHASTR PRHRNAH SARVE YUDDH VISHARDAH: They are experienced-well versed in using the weapons like sword, mac, trident held in the hand and the others are thrown like arrow, tomar and shakti in addition to he use of various astr.
The trick failed to impress Achry Dron.
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌॥1-10॥
भावार्थ:  हमारी वह सेना पांडवों पर विजय प्राप्त करने में असमर्थ  क्योकि उसके संरक्षक (-उभय पक्षपाती) भीष्म पितामह हैं। भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना हमें जीतने में समर्थ है, क्योंकि इसके संरक्षक भीम हैं। 
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌: द्रोणाचार्य को चुप देखकर दुर्योधन के मन में अन्याय और अधर्म पर चलते हुए विचार आया कि हमारी सेना बड़ी होने पर भी पाण्डवों पर विजय पाने में असमर्थ है, क्योंकि इसमें मतभेद हैं, एकता का अभाव है, उतनी निर्भयता-नि:संकोचता नहीं है, जितनी कि पांडव सेना में है। भीष्म पितामह उभयपक्षपाती हैं, उनके हदय में कृष्ण भक्ति और युधिष्टर की लिए प्यार व सम्मान है। अर्जुन पर बड़ा स्नेह है और वे पाण्डवों का भला चाहते हैं। वे हमारी सेना के सेनापति होकर भी अंदरुनी तौर पर पाण्डवों के साथ हैं। ऐसी दशा में हमारी सेना पांडवों से समर्थ नहीं हो सकती। 
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌: पाण्डवों की यह सेना जीतने में समर्थ है, क्योंकि इसमें मतभेद नहीं हैं, एकमत  है, संगठित है, भीम द्वारा रक्षित है। भीमसेन बचपन से ही दुर्योधन को हराता आ रहा था, वो उसे उसके 100 भाइयों के साथ मारने की प्रतिज्ञा कर चुका था और उसके जहर पिलाने पर भी जिन्दा था, उसमें 10,000 हाथियों का बल था और शरीर वज्र के समान था। दुर्योधन बचपन से ही भीम के बल और पराक्रम से भयभीत रहता था। इसलिए उसने कहा कि पांडव सेना भीम से रक्षित है। 
Achary Dron did not react to the utterances of Duryodhan-maintaining his cool-keeping quite-silence, which engulfed him with the feeling that his army protected and led by Bhishm is insufficient-incapable, since Bhishm is neutral, while Pandavs army can not be won-is beyond measure-sufficient to defeat mine, since its headed-led by Bhim, its own commander.
APARYATM TADSMAKM BALM BHISHMABHIRKSHITM: Silence of Dron forced Duryodhan to think of his irreligiosity-unlawfulness. He thought that his army was incapable of winning Pandavs since it lacks coordination, unity, internal freedom and has hesitation as compared to Pandavs army.
PARYAPTAM TVIDMETESHAM BALM BHIMABHIRAKSHITM: The army of Pandav's is capable of winning, as it has no differences, united and protected by Bhim Sen. Bhim Sen had been defeating Duryodhan from childhood and was under oath to kill-eliminate his 100 brothers (-including him) and survived even after being poisoned by him. He had the strength-potential of 10,000 elephants and his body was as strong as Vajr. Duryodhan was afraid of Bhim Sen's might-power and suffered from inferiority complex. Therefore, he thought that Pandavs army was safe-protected under him. 
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः। भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥1-11॥
भावार्थ: इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए, आप लोग सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करें। 
आप सभी महारथियों की जिन-जिन मोर्चों पर तैनाती की गई है, उन पर मजबूती से स्थित रहकर हर तरीके से भीष्म पितामह की रक्षा करें। 
पितामह अपनी और सेना की रक्षा करने में समर्थ थे, फिर भी यदि यह कहा गया तो उसके पीछे एक मात्र कारण शिखंडी था, जिस पर पितामह किसी भी परिस्थिति में शस्त्र नहीं उठाने वाले थे। शिखण्डी पूर्व जन्म में काशिराज की वह कन्या था जिसका विवाह नहीं हो सका तो उसने तपस्या की और भगवान शिव से उनकी मृत्यु का वरदान माँगा। 
Now Duryodhan addressed all his stalwarts-commanders-mighty warriors that they should occupy their strategic positions and protect Bhishm Pitamh.
Duryodhan directed all his captains to protect Bhishm Pitamh by occupying their strategic locations, in best possible manner. Only reason for this order was Shikhandi, who was the 3rd daughter of Kashi Raj, whom Bhishm picked up for marrying Chitr Viry and Vichitr Viry his step brothers from Saty Vati, in her earlier birth. She requested Bhishm to marry her. Under oath Bhishm could not marry her. She went to forest and begun asceticism-meditation-chastity and prayers to seek boon from Bhagwan Shiv to kill Bhishm. In this birth she became Shikhandi, who was an impotent-Hizra-Kinner. Bhishm had vowed not to kill Kinner-Woman in the war. He was aware of his past identity.
(दोनों सेनाओं के द्वारा शंख-ध्वनि SOUND OF SHANKH BY BOTH ARMIES)
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः। सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मौ प्रतापवान्‌॥1-12॥
भावार्थ:  कौरवों में वृद्ध बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए उच्च स्वर से सिंह की दहाड़ के समान गरजकर शंख बजाया।                               
तस्य सञ्जनयन्हर्षं: भीष्म पितामह ने जब शंख ध्वनि की तो दुर्योधन के ह्रदय में हर्ष-खुशी का संचार हुआ। दुर्योधन एक निर्णायक युद्ध चाहता था, जिससे कि पांडवों का अस्तित्व मिट जाये और वह निष्कंटक हो जाये।शंख ध्वनि युद्ध आरम्भ करने की प्रक्रिया थी।
कुरुवृद्धः  यद्यपि आयु की दृष्टि से बाहिल्क बड़े थे, तथापि मुख्य सेनापति होने, धर्म, ज्ञान, ईश्वरीय भक्ति, माँ गँगा के पुत्र होने-दैवीय सम्बन्ध, परशुराम जी के शिष्य होने और अनेकानेक युद्धों में विजय हासिल करने के कारण उन्हें ही वयोवृद्ध माना गया। 
प्रतापवान्‌: भीष्म पितामह ने अपनी प्रतिज्ञा के कारण विवाह नहीं किया, चित्र वीर्य और विचित्र वीर्य के विवाह हेतु काशिराज की कन्याओं का हरण करते वक्त सभी क्षत्रियों को पराजित किया। उनको शस्त्र और शास्त्र पर समान अधिकार था, इच्छा मृत्यु का वरदान था, परशुराम जी के शिष्य थे, मृत्यु शय्या पर भगवान कृष्ण ने युधिष्टर से कहा कि यदि धर्म सम्बन्धी कोई शंका हो तो भीष्म पितामह से पूछ लो। इससे उनकी प्रतिभा और प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
पितामहः दुर्योधन की चालाकी ताड़ने के बावजूद भीष्म पितामह ने वात्सल्य भाव के कारण दुर्योधन का मन रखने (-खुश करने को शंख बजाया), जबकि द्रोण चुप रहे।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मौ: शंख की आवाज ऐसी थी जैसी कि सिंह की गर्जना हो; जिसे सुनकर बड़े-बड़े पशु भी भयभीत हो जाते हैं।                                             
The eldest and most effective amongest the Kauravs-Bhishm Pitamh, blew the conch, giving pleasure-reassuring Duryodhan with loud sound like a roar of lion.
TASY SANJNYAN HARSHAM: Blowing of conch gave pleasure to Duryodhan, who was eager to fight a decisive battle-war with the Pandavs, so that he could rule without any hurdles.Quarrelsome-wretched-notorious people find pleasure in fighting. Such people create opportunities, so that others can involve in infighting. 
KURUVRDDHH: Bhishm Pitamh is designated as eldest by virtue of position-seniority-capability, Chief of the army, religiosity-chastity-asceticism, enlightenment, Vasu-a Demi God in previous life and being the son of Maan Ganga (-the divine connection), disciple of Bhagwan Shri Parsuram Ji, winner of many-many battles and capability to fight and satisfy his mentor-Guru Parshuram Ji in the fight, though Bahilk (-Shantnu's brother-Bhishm's uncle), was the eldest amongest the Kauravs.
PRATAPWAN: Bhishm Pitamh did not marry due to the oath of serving and protecting the throne of Hastinapur so that his children were not able to claim the right over the throne. He abducted the three daughters of the king of Kashi for his step brothers, by defeating all the kings, who gathered there. He had full command over weaponry and scriptures. He was blessed by his father to leave the human body according to his own will-desire. He was the best disciple of Bhagwan Parshuram Ji. Bhagwan Shri Krashn endorsed him, so that Yudhister could satisfy his quarries related to Dharm-duty-mode-art of living-dealings with citizens.
PITAMAH: Though Bhishm could see through the trick-cunning  behavior of Duryodhan, yet he blew the conch, just to satisfy-please-keep him happy. Both Dron and Bhishm were aware of his deceptive behavior. 
SINGHNADM VINDYOCHCHAEH SHANKH DDHMOU: The loud sound created by the conch was like the roar of the lion, enough to create terror in the big animals.
     ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः। सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌॥1-13॥
DHOL-ढोल 
भावार्थ:  इसके पश्चात शंख और नगाड़े तथा ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे। उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ-था।
ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः: इसके तुरंत बाद कौरव सेना में शंख, भेरी, पणव, आनक-पखावज, गौमुख-नरसिंघा, भीष्म पितामह के शंख बजाने पर बज उठे। भीष्म पितामह ने शंख केवल दुर्योधन को आश्वस्त करने के बजाया था, ना कि युद्ध की धोषणा के लिये। ये सभी बाजे राजाओं के महल और मन्दिरों में  शुभ कार्य दिन आरम्भ करने-होने पर बजाये जाते हैं।
Nagada, Musical Instrument Painting on Marble with Wood Frame
NAGADA-नगाड़ा 
सहसैवाभ्यहन्यन्त: कौरव सेना में बहुत जोश था, क्योंकि वह निरन्तर युद्ध का अभ्यास और इंतजार कर रही थी। दुर्योधन ने पाण्डवों को वन में भेजकर युद्ध की तैयारी आरम्भ कर दी थी। वो स्वयं प्रतिदिन युद्ध का अभ्यास करता था। उसने 13 सालों में अनेक राजाओं और युद्ध की चाहत रखने वालों से सन्धियां की थीं। उसके मित्र और सलाहकार कर्ण, अश्त्थामा, शकुनि को युद्ध का बेसब्री से इन्तजार था। क्षत्रिय का स्वभाव उसे युद्ध में प्रवृत करता है। इसीलिये परशुराम जी को उन्हें 21 बार धरती से मिटाना पड़ा था। दूसरों पर शासन करना-दबाना-अत्याचार करना उनकी स्वभाविक प्रवृति है। क्षत्रिय को बचपन से ही सिखाया जाता है-घुट्टी में पिलाया जाता है कि युद्ध में मृत्यु, उसे स्वर्ग ले जायेगी (-उसने स्वर्ग देखा ही नहीं है-जन्नत का सपना) युद्ध में पीठ दिखाना कायरता-जघन्य पाप है, आदि। 
JACHTHOORN-TURHI
स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌: विभिन्न विभागों-टुकड़ियों में सनन्न-तैयार खड़ी कौरव सेना के शंख-बाजे और मुँह से प्रसन्नता की आवाजों ने बेहद भयंकर शब्द किया और आबाजें गूंजने-प्रतिध्वनित होने लगीं। 
JACHTHOORN-TURHI
Soon after the blowing of conch by Bhishm, Kaurav army too, started blowing conchs, drums, cymbals and gongs in unison leading to production of echo and loud noise.
TTH SHANKHASHCH BHERAYSHCH PANVANAKGOMUKHAH: Blowing of conch by Bhishm, followed by blowing of conchs, beating of drums, cymbals and gongs by Duryodhan's army.
NAGADA
SHSAEVABHYHANYANTH: The Kaurav army was in great enthusiasm-preparedness, since Duryodhan had been preparing for the war relentlessly all these years, when Pandavs were in exile for 13 years. He entered into war treaties with like minded people (-wicked, having lust for war). The band was waiting for instructions to begin its job.The Kshtriy (-Marshal castes) has a natural tendency to tease, rule, oppress others. Due to this reason Parshuram Ji had to eliminate them 21 times from this earth. 
From the early childhood infancy he is nurtured-nursed with the idea-misconception that his death in the battle field-war, will take him to heaven (-which has not been seen by him-its only a dream).
NAGADA
Here the main point is that as per scriptures, only that person goes to heaven, after death, in a war-battle field, who has fought-sacrificed his life for a virtuous-righteous-pious cause, safety of his mother land, against the oppressor-traitor-wretched-sinner-terrorist-jihadi-brutal murderer. The Muslim traitors-terrorists-traitors are indiscriminately killing the innocents, while covering their face to avoid recognition. Take the case of Alexander, the British who invaded India, will certainly serve their term in hell.
At least one the two parties fighting a war is at fault, like Kauravs. There are chances that both of them are over the wrong foot. Hence they deserve hell.
S SHABDSTUMULOABHVAT:  Various units-columns-divisions of the army, which were ready and waiting for the orders to fight; generated loud-furious noises by using band-orchestra and mouth, depicting happiness which echoed and reverberated.
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ। माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥1-14॥
भावार्थ:  इसके अनन्तर सफेद घोड़ों से युक्त उत्तम रथ में बैठे हुए श्रीकृष्ण महाराज और अर्जुन ने भी अलौकिक शंख बजाए। 
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते: चित्ररथ नाम के गन्दर्भ ने अर्जुन को 100 धोड़े दिए थे। युद्ध में चाहे कितने भी घोड़े मर जायें इनकी संख्या उतनी ही बनी रहती थी। ये पृथ्वी, स्वर्ग या कहीं भी जा सकते थे। उन्हीं में से 4 सुन्दर और प्रशिक्षित घोड़े उस दिव्य रथ में जुड़े थे, जिसकी ध्वजा में कपि चिन्ह अंकित था। उसकी रक्षा स्वयं हनुमान जी कर रहे थे।
महति स्यन्दने स्थितौ: यह रथ बहुत विशाल था। यह अग्नि देव द्वारा अर्जुन को दिया गया था, क्योंकि उन्होंने अग्निदेव का अजीर्ण दूर करने के लिये उन्हें विलक्षण जड़ी-बूटियों से भरपूर खाण्डववन को जलाने में उनकी सहायता की थी; इन्द्रदेव द्वारा की गई बरसात को रोक कर। नौ गाड़ियों में लदे वजन के बराबर अस्त्र-शस्त्र इसमें आ जाते थे और इसकी पताका एक योजन (1योजन=4 कोस, 1  कोस=2 1/2  मील, 1 मील =1. 6 किलोमीटर ) तक लहराती रहती थी। न इसमें बोझ था, ना कहीं अटकती थी और न ही कहीं रूकती थी। इस ध्वजा पर हनुमान जी विराजमान थे। इसके पहिये बड़े मजबूत और विशाल थे।  यह सोने से मढ़ा था। 
उस सुन्दर और तेजोमय रथ पर श्री कृष्णऔर अर्जुन के विराजमान होने से उस  शोभा और बढ़ गई थी। 
माधवः पाण्डवश्चैव: मा माँ लक्ष्मी जी को कहते हैं और धव का अर्थ है पति; अर्थात लक्ष्मीपति नारायण। पाण्डव अर्जुन का सम्बोधन हैजो नर के अवतार थे। जहाँ नर-नारायण हैं वहाँ श्री, विजय, विभूति और अटल नीति रहेंगी।
दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः: भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन ने अपने दिव्य, अलौकिक, तेजोमय शंखों को बड़े जोर से बजाया। यद्यपि सेनापति धृष्टद्युम्न थे तथापि सैन्य संचालन स्वयं भगवान श्री कृष्ण ही कर रहे थे। अश्वमेध यज्ञ के अवसर पर भी युधिष्टर द्वारा प्रथम पूजन-अग्र पूजा उनका ही किया गया था, यद्यपि भीष्म पितामह उपस्थित थे और इसमें उनकी सम्मति थी। बाल्यावस्था से ही बड़े-बूढ़े-प्रबुद्धजन उनकी बात का सम्मान करते थे। शिशुपाल, कंस, जरासंध, दुर्योधन, धृतराष्ट्र आदि नहीं। उनके कहने पर ही गोकुल वासियों ने इन्द्र की पूजा बंदकर दी थी। 
Soon there after (-in response to this),  Arjun and Shri Krashn sitting over the great chariot (-provided by Agni Dev-deity-demigod of fire) having white horses too,  blew their divine conchs.
TTH SHAWETAERHYAERYUKTEH: Gandarvbh named Chirarath gave 100 divine white horses to Arjun. The specialty about them was that, they would remain 100 in number even after the death of any number of horses. These horses were capable of going to any place in the universe, including the heavens. Out of these 100 horses, 4 beautiful and trained horses were yoked in the divine chariot driven by Bhagwan Shri Krashn. 
MAHTI SAYNDNE STHITOU: This chariot was very large gifted by Agni Dev for the help given to him by Arjun in engulfing-burning the Khandav Van jungle-forest, full of valuable herbs to cure indigestion, he had due to eating the offerings made by the devotees, made with ghee-clarified butter. It could store weapons equivalent to 9 carts. It was made of gold. Its wheels were very strong and large. The flag-mast over it, was more than 1 Yojan (1 Yojan=4 Kos, 1 Kos=2 1/2 mile, 1 mile=1.6 km) or 10 miles in length (-16 km). The flag was occupied by Hanuman Ji Maharaj. This flag had the specialty of being extremely light weight, and did not struck any where in trees or any thing else.
The elegance-beauty of the chariot enhanced by the presence of Bhagwan Shri Krashn and Arjun.
MADHAVH PANDAVSHCHAEVH: Ma stands for Maan Laxmi-the goddess of all glory-money-riches-comforts and Dhav depicts husband i.e., Narayan-Bhagwan Vishnu. The presence of Nar & Narayan ensures riches-victory-glory and firm righteous policy.
DIVYOU SHANKHOU PRADDHMATUH: Bhagwan Shri Krashn and Arjun blew their divine-eternal-lustrous conchs on a high note-volume-sound. Though Dhrastdyumn was the commander in chief, yet in reality the army was acting over the guidance-command of Bhagwan Shri Krashn. At the auspicious occasion of Ashwmedh Yagy, first celebrity of honor was Krashn with the consent and advice of Bhishm, though Bhishm was the eldest and honored amongest Kaurav and Pandavs. From early childhood, elders-enlightened-honored people respected his words. Shishupal, Kans, Jarasandh, Duryodhan, Karn and Shakuni did not pay heed-attention to him and were doomed. People of Gokul stopped paying obscene-respect-honor to Indr on his advice.
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः। पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः॥1-15॥
भावार्थ :  श्रीकृष्ण महाराज ने पाञ्चजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त नामक और भयानक कर्मवाले भीमसेन ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया।
इन तीन शंखों की मिली जुली आवाज कौरवोँ की सेना का दिल दहलाने वाली थी और पाण्डव सेना में ख़ुशी की लहर। 
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो: हृषीकेश अंतर्यामी और सभी इन्द्रियों के स्वामी हैं। उन्होंने गुरु संदीपन के पुत्र की तलाश में समुद्र में बलराम जी साथ प्रवेश किया और समुद्र के कहने पर पञ्चजन नामक शंखरूपी राक्षस को मार कर उसको शंखरूप में गृहण किया था, इसलिए यह पाञ्चजन्य कहलाया। 
देवदत्तं धनञ्जयः: देवदत्त नामक शंख इन्द्र देव ने अर्जुन उस वक्त दिया था जब वे निवातकवच आदि दैत्यों  के साथ युद्ध कर रहे थे। इस शंख की आवाज सुनकर शत्रु सेना घबरा जाती थी। राजसूय यज्ञ करते समय जब धन की आवश्यकता हुई तो अर्जुन ने अनेक राजाओं को जीत कर धन इकट्ठा किया थश इसलिए धनञ्जय कहलाये।   [संस्कृत भाषा में नाम संज्ञा होते हुए भी व्यक्ति विशेष की विशेषता बतलाता है। भगवान के सभी नाम उनके द्वारा किये गए किसी विशिष्ट कार्य के द्योतक हैं ]
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः: पौण्ड्र नामक बहुत विशाल था और भीम के नाम के अनुरूप था। भीम कर्मा उन्हें इसलिए कहा गया, क्योंकि उनके हाथों हिडिम्बासुर, जरासंध, बकासुर, जटासुर, कीचक जैसे असुर और बलवान व्यक्तियों को मारा गया। भीम को भूख बहुत लगती थी और वे शेष 4 पाण्डवोँ के भोजन के बराबर अकेले ही खाते थे क्योंकि उनके उदर में जठराग्नि के अलावा वृक नामक अग्नि भी थी जो उनकी भोजन पचाने की क्षमता को बढ़ाती थी। 
Bhagwan Krashn master of all senses and aware of  each and every activity in this universe blew his conch called Panchjany, Arjuna blew his divine conch called Devdutt and Bhim the performer of unimaginable furious-dangerous deeds blew his conch Pondr which was very large.
This loud and penetrating sound was sufficient to generate fear in Kaurav armies and happiness in the Pandav forces.
PANCHJANYM HRISHIKESHO: Hrishikesh Bhagwan Shri Krashn, aware of each and every activity of the universe, controls all the sense organs of all creatures-organisms. He entered the ocean in search of the lost son of his Guru Sandipan, when Guru Mother asked him to bring him back from the ocean, who was assumed-considered to be eaten by the demon named conch due to his shape and size. Bhagwan killed the Rakshas and kept his shinning-glowing-lustrous shell with him. This shell was named after the demon. 
DEVDUTTM DHANANJAYHIndr awarded the conch named Devdutt to Ajun, while he was eliminating the demons-Rakshas-giants called Nivatkavach. its sound was furious tearing through the hearts of the opponents-enemies army. Arjun was nick named Dhananjay because of his ability to win-defeat many kings in wars and collecting a lot of money for donation and rituals-ceremonies, in the Rajsuy Yagy performed by Yudhister.  
PONDRAM DDHMOU MAHASHANKH BHIMKARMA VRKODARH: The conch shell named Pondr was very large and produced ear deafening irritating sound and matched Bhim's name. He was called Bhim because he killed many mighty people like Jarasandh and Keechak in addition to various furious demons like Hidimbasur, Bakasur, Jatasur etc. Bhim felt strong hunger for food because of the presence of an addition digestive enzyme called vrk besides jathragni. 
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥1-16॥
भावार्थ:  कुन्ती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक और नकुल तथा सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए। 
कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः  पाण्डु की दो रानियां थीं। पहली कुन्ती-प्रथा और दूसरी माद्री। युधिष्टर कुंती के व नकुल और सहदेव माद्री के पुत्र थे।
राजा: युद्ध से पहले युधिष्टर राजा थे और बनवास की समाप्ति के बाद भी वे पुनः राजा हो गये भले ही राज्य उन्हें नहीं मिला। युद्ध के बाद तो राज्य उन्हें मिलना ही था। क्योंकि युधिष्टर राजा हैं और भगवान श्री कृष्ण के कृपा पात्र भी हैं अतः शेष तीनों भाइयों ने भी शंख बजाकर युद्ध की सम्मति-सहमति प्रकट कर दी। 
King Yudhishtr-the son of Kunti, blew his conch Anant Vijay, Nakul blew his conch Sughosh and Sahdev his conch Manipushpak.
KUNTIPUTRO YUDHISHTRH: King Pandu had two queens. Kunti was his first wife while Madri was his second wife. Madri was an expert in chariot driving and war fare and was more near to him. Yudhistr got birth from Kunti and Nakul and Sahdev took birth from Madri. By blowing their conchs they approved-their consent for the beginning of battle.
RAJA: Sanjay addressed Yudhistr as Raja-king, since he was the king before going to exile and was supposed to be the king after the exile was over and Sanjay could see due to his ability to see through the future, granted by Ved Vyas that he would be the king after the battle again.
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः। धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥17॥ 
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते। सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌॥1-18॥ 
भावार्थ:  श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखण्डी एवं धृष्टद्युम्न तथा राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजावाले सुभद्रा पुत्र अभिमन्यु-इन सभी ने, हे राजन्‌! सब ओर से अलग-अलग शंख बजाए।
महारथी शिखण्डी: पूर्व  जन्म में वह काशी राज की कन्या था और इस जन्म में वह द्रुपद की कन्या बन कर पैदा हुआ था। स्थूलाकर्ण  नामक यक्ष ने उसे पुरुषत्व प्रदान किया। संसार उसे नपुंसक के रूप में जानता था और पितामह भीष्म उसे एक स्त्री ही समझते थे।इस तरह वो द्रोपदी और धृष्टद्युम्न की बहन हुआ। 
अभिमन्यु: अभिमन्यु सुभद्रा का पुत्र था।  वह एक महान सेना नायक और अपने पिता अर्जुन के समान महारथी-शूरवीर था। उसकी भुजाएं बहुत लम्बी थीं। उसे अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने प्रदान की थी। वह चन्द्र के पुत्र का अवतार-अंश था। चक्रव्यूह का संसाधन उसने माँ के गर्भ में ही सीख लिया था, जबकि अर्जुन सुभद्रा को चक्रव्यूह का भेदन समझा रहे थे। उसे इस व्यूह से निकलना नहीं आता था। उसकी हत्या कौरव सेना के 6 महारथियों ने षड्यंत्र करके की थी। दुःशासन के पुत्र ने नियम के विरुद्ध उसके सर पर गदा से प्रहार किया जिससे उसकी मृत्यु हो गई। इसके दण्ड स्वरूप जयद्रथ को अर्जुन ने मारा। 
संजय ने शंखनाद करने वालों में कौरव पक्ष से केवल पितामह भीष्म का ही नाम लिया जबकि पाण्डव पक्ष के 18 वीरों के नाम लिये। यह दर्शाता है कि संजय स्वयं धर्म के पक्ष का आदर करता था। सूत-निम्न वर्ण में जन्म लेने के बावजूद संजय एक विद्वान और नीतिकुशल व्यक्ति थे।
Kashiraj-The king of Kashi with excellent bow, great charioteer  Shikhandi, Dhrashtdyumn , Virat, Satyaki-one who never faced defeat, king Drupad, all the 5 sons of Draupadi, and Abhimanyu-Subhadra's son, with long arms, blew their conchs separately from all directions.
MAHA RATHI-GREAT CHARIOTAR SHIKHANDI: He was the daughter of Kashi Raj in his earlier birth abducted by Bhishm to marry her, to either of his half bothers. In the current birth, he again took birth as the daughter of King Drupad, sister of Draupdi and Dhrashtdyumn. Later, he was converted into a male by a Yaksh called Sthulakarn. Every one recognised him as an impotent-Kinnar. Bhishm Pitamh considered him to be a female and advised Arjun to place him before him as a shield, to retire him from the battle field. 
ABHIMANYU: He was the component-partial incarnation of the son deity-demigod Chandr-Moon, born with long arms. He learnt the art of penetrating into the cyclic formation of the army columns, while he was in the womb of his mother Subhdra. He could not learn the later part of relieving himself from the Vyuh, since Arjun stopped elaborating it further, as she fall asleep. He was trained in the use of weaponry by Bhagwan Krashn himself. He was killed by 6 stalwarts of the Kaurav's army through a conspiracy hatched by Jaidrath-who was killed by Arjun, the same day. Dushasan's son struck his head with the mac against rules of war.
Sanjay named just Bhishm Pitamh, when the conchs were blown, while he named 18 stalwarts from Pandav's army, reassuring Yudhister of the result-consequences of war. While Duryodhan had been preparing for the war for 13 years, Pandavs had no opportunity for practice and preparations. Sanjay too honored Yudhister and his side because of righteousness attached to them. He was a learned man in spite of his birth in a low caste family.
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌। नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌॥1-19॥ 
भावार्थ:  और उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धार्तराष्ट्रों के अर्थात आपके पक्षवालों के हृदय विदीर्ण कर दिए। 
सभी शंखों के संयुक्त-तुमुल उद्घोष ने कौरव सेना के ह्रदयों को विदीर्ण कर दिया और उनका उत्साह भंग कर दिया। 
धार्तराष्ट्राणां: राजा के सम्मुख धार्तराष्ट्राणां कहना असभ्यता और अयुक्ति संगत लगता है। इससे यह जाहिर होता है कि यह शब्द वो लोग-आपके पुत्र, जिन्होंने अन्याय-अधर्म पूर्वक राज्य हथिया लिया था; के लिए आया है।  इससे यह भी स्पष्ट होता है कि तेरह वर्ष के समय में पाण्डवों की अनुपस्थिति में उनकी सेना को भी दुर्योधन ने किसी तरह से अपने पक्ष में कर लिया था। 
मनुष्य जब धर्म के पक्ष में-साथ होता है-सत्य के साथ होता है; उसे भय महसूस नहीं होता। पाप, अन्याय, छल-कपट से युक्त व्यक्ति के ह्रदय में चोरे होता है और उसे हर समय डर  बना रहता है। अतः मनुष्य को शारीरिक, वाचिक और मानसिक पाप से हमेशां दूर रहना चाहिये। 
That reverberating (-echoed and reechoed  in the earth and the sky) sound of conchs shattered the hearts of  the sons of Dhratrashtr.
The tumultuous sound of the conchs penetrated through the hearts of Kauravs demoralizing them.
DHARTRASHTRANAM: Use of this word in front of the king appears to be indecent and against etiquette's. So, it represents those who had captured the kingdom of Pandavs by cunningness-wickedness-fraudulent means i.e., the sons, brother in law-Shakuni, Karn and Ashwatthama. It further elaborates the deceptive means adopted by the Kauravs to bring the Pandavs army to their fold in the period of 13 years by hook or crook, successfully.
One becomes fearless, when he follows the righteous-pious-virtuous-honest path, associated with truth. On the other hand, if he is guilty, wicked, sinner, corrupt, dishonest, vulgar he is always shadowed by his deeds. Therefore, one should avoid the sin through body, speech and thoughts.  ( अर्जुन द्वारा सेना-निरीक्षण का प्रसंग )
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः। प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥1-20॥ 
अर्जुन उवाचः हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते। सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥1-21॥ 
भावार्थ:  हे राजन्‌-महीपते! शस्त्र चलाने की तैयारियों के दौरान अन्याय पूर्वक राज्य करने वाले राजाओं और उनके साथियों को व्यवस्थित रूप से खड़े देखकर, कपिध्वज अर्जुन ने हृषीकेश भगवान श्रीकृष्ण से कहा-"हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिए"।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते:  शंख ध्वनि को युद्ध आरम्भ करने की सूचना समझकर दोनों पक्षों के लोगों ने अस्त्र-शस्त्र उठा लिये और अर्जुन ने भी अपना गाण्डीव धनुष हाथ में ले लिया जो कि उन्हें वरुण द्वारा प्रदान किया गया था।
व्यवस्थितान् धार्तराष्ट्रान्‌ दृष्ट्वा: दुर्योधन ने सेनाओं को देखा और भागा-भागा द्रोणाचार्य के पास गया जबकि अर्जुन ने सेनाओं को देखा और गाण्डीव उठा लिया। जो भागा वो डरपोक-कायर और जिसने शस्त्र उठाया वो बहादुर था।
धनुरुद्यम्य: जाहिर है दुर्योधन भयभीत है और अर्जुन निर्भय, उत्साही और वीर थे। 
कपिध्वजः:पवन देव ने अपने दोनों पुत्रों की भेंट कराने की इच्छा  से एक दिन वनवास के दौरान द्रौपदी के सामने, एक सहस्त्र दिव्य कमल दल रख दिये, जिन्हें देखकर उन्होंने भीम से और फूलों की इच्छा जाहिर की। भीमसेन खोजते हुए कदलीवन में हनुमान जी के निवास तक जा पहुँचे। हनुमान जी ने उन्हें वरदान दिया कि वे भीमसेन के सिंह नाद को बढ़ा देेंगे और अर्जुन के रथ की ध्वजा पर बैठकर उनकी रक्षा करेंगे।सेनयोरुभयोर्मध्ये: सेनाओं के बीच में रथ खड़ा करने का उद्देश्य स्पष्ट है। विरोधी की शक्ति-सामर्थ का आकलन व उन स्थानों को देखना-परखना-ताड़ना जहाँ से  जहाँपर हमला करना उचित और लाभप्रद है।
Oh! The king-owner of land! During the course of preparations for launching weapons by your side (-the Kauravs and their wretched associates, who were ruling different states) who had acquired the Pandav's kingdom; standing in their respective  positions; Arjun blessed by the flat mast having the picture of Hanuman Ji besides his presence, requested  Bhagwan Shri Krashn-Hrashikesk (-Almighty who controls the sense organs), Achyut (-The Almighty who is ready-willing to help his devotees) please to take the chariot between the two armies.
PRAVRTTE SHASTRSAMPATE: The soilders of both sides picked up their weapons-arms and Arjun also picked up his Gandeev-bow, gifted to him by Varun (-deity-demigod of water).
VYVASTHITAN DHARTRASHTRAN DRASHTWA: Duryodhan glanced the two armies and at once realized the weakness of his side and quickly run towards Dronachary, while Arjun at once picked up his bow. Here the theme is that Duryodhan was coward-fearful, while Arjun was brave.
DHNURUDAYMAY: Its clear that Duryodhan afraid and Arjun was bold, energetic and brave-ready to fight.
KAPIDWAJ (-The flagstaff-mast with the sign of monkey): Pawan Dev-the deity-demigod of air wanted both of his sons to meet. He left one thousand divine Lotus flowers in front of Draupdi. Draupdi requested Bheem Sen to bring more flowers for her. She always asked only Bheem to fulfill her wishes, like killing of Keechak and washing of her hair with the blood of Dushashan, because of Bheem Sen's devotion-love-obsession for her. He smelled the scent of divine flowers and reached Kadli van (-banana groove), the residence of Hanuman Ji Maharaj. There, he was blessed by Hanuman Ji that he would increase his strength in the battle along with positioning himself over the flag of Arjun. The moment he deserted the chariot, after the war was over, it burnt. Due to his love for Arjun Hanuman Ji met him at two earlier occasions to control his ego.
SENYORUBHYORMADHYE:  Its a practical approach to judge the capability-might of the opposition and observe its weaknesses and loose ends, for maximum gains-immediate results.
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌। कैर्मया सह योद्धव्यमस्मिन् रणसमुद्यमे॥1-22॥ 
भावार्थ:  हे अच्युत (-भक्त वत्सल)! आप दोनों सेनाओं के मध्य में मेरे रथ को तब तक खड़ा रखिये जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में डटे हुए, युद्ध के अभिलाषी इन विपक्षी योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ। ताकि मैं जान सकूँ कि इस युद्ध रूपी व्यापार-उद्योग में, मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना मुनासिब है।
अर्जुन स्थिति का आकलन करना चाहते हैं और सोचते हैं कि कौरवों के पास ऐसा कौन सा सामर्थ पैदा हो गया कि उन्होंने सन्धि तक से इंकार कर दिया। युद्ध में शत्रु को अपने से कमजोर समझने वाले अक्सर भयानक गलतियां कर बैठते हैं और उन्हें रोने-पछताने  तक का मौंका नहीं मिलता। यहाँ अच्छी बात यह है कि अर्जुन को अपने हर शत्रु के बल का ज्ञान था। उन्हें भीष्म पितामह, आचार्य द्रोण और कृपाचार्प का अपने प्रति लगाव और प्रेम का आभास था और इसके साथ उनकी मजबूरी का आभास भी था। सबसे परेशानी-दुःख का विषय था, उनकी अपनी सेना का दुर्योधन के हाथों में होना, जिसको दुर्योधन ने 13 सालों तक पाला था-वह सेना नमक के कर्ज से दबी हुई थी। इसमें अधिकतम सेनापति, रथी, अधीरथी, महारथी ऐसे थे, जिनको अस्त्र-शस्त्र का ज्ञान स्वयं अर्जुन से मिला था। उससे भी ज्यादा परेशानी की बात तो यह थी कि नारायणी सेना के विरुद्ध भी, उनको लड़ना था। 
Arjun requested Bhagwan Shri Krashn-one who is willing to do everything for his devotee, to move the chariot to the middle of the battle field, to enable him to have a look at those, who were against him and to evaluate those, who were capable-eager of fighting with him. 
Arjun was aware of the capacity-might-ability-strength of every stalwart of enemies army.  He wanted to discover the new entrants in Kauravs army, who had encouraged Duryodhan not to enter the treaty. One who underestimate his opponents commit worst possible mistakes of his life, without having time to repent over them. He was aware of the love, admiration and affection he got from Bhishm Pitamh, Achry Dron and Krap. The tragedy was that his entire army was now with Duryodhan, since it was he, who fed them, for 13 years (-debt of salt), including his own trained captains. The worst of it was that the Narayni Sena was also going to fight a grim battle with those who were on his side. This is such a tough situation that can baffle even the genius. The tug of war started in the soul-brain and heart created an extremely tough situation for him.
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः। धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥1-23॥ 
भावार्थ:  दुर्बुद्धि-दुष्ट बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में हित-प्रिय चाहने वाले जो ये राजा लोग इस सेना में आए हुए हैं और युद्ध करने को उतावले हैं, इन सबको (-युद्ध करने वालों को) मैं देख लूँ। 
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धेर्युद्धे प्रियचिकीर्षवः घृतराष्ट्र और उसके पुत्रों-दुर्योधन आदि ने, अपनी दुष्ट बुद्धि-प्रवृति वश, बार-बार उन्हें मारने-अपमानित करने-राज्य हड़पने के षड़यंत्र किये थे। नियम-धर्म-राजनीति के अनुसार आधा राज्य पाण्डवों मिल जाना चाहिए था। परन्तु ऐसा नहीं हुआ, क्योंकि उसके सहयोगियों ने उसकी दुर्नीति का समर्थन किया और उसके साथ ही विनाश-नर्क के अधिकारी बन गये।
योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः: इन युद्ध के लिए उतावले लोगों को, जिहोने अधर्म-अन्याय का पक्ष लिया है, वे हमारे सामने टिक नहीं पायेंगे और नष्ट हो जायेंगे।
I want to see the kings who have come to help wicked-evil minded Duryodhan.DHARTRASHTRASY DURBUDDHERYUDDHE PRIYCHIKIRSHVAH: The sons of Dhratrashtr (-Duryodhan etc.) made repeated efforts to kill-insult and snatch-acquire their kingdom due to their evil-wicked mindedness. On the basis of established principles of politics-religion and the prevailing laws, the Pandavs should have been given, half of the kingdom. But it did not materialize, because their like minded accomplices supported them. They too sought hell after their death.
 YOTSYMANANVEKSHEAHM Y ETEATR SAMAGATAH: These warriors who are eager to fight and have supported irreligiosity-injustice will not be able to stand before us and will parish.
संजय उवाचः एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत। सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌॥1-24॥ भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌। उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति॥1-25॥ 
भावार्थ:  संजय ने कहा-हे भरत वंशी राजन्! निद्रा विजयी अर्जुन द्वारा कहने के अनुसार अन्तर्यामी भगवान श्री कृष्णश्रेष्ठ रथ को दोनों सेनाओं के बीच में भीष्म, द्रोण और समस्त राजाओं के सामने खड़ा दिया और कहा "हे पार्थ! युद्ध के लिए जुटे हुए इन कौरवों को देख"।
गुडाकेशेन: गुडा का अर्थ है मुड़े हुए या घुँघराले और केश मायने बाल तथा गुडाका+ईश का तात्पर्य है  निद्रा-नींद का ईश्वर-स्वामी अर्थात जिसका निद्रा पर काबू-आधिपत्य है। अर्जुन के बाल घुँघराले थे और उन्हें निद्रा पर काबू था। 
एवमुक्त: जो सभी बन्धनों से मुक्त परमात्मा का भक्त है-अर्थात मोक्ष का अधिकारी है। अर्जुन को निद्रा मुक्त कहा गया है यहाँ तात्पर्य विषय-सुख-भोग से मुक्ति है। ऐसे  व्यक्ति की बात को भगवान निवाहते हैं-स्वीकारते हैं-मान्यता देते हैं। अर्जुन ने वनवास के अन्तिम वर्ष का काल स्वर्ग में सशरीर बिताया था-जो कि एक मनुष्य-शरीरी के लिये असम्भव है। और समस्त सुख-भोगों को ठुकरा दिया था।  वे स्वयं नर थे, भगवान के अवतार। फिर भी तर्क की दृष्टि से भी यह आवश्यक था कि भगवान श्री कृष्ण और अर्जुन परिस्थिति का आकलन कर लें। भगवान को युद्ध का संचालन करना था और अर्जुन को युद्ध करना था।
ह्रषीकेश: ह्रषीक समस्त इन्द्रियों का द्योतक है और इसमें ईश जुड़ते ही यह बन गया इन्द्रियों के ईश्वर-स्वामी और युद्ध क्षेत्र में भगवान स्वयं अर्जुन की इन्द्रियों को संचालन करने वाले बन गये।
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌: ह्रषीकेश ने उस स्थान को रथ खड़ा करने के लिए चुना जहाँ भीष्म, द्रोण और समस्त प्रमुख कुरु समर्थक राजा दृष्टिगोचर हो रहे थे।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌: प्रभु ने अर्जुन से कुरूओं-कौरव और पाण्डव दोनों को देखने के लिए कहा, धार्तराष्ट्रान् नहीं कहा, अर्थात केवल कौरवों को देखने के लिए नहीं कहा। अर्जुन ने कहा निरीक्षे, अवेक्षे परन्तु भगवान ने पश्य कहा और एक निर्लिप्त को लिप्त-मोहित कर दिया, ताकि मानव कल्याण हेतु गीता का महान उपदेश दिया जा सके। मोह उत्पन्न होते ही अर्जुन के भाव में बदलाव जरूरी था और वो हुआ। 
Sanjay said O! The Bharat Vanshi (-born in the great-mighty Bharat clan)! The Almighty pervaded in each and every organism and knowing-understanding, their inner self moved the chariot, to the middle of the battle field in front of Bhishm, Dron and all the kings leading their respective armies; as desired by Arjun and said O! Parth (-the son of Pratha, a nag kanya and related to his father Vasu Dev Ji, as a sister); Look at these Kauravs who have gathered here for the sake of war (-to be killed)!
GUDAKESHEN: Guda means twisted or curly and Kesh means hair. Gudaka stands for one who has won sleep-has command over sleep and Ish means God. Arjun had curly hair and he had command over sleep.
EVMUKT: Arjun is portrayed as an ascetic-with chastity and free from bonds-devoted to God, who deserved Salvation. He has been described as the one had won sleep-laziness-desire for comforts (-he had been to heaven with the human-material body which is uncommon, rather impossible, visualizing-experiencing all comforts-luxuries for one year and there too, he ignored-rejected, all these because of his being Nar-an incarnation of Almighty). One who has reached this stage becomes favorite of the God and the Almighty okays his prayers. Logic says that the one who was going to control the warfare of Pandavs himself had to asses the situation personally and the one who had to fight too had to check-asses the situation.
HRASHIKESH: Hrashik means the master-controller of all sense organs and the addition of Ish with it means the God. The Almighty took the control of all the sense organs-senses of Arjun in his control.
BHISMDRONPRAMUKHTH SARVESHAM CH MAHIKSHITAM: Hrashikesh selected that site for positioning the chariot from where Bhishm, Dron and all important-main kings were visible.
UVACH PARTH PASHYAETAN: The one who controlled all the sense organs, asked Arjun to see the Kurus i.e., both Kauravs and Pandavs, not "Dhartrashtran" which represented Kauravs alone. Arjun said Nirikshe (-inspect), avekshe (-evaluate) but Bhagwan Shri Krashn said pashy (-observe, see-so that you can not blame me, later) and indulged the one who had cut all bonds and become neutral and had come under the fold-shelter-asylum of the Almighty; so that this great treatise could be elaborated for the welfare of the humans specially during the Kalyug-present cosmic era.
तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌। आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन्पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥1-26॥ 
श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि॥1-27॥ 
भावार्थ: इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओं में स्थित पिताओं (-ताऊ-चाचा), पितामह (-दादा, परदादा), गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों, मित्रों, ससुरों और सुहृदों को भी देखा।
उस विशाल जन समूह में अर्जुन की दृष्टि सभी कुरुओं पर पड़ी। वे सभी तो अपने ही थे। भूरिश्र्वा पिता के समान, भीष्म, सोमदत्त आदि पितामह, द्रोण, कृप आचार्य-गुरु, पुरुजित, कुन्तिभोज, शल्य, शकुनि मामा, भीम, दुर्योधन आदि भाई, अभिमन्यु, घटोत्कच, लक्ष्मण अपने और भाइयों के पुत्र, पौत्र, अश्वत्थामा आदि मित्र, द्रुपद, शैव्य आदि श्वसुर और सात्यकि, कृतवर्मा जैसे सुह्रद भी मौजूद थे। यह एक जटिल-गूढ़ परिस्थिति थी जो किसी भी व्यक्ति को विचलित कर सकती थी और ऐसा ही हुआ।
After this Pratha's son  Arjun perceived-looked at the uncles (-equivalent to father), grand fathers, teachers, maternal uncles, brothers, sons, grandsons friends, fathers in law and those those who were sympathetic to him-Pandavs in both the armies.  
This was a very intricate-typical situation, which could mobilize-disturb any one. Arjun saw the large conglomerate-assembly of humans which included all Kurus (-Kaurav and Pandavs ) who were his own (-for the name sake). Bhurishrwa was like father, Bhishm, Somdutt were grand fathers, Dron and Krap were Guru-teachers, Purujit, Kunti Bhoj, Shaly, Shakuni maternal uncles, Bhim, Duryodhan brothers, Abhimanyu, Ghatotkach, Lakshman own and brother's son and grandsons, Ashwatthama a friend-classmate, Drupad, Shaevy father in law and neutral-diligent people like Satyki, Kratverma. 
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌ ॥1-27॥ कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌॥1-28॥ 
भावार्थ:  अपने-अपने स्थान पर उपस्थित सभी बंधुओं को देखकर वे कुंती पुत्र अर्जुन अत्यन्त करुणा-दया से युक्त होकर शोक-विषाद करते हुए, यह वचन बोले। 
तान् सर्वान्बन्धूनवस्थितान्‌ समीक्ष्य: उन लोगों को जिन्हें पहले देखा था, के अतिरिक्त अर्जुन ने बाहील्क आदि पितामह, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सुरथ आदि साले, जयद्रथ आदि बहनोई सहित, अनेक सम्बन्धियों को दोनों सेनाओं  देखा।
स कौन्तेयः कृपया परयाविष्टो: वे कुन्तीपुत्र इन लोगों को सामने देख कर दया से भर गये क्योंकि जिस सेना का संचालन स्वयं भगवान के हाथ में हो उनका बचना नामुम्किन था। इसका तात्पर्य कायरता तो कदापि नहीं हो सकता! हाँ अर्जुन विचलित अवश्य हो सकते हैं। झिझक अवश्य पैदा हो सकती है। और फिर माँ का आदेश तो निभाना ही था।
विषीदत्रिदमब्रवीत्‌: और अर्जुन विषाग्रस्त-किंवकर्तव्यविमूढ़,  हो गये। इन्हें मारूँ या ना मारूँ की दुविधा की स्थिति पैदा हो गई।क्या हम जीवन भर शर्म-अत्याचार-अन्याय और कायरता का तगमा लेकर जियें!?और अगर हम इन्हें बक्श देते हैं तो, संसार हमें कायर कहेगा और हमारे नाम पर थूकेगा।  मरने वालों के लिए शोक बाद में किया जाता है मरने से पहले नहीं।
Kunti's son Arjun looked at the brothers and relatives filled with compassion-pity-kindness and spoke with grief-pain-sorrow.
TAN SARWANBANDHUNVASTHITAN SAMIKSHY: Other than those who were perceived-seen earlier, Arjun saw Bahilk etc. great grand fathers, Dhrastdyumn, Shikhandi, Surath etc. (-brother in law-wife's brother's), Jaidrath etc. (-sister's husbands) and many more relatives in the two armies.
S KOUNTEYH KRAPYA PARYAVISHTO: He, the son of Kunti was filled with compassion-pity-kindness, because he was aware that the army which was controlled by Bhagwan Shri Krashn was sure to win and the elimination of warriors was certain, irrespective of the side. This does not mean cowardliness. Arjun could be disturbed. He could hesitate, but carrying out of the mother's order was supreme.
VISHIDTRIDAMBRAVEET: And here Arjun becomes indecisive-confused. He was unable to decide, whether these people deserve mercy or not, should be killed or allowed to survive. Should we continue to bear the burden of shame-torture-injustice or cowardice if we spare them-history will label them to be s coward. Condolences are offered after the death nor prior to it.                                                
(मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के दयालुता, स्नेह और शोकयुक्त वचन)
अर्जुन उवाचदृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥1-28॥ 
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति। वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥1-29॥ 
गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते। न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥1-30॥ 
भावार्थ: अर्जुन बोले-हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए, युद्ध के अभिलाषी इस स्वजन समुदाय को उपस्थित देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं, मुँह सूखा जा रहा है, शरीर में कँपकँपी हो रही है एवं रोमांच-रोंगटे खड़े हो रहे हैंहाथ से गाण्डीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी जल रही है। मेरा मन भ्रमित सा हो रहा है और मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हूँ। 
युयुत्सुं समुपस्थितम्‌: अर्जुन सबको स्वजनम् कह रहे हैं और दोनों पक्षों में भेद नहीं कर रहे हैं। यद्यपि धृष्ट्रराष्ट्र ने समवेता युयुस्तव:, मामका: और पाण्डवा कहा था जो कि भेद दर्शाता है।  धृष्ट्रराष्ट्र  को केवल अपने पुत्रों की चिन्ता है परन्तु अर्जुन के सामने सबके नष्ट होने की दुविधा है। 
दृष्टेवमं स्वजनं: दुर्योधन के मन में केवल एक विचार था युद्ध जितना कोई मरो या जियो। परन्तु अर्जुन के मन में इतने सारे लोगों को मारकर राज्य हासिल करने से होने वाले पाप की चिन्ता हो गई।
उस पाप के बोझ का अहसास अर्जुन पर भारी पड़  गया। उन्हें चिन्ता-दुःख-पाप बोध ने ग्रस लिया और इसका परिणाम स्वरूप उनके अंग शिथिल हो गये। मुँह सूखने लगा। शरीर थर-थर कांपने लगा। रौंगटे खड़े हो गये। रौंगटे भय, ठण्ड और परमात्मा के अहसास से खड़े होते हैं।  भी उन्हें था नहीं, ठण्ड का प्रश्न ही नहीं और एकमात्र कारण बचा परमात्मा की मौजूदगी का अहसास। गाण्डीव  हाथों  से छूट गया। शरीर में जलन होने लगी। मन भर्मित हो गया। उन्हें मूर्छा का आभास होने लगा और इसका एक मात्र कारण था उनका धार्मिक होना।
Arjun narrated his state-condition-experience to Shri Krashn: Having looked at the relatives and own people in the battle field desirous of war, my organs are becoming motionless-still-stationary, mouth is becoming dry, whole body is trembling, hairs are straightened, bow- Gandeev is falling-slipping out of my hands, skin is etching-burning and I am getting confused-indecisive-mind is up set and I am unable to stand.
YUYUTSAM SAMUPASTHITAM: Arjun has been looking at the entire army as his own friends and relatives which had placed him in suspense, while Dhratrashtr had a microscopic vision of only his sons. He was not only blind , his brain too did not work rationally.
DRASHTEVAMAM SWAJANAM: Duryodhan had only one thing in his mind-elimination of Pandavs, while Arjun got struck with the idea-thought of mass killings and the burden of sin he would have after that.
The thought of the accumulated sin after so many killings, over powered Arjun. He was over powered by the grief-sin-worry and this led to loosing of control over the body. His throat became dry, body started trembling. The body experienced curl-thrill of body hairs-pores due to ecstasy. This could not be due to fear-horror of extreme-biting cold. His mind immediately concentrated-convulsed in the Almighty, who was the driving force in him and all others, who were participating in the war fare-the one who had taken the incarnation to wipe off-eliminate the sinners, from the surface of earth, as per the request-desire of mother earth. This is a rarest of rare stage, attained by the ascetics-devotees, when they surrender themselves to the dictates of the Almighty (-deep/staunch meditation-regression) and feels relieved. Arjun felt semi consciousness. His brain was over powered by the illusion of the Almighty. He devotion -piousness-virtuousness-honesty-religiosity-righteousness was behind this ultimate state, leading to Salvation. The famous bow slipped out of his hands. This generated itching burning sensation, throughout his body, leading to recovery. 
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव। न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥1-31॥ 
भावार्थ:  हे केशव! मैं लक्षणों (-शकुनों) को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर श्रेय-लाभ-कल्याण भी नहीं देखता।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव: जो भी लक्षण प्रकट हो रहे हैं, वे अशुभ की ओर इशारा कर रहे हैं(पूर्व सूचना-ऐसा अशुभ तो होगा ही)। उल्कापात, असमय ग्रहण लगना, भूकम्प आना, पशु-पक्षियों का भयंकर बोली बोलना-कोलाहल, चन्द्रमा के दाग मिट जाना, रक्त की वर्षा होना, पशु-पक्षियों द्वारा अपने से भिन्न जाति के बच्चे पैदा करना आदि अनर्थ-तबाही की ओर इशारा करते हैं। मेरा मुँह सूखना, गाण्डीव का गिरना, शरीर का शिथिल होना, उत्साह  होना, संकल्प-विकल्पों का ठीक न होना, कम्पन होना आदि अच्छे लक्ष्ण नहीं हैं। सामान्यतया देखा जाता हैं कि पुच्छल तारे का दिखना, कुत्ते-सियार का रोना, पक्षियों का कोलाहल, साँप का सर्दी में बिल से निकलना आदि जब भी कभी होता है भयानक बरबादी-तबाही-महामारी लेकर आता है।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे: अपने बन्धु-बान्धव, गुरु-ब्राह्मण महापाप लगाने वाले हैं। गुरु-ब्राह्मण को मरने से तो ब्राह्मण हत्या तक लग जाती है।  इसका परिणाम अत्यंत भयावह नरकों में जाना है। यह तो सत्य है कि अकारण-व्यर्थ की हिंसा नरक प्रदान करती है परन्तु जो अत्याचार को सहता है, उसको भी बदनामी-बुराई झेलनी पड़ती है। निमित्तानि पश्यामि और श्रेय: अनुपश्यामि दोनों ही दिखाते हैं कि शकुन, और बुद्धि युद्ध में विनाश की ओर इंगित करते हैं। 
O! Keshav I am observing bad omens and do not find any gain-welfare-enhancement of reputation-honor by killing own relatives-friends in the war. (This war appears to be  counter productive.)
NIMITTANI CH PASHYAMI VIPRITANI KESHAVH: The omens which are appearing indicate misfortune-devastation. Meteorite-cosmic showers, untimely eclipse, earth quake, fearful-dangerous-terrible sounds by the birds-animals, loss of black spots of the moon, rain of blood, excreta and suppurate-pus, giving birth to different species by the animals and birds, indulgence of humans in sex during the day-openly points to destruction-devastation. Drying of my mouth-lips, excessive sweat, falling of Gandeev (-bow) from my hands, sudden loss of strength-weakening of body, trembling of body, maladjustment of various permutations and combinations goals-targets-indecisiveness, are not good omens. Its a common observation-feature that the citing of comets, weeping-growling of jackals and dogs in the residential areas, disturbing sounds by animals, coming out of snakes from the burrows during winters,  are associated with massive-furious  destruction-calamity.
N CH SHREYOANUPASHYAMI  HATVA SAWJANMAHVE: Killing of any organism, own relatives, friends, teacher-philosopher-Brahmn-enlightened earns extreme sin. Killing-murdering the Guru-Brahmn leads to Brahm Hatya-extreme curse (-vicious cycle of punishment). These acts leads the doer to extremely dangerous hells. Its a fact that un necessary-useless killing-violence, awards hells. Its equally true that the one who bear with torture-insult too undergo undesirable (-inflicted with) defamation leading to hiding-shying away from the society-dejection-suicide etc..
Both NIMITTANI  PASHYAMI and SHREYH ANUPASHYAMI illustrates that bad omens and thinking-intelligence, indicates-foretells destruction of both sides.
न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च। किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥1-32॥ 
भावार्थ:  हे कृष्ण! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को ही। हे गोविंद! हमें ऐसे राज्य से क्या प्रयोजन है अथवा ऐसे भोगों से और जीवन से भी क्या लाभ है?
Oh Krashn! I do not desire victory, empire-state, pleasures-comforts. Oh Govind! What is the purpose of seeking such luxuries or the survival-living-life?! 
न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च: पांडव युद्ध के मैदान में विजय या राज्यांक्षा से नहीं आये थे।उन्हें भोगों-सुख की लालसा भी नहीं थी। उन्होंने वन में सन्यासी-तपस्वी के समान जीवन व्यतीत किया था। अर्जुन तो सशरीर स्वर्ग हो आये थे। 5 गावों की तो क्या, वो पूरी पृथ्वी विजय में सक्षम थे। उन्होंने पहले भी अनेक युद्धों में सफलता पाई थी। वे अश्वमेध यज्ञ कर चुके थे। वे और द्रौपदी दिव्यात्मा थे। उनका युद्ध के मैदान में उतरना माँ की इच्छा को पूरा करना, अन्याय को मिटाना और द्रौपदी की कसम को निभाना था। इस हालत में भी वे बर्दाश्त के लिए तैयार थे। उनका व्यक्तित्व ऐसा था वे बिना किसी शिकायत के संतुष्टि की चरम सीमा पर पहुंच चुके थे।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा: कोई भी कैसा सुख भोग हो वो बिना आत्मियों के नीरस-स्वादहीन-बेमतलब-व्यर्थ होता है। युद्ध के उपरान्त विधवा स्त्रियों-अनाथ बच्चों-असहाय बीमार बूढ़े माँ बाप के सिवाय और क्या होगा ? अन्तहीन दुःख-रुदन-क्रन्दन-आहें-बददुआ और क्या ?! हमें और अधिक चिन्ता होगी। गोविन्द-गौ और इन्द्रियों को तुष्ट करने वाले: मनुष्य यदि भगवान को सन्तुष्ट करता है तो उसकी संतुष्टि स्वतः हो जाती है। इस प्रसंग में अर्जुन कह रहे हैं कि युद्ध के पीछे उनका उद्देश्य इन लोगों को सन्तुष्ट-प्रसन्न रखना है। 
N KANKSHE VIJYAM N CH SUKHANI CH: The plain truth was that Arjun or the Pandavs had no desire for victory, the empire or pleasures. They had lived in the dense forests like a hermit-sage in their youth. They were capable of winning entire earth instead of asking for a little piece of land-just 5 villages. They had successfully met a number of battles and carried Ashwmedh Yagy which was a distant dream for Kauravs. The Pandavs and Draupdi were incarnations of divine souls-demigods-deities. Their quest was for justice and carrying out mothers orders and fulfillment of Draupdi's vows. Still they were ready to settle for the insult meted out to them. They were the personalities who had reached contentment without resentment.
KIM NO RAJYEN GOVIND KIM BHOGAERJEEVITEN VA: No comfort-pleasure-luxury is useful-meaningful-justified, in the absence of own people. What would be left after the war: widows-orphans-helpless old sick-ill old people?! There would be endless sobs-tears-misery-cold deep breaths-curses and what else?! We will have more tensions-troubles. Govind means the Almighty who keeps the cows and senses of devotees happy when they devote themselves to him. Here the reference is there to say that Arjun had the inclination of keeping all these people happy.


येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥1-33॥ 
भावार्थ:  हमें जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट हैं, वे ही ये सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े हैं।
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च: हम राज्य-सुख-भोग अपने व्यक्तिगत सुख हेतु नहीं चाहते, अपितु कुटुम्बियों-प्रेमियों-मित्रों, आचार्यों, पिताओं, पितामहों, पुत्रों, प्रपोत्रों के लिए चाहते हैं। वन में पैदा हुए, वनवास भोगा ना सुख की आदत न अभ्यास।  तपस्वियों का जीवन  व्यतीत करने वालों का इनसे क्या और कैसा  लगाव हो सकता है? वे राजा जनक के सामान जीवन मुक्त थे।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च: ये सब यहाँ, अपने प्राणों का उत्सर्जन, हमारे हेतु करने के लिये, खड़े हुए हैं। इन्हें धन, सुख, प्राणों की तृष्णा नहीं है। ये मर भले ही जाएँ, मगर मैदान नहीं छोड़ेंगे। और अगर ये ही नहीं होंगे, तो युद्ध विजय करके ही क्या होगा ?
Those for whom, we are seeking-desiring empire, pleasures-comforts-riches-luxuries are standing here by rejecting their hope for survival-life. 
YESHAMARTHE KANKSHITAM NO RAJYAM BHOGAH SUKHANI CH: We do not want kingdom-comforts-pleasures for ourselves, instead they are meant for relatives-family members, affectionate, friends, teachers, fathers, grandfathers, sons and grand sons. They were born in the jungles and lived in jungles during exile, did not experience pleasures & become habitual of comforts. Those who lived like ascetics sages could not have attachment for such things.  They were detached-liberated like King Janak.
T IMEASVASTHITA YUDDHE PRANAMSTYKTVA DHANANI CH: All of them have assembled here for sacrificing their lives for us. They are free from the desire of riches, comforts, life. They will prefer to die, instead of fleecing the battle field. And if they are not there, what for are we going to win the war?!

आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः। मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥1-34॥ 
भावार्थ:  गुरुजन, ताऊ-चाचे, लड़के और उसी प्रकार दादे, मामे, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी लोग हैं। 
कोई भी कार्य पुण्य-पाप या मिला-जुला फल दे सकता है और इसका निर्धारण इरादे-मानसिकता के द्वारा तय होता है। शस्त्र संसाधन से पहले ही अर्जुन स्पष्ट कर लेना चाहते हैं कि उनका कार्य किस श्रेणी में आयेगा और उसका फल क्या होगा ? कौरव सेना दुष्टों-विकृत मनोवृति वालों-अपराधिक प्रकृति वालों से भरी पड़ी थी जो सम्बन्धी भी थे। अशुभ शकुन पूर्व सूचना दे चुके थे कि विनाश तो होना ही है। 
Those who are standing before me are Achary (Gurujan, elders, by virtue of enlightenment and longevity), people equivalent to father, son, grand fathers, mothers brothers, grand children and various other relatives etc.
Here Arjun wish to clarify the motive-intention behind killing the vast conglomeration-gathering of warriors. The same activity becomes either sin or virtue. Arjun wanted to be firm through clarification-assurance from the Almighty about the nature of his deeds ? The army of Kauravs constituted of the wicked people with criminal intentions-defective mind set. The bad omens had already clarified that the elimination of vast majority of the sinners will prevail.

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन। अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥1-35॥ 
भावार्थ:  हे मधुसूदन! कौरवों द्वारा मुझ पर प्रहार करने या तीनों लोकों (-स्वर्ग, धरा और पाताल) का राज्य मिलने पर भी मैं इनको मारना नहीं चाहता, फिर क्या पृथ्वी (-हस्तिनापुर) के लिए ही इनको मारूँ?
 Oh Madhusudan! The killer-liberator of Madhu (-Daety-demon), I am not interested-eager to attain the empire constituting of the three abodes-Loks (-Heaven-residence of deities-demigods, earth-residence of humans and Patal-residence of demons-giants-Rakshas) and therefore I have no desire to fight for this small piece of land called Hastinapur.
मधुसूदन: भगवान को मधुसूदन इसलिए गया, क्योंकि उन्होंने मधु नामक दैत्य को मारा जो कि लोगों को अपना आहार बनाता था। अर्जुन शायद ये नहीं जानते थे कि दुर्योधन भी मनुष्यों को अपने मित्र राक्षस का आहार बना देता था। अर्जुन को त्रिलोकी की आवश्यकता नहीं थी। वे निर्लिप्त थे। फिर उन्हें खाली हस्तिनापुर के लिए युद्ध करने की जरूरत ही कहाँ थी? और यहीं से भगवान श्री कृष्ण को उन्हें समझाना था कि आवश्यकता कहाँ और क्या है। 
अर्जुन के मन-मस्तिष्क में करुणा का संचार हुआ क्योंकि शस्त्र धारण करने के बावजूद, वे नर हैं; परन्तु इस बात से अनभिज्ञ हैं कि परमात्मा ने सम्मुख खड़े सम्बन्धियों को काळग्रस्त कर दिया है और अब तो केवल लौकिक दृष्टि से दिखावा ही शेष है। 
MADHUSUDAN: Madhusudan was a demon-giant who used to kill humans for his meals. He was killed-liberated by Bhagwan Shri Krashn and so the name-Madhusudan. Arjun was unaware of the fact that Duryodhan used to feed a Rakshas, who was his friend, with the prisoners-convicts. Arjun was unattached-liberated without the desire to conquer the three abodes:Heavens, Earth and the Patal. He would not fight for a small piece of land called Hastinapur at the cost of the life of billions of acquaintances.
The Almighty had developed a state where Arjun was eager to know the intricacies of the acts performed simultaneously by the people ready to encounter each other. From here on wards the mystery of life, birth and rebirth, Karm-deeds and their outcomes-results-fruits was going to be explained for the benefit of those who have taken birth in Kalyug-the present cosmic era.
Arjun was full of pity towards the people who were to confront him, unaware of the fact that their lives were shortened by the Almighty and what was going to happen was just a stage show.
निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन। पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः॥1-36॥ 
भावार्थ:  हे जनार्दन! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमें पाप ही लगेगा। 
अर्जुन ने पूछा कि इन आतातियों को मारकर हमें क्या प्रसन्नता मिलेगी ? उनको मारने से शोक-पश्चाताप सताता रहेगा। उनकी याद आयेगी और उनका अभाव खटकेगा।
आग लगानेवाला, विष देने वाला, शस्त्र से हत्या को तैयार, धन का हरण करने वाला, जमीन छीनने वाला और स्त्री का हरण करने वाला आतताई है (-वर्तमान में आतंकवादी, राजनीतिवाज) और दुर्योधन में ये सभी दुर्गुण थे। शास्त्र की व्याख्या को समझना भी जरूरी है। एक ओर कहा जाता है कि आतताई को मारना पाप नहीं है, और दूसरी ओर मारना उचित होते हुए भी इस प्रक्रिया को उचित नहीं ठहराया गया है। अहिंसा परम धर्म है, ऐसा कहा गया है; परन्तु यह सामान्य व्यक्ति और सामान्य परिस्थिति के लिये है न कि दुष्ट व्यक्तियों के लिये। भगवान राम ने रावण और असंख्य राक्षसों को मारा, वर्णाश्रम धर्म से विचलित को मारा। पाप है तो उसका प्रायश्चित भी है।
Oh Janardan! Will there be pleasure-happiness ?! Killing of these tyrants-oppressors will generate sin and loss of virtue for us.  
Arjun wanted to understand, if he would gain happiness by the killing-elimination of the tyrants-oppressors (-present day terrorists and the politicians indulged in dirty politics). Repentance will trouble him after wiping them off. They will come to his memory and their absence will also haunt him.
One who indulge in burning (-property, humans-creatures), poisoning, killing-murdering with the help of weapons or otherwise, snatching-looting-defrauding-cheating money, snatching property-land by hook or crook-defrauding-abrogation, abduction of woman-wife-daughter etc., is termed as tyrant-oppressor-terrorist. Duryodhan had all these defects. Here Arjun was unable to understand the theme-spirit-basis  behind the scriptures, which permits the killing of tyrants, on the other hand it does not hold the procedure and restraint their killing. The state-king-judiciary is justified to punish such people. It has been stated that "AHINSA PARMODHRMA"-Non Violence is ultimate religion. One should be aware that this is meant for the common citizen, under normal circumstances, only. The does not apply to the wicked-wretched. Bhagwan Ram killed Ravan and other demons-giants, along with those for did not stick to the Vernashrm Dharm. If there is sin there is penance-atonement-penitence-remorse.

तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌। स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥1-37॥
 भावार्थ:  अतएव-इसलिये हे माधव! अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने के लिए हम योग्य नहीं हैं क्योंकि अपने ही कुटुम्ब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे?
अर्जुन भगवान श्री कृष्ण को माधव कहकर सम्बोधित कर रहे हैं। माधव अर्थात लक्ष्मी पति विष्णु। शास्त्र कहता है कि राजा में भगवान विष्णु का अंश होता है। और दुर्योधन को तो लक्ष्मी और सरस्वती दोनों की कृपा प्राप्त थी। ऐसे में शास्त्र को जाननेवाले अर्जुन दुर्योधन पर शस्त्र उठाने और प्रहार करने से पहले अनुमति तो लेंगे ही। वो स्वयं को आताताई का वध करने के अयोग्य कह रहे हैं और स्वधर्म-क्षत्रिय धर्म, से विमुख हो रहे हैं। अर्जुन मोहजनित बातें कह रहे हैं और मोह विवेक को हर लेता है। अशुभ शकुनों ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया था कि श्री अर्थात लक्ष्मी जी ने और माँ सरस्वती ने दुर्योधन को तज दिया था, अर्थात अब उसमें से विष्णु का अंश निकल चुका है और वह एक सामान्य अपराधी के समान दण्ड के योग्य है। 
Therefore, Oh Madhav (-Krashn)! We are not qualified-competent-deserve to kill our own brothers-sons of Dhratrashtr and other relatives. How can we gain peace-comfort by killing the people of our own clan-decedents?! 
Arjun addressed Bhagwan Shri Krashn as Madhav purposely. Madhav means the husband of Laxmi. As per scriptures the king has a component of the nurturer Bhagwan Vishnu. Duryodhan was an exception with the blessings of both Maan Laxmi and Saraswati-a rarest of rare combination, like Rawan. Under these circumstances, one who knows the scriptures-enlightened will definitely-to be sure will seek the permission of the master-the Almighty bodily present in front of him. When Arjun says that he is incompetent-unqualified to kill the Kauravs he shows the illusion cast over his intelligence, since he is distracting from his duties as a Kshtriy-the duties of marshal castes. Bad omens had already declared that the time to eliminated the villain-wicked had come. Both Maan Laxmi and Maan Saraswati had discarded Duryodhan and the Kauravs. The nurturer Bhagwan Vishnu too had rejected them all and they all were parallel comparable to ordinary criminals-murders waiting for the sentence-punishment.


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यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः। कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌॥1-38॥ 
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌। कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥1-39॥ 
भावार्थ:  यद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक विचार लुप्त हो गया है (-भ्रष्टचित्त) वे लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से द्वेष करने से होने वाले पाप को नहीं देखते, तो भी हे जनार्दन! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोग इस पाप से निवृत होने का विचार क्यों नहीं करें? 
एक क्षत्रिय से यह अपेक्षा नहीं की जाती कि वह युद्ध या द्यूत-जूए की चुनौती-निमन्त्रण-ललकार को अस्वीकार करेगा। सम्राट युधिष्टर ने दुर्योधन के जूए के निमन्त्रण यह कहकर ही स्वीकार किया था। उसका परिणाम भले ही छल से था, उनके सामने आ गया। जूआ ना खेलकर उसके दुष्परिणाम से बच सकते हैं परन्तु युद्ध की चुनौती स्वीकार न करने का सीधा मतलब है, हर मानना-दासता-स्वीकार करना। 
लोभ मनुष्य को ऐसे कार्य करने की प्रेरणा देता है जिनसे उसकी इच्छाएँ-अपेक्षाएँ निरन्तर बढ़ती चली जाती हैं और वो परिणाम की चिंता किये बगैर उनकी पूर्ति के लिये छल-छन्द-प्रपञ्च-षड़यंत्र-चालें चलता रहता है जिनमें उसे कामयाबी मिलती है तो सुख-अहंकार का अनुभव करता है और नाकामयाबी से दुःख का अनुभव करता है। जो वस्तु आकर चली जाती है, वो उसमें ज्यादा निराशा उत्पन्न कर देती है। लोभ-इच्छाएँ-अपेक्षाएँ अन्त हीन हैं। 
कुलनाश होना अति दुष्कर-हानिकारक माना गया है। इससे पित्तरों को पानी देनेवाला नहीं रहता। वंशवृद्धि रुक जाती है जो कि स्वयं में एक पाप है, अगर जानबूझकर किया जाये। परन्तु एक ना एक दिन अन्ततोगत्वा तो कुलनाश-वंशनाश होना है ही। अर्जुन को दुर्योधन का लोभ-लालच तो दिखा परन्तु अपना मोह-अहँकार (-अच्छाई का) नहीं दिखा। 
Though, these people who have deviated-distracted-lost the sense of rationality due to greed, do not realize-understand-see-observe the gravity of the sin due to evolve by the killing of own people-clan-decedents and sin by virtue of opposing-resisting-envy-treachery with the friends, yet we, who are aware of the facts should not avoid-keeping aloof from the defect arising out of this mass murder. 
A Kshtriy is generally not expected to refuse the invitation either for war or gambling. One may refuse to participate in gambling, without side effects, but refusal to accept challenge for war may lead to acquisition of kingdom-slavery-imprisonment-death. Emperor Yudhishtr accepted the invitation for gambling by Duryodhan by quoting this only, though he had escape routes, as well. But, he had a bad taste for gambling, being an expert. But he was cheated and exiled for 13 years with brothers and Draupdi, which resulted in the present state of affairs.
Duryodhan cheated Yudhistr with the help of his maternal uncle Shakuni successfully and this enhanced-induced greed in him for further extension of exile for Pandavs. Greed induces desires-expectations which keep on increasing-boosting. One keeps on doing all sorts of mischievs-undesirable tactics-designs-acts. Success files him with pleasure leading to pride and failure, which further lead to grief-sorrow-painful end. Greed and desires are endless. 
Elimination of the clan-descendants is considered to be a great obstruction in Salvation of the entire chain of ancestors. It further leads to obstruction in prayers-peace meant for the deceased family members. Immediate impact of the stopping of the chain of the clan, if it is done knowingly-willfully, is disaster, leading to hells. Yet ultimately, on the dooms day, it is sure to happen. Arjun could see the greed of Duryodhan but he did not see-realize his own folly of attachment and pride of being a saintly person.
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः। धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नमधर्मोऽभिभवत्युत॥1-40॥  
भावार्थ:  कुल के क्षय से सनातन कुल-धर्म नष्ट हो जाते हैं तथा धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल को अधर्म दबा लेता (-में पाप भी बढ़ जाता) है।
With the receding of the family size family norms-sacred religious practices-rituals-piousity-mores-traditions along with Varnashram Dharm are lost-perish and the clan-descendants are suppressed by Adharm-irreligiosity. 

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 for better understanding of the text: HINDUISM (हिन्दुत्व)-SANATAN DHARM Chapter (I) to (IV).
प्रत्येक वर्ण, कुल, जाति के लिये नियम-धर्म हैं, जिनको स्वभाविक रूप से मानना चाहिये। युद्ध की विभीषिका सभी धर्मों का नाश कर देती है।  विधवाएँ, अनाथ बच्चे, वृद्ध बेसहारा हो जाते हैं और ऐसा कुछ करने को मजबूर हो जाते हैं जो कि अनर्थकारी है। संकर जातियों-आचारहीन लोगों का उदय होता है। बच्चों को ज्ञान-अच्छी शिक्षा देने वाला कोई नहीं रहता। मर्यादा भंग हो जाती है। स्त्रियां स्वेच्छाचारिणी हो जाती हैं।सर्वत्र व्यभिचार व्याप्त हो जाता  है और लोग इसमें लिप्त हो जाते हैं। संस्कृति का विनाश-ह्रास हो जाता है।पितरों को पानी देने वाला, श्राद्ध करने वाला नहीं रहता। मृतात्मा भूत-प्रेत-पिशाच योनियों से मुक्त नहीं हो पातीं। 
Every caste-clan-species-chain has its basic concepts-religious practices, which are followed-honored traditionally. War leads to loss of all religions practices-rituals-traditions-sacred sacrifices etc. Widows, orphans, old people are left without support and subjected to such deeds which leads  further destruction-loss-immorality. Hybrid castes with no norms come up.The society becomes directionless. No one is available to educate the children-off springs. Norms-standards are lost. Women becomes too independent-free. Chastity becomes meaningless. Morals-character takes a back seat and becomes irrelevant-meaning less. Culture is lost.There is no one to make offerings for the sake of the deceased-ancestors. The deceased is unable to free him self from the ghost form.

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः। स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥1-41॥
भावार्थ:  हे कृष्ण! अधर्म-पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
स्त्रियों में काम-वासना की मात्रा अधिक पाई जाती है। इसलिये उनका स्वछन्द होना अनुचित और पाप को बढ़ावा देने वाला होता है। जब कोई देखने-सँभालने वाला नहीं होता तो स्त्रियाँ दुराचार में लिप्त हो जाती हैं। सात्विक से तामसिक की ओर बढ़ जाती हैं। उनका चारित्रिक-नैतिक  पतन हो जाता है। शास्त्र मर्यादा-कुल मर्यादा-आचरण शुद्धि-अन्तः करण शुद्धि से रहित-विवेक शून्य हो जाती हैं। इसका परिणाम वर्ण संकर बच्चों का पैदा होने में होता है। 
यह बात साबित हो चुकी है कि बच्चों में माँ-बाप के डी एन ऐ और जींस होते हैं और उन्हीं के द्वारा उनके पूर्वजों के अनुवांशिक गुण-दोषों का निदान किया जाता है। पारिवारिक बीमारियों-प्रवृतियों का निदान-संचालन भी उनके द्वारा ही होता है। एक प्रयोग में 6 लाख लोगों के जैनेटिक मैप का स्कैटर डायग्राम प्लाट किया गया तो पाया गया कि वे स्पष्ट रूप से 4 भागों में [ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र] बंटे थे। 
Enhancement of irreligiosity-vices-wickedness leads to loss of virtues-morality-ideals-respect-self esteem of women giving birth to illegitimate-cross breed of children.
Quantum of sex-lust-sexuality-sensuality-passion in women is 8 times more as compared to the men.Their independence-freedom  leads to sin. They become vulnerable to attack by sex hunters-poachers.When there is no one to take care (-look after) of them, they indulge in illicit relations. They deviate from virtuousness and indulge in wickedness-wretchedness-vices-flirtations-moral turpitude-characterlessness-prostitution. They forget culture-morality-piousness-scriptures-family background-reputation-prestige-common sense.The result is obvious: Illegitimate children-sycophants-criminals-abnormal-mental wrecks-anti socials-impotent. Generally they remain in bad company with the people having loose morals and learn what they observe. It may result in mutations as well.
It has been proved scientifically that DNA-genes are the carriers of the characterices of the parents from one generation to the next. One can easily identify the race-species-inheritance of the off springs. Genetic diseases can be easily found in the children. As a consequence of it, one is advised not to marry either in close relations or out of caste.
A study conducted over 6 Lakh people showed that they could be placed in 4 distinct groups [comparable to Brahmn, Kshtriy, Vaeshy and Shudr] on the basis of the results of their DNA tests and scatter diagram.

संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च। पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥1-42॥
भावार्थ:  वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित, इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं।
आज के युग में नौजवान लड़कों और लड़कियों को यह समझाना बहुत मुश्किल है, क्योंकि यह कलयुग है और फिर उनमें ऐसो की संख्या बहुत है, जो स्वयं इस तरह से पैदा हुए होंगे। वर्णसंकर (-अवैध-हरामी-हरामजादा) में धार्मिक बुद्धि का नितान्त अभाव होता है। मर्यादा-कुलधर्म-धर्म वे ना तो जानते हैं और ना ही समझना चाहते हैं। उन्हें ऐसा कुलघाती कहा जा सकता है, जो पितरों को पिण्ड दान-तर्पण श्राद्ध और पानी तक अर्पित नहीं करेगा और वे अधोगति को प्राप्त होंगे। पितृ गण दो प्रकार के हैं: आजान और मर्त्य। आजान पितृलोक में  हैं, परन्तु मृत्युलोक से मर कर गए पितर-पितृ मर्त्य हैं; जिनका पतन होता है। कुटुंब-सन्तान से सम्बन्ध रहने के कारण, उनको श्राद्ध-तर्पण-पिण्ड दान-पानी की आशा होती है।
The mix breed [-One whose caste can not be ascertained-defined-fixed] leads the ancestors to undefined hells, by degrading-isolating them. The PITR-root-basic-original ancestors, from whom the clan-caste chain begun, are left without offerings-prayers for their clemency-relief-worship, leading to their downfall to difficult hells. 
Its extremely difficult to explain-elaborate, to the young generation, the importance of rituals like: holding of shanti path [-clemency rituals], prayers for the peace of the deceased, terahvan-barsi-annual ceremonies-offerings to Brahmns-poor-needy, after the death of the parents-grand parents, since they are born in Kalyug & they may not be aware of the family tradition. Still this postulate is meant for those who are born out of illicit relations, between the parents from two diversified castes-religions-regions-countries in the name of love affair-marriage or those who produce children by living together, without marriage and illicit-forced relations.
The cross breed is [bastard, scoundrel, illegitimate] without piousness-virtues-religiosity-family norms-traditions. They are generally termed as those, who lead their family tree to termination-fatal end. they will not hold prayers, make offerings, visit holy places for the peace-liberty-Salvation of their ancestors-fore fathers, unaware of the facts-traditions. Their ancestors-Pitr are sure to lead to hells.
Pitr are of two categories: First one are present in the divine abodes and next are those who deceased over the earth. The second category will be the victim of the absence of these proceedings by their off springs. Whether one is born normally or through illegitimate relations; must hold prayers for the liberation-peace of the deceased soul, of their departed parents-grand parents.

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥1-43॥
भावार्थ:  इन वर्णसंकर कारक-पैदा करने वाले दोषों से कुलघातियों के सनातन-सदा से चलते आये, कुल-धर्म और जाति-धर्म नष्ट हो जाते हैं।
वर्ण और जाति प्रथा मानव जाति की उत्पत्ति से ही जारी है। कश्यप ऋषि से मैथुनी सृष्टि: समस्त प्राणियों और मनुष्यों का प्रादुर्भाव हुआ। इसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण-आधार है। मनुष्यों में 23 जोड़े क्रोमोसोम्स पाये जाते हैं, जिनको परिवर्तित किया जा सकता है, जिससे नई जातियाँ-जीव उत्पन्न हो सकते हैं। इसके प्रमाण उपलब्ध हैं। मनुष्यों के व्यवहार को क्रोमोसोम्स पर पाये जाने वाले जीन्स के आधार पर तय किया जा सकता है। 
समूह का व्यवहार और उसमें रहने वालों का बहुत गहरा सम्बन्ध है। जाति-वर्ण, काम-धन्धे का मूलाधार है। किसी भी जाति और परिवार में पैदा हुए बच्चे अपने पैतृक कार्य को अधिक आसानी से सीख और अधिक कुशलता से कर सकते हैं। 
The defects which create these cross breeds, distort the ancient Vernashram Dharm of clans-descendants-segregating the populations leading to the diminishing-vanishing-loss of varied casts-groups traits, practices.
The caste system is ancient-since the beginning of evolution on earth by Kashyap Rishi through intercourse. It is perfect and has a scientific basis. Number of chromosomes and the genes present over them, determine the characteristices of a species. Humans have 23 pairs of chromosomes, which can be altered to create new species-living beings. It can be proved-demonstrated that human behaviour too has its seeds in the genetic structure over the chromosomes.
Traits of various individuals can be analysed by studying the group behaviour. Behavior of different people belonging to various castes and sub castes, too show remarkable similarities. There are practical advantages of this system as the progeny of one caste learns the parental skills much quicker-with remarkable ease.

उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन। नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥1-44॥
भावार्थ:  हे जनार्दन! जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया है, ऐसे मनुष्यों का अनिश्चितकाल तक नरक में वास होता है, ऐसा हम सुनते आए हैं।
विवेक-बुद्धि-तर्क-मनुष्य को, वो सभी कार्य करने से रोकती है, जो मनुष्य को नर्क गामी बनाते हैं। यह उसे कुलधर्म से भटकने से भी रोकती है। ये उसके ऊपर है की वो इनको सुने या ना सुने। अंतरात्मा की आवाज यही है। मद में अँधा हुआ मानव इसको दर किनार देता है। प्रवचन, उपदेश, मार्गदर्शन, उचित राय, शिक्षा मनुष्य को गुरु, पूर्वज, वृद्ध, साधु-सन्यासी, महात्मा, पुजारी, परिपक्व लोगों से समय-समय पर मिलते है।  जो इसका अनादर करता है, वो अपने लिए नर्क के दरवाजे खोल लेता है। धन, काम-वासना, क्रोध, मद-अहंकार, बुरी संगत, निरादर, तिरस्कार, असफलता, ईर्षा अपमान अक्सर मनुष्य को नर्कगामी बना देते हैं। जो भक्त हैं सत्य-नेक राह पर चलते हैं,  उन्हें किसी बात की चिंता नहीं रहती। उनकी रक्षा तो स्वयं प्रभु-जनार्दन-कृष्ण करते हैं।  
Oh Janardan! We have heard-learnt that those who have lost the Kul Dharm-duties-essentials-jobs of their ancestors have to spend infinite period in hells.
Prudence is gifted to each and every individual by the Almighty. It cations him, as and when he drifts away his family trade of the ancestors. Deviation from traditional practices-family occupation results in subjection to tortures in hells. It's up to him to utilize it or not. Some call it the inner voice, others call it the call of soul. One usually ignores it, when he is blind with the self motive. It comes to us in the form of guidance-advice-preachings  of saints-elderly-experienced-sages-priests-matured people-recluse. Money and sex are the major motives, which generally compel one to commit mistakes, which drive him to sin-vices-hells. Ego is another constraint, which do not let one utilize him common sense-prudence-intelligence-brilliance to rectify the errors in his mental make up. Attachments-greed-desire for comforts-envy-enmity-evil-bad company, censure-scolding-reproach-disrespect-disdain, insult-rejection-failure may lead one to commit deeds, which may put him in hells. The pious-virtuous-righteous-honest-religious-detached-devoted to the Almighty has nothing to fear.
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HEAVEN-HELL स्वर्ग-नरक
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM          PANDIT SANTOSH KUMAR BHARDWAJ
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अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥1-45॥
भावार्थ :  यह बड़े आश्चर्य और शोक-खेद की बात है कि हम लोग बड़ा भारी-महान पाप करने का निश्चय कर बैठे हैं और राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने के लिए उद्यत-तैयार हो गए हैं।
अर्जुन का ध्यान युद्ध की विभीषिका और इसके दुष्परिणामों पर था। वे भगवान के भक्त और उनके अभिन्न अंग थे। यह संवाद परिस्थितियों के मूल्यांकन को दर्शाता है। इसमें युद्ध के सूक्ष्मतम पहलुओं पर ध्यान दिया गया है। युद्ध केवल उसी परिस्थिति में होना चाहिये, जब कोई रास्ता-विकल्प शेष न रहे। अर्जुन के माध्यम से यह बताया गया है कि दोषी को बख्शना केवल अनजाने-अज्ञान-मोह-गुमराह होने के कारण है। यदि दोषी को समय पर दण्ड नहीं दिया गया तो वो और मुखर-भयानक हो जायेगा। दंड देने में सक्षम व्यक्ति को अपने जिम्मेवारी से बचना नहीं चहिये। युद्ध का अंतिम निर्णय तो युधिस्टर ने लेना था ना कि अर्जुन ने। यह प्रयास कलयुग में होने वाली युद्ध की विभीषिका का आकलन करने और तत्पश्यात निर्णय लेने के पक्ष में है। 
It's a matter of great pain-sorrow that we have prepared ourselves for the great sin-killing our own people, due to the greed-hunger-desire of empire and comforts.                           
Arjun's attention is towards the war and its after effects. He is a devotee (-as a matter of fact an incarnation of the Almighty himself) of the God. Here the questions-surprises are meant to analyse the situation. In one way its constructive discussion. An efforts has been made to judge-weigh the pros and cons of wars. One should enter into war, only when all efforts have failed to find an amicable solution of the problem-confrontation. He is willing to pardon the sinners-guilty due to ignorance-attachment-confusion. If the guilty is not punished in time, he will create further trouble-tension. One who is capable, is not supposed to evade his responsibility. However, the decision of war or no war had to be taken by Yudhistr, not Arjun. This whole affair-elaboration-discussion is to educate the people to tackle-deal, when such situations arises, during Kalyug-the present cosmic era.

यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः। धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌॥1-46॥
भावार्थ: यदि शस्त्र हाथ में लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मुझ शस्त्र रहित-निहत्थे एवं सामना न करने वाले को मार भी डालें तो वह मारना भी मेरे लिए बड़ा-अधिक कल्याण  कारक होगा। 
भावावेश में अधिकतर मनुष्य गलत निर्णय लेता और ऐसे कार्य कर बैठता है, जिनकी वजह से उसे बाद में पछताना पड़ता है। ऐसी परिस्थिति में जब कोई किंकर्तव्य विमूढ़ हो, उसे सलाह-मशवरे की आवश्यकता होती है। अपने से अधिक समझदार-ज्ञानी-विद्वान-जानकर-तजुर्बेकार से सम्पर्क करना, फयदेबंद साबित होता है। जब सेनाएँ आमने-सामने खड़ी हों, तो संकल्प-विकल्प का समय नहीं रहता। दया उन पर की जाती है, जो इसके लायक हों। ना कि आतताई-दुर्दान्त अपराधी पर।  साँप को जिन्दा रखना हो तो उसका जहर निकाल  दो।                     
If the armed sons of Dhratrashtr kill one, who is  unarmed and unwilling to fight, will be virtuous-beneficial-rewarding for me. 
One often resort to wrong decisions in a state of frenzy-emotionality-impulse of mood, which harm him later.When one is confused, he should seek advise from enlightened-experienced-mature-elderly-prudent person. Discussion with one, who is more clear-knowledgeable as compared to us, is always fruitful-beneficial. When the armies are ready to attack-confront each other, no time is available for clarifications-emotions-discussions. One must take pity over one, who deserve and not those, who are guilty-tyrants-invaders-brutes. If its essential to keep the snake alive, remove its poison. One stitch in time saves many later.

 संजय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌। विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥1-47॥भावार्थ:  संजय बोले-रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, बाण सहित धनुष को त्यागकर रथ के मध्य भाग में बैठ गए।
उद्वेग-परेशानी-मोह से ग्रस्त-भटके हुए अर्जुन रथ में जहाँ खड़े थे, वहीं बैठ गये। उनका धनुष-बाण अभी भी उनके साथ था जो कि नर रूप है। उन्हें सहानुभूति-मार्गदर्शन  की आवश्यकता थी, जो उन्हें इस मनोस्थिति से उबारे। भगवान कृष्ण ने संसार सागर से मुक्ति मार्ग प्रदर्शन की भूमिका बना दी थी ताकि आने वाले कलयुग में मनुष्य को आत्म प्रकाश आत्म बल प्राप्त हो सके और वह सभी प्रकार के पापों-बुराईयों-दुर्दान्त-भयंकर अपराधियों का सामना कर सके। 
Sanjay told: Having said this, Arjun full of grief-sadness retired to the rear of the chariot  and divested himself of the bow with arrow.
Grief-emotions-confusion-illusion over powered Arjun and he set, where he was standing, with his bow and arrow, ready to charge. He deserved sympathy and counselling. He had to be brought out of trauma. Thus platform for the discourse was ready for emitting the aura to enlighten the intelligentsia in Kalyug, when all sorts of sin-improprieties are going to confront the humans.


ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादेऽर्जुनविषादयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः।
इस प्रकार ॐ, तत्, सत् : इन भगवन्नामों के उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद् भगवद्गीतोपनिषदरूप श्री कृष्णार्जुन संवाद में अर्जुन विषाद योग नामक  प्रथम अध्याय पूरा हुआ।
In this form the first chapter of Shri Mad Bhagwad Geeta which constitutes of the grief of Arjun, has been completed. It has the essence-nectar-theme-central idea-elixir of all Upnishads. Utterance of ॐ, tt & st removes all mistakes-errors-omissions of the text. This is unique treatise on eternity and Salvation. 
ॐ, tt & st constitute the three names of the Almighty. It includes-provides luxury-comforts-pleasures, Dharm-religiosity-virtuousness-righteousness, fame-honor-goodwill, Shri-riches-wealth-property-power, Gyan-enlightenment-intelligence and ultimately detachment leading to Salvation.Virtuous reader-devotee may refer to the chapters on Salvation of the following blogs:
SALVATION PREPARATION मोक्ष-साधना 
SANTOSH KUMAR BHARDWAJ (CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM) 
santoshkipathshala.blogspot.com   santoshsuvichar.blogspot.com    bhartiyshiksha.blogspot.com hindutv.wordpress.com
Reading, writing, narrating the text gives the devotee the pious rewards, which never eliminate in rebirths.
This holy-sacred text is meant for the one, who has faith in it. One should not reveal-narrate-explain-describe-discuss the text to an Atheist. No attempt should be made to convince-justify the text, to one who questions its validity.
ALMIGHTY - भगवान 
समस्त धन, शक्ति, सौन्दर्य, ज्ञान,तथा त्याग से युक्त परम पुरुष भगवान कहलाता है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित कोई जीव कृष्ण के समान ऐश्वर्यवान नहीं है। 
ब्रह्म संहिता में ब्रह्मा जी स्पष्ट करते हैं कि गौ लोक वासी श्री कृष्ण स्वयं भगवान हैं न तो कोई उनके तुल्य है और न बढ़कर है। वे आदि पुरुष गोविन्द समस्त कारणों के कारण हैं। 
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानंद विग्रहः। अनादिरादि गोविन्दः सर्वकारण कारणम्॥ 
भागवत के अनुसार उसके अनेकानेक अवतार-विस्तार हैं। 
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयंम्। इन्द्रारी व्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे॥ 
कृष्ण आदि पुरुष, परम सत्य, परमात्मा तथा निर्विशेष ब्रह्म के उद्गम हैं। 

 

                                        
     
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       

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