Tuesday, February 26, 2013

PRAYER प्रार्थना

PRAYER प्रार्थना
 CONCEPTS & EXTRACTS IN HINDUISM 
By :: Pt. Santosh Bhardwaj
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हे परमात्मा मुझे क्षर से अक्षर, नश्वर से अनश्वर बना, समता प्रदान कर और अनन्य भक्ति से परिपूर्ण कर। 
 हे! विघ्न विनाशक गणपति! संवारो बिगड़े काम; मोक्ष मार्ग हो सहज, साधना हो निष्काम। 
करें वन्दना नित्य प्रति, दर्शन दो भगवान; अनन्य भक्ति प्रदानकर संतोष पर करो अहसान॥
मंत्र-जप, देव पूजन तथा उपासना की शब्दावली :: मंत्र जप, देव पूजन तथा उपासना के संबंध में प्रयुक्त होने वाले कुछ विशिष्ट शब्दों के अर्थ
(1). पंचोपचार :: गन्धपुष्पधूप,  दीप तथा नैवैध्य द्वारा पूजन करने को ‘पंचोपचार’ कहते हैं। 
(2). पंचामृत :: दूधदहीघृतमधु (-शहदतथा शक्कर इनके मिश्रण को ‘पंचामृत’ कहते हैं। 
(3). पंचगव्य :: पंचगव्य का निर्माण गाय के दूध, दही, घी, मूत्र, गोबर के द्वारा किया जाता है। पंचगव्य द्वारा शरीर की रोगनिरोधक क्षमता को बढाकर रोगों को दूर किया जाता है। गोमूत्र में प्रति ऑक्सीकरण की क्षमता के कारण डीएनए को नष्ट होने से बचाया जा सकता है। गाय के गोबर का चर्म रोगों में उपचारीय महत्व सर्वविदित है। दही एवं घी के पोषण मान की उच्चता से सभी परिचित हैं। दूध का प्रयोग विभिन्न प्रकार से भारतीय संस्कृति में पुरातन काल से होता आ रहा है। घी का प्रयोग शरीर की क्षमता को बढ़ाने एवं मानसिक विकास के लिए किया जाता है। दही में सुपाच्य प्रोटीन एवं लाभकारी जीवाणु होते हैं जो क्षुधा को बढ़ाने में सहायता करते हैं। पंचगव्य का निर्माण देसी मुक्त वन विचरण करने वाली गायों से प्राप्त उत्पादों द्वारा ही करना चाहिए, शहरों में घूमने वाली और गंदगी खाने वाली गायों से नहीं।
(4). षोडशोपचार :: आवाहन्, आसन, पाध्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, अलंकार, सुगंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवैध्य, अक्षत, ताम्बुल-पान तथा दक्षिणा इन सबके द्वारा पूजन करने की विधि को ‘षोडशोपचार’ कहते हैं। 
(5). दशोपचार :: पाध्य, अर्घ्य, आचमनीय, मधुपक्र, आचमन, गंध, पुष्प, धूप , दीप तथा नैवैध्य द्वारा पूजन करने की विधि को ‘दशोपचार’ कहते हैं।
(6). त्रिधातु :: सोना, चांदी और लोहा अथवा सोना,चांदी तथा ताँबे का मिश्रण। 
(7). पंचधातु :: सोना,  चांदी,  लोहा, तांबा और जस्ता। 
(8). अष्टधातु :: सोना, चांदी, लोहा, तांबा, जस्ता, रांगा, कांसा और पारा। 
(9. नैवैध्य :: खीर, मिष्ठान आदि मीठी वस्तुएँ। 
(10). नवग्रह :: सूर्य, चन्द्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु।
(11). नवरत्न :: माणिक्य, मोती, मूँगा, पन्ना, पुखराज, हीरा, नीलम,  गोमेद, और वैदूर्य। 
(12). देवपूजन हेतु अष्टगंध :: अगर, तगर, गोरोचन, केसर, कस्तूरी, श्वेत चन्दन, लाल चन्दन और सिन्दूर। 
(13). देवी पूजनअष्टगंध :: अगर, लाल चन्दन, हल्दी,  कुमकुम, गोरोचन, जटामासी, शिलाजीत और कपूर। 
(14). गंधत्रय :: सिन्दूर, हल्दी, कुमकुम।  
(15). पञ्चांग :: किसी वनस्पति के पुष्प, पत्र, फल, छाल और जड़।
(16). दशांश :: दसवां भाग।
(17). सम्पुट :: मिट्टी के दो सकोरों को एक-दूसरे के मुँह से मिला कर बंद करना।
(18). भोजपत्र :: एक वृक्ष की छाल। मन्त्र प्रयोग के लिए भोजपत्र का ऐसा टुकडा लेना चाहिए, जो कटा-फटा न हो।
(19). मन्त्र धारण :: किसी भी मन्त्र को स्त्री पुरुष दोनों ही कंठ में धारण कर सकते हैं, परन्तु यदि भुजा में धारण करना चाहें तो पुरुष को अपनी दायीं भुजा में और स्त्री को बायीं भुजा में धारण करना चाहिए।
(20). ताबीज :: ये ताँबे के बने हुए गोल तथा चपटे दो आकारों में मिलते हैं। सोना, चांदी, त्रिधातु तथा अष्टधातु आदि के ताबीज बनवाये जा सकते हैं।
(21). मुद्राएँ :: हाथों की अँगुलियों को किसी विशेष स्थिति में लेने कि क्रिया को मुद्रा कहा जाता है। मुद्राएँ अनेक प्रकार की होती हैं।
(22). स्नान :: यह दो प्रकार का होता है | बाह्य तथा आतंरिक,बाह्य स्नान जल से तथा आन्तरिक स्नान जप द्वारा होता है।
(23). तर्पण :: नदी, सरोवर, आदि के जल में घुटनों तक पानी में खड़े होकर हाथ की अंजुली द्वारा जल गिराने की क्रिया को तर्पण कहा जाता है। जहाँ नदी, सरोवर आदि न हो, वहाँ किसी पात्र में पानी भरकर भी तर्पण की क्रिया संपन्न कर ली जाती है।
(24). आचमन :: हाथ में जल लेकर उसे अपने मुंह में डालने की क्रिया को आचमन कहते हैं |
(25). करन्यास :: अंगूठा, अंगुली, करतल तथा करपृष्ठ पर मन्त्र जपने को ‘करन्यास’ कहा जाता है।
(26). हृद्याविन्यास :: ह्रदय आदि अंगों को स्पर्श करते हुएमंत्रोच्चारण को ‘हृदय्विन्यास’ कहते हैं।
(27). अंगन्यास :: ह्रदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र एवं करतल– इन 6 अंगों से मन्त्र का न्यास करने की क्रिया को अंगन्यास कहते हैं।
(28). अर्घ्य :: शंख , अंजलि आदि द्वारा जल छोड़ने को अर्घ्य देना कहा जाता है |घड़ा या कलश में पानी भरकर रखने को अर्घ्य-स्थापन कहते हैं। अर्घ्य पात्र में दूध, तिल, कुशा के टुकड़े, सरसों, जौ, पुष्प, चावल एवं कुमकुम इन सबको डाला जाता है।
(29). पंचायतन पूजा :: इसमें पांच देवताओं :– विष्णु , गणेश ,सूर्य , शक्ति तथा शिव का पूजनकिया जाता है।
(30). काण्डानुसमय :: एक देवता के पूजाकाण्ड को समाप्त कर, अन्य देवता की पूजा करने को ‘काण्डानुसमय’ कहते हैं।
(31). उद्धर्तन :: उबटन।
(32). अभिषेक :: मन्त्रोच्चारण करते हुए शंख से सुगन्धित जल छोड़ने को अभिषेक कहते हैं।
(33). उत्तरीय  :: वस्त्र।
(34). उपवीत :: यज्ञोपवीत-जनेऊ।
(35). समिधा :: जिन लकड़ियों को अग्नि में प्रज्जवलित कर होम किया जाता है उन्हें समिधा कहते हैं। समिधा के लिए आक, पलाश, खदिर, अपामार्ग, पीपल, उदुम्बर, शमी, कुषा तथा आम की लकड़ियों को ग्राह्य माना गया है।
(36). प्रणव :: ॐ।
(37). मन्त्र ऋषि :: जिस व्यक्ति ने सर्व प्रथम शिव जी के मुख से मन्त्र सुनकर उसे विधिवत सिद्ध किया था, वह उस मंत्र का ऋषि कहलाता है। उस ऋषि को मन्त्र का आदि गुरु मानकर श्रद्धापूर्वक उसका मस्तक में न्यास किया जाता है।
(38). छन्द :: मंत्र को सर्वतोभावेन आच्छादित करने की विधि को छन्द कहते हैं। यह अक्षरों अथवा पदों से बनता है। मंत्र का उच्चारण चूँकि मुख से होता है, अतः छन्द का मुख से न्यास किया जाता है।
(39). देवता :: जीव मात्र के समस्त क्रिया-कलापों को प्रेरित, संचालित एवं नियंत्रित करने वाली प्राणशक्ति को देवता कहते हैं। यह शक्ति मनुष्य के हृदय में स्थित होती है, अतः देवता का न्यास हृदय में कियाजाता है।
(40). बीज :: मन्त्र शक्ति को उद॒भावित करने वाले तत्व को बीज कहते हैं। इसका न्यास गुह्यांग में किया जाता है।
(41). शक्ति :: जिसकी सहायता से बीज मन्त्र बन जाता है वह तत्व ‘शक्ति’ कहलाता है। उसका न्यास पाद स्थान में करते हैं।
(42). विनियोग :: मन्त्र को फल की दिशा का निर्देश देना विनियोग कहलाता है।
(43). उपांशु जप :: जिह्वा एवं होठों को हिलाते हुए केवल स्वयम को सुनाई पड़ने योग्य मंत्रोच्चारण को उपांशु जप कहते हैं।
(44). मानस जप :: मन्त्र, मंत्रार्थ एवं देवता में मन लगाकर मन ही मन मन्त्र का उच्चारण करने को मानस जप कहते हैं।
(45). अग्नि की जिह्वाएँ :–
(I). अग्नि की 7 जिह्वाएँ :- (i). हिरण्या, (ii). गगना, (iii). रक्ता, (iv). कृष्णा, (v). सुप्रभा, ( vi). बहुरूपा एवं (vii). अतिरिक्ता।
(II). (i). काली, (ii). कराली,  (iii). मनोभवा, (iv). सुलोहिता (v). धूम्रवर्णा,  (vi). स्फुलिंगिनी एवं (vii). विश्वरूचि।
(46). प्रदक्षिणा :–देवता को साष्टांग दंडवत करने के पश्चात इष्ट देव की परिक्रमा करने को ‘प्रदक्षिणा’ कहते हैं।
विष्णु , शिव , शक्ति , गणेश और सूर्य आदि देवताओं की 4, 1, 2 , 1, 3, अथवा 7 परिक्रमायें करनी चाहियें |
(47). 5 प्रकार की साधना:-
(i). अभाविनी :– पूजा के साधन तथा उपकरणों के अभाव से, मन से अथवा जल मात्र से जो पूजा साधना की जाती है, उसे अभाविनी कहा जाता है।
(ii). त्रासी :– जो त्रस्त व्यक्ति तत्काल अथवा उपलब्ध उपचारों से अथवा मान्सोपचारों से पूजन करता है, उसे त्रासी कहते हैं। यह साधना समस्त सिद्धियाँ देती है।
(iii). दोवोर्धी :– बालक , वृद्ध , स्त्री , मूर्ख अथवा ज्ञानी व्यक्ति द्वारा बिना जानकारी के की जाने वाली पूजा‘दोर्वोधी’ कहलाती है।
(iv). सौतकी :- सूत की व्यक्ति मानसिक संध्या करा कामना होने पर मानसिक पूजन तथा निष्काम होने पर सब कार्य करें। ऐसी साधना को ‘सौतकी’ कहा जाता है।
(v). आतुरी :- रोगी व्यक्ति स्नान एवं पूजन न करें। देवमूर्ति अथवासूर्यमंडल की ओर देखकर, एक बार मूल मन्त्र का जप कर उस परपुष्प चढ़ाएं फिर रोग की समाप्ति पर स्नान करके गुरु तथा ब्राह्मणों की पूजा करके, पूजा विच्छेद का दोष मुझे न लगे-ऐसी प्रार्थना करके विधि पूर्वक इष्ट देव का पूजनकरे तो इस पूजा को ‘आतुरी’ कहा जाएगा।
(48). अपने श्रम का महत्व :– पूजा की वस्तुएँ स्वयं लाकर तन्मय भाव से पूजन करने से पूर्ण फल प्राप्त होता है। अन्य व्यक्ति द्वारा दिए गये साधनों से पूजा करने पर आधा फल मिलता है।
(49). वर्णित पुष्पादि :– (i). पीले रंग की कट सरैया, नाग चंपा तथा दोनों प्रकार की वृहती के फूल पूजा में नही चढाये जाते।
(ii). सूखे, बासी, मलिन, दूषित तथा उग्र गंध वाले पुष्प देवता पर नही चढाये जाते।
(iii). भगवान् विष्णु पर अक्षत, आक तथा धतूरा नही चढाये जाते।
(iv). भगवान् शिव पर केतकी, बन्धुक (-दुपहरिया), कुंद, मौलश्री, कोरैया, जयपर्ण, मालती और जूही के पुष्प नही चढाये जाते।
(v). माँ दुर्गा पर दूब, आक, हरसिंगार, बेल तथा तगर नही चढाये जाते।
(vi). भगवान् सूर्य तथा गणेश जी पर तुलसी नही चढाई जाती।
(vii). चंपा तथा कमल की कलियों के अतिरिक्त अन्य पुष्पों की कलियाँ नही चढाई जातीं।
(50). ग्राह्यपुष्प :– भगवान् विष्णु पर श्वेत तथा पीले पुष्प, तुलसी, सूर्य, गणेश जी पर लाल रंग के पुष्प, माँ लक्ष्मी पर कमल, भगवान् शिव के ऊपर आक, धतूरा, बिल्वपत्र तथा कनेर के पुष्प विशेष रूप से चढाये जाते हैं। अमलतास के पुष्प तथा तुलसी को निर्माल्य नही माना जाता।
(51). ग्राह्य पत्र :: तुलसी, मौलश्री, चंपा, कमलिनी, बेल, श्वेत कमल, अशोक, मैनफल,  कुषा, दूर्वा, नागवल्ली, अपामार्ग, विष्णुक्रान्ता, अगस्त्य तथा आंवला इनके पत्ते देव पूजन में ग्राह्य हैं।
(52). ग्राह्य फल :: जामुन, अनार, नींबू , इमली, बिजौरा, केला, आंवला, बेर, आम तथा कटहल ये फल देवपूजन में ग्राह्य हैं।
(53). धूप :: अगर एवं गुग्गुल की धूप विशेष रूप से ग्राह्य है। चन्दन-चूरा, बालछड़ आदि का प्रयोग भी धूप के रूप में किया जाता है।
(54). दीपक की बत्तियां :: यदि दीपक में अनेक बत्तियाँ हों तो उनकी संख्या विषम रखनी चाहिए।दायीं ओर के दीपक में सफ़ेद रंग की बत्ती तथा बायीं ओर के दीपक में लाल रंग की बत्ती रखनी चाहिए।
  • प्रार्थना :: हे परम पिता परमेश्वर, पर ब्रह्म परमेश्वर, जगदीश्वर मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें कि मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर जगदीश्वर भगवान् सदाशिव में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। 
  • आदिदेव महादेव, भगवान्  ब्रह्मा, विष्णु, महेश मुझ अकिंचक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परम धाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। 
  • आदि माता भगवती, उमा पार्वती, लक्ष्मी, सरस्वती मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। 
  • भगवान्  लक्ष्मी-नारायण-शेष नाग मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो।
  • माँ गायत्री-सावित्री, भगवान ब्रह्मा जी महाराज मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें कि मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। 
  • भगवान्  सदाशिव, माता पार्वती, गणपति जी महाराज, कुमार कार्तिकेय, नंदी बाबा जी  महाराज, हनुमान जी बाबा जी महाराज, रिद्धि, सिद्धि, शुभ लाभ मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो।  
  • भगवान रत्नाकर, समुद्र देवता, वरुण देवता, माता गंगा, यमुना सरस्वती, नर्मदा, कावेरी, गोदावरी, गोमती मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो।  
    Inside the Nag Temple (dozafar) Tags: vishnu lakshmi hindutemple sheshnag uttarkashi uttarakhand hindupainting tiloth nagtemple
  • कुल देवता,  नाग देवता, भगवान अनंत मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो।  
    Shri Narayan on Shri Sheshnag (Yadupati) Tags: hinduism vishnu narayana lakshmidevi hanuman naradamuni ganesh shiv parvatidevi nandi garuda brahma sheshnag andakinnarachoristerwithhorsehead
  • भगवान् शेष नाग, नागराज वासुकी, कर्कोटक, महात्मा तक्षक मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो।    
  • देवात्मा देवराज इंद्र, परम पवित्र अग्नि देवता, पवन देव, वरुण देव, समस्त मेध गण और बिजलियाँ मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर  में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो।   

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  • श्री हनुमान जी बाबा जी महाराज मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। मुझे तुम्हारा दर्शन और आशीर्वाद नित्य प्राप्त हॉट रहे। मेरे शरीरिक, मानसिक, भौतिक, आध्यात्मिक, काम और मोह विकार सदासर्वदा के लिए, जन्म-जन्मांतरों के लिये नष्ट हो जायें। 
  • भगवान्  वेद व्यास, देवऋषि नारद, सप्तऋषि गण, ब्रह्मऋषि गण, माता भगवती, माता  सरस्वती, गणपति बाबा जी महाराज मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो।हे प्रभु! मैं केवल वही लिखूँ जो सत्य, तुम्हारा कथन और मन्तव्य हो। मैं जो कुछ भी लिखूँ मुझे समझ में आये। मेरे लिखने में कोई भूल, गलती, त्रुटि हो तो उसे क्षमा करके शुद्ध कर देना। लिखे को अनन्त असंख्य लोग पढ़ें और सात्विक विचारों को ग्रहण करके जीवन में उपयोग में लायें। उनके कल्याण के साथ-साथ मेरा भी कल्याण हो जाये।  


  • भगवान् सूर्य व चन्द्र देव  मुझ अकिंचक पर प्रसन्न हों! मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। मैं तेजस्वी ओजस्वी बनूँ। मेरे शरीरिक, मानसिक, भौतिक, आध्यात्मिक, काम और मोह विकार सदा-सर्वदा के लिए, जन्म-जन्मांतरों के लिये नष्ट हो जायें। 
  • समस्त देवगण, ऋषिगण, पितृगण, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग, राक्षस,  दैत्य आदि प्रजातियाँ! मुझ पर प्रसन्न हों। मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। 
  • भगवान्  नर, नारायण, बद्रीनाथ, केदारनाथ! मुझ पर प्रसन्न हों। मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। 
  • बाबा विश्वनाथ, महाकाल, रामेश्वर! मुझ पर प्रसन्न हों। मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वरमें, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। मुझे तम्हारे, द्वारकाधीश, द्वादस ज्योतिर्लिंग और तिरुपति बाला जी महाराज का दर्शन और आशीर्वाद निरंतर प्राप्त होता रहे। 

  • भगवान्  तिरुपति बाला जी महाराज! मुझ अकिञ्चक पर प्रसन्न हों। मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर जगदीश्वर भगवान् सदाशिव में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो।
  • भगवान् सदाशिव, माता पार्वती, गणपति बाबा  महाराज, भगवान् कार्तिकेय और नंदी महाराज! मुझ पर प्रसन्न हों। मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद् बुद्धि, सद् भावना, समता, सद् गति प्रदान करने के साथ-साथ, मुझ पर ऐसी अनुकम्पा-कृपा करें  कि  मेरी शुद्ध सात्विक, मनोकामनाएँ, महत्वाकांक्षाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायें। मैं परम पिता पर ब्रह्म परमेश्वर में, सदा सर्वदा के लिए, स्थाई रूप से लीन और एकाकार हो जाऊँ। मुझे मेरे परिवार, पूर्वजों, पितरों ऋषियों सहित परम सुख, अनंत सुख, अक्षय सुख, परमानन्द, परमधाम की प्राप्ति हो। मेरा व्यवहार अनुकरणीय, सौहार्द पूर्ण, निर्मल, विनम्र और विवेक पूर्ण हो। 

 हे प्रभु! मुझ में तेरे प्रति श्रद्धा, भक्ति, विश्वास, आस्था,  निष्ठा,  प्रेम और ज्ञान की ज्योति सदैव जाग्रत-कायम रहे। समस्त प्राणियों के प्रति करुणा मय प्रेम हो। तुम्हारी कृपा  से  मेरे शरीर, आत्मा, बुद्धि-विवेक, मन, प्राण, चेतना, ध्यान, चित्त में, तुम्हारा, देवी देवताओं, परमात्मा, माँ भगवती, परम पिता परब्रह्म परमेश्वर भगवान सदाशिव का नित्य निवास-स्थाई निवास हो।

O God! Kindly bless me with faith, devotion, trust-confidence-reliance-belief, belief-inclination-regard-respect, reverence-devotion-faith-allegiance-devout-fulfilment of all religious duties, love-affection, and knowledge-enlightenment along with compassion-pity-mercy-tenderness towards all creatures for ever. My body, soul, intelligence-mind-brain, prudence, mood-mind and heart, vital breath, consciousness-recollection-intelligence of mind, attention of mind-contemplation-meditation-memory, reflection-thought-understanding of mind should become permanent abode of the Almighty, Mother Bhagwati, Per Brahm Parmeshwar  Bhagwan Sada Shiv.

हे प्रभु! मुझे व मेरे स्वजनों को मुक्ति, भक्ति, आत्म शुद्धि, सद्बुद्धि, सद भावना, सदगति  प्रदान कर। तेरी कृपा से हमारी  समस्त शुद्ध  सात्विक इच्छाएं, मनोकामनाएँ, मनोरथ सिद्ध हो जायं। हमें तुम्हारी अविचल, निश्छल, अनन्य, अनुपम, दिव्य, परम, अनन्त, अद्वितीय, नित्य, निर्मल  भक्ति की प्राप्ति हो।

O! Almighty kindly bless me, my relatives and fellow people with detachment-liberation-salvation, devotion, purity of body-mind-heart and soul, prudence-enlightenment-purity of thoughts, good-feelings-thoughts-will,  and peaceful transformation to next birth.

 हे परमात्मा-दयानिधान! कृपा करके मुझे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, मुक्ति, भक्ति एवं  परमानंद प्रदान कर !

Almighty kindly bless me with religiosity, finances, sensuality (-ability to perform righteous sex for family life/household duties, which considered as the best ashram), salvation, detachment (-from vices-defects-sins-wickedness), devotion and Ultimate bliss-happiness.
तेरी  छत्र छाया, मुझ पर, मेरे परिवार पर, सदा बनी रहे। हमें मुक्ति, भक्ति, आत्मशुद्धि, सद्बुद्धि सद्भावना, अनंत सुख-अक्षय सुख-परम सुख, परमानन्द की प्राप्ति हो।

Let the asylum-protection-shelter under you, be always available-bestowed upon me, my family-household members and fellow people.
हे परमात्मा ! हे भगवान ! कृप्या मुझे समस्त शारीरिक मानसिक दोषों, विकारों, विषय, वासनाओं, व्याधि-बीमारी-रोगों-तनावों  से मुक्त कर। O! God kindly protect me from vices-defects-wickedness.
One should not smear, stained, sullied, engross, discredited, attached, sullied to the following and get rid of them, as early as possible.
(1).काम (Sexuality-sex blindness-lust-sensuality-passions-wanton-lust-amorous) :: काम दैवी श्रष्टि और मैथुनी श्रष्टि दोनों को समान रूप से प्रभावित करता है। काम देव और चन्द्र दोनों ही ब्रह्मा जी के रूप ही हैं। ब्रह्मा जी ने स्वयं काम की रचना की और स्वयं ही उससे ग्रस्त हो गये।  भगवान शिव को भी काम ने त्रस्त किया और उन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया। मोहिनी अवतार ने भगवान शिव को मोहित कर दिया परन्तु वे भगवत कृपा से उसके दुष्प्रभाव से बच गये। विश्वामित्र जैसे ऋषि भी इसके जाल से निकल नहीं पाये। इस विकार से बचना असम्भव नहीं है, दृढ निश्चय-तप-ब्रह्मचर्य-भगवत भक्ति-शुद्ध विचार, विवेक, सद्बुद्धि  काम के आवेग को रोकते हैं। 
Its really very difficult to overcome-overpower the sex urge. Still one is capable of controlling-diverting this to devotion in God. [Please read more-Kam Yog, Sex Education of these blogs: bhartiyshiksha.blogspot.com  santoshkipathshala.blogspot.com]
(2). क्रोध (Anger-fury-rage-resentment-wrath) :: राग-द्वेष-ईर्ष्या, इच्छाओं की पूर्ति न होना, क्रोध उत्पन्न करता है। क्रोध में आकर व्यक्ति अपना नुक्सान ज्यादा करता है दूसरे का कम। One must control anger, not to repent later. Any act done in a fit of anger may put one  in trouble for the whole life. Life is spoiled. Always avoid such situations. Its better if you avoid anger. Anger is not bad if it is meant for the improvement-betterment of the depraved-corrupt-sinner-our children-society-self-others.

(3). मद (Intoxication-pride-arrogance-conceit-vanity) :Its the root cause behind the down fall of the mighty. Power, wealth, recognition, flattery corrupts the minds of such people. They start comparing them selves with God. The presume that they are capable of doing everything.One who suffers with this stigma is sure to loss his prestige-power-wealth-recognition-respect and human incarnation in next births. He is destined to hells for millions of years. Never have too high opinion about your self.

(4). लोभ (Greed-eager-covet) :There is no end of desires. As soon one is satisfied, another one develops-grows. It creates restlessness-instability till the goal (targets, desires, ambitions) are not fulfilled. One can never live with peace. Satisfaction-Santosh-contentment is the key to live peacefully. Make efforts without greed.
(5). मोह (Allurement-delusion-ignorance) :: One will not be able to qualify for assimilation in God-liberation, till he over powers this faculty.It keeps one struck-attached with the world. One has affection-attachments for the children-relations-property-wealth etc. Indifference-neglect is useful. Which can not be cut easily. One can seek guidance-help from the enlightened-Guru.

(6). ईर्षा (Envy-jealousy) :One feels that he should have all that which is possessed by others. As soon as he notices that some thing new (worthy, precious, useful) is acquired by others he starts longing for it. Failure to obtain it fills him with dis satisfactions-distress-anger. The results of which are never good for him and the society. Contentment-self satisfaction-discipline-minimisation of needs-desires is helpful.

(7). आलस्य (Laziness) :Its an evil which does not allow to attain the desired material, philosophical or spiritual goals.One seldom achieve success in life if he remains sluggish. Health conscious person always remain active, alert and ready to perform any duty assigned to him.
(8). मान (Pride, vanity, self respect) :Its good to be proud of ones country, children but one must not be over powered by this defect. Hirany Kashyap, Hiranyaksh Ravan, Kans, Shishu Pal were killed because they considered them selves to be above all-the greatest. One must maintain his dignity-self respect-prestige, but not by degrading others. All creatures have the same soul-its only the body which is different by virtue of the Karm-deeds. The egoist will certainly meet down fall.
(9). अपमान (Insult, disrespect, disgrace, contempt, curse, reproach) :One must respect others and their sentiments even if they do not resemble his thoughts. In not good to dishonour others without any valid reason. Chanky was insulted by Maha Nand which led to the elimination of his dynasty and crowning of Chandr Gupt Maury.
(10). भय Fear :: One should never be afraid of others. There is no reason to be afraid of the parents, elders, well wisher and the Almighty. We should be afraid of our sins, wickedness which sends us to hells and lower species. It does b not mean that one has to become over confident and too bold. Always asses the danger and act wisely-prudently-carefully-precisely remembering the God all the time. Fear can be over come easily.
(11). निद्रा Sleep, Drowsiness :One should not sleep for more than 8 hours. A sound sleep removes tiredness-fatigue and makes one alert, stable and fine. In stead of drowsing all the time one should prefer a sound sleep. It dangerous for own and others life. Never sleep while driving-navigating-flying. Arjun over powered sleep through practice-Yog. One can easily control sleep through practice and Yog. Always too hard work and fatigue. rest is an essential part of our daily routine. [Please refer to longevity of this blog for more knowledge] The God takes refuge in Yog Nidra-sleep.
(12). थकान Tiredness :One must avoid extreme physical and mental tiredness.Its not good for health. Amusement-entertainment are essential parts of our lives to shed off tiredness. Yog and refuse in God are alternate remedy for fatigue-tiredness. Increase stamina-enhance energy-boost power and start taking regular physical exercise and Yog. Consume healthy nourishing food,avoid meat-wine-women-fish-egg-narcotics-drugs.

(13). शोक Grief, condolence, mourning : Its not good to be under the cloud of grief for the ones who are dead for long. control yourself and be busy with the daily routine-chores of life. God-religion-social gatherings-congregations are good remedy for this. Its a temporary phase in each and every one's life.
(14). संताप Anguish, suffering, grief, remorse, trauma : Too much of every thing is bad. Control your self. One who has given grief will pull you out of it as well. Take a look at the future-brighten it.
(15). दुःख Sorrow, pain, sadness, grief, distress :There is nothing to be afraid or fear the pains-tensions-failures. They come and go. Over power them. They are meant to educate you, help you in finding out solutions. Remember nothing is difficult for the one who is determined-confident-brave-alert-conscious.
(16). कष्ट Trouble, difficulty : They come as routine. One must not be afraid of them and face them with confidence. They are the out come/result of current/previous deeds. Never try to escape them. Have faith in God.
(17). पाप SIN तीन प्रकार का होता है ::  (17.1). शारीरिक-कार्मिक, (17.2). वाचिक और (17.3). मानसिक। 
शारीरिक :: किसी भी प्राणी को शारीरिक आघात-कष्ट पहुँचाना। 
वाचिक :: वचनों-वाणी-शब्दों से अपमान-तिरस्कार-दिल दुखाना-क्रोध करना । 
मानसिक :: बुरा सोचना-दुर्भावना रखना-बदले की चाहत। 
पाप को प्रायश्चित, आराधना, तपस्या, दूसरों की मदद करके कम किया जा सकता है।
(17.1). परस्त्री की संगति, पापियों के साथ रहना और प्राणियों के साथ कठोरता का व्यवहार करना। 
(17.2). फलों की चोरी, आवारागर्दी, वृक्ष पेड़ काटना।
(17.3.1). वर्जित वस्तुओं को लेना, (17.3.2). वे कसूर को मारना, जेल-बन्धन में डालना, धन की प्राप्ति के लिये मुकदमा करना। 
(17.4). सार्वजनिक सम्पत्ति को नष्ट करना धर्म-नियमों के विपरीत चलना। 
(17.5). पुरश्चरण आदि तान्त्रिक अभिचरों से किसी को मारना, मृत्यु जैसा अपार कष्ट देना, मित्र के साथ छल-छंद, झूँठी शपथ, अकेले मधुर पदार्थ खाना। 
(17.6). फल-पत्र-पुष्प की चोरी, बंधुआ रखना, सिद्ध की प्राप्ति में बाधा डालना और नष्ट करना, सवारी के सामानों चोरी। 
(17.7). राजा को देय राशि में घपला, राजपत्नी का सन्सर्ग और राज्य-देश का अमंगल। 
(17.8). किसी वस्तु या व्यक्ति पर लुभा जाना, लालच करना, पुरुषार्थ से प्राप्त धर्म युक्त धन का विनाश करना, लार मिली वाणी-चिकनी-चुपड़ीबातें करना बनाना। 
(17-9) ब्राह्मण को देश से निकालना, उसका धन चुराना, निंदा करना तथा बन्धुओं से द्वेष-विरोध रखना।
(17.10). शिष्टाचार का नाश, शिष्ट जनों से विरोध, नादान-अबोध बालक की हत्या करना, शास्त्र-ग्रंथों की चोरी, स्वधर्म का नाश-धर्म परिवर्तन।
(17.11). वेद-विद्या, संधि विग्रह, यान, आसन, द्वैधी भाव, समाश्रय-राजनैतिक गुणों का प्रतिवेश। 
(17.12). सज्जनों से वैर, आचारहीनता, संस्कार हीनता, बुरे कामों से लगाव। 
(17.13). धर्म, अर्थ, सत्कामना की हानि, मोक्ष प्राप्ति में बाधा डालना या इसके समन्वय में विरोध उत्पन्न करना।
(17.14). कृपण,  धर्म हीनता, परित्याज्य और आग लगाने वाला।
(17.15). विवेकहीनता, दूसरे के दोष निकालना, अमंगल-बुरा करना, अपवित्रता एवं असत्य वचन बोलना। 
(17.16). आलस्य, विशेष रूप से क्रोध करना, सभी के प्रति आतताई बन जाना और घर में आग लगाने वाला।
(17.17). परस्त्री की कामना, सत्य के प्रति ईर्ष्या, निन्दित एवं उदण्ड व्यवहार। 
(17.18). देव ऋण, ऋषिऋण, प्राणियों के ग्रहण-विशेषत :- मनुष्यों एवं पित्तरों का ऋण, सभी वर्णो को एक समझना, ॐ औंकार  के उच्चारण में उपेक्षा भाव रखना, पापकर्मों को करना, मछली खाना तथा अगम्या स्त्री से संगत; महापाप हैं। 
(17.19). तेल-घृत बेचना, चाण्डाल से दान लेना अपना दोष छिपना और दूसरे का उजागर करना घोर पाप हैं। 
(17.20). दूसरे का उत्कर्ष देखकर जलना, कड़वी बात बोलना, निर्दयता, भयंकरता और अधर्मिकता। [वामन पुराण]
Sin is divided into three categories :-
(1). PHYSICAL :: The abuse is carried out physically by torture, murder, beating-thrashing, assault, tying, inflicting pain by harming bodily, over powering.
(2). VOCAL :: Speaking harsh words, insult, abusing, making fun, cutting jokes, rejection, mental agony-turpitude, harassment.
(3). MENTAL :: Thinking bad of others, desire for revenge, bad motives, desire for illicit relations, sensuality, passions, pride, ego, greed. 
Any deed-action-maneuver, preformed with bad intentions to harm others, amounts to sin. Harming others whether intentional or without intention-chance-happening is sin. Penances, repentance, ascetics, prayers devotion to God, helping others-poor-down trodden-elders-needy, pity on others, forgiving.
SIN-VICE (Devil, satanic, wicked, vicious, corrupt, villain, wretch, enemy) :: One is subjected-forced into the hells for thousands and thousands of years, become insect, worm, animal, tree on his release from the hells. The God provides him with an opportunity to improve by giving birth in human incarnation. This opportunity must be utilises for our own sack.
(17.1). Company of others women, wicked and too strict behaviour.
(17.2).  Stealing of fruits, roaming aimlessly with leisure, cutting-felling of trees.
(17.3). Acceptance of restricted goods, killing, beating, imprisoning, filing of false cases against for the sake of extracting money against the innocents. 
(17.4). Destruction of community property and acting against the religious rules-scriptures-epics-code.
(17.5). Killing of people through ghostly-wretched actions, torture like-comparable to death, cheating with friends-relatives-well wishers, false promise, ignoring colleagues-friends-relatives, sitting nearby while sweets. 
(17.6). Theft of vegetation-leaves-fruits-flowers, either vehicles or their components, keeping bonded labor, creating troubles-hindrances in the way of devotees busy in meditation asceticism.
 (17.7). Contact-relations with the queen, action against the country and non payment of the state dues. 
(17.8). To become greedy (-bait, lure, to temp, to decoy,intense desire, avarice) for a person or thing,  to be greedy and to destroy the wealth-money earned through righteous-honest means. 
(17.9). To expel a Brahmn (-Pundit, scholar, learned, enlightened) from the country, snatching-looting his money-wealth-property, spoiling the money earned through righteous means-honest-pure means, envy-anguish with the relatives-friends.
(17.10).  Loss of decency, opposition with the descent people, murder of infants-kids, theft-stealing of scriptures-epics-holy-religious books, change-conversion from own religion and acting against the religion.
(17.11). Action against the Veds-Purans-Upnishads, breaking of treaties, destabilising from vehicle-seat-couch, duality in behaviour, equanimity with the political thoughts-ideas-philosophy. 
(17.12). Rivalry-enmity with the descent people-gentle men, lack of virtues-manners, lack of ethics, attachment to bad deeds-vices-wickedness-devilish.
(17.13). Loss of religiosity, money-wealth-finances-budget, loss of good thoughts-ideas, prohibiting in the attainment of Liberty-Salvation-The Ultimate-Almighty.
(17.14) Miserliness, lack of religiosity, one to be rejected-expelled from family-society and the one who ignites fire to others possessions.
(17.15). Imprudence, finding faults with others, doing bad, impurity and speaking untrue-slur.
(17-16). Laziness, furor-being angry-anguish, becoming tyrant to all, burning homes-houses-inhabitants-huts-tents. 
(17.17). Desire for someone else's wife-abduction-forcefully or otherwise luring others women, enmity for truth, bad insensitive abnormal behaviour.
(17.18). All sorts of debt pertaining to elders, ancestors-failure to pay debt-debt servicing, considering all castes to be equal, keeping anti opinion-negligence-rejection-opposition against the pronunciation of Om-Onkar-ॐ : the sound created at the time of evolution, eating fish, sex with impure-wretched women are extreme sins.
(17.19). Selling of oil-ghee, accepting of donations-charity from a Chandal-one who performs last rights in cremation ground-extremely low caste person who lives away from the periphery of civilians-cities, hiding of own faults and exposing others are the ulterior sins.
(17-20). To envy others rise, always speaking the bitter, lack of pity, to act terribly like a monster-fearsome-terrible-dangerous-desolate.
Prayers, donations-charity, fasting, bathing in pious rivers-ponds-lakes on auspicious occasions-festivals, vising holy places-holy rivers, helping poor-down trodden-weaker sections of society, participation in religious activities, chanting-recitation-singing-celebrating-remembering of God's names on auspicious occasions, meditation, asceticism, thinking-analysing God's deeds are some of the actions which helps in getting rid from sins. sins carry the sinners to rigorous hells. On being released from them the soul goes to the species like insects-worms-animals.
(18). मत्सरी Envious, jealous, hostility :: Envy-jealousy-hostility leads to unnecessary desires and competitions. One indulge in acquisitions, which makes his bond-attachments strong with the world , making it difficult for him to relinquish it and attain liberation.
(19). प्रमाद Intoxication, frenzy :: One who attain power-worldly acquisitions generally become intoxicated. Those who never had it before, are plagued by this disease. They start thinking that they are above law and rest of the people, leading to their down fall. The sooner they rise the earlier the fall from grace.
(20). निंदा Blame, censure, scorn, abuse, defamation, slander, criticism, blasphemy, scolding, reproach, scorn :: Always avoid these things as far as possible. They only lead to displeasure-discomfort-disharmony and spoiled relations. Never blame or censure those in power, since these people are revengeful and harm one at the first opportunity, specially in today's climate.
(21). त्रष्णा Thirst-desires-longing :: Satisfaction-contentment is essential if you want to live peacefully. Desires have no limit. As soon as one desire is met the other comes forward.
(22). अहंकार-दंभ-दर्प-अभिमान Egotism-pride-arrogance :: Those who considered them selves to be powerful and above all, are no more with us. One can not become God, how so ever mighty he be.
(23). भोग Pleasure-gratification-enjoyment, suffering :: Pleasure leads to formation of ties with the world which may result in sin and suffering. Pleasure and pain are the two sides of the same coin. Neutrality towards them makes one closer to the Almighty.
(24). कुमती Evil thoughts-ideas, plans, designs :: Think before you act. One who act without analysing the consequences of his deeds, leads to trouble, ultimately. 
(25). विलास (Sensuous pleasure-flirting, luxurious life :: This leads to dissatisfaction from sex. Such people always suffer from venereal diseases-AIDS-black mail, disturbed family life. They loss their peace of mind. 
(26). दंभ Pretence-hypocrisy, deceit, boasting, ostentation :: One who is not so mature-intelligent-wise-prudent will suffer from this defect. Never show off your acquisitions. Protect them for lean period-difficult times.
(27). निराशा Despair-disappointment-hopelessness :: Never dream that high which you may not be able to attain instantaneously. Gradual rise is good. Go up step by step. Wait for the opportunities to come and catch hold of them, as soon as they come. Always remember the God. Your present, accumulated and deeds in previous births will modify your destiny. Nothing is too difficult to attain. Try to attain the God-Moksh-Salvation. 
(28). घृणा-द्वेष Hatred-aversion-enmity-spite :: It develops automatically when some one react-abuse-tease-tortures-troubles-scorn you without any valid reason. Its better you move away from the company of such people. Discard-avoid-repel them, away from you.
(29). अपशब्द Abuses :: Some people use abuses as a slang. Some do not miss an opportunity to abuse others. One must dissociate such people since he may also acquire this bad habit-evil. Always exercise restraint-control over the tongue. 
(30). असत्य Falsehood-lies-fake-incorrect ::  A lie spoken to save protect the innocent is not a sin. Those who are in a habit of telling, lies invite troubles for them selves in one or the other form. In fact they reserve their berth in the hells. 
(31). अधर्म Irreligiosity-unrighteousness-immorality-wickedness-sins-crime-guilt-impiety :: One who act against the humanity is irreligious. Visiting holy places, shrines, bathing in holy rivers, does not make you virtuous-pious-devoted to God.  Just by remaining away from criminality, anti social activities one may become religious. Scriptures have defined Varnashram Dharm for each and every one.
(32). कुटैव Bad habits-thought-ideas :: One loss his health, mental peace-harmony if  he indulge in bad company, habits. they are always harmful.
(33). कुविचार Ku Vichar-bad-wicked ideas-negative thoughts :: Reading vulgar books, watching vulgar films, bad company moves one to thoughts, which will spoil his present and future births.
(34). कुसंगति Ku Sangti, evil-wretched-bad company :: It always add to ills, bad ideas, imprudence. No chance is left for reforming such people.

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