Sunday, August 17, 2014

THE ALMIGHTY, GIST OF GOD & SOUL परमात्मा, परमात्म तत्व और आत्मा

ALMIGHTY :: वान 
CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM  By :: Pt. Santosh Bhardwaj 
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सत् और असत् [श्रीमद् भगवद्गीता]
तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥9-19॥ 
हे अर्जुन! संसार के हित के लिए मैं ही सूर्य रूप से तपता हूँ, मैं ही जल को ग्रहण करता हूँ औ फिर उस जल को बरसा देता हूँ। और तो क्या कहूँ अमृत और मृत्यु तथा सत् और असत् भी मैं ही हूँ।
शरीर सूर्य से ही निरोग होता है। पृथ्वी पर गंदगी-मल को सुखकर विषाणुओं-जीवाणुओं को नष्ट करने का कार्य भगवान् सूर्य करते हैं और इस प्रक्रिया में जो जल वाष्प बनकर उड़ता है उसी को वर्षा के रूपमे लौटा देते हैं। इस जल का कुछ भाग वे स्वयं ऊर्जा दायक विकिरण-पदार्थ के रूप में ग्रहण कर लेते हैं। इस प्रकार पृथ्वी पर मौजूद जहर को काफी मात्रा में वे कम कर देते हैं। इस प्रक्रिया में जल का शोधन और स्वभाविक मिठास लौट आती है। प्राणियों को लंबे समय तक जीवित रखने का कार्य अमृत करता है। भगवान् स्वयं ही अमृत का रूप ग्रहण करते हैं तथा समय पूरा होने पर धर्मराज-यमराज के रूप में मृत्यु भी बन जाते हैं। 
सत् और असत् (Contamination-impurity, adulterated; Not existent, Unfounded, Illusory, Untruth, falsehood, Unreal, Untrue) भी वे स्वयं ही हैं। 

कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्॥11.37॥ 
हे महात्मन्! गुरुओं के भी गुरु और ब्रह्मा जी के आदिकर्ता आपके लिये वे सिद्धगण नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! आप अक्षरस्वरूप हैं; आप सत् भी हैं, असत्  भी हैं और उनसे भी पर जो कुछ हैं आप ही हैं। 
Arjun called Almighty the Ultimate Ascetic! He said that he was the teacher of the teachers and the source of the creator Brahma Ji. Why should not the great ascetics bow in front of you!? You are eternal-infinite! You are the lord of lords-demigods-deities! You are formless-imperishable Om-ॐ-the cosmic sound! You are the abode-seat of the entire universe! You are both Eternal & Temporal! What ever is over them it's only you!
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥13.12॥ 
जो ज्ञेय (पूर्वोक्त ज्ञान से जानने योग्य) है, उस (परमात्म-तत्व) को मैं अच्छी तरह कहूँगा, जिसको जानकर (मनुष्य) अमरता का अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेय-तत्व) अनादि वाला (और) परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है (और) न असत् (-non existent, unfounded, illusory, untruth, falsehood, unreal) ही (कहा जा सकता है)। 
Bhagwan Shri Krashn asserted that he would fully describe the Parmatm-Ttv (-the gist of the Ultimate knowledge, ought to be known) object of knowledge, by knowing which one experiences immortality. The immortal-imperishable is Par Brahm-Supreme Being, who can not be called either  existent-eternal or nonexistent-temporal. 
भगवान् श्री कृष्ण ने कहा कि वे उस ज्ञेय-जानने योग्य परमात्म-तत्व को स्पष्ट करेंगे जिसकी प्राप्ति के लिये मानव शरीर प्राप्त हुआ है। परमात्म-तत्व को जानने के बाद मनुष्य अमरता का अनुभव करता है। उस आदि अन्त रहित परमात्मा  से ही संसार उत्पन्न होता है और उसी में विलीन हो जाता है। वह आदि, मध्य और अन्त में यथावत रहता है। उस परमात्मा को ही परम ब्रह्म कहा गया है। उसके सिवाय अन्य कोई दूसरा व्यापक (comprehensive, pervasive), निर्विकार (-immutable, invariable, unchanged, without defect), सदा रहने वाला तत्व नहीं है। उसे न सत् और न ही असत् कहा जा सकता है, क्योंकि वह बुद्धि का विषय नहीं है। वह ज्ञेय तत्व मन, वाणी और बुद्धि से सर्वथा अतीत है। उसका शब्दों में वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है। 
Bhagwan Shri Krashn told Arjun that he would make clear the concept of the gist of the Ultimate knowledge to him, for achieving which human incarnation is obtained. Having recognised the Parmatm Ttv (-the gist, nectar, elixir of the Almighty) the practitioner-devotee experiences immortality. The universe takes birth in that endless-perennial (-चिरस्थायी)-forever Almighty and vanishes in Him. He remains as such in the beginning, middle and at the end. That God is called-termed as Par Brahm. Nothing other than Him is comprehensive, defect less and for ever. He is neither existent-eternal nor nonexistent-temporal, since He is beyond the limits of brain-intellect. He-the one who ought to be known, is beyond imagination, thought, intelligence and speech. Its not possible to describe Him in words.
परमात्मा सत् भी है और असत् भी है, वह सत् और असत् से परे भी है  तथा वह न सत् भी है और न असत् ही है। 
OMKAR  ॐ कार 
जिस समय परमेष्ठी ब्रह्मा जी पूर्व सृष्टि का ज्ञान सम्पादन करने के लिये एकाग्रचित्त हुए, उस समय उनके हृदयाकाश से कण्ठ-तालु आदि स्थानों से, संघर्ष से रहित एक अत्यन्त विलक्षण अनाहत नाद प्रकट हुआ।  जब जीव अपनी मनोवृत्तियों को रोक लेता है, तब उसे भी इस अनाहत नाद का अनुभव होता है। बड़े-बड़े योगी उसी अनाहत नाद की उपासना करते हैं और उसके प्रभाव से अन्तःकरण के द्रव्य-अधिभूत क्रिया-अध्यात्म और कारक-अधिदैव रूप मल को नष्ट करके वह परमगति रूप मोक्ष प्राप्त करते हैं, जिसमें जन्म-मृत्यु संसार चक्र नहीं है। उसी अनाहत नाद से "अ " कार, "उ" कार और "म" कार रूप तीन मात्राओं से युक्त "ॐ कार" प्रकट हुआ। इस  कार की शक्ति से ही प्रकृति अव्यक्त से व्यक्त रूप में परिणित हो जाती है।  कार स्वयं व्यक्त एवं अनादि है और परमात्म स्वरूप होने से स्वयं प्रकाश भी है।  जिस परम वस्तु को भगवान् ब्रह्म अथवा परमात्मा के नाम से कहा जाता है, उसके स्वरूप का बोध भी  कार के द्वारा ही होता है। 


जब श्रवणेन्द्रियों की शक्ति लुप्त हो जाती है, तब भी इस ॐ कार को समस्त अर्थों को प्रकाशित करनेवाले स्फोट तत्व को जो सुनता है और सुषुप्ति एवं समाधि-अवस्थाओं में सबके आभाव को जानता है, वही परमात्मा का विशुद्ध स्वरूप है।  वही ॐ कार परमात्मा से हृदयाकाश में प्रकट होकर वेदरूपा वाणी को अभिव्यक्त करता है। ॐ कार अपने आश्रय परमात्मा परब्रह्म का साक्षात् वाचक है।  ॐ कार ही सम्पूर्ण मंत्र, उपनिषद और वेदों का सनातन बीज है। 
अ, उ और म   कार के तीन वर्ण हैं। ये तीनों ही सत्त्व, रज, तम-इन तीन गुणों; ऋक्, यजुः, साम-इन तीन नाम; भूः, भुवः, स्वः-इन  अर्थों और जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति-इन तीन वृत्तियों के रूप में तीन-तीन की संख्या वाले भावों को धारण करते हैं। 
 कार से ही ब्रह्मा जी ने अन्तःस्थ (य, र, ल, व), ऊष्म (श, ष, स, ह), स्वर (अ से औ तक), स्पर्श (क से म तक), तथा ह्रस्व और दीर्घ आदि लक्षणों से युक्त अक्षर-समान्माय अर्थात वर्णमाला की रचना की। 
इसी  वर्णमाला द्वारा उन्होंने अपने चार मुखों से होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा-इन कगार ऋत्विजों के कर्म बतलाने के लिये  कार और व्याहृतियों के सहित चार वेद प्रकट किये और अपने पुत्र मरीचि आदि को वेदाध्ययन में कुशल देखकर वेदों की शिक्षा दी। [श्रीमद्भागवत 12-6-(3-45)]
Om-Aum ओ३म् ॐ :: Om-Aum stirs the whole body, which results in soothing nerves and regulation of proper blood flow-pressure in the arteries and the veins. ओ३म् बोलने से शरीर के अलग अलग भागों मे कंपन होते हैं जैसे कि अ :- शरीर के निचले हिस्से (-पेट के करीब) कंपन उत्पन्न करता है। Aa creates vibrations in lower abdomen. उ :- शरीर के मध्य भाग (-छाती के करीब) कंपन उत्पन्न करता है। Uu; OO-oo generates waves in the middle segment of the body around the chest and Mmम :- शरीर के ऊपरी हिस्से (-मस्तिक में) कंपन  उत्पन्न करता है। It reverberate the brain, creating rhythm. One observes that the word Om-Aum produce vibrations in the body. Aaअ, Uuउ, Mmम Combination of these syllable brings one close to the Almighty automatically.
Om-Aum has extra ordinary healing powers and curative effects. It relieves one from pain-tensions-sorrow-difficulties, if he concentrate in God and pronounce it repeatedly with ease. It allows one to meditate-concentrate in the God-Almighty to resolve all problems-difficulties.
There are some words which are very close to om ॐ ओम. In English one finds (1). Omen: Good or Bad-evil (-portent, sign, signal, token, forewarning, warning, fore shadowing, prediction, forecast, prophecy, harbinger, augury) (2). Omni: All; of all things, omniscient-in all ways or places. omnipresent, omnipotent. In Gurumukhi Omkar, in Urdu Ameen.
Om is the sound produced by the newly born child. The frequency of the earth rotating around its axis is same as the one produced by OM. 
ॐ Om-Aum is a sacred sound and spiritual icon, connected as Dharmic-religious symbol, though it is universal governing the entire universe-cosmos. It is also a Mantr-the sound-hymn. Om is a spiritual symbol-Pratima (-प्रतिमा-मूर्ति-statue) referring to Atma (-soul, self within) and the Brahm (-ultimate reality, entirety of the universe, truth, divine, supreme spirit, cosmic principles, knowledge).
This is used a prefix and suffix as well, adding meaning to the verse-rhyme-Mantr-Shlok, in the Veds, the Upanishads and scriptures-epics. It is a sacred spiritual incantation made before and during the recitation of spiritual texts, during puja and private prayers, in ceremonies of rites of passages (sanskar-virtues-good qualities) such as weddings and sometimes during meditative and spiritual activities such as Yog.
Om is part of the iconography found in ancient and medieval era temples, monasteries and spiritual retreats.
The syllable is also referred to as Omkar (-ओंकार), Aumkar (-औंकार), Pranav (-प्रणव), Akshar-alphabet, Ekakshar-single alphabet .
It is the cosmic-mystical-divine sound, which was produced with the beginning of evolution. It symbolizes the abstract and spiritual in the Upanishads. It is core-theme-central idea-axis of the Vedic texts such as the Rig Ved.
ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्; होतारं रत्नधातमम्। [Rig Ved 1.1.1]
Om is divine acknowledgment, melodic confirmation, something that gives momentum and energy to a hymn. [Aitarey Aranyak 23.6]
The three phonetic components of Om (-pronounced AUM) correspond to the three stages of cosmic creation and when it is read or said, it celebrates the creative powers of the universe. It is equated Om with Bhur-Bhuvah-Swah, the latter symbolizing the whole Ved.[Aitarey Brahmn 5.32]
It represents-describes the universe beyond the Sun, which is mysterious and inexhaustible, infinite language, the infinite knowledge, essence of breath, life, everything that exists or that with which one is Liberated.
Sam Ved-the poetical Ved, orthographically maps Om to the audible, the musical truths in its numerous variations (Om, Aum, Ova, Um, etc.) and then attempts to extract musical meters from it.
Om as a tool for meditation. It helps one in meditation, ranging from artificial and senseless to highest concepts such as the cause of the Universe, essence of life, Brahm, Atma and Self-realization.
The syllable is also referred to as Pranav. Chhandogy Upnishad and the Shraut Sutr describes it as Akshar-alphabet, imperishable, immutable or Ekakshar-single alphabet and Onkar-beginning, female divine energy.
ॐ भूर्भुवस्व:, तत्सवितुर्वरेण्यम्; भर्गो देवस्य धीमहि; धियो यो न: प्रचोदयात्। [Rig Ved III.62.10]
 Gaytri Mantr describes the origin of the three abodes in Om. It is the desirable splendor of Savitr-Aura of the Sun, the Inspirer which stimulate one to insightful thoughts.
One should meditate-concentrate, on Om. Om is Udgeeth (-उद्गीथ, song, chant) and asserts that it's significance is: The essence of all beings is earth, the essence of earth is water, the essence of water are the plants, the essence of plants is man, the essence of man is speech, the essence of speech is the Rig Ved, the essence of the Rig Ved is the Sam Ved and the essence of Sam Ved is the Udgeeth (song, Om).[Chhandogy Upnishad]
Rik (-ऋच्, Ṛc) is speech and Sam (-साम) is breath. They co-exist in pairs. They have love and desire for each other, so speech and breath find themselves together and mate to produce song. Thus the highest song is Om. It is the symbol of awe, of reverence, of threefold knowledge because Adhvaryu invokes it, the Hotr recites it and Udgatr sings it.[Chhandogy Upnishad 1.1] 
Om was used to gain victory-energy by the Devs-demigods to overcome the Asurs-demons. The struggle between demigods and demons is allegorical (-symbolic, metaphorical, figurative, representative, emblematic, imagistic, mystical, parabolic, symbolizing) since good and evil inclinations within man, coexists. The legend in section  states that Demigods took the Udgeeth (-song of Om) unto themselves, thinking, with this song they would overcome the demons. So, the syllable Om is implied  to inspires the good inclinations-intentions within each person.[Chhandogy Upnishad 1.2]
It combines etymological speculations, symbolism, metric structure and philosophical themes.The meaning and significance of Om evolves into a philosophical discourse. Om is linked to the Highest Self. [Chhandogy Upnishad 2.10] 
Om is the essence of three forms of knowledge. Om is Brahm and Om is all this observed world.[Chhandogy Upnishad 2.23]
Nachiketa, son of sage Vajasravas, discussed the nature of man, knowledge, Atma (-Soul, Self) and Moksh (-Liberation, Salvation, assimilation in the Almighty-God), with Yam-Dharm Raj. It characterizes Knowledge-Wisdom, as the pursuit of good and Ignorance-Delusion-Illusion, as the pursuit of pleasant, that the essence of Ved is to make the man liberated and free, look past what has happened and what has not happened, free from the past and the future, beyond good and evil and one word for this essence is Om. [Katha Upanishad 1.2]
This is the word which is proclaimed by the Veds. It is expressed in every holy-pious deeds i.e., Yagy-Hawan-Agnihotr-rituals-prayers-Katha Shrawan (-listening, hearing), Tap-penance-austerity-meditation, offerings. One practices chastity-Brahmchary, while understanding-acquiring the essence of it.  It is identified with Brahm-the Supreme. [Katha Upnishad, 1.2.15-1.2.16]
Om represents Brahm-Atma-The Ultimate. The sound constitutes the body of Soul. It manifests in three forms: 
As gender endowed body:-Feminine, masculine, neuter.
As light endowed body:- Agni, Vayu and Adity.
As deity endowed body:- Brahma, Rudr and Vishnu. 
As mouth endowed body:- Grahpaty (-गृहपत्य), Dakshinagni (दक्षिणाग्नि)  and Avahniy (-आवाहनीय).
As knowledge endowed body:- Rig, Sam and Yajur Ved.
As world endowed body:- Bhur, Bhuvaḥ and Swaḥ.
As time endowed body:- Past, Present and Future.
As heat endowed body:- Breath, Fire and Sun.
As growth endowed body:- Food, Water and Moon.
As thought endowed body:Intellect, mind and psyche.
Brahm exists in two forms:- The material form and the immaterial-formless. The material form is changing, unreal. The immaterial-formless, has no specific shape or size, isn't changing, real. The immortal formless is truth, the truth is the Brahm, the Brahm is the light, the light is the Sun, which is the syllable Om as the Self. [Maetri Upnishad]
The world in itself, its light and the Sun are the manifestation of Om and the light of the syllable Om, asserts the Upnishad. Meditating on Om, is acknowledging and meditating on the Brahm-Atma (-Soul, Self).[Mundak Upnishad]
The means to knowing the Self and the Brahm to be meditation, self-reflection and introspection, are aided by the symbol Om.[Mundak Upnishad Part-2]
That which is flaming, which is subtler than the subtle, on which the three worlds are set along with their inhabitants. That is the indestructible Brahm. It is life, it is speech, it is mind. It is the real. It is immortal. It is a mark to be penetrated. One has to penetrate it. [Mundak Upnishad, 2.2.2]
One has to take the great weapon of the Upnishad as a bow, put upon it the arrow, sharpened by meditation, stretching it with a thought directed to the essence of that, penetrate that Imperishable as the mark. [Mundak Upnishad, 2.2.3]
Om is the bow, soul is the arrow, Brahm the mark and it has to be penetrated by the man. One should come to be in it, as the arrow becomes one with the mark. [Mundak Upnishad, 2.2.4]
Adi Shankrachary, in his review of the Mundak Upnishad, states that Om is a symbolic for Atma-soul-self.
The whole world is contained in this syllable Om! It constitutes of a fourfold derived from A + U + M + silence, without an element.[Mundak Upnishad]
Aum constitutes the three dimensions of time::
Time is threefold: The past, the present and the future, that these three are Aum. The fourth of time is that which transcends time and that too is Aum. [Mundak Upnishad 1]
Aum as all states of Atma.
Everything is Brahm, but Brahm is Atma (-the Soul, Self) and that the Atma is fourfold. These four states of Self, respectively are seeking the physical, seeking inner thought, seeking the causes and spiritual consciousness and the fourth state is realizing oneness with the Self, the Eternal.[Mundak Upanishad 2]
Aum constituents  all the states of consciousness::
It enumerates the four states of consciousness: Wakeful, dream, deep sleep and the state of Ekatm (-एकात्म, being one with Self, the oneness of Self). These four are A + U + M + without an element respectively.[Mundak Upnishad 3-6]
Aum as all of knowledge: 
It enumerates four fold etymological roots of the syllable Aum. The first element of Aum is A, which is from Apti (-आप्ति, obtaining, reaching) or from Aditv (-आदित्व, original, being first). The second element is U, which is from Utkarsh (-उत्कर्ष, exaltation) or from Ubhayatv (-उभयत्व  (-intermediateness). The third element is M, from Miti (-मिति,erecting,constructing) or from Mi Minati (-मिनाति), or Apiti (-आपिति, annihilation). The fourth is without an element, without development, beyond the expanse of universe. Om is in deed the Atma (-soul, the self). [Mundak Upnishad 9-12]
Meditation by concentrating over the syllable Om, where one's perishable body is like one fuel-stick and the syllable Om is the second fuel-stick, which with discipline and diligent rubbing of the sticks unleashes the concealed fire of thought and awareness within. Such knowledge, asserts the Upnishad and is the goal of the Upanishads. The text asserts that Om is a tool of meditation empowering one to know the God within oneself, to realize one's Atma (-Soul, Self).[Shwetashwtar Upnishad 1.14- 1.16]
Om is the symbol for the indescribable, impersonal Brahm. Krashn to Arjun: I am the Father of this Universe, Mother, Ordainer, Grandfather, the Thing to be known, the Purifier, the syllable Om, Rik, Saman and also Yajus.[Shri Mad Bhagwad Geeta 9.17]
The importance of Om during prayers, charity and meditative practices: 
Uttering Om, the acts of Yagy (-sacrificial fire ritual), Dan (-charity, donation) and Tapas (-austerity) as enjoined in the scriptures, are always begun by those who study the Brahm.[Bhagwad Geeta 17.24]
तस्य वाचकः प्रणवः ॥1.27॥ His word is Om. This  aphoristic verse highlights the importance of Om in the meditative practice of Yog, where it symbolizes three worlds in the Soul. The three divisions of time: Past, Present and the Future. Eternity, the three divine powers: Creation, Preservation and Transformation in one being. Three essences in one Spirit: Immortality, Omniscience and Joy. It is, a symbol for the perfected Spiritual Man (-his emphasis).[Ptanjali's Yog Sutr 1.27]
Om is the representation of the Trimurti and represents the union of the three Gods, viz. A for Brahma, U for Vishnu and M for Mahesh-Shiv. The three sounds also symbolize the three Veds, namely (Rig Ved, Sam Ved, Yajur Ved).[Vayu Puran]
Shiv is Om-Pranav and that Om is Shiv.[Shiv Puran]
It is the primordial sound associated with the creation of universe from nothing. [Maheshwaranand] 
Om is Ekam Akshram (एकम् अक्षरम्, one syllable). Udgeeth, a word found in Sam Ved and Bhashy (commentaries) based on it, is synonymous therein, with the syllable Om.
तत्व ज्ञान :: मनुष्य को सदा उस परमेश्वर का, जिसके चरण-कमल निरन्तर भजने योग्य हैं, के गुणों का आश्रय लेने वाली भक्ति के द्वारा, सब प्रकार से: मन, वाणीं और शरीर से; भजन करना चाहिये। उनको समर्पित भक्ति योग तुरंत ही संसार से वैराग्य और ब्रह्म साक्षात्कार रूप ज्ञान की प्राप्ति करा देता है। सभी विषय भगवद् रूप होने के कारण समान हैं। अतः जब इन्द्रियों की वृत्तियों के द्वारा भी भगवद्भक्त का चित्त उनमें प्रिय-अप्रिय रूप विषमता का अनुभव नहीं करता-सर्वत्र भगवान् का ही दर्शन करता है-उसी समय वह सङ्ग रहित, सबमें समान रूप से स्थित, त्याग और ग्रहण करने योग्य, दोष और गुणों से रहित, अपनी महिमा में आरूढ़ अपने आत्मा का ब्रह्म रूप से साक्षात्कार करता है। वही ज्ञान स्वरूप है, वही परब्रह्म है, वही परमात्मा है, वही ईश्वर है, वही पुरुष है; वही एक भगवान् स्वयं जीव, शरीर, विषय, इन्द्रियों आदि अनेक रूपों में प्रतीत होता है। 
सम्पूर्ण संसार में आसक्ति का अभाव हो जाना-बस यही  योगियों के सब योग साधन का एक मात्र अभीष्ट फल है। ब्रह्म एक है, ज्ञान स्वरूप और निर्गुण है, तो भी वह बाह्य वृतियों वाली इन्द्रियों के द्वारा भ्रान्ति वश शब्दादि, धर्मों वाले विभिन्न-पदार्थों के रूप में भास रहा है। जिस प्रकार एक ही परब्रह्म महत्त्व, वैकारिक, राजस और तामस-तीन प्रकार का अहंकार, पञ्च महाभूत एवं ग्यारह इन्द्रिय रूप बन गया और फिर वही स्वयं प्रकाश इनके संयोग से जीव कहलाया, उसी प्रकार उस जीव का शरीर रूप यह ब्रह्माण्ड भी वस्तुतः ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्म से ही इसकी उत्पत्ति हुई है। किन्तु इसे ब्रह्म रूप में वही देख सकता है, जो श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य तथा निरन्तर योगाभ्यास के द्वारा एकाग्र चित्त और असंगबुद्धि हो गया है। 
इस ज्ञान के माध्यम से प्रकृति और पुरुष के यथार्थ स्वरूप का बोध हो जाता है। निर्गुण ब्रह्म विषयक ज्ञान योग और परमेश्वर के प्रति भक्ति योग का फल एक ही है। उसे ही भगवान कहते हैं। 
जिस प्रकार रूप, रस एवं गंध आदि अनेक गुणों का आश्रय भूत एक ही पदार्थ भिन्न-भिन्न इन्द्रियों द्वारा विभिन्न रूप से अनुभूत होता है, वैसे ही शास्त्र के विभिन्न मार्गों द्वारा एक ही भगवान् की अनेक प्रकार से अनुभूति होती है। नाना प्रकार के कर्म कलाप यज्ञ, दान, तप, वेदाध्ययन-मीमांसा, मन और इन्द्रियों के संयम, कर्मों के त्याग, विविध अङ्गों वाले योग, भक्ति योग, निवृति और प्रकृति रूप सकाम और निष्काम दोनों प्रकार के धर्म, आत्मतत्व के ज्ञान और दृढ़ वैराग्य-इन सभी साधनों से सगुण-निर्गुणरूप स्वयं प्रकाश भगवान् को ही प्राप्त किया जाता है। 
जो सात्विक, राजसिक, तामस और निर्गुण भेद से चार प्रकार के भक्ति योग का और जो प्राणियों के जन्मादि विकारों का हेतु है तथा जिसकी गति जानी नहीं जाती, उस काल के स्वरूप को परमात्मा ने उपरोक्त पदों में स्वयं स्पष्ट किया है। 
अविद्या जनित कर्म के कारण जीव की अनेकों गतियाँ होती हैं; उनमें जाने पर वह अपने स्वरूप को नहीं पहचान सकता। 
उपरोक्त ज्ञान दुष्ट, दुर्विनीत, घमण्डी, दुराचारी और धर्मध्वजी-दम्भी पुरुषों को नहीं सुनाना-समझाना-पढ़ाना चाहिए।  विषय लोलुप, गृहासक्त, अभक्त, श्रद्धाहीन, परमात्मा के भक्तों से द्वेष रखने वाला भी इस उपदेश से दूर रखना चाहिये। 
जो  श्रद्धालु भक्त, विनयी, दूसरों के प्रति दोषदृष्टि न रखने वाला, सब प्राणियों से मित्रता रखने वाला, गुरु सेवा में तत्पर, बाह्य विषयों अनासक्त, शांत चित्त, मत्सर शून्य और पवित्र चित्त हो तथा परमात्मा को अपना प्रियतम मानने वाला हो, उसे इसका उपदेश अवश्य किया जाये। परमात्मा में  मन-ध्यान-चित्त लगाकर श्रद्धापूर्वक जो भी व्यक्ति, इसका एक बार भी श्रवण या कथन करेगा, वह परमात्मा के परम पद को प्राप्त होगा।  [श्रीमद्भागवत {3-32-(22-42)}]
तत्ववेत्ता ज्ञाता और ज्ञेय के भेद से रहित अखण्ड अद्वितीय सच्चिदानन्द स्वरूप ज्ञान को ही तत्व कहते हैं। उसी को कोई ब्रह्म, कोई परमात्मा और कोई भगवान् के नाम से पुकारते हैं। [श्रीमद्भागवत (2-1 -11)]
THE ULTIMATE परमात्म तत्व :: 
🔔 मनुष्य जीवन का उद्देश्य उस चेतन को जानना है जो पूर्ण है और जिसका आदि अंत नहीं हैं, जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है। जो जड़ भी है और चेतन भी हैं। जो शरीर रहित भी है और शरीर सहित भी है। जिसका रूप है और नहीं भी है। 
🔔 आत्मा का परमात्मा में लीन होना ही मुक्ति-भक्ति-मोक्ष है। 
🔔 जिसने स्वयं में स्थित उस आत्मा रूपी परमात्मा को जान लिया है वह बन्धन मुक्त, ज्ञानी, समदर्शी, ब्रह्म में लीन है, समता प्राप्त है। 🔔 जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
🔔 अहम्-अहंकार का त्याग करने वाला परमात्मतत्व का अधिकारी है। 
🔔 हानि-लाभ, सुख-दुःख, में समान भाव रखने वाला, भय से मुक्त परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है। 
🔔 काम, क्रोध, मद, लोभ-लालच-स्वार्थ-मोह को त्यागने वाला परमात्म तत्व का अधिकारी है। 
🔔 स्वः धर्म,वर्णाश्रम धर्म का पालन करने वाला, कर्म-कर्तव्य-दायित्व से मुँह न मोड़ने वाला ब्रह्म मार्ग का अनुयायी है।  
🔔 प्राणियों पर दया भाव रखने वाला, परोपकारी परमात्मा को प्राप्त करने का अधिकारी है।
🔔 मन, इन्द्रियों, वाणी, इच्छाओं पर काबू करने वाला मोक्ष का अधिकारी है। 
🔔 त्यागी, वैरागी, संतुष्ट-संतोषी, आत्म संयमी, आत्म दर्शी है।
One who is relinquished, content-satisfied, sees the Almighty in him self, exerts control over himself, his desires is entitled for Liberation.
🔔 उसे सुख दुःख, जन्म-मृत्यु, हानि-लाभ, समस्त प्राणियों के प्रति समता प्राप्त है। 
🔔 निर्लिप्त-सत्यनिष्ठ है। 
🔔 उसने परमात्मा की शरण ग्रहण कर ली है। 
🔔 वो निर्द्वन्द है। 
🔔 वो सेवा निष्ठ-समाजसेवी-परमार्थी है। 
🔔 जो तीर्थ यात्रा, धर्म अनुष्ठान, यज्ञ-हवन, पूजा-पाठ, स्वाध्याय करता है, वह परमात्म तत्व का अधिकारी है।
🔔 जो माता-पिता-गुरु-जन, वृद्ध, दीन-हीन, प्रताड़ित की मदद-सेवा-सहायता करता है वो परमात्मतत्व का अनुरागी है। 
🔔 जो परोपकार, समाज सेवा करता है, वो परमात्मतत्व का हक़दार है। 
🔔 जो अन्याय, दुराचार, अनाचार, अत्याचार से दूर से और इनका मुकाबला करता है, वह धर्मनिष्ठ है। 
🔔 तत्वज्ञान अथवा अज्ञान का नाश एक बार ही होता है और सदा के लिए होता है। तत्वज्ञान की आवृति नहीं होती। ज्ञान की स्वतंत्र सतत है ही नहीं। बोध का अनादर-तिरस्कार करने से असत् को ग्रहण किया जाता है। असत् को महत्व देने से विवेक जाता है। बोध एक बार ही होगा और सदा के लिए होगा। तत्वज्ञान होने पर मोह नहीं होगा। जगत जीव के अन्तर्गत और जीव परमात्मा के अंतर्गत है। साधक पहले जगत को अपने में देखता है, फिर स्वयं में परमात्मा को देखता है। आत्मज्ञान ज्ञान और परमात्मज्ञान विज्ञान है। आत्मज्ञान में निज आनन्द है और परमात्मज्ञान में परमानन्द है। लौकिक निष्ठा से कर्मयोग तथा ज्ञान योग से आत्मज्ञान होता है और अलौकिक निष्ठा से भक्तियोग जिससे परमात्मज्ञान का अनुभव होता है।
🔔 आत्मज्ञान से मुक्ति तो होती है परन्तु अहंम्-अहंकार रह जाता है। आत्मज्ञान से अहंकार भी मिट जाता है। 
⇔ Sole aim of the incarnation as a human being is to realize-find-understand that conscious, which is complete, has no end-is infinite, which is free from birth and the death. He is static-inertial and conscious as well.He is with the body-shape and size and otherwise as well.He has infinite shapes-figures-forms-faces-features.
⇔ Assimilation of the soul in the Almighty is Liberation-Salvation Moksh, like a drop of water which falls in the ocean becomes ocean, a dust particle which falls over the earth from the space-sky becomes earth.
⇔ One who has identified-recognized the Almighty present in him self in the form of soul is detached-relinquished. he is free from bonds-ties-illusion-attachments-affections. He is enlightened having attained equanimity, assimilated-absorbed in the Ultimate.
⇔ He is free from the clutches-ties of birth and death.
⇔ He is not perturbed by the loss-gain, pleasure-pain. he weighs them equally. He is free from fear and deserve association with the God.
⇔ One who follows his duties religiously, follows the Varnashram Dharm, keep on performing his duties-responsibilities-liabilities is a follower of the Brahm-the Ultimate.
⇔ One (-beneficent, philanthropist, altruist) who takes pity over the living beings is entitled for the blessings of the Almighty.
⇔ One has control over his senses, sense organs, sensuality,is entitled for Salvation.
⇔ One who is relinquished, content-satisfied, sees the Almighty in him self, exerts control over himself, his desires is entitled for Liberation.
ब्रह्म रहस्य-प्रज्ञानं :: कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद (-शुकरहस्योपनिषद) में भगवान् वेद व्यास जी के आग्रह पर भगवान्  शिव उनके पुत्र शुकदेव को चार महावाक्यों का उपदेश "ब्रह्म रहस्य" के रूप में दिया :-
(1).  ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म :: प्रकट ज्ञान ब्रह्म है। वह ज्ञान-स्वरूप ब्रह्म जानने योग्य है और ज्ञान गम्यता से परे भी है। वह विशुद्ध-रूप, बुद्धि-रूप, मुक्त-रूप और अविनाशी रूप है। वही सत्य, ज्ञान और सच्चिदानन्द-स्वरूप ध्यान करने योग्य है। उस महातेजस्वी देव का ध्यान करके ही हम ‘मोक्ष’ को प्राप्त कर सकते हैं।
वह परमात्मा सभी प्राणियों में जीव-रूप में विद्यमान है। वह सर्वत्र अखण्ड विग्रह-रूप है। वह हमारे चित और अहंकार पर सदैव नियन्त्रण करने वाला है। जिसके द्वारा प्राणी देखता, सुनता, सूंघता, बोलता और स्वाद-अस्वाद का अनुभव करता है, वह प्रज्ञान है। वह सभी में समाया हुआ है; वही ‘ब्रह्म’ है।
(2). ॐ अहं ब्रह्माऽस्मि :: मैं ब्रह्म हूं।’ यहाँ ‘अस्मि’ शब्द से ब्रह्म और जीव की एकता का बोध होता है। जब जीव परमात्मा का अनुभव कर लेता है, तब वह उसी का रूप हो जाता है। दोनों के मध्य का द्वैत भाव नष्ट हो जाता है। उसी समय वह ‘अहं ब्रह्मास्मि’ कह उठता है।
(3). ॐ तत्त्वमसि :: वह ब्रह्म तुम्हीं हो। सृष्टि के जन्म से पूर्व, द्वैत के अस्तित्त्व से रहित, नाम और रूप से रहित, एक मात्र सत्य-स्वरूप, अद्वितीय ‘ब्रह्म’ ही था। वही ब्रह्म आज भी विद्यमान है। उसी ब्रह्म को ‘तत्त्वमसि’ कहा गया है।
वह शरीर और इन्द्रियों में रहते हुए भी, उनसे परे है। आत्मा में उसका अंश मात्र है। उसी से उसका अनुभव होता है, किन्तु वह अंश परमात्मा नहीं है। वह उससे दूर है। वह सम्पूर्ण जगत में प्रतिभासित होते हुए भी उससे दूर है।
(4). ॐ अयमात्मा ब्रह्म :: यह आत्मा ब्रह्म है। उस स्वप्रकाशित परोक्ष (-प्रत्यक्ष शरीर से परे) तत्त्व को ‘अयं’ पद के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। अहंकार से लेकर शरीर तक को जीवित रखने वाली अप्रत्यक्ष शक्ति ही ‘आत्मा’ है। वह आत्मा ही परब्रह्म के रूप में समस्त प्राणियों में विद्यमान है। सम्पूर्ण चर-अचर जगत में तत्त्व-रूप में वह संव्याप्त है। वही ब्रह्म है। वही आत्मतत्त्व के रूप में स्वयं प्रकाशित ‘आत्मतत्त्व’ है।
अन्त में भगवान्  शिव शुकदेव से कहते हैं :-"हे शुकदेव! इस सच्चिदानन्द-स्वरूप ‘ब्रह्म’ को, जो तप और ध्यान द्वारा प्राप्त करता है, वह जीवन-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है।" भगवान शिव के उपदेश को सुनकर मुनि शुकदेव सम्पूर्ण जगत के स्वरूप परमेश्वर में तन्मय होकर विरक्त हो गये। उन्होंने भगवान्  को प्रणाम किया और सम्पूर्ण प्ररिग्रह का त्याग करके तपोवन की ओर चले गये।
साधन पंचकम् :: 
वेदो नित्यमधीयताम्, तदुदितं कर्म स्वनुष्ठीयतां, तेनेशस्य विधीयतामपचितिकाम्ये मतिस्त्यज्यताम्।
पापौघः परिधूयतां भवसुखे दोषोsनुसंधीयतां, आत्मेच्छा व्यवसीयतां निज गृहात्तूर्णं विनिर्गम्यताम्॥1॥ 
वेदों का नियमित अध्ययन करें, उनमें कहे गए कर्मों का पालन करें, उस परम प्रभु के नियमों का पालन करें, व्यर्थ के कर्मों में बुद्धि को न लगायें। समग्र पापों को जला दें, इस संसार के सुखों में छिपे हुए दुखों को देखें, आत्म-ज्ञान के लिए प्रयत्नशील रहें, अपने घर की आसक्ति को शीघ्र त्याग दें। 
संगः सत्सु विधीयतां भगवतो भक्ति: दृढाऽऽधीयतां, शान्त्यादिः परिचीयतां दृढतरं कर्माशु संत्यज्यताम्।
सद्विद्वानुपसृप्यतां प्रतिदिनं तत्पादुका सेव्यतां, ब्रह्मैकाक्षरमर्थ्यतां श्रुतिशिरोवाक्यं समाकर्ण्यताम्॥2॥ 
सज्जनों का साथ करें, प्रभु में भक्ति को दृढ़ करें, शांति आदि गुणों का सेवन करें, कठोर कर्मों का परित्याग करें, सत्य को जानने वाले विद्वानों की शरण लें, प्रतिदिन उनकी चरण पादुकाओं की पूजा करें, ब्रह्म के एक अक्षर वाले नाम ॐ के अर्थ पर विचार करें, उपनिषदों के महावाक्यों को सुनें। 
वाक्यार्थश्च विचार्यतां श्रुतिशिरःपक्षः समाश्रीयतां, दुस्तर्कात् सुविरम्यतां श्रुतिमतस्तर्कोऽनुसंधीयताम्।
ब्रम्हास्मीति विभाव्यतामहरहर्गर्वः परित्यज्यताम्, देहेऽहंमति रुझ्यतां बुधजनैर्वादः परित्यज्यताम्॥3॥ 
वाक्यों के अर्थ पर विचार करें, श्रुति के प्रधान पक्ष का अनुसरण करें, कुतर्कों से दूर रहें, श्रुति पक्ष के तर्कों का विश्लेषण करें, मैं ब्रह्म हूँ ऐसा विचार करते हुए "मैं रुपी अभिमान" का त्याग करें, "मैं शरीर हूँ", इस भाव का त्याग करें, बुद्धिमानों से वाद-विवाद न करें। 
क्षुद्व्याधिश्च चिकित्स्यतां प्रतिदिनं भिक्षौषधं भुज्यतां, स्वाद्वन्नं न तु याच्यतां विधिवशात् प्राप्तेन संतुष्यताम्।
शीतोष्णादि विषह्यतां न तु वृथा वाक्यं समुच्चार्यतां, औदासीन्यमभीप्स्यतां जनकृपानैष्ठुर्यमुत्सृज्यताम्॥4॥ 
भूख को रोग समझते हुए प्रतिदिन भिक्षा रूपी औषधि का सेवन करें, स्वाद के लिए अन्न की याचना न करें, भाग्यवश जो भी प्राप्त हो उसमें ही संतुष्ट रहें। सर्दी-गर्मी आदि विषमताओं को सहन करें, व्यर्थ वाक्य न बोलें, निरपेक्षता की इच्छा करें, लोगों की कृपा और निष्ठुरता से दूर रहें। 
एकान्ते सुखमास्यतां परतरे चेतः समाधीयतां, पूर्णात्मा सुसमीक्ष्यतां जगदिदं तद्वाधितं दृश्यताम्।
प्राक्कर्म प्रविलाप्यतां चितिबलान्नाप्युत्तरैः श्लिश्यतां, प्रारब्धं त्विह भुज्यतामथ परब्रह्मात्मना स्थीयताम्॥5॥ 
एकांत के सुख का सेवन करें, परब्रह्म में चित्त को लगायें, परब्रह्म की खोज करें, इस विश्व को उससे व्याप्त देखें, पूर्व कर्मों का नाश करें, मानसिक बल से भविष्य में आने वाले कर्मों का आलिंगन करें, प्रारब्ध का यहाँ ही भोग करके परब्रह्म में स्थित हो जाएँ। 
THE ULTIMATE ब्रह्म ज्ञान :: सच्चिदानन्द स्वरूप श्री कृष्णसनातन हैं। वे सारे जगत के कारणरूप प्रधान और पुरुष के भी नियामक परमेश्वर हैं। इस जगत के आधार, निर्माता और निर्माण सामग्री तथा स्वामी वे ही हैं। उनकी क्रीड़ा के हेतु  ही जगत का निर्माण हुआ है। यह जिस समय, जिस रूप में जो कुछ रहता है-होता है, वह ये परमेश्वर ही हैं। इस जगत में प्रकृति-रूप से भोग्य और पुरुष रूप से भोक्ता तथा दोनों से परे दोनों के नियामक साक्षात भगवान् भी ये ही हैं।  इन्द्रियातीत! जन्म, अस्तित्व आदि भाव विकारों से रहित परमात्मा ने ही इस चित्र-विचित्र जगत का निर्माण किया है। और इसमें इन्होने ही आत्मा रूप से प्रवेश भी किया है।  वे ही प्राण-क्रिया शक्ति और जीव-ज्ञान शक्ति के रूप में इसका पालन पोषण कर रहे हैं। क्रिया शक्ति प्रधान प्राण आदि में जो जगत की वस्तुओं की सृष्टि करने की सामर्थ्य है वह उन वस्तुओं की नहीं; अपितु इनकी की सामर्थ्य ही है। क्योकि वे परमात्मा के समान चेतन नहीं अपितु अचेतन हैं; स्वतंत्र नहीं परतंत्र हैं।  उन चेष्टाशील प्राण आदि में केवल चेष्टा मात्र होती है, शक्ति नहीं। शक्ति तो प्रभु की ही है। चन्द्रमा की कांति, अग्नि का तेज, सूर्य की प्रभा, नक्षत्र और विद्युत आदि की स्फुरण रूप से सत्ता, पर्वतों की स्थिरता, पृथ्वी की साधारण शक्ति रूप वृत्ति और गंध रूप गुण-ये सब प्रभु ही हैं। जल में तृप्त करने, जीवन देने और शुद्ध करने की जो शक्तियाँ हैं, वे परमात्मा के स्वरूप ही हैं। जल और उसका रस भी वही हैं। इन्द्रिय शक्ति, अन्तःकरण की शक्ति, शरीर की शक्ति, उसका हिलना-डुलना, चलना-फिरना-ये सब वायु की शक्तियां उन्हीं की हैं। दिशाएं और उनके आकाश भी वही हैं। आकाश और उसका आश्रय भूत स्फोट-शब्द तन्मात्रा या परा वाणी, नाद-पश्यन्ति, ओंकार-मध्यमा तथा वर्ण (-अक्षर) एवं पदार्थों का अलग-अलग निर्देश करने वाले पद, रूप, वैखरी वाणी भी वे ही हैं।  इन्द्रियां और उनकी विषय प्रकाशिनी शक्ति और अधिष्ठातृ-देवता वे ही हैं। बुद्धि की निश्चयात्मिका शक्ति और जीव की विशुद्ध स्मृति भी वे ही हैं। भूतों में उनका कारण तामस अहँकार, इन्द्रियों में उनका कारण तैजस अहँकार और इन्द्रियों के अधिष्ठातृ-देवताओं में उनका कारण सात्विक अहँकार तथा जीवों के आवागमन का कारण माया भी वे ही हैं। जैसे मिट्टी आदि वस्तुओं के विकार घड़ा, वृक्ष आदि में मिट्टी निरन्तर वर्तमान है और वास्तव में वे कारण-मृतिका रूप ही हैं-उसी प्रकार जितने भी विनाशवान पदार्थ हैं, उनमे कारण रूप से अविनाशी तत्व परमात्मा ही हैं। वास्तव में वे उनके ही रूप हैं। सत्व, रज और तम-ये तीनों गुण और उनकी वृत्तियाँ-परिमाण-महत्तत्त्वादि परब्रह्म परमात्मा में वे ही माया द्वारा कल्पित हैं। जितने भी जन्म, अस्ति, वृद्धि, परिणाम आदि भाव-विकार हैं, वे प्रभु से सर्वथा अलग नहीं हैं। जब इनमें प्रभु की कल्पना कर ली जाती है तब वे ही इन विकारों के अनुगत जान पड़ते हैं। कल्पना की निवृति हो जाने पर निर्विकल्प परमार्थ स्वरूप वे ही रह जाते हैं। यह जगत सत्व, रज और तम-इन तीनो गुणों का प्रवाह हैं; देह, इन्द्रियां, अन्तःकरण, सुख, दुःख और राग-लोभादि उन्हीं के कार्य हैं। इनमें जो अज्ञानी परमात्मा का सर्वात्मा सूक्ष्म स्वरूप नहीं जानते, वे अपने देहाभिमानरूप ज्ञान के कारण ही कर्मों के फंदे में फंसकर बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्कर में भटकते हैं। मनुष्य को प्रारब्ध के अनुसार इन्द्रियादि के सामर्थ्य से युक्त अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य-शरीर प्राप्त हुआ है।  किन्तु माया वश वह असावधान हो जाता है और स्वार्थ-परमार्थ से ही असावधान होकर सारी  उम्र बिता देता है। मनुष्य को शरीर के सम्बन्धी, अहंता एवं  ममता रूप स्नेह के फंदे से प्रभु ने ही बांध रखा है। वे अजन्मा हैं, फिर भी अपने बनाई हुई मर्यादा की रक्षा करने के लिए वे अवतार ग्रहण करते हैं। वे अनन्त और एकरस सत्ता हैं। [श्रीमद्भागवत 85-3-20]
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् । स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥18-46॥
जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है, उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके, मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। 
जिस परमात्मा से संसार पैदा हुआ है और संचालित है, जो सबका उत्पादक आधार और प्रकाशक है जो सबमें परपूर्ण है अर्थात जो अनन्त ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति से पहले भी था, उनके रहते हुए भी जो रहता है और जो उनके लीन  होने के बाद भी रहेगा, तथा जो अनन्त ब्रह्माण्डों में व्याप्त है, उसी परमात्मा का अपने-अपने स्वभावज-वर्णोचित स्वभाविक कर्मों के द्वारा पूजन करना चाहिए। 
लौकिक और पारलौकिक कर्मो के द्वारा परमात्मा का पूजन तो करना चाहिए, परन्तु उनके करणों-उपकरणों में ममता नहीं रखनी चाहिए। क्योंकि उनमें ममता होते ही वे वस्तुएँ अपवित्र हो जाती हैं। सिद्धि को प्राप्त करने का अर्थ है कि मनुष्य अपने कर्मों से परमात्मा की पूजा करने से प्रकृति से असंबद्ध होकर स्वतः अपने स्वरूप में स्थित हो जाता है। उसका प्रभु में स्वतः अनन्य प्रेम जाग्रत हो जाता है। अब उसको पाने-हासिल करने के लिए कुछ भी शेष नहीं है। किसी भी जाति, सम्प्रदाय (हिन्दु, बौद्ध, ईसाई , पारसी, यहूदी, मुसलमान), वर्ग से व्यक्ति क्यों न हो वह परमात्मा के पूजन का अधिकारी है। भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन के इस संवाद-श्री मद्  भागवत गीता का जो अध्ययन करेगा उसके द्वारा परमात्मा ज्ञान से पूजित होंगे। कर्मयोगी और ज्ञान योगी अन्त में एक हो जाते हैं क्योंकि दोनों में जड़ता का त्याग किया गया है। इसी प्रकार भक्ति मार्ग भी जड़ता को मिटाता है। 
Accomplishment is attained by an individual by worshiping the Almighty, from whom all the universes, organisms have evolved and by whom all the universes are pervaded, through his natural-instinctive-prescribed-Varnashram related deeds.
One should pray to the Almighty from whom the entire Universe has evolved, who operates the world, who is the creator, producer, founder and illuminator, administrator-organizer-who alone is complete amongest all–who was present before creation of infinite universes and who will remain after assimilation of infinite universes in him and who is pervaded in infinite universes, is worshiped automatically if the individual performs his natural-prescribed-Varnashram dutiesPerformance of the prescribed-Varnashram duties assigned to the individual, itself is worship of the God.
Both Karm Yog and Gyan Yog merge into one single stream by eliminating immovability-inertness through service and worship enabling detachment, resulting in immersion in Supreme Power.
अविनाशी भगवान विष्णु सतो गुण, रजो गुण और तमो गुण से  युक्त, निर्गुण व सगुण, सर्वगामी और सर्वव्यापी हैं। वे श्वेत द्वीप-क्षीर सागर में अनन्त नाग शय्या पर आसीन, चक्र-गदा, धारण करने वाले हैं। 
अविनाशी भगवान विष्णु सर्वगत-अव्यक्त-सर्वव्यापी जगन्नाथ चतुर्मूर्ति कहे जाते हैं। (1). वासुदेव नामक श्रेष्ठ पद (तर्क या अनुमान द्वारा अज्ञेय) एवं निर्देश किया जाने में अशक्य, (2). शुक्ल (शुद्ध), (3). शांति युक्त, (4). अव्यक्त (अप्रकट) एवं द्वादश पत्रक (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) द्वादश मन्त्र वाला कहा गया है।
द्वादश पत्रक
प्रथम पत्रक: ॐ उनकी शिखा में स्थित है और मेष राशि और वैशाख मास का प्रतीक है,
द्वितीय पत्रक: अक्षर उनके मुख में विद्यमान है और वहीं पर वृष राशि और ज्येष्ठ मास को दर्शाता है,
तृतीय पत्रक: मो उनकी दोनों भुजाओं में स्थित और मिथुन राशि तथा आषाढ़ मास का द्योतक है,
चतुर्थ पत्रक: भ अक्षर उनके नेत्रों में स्थिततथा  कर्क राशि व श्रावण मास को दिखता है,
पञ्चम पत्रक: ग अक्षर उनके ह्रदय में स्थित सिंह राशि और भाद्रपद मास का प्रतीक है,
षष्ठ पत्रक: व अक्षर उनके कवच के रूप में कन्या राशि और आश्विन मास को दिखता है, 
सप्तम पत्रक: ते उनके अस्त्र समूह के रूप में तुला राशि और कर्तिक मास को प्रकट करता है,
अष्टम पत्रक: वा उनके नाभि रूप में है और वृश्चिक राशि और मार्ग शीर्ष मास का प्रतीक है,
नवम पत्रक: सु जघन रूप में स्थित और धनु राशि और पौष मास को प्रकट करता है,
दशम पत्रक: दे अक्षर उनके उरु युगल रूप में मकर राशि और माघ मास का द्योतक है,
एकादश पत्रक: वा अक्षर उनके घुटने में विराजमान और कुम्भ राशि के साथ फाल्गुन मास के प्रतीक है,
द्वादश पत्रक: य अक्षर उनके चरण द्व्यरूप में विद्यमान मं राशि और चैत्र मास को दर्शाता है। 
परमेश्वर की प्रथम मूर्ति: उनका चक्र 12 अरों 12 नाभियों और 3 व्यूहों से युक्त है। 
द्वितीय रूप: सत्वमय, श्रीवत्स धारी, अविनाशी स्वरूप, चतुर्वर्ण, चतुर्वाहु, और उदार अंगों से युक्त है। 
तृतीय मूर्ति: हजारों पैरों एवं मुखों से सम्पन्न श्री संयुक्त तमोगुण मयी शेष मूर्ति प्रजाओं का प्रलय करती है। 
चतुर्थ रूप: राजस रूप रक्तवर्ण, चार मुख, एवं दो भुजाओं एवं माला धारण किये है।  यही श्रष्टि करने वाल आदि रूप है। 
THE ALMIGHTY :: He is NIRAKAR-has no specific shape, size or alignment. He is invisible, like air or energy. He is AVAYAKT-undefined-without illustration, unrevealed  It's only he, who is immortal-beyond life and death. He had infinite incarnations -AVTARS (-incarnations), in the past and will have infinite incarnations in the future as well.
परमात्मा निराकार है। उसका कोई विशिष्ट आकार  नहीं है। वह अद्रश्य है। वह अव्यक्त है। जन्म  मृत्यु से परे है, उसके अनंत अवतार हो चुके हैं और आगे भी होंगे।  
He is SAKAR-Vyakt (-defined), has various-infinite shapes and sizes. He is capable of acquiring any shape, size, figure, form. He is beyond the limits of time, place, cast, creed, belief or religion.
वह  साकार है। अवतार  ग्रहण करते समय वह आकार ग्रहण करता है। वह सभी-कोई भी आकार धारण करने में समर्थ है। 
He is both material and immaterial, finite and infinite. He has unending powers, capacities, and capabilities. He is SUPREME-He is Param Pita-Per Brahm Permashwer.
वह भौतिक व अभौतिक, सीमा सहित व सीमा रहित-अनंत है। उसकी शक्तियां असीम हैं। वह  परम पिता परम ब्रह्म परमेश्वर  है। 
He is neither male nor female or impotent (-kinner, third sex) either.
वह स्त्री, पुरुष या किन्नर नहीं है।  
He is present in each and every particle, living and nonliving.  All life forms have evolved out of him and  will merge in him, ultimately.
वह  हम सब में विराजमान है। जीवन के सभी रूप उसी से उत्पन्न हुए हैं व उसी में विलीन हो जायेंगे। 
A Hindu can worship Him in any way, as per his liking. He is free to choose a  deity and worship accordingly. He may visit temple, holy places as per his will.He is free to pray in front of an idol, in a temple or in solitude.He may offer gifts, flowers, money. God welcomes him even if he offers prayers empty handed. He can recite prayers while travelling, sitting, bathing, resting or in any posture. Members of a family may be worshiping different deities at the same occasion. There is no restriction on the method of performing prayers. How ever rites, rituals, Hawan, Yagy, verses needs high degree of essence, purity, notes and specific procedures. Rhythm, pronunciation, clarity in recitation is-essential, stressed. Bathing in the morning before prayers is advised. Wearing of clean clothes is advised during the prayers. Morning prayers are performed facing east and evening prayers are performed facing north. However, again, there is no restriction on direction,time, mode.
This is a religion which provides unlimited freedom. Any one can adopt it, without conversion.
This is the source of all faiths and practice, including Mallechs & Yavans-Romans.
समस्त धन, शक्ति, सौन्दर्य, ज्ञान,तथा त्याग से युक्त परम पुरुष भगवान कहलाता है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव सहित कोई जीव कृष्ण के समान ऐश्वर्यवान नहीं है। 
ब्रह्म संहिता में ब्रह्मा जी स्पष्ट करते हैं कि गौ लोक वासी श्री कृष्ण स्वयं भगवान हैं न तो कोई उनके तुल्य है और न बढ़कर है। वे आदि पुरुष गोविन्द समस्त कारणों के कारण हैं। 
ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानंद विग्रहः। अनादिरादि गोविन्दः सर्वकारण कारणम्॥ 
भागवत के अनुसार उसके अनेकानेक अवतार-विस्तार हैं। 
एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयंम्। इन्द्रारी व्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे॥ 
कृष्ण आदि पुरुष, परम सत्य, परमात्मा तथा निर्विशेष ब्रह्म के उद्गम हैं। 
उन सनातन आदि देव को देवता आदि कोई भी वास्तविक रूप में नहीं जानते यद्यपि वे समस्त देवों-ब्रह्मादि को श्रुति-वेद एवं समस्त विश्व को जानते हैं। 



चितिः स्वतन्त्रा विश्वसिद्धिहेतुः :  Chitt, which is absolute consciousness, (and latent with power to do), by its own free will (Swatantray-freedom-Independence), is the cause of manifestation, preservation and again re absorption or withdrawal of the Universe into itself also called dissolution.
स्वेच्छया स्वभित्तौ विश्वमुन्मीलयति :-The nature Maa Bhagwati by Her own power,  unfolds the Universe on her own screen. 
God is both the efficient, as well as material cause of the Universe, that is to say, He creates out of his own will, on his own self, there is no extraneous material and even the analogy of the potter and the pot of clay, fails here, since the potter emanates or projects out of himself, not out of clay.
Bhagwan Shiv is constantly creating His own world, in which we find ourselves in a cosmic dance.
आध्यात्मिक ज्ञान और परमात्मा: पूर्ण परमात्मा, पूर्ण ब्रह्म, निरंजन, काल और भगवान महाविष्णु भी कहते हैं। 
अव्यक्त अर्थात् एक ओंकार परमात्मा की पूजा का ज्ञान पवित्र शास्त्रों (-पुराणों, उपनिषदों, वेद, गीता) के अध्ययन और गुरु कृपा से होता है।शास्त्रों में ज्योति स्वरूपी अर्थात् काल ब्रह्म की पूजा विधि  का वर्णन मिलता है। वह फोर्मलैस गौड अर्थात निराकार प्रभु  है। प्रभु-बेचून-निराकार-अल्लाह एक ही है  जो कि पूजा के योग्य है। 
अग्नेः तनूर् असि, विष्णवे त्वा सोमस्य तनुर् असि। कविरंघारिः असि, बम्भारिः असि स्वज्र्योति ऋतधामा असि॥ 
परमेश्वर पाप-बन्धनों का शत्रु है। वह सर्व पालन कर्ता, अमर, अविनाशी है। वह स्वप्रकाशित प्रभु सत धाम अर्थात् सतलोक में रहता है। [यजुर्वेद 1-15,  5-1 व 5-32] 
 SOUL & THE ALMIGHTY आत्मा और परमात्मा 
आत्मा के 12 लक्षण :- आत्मा नित्य, अविनाशी, शुद्ध, एक,क्षेत्रज्ञ, आश्रय, निर्विकार, स्वयं प्रकाश, सबका कारण, व्यापक, असङ्ग तथा आवरणरहित रहित है। [श्रीमद्भागवत 7-7-19]
मनुष्य के भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरण से उनका साक्षी आत्मा अलग है। जीव कहलाने वाले उस आत्मा से भी ब्रह्म भिन्न है और प्रकृति से उसके संचालक पुरुषोत्तम भिन्न हैं। [श्रीमद्भागवत 3-28-41]
देव मनुष्यादि शरीरों में रहनेवाल एक ही आत्मा अपने आश्रयों के गुण-भेद के कारण भिन्न-भिन्न प्रकार का भासता-प्रतीत होता है। [श्रीमद्भागवत 3-28-43]
मनुष्य योनिज्ञान-विज्ञान का मूल स्त्रोत है। जो इसे पाकर भी अपने आत्मरूप परमात्मा को नहीं जान लेता, उसे कहीं भी, किसी भी योनि में शांति नहीं मिल सकती॥ श्रीमद्भागवत 6-16-58॥ 
आत्मा का स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति-इन तीनों अवस्थाओं तथा इनके अभिमानों से विलक्षण है॥श्रीमद्भागवत 6-16-61॥ 
आत्मा तो एक ही  है परन्तु वह अपने ही गुणों की सृष्टि कर लेता है। और गुणों के द्वारा बनाये गए पञ्च भूतों में एक होने पर भी अनेक, स्वयं प्रकाश होने पर भी दृश्य, अपना स्वरूप होने पर भी अपने से भिन्न, नित्य होने पर भी अनित्य और निर्गुण होने पर भी सगुण के रूप में प्रतीत होता है। [श्रीमद्भागवत 10-85-24]
आत्मा परमात्मा का ही अंग है। आत्मा पूर्वजन्म की स्मृति और संस्कारों से संयुक्त रहती है जब तक कि पुण्य-पाप शेष हैं। मन आत्मा का अभिन्न अंग है। मन में जब तक इच्छाएँ शेष हैं आत्मा जीव रूप में जन्म लेती रहेगी। माता के गर्भ में आते ही उसे पूर्वजन्मों की स्मृति हो जाती है और प्राणी अत्यन्त कष्ट के साथ उनको स्मरण करता रहता है। जन्म के तुरन्त पश्चात् अधिकांश प्राणियों की स्मृति विलुप्त हो जाती है। नारद, जड़ भरत जैसे महापुरुष पूर्व जन्म की स्मृति से संयुक्त होकर प्रकट हुए। 
HUMAN मानव-मनुष्य योनि :- Humans are the best creations of the Almighty far-far better than the demigods-deities-demons-giants since its only when the soul gets the incarnation as a human being, it can perform-do some activity to get rid of the sins or perform virtuous jobs. One becomes a human being only after traversing through 84,00,000 species. Its the only species-race, which willingly perform Tapsya-asceticism-welfare of others-chastity. However some exceptions are always there. Purity-piousness leads to higher abodes and vices-wretchedness-evils throw the sinner in hells. On completion of the reward of virtuous activities one will return back to earth to take birth in some good -respectable family. On release from the hell the sinner will acquire the lower species of insects, gradually moving from one to another higher forms of living beings like fish-reptiles-birds-animals etc. Thereafter, he goes to the families of the Mallechh-Muslims, Yawan-Christians, Shudr, Vaishy, Kshatriy and the Brahmn, ultimately. However he may keep wriggling from one race to another, one species to another, depending upon the outcome of deeds. One is elevated from a lower caste-Varn to higher directly without going to the middle ranks depending upon his meritorious virtuous activities. He slides to lower forms as and when he perform evils. Its like the game of snake and ladder. The last abodes from where the soul is not expected to return is Gau Lok-the abode of Bhagwan Shri Krashn-the Almighty Par Brahm Parmeshwar. It happens only after Salvation.
At least 26 subatomic particles are known to us, there may be even more, to be identified sooner or later. We may soon, come across such elements which have never been heard of, on our earth. The periodic table which is based on physical and; chemical properties, might soon be switched over-drafted on the basis of nuclear properties. Electron and Positron are two such sub-atomic particles, which combine to produce Gamma-rays pure energy form. Neutrons break down to produce one proton and one electron. Photons, the light particles and electrons, identified as fastest moving particles, have dual nature: particle and wave. It has been reported that particles-rays have been found which have speeds much higher than photons-light.
कपिल मुनि  ने सांख्य शास्त्र में कहा है : न वस्तुनो वस्तुसिद्धिः ॥ 1-43॥ 
Nothing can be created from space-zero state, unless until the basic components are already present-available. Law of conservation of matter states that “matter can neither be created nor be destroyed, as a result of any physical or chemical change, but it can be transformed from one state to another”. The law is incomplete without considering nuclear reactions, which change the basic configuration of atom or the molecule. Einstein Principle states that “Energy can be converted to mass and mass can be converted to energy."
Energy leads to the formation of protons-Hydrogen, particles. Hydrogen fuses to produce Helium isotopes. The chain once began leads to the formation of oxygen, Carbon, Nitrogen, Sulfur, Uranium of course intermediaries like Lead. In nascent state (newly born), both hydrogen and oxygen are extremely reactive. They produce water most essential for living organisms. The process of formation of new atoms and molecules does not stop here. More and more complex molecules are formed, the process is never ending. Meteors, Asteroids, Planets, Sun, Solar-System, Galaxies, Super Galaxies, Constellations, tail star were all formed in this manner.The make and break process is still on and is likely to continue infinitely. Gau Lok and Vaikunth Lok are the only exceptions, since they will last longer than the others.
Vast oceans are reservoirs of water, on earth, moon, Venus, mars or the Saturn. Mountain cliffs-caps, laden with ice, rivers, lakes, ponds, streams, wells, underground currents of water, tap water: are all different sources of water.
Each and every molecule of water irrespective of its source has absolutely same properties. Solid-ice, Liquid-water, Gaseous: steam or vapors, Ionic or Plasmic do represent one and the same thing i.e. water. It’s capable of taking the shape and size of the container. The soul present in different creatures is absolutely the same as the God himself.
Water keeps evaporating from reservoirs, gets mixed with air in the form of moisture and takes the shape of clouds, forms monsoon, which moves over to the land and converts into rain. At places, it takes the shape of hails-hail storms or start falling as snow. On the top of the mountain, the snow hardens and it takes the shape of mountain cliff. During summers, the ice melts and takes the shape of streams-rivers-lakes etc. Monsoon showers, on the land-houses-water bodies, produce different channels or pools of water. Water from these sources is either evaporated or consumed in different manners. This water is contaminated in various ways. Water is recycled and put to use again and again. Often the treated water is used for agriculture purposes, and harvesting. Water is distilled to 100% purity, for chemical-nuclear purposes. It exhibits various physical states in addition to Heavy water which is used in nuclear reactors, for nuclear research and energy purposes. 
Similarly, The soul keep revolving from one species to another, one abode to another, from one universe to another, from one deity to another, unless until it becomes free from all sins or virtues, to merge into the Almighty for ever.
In its purest form-molecular state, water constitutes of two atoms of Hydrogen and one atom of Oxygen. Hydrogen has three isotopes i.e., Hydrogen, Deuterium, Tritium. Similarly, Oxygen does exhibit isotopes. In molecular state, Hydrogen has two atoms and Oxygen too has two in normal state and three as Ozone. In addition to this, both Hydrogen and Oxygen have nascent states in which, they are very reactive and can’t exist freely in nature. Plasma states of Hydrogen and Oxygen are one of the biggest reservoirs of energy. Release of tremendous amount of energy by Hydrogen, through nuclear fusion is well known. Source of energy on the Sun is also a case of nuclear fusion. Two atoms of hydrogen combine to form Hydrogen molecule and two atoms of oxygen combine to form, Oxygen molecule. Two molecules of hydrogen and one molecule of oxygen combine to form a water molecule.
Each and every molecule has the properties of its parent substance-the molecule. An atom has all the properties of the parent element. We are the molecules, God is the parent substance-compound, if we are atoms, and God is the parent element.
Hydrogen is the basic element, which through various permutations and combinations, produces larger-heavier elements. Larger molecules of the same element, having four or more atoms, are found in nature, like Tetra-Nano Carbon. The process of hydrogen formation and release of energy are cyclic and reversible in nature.
Photon, a component of light from the Sun, which breaks water into hydrogen, which further breaks down into plasmic state. The energy released, travels back to the Sun, with the help of some particle, providing a never ending source of power. Piousity, virtues, welfare of living beings,charity, donations, high moral character, good deeds offered to the God, strengthen the Demigods to take care of the humans.
A soul is the single-smallest unit of life form, which can exist in either material-divine bodies or even freely without a body. Two or more souls having same orientation can fuse together into one. The living being may be both: Material as well as Divine. 
It may constitute of a soul or a quantum of souls. Soul is like the driver of the body of the creature-the organism. Body is dead without it-a lump of clay-mound-dust particle. All souls have their origin in Brahma and they merge into him at the time of destruction.
The way a molecule of water moves from the oceans to air and reaches back, after passing through various cycles of nature. The soul having born out of the God meets him again and again, after attaining Salvation ultimately, to depart again since nothing is permanent-constant-stationary. Still, there are the souls, which never depart after assimilation in The Almighty.
No one is Ajar or Amar (-Indestructibility-permanent-for ever), how so ever, high or mighty he be, he has to go, one day or the other. A dust particle becomes earth after falling over it. A drop of water, becomes ocean after falling in it. The soul becomes Permatma-the Almighty, after assimilation in it.
भगवान विष्णु ने भगवती माँ लक्ष्मी से कहा: मैं योगनिद्रा में तत्व का अनुसरण करने वाली अंतर्दृष्टि से अपने ही माहेश्वर तेज का साक्षात्कार करता हूँ। यह वही तेज है जिसका योगी पुरुष कुशाग्र बुद्धि द्वारा अपने अन्तःकरण में दर्शन करते हैं। जिससे मीमांसक विद्वान वेदों का सार तत्व निश्चित करते हैं। वह माहेश्वर तेज एक अजर, प्रकाश स्वरूप, आत्मरूप, रोग-शोक रहित, अखण्ड, आनन्द का पुंज, निष्पन्द (-निरीह) तथा द्वैत रहित है। इस जगत का जीवन उसी के अधीन है। मैं उसी का अनुभव करता हूँ और तुम्हें नींद लेता हुआ प्रतीत हो रहा हूँ। 
आत्मा का स्वरूप द्वैत औए अद्वैत से पृथक, भाव और  मुक्त तथा आदि और अन्त से रहित है।  शुद्ध ज्ञान के प्रकाश से उपलब्ध होने वाला तथा परमानन्द स्वरुप होने के कारण एक मात्र सुन्दर है। यही मेरा ईश्वरीय  रूप है। गीता उसका बोध-उनके स्वरूप, जो स्वयं परमानन्दमय और मन और वाणी से बाहर है, कराती है।  [पद्म पुराण]

ALMIGHTY-THE DIVINE WISDOM OF THE UPANISHADS :: The Almighty is one. All life forms are his incarnations-manifestations-fragments. He is swifter than thoughts and the senses. Though motionless, yet he outruns all pursuit. Without him nothing can exist or happen.

The Supreme Soul constituting of the Creator, Nurturer and the Destroyer seems to move, but is he ever still. He seems far away, but is ever near. He is within all and he transcends all.

One who identifies him selves with all creatures-living beings in him self and him self in all creatures, does not encounter fear, faces no grief.  Multiplicity of life forms can not delude one, who has attained equanimity.

He is everywhere. He is indivisible, untouched by sin, wise, immanent and transcendent. He is the one, who created the cosmos and keeps-hold it together. 

Senses are separate-detached from Him-the un simmered-un tainted. The sense experience are fleeting and the wise never grieve-repent for them.

Above the senses is the mind, above the mind is the intellect and the prudence, above that is the ego and above the ego is the un manifested cause. And beyond this is Brahmn, omnipresent, attribute less. Realizing Him, one is released from the cycle of birth and death.

He is formless and can never be seen with these two eyes. But, He reveals Himself in the heart made pure through meditation and sense-restraint. Realizing Him, one is released from the cycle of birth and death.

When the five senses are stilled, when the mind is stilled, when the intellect is stilled, that is called the highest state by the wise. They say Yog is this complete stillness in which one unitize-immerse him self with the Supreme, never to separate again. One who does not establish him self in this state, the sense of unity will come and go.

As long as there is separateness-differentiation-distinction, one sees another entity as separate from oneself, hears another as separate from oneself, smells another as separate from oneself, speaks to another as separate from oneself, thinks of another as separate from oneself, knows another as separate from oneself. But when the Self-Almighty is realized as the indivisible unity of life, who can be seen by whom, who can be heard by whom, who can be smelled by whom, who can be spoken to by whom, who can be thought of by whom, who can be known by whom? 

He is fire and the sun and the moon and the stars. He is the air and the sea and the Creator-the Prajapati.

He is this boy, he is that girl, he is this man, he is that woman and he is this old man, too, tottering on his staff. His face is everywhere. He is present in each and every one and looks in each and direction simultaneously.

He is the blue bird; he is the green bird with red eyes; he is the thundercloud and he is the seasons and the seas. He has no beginning; he has no end. He is the source from whom, the worlds evolve.

His divine power casts a spell-illusion-mirage on each and every one, which appears in the form of pain and pleasure. Only when, one pierce through this magic veil, do he see the Ultimate, who appears in multiple forms. 

One becomes so as he acts-performs-functions. He who do good become good; one who do harm others, become bad. Good deeds make one pure; bad deeds make him impure-tainted-slurred-devil-sinner-wicked. One will become, what he desires-thinks. The will, deeds, desires shape the destiny.

One live in accordance with his deep, driving desires-ambitions. It is this desire at the time of death that determines what one's next life will be (-next birth-incarnation or the abode-hell or heaven or the abode of the Almighty). One will return to earth, to satisfy his unfulfilled desires-targets-goals.

One, who has attained emancipation-liberation-assimilation in the eternal, will never return. Detachment-relinquishment, shelter-asylum-refuse under the Almighty, devotion-Bhakti, equanimity, will keep him in association with the Ultimate-Supreme-The Almighty. One who breaks-severs all bonds-ties-connections, will never return. One who has offered all his deeds-virtues-goodness to the Ultimate will never come down.

Ceasing-fulfilment-renouncing make a mortal, immortal. The Self (-a unit of the Almighty-soul), freed from the body, merges with the Brahmn-the infinite-eternal.

The Ultimate Bliss, Love, Who projects himself into this universe of myriad forms, from Whom all beings come and in Whom all return; may He grant the grace of wisdom to the devotee.

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥
अनादि सत्य सिद्ध ग्रंथों-वेद, उपनिषद, पुराण अादि में जहाँ कहीं भी आत्मा के स्वरूप या फिर परमतत्व परमब्रह्म परमेश्वर परमात्मा का निरूपण किया गया है, उसके स्वरूप की तुलना अँगूठे से की गई है। 
The eternal scriptures Veds, Upnishads and the Purans have configured the Almighty like the Thumb.
The soul present in the body of an organism acquires the shape and size of the human thumb once its released from the body.
वराहतोको निरगादंगुष्ठ परिमाणक:। दृष्टोSंगुष्ठ शिरोमात्र: क्षणाद्गण्डशिलासम: 
[श्रीमद्भागवत महापुराण 3.13.18]
ब्रह्मा जी के नासिका छिद्र से अकस्मात अँगूठे के बराबर आकार का वराह शिशु निकला और अँगूठे के पेरूए के बराबर दिखने वाला वह प्राणी-वराह, क्षण भर में पर्वत के समान विस्तृत हो गया। 
A small boar-hog equal to the size of the thumb came out of the nasal cavity of Brahma Ji -the creator, spontaneously and took the shape of a mountain at once.
अंगुष्ठमात्रो रवितुल्यरूप, संकल्पाहंकार समन्वितो यः। 
बुद्धेर्गुणेनात्मगुणेन  चैव,आराग्रमात्रो ह्यपरोSपि दृष्टः॥[श्वेताश्वतरोपनिषद् 5.8]   
जो अँगुष्ठ मात्र परिमाण वाला, रवितुल्य-सूर्य के समान प्रकाश वाला तथा संकल्प और अहंकार से युक्त है, बुद्धि के गुण के कारण और अपने गुण के कारण ही सूजे की नोक के जैसे सूक्ष्म आकार वाला है; ऐसा अपर-अर्थात परमात्मा से भिन्न जीवात्मा भी निःसन्देह ज्ञानियों के द्वारा देखा गया है। 
The Almighty-God similar in shape & size to the thumb, brilliant like the Sun, associated with firmness-determination & possessiveness, due to his own characterises and the intelligence, small & sharp just like the tip of a needle was in deed seen-visualised-observed-conceived by the learned-enlightened-scholars.
अंगुष्ठमात्र: पुरुषो, मध्ये आत्मनि तिष्ठति। ईशानो भूतभव्यस्य न तेता विजुगुप्सते॥ 
[कठोपनिषद् 2.1.13] 
अंगुष्ठमात्र परिमाण वाला, परम पुरुष-परमात्मा, शरीर के मध्य भाग अर्थात हृदयाकाश में स्थित है, जो कि भूत, भविष्य और वर्तमान का शासन करने वाला है। उसे जान लेने के बाद वह जिज्ञासु-मनुष्य किसी की निन्दा नहीं करता। यही वह परमतत्व है।  
The Almighty comparable to thumb in shape and size is present in the middle segment of the body and visualises the past, present and the future. Once a man knows Him, never censure others.
निन्दा :: तिरस्कार, आक्षेप, प्रत्याख्यान, भंडाफोड़, पर्दाफ़ाश, मलामत, झिड़की, गुण-दोष की व्याख्या, प्रतिवाद, विरोध, नापसंदगी, बदनामी, कलंक, अपवाद, ग्लानि की भावना, अपमान, दोष, भंडाफोड़, धमकी, परछाई, परावर्तन, भावना, प्रतिबिंब, सोच, फटकार, मुंहतोड़ जवाब, सामना, फटकार, परावर्तन, विचार, ध्यान, फटकार, डांट-डपट, शाप, आलोचना, टीका-टिप्पणी, दोष-विवेचन, चुगली, अनुचितता, घृणोत्पादकता, वीभत्सता, रोमांचकारिता, कठोर समालोचना, विवाद, अप्रतिष्ठा, बुराई, निर्घोष, विस्फोट, दोषारोपण, अभियोग में फॉंसना या लपेटना, बदनामी, आक्रोश, अभिशाप, अपयश, अपकीर्ति; opprobrium, condemnation, censure, denunciation, twit, stricture, deprecation, scandal, blame, denouncement, re-flexion, reproof, letdown, objurgation, talking to, decrial, tarnation, reflection, dispraise, dressing down, telling-off, animadversion, backbiting, shocking, diatribe, disparagement, fulmination, malediction. 
ईशानो भूत भव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः। 
भूत, भविष्य तथा वर्तमान पर शासन करने वाला वह परमात्म परमतत्त्व जैसा आज है, वैसा ही कल भी रहेगा। The Almighty who rules the present, past and the future will remain as such always & for ever.
BHAGWAT EXTRACT चतुः श्लोकी भागवत
श्रीभगवानुवाच :- 
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्य त् सदसत् परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥1॥
श्री भगवान कहते हैं :- सृष्टि से पूर्व केवल मैं ही था। सत्, असत् या उससे परे, मुझ से भिन्न कुछ भी नहीं था। सृष्टि न रहने पर (प्रलय काल में) भी मैं ही रहता हूँ। यह सब सृष्टि रूप भी मैं ही हूँ और जो कुछ इस सृष्टि, स्थिति तथा प्रलय से बचा रहता है, वह भी मै ही हूँ।
The Almighty said that he existed prior to the creation of life. There was nothing existent-manifest or non existent-unmanifest or any thing else other than-except me. After dissolution-destruction-annihilation of life, I remain. I am embodiment of life. I am all that is visible. Whatever remains after annihilation is also me.
MANIFEST :: clear or obvious to the eye or mind, obvious, clear, plain, apparent, evident, patent, palpable, distinct, definite, blatant, overt, glaring, barefaced, explicit, transparent, conspicuous, undisguised, unmistakable, unquestionable, undeniable, noticeable, perceptible, visible, recognisable, observable.
UN-MANIFEST :: असत्; non existent, unfounded, illusory, falsehood, contamination-impurity, adulterated, unreal, untrue.
ऋतेऽर्थं यत् प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः॥2॥
जो मुझ मूल तत्त्व के अतिरिक्त (सत्य सा) प्रतीत होता (दिखाई देता) है; परन्तु आत्मा में प्रतीत नहीं होता (दिखाई नहीं देता), उस अज्ञान को आत्मा की माया समझो जो प्रतिबिम्ब या अंधकार की भांति मिथ्या है। 
Whatever is visible-appears to be truth, but does not appear to exist in the soul, is illusion-ignorance-mirage. Consider it to be unreal-darkness.
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु। प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम्॥3॥
जैसे पंच महाभूत :- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश, संसार के छोटे-बड़े सभी पदार्थों में प्रविष्ट होते हुए भी उनमें प्रविष्ट नहीं हैं, वैसे ही मैं भी सबमें व्याप्त होने पर भी सबसे पृथक् हूँ।
The manner in which the basic ingredients of life-the five elements viz. earth, water, fire, air and space pervade everything in the universe; but in reality do not exist in them i.e., maintain their identity, I am also present in each and every organism but does not appear separate-different from them.
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः। अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत् स्यात् सर्वत्र सर्वदा॥4॥

आत्म-तत्त्व को जानने की इच्छा रखने वाले के लिए इतना ही जानने योग्य है कि अन्वय-सृष्टि अथवा व्यतिरेक-प्रलय क्रम में जो तत्त्व सर्वत्र एवं सर्वदा-स्थान और समय से परे, रहता है, वही आत्म तत्त्व है।
Its sufficient for the desirous to know that He-The Ultimate, i.e., whatever existed eternally, who remains distinguished from creation or annihilation is the Ultimate Truth, beyond the limits of time and space.

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