Friday, June 7, 2013

DREAM ANALYSIS -FUTURE FORECASTS शुभाशुभ स्वप्न विचार

DREAM ANALYSIS -FUTURE FORECASTS शुभाशुभ स्वप्न विचार
  CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM By:: Pt. Santosh Bhardwaj  
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CHAPTER (I) AGNI PURAN
PhotoInauspicious-Bad Dreams: Growth of straw and trees all over the body, except the naval, breaking of  utensils made up of bronze (-bell metal, brass) over the head, shaving of head, being naked, wearing of dirty-unclean cloths, drinking-massage-bathing in/with oil, rubbing-rapping of mud, falling from a height, marriage, enjoyment through music-films or other means, swinging, earning of lotus or iron, killing of snakes, wearing garlands made up of red flowers-application of sandal wood paste over the fore head, observation-seeing-spotting of trees laden with red flowers or Chandal (-low caste Shudr earning through the last rites in cremation ground), riding pig-dog-ass-camel, eating the flash/meat of birds-Khichdi (-boiled mixture of rice and pulses), entering mother's womb, riding-entering funeral pyre, breaking of flag, falling of Sun and Moon, visualization of disturbances in heavens-sky-space-earth, curse of Deities/Brahmn/Priests/King/Rulers/Guru, dancing-singing-songs-instrumental music except Veena, drowning in river after a fall, bathing is water mixed with dung/mud/ink, embarrassing the unmarried/virgin girls, gay sex-intercourse, loss of own organs, vomiting-purging-laxative, moving towards south, suffering from some disease, loss of fruits, hole formation/piercing of metals, falling of house-building, sweeping of home, playing with demons-Dracula-Vaner (-monkey)-Chandal, defeat/insult/trouble from the enemy, wearing of saffron coloured cloths or playing with saffron coloured cloths.
The impact of the events fore cast by the dream can be contained-controlled-restricted through bathing, honouring the Brahmns/Philosopher/Priests, carrying out Hawan-Agnihotr with Til, prayers pertaining-devoted to the Almighty-Brahma, Vishnu & Mahesh, Sun & Moon, recitation of Shanti Mantr-Holi-sacred verses.

Dreams seen during 6-9 PM shows their impact with in one year, between 9-12 PM in 6 months , between 12-3 AM in 3 months and there after with in 15 days.
बुरे स्वप्न: नाभि के सिवाय शरीर के अन्य अंगों पर  और तृण  वृक्षों का  उगना, कांसे के बर्तनों का सिर के ऊपर रख कर फोड़ा जाना, माथा-सिर मुंडाना, नग्न होना, मैले वस्त्र पहनना, तेल पीना-लगाना-नहाना, कीचड़ लपेटना, ऊँचे से गिरना, विवाह होना, संगीत-वाद्य-बाजे सुन कर दिल बहलाना, झूला-हिंडोले पर झूलना,  पद्म और लोहे का उपार्जन, सर्पों को मारना,  लाल फूलों की माला पहनना-लाल चन्दन का टीका लगाना, लाल फूल से लदे वृक्ष तथा चांडाल को देखना, सूअर-कुत्ता-गदहा-ऊँट पर चढ़ना, चिड़ियों का मांस भक्षण, खिचड़ी खाना, माता के गर्भ में प्रवेश, चिता  पर चढ़ना, धवजा का टूटना, सूर्य व चंद्र का गिरना, दिव्य-अंतरिक्ष-भूलोक में उत्पात दिखाई देना, देवता-ब्राह्मण-राजा-गुरु-का कोप, नाचना-गाना-गीत-वीणा के सिवाय अन्य बाजों का स्वयं बजना, नदी में गिरकर नीचे जाना, गोबर-कीचड़-स्याही-मिले जल से स्नान करना, कुमारी कन्याओं का आलिंगन, पुरुषों का परस्पर मैथुन, अपने अंगों की हानि, वमन और विरेचन करना, दक्षिण दिशा की ओर जाना, रोग से पीड़ित होना, फलों की हानि, धातुओं का भेदन, घरों का गिरना, घरों में झाड़ू  देना, पिशाच-राक्षस-वानर-चांडाल आदि के साथ खेलना, शत्रु से अपमानित-संकट ग्रस्त होना, गेरुए वस्त्र  पहनना-गेरुए वस्त्र से खेलना। 
स्वप्न दोष की शांति के लिये स्नान, ब्राह्मणों का पूजन, तिलों का हवन, ब्रह्मा-विष्णु-महेश-सूर्य गण की पूजा, स्तुति पाठ तथा पुरुष सूक्त आदि का पाठ करना चाहिये। 
रात के पहले प्रहर में देखे गए स्वप्न एक वर्ष, दूसरे प्रहर के छः महीने में, तीसरे प्रहर  के तीन माह में तथा चौथे प्रहर के स्वप्न पद्रह दिनों में ही फल दायक होते हैं।
Receipt of gold, cash, jewellery, currency, coins generally fore caste illness. Visualising/eating/spread over of excreta-dung brings money-wealth-possessions-promotion-financial gains, burning pyre brings money, wedding shows trouble, and eating-feast illustrates bad days ahead. Serpents warn to be careful from opponents.

A general rule is that if one feels happy-energetic-calm and cosy in the morning  after a sound sleep and a dream, it's is good omen. It's auspicious. If one feels-witness restlessness, uneasiness  if may yield otherwise. One should never be unnerved after witnessing a horrible terrifying dream. Remember the Almighty and go ahead with your daily routine. Dreams are warnings to guide the viewer.
In case one sees both auspicious and in auspicious dreams, he should consider the impact of the later dream. Having witnessed an auspicious dream, one should not sleep after that.
Riding an elephant, horse, bull is auspicious. Climbing over hill-mountain-hillock or a palace is auspicious.Watching trees laden with white flowers on earth or the sky is auspicious. Growth of straw or trees through the navel is auspicious. Graying of own hair in dream, growth of additional arms, heads is to yields excellent results.
Wearing of white coloured cloths-garlands is good. Holding of Sun/Moon/The flag of Indr-The King of Deities/angles is quite good, raising of flag, holding of water stream over head is good, witnessing bad condition of enemies is good, debate victory in war, eating kheer-pudding (-sweetened rice cooked in milk) is good, spreading-seeing of blood-bathing with blood, drinking of wine-alcohol-milk is good, uneasiness caused by striking with weapons, clean sky, milking of cow-buffalo-lioness-she elephant/horse through mouth are excellent dreams.
One who witness own crowing, happiness of Deities/ God/ Brahmns/ Philosophers/pouring of pious water by cows horns or from the moon, results in promotion to high positions. Own crowning, cutting of head, burning in the fire in the house, obtaining of the marks of  kingdom, playing of Veena by self, too results in elevation to high positions-dignity-power.
One who witness king, elephant, horse, gold, oxen-bull, cows, in the last leg of the dream will find growth of his family. Riding ox, elephant, roof of palace, hill top or the tree will find favours. Weeping, pasting of ghee/excreta  on body or intercourse with a discarded woman too, will experience favours through fortune.
एक ही रात में अशुभ व शुभ दोनों किस्म के स्वप्न देखने पर, बाद वाले स्वप्न का फल ही जानना चाहिये।
शुभ स्वप्न के बाद सोना उचित नहीं है।
स्वप्न में पर्वत, महल, हाथी, घोड़े और बैल पर चढना शुभ है। पृथ्वी या आकाश में सफ़ेद फूलों से भरे वृक्ष, नाभि से वृक्षों या तिनकों का  उत्पन्न होना, अपनी भुजाएँ और मस्तक अधिक दिखाई देना, सर के बल पक जाना, उत्तम फल दायक है।
सफेद फूलों की माला और श्वेत वस्त्र धारण करना, सूर्य, चन्द्र व तारों को पकड़ना-परिमार्जन करना, इंद्र की ध्वजा का आलिंगन करना, ध्वजा को ऊँचा उठाना, पृथ्वी  पर पड़ती जलधारा को अपने ऊपर रोकना, शत्रुओं की बुरी दशा देखना, वाद-विवाद, जुआ, संग्राम में विजय, खीर खाना, रक्त देखना, खून से नहाना, सुरा-शराब-दूध पीना, अस्त्रों से घायल होकर धरती पर छटपटाना, आकाश का स्वच्छ होना, गाय-भैंस-सिंहनी-हथिनी-घोड़ी  को मुंह से दुहना आदि उत्तम स्वप्न हैं। 
देवता, ब्राह्मण और गुरुओं की प्रसन्नता, गौओं की सींग अथवा चंद्रमा से गिरे हुए जल के द्वारा अपना अभिषेक होना राज्य प्रदान  करता है। अपना राज्याभिषेक होना, अपने मस्तक को कटा हुआ देखना, मरना, आग में पड़ना, गृह आदि में लगी आग के भीतर जलना, राज्य चिन्हों का प्राप्त होना, अपने हाथ से वीणा बजाना-भी राज्य दायक  हैं। 
जो स्वप्न के अंतिम भाग में राजा, हाथी, घोडा, सुवर्ण, बैल तथा गाय को देखता है उसका परिवार-कुटुंब बढ़ता है । बैल, हाथी, महल की छत, पर्वत-शिखर तथा वृक्ष पर चढ़ना, रोना, शरीर में घी और विष्ठा, लग जाना, तथा अगम्या स्त्री के साथ समागम-शुभ स्वप्न हैं।  
CHAPTER  (II) BHAVISHY PURAN 
One who observe a fast on the seventh of the month (Vikrmi-Shak Samwat) after performing Yagy-Hawan, and goes to bed meditating of the Bhagwan Surya, witness a dream, the out come-result of it follows:
स्वप्न में सूर्योदय, चन्द्र, इंद्र ध्वज दिखाई दें, तो सभी उपलब्धियां-समृधियाँ प्राप्त होती हैं। माला पहने व्यक्ति, गाय या वंशी की आवाज, श्वेत कमल, चामर, दर्पण, सोना, तलवार, पुत्रप्राप्ति, रुधिर थोड़ा या अधिक निकलना या पान  करना-ये स्वप्न ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। घ्रताक्त प्रजापति के दर्शन से पुत्र प्राप्त होता है। 
स्वप्न में प्रशस्त वृक्ष पर चढ़े अथवा अपने मुँख में महिषी, गौ या सिंघनी का दोहन करे तो, शीघ्र ही ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सोने या चांदी के पात्र में अथवा कमल पत्र में जो खीर खाता हो, उसे बल की प्राप्ति होती है।जुआ, वाद या युद्ध में विजय का जा स्वप्न देखता हो, वह सुख प्राप्त करता है। स्वप्न में जो अग्नि पान  करता है, उसकी जठराग्नि की वृद्धि होती है। अपने अंग प्रज्वलित होते दिखाई देते हों और सिर में पीड़ा हो तो संपत्ति मिलती है। श्वेत वर्ण के वस्त्र, माला और प्रशस्त पक्षी के दर्शन शुभ होते हैं। देवता-आचार्य, गुरू, वृद्ध तथा तपस्वी स्वप्न में जो कहते हैं, वह सत्य होता है। स्वप्न में सिर का कटना अथवा फटना, पैरों में बेड़ी पहनना-राज्य प्राप्ति का संकेत है। स्वप्न में रोने से हर्ष की प्राप्ति होती है। घोड़ा, बैल, श्वेत कमल तथा श्रेष्ठ हाथी पर निडर चढ़ने से महान् ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। ग्रह, ताराओं का ह्रास देखे, पृथ्वी को उलट दे और पर्वतों को फेंके तो राज्य का लाभ होता है।  पेट से आंत निकाले और उससे पेड़ को लपेटे, पर्वत, समुद्र तथा नदी को पार करे, तो अत्यधिक ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। सुन्दर स्त्री की गोद में बैठे और बहुत सी स्त्रियाँ आशीर्वाद दें, स्वप्न में शरीर को कीड़े-मकोड़े खायें, स्वप्न में स्वप्न का ज्ञान हो, अभीष्ट बात कहने और सुनने में आयें  तथा मंगल दायक पदार्थों का दर्शन एवं प्राप्ति  हो तो धन एवं आरोग्य का लाभ होता है। जिन स्वप्नों का फल राज्य व ऐश्वर्य की प्राप्ति है, यदि उन स्वप्नों को रोगी देखता है तो वह  रोग मुक्त हो जाता है। 
इस प्रकार रात्रि में स्वप्न देख कर प्रात: काल राजा-ब्राह्मण-अथवा भोजक को सुनाना चाहिये। 
INAUSPICIOUS DREAMS AND REMEDY:: भगवान्‌ रुद्र और ब्रह्मा जी ने गणेश जी को ‘गणपति’ पद पर बिठाया और कर्मों में विघ्न डालनेका कार्य उन्हें सौंप रखा है। वे विघ्नेश विनायक जिस पर सवार होते हैं, उस पुरुष के लक्षण सुनो। वह स्वप्नमें बहुत अगाध जल में प्रवेश कर जाता है, मूँड मुडाये मनुष्योंको तथा गेरुआ वस्त्र धारण करनेवाले पुरुषोंको देखता है। कच्चा मांस खाने वाले ग्रुध्र आदि पक्षियों तथा व्याघ्र आदि पशुओंपर चढता है। एक स्थानपर चाण्डालों, गदहों और ऊँटोंके साथ उनसे घिरा हुआ बैठता है। चलते समय भी अपने आपको शत्रुओं से अनुगत मानता है, उसे ऐसा भान होता है कि शत्रु मेरा पीछा कर रहे हैं। (जाग्रत्‌ अवस्था में भी) उसका चित्त विक्षिप्त रहता है। उसके द्वारा किये हुए प्रत्येक कार्य का आरम्भ निष्फल होता है। वह अकारण खिन्न रहता है। विघ्न राज का सताया हुआ मनुष्य राजा का पुत्र होकर भी राज्य नहीं पाता। कुमारी कन्या अनुकूल पति नहीं पाती, विवाहिता स्त्री को अभीष्ट पुत्र की प्राप्ति नहीं होती। श्रीत्रिय को आचार्य पद नहीं मिलता, शिष्य स्वाध्याय नहीं कर पाता, वैश्य को व्यापार में और किसान को खेती में लाभ नहीं हो पाता। 
ऐसे पुरुषको किसी पवित्र दिन एवं शुभ मुहूर्तमें विधि पूर्वक स्नान कराना चाहिये। पीली सरसों पीस कर उसे घी से ढीला करे और उस मनुष्य के शरीर में उसीका उबटन लगाये। प्रियङ्गु, नाग केसर आदि सब प्रकार की ओषधियों और चन्द, अगुरु, कस्तूरी आदि सब प्रकार की सुगन्धित वस्तुओं को उसके मस्तक में लगाये। फिर उसे भद्रासन पर बिठाकर उसके लिये ब्राह्मणों से शुभ स्वस्तिवाचन (पुण्याह वाचन) कराये। अश्वशाला, गजशाला, वल्मीक (बाँबी), नदी सङ्गम तथा जलाशय से लायी हुई पाँच प्रकार की मिट्ट , गोरोचन, गन्ध (चन्दन, कुंकुम, अगुरु आदि) और गुग्गुल; ये सब वस्तुएँ जल में छोडे और उसी जल में छोड़े जो गहरे और कभी न सूखनेवाले जलाशय से एक रंग के चार नये कलशों द्वारा लाया गया हो। तदनन्तर लाल रंग के वृष भचर्म पर भद्रासन स्थापित करे। (इसी भद्रासन पर यजमान को बैठाकर ब्राह्मणों से पूर्वोक्त स्वस्तिवाचन कराना चाहिये। इसके सिवा स्वस्ति वाचनके अनन्तर जिनके पति और पुत्र जीवित हों, ऐसी सुवेश धारिणी स्त्रियों द्वारा मह्हल गान कराते हुए पूर्व दिशावर्ती कलश को लेकर आचार्य निम्नङ्कित मन्त्रसे यजमानका अभिषेक करे- 
सहस्त्राक्षं शतधारमृषिभि : पावनं कृतम्‌। तेन त्वामभिषिञ्चामि पावमान्य : पुनन्तु ते॥ 
‘जो सहस्त्रों नेत्रों अनेक प्रकारकी शक्तियों-से युक्त हैं, जिसकी सैकडों धाराएँ (बहुत से प्रवाह) हैं और जिसे महर्षियों ने पावन बनाया है, उस पवित्र जल से मैं तुम्हारा अभिषेक करता हूँ। पावमानी ऋचाएँ तथा यह पवित्र जल तुम्हे पवित्र करें (और विनायक जनित विघ्नकी शान्ति हो) । ’ 
तदनन्तर दक्षिण दिशामें स्थित द्वितीय कलश लेकर नीचे लिखे मन्त्रको पढते हुए अभिषेक करे -
भगं ते वरुणो राजा भगं सुर्यो बृहस्पति:। भगमिन्द्रश्च वायुश्च भगं सप्तर्षयो ददु:॥ 
‘ राजा वरुण, सूर्य , बृहस्पति, इन्द्र, वायु तथा सप्तर्षिगण तुम्हें कल्याण प्रदान करें। ’ 
फिर तीसरा पश्चिम कलश लेकर निम्नाङ्कित मन्त्रसे अभिषेक करे - 
यत्ते केशेषु दौर्भाग्यं सीमन्ते यच्च मूर्धनि। ललाटे कर्णयोरक्ष्णोरापस्तद्‌ घ्नन्तु सर्वदा॥ 
‘तुम्हारे केशों में, सीमन्त में, मस्तक पर, ललाट में, कानों में और नेत्रों में भी जो दुर्भाग्य (या अकल्याण) है, वह सब सदा के लिये जल शान्त कर दे। ’
तत्पश्चात्‌ चौथा कलश लेकर पूर्वोक्त तीनों मन्त्र पढकर अभिषेक करे। इस प्रकार स्नान करनेवाले यजमान के मस्तक पर बायें हाथ में लिये हुए कुशों को रख कर उस पर गूलर की स्रुवा से सरसों का तेल उठाकर डाले, उस समय निम्नाकित मन्त्र पढे -  
‘ॐ मिताय स्वाहा। ॐ संमिताय स्वाहा। ॐ शालाय स्वाहा। ॐ कटंकटाय स्वाहा। ॐ कूष्णाण्डाय स्वाहा। ॐ राजपुत्राय स्वाहा। ’ 
मस्तकपर होमके पश्चात्‌ लौकिक अग्निमें भी स्थाली पाक की विधि से चरु तैयार करके उक्त छ : मन्त्रों से ही उसी अग्निमें हवन करे। फिर होम शेष चरु द्वारा बलि मन्त्रोंको पढकर इन्द्रादि दिक्‌पालोंको बलि भी अर्पित करे। तत्पश्चात्‌ कृताकृत आदि उपहार-द्रव्य भगवान्‌ विनायक को अर्पित करके उनके समीप रहनेवाली माता पार्वतीको भी उपहार भेंट करे। फिर पृथ्वी पर मस्तक रखकर-
 ‘तत्पुरुषाय विद्महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात्‌।’ 
इस मन्त्र से गणेश जी को और 
‘सुभगायै विद्महे। काममालिन्यै धीमहि। तन्नो गौरी प्रचोदयात।’ 
इस मन्त्र से अम्बिकादेवीको नमस्कार करे। फिर गणेश जननी अम्बिका का उपस्थान करे। उपस्थान से पूर्व फूल और जल से अर्घ्य देकर दूर्वा, सरसों और पुष्प से पूर्व अञ्जलि अर्पण करे। उपस्थान का मन्त्र इस प्रकार है- 
रूपं देहि यशो देहि भगं भगवति देहि में। पुत्रान्‌ देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि में॥ 
‘ भगवति ! मुझे रूप दो, यश दो , कल्याण प्रदान करो, पुत्र दो, धन दो और सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करो। ’ 
पार्वती जी का उपस्थान करके धूप, दीप, गन्ध, माल्य, अनुलेप और नैवेद्य आदिके द्वारा उमापति श्री भगवान्‌ शङ्कर की पूजा करे। तदनन्तर श्वेत वस्त्र धारण करके श्वेत चन्दन और मालासे अलंकृत हो ब्राह्मणों को भोजन कराये और गुरु को भी दक्षिणा सहित दो वस्त्र अर्पित करे। 
इस प्रकार विनायक की पूजा करके लक्ष्मी, शान्ति, पुष्टि, वृद्धि तथा आयु की इच्छा रखने वाले वीर्यवान्‌ पुरुष को ग्रहों की भी पूजा करनी चाहिये। सूर्य, सोम, मङ्गल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु तथा केतु- इन नवों ग्रहोंकी क्रमश : स्थापना करनी चाहिये। सूर्य की प्रतिमा ताँबे से, चन्द्रमा की रजत (या स्फटिक से), मङ्गल की लाल चन्दन से, बुध की सुवर्ण से, गुरु की सुवर्ण से, शुक्र की रजत से, शनि की लोहे से तथा राहु-केतु की सीसे से बनाये, इससे शुभ की प्राप्ति होती है। अथवा वस्त्र पर उनके-उनके रंग के अनुसार वर्णक से उनका चित्र अङ्कित कर लेना चाहिये। अथवा मण्डल बनाकर उनमें गन्ध (चन्दन , कुंकुम आदि) से ग्रहोंकी आकृति बना ले। ग्रहों के रंगके अनुसार ही उन्हें फूल और वस्त्र भी देने चाहिये। सब के लिये गन्ध, बलि, धूप और गुग्गुल देना चाहिये। प्रत्येक ग्रहके लिये ( अग्नि स्थापन पूर्वक) समन्त्रक चरु का होम करना चाहिये। 
‘आ कृष्णेन रजसा०’ इत्यादि सूर्य देवता के, ‘इमं देवा:०’ इत्यादि चन्द्रमा के, ‘अग्निर्मूर्धा दिव: ककुत्‌०’ इत्यादि मङ्गल के, ‘उदबुध्यस्व०’ इत्यादि मन्त्र बुध के, ‘बृहस्पते अति यदर्य:०’ इत्यादि मन्त्र बृहस्पति के, ‘अन्नात्‌ परिस्नुतो०, इत्यादि मन्त्र शुक्र के ‘ शन्नो देवी०’ इत्यादि मन्त्र शनैश्चर के, ‘काण्डात्‌ काण्डात’ इत्यादि मन्त्र राहु के और ‘केतुं कृण्वन्नकेतवे०’ इत्यादि मन्त्र केतु के हैं। आक, पलाश, खैर, अपामार्ग, पीपल, गूलर, शमी, दूर्वा और कुशा- ये क्रमश: सूर्य आदि ग्रहों की समिधा हैं। सूर्यादि ग्रहों में से प्रत्येक के लिये एक सौ आठ या अट्ठाईस बार मधु, घी, दही अथवा खीर की आहुति देनी चाहिये। गुड़ मिलाया हुआ भात, खीर, हविष्य (मुनि-अन्न), दूध मिलाया हुआ साठी के चावल का भात, दही-भात, घी-भात, तिल चूर्ण मिश्रित भात, माष (उडद) मिलाया हुआ भात और खिचडी, इनको ग्रह के क्रमानुसार विद्वान्‌ पुरुष ब्राह्मण के लिये भोजन दे। अपनी शक्ति के अनुसार यथा प्राप्त वस्तुओं से ब्राह्मणों का विधि पूर्वक सत्कार करके उनके लिये क्रमश: धेनु, शंख, बैल, सुवर्ण, वस्त्र, अश्व, काली गौ, लोहा और बकरा- ये वस्तुएँ दक्षिणा में दे। ये ग्रहों की दक्षिणाएँ बतायी गयी हैं। जिस-जिस पुरुषके लिये जो ग्रह जब अष्टम आदि दुष्ट स्थानों में स्थित हो, वह पुरुष उस ग्रह की  उस समय विशेष यत्नपूर्वक पूजा करे। ब्रह्माजी ने इन ग्रहों को वर दिया है कि ‘जो तुम्हारी पूजा करें, उनकी तुम भी पूजा (मनोरथ पूर्ति पूर्वक सम्मान) करना। राजाओं के धन और जाति का उत्कर्ष तथा जगत्‌की जन्म-मृत्यु भी ग्रहोंके ही अधीन है। अत: ग्रह सभी के लिये पूजनीय हैं। जो सदा सूर्य देवकी पूजा एवं स्कन्द स्वामी को तथा महा गणपति को तिलक करता है, वह सिद्धि को प्राप्त होता है। इतना ही नहीं, उसे प्रत्येक कर्म में सफलता एवं उत्तम लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। जो मातृ याग किये बिना ग्रह पूजन करता है, उस पर मातृकाएँ कुपित होती हैं और उसके प्रत्येक कार्य में विघ्न डालती हैं। शुभ की इच्छा रखने वाले मनुष्यों को ‘वसो : पवित्रम्‌०’ इस मन्त्रसे वसुधारा समर्पित करके प्रत्येक माङ्गलिक कर्म में गौरी आदि मातृकाओं की पूजा करनी चाहिये। उनके नाम ये हैं- गौरी. पद्मा, शची, मेधा, सावित्री, विजया, जया, देवसेना, स्वधा, स्वाहा, मातृकाएँ, वैधृति, धृति, पुष्टि, ह्रष्टि और तुष्टि। इनके साथ अपनी कुल देवी और गणेश जी करे। वृद्धि के अवसरों पर इन सोलह मातृकाओं की अवश्य पूजा करनी चाहिये। इन सब की प्रसन्नताके लिये क्रमश: आवाहन, पाद्य, अर्घ्य, (आचमनीय), स्नान, (वस्त्र), चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल, नैवेद्य, आचमनीय, ताम्बूल, पूगीफल, आरती तथा दक्षिणा- ये उपचार समर्पित करने चाहिये। 


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